इन दिनों बात हो रही है अमरीका और कुछ अन्य देशों द्वारा ईराक में किये गये हमले की पाँचवीं वर्षगाँठ की. हमला करने के जो भी कारण बताये गये थे कि ईराक के अल कायदा से सम्बंध हैं या कि ईराक में परमाणू शस्त्र हैं, आदि सब झूठे साबित हुए हैं. फ़िर कहा गया कि यह ईराक में तानाशाह सद्दाम हुसैन को हटा कर वहाँ प्रजातंत्र लाने के लिए किया गया. विश्व स्वास्थ्य संघ के अनुसार इन पाँच सालों में कम से कम एक लाख साठ हज़ार लोग मरे हैं जबकि ईराक में काम करने वाली कुछ संस्थाओं के हिसाब से मरने वालों की संख्या इससे कई गुना अधिक है. करीब पचास लाख बेघर हो चुके हैं जिनमें से 25 लाख ईराक से भाग कर पड़ोसी देशों में शरणार्थी बन गये हैं.
एक और वर्षगाँठ है इन दिनों, पुरुषों के लिए दी जाने वाली नीली गोली यानि वियाग्रा की, जो कि दस साल पहले बाज़ार में आयी थी. वियाग्रा यानि सिलडेनाफिल साईट्रेट (sildenafil citrate, Viagra) आज की सबसे अधिक बिकने वाली दवाईयों में से है जिन्हें ब्लाकबस्टर दवाईयाँ कहा जाता है. अनुमान लगया जाता है कि इसे बनाने वाली अमरीकी कम्पनी प्फाईज़र (Pfizer) को पिछले दस सालों में इस दवा की वजह से कई सौ करोड़ का फायदा हुआ है.
वियाग्रा का काम है पुरुष लिंग के ईरेक्टाईल डिस्फँक्शन यानि तनने की कमज़ोरी को ठीक करना. गोली का असर 40-45 मिनट के बाद होता है और करीब 6-8 घँटे तक रहता है जिसके दौरान पुरुष सम्भोग करने में सफ़ल हो सकता है. अगर 50 मिलीग्राम की गोली से असर न हो तो 100 मिलीग्राम की गोली ली जा सकती है. खाली पेट या खाने के तीन घँटे बाद लेने से भी गोली का असर बेहतर होता है. गोली के अन्य बुरे प्रभाव विषेश नहीं हैं पर हृदय रोगी या फ़िर रक्तचाप काबू में न हो और बहुत बढ़ा हो तो इसे लेने में कुछ खतरा है.

लिंग ठीक से न तन पाये तो इसका कारण अधिकतर मानसिक होता है पर कई बार इसके भौतिक कारण भी हो सकते हैं जैसे कि प्रोस्टेट से जुड़ी कुछ बिमारियाँ. वियाग्रा का असर दोनो तरह की तकलीफों में होता है. वियाग्रा जैसी एक अन्य गोली है सियालिस (Cialis, Tadalafil) जिसका असर अधिक लम्बे समय तक रहता है. एक नयी दवा लेवित्रा (Levitra, Vardenafil) के टेस्ट चल रहे हैं पर असर में लेवित्रा तथा वियाग्रा में कोई अंतर नहीं दिखता.
लिंग की कमज़ोरी की वजह से सम्भोग न कर पाना, कुछ पुरुषों के लिए जीवन नष्ट हो गया महसूस करना जैसी बात बन सकती है. भारत में रेल यात्रा करें तो किसी शहर के आने से पहले इस बात की इलाज के विज्ञापन दिखते हैं, "विवाहित जीवन में परेशानी, निराश न होईये, हकीम से मिलिये, शर्तिया इलाज". अधिकतर व्यक्तियों में परेशानी भौतिक नहीं बल्कि मानसिक होती है इसलिए हकीम कुछ भी इलाज कर दें, उस का कुछ न कुछ असर हो ही जाता है क्योंकि मन से डर कम हो जाता है. इस मानसिक डर का एक कारण शारीरिक प्रक्रियाँओं से जुड़ी भ्राँतियों से भी है जैसे कि हस्तमैथुन से शरीर में कमजोरी आ जाती है और बाद में लिंग से जुड़ी तकलीफ़े हो सकती हैं. नवजवान इस तरह की बातों में बहुत विश्वास करते हैं, डर और चिंता की वजह से उनका आत्मविश्वास गिर जाता है. इस हालत में वियाग्रा जैसी दवाई का बहुत अच्छा असर होता है.
दिक्कत यह है कि एक बार इस तरह का दवा लेने लगो तो मन में बैठा डर और गहरा हो सकता है और पुरुष यह सोचने लगता है कि बिना दवा के वह सेक्स नहीं कर सकता. दूसरी बात है गोली का गलत फ़ायदा उठाने की जब सेक्स ही जीवन का मूल केंद्र बन जाये. नवयुवक, प्रोढ़ और वृद्धों की सेक्स पार्टियों की बातें भी सुनने में आई हैं जिनमें लोग गोलियों का गलत उपयोग करते हैं. या फ़िर गोली के असर में अपने आप को कामशास्त्र का हीरो समझना.
गोली के गलत प्रयोग से जुड़ा एक नया रोग है जिसे नाम दिया है "टेढ़े कील की बीमारी" का (Bent nail syndrome) . यह बीमारी अक्सर प्रौढ़ पुरुषों में पायी गयी जो किसी जवान लड़की के साथ पत्नी से छुप कर मज़े लेने कहीं होटल में पाये जाते हैं और रात को अस्पताल में एमरजैसीं विभाग में आते हैं. गोली के असर में वह खुद को नवयुवक महसूस करते हैं और कामशास्त्र के किसी टेढ़े मेढ़े आसन लगाने की कोशिश में लिंग की जड़ को गहरा नुक्सान पहुँच जाता है जिसका इलाज है लिंग पर प्लस्तर किया जाये.
इस लिए इस गोली की वजह से तलाक भी हो सकता है!
सही कहा. नीली गोली एक मिथक सा बनती जा रही है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंमजे की बात यह है की जिस प्रकार इसका टीवी पर विज्ञापन आता है, ऐसा लगता है मानो सरदर्द की गोली हो. गोली खाइए, मर्दानगी हाजिर. वीवा वायग्रा इत्यादी. कम से कम अमेरिका में तो ऐसा ही लगता है. CNN पर ख़बर देखते हुए आधे घटे में दो बार ऐसे विज्ञापन, कभी वायग्रा, कभी सिअलिस, और कभी कोई तीसरी ऐसी गोली. अब ६-७ साल के बच्चे पूछें तो क्या समझायें यह कौनसी चीज़ का एड्वार्तैज़मेंट है. बाकी कोई परेशानी नहीं, जय विज्ञान.
प्रत्युत्तर देंहटाएं