सोमवार, जून 27, 2005

संस्कृति सभ्यत्ता की रक्षा

घर के पास एक खेत में खिले लाल पौपी के फ़ूल
आज अपने ब्लौग पर पहली टिप्पड़ीं मिली श्री अनूप शुक्ला की जो अनुगूँज नाम के वेब पृष्ठ को चलाते हैं जहाँ हिन्दी में ब्लौग [चिट्ठा] लिखने वाले आपस में बातचीत कर सकते हैं. अनुगूँज का ही एक प्रयत्न है कि चिट्ठा लिखने वाले एक विषय पर कुछ लिखें. शायद इसका उद्देश्य है कि हम लोग फ़िर एक दूसरे के चिट्ठों को पढ़ने के लिये प्रेरित होंगे वरना तो हर कोई सिर्फ अपने अपने चिट्ठों मे लगा रहेगा और हम लोग एक साथ अपना सामूहिक संगठन नहीं कर पायेंगे? इस माह का विषय है "माजरा क्या है". अगला ब्लौग मेरा भी इसी विषय पर होगा.

कल शाम को बाग में एक पाकिस्तानी दम्पती से मुलाकात हुई. अपनी चार पाँच साल की बेटी के साथ सैर कर रहे थे. बात करने लगे तो वह कहने लगे की उनकी पत्नी सिर्फ घर में रहतीं हैं, न तो उन्हें कुछ इतालवी भाषा आती है और न ही वह चाहतें हैं कि पत्नी उसे सीखें या अकेले बाहर जाने की सोचे, काम करने की सोचना तो बहुत दूंर की बात है. थोड़ी देर तो मैने उनके विचार बदलने के लिये बहस शुरु कर दी मगर फ़िर देखा के हम दोनों को ही गुस्सा आने लगा है तो चुप हो गया. उनका ख़्याल है यही तरीका है यहाँ रह कर अपनी संस्कृति और सभ्यता को बचाने का. इस पूरी बहस के दौरान उनकी पत्नी ने एक शब्द भी नहीं कहा न ही उन्होंने अपनी पत्नी की कोई राय इस बारे में जानना आवश्यक समझा.
एक बाद में इस बारे में सोच रहा था तो इलाहाबाद में छोटे फ़ूफा के बड़े भाई की याद आ गयी. वह भी तो कुछ इसी तरह सोचते थे. लड़कियाँ पढ़ सकतीं थीं और इसलिये निन्नी दीदी, किरन, सभी ने बीए मेए करके भी घर में बन्द रहतीं थी, क्यौंकि बेटियों के नौकरी करने से परिवार के आत्म सम्मान को ठेस लगती थी. जाने कितने परिवार होंगे आज भी जहाँ ऐसा ही सोचते हैं लोग और लड़कियाँ घुट घुट कर सारा जीवन गुज़ारने को ही अपना धर्म समझती हें.

आज की कविता मे हैं महादेवी वर्मा की कुछ पंक्त्तियाः

तुम हो विधु के बिम्ब और मैं मुग्धा रश्मि अजान,
जिसे खींच लाते अस्थिर कर कौतूहल के बाण.

स्वरलहरी मैं मधुर स्वप्न की तुम निन्द्रा के तार,
जिसमें होता इस जीवन का उपक्रम उपसंहार.

मुझे बाँधने आते हो लघु सीमा मे चुपचाप,
कर पाओगे भिन्न कभी क्या ज्वाला से उत्ताप?


1 टिप्पणी:

  1. सुनीलजी,ये जो अनुगूँज है वह मैं अकेले नहीं चलाता न ही यह कोई वेबपेज है।दरअसल यह हम हिंदी के ब्लागर बारी-बारी से विषय देते हैं जिस पर साथी लोग अपने ब्लाग में लिखते हैं । जिनकी
    समीक्षा विषय देने वाला करता है। विषय की घोषणा तथा ब्लाग का अवलोकन अक्षरग्राम पर किया जाता है। पुराने सारे विवरण अक्षरग्राम(अनुगूँज) पर
    उपलब्ध हैं। अक्षरग्राम हम लोगों की चौपाल की तरह है। इस सामूहिक ब्लाग मेंलोग अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं। सारे ब्लाग की लिंक तथा नवीनतम पोस्टकी जानकारी चिट्ठा विश्व में मिल जायेगी। हम लोग निरंतर नाम की मासिक पत्रिका भी निकालते । ब्लाग का मासिक अवलोकन चिट्ठा-चर्चा में करते हैं। मैं फुरसतिया नाम से ब्लाग लिखता हूँ। मेरे पुराने लेख यहां मिलेंगे। आपके चिट्ठों की नियमितता तथा स्तर देखकर मन बहुत खुश है। बधाई फिर से बढ़िया लिखने के लिये। आप हमारे साथियों के ब्लाग पढ़ें ।बहुरंगी /इन्द्रधनुषी है हमारा परिवार जिसमें आप भी शामिल हो गये।

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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