रविवार, मई 18, 2008

शोनेन आइ - नारी कामुक लेखन

अपने घर के पास के पुस्तकालय में किताबें देख रहा था कि एक गुलाबी रंग की छोटी सी किताब पर दृष्टि पड़ी. वेरुस्का सबूक्को द्वारा लिखी इस पुस्तक का शीर्षक है "शोनेन आइ - पूर्व और पश्चिम के बीच नारी कामुकता का कल्पना जगत". शीर्षक देख कर मन में जिज्ञासा जागी तो उसे पढ़ने के लिए ले आया.

इस प्रारम्भ से आप समझ सकते हैं कि इस लेख का विषय यौन सम्बंधी है और अगर आप इस तरह की बातों में रुचि नहीं रखते या उन्हें गलत मानते हैं तो कृपया इस लेख को न पढ़ें.

बात हो रही है "एरोटिक लेखन" (erotic writing) की. एरोटिक का सही हिंदी में अनुवाद क्या होगा यह मुझे ठीक से नहीं समझ में आया. मैं इसके लिए "कामुक लेखन" का उपयोग कर रहा हूँ. यानी कि वैसा लेखन जिसे पढ़ कर मन में काम भावना का जागरण हो या काम इच्छा को प्रेरणा या उत्साह मिले. काम भावना की बात उठे तो पोर्नोग्राफी का नाम भी लिया जाता है, तो क्या एरोटिक और पोर्नोग्राफी एक ही बात के दो नाम हैं? पश्चिमी लेखन में पोर्नोग्राफी और एरोटिक में अंतर माना जाना है.

पोर्नोग्राफी (pornography) का अर्थ दिया जाता है कि दो या अधिक व्यक्तियों के बीच सेक्स क्रिया की बात करना, चाहे वह लेखन में हो, चाहे तस्वीरों में या फिल्म के रूप में. पोर्नोग्राफी यौन अंगों पर केंद्रित होती है. इस बारे में बात करते हुए "व्यक्ति" शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ क्योंकि यौन सम्बंध नारी और पुरुष के बीच भी हो सकता है, केवल नारियों या केवल पुरुषों के बीच भी. दूसरी ओर, एरोटिक का अर्थ दिया जाता है आपस में आंतरिकता, रिश्ते की बात करना, जिसमें सम्बंध तन का हो या मन का, वह यौन अंगों पर केंद्रित नहीं होता, उसमें दूसरे के प्रति चाह की बात अधिक होती है हालाँकि एरोटिक लेखन में भी सेक्स सम्बंधों की बात कम या अधिक खुले तरीके से हो सकती है.

पर सच कहूँ तो मेरे लिए पोर्नोग्राफी और एरोटिक लेखन का अंतर इतना स्पष्ट नहीं है, कभी कभी लगता है कि अगर साहित्यिक भाषा का उपयोग करें तो उसे एरोटिक बुला लेते हैं और लेखक अच्छा न हो तो उसे पोर्नोग्राफी कह देते हें. या फ़िर सीधे दौ टूक शब्दों में बात की जाये तो वह पोर्नोग्राफी और और उसके बारे में साहित्यिक शब्दों का प्रयोग किया जाये तो एरोटिस्सिम. खैर मुझे लगता है कि इस बहस में किसी निर्णय पर पहुँचना शायद कठिन है.

पुरुष और स्त्री कामुकता में अंतर होता है, यह बात साधारण लग सकती है पर अक्सर मेरे विचार में इसे ठीक से नहीं समझा जाता. कई साल पहले जब मैं "यौन सम्बंध और विकलांगता" विषय पर शौध कर रहा था तो यौन सम्बंधों के बारे में कौन से प्रश्न पूछे जायें यह निर्णय शौध में भाग लेने वालों के साथ ही किया गया था, जिनमें पुरुष भी थे, स्त्रियाँ भी. शौध के सात-आठ महीनों में भाग लेने वाले लोगों से मित्रता के सम्बंध बन गये थे, हम लोग एक दूसरे को जानने लगे थे. तब बात हो रही थी कि शौध के प्रश्न ठीक थे या नहीं, तो स्त्रियों का कहना था कि शौध के यौन सम्बंध पर सभी प्रश्न पुरुष की दृष्टि से थे, उनमें नारी दृष्टि नहीं थी.

पहले तो लगा कि यह बात ठीक नहीं होगी, क्योंकि प्रारम्भ की बहस में, स्त्री और पुरुष दोनो ने भाग लिया था, तो क्यों नारी दृष्टिकोण प्रश्नों में नहीं आ पाया? और दूसरी बात थी कि क्या नारी का यौन सम्बंधों को देखना का नजरिया पुरुष नजरिये से भिन्न होता है, तो क्या भिन्नता होती है उसमें?

बात की गहराई में जाने पर निकला कि प्रारम्भ की बहस में सब लोग नये नये थे, एक दूसरे को ठीक से नहीं जानते थे, और उस समय गुट की स्त्रियों ने, जब प्रश्न निर्धारित किये जा रहे थे तो झिझक की वजह से ठीक से अपने विचार नहीं रखे. उनका यह भी कहना था कि अगर किसी स्त्री ने अपनी बात रखने की कोशिश की भी तो शौध दल के पुरुष उसे ठीक से नहीं समझ सके, क्योंकि पुरुषों का इस बारे में सोचने का तरीका ही भिन्न है. इस बात चीत का निष्कर्ष था कि पुरुष विचारों में प्रेम को यौन सम्बंध से मिला कर देखता है, यौन अंग और सम्भोग पुरुष कामुकता का केन्द्र होते हैं. जबकि नारी विचार रिश्ते की आंतरिकता, उनकी भावनाओं को केन्द्र में रखते हैं, उसमें यौन अंग और सम्भोग के साथ एक दूसरे को करीब से जानना और महसूस करना उतना ही महत्वपूर्ण है.

कुछ समय पहले अर्धसत्य चिट्ठे पर मनीषा जी का एक संदेश पढ़ा था जिसमें उन्होंने लिखा था, ".. अब अपनो से अपनी बात कहना चाहती हूं कि सेक्सुअल लाइफ़ हमारी तो होती ही नहीं है उस आदमी की होती है जिसके शारीरिक संबंध किसी लैंगिक विकलांग के साथ होते होंगे क्योंकि ईश्वर ने मनुष्य के शरीर में अलग-अलग आनंद की अनुभूति के लिये अलग-अलग अंग बनाए हैं लेकिन जब हमारे जैसे लोग एक अंग विशेष से दुर्भाग्यवश वंचित हैं तो हम उस आनंद की अनुभूति कैसे कर सकते हैं? जैसे किसी को जीभ न हो तो उससे कहा जाये कि आप कान से स्वाद का अनुभव करके बताइए कि अमुक पदार्थ का क्या स्वाद है? .." जब यह पढ़ा तो वही बात मन में आयी थी कि क्या मनीषा जी की बात यौनता को पुरुष दृष्टिकोण से देखने का निष्कर्ष है और अगर नारी दृष्टि से देखा जाये तो क्या यौन अंग का होना या न होना ही सब कुछ नहीं? पर यह भी सच है कि इस विषय पर मेरी जानकारी शायद अधूरी ही है और इस तरह की बातें कि "सभी पुरुष ऐसे होते हैं" या "सभी नारियाँ वैसा महसूस करती हैं", जैसी बातें सोचना गलत है, क्योंकि हम सब भिन्न हैं, और हमारे सोचने महसूस करने के तरीकों को पुरुष या नारी होने की परिधियों में बाँधना उसे कम करना है?

खैर बात शुरु की थी वेरुस्का साबूक्को की किताब "शोनेन आइ" से. "शोनेन आइ" (shonen ai) शब्द जापानी भाषा का है, शोनन का अर्थ है लड़का और आइ का अर्थ है प्यार, तो "शानन आइ" का अर्थ हुआ "लड़कों का प्यार". इस पुस्तक में उन्होंने जापान में और अमरीका में नारियों द्वारा नारियों के लिए लिखे जाने वाले कामुक लेखन की बात की है.

इस कामुक लेखन की खासियत है कि वह जाने माने साहित्य, चित्रकथाओं और फ़िल्मों के पुरुष पात्रों को ले कर उनके बारे में समलैंगिक प्रेम कल्पना की संरचना करता है. जापान में इस तरह की कामुक किताबें चित्र कथाओं के रूप में होती हैं जिनके पात्र किशोर या नवयुवक होते हैं, जिनके शरीर एन्ड्रोगाईनस होते हैं, यानि कि वैसे तो पुरुष होते हैं पर उनके हाव भाव नारी रूप के होते हैं.इसके विपरीत है अमरीकी युवतियों द्वारा अन्य युवतियों के लिए लिखे हुए कामुक लेखन, जिसे "स्लेश" (slash) कहा जाता है जिसमें फिल्मों या टेलीविजन के पुरुष पात्रों को ले कर समलैंगिक प्रेम कहानियाँ लिखी जाती हैं. स्लेश लेखन में उम्र में बड़े पुरुष पात्र जैसे स्टार ट्रेक (Star Trek) या एक्स फाईलस (X files) जैसी टेलिविजन सीरियल के पुरुष पात्रों को ले कर लिखी गयीं कहानियाँ. स्लेश लेखन में स्त्री पात्रों को ले कर भी कुछ समलैंगिक कल्पनाओं का लेखन है पर यह अधिक महत्वपूर्ण नहीं है.

शोनेन आइ और स्लेश लेखनों में कामुकता का नारी दृष्टिकोण मिलता है यानि यौन अंगों या सम्भोग की बात कम होती है, पात्रों के आपस में प्यार, उनकी भावनाओं की बात अधिक होती है. पर स्त्रियों को पुरुष समलैंगिक सम्बंध में क्यों या कैसे कामुकता मिली यह मैं ठीक से नहीं समझ पाया. यह तो पढ़ा था कि कई पुरुष नारी समलैंगिक सम्बंधों के बारे में पढ़ना या देखना पसंद करते हैं और इस तरह के दृष्य पोर्नोग्राफिक फिल्मों में दिखाये जाते है.

खैर कोई क्या महसूस करता है, क्यों करता है, यह सब शायद समझने की कोशिश करना समय बरबाद करना है. जब यौनता की बात होती है तो अक्सर विषमलैंगिक, समलैंगिक, आदि शब्दों पर रुक जाती है, पर यह शब्द कैदखाने जैसे हैं जिनमें पूरी मानव जाति को बन्द करने की कोशिश करने की कोशिश करना गलत है.

अगर सोनेन आइ या स्लेश के बारे में अधिक जानना चाहते हें तो इन्हें गूगल पर खोजिये, बहुत सामग्री मिल जायेगी.

9 टिप्‍पणियां:

  1. सुनील जी आप वाकई महान हैं जो कि मुझ जैसी क्षुद्र सी लैंगिक विकलांग को अपने पोस्ट में जगह दिये बैठे हैं। मुझे पूरा यकीन है कि एक दिन लोग हमें सहज ही स्वीकारेंगें। आपका लेख सुन्दर और मननीय है।

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  2. आपकी पोस्ट्स हमेशा प्रभावित करती हैं । समलैंगिकता , विषमलैंगिकता के कैदखानों से दुनिया वाकई बन्द है ।
    देह की मुक्ति , मानव की मुक्ति के सवाल जैसे आप उठाते हैं , वह ज़रूरी भी हैं ।

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  3. सच है, कामुकता और धार्मिकता दोनों ही पहलू महिलाओं में ज्यादा होते हैं।

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  4. 'जिनमें पूरी मानव जाति को बन्द करने की कोशिश करने की कोशिश करना गलत है.' में 'करने की कोशिश' दो बार है। इस लेख पर फिलहाल कुछ नहीं कहूंगा।

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  5. उत्तर
    1. सराहना के लिए आप का धन्यवाद :)

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  6. This was an interesting article as most of the times what women desire in -through sexual relations is lost.

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    1. Thanks Kali. As men and women, how much of our sexuality is our innate nature and how much is influenced by the cultures where we grow up, is such an interesting area for exploration. I agree that most of the time, what does a women desire in a sexual relationship, is often lost.

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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