बुधवार, सितंबर 28, 2005

यह शरीर किसका ?

कल की तरह आज का विषय भी यौन सम्बंधी है. यही नहीं, कठोर भी है, जिसे पढ़ कर अच्छा न लगे. अगर आप फिर भी इसे पढ़ते हैं, और आप को बुरा लगे तो मुझे नहीं कोसियेगा.

आज बात करना चाहता हूँ स्त्री यौन अंगो की कटायी की, यानि कि female genital mutilation और इसके खिलाफ वारिस दिरिए की लड़ाई की. वारिस सोमालिया से हैं और एक प्रसिद्ध माडल हैं, कुछ फिल्मों में भी काम कर चुकी हैं. उन्होंने अपने जीवन के बारे में एक किताब लिखी है Desert Flower (रेगिस्तान का फ़ूल). वह इस किताब में अपनी, अपनी बहनों की और अपने जैसी लाखों लड़कियों के जीवन में होने वाले इस समाज स्वीकृत अपराध के बारे में बताती हैं.


बहुत से देशों में, विषेशकर उत्तरी अफ्रीका तथा मध्य पूर्व में, यह प्रथा प्रचलित है. विश्व स्वास्थ्य संस्थान के अनुसार, सोमालिया, इथिओपिया, कीनिया जैसे देशों में करीब ६० प्रतिशत लड़कियों और स्त्रियों के जीवन प्रभावित करती है. स्त्री यौन अंगों की कटायी अलग अलग देशों में भिन्न तरह से होती है. सबसे अधिक प्रचलित तरीका है कि यौन अंग का बाहरी हिस्सा काट दिया जाये और अंग खुला कर दिया जाये. पर बहुत सी जगह, इसमें स्त्री यौन अंग को भीतर तक काट कर उसे धागे से सिल दिया जाता है. यह "आपरेशन" गाँव की दाईयाँ बिना किसी एनेस्थीसिया के करती हैं और अधिक खून निकलने से या इन्फेक्शन होने से कई बार इसमें लड़की की मृत्यु भी हो जाती है. आपरेशन सात-आठ साल की उम्र से ले कर सतरह-अठारह बरस तक किया जाता है. पिशाब करने के दौरान, माहवारी के समय और बच्चा पैदा करते समय इससे लड़की को पीड़ा होती है जो सारा जीवन उसे नहीं छोड़ती.

पर बात केवल गरीब, अनपढ़, गाँव में रहने वालों की नहीं, धनवान परिवार इसे शहरों में डाक्टरों की सहायता से पूरी हिफाजत से भी करवाते हैं. यूरोप और अमरीका में रहने वाले प्रवासी, इसे अपने समाज के प्रवासी डाक्टरों की मदद से छुप छुप कर करवाते हैं. कुछ बार कहा गया है कि यह मुसलमानों मे ही होता है पर यह सच नहीं है. जिन जगहों पर यह प्रथा प्रचलित है, वहाँ सभी धर्मों के लोग इसे अपनाते हैं.

कहते हैं कि यह प्रथा उनकी संस्कृति की रक्षा के लिए आवश्यक है और इसे रोकने के सभी प्रयासों पर दंगे शुरु हो जाते हैं. यह प्रथा जरुरी है ताकि लड़कियों का कुँवारापन उनके पतियों के लिए सुरक्षित रखा जा सके. इसका अन्य फायदा है कि इससे स्त्री को यौन सम्बंधों में पीड़ा होगी, इसलिए वह परमर्दों को नहीं देखेगी और परिवार टूटने से बचेंगे. जिन समाजों में लड़कियों को अपने से उम्र में बड़े पुरुषों से उनके विवाह का चलन हो, वहाँ परिवार की रक्षा और भी जरुरी हो जाती है.

शादी की रात को पति देव अपने जोर से उस धागे से सिले अंग को खोलेंगे, तो कसे बंधे अंग में उन्हे अधिक आनंद आयेगा. उनका आनंद कम न हो, इसलिए कई जगह बच्चा जनने के बाद, सूई धागे से अंग को दोबारा सिल कर कसा जाता है. वारिस पूछती है, "यह शरीर किसका है, असली प्रश्न तो यही है ? मेरे पिता का, मेरे भाईयों का, मेरे पति का, मेरे बेटों का ?" आप क्या उत्तर देंगे उसे ?

आज मुझे तीन दिन के लिए बाहर जाना है इसलिए रविवार तक चिट्ठे की छुट्टी.

मंगलवार, सितंबर 27, 2005

गालियों का सामाजिक महत्व

यह बात पहले अनूप ने चलायी, फिर कालीचरण जी ने उसमें भोपाल का किस्सा जोड़ दिया, तो सोचा कि ऐसे गंभीर विषय पर और विचार होना चाहिये. गालियों की बात करेंगे तो गालियों का विवरण भी कुछ स्पष्ट होगा, हालाँकि मैं कोशिश करुँगा कि यह चिट्ठा शालीनता की सीमा के बहुत अधिक बाहर न जाये. अगर आप नाबालिग हैं या फिर आप को ऐसी बातों से परेशानी होती है, तो अच्छा होगा कि आप इस चिट्ठे को बंद करके कुछ और पढ़ें.

गाली एक तरीका है अपना गुस्सा व्यक्त्त करने का. यानि आप बजाये मारा पीटी करने के, कुछ कह कर अपनी नापसंदगी जाहिर कीजिये. जैसे कालीचरण जी कहते हैं, एक उम्र के बाद, हम गाली देने में कुछ संयम बरतने लगते हैं. गुस्सा आये भी, तो गाली को मन ही मन देते हैं, और ऊपर से मुस्कुरा कर कहते हैं, "नहीं, नहीं, कोई बात नहीं. इसे अपना ही समझिये."

गाली हम आनंद के लिए भी दे सकते हैं, वह आनंद जो समाज से मना की हुई बातों को करने से मिलता है. बचपन से ही परिवार और समाज हमें सिखाते हें कि क्या सही है और क्या गलत. गलत कहे जाने वाले काम को करके, हम अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रा को जताते हैं और यार दोस्तों में अच्छी अच्छी, नयी गालियाँ बनाने में बहुत आनंद है.

गाली अपनी शक्त्ति दिखाने का भी माध्यम है. गाली दे कर हम कहते हैं कि तुम हमसे छोटे हो, कमजोर हो, हीन हो. यह सब उद्देश्य तभी पूरे हो सकते हैं, अगर गाली सुनने वाले को बुरी लगे. इसलिए गालियों से हमें यह मालूम चलता हे कि हमारे समाज में किस चीज़ को अधिक बुरा माना जाता है.

पिता के वैध होने या न होने से "हरामी" जैसी गाली बनती है. शायद इस शब्द से हमारा जमीन जायदाद के वारिस होने का सवाल भी जुड़ा हुआ है. पर आजकल, इस गाली की कीमत बहुत कम है, शायद इसलिए भी कि आज तलाक, दूसरी शादी और शादी के बाहर प्रेम का जमाना है, जिसमें हरामी शब्द की ठीक से व्याख्या करना आसान नहीं है ?

अधिकतर गालियाँ यौन अंगों और यौन सम्बंधों से जुड़ी हुई हैं और जबरदस्ती यौन संपर्क की बात करती हैं, जो कि अपनी ताकत दिखाने का तरीका है, यानि मैं चाहूँ तो ..... भारत ही नहीं सभी सभ्यताओं में शायद गालियाँ यौन अंगों तथा यौन सम्बंधों से जड़ी हैं. इटली में आम बोल चाल में सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली गाली है, cazzo यानि पुरुष यौन अंग. इसे पुरुष और स्त्रियाँ बिना किसी परेशानी से बोलते हैं, टीवी पर भी आम है. अन्य गालियाँ भी, स्त्री और पुरुष दोनो ही बिना किसी हिचक के बोलते हैं जैसे fottiti तथा vaffanculo जोकि विभिन्न प्रकार के यौन सम्बंधों की धमकियाँ हैं. शुरु शुरु में, सड़क पर या बस में अच्छी पढ़ी लिखी लड़कियों और औरतों को यौन अंग या यौन सम्बंध की गाली देते सुन कर बहुत अचरज होता था.

पर भारतीय गालियों में एक बात खास है. हमारी अधिकतर गालियाँ स्त्रियों की बात करती हैं. यानि आप का झगड़ा किसी से हो, गाली में अक्सर उसकी माँ या बहन को पुकारा जाता है. ऐसी कुछ गालियाँ अंग्रेजी में भी हैं पर उनका उपयोग आम नहीं है. अंग्रेजी, फ्राँसिसी, इतालवी भाषाओं में आप को गाली देने वाला आप से जबरदस्ती यौन सम्बंध की बात करेगा, आप की माँ, बहन या पत्नी से नहीं. क्या करण है इसका ? शायद इसलिए कि स्त्री और लड़की को हम लोग अधिक हीन समझते हैं ?



आप इटली में आयें और कोई सुंदर सी युवती आप को गस्से से गाली दे कि वह जबरदस्ती आप से यौन सम्बंध रखेगी, तो आप को कैसा लगेगा ? अवश्य आप के मन में लड्डू फूटेंगे, सोचेंगे, यही तो चाहता हूँ मैं. पर सावधान रहियेगा, यहाँ सेक्स दुकानों में कई खिलौने मिलते हैं, कहीं लेने के देने न पड़ जायें.

सोमवार, सितंबर 26, 2005

मोटर साइकिल और ज़ेन

"असली मर्द" को पूछना नहीं पड़ता. वह तो जेमस् डीन या मालोन ब्रांडो की तरह, अपनी हारले डेविडसन पर बैठ कर बस अपने में ही मस्त रहता है, लड़कियाँ उसके पीछे भागती हैं! क्या आप भी ऐसा सोचते हैं ?

मुझे मोटर साइकल अच्छी भी लगती है, पर उससे डर भी लगता है, जाने क्यों मन मे बैठा है कि अगर मोटर साइकल चलाऊँगा तो कोई दुर्घटना हो जायेगी.

कल, कोमो शहर में पुरानी मोटर साइकलों की प्रदर्शनी लगी थी. कोमो अपनी झील और उसके आस पास बने आलीशान भवनों के लिए प्रसिद्ध है. सबसे अधिक प्रसिद्ध घर है होलीवुड के सितारे जोर्ज क्लूनी का. एक नहीं तीन साथ साथ वाले घर खरीद कर उन्हें जोड़ कर अपने होलीवुड के मित्रों के लिए छुट्टियों का गेटअवे बनाया है. वहाँ के सब्जी वाले तक टीवी पर साक्षात्कार देते हैं, यह बाताने के लिए कि कैसे उन्होंने सुबह जूलिया रोबर्ट या मेडोना को संतरे या सेब बेचे.

मोटर साइकल की प्रदर्शनी में सन चालीस से ले कर सन सत्तर तक की पुरानी मोटर साइकलें लगीं थीं और उन के दीवाने इतने प्यार से उन्हें देख रहे थे कि उनकी प्रेमिकाओं को जलन होने लगे. अगर आप ने कभी मोटर साइकल चलायी है तभी आप इस दीवानगी को समझ सकते हैं जिसे "ज़ेन एंड द आर्ट ओफ मोटर साइकल मेनेजमेंट" नाम की किताब में बखूबी बताया गया था.

कल के चिट्ठे पर मारिया के बारे में कालीचरण जी और रमण ने लिखा है. मालूम नहीं कि भारत में विकलांग होने से उनका अनुभव मारिया के अनुभवों से भिन्न होगा. मैं अन्य लोगों से मदद की बात नहीं कर रहा, मित्रता की बात कर रहा हूँ. सच्चे मित्र तो साथ रहने ही चाहिये पर शायद सच्चे मित्र कम ही होते हैं ?

आज की तस्वीरें, कोमो की मोटर साइकल प्रदर्शनी से:


रविवार, सितंबर 25, 2005

ऐसे क्यों ?

मारिया कहती है, "जिस समय मुझे दोस्तों की सबसे अधिक जरुरत थी, उसी समय सारे दोस्त गुम हो गये." मारिया अस्पताल में मनोवैज्ञानिक है. ट्रेफिक दुर्घटना में उसके शरीर का नीचे का हिस्सा पंगु हो गया था और वह व्हील चैयर पर घूमती है. दुर्घटना के बाद, पति ने तलाक ले लिया. मरिया कहती है, "लोगों को शायद लगता है कि कुछ कर नहीं सकते, हमारे दुख को कम नहीं कर सकते. शायद हमारा यह समाज, हमें दुख, दुर्घटना, मृत्यु, बीमारी जैसी कोई भी नेगेटिव बात होने के लिए तैयार नहीं करता. मेरे अधिकतर मित्र मुझसे बात करने से कतराते थे. दुर्घटना से पहले के जो भी मित्र थे, उनमे से आज केवल दो लोग है जिनसे संपर्क बना हुआ है. मैंने देखा है कि किसी को कैसंर जैसी बीमारी हो जाये, लोग उससे बात करना छोड़ देते हैं, शुरु में एक बार टेलीफोन से या चिट्ठी से कहेंगे कि उन्हे दुख है, पर फिर उस व्यक्त्ति से बात करना ही छोड़ देते हैं."

शनिवार, सितंबर 24, 2005

जाल में फँसे

मेरा क्मप्यूटर से परिचय इटली में आने के बाद हुआ. जब दफ्तर में पहला क्मप्यूटर आया तो करीब एक साल तक मैं उसके नजदीक नहीं गया. डर लगता था. १९९१ या १९९२ की बात थी, इंटरनेट का नाम सुना था पर मालूम नहीं था कि क्या होता है.

१९९४ में हम लोग गरमी की छुट्टियों में अमरीका गये तो बोस्टन में विज्ञान म्यूजियम में पहली बार इंटरनेट को देखने का मौका मिला. एक साहब ने उसके बारे में पहले समझाया, फिर एक क्मप्यूटर के सामने बिठा दिया.

छुट्टियों के बाद वापस इटली में घर लौटे तो तुरंत पहला क्मप्यूटर खरीदा. शहर में एक दो प्रोवाईडर खुले थे, उन्होंने ईमेल और इंटरनेट दोनो के प्रोग्राम दिये. पर क्नेक्शन बहुत मंद था और बार बार टूट जाता था, इसलिए जाल पर घूमना आसान नहीं था, बस ईमेल लेने या भेजने में कोई परेशानी नहीं थी. पर ईमेल किसे लिखते, किसी भी जान पहचान वाले के घर में क्मप्यूटर नहीं था ? तो खोज की कि कोई भारतीय ईमेल ग्रुप मिल जाये जो हमें रोज ईमेल भेजें.

जाल का और ईमेल का, उन दिनों सभी काम अमरीका में ही हो रहा था. खोज कर, तीन अमरीकी भारतीय ईमेल ग्रुप मिले. एक तो रोज भारत के समाचार भजता था. दूसरा, सप्ताह में एक दो बार, इंडिया डी नाम से भारत के बारे में साधारण बातों के कविता, किताबों, बहस, आदि के बारे में ईमेल आते थे. कोई मूर्ती जी थे जो इन्हें चलाते थे. जहाँ हम लोग रहते थे वहाँ सिर्फ एक ही अन्य भारतीय था. भारत से कोई समाचार मिलना आसान नहीं था. उन ईमेल से मिले समाचारों से मुझे कितनी खुशी होती थी, आज उसे समझ नहीं सकते.

तीसरे ईमेल ग्रुप का नाम था "खुश", वह अमरीका में रहने वाले भारतीय गै और लेसबियन लोगों का दल था. तब गै यानि समलैंगिक पुरुषों के बारे मे तो समझ थी पर लेसबियन यानि समलैंगिक स्त्रीयों के बारे में बिल्कुल जानकारी नहीं थी. शुरु शुरु में वे संदेश पड़ कर हैरत में पड़ जाता था. लड़कियाँ ऐसी बातें सोच और लिख सकती हैं इससे अचरज होता था.

धीरे धीरे जब जाल पर घूमना आसान होने लगा, तो उन सब से रिश्ते टूट गये. आज ईमेल ज्यादातर, काम का माध्यम है. जाल पर भारत के समाचार पढ़ना, संगीत सुनना, बाते करना, वीडियो देखना, सब कुछ आसान है. लगता है मानो हमेशा ऐसा ही था. पर सिर्फ दस साल पहले ही परिचय हुआ था इससे! अब जाल के बिना रहने का सोचा भी नहीं जाता.

आज की तस्वीरों का विषय है रंग बिरंगे विज्ञापनः


शुक्रवार, सितंबर 23, 2005

लागी नाहीं छूटे रामा

चिट्ठे लिखना पढ़ना तो जैसे एक नशा है, एक बार यह नशा चढ़ गया तो बस कुछ अन्य न दिखता है न करते बनता है. ऐसा कुछ कुछ मेरा विचार बन रहा है.

कल मेरे चिट्ठे पर नारद जी यानि जीतेंद्र की स्नेहपूर्ण टिप्पड़ीं थी कि लगातार नियमित रुप से लिखने में, बीच में छुट्टी मार लेना अच्छी बात नहीं. यह छुट्टी मैंने अपनी मरजी से नहीं मारी थी, ब्लोगर सोफ्टवेयर की कुछ कठिनाई थी इसलिए लिखा संदेश शाम तक नहीं चढ़ा पाया. सोचा, बच्चू अभी भी संभ्हल जाओ. बस एक दिन अपना चिट्ठा औरों को न दिखा पाने से इतनी छटपटाहट हुई है, अगर यह साला सोफ्टवैयर ही ठप्प हो गया तो अपन कहाँ जायेंगे ?

चिट्ठा लिखना ही नहीं, पढ़ना भी एक नशा है. पर कैसे मालूम चले कि किसने ताजा कुछ लिखा है ? पिछले कुछ दिनों से चिट्ठा विश्व पर कुछ गड़बड़ है क्योंकि जो नये चिट्ठे लिखे गये हैं उनकी सूचना वाला खाना खाली दिखता है. जितेंद्र ने सलाह दी कि उन्हे अक्षरग्राम के नारद पर देखिये. नारद को देखा,बहुत बढ़िया लगा. सभी नये चिट्ठे वहाँ दिखते हैं.

पर बात समय की है. परिवारिक जिम्मेदारियाँ, कुत्ते को घुमाने और काम पर जाने के बाद मेरे पास थोड़ा सा ही समय बचता है जिसे मैं अपना कह सकता हूँ. पहले, सुबह जल्दी उठ कर इस समय में ध्यान करता था, कुछ पढ़ता लिखता था, अपने वेबपृष्ठ यानि कल्पना का कुछ काम करता था.

अब, सुबह उठते ही चाय बनाते समय सोचता हूँ आज क्या लिखूँगा ? फिर प्याला लिए, औरों के चिट्ठे पढ़ने बैठ जाता हूँ, एक दो टिप्पड़ियाँ लिख देता हूँ. तब तक अपने चिट्ठे में क्या लिखना है इसका कुछ विचार आ जाता है. जब तक लिखना समाप्त होता है, काम पर जाने का समय हो जाता है और रोज की भागमभाग शुरु हो जाती है जो फिर रात को ही सोते समय खत्म होगी. आप ही कहिये, यह भी कोई जिंदगी है क्या ?

आज की तस्वीरें देबाशीष, जितेंद्र, रमण, अनूप आदि उन सब लोगों के नाम जो मुझ जैसे अकृतज्ञ चिट्ठाकारों का जीवन आसान और दिलचस्प बनाने में अपना समय देते हैं.


गुरुवार, सितंबर 22, 2005

सच्ची प्रेम कहानी

आठ-दस साल पहले, लंदन में एक सभा में हमारी प्रमुख मेहमान थीं प्रिंसेज डयाना. जब भाषण आदि चल रहे थे, उस समय वह स्टेज पर बैठी थीं और उनसे नजर हटाना आसान नहीं था. सुंदरता के साथ साथ उनके व्यक्त्तिव में जादू सा था. सभा के बाद जब उनसे थोड़ी देर मिलने का मौका मिला तो उनका जादू और चढ़ गया.

तब सोचता था कि डयाना और चार्लस् की जोड़ी राजकुमारी और मेंढ़क की जोड़ी है. तब भी चार्लस् के कमिल्ला से प्रेम सम्बंध के चर्चे होते थे और सोचता था, घोड़े को एक घोड़ी मिली है. बहुत सालों तक, डयाना के बाद चार्लस् और कमिल्ला के चक्करों का सुन कर उन पर हँसी आती थी.

पर पिछले साल जब उनकी शादी हुई तो मेरे सोचने का ढ़ंग बदल गया. मेरे इस बदलाव में, मेरे बहुत से अंग्रेज जानने वालों का हाथ है. सभी इस विवाह के खिलाफ थे. कोई कहता वह भद्दी है, कोई कहता उसके कपड़े अच्छे नहीं हैं, कोई कुछ और आलोचना करता.

इस बार लंदन गया तो दोपहर को खाना खाते समय केमिल्ला की बात निकली. दफ्तर के सभी लोगों ने, विषेशकर, औरतों ने, अभी भी केमिल्ला आलोचना बंद नहीं की थी. पर मुझे लग रहा था कि चार्लस् और केमिल्ला की तो सच्ची प्रेम कहानी है. कुछ कुछ "हम तुम" जैसी, कितनी बार मिले और बिछुड़े, अन्य लोगों से विवाह हो गये, बच्चे हो गये, पर फिर भी उनका प्रेम बना रहा. या फिर कहें शाहजहान और मुमताज महल जैसा. अगर चार्लस् जी ताजमहल बनवा सकते, तो जरुर बनवाते.

तो आज की तस्वीर है डायना से उस मुलाकात की, जिसके कुछ महीनों बाद कार दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गयी थीः

बुधवार, सितंबर 21, 2005

झूठे रिश्ते

"यह लोग झूठमूठ के रिश्ते बना कर लोगों को ले आते हैं. अपनी बिरादरी या अपने गाँव या अपनी भाषा बोलने वाले को, अपना भाई, अपना चाचा या मामा कह कर मिलवाते हैं. दूसरी तरफ मालिक लोग भी जान पहचान के लोगों को काम पर रखना अधिक पसंद करते हैं. अगर आप किसी को अपना भाई या रिश्तेदार बना कर प्रस्तुत करें और उसे काम मिल जाये, तो आप उस नये काम करने वाले के लिए मालिक के सामने जिम्मेदार बन जाते हैं..." यह इटली में रह रहे सिखों के बारे में किये हुए एक शोधग्रंथ में लिखा है.

उत्तरी पूर्वी इटली में सिख परिवार केवल चार पाँच जगहों पर ही बसे हैं और उन्हें आदर्श इमिगरेंटस् कहा जाता है. उत्तरी इटली में "लेगा नोर्द" नाम की राजनीतिक पार्टी है जो कि विदेश से आये काम करने वालों, विषेशकर मुस्लिम प्रवासियों के खिलाफ बहुत सक्रिय है, पर वह भी कहते हैं कि उन्हें सिख प्रवासियों से कोई शिकायत नहीं.

मैं सोच रहा था उन "झूठे" रिश्तों के बारे में. भारत में भी तो शहरों में गाँवों से काम ढ़ूँढ़ने आते हैं लोग. दिल्ली में बहुत से सम्पन्न घरों में गड़वाल या नेपाल से आये लड़के काम करते थे. वहाँ भी तो ऐसे ही भाईचारे में ही लोग अपनी बिरादरी या गाँव आदि के लोगों को काम पर लगवाने ले आते हैं. क्या हम उन्हें झूठे रिश्ते कहते हैं ?

मेरा विचार है कि भारतीय या शायद एशियाई समाज रिश्तों को भिन्न दृष्टी से देखता है. हमारे यहाँ तो सभी को भाई साहब, बहन जी, अम्मा या अंकल कह कर बुलाते हैं. पर क्या यह केवल बुलाने की बात है या रिश्तों को दूसरी नजर से देखने की बात है ?

आज की तस्वीरों में मेरे दो दोस्ती के रिश्ते - ‍न मानो तो कुछ भी नहीं, मानो तो सब कुछ

मंगलवार, सितंबर 20, 2005

अगर वह न आये

कल बात हो रही थी नींद की. पिछले १५ सालों में शायद एक बार जागा हूँ रात के १२ बजे तक, नये साल के आने के इंतज़ार में. अधिकतर तो पत्नी ही जगाती है नये साल की बधायी देने के लिए. कभी रात की यात्रा करनी पड़े या फिर बहुत साल पहले जब अस्पताल में रात की ड्यूटी करनी पड़ती थी, तब न सो पाने पर बहुत गुस्सा आता था.

पर अगर जल्दी सोने वाले की शादी, देर से सोने वाले से हो जाये तो क्या होता है ? अपना यही हुआ. मैं रात को दस बजे सोने वाला और श्रीमति जी रात को दो बजे सोने वाली. नयी शादी के बाद इस बात पर बहस होती थी कि सोने जायें या बाहर घूमने. पहले यह सोचा कि कभी हमारी चलेगी और कभी उनकी. पर बात बनी नहीं, जब हमें रात को बाहर जाना पड़ता, तो हर ५ मिनट में मेरा जुम्हाई लेना या घड़ी की ओर देखना, न श्रीमति को भाता न अन्य मित्रों को. खैर, शादी के २५ सालों में हमने इसका हल ढ़ूँढ़ ही लिया. मैं सोने जाता हूँ और वह सहेलियों के साथ घूमने.

पर, इसी बात का दूसरा पहलू भी तो है. रोज आती थी, जाने एक दिन अचानक क्यों नहीं आती ? अनूप जी जैसा होने के लिए, यानि काम पड़े तो सारी रात जगते रहो और सोना हो तो घंटो सोते रहो, दिमाग में बिजली का बटन चाहिये, जिसे दबाने से काम की बात दिमाग से एकदम से बंद हो जाये.

कालीचरण जी को शायद ऐसे ही बटन की आवश्यकता है. और जब वह नींद नहीं आती तो क्या करें ? अगर दोपहर को या शाम को, काफी पी लूँ या सफेद वाइन पी लूँ तो ऐसा अक्सर होता है. जब बिस्तर में करवटें बदलते बदलते थक जायें तो नींद लाने के लिऐ क्या करें ?

मैं कोई भारी सी, न समझ में आने वाली किताब ढ़ूँढ़ता हूँ. होफश्टाडेर की किताब "गोडल, एशर, बाख", मुझे इसीलिए बहुत पसंद है. कितनी भी बार पढ़ लूँ कुछ समझ में नहीं आता पर आधा घंटा पढ़ने की कोशिश के बाद नींद अवश्य आ जाती है. इसी तरह की एक अन्य प्रिय पुस्तक है, कथोउपानिषद. धार्मिक किताबों में से यह मेरी सबसे प्रिय किताब है. पर अगर संस्कृत के श्लोक, बिना उनके हिंदी अर्थ के पढ़ूँ, तो भी नींद आ जाती है. और आप का कोई रामबाण नुस्खा है नींद लाने के लिए ?


इतालवी एसप्रेसो काफी का छोटा सा प्याला, मेरी नींद गुम कर देता है
इन्हें सोने की कोई चिंता नहीं - रोबेन द्वीप (दक्षिण अफ्रीका) का कब्रीस्तान

सोमवार, सितंबर 19, 2005

मुझे नींद क्यों आये ?

दुनिया में बहुत से ऐसे लोग हैं जो सच्चे दिल से गा सकते हैं कि "मुझे नींद न आये, मैं क्या करुँ". ऐसे लोग रात को १२ बजे तक फिल्म देखते हैं, क्लब जाते हैं, गुलछर्रे उड़ाते हैं. यह वे भाग्यशाली लोग हैं जिनके दिमाग अँधेरे होते ही खुल जाते हैं और जिनके शरीर में रात में नयी स्फुर्ती आ जाती है.

कुछ मेरे जैसे दुर्भाग्यशाली होते हैं जो केवल गाने में ही गा सकते हैं, "मुझे नींद न आये" पर सच में अँधेरा होते ही उबासिया लेने लगते हैं. मेरे जैसे लोगों के दिमाग केवल सुबह ही खुलते हैं, शाम होते ही ये अपने शटर बंद कर, "दुकान बंद है" का बोर्ड लटका देते हैं. शाम को कहीं जाना पड़े तो हमेशा कोई बहाना ढ़ूँढ़ता हूँ, कि न जाना पड़े. जब कोई बहाना न चले तो थोड़ी देर में ही, उबासियों का दौरा पड़ जाता है.

इन रात को जागने वालों में और सुबह जल्दी उठने वालों में कोयल और कौवे का अंतर होता है. सुबह जल्दी उठने वाले भक्त्ती, योग, ध्यान आदि बातें सोचने वाले गंभीर लोग होते हैं. सुबह के अँधेरे में बाग में लम्बे लम्बे साँस लेते हूए भाग भाग कर सैर करते हैं. न ये कभी क्लास छोड़ कर फिल्म देखने जाते हैं, न गप्पबाजी में समय बरबाद करते हैं. मोटी किताबें पड़ने वाले, इन्हें अक्सर उतने ही मोटे चश्मे से पहचाना जा सकता है.

रात देर जागने वाले यह सोचते हैं कि यह जीवन ही सब कुछ है, यह इंद्रियाँ प्रभु ने कुछ सोच कर ही मानव शरीर को दी हैं, इनका पूरा उपयोग होना चाहिये. सुबह देर से जब उठते हैं जो कभी कभी इनका सर अवश्य दुखता है और रात को अंत में क्या हुआ, इन्हें ठीक से याद नहीं रहता. लम्बी साँस ले कर कहते हैं, "बस, अब बहुत हो गया, अब मैं सुधर जाऊँगा, अब गम्भीरता से पढ़ायी करने का समय आ गया है" पर शाम तक वह सब भूल जाते हैं.

क्या आपको भी मेरी तरह दुख होता है कि सारा जीवन यूँ ही बीत गया, "अजुँरी में भरा हुआ जल जैसे रीत गया" ? यानि आप कोयल हैं या मेरी तरह का कौवा ?

आज की तस्वीरें, इटली के फैरारा शहर के पुराने मध्ययुगीन भाग सेः

रविवार, सितंबर 18, 2005

लंदन बदला क्या ?

कल शाम को लंदन से वापस आया. पिछली बार लंदन बम फटने से पहले गया था. सोच रहा था कि क्या बमों के फटने से लंदन बदल गया होगा ?

लंदन में रहने वालों से बात की तो यही सवाल पूछा. विभिन्न उत्तर मिले, पर सभी मान रहे थे कि कुछ बातों में उनका शहर बदल गया है. शहर के केंद्रीय हिस्से में रहने वाली सूसन बोली, "हमारे यहाँ रात का जीवन बिल्कुल बदल गया है. पहले रात को भीड़ होती थी, पब बीयर पीने वालों से भरे रहते थे, अब शाम को ७ बजे ही सड़कें खाली हो जाती हैं. पब वालों का बिजनेस बिल्कुल ठप्प हो गया है."

किसी ने कहा कि अब ट्यूब में कम भीड़ होती है, शहर में साईकल और स्कूटर चलाने वाले बढ़ गये हैं, विषेशकर बृहस्पतिवार को क्योंकि दोनो बार बम बृहस्पतिवार को ही फटे थे. एक और सज्जन बोले कि शुरु शुरु में अगर कोई ट्यूब में रकसेक या कंधे वाला बैग ले कर चढ़ता तो सब लोग उसे ध्यान से देखते थे.

पर मुझे तो कोई बदलाव नहीं लगा शहर में. यह सच है कि मैं रात को लंदन के केंद्रीय हिस्से में नहीं गया, पर ट्यूब में मुझे कुछ कम भीड़ नहीं लगी. वही धक्का मुक्की, वैसा ही विभिन्न देशों के पर्यटकों से भरा लंदन जहाँ एक तरफ नये आलीशान भवन बन रहे हैं, ट्यूब स्टेशन पर ही नये शोपिंग माल बने हैं और दूसरी तरफ गंदी, जंग लगी तारें जो ट्यूब की रेल लाइन के साथ साथ चलती हैं, स्टेशन कब बंद हो जायें पता नहीं, और मेट्रो वाले क्षमा माँगते हैं कि काम करने वालों की कमी की वजह से मेट्रों में कुछ देर हो सकती है.

आज की तस्वीरों लंदन के मिलेनियम पुल के पास से हैं

नया मिलेनियम पुल जिसका उद्घाटन सन २००० में हुआ - सौ वर्षों के बाद लंदन में कोई नया पुल बना है
टेट आधुनिक कला गेलरी के बाहर एक "पंक" जोड़ा

गुरुवार, सितंबर 15, 2005

माँसाहारी दुनिया में शाकाहारी

फणीश्वरनाथ रेणू की कहानी "मारे गये गुलफाम" के नायक हीरामन की तीसरी कसम थी कि फिर कभी अपनी बैलगाड़ी में नाचने वाली बाई जी को नहीं बिठायेंगे. ऐसे ही कसम है हमारी, कहीं भी जायेंगे, किसी से नहीं पूछेंगे कि खाने में क्या है, बस जो भी हो चुपचाप खा लो. दुनिया में जाने क्या क्या खाते हैं लोग बंदर, कुत्ता, चूहा, घोड़ा, साँप, केंचुआ. अगर पूछो तो खाना ही न खाया जाये, और मतली हो जाये.

जिन सभ्यताओं में शाकाहारी खाने का कंसेप्ट ही नहीं है, वहाँ जरा यह बता कर देखिये कि साहब हम मीट नही खाते, वे कहेंगे, अच्छा तो चिकन ले लेजिये या मछली खा लीजिये. जब आप मीट, चिकन, हेम, पोर्क, मछली, अंडे इत्यादि की पूरी सफाई दे कर समझाते हैं कि आप कुछ नहीं खाते, तो वे आपको ऐसे देखते हें मानो आप हिमालय के येती हैं या फिर अस्पताल में बंद करने लायक पागल, और दया भरी आवाज में कहते हैं, अच्छा तो यह लीजिये, हमने इसमे से सारा माँस निकाल दिया है, कोई छोटा मोटा टुकड़ा रह गया हो तो आप खाते समय निकाल दीजियेगा.

अरे फिर भी आप इसे खाने से हिचकचा रहे हैं ? समझाईये आप उन्हें, कि माँस के साथ बने, मिले खाने को नहीं खा सकते या माँस न खाने का मतलब है कि आप माँस का सूप भी नहीं पीते!

पर बात मेरी कसम की हो रही थी. मानता हूँ कि यह कसम गाँधी जी के आँख मूंदे हुए बंदर जैसी है, पर जीने के लिए कोई न कोई बहाना तो निकालना ही पड़ता है. दिक्कत तब होती है जब पकवान ऐसे पकाया जाता है कि आप को जंतु को पहचानने में गलती नहीं हो सकती. कुछ पूछने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती. एक ऐसा अनुभव कोंगो में हुआ. वहाँ की राजधानी किनशासा में एक खाने में कानखजूरे बने थे. उन्हें शायद भाप में पकाया गया था, क्योंकि साफ दिख रहा था कि वे कानखजूरे ही थे. एक प्लेट में लाल या भूरे रंग के, दूसरी प्लेट में काले से. जिनके यहाँ खाना था वे बोले, बहुत प्रोटीन है इनमें. उनके बहुत जोर देने पर, बस एक ही खा पाया. मेरी चीन में केवल तीन मधुमक्खियों के खाने पर कुछ बेदर्द सी चुटकियाँ लीं गयीं तो जाहिर है कि सिर्फ एक कानखजूरा खाने पर कुछ और कहा जायेगा. कह लीजिये जनाब, जो मधुमक्खी या कानखजूरे खा सकते हैं वह आप की बात भी सुन लेंगे.

आज लंदन जाना है इसलिए दो दिन के लिए चिट्ठे की छुट्टी. आज की तस्वीरें कोंगो से.


बुधवार, सितंबर 14, 2005

शाहरुख का नया रुख

कल के समाचारों में दो बातों ने सोचने पर मजबूर किया. पहली खबर थी शाहरुख खान के नये विज्ञापन की चर्चा, यानि लक्स साबुन का विज्ञापन जिसमें वह टब में नहाते हुए दिखाये गये हैं.

दूसरी बात थी दिल्ली के क्नाट प्लेस की जहाँ कार चलाती हुई २७ वर्षीय युवती को मोटर साइकल पर जा रहे दो लड़कों ने छेड़ा और मार पिटाई की. उस समय कार में युवती के साथ उसकी माँ, छोटा भाई और मंगेतर भी थे.

सोच रहा था कि कैसे धीरे धीरे स्त्री और पुरुष के रुप और समाज स्वीकारित व्यवहार बदल रहे हैं.

पुरुषों के लिए कोमल होना, संवेदनशील होना, नृत्य, संगीत या संस्कृति की बात करना, लाल या गुलाबी रंग के कपड़े पहनना, आँसू बहाना, जैसी बातें उसमें किसी कमी या फिर उसकी पुरुषता के बारे में शक पैदा कर देती हैं. ऐसे में बिना यह सोचे कि दूसरे क्या सोचेंगे या कहेंगे, जो मन में आये करना केवल विकसित आत्मविश्वास वाले लोग ही कर सकते हैं. पर छोटी छोटी बातों में कुछ परिवर्तन सभी पुरुषों के जीवन में आये हैं. पिता के लिए बच्चे से प्यार जताना पहले पुरुष व्यवहार के योग्य नहीं समझा जाता था, सड़क पर कोई आदमी गोद में बच्चे के साथ दिख जाये तो कुछ अजीब सा लगता था, पर आज इसमें किसी को अजीब नहीं लगता.

दूसरी तरफ औरतें घर से बाहर निकल रहीं हैं, बहुत बार पुरुषों से अधिक कमाती हैं, उनमें आत्म विश्वास है. जो युवक क्नाट प्लेस में कार चलाती युवती के साथ बद्तमीजी कर रहे थे, शायद उसकी वजह केवल गुंडा गर्दी ही हो पर मुझे शक है कि उसके साथ साथ स्त्रियों के बढ़ते आत्मविश्वास के सामने नीचा महसूस करने का गुस्सा भी हो सकता है ?

आज की तस्वीरों में आज के नये स्त्री पुरुष जिन्हें समाज स्वीकृति या अस्वीकृति की चिंता नहीं:


मंगलवार, सितंबर 13, 2005

किटाणु रहित दुनिया

यहाँ टीवी पर प्रतिदिन नये विज्ञापन आते हैं जिनका सार यही होता है कि हमारे आसपास की दुनिया, फर्श पर, सोफे पर, रसोई में, हर जगह खतरनाक किटाणुओं से भरी है और जिनसे बचने के लिए केवल सफाई से काम नहीं चलेगा. अगर आप अच्छी गृहणीं हैं तो अवश्य यह नया पदार्थ खरीदये, जिसे पानी में मिला कर सफाई करने से या जिसे स्प्रे करने से, सारे किटाणु १२ घंटे या २४ घंटे के लिए नष्ट हो जायेंगे. विज्ञापन का असर बढ़ाने के लिए इनमें अक्सर बच्चे भी अवश्य दिखाये जाते हैं. यानि कि खतरनाक किटाणुओं के बारे में सुन कर अगर आपके मन पर कोई असर न हो तो, उस विज्ञापन में एक छोटा सा गोल मटोल बच्चा जोड़ दीजिये जो जमीन पर रेंग रहा हो या फिर उठा कर कोई चीज़ अपने मुँह में डाल रहा हो. अगर आप अच्छे माता पिता हैं तो अवश्य अपने बच्चे की सुरक्षा के लिए किटाणु रहित संसार बनाना चाहेंगे ?

यह सब बिकरी कराने के विषेशज्ञों का कमाल है, जो यह देखते हैं कि कैसे अपनी ब्रेंड बनायी जाये, कैसे अपने प्रोडक्ट को बाजार मे बिकने वाली उस जैसी अन्य सभी वस्तुओं से भिन्न बनाया जाया और कैसे मानव मन में छुपे डरों और विश्वासों का विज्ञापनमों में ऐसे प्रयोग किया जाये कि आप उनकी कम्पनी की वस्तु को ही खरीदें.

अगर आपने जीव विज्ञान पढ़ा है तो जानते ही होंगे कि यह दुनिया, आँखों से न दिखने वाले किटाणुओं से भरी है. ये मानव के लिए कोई हानी नहीं करते. मानव शरीर के अंदर भी ऐसे किटाणु भरे हैं, जो हमारे जीने के लिए जरुरी हैं और जब बिमार होने पर एंटीबायटिक लेने से यह किटाणु मर जाते हैं तो दस्त लगना और अन्य तकलीफें हो जाती हैं. एंटीबायटिक के गलत इस्तमाल की वजह से बहुत से किटाणु पर इन दवाईयों का असर होना बंद हो जाता है इसलिए नयी दवाईयों की खोज हमेशा जारी रहती है. ऐसे में, मेरे विचार में ऐसे विज्ञापन लोंगो को गलत विचार देते हैं और इन पर विश्वास नहीं करना चाहिये.

आज की तस्वीरें किटाणुओं से भरी हुई प्रकृति कीः

सोमवार, सितंबर 12, 2005

चार साल पहले

चार साल पहले, ११ सितंबर २००१ के न्यू योर्क पर हुए हमले की आज बरसी है. जब ऐसी कोई घटना होती है, तो याद रहता है कि जब यह समाचार मिला था, उस दिन, उस समय हम कहाँ थे, क्या कर रहे थे. उस दिन मैं लेबनान जा रहा था, सुबह बोलोनिया से उड़ान ले कर मिलान पहूँचा था और बेरुत की उड़ान का इंतज़ार कर रहा था, जब किसी से सुना. हवाई अड्डे पर ही एक टीवी पर उन न भूलने वाली छवियों को देखा. आस पास हवाई अड्डे पर दुकाने बंद होने लगी और हमारी उड़ान भी रद्द हो गयी. सारा दिन हवाई अड्डे में बिता कर, रात को घर लौटा था.

पर उस दिन चिंता अपनी उड़ान की नहीं, माँ की हो रही थी, जो उसी सुबह वाशिंगटन पहुँच रहीं थीं. उनकी उड़ान को केनेडा में कहीं भेज दिया गया था और दो तीन दिन तक हमें पता नहीं चल पाया था कि वे कहाँ हैं.

कल टीवी पर ११ सितंबर पर बनी वह फिल्म देखी जिसमें विभिन्न देशों के फिल्म निर्देशकों के बनायीं छोटी छोटी कई फिल्मे हैं. उनमें, मीरा नायर की फिल्म जिसमें वह पाकिस्तानी लड़के सलीम की कहानी है, भी है. मुझे वह फिल्म अच्छी लगी जिसमें गाँव की शिक्षका छोटे बच्चौं को यह समाचार समझाने की कोशिश करके, उनसे एक मिनट का मौन रखवाती है. पर मेरे लिए सबसे अच्छी फिल्म उस गूँगी बहरी फ्राँसिसी लड़की की है जो न्यू योर्क के इशारों की भाषा के अनुवादक लड़के के साथ रहती है.

कल के चिट्ठे की टिप्पड़ियों ने सोवने का सामान दिया है. विषेशकर, रमण की भारतीय पारिवारिक सम्बंधों के बारे में टिप्पड़ीं. हमारे दादा, नाना, मामा, चाचा जैसे रिश्ते पश्चिम देशों में कम महत्वपूर्ण होते हैं ? पर रमण और भी नयी दिशाओं में बात को बढ़ा रहे हैं. जैसे रेलगाड़ी के बदले में लोहपथगामिनी जैसे शब्दों का बनाना या फिर ऐसे शब्द ढ़ूँढ़ना जो अंग्रेजी में हैं और हिंदी में नहीं जैसे teenager. पुण्य और धर्म के जो उदाहरण स्वामी जी ने दिये हैं वे शायद हिंदु धर्म विचारों की वजह से हैं और मोक्ष, निर्वाण, आदि अन्य शब्दों की ओर ले जाते हैं.

आज की तस्वीरें कुछ साल पहले की न्यू योर्क यात्रा से - ट्विन टोवर्स की ऊपरी मंजिल से एक दृष्य और टोवर्स के नीचे हाल में एक शादीः

रविवार, सितंबर 11, 2005

आवारापन

मैं सोच रहा था कि "आवारापन" शब्द का अंग्रेज़ी में क्या अनुवाद होगा ? आवारा, आवारापन, आवारागर्दी, आवारगी जैसे शब्द एक विषेश रहने, सोचने, बात करने, जीवन बिताने की बात करते हैं जो हमारी उत्तर भारतीय और शायद पाकिस्तानी सभ्यता से जुड़े हैं जिनके लिए अंग्रेज़ी में समान एक शब्द नहीं हैं. सुना है कि आईसलैंड में विभिन्न तरह की बर्फ के बारे में सात या आठ शब्द हैं क्योंकि उनकी सभ्यता में बर्फ का बहुत महत्व है, जबकि हिंदी में बरफ का महत्व कम है. हालाँकि हिम जैसे शब्द भी हैं पर आम भाषा में हम लोग खाने वाली बर्फ (ice) हो या आसमान से गिरने वाली बर्फ हो (snow), हमारे लिए तो वह बस बर्फ है.

इसी बात से विचार आया ऐसे हिंदी शब्दों को पहचानने का जिनके लिऐ अंग्रेज़ी में समान एक शब्द नहीं है, बल्कि जिन्हें समझाने के लिए अंग्रेज़ी में दो या अधिक शब्दों की आवश्यकता पड़े. भारतीय वस्त्रों से जुड़े शब्द जैसे धोती, साड़ी, पगड़ी, सलवार, पल्ला, आँचल, आदि शब्द कुछ ऐसे ही हैं. त्योहारों से जुड़े शब्द यानि दिवाली, होली, रामनवमी, आदि भी कुछ ऐसे ही हैं. खाने से जुड़े कई शब्द जैसे रोटी, पराँठा, मसाला, कड़ाई, सिल, बट्टा जैसे शब्द भी ऐसे ही हैं.

ऐसे और शब्द कौन से हैं ?

आज की तस्वीरें हैं हेलसिंकी के आधुनिक कला म्यूज़ियम से, जिनमें अफ्रीकी परमपरागत पौशाकें दिखायीं गयीं हैं. आजकल कहीं कोई बड़ी अंतर्राष्ट्रीय सभा होती है, अफ्रीका नेता ऐसी पौशाकें पहनते हैं, कुछ वैसे ही जैसे हम लोग कर्ता, पजामा या अचकन पहन सकते हैं. अपनी परमपरागत पौशाकों से हम यूरोप और अमरीका से अपनी स्वतंत्रता और भिन्नता दिखाते हैं. म्यूज़ियम की यह प्रदर्शनी दिखाती है कैसे हमारी परमपरागत पहचान नकली ढ़ंग से भी बनायी जा सकती है, जैसे यह परमपरागत अफ्रीकी पौशाकें जो ३०० साल पहले डच और अंग्रेज लोग एन्डोनेसिया और भारत से अफ्रीका ले कर गये.


शनिवार, सितंबर 10, 2005

ग्रीशम बोलोनिया में

कल जाह्न ग्रीशम (John Grisham) बोलोनिया विश्वविद्यालय आये और हम भी उन्हे देखने सुनने गये. करीब एक हजार साल पुराना "सांता लूचिया हाल" जो हैरी पोटर फिल्मों का डाइनिंग हाल जैसा लगा है, ठसाठस भरा था, खड़े होने की जगह नहीं थी. ग्रीशम ने अपने नये उपन्यास "द बरोकर" (The Broker) के बारे में बात की, अपने फिल्मकार होने के अनुभव के बारे में बताया, अपने बेसबाल के कोच होने के अनुभव के बारे में कहा, अमरीकी राष्ट्रपति बुश, न्यू ओरलिओन्स के कटरीना तूफान और अमरीका में "फ्रीडम आफ एक्सप्रेशन" की बढ़ती हुई कमी आदि बातों पर अपने विचार प्रकट किये.

जो सवाल मैं उठाना चाहता था, आलोचकों का उन्हें साहित्यकार न मानने का, वह भी उठा. ग्रीशम गुस्से से बोले, "आलोचक जायें भाड़ में, मैं उनकी कुछ परवाह नहीं करता. जनप्रिय लेखन क्या होता है, उन्हें नहीं मालूम. पहले आलोचना करते थे कि मेरी हर किताब का एक जैसा फारमूला होता है, अब उन्हें यह एतराज है कि मैं फारमूला छोड़ कर भिन्न क्यों लिख रहा हूँ." यानि की भीतर भीतर से, आलोचकों के प्रति उनमें गुस्सा है हालाँकि वे परवाह न करने की कहते हैं.

एक अन्य सवाल का उत्तर देते हुए बोले "पिछले पंद्रह सालों में मैं बहुत भाग्यशाली रहा हूँ. २० करोड़ के करीब मेरी किताबें बिकी हैं और मुझे दुनिया का सबसे अधिक बिकने वाला लेखक कहते थे, जब तक हैरी पोटर नहीं आ गया ..."

पर उनकी सब बातों से अधिक तालियाँ तभी बजी जब उन्होंने हमारे शहर बोलोनिया के बारे में कहा. बोले, "पिछले साल जुलाई में पहली बार बोलोनिया आया. शहर को जानता नहीं था, पर इटली मुझे बहुत अच्छा लगता है, पहले भी कई बार आ चुका था अन्य मशहूर शहर देखने. मुझे एक ऐसे छोटे शहर की तलाश थी, जहाँ मेरा जासूस नायक छुप सके. जब मैंने नाज़ी और फासिस्ट शासन के खिलाफ लड़ने वाले शहीद हुए जवानों की फोटो से भरी दीवार देखी, उसने मेरे मन को छू लिया और मुझे इस शहर से प्यार सा हो गया."

आज की तस्वीरों में ग्रीशम और उन्हें सम्मान देते बोलोनिया के मेयस, श्री कोफेरातीः


शुक्रवार, सितंबर 09, 2005

दावत हो तो ऐसी

यह बात मुझे जितेंद्र के अझेल खाने की बात से याद आयी. मैं अक्सर यात्रा पर विभिन्न देशों में जाता हूँ. कई बार ओफिशियल खाना होता है जिसमे साथ में कोई मंत्री जी या मेयर या बड़े अधिकारी होते हैं, जिनके सामने कई बार ऐसी हालत हो जाती है कि न खाते बनता है, न उगलते. ऐसी घटनाओं का सबसे बड़ा फायदा यह है कि फिर जब कहीं गप्प बाजी हो तो मुझे सुनाने के लिए बढ़िया किस्सा मिल जाता है.

जिस दावत के बारे में सुना रहा हूँ वह १९९३ या ९४ की है. मैं विश्व स्वास्थ्य संघ की ओर से चीन मे गया था. देश के दक्षिण पश्चिम के राज्य ग्वीझू में अनशान के झरनों के पास एक छोटे से शहर में थे, जहाँ के मेयर ने हमें शाम की दावत का निमंत्रण दिया. यहाँ एक अल्पसाख्यिँक जनजाति के लोग रहते हैं. दावत के लिए एक छोटा सा नीचा गोल मेज़ था जिसके आसपास हम सब लोग घुटनों पर बैठे. मेरे बाँयीं तरफ मेयर जी थे. खाने का मुख्य भोज था एक मीट वाला सूप जिसे एक बड़े बर्तन में बीच में रखा गया. मेयर जी को मेरी बहुत चिंता थी, हाथ से चबर चबर मीट इत्यादि खा रहे थे, कोई अच्छा टुकड़ा दिखता तो उसे उन्हीं हाथों से उठा कर मेरी प्लेट में रख देते, और मुस्कुरा कर मुझे उसे चखने के लिए कहते और मेरी तरफ देखते रहते जब तक मैं उसे खाता नहीं.

सभी लोग मीट की हड्डियाँ निकाल फैंकने के चैम्पियन थे. मेज़ पर हड्डियाँ एकत्र करने के लिए कोई प्लेट नहीं थी, सभी लोग थोड़ा सा सिर घुमा कर, पीछे की तरफ हड्डियाँ थूक या फैंक रहे थे. पीछे हमारे आसपास कब्रीस्तान सा बन रहा था. जितनी बार मेयर जी पीछे मुड़ कर हड्डी फैंकते, कुछ थूक और हड्डियाँ मेरे जूतों पर गिरतीं.

खुद को बहुत कोसा कि कोई बहाना क्यों नहीं बनाया इस झंझट से बचने के लिए. पर अभी झंझट समाप्त नहीं हुआ था, जब नया पकवान आया. भुनी हूई मधुमक्खियाँ. उन्हो्ने मधुमक्खी को पूरा का पूरा, पँख समेत, ले कर भुना या तला था. देख कर बहुत जी घबराया पर सच कहुँ तो खाने में इतनी अजीब नहीं थीं, मुँह मे रखते ही घुल सी जाती थीं. दो तीन ही खायीं. मेरे साथ चीन स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से सरकारी अनुवादक थे, उन्होंने ही मेरी जान बचायी, कहा कि हमें देर हो रही है और मेयर जी के चुंगल से निकाल लाये. वह स्वयं भी बेजिंग के रहने वाले थे और शायद जनजातियों के यहाँ खाये जाने वाले ऐसे पकवानों के आदि नहीं थे. आज भी उस दावत के बारे में सोचूँ तो भूख गुम हो जाती है.

आज की तस्वीरें दक्षिण पश्चिम चीन की जनजातियों की हैं.


गुरुवार, सितंबर 08, 2005

लेखक या साहित्यकार

कल अमरीकी लेखक जोह्न ग्रीशम (John Grisham) बोलोनिया विश्वविद्यालय में आने वाले हैं. उनकी नयी किताब, "द बरोकर" (The Broker), की कहानी हमारे शहर बोलोनिया में ही बनायी गयी है. लोग सोच रहे हैं कि शायद ग्रीशम की यह किताब पढ़ कर, हमारे शहर में कुछ अधिक पर्यटक आयेंगे. यहाँ रोम, वेनिस, फ्लोरेंस आदि शहरों के सामने, बेचारी बोलोनिया को कोई नहीं पूछता.

अगर मैं कोई सवाल पूछ सकूँ श्रीमान ग्रीशम से, तो वो यह होगा, "जब आलोचक आप को जनप्रिय लेखक कहते हैं पर आपको साहित्यकार नहीं मानते तो आप इस बारे में क्या सोचते हैं ?" उन्होंने इस तरह के आलोचनाओं के बाद, कुछ गम्भीर तरीके से भी लिखने की कोशिश की है, जैसे "यैलो हाऊस" (Yellow House), पर उनके ऐसे उपन्यासों को न तो सफलता मिली और न ही आलोचनों ने अपनी राय बदली. मैंने स्वयं भी, उनकी कई किताबें खूब मजे से पढ़ीं पर उनका गम्भीर "साहित्य" मुझसे नहीं पढ़ा गया.

इसी बारे में सोच रहा हूँ, क्या फर्क है आम लेखक में और साहित्यकार में ? मेरी दो प्रिय लेखिकाओं, शिवानी और आशापूर्णा देवी, को बहुत साल तक आलोचक आम लेखक, या "रसोई लेखिकाँए" कहते रहे. बचपन में मेरे स्कूल में हिंदी के एक बहुत बिकने वाले लेखक का पुत्र पढ़ता था, उन लेखक का नाम मुझे ठीक से याद नहीं, शायद दत्त भारती जी या ऐसा ही कुछ था. लेकिन अगर घर में कोई उनकी किताब पढ़ते हुए देख लेता तो कहता, "क्या कूड़ा पढ़ रहो हो". बचपन में पढ़ी गुलशन नंदा जैसे लेखकों की किताबें या फिर जासूसी उपन्यास इसी श्रेणीं में गिने जाते थे, कूड़ा. पर उन्हें पढ़ने में बहुत आनंद आता था.

तो सोच रहा था, किस बात से आम लेखन का साहित्य से भेद किया जा सकता है ? भाषा के उपयोग से ? याने साधारण लेखन सरल, आसानी से समझ आने वाली भाषा का प्रयोग करते हैं, पर साहित्यकार की भाषा अधिक कठिन होती है ? यह अंतर मुझे कुछ ठीक नहीं लगता, क्योंकि मेरे विचार में कई साहित्यकार हैं जो आसान भाषा का प्रयोग करते हैं. शायद लिखने की गहराई से साहित्यता को मापने का कोई नाता था ? या कथा के विषय से ? या लेखक किस तरह से कथा का विकास करता है ? या फिर आलोचक के अपने विचारों से ? बहुत सोच कर भी कोई सरल नियम जिससे यह आसानी से कहा जाये कि यह साहित्य है और यह साधारण लेखन है, मुझे समझ में नहीं आया. शायद मरने के बाद आम लेखक का साहित्यकार बनना अधिक आसान है.


आज हमारे शहर बोलोनिया की दो तस्वीरे

बुधवार, सितंबर 07, 2005

उन्हें क्या मिला ?

कल सुबह का चिट्ठा कुछ भावावेश में लिखा था. शाम को दुबारा पढ़ा तो लगा कि अपनी बात को ठीक से नहीं व्यक्त्त कर पाया. अनूप, जितेंद्र और नितिन के चिट्ठों की बात की पर उनके लिंक भी नहीं दिये. असल में सब कुछ अनूप के मेरे पन्ने में लिखे बाजपेयी सर के बारे में पढ़ कर शुरु हुआ. अनूप ने बहुत अच्छा लिखा है, और दिल से लिखा है. पढ़ कर सोच रहा था कि मेरा किसी शिक्षक से ऐसा संबध नहीं बना, पर अगर यह सोचूँ कि किससे मुझे क्या मिला, तो कई नाम और चेहरे याद आ जाते हैं.

मिडिल स्कूल के हिंदी के गुरु जी, प्रीमेडिकल के दौरान भौतिकी के गुरु और मेडिकल कालिज से निकलने के बाद, कर्मभूमि मे काम कर रहे गुरु जिनके साथ काम करने का मौका मिला. फिर सोचा उनके बारे में जो बिल्कुल अच्छे नहीं लगते थे, लगता था कि उन्हें किस्मत ने हमें तंग करने के लिए ही हमारे जीवन में भेजा हो. पर उनसे भी कुछ सीखने का मौका मिला और ऐसे ही एक नापसंद से गुरु की वजह से ही मेरा जीवन बदल गया. यह सब सोचा शाम को, बाग में कुत्ते के साथ सैर करते हुए.

पर फिर सोचा कि बजाय यह सोचने के मुझे क्या मिला, उन्हें क्या मिला अच्छे गुरु बन कर ? अपने एक गुरु जी के लाचारी के अंतिम दिनों की बात याद आ गयी. सारा जीवन इमानदारी और आदर्शों का जीता जागता उदाहरण थे और उनकी बहुत सी बातें मेरा हिस्सा बन गयीं हैं. यही क्षोभ और ग्लानी थे मेरे कल के चिट्ठे में, सबसे पहले स्वयं से फिर उस समाज से, जहाँ ऐसे लोग गरीबी और लाचारी मे मरते हैं. गुस्सा था उनके बच्चों पर जो पढ़ लिख कर, अच्छे पदों पर हो कर भी, उन्हें इस लाचारी में अकेला छोड़ गये थे.

अतुल ने लिखा है, "मेरे गुरुजी भी आम आदमी थे.उनके सामने तमाम मानवीय चुनौतियां थीं. वे ट्यूशन भी पढाते थे उन लड़कों को जो उनसे पढ़ने आते थे.उनकी पारिवारिक समस्यायें भी थीं .जिन्दगी बिता दी किराये के मकान में जब मकान बन पाया तो रहने के लिये वो नहीं थे.बडी़ लडकी विधवा हो गयी ४०-४५ की उमर में .यह् सदमा भी रहा.अपने छोटे बेटे के भविष्य को लेकर काफी चितित रहे.इन सारी आपा-धापी के बीच वे सदैव अपने मानस पुत्रों के उन्नयन के लिये निस्वार्थ् लगे रहे." यह समझता हूँ कि कठिनाईयाँ तो किसी भी जीवन में हो सकती हैं, चाहे आप शिक्षक हों या कुछ और. उन्हीं को याद करेंगे लोग जिसने सब कठिनाईयों के होते हुए अपने जीवक को औरों के जीवन सँवारने में लगाया हो.


आज की तस्वीरें हैं दक्षिण अमरिकी देश, गुयाना से, जहाँ ६० प्रतिशत लोग भारतीय मूल के हैं.


मंगलवार, सितंबर 06, 2005

शिक्षकों की याद

एक वह दुनिया है जहाँ हम लोग सचमुच रहते हैं और फिर अन्य कई दुनिया हैं, सपनों की दुनिया जहाँ सब कुछ सुंदर और आदर्शों से भरा हो सकता है. शिक्षकों के बारे में अनूप, जीतेंद्र और नितिन के चिट्ठे देख कर ऐसा ही अचरज हो रहा था मुझे. शिक्षक दिवस और शिक्षकों को याद करना, यह लोग सचमुच की दुनिया के लोग हैं या फिर किसी काल्पनिक, आदर्शमय दुनिया में रहते हैं ?

मैं तो सोचता था कि शिक्षकों के आदर की बात करना, कुछ मजाक सा है. कौन पूछता है और समाज में सचमुच कितना आदर है आज शिक्षकों का? क्या हममें से कोई चाहेगा कि हमारा बच्चा शिक्षक बने ? शायद मैं यह इसलिए कह रहा हूँ कि एक शिक्षिका का बेटा हूँ जो नगरपालिका के गरीब स्कूल में पढ़ाती थी.

बच्चे का भोला मन ही अपने गुरु जी के दिये ज्ञान और प्रेरणा का मान कर सकता है, पर जैसे जैसे बच्चे बड़े होते हैं दुनिया के नियम सीख जाते हैं कि पैसे से औकात मापने वाली दुनिया में शिक्षकों का स्थान बहुत नीचा है.

अनूप के बाजपेयी सर जैसे गुरु तो बहुत किस्मत से ही मिलते हैं. अच्छे गुरु के साथ आदर से बढ़ कर, पितामय स्नेह का रिश्ता बना पाना और भी कठिन है. ऐसे समाज में जहाँ पैसा ही पहला मापदंड है, आज आम स्कूलों में शिक्षक वही बनता है जिसे और कोई काम नहीं मिलता. ऐसे में शिक्षक का काम गर्व से नहीं, कुँठा से निभता है. कैसे और ट्यूशन करुँ, कैसे और पैसे बनाऊँ, यह चिंता होती है. उनमे से अगर कोई अनूप के बाजपेयी सर जैसे गुरु हों भी तो बेवकूफ कहलाते हैं, आदर्शवादी बेवकूफ जिन्हे इस समाज के नियम और इसमे ठीक से रहना नहीं आया, न खुद कुछ बनाया खाया, न औरों को खाने दिया.

शायद यह बाद बहुत कड़वी लगे पर लिखते समय मेरी आँखों के सामने एक आदर्शवादी बूढ़े का चेहरा है, गाँधी पुरस्कार मिला था उन्हें आदर्शवाद के लिए, आखिरी दिनों में एकदम अकेले रह गये थे और उनके बच्चे उनके आदर्शवाद की हँसी उड़ाते थे. शिक्षक दिवस पर उन जैसे बेवकूफ आदर्शवादी शिक्षकों के लिए ही हैं आज की तस्वीरें.


सोमवार, सितंबर 05, 2005

कुकुरमुत्ता बाग

सुबह और शाम जब गावों में गायें धूलि उड़ाती हुई, घंटियां बजाती हुई चलती हैं, शहरों में धूँआ उगलती, होर्न बजाती बस और स्कूटर पर काम से लोग लौटते हैं, हमारा कुकुरमुत्ता बाग जाने का समय हो जाता है. जिन जिन के यहाँ कुत्ते हैं वह अपने लाडलों और लाडलियों को ले कर सैर के लिए निकल पड़ते हैं. हमारे परिवार में यही नियम है कि अगर मैं घर पर हूँ तो यह मेरी जिम्मेदारी है कि मैं समय पर अपने कुत्ते को उसकी मल मूत्र (क्षमा कीजिये पर इन शब्दो के लिए पर इस बारे में बात करने का कोई अन्य तरीका भी नहीं है) आदि की जरुरतों के लिए बाहर सैर पर ले जाऊँ.

शहरों में जहाँ एक बिल्डिंग में रह कर भी, अपने पड़ोसियों को नहीं पहचानने का नियम है, कुत्ते आप की जान पहचान बढ़ाने का काम करते हैं. अन्य कुत्ता स्वामियों से पहचान तो अपने आप ही हो जाती है क्योंकि कुत्तों ने अभी "पड़ोसियों को न पहचानने" वाले नियम के बारे में नहीं सुना, और शायद सुनना ही नहीं चाहते. उनके इलावा, अन्य लोग जो अकेलेपन को महसूस करते हैं, जैसे घर के बड़े बूढ़े, उनसे भी जान पहचान कुत्तों के बहाने आसानी से हो जाती है. हालाँकि कभी कभी यह जान पहचान कुछ अजीब सी होती है, जैसे हमारे बाग में, हम सभी कुत्तों के नाम तो जानते हैं, उनके मालिकों से हमेशा हँस कर दुआ सलाम होता है पर हमें किसी का भी नाम नहीं मालूम. यानि हम लोगों को "एशिया के मालिक", "टक्की की मालकिन", "साशा की वह मोटी मालकिन", के नामों से याद रखते हैं.

इसमे गलती उनकी नहीं कि अपना नाम नहीं बताना चाहते, हमारे कुत्ते की है जो घर में गुमसुम सा भोला भाला रहता है पर बाहर निकलते ही बाकी कुत्तों को देखते ही या तो "भौंकना चैम्पियन" बन जाता है या शक्त्ति कपूर की तरह अपनी सभी सखियों के ऊपर चढ़ने की कोशिश करता है, इसलिए किसी से ठीक से बात करने का मौका नहीं मिलता.

पर जिसने भी यह सोचा कि जहाँ कुत्ते मूतते हैं वहाँ कुकुरमुत्ते निकल आते हैं, यह ठीक नहीं है. हमने अपने वैज्ञानिक जाँच से इसकी गहराई में जाँच पड़ताल की है. अगर यह सच होता तो हमारा बाग अब तक कुकुरमुत्तों का जंगल बन गया होता, पर हमारे बाग में कभी एक भी कुकुरमुत्ता नहीं दिखाई दिया.

आज हमारे कुकुरमुत्ता बाग से दो तस्वीरें:


रविवार, सितंबर 04, 2005

बचपन से जवानी का रास्ता

शाम को बेटे को लेने फोर्ली जाना था. वह लंदन से रायन एयर की उड़ान से वापस आ रहा था. फोर्ली का हवाई अड्डा हमारे शहर से ७० किलोमीटर दूर है और सस्ती उड़ाने वहीं आती हैं. रास्ते में, उड़ान आने में अभी समय था, इसलिए सोचा कि इमोला रुक कर चलेंगे. इमोला छोटा सा शहर है, करीब ३० किलोमीटर दूर, जहाँ हम करीब दस साल तक रहे थे. सात साल पहले बोलोनिया में घर लेने के बाद वहाँ वापस कभी नहीं गया था.

इमोला "ग्रान प्री फोरमूला-एक" की कार रेस के लिए मशहूर है. अप्रेल में जब कार रेस के दिन आते हैं तो देश विदेश से लाखों पर्यटक यहाँ आते हैं और एक सप्ताह के लिए वहां की जनसंख्या ३० हजार से ३० लाख हो जाती है. जब वहाँ रहते थे तो उस एक सप्ताह में बड़ी कोफ्त होती थी. इतनी भीड़ की कुछ भी काम न हो पाये. सड़कों के फुटपाथों पर लोग कार पार्क कर देते, बागों में टेंट लगा देते, और कार रेस ट्रेक से कारों की घुर घुर इतनी तेज़ होती जैसे हवाई जहाज़ की आवाज होती है.

इतने दिनों बाद वहाँ लौटना अच्छा भी लगा और अजीब भी. वही पुरानी सड़कें जहाँ से रोज गुजरता था, जानी पहचानी भी लग रहीं थीं और नयी भी. किले के पास घूम रहे थे जब अचानक पत्नी ने एक लड़के को आवाज लगायी, "रिक्की!" मैं तो पहले पहचान नहीं पाया. लम्बा, पतला सा लड़का. बिखरे गंदे बाल, पतला शरीर, बुझा चेहरा, गंदे कपड़े. धीरे धीरे पास आया तो याद आया. बेटे का स्कूल का दोस्त था, अकसर घर आता था. कई बार बेटे के साथ साथ उसे भी मैंने होम वर्क करवाया और पढ़ाया था. उसके पिता की फैक्टरी है और बहुत पैसे वाले लोग हैं. कभी कभी मिलते थे पर विषेश दोस्ती नहीं थी. इमोला से आने के बाद, जानता था कि मेरे बेटे से कभी बात होती है पर मैंने उससे या उसके परिवार से दोबारा बात नहीं की थी.

उसे देख कर हैरान हो गया. इतना कैसे बदल गया था. वह खास बोला नहीं, बस सिर हिलाता रहा. चार पाँच मिनट बात की, मेरी पत्नी ने ही बात की, घर की, परिवार के समाचार पूछे. सारे समय वह या तो नीचे देखता रहा या फिर उसकी आँखें इधर उधर अजीब ढ़ंग से घूम रहीं थीं जैसे कैद हुआ हिरन भागने का रास्ता ढ़ूंढ़ रहा हो. छोटा सा सुंदर सा हँसमुख लड़का जो मेरी याद में था वह इस गम्भीर, बीमार से नवजवान से बिल्कुल मेल नहीं खाता था. बाद में पत्नी ने कहा कि शायद नशा करता है.

सब कुछ तो था उनके पास. पढ़े लिखे शालीन माता पिता, पैसा, सभी सुख, बचपन से जवानी के रास्ते में क्या हुआ ? ऐसा कैसे हो गया?

आज की तस्वीरे इमोला सेः इमोला का किला और पुरानी कपड़े धोने की जगह, जहाँ स्त्रियाँ कपड़े धोने आती थीं और आज भी बूढ़ी औरतें कपड़े धोने के बहाने आ जाती हैं.


शनिवार, सितंबर 03, 2005

राग अनुराग

"यह क्या टें टें लगायी है, कुछ अच्छा संगीत नहीं है क्या ?", शास्त्रीय संगीत सुन कर अधिकतर लोग कुछ ऐसा ही कहते हैं. मैं भी बचपन में ऐसा ही सोचता था. फिर जब १५-१६ साल का था तब पहली बार कुमार गंधर्व के भजन सुने तो उनका प्रशंसक हो गया. "उड़ जायेगा, हँस अकेला, जग दर्शन का मेला" जैसे उनके भजन मुझे आज भी उतना ही आनंद देते हैं जितना ३५ साल पहले देते थे. धीरे धीरे उनके अन्य संगीत को जानने की इच्छा हुई. कुछ शास्त्रीय रचनाएँ सुनी उनकी पर उन्हें ठीक से नहीं समझ पाया. फिर कुछ अन्य शास्त्रीय गायकों को देखने और सुनने का मौका मिला, जैसे पंडित भीमसेन जोशी, पंडित जसराज. उनकी सरल रचनाएँ, गीत या भजन आदि तो अच्छे लगते पर पूरे शास्त्रीय राग सुन कर कोई विषेश आनंद नहीं आता था.

कुछ समय बाद मौका मिला प्रभा अत्रे जी का गाया राग कलावती में "तन मन धन तोपे वारुँ" सुनने का. पहली बार समझ में आया कि शास्त्रीय संगीत कितना अच्छा हो सकता है. आज भी उनका यह गायन सुन कर रौगंटे खड़े जाते हैं. एक बार उनके इस गायन को कमरा बंद करके, बिना शोर के या फिर इयरफोन के साथ सुनिये, कुछ कुछ समझ आ जायेगा कि शास्त्रीय संगीत में क्या आनंद हो सकता है.

मुझे गायको से गायिकाएँ अधिक पसंद हैं, जैसे किशोरी आमोनकर, श्रुती सादोलिकर, वीणा सहस्रबुद्धे, मालिनी राजुरकर, इत्यादि. अभी तक केवल उत्तर भारत के हिंदुस्तानी संगीत की बात की है, दक्षिण भारत के कर्नाटक संगीत की नहीं. शुरु शुरु में कुछ बार सुनने की कोशिश की, पर कुछ खास मजा नहीं आया. वही बात मन में आती, "क्या एक जैसी टें टें चलती रहती है". फिर एक बार एकांत में बिना शोर के, ध्यान से सुनने की कोशिश की, तब आनंद आया.

मेरे विचार में अगर आप समझना चाहते हैं कि लोगों को शास्त्रीय संगीत में क्या मिलता है, तो इसे अकेले में पूरे ध्यान से सुनिये. शुरु शुरु में अगर आप कुछ और काम करते हुए इसे साथ साथ सुनेगें तो इसमे छुपी हुई ध्यान, साधना और भक्त्ति को नहीं समझ पायेंगे. मुझे आज भी रागों के नाम या उन्हें पहचानना नहीं आता, पर उसके बिना भी शास्त्रीय संगीत को सुन कर आनंद लिया जा सकता है.

आज दो तस्वीरें उत्तरी इटली की एल्पस पहाड़ों में "त्रेसका और कोंका" वादी सेः

शुक्रवार, सितंबर 02, 2005

भाई की खोज

"२६ सितंबर, १९४४. चौदह साल का था मैं, वहाँ, उस कोने पर खड़ा था. हर पेड़ के नीचे पर एक लाश झूल रही थी", उनकी आवाज में कोई भावना नहीं झलकती. वह यह कहानी जाने कितनी बार पहले भी सुना चुके होंगे. यहाँ आने वाले पर्यटकों को. हम लोग उत्तरी इटली में एक छोटे से शहर "बसानो देल ग्रापा" में थे. शहर के प्रमुख पियात्सा (चौबारे) से घड़ी के काँटे जैसी कई सड़कें शुरु होती हैं और इस चांदाकार सड़क पर समाप्त होती हैं. लगता है जैसे किसी सिनेमा हाल की बालकनी पर खड़े हों. एक तरफ गोल घूमती सड़क और शहर की प्राचीन दीवारें और दूसरी ओर नीचे एक हरी भरी घाटी और फिर ऊँचे पहाड़. करीब ही बहती है ब्रेंता नदी जिस पर बना प्राचीन पुल द्वितीय महायुद्ध में पूरा नष्ट हो गया था पर जिसे दोबारा से अपने पुराने रुप में बनाया गया है.

जहाँ सड़क खत्म होती है और वादी शुरु होती है, वँही कतार में लगे हैं वे ३१ पेड़ जिनकी बात हमारे गाइड कर रहे हैं. हर पेड़ एक छतरी की तरह तराशा लगता है. हर पेड़ पर लगा है उस पर फाँसी चढ़ने वाले का नाम, किसी किसी की फोटो भी है. इतनी सुंदर जगह पर मौत की बात कुछ अजीब सी लगती है. "आप जानते थे, उनमें से किसी को ?", मैंने पूछा.

"जानता था ? हमारे यँही के तो लड़के थे सब. सबको जानता था", हमारे गाइड की आवाज भर्रा आयी, "बच्चे थे वे भी मेरे जैसे, सोचते थे कि जर्मन सिपाहियों और फासिस्टों से अपना देश आजाद करवाना है. जर्मन तब हारने लगे थे, फासिस्टों को डर लगने लगा था."

कुछ देर चुप रह कर वे फिर बोले, "हमारे घर के पास रहती थी एक औरत. उसने सुना कि फाँसी लगने वालों में शायद उसका भाई जिरोलामों भी है, साइकल पर आयी थी और हर पेड़ के नीचे लटकी लाश के चेहरे देख रही थी. था एक जिरोलामो फाँसी चढ़ने वालों में से, पर वह उसका भाई नहीं था. बहुत सी बातें भूल गया हूँ पर यह बात नहीं भुला पाया, उसका हर पेड़ पर लटकी लाश में अपना भाई ढ़ूंढ़ना."

बासानो देल ग्रापा के शहीद मार्ग के पेड़ और ब्रेंता नदी पर पुल



गुरुवार, सितंबर 01, 2005

यादों के रंग

मुझे काम से उत्तरी इटली जाना था, पत्नी से साथ चलने को कहा, काम के बहाने सैर हो जायेगी. वह बोली कि अगर दो दिन की छुट्टी मिल जाये तो हम लोग स्कियो भी जा सकते हैं. स्कियो, यानि हमारी ससुराल. बहुत दिन हो गये थे ससुराल गये भी तो हमने भी तुरंत हाँ कर दी. वहाँ हमारी बड़ी साली साहिबा इन दिनों घर में अकेली हैं तो प्लेन यह बना कि काम समाप्त होने पर स्कियो से उनको ले कर, आसपास के छोटे छोटे शहरों में दो दिन घूमा जाये.

छोटा सा शहर है स्कियो, उत्तरी इटली में एल्पस के पहाड़ों से घिरा हुआ. इन दिनों में वहाँ मौसम भी अच्छा है, दिन में सुहावना और रात को थोड़ी सी सर्दी. पहाड़ों के अलावा, वहाँ बहुत सी झीलें भी हैं. दो दिन कैसे बीत गये पता ही नहीं चला. बहुत से छोटे शहर देखे जहाँ पहले कभी नहीं गया था या पंद्रह बीस साल पहले गया था.

सारे रास्ते में मेरी पत्नी अपनी बड़ी बहन से बातें करती रहीं. "वो याद है जब हम लोग उस पगडंदी पर साइकल ले कर घूमने गये थे ... वहाँ से केमिस्ट की दुकान से दवाई लेने गये थे ... वहाँ आइसक्रीम कितनी अच्छी थी ... वहाँ की जो मालकिन थी, जिसे बाद में केंसर हो गया था..." उन्ही शहरों में उन्होंने शादी से पहले बहुत बार छुट्टियाँ बितायीं थीं और उनसे जुड़ी हज़ार यादें थीं. हर जगह पहुँच कर सारी कहानी सुननी पड़ती, किसका कहाँ पर क्या हुआ था. शुरु शुरू में तो ध्यान से सुना पर फिर थोड़ी देर में थक गया. मन में सोच रहा था कि ऊपर से जाने हम कितने भिन्न हों, पर अंदर से सारी दुनिया में सभी लोग एक सी होते हैं. भाई-बहन जब बहुत दिनों बाद मिलते हैं और पुरानी जगहों को देखते हैं तो हर जगह एक जैसी ही बातें करते हैं. पुराने मित्रों की, पुराने गानों की, किसकी शादी हुई, कौन मरा, कौन चला गया.

आज की तस्वीरें इसी यात्रा से.

पिछले चिट्ठे के बारे में जिसमे पुराने आने-टकों की बात की थी, स्वामी जी और अतुल ने टिप्पड़ियों में मेरी गलतियों को सुधारा है और अन्य जानकारी भी दी है, दोनो को धन्यवाद.

विचेंज़ा का घंटाघर

लावारोने की झील
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