<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591</id><updated>2012-01-31T05:00:35.357+01:00</updated><category term='संगीत'/><category term='विज्ञान'/><category term='यादें'/><category term='यूरोप'/><category term='राजनीति'/><category term='कविता पुस्तक'/><category term='चीन'/><category term='जीवन'/><category term='यात्रा'/><category term='कोमिक्स'/><category term='व्यक्तिगत'/><category term='इटली'/><category term='भूमँडलिकरण'/><category term='चिकित्सा'/><category term='इतिहास'/><category term='सभ्यता'/><category term='विश्व'/><category term='बौलीवुड'/><category term='त्योहार'/><category term='एशिया'/><category term='भाषा'/><category 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uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>480</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-4022116559873313015</id><published>2012-01-29T12:32:00.000+01:00</published><updated>2012-01-29T13:52:47.290+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यूरोप'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यात्रा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कला'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इटली'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सभ्यता'/><title type='text'>कला यात्रा</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;आज कल यहाँ हमारे शहर बोलोनिया (Bologna, Italy) में अंतर्राष्ट्रीय कला मेला चल रहा है जिसमें शहर भर में पचासों कला प्रदर्शनियाँ लगी हैं. मेरी दृष्टि में कला का ध्येय केवल आँखों को अच्छा लगना ही नहीं है बल्कि दुनिया को नयी नज़र यानि कलाकार की दृष्टि से देखना भी है. सोचा कि इस तरह का मौका मिले कि विभिन्न देशों के जाने माने कलाकारों का काम देखने को मिले तो छोड़ना नहीं चाहिये. लेकिन सभी कला प्रदर्शनियों को देखने जाने के लिए तो सारा दिन भी काफ़ी नहीं था, इसलिए सोचा कि केवल शहर के प्राचीन केद्र के आसपास लगी कला प्रदर्शनियों को देखने जाऊँगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मध्ययुगीन इटली में सुरक्षा के लिए शहरों के आसपास ऊँची दीवारें बनायी जाती थीं और शहर के घेरे के केन्द्र में एक बड़ा खुला सा मैदान बनाया जाता था जहाँ जन समारोह के लिए शहर के सब लोग इकट्ठे हो सकते थे. इसी मैदान के पास शहर का सबसे बड़ा गिरजाघर यानि कैथेड्रल होता था, नगरपालिका का भवन और बड़े रईसों के घर भी. इस तरह से इटली के हर छोड़े बड़े शहर में यह प्राचीन केन्द्र होते हैं, जहाँ खुला मैदान होने से वहाँ अक्सर साँस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. मेरा विचार था कि वहीं जाया जाये क्योंकि वहाँ आसपास ही बहुत सी प्रदर्शनियाँ लगी हैं जिनके लिए चलना भी कम पड़ता. शहर के अन्य हिस्सों में लगी कला प्रदर्शनियों को देखने जाता तो इधर उधर जाने में आधा समय निकला जाता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम को सात बजे घर से निकला तो अँधेरा घना हो रहा था और तापमान शून्य से कुछ नीचे ही था. केन्द्र में पहुँचा तो सबसे पहला मेरा पड़ाव था "&lt;b&gt;कला तथा विज्ञान&lt;/b&gt;" के विषय पर लगी प्रदर्शनी. इस प्रदर्शनी का ध्येय था आधुनिक जीवन में कला और विज्ञान के मिलन से किस तरह हमारा जीवन बदल रहा है, उसे दिखाना. फेसबुक, गूगल तथा यूट्यूब जैसी इंटरनेट की तकनीकें, नेनो तकनीकी का विकास, मानव डीएनए के नक्शे जैसी विज्ञान की खोजों, आदि से आज का हमारा जीवन, कला को जानना परखना, सामाजिक समस्याएँ जैसे स्त्री पर गृह और पारिवारिक हिँसा या एल्सहाईमर जैसी बीमारियाँ, यह सब कुछ बदल रहा है. यह प्रदर्शनी इसी बदलाव को दिखलाती थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Bologna art fair and art first - S. Deepak, 2012" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/art_bologna_2012_01.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;कला यात्रा का मेरा दूसरा पड़ाव था अमरीकी कलाकार &lt;b&gt;किकी स्मिथ&lt;/b&gt; की बनी "खड़ी हुई नग्न आकृति", जिसमें उन्होंने नग्न स्त्री मूर्ति को बनाया है. किकी के शिल्प का विषय अक्सर नारी होता है लेकिन वह आम तौर के बनाये जाने वाले शिल्प जिसमें नारी शरीर की सुन्दरता या रूमानी रूप दिखाने पर ज़ोर होता है, उसमें वह विश्वास नहीं करतीं. उनके शिल्प की औरतों के शरीर सामान्य लोगों के शरीर होते हैं और इन आकृतियों से वह सामाजिक समस्याओं की ओर ध्यान खींचती है, विषेशकर औरतों पर होने वाली समस्याओं की ओर, जैसे कि हिँसा और सामाजिक शोषण.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Bologna art fair and art first - S. Deepak, 2012" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/art_bologna_2012_02.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद मैं मिस्री शिल्पकार &lt;b&gt;मुआताज़ नस्र&lt;/b&gt; की बनायी शिल्पकला "प्रेम की मीनारें" देखने गया. इस शिल्प में उन्होंने सात विभिन्न तत्वों से भिन्न धर्मस्थलों की मीनारें बनायी हैं. यह तत्व हैं मिट्टी, काठ, शीशा, क्रिस्टल और कुछ धातुएँ. सभी मीनारों की नोक पर अरबी भाषा में एक ही शब्द लिखा हुआ था. मेरे विचार में उन्होंने अवश्य उन मीनारों पर अपनी भाषा में "प्रेम" या "खुदा" लिखा होगा, लेकिन सच में क्या लिखा है यह तो कोई अरबी जानने वाला ही बता सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Bologna art fair and art first - S. Deepak, 2012" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/art_bologna_2012_03.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद मैं वहाँ करीब बने प्राचीन राजभवन में गया जहाँ &lt;b&gt;प्राचीन कला का संग्रहालय&lt;/b&gt; है. यह जगह मुझे बहुत पसंद है और इस संग्रहालय में मैंने कई बार कई घँटे बिताये हैं. संग्रहालय के बाहर के हाल की दीवारों और छत पर मनमोहक चित्रकारी है जिसके गहरे काले, कथई और भूरे रंग मुझे बहुत भाते हैं, जी करता है कि उन्हें देखता ही रहूँ. इसी हाल में फ्राँस के राजा नेपोलियन ने बोलोनिया की सैना को 1796 में हरा कर अपना शासन की घोषणा की थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Bologna art fair and art first - S. Deepak, 2012" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/art_bologna_2012_04.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;कला संग्रहालय की छत पर जो चित्रकारी की गयी है उसे "त्रोम्प लोई" (Trompe-l'oiel) यानि "आँख का धोखा" कहते हैं. इसकी चित्रकारी इस तरह की है जिससे पत्थर की नक्काशी का धोखा होता है. संग्रहालय की छत पर इतने सुन्दर चित्र बने हैं कि जी करता है ऊपर ही देखते रहो. पर चूँकि ऊपर देखने से गर्दन दुखने लगती है, मैं छत की तस्वीरें खींच लेता हूँ और उन्हें कम्प्यूटर पर आराम से देखना अधिक पसंद करता हूँ. अगली तस्वीर में "आँख का धोखे" का एक नमूना प्रस्तुत है, आप बताईये कि यह पत्थर की नक्काशी लगती है या नहीं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Bologna art fair and art first - S. Deepak, 2012" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/art_bologna_2012_05.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;आजकल बोलोनिया में और यूरोप में करीब करीब हर शहर में, अधिकतर जगहों पर, संग्रहालयों आदि में तस्वीर खींचने की स्वतंत्रता है, बस फ्लैश का उपयोग करना मना है क्योंकि फ्लैश की तेज रोशनी से पुरानी कलाकृतियों को नुक्सान हो सकता है और संग्रहालय में घूम रहे अन्य लोगों को भी परेशानी होती है. इस तरह तस्वीरें लेने की छूट होने का फायदा है कि जो लोग यहाँ आते हैं वह फेसबुक, गूगल प्लस और यूट्यूब आदि से यहाँ की कलाकृतियों के बारे में लोगों को बताते हैं और संग्रहालय को मुफ्त में विज्ञापन मिल जाते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्राचीन कला संग्रहालय में इतालवी कलाकार &lt;b&gt;मेस्त्राँजेलो&lt;/b&gt; की दो कलाकृतियाँ लगी थी. मुझे उनकी कलाकृति "कोगनिती दिफैंसोर" यानि "ज्ञान की रक्षा" अच्छी लगी, जिसमें उन्होंने अठाहरवीं शताब्दी की किताबों को ले कर उन्हें रंग बिरंगी रोशनी वाली तारों से सिल दिया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Bologna art fair and art first - S. Deepak, 2012" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/art_bologna_2012_06.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;मेरा अगला पड़ाव था एक छोटी सी सड़क पर लगी नये युवा कलाकारों की प्रदर्शनी जहाँ कलाकृतियों के साथ ही एक वाईनबार भी था जहाँ पर एक डीजे संगीत बजा रहे थे और लोग कलाकृतियों के आसपास नाच रहे थे या वाईन की चुस्कियाँ लेते हुए बातें कर रहे थे. जैसा कि आप अनुमान लगा सकते हैं यहाँ पर नवयुवकों की बहुत भीड़ थी. मुझे यहाँ लगी कलाकृतियों में इतालवी युवा फोटोग्राफर पाओला सन्डे की तस्वीर अच्छी लगी जिसमें उन्होंने एक कपड़े सिलने वाली फैक्टरी में एक लाल स्कर्ट पहने हुए मोडल की तस्वीरों को मिला कर नयी तस्वीर बनायी है, लगता है कि फैक्टरी में काम करने वाली युवतियाँ मोडल को विभिन्न तरीकों से सिल रही हैं. आप चाहें तो &lt;a href="http://www.paulasunday.com/PaulaPersonalWorks.html" target="_blank"&gt;पाओला सन्डे की तस्वीरों को उनके वेबपृष्ठ पर देख सकते हैं&lt;/a&gt;.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Bologna art fair and art first - S. Deepak, 2012" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/art_bologna_2012_07.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Bologna art fair and art first - S. Deepak, 2012" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/art_bologna_2012_08.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद मैं पुरात्तव संग्रहालय में लगी कला प्रदर्शनी को देखने गया, जहाँ मुझे &lt;b&gt;नीना फिशर तथा मारोअन अल सनी&lt;/b&gt; की वीडियो कला "डिस्टोपिक स्पैलिंग" ने प्रभावित किया. इस वीडियो कलाकृति में इन दो कलाकारों ने जापान के एक द्वीप की कहानी को लिया है जहाँ 1974 तक कोयले की खाने थीं और लोग रहते थे, पर अब वहाँ कोई नहीं रहता और खानें बन्द हो गयी हैं. वीडियो में एक तरफ़ एक जापानी स्कूल की लड़कियाँ हैं जो द्वीप के वीरान स्कूल के खेल के मैदान में मिल कर अपने शरीरों से जापानी भाषा में शब्द लिखती हैं और दूसरी ओर पुराने वीरान स्कूल के कमरों की और लड़कियों की फ़िल्म चलती है, जिसमें पीछे से आवाजें हैं - उस द्वीप पर बड़े होने वाले एक युवक की जो पुराने दिनों के बारे में बताता है, और एक जापानी फँतासी फ़िल्म की जिसमें फ़िल्म में होने वाली हिँसा के विवरण हैं. सब कुछ इस तरह से मिला जुला है कि कला अनुभव में अतीत, आज, सत्य, फँतासी सब मिल जाते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Bologna art fair and art first - S. Deepak, 2012" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/art_bologna_2012_09.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;मेरा अगला पड़ाव था बोलोनिया विश्वविद्यालय का पँद्रहवीं शताब्दी का प्राचीन भवन. यह भवन बहुत सुन्दर है, इसकी दीवारों पर यूरोप के प्राचीन घरानो से आने वाले विद्यार्थियों के राज परिवारों के हज़ारों चिन्ह सजे हैं. इस भवन के प्रागंण में इतालवी कलाकार फाबियो माउरी की कलाकृति "&lt;b&gt;हार&lt;/b&gt;" थी जिसमें उन्होंने "हार" को श्वेत ध्वज से दर्शित किया था. मुझे उनकी कलाकृति कोई विषेश नहीं लगी, लेकिन उस सुन्दर भवन की रात की रोशनी में दिखती सुन्दरता की वजह से, सब मिला कर बहुत अच्छा लगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Bologna art fair and art first - S. Deepak, 2012" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/art_bologna_2012_10.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;अब तक चलते घूमते मुझे थकान होने लगी थी तो सोचा कि बोलोनिया के मध्ययुगीन कला संग्रहालय में मेरा अंतिम पड़ाव होगा. यहाँ पर संग्रहालय के प्राँगण में फ्लावियो फावेल्ली की कलाकृति "&lt;b&gt;कम्युनिस्ट पार्टी को वोट दीजिये&lt;/b&gt;" कुछ अलग लगी. उन्होंने नीचे लकड़ी और उस पर लगे पुराने विज्ञापन के चित्र को बहुत खूबी से बनाया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Bologna art fair and art first - S. Deepak, 2012" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/art_bologna_2012_11.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;बाहर निकला तो साथ के फावा भवन से बहुत से लोगों को बाहर आते देखा. हालाँकि अब तक पैर दुखने लगे थे फ़िर भी वहाँ घुस कर अन्य कलाकृतियों को देखने के लोभ को रोक नहीं पाया. वहाँ कलाकृतियों के बीच में एक युवती पियानो का संगीत बजा रही थी, जिससे शिल्पकला और संगीत दोनो का साथ आनन्द मिल रहा था. मुझे वहाँ दो कलाकृतियाँ बहुत अच्छी लगी - लूचियो फोन्ताना की नीले रंग की "&lt;b&gt;ओलिम्पिक चैम्पियन&lt;/b&gt;" की मूर्ति और आर्तुरो मार्तीनी की मिट्टी की बनी "&lt;b&gt;पागल माँ&lt;/b&gt;".&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Bologna art fair and art first - S. Deepak, 2012" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/art_bologna_2012_12.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Bologna art fair and art first - S. Deepak, 2012" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/art_bologna_2012_13.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;अंत में बाहर निकला तो बस स्टाप तक चल कर जाने में कठिनाई हो रही थी, करीब आधी रात होने वाली थी. कला प्रदर्शनियों में पाँच घँटे घूमा था. बीच में एक क्षण के लिए भी कहीं बैठ कर आराम नहीं किया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए थकान तो बहुत थी पर मन में संतोष भी था कि कुछ समय के लिए अपनी गाड़ी की कला की टंकी फुल भरवा ली थी. आप बताईये आप को कैसे लगी मेरी यह कला यात्रा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-4022116559873313015?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/4022116559873313015/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2012/01/blog-post_29.html#comment-form' title='12 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/4022116559873313015'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/4022116559873313015'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2012/01/blog-post_29.html' title='कला यात्रा'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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/&gt;&lt;br /&gt;जिस बच्चे या छरहरे शरीर वाले नवयुवक की छवि मेरे मन में होती है, उसकी जगह पर अपने जैसे सफ़ेद बालों वाले मोटे से या टकले या बालों को काला रंग किये अंकल जी को देख कर लगता है कि जैसे शीशे में अपना प्रतिबिम्ब दिख गया हो. उनसे थोड़ी देर बात करो तो समझ में आता है कि हमारी बहुत सी यादे मेल नहीं खाती. जिन बातों की याद मेरे मन में होती है, वह उन्हें याद नहीं आतीं और जिन बातों को वह याद करते हैं, वह मुझे याद नहीं होती. यानि जिस मित्र की याद मन में बसायी थी, यह व्यक्ति उससे भिन्न है, समय के साथ बदल गया है. उन्हें भी कुछ ऐसा ही लगता होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर मिलते रहो तो बदलते समय के साथ बदलते व्यक्ति से परिचय रहता है, पर अगर वर्षों तक किसी से कोई सम्पर्क न रहे तो परिचित व्यक्ति भी अनजाना हो जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चालिस साल बाद वापस अपने स्कूल में "पुराने विद्यार्थियों की सभा" में गया तो यह सब बातें मेरे मन में थी. सोचा था कि बहुत से पुराने साथियों से मिलने का मौका मिलेगा, पर चिन्ता भी थी कि उन बदले हुए साथियों से किस तरह का मिलन होगा. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, मेरे साथ के थोड़े से ही लोग आये थे और दिल्ली में रहने वाले अधिकतर साथी उस सभा में नहीं आये थे. जो लोग मिले उनमें से कोई मेरे बचपन का घनिष्ठ मित्र नहीं था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Harcourt Butler school" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/school_temple_01.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;पुराने मित्र नहीं मिले, लेकिन स्कूल की पुराने दीवारों, क्लास रूम और मैदान को देख कर ही पुरानी यादें ताजा हो गयीं. स्कूल के सामने वाले भाग से पीछे तक की यात्रा मेरी ग्याहरवीं से पहली कक्षा की यात्रा थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्याहरवीं कक्षा के कमरे की पीछे वाली वह बैंच जहाँ घँटों मित्रों से बहस होती थी और जब रहेजा सर भौतिकी पढ़ाते थे तो कितनी नींद आती थी! बायलोजी की लेबोरेटरी जहाँ केंचुए और मेंढ़कों के डायसेक्शन होते थे. आठवीं की क्लास की तीसरी पंक्ति की वह बैंच जहाँ से खिड़की से पीछे बिरला मन्दिर की घड़ी दिखती थी और जहाँ मैं अपनी पहली कलाई घड़ी को ले कर बैठा था, जो कि पापा की पुरानी घड़ी थी. पाँचवीं की वह क्लास जहाँ नानकचंद सर मुझे समझाते थे कि अगर मेहनत से पढ़ूँगा अवश्य तरक्की करूँगा. वह मैदान जहाँ इन्द्रजीत से छठी में मेरी लड़ाई हुई थी. खेल के मेदान के पास की वह दीवार जहाँ दूसरी के बच्चों ने मिल कर तस्वीर खिंचवायी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन चालिस साल पहले अपना स्कूल इतना जीर्ण, टूटा फूटा सा नहीं लगता था. &amp;nbsp;हर ओर पुरानी बैंच, खिड़की के टूटे शीशे, कार्डबोर्ड से पैबन्द लगी खिड़कियाँ दरवाज़े, देख कर दुख हुआ. सरकारी स्कूल को क्या सरकार से पैसा मिलना बन्द हो गया था? आर्थिक तरक्की करता भारत इस पुराने स्कूल से कितना आगे निकल गया, जहाँ कभी भारत के प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू अपने जन्मदिन पर हम बच्चों को मिलने आये थे और उन्होंने हवा में सफ़ेद कबूतर छोड़े थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Harcourt Butler school" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/school_temple_02.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Harcourt Butler school" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/school_temple_03.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;स्कूल से निकला तो जी किया कि साथ में जा कर बिरला मन्दिर को भी देखा जाये और उसकी यादों को ताजा किया जाये. पर जैसा सूनापन सा स्कूल में लगा था, वैसा ही सूनापन बिरला मन्दिर में भी लगा. बाग में बने विभिन्न भवनों को जनता के लिए बन्द कर दिया गया है. लगता है कि भवन की देखभाल के लिए उनके पास भी माध्यम सीमित हो गये हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"स्वर्ग नर्क भवन" जो हमारे स्कूल के मैदान से जुड़ा था और जहाँ अक्सर हम स्कूल की दीवार से कूद कर पहुँच जाते थे, का निचला हिस्सा अब विवाहों के मँडप के रूप में उपयोग होता है और भवन का ऊपर वाला हिस्सा बन्द कर दिया गया है. इसी तरह से अन्य कई भवन काँटों वाली तारों से घिरे बन्द पड़े थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Harcourt Butler school" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/school_temple_04.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;वह गुफ़ाएँ जहाँ हम लोग अक्सर "आधी छुट्टी" के समय पर छुपन छुपाई खेलते थे, उन पर गेट बन गये थे और ताले लगे थे. बीच की ताल तलैया सूखी पड़ी थीं. सबसे अधिक दुख हुआ जब देखा कि बाग में से बुद्ध मन्दिर जाने का रास्ता भी बड़े गेट से बन्द कर दिया गया है. बुद्ध मन्दिर में पूछा तो बोले कि दोनो मन्दिरों में इस तरह से आने जाने का रस्ता 1985 में बन्द कर दिया गया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Harcourt Butler school" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/school_temple_05.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Harcourt Butler school" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/school_temple_06.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;बिरला मन्दिर के बाहर की दुनिया तो बहुत पहले ही बदल चुकी थी. सामने वाले खुले स्क्वायर और छोटे छोटे सरकारी घरों की जगह पर बहुमंजिला मकान बने हैं, और वहाँ जो खुलापन और हरियाली दिखती थी वे वहाँ वह गुम हो गये हैं. सामने एक नया स्कूल भी बना है जिसकी साफ़ सुथरी रंगीन दीवारों और चमकते शीशों के सामने अपना पराना स्कूल, कृष्ण के महल में आये सुदामा जैसा लगता है. शायद नया प्राईवेट स्कूल है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वापस घर लौट रहा था तो सोच रहा था कि यूँ ही दिन और मूड दोनो को बेवजह ही खराब किया. पुरानी यादों को वैसे ही सम्भाल कर रखना कर चाहिये था, वह भी यूँ ही बिगड़ गयीं. अब जब अपने स्कूल के बारे में सोचूँगा, बजाय पुरानी यादों के, इस बार का सूनापन याद आयेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-146051360187060813?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/146051360187060813/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2012/01/blog-post.html#comment-form' title='14 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/146051360187060813'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/146051360187060813'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='यादों की पगडँडियाँ'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-1274388611936393444</id><published>2011-12-26T17:30:00.000+01:00</published><updated>2011-12-27T05:07:37.689+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तस्वीरें'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कला'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चीन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सभ्यता'/><title type='text'>श्रीमान छू मन्तर</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_01.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;चीन के शिल्पकार, चित्रकार और फोटोग्राफ़र श्री ल्यू बोलिन (Mr. Liu Bolin) अपनी "बोडी आर्ट" यानि "शरीर को रँगने की कला" के लिए जग प्रसिद्ध हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;36 वर्षीय ल्यू का जन्म शानडोंग शहर में हुआ और 1995 में उन्होंने शिल्पकला में डिग्री पायी. उन्हें प्रसिद्ध मिली 2008 में उन्होंने "इन्विसिबल इन द सिटी" (Invisible in the city) यानि "शहर में अदृश्य" नाम की अपनी प्रदर्शनी लगायी जिसमें उन्होंने अपने शरीर को विभिन्न पृष्ठभूमियों के हिसाब से इस तरह रंग कर तस्वीर खिंचवाई कि तस्वीर में उनको देख पाना बहुत कठिन था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रदर्शनी ने सारी दुनिया में तहलका मचा कर उनका नाम प्रसिद्ध कर दिया. तब से उनकी विभिन्न प्रदर्शनियाँ दुनिया के विभिन्न देशों में लग चुकी हैं, और अलग अलग देशों में जा कर वह वहाँ के प्रसिद्ध स्थानों पर स्वयं को अदृश्य करके तस्वीरें खिंचवाते हैं. उनकी हर एक तस्वीर की तैयारी बहुत मेहनत का काम है, जिसमें दस बारह घँटे भी लग जाते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ल्यू को "अदृश्य पुरुष" या "श्रीमान गिरगिट" के नाम से भी जाना जाता है. जैसे कि नीचे की तस्वीर में देखिये, क्या आप को बिल्लियों के बीच छिपे हुए ल्यू दिखायी दिये?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_02.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इटली में भी ल्यू अपनी दो प्रदर्शनियाँ लगा चुके हैं. पिछले वर्ष उनकी एक प्रदर्शनी को देखने का मौका मिला था, तब से मैं भी उनका प्रशंसक हो गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले प्रस्तुत हैं ल्यू की कुछ छू मन्तर होने की तैयारी और उसके परिणाम की तस्वीरें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_03.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_04.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_05.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_06.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_07.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_08.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;कुछ अन्य ऐसी तस्वीरें प्रस्तुत हैं जिनमें वह बहुत कठिनाई से दिखते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_09.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_10.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_11.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_12.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_13.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_14.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_15.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_16.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_17.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_18.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_19.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_20.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_21.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_22.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_23.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Special body art of Liu Bolin" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/liu_bolin_24.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;कहिये क्या आप को ल्यू की यह अनूठी कला पसंद आयी या नहीं?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-1274388611936393444?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/1274388611936393444/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/12/blog-post_26.html#comment-form' title='14 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/1274388611936393444'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/1274388611936393444'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/12/blog-post_26.html' title='श्रीमान छू मन्तर'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-3747663098126004008</id><published>2011-12-07T06:56:00.001+01:00</published><updated>2011-12-07T06:59:29.247+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यक्तिगत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यादें'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सिनेमा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बौलीवुड'/><title type='text'>छोटी सी याद</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;1973-74. हम लोग दिल्ली से मध्य प्रदेश में नरसिंहपुर जा रहे थे. मेरे साथ मेरी एक मौसी और नानी थे. रेलगाड़ी रात को इटारसी स्टेशन पर पहुँची थी, जहाँ हम लोगों ने कुछ घँटे बिताये थे, अगली रेलगाड़ी के आने के इन्तज़ार में.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस रात मुझे मिली थी ज़रीना वहाब और पहली मुलाकात में ही प्यार हो गया था. ज़रीना वहाब की तस्वीरें "नयी आने वाली अभिनेत्री" के शीर्षक से फ़िल्मफेयर पत्रिका में छपी थीं और उन तस्वीरों को देख कर मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गयी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन दिनों में मुझे ज़रीना वहाब की तस्वीरें खोजने का भूत सवार हुआ था. किसी पत्रिका में उनकी तस्वीर दिखती तो उसे खरीदने में ही जेबखर्च के सब पैसे चले जाते. तस्वीर को पत्रिका से काट कर संभाल कर रखता. उन तस्वीरों से बातें करता और सपने देखता उनसे मिलने के.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब सुना था कि वह देवआनन्द साहब की फ़िल्म "इश्क इश्क इश्क" में आ रही हैं तो उस दिन मेडिकल कॉलिज की क्लास छोड़ कर उस फ़िल्म का पहले दिन का पहला शो देखने गया था. फ़िल्म में छोटा सा भाग था उनका लेकिन आज भी अगर उस फ़िल्म के बारे में सोचूँ, तो बस केवल उनका वही भाग याद हैं मुझे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी उस पहली फ़िल्म के बाद, बहुत समय तक उनकी कोई अन्य फ़िल्म नहीं आयी थी. फ़िर एक-दो सालों के बाद आयी थी बासू चैटर्जी की "चितचोर". जिस दिन वह फ़िल्म रिलीज़ हुई थी, उस दिन मेरा जन्मदिन था और अपने सब मित्रों के साथ दिल्ली के शीला सिनेमा हाल में पहले दिन का पहला शो देखने गया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Zarina Wahab Amol Palekar in Chitchor" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/films/chitchor.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िर समय बीता और धीरे धीरे पर्दे पर या तस्वीरों में देखी ज़रीना वहाब का जादू अपने आप ही कम होता गया. उनकी जगह दूसरी छवियाँ बसीं मन में, दूसरे सपने आने लगे. फ़िर भी उनकी वे तस्वीरें मेरी डायरी में जाने कितने बरसों तक जमा रहीं थीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देवानन्द साहब की मृत्यु पर पिछले दिनों में बहुत आलेख निकले. उन्हीं में कहीं "इश्क इश्क इश्क" के बारे में पढ़ा तो अपने उस पहले नशे की यह बात याद आ गयी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैसा होता है मानव मन! भूली बिसरी बातें मन के कोनों में कहाँ छुपी बैठी रहती हैं और जैसे किसी ने बटन दबाया हो, तुरंत उठ कर यूँ सामने आती हैं मानो कल की ही बात हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बात के बारे में लिखते हुए पाया कि मैं गुनगुना रहा हूँ "तू जो मेरे सुर में सुर मिला ले"!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-3747663098126004008?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/3747663098126004008/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/12/blog-post_07.html#comment-form' title='16 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/3747663098126004008'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/3747663098126004008'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/12/blog-post_07.html' title='छोटी सी याद'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-1077810752870959957</id><published>2011-12-04T10:34:00.001+01:00</published><updated>2011-12-04T10:51:00.596+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यात्रा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तस्वीरें'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='एशिया'/><title type='text'>मनीला में एक घँटा</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;केवल एक सप्ताह के लिए मनीला आया था और सारे दिन कोन्फ्रैंस की भाग-दौड़ में ही गुज़र गये थे. उस पर से यूरोप से सात घँटे के समय के अंतर की वजह से शाम होते होते नींद के मारे पलकें खुली रखना असम्भव सा लगता था, बस एक दिन रात को थोड़ी देर के लिए बाहर सैर करने को बाहर गया था, तो करीब के एक बाग में रंग बिरंगी रोशनी वाले संगीतमय फुव्वारे देखे थे, जिसमें संगीत की ताल पर पानी की धाराएँ इधर उधर डोलती हुई नृत्य करती हुई लगती थीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Musical fountain, Rizal Park, Manila - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/asia/manila_rizal_park_01.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Musical fountain, Rizal Park, Manila - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/asia/manila_rizal_park_02.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Musical fountain, Rizal Park, Manila - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/asia/manila_rizal_park_03.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;आखिर जिस दिन वहाँ से वापस आना था, उसी दिन सुबह जल्दी उठने का कार्यक्रम बनाया कि कम से कम मनीला छोड़ने से पहले, एक घँटे में कुछ आसपास घूम कर देखूँ. हमारा होटल शहर के मध्य में यूनाईटिट नेशन के मैट्रो स्टेशन के पास था. नक्शे में देखा कि जहाँ मैंने संगीतमय फुव्वारे देखे थे उसके करीब ही कुछ संग्रहालय और अन्य देखने वाली जगहें थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह साढ़े पाँच बजे का अलार्म लगाया था. जब अलार्म बजा तो एक पल के लिए मन में आया कि करीब 24 घँटे की यात्रा की थकान का सामना करना था, कुछ और सोना ही बेहतर होगा. लेकिन फ़िर सोचा कि जाने कब दोबारा मनीला आने का मौका मिले, इसे खोना नहीं चाहिये. यही सोच कर मन कड़ा करके उठा और जल्दी से नहाया और सामान तैयार किया. जाने की सब तैयारी करके छः बजे होटल से सैर को निकला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिलीपीन्स देश करीब सात हज़ार द्वीपों से बना है जिसमें सबसे बड़े द्वीप हैं लूज़ोन, विसायास और मिन्डानाव. देश की राजधानी मनीला लूज़ोन द्वीप के दक्षिण में सागरतट पर है. इस देश का इतिहास स्पेनी साम्राज्यवाद से जुड़ा है. स्पेनी साम्राज्यवाद का प्रारम्भ हुआ 1565 में और स्पेनी शासकों ने ही इसे अपने राजा फिलिप द्वितीय के नाम से फिलिपीन्स का नाम दिया. स्पेनी शासन से पहले यह द्वीप अनेक राज्यों में बँटे थे जहाँ विभिन्न दातू, राजा और सुल्तान शासन करते थे. स्पेनी साम्राज्यवादियों के आने से पहले इन द्वीपों की सभ्यता पर हिन्दू, बुद्ध तथा इस्लाम धर्मों का प्रभाव था जबकि स्पेनी शासन में यहाँ के अधिकाँश लोगों ने ईसाई कैथोलिक धर्म को अपना लिया. स्पेनी साम्राज्य 1898 तक चला जब फिलिपीन्स गणतंत्र की स्थापना हुई. लेकिन स्पेनी शासकों ने फिलीपीन्स देश को अमरीका को बेच दिया और अमरीकी फिलीपीनो युद्ध के बाद, अमरीका ने इस देश पर कब्ज़ा कर लिया. द्वितीय महायुद्ध में जापानी फौज ने फिलीपीन्स पर कब्ज़ा किया और देश के बहुत से हिस्से इस युद्ध में बमबारी से नष्ट हो गये. द्वितीय महायुद्ध में करीब दस लाख फिलीपीन निवासियों की मृत्यु हुई. अंत में 1946 में फिलीपिन्स स्वतंत्र हुआ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होटल से निकला तो बाहर मैट्रो स्टेशन पर काम पर जाने आने वालों की भीड़ दिखी. अभी सूरज नहीं निकला था इसलिए हवा में कुछ ठँडक थी. सड़क के किनारे खाने पीने का सामान बेचने वालों के खेमचे, सड़क पर झाड़ू लगाते सफ़ाई कर्मचारी, बैंचों और रिक्शे में सोये लोग आदि देख कर लगा मानो भारत में हों. यहाँ के रिक्शे भारत से भिन्न हैं. रिक्शा खींचने वाली साईकल रिक्शे के आगे नहीं बल्कि बाजु में लगी होती है और किसी किसी रिक्शे में साईकल के बदले मोटर साईकल भी लगी होती है. यहाँ पर अधिकतर लोग अंग्रेज़ी बोलते हैं. एक रिक्शे वाले ने बताया कि रिक्शा चलाने का लायसैंस लेना पड़ता है जिससे उस रिक्शे को केवल शहर के एक हिस्से में चलाने की अनुमति मिलती है और वह शहर के बाकी हिस्सों में नहीं जा सकते. मुझे लगा कि उनका अधिकतर काम मैट्रो से आने जाने वाले लोगों को आसपास की जगहों पर ले जाना होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="City life, Rizal Park, Manila - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/asia/manila_rizal_park_04.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="City life, Rizal Park, Manila - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/asia/manila_rizal_park_05.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="City life, Rizal Park, Manila - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/asia/manila_rizal_park_06.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;सबसे पहले तो मैं लापू लापू स्वतंत्रता सैनानी स्मारक पर रुका. श्री लापू लापू ने स्पेनी शासन के विरुद्ध लड़ायी की थी. इस स्मारक की विशालकाय मूर्ति देख कर मुझे भारत के विभिन्न शहरों में लगी विशालकाय देवी देवताओं की मूर्तियों की याद आ गयी. स्मारक के पास बाग में रात भर काम करके, मुँह हाथ धो कर मेकअप उतारते हुए कुछ युवक दिखे. मुझे देख कर मुस्कुरा कर "गुड मार्निंग" करके अभिवादन किया. फिलीपीन्स में समलैंगिक और अंतरलैंगिक लोगों के लिए कानूनी स्वतंत्रता भी है और सामाजिक मान्यता भी. दो दिन पहले हमारी कौन्फ्रैन्स में भी देश के राष्ट्रपति के सामने, टीवी पर काम करने वाले एक प्रसिद्ध फिलीपीनी अभिनेता ने सहजता से अपने समलैंगिक होने की बात को कहा था. मैंने उनके अभिवादन का मुस्करा कर उत्तर दिया और पूछा कि क्या मैं उनकी तस्वीर ले सकता हूँ. लिपस्टिक और मेकअप लगाये एक युवक ने सिर हिला कर नहीं कहा, लेकिन उसके दो अन्य साथी जो हाथ मुँह धो कर वस्त्र बदल चुके थे, तुरंत मान गये.&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;img alt="Lapu Lapu monument, Rizal Park, Manila - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/asia/manila_rizal_park_07.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="City life, Rizal Park, Manila - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/asia/manila_rizal_park_08.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;युवकों से विदा ले कर मैं ओर्किड फ़ूलों के बाग को देखने गया. हालाँकि अभी उस बाग के खुलने का समय नहीं हुआ था फ़िर भी जब मैंने बताया कि मेरे पास समय कम था और मुझे थोड़ी देर में हवाई अड्डा जाना था तो बाहर बैठे सिपाही ने मुझे बिना टिकट ही अन्दर जाने दिया. बाग में ओर्किड के फ़ूल कुछ विषेश नहीं दिखे लेकिन जगह सुन्दर लगी.&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;img alt="Orchid garden, Rizal Park, Manila - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/asia/manila_rizal_park_09.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Orchid garden, Rizal Park, Manila - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/asia/manila_rizal_park_10.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Orchid garden, Rizal Park, Manila - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/asia/manila_rizal_park_11.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इसी बाग के बाहर दक्षिण कोरिया और फिलीपीनी सैनिकों की जापानी सैना से लड़ाई से जुड़े कुछ स्मारक बने हैं.&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;img alt="Philippine-Korea memorial, Rizal Park, Manila - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/asia/manila_rizal_park_12.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Philippine-Korea memorial, Rizal Park, Manila - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/asia/manila_rizal_park_13.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;बाग से थोड़ी दूर एक कृत्रिम झील में संगीतमय फुव्वारों का कार्यक्रम चल रहा था, जिसमें रात की रंगबिरंगी बत्तियाँ आदि नहीं थीं लेकिन सुन्दर लग रहा था. झील के किनारे स्पेनी साम्राज्य के विरुद्ध लड़ने वाली स्वतंत्रता सैनानियों की मूर्तियों की कतार लगी थी.&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;img alt="Musical fountain, Rizal Park, Manila - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/asia/manila_rizal_park_14.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Musical fountain, Rizal Park, Manila - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/asia/manila_rizal_park_15.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Musical fountain, Rizal Park, Manila - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/asia/manila_rizal_park_16.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Martyrs statues, Rizal Park, Manila - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/asia/manila_rizal_park_17.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;झील के पास संगीतमय फुव्वारे के संगीत की ताल पर चीनी ताई छी व्यायाम करने वाले लोग दिखे. ताई छी की धीमी धीमी बदलती मुद्रायें नृत्य जैसी लगती हैं. अन्य लोगों के साथ मिल कर सुबह सुबह ताई छी का व्यायाम करना चीन में भी बहुत शहरों में देखा था.&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;img alt="Tai chi, Rizal Park, Manila - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/asia/manila_rizal_park_18.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Tai chi, Rizal Park, Manila - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/asia/manila_rizal_park_19.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;तब तक सूरज निकला आया था और गर्मी भी बढ़ने लगी थी. मैंने घड़ी देखी सात बज चुके थे. मैं वापस होटल की ओर मुड़ा. झील के किनारे बने जापानी और चीनी बागों को देखने का मेरे पास समय नहीं था, लेकिन होटल वापस आते समय मैं केवल एक अन्य छोटे से कृत्रिम तालाब में बने फिलीपीन्स के नक्शे को देखने के लिए रुका.&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;img alt="Philippines relief map, Rizal Park, Manila - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/asia/manila_rizal_park_20.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;वापस होटल पहुँचा तो बस जल्दी से नाशता करके सामान उठाने का समय बचा था. हवाई अड्डा जाने की प्रतीक्षा में कुछ साथी तैयार खड़े थे. थोड़ी देर को ही सही, कम से कम मनीला शहर के एक छोटे से भाग को देखने में सफ़ल हुआ था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;***&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-1077810752870959957?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/1077810752870959957/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/12/blog-post.html#comment-form' title='23 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/1077810752870959957'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/1077810752870959957'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='मनीला में एक घँटा'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>23</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-6705132824900085866</id><published>2011-11-16T05:55:00.001+01:00</published><updated>2011-11-16T06:26:39.466+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संगीत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मानसिक रोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यादें'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सिनेमा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बौलीवुड'/><title type='text'>फ़िल्मी रोग और उनके डागधर बाबू</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;रोग, ओपरेशन, जन्म, मृत्यु, अस्पताल, डाक्टर और वैद्य, यह सभी मानव जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं. अधिकतर फ़िल्मों में कोई न कोई दृश्य ऐसा होता ही है जिसमें कोई डाक्टर या अस्पताल दिखे. पर कुछ फ़िल्मों का प्रमुख विषय बीमारी या अस्पताल में काम करने वाले लोग होते हैं. आज मैं कुछ ऐसी ही फ़िल्मों की बात करना चाहता हूँ. अक्सर इन फ़िल्मों को रोने धोने वाली फ़िल्में कहा जाता है, लेकिन कभी कभी गम्भीर विषय पर बनी&amp;nbsp;यह&amp;nbsp;फ़िल्में अपनी बात को मुस्कान के साथ कहने में सक्षम होती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे पहले मेरे &lt;b&gt;कुछ मन पंसद दृष्यों&lt;/b&gt; की बात की जाये, उन फ़िल्मों से जिनकी कहानी में डाक्टर या बीमारियों की बात थी तो छोटी सी, लेकिन फ़िर भी मेरे लिए वे यादगार दृष्य हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे पहला न भूलने वाला दृष्य है मनमोहन देसाई की फ़िल्म &lt;b&gt;अमर अकबर एन्थनी&lt;/b&gt;&amp;nbsp;से. वह दृष्य था जिस में तीनो भाई, अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना और ऋषी कपूर, अस्पताल में अपनी बचपन की खोयी माँ निरूपा राय को खून देते हैं. तीनों की बाहों से खून निकल कर माँ के शरीर में सीधा पहुँच रहा था, इस दृष्य ने मुझे बहुत रोमाँचित किया था, हालाँकि मालूम था कि इस तरह से खून नहीं देते. इसी फ़िल्म में एक अन्य दृष्य था जिस पर मुझे बहुत हँसी आयी थी, जिसमें विवाह के वस्त्र पहने हुए परवीन बाबी जी चक्कर खा कर गिर जाती हैं और नीतू सिंह जो डाक्टर हैं, उनकी कलाई को उठा कर कान से लगाती हैं और कहती हैं, "बधाई हो, यह तो माँ बनने वाली है". यह सच्ची बम्बईया मसाला फ़िल्म थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा दृष्य जो मुझे न भूलने वाला लगता है वह गम्भीर था, गुलज़ार की फ़िल्म &lt;b&gt;परिचय&lt;/b&gt; से. इस दृष्य में अपनी बीमारी को छुपाने वाले संजीव कुमार अपने रुमाल पर लगे खून के छीटों को अपनी बेटी जया भादुड़ी से नहीं छुपा पाते तो उनकी आँखों में जो कातरता, मजबूरी और दुख की झलक दिखायी दी थी उसने मन को छू लिया था. बिल्कुल इसी से मिलता जुलता एक अन्य दृष्य था ऋषीकेश मुखर्जी की &lt;b&gt;सत्यकाम&lt;/b&gt; में जिसमें शर्मीला टैगोर जब अस्पताल में बीमार पति धर्मेन्द्र की खाँसी में खून के छीटें देख लेती हैं तो धर्मेन्द्र की आँखों में आयी हताशा, पीड़ा और दुख बहुत सुन्दर लगे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अस्पताल या बीमारी से जुड़ा कोई दृष्य है जो आपके मन को छू गया और जिसे आप कभी नहीं भुला पाये? उसके बारे में हमें भी बताईये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Collage hindi films - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/films/film_doctor.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर अब न भूलने वाले दृष्यों की बात छोड़ कर, उन फ़िल्मों की बात की जाये जिनकी कहानी में बीमारी और अस्पतालों का स्थान महत्वपूर्ण था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;दिल एक मन्दिर&lt;/b&gt;&amp;nbsp;: अगर अस्पतालों और बीमारियों से जुड़ी फ़िल्मों के बारे में सोचूँ तो सबसे पहला नाम जो मन में उभरता है वह है श्रीधर की 1963 की फ़िल्म &lt;b&gt;दिल एक मन्दिर&lt;/b&gt;. राम (राजकुमार) को कैन्सर है, वह अस्पताल में अपनी पत्नी सीता (मीना कुमारी) के साथ आते हैं, जहाँ उनकी मुलाकात होती है डा धर्मेश (राजेन्द्र कुमार) से. धर्मेश सीता को देख कर हैरान हो जाते हैं, वही तो उनका पहला प्यार थी. राम को जब अपनी पत्नी और डाक्टर के पुराने प्रेम सम्बन्ध का पता चलता है, वह अपनी पत्नी से कहते हैं कि तुम मेरी मृत्यु के बाद डाक्टर से विवाह कर लेना.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसी उस ज़माने की फ़िल्में होती थीं, उस हिसाब से यह नाटकीय और ज़बरदस्त रुलाने वाली फ़िल्म है, जिससे रो रो कर डीहाईड्रेशन का खतरा हो जाये. बचपन में जब पहली बार देखी थी तो पति पत्नी के रिश्ते में पुराने प्रेमी के आने की बात को ठीक नहीं समझ पाया था लेकिन तब भी एक कैन्सर ग्रस्त छोटी बच्ची के लिए मीना कुमारी द्वारा गाया गीत "जूही की कली मेरी लाडली" दिल को छू गया था. फ़िल्म में अन्य भी कई सुन्दर गीत थे जैसे - "याद न जाये बीते दिनों की", "रुक जा रात ठहर जा रे चन्दा", "हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे हैं".&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;आनन्द&lt;/b&gt;&amp;nbsp;: अस्पतालों और बीमारियों से जुड़ी मनपसंद फ़िल्मों में मेरे दूसरे नम्बर पर है हृषिकेश मुखर्जी की 1971 की फ़िल्म &lt;b&gt;आनन्द&lt;/b&gt;, जिसमें तब के उभरते अभिनेता राजेश खन्ना के साथ अमिताभ बच्चन नये आये थे. आँतड़ियों के कैंन्सर "लिम्फ़ोसारकोमा आफ इन्टस्टाईनस" से पीड़ित आनन्द (राजेश खन्ना) बम्बई में डा. भास्कर (अमिताभ बच्चन) के पास कुछ दिन रहने आते हैं. उसे मालूम है कि उसके जीवन के चन्द महीने ही शेष बचे हैं लेकिन जीवन से भरे आनन्द को इसकी कुछ चिन्ता नहीं लगती, बल्कि वह खुशियाँ बाँटने में मग्न लगता है. भास्कर, उसका "बाबू मोशाय", अपने आसपास की गरीबी और विषमताओं से हताश है, उसे लगता है कि उसके चिकित्सक होने का क्या फायदा जब लोग भूख से मरते हैं. आनन्द उसे प्रेम, दोस्ती और जीवन का पाठ सिखाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुलज़ार के लिखे इस फ़िल्म के डायलाग बोलने वाले आज भी मिल जाते हैं. "कहीं दूर जब दिन ढल जाये", "मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने", &amp;nbsp;"न जिया लागे न" और "ज़िन्दगी कैसी है पहेली हाय" जैसे गानों में आज भी मिठास लगती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी फ़िल्म से प्रेरित थी करण जौहर की 1998 की फ़िल्म &lt;b&gt;कल हो न हो&lt;/b&gt; जिसमें अमन (शाहरुख खान) अपनी बीमारी को छुपाते हुए न्यू योर्क आते हैं और नैना (प्रीति ज़िन्टा) तथा रोहित (सैफ़ अली ख़ान) के जीवन में सुख घोलने की कोशिश करते हैं. यूँ तो यह फ़िल्म भी बुरी नहीं थी लेकिन आनन्द की तुलना में अमन के पात्र की बीमारी का चित्रण सतही और अविश्वस्नीय सा था और फ़िल्म में उसकी बीमारी वाला भाग भी सीमित था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सूची में मेरी तीसरी मनपंसद फ़िल्म है 1963 की बिमल राय की फ़िल्म &lt;b&gt;बन्दिनी&lt;/b&gt;, जिसकी नायिका कल्याणी (नूतन) जेल में खून की सजा काट रही है. स्त्री जेल में एक तपेदिक की मरीज का इलाज करने डा देवेन (धर्मेन्द्र) आते हैं और कहते हैं कि रोगी की देखभाल के लिए उन्हें एक स्वयंसेवी-कैदी की आवश्यकता है. बाकी कैदी डरती हैं केवल कल्याणी ही इस काम के लिए आगे बढ़ती है. तपेदिक का इलाज करते करते स्वयं देवेन को कल्याणी से प्यार हो जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस फ़िल्म में अस्पताल का हिस्सा सारी फ़िल्म में नहीं था, अधिकतर प्रारम्भ के हिस्से में था लेकिन बहुत सशक्त था. धारी वाले वस्त्रों में कैदी औरतें, नूतन का अभिनय और धर्मेन्द्र का शर्मीलापन, यह सब उस समय बहुत पसन्द किये गये थे और फ़िल्म को कई फ़िल्मफेयर पुरस्कार भी मिले थे. "ओ पंछी प्यारे, साँझ सखारे", "मत रो माता लाल तेरे बहुतेरे", "अब के बरस भेज भईया को बाबुल", "मोरा गोरा रंग लैईले", "ओरे माँझी, मेरे साजन हैं उस पार" जैसे गीतों से सजी यह फ़िल्म आसानी से नहीं भुलाई जा सकती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुलज़ार की प्रारम्भ की फ़िल्मों में से 1973 की बनी &lt;b&gt;अचानक&lt;/b&gt; ने मुझे बहुत प्रभावित किया था. थोड़े से फ्लैशबैक के दृष्य छोड़ कर बाकी की यह सारी फ़िल्म एक अस्पताल में ही केन्द्रित थी. कहानी थी मेजर रन्जीत (विनोद खन्ना) की जिन्हें गोली लगी है और जिनका इलाज हो रहा है. उनकी देखभाल करने वाली है नर्स राधा (फरीदा जलाल). रन्जीत के साथ उसकी यादें हैं, जिनमें पत्नी पुष्पा का प्यार भी है और उन्हीं के मित्र के साथ बेवफ़ाई भी. रन्जीत ने अपनी पत्नी का खून किया है और ठीक होने पर उन्हें फाँसी लगनी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िल्म का ध्येय था कानून की दृष्टि पर और मृत्युदंड पर प्रश्न उठाना. गोली लगने पर पहले &amp;nbsp;मरीज़ की जान बचाने के लिए डाक्टर मेहनत करते हैं, लेकिन जब डाक्टर उस व्यक्ति की जान बचा लेने में सफल होते हैं तो उसे फाँसी की सजा में मार दिया जाता है. इस फ़िल्म में फ़रीदा जलाल बहुत अच्छी लगी थीं. इस फ़िल्म में गाने नहीं थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;ख़ामोशी&lt;/b&gt;&amp;nbsp;: असित सेन की 1969 की यह फ़िल्म प्रेम में निराशा से जुड़े मानसिक रोग की कहानी थी जिसकी नायिका थी नर्स राधा के रूप में वहीदा रहमान. प्रेम की हताशा को मानसिक रोग के रूप में पालने वाले नवयुवकों के इलाज के लिए मानसिक रोग के डाक्टर कर्नल साहब (नासिर हुसैन) एक नये इलाज की कोशिश करना चाहते हैं और राधा को देव (धर्मेन्द्र) से प्रेम का नाटक करने को कहते हैं. नाटक करते करते राधा को सचमुच देव से प्यार हो जाता है लेकिन देव ठीक हो कर, राधा को भूल कर अस्पताल से चला जाता है. फ़िर कर्नल साहब राधा से एक अन्य रोगी अरुण (राजेश खन्ना) से प्रेम का नाटक करने को कहते हैं. राधा इस काम को स्वीकार नहीं करना चाहती लेकिन कर्नल साहब को मना नहीं कर पाती. अरुण से प्रेम का नाटक करती है तो भी उसकी यादों में देव लौट आता है, और अरुण ठीक हो कर चला जायेगा और उसे भूल जायेगा, इसके डर से वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहीदा रहमान, धर्मेन्दर और राजेश खन्ना का सशक्त अभिनय और "तुम पुकार लो", "वो शाम कुछ अज़ीब थी" जैसे गाने, यह फ़िल्म भी बहुत सुन्दर थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1970 की असित सेन की फ़िल्म &lt;b&gt;सफ़र&lt;/b&gt; में एक बार फ़िर से राजेश खन्ना थे मैडिकल कोलेज में पढ़ने वाले कैंन्सर के रोगी जो सबसे अपना रोग छुपाते हैं. "ज़िन्दगी का सफ़र यह है कैसा सफ़र कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं" इस फ़िल्म का गीत बहुत प्रसिद्ध हुआ था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;तेरे मेरे सपने&lt;/b&gt;&amp;nbsp;: क्रोनिन के प्रसिद्ध उपन्यास "द सिटाडेल" पर बनी नवकेतन की फ़िल्म "तेरे मेरे सपने" के निर्देशक थे विजय आनन्द. 1971 की इस फ़िल्म की कहानी थी एक आदर्शवादी डाक्टर आनन्द (देव आनन्द) की, जो कोयले की खान से जुड़े एक छोटे से शहर में काम करने आता है. वहाँ आनन्द को गाँव की मास्टरनी निशा (मुम्ताज़) से प्यार हो जाता है और दोनो विवाह कर लेते हैं. एक गलतफ़हमी की वजह से आनन्द को वह शहर छोड़ना पड़ता है और आनन्द बम्बई में जा कर पैसा कमाने की सोचता है. बम्बई में प्रसिद्ध फ़िल्म अभिनेत्री माल्तीमाला (हेमा मालिनी) से आनन्द के सम्बन्ध बनते है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पैसे और नाम की चाह में ऊपर उठता आनन्द, छोटे शहर और प्रारम्भिक जीवन के आदर्शों को भूल जाता है. उसे होश आता है जब गर्भवती निशा उसे छोड़ कर चली जाती है. सचिन देव बर्मन के संगीत में बने इस फ़िल्म के कुछ गीत जैसे "जीवन की बगिया महकेगी", "मेरा अंतर इक मन्दिर है तेरा" और "जैसे राधा ने माला जपी श्याम की" मुझे बहुत पसन्द आये थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनुराधा&lt;/b&gt;&amp;nbsp;: 1960 की ऋषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्देशित फ़िल्म "अनुराधा" की कहानी बहुत सीधी साधी थी. आदर्शवादी डा. निर्मल (बलराज साहनी) गाँव में रह कर लोगों की सेवा करते हैं. छोटा सा संसार है उनका, पत्नि अनुराधा और बेटी रानू. काम में व्यस्त निर्मल, अपनी पत्नी का अकेलापन और त्याग नहीं देख पाते जो प्रसिद्ध गायिका हो कर भी, गाँव में दिन भर घर में रह कर संगीत के दूर चली गयी है. पैसा कमाने में व्यस्त पति हो या शराबी पति हो, कम से कम अकेली पड़ी पत्नी को लोगों की सुहानूभूति तो मिल सकती है लेकिन अगर पति जग भलाई में व्यस्त हो और उसके पास पत्नि और घर के लिए समय न हो तो उसमें पत्नी के अकेलापन सुहानूभूति कठिनाई से मिलती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस फ़िल्म में संगीत दिया था प्रसिद्ध सितारवादक रवि शंकर ने. उनके बनाये गीत जैसे "हाय रे वह दिन क्यों न आयें", "कैसे दिन बीते, कैसे बीती रतियाँ", और "जाने कैसे सपनों में खो गयी अँखियाँ" जैसे गाने आज भी उतने ही ताज़े लगते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;दिल अपना और प्रीत परायी&lt;/b&gt;&amp;nbsp;: किशोर साहू द्वारा निर्देशित 1960 की इस फ़िल्म में डाक्टर सुशील (राजकुमार) और उनकी नर्स करुणा (मीना कुमारी) का प्यार दिखाया गया था. पुराने अहसान का बदला चुकाने के लिए सुशील को कुसुम (नादिरा) से विवाह करना पड़ता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शंकर जयकिशन के मधुर संगीत से इस फ़िल्म में कई उम्दा गीत थे जैसे कि "मेरा दिल अब तेरा ओ साजना", "अज़ीब दास्ताँ है यह", "दिल अपना और प्रीत परायी". इसी फ़िल्म से प्रेरित थी हनी ईरानी द्वारा निर्देशित 2003 की फ़िल्म &lt;b&gt;अरमान&lt;/b&gt; जिसने डाक्टर आकाश (अनिल कपूर) और डाक्टर नेहा (ग्रेसी सिंह) के प्यार के बीच में अमीर बाप की बेटी सोनिया कपूर (प्रीति ज़िन्टा) आ जाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मौसम&lt;/b&gt;&amp;nbsp;: गुलज़ार द्वारा 1975 में निर्देशित इस फ़िल्म की कहानी भी क्रोनिन के एक उपन्यास "द जूडास ट्री" पर आधारित थी. इस फ़िल्म में वैसे तो बीमारी का बड़ा हिस्सा नहीं था लेकिन कहानी के नाटकीय मोड़ बनाने में इसमें एक वैद्य जी का बड़ा हिस्सा था जिनकी बेटी चन्दा (शर्मीला टैगोर) से शहर से आये डाक्टर अमरनाथ (संजीव कुमार) को प्यार हो जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस फ़िल्म की बात से यह भी मेरे ध्यान में आता है कि भारत में बहुत से लोग देसी या आयुर्वेदिक दवा में विश्वास रखते हैं और आवश्यकता पड़ने पर सबसे पहले वैद्य के पास ही जाते हैं लेकिन हमारी फ़िल्मों को वैद्य के ज्ञान को पश्चिमी ज्ञान से पढ़े डाक्टरों से नीचा माना जाता है और मेरे विचार में कभी कोई ऐसी फ़िल्म नहीं बनी जिसमें वैद्य का प्रमुख भाग हो या उसे हीरो दिखाया गया हो या उनके ज्ञान को सही गौरव से प्रस्तुत किया गया हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म &lt;b&gt;खूबसूरत&lt;/b&gt; में अशोक कुमार को होम्योपैथी का इलाज करने वाला दिखाया गया था, जोकि वह अपने असली जीवन में भी थे. हाल में ही एक पाकिस्तानी फ़िल्म &lt;b&gt;बोल&lt;/b&gt; में पिता के रूप में वैद्य का भाग था जिनका काम शहर में पश्चिमी पढ़ायी किये डाक्टरों के आने से ढप्प सा हो जाता है. पिछले दो दशकों में भूमण्डलिकरण से इस तरह की सोच को और भी ज़ोर मिला है और हिन्दी में गाँवों के विषयों पर बनने वाली फ़िल्में और भी कम हो गयीं हैं, इस तरह वैद्यों के काम पर आधारित कहानी पर फ़िल्म बने यह और भी कठिन होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1975 की ही गुलज़ार की एक अन्य फ़िल्म थी &lt;b&gt;खुशबू&lt;/b&gt; जो शरतचन्दर के उपन्यास पर बनी थी और जिसमें जितेन्द्र ने गाँव के डाक्टर बृन्दावन का भाग निभाया था, हालाँकि फ़िल्म में बीमारियों या अस्पालों की बात कम ही थी. इसमें शर्मीला टैगोर का एक छोटा सा हिस्सा था जिसमें उनका नाम था लक्खी लेकिन उनका पात्र &lt;b&gt;मौसम&lt;/b&gt; की चन्दा से प्रेरित था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मिली&lt;/b&gt;&amp;nbsp;: 1975 की ऋषीकेश मुखर्जी की इस फ़िल्म में जया भादुड़ी को हीमोफिलिया नाम की रक्त की बीमारी थी. उनके पड़ोसी शेखर के रूप में अपने परिवार के स्कैंडल को शराब में डुबा कर भुलाने की कोशिश करने वाले अमिताभ बच्चन को मिली से प्यार हो जाता है लेकिन जब उसे मिली की बीमारी के बारे में मालूम चलता है तो उसे लगता है कि वह इस तरह के दुख का सामना नहीं कर सकता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊपर जितनी फ़िल्मों की बात की गयी है वे सब साठ और सत्तर के दशक में बनी. इसके बाद, अस्सी और नब्बे के दशकों में बनी फ़िल्मों के बारे में, मुझे सोच कर भी याद नहीं आया कि अस्पताल या डाक्टरी विषय पर कौन सी फ़िल्में बनी थीं. केवल पिछले दशक की इस विषय पर बनी कुछ फ़िल्में याद आती हैं, जिनमें से प्रमुख हैं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;दिल ने जिसे अपना कहा&lt;/b&gt;&amp;nbsp;: 2004 की इस फ़िल्म के निर्देशक थे अतुल अग्निहोत्री और फ़िल्म की कहानी थी ऋषभ (सलमान खान) और परिणीता (प्रीति ज़िन्टा) की. परिणीता बच्चों की डाक्टर है, बच्चों का अस्पताल बनाना चाहती है, गर्भवती भी है जब दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो जाती है. उसका दिल मिलता है धनि (भूमिका चावला) को जो ऋषभ के बच्चों के अस्पताल बनाने के काम में उसके साथ जुड़ती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मुन्ना भाई एमबीबीएस&lt;/b&gt;&amp;nbsp;: राजकुमार हिरानी की 2003 की इस फ़िल्म ने भी अस्पतालों, डाक्टरों और डाक्टरी पढ़ने वाले छात्रों की बातें हँसी मज़ाक के साथ साथ बड़ी गम्भीरता से दिखायीं थीं. डाक्टरों, नर्सों के साथ साथ, अस्पताल में और भी कितने लोग काम करते हैं जिनकी बात कभी किसी फ़िल्म में नहीं देखी थी, जैसे कि अस्पताल में सफ़ाई करने वाले. पहली बार मुन्ना भाई में उन्हें भी इन्सान के रूप में दिखाया गया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अतिरिक्त 2003 की ही एक मराठी फ़िल्म &lt;b&gt;श्वास&lt;/b&gt; जिसने मुझे बहुत प्रभावित किया था. इसके निर्देशक थे संदीप सावंत और इसकी कहानी थी एक बच्चे की जिसकी आँख में ट्यूमर है और जिसका ईलाज कराने उसके दादा जी उसे बम्बई ले कर आये हैं. यह फ़िल्म मुझे बहुत बहुत अच्छी लगी थी और &lt;a href="http://jonakehsake.blogspot.com/2009/08/blog-post.html"&gt;इस मैंने पहले भी लिखा था&lt;/a&gt;.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;क्यों कि&lt;/b&gt;&amp;nbsp;: 2005 में प्रियदर्शन द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म में मानिसक रोगी (सलमान खान) और उसका इलाज करनी वाली डाक्टर (करीना कपूर) की कहानी थी. यह फ़िल्म चीखने चिल्लाने वाली अतिनाटकीयता से भरी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अतिरिक्त, 2009 की फ़िल्म &lt;b&gt;पा&lt;/b&gt; जिसमें अमिताभ बच्चन ने प्रोजेरिया नाम की बीमारी से पीड़ित बच्चे का भाग निभाया था, इस दशक की अच्छी फ़िल्मों में से गिनी जा सकती है. अच्छी कहानी, विश्वस्नीय मुख्य पात्र, फ़िल्म भावपूर्ण थीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंत में 2010 की करण जौहर की फ़िल्म &lt;b&gt;वी आर फ़ेमिली&lt;/b&gt; में काजोल और करीना कपूर जैसी अभिनेत्रियों के साथ भी कैन्सर से पीड़ित माँ का अपने बच्चों के लिए नयी माँ खोज करने का विषय था. पर इस फ़िल्म में मुझे सब कुछ नकली सा लगा था. सुन्दर कपड़े, बढ़िया लोकेशन थीं फ़िल्म में लेकिन कहानी और पात्र बहुत सतही थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे लगता है कि जिस तरह की भावनात्मक फ़िल्में तीस-चालिस साल पहले बनती थीं वह फ़िर उसके बाद नहीं बनी. अस्सी के दशक के बाद फ़िल्मों में तकनीकी सुधार हुआ, फ़िल्में रंगीन हो गयीं, लेकिन जिस तरह की भावनाएँ उनमें होती थीं वह "मुन्ना भाई" और "पा" जैसे अपवादों को छोड़ कर, बाद में बहुत सतही हो गयी. तीस-चालिस पहले कोई फ़िल्म करोड़ों के धँधे की बात नहीं कर सकती थी, न ही उस समय मल्टीप्लेक्स थे, पर उस समय उनमें जो भावनाओं की गहरायी थी उसे पुराना कह कर भूल जाने में शायद हमारा ही नुक्सान है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर मेरी इस सूची में इस विषय पर बनी कोई अन्य अच्छी हिन्दी फ़िल्म छूट गयी है तो उसके बारे में मुझे बताईये. आप का क्या विचार है, क्या आज भावनात्मक फ़िल्में बने तो चलेंगी? डाक्टरी और चिकित्सा विषयों पर बनी फ़िल्मों में आप की सबसे पसन्दीदा फ़िल्म कौन सी होगी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-6705132824900085866?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/6705132824900085866/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/11/blog-post_16.html#comment-form' title='15 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/6705132824900085866'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/6705132824900085866'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/11/blog-post_16.html' title='फ़िल्मी रोग और उनके डागधर बाबू'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-2597006916120260945</id><published>2011-11-13T07:40:00.001+01:00</published><updated>2011-11-13T07:58:17.364+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यूरोप'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यात्रा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तस्वीरें'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लंदन'/><title type='text'>फोटो डायरीः लंदन में एक दिन</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;पिछले पच्चीस सालों में हर वर्ष, किसी न किसी मीटिंग आदि के लिए दो तीन बार लंदन जाना हो ही जाता था. शहर में कई बार घूम चुका था लेकिन शहर कैसा बना है इसकी जानकारी बहुत कम थी, क्योंकि हर जगह मैट्रो से ही जाता. लंदन में मैट्रो की दस-पंद्रह लाईनों का जाल बिछा है, कहीं भी जाना हो, उसके करीब में कोई न कोई मैट्रो स्टेशन मिल ही जाता है इसलिए मुझे सुविधाजनक लगता था कि दिन भर का टिकट खरीदो और जहाँ मन हो वहाँ घूमो. लंदन मैट्रो मँहगा है, इसलिए भी दिन भर का टिकट खरीदना बेहतर लगता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर दिक्कत यह थी कि मैट्रो के सारे रास्ते अधिकतर धरातल से निचले स्तर पर अँधेरी सुरंगों में गुज़रते हैं. इसकी वजह से बहुत से मैट्रो स्टेशनों के आसपास की जगहें मेरी पहचानी हुई थीं लेकिन लंदन शहर के रास्ते कैसे हैं, इसकी जानकारी कम थी. केवल पिछले दो तीन सालों में ही मैंने शहर की सड़कों को कुछ जानने की कोशिश शुरु की थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले सप्ताह एक दिन के लिए लंदन जाना था, तो सोचा कि क्यों न इस बार रेलवे स्टेशन से मीटिंग स्थल का रास्ता पैदल ही चलने की कोशिश करूँ. गूगल मैप पर देख कर रास्ता बनाया (नीचे नक्शे में लाल रंग का निशान), तो लगा कि पैदल जाने में एक घँटे से कम समय लगना चाहिये. उसी नक्शे को छाप कर साथ रख लिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Central London - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/london_walk_18.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह 6.30 की उड़ान थी. लंदन के गेटविक हवाई अड्डा पहुँचा. वहाँ पहुँच कर तुरंत रेलगाड़ी से लंदन शहर के विक्टोरिया स्टेशन पहुँचा, तब समय था सुबह के आठ बज कर चालिस मिनट. बाहर विक्टोरिया स्ट्रीट खोजने में दिक्कत नहीं हुई. चलना शुरु किया ही था कि दृष्टि दायीं ओर के एक सुन्दर गिरजाघर पर पड़ी. पूर्वी बाइज़ेन्टाईन शैली से प्रभावित गुम्बजों वाले गिरजाघर का नाम है "अति पवित्र रक्त कैथेड्रल". उस समय हल्की हल्की बूँदा बाँदी हो रही थी लेकिन इतनी भी नहीं कि छतरी खोली जाये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Central London - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/london_walk_01.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सड़क की दूसरी ओर एक विशाल शीशे का भवन है जिसमें दुकाने और दफ़्तर हैं, उस समय वह बन्द ही दिख रहा था. आगे बढ़ा तो एक अन्य सुन्दर गिरजाघर दिखने लगा. पीछे से थेम्स नदी के किनारे बना "लंदन आई" यानि "लंदन की आँख" नाम का विशालकाय गोल झूला दिख रहा था. "अरे यह तो वेस्टमिनस्टर गिरजाघर है", मैंने आश्चर्य से सोचा. पहले वेस्टमिनस्टर कई बार देखा था पर तब यह समझ नहीं पाया था कि वह विक्टोरिया स्टेशन के इतने करीब है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Central London - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/london_walk_02.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पार्लियामैंट स्क्वायर पहुँचा तो आसपास बहुत सी मूर्तियाँ दिखीं लेकिन सड़क पर बसों, कारों का इतना यातायात था कि सबकी तस्वीरें लेना संभव नहीं था. सड़क के किनारे पर बनी अमरीकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की तस्वीर खींची और पार्लियामैंट स्ट्रीट पर मुड़ा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Central London - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/london_walk_03.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सड़क पर बहुत से लोग से मेरी तरह ही पैदल चलते हुए, या फ़िर शायद काम में देरी के डर से कुछ कुछ भागते हुए दिख रहे थे. वहीं सड़क के बीच में काले पत्थर का बना कुछ अलग सा स्मारक दिखा, जिसमें स्त्रियों के कोट और पर्स आदि टँगे बनाये गये थे. यह द्वितीय विश्वयुद्ध में स्त्रियों के योगदान का स्मारक है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Central London - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/london_walk_04.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ और आगे बढ़ा तो सामने से धुँध के बीच में आसमान की पृष्ठभूमि पर एक जानी पहचानी मूर्ति दिखी, ट्रफाल्गर स्क्वायर पर नेलसन के खम्बे पर बनी जनरल नेलसन की मूर्ति जिनका नाव जैसा टोप दूर से ही पहचाना जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Central London - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/london_walk_05.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घड़ी देखी, स्टेशन से चले करीब आधा घँटा हुआ था. सोचा कि अब आस पास देखने और फोटो खींचने का समय नहीं था. कम से कम आधे घँटे का रास्ता अभी बाकी था और मीटिंग में मेरा प्रेसेन्टेशन शुरु में ही था. इसलिए कैमरे को बैग में बन्द किया और तेज़ी से चैरिंग क्रास रोड की ओर कदम बढ़ाये. यूस्टन के पास लंदन स्कूल ओफ़ हाईजीन पहुँचना था, उसमें आधा घँटा लगा, और पूरे रास्ते में &amp;nbsp;बस एक बार ही किसी से दिशा पूछने की आवश्यकता पड़ी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोपहर को तीन बजे काम समाप्त करके मैंने मित्रों से विदा ली और वापस जाने के लिए निकला. मेरा विचार था कि पाँच बजे तक वापस विक्टोरिया स्टेशन पहुँचना चाहिये जिससे शाम के 6 बजे तक गैटविक हवाईअड्डा पहुँच जाऊँ क्योंकि वापस जाने की उड़ान 7.30 की थी. लगा कि बहुत समय है और आराम से इधर उधर देखता घूमता हुआ वापस पहुँच जाऊँगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टोटनहैम कोर्ट रोड से लेस्टर रोड के बीच बहुत से थियेटर हैं जहाँ नाटक, नृत्यकार्यक्रम, म्यूजि़कल आदि होते हैं. सबसे पहले दिखी एक थियेटर के बाहर "क्वीन" के प्रसिद्ध गायक फ्रेड्डी मर्करी की मूर्ति जहाँ "वी विल रोक इट" नाम का म्यूज़िकल दिखाया जा रहा था. फ्रैडी मर्करी यानि भारत में जन्मे फारुख बलसारा अपने संगीत के लिए सारी दुनिया में प्रसिद्ध हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Central London - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/london_walk_06.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िर लगा कि समय है तो बजाय मुख्य सड़क पर चलने के क्यों न साथ की छोटी सड़कों और गलियों में चला जाये? यह सोच कर सैंट मार्टन स्ट्रीट पर मुड़ा तो वहाँ वह थियेटर दिखा जहाँ पिछले 59 सालों से, यानि मेरे पैदा होने से भी पहले से, अगाथा क्रिस्टी के उपन्यास माउस ट्रेप (चूहेदानी) पर आधारित नाटक को निरन्तर किया जाता है. तीस चालिस साल पहले भारत में सुना था इस बारे में, देख कर कुछ अचरज हुआ. सोचा कि यह भी एक तरह का स्मारक सा बन गया है जहाँ पर्यटक लोग बस सिर्फ़ इसीलिए आते होंगे कि चलो इसे भी देख लो, कहने को हो जायेगा कि लंदन गये तो इसे भी देखा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Central London - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/london_walk_07.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िर मुझे आकर्षित किया दुकानो़ पर क्रिसमस की तैयारी में लगायी गई रंग बिरंगी रोशनियों ने. सोचा कि क्यों न उस और जा कर भी देखा जाये?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Central London - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/london_walk_08.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंगबिरंगी रोशनियों और दुकानों को देखते देखते मैं कोवेन्ट गार्डन पहुँच गया, जहाँ बाज़ार की छत पर लाल, चाँदी और सुनहरे रंग के बड़े बड़े गेंद से गोले लटक रहे थे. एक ओर रेस्टोरेंट थे, संगीतकार थे, तो दूसरी ओर दुकानें और भीड़ भाड़.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Central London - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/london_walk_09.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ देर तक वहीं दुकानों में घूमा, फ़िर बाहर निकला तो क्रिसमस के लिए बने हरे रंग के भीमकाय रैंनडियर ने ध्यान आकर्षित किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Central London - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/london_walk_10.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िर लगा कि अब देर हो रही है, वापस चलना चाहिये. तेज़ी से कदम बढ़ाये वापस चैरिंग क्रास जाने के लिए. आधा घँटा चल कर लगा कि कुछ गड़बड़ है. कोई जानी पहचानी सड़क नहीं दिख रही थी. वहाँ बैठी युवती की सुन्दर मूर्ति दिखी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Central London - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/london_walk_11.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रुक कर कुछ लड़कों से पूछा तो वह मेरी ओर हैरानी से देखने लगे, बोले कि यह तो अल्डविच है, चेरिंग क्रास तो बिल्कुल दूसरी ओर है और मुझे वापस जाना चाहिये. तब समझ में आया कि गलियों में घूमते हुए मेरी दिशा गलत हो गयी थी और मैं अपने रास्ते से बहुत दूर आ गया था. एक क्षण के लिए मन में आया कि इतनी झँझट करने से क्या फ़ायदा, वहीं से मैट्रो ले कर वापस विक्टोरिया जा सकता हूँ. लेकिन यह भी लगा कि वह मेरी हार होगी. हार न मानने की सोच कर, जिस रास्ते से आया थे, उसी पर वापस गया और जहाँ से सड़क छोड़ी थी, वहीं वापस पहुँचा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलना तो बहुत पड़ा लेकिन अंत में मुझे मेरी खोयी सड़क मिल गयी. अंत में जब ट्रैफ़ाल्गर स्क्वायर पहुँचा तो सोचा कि कुछ सुस्ता लिया जाये. चलते चलते टाँगे दुखने लगी थीं. उस समय दोपहर के 4.30 ही बजे थे लेकिन अँधेरा होने लगा था और बत्तियाँ जल चुकीं थीं. ट्रैफ़ाल्गर स्क्वायर में बड़ी घड़ी लगी दिखी जिस पर अगले वर्ष के ओलिम्पिक खेलों के प्रारम्भ होने में कितना समय बाकी है इसे दिखाया गया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Central London - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/london_walk_12.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ देर सुस्ता कर पार्लियामैंट स्ट्रीट की ओर बढ़ा तो एक सड़क के कोने पर नाम देख कर ठिठक गया, "डाउनिंग स्ट्रीट", यानि जहाँ ब्रिटिश प्रधान मंत्री का घर है. टेलीविज़न पर बहुत बार देखा था पर टीवी पर यह नहीं पता चलता कि उस सड़क पर सब लोग नहीं जा सकते क्योंकि सड़क के किनारे ग्रिल लगी है जिसके पीछे पुलिस वाले चेक करते हें कि कौन अन्दर जा सकता है, जैसा कि दिल्ली में रेसकोर्स रोड पर होता हैं जहाँ पहले इन्दिरा गाँधी रहती थी और अब सोनिया गाँधी रहती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Central London - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/london_walk_13.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वेस्टमिन्सटर पहुँचा तो पुल की ओर जा कर नीली रोशनी में चमकते गोल झूले की तस्वीर लेने के लालच से खुद को नहीं रोक पाया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Central London - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/london_walk_14.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुल के किनारे पर बनी बिग बैन की घड़ी और ब्रिटिश संसद का भवन रोशनी में चमक रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Central London - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/london_walk_15.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संसद भवन के साथ ही वैस्टमिन्स्टर के गिरजाघर में 11 नवम्बर के प्रथम विश्व युद्ध में मरने वाले सिपाहियों के स्मृति दिवस की तैयारी में पौपी यानि पोस्त के फ़ूलों से सजे क्रौस क्यारियों में लगाये गये थे, जैसा छोटा सा कब्रिस्तान बना हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Central London - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/london_walk_16.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंत में विक्टोरिया स्टेशन पहुँचा तो सामने शीशे का विशाल भवन रोशनी में जगमगा रहा था. उसके भीतर दफ़्तरों में काम करने वाले लोग किसी नाटक में काम करने वाले अभिनेता लग रहे जो सड़क पर जाने वाले लोगों को रियाल्टी शो दिखा रहे हों.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Central London - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/london_walk_17.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिरकार ठीक समय पर विक्टोरिया स्टेशन पहुँच ही गया था. पैर दर्द कर रहे थे लेकिन मन में अपने पर गर्व हो रहा था कि लंदन की सारी यात्रा पैदल ही की और इस तरह से अपने जाने पहचाने शहर की बहुत सी नयी जगहों को देखने का मौका भी मिला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-2597006916120260945?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/2597006916120260945/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/11/blog-post_13.html#comment-form' title='11 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/2597006916120260945'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/2597006916120260945'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/11/blog-post_13.html' title='फोटो डायरीः लंदन में एक दिन'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-5278877648264003376</id><published>2011-11-11T06:30:00.001+01:00</published><updated>2011-11-11T06:36:45.442+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मानव अधिकार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लेखक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रवासी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इटली'/><title type='text'>अल्वीरा का पत्र</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;आखिरकार इतालवी प्रधानमंत्री श्री बरलुस्कोनी के सूर्यास्त का समय आ ही गया. सरकार में रह कर उन्होंने क्या किया और क्या नहीं किया, शायद इसे तो इतिहास भूल भी जाये, पर उनके व्यक्तिगत जीवन की बातें जैसे कि भद्दे इशारे या मज़ाक करना, नवजवान और नाबालिग लड़कियों से जुड़े हुए किस्से, बहुत समय तक याद रखे जायेंगे. उनके राजनीतिक भविष्य का क्या होगा यह तो समय ही बतायेगा. कुछ समय पहले अल्बानिया देश की यात्रा में कही उनकी कुछ बातों पर अल्बानी मूल के लेखिका &lt;b&gt;&lt;a href="http://www.elviradones.com/" target="_blank"&gt;अल्वीरा दोनेस&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&amp;nbsp;(Elvira Dones) जो इटली में रहती हैं, ने उनके नाम एक चिट्ठी लिखी थी जिसका हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दशकों में इटली के दक्षिण में भूमध्यसागर के आसपास के देशों, टुनिज़ी, मोरोक्को, लिबिया, अल्बानिया आदि से हो कर अफ़्रीका तथा एशिया से नावों से समुद्र के रास्ते इटली में बहुत से गैरकानूनी प्रवासी आने लगे थे. बरलुस्कोनी सरकार ने प्रवासियों का हव्वा बना दिया था कि यह गुण्डे हैं, अपराधी हैं और इटली की सभ्यता को मिटा रहे हैं. इसी वजह से इन गैरकानूनी प्रवासियों को रोकने के लिए उनकी सरकार ने नये कठोर कानून बनाये. यहाँ तक कि समुद्र में डूबते हुए, मरते हुए लोगों को मदद देने को भी बुरा माना जाने लगा, मानो प्रवासी इन्सान न हों.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके साथ ही बरलुस्कोनी सरकार ने भूमध्यसागर के आसपास के देशों को पैसे दिये और उनसे समझौते किये कि वे अपने समुद्रतटों पर पहरेदारी करें और नाव वालों को प्रवासियों को ले कर इटली में घुसने से रोकें. जिस बात पर अल्वीरा ने चिट्ठी लिखी वह इन्हीं प्रवासियों की नावों को रोकने की बात से जुड़ी थी.&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;"आदरणीय प्रधानमंत्री जी, आप को उस अखबार के माध्यम से यह चिट्ठी लिख रही हूँ जिसे शायद आप नहीं पढ़ते होंगे, लेकिन बिना कुछ लिखे नहीं रह सकती थी क्योंकि पिछले शुक्रवार को आप ने हमेशा की तरह अपने क्रूर मज़ाक करने की आदत से उन लोगों की बात की जो मुझे बहुत प्रिय हैं: अल्बानिया की सुन्दर लड़कियाँ. जब मेरे देश के प्रधानमंत्री आप को भरोसा दे रहे थे कि वह इटली की ओर आने वाली प्रवासियों की नावों को रोकेंगे तो आप ने कहा कि "सुन्दर लड़कियों के लिए यह बात लागू नहीं होती".&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;मैं उन "सुन्दर लड़कियों" से कई बार मिली हूँ, रातों में, दिनों में, अपने दलालों से छुपते हुए, मैंने उत्तर में मिलान से दक्षिण में सिसली तक उनकी यात्रा देखी है. मुझे उन्होंने मुझे अपने तबाह, शोषित जीवनों के बारे में बताया है.&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;"स्तेल्ला" के पेट पर उसके मालिकों ने गरम सलाख से एक शब्द दाग़ दिया थाः वैश्या.&lt;br /&gt;सुन्दर थी वह बहुत, लेकिन उसमें एक कमी थी. अल्बानिया से उठा कर इटली में लायी गयी स्तेल्ला फुटपाथ पर स्वयं को बेचने से इन्कार करती थी. एक महीने तक उसके साथ अल्बानी दल्लों और उनके इतालिवी साथियों ने मिल कर बलात्कार किये और अंत में उसे अपनी इस नियती के सामने झुकना पड़ा. वह उत्तरी इटली के बहुत से शहरों के फुटपाथों पर बिकी. फ़िर तीन साल बाद, उसके पेट पर वह शब्द दाग़ा गया, शायद यूँ ही मज़ाक में या समय बिताने के लिए. एक समय था जब वह सुन्दर थी. आज वह दुनिया के हाशिये से बाहर है. न कभी प्यार होगा उसे, न वह कभी माँ बनेगी, न कभी किसी की नानी या दादी. उस पेट पर लिखे वैश्या शब्द ने उसके भविष्य से सभी आशाओं और सपनों को छीन लिया है. पुरुषों को खिलौना बन कर उसका गर्भअंग भी नष्ट हो चुका है.&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;इन "सुन्दर लड़कियों" पर मैंने एक किताब लिखी थी, "सोले ब्रुचातो" (जला हुआ सूर्य). फ़िर कुछ सालों के बाद स्विटज़रलैंड के टेलीविज़न के लिए इसी विषय पर एक डाकूमैंटरी फ़िल्म भी बनायी थी. उस फ़िल्म के लिए मैं एक अन्य सुन्दर लड़की की खोज में निकली थी जिसका नाम था ब्रुनिल्दा. उसके पिता ने मुझे प्रार्थना की थी कि मैं उसकी बेटी को खोजने में मदद करूँ. वह उन अल्बानी पिताओं मे से हैं जो अपनी बेटियाँ खोज रहे हैं. उनकी बेटियाँ अल्बानियाँ से उठा कर इटली लायी जाती हैं, उन्हें कसाईघरों में उल्टा लटकाया जाता है, उनके साथ बलात्कार करते हैं, उन्हें यातना देते हैं जब तक वह वैश्या बनने को मानती नहीं. प्रधानमंत्री जी, वह भी आप के ही जैसे पिता हैं पर आप जैसा भाग्य नहीं है उनका. आज भी ब्रुनिल्दा का पिता मानना नहीं चाहता कि उसकी बेटी मर चुकी है, वह किसी चमत्कार में आशा रखता है कि उसकी बेटी कहीं छिपी है, वापस आ जायेगी.&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;लम्बी कहानी है प्रधानमंत्री जी, आप शायद सुनना नहीं चाहेंगे. इतना अवश्य कहूँगी कि मुझसे अगर आप अपने मज़ाक की बातें करेंगी तो उन्हें चुप नहीं सुनूँगी. हर स्तेल्ला, बियाँका, ब्रुनिल्दा और उनके परिवारों के नाम पर आप को यह पत्र लिखना मेरा कर्तव्य था. पिछले बीस सालों के बदलाव में मेरे देश अल्बानिया ने स्वयं अपने आप को बहुत से घाव और दुख दिये हैं, लेकिन अब हम लोग सिर उठा कर, गर्व से चलना चाहते हैं. बेमतलब की क्रूर टिप्पणियों को नहीं स्वीकार करेंगे.&lt;/blockquote&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Graphic by S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/designs/rape.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;blockquote&gt;मेरे विचार में किसी मानव जीवन की दर्दपूर्ण नियति पर अगर अपनी क्रूर टिप्पणियाँ नहीं करें तो इसमे सभी का भला होगा. आप के उन शब्दों पर किसी ने कुछ नहीं कहा. शायद सब लोग अन्य झँझटों की सोच रहे हैं. किसी के पास समय नहीं जबकि आप व आप के अन्य साथी, औरतों के बारे में इस तरह की नीची बातें हमेशा से ही करते आये हैं. इस तरह की सोच और बातें, उन अपराधियों से जो अल्बानी नवयुवतियों का शोषण करते हैं, कम नहीं हैं. आप की ओर से शर्म के साथ अल्बानी औरतों से मैं क्षमा माँगती हूँ."&lt;/blockquote&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-5278877648264003376?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/5278877648264003376/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/11/blog-post_11.html#comment-form' title='10 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/5278877648264003376'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/5278877648264003376'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/11/blog-post_11.html' title='अल्वीरा का पत्र'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-176313774814720428</id><published>2011-11-01T11:00:00.004+01:00</published><updated>2011-11-01T18:16:22.642+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इतिहास'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तस्वीरें'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इटली'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यादें'/><title type='text'>हेमन्त की एक सुबह</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;लगता है कि इस वर्ष सर्दी कहीं सोयी रह गयी है. नवम्बर शुरु हो गया लेकिन अभी सचमुच की सर्दी शुरु नहीं हुई. यूरोप में हेमन्त का प्रारम्भ सितम्बर से माना जाता है. अक्टूबर आते आते ठँठक आ ही जाती है. मौसम की भविष्यवाणी करने वाले कहते हैं कि इस साल बहुत सर्दी पड़ेगी और बर्फ़ गिरेगी, पर अब तक शायद सर्दी को उनकी बात सुनने का मौका नहीं मिला. लेकिन अक्टूबर के जाने का समाचार पेड़ों को मिल गया है. मौसम के रंगरेज ने पत्तों में पीले, लाल, कत्थई रंगों से रंगोली बनाना शुरु किया है, उनकी विदाई की खुशी मनाने के लिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौसम और जीवन कितना मिलते हैं! बँसत जैसे कि बचपन, अल्हड़, नटखट रँगों के फ़ूलों की खिलखिलाती हँसी से भरा. गर्मी यानि जवानी, जोश से मदहोश जिसमें अचानक बरखा की बूँदें प्रेम सँदेश ले कर आती हैं. हेमन्त यानि प्रौढ़ता, जीवन की धूप में बाल पकाने के साथ साथ जीने के सबक सीखे हैं, फ़ूल नहीं तो क्या हुआ, पत्तों में भी रँग भर सकते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और आने वाला शिशिर, जब पत्ते अचानक पेड़ का घर छोड़ कर, लम्बी यात्रा पर निकल पड़ते हैं, हवा के कन्धों पर. वर्षों के गुज़रने के&amp;nbsp;साथ, वापस न आने वाली यात्रा पर निकले प्रियजनों की सूची लम्बी होती जाती है. इस साल चार प्रियजन जा चुके हैं अब तक. अगली बारी किसकी होगी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आल सैंटस (All saints) का दिन है आज. यानि "हर संत" को याद करने का ईसाई त्यौहार जिसे यूरोप, अमरीका और आस्ट्रेलिया में अपने परिवार के मृत प्रियजनों को याद करने के लिए मनाया जाता है. अमरीका में इसके साथ हेलोवीयन (Halloween) का नाम भी जुड़ा है जिसमें बच्चे और युवा आलसैंटस से पहले की शाम को डरावने भेस बना कर खेलते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर ईसाई नाम के साथ एक संत का नाम जुड़ा होता है जिसका वर्ष में एक संत दिवस होता है. 1 नवम्बर को सभी संतों को एक साथ याद किया जाता है, जिसमें कब्रिस्तान में जा कर अपने परिवार वालों तथा मित्रों की कब्रों पर जा कर लोग फ़ूल चढ़ाते हैं, कब्रों की सफ़ाई करते हैं और उन्हें याद करते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही सोच कर मैंने अपनी पत्नी से कहा कि चलो आज हम लोग इटली में द्वितीय महायुद्ध में मरे भारतीय सिपाहियों के कब्रिस्तान में हो कर आते हैं. उन्हें तो कोई याद नहीं करता होगा. सुबह सुबह तैयार हो कर हम घर से निकल पड़े.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Indian cemetery of Forli, Italy - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/forli_indian_cemetery_01.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय सिपाहियों का यह कब्रिस्तान हमारे घर के करीब एक सौ किलोमीटर दूर है, फोर्ली (Forli) नाम के शहर में. हाईवे से वहाँ पहुँचने में करीब 40 मिनट लगे. फोर्ली जिले का नाम फास्सिट नेता और द्वितीय महायुद्ध के दौरान, हिटलर के साथी, इटली के प्रधान मंत्री बेनितो मुसोलीनी के जन्मस्थान होने से प्रसिद्ध है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;द्वितीय महायुद्ध में अविभाजित भारत से करीब पचास हज़ार सैनिक आये थे इटली में, अंग्रेज़ी सैना का हिस्सा बन कर. उनमें से पाँच हज़ार सात सौ बयासी (5,782) भारतीय सैनिक इटली में युद्ध में मरे थे, जो अधिकतर नवयुवक थे और जिनकी औसत उम्र बाइस-तैईस साल की थी. इटली में मरने वाले इन सिपाहियों में से बारह सौ पैंसठ (1,265) लोगों का अंतिम संस्कार फोर्ली के कब्रिस्तान में हुआ था. उनमें से चार सौ छयानबे (496) लोग मुसलमान थे उन्हें यहाँ दफ़नाया गया, जबकि सात सौ उनहत्तर (769) लोग हिन्दू या सिख थे, जिनका यहाँ अग्नि संस्कार हुआ था. इटली में यह भारतीय सिपाहियों का सबसे बड़ा कब्रिस्तान-संस्कार स्थल है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ मुसलमान सैनिकों की अपने नामों की अलग अलग कब्रें है जबकि हिन्दू तथा सिख सैनिकों के नाम का एक स्मारक बनाया गया है जिसपर उन सबके नाम लिखे हैं. इसके अतिरिक्त कुछ बहादुरी का मेडल पाने वाले हिन्दू तथा सिख सिपाहियों के नाम के बिना कब्र के पत्थर भी लगे हैं. सिपाहियों के नामों की सूची में, जो नामों के एबीसी (A B C) के हिसाब से बनी है, पहला नाम है स्वर्गीय आभे राम का जो दिल्ली के रहने वाले थे और 23 वर्ष के थे, अंतिम नाम है स्वर्गीय ज़ैल सिंह का जो लुधियाना जिले के थे और 25 साल के थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Indian cemetery of Forli, Italy - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/forli_indian_cemetery_02.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Indian cemetery of Forli, Italy - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/forli_indian_cemetery_03.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Indian cemetery of Forli, Italy - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/forli_indian_cemetery_04.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Indian cemetery of Forli, Italy - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/forli_indian_cemetery_05.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;जब भारतीय सिपाहियों की चिताएँ जलाई गयी थी, उस समय वहाँ काम करने वाले फोर्ली के रहने वाले एक व्यक्ति श्री साल्वातोरे मरीनो पारी ने 2007 में एक साक्षात्कार में उन दिनों की याद को इन शब्दों में व्यक्त किया था (यह साक्षात्कार लिया था श्री एमानूएले केज़ी ने , जिसे उन्होंने &lt;b&gt;&lt;a href="http://ducelandia.blogspot.com/2007/11/1945-pire-funebri-ind-al-cimitero-di.html" target="_blank"&gt;दूचेलाँदियाँ नाम के इतालवी चिट्ठे&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; पर लिखा था):&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;"तब मैं 18 साल का था. 1945 की बात है, लड़ाई समाप्त हुई थी. अंग्रेजी फौज ने वायुसैना रक्षा कोलेज में अपना कार्यालय बनाया था, वहीं मुझे काम मिला था. हमारा काम था जहाँ जहाँ लड़ाई हुई थी वहाँ जा कर अंग्रेज़ी फौज के सिपाहियों की लाशों को जमा करना और उन्हें अलग अलग जगहों पर अंतिम संस्कार के लिए भेजना. सुबह ट्रक में निकलते थे, और आसपास की हर जगहों को खोजते थे. लाशों को जमा करके उनको पहचानने का काम किया जाता था, जो कठिन था. हमें कहा गया कि किसी सैनिक की एक उँगली तक को ठीक से ले कर आना है. हमारा काम था जब भी कोई भारतीय सैनिक मिलता, हम उसे फोर्ली के कब्रिस्तान में ले कर आते. हमने मुसलमानों की लाशों को दफनाया और हिन्दू तथा सिख सिपाहियों की लाशों का लकड़ी की चिताएँ बना कर, घी डाल कर उनका संस्कार किया. एक चिता पर छः लोगों का इकट्ठा संस्कार किया जाता था.&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;इस तरह का दाह संस्कार हमने पहले कभी नहीं देखा था. शहर से बहुत लोग उसे देखने आये, लेकिन किसी को पास आने की अनुमति नहीं थी. अंग्रेज़ी फौज ने चारों ओर सिपाही तैनात किये थे जो लोगों को करीब नहीं आने देते थे. फ़िर हमने चिताओं से राख जमा की और उसको ले कर रवेन्ना शहर के पास पोर्तो कोर्सीनी में नदी में बहाने ले कर गये. बेचारे नवजवान सिपाही अपने घरों, अपने देश से इतनी दूर अनजानी जगह पर मरे थे, बहुत दुख होता था.&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;मुझे उनका इस तरह से पार्थिव शरीरों को चिता में जलाना बहुत अच्छा लगा. जब मेरा समय आयेगा, मैं चाहता हूँ कि मेरे शरीर को जलाया जाये और मेरी राख को मिट्टी में मिला दिया जाये ताकि मैं प्रकृति में घुलमिल जाऊँ."&lt;/blockquote&gt;हरी घास में तरीके से लगे पत्थर, कहीं फ़ूलों के पौधे, पुराने घने वृक्ष, बहुत शान्त और सुन्दर जगह है यह भारतीय सिपाहियों का स्मृति स्थल. जाने इसमें कितने सैनिकों के परिवार अब पाकिस्तान तथा बँगलादेश में होंगे, और कितने भारत में, इस लिए यह केवल भारत का ही नहीं बल्कि पाकिस्तान तथा बँगलादेश का भी स्मृति स्थल है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहीं उत्तरी इटली में रहने वाले सिख परिवारों ने मिल कर एक सिख स्मारक का निर्माण करवाया है जिसमें दो सिख सिपाही हैं जोकि एक इतालवी स्वतंत्रता सैनानी को सहारा दे रहे हैं. यह स्मारक बहुत सुन्दर है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Indian cemetery of Forli, Italy - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/forli_indian_cemetery_06.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Indian cemetery of Forli, Italy - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/forli_indian_cemetery_07.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Indian cemetery of Forli, Italy - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/forli_indian_cemetery_08.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;सड़क की दूसरी ओर, फोर्ली का ईसाई कब्रिस्तान भी है. जहाँ एक ओर भारतीय सिपाही स्मृति स्थल में हमारे सिवाय कोई नहीं था इस तरफ़ के ईसाई कब्रिस्तान में सुबह सुबह ही लोगों का आना प्रारम्भ हो गया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाथों में फ़ूल लिये, या प्रियजन की कब्र की सफ़ाई करते हुए या फ़िर नम आँखों से पास खड़े हुए प्रार्थना करते हुए लोग दिखते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुन्दर मूर्तियाँ, रंग बिरँगे फ़ूल, घने पेड़ों पर चहचहाती चिड़ियाँ, और पीले कत्थई होते हुए पेड़ों के पत्ते, हर तरफ़ शान्ती ही दिखती थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Cemetery of Forli, Italy - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/forli_cemetery_01.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Cemetery of Forli, Italy - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/forli_cemetery_02.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-176313774814720428?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/176313774814720428/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/11/blog-post.html#comment-form' title='19 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/176313774814720428'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/176313774814720428'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='हेमन्त की एक सुबह'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>19</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-6574579716423706997</id><published>2011-10-29T16:57:00.001+02:00</published><updated>2011-10-29T20:40:37.764+02:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इतिहास'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दक्षिण अमरीका'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यादें'/><title type='text'>वेरा की लड़ाई</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;जीवन में कब किससे मिलना होगा और कौन सी बात होगी, यह कौन बता सकता है? संयोग से कभी कभी ऐसा होता है कि इतने दूर की किसी बात से मिली कड़ी का अगला हिस्सा भी संयोग से अपने आप ही मिल जाता है. कुछ मास पहले मैंने "&lt;b&gt;&lt;a href="http://jonakehsake.blogspot.com/2011/03/blog-post_04.html"&gt;हाहाकार का नाम&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;" शीर्षक से एक अर्जेन्टीनी मित्र से मुलाकात की बात लिखी थी जिसने मुझे तानाशाही शासन द्वारा मारे गये बच्चों की खोज में किये जाने वाले काम के बारे बता कर द्रवित कर दिया था. तब नहीं सोचा था कि वेरा से मुलाकात भी होगी, जिसने उसी तानाशाह शासन से अपनी बच्ची को खोजने के लिए लड़ाई लड़ी थी और सत्य की खोज में आज भी लड़ रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वेरा का जन्म 1928 में इटली में हुआ था. ज्यू यानि यहूदी परिवार में जन्मी वेरा जराख (Vera Jarach) दस साल की थी, मिलान के एक प्राथमिक विद्यालय में पढ़ती थी जब इटली में मुसोलीनी शासन के दौरान जातिवादी कानून बने. वेरा को विद्यालय में अध्यापिका ने कहा कि तुम इस विद्यालय में नहीं पढ़ सकती, क्योंकि तुम यहूदी हो और नये कानून के अनुसार यहूदी बच्चे सरकारी विद्यालयों में नहीं पढ़ सकते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Vera Jarach, desparecidos in Argentina - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/vera_jarach_02.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बात के कुछ मास बाद जनवरी 1939 में वेरा के पिता ने निर्णय किया कि जब तक यहूदियों के विरुद्ध होने वाली बातें&amp;nbsp;समाप्त&amp;nbsp;न हों, वह परिवार के साथ कुछ समय के लिए इटली से बाहर कहीं चले जायेंगे. उनके कुछ मित्र अर्जेन्टीना में रहते थे, इसलिए उन्होंने यही निर्णय लिया कि कुछ समय के लिए वे लोग अर्जेन्टीना चले जायेंगे. वेरा के दादा ने कहा कि वह अपना घर, देश छोड़ नहीं जायेंगे, वह मिलान में अपने घर में ही रहेंगे. वेरा के परिवार के अर्जेन्टीना जाने के एक वर्ष बाद उसके दादा को पुलिस ने पकड़ कर आउश्विट्ज़ के कन्सनट्रेशन कैम्प में भेजा, जहाँ कुछ समय बाद उन्हें मार दिया गया. वेरा और उसका बाकी परिवार यूरोप से होने की वजह से इस दुखद नियति से बच गये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;द्वितीय महायुद्ध के समाप्त होने पर, मुसोलीनी तथा हिटलर दोनो हार गये, और अर्जेन्टीना में गये इतालवी यहूदी प्रवासी वापस इटली लौट आये, लेकिन वेरा के परिवार ने फैसला किया कि वह वहीं रहेंगे, क्योंकि तब तक वेरा की बड़ी बहन ने वहीं पर विवाह कर लिया था, और वह सब लोग करीब रहना चाहते थे. कुछ सालों के बाद वेरा को भी एक इतालवी मूल के यहूदी युवक से प्यार हुआ और उन्होंने विवाह किया और उनकी एक बेटी हुई जिसका नाम रखा फ्राँका.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ्राँका जब हाई स्कूल में पहुँची, तब दुनिया बदल रही थी. यूरोप तथा अमेरिका में वियतनाम युद्ध के विरोध में प्रदर्शन किये जा रहे थे. तब हिप्पी आंदोलन और युवाओं के आँदोलन भी चल रहे थे. वैसे ही प्रदर्शन दक्षिण अमरीका में भी हो रहे थे. फ्राँका भी अर्जेन्टीनी युवाओं के साथ प्रर्दशनों में हिस्सा ले रही थी. तब अर्जेन्टीनी राजनीतिक स्थिति बदली. जुलाई 1974 में राष्ट्रपति पेरों की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी एवा पेरों (Eva Perone) को राष्ट्रपति बनाया गया लेकिन उस समय वामपंथी तथा रूढ़िवादि राजनीतिक दलों के बीच में झगड़े शुरु हो गये. कुछ वामपंथी दल रूसी कम्यूनिस्ट शैली के शासन की माँग कर रहे थे और रूढ़िवादि दल, मिलेट्री के साथ मिल कर उनके विरुद्ध कार्यक्रम बना रहे थे. मार्च 1976 में मिलेट्री ने एवा पेरों को हटा कर सत्ता पर कब्ज़ा किया और वामपंथी दलों के समर्थकों पर हमले शुरु हो गये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;18 साल की फ्राँका को भी मिलेट्री सरकार की खुफ़िया पुलिस विद्यालय से जुलाई 1976 में पकड़ कर ले गयी. उन दिनों से शुरु हुआ मिलेट्री शासन का अत्याचार जिसमें करीब 30,000 लोग उठा लिए गये जिनका कुछ पता नहीं चला. उनको पहले यातनाएँ दी गयीं फ़िर उनमें से कुछ लोगो को मार कर समुद्र में फैंक दिया गया, कुछ को मार कर जँगल में दबा दिया गया. आज उन लोगों को स्पेनी भाषा के शब्द "दिसाआपारेसिदोस" (Desaparecidos) यानि "खोये हुए लोग" के नाम से जाना जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिनके बच्चे खोये थे, वे परिवार पहले तो डरे रहे, फ़िर धीरे धीरे, अर्जेन्टीना की राजधानी बोनोस आएरेस के उन परिवारों की औरतों ने फैसला किया कि वह शहर के प्रमुख स्काव्यर प्लाजा दो मायो (Plaza do Mayo), जहाँ राष्ट्रपति का भवन था, में जा कर प्रर्दशन करेंगी. उन्होंने परिवारों के पुरुषों को कहा कि तुम सामने मत आओ वरना पुलिस तुमको विरोधी कह कर पकड़ लेगी, लेकिन प्रौढ़ माँओं को पकड़ने से हिचकेगी. एक दूसरे की बाँहों में बाँहें डाल कर गुम हुए बच्चों की माँओं ने प्लाज़ा दो मायो में घूमते हुए प्रर्दशन करना शुरु किया. इस विरोध को आज "प्लाज़ा दो मायो की माओं का विरोध" के नाम से जाना जाता&amp;nbsp;है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरे धीरे जानकारी आनी लगी कि किसके साथ क्या किया गया था, कैसे लोगों को यातनाएँ दे कर मारा गया था, कैसे गर्भवति औरतों के बच्चे पैदा कर मिलेट्री वाले निसन्तान लोगों ने ले लिए थे और उनकी माओं को मार दिया गया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत सालों की लड़ाई और खोज के बाद वेरा को मालूम पड़ा कि उसकी बेटी फ्राँका की मृत्यु उसके पकड़े जाने के एक माह के बाद ही हो गयी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मन में आस छुपी थी कि शायद मेरी बेटी कहीं ज़िन्दा हो", वेरा बोली, "वह आस बुझ गयी, दुख भी हुआ पर यह भी लगा कि अब इस बात को ले कर सारा जीवन नहीं तड़पना पड़ेगा. जैसा उसके दादा के साथ हुआ था, फ्राँका की भी कोई कब्र नहीं, मेरे दिल में दफ़न है वह."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले 35 सालों से वेरा और उसके साथ की अन्य माएँ न्याय के लिए लड़ रही हैं. कुछ मिलेट्री वालों को पकड़ लिया गया, उन पर मुकदमें चले और उन्हें सजा मिली. कुछ लोगों की कब्रों से हड्डियों की डीएनए जाँच द्वारा पहचान की गयी और उनके परिवार वालों को उन्हें ठीक से दफ़नाने का मौका मिला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Vera Jarach, desparecidos in Argentina - S. Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/vera_jarach_01.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वेरा ने मुझसे कहा, "उन मिलेट्री वालों ने 400 नवजात बच्चों को उनकी माओं से छीन कर मिलेट्री परिवारों में गोद ले कर पाला, हम उन्हें भी खोजती है, और उन्हें भी बताती हैं कि उनके साथ क्या हुआ था और उनके असली माँ बाप कौन थे."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे बच्चे आज करीब तीस पैंतीस साल के लोग हैं. मैंने सुना तो मुझे लगा कि अगर अचानक कोई आप को आ कर बताये कि जिन्हें सारा जीवन आप ने अपने माँ पिता समझा है वह असल में वे लोग हैं जिन्होंने आप के असली माता पिता को मारा होगा, तो कितना धक्का लगेगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने वैरा से कहा, "पर क्या यह करना जरूरी है? जिन लोगों को कुछ नहीं मालूम, यह भी नहीं कि वे गोद लिये गये थे, उनके जीवन में यह समाचार दे कर उन्हें कितना दुख होता होगा?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वेरा बोली, "सोचो कि तुम हो इस स्थिति में, क्या तुम अपने जीवन की इतनी भीषड़ सच्चाई को जानना नहीं चाहोगे? मैं नहीं मानती कि झूठ में रहा जा सकता है. करीब सौ बच्चों को पहचाना जा चुका है, उनकी नानियाँ दादियाँ और मनोवैज्ञानिक इस स्थिति में उन्हें सहारा देते हैं. सच्चाई को छुपाने से जीवन नहीं बन सकता, सच जानना बहुत आवश्यक है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर फ़िर भी मुझे वेरा की बात कुछ ठीक नहीं लगी. लगा कि इतना भीषड़ सत्य शायद मैं न जानना चाहूँ जिसे सारा जीवन उथल पथल हो जाये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;83 वर्ष की वेरा की हँसी मृदुल है. वह अब भी घूमती रहती है, विद्यालयों में बच्चों को उन सालों की कहानी सुनाती है, अपनी लड़ाई के बारे में बताती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वेरा बोली, "मुझे लोग कहते हैं कि जो हो गया सो हो गया, इतने साल बीत गये, अब उनको क्षमा कर दो, भूल जाओ. मैं पूछती हूँ कि क्या किसी ने क्षमा माँगी है हमसे कि हमने गलत किया, जो मैं क्षमा करूँ? वे लोग तो आज भी अपने कुकर्मों की डींगे मारते हैं कि उन्होंने अच्छा किया कम्युनिस्टों को मार कर. उन्हें सज़ा मिलनी ही चाहिये, हाँलाकि उनमें से अधिकाँश लोग अब बूढ़े हो रहे हैं, कई तो मर चुके हैं. मेरे मन में बदले की भावना नहीं, मैं न्याय की बात करती हूँ. अत्याचारी खूनी को कुछ सजा न मिले, क्या यह अन्याय नहीं?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वेरा कभी भारत नहीं गयी लेकिन कहती है कि उसकी एक मित्र कार्ला (Carla) अपने पति माउरिज़यो (Maurizio) के साथ दिल्ली में रहती है जिसके साथ मिल कर उसने अपने जीवन के बारे में एक किताब लिखी थी. उसने मुझसे पूछा, "यह बात केवल अर्जेन्टीना की नहीं, हर देश की है. भारत में भी तो दंगे होते हैं, विभिन्न धर्मों के बीच, क्या उनमें अपराधियों को सज़ा मिलती है?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उसे 1984 में हुए सिख परिवारों के साथ हुए तथा 2002 में गुजरात में मुसलमान परिवारों के साथ हुए काँडों के बारे में बताया कि भारत में भी अधिकतर दोषी खुले ही घूम रहे हैं, और वहाँ भी कुछ लोग न्याय के लिए लड़ रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं चलने लगा तो वेरा ने कहा, "मैं आशावान हूँ, मैं निराशावादी नहीं. मेरे दादा नाज़ी कंसन्ट्रेशन कैम्प में मरे, उनकी कोई कब्र नहीं. मेरी बेटी भी अनजान जगह मरी, उसकी भी कोई कब्र नहीं. मेरा कोई वारिस नहीं. फ़िर भी मैं आशावान हूँ, मैं मानती हूँ कि दुनिया में अच्छे लोग बुरे लोगों से अधिक हैं और अंत में अच्छाई की ही जीत होगी. मेरी एक ही बेटी थी, वह नहीं रही, पर मैं सोचती हूँ कि दुनिया के सारे बच्चे मेरे ही नाती हैं. पर मेरा कर्तव्य है कि उन बच्चों को याद दिलाऊँ कि हमारी स्वतंत्रता, हमारी खुशियाँ, हमारे जीवन, हमारे लोकतंत्र, इनकी हमें रक्षा करनी है. अगर तानाशाह इन पर काबू करके हमें डरायेंगे तो हमें डरना नहीं, उनसे लड़ना है. अन्याय हो और हम अपनी आवाज़ न उठायें, तो इसका मतलब हुआ कि हम भी अत्याचारियों के साथी हैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-6574579716423706997?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/6574579716423706997/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/10/blog-post_29.html#comment-form' title='10 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/6574579716423706997'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/6574579716423706997'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/10/blog-post_29.html' title='वेरा की लड़ाई'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-3940707381972770118</id><published>2011-10-24T07:18:00.001+02:00</published><updated>2011-10-24T07:22:58.136+02:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रवासी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इटली'/><title type='text'>विदेशी पनीर के देसी बनानेवाले</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;इतालवी पारमिज़ान पनीर दुनिया भर में प्रसिद्ध है. वैसे तो बहुत से देशों में लोगों ने इसे बनाने की कोशिश की है लेकिन कहते हैं कि जिस तरह का पनीर इटली के उत्तरी पूर्व भाग के शहर पारमा तथा रेज्जोइमीलिया में बनता है वैसा दुनिया में कहीं और नहीं बनता. इसकी वजह वहाँ के पानी तथा गायों को खिलायी जाने वाली घास में बतायी जाती है. पारमिज़ान पनीर को घिस कर पास्ता के साथ खाते हैं और अन्य कई पकवानों में भी इसका प्रयोग होता है. वैसे तो पिछले कुछ वर्षों से इटली के विभिन्न उद्योगों में गिरावट आयी है लेकिन लगता है कि पारमिज़ान पनीर के चाहने वालों ने इस पनीर के बनाने वालों के काम को सुरक्षित रखा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करीब पंद्रह बीस वर्ष पहले पारमिज़ान पनीर को बनाने वाले उद्योग को काम करने वाले मिलने में कठिनाई होने लगी. इतालवी युवक कृषि से जुड़े सब काम छोड़ रहे थे, गायों तथा भैंसों की देखभाल करने वाले नहीं मिलते थे. तब इस काम का मशीनीकरण होने लगा पर साथ ही पंजाब से आने वाले भारतीय युवकों को इस काम के लिए बुलाया जाने लगा. आज उत्तरी इटली में करीब 25 हज़ार पंजाबी युवक, जिनमें से अधिकतर सिख हैं, इस काम में लगे हैं. यहीं के छोटे से शहर नोवेलारा में यूरोप का सबसे बड़ा गुरुद्वारा भी बना है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यानि दुनिया भर में निर्यात होने वाले इतालवी पारमिज़ान पनीर को बनाने वाले चालिस प्रतिशत कार्यकर्ता भारतीय हैं. वैसे तो इटली में भारतीय प्रवासी बहुत अधिक नहीं हैं लेकिन इस काम में केवल भारतीय पंजाबी प्रवसियों को ही जगह मिलती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज सुबह इस विषय पर इटली के रिपुब्लिका टेलीविज़न पर छोटा सा समाचार देखा जिसमें भारत से सात वर्ष पहले आये मन्जीत सिंह का साक्षात्कार है. उन्हें यह काम सिखाया कम्पनी के मालिक ने जो कहते हें कि भारत से आये प्रवासी यहाँ के समाज में घुलमिल गये हैं और उनके बिना इस काम को चलाना असम्भव हो जाता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप चाहें तो इस समाचार को&amp;nbsp;&lt;a href="http://tv.repubblica.it/cronaca/italia-sono-i-sikh-i-veri-artefici-del-parmigiano/79011/77401?ref=HREV-4" target="_blank"&gt;&lt;b&gt;इस&amp;nbsp;लिंक पर देख सकते&lt;/b&gt; &lt;/a&gt;हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;object classid="&amp;quot;clsid:d27cdb6e-ae6d-11cf-96b8-444553540000&amp;quot;" codebase="&amp;quot;http://download.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=10,0,0,0&amp;quot;" height="&amp;quot;390&amp;quot;" width="&amp;quot;640&amp;quot;"&gt;&lt;param name=&amp;quot;movie&amp;quot; value=&amp;quot;http://tv.repubblica.it/static/swf/z_adv_player.swf&amp;quot;&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name=&amp;quot;allowScriptAccess&amp;quot; value=&amp;quot;always&amp;quot; /&gt;&lt;param name=&amp;quot;allowFullScreen&amp;quot; value=&amp;quot;true&amp;quot;&gt;&lt;/param&gt;&lt;param 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rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-4670303221179085784</id><published>2011-09-26T07:27:00.000+02:00</published><updated>2011-09-26T07:28:26.384+02:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इतिहास'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तस्वीरें'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कला'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इटली'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सभ्यता'/><title type='text'>दिल लुभाने वाली मूर्तियाँ</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;बोलोनिया शहर संग्रहालयों का शहर है. गाइड पुस्तिका के हिसाब से शहर में सौ से भी अधिक संग्रहालय हैं. इन्हीं में से एक है दीवारदरियों (Tapestry) का संग्रहालय. दीवारदरियाँ यानि दीवार पर सजावट के लिए टाँगने वाले कपड़े जिनके चित्र जुलाहा करघे पर कपड़ा बुनते हुए, उस पर बुन देता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत दिनों से मन में इस संग्रहालय को देखने की इच्छा थी. कल रविवार को सुबह देखा कि मौसम बढ़िया था, हल्की हल्की ठंडक थी हवा में. पत्नि को भी अपनी सहेली के यहाँ जाना था जहाँ जाने का मेरा बिल्कुल भी मन नहीं था, तो सोचा क्यों न आज सुबह साइकल पर सैर को निकलूँ और उस संग्रहालय को देख कर आऊँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह संग्रहालय हमारे घर से करीब आठ या नौ किलोमीटर दूर, शहर के दक्षिण में जहाँ पहाड़ शुरु होते हैं, उनके आरम्भिक भाग में अठाहरवीं शताब्दी के एक प्राचीन भवन में बना है. इस प्राचीन भवन का नाम है "विल्ला स्पादा" (Villa Spada) जो कि रोम के स्पादा परिवार का घर था. सोचा कि पहाड़ी के ऊपर से शहर का विहंगम दृश्य भी अच्छा दिखेगा. यह सब सोच कर सुबह नौ बजे घर से निकला और करीब आधे घँटे में वहाँ पहुँच गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संग्रहालय के आसपास प्राचीन घर का जो बाग था उसे अब जनसाधारण के लिए खोल दिया गया है. बाग में अंदर घुसते ही सामने एक मध्ययुगीन बुर्ज बना है, जबकि बायीं ओर एक पहाड़ी के निचले हिस्से पर विल्ला स्पादा का भवन है. संग्रहालय में देश विदेश से करघे पर बुने कपड़ों के नमूने हैं. &amp;nbsp;इन कपड़ों के नमूनों में से कुछ बहुत पुराने हैं, यहाँ तक कि दो हज़ार साल से भी अधिक पुराने, यानि उस समय के कपड़े जब भारत में सम्राट अशोक तथा गौतम बुद्ध थे. कपड़ों के अतिरिक्त संग्रहालय में प्राचीन चरखे और कपड़ा बुनने वाले करघे भी हैं जैसे कि एक सात सौ साल पुराना करघा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संग्रहालय में घूमते हुए लगा कि शायद यूरोप में कपड़ा बुनने वालों को नीचा नहीं समझा जाता था बल्कि उनको कलाकार का मान दिया जाता था. तभी उनके बनाये कढ़ाई के काम को, डिज़ाईन के काम को इतने मान के साथ सहेज कर रखा गया है. उनमें से कुछ लोगों के नाम तक लिखे हुए हैं. सोचा कि अपने भारत में हाथ से काम करने वाले को हीन माना जाता है, उनकी कला को कौन इतना मान देता है कि उनके नाम याद रखे जायें या उनके डिज़ाईनों को संभाल कर रखा जाये? पहले ज़माने की बात तो छोड़ भी दें, आज तक पाराम्परिक जुलाहे जो चंदेरी या चिकन का काम करते हैं, क्या उनमें से किसी को कलाकार माना जाता है? धीरे धीरे सब काम औद्योगिक स्तर पर मिलें और मशीने करने लगी हैं, जबकि हाथ से काम करने वाले कारीगर गरीबी और अपमान से तंग कर यह काम अपने बच्चों को नहीं सिखाना चाहते. कहते थे कि ढ़ाका की इतनी महीन मलमल होती थी कि अँगूठी से निकल जाये, पर क्या किसी मलमल बनाने बनाने का नाम हमारे इतिहास ने याद रखा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संग्रहालय में रखे कपड़ों, करघों के अतिरिक्त घर की दीवारों तथा छत पर बनी कलाकृतियाँ भी बहुत सुन्दर हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संग्रहालय देख कर बाहर निकला तो भवन के प्रसिद्ध इतालवी बाग को देखने गया. इतालवी बाग बनाने की विषेश पद्धति हुआ करती थी जिसमें पेड़ पौधों को अपने प्राकृतिक रूप में नहीं बल्कि "मानव की इच्छा शक्ति के सामने सारी प्रकृति बदल सकती है" के सिद्धांत को दिखाने के लिए लगाया जाता था. इन इतालवी बागों में केवल वही पेड़ पौधे लगाये जाते थे जो हमेशा हरे रहें ताकि मौसम बदलने पर भी बाग अपना रूप न बदले. इन पौधों को इस तरह लगाया जाता था जिससे भिन्न भिन्न आकृतियाँ बन जायें, जो प्रकृति की नहीं बल्कि मानव इच्छा की सुन्दरता को दिखाये. इस तरह के बाग बनाने की शैली फ़िर इटली से फ्राँस पहुँची जहाँ इसे और भी विकसित किया गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विल्ला स्पादा के इतालवी बाग में पौधों की आकृतियों को ठीक से देखने के लिए एक "मन्दिर" बनाया गया था जिसकी छत पर खड़े हो कर पौधों को ऊपर से देख सकते हैं. बाग के बीचों बीच ग्रीस मिथकों पर आधारित कहानी से हरक्यूलिस की विशाल मूर्ति बनी है. पर बाग की सबसे सुन्दर चीज़ है मिट्टी की बनी नारी मूर्तियाँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक कतार में खड़ीं इन मूर्तियों में हर नारी के भाव, वस्त्र, मुद्रा भिन्न है, कोई मचलती इठलाती नवयुवती है तो कोई काम में व्यस्त प्रौढ़ा, कोई धीर गम्भीर वृद्धा. मुझे यह मूर्तियाँ बहुत सुन्दर लगी. बहुत देर तक उन्हें एक एक करके निहारता रहा. लगा कि मानो उन मूर्तियों में मुझ पर जादू कर दिया हो. दो सदियों से अधिक समय से खुले बाग में धूप, बर्फ़, बारिश ने हर मूर्ति पर अपने निशान छोड़े हैं, कुछ पर छोटे छोटे पौधे उग आये हैं. इन निशानों की वजह से वे और भी जीवंत हो गयी हैं. उनके वस्त्र इस तरह बने हैं मानो सचमुच के हों.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस दिन को इन मूर्तियों की वजह से कभी भुला नहीं पाऊँगा, और दोबारा उन्हें देखने अवश्य जाऊँगा. प्रस्तुत हैं विल्ला स्पादा के संग्रहालय तथा बाग की कुछ तस्वीरें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहली तस्वीरें हैं संग्रहालय की.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Villa Spada, Bologna, Italy" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/villa_spada_01.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Villa Spada, Bologna, Italy" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/villa_spada_02.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Villa Spada, Bologna, Italy" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/villa_spada_03.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इन तस्वीरों में है इतालवी बाग और हरक्यूलिस की मूर्ती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Villa Spada, Bologna, Italy" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/villa_spada_04.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Villa Spada, Bologna, Italy" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/villa_spada_05.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;और अंत में यह नारी मूर्तियाँ जो मुझे बहुत अच्छी लगीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Villa Spada, Bologna, Italy" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/bologna_villa_spada_03.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Villa Spada, Bologna, Italy" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/bologna_villa_spada_05.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Villa Spada, Bologna, Italy" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/bologna_villa_spada_06.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Villa Spada, Bologna, Italy" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/bologna_villa_spada_07.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Villa Spada, Bologna, Italy" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/bologna_villa_spada_11.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;हैं न सुन्दर यह नारी मूर्तियाँ?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-4670303221179085784?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/4670303221179085784/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/09/blog-post_26.html#comment-form' title='16 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/4670303221179085784'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/4670303221179085784'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/09/blog-post_26.html' title='दिल लुभाने वाली मूर्तियाँ'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-6859322397900373022</id><published>2011-09-16T07:45:00.001+02:00</published><updated>2011-09-16T07:45:47.271+02:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तकनीकी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिकित्सा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भूमँडलिकरण'/><title type='text'>धँधा है, सब धँधा है</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;अखबार में पढ़ा कि इंफोसिस कम्पनी ने अपने व्यापार को विभिन्न दिशाओं में विकसित करने का फैसला किया है, इसलिए कम्पनी अब प्राईवेट बैंक के अतिरिक्त चिकित्सा क्षेत्र में भी काम खोलेगी. चिकित्सा क्षेत्र को नया "सूर्योदय उद्योग" यानि Sunrise industry कहते हैं क्योंकि इसमें बहुत कमाई है, जो धीरे धीरे उगते सूरज की तरह बढ़ेगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोचा कि दुनिया कितनी बदल गयी है. पहले बड़े उद्योगपति बहुत पैसा कमाने के बाद खैराती अस्पताल और डिस्पैंसरियाँ खोल देते थे ताकि थोड़ा पुण्य कमा सकें, अब के उद्योगपति सोचते हैं कि लोगों की बीमारी और दुख को क्यों न निचोड़ा जाये ताकि और पैसा बने.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले वर्ष फरवरी में चीन में काम से गया था जब छोटी बहन ने खबर दी थी कि माँ बेहोश हो गयी है और वह उसे अस्पताल में ले जा रही है. माँ का यह समय भी आना ही था यह तो कई महीनो से मालूम हो चुका था. पिछले दस सालों में एल्सहाईमर की यादाश्त खोने की बीमारी धीरे धीरे उनके दिमाग के कोषों को खा रही थी, जिसकी वजह से कई महीनों से उनका उठना, बैठना, चलना,सब कुछ बहुत कठिन हो गया था. मन में बस एक ही बात थी कि माँ के अंतिम दिन शान्ती से निकलें. मैं खबर मिलने के दूसरे ही दिन दिल्ली पहुँच गया. अस्पताल पहुँचा तो माँ के कागजों में उन पर हुए टेस्ट देख कर दिमाग भन्ना गया. जाने कितने खून के टेस्ट, केट स्कैन आदि किये जा चुके थे, पर मुझे दुख हुआ जब देखा कि माँ की रीढ़ की हड्डी से जाँच के लिए पानी निकाला गया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करीब सत्ततर वर्ष की होने वाली थी माँ. इतने सालों से लाइलाज बिमारी का कुछ कुछ इलाज उसी अस्पताल के डाक्टर कर रहे थे. यही इन्सान की कोशिश होती है कि मालूम भी हो कि कुछ विषेश लाभ नहीं हो रहा तब भी लगता है कि बिना कुछ किये कैसे छोड़ दें. मरीज़ कुछ गोली खाता रहे, तो मन को लगेगा कि हम बिल्कुल लाचार नहीं हैं, कुछ कोशिश कर रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोमा में पड़ी माँ के अंतिम दिन थे, यह सब जानते थे. किसी टेस्ट से उन्हें कुछ होने वाला नहीं था. उस हाल में खून के टेस्ट, ईसीजी, ईईजी, केट स्कैन आदि सब बेकार थे, पर उन्हें स्वीकारा जा सकता था, यह सोच कर कि इतना बड़ा प्राईवेट अस्पताल चलाना है तो वह लोग कुछ न कुछ कमाने की सोचेंगे ही. पर रीढ़ की हड्डी से पानी निकालना? यानि उनकी इस हालत में जब हाथ, पैर घुटने अकड़े और जुड़े हुए थे, उन्हें खींच तान कर, इस तरह से तकलीफ़ देना, यह तो अपराध हुआ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे बहुत गुस्सा आया. छोटी बहन को बोला कि तुमने उन्हें यह रीढ़ की हड्दी से पानी निकालने का टेस्ट करने क्यों दिया? वह बोली मैं उन्हें क्या कहती, वह डाक्टर हैं वही ठीक समझते हैं कि क्या करना चाहिये, क्या नहीं करना चाहिये! डाक्टर आये तो मन में आया कि पूछूँ कि रीढ़ की हड्दी से पानी वाले टेस्ट में क्या देखना चाहते थे, लेकिन कुछ कहा नहीं. मैंने उन्हें यही कहा कि मैं माँ को घर ले जाना चाहूँगा. तो बोले कि हाँ ले जाईये, यही बेहतर है, इनकी हालत ऐसी है कि यहाँ हम तो कुछ कर नहीं सकते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं माँ को घर ला सका था क्योंकि मेरे मन में था कि मैं स्वयं माँ का अंतिम दिनो में उपचार करूँगा. कुछ समय तक मैंने आई.सी.यू. में काम किया था, मालूम था कि उनकी देखभाल जिस तरह मैं कर सकता हूँ, उस तरह अन्य लोग नहीं कर सकते. क्योंकि मेरे उपचार में अपना लाभ नहीं छुपा था, केवल माँ के अंतिम दिनों में उनको शान्ति मिले इसका विचार था. लेकिन जिनके अपनों में कोई डाक्टर न हो जो उनका ध्यान कर सके, क्या उसके अच्छा इलाज का अर्थ यही है कि पैसे कमाने वाले "सूर्योदय उद्योग" से उसे निचोड़ सकें?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Graphic on doctor and money" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/doctor.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;भारत के डाक्टर, नर्स, फिज़योथेरापिस्ट आदि अपने काम के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं. मेरे विचार में अगर कोई चिकित्सा क्षेत्र में काम करने की सोचता है तो उसे धँधा समझ कर यह सोचे, ऐसे लोग कम ही होंगे. इस क्षेत्र में काम करने वाले अधिकतर लोग अपने मन में स्वयं को भले आदमी के रूप में ही देखते सोचते हैं कि वह लोगों की भलाई का काम कर रहे हैं. लेकिन जब अपने काम से अपनी रोटी चलनी हो और मासिक पागार नहीं बल्कि कौन मरीज़ कितना देगा की भावना हो तो धीरे धीरे लालच मन में आ ही जाता है. बिना जरूरत के आपरेशन से बच्चा करना, बिना बात के ओपरेशन करना या दवाईयाँ खिलाना, नयी बिमारियाँ बनाना, बेवजह के टेस्ट और एक्सरे कराना, जैसी बातें इसी लालच का नतीजा हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर क्षेत्र की तरह इस क्षेत्र में भी अच्छे और बुरे दोनो तरह के लोग होते हैं. भारत में चिकित्सा क्षेत्र में काम करने वाले ऐसे बहुत से लोगों को जानता हूँ जो आदर्शवादी हैं और इसे सेवा के रूप में देखते हैं. भारत के चिकित्सा से जुड़े कुछ उद्योगों ने भी दुनिया में अपनी धाक आदर्शों के बल पर ही बनायी है, जैसे कि जेनेरिक दवा बनाने वाले तथा सिपला जैसी दवा बनाने की कम्पनियाँ जिन्होंने एडस, मलेरिया, टीबी जैसी बीमारियों की सस्ती दवाईयाँ बना कर विकासशील देशों में रहने वाले गरीब लोगों को इलाज कराने का मौका दिया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर बड़े शहरों में पैसे वालों के लिए सरकारी अस्पतालों की तुलना में पाँच सितारा अस्पतालों में या नर्सिंग होम में लोगों को सही इलाज मिल सकेगा, इसके बारे में मेरे मन में कुछ दुविधा उठती है. वहाँ सरकारी अस्पताल सी भीड़ और गन्दगी शायद न हो, लेकिन क्या चिकित्सा की दृष्टि से वह इलाज मिलेगा जिसकी आप को सच में आवश्यकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अहमदाबाद की संस्था "सेवा" के एक शौध में निकला था कि भारत में गरीब परिवारों में ऋण लेने का सबसे पहला कारण बीमारी का इलाज है. प्राईवेट चिकित्सा संस्थाओं को बीमारी कैसी कम की जाये, इसमें दिलचस्पी नहीं, बल्कि पैसा कैसे बनाया जाये, इसकी चिन्ता उससे अधिक होती है. वहाँ काम करने वाले लोग कितने भी आदर्शवादी क्यों न हों, क्या वह निष्पक्ष रूप से अपने निर्णय ले पाते हैं और वह सलाह देते हैं जिसमें मरीज़ का भला पहला ध्येय हो, न कि पैसा कमाना?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसीलिए जब सुनता हूँ कि भारत में अब अमरीका जैसे बड़े स्पेशालिटी अस्पताल खुले हैं जहाँ पाँच सितारा होटल के सब सुख है, जहाँ सब नयी तकनीकें उपलब्ध हैं, विदेशों से भी लोग इलाज करवाने आते हैं, तो मुझे लगता है कि अगर मुझे कुछ तकलीफ़ हो तो वहाँ नहीं जाना चाहूँगा, कोई सीधा साधा डाक्टर ही खोजूँगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-6859322397900373022?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/6859322397900373022/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/09/blog-post.html#comment-form' title='19 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/6859322397900373022'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/6859322397900373022'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='धँधा है, सब धँधा है'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>19</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-2250723727644340638</id><published>2011-08-13T10:48:00.004+02:00</published><updated>2011-08-13T16:03:32.000+02:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धर्म'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सभ्यता'/><title type='text'>राखी का वचन</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;कल शाम को काम से घर लौटा तो अपनी दोनो बहनों की ईमेल देखी जिसमें राखी बाँधने की बात थी. एक भारत में रहती है, दूसरी अमरीका में. पहले कई सालों तक दोनो बहनें लिफ़ाफ़े में राखी भेजती थीं जो अक्सर त्योहार के कुछ दिनों बाद मिलती थीं और मैं अपनी पत्नी या बेटे से कहता था कि बाँध दो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब कल्पना की राखी से ही काम चल जाता है. वह कहती हैं कि हम प्यार से भेज रहे हैं, और हम प्यार से कहते हैं कि मिल गयी तुम्हारी राखी. आज की दुनिया में वैसे ही इतना प्रदूषण हैं, इस तरह से राखी मनाना पर्यावरण के लिए भी अच्छा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज सुबह फेसबुक के द्वारा कुछ इतालवी "मित्रों" के संदेश भी मिले, पुरुषों के भी और स्त्रियों के भी, "हैप्पी रक्षाबँधन". यहाँ बहुत से मित्र भारत प्रेमी हैं, जो देखते रहते हैं कि भारत में क्या हो रहा है और होली, दीवाली तथा अन्य त्योहारों पर याद दिला देते हैं कि वे भी हैं, जो हमारे बारे में सोचते हैं. क्या इस तरह के संदेश मिलने को भी राखी बाँधना समझा जाये? तो अन्य पुरुषों से राखी मिलने को क्या समझा जाये?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचपन में सोचते थे कि राखी तो भाई बहन के पवित्र बँधन का त्योहार है. कुछ बड़े हुए तो मालूम चला कि लड़के लड़कियाँ दोस्ती को छिपाने के लिए भी राखी बाँध कर भाई बहन बन सकते हैं. अब यह फेसबुकिया नये राखी वाले भाई बहन की एक नयी श्रेणी बन जायेगी. जिस इतालवी "फेसबुक मित्र" ने भी मुझे रक्षाबँधन के संदेश भेजे, सबको मैंने यही उत्तर दिया कि मेरा भाई या बहन बनने के लिए बहुत धन्यवाद. बस यह नहीं लिखा उन्हें कि रक्षाबँधन पर वचन क्या दे रहा हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िर इसी बात से सोचना शुरु किया कि आज की दुनिया में राखी जैसे त्योहार का क्या अर्थ है? युद्ध में जाते हुए भाई को राखी बाँधने वाली बहन उसकी मँगल कामना करती थी और भाई यह वचन देता था कि ज़रूरत पड़ने पर वह बहन की सहायता के लिए आयेगा. राखी भाई की रक्षा करेगी, और भाई बहन की रक्षा करेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Graphics on Rakhi designed by Sunil Deepak, 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/designs/rakhi.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;पर आज भाई युद्ध पर नहीं नौकरी पर जाते हैं, और बहने भी घर में नहीं बैठती, वे भी पढ़ने स्कूल व कोलिज जाती हैं, नौकरी करती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय समाज में बहन की रक्षा करने का अर्थ पितृपंथी समाज ने कई तरह से लगाया है जिसमें जाति और धर्म की रक्षा तथा नारी की शारीरिक पवित्रता की रक्षा की बाते जुड़ी हैं. बहन की रक्षा यानि परधर्मी उसकी इज़्ज़त न लूटें, वह परधर्मियों या जाति से बाहर लोगों से प्रेम या विवाह न करे, अगर वह ऐसा करती है तो उसे और उसके प्रेमी/पति को मार दिया जाये, शारीरिक इज़्ज़त खोने से तो मरना अच्छा है, पति न रहे तो सति होना अच्छा है, जैसी बहुत सी बातें "बहन की रक्षा" करने की बात से भी जुड़ी हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नारी या परिवार की इज़्ज़त बचाने लिए औरतों को मारने को "अस्मिता बचाने के खून" (Honour Killing) जैसे नाम दिये गये हैं. इसी वजह से बलात्कार की शिकार औरतों और लड़कियों को कहा जाता है कि अब तुमने अपनी इज़्ज़त खो दी, अब तुममें खोट हो गया, अब तुम बेकार हो गयी, अब तुम से कौन विवाह करेगा? यहाँ तक कि उस लड़की से कहा जाता है कि वह अपने बलात्कारी से ही विवाह कर ले.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद बड़े शहरों में रहने वाले सोचें कि यह सब तो पुरानी बाते हैं लेकिन मेरे विचार में गाँवों और पिछड़ी जगहों में ही नहीं, आज भी हमारे शहरों में इस तरह के विचार ज़िन्दा हैं, और इनमें अगर बदलाव आ रहा है तो बहुत धीरे धीरे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाकिस्तानी फ़िल्म "खामोश पानी" में ऐसी ही एक सिख नारी की कहानी थी जिसका पात्र भारतीय अभिनेत्री किरण खेर ने निभाया था, जिसे उसका परिवार पाकिस्तान में ही पीछे छोड़ आया थे. अमृता प्रीतम की कहानी पर बनी चन्द्र प्रकाश द्विवेदी की फ़िल्म "पिंजर" में भी कुछ इसी तरह की बात थी, जिसमें हिन्दु परिवार द्वारा त्यागी पूरो का पात्र अभिनेत्री उर्मिला मटोँडकर ने निभाया था. दोनो फ़िल्में भारत के विभाजन के समय की कहानी सुना रही थीं, लेकिन क्या इन साठ सालों में हमारे समाज की मानसिकता बदली है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िल्मों ही नहीं, अखबारों में भी इस तरह के समाचार आते ही रहते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे विचार में आज रक्षाबँधन पर भाईयों को विचार करना चाहिये कि अपनी बहनों का क्या वचन दें जिससे यह समाज, और समाज में नारियों की यह परिस्थिति बदल सके?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे किः "मेरी बहन, मैं वचन देता हूँ कि तुम्हे पढ़ने का, नौकरी करने का, मन पसंद साथी से प्यार और विवाह करने का मौका मिलेगा. वचन देता हूँ कि अगर तुम किसी वजह से पति के घर में सतायी जाओ तो तुम्हारा साथ दूँगा, संरक्षण दूँगा. कोई तुम पर ज़ोर लगाये कि बेटी पैदा करने के बजाया गर्भपात करो तो उसका विरोध करूँगा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर आप से पूछा जाये कि आज के वातावरण में भाईयों को रक्षाबँधन पर बहनो को क्या वचन देना चाहिये, तो आप क्या वचन देना चाहेंगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-2250723727644340638?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/2250723727644340638/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/08/blog-post_13.html#comment-form' title='18 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/2250723727644340638'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/2250723727644340638'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/08/blog-post_13.html' title='राखी का वचन'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-4881214921733875404</id><published>2011-08-12T07:30:00.002+02:00</published><updated>2011-08-12T07:30:41.881+02:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मानव अधिकार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सिनेमा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बौलीवुड'/><title type='text'>अधिकारों का आरक्षण</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;जब एक मानव अधिकार, किसी दूसरे के मानव अधिकार को प्रभावित करे, तो किस मानव अधिकार को महत्व और सरंक्षण मिलना चाहिये? श्री प्रकाश झा की नयी फ़िल्म "आरक्षण" पर हो रही बहसों के बारे में पढ़ कर मैं यही बात सोच रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बहस में है एक ओर फ़िल्म बनाने वालों की कलात्मक अभिव्यक्ति का अधिकार, अपनी बात कहने का अधिकार, और दूसरी ओर है, दलित शोषित मानव वर्ग की चिन्ता कि सवर्णों की कलात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर उन्हें फ़िर से नीचा दिखाने और संघर्षों से अर्ज़ित अधिकारों के विरुद्ध बात की जायेगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Poster of film - Aarakshan" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/films/aarakshan.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;कौन सा अधिकार सर्वोच्च माना जाया उसकी यह बहस नयी नहीं है और अन्य मानव गुट बहुत समय से इसका समाधान खोज रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे कि विकलाँग व्यक्तियों के अधिकारों तथा नारी अधिकारों की बात करने वाले गुटों की बहस.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नारी अधिकारों में गर्भपात का अधिकार भी है, जिसे कुछ देशों में बहुत कठिनायी से जीता गया है. इस अधिकार का अर्थ है कि गर्भ के पहले 18 से 20 सप्ताह में, अगर नारी किसी वजह से उस गर्भ को नहीं चाहती तो वह गर्भपात करवा सकती है. बहुत से देशों में यह अधिकार नहीं है. कैथोलिक धर्म नेताओं ने इस अधिकार का हमेशा विरोध किया है क्योंकि वह मानते हैं कि जीवन उसी क्षण से प्रारम्भ हो जाता है जब नर और नारी के अंश मिल कर गर्भ की शुरुआत करते हैं, इसलिए उनका मानना है कि नारी का गर्भपात का अधिकार, होने वाले बच्चे के जीवन के अधिकार के विरुद्ध है, और जीवन का अधिकार सर्वोच्च है. चाहे होने वाला बच्चा बलात्कार का परिणाम हो या यह मालूम हो कि बच्चा विकलाँग होगा, कैथोलिक धर्म नेता यही कहते हैं कि उसका जीवन अधिकार नहीं छीना जा सकता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विकलाँग व्यक्तियों के अधिकारों के लिए लड़ने वालों का कहना है कि यह मानना कि विकलाँग होने से किसी व्यक्ति को जीने का अधिकार नहीं, और उसे गर्भपात से मारने की अनुमति देना गलत है, विकलाँग बच्चों को भी पैदा होने का अधिकार है. वह नारियों के गर्भपात के अधिकार के विरुद्ध नहीं लेकिन कहते हैं कि यह गलत है कि केवल इस लिए गर्भपात किया जाये क्योंकि होने वाला बच्चा विकलाँग होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विकलाँग व्यक्तियों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले गुट भी टीवी, फ़िल्म आदि में विकलाँग व्यक्तियों के चित्रण के विरुद्ध लड़ते आये हैं. उनका कहना है कि अक्सर सिनेमा में विकलाँग व्यक्तियों को हास्यप्रद व्यक्ति बनाया जाता है जिसमें लोग उनकी विकलाँगता का मज़ाक उड़ाते हैं, उनके बारे में अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करते हैं, उनके पुरुष होने या स्त्री होने के मानव अधिकारों को नकारते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो प्रकाश झा की "आरक्षण" के बारे में हो रही बहस का क्या समाधान है? मेरे विचार में इसका समाधान बहस ही है, यानि फ़िल्म क्या कहती है, कैसे कहती है, हम उससे सहमत हैं या असहमत, इस पर सभ्यता से बहस करना.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कहना कि उसकी कहानी बदल दी जाये या उसके डायलाग बदल दिये जायें, यह नकारना है कि दुनिया में ऐसे व्यक्ति होते हें जो उस तरह का सोचते या बोलते हैं, और फ़िल्मकार की स्वतंत्रता पर रोक लगायी जाये कि कौन से पात्र चुने, कौन सी कहानी कहे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कहना कि फ़िल्में, कहानियाँ, उपन्यास, दलितों के विरुद्ध कुछ भी कहने से पहले इस व्यक्ति या उस कमिशन या इस दल की अनुमति लें का अर्थ हर नागरिक के अधिकारों का हनन है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाहे सवर्ण हो या दलित, मराठी हों या गुजराती या बँगाली, नर हो या नारी, अमीर हो या गरीब, हर समाज में कुछ लोग होते हैं जो बात चीत में नहीं बल्कि हिँसा में और तानाशाही में विश्वास रखते हैं. मुम्बई में जब शिवसैना के लोग किसी फ़िल्म को या किताब को या चित्रकला को बैन करने या नष्ट करने के लिए धमकी देते हैं वह लोग उन दलित नेताओं से किस तरह भिन्न हैं जो किसी फ़िल्म को या किताब को बैन करने की माँग करते हैं? किसी भी बात पर, लोगों को अपनी सहमती असहमती को न जताने देना, यह कहना कि बस मेरी बात मानिये, गणतंत्र का हिस्सा नहीं, तानाशाही का हिस्सा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन राज्यों ने फ़िल्म को प्रदर्शित होने से रोका है, मालूम है कि रोकने से केवल सिनेमा हाल में फ़िल्म रोकी जायेगी. इस रोक से बहुत से लोगों में फ़िल्म देखने की उत्सुकता बढ़ेगी और दूसरे तीसरे दिन ही पायरेटिक डीवीडी बाज़ार में मिल जायेंगी. जो लोग देखना चाहते हैं वह फ़िल्म तो देखेंगे, हाँ निर्माता निर्देशक को अवश्य आर्थिक नुकसान होगा, और डँडाराज की मानसिकता इसी से प्रसन्न होगी, कि कैसा पाठ पढ़ाया, अगली बार कोई हमारे सामने सिर नहीं उठायेगा. सवर्णों ने सदियों से यही किया है, डँडाराज के सहारे दलितों को दबाया है, जब मौका मिलता है तो दलित क्यों न वही हथियार उठायें?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-4881214921733875404?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/4881214921733875404/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/08/blog-post_12.html#comment-form' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/4881214921733875404'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/4881214921733875404'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/08/blog-post_12.html' title='अधिकारों का आरक्षण'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-2492574725832117293</id><published>2011-08-10T18:12:00.002+02:00</published><updated>2011-08-10T18:14:13.793+02:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सभ्यता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विज्ञान'/><title type='text'>दुनिया का स्वाद</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;एक ही वस्तु से विभिन्न लोगों के अनुभव भिन्न भिन्न होते हैं. जिस वस्तु से हमें आनन्द मिलता है, किसी अन्य को उसी से भय लग सकता है. किस वस्तु का कैसा अनुभव होगा, यह हमारी मनस्थति पर निर्भर करता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मान लीजिये कि आप एक सड़क पर जा रहे हैं, सड़क के दोनो ओर बहुत से वृक्ष लगे हैं. शीतल हवा चल रही है, पक्षी चहचहा रहे हैं. उस सड़क से गुज़रते हुए आप को क्या अनुभव होगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप की मनस्थिति कैसी होगी. अगर आप सैर को निकले हैं तो प्रसन्न हो कर शायद आप गीत गुनगुनाने लगें. अगर लम्बी यात्रा से चल कर आ रहे हैं, थके हुए हैं तो आप किसी बात पर ध्यान न दें, बस अपने टाँगों के दर्द और थकान  के बारे में सोचें. अगर आप ने नया जूता पहना जो पाँव को काट रहा है तो आप का सारा ध्यान अपने पैरों की ओर हो सकता है. अगर आप को नया नया प्यार हुआ है और आप के आगे आप की प्रेयसी अपनी सहेलियों के साथ जा रही है, तो शायद आप यही सोच रहे हों कि कैसे उससे अकेले में बात कर सकें, उस सड़क का अन्य कुछ आप को नहीं दिखता. अगर किसी प्रियजन के शव के पीछे पीछे शमशान घाट जा रहे हों, तो हृदय दुख से भरा होगा. अगर किसी को मिलने का समय दिया हो और देर हो गयी हो, तो जल्दी जल्दी में होंगे. यानि इन सब मनोस्थितियों में उसी सड़क का अनुभव आप को अलग अलग तरह से होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनस्थिति के हिसाब से हमारे देखने, सुनने, छूने, सूँघने या स्वाद में फ़र्क आये, इस बात को समझना आसान है. लेकिन क्या हमारी इन्द्रियों पर हमारी सभ्यता, पढ़ायी, सामाजिक स्थिति आदि का भी प्रभाव पड़ता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ्राँस के सामाजिक शास्त्री, मानव व्यवहार शास्त्र के विषशज्ञ तथा लेखक श्री दाविद ल ब्रेतों (David Le Breton) ने अपनी किताब "दुनिया का स्वाद" (La saveur du Monde - une anthropologie des sens, 2006) में इसी प्रश्न पर लिखा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनका कहना है कि पहले श्रवण यानि सुनने को ऊँचा स्थान दिया जाता था लेकिन आज की पश्चिमी दुनिया में दृष्टि का स्थान सर्वोच्च हो गया है, जिसके सामने बाकी सब इन्द्रियों का महत्व कम हो गया है. यानि कि हम जो भी अनुभव करते हें उसमें हमारा दिमाग दृष्टि से मिलने वाली सूचनाओं को अधिक ध्यान देता है, बाकी सब सूचनाओं को उतना ध्यान नहीं देता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी किताब में उन्होंने इसका एक उदाहरण धरती के उत्तरी ध्रुव के पास बर्फ़ में रहने वाली जातियों के जीवन से दिया है. वह कहते हैं कि जहाँ सब कुछ बर्फ़ से ढका हो, यूरोप से आने वाले आगुंतक के लिए यह समझना बहुत कठिन है कि कौन सी दिशा से जाना चाहिये, क्योंकि वह दृष्टि पर अधिक निर्भर है, जबकि वहाँ के रहने वाले, दृष्टि पर बहुत कम निर्भर करते हैं बल्कि बाकी इन्द्रियों पर अधिक ध्यान देते हैं. इस तरह से जब वहाँ के रहने वाले, बर्फ़ में, या अँधेरे में भी, जानते हैं कि किस दिशा में जाना चाहिये तो यूरोप से आये लोग हैरान रह जाते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img 2011"="" alt="Graphic design " by="" deepak,="" s.="" senses"="" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/designs/senses.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;श्री ल ब्रेतों का यह भी कहना है कि टेलीविजन, इंटरनेट आदि की वजह से आधुनिक मानव के जीवन में दृष्टि का महत्व और भी बढ़ता जा रहा है. दृष्टि के बाद स्थान आता है सुनने का, पर शहरों में रहने वाले अधिकाँश लोग आसपास में वातावरण में होने वाली ध्वनियों को नहीं सुन पाते, यानि सुनते हैं लेकिन बता नहीं पाते कि क्या सुना. दृष्टि के बाद स्थान आता है स्वाद का, पर यह भी कम हो रहा है.  आधुनिक मानव में छूना यानि स्पर्श और सूँघने की शक्ति में सबसे अधिक कमज़ोरी आयी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह मानते हैं कि इन्द्रियाँ दिमाग के काबू में हैं और जिस तरह से दिमाग का विकास होता है, वही तय करता है कि उस मानस में कौन सी इन्द्री का महत्व अधिक होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री ल ब्रेतों भारत या पूर्वी देशों की बात नहीं करते लेकिन भारतीय दर्शन में "विश्व माया है" का विचार महत्वपूर्ण जिसमें इन्द्रियों की तुलना घोड़ों से की गयी है जिन्हें मस्तिष्क के सारथी द्वारा काबू में रखने की बात होती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैनोपानिषद में इन्द्रियों की बात करते हुए एक एक इन्द्री के काम का वर्णन है और हर एक के बारे में यही प्रश्न उठता है कि ध्वनि, दृष्टि, स्वाद, स्पर्श आदि जो अनुभव कराते हैं उसे अनुभव करने वाला मानव शरीर के अन्दर कौन है? इसका हर बार एक ही उत्तर है कि वही आत्मा ही ब्राह्मण यानि जगत संज्ञा है, वही परमेश्वर है न कि वे देवी देवता जिनकी पूजा की जाती है. कैनोपानिषद के इस हिस्से की पहली ऋचा ध्वनि पर हैः&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;यदाचानुभ्युदितं येन वागभ्युद्यते !&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;तदेव ब्रह्मा त्वं नेदं यदिदमुपासते ॥&lt;/blockquote&gt;तो क्या इसका यह अर्थ लगाया जाये कि प्राचीन भारत में स्वर को यानि श्रवण इन्द्री को सबसे अधिक महत्व दिया जाता था? कैनोपानिषद में दिमाग को भी इन्द्रियों का हिस्सा माना गया है, यानि जिस दिमाग से हम सोचते हैं, कि हमारी इन्द्रियों ने हमें क्या अनुभव दिया, वह भी एक इन्द्री है, तथा हमारे प्राण यानि श्वास भी एक इन्द्री हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह से प्राचीन भारतीय दर्शन श्री ल ब्रेतों की सोच से भिन्न है. लेकिन अगर भारतीय दर्शन की बात को छोड़ कर श्री ल ब्रेतों की दृष्टि से देखने की कोशिश करें तो क्या भारतीय मानस के इन्द्रियों द्वारा जगत अनुभव करने में कौन सी इन्द्री का अधिक महत्व है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या भारत के लोग, सभी इन्द्रियों को एक सा महत्व देते हैं और उनका समन्वय करके जगत को समझते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या टेलीविज़न, फ़िल्मों, इंटरनेट के साथ साथ, भारतीय जगत अनुभव भी दृष्टि को ही सबसे अधिक महत्व दे रहा है? आप का क्या विचार है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-2492574725832117293?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/2492574725832117293/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/08/blog-post_10.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/2492574725832117293'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/2492574725832117293'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/08/blog-post_10.html' title='दुनिया का स्वाद'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-2902091598340801057</id><published>2011-08-08T11:58:00.005+02:00</published><updated>2011-08-08T12:33:41.220+02:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यादें'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सिनेमा'/><title type='text'>चालिस साल बाद</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;1965 में आयी थी राजेन्द्र कुमार, साधना, फिरोज़ खान और नाज़िमा की फ़िल्म "&lt;b&gt;आरज़ू&lt;/b&gt;", जिसके निर्देशक थे &lt;b&gt;रामानन्द सागर&lt;/b&gt;. तब दिल्ली के इंडिया गेट पर अमर जीवन ज्योति का सैनिक स्मारक नहीं बना था और रानी विक्टोरिया की मूर्ति भी वहीं पर स्थापित थी. तब दिल्ली में कारें भी बहुत कम थीं, साइकल पर बाहर घूमने जाना न तो नीचा माना जाता था, और न ही उससे दिल्ली की सड़कों पर आप की जान को खतरा होता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब जँगली, कश्मीर की कली, जब प्यार किसी से होता है, जैसी फ़िल्मों में गाने कश्मीर में फ़िल्माये जाते थे, जहाँ हीरो हीरोइन का प्रेम मिलन दो फ़ूलों को एक दूसरे से टकरा कर दिखाते थे. उन दिनों में इंडियन एयरलाईंस की एयर होस्टेस हल्के नीले रंग के बोर्डर वाली साड़ी पहनती थीं और हवाई अड्डे खुले मैदान जैसे होते हैं बस उसकी बाऊँडरी के आसपास काँटों वाला तार लगा होता था. तब चित्रकार बड़े बड़े बोर्डों पर फ़िल्म के दृश्य बनाते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे ही किसी बोर्ड पर हमने भी "आरज़ू" फ़िल्म का दृश्य बना देखा था जिसमें &lt;b&gt;राजेन्द्र कुमार&lt;/b&gt; जी पहाड़ पर बर्फ़ में स्कीइंग कर रहे थे, और जिसने हमारा मन मोह लिया था. खूब ज़िद की हमने घर में कि हम यह फ़िल्म अवश्य देखेंगे. खैर जब तक फ़िल्म देखने का कार्यक्रम बना, फ़िल्म को आये छः सात महीने अवश्य हो चुके थे, उसकी गोल्डन जुबली मनायी जा चुकी थी, और उसे देखने हम लोग तीस हज़ारी के पास एक सिनेमा हाल में गये थे जिसका नाम शायद नोवल्टी था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंगीन फ़िल्म, बर्फ़ के सुन्दर नज़ारे, राजेन्द्र कुमार की स्कीइंग और त्याग, फ़िरोज़ खान की दोस्ती, साधना का रोना और अपना पाँव काटने की कोशिश करना, नाज़िमा की चीखें, नज़ीर हुसैन का रोते हुए कहना "बेटी, अपने खानदान की इज़्ज़त अब तुम्हारे हाथ में है", वाह! फ़िल्म की कहानी, डायलाग, गाने सब कुछ बहुत अच्छा लगा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चालिस साल बीतने के बाद भी "आरज़ू" फ़िल्म की याद मन में थी, इसलिए पिछली भारत यात्रा में जब एक दुकान में फ़िल्म की डीवीडी देखी तो रुका नहीं गया, सोचा कि पुरानी यादों को ताज़ा करने के लिए फ़िल्म को दोबारा देखना चाहिये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िल्म के पहले ही दृश्य में राजेन्द्र कमार को साइकल पर &lt;b&gt;इंडियागेट&lt;/b&gt; में जहाँ अब अमर जवान ज़्योति है, वहाँ से बीच में से गुज़रते देखा, तो दिल्ली के भूले हुए दिन याद आ गये, पर साथ ही लगा कि चालिस साल के बाद भी हिन्दी फ़िल्मों में एक बात नहीं बदली. यानि कि चाहे आप एयरपोर्ट से आ रहे हों, वैसे ही बाहर घूम रहे हों, या काम पर जा रहे हों, कुछ भी हो, फ़िल्म में वह सड़क इन्डिया गेट, लाल किला और कुतुब मिनार के सामने से अवश्य गुज़रती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजेन्द्र कुमार को कालिज का परिणाम पाने वाला दृष्य देखा और जब उनकी माँ बोली कि बेटा तुमने मेडिकल कोलिज में फर्स्ट कलास में सबसे अव्वल नम्बर पाये हैं तो भी यही ख्याल आया कि चालिस साल बाद यह भी नहीं बदला कि हमारे 35 या 40 साल के हीरो अभी भी कोलिज में पढ़ते हैं और कालिज के अन्य लड़के लड़कियों के बाप जैसे लगते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हीरो हीरोइन कई दिनों तक मिलते हैं, उनमें प्रेम होता जाता है लेकिन हीरोइन को न हीरो का नाम मालूम होता है न उसका पता. फ़िर संयोग से हीरोइन की सगाई हीरो के करीबी मित्र से हो जाती है और संयोग से ही हीरोइन हीरो की बहन से साथ पढ़ती है. इस तरह की संयोग वाली अविश्वस्नीय बातें भी इन चालिस सालों में हिन्दी सिनेमा में नहीं बदलीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन किसी किसी बात में बदलाव आया है. जैसे कि राजेन्द्र कुमार की स्कीइंग का दृश्य देखा तो हँसी आ गयी कि चालिस साल पहले यह किस तरह से ग्लेमरस लगा था! कश्मीर में इस तरह की&amp;nbsp;फ़िल्म बनाना तो कई दशकों से बन्द हो गया है और अब कश्मीर में केवल आतंकवाद या मिलेट्री वाली फ़िल्में ही बनती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजेन्द्र कुमार का अपनी प्रेमिका की सहेली सलमा के पिता हकीम साहब बन कर उसके घर जाने के दृष्य को देख कर लगा कि पहले उर्दू शेरो-शायरी की बात जितनी सहजता से कहानी में जोड़ दी जाती थी, वह अब नहीं होती. उससे एक साल पहले 1964 में राजेन्द्र कुमार और साधना की फ़िल्म "&lt;b&gt;मेरे महबूब&lt;/b&gt;" बहुत हिट हुई थी, शायद आरज़ू फ़िल्म का यह सारा हिस्सा उसी की प्रेरणा से इस फ़िल्म में जोड़ दिया गया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इतने सालों के बाद भी फ़िल्म के गानो को सुन कर लगा मानो मैं अभी वही लड़का हूँ जो इस फ़िल्म को देखने गया था -&lt;br /&gt;&lt;ul style="text-align: left;"&gt;&lt;li&gt;अजी रूठ कर अब कहाँ जाईयेगा, जहाँ जाईयेगा हमें पाईयेगा&lt;/li&gt;&lt;li&gt;ऐ नरगिसे मस्ताना बस इतनी शिकायत है&lt;/li&gt;&lt;li&gt;छलके तेरी आँखों से शराब और भी ज़्यादा&lt;/li&gt;&lt;li&gt;ऐ फ़ूलों की रानी, बहारों की मल्लिका, तेरा मुस्कुराना गज़ब ढा गया&lt;/li&gt;&lt;li&gt;बेदर्दी बाल्मा तुझको मेरा मन याद करता है&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;शंकर जयकिशन के संगीत से सजे गानों में आज भी वही नशा है जो चालिस साल पहले होता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुरानी यादों को ताज़ा करते हुए, "आरज़ू" के कुछ दृष्य प्रस्तुत हैं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;श्रीनगर हवाईअड्डा और एयर इंडिया की एयर होस्टेस&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Arzoo by Ramanand Sagar, India, 1965" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/films/arzoo_01.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;हीरो का भेष बदल कर हीरोइन के घर आना&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Arzoo by Ramanand Sagar, India, 1965" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/films/arzoo_02.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;संयोग से हीरोइन की बहन ने देखा कि उसकी सहेली के पास उसके भाई की तस्वीर थी&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Arzoo by Ramanand Sagar, India, 1965" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/films/arzoo_03.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;धूमल और महमूद की कामेडी&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Arzoo by Ramanand Sagar, India, 1965" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/films/arzoo_04.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;हीरोइन का अपना पैर काटने का बलिदान&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;(अगर वह लकड़ी काटने वाली मशीन के करीब ही बैठ जाती तो आप के दिल की धड़कन कैसे बढ़ती?)&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Arzoo by Ramanand Sagar, India, 1965" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/films/arzoo_05.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-2902091598340801057?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/2902091598340801057/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/08/blog-post.html#comment-form' title='17 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/2902091598340801057'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/2902091598340801057'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='चालिस साल बाद'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-850469277277600601</id><published>2011-07-17T09:43:00.000+02:00</published><updated>2011-07-17T09:43:11.684+02:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत'/><title type='text'>संदेश किसके लिए है?</title><content type='html'>"तो कैसी लगी फ़िल्म?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िल्म समाप्त होने पर मैंने अपनी मित्र से पूछा तो उसने मुँह बना दिया था. फ़िर कुछ देर सोच कर बोली थी, "यह फ़िल्म शायद विदेशियों के लिए बनायी गयी है, विदेशों में दिखाने के लिए. यहाँ भारत में इसे शहरों में रहने वाले पैसे वाले लोग देखें जिन्हें अपने देश में गाँव में कैसे रहते हैं यह मालूम नहीं. सचमुच की समस्याएँ क्या हैं गरीबों की, किस तरह इस व्यवस्था में शोषित होते हैं लोग, यह नहीं दिखाना चाहते इस फ़िल्मवाले. गरीबी की पोर्नोग्राफ़ी है, उसे रूमानी बना कर बेचने का ध्येय है उनका. ताकि दया दान देने वाले विदेशी और पैसे वाले मन ही मन खुश हो सकें कि उनकी दया से किसी बच्चे की ज़िन्दगी सुधर गयी, पर इससे व्यवस्था को बदलने के लिए कोई नहीं कहे."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िल्म का नाम था "आई एम कलाम" (&lt;b&gt;I am Kalam&lt;/b&gt;) जिसे बँगलौर की &lt;a href="http://smilefoundationindia.org/" target="_blank"&gt;स्माईल फाउँडेशन&lt;/a&gt; ने निर्मित किया है. मेरी मित्र की आलोचना बिल्कुल गलत तो नहीं थी, पर शायद पूरी भी नहीं थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="I am Kalam by Smile Foundation" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/kalam_02.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इस फ़िल्म की कहानी सचमुच की गरीबी या सच की कहानी नहीं है, बल्कि बच्चों के लिए लिखी परियों की कथा जैसी है. फ़िल्म में  एक राजकुँवर और ढ़ाबे में काम करने वाले गरीब बच्चे में बराबर की दोस्ती की है, और अंत में पुराने विचारों वाले राजा साहब द्वारा गरीब बच्चे को मान देने का सपना है. कुछ दृष्यों को छोड़ कर जिनमें बचपन में ढ़ाबे और रेस्टोरेंटों में काम करने वाले बच्चों के कड़वे सच दिखते हैं, बाकी सारी फ़िल्म में रेगिस्तान के मनोरम दृष्य, रंगीन पौशाकें, समझदार विदेशी लड़कियाँ, दयावान प्रेमी ढ़ाबेवाला, ऊँठ पर बैठ कर चाय बाँटनेवाला और मन लुभाने वाला गरीब लेकिन सुंदर बच्चा दिखता है. यानि मेरी मित्र की दृष्टि में "रुमानी गरीबी".&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मेरी मित्र की आलोचना मुझे कुछ अधिक कठोर लगी. मैंने सोचा कि सच को इस तरह कहना कि उसे अधिक लोग देख सकें, क्या गलत बात है? अगर सचमुच की गरीबी दिखानी वाली डाकूमैंटरी या कला फ़िल्म होती तो कितने लोग देखते और क्या गरीबी दिखाने वाली डाकूमैंटरियों की कमी है भारत में? जिन लोगों को गरीब बच्चों के जीवन के कड़वे सच मालूम हैं वे इस बारे में लिखते हैं, सेमीनार करते हैं, डाकूमैंट्री फ़िल्में बनाते हैं और देखते हैं. जिन्हें नहीं मालूम या जिनके पास अपने जीवन से बाहर देखने के फुरसत ही नहीं हैं, उनके पास यह सेमीनार, आलेख और डाकूमैंट्री कहाँ पहुँचती हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ इसी तरह की बात उठी थी जब &lt;b&gt;अमोल पालेकर&lt;/b&gt; की फ़िल्म "&lt;b&gt;पहेली&lt;/b&gt;" देखी थी. उसमें बात थी नारी के अधिकारों की, लेकिन इस तरह से कही गयी थी कि रानी मुखर्जी के रंगों और शाहरुख जैसे प्रेमी भूत की परतों के नीचे दबी हुई, वह भी शायद "रुमानी नारी अधिकारों" की बात थी. पर कम से कम उसे उन लोगों ने देखा तो था जिनको नारी अधिकारों के बारे में जानने और सोचने की आवश्यकता थी. वैसे तो "पहेली" को भी बहुत अधिक व्यवसायिक सफ़लता नहीं मिली थी, लेकिन उसी कहानी पर बनी मणि कौल की "दुविधा" को कितने लोगों ने देखा था?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्सर मेरे विचार में बहुत से बुद्धिजीवियों को विश्वास नहीं होता कि अगर कोई बात बिना चीख चिल्ला कर या भाषण की तरह नहीं कही जाये तो लोग उसे समझेंगे. अगर बात को भाषण की तरह बार बार न दोहराया जाये और कहानी का हिस्सा बना कर इस तरह रखा जाये कि तुरंत स्पष्ट न हो लेकिन धीरे धीरे मन को सोचने के लिए प्रेरित करे तो उसे वह प्रभावशाली नहीं मानते. ऐसे लोगों से दुनिया भरी हुई है जो "क्मप्रोमाईज़" नहीं करना चाहते हैं, कहते हैं कि जीवन के कड़वे सचों को उनकी पूरी कड़वाहट के साथ ही दिखाना चाहिये. पर जब सच इतने कड़वे होते हें कि कोई उन्हें देख ही नहीं पाये तो उसे कौन देखता है? वही लोग देखते हैं जिन्हें इस सब के बारे में पहले से मालूम है, पर जिन्हें इस चेतना की आवश्यकता है वे लोग क्या देखते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे "&lt;b&gt;आई एम कलाम&lt;/b&gt;" बहुत अच्छी लगी, आप को भी मौका मिले तो अवश्य देखियेगा. देख कर आप को सचमुच की गरीबी क्या होती है शायद उसकी समझ नहीं आयेगी, लेकिन देख कर अगर आप एक दिन के लिए भी अपने घर में काम करने वाले नाबालिग नौकर या ढाबे रेंस्टोरेंट में वेटर या बर्तन धोने का काम करने वाले बच्चे के कठोर जीवन के बारे में सोचेंगे तो क्या यह कम है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="I am Kalam by Smile Foundation" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/kalam_01.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;एक अन्य बात भी है, वह है देखने वाले को बुद्धिमान और व्यस्क समझने की. मुझे लगता है कि "कड़वा सच" दिखाने की ज़िद करने वाले लोगों में अक्सर यह सोच होती है कि जिस तरह हममें इस सच की समझ है, वह अन्य लोगों में नहीं और जब तक उसे बार बार कह कर, दिखा कर, जबरदस्ती कड़वी दवा की तरह लोगों को पिलाया नहीं जायेगा, तब तक उनकी समझ में नहीं आयेगा. जबकि मैं मानता हूँ कि कभी कभी कड़वे सच को सांकेतिक रूप में दिखाने से, बुद्धीमान दर्शक को मौका मिलता है कि वह उसे अपनी दृष्टि से अपने आप समझ सके.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रही बात उन लोगों की जिन्हें सांकेतिक बात समझ नहीं आती, उन्हें कड़वे सच को जिस तरह भी कह लीजिये, वह उसे देखने से या समझने से इन्कार कर देंगे, तो उनकी चिंता करना शायद व्यर्थ ही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे कहने का यह अभिप्राय नहीं है कि सामाजिक समस्याओं और कड़वे सचों पर सभी कला अभिव्यक्ति केवल रंगीन, रूमानी तरीके से ही हो सकती है या होनी चाहिये. मणि कौल के सिनेमा अभिव्यक्ति के अंदाज़ में अपनी सुन्दरता थी, जो अमोल पालेकर की "पहेली" की सुन्दरता से भिन्न थी. कलात्मक अभिव्यक्ति के हर क्षेत्र में विभिन्नता आवश्यक है. लेकिन मेरा सोचना है कि अगर किसी कला का उद्देश्य जन सामान्य तक पहुँच कर उनको समझाना या जानकारी देना हैं, तो संदेश को उस भाषा में कहना बेहतर है जो जन सामान्य को समझ आ सके.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो महीने पहले विश्व स्वास्थ्य संस्थान (World Health Organisation) की वार्षिक एसेम्बली में जेनेवा गया था तो वहाँ एक हाल में तम्बाकू और सिगरेट प्रयोग के बारे में बड़े बड़े विज्ञापन लगे थे, जिसमें इन पदार्थों के प्रयोग से शरीर पर होने वाले प्रभावों को इस खूबी से दिखाया गया था कि उन तस्वीरों की ओर ठीक से देखने पर जी मिचलाने लगा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="WHO poster on tobacco use" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/who_tobacco_ad_01.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="WHO poster on tobacco use" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/who_tobacco_ad_02.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;तब भी मेरे मन में यही बात आयी थी कि तम्बाकू और सिगरेट बेचने वाली कम्पनियाँ अपना प्रचार करने के लिए जाने माने सुन्दर लोगों और जगहों का उपयोग करती हैं. उससे लड़ने के लिए, यह तो ठीक है कि इन पदार्थों के डिब्बों पर इस तरह की फोटो लगाई लगाई जानी चाहिये जिनसे इनका उपयोग करने वाले लोगों में वितृष्णा हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अगर जन सामान्य को संदेश देना हो, या नवजवानों और किशोरों को संदेश देना है, और उसके लिए इस तरह की वीभत्स तस्वीरों का प्रयोग होगा तो मुझे लगता है कि अधिकतर लोग उन्हें ध्यान से नहीं देखना चाहेंगे न ही इस तरह की तस्वीरों के पास क्या लिखा है उसे पढ़ना चाहेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिगरेट और तम्बाकू का प्रयोग शरीर के लिए हानिकारक है और जन सामान्य में उसके खतरों की जानकारी देना आवश्यक है. पर यह संदेश किस तरह की भाषा में, किस तरह की तस्वीरों के साथ, किस तरह से दिया जाना चाहिये, ताकि नवयुवकों और किशोरों पर असरकारी हो सके? रुमानी बनाके, ताकि अधिक लोग उसे देखें या फ़िर कड़वे सच को उसकी सच्चाई के साथ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और जन सामान्य में गरीब बच्चों के साथ होने वाले अमानवीय वर्ताव के बारे में सँचेतना जगानी हो, तो उसमें "आई एम कलाम" या "चिल्लर पार्टी" जैसी हँसी खुशी वाली फ़िल्मों का कोई स्थान है या गम्भीर विषयों पर केवल गम्भीर फ़िल्में ही बननी चाहिये?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप क्या सोचते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-850469277277600601?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/850469277277600601/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/07/blog-post_17.html#comment-form' title='12 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/850469277277600601'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/850469277277600601'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/07/blog-post_17.html' title='संदेश किसके लिए है?'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-588721170619785201</id><published>2011-07-11T10:10:00.000+02:00</published><updated>2011-07-11T10:10:31.713+02:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इतिहास'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विश्व'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कला'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सभ्यता'/><title type='text'>सभ्यता का मूल्य</title><content type='html'>"संग्रहालय के मूल्य को केवल खर्चे और फायदे में मापना गलत है, उसकी कीमत को मापने के लिए उसके उद्देश्य को मापिये. उसका उद्देश्य है जनता को नागरिक बनाना." यह बात कह रहे थे रोम के &lt;a href="http://mv.vatican.va/3_EN/pages/MV_Home.html" target="_blank"&gt;वेटीकेन संग्रहालय&lt;/a&gt; के निर्देशक श्री &lt;b&gt;अन्तोनियो पाउलूच्ची&lt;/b&gt; (Antonio Paolucci). &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री पाउलूच्ची इन दो शब्दों, जनता और नागरिक, को विषेश अर्थ देते हैं. "जनता" यानि एक जगह पर रहने वाले लोग और "नागरिक" यानि वह लोग जो अपने अधिकारों और कर्तव्यों को समझते हैं, जिनके लिए जीवन में सभ्य होने का महत्व हो, जिनमें अपनी कला, संगीत, लेखन, शिल्प को जानने की समझ हो. लेकिन आज के भूमण्डलिकृत जगत में जहाँ पूँजीवाद के आदर्शों से स्वास्थ्य, शिक्षा, आदि जनकल्याण सेवाओं को मापते हैं, सभ्यता के मापदँड भी अधिकतर खर्चे और फायदे में गिने जाते हैं. उसे नागरिक अधिकार मानना कोई कोई विरला शहर ही कर पाता है, जैसे कि लंदन जहाँ सभी संग्रहालय मुफ्त हैं, अपनी कला और सभ्यता को जानने के लिए आप को कोई टिकट नहीं खरीदना पड़ता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं श्री पाउलूच्ची की बात से सहमत हूँ कि अपनी कला, संस्कृति को बाज़ार के मापदँड से नहीं, सभ्यता के मादँड से तौलना चाहिये. पर यही काफ़ी नहीं. साथ ही, मुझे यह भी लगता है कि कला और सभ्यता की बातों को विषेशज्ञों के बनाये पिँजरों से बाहर निकाल कर जनसामान्य के लिए समझने लायक बनाया जाये. वह कहते हैं कि कला सँग्रहालयों को मैनेजरों की नहीं, कला को समझने वाले निर्देशकों की आवश्यकता है, जो नफ़े नुक्सान की बातों से ऊपर उठ सकें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बदलते परिवेश में पर्यटक बदल गये हैं जिसके बारे में पाउलूच्ची कहते हैं, "आज कल चार्टर उड़ानों से अलग अलग देशों के बहुत से पर्यटकों के गुट आते हैं. उनके पास रोम घूमने के लिए एक ही दिन होता है, जिसमें से वह लोग एक डेढ़ घँटा वेटीकेन संग्रहालय को देखने के लिए रखते हैं. उनके पास संग्रहालय के अमूल्य चित्रों या शिल्पों की कोई कीमत नहीं, क्योंकि उनके पास कुछ देखने का समय नहीं है. उन्हें देखना होता है केवल सिस्टीन चेपल में माईकल एँजेलो की कलाकृति को. वह लोग संग्रहालय में भागते हुए घुसते हैं, सिस्टीन चेपल देख कर, सेंट पीटर के गिरजाघर की ओर भागते है. फ़िर  कोलोसियम देखो, त्रेवी का फुव्वारा देखो, स्पेनी सीढ़ियाँ देखो, बस रोम हो गया. अब बारी है अगले शहर जाने की."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सच है कि विदेश घूमते हुए थोड़े दिनों की छुट्टियाँ होती हैं, रहने घूमने के खर्चे भी भारी होते हैं. तो बस यही चिन्ता रहती है कि कैसे जानी मानी प्रसिद्ध चीज़ें देखीं जायें. बाकी सबको देखना समझना मुमकिन नहीं होता. मेरे विचार में असली प्रश्न है कि जिन शहरों में हम रहते हैं क्या वहाँ के इतिहास को जानते समझते हैं, वहाँ के कला संग्रहालयों को देखने का समय होता है हमारे पास? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब बात संग्रहालयों की हो रही हो तो कला और शिल्प को कैसे जाना और समझा जाये, इसकी बात करना उतना ही आवश्यक है. और मेरे विचार में इस बात को खर्चे और फायदे की बात करने वाले मैनेजरों ने भी समझा है, चाहे वह अपने स्वार्थवश ही समझा हो. यानि पैसे बनाने के लिए, कला और सभ्यता का भला करने के लिए नहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचपन में स्कूल के साथ कभी दिल्ली के कुछ संग्रहालयों को देखने का मौका मिला था, लेकिन सामने गुज़रने भर से क्या समझ में आता? कोई बताने समझाने वाला नहीं था. कुछ साल पहले एक बार इंडियागेट के पास पुरात्तव संग्रहालय में गया था लेकिन तब भी वहाँ संग्रहालय की विभिन्न कलाकृतियों को समझने के लिए कोई गाइड या किताब आदि नहीं थे. वहाँ जो कुछ देखा उसका हमारे समाज और संस्कृति के लिए क्या अर्थ था? हमारी संस्कृति में क्या स्थान था उस पुरात्तव इतिहास का, यह सब समझने की कोई जगह नहीं थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब विभिन्न देशों में घूमने का मौका मिला तो भी शुरु शुरु में समझ नहीं थी कि कला, इतिहास या पुरात्तव को उसकी सन्दरता देखने के अतिरिक्त, और गहराई से जानना और समझना भी दिलचस्प हो सकता था. वाशिंगटन का आधुनिक कला का संग्रहालय, अमस्टरडाम का वान गोग संग्रहालय, लंदन की टेट गेलरी, जैसे जगहें देखीं पर तब बात वहीं तक जा कर रुक जाती थी कि कौन सी कलाकृति देखने में अच्छी लगती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िर एक बार मेरे मन में कुछ आया और मैंने "खुले विश्वविद्यालय" के "कला को कैसे समझा जाये" के कोर्स में अपना नाम लिखवा लिया. इस कोर्स की कक्षाएँ रात को होती थी. दिन भर काम के बाद रात को कक्षा जाने में नींद बहुत आती थी. कई बार मैं कक्षा में ही सो गया. फिर भी, उस कोर्स का कुछ फ़ायदा हुआ. यह समझ आने लगी कि कला को समझने के लिए उसके कलाकार को और जिस परिवेश में उस कलाकार ने जिया और वह कृति बनायी, उसे समझना उतना ही आवश्यक है. समझ आने लगा कि संग्राहलय में जो देखो, उसकी सुन्दरता के साथ साथ, उसके बारे में भी जानो और समझो, तो संग्रहालयों से किताबे खरीदना प्रारम्भ किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दस वर्षों में इंटरनेट के माध्यम से संग्रहालय, कला और शिल्प को समझने के अन्य बहुत से रास्ते खुल गये हैं. जब भी किसी नये संग्रहालय में जाने का मौका मिलता है तो पहले उसके बारे में, वहाँ की प्रसिद्ध कलाकृतियों के बारे में पढ़ने की कोशिश करता हूँ. वहाँ जा कर जो कुछ अच्छा लगता है उसकी बहुत सी तस्वीरें खींचता हूँ. घर वापस आ कर, उन तस्वीरों के माध्यम से कलाकृतियों और कलाकारों के बारे में जानने की कोशिश करता हूँ. कई बार इस तरह से उन कलाकृतियों के बारे में मन में और जानने समझने की इच्छा जागती है तो वापस संग्रहालय जा कर उन्हें दोबारा देखने जाता हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद यही वजह है कि आजकल दुनिया के बहुत से आधुनिक संग्रहालयों में तस्वीर खींचने से कोई मना नहीं करता, बस फ्लैश का उपयोग निषेध होता है. पहले लोग सोचते थे कि संग्रहालय की हर वस्तु को गुप्त रखना चाहिये, तभी लोग आयेंगे.&amp;nbsp;संग्रहालय&amp;nbsp;चलाने वाले लोग सोचते थे कि अगर लोग तस्वीर खींच लेंगे तो उनके मित्र तस्वीरें देख कर ही खुश हो जायेंगे, संग्रहालय नहीं आयेंगे.  इसलिए वहाँ फोटो खींचने की मनाई होती थी. तस्वीरें, कार्ड आदि कुछ भी हो, उसे आप केवल संग्रहालय की दुकान से मँहगा खरीद सकते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज के संग्रहालयों को समझ आ गया है कि जो लोग वहाँ घूमते हुए तस्वीरें खींचते हैं, वही लोग बाद में उन्हें फेसबुक, फिल्क्र, चिट्ठों आदि के द्वारा अपने मित्रों व अन्य लोगों में उस संग्रहालय का मुफ्त में विज्ञापन करते हैं. जितनी तस्वीरें अधिक खींची जाती हैं, उतना विज्ञापन&amp;nbsp;अधिक&amp;nbsp;होता है, और अधिक लोग वहाँ जाने लगते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पैसा कमाने के लिए संग्रहालयों को नये तरीके समझ में आये हैं, जैसे कि विभिन्न कलाकारों की कला को समझने के लिए उसके बारे में किताबें, पोस्टर, प्रिंट आदि और संग्रहालय में बने काफ़ी हाउस, बियर घर और रेस्टोरेंट.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सच है कि ग्रुप यात्रा में निकले लोगों के पास समय कम होता है, बस कुछ महत्वपूर्ण चीज़ों को ही देख सकते हैं. लेकिन मेरे विचार में ग्रुप यात्रा के बढ़ने के साथ साथ, दुनिया में कला को अधिक गहराई से समझने वाले भी बढ़ रहे हैं, जो अब इंटरनेट के माध्यम से कला और इतिहास को इस तरह समझ सकते हैं जैसे पहले मानव इतिहास में कभी संभव नहीं था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका एक उदाहरण है दिल्ली के पुरात्तव संग्रहालय में मोहनजोदारो और हड़प्पा से मिली प्राचीन मुद्राएँ. जब उन्हें देखा था तो वह मुद्राएँ केवल छोटे मिट्टी के टुकड़े जैसी दिखी थीं, उनमें कुछ दिलचस्प भी हो सकता है, यह समझ नहीं आया था. आज टेड वीडियो पर प्रोफेसर राजेश राव का यह वीडियो देखिये. उन मुद्राओं को देख कर उन्हें समझने की उत्सुकता अपने आप बन जाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;object height="326" width="446"&gt;&lt;param name="movie" value="http://video.ted.com/assets/player/swf/EmbedPlayer.swf"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true" /&gt;&lt;param name="allowScriptAccess" value="always"/&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="bgColor" value="#ffffff"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="flashvars" value="vu=http://video.ted.com/talk/stream/2011/Blank/RajeshRao_2011-320k.mp4&amp;su=http://images.ted.com/images/ted/tedindex/embed-posters/RajeshRao-2011.embed_thumbnail.jpg&amp;vw=432&amp;vh=240&amp;ap=0&amp;ti=1180&amp;lang=eng&amp;introDuration=15330&amp;adDuration=4000&amp;postAdDuration=830&amp;adKeys=talk=rajesh_rao_computing_a_rosetta_stone_for_the_indus_scri;year=2011;theme=new_on_ted_com;theme=a_taste_of_ted2011;theme=technology_history_and_destiny;theme=tales_of_invention;event=TED2011;tag=Science;tag=computers;tag=history;tag=language;&amp;preAdTag=tconf.ted/embed;tile=1;sz=512x288;" /&gt;&lt;embed src="http://video.ted.com/assets/player/swf/EmbedPlayer.swf" pluginspace="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" bgColor="#ffffff" width="446" height="326" allowFullScreen="true" allowScriptAccess="always" 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दृष्टि मिल जायेगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर इस तरह कला को देखने, समझने का जिस तरह का मौका आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बन गया है वैसा पहले कभी नहीं था, जिसका एक उदाहरण है &lt;a href="http://www.googleartproject.com/" target="_blank"&gt;गूगल द्वारा संग्रहालयों की प्रसिद्ध कलाकृतियों को देख पाना&lt;/a&gt;.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में कला के बारे में, संग्रहालयों के बारे में कैसे जानकारी मिलेगी, यह अभी आसान नहीं हुआ है. भारत के कौन से प्रसिद्ध चित्रकार हैं, किसी अच्छे भले, पढ़े लिखे व्यक्ति से पूछिये तो भी आप को अमृता शेरगिल, मकबूल फिदा हुसैन आदि दो तीन नामों से अधिक नहीं बता पायेगा. हेब्बार, राम कुमार, बी प्रभा जैसे नाम कितनों को मालूम हैं? काँगड़ा और राजस्थानी मिनिएचर चित्रकला शैलियों की क्या विषेशताएँ हैं, शायद लाखों में एक व्यक्ति भी नहीं बता सकेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के प्रसिद्ध शिल्पकार कौन हैं तो शायद कुछ लोग अनिश कपूर का नाम ले सकते हैं क्योंकि वे लंदन में प्रसिद्ध हैं. कैसे कला में पैसा लगाना आज फायदेमंद है, इस पर फायनेन्शियल टाईमस या बिजनेस टुडे पर लेख मिल जायें, पर आम टीवी कार्यक्रमों में भारतीय कलाकारों की कला को कैसे समझा जाये, इसका कोई कार्यक्रम क्या आप ने कभी देखा है? जब तक किसी कलाकार की बिक्री लाखों करोड़ों में न हो, या उसे विदेश में कुछ सम्मान न मिले, लगता है कि भारत में उसका कुछ मान नहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://asi.nic.in/index_hn.asp" target="_blank"&gt;भारतीय पुरात्तव विभाग की वेबसाईट&lt;/a&gt; तो हिन्दी में भी है लेकिन वहाँ पर आप को केवल प्रकाशनों की लिस्ट मिलेगी. इंटरनेट पर पढ़ने वाली किताबों पत्रिकाओं की लिंक अंग्रेज़ी वाले हिस्से में हैं. तस्वीरों की गैलरी है, लेकिन उनमें जगह के नाम के सिवा, उसे जानने समझने के लिए कुछ नहीं. वैसे तो भारत दुनिया भर के क्मप्यूटरों की क्राँती का काम कर रहा है तो आशा है कि भारतीय पुरात्तव विभाग की वेबसाईट को भी अच्छा होने का मौका मिलेगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली के &lt;a href="http://www.nationalmuseumindia.gov.in/" target="_blank"&gt;राष्ट्रीय संग्रहालय की वेबसाईट&lt;/a&gt; केवल अंग्रेज़ी में है और उसपर उपलब्ध जानकारी बहुत सतही है. तस्वीरें छोड़ कर किसी तरह की समझ बढ़ाने वाली जानकारी नहीं मिलती. वेबसाईट पुराने तरीके की है, उसे देख कर नहीं लगता कि यह भारत के सबसे प्रमुख संग्रहालय का परिचय दे सकती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली के राष्ट्रीय कला संग्रहालय की &lt;a href="http://ngmaindia.gov.in/hindi/index.asp" target="_blank"&gt;वेबसाईट देखने में बहुत सुन्दर है, और हिन्दी में भी है&lt;/a&gt;. वेबसाईट पर संग्रहालय के विभिन्न संग्रहों की कुछ सतही जानकारी भी है, लेकिन सभी प्रकाशन केवल खरीदने के लिए ही हैं, इंटरनेट से कलाकारों और कला के बारे में जानकारी सीमित है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर हमारी संस्कृति, सभ्यता को जनसामान्य तक पहुँचाना आवश्यक है तो भारतीय संग्रहालय और पुरात्तव विभागों को इंटरनेट के माध्यम से नये कदम उठाने चाहिये, ताकि जनता में अपने इतिहास और कला को जानने समझने की इच्छा जागे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीचे की मेरी खींची तस्वीरें दुनिया के विभिन्न देशों में संग्रहालयों से हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Museums - images by S. Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/museums_01.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Museums - images by S. Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/museums_02.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Museums - images by S. Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/museums_03.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Museums - images by S. Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/museums_04.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Museums - images by S. Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/museums_05.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Museums - images by S. Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/art/museums_06.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-588721170619785201?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/588721170619785201/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/07/blog-post_11.html#comment-form' title='11 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/588721170619785201'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/588721170619785201'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/07/blog-post_11.html' title='सभ्यता का मूल्य'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-564478617529163450</id><published>2011-07-09T07:51:00.001+02:00</published><updated>2011-07-09T07:56:02.341+02:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संगीत'/><title type='text'>मन पसंद गैर फ़िल्मी गीत</title><content type='html'>सुबह साइकल पर जा रहा था. कुछ देर पहले ही बारिश रुकी थी. आसपास के पत्ते, घास सबकी धुली हुई हरयाली अधिक हरी लग रही थी. अचानक मन में गाना आया "&lt;b&gt;इस तुमुल कोलाहल कलह में&lt;/b&gt;". जाने कितने साल पहले सुना था यह गीत, शायद चालिस साल पहले. आशा भौंसले का गाया यह गीत, मन की गहराईयों में जाने कहाँ चुपा था जो इस तरह से अचानक उभर आया था. आसपास बिल्कुल सन्नाटा था, कोई तुमल, कोलाहल, कलह नहीं था, फ़िर क्यों यही गीत मन में आया था? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विदेशों में अधिकतर फ़िल्मों में गीत नहीं होते, जबकि भारतीय फ़िल्मों में गीतों के बिना फ़िल्में नहीं होती. हम लोग अधिकतर फ़िल्मी गीतों से ही अधिक परिचित हैं, पर फ़िर भी कभी कभी आशा भौंसले के "तुमुल कोलाहल" जैसे गीत कुछ प्रसिद्ध हो ही जाते हैं. जब एम टीवी और वी चैनल आने लगे थे तो मैं सोचता था कि अब गैर फ़िल्मी गानो को अपना सही स्थान मिलेगा, पर इस तरह का कुछ हुआ लगता नहीं, हालाँकि नब्बे के दशक के बाद से गैर फ़िल्मी गीतों की कुछ लोकप्रियता बढ़ी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िर सोचने लगा कि अगर गैर फ़िल्मी गानों के बारे में सोचूँ तो क्या अपने &lt;b&gt;मन पंसद दस गैर फ़िल्मी गानों&lt;/b&gt; की सूची बना पाऊँगा? साथ में ही मेरी शर्त यह भी थी कि एक एँल्बम से एक से अधिक गीत नहीं चुन सकते, और गीत अपने आप याद आना चाहये, गूगल पर खोज कर नहीं निकनला उसे. प्रारम्भ में कुछ ध्यान में नहीं आ रहा था, लेकिन फ़िर धीरे धीरे कुछ गाने याद आने लगे. यह सूची बनायी है, हालाँकि इनमें से यह चुनना कि कौन सा गीत अधिक पसंद है कठिन है. कुछ गायकों के नाम याद आये पर उनका कोई गीत याद नहीं आया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1. "कृष्णा नीबेगने बरो" जिसे कोलोनियल कज़नस् (Colonial Cousins) ने गाया था. इनकी इसी एल्बम में से मुझे "स नि धा पा गा मा गा रे सा" भी बहुत अच्छा लगता है लेकिन अगर एक ही चुनना पड़े तो मैं "कृष्णा" को ही चुनुँगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;iframe allowfullscreen="" frameborder="0" height="349" src="http://www.youtube.com/embed/KG9Sbg_gkxA" width="425"&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2. रब्बी का गाया &lt;a href="http://youtu.be/pTxZy32Fv_0" target="_blank"&gt;"बुल्ला की जाणा मैं कौण"&lt;/a&gt; - इस गाने के बाद मैंने रब्बी की एक और एँल्बम भी खरीदी थी जो मुझे अच्छी भी लगी थी, लेकिन अब सोचने पर भी उसके गीत याद नहीं आते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3. &lt;b&gt;मुकुल और मितुल&lt;/b&gt; का "सावन" यह दोनो गायक अधिक प्रसिद्ध नहीं हुए लेकिन मुझे इनके गाने का अंदाज़ बहुत पसंद है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;iframe allowfullscreen="" frameborder="0" height="349" src="http://www.youtube.com/embed/jJJXYl9of4Q" width="425"&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4. आशा जी का &lt;a href="http://ww.smashits.com/my-favourites-asha-bhosle-4/tumul-kolahal-kalah-mein/song-80131.html" target="_blank"&gt;"इस तुमुल कोलाहल कलह में"&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;5. जगजीत सिंह और चित्रा सिंह का &lt;a href="http://youtu.be/3Dp0O4OW0IY" target="_blank"&gt;"सरकती जाये है रुख से नकाब आहिस्ता आहिस्ता"&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;6. किशोरी आमोनकर का &lt;a href="http://youtu.be/ipauyMfVYso" target="_blank"&gt;"सहेला रे"&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;7. अश्विनी भिडे देशपांडे का &lt;a href="http://www.we7.com/song/Ashwini-Bhide/Ganpati-Vighnaharan?m=0" target="_blank"&gt;"गणपति विघ्नहरण गजानन"&lt;/a&gt;. इस गीत के पीछे एक छोटी सी कहानी है. कुछ वर्ष पहले डा. देशपांडे हमारे शहर आयीं थीं. उनसे बात करने का भी मौका मिला. उनसे बात करते हुए मैंने उन्हें कहा कि मुझे उनका यह भजन बहुत प्रिय है. उस दिन शाम को जब उनका गायन कार्यक्रम समाप्त होने वाला था, उन्होंने इस गीत को मेरे लिए गाया. तब से यह गीत मेरे मन में और गहरा उतर गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;8. मोहित चौहान का &lt;a href="http://youtu.be/wa8EWmLB_9U" target="_blank"&gt;"सजना"&lt;/a&gt; -  आज कल के गायकों में से मेरे सबसे प्रिय हैं मोहित चौहान.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;9. ग़ुलाम अली का &lt;a href="http://youtu.be/Jf5LOSnbkNg" target="_blank"&gt;"आवारागी"&lt;/a&gt; - चालिस साल पहले यह गीत एक बार दिल्ली की ललित कला अकेदमी की लायब्रेरी में सुना था तो उसने मंत्र मुग्ध कर दिया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;10. कुमार गंधर्व का &lt;a href="http://youtu.be/kY2k0JcfByg" target="_blank"&gt;"उड़ जायेगा हँस अकेला"&lt;/a&gt; - बचपन में कुमार गंधर्व जी के निर्गुणी भजनों से मेरी मुलाकात मेरे छोटे फ़ूफा ने करायी थी. उसके बाद कई बार कुमार गंधर्व जी को गाते हुए सुनने का मौका भी मिला. उनके कबीर भजन मुझे बहुत प्रिय हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह दस गीत तो मैंने आज चुने हैं लेकिन यह भी है कि समय के साथ मेरी पसंद भी बदलती रहती है. आप के सबसे प्रिय गैर फ़िल्मी गीत कौन से हैं, हमें भी बताईये. शायद आप की पसंद के गीतों में मेरी पसंद के अन्य गीत भी छुपे हों?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-564478617529163450?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/564478617529163450/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/07/blog-post.html#comment-form' title='16 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/564478617529163450'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/564478617529163450'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='मन पसंद गैर फ़िल्मी गीत'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://img.youtube.com/vi/KG9Sbg_gkxA/default.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-4254593769140859576</id><published>2011-06-20T06:15:00.000+02:00</published><updated>2011-06-20T06:15:32.514+02:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पुस्तक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भाषा'/><title type='text'>विचित्र शब्द</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;हिन्दी के "चंदू की चाची ने, चंदू के चाचा को चाँदी के चम्मच से चाँदनी चौंक में चटनी चटाई" जैसे वाक्यों को, जिन्हें बोलने में थोड़ी कठिनायी हो या बोलने के लिए बहुत अभ्यास करना पड़े, अंग्रेज़ी में "टँग टिविस्टर" (Tongue twister) यानि "जीभ को घुमाने वाले" वाक्य कहते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Grafic design about strange words by S. Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/designs/words_design01.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इस तरह के वाक्य अन्य भाषाओं में भी होते हैं. चेक गणतंत्र की भाषा चेक में ऐसा एक वाक्य हैः "मेला बब्का वू कापसे ब्राबसे, ब्राबसे बाबसे वू कापसे पिप. ज़्मक्ला बबका ब्राबसे वू कापसे, ब्राबसे बाबसे वू कापसे चिप." यानि "नानी की जेब में चिड़िया थी, चिड़िया ने चींचीं की, नानी ने चिड़िया को दबाया, चिड़िया मर गयी."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विभिन्न भाषाओं कई बार छोटे से शब्द मिलते हें, जिनके अर्थ समझाने के लिए पूरा वाक्य भी कम पड़ सकता है. कुछ इस तरह के शब्दों के उदाहरण देखिये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जापानी लोग कहते हैं "अरिगा मेईवाकू" जिसका अर्थ है, "वह काम जिसे कोई आप के लिए करता है, जो आप नहीं चाहते थे, और आप की पूरी कोशिश के बाद कि वह व्यक्ति वह काम न करे, वह उसे करता है, और आप के लिए इतना झँझट खड़ा कर देता है जिससे आप को बहुत परेशानी होती है, लेकिन फ़िर भी आप को उस व्यक्ति को धन्यवाद कहना पड़ता है". जर्मन शब्द "बेरेनडीन्स्ट" का अर्थ भी इससे मिलता जुलता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जापानी का एक अन्य शब्द है, "आजे ओतोरी" जिसका अर्थ है "बड़ा होने के समारोह के लिए अपने बालों का विषेश स्टाईल बनवाना, जिससे बजाय अच्छा लगने के, आप की शक्ल और भी बिगड़ी हुई लगे".&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालैंड निवासी कहते हैं "प्लिमप्लामप्लैटरेन", जब कोई पानी की सतह पर इस तरह से पत्थर फ़ैंके कि वह पत्थर कुछ दूर तक पानी पर उछलता हुआ जाये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ्राँसिसी बोली में कहते है, "सिन्योर तेरास", उस व्यक्ति के बारे में जो बार या रेस्टोरेंट में जा कर बहुत सा समय बिताता है, पर खाता पीता बहुत कम है जिससे उसका खर्चा कम होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अलग अलग भाषाओं में बात को कहने के कुछ अजीब अजीब तरीके भी होते हैं, जैसे कि इंदोनेशिया में समय बरबाद को कहते हैं "कुसत सेबे लोकटी", यानि "अपनी कोहनियाँ चाटना". चीनी लोग, जब कोई ज़रूरत से अधिक ध्यान और हिदायत से काम करता है, कहते हैं, "तुओ कूरी फाँग पी" यानि "पाद मारने के लिए पैंट उतारना". कोरिया में जब कोई बिना आवश्यकता के बहुत ताकत लगा कर कुछ काम करता है, तो कहते हैं "मोजी जाबेरियूदाछोगा सामगान दा तायेवोन्दा" यानि "मच्छर पकड़ने के चक्कर में घर गिरा देना". &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह के शब्दों के बारे में विचित्र और दिलचस्प बातें लिखीं हैं होलैंड के &lt;b&gt;आदम जूआको&lt;/b&gt; ने अपने चिट्ठे "टिंगो का अर्थ" (&lt;b&gt;&lt;a href="http://themeaningoftingo.blogspot.com/" target="_blank"&gt;The Meaning of Tingo&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;) पर. उनका यह चिट्ठा इतना सफ़ल हुआ कि इसकी उन्होंने किताब छपवायी. किताब छपने के बाद से उन्होंने चिट्ठे पर नयी पोस्ट लिखना बन्द कर दिया, फ़िर भी पढ़ने के लिए वहाँ बहुत सी दिलचस्प बातें मिलती हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी भारतीय भाषाओं में भी जाने इस तरह के कितने शब्द होंगे, विचित्र तरीके होंगे बात को कहने के, ऐसे छोटे छोटे शब्द होंगे जिनके लम्बे अर्थ हों, जो सारी दुनिया से अलग हों. शायद हममें से कोई उस पर चिट्ठा बना सकता है, सफ़लता अवश्य मिलेगी. कुछ उदाहरण हमें भी देने की कोशिश कीजिये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-4254593769140859576?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/4254593769140859576/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/06/blog-post_20.html#comment-form' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/4254593769140859576'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/4254593769140859576'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/06/blog-post_20.html' title='विचित्र शब्द'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-6639887761293625255</id><published>2011-06-17T06:58:00.000+02:00</published><updated>2011-06-17T06:58:11.209+02:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इटली'/><title type='text'>अंत का प्रारम्भ</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;पिछले कुछ सालों में इटली के &lt;b&gt;प्रधानमंत्री&lt;/b&gt; श्री &lt;b&gt;सिल्वियो बरलुस्कोनी&lt;/b&gt; का नाम विश्व भर में जाना जाने लगा है. जिन्हें इटली के बारे में कोई अन्य जानकारी नहीं है, वे भी बरलुस्कोनी का नाम जानते हैं. इसका कारण यह भी है कि विश्व भर में पत्रकारिता बदल रही है. उदारवाद और वैश्वीकरण से, अखबारों में बिक्री कैसे बढ़ायी जाये की चिन्ता भी बढ़ी है और इस चिन्ता को घटाने में बरलुस्कोनी जी बड़े सहयोगी हैं क्योंकि वह नियमित रूप से सेक्स से जुड़े स्कैंडलों के हीरो हैं जिनकी खबरे दुनिया के समाचार पत्र खुशी से छापते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तरी इटली के मिलान शहर के उद्योगपति, बरलुस्कोनी ने पहला पैसा ज़मीन और घरों के बनाने और उनकी बिक्री से बनाया, फ़िर टेलीविज़न और अखबारों के व्यवसाय में झँडे गाड़े. आज उनके व्यवसाय विभिन्न क्षेत्रों में फ़ैले हैं और वह दुनिया के सबसे अमीर लोगों में गिने जाते हैं. सत्रह वर्ष पहले, राजनीति में आने से पहले, वह 1980 के दशक में इटली की समाजवादी पार्टी के नेता इटली के प्रधान मंत्री &lt;b&gt;बेत्तिनो क्राक्सी&lt;/b&gt; के करीबी मित्र समझे जाते थे. 1990 के दशक के प्रारम्भ में इटली में "साफ़ हाथ" का स्कैंडल हुआ जिसकी चपेट में उस समय के बहुत सारे भ्रष्टाचारी राजनीतिज्ञ आ गये. जेल से बचने के लिए क्राक्सी को इटली छोड़ मोरोक्को भागना पड़ा. उस समय को इटली के "पहले गणतंत्र का अंत" कहा जाता है और तब आशा थी कि इटली में भ्रष्टाचार विहीन नया "दूसरा गणतंत्र" बनेगा. उस समय नये गणतंत्र के दूत के रूप में राजनेता बरलुस्कोनी का जन्म हुआ, उन्होंने "फोर्स्ज़ा इतालिया"  (Forza Italia) यानि "मजबूत इटली" नाम का नया राजनीतिक दल बनाया जिसमें राजनीति से बाहर के नये "ईमानदार" लोगों को जगह दी गयी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Berlusconi posters" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/berlusconi_01.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;लोगों का कहना था कि बरलुस्कोनी राजनीति से बाहर के व्यक्ति हैं, पहले से ही इनके पास पैसा है, उन्हें देश का पैसा खाने की आवश्यकता नहीं, वह ईमानदारी से देश की सेवा करेंगे. उनकी इस स्वच्छ छवि में कुछ कमियाँ थीं, जैसे कि उनके विरुद्ध चल रहे कुछ मुकदमें और राजनीति में उनका पुरानी फासिस्ट पार्टी से गठबँधन, पर इन दोनो बातों को उनके प्रशंसकों ने बहुत गम्भीरता से नहीं लिया. नब्बे के दशक में उन्होंने चुनाव जीते और सरकार बनायी, लेकिन गठबँधन के साथियों ने उनका पूरा साथ नहीं दिया और उनकी सरकार बहुत समय तक नहीं चली. उसी समय में उन पर लगे मुकदमे भी बढ़ने लगे. इससे बरलुस्कोनी ने दो तरह की बातों को बढ़ावा दिया - पहली बात कि मुझसे सत्ता में रहने वाले वामपंथी दल डरते हैं और मुझे राह से हटाने के लिए वामपंथी मजिस्ट्रेटों के सहयोग से झूठे मुकदमे चलाये रहे हैं, और दूसरी बात कि मैं देश को तरक्की की राह पर ले जाना चाहता हूँ लेकिन बाकी के दल आपस में मिल कर मुझे यह मौका नहीं दे रहे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्हीं दो संदेशों को वह विभिन्न रूपों में पिछले दशक में भी दौहराते रहें हैं, हालाँकि इस दशक में वह स्वयं सबसे अधिक समय से सत्ता में हैं. जवान कम उम्र की लड़कियों और युवतियों पर सेक्स सम्बंधी बातें व इशारे करना, अपनी मर्दानगी की डींगे मारना, इन सब बातों के लिए वह शुरु से ही जाने जाते थे. प्रधानमंत्री बनने के बाद जब विभिन्न अंतरराष्ट्रीय सभाओं आदि में उन्होंने अन्य देशों की नारी नेताओं के बारे में बिना सोचे समझे टिप्पणियाँ की या इशारे किये, तो विभिन्न देशों की जनता ने उन्हें पहचानना शुरु कर दिया. विरोधी दलों की औरतों के बारे में उनकी टिप्पणियाँ बार बार अखबारों में मुख्यपृष्ठ का मसाला बनती रही हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी इस दृष्टि के समर्थन में उन्होंने यह कहना शुरु कर दिया कि मैं जिस औरत को चाहूँ, उसे राजनीति में नेता बना सकता हूँ, क्योंकि नेता बनने के लिए उनको बस किसी पुरुष नेता का सहारा चाहिये, और कुछ नहीं. जनता में वह बहुत लोकप्रिय थे, और उनकी इस तरह की बातों को बहुत गम्भीरता से नहीं लिया गया, लोग कहते थे कि वह अच्छे नेता हैं, काम बढ़िया करते हैं, इस तरह की बातें तो वह हँसी मज़ाक में कहते रहते हैं और साथ ही यह भी कि इस तरह की बातें उनकी व्यक्तिगत जीवन की बाते हैं, इन्हें गम्भीरता से नहीं लेना चाहिये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर पिछले दो तीन सालों में उनकी इस तरह की बातें इतनी बढ़ गयीं हैं कि इन बातों के पीछे उनकी सरकार क्या करती है या नहीं करती, इसकी बात होनी बन्द हो गयी है. उन पर चलने वाले मुकदमे  हर साल नये जुड़ रहे हैं, लेकिन वह कहते हैं कि सब झूठे हैं, कि मुकदमे कम्युनिस्ट मजिस्ट्रेटों द्वारा उन्हें सत्ता से हटाने के लिए बनाये जा रहे हैं. उनकी सरकार ने कई नये कानून बनाये हैं ताकि वह अपने मुकदमों से छुटकारा पा सकें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके विरुद्ध पैसे दे कर जवान युवतियों से सेक्स सम्बंध करने के बहुत से मामले निकले हैं. पैसा दे कर सेक्स करना, यह इतालवी कानून के विरुद्ध नहीं, लेकिन युवती कम से कम 18 साल की होनी चाहिये. लेकिन अन्य युवतियों की वेश्यावृति से पैसे कमाना, यानि दल्लेबाज़ी गैरकानूनी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए, इन मामलों में यही कहा गया कि उन्होंने कोई गैर कानूनी काम नहीं किया, लेकिन उन युवतियों ने पत्रिकाओं को प्रधान मंत्री के साथ अपने आत्मीय अनुभवों की बातों के साक्षात्कार बेच कर सनसनी फैलायी और दल्लाबाज़ी के अपराध में उनके कुछ सहयोगियों पर मुकदमे चले. ऐसी बातें भी निकलीं कि अच्छे खाते पीते घरों की पढ़ी लिखी युवतियाँ उनसे दोस्ती बनाती हैं ताकि ऊँचे पद की नौकरी या संसद में जगह पा सकें. कहते हैं कि उनके मंत्री मंडल में और देश के विभिन्न शहरों की स्थानीय सरकारों में इस तरह से उन की जान पहचान वाली बहुत सी यवतियाँ हैं जिनमें से कुछ ने स्वीकारा है कि उनके प्रधान मंत्री से प्रेम या सेक्स सम्बंध भी रहे हैं. उनकी संगीत, नृत्य और कम कपड़े पहने हुए युवतियों की पार्टियों में विदेशी राष्ट्रपति, मंत्री, प्रधानमंत्री भी हिस्सा लेते हैं, इसकी बातें भी कई बार निकली.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सब बातों में हर बार अखबार में पहले पन्ने पर हेडलाईन निकलती हैं, कुछ दिन हल्ला उठता है, फ़िर बात गुम हो जाती है, यह समझना कठिन होता है कि क्या सच है, क्या झूठ. तीन साल पहले उनकी पत्नी ने उन पर आरोप लगाया कि वह नाबालिग युवतियों से सम्बंध बना रहे थे और उनसे अलग होने का फैसला किया. लेकिन 75 वर्षीय बरलुस्कोनी इससे हताश नहीं हुए हैं और तलाक के बाद उनके चर्चे और भी बढ़ गये हैं. कुछ महीने पहले, मोरोक्को की एक सत्रह साल की नाबालिग लड़की &lt;b&gt;रूबी&lt;/b&gt; से सेक्स का स्कैंडल निकला, जिसकी बहुत चर्चा रही, लेकिन यह कहना कठिन है कि इसका कुछ असर पड़ेगा या यह भी भुला दिया जायेगा. इस बात पर कुछ मास पहले सारी इटली में विभिन्न शहरों में उनके विरुद्ध स्त्री समूहों द्वारा आयोजित बड़े प्रदर्शन हुए थे. नीचे की तस्वीरों में, बरलुस्कोनी के विरुद्ध  बोलोनिया शहर में हुए प्रदर्शन की कुछ तस्वीरें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Anti-Berlusconi protests, Bologna, February 2011 - images by S. Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/berlusconi_02.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Anti-Berlusconi protests, Bologna, February 2011 - images by S. Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/berlusconi_03.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Anti-Berlusconi protests, Bologna, February 2011 - images by S. Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/berlusconi_04.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;विदेश में लोग बार बार पूछते हैं कि इतने स्कैंडल के बाद भी बरलुस्कोनी कैसे प्रधानमंत्री बने हुए हैं और जनता में इतने लोकप्रिय हैं. ऐसा नहीं कि इटली में उनके विरुद्ध बोलने वाले लोग नहीं, लेकिन यह भी सच है कि 30 या 33 प्रतिशत वोट लेने वाली उनकी पार्टी पिछले राष्ट्रीय चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी थी. यानि, &lt;b&gt;67 से 70&lt;/b&gt; प्रतिशत लोग उनके विरुद्ध हैं, पर उनके विरोधी अलग अलग गुटों या दलों में बँटे हैं, मिल कर उनका सामना नहीं कर पाते. पिछले दो दशकों में विरोधी दल अगर सत्ता में आये भी हैं, तो आपस में ही लड़ते रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन शायद अब स्थिति कुछ बदलने लगी है. मई के अंत में देश के कई बड़े शहरों में चुनाव हुए. करीब करीब हर जगह, बरलुस्कोनी की पार्टी को मात मिली. पिछले सप्ताह, सरकार के चार निर्णयों पर विरोधी दलों ने जनमत का आयोजन किया, जिसमें बरलुस्कोनी ने सबसे कहा कि वोट देने नहीं जाईये ताकि जनमत असफ़ल हो जाये. लेकिन लोग वोट देने गये और सरकार के चारों निर्णयों को जनता ने गलत कहा, यानि सरकार को यह निर्णय बदलने पड़ेंगे. इनमें से एक निर्णय बरलुस्कोनी पर चलने वाले मुकदमें से सम्बंधित भी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल तक बरलुस्कोनी जी लगता था कि अपने किले में सुरक्षित हैं, उन्हें कोई हरा नहीं सकता, अब अचानक लोग कहने लगे हैं कि शायद बरलुस्कोनी का समय गया, जनता का उन पर विश्वास नहीं रहा. बहुत से लोग कह रहे  हैं कि यह बरलुस्कोनी के अंत का प्रारम्भ है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी सरकार के पास अभी दो साल और हैं. प्रतीक्षा करनी पड़ेगी यह देखने के लिए कि क्या वह इन दो सालों में अपनी छवि को सुधार सकेंगे? नयी नीतियाँ बना सकेंगे जिनसे उनके प्रशंसक फ़िर से उन पर विश्वास करने लगें? क्या विरोधी दल मिल कर काम कर सकेंगे और सरकार बना सकेंगे? इन सब प्रश्नों के उत्तर तो समय ही देगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-6639887761293625255?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/6639887761293625255/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/06/blog-post.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/6639887761293625255'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/6639887761293625255'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='अंत का प्रारम्भ'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-8403280708632507529</id><published>2011-06-10T06:42:00.002+02:00</published><updated>2011-06-10T06:46:45.585+02:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दक्षिण अमरीका'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यात्रा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सभ्यता'/><title type='text'>ब्राज़ील डायरी (2)</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;पिछले दिनों मुझे ब्राज़ील के &lt;b&gt;गोयास&lt;/b&gt; और &lt;b&gt;परा&lt;/b&gt; प्रदेशों में यात्रा का मौका मिला. उसी यात्रा से मेरी डायरी के कुछ पन्ने प्रस्तुत हैं. &lt;a href="http://jonakehsake.blogspot.com/2011/06/1.html"&gt;&lt;b&gt;कल इस डायरी का पहला भाग&lt;/b&gt;&lt;/a&gt; प्रस्तुत किया था. आज प्रस्तुत है दूसरा और अंतिम भाग.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;***&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;3 जून 2011, अबायतेतूबा (परा)&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्राज़ील में गोरे, काले, भूरे, हर रंग के लोग मिलते हैं. अफ्रीकी, अमेरंडियन और यूरोपीय लोगों के सम्मिश्रण से एक ही परिवार में तीनो जातियों के चेहरे दिखते हैं. अक्सर लड़के और लड़कियाँ छोटे छोटे कपड़े पहनते हैं और शारीरिक नग्नता पर कोई ध्यान नहीं देता. अमेज़न जँगल में दूर दूर के गाँवों में भी लोग इसी तरह के छोटे छोटे पश्चिमी लिबास पहनते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह वस्त्र मेरे मन में समृद्ध यूरोप या अमरीका की छवि बनाते हैं. भारत में इस तरह के कपड़े तो केवल बड़े शहरों में अमीर घर के लोग ही पहनते हैं. इसलिए उन्हें देख कर अक्सर उनकी गरीबी को तार्किक स्तर पर समझता हूँ लेकिन भावनात्मक स्तर पर&amp;nbsp;महसूस नहीं कर पाता हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(नीचे की तस्वीरों में अबायतेतूबा के ग्रामीण और नदी के किनारे पर रहने वाले गरीब लोग)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Rural area, Abaetetuba, Parà Brazil - Images by S. Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/brazil_diary_05.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="River area, Abaetetuba, Parà Brazil - Images by S. Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/brazil_diary_06.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;मन में कुछ अज़ीब सा लगता है. गोरा चेहरा, सुनहरे बाल, छोटे छोटे आधुनिक कपड़े, ऐसे लोग गरीब कैसे हो सकते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गरीबी और भूख से भी अधिक चुभती हैं, परिवार में हिँसा की कहानियाँ, विषेशकर यौन हिँसा की कहानियाँ. अमेज़न जँगल में नदियों में हज़ारों द्वीप हैं जिनमें रहने वाले रिबारीन लोग हैं. उनमें छोटी छोटी चौदह पंद्रह साल की गर्भवती लड़कियों को देख कर बहुत दुख होता है. नदी के किनारे घर हैं, एक दूसरे से कटे हुए, जहाँ एक घर से दूसरे घर जाने के लिए नाव से ही जा सकते हैं, जँगल को पार करके जाना बहुत कठिन है. इस तरह से हर परिवार अपने आप में अलग द्वीप सा है. मेरे साथ की सोशल वर्कर ने बताया कि अक्सर नाबालिग लड़कियों से यौन सम्बन्ध बनाने वाले उनके पिता या अन्य पुरुष रिश्तेदार होते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह एक परिवार में पति पत्नि, उनके बच्चे और पिता और बेटियों के हुए बच्चे साथ साथ देखने को मिले.&amp;nbsp;इस बात पर नदियों के किनारे पर बसे, बाकि दुनिया से कटे हुए&amp;nbsp;इस समाज में शायद अधिक चेतना भी नहीं है. जब एक युवती से मैंने उसके पति के बारे में पूछा, तो उसने सहजता से कहा कि उसका पति नहीं है, बल्कि उसके बच्चे उसके पिता के साथ हुए हैं. इस तरह के परिवार भी बहुत देखे जहाँ घर में एक स्त्री के तीन चार बच्चे थे, लेकिन हर बच्चे का पिता अलग पुरुष था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होटल में, स्वास्थ्य केन्द्र में, हर तरफ़ नाबालिग बच्चों से सेक्स सम्बन्ध और उनके यौनिक शोषण के बारे में पोस्टर लगे हैं, चूँकि नाबालिग बच्चों को खोजने वाले पयर्टक भी यहाँ बहुत आते हैं. कुछ सोचते हैं कि एड्स की बीमारी का इलाज, नाबालिग कमसिन बच्ची से सम्भोग करने से होगा. (नीचे की तस्वीर में अबायतेतूबा के एक स्वास्थ्य केन्द्र में बच्चों के यौनिक शोषण के बारे में पोस्टर)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Poster on sexual exploitation of minors, Parà Brazil - Images by S. Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/brazil_diary_07.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;***&lt;br /&gt;बहुत सुन्दर है अमेज़न का जँगल. हर तरफ़ हरियाली और नदियाँ, झीलें, पक्षी. बहुत सुन्दर लोग भी हैं. लेकिन उनकी सुन्दरता में गरीबी, हिँसा और शोषण की इतनी कहानियाँ. पर वहाँ के गरीबों और भारत के गरीबों में एक बड़ा अंतर दिखता है, अपने आत्मसम्मान का. भारत में लगता है कि अगर आप गरीब हैं या मजदूरी का काम करते हैं या वैसा काम करते हें जिसे नीचा समझा जाये, तो वह लोग "जी, जी हज़ूर" करके अपने आप को नीचा दिखाने को मजबूर होते हैं, तथा अपने आप को ऊँचा समझने वाले लोग उनसे मानव जैसा व्यवहार भी नहीं करते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;आनन्द गिरिधरदास&lt;/b&gt; की किताब "&lt;b&gt;इंडिया कालिंग&lt;/b&gt;" &amp;nbsp;(India Calling, Anand Giridhardas, Harper Collins India, 2011) में इसका एक वर्णन है जिसे पढ़ कर मन बहुत क्षुब्ध हुआ था. इस किताब में एक जगह वह बताते हैं एक घर का काम करने वाले नौकर के व्यवहार के बारे में:&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;तब मुझे समझ में आया. उसने मुझे पहचाना नहीं था. उसने सोचा था कि मैं डिलिवरीवाला था, क्योंकि मैंने टी शर्ट और निकर पहनी हुई थी, और इसलिए भी कि इज़्ज़तदार भारतीय गद्दे अपने आप नहीं उठाते. जैसे ही उसने मुँह बनाया और मुझे जाने के लिए कहा, मैंने उसकी आँखों में आँखें डाल कर उसे याद दिलाया कि मैं सुबह उनके घर नाशते पर आया था. उसमें जो बदलाव आया, मैं उसे कभी भूल नहीं पाऊँगाः वह मेरी आँखों के सामने सिकुड़ कर छोटा हो गया, मालिक से नौकर. उसका तना हुआ बदन झुक गया. उसकी आँखों में विनीत भाव आ गया. जो हाथ इधर उधर चला रहा था, झुक कर शरीर से जुड़ गये. "जी सर, क्षमा कीजिये सर, जी सर" करके बात करने लगा. थोड़ी देर पहले वह पुरुष था और मैं बच्चा. अब वह बच्चा बन गया था, मुझे माफ़ी माँग रहा था, डरा हुआ उम्मीद कर रहा कि मैं यह बात किसी से कहूँगा नहीं.&lt;/blockquote&gt;भारत में इस तरह के अनुभव आम हैं. जबकि ब्राज़ील के गरीब लोगों के बात करने में इस तरह से खुद को नीचा समझना नहीं दिखा. हम लोग वहाँ की झोपड़पट्टी में गये, वहाँ चाहे लोग कितने भी गरीब थे, उनके बात करने के ढंग में आत्मविश्वास था, लगा जैसे वह कह रहे हों कि पैसे न हों तो भी हम तुमसे किसी बात में कम मानव नहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;***&lt;br /&gt;&lt;b&gt;4 जून 2011, बेलेम&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल शाम को अबायतेतूबा से वापस आये थे. सुबह वहाँ से अंद्रेया का टेलीफ़ोन आया. हमारे जाने के बाद, उस झोपड़पट्टी के पास पुलिस वालों और नशे की सम्गलिंग करने वालों के बीच घमासान युद्ध हुआ था जिसमें दस लोग मारे गये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किस्मत अच्छी थी कि हमारे वहाँ रहते कुछ नहीं हुआ था. जल्दी से सूटकेस तैयार करना है, यह यात्रा भी स्माप्त होने वाली है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;***&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-8403280708632507529?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/8403280708632507529/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/06/2.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/8403280708632507529'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/8403280708632507529'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/06/2.html' title='ब्राज़ील डायरी (2)'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-2167765524313236390</id><published>2011-06-09T06:40:00.000+02:00</published><updated>2011-06-09T06:40:24.449+02:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दक्षिण अमरीका'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यात्रा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सभ्यता'/><title type='text'>ब्राज़ील डायरी (1)</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;पिछले दिनों मुझे ब्राज़ील के &lt;b&gt;गोयास&lt;/b&gt; और &lt;b&gt;परा &lt;/b&gt;प्रदेशों में यात्रा का मौका मिला. उसी यात्रा से मेरी डायरी के कुछ पन्ने प्रस्तुत हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;24 मई 2011, गोयास वेल्यो&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोर्ड पर लिखा था, "&lt;i&gt;ओ कुआरो&lt;/i&gt;". मैंने मेक्स से उसका मतलब पूछा तो उसने बताया कि यह ब्राज़ील की ग्वारानी जनजाति के अमेरिंडियन लोगों का आपस में नमस्ते कहने का तरीका है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेक्स प्राथमिक स्कूल के बच्चों को प्राचीन अफ्रीकी और अमेरिंडियन सभ्याताओं के बारे में पढ़ाता है. वह बोला, "हम लोगों के खून में, यूरोप से आये लोगों के साथ साथ, अफ्रीका से लाये गुलामों और यहाँ के रहने वाले मूल अमेरिंडियन निवासियों का खून भी मिला है. एक ही ब्राज़ीली परिवार में तुम्हें सुनहरे बालों और नीली आँखों वाले यूरोपी चेहरे, काले अफ्रीकी चेहरे, भूरे अमेरिंडियन चेहरे और इन सबके सम्मिश्रिण से बने हर रंग के चेहरे मिलेंगे. लेकिन आज का ब्राज़ील वासी, अपने आप को यूरोपीय मानना बेहतर समझता है, हमारी सभ्यता पर यूरोपी भाषा, सोच विचार, धर्म हावी हैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अफ्रीकी सभ्यता या अमेरिंडियन सभ्यता की हमारी जड़ों की, किसी को परवाह नहीं, वे तो आजकल नीचे दर्जे की सभ्यताएँ मानी जाती हैं. उनको याद रखना या बना कर रखना बेकार है, ऐसा कहते हैं. अधिकतर लोग उन भाषाओं और सभ्यताओं के बारे में कुछ जानना चाहते ही नहीं. लेकिन अपने खून में मिली सभ्यता, संस्कृति, किस्से कहानियाँ, पाराम्परिक ज्ञान को यूँ फैंक देना गलत है." मेक्स ने कुछ हताश हो कर बताया, "सच तो यह है कि आज चाहो भी तो ग्वारानी भाषा किससे बोलो? जो भाषा मर चुकी है, भुला दी गयी है, उसे मेरे कितना भी चाहने से फ़िर से जीवित नहीं किया जा सकता."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(नीचे की तस्वीरों में विला स्पेरान्ज़ा स्कूल में अफ्रीकी और अमेरिंडियन मुखौटे)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="African mask, Goias Velho, Brazil, Images by Sunil Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/brazil_diary_01.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Amerindian mask, Goias Velho, Brazil, Images by Sunil Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/brazil_diary_02.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;उसकी इस बात से मैं हिन्दी के बारे में सोचने लगा. आज भारत में भी सब माँ पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा अंग्रेजी बोले, अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़े. मैं खुद भी कितना ही "हिन्दी हिन्दी" बोलता सोचता रहूँ, सच तो यही है कि बात थोड़ी सी भी जटिल होने लगे तो मुझसे हिन्दी में बात नहीं की जाती, अंग्रेज़ी में की जाती है. धीरे धीरे क्या हिन्दी भी एक दिन ग्वारानी बन जायेगी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;***&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;25 मई 2011, गोयास वेल्यो&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने एड्रियानो से पूछा कि उसने अपनी बेटी को "&lt;b&gt;विला स्पेरान्सा&lt;/b&gt;" के स्कूल में क्यों पढ़ाना चाहा, तो उसने बताया, "मैंने इस स्कूल के बनाने का कुछ काम किया था. तब मुझे बच्चों के लिए इस स्कूल में इतने ध्यान से बनायी गयी बच्चों के खेलने की जगहें, सोचने की जगहें, पढ़ने की जगहें, आदि देख कर बहुत अच्छा लगा. जब मेरी बेटी ओलिन्दा को स्कूल में दाखिल करने का समय आया तो मैंने सोचा कि उसे इसी स्कूल में पढ़ाना चाहिये. मेरे कई मित्रों ने मुझसे कहा कि यह स्कूल बेकार है, यहाँ ठीक से पढ़ायी नहीं होती, बच्चों को खेल खिलाते रहते हैं, होम वर्क भी नहीं देते, किताबें भी कम है, वगैरह. पर वह लोग यह इस लिए कहते हैं क्योंकि यहाँ की पढ़ायी के तरीके को ठीक से नहीं समझते. मैं यहाँ के पढ़ने खेलने के मिले जुले तरीकों से बहुत खुश हूँ."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद में मैंने मेक्स से पूछा कि लोग तुम्हारे स्कूल के बारे में इस तरह क्यों सोचते हैं कि यहाँ ठीक से पढ़ायी नहीं होती?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेक्स इस स्कूल का जन्मदाता है और कर्ता धर्ता भी.  पहाड़ी पर, &lt;b&gt;रियो वेरमेलियो नदी&lt;/b&gt; के किनारे, एक बहुत सुन्दर जगह पर बना है "विला स्पेरान्सा" यानि "आशा का घर". हर तरफ़ रंग बिरंगी कुर्सिया मेज़, खेलने की चीज़ें और किताबें. बस एक दिक्कत है यहाँ कि एक क्लास से दुसरी में जाने के लिए बहुत सीढ़ियाँ चढ़नी उतरनी पड़ती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेक्स ने कहा, "हम लोग पढ़ायी और खेल के साथ साथ सभ्यता की बात भी करते हैं जिसमें पुरानी अफ्रीकी और अमेरिंडियन कहानियाँ, रीति रिवाजों, नृत्य, संगीत और गीत, वस्त्र, पाराम्परिक खाने आदि के बारे में सप्ताह में एक दिन उत्सव मनाया जाता है. इसका ध्येय है कि हम अपनी प्राचीन जड़ों के प्रति शर्मिन्दा न हों. बल्कि अपनी साँस्कृतिक धरौहर को पहचाने, उसे सम्भाल कर रखें और उस पर गर्व करें. लेकिन यहाँ एवान्जलिक और कैथोलिक दो तरह के ईसाई धर्म का बहुमत हैं, उनके कुछ लोगों ने कहना शुरु कर दिया कि हम बच्चों में पुराने अफ्रीकी और अमेरिंडियन धर्म जैसे मुकम्बा या ओरिशा, का बढ़ावा दे रहे हैं, ताकि बच्चे अपना धर्म बदल दें. यह बात ठीक नहीं क्योंकि हम किसी को धर्म बदलने के लिए नहीं कहते, पर फ़िर भी इस बात से बहुत से लोगों ने यह कहना शुरु कर दिया है कि विला स्पेरान्सा में बच्चों को नहीं पढ़ाना चाहिये. वही लोग हमारे स्कूल के बारे में गलत अफवाहें फैलाते हैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(नीचे की तस्वीरों में विला स्पेरान्ज़ा स्कूल से दिखती रियो वेरमेल्यो नदी और स्कूल में अफ्रीकी सभ्यता का कार्यक्रम)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Vila Esperança school view, Goias Velho, Brazil, Images by Sunil Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/brazil_diary_03.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="African living festival in Vila Esperança, Goias Velho, Brazil, Images by Sunil Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/brazil_diary_04.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;मैं भारत में होने वाली विभिन्न धर्मों के बीच होने वाली बहस के बारे में सोचने लगा. देश, परिवेश बदल जाते हैं, लेकिन मानव अपनी भिन्नताओं को ले कर लड़ने झगड़ने का कोई न कोई बहाना खोज ही लेता है! धर्म बदलने बदलवाने को ले कर तो इतनी बहस और लड़ाईयाँ होती हैं. कर्णाटक में गया था तो वहाँ गाँवों में कुष्ठ रोग तथा एडस रोग के लिए काम करने वाली कैथोलिक ननस् पर वहाँ के कुछ हिन्दु दल धर्म बदलने का प्रचार करने का आरोप लगा रहे थे. मेक्स की तरह सिस्टर आइडा ने भी मुझसे कुछ ऐसी ही बात कही थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे मेक्स का स्कूल बहुत अच्छा लगा. दिल किया कि काश बचपन में मुझे भी इस तरह के स्कूल में पढ़ने का मौका मिलता, जहाँ कुछ रटना नहीं पढ़ता, हर बात में बच्चों को स्वयं सोचने समझने के लिए प्रेरित किया जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;***&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;28 मई 2011, गोयानिया&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जूनियर मेरे साथ काम करने वाली मेरी ब्राज़लियन मित्र का बेटा है, वह होटल में मुझे लेने आया. करीब पंद्रह साल बाद उससे मिल रहा था. मुझसे गले लग कर मिला. जब अंतिम बार मिले थे, तब वह स्कूल में पढ़ता था, अब वह विवाहित है दो बच्चे हैं और वकील का काम करता है. पर यह जूनियर उस पंद्रह साल पहले वाले खेल कूद और सिनेमा में दिलचस्पी रखने वाले लड़के से बहुत भिन्न था जिससे पिछली बार मिला था. अब उसके चेहरे पर मृदुल मुस्कान थी, और धीरे धीरे सोच समझ के बोलने वाला हो गया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करीब दस साल पहले, एक दिन जूनियर कार में कहीं जा रहा था, चौराहे पर लाल बत्ती के हरा होने का इन्तज़ार कर रहा था, जब किसी ने कार की खिड़की से उसे बन्दूक दिखा कर लूटने की कोशिश की थी. जूनियर ने कार चला कर भागने की कोशिश की थी, तो लूटने वाले ने उसके सिर पर गोली मारी थी. किस्मत अच्छी थी, जूनियर मरा नहीं, कई महीनों तक बेहोश पड़ा रहा, जब होश आया तो बोल नहीं पाता था, उसने फ़िर से बोलना सीखा. अब भी बोलते बोलते कई बार अटक सा जाता है, इसलिए धीरे धीरे बोलता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वास्थ्य मंत्रालय में गया. वहाँ काम करने वाली एक अन्य पुरानी मित्र के बारे में पूछा, तो मालूम चला कि वह कई महीनो से छुट्टी पर चल रही है. मेरी मित्र खरीदारी करने सुपरमार्किट गयी थी. खरीदे सामान की ट्राली को ले कर निचले तल पर कार पार्क में पहुँची तो दो लोगों ने उसे चाकू दिखाया. सब सामान, पैसा, घड़ी, कार, पर्स आदि ले लिया. बेचारी को इतना धक्का लगा कि तब से मनोविज्ञान विशेषज्ञ से चिकित्सा चल रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्राज़ील यात्रा में इस तरह की कहानियाँ इतनी सारी सुनने को मिलती हैं कि अकेले बाहर जाने से बहुत डर लगता है. कार में कहीं जाते हैं तो हमेशा दरवाज़ा लोक्क करके खिड़कियाँ बन्द करके जाते हैं. मुझे यह भी सलाह दी गयी कि उँगली से सोने की अँगूठी को उतार देना ही बेहतर है, लेकिन बहुत कोशिश करने पर भी उसे उँगली से नहीं निकाल पाया, तो मेरी मित्र बोली, "भगवान न करे कि वह अँगूठी लेने के लिए तम्हारी उँगली ही काट लें!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभी पैसे वाले लोग यहाँ ऊँचे गगनचुम्बी घरो में रहते हैं, जिनके आसपास ऊँची दीवारें हैं और गेट पर बन्दूक लिये हुए संतरी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेलेम विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले प्रोफेसर क्लाउदियो कह रहे थे, "हम लोग शौध कार्य के लिए पिछले दो सालों से शहर के बाहरी हिस्से और आसपास के गाँवों में घूम रहे हैं. वहाँ की हालत कितनी बुरी है, इसका शहर में रहने वालों को पता नहीं. न ठीक से बिजली पानी, न सफ़ायी, न रहने के लिए ठीक से घर. मैंने सोचा भी नहीं था कि हमारे ब्राज़ील में लोग इस तरह भी रह सकते हैं. इसीलिए वहाँ के लोगों में हिँसा है, बहुत गुस्सा है. इस तरह का जीवन होगा तो गरीब नवयुवक तरह तरह के नशे करेंगे ही."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सच है कि ब्राज़ील के शहर देखो तो लगता है यूरोप या अमरीका में हो, जबकि शहर के बाहरी हिस्सों तथा गाँवों में रहने वालों की स्थिति पिछड़ी हुई है. लेकिन जिस तरह की भूखी नँगी गरीबी और गन्दगी भारत में दिखती है, उसके हिसाब से तो ब्राज़ील की गरीबी कम ही लगती है. अमीरों और गरीबों के बीच विषमताएँ भारत में कम नहीं, लेकिन भारत में गरीबों में इस तरह की हिँसा क्यों नहीं है, यहाँ क्यों है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में किसी भी गरीब से गरीब जगह पर भी, किसी भी झोपड़पट्टी में अकेले जाते मुझे कभी डर नहीं लगा, बल्कि मैं सोचता हूँ कि गरीब झोपड़ियों में लोग बहुत प्यार और भोलेपन से मिलते हैं. पर यहाँ की झोपड़पट्टी में अकेले जाने का अर्थ लूट और हिँसा हैं. लेकिन यह भी सच है कि मैं कभी भारत में नक्सलवादी हिँसा क्षेत्र में नहीं गया, शायद वहाँ जा कर इसी तरह का डर लगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;***&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-2167765524313236390?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/2167765524313236390/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/06/1.html#comment-form' title='10 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/2167765524313236390'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/2167765524313236390'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/06/1.html' title='ब्राज़ील डायरी (1)'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-1497229623237037952</id><published>2011-05-20T06:29:00.001+02:00</published><updated>2011-05-21T06:00:32.191+02:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यक्तिगत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इतिहास'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कला'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इटली'/><title type='text'>मृत्यु के घर में जीवन</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;अगर आप से कोई पूछे कि आप मत्यु के बारे में क्या सोचते हैं और फ़िर आप से कहे कि आप की तस्वीर खींच कर उसे कब्रिस्तान में आप के मृत्यु के बारे में विचारों के साथ लगायेंगे तो क्या आप मान जायेंगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;विरजिनिया&lt;/b&gt; ने मुझसे पूछा तो मैं तुरंत मान गया. लेकिन मेरे जान पहचान वाले कुछ लोग थोड़े से चकित हो गये. बोले कि क्या डर नहीं लगता कि अपशगुन हो जाये और तुम सचमुच कब्रिस्तान पहुँच जाओ? वहाँ तो तस्वीरें केवल मरने वालों की लगती हैं, तुम जीते जी वहाँ अपनी तस्वीर लगवाओगे, लोग क्या सोचेंगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विरजिनया कलाकार है, तस्वीरें खींचती है, पैंटिग बनाती है, कविता लिखती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मई के अंतिम सप्ताह में यूरोप कमिशन की तरफ़ से प्राचीन कब्रिस्तानों के बारे में जानकारी बढ़ाने का निर्णय किया गया है. इसी सिलसिले में पुराने कब्रिस्तानों के बारे में लोगों को जानकारी देने के लिए जब यूरोप कमिशन ने बोलोनिया के सबसे &lt;b&gt;प्राचीन कब्रिस्तान&lt;/b&gt; &lt;b&gt;चरतोज़ा&lt;/b&gt; को भी चुना, तो विरजिनिया को एक प्रदर्शनी बनाने का विचार आया कि विभिन्न देशों सभ्यताओं में लोग मृत्यु के बारे में क्या सोचते हैं इसके साक्षात्कार तैयार किये जायें. उनका यह विचार यूरोपियन कमिशन को पसंद आया. इसके लिए उन्होंने बारह देशों के लोगों से यह बात करने की सोची जिसमें भारत की ओर से मुझे अपने विचार कहने के लिए कहा गया. इसके अतिरिक्त, घुप अँधेरे में एक टार्च की रोशमी में सब लोगों की विशिष्ठ अंदाज़ में तस्वीरें खींची गयीं जिनसे लगे कि हम अँधेरे कूँएँ से बाहर निकल रहे हैं. इसके अतिरिक्त हर व्यक्ति से कहा गया कि अपने देश की भाषा में वहीं बाते कहे और उन्हें रिकार्ड किया गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सब तस्वीरों, शब्दों, आवाज़ों, विचारों को मिला कर चरतोज़ा के कब्रिस्तान में एक प्रदर्शनी लगायी जायेगी, जिसका उदघाटन 1 जून को होगा. प्रदर्शनी का नाम है "&lt;b&gt;आत्मा की यात्रा&lt;/b&gt;" और प्रदर्शनी के पोस्टर से विरजिनया की ली हुई &lt;b&gt;कागज़ की नाव&lt;/b&gt; की तस्वीर प्रस्तुत है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Mostra Trasmigrazione di Virginia Farina, Bologna Certosa, giugno 2011" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/trasmigrazione.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;मैं नहीं मानता कि कब्रिस्तान में तस्वीर लगवाने से या मृत्यु की बात करने से, हम सब 12 लोगों के पीछे कोई भूत प्रेत पड़ जायेगा, या अपशगुनी होगी. बल्कि मैंने सोचा कि कितने लोगों की किस्मत होती है कि कब्रिस्तान में जीते जी अपनी तस्वीर देखें? जब यह मौका मिल रहा है तो उसे छोड़ना नहीं चाहिये. मरना तो सबने है ही एक दिन, इसके डर से हम लोग जीना तो नहीं छोड़ सकते!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चरतोज़ा का कब्रिस्तान मुझे बहुत प्रिय है, सुंदर प्राचीन मूर्तियों से भरा. यहाँ अधिकतर लोग कब्र में दफ़न होना पसंद करते हैं. कोई जो अपने प्रियजन के शरीर को बिजली के क्रेमाटोरियम में जलवा भी ले, उनकी भी राख को मटकी में भर कर, उसकी छोटी सी कब्र बना सकते हैं. लेकिन वहाँ पर एक बहुत सुन्दर खुली जगह भी है, जहाँ जो लोग चाहते हैं उनके परिवार वाले उनकी राख को खुले खेत में मिट्टी में मिला सकते हैं. बहुत सुन्दर जगह है, सामने चीड़ के पेड़ों से भरी पहाड़ी और एक नहर जहाँ छोटे बच्चे अक्सर बतखों को रोटी के टुकड़े खिलाते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रदर्शनी के चित्र तो जब लगेगी, तभी दिखा सकता हूँ. अभी प्रस्तुत हैं चरतोज़ा के कब्रिस्तान की मूर्तियों की कुछ तस्वीरें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Certosa cemetry Bologna - images by Sunil Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/bologna_certosa_01.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Certosa cemetry Bologna - images by Sunil Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/bologna_certosa_02.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Certosa cemetry Bologna - images by Sunil Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/bologna_certosa_03.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Certosa cemetry Bologna - images by Sunil Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/bologna_certosa_04.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Certosa cemetry Bologna - images by Sunil Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/bologna_certosa_05.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Certosa cemetry Bologna - images by Sunil Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/bologna_certosa_06.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Certosa cemetry Bologna - images by Sunil Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/italy/bologna_certosa_07.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-1497229623237037952?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/1497229623237037952/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/05/blog-post_20.html#comment-form' title='16 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/1497229623237037952'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/1497229623237037952'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/05/blog-post_20.html' title='मृत्यु के घर में जीवन'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-4148491208570654820</id><published>2011-05-19T07:17:00.000+02:00</published><updated>2011-05-19T07:17:44.184+02:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इतिहास'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पुस्तक'/><title type='text'>बँटने का दर्द</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;लम्बी रेल यात्रा का प्रोग्राम हो तो कई दिन पहले सोचने लगता हूँ कि कौन सी किताब रास्ते के लिए साथ ली जाये. यहाँ रेल यात्रा में साथ बैठे लोगों से बातचीत करना लगभग नामुमकिन सा है, सामने कोई बैठा हो तो उससे अधिक नज़र मिलाना भी बद्तमीज़ी समझी जाती है. दुकान से सैंडविच खरीद के खाते लोग, साथ बैठने वाले से नहीं पूछते कि "आप भी कुछ लीजिये न भाईसाहब!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में अच्छी किताब पढ़ने के लिए होना बहुत ज़रूरी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे यहाँ से जेनेवा जाने का अर्थ है मिलान में गाड़ी बदलना और करीब सात घँटे की रेल यात्रा. इस बार साथ ले जाने के लिए, मैंने &lt;b&gt;नासिरा शर्मा&lt;/b&gt; की "&lt;b&gt;ज़िन्दा मुहावरे&lt;/b&gt;" चुनी. इसे दो साल पहले दिल्ली में लगे पुस्तक मेले में खरीदा था, पर अब तक पढ़ने का मौका नहीं मिला था. एक बार पढ़ना शुरु किया तो उसमें इतना खोया कि रास्ते का पता ही नहीं चला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img alt="Zinda Muhaware by Nasira Sharma" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/blogs/zinda_muhaware.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;किताब का शीर्षक "ज़िन्दा मुहावरे" उन शब्दों की ओर संकेत करता है जिनकी मूल भाषा मर जाती है लेकिन वे शब्द किसी अन्य भाषा का हिस्सा बन कर ज़िन्दा रहते हैं. उपन्यास का विषय है पाकिस्तान के बनने से, उत्तर प्रदेश के पुराने ज़मीन्दार रहमतुल्लाह के परिवार का बँटवारा. आज़ादी रहमतुल्लाह से उनकी कुछ ज़मीन छीन लेती है, और उनका छोटा बेटा निजाम परिवार छोड़ कर पाकिस्तान जाने का फैसला करता है. गाँव में रह जाते हैं रहमतुल्लाह और उनका बड़ा बेटा, इमाम. अपना देश छोड़ कर नया देश चुनने वालों की सजा भारत में रह जाने वाले उनके परिवारों को भी देनी पड़ती है. नये देश में शरर्णार्थी बन कर आये लोगों को नये वातावरण में जीवन तो बनाना ही है, पुरानी यादों को भी भूलना है जिसमें उनके परिवार के हिस्से हैं जो भारत में ही रह गये.&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;"दोनो तरफ़ एक इल्ज़ाम कटी पतंग बन फड़फड़ाता है कि तुम यहाँ के नहीं हो, परदेसी हो, गैर हो. इसलिए दोनो तरफ़ के बाशिन्दों के दर्द की ज़मीन एक है. खून का रंग वही इन्सानी है, बस ज़रा सा फर्क यह है कि इधर वाले जाने वालों के गुनाह की सलीब पर टांग दिये गये हैं और उधर वाले यादों के तहखाने से गुज़र रहे हैं."&lt;/blockquote&gt;इमाम, रहमातुल्लाह का बड़ा बेटा कहता है, "&lt;i&gt;इस बटवारे के बोझ से हमारी पीढ़ी आजाद नहीं हो सकती. भले ही तुम जैसे लोगों के लिए भूल जाने वाली बात हो, मगर हम जैसों के लिए ऐसी लानत है, जो चाह कर भी हम भुला नहीं सकते. जैसे मैं.. मैं सिर्फ़ मुल्क और समाज से नहीं, बल्कि अपने आप से भी जवाब तलब करता हूँ कि यह सब क्यों और कैसे हुआ? हमने ऐसा क्यों होने दिया? इसी सवाल ने हमारे आगे के रास्ते में कांटे बो दिये हैं&lt;/i&gt;."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बटवारे के समय घर, परिवार, देश छोड़ कर जाने वाले शायद ठीक से समझ नहीं पाये थे कि समय, जंग, राजनीति, दुश्मनी की वह खाईयाँ बना देगी, जिसमें उनका वापस लौट कर जाना संभव नहीं होगा. नये देश में अपनी जगह बनाने में लगे निजाम को शर्म आती है परिवार को बताने में कि जिसे आरामदायक इज्जतदार जीवन समझ कर वह आया था, वहाँ रहना उतना आसान नहीं, कुछ बनने के लिए उसे अपनी जान लड़ानी होगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके पीछे, उसके बूढ़े होते पिता के मन में टीस है, यह न जान पाने की कि उनका छोटा बेटा कहाँ है, किस हाल में है, ज़िन्दा है या नहीं, "&lt;i&gt;कल इस घर में सारे पुरखों की रूह आयेगी. एक एक कर के सारे मुर्दों के नाम पर नज़र होगी. इस सारे इंतज़ाम के बीच ज़िन्दा और मुर्दा अपना संवाद स्थापित करेंगे, मगर उनका वहाँ कहीं ज़िक्र नहीं आयेगा, जो अपनो के बीच से चले गये. जो अब न ज़िन्दा थे न मुर्दा, न गायब थे न अगुआ हुए थे, फ़िर उनकी कब्र कहाँ ढूंढ़ कर उस पर दिया बाती जलायें&lt;/i&gt;."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपन्यास में नासिरा शर्मा नये बने पाकिस्तान में निजाम और भारत में अपने पुराने गाँव में रहने वाले इमाम की जीवन कहानियों को समानान्तर बुनती हैं. यह उनकी व्यक्तिगत कहानियाँ हैं, जिनमें दोनो देशों के बीच होने वाली घटनाएँ, दोनो भाईयों के बीच की दूरी को बढ़ाती जाती है. भारत से गये निजाम जैसे लोग, पाकिस्तान में फ़लने फूलने का मौका पाते हैं और जब किसी को भारत में अपने पुराने गाँव आने का मौका मिलता है तो वे अपनी खुशहाली दिखाते हैं यह जताने के लिए कि हमने पाकिस्तान जा कर अच्छा किया, "&lt;i&gt;लड़कियां इस तरह से सजी धजी सोने से मढ़ी हुई थीं कि सबको धोखा हुआ था कि वह चारों शादीशुदा हैं. बात बात पर वह लाहौर कराची का ज़िक्र कुछ इस चटखारे से करतीं कि गांव की सीधी साधी गरीब औरतें उन्हें अजीब हसरत की नज़र से देखने लगी थीं. उनके लिबास और ज़ेवरों पर उनकी नज़रें ठहरी थीं. उनके दिल व दिमाग में यह बात बिठाने की कोशिश पाचों कर रही थीं कि जो मुसलमान यहां रह गये हैं उनकी किस्मत में सिर्फ ख़ाक फांकना रह गया है&lt;/i&gt;."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर समय के साथ, एक धर्मी हो कर भी, पाकिस्तान के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले लोगों के बीच झगड़े और दंगे शुरु हो जाते हैं. भारत से आये महाज़िरों को नीचा देखा जाता हैं. निजाम का एक दोस्त जो पाकिस्तान छोड़ कर कनाडा जा रहा है, कहता है, "&lt;i&gt;हम बटवारे में बिहार से चटगांव जा कर बसे और वहां से भाग कर कराची आना पड़ा. यहां पर भी बिहारी होने की वजह से मार खायी .&lt;/i&gt;.." इधर भारत में इमाम का बेटा गयासुद्दीन पढ़ लिख कर कमिश्नर बन जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश छोड़ने के चालिस साल बाद हिन्दुस्तान आने वाला निजाम को समझ में आता कि देश छोड़ कर उसने सच में क्या खोया, लेकिन अब उसके लिए उस रास्ते से वापस लौट आना संभव नहीं. उसके परिवार के लिए उनका वतन पाकिस्तान है, और हिन्दुस्तान की खुली हवा में उन्हें डर सा लगता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निजाम अपने बेटे अख्तर के लिए हिन्दुस्तानी बहु चाहता है, पर जब वह रिश्ते की बात उठाता है तो कुछ लोग स्पष्ट कह देते हैं कि वह पाकिस्तान में बेटी नहीं ब्याहेंगे. अख्तर खुद भी समझता है कि हिन्दुस्तान में बड़ी हुई लड़की पाकिस्तान में नहीं रह पायेगी, "&lt;i&gt;खाने के वक्त तक नूरी भी अपने घर वालों के संग आ गई. उसे देख कर अख्तर परेशान हो गया. जीन्स पर मर्दानी शर्ट पहने वह लड़की स्मार्ट और जहीन लगी. बहस में इस तरह के तर्क दे रही थी कि अख्तर सोचने लगा कि यह न लाहौर में खप पायेगी न कराची में...वह हमारे मुल्क में घुट कर रह जायेगी... उस घुटन को जो हमें बुरी लगती है, उसका मैं आदी हो चुका हूँ. मछली को पानी से निकाल दो क्या वह जी पायेगी? उसी तरह मेंढ़क को समन्दर के गहरे पानी में डाल दो तो क्या वह जी पायेगा&lt;/i&gt;?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिन्दुस्तान में रहने वाले मुसलमानों की समस्याओं के बारे में लेखिका अंत में आशावान हैं. गयासुद्दीन का बेटा मजहर अपना नाम बदलना चाहता है, तो गयास उसे सलाह देता है कि अपना नाम "रोटा कपड़ा और मकान" रख लो. बेटा रोने लगता है तो गयास कहता है, "&lt;i&gt;रोने दो यार! ...दिल हल्का हो जायेगा और आदत भी पड़ जायेगी. इस मुल्क में रहना है तो "शाक प्रूफ़" बन कर रहना पड़ेगा, छुई मुई का पौधा नहीं. यहाँ तरह तरह के लोग हैं. माली मुश्किलात है. मुकाबला है. गन्दी, पस्त सियासत है. निज़ि फायदे हैं. अकाल है, बाढ़ है. ऐसी भीड़ में सबने नार्मल रहने का ठेका तो नहीं ले रखा है?&lt;/i&gt;"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बटवारें में लाखों जाने गयीं, घर परिवार बँटे. इतिहास की किताबें उस समय के खून खराबे के बारे में कुछ लिख भी दें, उनमें वह जीवन नहीं होगा, जो लोगों की आपबीति में होता है. कला, सिनेमा और साहित्य ही उसमें उलझे मानवों की कहानियाँ सुना कर यह समझ दे सकते हैं कि सचमुच क्या हुआ, कैसे हुआ, क्यों हुआ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस समय के बारे में कम ही लिखा गया है, कुछ लिखा गया है तो वह भी अधिकतर पाकिस्तान से भारत आने वाले लोगों की दृष्टि से. भारत में रह जाने वाले मुसलमान परिवारों की कहानियाँ और पाकिस्तान जाने का निर्णय लेने वाले लोगों की कहानियाँ न के बराबर ही हैं. साथ्यू की "गर्म हवा" जो कई दशक पहले आयी थी, देखने के बाद इस विषय पर कुछ अधिक नहीं पढ़ा था. इस दृष्टि से &lt;b&gt;नासिरा शर्मा&lt;/b&gt; की यह किताब बहुत सुन्दर लगी. किताब पढ़ते पढ़ते कई बार आँखें नम हो गयीं. अगर आप को मौका मिले तो इस किताब को अवश्य पढ़ियेगा (&lt;b&gt;ज़िन्दा मुहावरे, नासिरा शर्मा, अरुणोदय प्रकाशन दिल्ली, 1996&lt;/b&gt;)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-4148491208570654820?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/4148491208570654820/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/05/blog-post_19.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/4148491208570654820'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/4148491208570654820'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/05/blog-post_19.html' title='बँटने का दर्द'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-8612542093602493456</id><published>2011-05-14T08:51:00.001+02:00</published><updated>2011-05-14T09:58:33.051+02:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इटली'/><title type='text'>देसी गपशप</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;एक तरफ़ से तो सोचता हूँ कि दोस्ती तो मन मिलने की बात है, उसमें देसी विदेसी कुछ नहीं होता. लेकिन कुछ महीने बिना अपने देसी मित्रों से मिले निकल जायें तो लगता है कि जीवन कुछ फ़ीका सा रह गया. उनमें से अधिकतर सचमुच के मित्र नहीं, क्योंकि उनसे मन का कोई तार कुछ विषेश नहीं जुड़ता. यह भी नहीं कह सकते कि एक भाषा से जुड़ते हैं क्यों कि उनमें से कई लोग हिन्दी तो जानते ही नहीं थे, यहाँ अंग्रेज़ी भी भूल गये हैं और उनसे सब बात इतालवी भाषा में ही होती है. लेकिन फ़िर भी कुछ होता है जो हम देसी लोगों को जोड़ता है, जिसको समझना समझाना आसान नहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तो क्या चल रहा है? क्या नयी ताज़ी खबर?", अचानक लायब्रेरी से निकलते हुए वे दोनो मिले तो मन प्रसन्न हो गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"यार मन तो था कि इस बार कान्न के फ़िल्म फेस्टिवेल में जा कर अमिताभ की बहू को देख ही आते, पर छुट्टी की बात बनी नहीं. " श्रीमान हैं तो रायबरेली के लेकिन चूँकि पत्नी इलाहाबाद से हैं, इसलिए यूँ बनते हैं कि मानो बच्चन जी इनके साले हों.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"उसकी फोटो देखीं? बहुत सुन्दर लग रही थी. पर यह लड़कियाँ साड़ी या कोई इन्डियन ड्रेस क्यों नहीं पहनती? यह अरमानी या प्रादा के गाउन पहन लेती हैं, बिल्कुल बकवास!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अरे एश्वर्या को छोड़ो, यहाँ जो इन्डिया से एक अरबपति वेनिस में अपनी बेटी की शादी करने आये हैं, उनका सुना?" मित्र की पत्नी बोली.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ साल पहले, भारतीय मूल के इग्लैंड में रहने वाले स्टील के व्यवसायी मित्तल ने अपनी बेटी की शादी पर फ्राँस में वरसाई का राजभवन किराये पर लिया था और उस शादी में जाने कितने करोड़ रुपये खर्च किये थे. वैसी ही बात है कुछ. उनका नाम है प्रमोद अग्रवाल, लोहे का बिज़नेस हैं उनका और उनकी बेटी की शादी हो रही है. सुना है कि वह वेनिस में 800 मेहमान, 30 रसोईये, और जाने क्या क्या ले कर आये हैं, पूरे के पूरे द्वीप किराये पर लिये हैं, सबके लिए कार्निवाल की मध्ययुगीन पौशाकें बनायी गयीं हैं, वगैरह वगैरह. कई सौ करोड़ के खर्चे की बात हो रही है. शादी हो भी करण जौहर स्टाईल में, यानि संगीत, मँहदी वगैरह.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Graphic design by S. Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/designs/desi_gupshup.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;"हमारे घर में आ कर शादी कर रहे हैं, कम से कम हमें न्यौता तो देते", मित्र का कहना था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ताकि तुम भी शाम को वहाँ जा कर शकीरा के ठुमके देखते?" पत्नी ने पतिदेव को हलका सा ताना दिया. क्या जाने बालीवुड के सितारे बुलाये हैं या नहीं, बेटी की मँहदी में नचवाने के लिए, पर हालीवुड से शकीरा को बुलाया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब हिन्दी फ़िल्में भारत में आयीं थीं, शुरु शुरु में, तब किसी अच्छे घर की लड़की फ़िल्मों में काम नहीं करना चाहती थी, तो नाचने गाने वाली औरतों को फ़िल्मों में हीरोइन बनाते थे. आज बड़े बड़े घरों की लड़कियाँ लड़के फ़िल्मों में काम करके प्रसिद्धी पाते हैं, और जब नाम और पैसा हो जाये तो शादी ब्याह में नाचने का काम भी कर लेते हैं. यानि दुनिया गोल है, हर बार बात घूम कर वहीं लौट आती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी हमें देख कर, दो लोग और आ गये. विद्यार्थी हैं, पीएचडी कर रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अरे अंकल, आजकल इण्डिया तो बहुत तरक्की कर रहा है. न्यू योर्क में जो सट्टेबाजी का बड़ा घोटाला हुआ है, उसमें आधे लोग हिन्दुस्तानी ही हैं. उनका नेता राजरत्नम जो श्री लंका से हैं, और उनके साथी रजत गुप्ता, अनिल कुमार, राजीव गोयल, रूमी खान आदि. हिन्दुस्तानी, पाकिस्तानी, श्रीलंकन और बँगलादेशी, सब लोग भाई भाई की तरह थे, एक दूसरे को खबरे देते थे और करोड़ों डालर बनाते थे. रात को सीएनएन पर बता रहे थे", एक ने समाचार सुनाया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोचा कि बस माफिया और गुण्डागर्दी में ही कुछ पीछे रह गये हैं हम लोग. कुछ मुम्बई के भाई लोग बाहर विदेश में बिजनेस बनाये तो उसमें भी कुछ नाम हो अपना, फ़िर तो हर तरफ़ इन्डिया ही इन्डिया होगा, छा जायेंगे अपने लोग.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अच्छा, जो हमारा इन्डियन लड़का पिछले दिनों यहाँ बाग में मर गया था", मैंने ही बात बदली, "उसकी याद में मीटिंग हुई तो कोई भी नहीं आया, क्या बात थी?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करीब दो सप्ताह पहले, शहर के बीचों बीच, 21 साल का पँजाबी युवक, रनबीर सिंह, बाग की बैंच पर मरा पाया गया था. इल्लीगल प्रवासी था, यूरोप गैरकानूनी रहने वाला, जाने किस रास्ते से, भटक भटक कर इटली पहुँचा था. काम छूट गया था, तो सरकार ने रहने की अनुमति हटा ली. शराब बहुत पीने लगा था, मेरी एक इतालवी मित्र जो सोशल वर्कर हैं, ने मुझे बताया था. जब सर्दी बहुत थी तो रात को चर्च द्वारा चलाये जाने वाले रैन बसेरे में सोने आ जाता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"इतालवी भाषा ठीक नहीं बोलता. तुम उससे कुछ बात करके देखो. बहुत अकेला लगता है बेचारा", मेरी सोशल वर्कर मित्र ने मुझसे आग्रह किया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अच्छा मैं मिलने आऊँगा, बात करूँगा उससे, उसे समझाऊँगा, मैंने वादा किया था, पर फ़िर भूल गया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने बड़े शहर की भीड़ में अकेला रनबीर, जहाँ लोग दया से भीख तो दे देते हैं, पर प्यार से बात करने का समय किसके पास है. पार्क में जहाँ मरा था, वहीं बैंच के पास व्हिस्की की दो बोतलें मिलीं थीं, एक खाली, दूसरी अधखाली. सड़क पर रहने वाले बेघर लोगों की सहायता करने वाली एसोसियेशन ने उसकी याद में सभा आयोजित की थी, थोड़े से बेघर लोग ही आये थे. बैंच पर फ़ूल रखते हुए अपने झूठे शोक पर मन में थोड़ी शर्म महसूस हुई थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ उत्तर नहीं दिया किसी ने. मित्र बोले कि बेटी को लेने जाना था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"चलो, प्रोग्राम बनायेंगे, वीकएँड पर कुछ पिकनिक करते हैं, अब तो मौसम बढ़िया है, बारबेकू बनायेंगे!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ज़रूर! अच्छा चलो, फ़िर मिलते हैं!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-8612542093602493456?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/8612542093602493456/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/05/blog-post_14.html#comment-form' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/8612542093602493456'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/8612542093602493456'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/05/blog-post_14.html' title='देसी गपशप'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-4509617946614366749</id><published>2011-05-04T06:05:00.000+02:00</published><updated>2011-05-04T06:05:16.055+02:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यात्रा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='एशिया'/><title type='text'>गुलाब, अँगूर और रामबाण दवा</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;"एक बहुत सुन्दर बाग है यहाँ, देखने चलेंगे?", मित्र ने मुझसे पूछा तो समझ में नहीं आया कि कैसे उत्तर दिया जाये, जिससे कहीं जाना भी न पड़े और उसे बुरा भी नहीं लगे. सुबह सुबह निकले थे प्रोजेक्ट देखने, दिन भर भरी धूप में घूमे थे, अब वजाय कमरे में जा कर सुस्ताने के, उसका सुझाव था कि किसी बाग को देखने जाया जाये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"क्या है बाग में?", जब और कुछ समझ में नहीं आया तो मैंने बेवकूफ़ी वाला प्रश्न पूछा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मेरा प्रश्न मेरे मित्र को बेवकूफ़ी वाला नहीं लगा, उत्साहित हो कर बोला, "बहुत सुन्दर गुलाब के फ़ूल हैं. कुछ जानवर भी हैं, ऊँठ और घोड़े आदि. बहुत बढ़िया जगह है, तुम्हें अवश्य अच्छी लगेगी."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने उत्साह से मुझे वह बाग दिखाना चाहता था कि आखिरकार हाँ कहनी ही पड़ी. मैं बैलरी जिले में हेगड़ी बोम्मन्नाहल्ली तालुक में कुष्ठ रोग और विकलाँग पुनर्स्थान सम्बन्धी प्रोजेक्ट के सिलसिले में आया था. वह बाग वहाँ से करीब तीस मिनट की कार यात्रा पर, होसपेट जाने वाले रास्ते पर था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब गाड़ी एक फैक्टरी जैसे गेट से घुसी और बड़े से इन्डस्ट्रियल शैड के सामने रुकी तो थोड़ा अचरज हुआ कि यह कैसा बाग है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल वह गुलाब के फ़ूलों का निर्यात करने वाली फैक्टरी थी. अन्दर बीसयों लोग काम में लगे थे. कोई ट्राली में रँग बिरँगे गुलाबों को इधर से उधर ले रहा था, कहीं गुलाब की टहनियाँ काट कर उन्हें गुलदस्तों में सजा कर पैक किया जा रहा था. अन्दर दो वातानुकूलित कक्ष भी बने थे जिनमें ठँडक में हज़ारों गुलाब की कलियाँ कतारों में सजी थीं. पँद्रह बीस भिन्न रँगों के गुलाब थे वहाँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="VSL agrotech project, Bellary district" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/india/vsl_bellary_01.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="VSL agrotech project, Bellary district" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/india/vsl_bellary_02.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;यह &lt;b&gt;&lt;a href="http://www.vslagrotech.com/" target="_blank"&gt;वीएसएल कृषि-तकनीकी प्रजेक्ट&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; का हिस्सा था जिसके मालिक है राज्य सभा के सदस्य अनिल लाड, जिनकी लोहे की खानें और अन्य कई व्यवसाय भी हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शैड से बाहर निकले तो पीछे बड़े बड़े ग्रीनहाउस थे, जिनमें नियंत्रित वातावरण में गुलाब उगाये जाते हैं. हर एक ग्रीन हाउस में करीब 35 हज़ार गुलाब के पौधे हैं और सारा काम आधुनिक तकनीकों के सहारे से किया जाता है. यानि, कहने का बाग था, पर असल में विषेश प्रकार की फैक्टरी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="VSL agrotech project, Bellary district" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/india/vsl_bellary_03.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="VSL agrotech project, Bellary district" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/india/vsl_bellary_04.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;ग्रीन हाउस वाले हिस्से से बाहर निकले तो गाय और बैलों के हिस्से में पहुँचे. फैक्टरी के इस हिस्से में अलग अलग शैड के नीचे दसियों तरह की सुन्दर गाय और बैल बँधे थे. मुझे कर्णाटकी गायों और बैलों के सीधे नुकीले सींग बहुत अच्छे लगे. हाँलाकि मुझे विभिन्न गायों और बैलों की नस्लों का पता नहीं, पर फ़िर भी अलग अलग नस्लें देखना अच्छा लगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="VSL agrotech project, Bellary district" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/india/vsl_bellary_05.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="VSL agrotech project, Bellary district" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/india/vsl_bellary_06.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="VSL agrotech project, Bellary district" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/india/vsl_bellary_07.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;गायों के शैड के पीछे ऊँठों और घोड़ों के शैड बने थे, और सबके पीछे एक कृत्रम झील में पानी चमक रहा था, यह झील भी फैक्टरी वालों ने बनवायी है जिससे पूरी फैक्टरी को पानी मिलता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="VSL agrotech project, Bellary district" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/india/vsl_bellary_08.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;सब जगह घूम कर अंत में हम लोग "जननी गौशाला" पहुँचे, जो एक अलग तरह की फैक्टरी है. यहाँ एक रयासन विषेशज्ञ काम कर रहे थे. उन्होंने बताया कि इस गौशाला में गौ मूत्र से एक रामबाण दवा बनायी जाती है. एक सिलिन्डर में गौ मूत्र रखा जाता है, जिसे भाप बना कर उसके स्वच्छ पानी को अलग जगह बोतलों में भरा जाता है. गौ मूत्र से बने इस पानी की रसायनिक जाँच भी की गयी है और इसमें कई तरह के रसायन पाये जाते हैं. उन सज्जन के अनुसार इस पानी में शरीर की बहुत सी बीमारियाँ, जैसे कि ब्लड प्रैशर, डायबेटीज, अस्थमा, एक्ज़ीमा आदि ठीक करने की शक्ति है, और यह एक आयुर्वेदिक दवा मानी जाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="VSL agrotech project, Bellary district" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/india/vsl_bellary_09.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं उस पानी का स्वाद चखना चाहूँगा, तो मैंने सिर हिला दिया कि नहीं. मूत्र से बनी कोई चीज़ पीने का विचार अच्छा नहीं लगा. हालाँकि मन ही मन सोच रहा था कि यह तो स्वच्छ किया हुआ पानी है, इसमें मूत्र का स्वाद नहीं होना चाहिये. अब इस बात को सोचूँ तो थोड़ा दुख होता है कि क्यों नहीं चखा, क्या जाने फ़िर कभी इसका मौका मिले भी कि न मिले. उस तरह का स्वच्छ किया हुआ मूत्र खोज पाना आसान नहीं होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर में जब हम उस "बाग" से निकले तो हमारे मित्र ने कहा कि रास्ते में रुक कर अँगूर खरीदे जायें. कर्णाटक का यह हिस्सा बहुत उपजाऊ है, और आज कल यहाँ जगह जगह अँगूर, अनार जैसे फ़लों की खेती की जा रही है. जब अंगूर के खेतों के बीच पहुँचे तो हरे भरे दूर दूर तक फ़ैले खेत और अंगूर से लदी लताएँ देख कर सुखद आश्चर्य हुआ. तब तक शाम घिर आयी थी और वहाँ काम करने वाले लोग, टेम्पू या आटो में हर तरफ़ से चढ़ कर अपने गाँवों की ओर वापस जा रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="VSL agrotech project, Bellary district" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/india/vsl_bellary_10.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="VSL agrotech project, Bellary district" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/india/vsl_bellary_11.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;घूमने के बाद अँगर खाते हुए वापस हेगड़ी बोम्मन्नाहल्ली की ओर जा रहे थे तो सोच रहा था कि मित्र ने ठीक ही कहा था, यह आम बाग में घूमने वाली बात नहीं बल्कि विषेश मौका था जिसका फ़ायदा उठा कर नयी जगह देखने का मौका मिल गया था. इस घूमने फ़िरने में सारे दिन के काम की थकान और तनाव भी गुम हो गये थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="VSL agrotech project, Bellary district" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/india/vsl_bellary_12.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-4509617946614366749?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/4509617946614366749/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/05/blog-post_04.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/4509617946614366749'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/4509617946614366749'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/05/blog-post_04.html' title='गुलाब, अँगूर और रामबाण दवा'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-5767614574737804613</id><published>2011-05-02T07:36:00.000+02:00</published><updated>2011-05-02T07:36:22.430+02:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कला'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संगीत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भाषा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बौलीवुड'/><title type='text'>हिन्दी फ़िल्मों के बाउल गीत</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;b&gt;&lt;a href="http://www.caravanmagazine.in/" target="_blank"&gt;अग्रेज़ी पत्रिका कारवाँ&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; पिछले कुछ समय से अक्सर अनछुए से विषयों पर सुन्दर और लम्बे आलेख निकाल रही है, उस तरह का लेखन मेरे विचार में आजकल की अन्य किसी हिन्दी या अंग्रेज़ी की पत्रिका में नहीं दिखते. कारवाँ के नये अंक में मैंने त्रिषा गुप्ता का एक दिलचस्प आलेख पढ़ा जिसमें बात है मुम्बई के फ़िल्म जगत के बहुत से नये फ़िल्म निर्माताओं की, जो सोचते और बात तो अंग्रेज़ी में करते हैं और फ़िल्में बनाते हैं हिन्दी में.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आलेख में ऐसे कई उदाहरण हैं जिनसे इस बेमेल व्यवस्था का प्रभाव स्पष्ट दिखता है, चूँकि अंग्रेज़ी में सोचने समझने और लिखने वाले निर्देशक अपनी फ़िल्मों के सम्वाद भी अंग्रेज़ी में ही लिखते हैं जिनका बाद में हिन्दी में अनुवाद किया जाता है. पर यह अंग्रेज़ी के वाक्यों का शाब्दिक अनुवाद होता है, जिसमें मूल हिन्दी में सोचबने बोलने वाली सहजता नहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आलेख में यह बात भी उठायी गयी है कि शहरों से आने वाले इन फ़िल्म निर्माता निर्देशकों की अधिकतर गाँवों और छोटे शहरों से कोई जान पहचान नहीं, इनकी फ़िल्मों के विषय बड़े शहरों में ही केन्द्रित हैं, मध्य वर्गीय और उच्च मध्यवर्गीय लोगों की सोचने समझने की दुनिया. हालाँकि अनुराग कश्यप, मनीष शर्मा जैसे निर्देशक भी हैं जिनकी मुफस्सिल भारत से जान पहचान है, पर आलेख में यही चिन्ता झलकती है कि जिस तरह से मुम्बई के फ़िल्म जगत में यह बदलाव आ रहा है, उस तरह से छोटे शहरों और गाँवों की कहानियाँ हिन्दी सिनेमा से लुप्त हो जायेंगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे विचार में यह सच है कि बड़े शहरों में कमर्शियल मालस् और मल्टीप्लेक्स की संस्कृति का असर पड़ा है कि किस तरह की फ़िल्में बनायी जायें और ऐसे सिनेमा हालों में दिखायी जायें, लेकिन मुझे भविष्य में दूसरा बदलाव दिखता है, जिसमें आने वाले भारत के छोटे शहरों और गाँवों में बड़े होने वाले नवजवान हैं जिनमें आज अपने रहने सहने, तौर तरीकों पर बहुत गर्व है और आत्मस्वाभिमान भी. इसी बदलते भारत की व्यवसायिक ताकत हिन्दी फ़िल्म जगत में होने वाली भाषा और परिवेश को बदलेगी. पिछले कुछ वर्षों की सफ़ल फ़िल्मों के बारे में सोचें तो विदेशी परिवेश में सतही भारतीयकरण से बनी किसी भी सफ़ल फ़िल्म का नाम याद नहीं आता, जबकि छोटे शहरों और मुफ़स्सिल संस्कृति में घुली मिली सफ़ल फ़िल्मों के नाम तुरंत याद आ जाते हैं, "&lt;b&gt;फ़स गये से ओबामा&lt;/b&gt;" से ले कर "&lt;b&gt;तेरे बिन लादन&lt;/b&gt;" तक.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कारवाँ पत्रिका में एक अन्य आलेख है पश्चिम बँगाल के एक बाउल गायक मँडली की अमरीका यात्रा के बारे में, जिससे मुझे याद आये हिन्दी फ़िल्मों में गाये बाउल गीत.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Baul dolls from Sally Grossman's Baul Music archive" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/india/baul_dolls.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;एक ज़माना था था जब डमरु या इकतारा ले कर गाने वाले साधु, हिन्दी फ़िल्मों में अक्सर दिखते थे. शायद इस तरह के गीतों के पीछे बिमल राय, ऋषीकेष मुखर्जी जैसे बँगला फ़िल्म निर्देशकों का हाथ था जिन पर बाउल और रवीन्द्र संगीत का असर था. इस तरह के गीतों के बारे में सोचूँ तो दो गीत तुरंत याद आते हैं -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1) 1955 की बिमल राय की फ़िल्म &lt;b&gt;देवदास&lt;/b&gt; में गीता दत्त और मन्नाडे का गाया "आन मिलो, आन मिलो, आन साँवरे".&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2) 1957 की गुरुदत्त की फ़िल्म &lt;b&gt;प्यासा&lt;/b&gt; में गीता दत्त का गाया "आज सजन मोहे अंग लगालो, जन्म सफ़ल हो जाये".&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनके अतिरिक्त, हिन्दी फ़िल्मों के बाउल संगीत से प्रभावित अन्य कौन से गीत हैं, क्या आप को याद है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज शायद प्रभु से आत्मा मिलन के गीत के द्वारा अपने प्रेमी या प्रेमिका की विरह को व्यक्त करने का समय नहीं रहा. दूर दूर से देख कर प्यार करने के दिन गज़र गये. शायद इसलिए आज की हिन्दी फ़िल्मों में गली गली गाँव गाँव घूमने वाले बाउल भिक्षुक के गाने की जगह नहीं, लेकिन जिन मानव भावनाओं को यह गीत व्यक्त करते हैं, वह तो कभी पुराने नहीं पड़ेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-5767614574737804613?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/5767614574737804613/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/05/blog-post_02.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/5767614574737804613'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/5767614574737804613'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/05/blog-post_02.html' title='हिन्दी फ़िल्मों के बाउल गीत'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-6620512646743644994</id><published>2011-05-01T06:54:00.002+02:00</published><updated>2011-05-01T07:13:05.303+02:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यौनता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सभ्यता'/><title type='text'>यौन उदासीनता</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;जब "यौन उदासीन" लोगों के संगठन के बारे में सुना तो कुछ आश्चर्य सा हुआ. काफ़ी समय से मुझे यौन विषयों में दिलचस्पी है और इस क्षेत्र में कुछ शौध कार्य भी कर चुका हूँ, इसलिए सोचता था कि इस क्षेत्र की हर छोटी बड़ी बात की कुछ न कुछ जानकारी मुझे है, लेकिन जन्मगत यौन उदासीनता की बात भी हो सकती है, यह नहीं सोचा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Sexuality - graphic design by S. Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/designs/sexuality_02.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;लड़कपन में जब यौन इच्छाएँ जागती हैं तो किशोर किशोरियों के लिए सेक्स से जुड़े बहुत से प्रश्न बहुत अहम हो जाते हैं. उस समय यह सोचना कि कभी ऐसा समय भी आ सकता है जब यौन सम्बन्धों के लिए साथी के होते हुए भी यौन इच्छा नहीं हो, कुछ अविश्वासनीय सा लगता है. आजकल एक नयी हिन्दी फ़िल्म का विज्ञापन आता है, जिसमें तीन लड़के आपस में बात करते हैं और एक कहता है कि अक्सर लड़कियाँ कहती हैं कि "अभी मेरा मन नहीं तो कभी कभी पुरुष भी यही कह सकता है कि सेक्स के लिए उसका मन नहीं", तो दूसरा लड़का आश्चर्य से कहता है, "कोई आदमी कहे कि उसका सेक्स का मन नहीं, क्या ऐसा सचमुच हो सकता है?" यानि उनका सोचना है कि पुरुषों को तो हमेशा सेक्स की चाह रहती है. लेकिन अगर आप विवाहित हों या किसी लम्बे समय से आत्मीय रिश्ते से जुड़े हों तो अवश्य ऐसे मौकों से गुज़रे होगें जब यौन सम्बन्धों की इच्छा न हो. और अगर अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ तो भविष्य में हो सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज कल की भागती दौड़ती दुनिया में, भागम भाग का टेंशन, काम का टेंशन या किसी अन्य बात की चिंता या जल्दबाज़ी, यौनिक आत्मीयता की नाजुक इच्छा अक्सर खो जाती है. इंटरनेट और डीवीडी पर वयस्कों के लिए कामुक साहित्य और फ़िल्में (पोर्नोग्राफ़ी) आज बहुत आसानी से उपलब्ध हैं. कुछ लोग इनका प्रयोग अपनी खोयी हुई यौन इच्छा को जगाने के लिए भी करते हैं, लेकिन इसका अधिक प्रयोग भी यौन उदासीनता का बड़ा कारण है. इसलिए यौन उदासीनता के उपचार के लिए कामुक साहित्य, फ़िल्मों और यौन सम्बन्धों से कुछ दिन का उपवास लेने की सलाह दी जाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोग सब कुछ जान कर और सोच कर यौन सम्बन्ध न बनाने यानि ब्रह्मचर्य का व्रत लेते हैं, जैसे कि कैथोलिक पादरी या हिन्दू आध्यात्मिक गुरु. इस तरह के ब्रह्मचर्य का पालन करना आसान नहीं. भारतीय मनोवैज्ञानिक और सुप्रसिद्ध लेखक &lt;b&gt;सुधीर कक्कड़&lt;/b&gt; ने अपनी पुस्तक "मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक" (The psychoanalyst and the mystic) में लिखा है कि "गुरु होने का खतरा यह है कि उनका भक्त उन्हें अपने माता पिता के समान रूप में देखना है. इस खतरे की गुरु को समझ होनी चाहिये." उनका कहना है कि यह बात केवल धार्मिक गुरुओं के लिए नहीं, मनोवैज्ञानिकों और चिकित्सकों के लिए भी लागू होती है. लेकिन जिस तरह से और जितने अधिक लोगों की, और जितने लम्बे समय के लिए, धार्मिक गुरुओं के प्रति इस तरह की भावनाएँ होती है, उससे गुरु के पथभ्रष्ट होने का खतरा अधिक होता है. भक्तों की बातें सुन सुन कर, वह स्वयं को सर्वशक्तिमान, सामान्य मानव से ऊँचा समझने लगते हैं. इसका एक नतीज़ा यह भी होता है कि वे यौनिक दोषों में गिर जाते हैं. 70 साल के गुरु जो छुप कर अपनी जवान भक्तिनियों को निर्वस्त्र देखते हैं या बुढ़ापे में भी कई स्त्रियों से सम्बन्ध बनाते हैं, इस तरह के इनके बहुत से उदाहरण मिलते ही रहते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जन्मगत यौन उदासीनता की बात करने वाले जानबूझ कर ब्रह्मचर्य जैसा कोई निर्णय नहीं लेते, बल्कि उनका कहना है कि पैदाइश से ही, उनके मन में सेक्स सम्बन्धों के प्रति कोई आकर्षण नहीं होता. इतालवी यौन उदासीन संगठन के 28 वर्षीय अध्यक्ष एमानूऐले का कहना है कि उनके कई युवतियों से प्रेम सम्बन्ध हुए हैं. उन्हें भावनात्मक प्रेम में विश्वास है, शारीरिक प्रेम में नहीं. उन्हें चुम्बन या प्यार से गले लगना अच्छा लगता है लेकिन वह सेक्स सम्बन्ध की कोई इच्छा मन में महसूस नहीं करते और न ही अभी तक यह सम्बन्ध उन्होंने किसी से बनाये. उनका कहना है कि उनके प्रजनन अंगों में कोई दोष नहीं और अगर चाहें तो सेक्स सम्बन्ध बना सकते हैं, लेकिन वह नहीं चाहते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह पूछने पर कि अगर आप सम्भोग नहीं चाहते पर आप की प्रेयसी चाहती हो या आप परिवार बनाना चाहते हों, तो एमानूऐले कहते हैं कि विषेश परिस्थितियों में वह सम्भोग कर सकते हैं, पर आप तौर पर वह इसके बिना ही रहना चाहेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर मैं सोचता हूँ कि अगर एक बार सेक्स का आनन्द ले लें तो शायद उनकी यौन उदासीनता ही समाप्त हो जाये?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या यौन उदासीनता को भी अंतरलैंगिकता, समलैंगिकता या द्विलैंगिकता की तरह, यौन विभिन्नता का हिस्सा समझना चाहिये? शायद मनोवैज्ञानिक इसे यौन विभिन्नता के रूप में नहीं देखेंगे बल्कि बीमारी के रूप में देंखें. शायद इनका अवचेतन मन वैसे यौन सम्बन्ध चाहता है जिन्हें सामाजिक स्वीकृति नहीं है और जिनका सामना न करने के लिए यह लोग यौन उदासीन हो जाते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर अगर जो लोग इस तरह महसूस करते हैं अगर वह खुश हैं तो किसी और को इसमें परेशानी नहीं होनी चाहिये. इस संगठन का &lt;b&gt;&lt;a href="http://www.asexuality.org/home/" target="_blank"&gt;अपना वेबपृष्ठ भी है&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; जिसके करीब तीस हज़ार सदस्य हैं. यह नहीं मालूम कि संगठन में भारतीय सदस्य भी हैं और कितने. इस वेबपृष्ठ पर आप इस तरह के लोगों के बारे में जानकारी पा सकते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-6620512646743644994?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/6620512646743644994/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/05/blog-post.html#comment-form' title='12 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/6620512646743644994'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/6620512646743644994'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='यौन उदासीनता'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-8247941730587677080</id><published>2011-04-25T12:22:00.001+02:00</published><updated>2011-04-25T18:34:49.896+02:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दर्शन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पुस्तक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='एशिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धर्म'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लेखक'/><title type='text'>मन की खोज</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;कल &lt;b&gt;सत्य साईं बाबा &lt;/b&gt;का देहांत हो गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"साईं" शब्द से मेरी एक बहुत साल पुरानी याद जुड़ी है. तब मैं इटली में नया नया आया था और इतालवी भाषा को अच्छी तरह से नहीं जानता था. तब कई बार लोगों से बात करते हुए वाक्य के अंत में "साई" शब्द सुन कर बहुत हैरानी होती और मन में यह बात उठी कि शायद इतालवी भाषा और सिंधी भाषा में कुछ समानताएँ हैं. फ़िर इतालवी भाषा का ज्ञान बढ़ा तो समझ आया कि इतालवी "साई", लेटिन भाषा की "सपेरे" संज्ञा से बना है जिसका अर्थ है "जानना". कई इतालवी लोग बोलते समय "साईं" शब्द का प्रयोग "तुम जानते हो?" के तकिया कलाम की तरह करते हैं जैसे कि अंग्रेज़ी बोलने वाले कुछ लोग बात बात पर "यू नो?" (You know) कहते हैं. आज जब साईं बाबा की मृत्यु का समाचार सुना तो यही बात याद आयी. सोचा कि शायद भारत में प्रयोग किया जाने वाले "साईं" शब्द का मूल भी वही है, जो इतालवी भाषा में है, यानि "जानने वाला" या "ज्ञानी", चूँकि संस्कृत और लेटिन दोनो को इन्दोयूरोपीय मूल के भाषाएँ माना जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक समय था जब सत्य साईं बाबा के इटली में भी बहुत भक्त थे. 1980 के दशक के इतालवी राजनीतज्ञ &lt;b&gt;बेत्तीनो क्राक्सी&lt;/b&gt; (Bettino Craxi) के भाई अंतोनियो, साईं बाबा के बड़े भक्त थे और बँगलौर के पास किसी आश्रम में रहते थे. एक बार बेत्तीनो क्राक्सी भी अपने भाई से मिलने साईं बाबा के आश्रम गये थे, तब साईं बाबा ने उन्हें कहा था कि वह एक दिन इटली के प्रधानमंत्री बनेंगे. कुछ वर्षों के बाद ऐसा हुआ भी और क्राक्सी इटली के प्रधान मंत्री बने जिससे साईं बाबा की प्रसिद्धि पूरी इटली में फ़ैल गयी. 1990 के दशक में जब भी मुझे बँगलौर जाने का मौका मिलता तो हर बार मेरे इतलावी मित्र मुझसे पूछते कि क्या मैं साईं बाबा के दर्शन करने भी जाऊँगा? बाद में श्री क्राक्सी पर पैसे के घपले का आरोप लगा तो वह इटली छोड़ कर चले गये, साथ ही धीरे धीरे, साईं बाबा का नाम भी कुछ कम हो गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर मेरे मन में साईं बाबा की लोकप्रिय छवि से, जो उन्हें चमत्कार करने वाला बाबा वाली छवि थी, बिल्कुल भी आकर्षण नहीं था. प्रारम्भ से ही मुझे सोचने विचारने वाली बातें करने वाले आध्यात्मिक गुरुओं में दिलचस्पी रही है, जबकि चमत्कार करने वाले और वरदान देने वाले गुरुओं के प्रति मुझे अविश्वास सा होता है, लगता है कि लोगों की सहज श्रद्धा का गलत फ़ायदा उठाया जा रहा हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में जन्मी पनपी आध्यात्मिक परम्परा की जड़ें उपानिषिदों में हैं और उनमें मानव की अंतरात्मा की गहराईयों में छुपी जगत संज्ञा को खोजने की चेष्ठा है, यही चेष्ठा मुझे इस परम्परा की सबसे बड़ी उपलब्धी लगती है. पर योगी तपस्या से या आत्मसंयम से उड़ने लगें या चमत्कार करने लगें, इस तरह की बातों पर मेरा विश्वास नहीं है. मेरा मानना है कि भौतिक जीवन को भौतिक जगत के नियम मानने ही होंगें और उन नियमों से ऊपर उठने की बातें करने वाले लोग सच नहीं बोल रहे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह, आध्यात्म को धँधा बना कर पैसा कमाने लोग भी हैं, जो एक ओर माया संसार को त्यागने का मार्ग दिखाने का दावा करते हैं पर साथ ही मैनेजर भी बन जाते हैं ताकि उस पर कापीराईट बना कर सम्पति बनायी जाये. इस तरह के काम करने वाले लोग, चाहे वह दीपक चोपड़ा हों या श्री श्री रविशंकर, मुझे आकर्षित नहीं करते, आध्यात्म के व्यापारी लगते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनोवैज्ञनिक दृष्टि से सोचूँ तो मुझे लगता है सर्वज्ञानी सर्वशक्तिमान गुरु या राजनीतिक नेता जैसी आकृतियों की खोज उन व्यक्तियों को होती है जिनके मन में असुरक्षा की भावना हो. इस तरह की आकृतियाँ हमें बचपन में पैदा होने के बाद के उन दिनों में ले जाती हैं जब हमारे लिए माता पिता सर्वज्ञानी सर्वशक्तिमान होते थे, वही हमारे सभी निर्णय लेते थे और हमें मानसिक सुरक्षा की अनुभूति देते थे. शायद इसका अर्थ है कि मानसिक दृष्टि से मैं अधिक आत्मनिर्भर हूँ और अपने ऊपर इस तरह की किसी आकृति को नहीं स्वीकारना चाहता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;स्वाति चौपड़ा&lt;/b&gt; की नयी किताब "जागृत स्त्रियाँ - भारत में आधुनिक आध्यात्म की कहानियाँ" (Women awakened - stories of contemporary spirituality in India, Swati Chopra, Harper Collins publisher India, 2011) में आध्यात्म को स्त्री के दृष्टिकोण से देखने का प्रयास है. इसके पीछे उनकी भावना है कि पुरुषों के मुकाबले में नारियों के लिए सन्यास लेना, घर परिवार त्यागना, जँगल में अकेले निकल पड़ना जैसे काम कठिन हैं. इसका सबसे बड़ा खतरा है कि पुरुष दृष्टि उनके जगत्याग को मान न दे कर, उन्हें यौन वासना का पात्र ही मानती है. पारम्परिक हिन्दू धर्म में साधवियों के लिए मठ या आश्रम जिसमें केवल सन्यासी औरते रहें, इसका विधान नहीं रहा है. इस सब की वजह से नारियों के लिए सन्यास मार्ग पर चलना और जगसम्मानित आध्यात्मिक गुरु बनना कठिन रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस किताब में स्वाति चौपड़ा ने आठ नारी गुरुएँ के जीवन के बारे में लिखा है. इन आठ आकृतियों में एक हैं माँ शारदा देवी, स्वामी रामकृष्ण परमहँस की पत्नी, जिनकी जीवन कथा और सन्यास पथ को पुराने दस्तावेज़ो के माध्यम से समझने की कोशिश की गयी है. बाकी की सात आकृतियाँ आधुनिक गुरुओं की हैं - श्री आनन्दमयी माँ, माता निर्मला देवी, नानी माँ, जेत्सुनमा तेंज़िंग पाल्मो, माता अमृतानन्दामयी, खाँद्रो रिनपोछे और साध्वी भगवती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="Women spiritual gurus from contemporary India" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/india/women_spiritual_guru.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इन सब गुरुओं से स्वाति चौपड़ा ने साक्षात्कार किये हैं, उनके जीवन को जानने की और साध्वी बनने के मार्ग को समझने की चेष्ठा की है. इन साक्षात्कारों में श्रद्धा तो है लेकिन पत्रकार का कोतूहल भी है. अक्सर गुरुओं को देवाकृति मान कर उनके बारे में लिखने वाले भक्त लोग निष्पक्ष भाव से नहीं लिख पाते, और गुरु के सामान्य मानव जीवन संबन्धी बातों को समझने के लिए ठीक से प्रश्न नहीं पूछ पाते. स्वाति चौपड़ा के लेखन में यह अंधभक्ति नहीं दिखती, बल्कि पश्चिमी तार्किक विचारधारा से प्रभावित सोचने समझने वाले प्रश्न भी हैं जो सामान्य जगत और आध्यात्मिक जगत के बीच की धँधली सीमारेखा को दोनो ओर देखने की चेष्ठा करते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस किताब की चुनी गयी आठों नारी आकृतियाँ हिन्दु और बौद्ध धर्म से जुड़ी हैं. उनमें जैन, सिख, ईसाई आदि धर्मों की साध्वियों की कोई आकृति नहीं, जो मेरे विचार में इस किताब की थोड़ी सी कमज़ोरी है. किताब की हर आकृति से स्वाति जी प्रश्न पूछती हैं कि क्या गुरु के स्थान पर पहुँचने वाली स्त्रियों का आध्यात्मिक दृष्टिकोण पुरुष गुरुओं से भिन्न होता है? इस प्रश्न का उन्हें समान उत्तर मिलता है कि, स्त्री हो या पुरुष, एक बार आत्मा के गहन में छुपे परमात्मा से मिलन हो जाये तो नारी पुरुष की भिन्नता समाप्त हो जाती है, यानि गुरु तो केवल गुरु है, लिंग से परे, पर लिंगविहीन नहीं, उसमें नारी भी है, पुरुष भी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आध्यात्मिक मार्ग को अधिकतर जग त्याग और सन्यास के मार्ग के रूप में ही देखा समझा गया है, जोकि सामान्य रूप से पुरुष मार्ग है. पुस्तक में स्त्रियों की प्रतिदिन में काम में लगे रहते हुए भी आध्यात्मिक मार्ग की खोज करने का कुछ विवेचन है जो मुझे बहुत अच्छा लगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आठों आकृतियों की अलग अलग जीवन गाथाओं में, अंतरात्मा की खोज के प्रारम्भ के रास्ते कुछ अलग लग सकते हैं पर बाद में सभी रास्ते एक ही मार्ग पर आ जाते हैं. इस तरह से दो तीन नारी गुरुओं के जीवनचित्र पढ़ कर लगता है कि पुस्तक में कुछ दोहराव है. इसकी वजह से आखिरी जीवन चित्रों को मैंने उतने रोचक नहीं पाया जितने मुझे किताब के प्रारम्भ के जीवनचित्र लगे. फ़िर भी यह किताब मुझे पढ़ने योग्य लगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9115561631155571591-8247941730587677080?l=jonakehsake.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/8247941730587677080/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/04/blog-post_25.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/8247941730587677080'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/8247941730587677080'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2011/04/blog-post_25.html' title='मन की खोज'/><author><name>sunil deepak</name><uri>https://profiles.google.com/111791527414763979056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-Z1xfrfa8MNA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABZ0/D1k_7-jWgAs/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-1034741255810357321</id><published>2011-04-22T07:14:00.002+02:00</published><updated>2011-04-23T06:08:17.476+02:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यात्रा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तस्वीरें'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='एशिया'/><title type='text'>कबड्डी और बचपन के खेल</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;उत्तरी कर्णाटक की यात्रा के बाद ६ अप्रैल को शाम को बँगलौर लौटा था और हवाई अड्डे से टेक्सी ले कर होटल जा रहा था. गर्मी, धूप और गाँवों में घूमते हुए ऊबड़ खाबड़ सड़कों पर जीप के धक्के, बहुत थकान लग रही थी. होटल में पहुँच कर नहा कर तुरंत सो जाऊँगा यह सोच रहा था. टेक्सी जयानगर से गुजंर रही थी जब एक पार्क में कुछ चहलकदमी दिखी. आसपास बोर्ड पर कुछ कन्नड़ भाषा में लिखा था जो समझ नहीं आया, तो टेक्सी वाले से पूछा कि क्या हो रहा था वहाँ? उसने बताया कि भारतीय राष्ट्रीय कबड्डी प्रतियोगिता का उद्दघाटन होने वाला था जिसके लिए पूरे भारत से टीम आयी थीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;img alt="National kabaddi championship, Bangalore, April 2011 - images by S. Deepak" src="http://www.kalpana.it/blogpics01/india/kabaddi_championship_2011_02.jpg" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रिकेट का चाहे विश्व कप हो या आई पी एल, उसमें मुझे उतनी रुचि नहीं होती जितना "कबड्डी" शब्द सुन कर हुई. मुझे तो याद भी नहीं था कि कबड्डी नाम का कोई खेल होता था. एक पल के लगा कि बचपन लौट आया हो, बचपन में खेले कबड्डी, खो खो और पिट्ठू की याद आ गयी. होटल में पहुँचा तो बस सामान रखा, नहाने और आराम करने को भूल, तुरंत उसी पार्क में लौट आया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई बँगलौर के नगरपालक श्री नटराज प्रतियोगिता का उद्दघाटन करने आये थे, उनके आसपास बहुत भीड़ थी. पहले कुछ साँस्कृतिक कार्यक्रम हुआ जिसमें लोक नर्तकों ने अपनी नृत्य कला दिखायी, फ़िर विभिन्न शहरों से आयी 40 टीमों का जलूस निकला, जिनमें दिल्ली की भी एक टीम 
