बुधवार, जून 24, 2009

अपनी भाषा

पिछले कई वर्षों से किताबें खरीदना बंद कर दिया है मैंने.

कहाँ रखो और एक बार पढ़ कर उनका क्या करो, यही दुविधा थी जिसका उत्तर नहीं मिला. किताबें रखने की जगह सीमित हो और जब अलमारी किताबों से भरी हो तो नयी किताबें कहाँ रखी जायें? खरीदी किताबों को रद्दी के कूड़े में फ़ैंकने से दुख होता था, लेकिन इसके अतिरिक्त चारा भी नहीं था. कुछ किताबें तो हमारे घर के पास वाले पुस्तकालय में दे दीं, पर बाकी बहुत सी किताबें पहले बेसमैंट में रखीं और जब बेसमैंट की छोटी सी कोठरी में जगह की आवश्कता हुई तो बहुत सी किताबें फैंकनीं ही पड़ीं.

तो निर्णय लिया कि अब से अँग्रेज़ी, इतालवी जैसी भाषाओं में कोई किताब नहीं खरीदूँगा क्योंकि इन सब भाषाओं की नयी किताबें हमारे स्थानीय पुस्तकालय में तुरंत मिल जाती हैं. अगर कोई पुस्तक पुस्तकालय में नहीं हो, तो उसको खरीदने के लिए फार्म भर देने से, कुछ दिन में पुस्तकालय उसे खरीद लेता है. तो सोचा कि केवल पुस्तकालय से ले कर पढ़ूँगा. पर हिंदी की किताबें पढ़ने के लिए क्या किया जाये, वह तो इटली के किसी पुस्तकालय में नहीं मिलती? अंत में यही सोचा कि हर वर्ष भारत यात्रा में कुछ सीमित हिंदी की किताबें खरीदी जायें, पर इस निर्णय का पालन करना भी कठिन है.

प्रश्न है कि हिंदी की किताबें कहाँ से खरीदी जायें और कौन सी?

पहले क्नाटप्लेस में मद्रास होटल में आयर्वेदिक डिस्पेंसरी के पीछे हिंदी किताबों की दुकान थी, पर वह भी कुछ साल पहले बंद हो गयी. कुछ दिन पहले भाँजा बता रहा था कि दरियागंज में हिंदी किताबों के विभिन्न प्रकाशकों के शो रूम हैं पर अगर आप को कोई किताब चाहिये तो उसी प्रकाशक के पास मिलेगी जिसने छापा हो और ऐसी कोई जगह नहीं जहां आप विभिन्न प्रकाशकों की किताबें खरीद सकें. विश्वास नहीं होता कि इतने बड़े सुपरपावर बनने वाले भारत की राजधानी दिल्ली में रहने वाले लाखों लोगों में इतने हिंदी की किताबें खरीदने वाले लोग नहीं कि उनके लिए इसकी दुकानें हों, एक भी दुकान हो?

फ़िर झँझट कि कौन सी किताब खरीदी जाये. कुछ पत्रिकाओं में नयी किताबों की समीक्षा छपती रहती हैं लेकिन जिस तरह नियमित रूप से अँग्रेज़ी की सबसे अधिक बिकने वाली किताबों की टाप टेन जैसी लिस्ट छपती हैं, जिससे आप देख सकते हें कि इस समय कौन सी नयी किताबें चर्चित हैं या पसंद की जा रही हैं, वैसा हिंदी में नहीं होता. या शायद मुझे मालूम नहीं? अगर पुस्तकालय से किताब लो तो सब कुछ पढ़ सकते हें, अगर न पसंद आये तो वापस दे दीजिये और किसी अन्य नये लेखक को पढ़ने के लिए ले लीजिये. लेकिन अगर मेरी तरह, साल में एक बार भारत आते हैं और कुछ गिनी चुनी किताबें खरीदना चाहते हैं तो इस तरह नहीं कर सकते. नतीजा यही होता है कि हर बार पहले से जाने पहचाने पुराने लेखकों की किताबें खरीदये.

ऐसा क्यों है?

कुछ दिन पहले अँग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस में तवलीन सिंह ने अपने लेख "आयतुल्लाह के पाठ" (Lessons from Ayatullah) में लिखा था:

"अपने प्राचीन हिंदू भारत के विषय में बहुत सी बातें हें जिन्हें हमें समझने और सम्भालने की कोशिश करनी चाहिये. मुझे दुख होता है जब मैं दक्षिण पूर्वी एशिया के किसी देश में जाती हूँ और देखती हूँ कि भारत की प्राचीन सभ्यता का कितना गहरा असर था जो आज भी बना हुआ है और जो अपने यहाँ खोया जा चुका है. अगर हम यह चाहते हैं कि भारत की सभ्यता बस बोलीवुड की सभ्यता मात्र बन कर न रह जाये तो हमें यह समझना चाहिये कि क्यों वह यहाँ खो गया है? हमें यह समझना चाहिये कि क्यों हमारे महानगरों में कोई दुकाने नहीं जहाँ भारतीय भाषाओं कि किताबें मिलें? अगर करोड़ों लोग प्रतिदिन हिंदी की अखबारें पढ़ रहे हैं तो वह हिंदी की किताबें क्यों नहीं खरीदते? क्यों छोटे शहरों में किताबों की कोई दुकान नहीं मिलती? क्यों हमारे गाँवों में कोई किताबें नहीं बेचता?"

स्थिति को समझने के लिए उसे विभिन्न दृष्टिकोणों से देखना होगा. जुलाई 2008 की "सामायिक वार्ता" पत्रिका में योगेंद्र यादव ने अपने सम्पादकीय में लिखा था:

"हाल ही में जारी इन आकंड़ों के मुताबिक सन् 2001 में देश भर में अंग्रेजी को अपनी मातृभाषा बताने वाले लोग सिर्फ 0.02 फीसदी थे, यानि हर दस हजार में से सिर्फ दो व्यक्ति अपने घर में पहली भाषा के रूप में अंग्रेजी बोलते थे. ... सन 2006 में देश भर में छह फीसदी बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ रहे थे. ज्यादा चौकाने वाला आंकड़ा है कि सन् 2003 और 2006 के बीच सिर्फ तीन सालों में जहां भारतीय भाषाओं में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या 24 फीसदी बढ़ी वहीं अंग्रेजी में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या में 74 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. अगर स्कूली शिक्षा देश के भविष्य का दर्पण है तो अंग्रेजी बढ़ रही है और भयावह दृष्टि से बढ़ रही है."

दूसरी ओर हिंदी तथा भारतीय भाषाओं में अखबार पढ़ने वालों की संख्या भी बढ़ी है. देश के 22 करोड़ अखबार पढ़ने वालों में से बीस करोड़ लोग हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में अखबार पढ़ते हैं. टीवी पर हिंदी की चैनल देखने वाले लोगों के सामने, अंग्रेजी चैनल देखने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है. इस स्थिति के बारे में यादव जी ने लिखा कि, "भारतीय भाषाँए अंगरेजी के साये तले सूखने या मरने वाली नहीं है लेकिन जहां उनका शरीर फल फूल रहा है वहीं उनका ओज घट रहा है, आत्मा सिकुड़ रही है." इसे वह भाषा की राजनीति को नये तरीके से परिभाषित करने के मौके के रूप में देखते है, और पुराने "अंग्रेजी हटाओ" के नारे को छोड़ कर, वह अंग्रेजी को भारतीय भाषा मानने की सलाह देते हैं और अंग्रेजी को कम करने की बात को छोड़ कर "हिंदी बनाओ" की बात पर जोर देने की सलाह देते हैं.

यह सच है कि आज की दुनिया में तकनीकी और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्रों में अंग्रेजी न जानने का अर्थ है कि इन क्षेत्रों में होने वाले विकास से कट जाना. कुछ दिन पहले मेरठ में हो रहे एक संस्कृत सम्मेलन की बात पढ़ी थी जिसमें लिखा था कि क्मप्यूटर की प्रोग्रामिंग की भाषा के रूप में संस्कृत बहुत उपयुक्त है, पर इस तरह की बात आज व्यावहारिक नहीं मानी जा सकती जहां फ्राँस, जर्मनी, स्पेन जैसे विकसित देश भी जो अन्य सब काम अपनी भाषा में करते हैं, इन क्षेत्रों में अंग्रेजी के वर्चस्व को मानने को मजबूर हैं.

मुझे ब्राजील, चीन और कोंगो जसे देशों का अनुभव है. जानता हूँ कि ब्राजील में पोर्तगीस भाषा में शौध कार्य में बहुत बढ़िया काम हुआ है, चीन में चीनी भाषा में काम हुआ है, कोंगो में फ्राँसिसी भाषा में काम हुआ है, पर इस काम को अपने देश की सीमा से बाहर दूसरे लोगों तक पहुँचाना कठिन है, और किसी भी अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक सभा में इन देशों की उपस्थिति नगण्य ही रहती है, वे लोग नये होने वाले विकासों से कटे रहते हैं. इटली में, जहाँ मैं रहता हूँ, पंद्रह साल पहले तक अंग्रेजी या फ्राँसिसी भाषा पढ़ने का मौका कुछ उसी तरह मिलता था जिस तरह हमें मिडिल स्कूल में तीन साल तक संस्कृत पढ़ने का मौका मिलता था. पर पंद्रह साल पहले फैसला लिया गया कि प्राईमरी विद्यालय से ले कर, हाई स्कूल तक, सब छात्रों को अंग्रेजी दूसरी भाषा के रूप में पढ़ायी जायेगी. हालैंड ने फैसला लिया कि सारी पढ़ाई अंग्रेजी में होगी और उनकी अपनी डच भाषा को केवल भाषा के रूप में पढ़ाया जायेगा.

अगर हिंदी में उच्चतम स्तर तक तकनीकी तथा वैज्ञानिक शिक्षा कि सुविधा हो भी जाये तो भी यह स्नातक बाकी विश्व से किस तरह से बात करेंगे, उनका काम किन अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में छपेगा, जबकि उनके क्षेत्रो में होने वाले नये विकासों को अनुवादित करके उन तक पहुँचाया जा सकता है? तो क्या इसका अर्थ है कि अंग्रेजी न जानने वालों को इन क्षेत्रों में उच्च स्तर पर पढ़ाई करने का मौका नहीं मिलना चाहिये? मैं सहमत हूँ कि यह मौका अवश्य मिलना चाहिये पर इस तरह के स्नातकों की सीमाओं को स्पष्ट माना जाना चाहिये और उनसे बाहर निकलने के साधनों को भी तैयार किया जाना चाहिये. इसका एक उदाहरण है कि इसी तरह का एक समाचार पढ़ा था कि इस बार के सिविल सर्विस इम्तहान में छह लोग भी हैं जिन्होंने हिंदी माध्यम से इन्तहान दिया और विदेश मंत्रालय के लिए चुने गये हैं, उनकी अंग्रेजी भाषा की जानकारी को सुदृढ़ करने के लिए कोर्स की सुविधा दी गयी है.

इस लिए मैं यादव जी के विचारों से सहमत हूँ कि बात अंग्रेजी से लड़ाई की नहीं बल्कि बात हिंदी को बनाने और दृढ़ करने की है, पर यह किस तरह हो, यह प्रश्न जटिल है. अन्य सब बातों को भूल भी जायें, एक बात के लिए ध्यान आवश्यक है कि यह बात गरीब, कमज़ोर वर्ग की भी है जो अंग्रेजी न जानने की वजह से दबाव सहता है क्योंकि शासन और ताकत की भाषा तो अंग्रेजी ही है. जो लोग इस दिशा में काम कर रहे हैं वह इस विषमता से किस तरह लड़ सकते हैं? क्या नयी तकनीकें कोई रास्ता दिखा सकती हैं जिनसे गरीब, कमजोर वर्ग का संशक्तिकरण हो जिसमें अंग्रेजी जानने या न जानने का उनके जीवन पर असर कम हो?

एक अन्य बात है प्राथमिक स्तर पर शिक्षा के माध्यम की बात. इस विषय में हुए शौध ने बताया है कि प्राथमिक शिक्षा अपनी मातृभाषा में ही होनी चाहिये. क्या ऐसा हो सकता है कि पूरे भारत में प्राथमिक स्तर पर सारी शिक्षा को अंग्रेजी माध्यम की बजाय स्थानीय भाषा में किया जाये और अंग्रेजी को केवल भाषा के रूप में पढ़ाया जाये?

हिंदी के लेखक, विचारक और शुभचिंतक जो नहीं कर पाये, उसे नीचा समझे जाने वाले बाज़ारी ताकत ने ही कर दिखाया है. जनसंस्कृति में हिंदी के महत्व को स्थापित करने में हिंदी अखबारों और पत्रिकाओं की बिक्री, हिंदी फिल्मों और फिल्मी संगीत ने, हिंदी टीवी चैनलों ने जितना किया है उतना शायद कोई सरकारी या गैरसरकारी संस्था नहीं कर पायी.

हिंदी और भारतीय भाषाओं के साहित्य का अंग्रेजी में अनुवाद और अंग्रेजी में छपने वाले विदेशी साहित्य का भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी हो रहा है और शायद अगले कुछ वर्षों में और बढ़ेगा. अगर इतालवी, फ्राँसिसी, स्पेनिश, पोतर्गीस भाषाओं के प्रकाशक यह आसानी से जान सकें कि किन हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में लिखने वाले लेखकों की किताबें सराही जा रही हैं, बिक रहीं हैं तो उनके लिऐ अन्य भाषाओं के बाज़ार खुल सकते हैं.

बालीवुड के सितारे, काम हिंदी फिल्मों के करते हैं पर बातचीत और साक्षात्कार और चिट्ठे अंगरेजी में देते हैं, लेकिन जब इंटरनेट पर भारतीय भाषाओं में पढ़ने वाले बढ़ेंगे तो वे लोग भी हिंदी में अपनी बात लिखने कहने की कोशिश करेंगे?

आजकल समाचार पत्र "देल्ही" का नाम "दिल्ली" में बदलने की बात भी कर रहे हैं. मुझे लगता है कि इस तरह की बातें वही लोग उठाते हैं जिनमें आत्मविश्वास नहीं, या जिन्हें सचमुच की समस्याओं से सरोकार नहीं, बल्कि अस्मिता की बात उठा कर उसका राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं. मैंने तो आज तक कभी भी हिंदी पढ़ने लिखने वालों में देल्ही शब्द को नहीं देखा सुना, इसका उपयोग केवल अंग्रेजी बोलने वाले ही करते हैं. जब तक हिंदी सुरक्षित है तब तक दिल्ली को अपने नाम की अस्मिता को बचाने की कोई चिंता नहीं, हाँ अगर हिंदी ही नहीं रहेगी तो नाम देल्ही हो या दिल्ली, क्या फर्क पड़ेगा?

बात हिंदी किताबों को खरीदने से शुरु की थी. आखिर में पाया कि क्नाट प्लेस में प्लाज़ा सिनेमा वाली सड़क पर जैन बंधुओं की नयी दुकान खुली है जहाँ पहले माले पर कुछ हिंदी की किताबें भी हैं. इस बार भी मैंने पुराने जाने पहचाने लेखकों की किताबें ही खरीदी हैं. आशा है कि जनसत्ता जैसे दैनिक या फ़िर टीवी पर "भारत का सबसे बड़ा समाचार गुट" जैसा दावा करने वाला दैनिक भास्कर जैसे अखबार, हिंदी किताबें बेचने वाली दुकानों के सहयोग से नियमित रूप से अधिक बिकने वाली हिंदी की टाप टेन किताबों के बारे में छापेंगे, और हिंदी के बढ़ते फ़ैलते चिट्ठाजगत से जुड़े लोग हिंदी की किताबें बेचने वाली दुकानों पर जा कर नयी छपने वाली किताबों को खरींदेगे, उनके बारे में बात करेंगे, उनकी आलोचना और प्रशंसा करेंगे, और कभी मैं भी नये लेखकों की किताबें खरीदूँगा!

सोमवार, जून 22, 2009

अतीत का मूल्यांकन

"आप मेरे साथ क्यों चल रहे हैं?" मां ने अचानक मुझसे पूछा. बात कम ही करतीं हैं आजकल माँ, और जब करती भी हैं तो इस तरह कि बात अधिकतर समझ नहीं आती. एक तो उनकी आवाज़ इतनी धीमी हो गयी है कि समझने के लिए बहुत ध्यान से सुनना पड़ता है. उस पर से उनके शब्द गड़मड़ हो गये हैं, पुरानी ऊन के गोले की तरह, एक दूसरे से चिपटे हुए, कहना कुछ चाहती हैं, पर मुख से कुछ और ही निकलता है और वह भी अधूरा.

"मां, आप का बेटा हूँ तो आप के ही साथ चलूँगा, और किसी की मां के साथ तो नहीं जा सकता?", मैंने कहा तो उन्होंने उत्तर नहीं दिया पर लगा कि वह कुछ अश्वस्त हो गयीं हों.

हम लोग जहाँ रहते हैं वहीं कम्पाऊँड में सैर कर रहे थे. घर के आसपास की सैर या फ़िर सब्ज़ी खरीदने के अलावा घर से बाहर नहीं निकलता, और अगर कोई मिलने वाला मित्र या रिश्तेदार न हो, तो सब समय पढ़ने में ही गुज़रता है. शायद इसी लिए अपने परिवार के अतीत से जुड़ी बातें अक्सर मन में आ जाती हैं, जिनके बारे में अक्सर सोचता रहता हूँ. चूँकि कोई अन्य नहीं जिनसे बात कर सकूँ, बहुत से प्रश्न और उत्तर मन में अपने आप उठ कर, अपने आप ही शांत हो जाते हैं.

सोचता हूँ कि मानव कैसा बना है कि उसे लगता है कि उसका जीवन का कुछ महत्व है. वह सोचता है कि जो वह लिखता है, जो वह सोचता है, उस सबका कुछ महत्व है. पर वही मानव अगर रुक कर सोचे तो पायेगा कि पृथ्वी पर जीवन के विकास के इतिहास में उसका स्थान कितना छोटा सा है, और एक किसी मानव के जीवन का, उसके सोचने और लिखने का, उसके जीवन का प्रभाव अगर समय की लम्बी दृष्टि से देखा जाये तो नगण्य से भी छोटा होगा. लेकिन फिर भी आज के युग में अखबार, टीवी, रेडियो, पत्रिकाँए, आदि छोटी छोटी बातों को ले कर इस तरह सारा दिन बार बार दौहराती रहती हैं, मानो जग हिला देने वाली घटना हुई हो. लेकिन इन सबको स्वयं भी अपने इस झूठ मूठ के गढ़े जाने वाले इतिहास पर विश्वास नहीं, इसीलिए अगले दिन उन जग हिला देने वाली घटनाओं को भूल कर, किसी अन्य बात पर उसी तरह का तूफ़ान गढ़ने में जुट जातीं हैं. रुक कर, सोच कर, समझ कर कुछ भी कहने सुनने की बात नहीं होती, या बहुत कम होती है.

पैसा, बेचना, कमाना, आदि ही आज के जीवन के सर्वव्यापी गुण हैं, और इस बाज़ार युग में रुक कर, सोच समझ कर की जाने वाली बात को सुनने का समय भी किसी के पास नहीं है.
***

सोच रहा था कि इतिहास कैसे बनता है? पिछले कुछ दशकों में, पहले पत्रों, किताबों और पत्रिकाओं के जनाकरण से, और फ़िर तस्वीरों, चलचित्रों से, और अब, इंटरनेट के माध्यम से, करोड़ों लोग अपने स्वर उठा सकते हैं, इतिहास के बारे में अपनी बात के निशान छोड़ सकते हैं. इतने स्वर उठने का तो मानव इतिहास में पहले कभी अवसर नहीं मिला था? पहले तो बड़े बड़े राजा महाराजा ही, अपनी बातों को जीवनी लिखने वाले, राज कवियों और प्रशस्ति गायकों के माध्यम से कह पाते थे. तो क्या आज का जो इतिहास बनेगा वह पहले लिखे जाने वाले इतिहास से भिन्न होगा, और किस तरह भिन्न होगा?

किसी दुर्घटना की गवाहियाँ सुने तो समझ आता है कि "आँखों देखा" भी देखने वाले कि दृष्टि के अनुसार भिन्न हो सकता है, तो लाखों करोड़ों दृष्टियों से देखे इतिहास में भी तो करोड़ों भिन्नताँए ही होगी. बात फ़िर घूम कर वहीं आ जाती है कि अंत में, समय के साथ लोग अपनी छोटी छोटी बातों को भूल जायेंगे और माना जाने वाला इतिहास इस पर निर्भर करेगा कि इतिहासकार ने किसकी आवाज़ों को विश्वासनीय माना और किन बातों की नींव पर अपने इतिहास का ताना बाना बुना.

पिछले दिनों जनसत्ता अखबार में श्री अपूर्वानंद का लेख, "जेपी आंदोलन की भूल" को पढ़ा तो यही अलग अलग इतिहास वाली बात मन में आयी. इस आलेख में उनका आरोप है कि उन्नीस सौ सत्तर के दशक में होने वाले जयप्रकाश नारायण के जन आंदोलन ने सांप्रदायिक दलों, जनसंघ तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, को राजनीतिक मान्यता दिलाने का काम किया. अपनी इस बात के समर्थन में वह पत्रकार फैसल अनुराग तथा कवि नागार्जुन के उदाहरण देते हैं.

जनसत्ता अखबार में ही, इसी आरोप का कुछ कुछ खँडन किया है, दो हिस्सों में छपे प्रभाष जोशी के लेख, "जो जेपी को नहीं जानते" एवं "लोकतंत्र अपना कर पचाता है" ने, जोकि जयप्रकाश नारायण के जन आंदोलन के शुरु के इतिहास यानि गुजरात और बिहार छात्र आंदोलनों की बात को विस्तार से बताते हैं कि प्रारम्भ में इन आंदोलनो में राजनीतिक दल शामिल नहीं थे. लेकिन लेख के अंत में वह इस बात को मानते लगते हैं कि जेपी आंदोलन ने जनसंघ तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को राजनीतिक मान्यता दी, जिसे वह उचित भी बताते हैं -

"संघ परिवार और उसकी विचारधारा को अछूत और संवाद के लायक न मान कर आप समाप्त नहीं कर सकते. वे भारत की एक सामाजिक राजनीतिक ताकत हैं जिनकी अनदेखी करके आप उनसे नहीं निपट सकते. उनसे संवाद और बरताव करके ही आप उनका निकाल कर सकते हैं. जेपी ने उन्हें अपने आंदोलन में साथ ले कर यही कोशिश की. सही है कि उस आंदोलन से संघ तथा भाजपा अपने राजनीतिक जीवन में ज्यादा वैध और मान्य हुए. लेकिन लोकतंत्र में किसी को भी ठीक करने का यही तरीका है."

पापा भी जेपी आंदोलन से जुड़े थे, उस समय मैं मेडिकल कोलिज में पढ़ता था. तब मुझे न राजनीतिक बातों में दिलचस्पी थी, न ही छात्र आंदोलन में जुड़े गुजरात और बिहार के अपने हमउम्र छात्रों की बातों की कोई जानकारी थी. घर पर आये पिता के मित्रों सहयोगियों से बात, नमस्कार, कैसे हैं, आदि की औपचारिकता तक ही रुक जाती थी. 1975 में दिल्ली के बोट क्लब में हुई जेपी की रैली और, रामलीला मैदान में जेपी के साथ विभिन्न पार्टियों की सभा में भी गया था, पर इन बातों से जुड़े मुद्दों की अधिक समझ नहीं थी और न ही अधिक जानने समझने की जिज्ञासा ही थी. इसलिए यह बात नहीं कि इस बहस में मैं अपनी किसी विषेश जानकारी से कोई नयी बात जोड़ सकता हूँ.

कुछ समय पहले इस समय के बारे में रामनाथ गुहा की किताब "इंडिया आफ्टर गाँधी" (India after Gandhi) में पढ़ा था, जिसमें जेपी के आंदोलन की विभिन्न दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया था. जो पढ़ा था वह सब याद नहीं पर एक बात अवश्य याद रही कि कुछ लोगों का कहना था कि जनतंत्र में चुनाव में बनी सरकार के विरुद्ध इस तरह आंदोलन चलाना, जनतंत्र पर ही प्रहार था और इसलिए गलत था.

मैं प्रभाष जोशी से सहमत हूँ. यानि मेरे विचार में जब बने हुए सामाजिक तानेबाने को तोड़ने वाली बात निकलती है, चाहे वे जन अभियान हों या आम लोगों का मनमुग्ध कर अपने विचारों के साथ लेने वाले नवनेता, तो जनतंत्र में उन्हें शामिल होने का मौका देने के अलावा उससे अच्छा कोई रास्ता नहीं. मुझे लगता है कि यह नयी शक्ति चाहे हिंसा, चाहे सांप्रयदायिकता जैसी नीतियों की वजह से अवाँछनीय हो, पर उसे कुचलना या बैन करना या हिंसा से दबाने से बात नहीं बनती. चाहे वे नेपाल के माओवादी हों या आयरलैंड के धर्म गृह युद्ध में लगे गुरिल्ला, लोकतंत्र में शामिल होना ही रास्ता है जो इन शक्तियों के नुकीले कोने घिस कर उनके क्रोध व हिंसा को काबू में करता है, ताकि वे अपने दलों के पीछे आने वाले जनसमूह को उसके अधिकार दिला सकें. कभी कभी वही लोकतंत्र, हिटलर या तालिबान जैसी शक्तियों को मौका देता भी देता है कि वह शासन में आ कर लोकतंत्र को ही तानाशाही में बदल देते हैं, इसलिए कुछ लोग कह सकते हैं कि लोकतंत्र इन शक्तियों के लिए वाँछित नहीं, लेकिन मुझे लगता है कि सब डरों के बावजूद भी, लोकतंत्र में सबको शामिल होने का मौका देने के अन्य विकल्प नहीं हैं. यह तो केवल भविष्य ही बता सकता है कि वह ठीक निर्णय था या नहीं.

अगर मुझसे मेरी सोच के बारे में पूछा जाये तो स्वयं को बहुत सी बातों में वामपंथ विचारधारा के करीब पाता हूँ, पर अक्सर मुझे लगता है कि अपनी बात कहने का अधिकार, नापसंद बात का विरोध करना का अधिकार, जैसी बातें जो वामपंथी विचारक अपने आप के लिए तो ठीक समझते हैं, पर वे यही अधिकार अपने कुछ विरोधियों को उस तरह से नहीं देना चाहते. या फ़िर, हर बात को केवल आईडिओलोजी के माध्यम से ही देखते हैं और जो बात उस आडिओलोजी के विरुद्ध हो, उसे समझने की कोशिश नहीं करते. लेकिन अगर बात विचारकों की नहीं बल्कि राजनीतिक दलों की हो, तो आज भाजपा, वामपंथी दल, काँग्रेस जैसे राजनीतिक दलों में मुझे अधिक अंतर नहीं दिखता. भाजपा के मोदी या वरुण गाँधी जैसे लोगों की बात न की जाये, तो भाजपा की राजनीतिक सोच अन्य दलों से किस तरह भिन्न है यह भेद जल्दी समझ नहीं आता. नंदीग्राम और तस्लीमा नजरीन के मामले में कट्टरपंथियों के आगे सिर झुकाने की नीतियों में बंगाल की वामपंथी सरकार किस तरह अन्य पार्टियों से भिन्न है, यह भी मुझे समझ नहीं आता. तो भाजपा को राजनीतिक मान्यता मिलना क्या गलत निर्णय था?

दूसरी बात है कि क्या लोकतंत्र में तरीके से चुनी सरकार के विरुद्ध क्या जयप्रकाश नाराणय का क्राँती की बात करना जायज था? यह कहना कि लोकतंत्र में क्राँती की बात करना या चुनाव से बनी सरकार को जन अभियान से हटाने की कोशिश करना हमेशा गलत है, यह मैं नहीं मानता, विषेशकर जब बात अहिंसक जनक्राँती की है. जैसे कि अगर लोकतांत्रिक तरीके से चुनी सरकार, राजनीति को एक पार्टी राज्य या तानाशाही की ओर ले जाये, तो मैं अहिंसक जनक्राँती के पक्ष में हूँ. चुनी सरकार अगर हिटलर की यहूदी संहार और उपनिवेशी नीतियाँ अपना रही हो या कास्ट्रो की तरह, अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता को बाँधने की नीतियाँ बनाये, तो क्या विरोध करना उचित नहीं होगा? हां, इस बात पर बहस हो सकती है कि क्या उन्नीस सौ सत्तर के दशक के प्रारम्भ में इंदिरा गाँधी की सरकार की नीतियाँ लोकतंत्र के लिए इतनी खतरनाक थीं कि उनके विरुद्ध जन आंदोलन चलाया जाये?

अभी हाल ही में हुए चुनावों के नतीजों पर सभी लेखक, पत्रकार और विचारक इस तरह प्रसन्न हो कर काँग्रेस के गुणगानों में मस्त लगते हैं कि आज यह समझना कि कभी कोई इसी काँग्रेस के शासन के विरुद्ध जनक्राँती लाने की बात करता था, समझ नहीं आयेगी. दूसरी ओर, भाजपा के अंदरूनी झगड़ों से और वामपंथियों की हार से सभी राजनीतिक विषेशज्ञ इसे इन पार्टियों के अवसान या सरज डूबने जैसा बुला रहे हैं. कल फ़िर, यही विषेशज्ञ काँग्रेस की व्यवसायिक, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में अतिउदारवाद और निजिवाद की नीतियों का रोना रोयेंगे और भाजपा या वामपंथियों की जीत की बात करेंगे, यानि कालचक्र चलता रहेगा.

और आज से पचास साल बाद या सौ साल बाद का इतिहास, इस समय को किस तरह से देखेगा, यह सोचना चाह कर भी नहीं सोच पाता. जाने उस समय के भारतीय बच्चों को नेहरु, पटेल, इंदिरा गाँधी, मनमोहन सिंह, जैसे नाम मालूम भी होंगे या नहीं? पृथ्वी पर जीवन का विकास डार्विन के ईवोल्यूशन के सिद्धांत के प्रभाव से पनपता बढ़ता है. सोचता हूँ कि यही सिद्धांत जनजीवन और सामाजिक विकास पर भी तो लागू होता होगा? जिस तरह, देश बने हैं, सीमांए बनी हैं, लोकतंत्र जैसी पद्धतियाँ विकसित हुई हैं, कल क्या नया बनेगा? आज के लाखों करोड़ों लोग जो विषमताओं के बोझ से दबे हैं, जिनके पास रहने, सोने, खाने को नहीं, उनकी आकांक्षांए से सिंचा कल का राजनीतिक स्वरूप कैसा होगा? यह नहीं सोच पाता. इतिहास ही बतायेगा कि आज होने वाली में से कौन सी बात इतिहास का नया पृष्ठ खोलेगी और मानवता को नया रूप देगी.

गुरुवार, जून 04, 2009

प्रेम के लिए जेहाद

इस बार के बोलिनिया फ़िल्म फेस्टिवल में भारतीय मूल के फ़िल्म निर्देशक परवेज़ शर्मा की फ़िल्म "प्रेम के लिए जेहाद" (Jehad for Love) देखने का मौका मिला. इस फ़िल्म के बारे में पिछले वर्ष के जैंडर बैंडर फ़ैस्टिवल (Gender Bender Film Festival) में सुना था पर तब इसे देख नहीं पाया था. फ़िल्म का विषय है आज के वातावरण में विभिन्न देशों में मुसलमान समुदाय में समलैंगिक होने का अर्थ. फ़िल्म में भारत, मिस्र, दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान, तुर्की, मोरोक्को जैसे देशों से मुसलमान समलैंगिक स्त्रियों तथा पुरुषों की कहानियाँ दिखायीं गयीं हैं. यह अपनी तरह की पहली फ़िल्म है क्योंकि ईस्लाम समलेंगिकता को बिल्कुल स्वीकृति नहीं देता और शारिया की बात की जाये, तो बहुत से परम्परावादी मुसलमान समलैंगकिता की सजा मौत बताते हैं.

यही वजह है कि फ़िल्म में साक्षात्कार देने वाले बहुत से लोग अपनी कहानियाँ तो सुनाते हैं पर अपना चेहरा नहीं दिखाते, हालाँकि सुना है कि 2007 में इस फ़िल्म के प्रदर्शित होने के बाद स्वयं परवेज़ को और फ़िल्म में अपनी कहानी सुनाने वाले कई लोगों को मृत्यु की धमकियाँ मिल चुकी हैं.

दक्षिण अफ्रीकी कहानी है एक समलैंगिक इमाम मुहसिन हैंडरिक्स की, जिनका विवाह हुआ था, दो बेटियाँ भी थीं पर जब उन्होंने पत्नी से तलाक होने के बाद अपनी समलैंगिकता की बात को छुपाने के बजाय खुलेआम स्वीकार किया तो उनके जीवन में तूफ़ान आ गया और उन्हें इमाम के पद से हटा दिया गया. बहुत कोशिशों के बाद उनके शहर के कुछ मुसलमानों ने स्वीकार किया कि वे उन्हें अपनी मस्जिद में इमाम चाहते थे. उनसे बात करने के लिए, बाहर से एक जाने माने करान शरीफ़ के ज्ञानी को बलाया गया, जिनका फैसला बहुत कठोर था, "अगर तुम अपने को नहीं बदल सकते तो समलैंगिकता की सजा मृत्यु दँड है. इस बात पर बहस कर सकते हें कि किस तरह से यह मृत्यु दँड दिया जाये, लेकिन इस बात में कोई शक नहीं कि इसकी सज़ा मृत्यु दँड ही है."

मुहसिन का अपनी बेटियों से बात करने का दृष्य बहुत अच्छा लगा. मुहसिन पूछते हैं, "अगर मुझे पत्थर मार कर जान से मारने की सजा सुनायी जायेगी तो क्या होगा?" उनकी बड़ी बेटी कहती है कि दक्षिण अफ्रीका में इस तरह की सज़ा कोई नहीं दे सकता. उनकी छोटी बेटी कहती है, "पापा, अगर ऐसा होगा तो में चाहुँगी कि तुम पहले पत्थर से ही मर जाओ और तुम्हें तकलीफ़ न हो."

ईरान के कुछ नवयुवकों की कहानियाँ हैं जो कि तुर्की में छुपे हैं और प्रतीक्षा कर रहे हैं कि संयुक्त राष्ट्र संघ का शरणार्थी कमीशन उनकी अर्ज़ी को मान ले और उन्हें कनाडा में जाने की अनुमति मिल जाये. उनके दिन घर वालों, साथियों, मित्रों और प्रेमियों की यादों में कटते हैं जिनको वह अपने गाँवों में छोड़ कर आये हैं, माँ से टेलिफ़ोन से बात करने वाला एक युवक बिलख कर रोता है, उसे मालूम है कि वापस गाँव जा कर वह अपनी माँ को दोबारा कभी नहीं मिल पायेगा क्योंकि उसके नाम पर पुलिस का वारंट है.

कुछ मिलती जुलती कहानी है मिस्र के लड़के की जो कि फ्राँस में शरणार्थी बन कर रह रहा है. मिस्री जेल में अपने बलात्कार के बारे में बताते हुए उसकी भी आँखों में आँसू आ जाते हैं. सबकी बातों में घर परिवार, मित्रों से बुछुड़ने का दर्द भी है और अपनी समाज व्यवस्था पर रोष भी जो उन्हें मानव नहीं मानती.



भारत की कहानियां उत्तरप्रदेश से हैं. एक व्यक्ति बताता है कि वह मक्का की तीर्थ यात्रा कर चुका है और उसने निश्चय किया है वह स्वयं पर कँट्रोल करने की कोशिश करेगा, वह दोबारा से स्त्री वस्त्र नहीं पहनेगा. एक अन्य नवयुवक, जो कि एक इस्लाम के ज्ञानी से अपनी परेशानी की सलाह चाहता है, कहता है, "क्या करें, जब मुसलमान जात में पैदा हुए हैं तो अपनी जात की बात तो माननी ही पड़ेगी." ज्ञानी जी का विचार है कि समलैंगिता गलत है और किसी भी हालत में उसी सही नहीं माना जा सकता, इसलिए उनकी सलाह है कि नवयुवक को स्वयं पर अपने "गलत आदतों" को रोकने के लिए संयम का प्रयोग करना होगा. जब वह नवयुवक ज़िद करता है कि यह बात उसके बस में नहीं, तो ज्ञानी जी कहते हैं कि समलैंगिकता एक बिमारी है जिसका इलाज उन्हें अस्पताल में कराना चाहिये. रात को सब समलैंगिक मित्र छुप कर एक घर में मिलते हैं जब उनमें से कई लोग स्त्री वस्त्र पहनते हैं और "जब प्यार किया तो डरना क्या" पर नाचते हैं.

मिस्र की दूसरी कहानी दो स्त्रियों की है, माहा और मरियम. माहा ने अपनी समलैंगिकता को स्वीकार कर लिया है, जबकि मिरियम को अपराधबोध खा रहा है कि वह अपने धर्म के विरुद्ध जा रही है. "हमें नहीं मिलना चाहिये, हमें खुद को बदलने की कोशिश करनी चाहिये", मिरियम कहती है. माहा अपनी सखी को समझाने के लिए इस्लाम धर्म के बारे में एक किताब खरीद कर लाती है, "देखो, इसमें लिखा है कि अगर मिथुन क्रिया न हो तो वह समलैंगिकता उतनी गम्भीर बात नहीं, इसका मतलब है कि हमारा पाप उतना बड़ा नहीं."



फ़िल्म में बस एक ही खुश जोड़ा है, तुर्की की दो औरतें, फेर्दा और केयमत, जो मसजिद के बाहर भी आपस में मज़ाक करती हैं और छुप कर एक दूसरे को चूम लेती हैं. उनके रिश्ते को पारिवारिक स्वीकृति भी मिली है.

समलैंगिकता किसी धर्म में आसान नहीं, लेकिन इस्लाम से जुड़ी कठिनाईयां अधिक जटिल लगती हैं. फ़िल्म देखने से पहले मुझे नहीं मालूम था कि मुसलमान और समलैंगिक होने में इतनी कठिनाईयाँ है. इस दृष्टि से यह फ़िल्म महत्वपूर्ण है क्योंकि एक दबे छुपे विषय को, जिसका असर विभिन्न देशों के इतने सारे लोगों पर पड़ता है, को खुले में लाती है और उनसे जुड़े प्रश्न उठाती है. फ़िल्म में जिन लोगों की बात उठायी गयी है उन सब के जीवन की कठिनाईयों में मुसलमान समाज का समलैंगिकता के प्रति दृष्टिकोण और सोच का हिस्सा तो है लेकिन साथ ही साथ, उनका स्वयं के बारे में यह सोचना कि वे लोग धर्म के विरुद्ध गलत काम करते हैं, भी एक बड़ी समस्या है.
यानि औरों की सोच बदलने के साथ साथ, इस फ़िल्म के अनुसार, मुस्लिम समलैंगिक लोगों को अपनी सोच को भी बदलने की समस्या है और जब तक वह लोग अपने इस अपराधबोध से नहीं निकल पायेंगे, किस तरह संतोषजनक जीवन बिता सकते हैं? इस बात से मुझे थोड़ा सा आश्चर्य हुआ कि इतने सारे मुस्लिम समलैगिक युवक और युवतियाँ, "उनका धर्म क्या कहता है" वाली बात को इतनी गँभीरता से लेते हैं.

हिंदू धर्म में समलैंगिकता को किसी प्राचीन धार्मिक पुस्तक में गलत कहा गया हो, मुझे नहीं मालूम हालाँकि हिंदू धर्म के रक्षक होने का दावा करने वाले हिंदुत्व वादी कहते हैं कि समलैंगिकता धर्म के विरुद्ध है. बल्कि शिव के अर्धनारीश्वर होने की बात या फ़िर देवी देवताओं के मनचाहने पर पुरुष या स्त्री रूप धारण करना आदि बातों से लगता है कि हिंदू धर्म में मानव के पुरुष रूप और स्त्री रूप की भिन्नता को स्वीकारने की जगह थी. यह सच है कि आज का हिंदू समाज हिँजड़ा कहे जाने वाले लोगों को जिनमें अंतरलैंगिकता, समलैंगिकता के अंश होते हैं, को समाज से बाहर देखता है, लेकिन मैंने नहीं सुना कि कोई कहे कि वे लोग हिंदू धर्म के विरुद्ध हैं. ईसाई धर्म में बाईबल की कुछ बातों को ले कर यह कहा जाता है कि समलैंगिकता अप्राकृतिक है, प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है, गलत है.

मुझे लगता है कि उनके धर्म कुछ भी कहें, परिवार कुछ भी कहें, आज अन्य धर्मों के समलैंगिक लोग अपना जीवन अपनी मर्जी से, स्वतंत्रता से जीने के लिए लड़ते हैं और कई बार अपने धर्म की संकीर्ण तरीके से सोच के विरुद्ध आवाज़ उठाते हैं. लड़कपन में जब अपनी यौनिक पहचान स्पष्ट न बनी हो, उस समय में उनमें अपराधबोध हो सकता है पर समय के साथ वे लोग इस अपराधबोध से निकल जाते हैं और अक्सर धर्म से दूर हो जाते हैं. जबकि फ़िल्म देख कर लगा कि मुस्लिम समलैंगिक लोगों में अपराधबोध से निकलना अधिक कठिन है. मैं सोचता हूँ कि अगर हमारे धर्म में कोई बात मानव अधिकारों के विरुद्ध है तो उसे बदलना चाहिये, जबकि फ़िल्म से लगता है कि इस्लाम में यह नहीं हो सकता क्योंकि कुरान शरीफ़ को बदला नहीं जा सकता.

इस तरह की फ़िल्म बनाने के लिए बहुत साहस चाहिये. परवेज़ को धमकियाँ मिली हैं, उनके विरुद्ध फेसबुक पर पृष्ठ बनाये गये हैं. परवेज़ अपने चिट्ठे पर अपनी लड़ाई के बारे में बताते हैं.
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