रविवार, अगस्त 23, 2009

श्वास की मिठास

इस साल तो कोई भी अच्छी हिंदी फ़िल्म देखने को तरस गये. "न्यू योर्क" या "लव आज कल" जैसे नामी फ़िल्मों से भी उतना संतोष नहीं मिला. "संकट सिटी" और "कमीने" के बारे में अच्छा पढ़ा है पर देखने का मौका नहीं मिला. पर कुछ दिन पहले 2003 की बनी एक मराठी फ़िल्म देखी "श्वास" तब जा कर लगा कि हाँ कोई बढ़िया फ़िल्म देखी.

फ़िल्म को बनाया था संदीप सावंत ने और सीधी साधी सी कहानी है, कोई बड़े नामी अभिनेता या अभिनेत्री नहीं हैं, लेकिन फ़िल्म मन को छू गयी. कहानी है परशुराम (अश्विन छिताले) की, छोटा सा बच्चा जो अपनी उम्र के सभी बच्चों की तरह खेल कूद और शरारतों में मस्त रहता है, बस एक ही कठिनाई है कि बच्चे को कुछ दिनों से देखने में कुछ परेशानी हो रही है, जिससे न पढ़ लिख पाता है, न ठीक से खेल पाता है. परशु के पिता बस में कँडक्टर थे पर एक सड़क दुर्घटना से विकलाँग हो कर घर में रहते हैं, इसलिए परशु की चिंता उसके दादा जी केशवराम (अरुण नालावड़े) करते हैं. दादा जी ही परशु को ले कर पहले गाँव के डाक्टर के पास ले कर जाते हें जो उन्हें परशु को शहर के बड़े आँखों के डाक्टर के पास जाने की सलाह देता है.

दादा जी और परशु के मामा दिवाकर (गणेश मंजरेकर) बच्चे को ले कर पूना डा. साने (संदीप कुलकर्णी) के क्लीनिक में जाते हैं. साने जी अच्छे डाक्टर हैं पर बहुत व्यस्त हैं, उनके पास अपनी पत्नी, अपनी बेटी के लिए भी अधिक समय नहीं और गाँव से आये दादा जी, शहर के तेज भागते जीवन जिसमें लोगों के पास रुक कर प्यार से बोलने समझाने का समय नहीं, बेचारे परेशान से हो जाते हैं. डा साने उन्हें कहते हैं कि कुछ टेस्ट आदि करवाने होंगे और शहर में रुकना पड़ेगा. टेस्ट करवाने में भी खतरा हो सकता है यह जान कर दादा जी घबरा जाते हें तब उनकी मुलाकात सोशल वर्कर आशावरी (अम्रुता सुभाष) से होती है जो उन्हें धर्य से समझाती है और टेस्ट पूरे होते हैं. (तस्वीर में डा. साने दादा जी को बच्चे की बीमारी के बारे में बताते हैं)


टेस्ट से मालूम चलता है कि परशु की आँख में कैसर है. बीमारी अभी शुरु में ही है इसलिए अगर ओपरेशन किया जाये तो परशु बच सकता है पर उस ओपरेशन में वह अपनी दोनो आँखें खो देगा और अँधा हो जायेगा. दादा जी पहले रोते हैं, किसी अन्य डाक्टर की सलाह लेने की सोचते हैं, पर आशावरी की सलाह से मान जाते हैं कि ओपरेशन के अतिरिक्त कोई चारा नहीं. डा. साने का कहना है कि परशु को ओपरेशन से पहले बताना पड़ेगा कि वह ओपरेशन के बाद देख नहीं पायेगा, पर न दादा जी में हिम्मत है न आशावरी में कि इतनी बड़ी बात परशु को बता सकें. डा. साने भी हिचकिचाते हें कि कैसे यह बात बच्चे को कहे, पर परशु समझ गया है कि उसके दादा उसे देख कर क्यों रोते हैं, क्यो डाक्टर साहब उसे आँख बंद कर खेलने को कहते हैं. (तस्वीर में दिवाकर, परशु, नर्स और दादा जी)


परशु अस्पताल में भरती होता है पर अंतिम समय में किसी वजह से ओपरेशन नहीं हो पाता और उसके अगले दिन होने की बात होती है. वापस वार्ड में दादा जी परशु को ले कर अचानक गुम हो जाते हैं. वार्ड में सब परेशान हैं कि भरती हुआ मरीज कहाँ चला गया, किसकी लापरवाही से यह हुआ? आशावरी को चिंता है कि निराश दादा जी ने आत्महत्या न कर ली हो. अस्पताल में घूमने वाले पत्रकार टीवी चैनल इस बात को उछाल देते हैं कि अस्पताल लापरवाही से काम करता है और इसी लापरवाही से बच्चा और उसके दादा जी खो गये हैं. परेशान डा. साने पहले अस्पताल के अधिकारियों पर बिगड़ते हैं, फ़िर अपने सहयोगियों पर, पर पत्रकारों के प्रश्नों का उनके पास कोई उत्तर नहीं. (तस्वीर में, परशु के खोने से परेशान, डा. साने और आशावरी)


थके हारे डा. साने अस्पताल से बाहर निकलते हैं तो बाहर रंगबिरगी टोपी पहने दादा जी दिखते हैं, साथ में भोंपू बजाता खुश परशु. डाक्टर साहब बहुत बिगड़ते हैं, गुस्से से चिल्लाते हैं कि तुम जैसे जाहिल लोग कुछ अच्छा बुरा नहीं समझते, मैं तुम्हारे पोते का मुफ्त ओपरेशन कर रहा था और तुमने उसका यह जबाव दिया मुझे, जाओ ले जाओ अपने पोते को, मैं उसका ओपरेशन नहीं करुँगा.

दादा जी, डाँट खा कर पहले तो रुआँसे हो जाते हें फ़िर गुस्से से चिल्लाते हैं, आखिरी 24 घँटे थे मेरे परशु के पास इस रोशनी की दुनिया के, उन्हें क्या वार्ड के दुख भरे वातावरण में गुजारने देता? कौन सा संसार याद रहता परशु को, हमेशा के लिए अँधेरे में जाने के बाद?

फ़िल्म के सभी पात्रों का अभिनय बहुत बढ़िया है, विषेशकर दादा जी के भाग में केशव नालावड़े, परशु के भाग में अश्विन छिताले का और डाक्टर साने के भाग में संदीप कुलकर्णी का. हालाँकि फ़िल्म कम बजट में बनी है, पर गाँव वाले भाग का चित्रण बहुत सुंदर है. अस्पताल के दृश्य बिल्कुल असली लगते हैं.

आशावरी के भाग में अम्रुता सुभाष कुछ बनावटी लगती हैं पर मुझे अपने कार्य के सिलसिले में कई सोशल वर्कर को जानने का मौका मिला है, और मुझे लगता है पैशे से संवदेनापूर्ण होने की वजह से शायद उनके सुहानुभूती जताने के तरीके में, जाने अनजाने कुछ बनावटीपन सा आ जाता है, इसलिए वह भी बहुत असली लगीं.

हालाँकि फ़िल्म का विषय गम्भीर है पर उसमें न कोई अतिरंजना है, न बेकार की डायलागबाजी या रोना धोना. फ़िल्म के अंत में यही समझ आता है कि यह जीवन अँधा होने से रुक नहीं जाता, अँधा हो कर भी जीवन में कुछ बनने के, कुछ करने के, आत्मनिर्भर होने के रास्ते हैं. इस दृष्टी से फ़िल्म का वह छोटा सा हिस्सा जब दादा जी परशु को ले कर अँधे बच्चों के स्कूल जाते हैं, बहुत प्रभावशाली लगा.

अगर आप ने श्वास नहीं देखी और मौका मिले तो इसे अवश्य देखियेगा. फ़िल्म मराठी में है, पर चाहें तो इसकी डीवीडी में अंग्रेजी, हिंदी के अलावा भी कई भारतीय भाषाओं में सबटाईटल चुन सकते हैं. मुझे मराठी भाषा बहुत अच्छी लगती है पर पूरा नहीं समझ पाता, मैंने इसे हिंदी के सबटाईटल के साथ देखा. श्वास को 2003 की सबसे सर्वश्रैष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था और 2004 में यह भारत की ओर से ओस्कर पुरस्कार के लिए नामांकित की गयी थी.

शनिवार, अगस्त 22, 2009

चाँद और आहें

कुछ दिन पहले आयी एक फ़िल्म "शार्टकट" का एक गीत सुना तो बहुत अच्छा लगा.

"कल नौ बजे तुम चाँद देखना, मैं भी देखूँगा, और फ़िर दोनो की निगाहें चाँद पर मिल जायेंगी"

मन में तीस या चालिस साल पहले देखी फ़िल्म "शारदा" की याद आ गयी जिसमें कुछ इसी तरह का गीत था, "ऐ चाँद जहाँ वो जायें, तुम साथ चले जाना". जब हीरो राजकपूर कहीं पर चला जाता है और पीछे से उसकी पत्नी या प्रेयसी यह गीत गाती है. इस फ़िल्म की कहानी बहुत अज़ीब थी. राजकपूर जी प्यार करते हैं शारदा यानि मीना कुमारी से, वह कहीं जाते हैं तो पीछे से शारदा का विवाह उनके पिता से हो जाता है, और जब वह घर वापस आते हें तो पिता की नयी पत्नी को देख कर दंग रह जाते हैं. इस तरह भी हो सकता है, इस बात को माना जा सकता है, बिमल मित्र के उपन्यास "दायरे के बाहर" में भी यही होता है, लेकिन शारदा का यह कहना कि उनके पुराने प्रेमी अब उन्हें माँ कह कर पुकारें और माँ के रूप में सोचें, मुझे बहुत अजीब लगा था और बेचारे राज कपूर पर बहुत दया आयी थी. बिमल मित्र ने अपने नायक शेखर से इस तरह की बात नहीं की थी.

खैर शारदा की बात छोड़ें और "शार्टकट" के गीत की बात पर वापस लौट चलें. गीत सुन कर लगा कि वाह कितना रोमाँटिक गाना है, दूर से चाँद को देख कर एक दूसरे के लिए विरह में जलना. पुराने दिन याद आ गये. यही झँझट है हम प्रौढ़ों का, कुछ भी हो, बस पुरानी बातों को सोच कर भावुक हो जाते हैं.

फ़िर इंटरनेट पर यह गीत देखा तो सब रोमाँस छू मंतर की तरह गायब हो गया, वही स्कर्ट या बिकनी पहने, समुद्र किनारे नाचते इतराते अक्षय खन्ना और अमृता राव. यह बात नहीं कि समुद्र या अमृता सुंदर नहीं, पर इस गाने के बोलों के साथ ठीक नहीं बैठ रहे थे. लगा कि इस फ़िल्म के निर्देशक को इतने सुंदर गाने को इस तरह से बिगाड़ने की सजा दी जानी चाहिये. आप स्वयं इस वीडियो को देखिये और बताईये कि क्या मेरा दुखी होना सही है या नहीं?





शायद यह आशा करना कि आज के ज़माने में चाँद तारों की बातें की जायें, यह बात ही गलत है? दूर से चाँद को देख कर आहे भरने का गीत गाना, साठ सत्तर के दशक तक के वातावरण में तो फिट हो सकता है, आज के ज़माने में चाँद तारों के लिए किसके पास समय है? अगर प्रेमी युगल में से एक व्यक्ति विदेश गया है तो "नौ बजे चाँद देखना" गाने का क्या औचित्य होगा, क्योंकि जब लंदन में नौ बजे होंगे तब भटिंडा या मुंबई में रात को दो बजे होंगे, तो अलग अलग समय में चाँद देखने से निगाहें कैसे मिलेंगी? और आज के ज़माने में जब मोबाईल, फेसबुक, टिव्टर, ईमेल, चेटिंग आदि के होने से किसी से बिछड़ कर सचमुच का विरह महसूस करना नामुमकिन सा हो गया है, चाँद देखने की बात करना बेमतलब सा है. साथ ही, हमारी पुरानी यादों की भी घँटी बज जाती है. इन आधुनिक फ़िल्मवालों को कुछ ध्यान रखना चाहिये कि हम जैसे पके बालों वालों की भावनाओं को ठेस लग सकती है कि हमारी प्रिय रोमाँटिक सिचुएशन को इस तरह से बिगाड़ा जाया.

कुछ इसी तरह लगा था जब "लव आज कल" देखी जिसकी बहुत चर्चा हो रही है कि बहुत रोमाँटिक फ़िल्म है. वीर सिंह और हरलीन वाले भाग में तो मुझे रोमाँस दिखा था पर आधुनिक रिश्ते जिस तरह इस फ़िल्म में दिखाये गये हैं, जय और मीरा के बीच, उनमे रोमाँस कहाँ था, कुछ स्पष्ट समझ नहीं आया. लगा कि जय और मीरा का बस एक आधुनिक रिश्ता था, जिसमें साथ रहने का आनंद, साथ सोने का सुख तो था पर प्रेम नहीं दिखा.

प्रियतमा हमेशा के लिए जा रही है, पर हमें समझ न आये कि हमें उससे प्रेम है या नहीं, उसके बाद दो साल बीत जायें, हम कुछ प्रेम अन्य जगह बाँट कर, अचानक अपने सुविधापूर्ण जीवन और सहेलियों से, जिसमें कोई चुनौती नहीं दिखती, बोर या उदास हो जायें, और फ़िर कहें कि वैसे सचमुच में हम मीरा से ही प्यार करते थे, पर हमें पता नहीं था, कुछ बेतुका सा नहीं लगता? और मीरा, जो साल भर अपने साथ काम करने वाले के साथ रह चुकी हैं, दोनो साथ रहते थे तो सोते भी होंगे, उन्हें अचानक सुहागरात को याद आता है कि भाई हमारा सच्चा प्यार तो जय था? कुछ कन्फूसड लोगों वाली बात नहीं लगती, जिन्हें प्रेम क्या होता है यह सचमुच देखने का मौका ही नहीं मिला?

क्या यह केवल प्रेम की बदलती परिभाषा है, जीवन के व्यस्तता में मन की भावनाओं को न पहचान पाने की दुविधा है या कुछ और? या शायद, प्रेम के लिए, दूरी और विरह की आवश्यकता है, कोई रुकावट या दुख भी चाहिये बीच में जिसके बिना हम अपने प्रेम को पहचान नहीं पाते?

जुलाई की अमरीकी मासिक पत्रिका "द एटलाँटिक" (The Atlantic) में साँद्रा त्सिंग लोह (Sandra Tsing Loh) का लेख छपा था जिसमें उन्होंने अपने तलाक के बारे में लिखा था. उनका कहना है कि आज जब स्त्री पुरुष के सामाजिक रोल और अपेक्षाएँ बदल चुकी हैं, आज लोगों की औसत उम्र लम्बी हो गयी है, सौ वर्ष पहले की सोचें तो दुगनी हो गयी है, तो इस बदले हुए परिपेश में सोचना कि स्त्री और पुरुष वही पुराने तरीकों से साथ रहेंगे, प्रेम करेंगे, विवाह करेंगे, आदि यह ठीक नहीं.

तो क्यों बात करें वही पुराने प्रेम और विवाह की? क्यों बात करें चाँद तारों की? क्या इस नयी दुनिया को "प्रेम" शब्द के बदले में कोई नया शब्द नहीं खोजना चाहिये, जो आधुनिक जीवन की इस नयी भावना की सही परिभाषा दे सके?

शुक्रवार, जुलाई 17, 2009

रिश्ते

करीब तीस साल पहले की बात है, तब मैं उत्तरी इटली के एक अस्पताल में ट्रेनिंग ले रहा था. अस्पताल में साथ काम करने वाली अन्ना मुझे बहुत अच्छी लगती थी. जल्दी ही उससे दोस्ती हो गयी, अक्सर शाम को उसके घर जाता. अन्ना की दस साल की बेटी थी जूलिया और उसका पहले पति, यानि जूलिया के पिता से तलाक हो चुका था. अन्ना तब एक युवक से साथ बिना विवाह के रहती थी. अन्ना के साथी से मेरी कभी कोई विषेश बात नहीं हुई और आज उसका नाम भी याद नहीं. शाम को उसके घर के बाग में बैठ कर, कई बार अन्ना से मेरी लम्बी बातचीत और बहस होती.

जैसे कि एक बार बात शादी की हुई तो उसने पूछा कि भारत में कैसे युवक युवतियाँ परिवार के पसंद किये हुए जीवनसाथी से विवाह को मान जाते हैं? उसे यह बात समझ में नहीं आती, उसे लगता कि यह तो युवक और युवती दोनों के साथ अन्याय है. जब आप किसी संस्कृति में पले बड़े हुए हों तो कई बातें आप को स्वाभाविक लग सकती हैं, लेकिन जब कोई उनके बारे में प्रश्न पूछता है तो आप उस स्वाभाविक लगने वाली बातों के छुपे पहलुओं के बारे में सोचने को विवश हो जाते हैं.

इस तरह अन्ना से हुई बहसों ने मुझे मन ही मन में स्वाभाविक लगने वाली कई बातों पर सोचने का मौका दिया. अन्ना से सिर ढकने, शरीर ढकने के बारे में एक बार बात हुई तो वह बोली कि इटली में और यूरोप में सभी लड़कियाँ और स्त्रियाँ बदन दिखाती हैं तो क्या इसका अर्थ है कि यहाँ के लड़कों और पुरुषों में अधिक सभ्यता है, कि वह लड़कियों को नहीं छेड़ते? उसका तर्क था कि बात यह नहीं कि यूरोपीय पुरुष, एशिया या अरब देशों के पुरुषों से अधिक सभ्य हैं बल्कि फर्क है कि यहाँ का समाज इस तरह के व्यवहार को पुरुषों के पिछड़ेपन की तरह से देखता है, उसे सामाजिक स्वीकृति नहीं है और कानून ऐसे मामलों में सख्ती से आता है. कुछ दिन पहले एक पत्रिका में बुर्का पहनने के बारे में तर्क दिया जा रहा था कि इससे औरतें अधिक सुरक्षित महसूस करती हैं तो अन्ना की कही वही बात मन में आ गयी.

मध्यमवर्ग में पला बड़ा हुआ, मुझे अन्ना की उन्मुक्ता बहुत आकर्षित करती. उसका गर्मियों में छोटे छोटे कपड़े पहनना, खुल कर हँसना, देर रात तक बाहर साथ घूमना, उसका बिना विवाह के अपने साथी के साथ रहना, उसका सेक्स के बारे में बेझिझक बात करना.

मेरी ट्रेनिंग समाप्त हुई, शहर बदला और अन्ना से सम्पर्क छूट गया. करीब एक साल बाद, टेलीफोन पर बात हुई तो उसने बताया कि उसने अपने साथी से, जिसके साथ कई सालों से रह रही थी, विवाह करने का फैसला किया था. फ़िर बहुत समय तक कोई सम्पर्क नहीं हुआ और करीब दो साल बाद, एक अन्य पुराना मित्र मिला जिसने बताया कि विवाह के एक साल बाद ही, अन्ना और उनके दूसरे पति ने तलाक ले लिया था. वह दोनों तो अनजान नहीं थे, शादी से पहले छह या सात साल साथ रहे थे. इतने साल साथ रह कर भी क्या वह एक दोनो को ठीक से नहीं पहचान पाये थे, मेरे मन में इस तरह के बहुत प्रश्न उठे. जूलिया का सोच कर बुरा भी लगा.

अभी कुछ समय पहले अमरीकी पारिवारिक मनोविज्ञान की पत्रिका (Journal of Family Psychology) में एक शौध के बारे में पढ़ा जिसमें यह निष्कर्श निकला है कि पहले बिना शादी के साथ रहने वाले युगल जब विवाह करते हें तो उनमें असंतोष तथा तलाक अधिक होते हैं, तो अन्ना की शादी की बात याद आ गयी. शौध करने वालों का कहना है कि कई बार साथ रहने वाले युगल विवाह के बारे में ठीक से नहीं सोचते, बस चूँकि साथ रह रहे हैं तो चलो शादी भी करलो यहीं सोच कर विवाह करते हैं पर मन में इस बात को स्पष्ट नहीं करते कि विवाह किस लिये, क्या बदलेगा, और इस तरह जल्दी शादी से असंतुष्ट हो जाते हैं. बिना विवाह के साथ रहने वाले क्या विवाह करके बदल जाते हैं?

शायद बात मन में विवाह के प्रति बने विचारों की, निष्ठा की भी है?

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समाचार पत्र में पढ़ा कि जर्मनी में बर्लिन के एक वेश्याघर ने बदलते पर्यावरण की रक्षा के लिये नया कदम उठाया है. अगर आप वेश्याघर में कार के बजाय साईकल या जन यातायात जैसे कि बस से जायें तो वेश्याघर आप को 5 प्रतिशत की छूट देगा. इस वेश्याघर के मालिक का कहना है कि इस बात से उन्हें मुफ्त की प्रसिद्धी मिलेगी ही, पर्यावरण की रक्षा भी होगी. वेश्याघर के रेट पहले से पक्के हैं, 45 मिनट के सत्तर यूरो (करीब 4,200 रुपये).

यानि पत्नी से उकताए पुरुष अब यह कह सकते हैं कि वह तो वेश्याघर समाजसेवा की भावना से पर्यावरण को बचाने के लिए गये थे. अब आवश्यकता है कि पुरुष वेश्याओं वाले वेश्याघर भी कुछ इसी तरह का काम करे ताकि पत्नियाँ भी पर्यावरण को बचाने में समाजसेवा कर सकें और पतियों को सहयोग दे सकें!

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पति पत्नी की बातें, एक दूसरे को न समझ पाने की उल्झनें, और झगड़े. इस विषय पर चीनी कवि वांग जिंगझी (Wang Jingzhi) की एक प्रेम कविता मुझे बहुत संदर लगती है, जो 1995 में छपी थी जब वह 93 साल के थे. कविता छपने के एक वर्ष बाद उनका देहांत हो गया. 1922 में वांग अपनी प्रेम कविताओं के लिए प्रसिद्ध हो गये थे क्योंकि वह उन्मुक्त प्यार की बात करते थे और चीनी पारम्परिक मान्यताओं को ललकारते थे. 1925 में क्म्यूनिस्ट पार्टी का सदस्य बनने के बाद उन्होंने कविता लिखना छोड़ दिया था और दोबारा कविता लेखन वृद्ध हो कर किया. उनकी एक कविता की यह पक्तियाँ देखियेः

"कल रात मैंने तुम्हारी चिट्ठी का सपना देखा
जिसे मैं समझ नहीं पा रहा था, बस एक ही शब्द, "प्रेम" समझ में आ रहा था,
आशा करता हूँ कि आगे से मेरे सपने में अधिक स्पष्ट करके लिखोगी."

यानि, प्रेयसी, सच में तो तुमसे यह अपेक्षा नहीं कर सकता कि हम एक दूसरे से बात करें, और शायद आमने सामने एक दूसरे की बात को सुनना कठिन भी है, जाने कितनी बीती बातें बीच में टाँग अड़ाने आ जाती हैं. तो कम से कम सपने में कुछ समझने की आशा की जा सकती है!


बुधवार, जून 24, 2009

अपनी भाषा

पिछले कई वर्षों से किताबें खरीदना बंद कर दिया है मैंने.

कहाँ रखो और एक बार पढ़ कर उनका क्या करो, यही दुविधा थी जिसका उत्तर नहीं मिला. किताबें रखने की जगह सीमित हो और जब अलमारी किताबों से भरी हो तो नयी किताबें कहाँ रखी जायें? खरीदी किताबों को रद्दी के कूड़े में फ़ैंकने से दुख होता था, लेकिन इसके अतिरिक्त चारा भी नहीं था. कुछ किताबें तो हमारे घर के पास वाले पुस्तकालय में दे दीं, पर बाकी बहुत सी किताबें पहले बेसमैंट में रखीं और जब बेसमैंट की छोटी सी कोठरी में जगह की आवश्कता हुई तो बहुत सी किताबें फैंकनीं ही पड़ीं.

तो निर्णय लिया कि अब से अँग्रेज़ी, इतालवी जैसी भाषाओं में कोई किताब नहीं खरीदूँगा क्योंकि इन सब भाषाओं की नयी किताबें हमारे स्थानीय पुस्तकालय में तुरंत मिल जाती हैं. अगर कोई पुस्तक पुस्तकालय में नहीं हो, तो उसको खरीदने के लिए फार्म भर देने से, कुछ दिन में पुस्तकालय उसे खरीद लेता है. तो सोचा कि केवल पुस्तकालय से ले कर पढ़ूँगा. पर हिंदी की किताबें पढ़ने के लिए क्या किया जाये, वह तो इटली के किसी पुस्तकालय में नहीं मिलती? अंत में यही सोचा कि हर वर्ष भारत यात्रा में कुछ सीमित हिंदी की किताबें खरीदी जायें, पर इस निर्णय का पालन करना भी कठिन है.

प्रश्न है कि हिंदी की किताबें कहाँ से खरीदी जायें और कौन सी?

पहले क्नाटप्लेस में मद्रास होटल में आयर्वेदिक डिस्पेंसरी के पीछे हिंदी किताबों की दुकान थी, पर वह भी कुछ साल पहले बंद हो गयी. कुछ दिन पहले भाँजा बता रहा था कि दरियागंज में हिंदी किताबों के विभिन्न प्रकाशकों के शो रूम हैं पर अगर आप को कोई किताब चाहिये तो उसी प्रकाशक के पास मिलेगी जिसने छापा हो और ऐसी कोई जगह नहीं जहां आप विभिन्न प्रकाशकों की किताबें खरीद सकें. विश्वास नहीं होता कि इतने बड़े सुपरपावर बनने वाले भारत की राजधानी दिल्ली में रहने वाले लाखों लोगों में इतने हिंदी की किताबें खरीदने वाले लोग नहीं कि उनके लिए इसकी दुकानें हों, एक भी दुकान हो?

फ़िर झँझट कि कौन सी किताब खरीदी जाये. कुछ पत्रिकाओं में नयी किताबों की समीक्षा छपती रहती हैं लेकिन जिस तरह नियमित रूप से अँग्रेज़ी की सबसे अधिक बिकने वाली किताबों की टाप टेन जैसी लिस्ट छपती हैं, जिससे आप देख सकते हें कि इस समय कौन सी नयी किताबें चर्चित हैं या पसंद की जा रही हैं, वैसा हिंदी में नहीं होता. या शायद मुझे मालूम नहीं? अगर पुस्तकालय से किताब लो तो सब कुछ पढ़ सकते हें, अगर न पसंद आये तो वापस दे दीजिये और किसी अन्य नये लेखक को पढ़ने के लिए ले लीजिये. लेकिन अगर मेरी तरह, साल में एक बार भारत आते हैं और कुछ गिनी चुनी किताबें खरीदना चाहते हैं तो इस तरह नहीं कर सकते. नतीजा यही होता है कि हर बार पहले से जाने पहचाने पुराने लेखकों की किताबें खरीदये.

ऐसा क्यों है?

कुछ दिन पहले अँग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस में तवलीन सिंह ने अपने लेख "आयतुल्लाह के पाठ" (Lessons from Ayatullah) में लिखा था:

"अपने प्राचीन हिंदू भारत के विषय में बहुत सी बातें हें जिन्हें हमें समझने और सम्भालने की कोशिश करनी चाहिये. मुझे दुख होता है जब मैं दक्षिण पूर्वी एशिया के किसी देश में जाती हूँ और देखती हूँ कि भारत की प्राचीन सभ्यता का कितना गहरा असर था जो आज भी बना हुआ है और जो अपने यहाँ खोया जा चुका है. अगर हम यह चाहते हैं कि भारत की सभ्यता बस बोलीवुड की सभ्यता मात्र बन कर न रह जाये तो हमें यह समझना चाहिये कि क्यों वह यहाँ खो गया है? हमें यह समझना चाहिये कि क्यों हमारे महानगरों में कोई दुकाने नहीं जहाँ भारतीय भाषाओं कि किताबें मिलें? अगर करोड़ों लोग प्रतिदिन हिंदी की अखबारें पढ़ रहे हैं तो वह हिंदी की किताबें क्यों नहीं खरीदते? क्यों छोटे शहरों में किताबों की कोई दुकान नहीं मिलती? क्यों हमारे गाँवों में कोई किताबें नहीं बेचता?"

स्थिति को समझने के लिए उसे विभिन्न दृष्टिकोणों से देखना होगा. जुलाई 2008 की "सामायिक वार्ता" पत्रिका में योगेंद्र यादव ने अपने सम्पादकीय में लिखा था:

"हाल ही में जारी इन आकंड़ों के मुताबिक सन् 2001 में देश भर में अंग्रेजी को अपनी मातृभाषा बताने वाले लोग सिर्फ 0.02 फीसदी थे, यानि हर दस हजार में से सिर्फ दो व्यक्ति अपने घर में पहली भाषा के रूप में अंग्रेजी बोलते थे. ... सन 2006 में देश भर में छह फीसदी बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ रहे थे. ज्यादा चौकाने वाला आंकड़ा है कि सन् 2003 और 2006 के बीच सिर्फ तीन सालों में जहां भारतीय भाषाओं में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या 24 फीसदी बढ़ी वहीं अंग्रेजी में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या में 74 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. अगर स्कूली शिक्षा देश के भविष्य का दर्पण है तो अंग्रेजी बढ़ रही है और भयावह दृष्टि से बढ़ रही है."

दूसरी ओर हिंदी तथा भारतीय भाषाओं में अखबार पढ़ने वालों की संख्या भी बढ़ी है. देश के 22 करोड़ अखबार पढ़ने वालों में से बीस करोड़ लोग हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में अखबार पढ़ते हैं. टीवी पर हिंदी की चैनल देखने वाले लोगों के सामने, अंग्रेजी चैनल देखने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है. इस स्थिति के बारे में यादव जी ने लिखा कि, "भारतीय भाषाँए अंगरेजी के साये तले सूखने या मरने वाली नहीं है लेकिन जहां उनका शरीर फल फूल रहा है वहीं उनका ओज घट रहा है, आत्मा सिकुड़ रही है." इसे वह भाषा की राजनीति को नये तरीके से परिभाषित करने के मौके के रूप में देखते है, और पुराने "अंग्रेजी हटाओ" के नारे को छोड़ कर, वह अंग्रेजी को भारतीय भाषा मानने की सलाह देते हैं और अंग्रेजी को कम करने की बात को छोड़ कर "हिंदी बनाओ" की बात पर जोर देने की सलाह देते हैं.

यह सच है कि आज की दुनिया में तकनीकी और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्रों में अंग्रेजी न जानने का अर्थ है कि इन क्षेत्रों में होने वाले विकास से कट जाना. कुछ दिन पहले मेरठ में हो रहे एक संस्कृत सम्मेलन की बात पढ़ी थी जिसमें लिखा था कि क्मप्यूटर की प्रोग्रामिंग की भाषा के रूप में संस्कृत बहुत उपयुक्त है, पर इस तरह की बात आज व्यावहारिक नहीं मानी जा सकती जहां फ्राँस, जर्मनी, स्पेन जैसे विकसित देश भी जो अन्य सब काम अपनी भाषा में करते हैं, इन क्षेत्रों में अंग्रेजी के वर्चस्व को मानने को मजबूर हैं.

मुझे ब्राजील, चीन और कोंगो जसे देशों का अनुभव है. जानता हूँ कि ब्राजील में पोर्तगीस भाषा में शौध कार्य में बहुत बढ़िया काम हुआ है, चीन में चीनी भाषा में काम हुआ है, कोंगो में फ्राँसिसी भाषा में काम हुआ है, पर इस काम को अपने देश की सीमा से बाहर दूसरे लोगों तक पहुँचाना कठिन है, और किसी भी अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक सभा में इन देशों की उपस्थिति नगण्य ही रहती है, वे लोग नये होने वाले विकासों से कटे रहते हैं. इटली में, जहाँ मैं रहता हूँ, पंद्रह साल पहले तक अंग्रेजी या फ्राँसिसी भाषा पढ़ने का मौका कुछ उसी तरह मिलता था जिस तरह हमें मिडिल स्कूल में तीन साल तक संस्कृत पढ़ने का मौका मिलता था. पर पंद्रह साल पहले फैसला लिया गया कि प्राईमरी विद्यालय से ले कर, हाई स्कूल तक, सब छात्रों को अंग्रेजी दूसरी भाषा के रूप में पढ़ायी जायेगी. हालैंड ने फैसला लिया कि सारी पढ़ाई अंग्रेजी में होगी और उनकी अपनी डच भाषा को केवल भाषा के रूप में पढ़ाया जायेगा.

अगर हिंदी में उच्चतम स्तर तक तकनीकी तथा वैज्ञानिक शिक्षा कि सुविधा हो भी जाये तो भी यह स्नातक बाकी विश्व से किस तरह से बात करेंगे, उनका काम किन अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में छपेगा, जबकि उनके क्षेत्रो में होने वाले नये विकासों को अनुवादित करके उन तक पहुँचाया जा सकता है? तो क्या इसका अर्थ है कि अंग्रेजी न जानने वालों को इन क्षेत्रों में उच्च स्तर पर पढ़ाई करने का मौका नहीं मिलना चाहिये? मैं सहमत हूँ कि यह मौका अवश्य मिलना चाहिये पर इस तरह के स्नातकों की सीमाओं को स्पष्ट माना जाना चाहिये और उनसे बाहर निकलने के साधनों को भी तैयार किया जाना चाहिये. इसका एक उदाहरण है कि इसी तरह का एक समाचार पढ़ा था कि इस बार के सिविल सर्विस इम्तहान में छह लोग भी हैं जिन्होंने हिंदी माध्यम से इन्तहान दिया और विदेश मंत्रालय के लिए चुने गये हैं, उनकी अंग्रेजी भाषा की जानकारी को सुदृढ़ करने के लिए कोर्स की सुविधा दी गयी है.

इस लिए मैं यादव जी के विचारों से सहमत हूँ कि बात अंग्रेजी से लड़ाई की नहीं बल्कि बात हिंदी को बनाने और दृढ़ करने की है, पर यह किस तरह हो, यह प्रश्न जटिल है. अन्य सब बातों को भूल भी जायें, एक बात के लिए ध्यान आवश्यक है कि यह बात गरीब, कमज़ोर वर्ग की भी है जो अंग्रेजी न जानने की वजह से दबाव सहता है क्योंकि शासन और ताकत की भाषा तो अंग्रेजी ही है. जो लोग इस दिशा में काम कर रहे हैं वह इस विषमता से किस तरह लड़ सकते हैं? क्या नयी तकनीकें कोई रास्ता दिखा सकती हैं जिनसे गरीब, कमजोर वर्ग का संशक्तिकरण हो जिसमें अंग्रेजी जानने या न जानने का उनके जीवन पर असर कम हो?

एक अन्य बात है प्राथमिक स्तर पर शिक्षा के माध्यम की बात. इस विषय में हुए शौध ने बताया है कि प्राथमिक शिक्षा अपनी मातृभाषा में ही होनी चाहिये. क्या ऐसा हो सकता है कि पूरे भारत में प्राथमिक स्तर पर सारी शिक्षा को अंग्रेजी माध्यम की बजाय स्थानीय भाषा में किया जाये और अंग्रेजी को केवल भाषा के रूप में पढ़ाया जाये?

हिंदी के लेखक, विचारक और शुभचिंतक जो नहीं कर पाये, उसे नीचा समझे जाने वाले बाज़ारी ताकत ने ही कर दिखाया है. जनसंस्कृति में हिंदी के महत्व को स्थापित करने में हिंदी अखबारों और पत्रिकाओं की बिक्री, हिंदी फिल्मों और फिल्मी संगीत ने, हिंदी टीवी चैनलों ने जितना किया है उतना शायद कोई सरकारी या गैरसरकारी संस्था नहीं कर पायी.

हिंदी और भारतीय भाषाओं के साहित्य का अंग्रेजी में अनुवाद और अंग्रेजी में छपने वाले विदेशी साहित्य का भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी हो रहा है और शायद अगले कुछ वर्षों में और बढ़ेगा. अगर इतालवी, फ्राँसिसी, स्पेनिश, पोतर्गीस भाषाओं के प्रकाशक यह आसानी से जान सकें कि किन हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में लिखने वाले लेखकों की किताबें सराही जा रही हैं, बिक रहीं हैं तो उनके लिऐ अन्य भाषाओं के बाज़ार खुल सकते हैं.

बालीवुड के सितारे, काम हिंदी फिल्मों के करते हैं पर बातचीत और साक्षात्कार और चिट्ठे अंगरेजी में देते हैं, लेकिन जब इंटरनेट पर भारतीय भाषाओं में पढ़ने वाले बढ़ेंगे तो वे लोग भी हिंदी में अपनी बात लिखने कहने की कोशिश करेंगे?

आजकल समाचार पत्र "देल्ही" का नाम "दिल्ली" में बदलने की बात भी कर रहे हैं. मुझे लगता है कि इस तरह की बातें वही लोग उठाते हैं जिनमें आत्मविश्वास नहीं, या जिन्हें सचमुच की समस्याओं से सरोकार नहीं, बल्कि अस्मिता की बात उठा कर उसका राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं. मैंने तो आज तक कभी भी हिंदी पढ़ने लिखने वालों में देल्ही शब्द को नहीं देखा सुना, इसका उपयोग केवल अंग्रेजी बोलने वाले ही करते हैं. जब तक हिंदी सुरक्षित है तब तक दिल्ली को अपने नाम की अस्मिता को बचाने की कोई चिंता नहीं, हाँ अगर हिंदी ही नहीं रहेगी तो नाम देल्ही हो या दिल्ली, क्या फर्क पड़ेगा?

बात हिंदी किताबों को खरीदने से शुरु की थी. आखिर में पाया कि क्नाट प्लेस में प्लाज़ा सिनेमा वाली सड़क पर जैन बंधुओं की नयी दुकान खुली है जहाँ पहले माले पर कुछ हिंदी की किताबें भी हैं. इस बार भी मैंने पुराने जाने पहचाने लेखकों की किताबें ही खरीदी हैं. आशा है कि जनसत्ता जैसे दैनिक या फ़िर टीवी पर "भारत का सबसे बड़ा समाचार गुट" जैसा दावा करने वाला दैनिक भास्कर जैसे अखबार, हिंदी किताबें बेचने वाली दुकानों के सहयोग से नियमित रूप से अधिक बिकने वाली हिंदी की टाप टेन किताबों के बारे में छापेंगे, और हिंदी के बढ़ते फ़ैलते चिट्ठाजगत से जुड़े लोग हिंदी की किताबें बेचने वाली दुकानों पर जा कर नयी छपने वाली किताबों को खरींदेगे, उनके बारे में बात करेंगे, उनकी आलोचना और प्रशंसा करेंगे, और कभी मैं भी नये लेखकों की किताबें खरीदूँगा!

सोमवार, जून 22, 2009

अतीत का मूल्यांकन

"आप मेरे साथ क्यों चल रहे हैं?" मां ने अचानक मुझसे पूछा. बात कम ही करतीं हैं आजकल माँ, और जब करती भी हैं तो इस तरह कि बात अधिकतर समझ नहीं आती. एक तो उनकी आवाज़ इतनी धीमी हो गयी है कि समझने के लिए बहुत ध्यान से सुनना पड़ता है. उस पर से उनके शब्द गड़मड़ हो गये हैं, पुरानी ऊन के गोले की तरह, एक दूसरे से चिपटे हुए, कहना कुछ चाहती हैं, पर मुख से कुछ और ही निकलता है और वह भी अधूरा.

"मां, आप का बेटा हूँ तो आप के ही साथ चलूँगा, और किसी की मां के साथ तो नहीं जा सकता?", मैंने कहा तो उन्होंने उत्तर नहीं दिया पर लगा कि वह कुछ अश्वस्त हो गयीं हों.

हम लोग जहाँ रहते हैं वहीं कम्पाऊँड में सैर कर रहे थे. घर के आसपास की सैर या फ़िर सब्ज़ी खरीदने के अलावा घर से बाहर नहीं निकलता, और अगर कोई मिलने वाला मित्र या रिश्तेदार न हो, तो सब समय पढ़ने में ही गुज़रता है. शायद इसी लिए अपने परिवार के अतीत से जुड़ी बातें अक्सर मन में आ जाती हैं, जिनके बारे में अक्सर सोचता रहता हूँ. चूँकि कोई अन्य नहीं जिनसे बात कर सकूँ, बहुत से प्रश्न और उत्तर मन में अपने आप उठ कर, अपने आप ही शांत हो जाते हैं.

सोचता हूँ कि मानव कैसा बना है कि उसे लगता है कि उसका जीवन का कुछ महत्व है. वह सोचता है कि जो वह लिखता है, जो वह सोचता है, उस सबका कुछ महत्व है. पर वही मानव अगर रुक कर सोचे तो पायेगा कि पृथ्वी पर जीवन के विकास के इतिहास में उसका स्थान कितना छोटा सा है, और एक किसी मानव के जीवन का, उसके सोचने और लिखने का, उसके जीवन का प्रभाव अगर समय की लम्बी दृष्टि से देखा जाये तो नगण्य से भी छोटा होगा. लेकिन फिर भी आज के युग में अखबार, टीवी, रेडियो, पत्रिकाँए, आदि छोटी छोटी बातों को ले कर इस तरह सारा दिन बार बार दौहराती रहती हैं, मानो जग हिला देने वाली घटना हुई हो. लेकिन इन सबको स्वयं भी अपने इस झूठ मूठ के गढ़े जाने वाले इतिहास पर विश्वास नहीं, इसीलिए अगले दिन उन जग हिला देने वाली घटनाओं को भूल कर, किसी अन्य बात पर उसी तरह का तूफ़ान गढ़ने में जुट जातीं हैं. रुक कर, सोच कर, समझ कर कुछ भी कहने सुनने की बात नहीं होती, या बहुत कम होती है.

पैसा, बेचना, कमाना, आदि ही आज के जीवन के सर्वव्यापी गुण हैं, और इस बाज़ार युग में रुक कर, सोच समझ कर की जाने वाली बात को सुनने का समय भी किसी के पास नहीं है.
***

सोच रहा था कि इतिहास कैसे बनता है? पिछले कुछ दशकों में, पहले पत्रों, किताबों और पत्रिकाओं के जनाकरण से, और फ़िर तस्वीरों, चलचित्रों से, और अब, इंटरनेट के माध्यम से, करोड़ों लोग अपने स्वर उठा सकते हैं, इतिहास के बारे में अपनी बात के निशान छोड़ सकते हैं. इतने स्वर उठने का तो मानव इतिहास में पहले कभी अवसर नहीं मिला था? पहले तो बड़े बड़े राजा महाराजा ही, अपनी बातों को जीवनी लिखने वाले, राज कवियों और प्रशस्ति गायकों के माध्यम से कह पाते थे. तो क्या आज का जो इतिहास बनेगा वह पहले लिखे जाने वाले इतिहास से भिन्न होगा, और किस तरह भिन्न होगा?

किसी दुर्घटना की गवाहियाँ सुने तो समझ आता है कि "आँखों देखा" भी देखने वाले कि दृष्टि के अनुसार भिन्न हो सकता है, तो लाखों करोड़ों दृष्टियों से देखे इतिहास में भी तो करोड़ों भिन्नताँए ही होगी. बात फ़िर घूम कर वहीं आ जाती है कि अंत में, समय के साथ लोग अपनी छोटी छोटी बातों को भूल जायेंगे और माना जाने वाला इतिहास इस पर निर्भर करेगा कि इतिहासकार ने किसकी आवाज़ों को विश्वासनीय माना और किन बातों की नींव पर अपने इतिहास का ताना बाना बुना.

पिछले दिनों जनसत्ता अखबार में श्री अपूर्वानंद का लेख, "जेपी आंदोलन की भूल" को पढ़ा तो यही अलग अलग इतिहास वाली बात मन में आयी. इस आलेख में उनका आरोप है कि उन्नीस सौ सत्तर के दशक में होने वाले जयप्रकाश नारायण के जन आंदोलन ने सांप्रदायिक दलों, जनसंघ तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, को राजनीतिक मान्यता दिलाने का काम किया. अपनी इस बात के समर्थन में वह पत्रकार फैसल अनुराग तथा कवि नागार्जुन के उदाहरण देते हैं.

जनसत्ता अखबार में ही, इसी आरोप का कुछ कुछ खँडन किया है, दो हिस्सों में छपे प्रभाष जोशी के लेख, "जो जेपी को नहीं जानते" एवं "लोकतंत्र अपना कर पचाता है" ने, जोकि जयप्रकाश नारायण के जन आंदोलन के शुरु के इतिहास यानि गुजरात और बिहार छात्र आंदोलनों की बात को विस्तार से बताते हैं कि प्रारम्भ में इन आंदोलनो में राजनीतिक दल शामिल नहीं थे. लेकिन लेख के अंत में वह इस बात को मानते लगते हैं कि जेपी आंदोलन ने जनसंघ तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को राजनीतिक मान्यता दी, जिसे वह उचित भी बताते हैं -

"संघ परिवार और उसकी विचारधारा को अछूत और संवाद के लायक न मान कर आप समाप्त नहीं कर सकते. वे भारत की एक सामाजिक राजनीतिक ताकत हैं जिनकी अनदेखी करके आप उनसे नहीं निपट सकते. उनसे संवाद और बरताव करके ही आप उनका निकाल कर सकते हैं. जेपी ने उन्हें अपने आंदोलन में साथ ले कर यही कोशिश की. सही है कि उस आंदोलन से संघ तथा भाजपा अपने राजनीतिक जीवन में ज्यादा वैध और मान्य हुए. लेकिन लोकतंत्र में किसी को भी ठीक करने का यही तरीका है."

पापा भी जेपी आंदोलन से जुड़े थे, उस समय मैं मेडिकल कोलिज में पढ़ता था. तब मुझे न राजनीतिक बातों में दिलचस्पी थी, न ही छात्र आंदोलन में जुड़े गुजरात और बिहार के अपने हमउम्र छात्रों की बातों की कोई जानकारी थी. घर पर आये पिता के मित्रों सहयोगियों से बात, नमस्कार, कैसे हैं, आदि की औपचारिकता तक ही रुक जाती थी. 1975 में दिल्ली के बोट क्लब में हुई जेपी की रैली और, रामलीला मैदान में जेपी के साथ विभिन्न पार्टियों की सभा में भी गया था, पर इन बातों से जुड़े मुद्दों की अधिक समझ नहीं थी और न ही अधिक जानने समझने की जिज्ञासा ही थी. इसलिए यह बात नहीं कि इस बहस में मैं अपनी किसी विषेश जानकारी से कोई नयी बात जोड़ सकता हूँ.

कुछ समय पहले इस समय के बारे में रामनाथ गुहा की किताब "इंडिया आफ्टर गाँधी" (India after Gandhi) में पढ़ा था, जिसमें जेपी के आंदोलन की विभिन्न दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया था. जो पढ़ा था वह सब याद नहीं पर एक बात अवश्य याद रही कि कुछ लोगों का कहना था कि जनतंत्र में चुनाव में बनी सरकार के विरुद्ध इस तरह आंदोलन चलाना, जनतंत्र पर ही प्रहार था और इसलिए गलत था.

मैं प्रभाष जोशी से सहमत हूँ. यानि मेरे विचार में जब बने हुए सामाजिक तानेबाने को तोड़ने वाली बात निकलती है, चाहे वे जन अभियान हों या आम लोगों का मनमुग्ध कर अपने विचारों के साथ लेने वाले नवनेता, तो जनतंत्र में उन्हें शामिल होने का मौका देने के अलावा उससे अच्छा कोई रास्ता नहीं. मुझे लगता है कि यह नयी शक्ति चाहे हिंसा, चाहे सांप्रयदायिकता जैसी नीतियों की वजह से अवाँछनीय हो, पर उसे कुचलना या बैन करना या हिंसा से दबाने से बात नहीं बनती. चाहे वे नेपाल के माओवादी हों या आयरलैंड के धर्म गृह युद्ध में लगे गुरिल्ला, लोकतंत्र में शामिल होना ही रास्ता है जो इन शक्तियों के नुकीले कोने घिस कर उनके क्रोध व हिंसा को काबू में करता है, ताकि वे अपने दलों के पीछे आने वाले जनसमूह को उसके अधिकार दिला सकें. कभी कभी वही लोकतंत्र, हिटलर या तालिबान जैसी शक्तियों को मौका देता भी देता है कि वह शासन में आ कर लोकतंत्र को ही तानाशाही में बदल देते हैं, इसलिए कुछ लोग कह सकते हैं कि लोकतंत्र इन शक्तियों के लिए वाँछित नहीं, लेकिन मुझे लगता है कि सब डरों के बावजूद भी, लोकतंत्र में सबको शामिल होने का मौका देने के अन्य विकल्प नहीं हैं. यह तो केवल भविष्य ही बता सकता है कि वह ठीक निर्णय था या नहीं.

अगर मुझसे मेरी सोच के बारे में पूछा जाये तो स्वयं को बहुत सी बातों में वामपंथ विचारधारा के करीब पाता हूँ, पर अक्सर मुझे लगता है कि अपनी बात कहने का अधिकार, नापसंद बात का विरोध करना का अधिकार, जैसी बातें जो वामपंथी विचारक अपने आप के लिए तो ठीक समझते हैं, पर वे यही अधिकार अपने कुछ विरोधियों को उस तरह से नहीं देना चाहते. या फ़िर, हर बात को केवल आईडिओलोजी के माध्यम से ही देखते हैं और जो बात उस आडिओलोजी के विरुद्ध हो, उसे समझने की कोशिश नहीं करते. लेकिन अगर बात विचारकों की नहीं बल्कि राजनीतिक दलों की हो, तो आज भाजपा, वामपंथी दल, काँग्रेस जैसे राजनीतिक दलों में मुझे अधिक अंतर नहीं दिखता. भाजपा के मोदी या वरुण गाँधी जैसे लोगों की बात न की जाये, तो भाजपा की राजनीतिक सोच अन्य दलों से किस तरह भिन्न है यह भेद जल्दी समझ नहीं आता. नंदीग्राम और तस्लीमा नजरीन के मामले में कट्टरपंथियों के आगे सिर झुकाने की नीतियों में बंगाल की वामपंथी सरकार किस तरह अन्य पार्टियों से भिन्न है, यह भी मुझे समझ नहीं आता. तो भाजपा को राजनीतिक मान्यता मिलना क्या गलत निर्णय था?

दूसरी बात है कि क्या लोकतंत्र में तरीके से चुनी सरकार के विरुद्ध क्या जयप्रकाश नाराणय का क्राँती की बात करना जायज था? यह कहना कि लोकतंत्र में क्राँती की बात करना या चुनाव से बनी सरकार को जन अभियान से हटाने की कोशिश करना हमेशा गलत है, यह मैं नहीं मानता, विषेशकर जब बात अहिंसक जनक्राँती की है. जैसे कि अगर लोकतांत्रिक तरीके से चुनी सरकार, राजनीति को एक पार्टी राज्य या तानाशाही की ओर ले जाये, तो मैं अहिंसक जनक्राँती के पक्ष में हूँ. चुनी सरकार अगर हिटलर की यहूदी संहार और उपनिवेशी नीतियाँ अपना रही हो या कास्ट्रो की तरह, अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता को बाँधने की नीतियाँ बनाये, तो क्या विरोध करना उचित नहीं होगा? हां, इस बात पर बहस हो सकती है कि क्या उन्नीस सौ सत्तर के दशक के प्रारम्भ में इंदिरा गाँधी की सरकार की नीतियाँ लोकतंत्र के लिए इतनी खतरनाक थीं कि उनके विरुद्ध जन आंदोलन चलाया जाये?

अभी हाल ही में हुए चुनावों के नतीजों पर सभी लेखक, पत्रकार और विचारक इस तरह प्रसन्न हो कर काँग्रेस के गुणगानों में मस्त लगते हैं कि आज यह समझना कि कभी कोई इसी काँग्रेस के शासन के विरुद्ध जनक्राँती लाने की बात करता था, समझ नहीं आयेगी. दूसरी ओर, भाजपा के अंदरूनी झगड़ों से और वामपंथियों की हार से सभी राजनीतिक विषेशज्ञ इसे इन पार्टियों के अवसान या सरज डूबने जैसा बुला रहे हैं. कल फ़िर, यही विषेशज्ञ काँग्रेस की व्यवसायिक, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में अतिउदारवाद और निजिवाद की नीतियों का रोना रोयेंगे और भाजपा या वामपंथियों की जीत की बात करेंगे, यानि कालचक्र चलता रहेगा.

और आज से पचास साल बाद या सौ साल बाद का इतिहास, इस समय को किस तरह से देखेगा, यह सोचना चाह कर भी नहीं सोच पाता. जाने उस समय के भारतीय बच्चों को नेहरु, पटेल, इंदिरा गाँधी, मनमोहन सिंह, जैसे नाम मालूम भी होंगे या नहीं? पृथ्वी पर जीवन का विकास डार्विन के ईवोल्यूशन के सिद्धांत के प्रभाव से पनपता बढ़ता है. सोचता हूँ कि यही सिद्धांत जनजीवन और सामाजिक विकास पर भी तो लागू होता होगा? जिस तरह, देश बने हैं, सीमांए बनी हैं, लोकतंत्र जैसी पद्धतियाँ विकसित हुई हैं, कल क्या नया बनेगा? आज के लाखों करोड़ों लोग जो विषमताओं के बोझ से दबे हैं, जिनके पास रहने, सोने, खाने को नहीं, उनकी आकांक्षांए से सिंचा कल का राजनीतिक स्वरूप कैसा होगा? यह नहीं सोच पाता. इतिहास ही बतायेगा कि आज होने वाली में से कौन सी बात इतिहास का नया पृष्ठ खोलेगी और मानवता को नया रूप देगी.

गुरुवार, जून 04, 2009

प्रेम के लिए जेहाद

इस बार के बोलिनिया फ़िल्म फेस्टिवल में भारतीय मूल के फ़िल्म निर्देशक परवेज़ शर्मा की फ़िल्म "प्रेम के लिए जेहाद" (Jehad for Love) देखने का मौका मिला. इस फ़िल्म के बारे में पिछले वर्ष के जैंडर बैंडर फ़ैस्टिवल (Gender Bender Film Festival) में सुना था पर तब इसे देख नहीं पाया था. फ़िल्म का विषय है आज के वातावरण में विभिन्न देशों में मुसलमान समुदाय में समलैंगिक होने का अर्थ. फ़िल्म में भारत, मिस्र, दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान, तुर्की, मोरोक्को जैसे देशों से मुसलमान समलैंगिक स्त्रियों तथा पुरुषों की कहानियाँ दिखायीं गयीं हैं. यह अपनी तरह की पहली फ़िल्म है क्योंकि ईस्लाम समलेंगिकता को बिल्कुल स्वीकृति नहीं देता और शारिया की बात की जाये, तो बहुत से परम्परावादी मुसलमान समलैंगकिता की सजा मौत बताते हैं.

यही वजह है कि फ़िल्म में साक्षात्कार देने वाले बहुत से लोग अपनी कहानियाँ तो सुनाते हैं पर अपना चेहरा नहीं दिखाते, हालाँकि सुना है कि 2007 में इस फ़िल्म के प्रदर्शित होने के बाद स्वयं परवेज़ को और फ़िल्म में अपनी कहानी सुनाने वाले कई लोगों को मृत्यु की धमकियाँ मिल चुकी हैं.

दक्षिण अफ्रीकी कहानी है एक समलैंगिक इमाम मुहसिन हैंडरिक्स की, जिनका विवाह हुआ था, दो बेटियाँ भी थीं पर जब उन्होंने पत्नी से तलाक होने के बाद अपनी समलैंगिकता की बात को छुपाने के बजाय खुलेआम स्वीकार किया तो उनके जीवन में तूफ़ान आ गया और उन्हें इमाम के पद से हटा दिया गया. बहुत कोशिशों के बाद उनके शहर के कुछ मुसलमानों ने स्वीकार किया कि वे उन्हें अपनी मस्जिद में इमाम चाहते थे. उनसे बात करने के लिए, बाहर से एक जाने माने करान शरीफ़ के ज्ञानी को बलाया गया, जिनका फैसला बहुत कठोर था, "अगर तुम अपने को नहीं बदल सकते तो समलैंगिकता की सजा मृत्यु दँड है. इस बात पर बहस कर सकते हें कि किस तरह से यह मृत्यु दँड दिया जाये, लेकिन इस बात में कोई शक नहीं कि इसकी सज़ा मृत्यु दँड ही है."

मुहसिन का अपनी बेटियों से बात करने का दृष्य बहुत अच्छा लगा. मुहसिन पूछते हैं, "अगर मुझे पत्थर मार कर जान से मारने की सजा सुनायी जायेगी तो क्या होगा?" उनकी बड़ी बेटी कहती है कि दक्षिण अफ्रीका में इस तरह की सज़ा कोई नहीं दे सकता. उनकी छोटी बेटी कहती है, "पापा, अगर ऐसा होगा तो में चाहुँगी कि तुम पहले पत्थर से ही मर जाओ और तुम्हें तकलीफ़ न हो."

ईरान के कुछ नवयुवकों की कहानियाँ हैं जो कि तुर्की में छुपे हैं और प्रतीक्षा कर रहे हैं कि संयुक्त राष्ट्र संघ का शरणार्थी कमीशन उनकी अर्ज़ी को मान ले और उन्हें कनाडा में जाने की अनुमति मिल जाये. उनके दिन घर वालों, साथियों, मित्रों और प्रेमियों की यादों में कटते हैं जिनको वह अपने गाँवों में छोड़ कर आये हैं, माँ से टेलिफ़ोन से बात करने वाला एक युवक बिलख कर रोता है, उसे मालूम है कि वापस गाँव जा कर वह अपनी माँ को दोबारा कभी नहीं मिल पायेगा क्योंकि उसके नाम पर पुलिस का वारंट है.

कुछ मिलती जुलती कहानी है मिस्र के लड़के की जो कि फ्राँस में शरणार्थी बन कर रह रहा है. मिस्री जेल में अपने बलात्कार के बारे में बताते हुए उसकी भी आँखों में आँसू आ जाते हैं. सबकी बातों में घर परिवार, मित्रों से बुछुड़ने का दर्द भी है और अपनी समाज व्यवस्था पर रोष भी जो उन्हें मानव नहीं मानती.



भारत की कहानियां उत्तरप्रदेश से हैं. एक व्यक्ति बताता है कि वह मक्का की तीर्थ यात्रा कर चुका है और उसने निश्चय किया है वह स्वयं पर कँट्रोल करने की कोशिश करेगा, वह दोबारा से स्त्री वस्त्र नहीं पहनेगा. एक अन्य नवयुवक, जो कि एक इस्लाम के ज्ञानी से अपनी परेशानी की सलाह चाहता है, कहता है, "क्या करें, जब मुसलमान जात में पैदा हुए हैं तो अपनी जात की बात तो माननी ही पड़ेगी." ज्ञानी जी का विचार है कि समलैंगिता गलत है और किसी भी हालत में उसी सही नहीं माना जा सकता, इसलिए उनकी सलाह है कि नवयुवक को स्वयं पर अपने "गलत आदतों" को रोकने के लिए संयम का प्रयोग करना होगा. जब वह नवयुवक ज़िद करता है कि यह बात उसके बस में नहीं, तो ज्ञानी जी कहते हैं कि समलैंगिकता एक बिमारी है जिसका इलाज उन्हें अस्पताल में कराना चाहिये. रात को सब समलैंगिक मित्र छुप कर एक घर में मिलते हैं जब उनमें से कई लोग स्त्री वस्त्र पहनते हैं और "जब प्यार किया तो डरना क्या" पर नाचते हैं.

मिस्र की दूसरी कहानी दो स्त्रियों की है, माहा और मरियम. माहा ने अपनी समलैंगिकता को स्वीकार कर लिया है, जबकि मिरियम को अपराधबोध खा रहा है कि वह अपने धर्म के विरुद्ध जा रही है. "हमें नहीं मिलना चाहिये, हमें खुद को बदलने की कोशिश करनी चाहिये", मिरियम कहती है. माहा अपनी सखी को समझाने के लिए इस्लाम धर्म के बारे में एक किताब खरीद कर लाती है, "देखो, इसमें लिखा है कि अगर मिथुन क्रिया न हो तो वह समलैंगिकता उतनी गम्भीर बात नहीं, इसका मतलब है कि हमारा पाप उतना बड़ा नहीं."



फ़िल्म में बस एक ही खुश जोड़ा है, तुर्की की दो औरतें, फेर्दा और केयमत, जो मसजिद के बाहर भी आपस में मज़ाक करती हैं और छुप कर एक दूसरे को चूम लेती हैं. उनके रिश्ते को पारिवारिक स्वीकृति भी मिली है.

समलैंगिकता किसी धर्म में आसान नहीं, लेकिन इस्लाम से जुड़ी कठिनाईयां अधिक जटिल लगती हैं. फ़िल्म देखने से पहले मुझे नहीं मालूम था कि मुसलमान और समलैंगिक होने में इतनी कठिनाईयाँ है. इस दृष्टि से यह फ़िल्म महत्वपूर्ण है क्योंकि एक दबे छुपे विषय को, जिसका असर विभिन्न देशों के इतने सारे लोगों पर पड़ता है, को खुले में लाती है और उनसे जुड़े प्रश्न उठाती है. फ़िल्म में जिन लोगों की बात उठायी गयी है उन सब के जीवन की कठिनाईयों में मुसलमान समाज का समलैंगिकता के प्रति दृष्टिकोण और सोच का हिस्सा तो है लेकिन साथ ही साथ, उनका स्वयं के बारे में यह सोचना कि वे लोग धर्म के विरुद्ध गलत काम करते हैं, भी एक बड़ी समस्या है.
यानि औरों की सोच बदलने के साथ साथ, इस फ़िल्म के अनुसार, मुस्लिम समलैंगिक लोगों को अपनी सोच को भी बदलने की समस्या है और जब तक वह लोग अपने इस अपराधबोध से नहीं निकल पायेंगे, किस तरह संतोषजनक जीवन बिता सकते हैं? इस बात से मुझे थोड़ा सा आश्चर्य हुआ कि इतने सारे मुस्लिम समलैगिक युवक और युवतियाँ, "उनका धर्म क्या कहता है" वाली बात को इतनी गँभीरता से लेते हैं.

हिंदू धर्म में समलैंगिकता को किसी प्राचीन धार्मिक पुस्तक में गलत कहा गया हो, मुझे नहीं मालूम हालाँकि हिंदू धर्म के रक्षक होने का दावा करने वाले हिंदुत्व वादी कहते हैं कि समलैंगिकता धर्म के विरुद्ध है. बल्कि शिव के अर्धनारीश्वर होने की बात या फ़िर देवी देवताओं के मनचाहने पर पुरुष या स्त्री रूप धारण करना आदि बातों से लगता है कि हिंदू धर्म में मानव के पुरुष रूप और स्त्री रूप की भिन्नता को स्वीकारने की जगह थी. यह सच है कि आज का हिंदू समाज हिँजड़ा कहे जाने वाले लोगों को जिनमें अंतरलैंगिकता, समलैंगिकता के अंश होते हैं, को समाज से बाहर देखता है, लेकिन मैंने नहीं सुना कि कोई कहे कि वे लोग हिंदू धर्म के विरुद्ध हैं. ईसाई धर्म में बाईबल की कुछ बातों को ले कर यह कहा जाता है कि समलैंगिकता अप्राकृतिक है, प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है, गलत है.

मुझे लगता है कि उनके धर्म कुछ भी कहें, परिवार कुछ भी कहें, आज अन्य धर्मों के समलैंगिक लोग अपना जीवन अपनी मर्जी से, स्वतंत्रता से जीने के लिए लड़ते हैं और कई बार अपने धर्म की संकीर्ण तरीके से सोच के विरुद्ध आवाज़ उठाते हैं. लड़कपन में जब अपनी यौनिक पहचान स्पष्ट न बनी हो, उस समय में उनमें अपराधबोध हो सकता है पर समय के साथ वे लोग इस अपराधबोध से निकल जाते हैं और अक्सर धर्म से दूर हो जाते हैं. जबकि फ़िल्म देख कर लगा कि मुस्लिम समलैंगिक लोगों में अपराधबोध से निकलना अधिक कठिन है. मैं सोचता हूँ कि अगर हमारे धर्म में कोई बात मानव अधिकारों के विरुद्ध है तो उसे बदलना चाहिये, जबकि फ़िल्म से लगता है कि इस्लाम में यह नहीं हो सकता क्योंकि कुरान शरीफ़ को बदला नहीं जा सकता.

इस तरह की फ़िल्म बनाने के लिए बहुत साहस चाहिये. परवेज़ को धमकियाँ मिली हैं, उनके विरुद्ध फेसबुक पर पृष्ठ बनाये गये हैं. परवेज़ अपने चिट्ठे पर अपनी लड़ाई के बारे में बताते हैं.

गुरुवार, मई 28, 2009

आँखों ही आँखों में

मेरी पत्नी की बचपन की सखी अपने पति से साथ हमारे यहाँ खाने पर आयीं थीं. मुझे स्वयं यह महिला कुछ अधिक पसंद नहीं क्योंकि जितनी बार भी मिला हूँ, मुझे लगता है कि वह हमेशा कुछ न कुछ रोना या शिकायत ले कर कुढ़ती रहती हैं, जबकि उनके पति मुझे सीधे साधे से लगते हैं. उन दोनों से मेरी अधिक घनिष्टता नहीं, और अगर जब मालूम हो कि वे लोग आ रहे हें तो मैं कुछ न कुछ बहाना बना कर खिसकने की कोशिश करता हूँ.

पर इस बार तो खाने के दौरान हद ही हो गयी. शुरुआत हुई शिकायत से "यह बात नहीं करते, बताते नहीं, बस चुप रहते हैं." पहले तो पतिदेव कुछ देर तक चुपचाप सुनते रहे, पर जब वह महिला इस बारे में बोलती ही गयीं, और कई उदाहरण दिये कि कैसे उनके पतिदेव किसी भी बात का सामना नहीं करना चाहते तो आखिर में वह बोल पड़े कि बात करने से क्या फायदा, कि वह सुनती तो हैं नहीं, कि कुछ भी हो गलती तो हमेशा पुरुष की मानी जाती है, आदि.

बस फ़िर तो घमासान युद्ध छिड़ गया. मुझे इस झगड़े के बीच में होना बहुत अज़ीब लग रहा था, पर कुछ बोला नहीं. उनके पतिदेव ने खिसिया कर कोशिश की इन सब बातों को इस तरह दूसरों के सामने उठाना ठीक नहीं पर वह बोलीं कि अपनी सखी से वह कुछ नहीं छुपाना चाहती थीं.

खैर जैसे तैसे करके वह खाना स्माप्त हुआ और वो लोग चले गये तो मेरी अपनी पत्नी से इस झगड़े के बारे में बात हुई. कुछ साल पहले, एक बार पहले भी कुछ कुछ इसी तरह हुआ था जब हमारे एक अन्य मित्र की पत्नी ने सबके सामने अपने पति के साथ सँभोग में उनके यौन व्यवहार की बाते बतानी शुरु कर दी थीं. मुझे तो बहुत अजीब लगा था, लगा था कि इस तरह की बातें तो किसी भी दम्पति की इतनी निजि होती हैं जिन्हें किसी बाहर वाले के सामने कहना ठीक नहीं समझा जा सकता, और न ही किया जाना चाहिये.

पर इस तरह की बातों से हमारे मित्र को कुछ विषेश अपत्ति नहीं हो रही थी क्यों कि वह अपनी पत्नी की बातें आराम से सुनते रहे थे. मुझे लग रहा था कि भारत में पत्नी इस तरह की बात बाहर वालों के सामने कभी नहीं करेगी. उस बार मेरी पत्नी मेरी बात से सहमत थीं, उसका कहना था कि इस तरह की बात को विषेश सहेली से अकेले में किया जा सकता है पर पति के सामने या अन्य लोगों के सामने नहीं. तब भी मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ था, मेरे विचार में अपने पति पत्नी के यौन सम्बंधों के विषय में अधिकतर पुरुष अपने मित्रों से भी बात नहीं करते.

पर इस बार के झगड़े में मेरे और मेरी पत्नी के विचारों में मतभेद था. मैं उनकी सखी के पति की तरफ़दारी कर रहा था कि झगड़े के समय चुप रहना ही बेहतर है, बजाय कि उस समय अपनी बात समझाने की कोशिश की जाये. तो मेरी पत्नी बोली कि मैं भी सभी पुरुषों जैसा ही हूँ जो बात करने के बजाय चुप रहना बेहतर समझता है या फ़िर अपनी बात को मन में ही दबाये रखता है. थोड़ी देर में ही बात उनकी सखी और उसके पति से हट कर हमारे अपने बारे में होने लगी.

मेरी पत्नी बोली,"तुम ही मेरी बात कहाँ सुनते हो, बस हाँ हूँ करते रहते हो, लेकिन बात एक कान से घुस कर दूसरे से निकल जाती है." चूँकि इस बात में अवश्य कुछ सच था तो मैंने बात बदलने की कोशिश की. "प्रेम हो तो कुछ कहना नहीं पड़ता, बिना कहे, आँखों आँखों मे ही प्रेमी समझ जाते हैं." और इसको समझाने के लिए "जाने क्या तूने कही, जाने क्या मैंने सुनी, बात कुछ बन ही गयी" के गीत का उदाहरण दिया.

"अवश्य यह गीत किसी पुरुष ने ही लिखा होगा", मेरी पत्नी बोली.

क्या सचमुच अधिकतर पुरुष इसी तरह के होते हैं, कि बात कम करते हैं, जबकि स्त्रियाँ बात करने को तरसती रहती हैं, आप का इसके बारे में क्या विचार है? यहाँ इटली में यह बात मैं कई बार सुन चुका हूँ. सुना है कि तलाक के कारणों में से यह भी अक्सर एक कारण होता है.

शब्दों के बारे में पोलैंड की नोबल पुरुस्कार पाने वाली कवयत्रि विसलावा स्ज़िमबोर्स्का (Wislawa Szymborska) की एक कविता की पक्तियाँ प्रस्तुत हैं (हिंदी अनुवाद मेरा है)

जैसे ही भविष्य शब्द का स्वर निकलता है, तब तक शब्द का पहला वर्ण अतीत में जा चुका होता है,
जब सन्नाटा शब्द को बोलता हूँ, उसी का विनाश करता हूँ
जब कहता हूँ कुछ नहीं, कुछ नया बनता है जो किसी खालीपन में नहीं घुसता

बुधवार, मई 20, 2009

आखिरी बार

अमरीकी लेखिका और कवि जोयस केरोल ओटस् (Joyce Carol Oates) की एक कविता की कुछ पंक्तियाँ पढ़ी और उनके बारे में देर तक सोचता रहाः

आखिरी बार किसी व्यक्ति को देखो, पर तुम्हें मालूम न हो कि वह आखिरी बार है.
बस यही सब कुछ मालूम है अब, अगर उस समय यह जानते तो ....
पर उस समय नहीं जानते थे, और अब तो बहुत देर हो गयी.

रविवार, मई 17, 2009

घुमक्कड़ी चटनी

पिछले साल की तीन छुट्टियाँ बची थीं, उसके साथ सप्ताहअंत के दो दिन, शनिवार और रविवार, को मिला कर छुट्टी के कुल पाँच दिन बनते थे. कभी भी छुट्टियाँ हो तो अक्सर हम लोग उत्तरी इटली में वेनिस से करीब सौ किलोमीटर उत्तर में बिबियोने नाम के शहर में जाते हैं जहाँ समुद्र से सौ मीटर दूर मेरी पत्नी का छोटा सा पारिवारिक घर है. इस बार भी सोचा कि चलो वहीं चलते हैं.

इटली में हाईवे पर 130 किलोमीटर की गति से कार चला सकते हैं. इस तरह से, बोलोनिया से बिबियोने की 350 किलोमीटर की दूरी करीब ढाई घँटे में पूरी करके जब हम लोग बिबियोने पहुँचे तो समझ में आया कि यह वहाँ छुट्टियाँ बिताने का समय नहीं था. मैं साथ में एक जैकेट ले कर गया था पर पहले दिन समुद्र के किनारे सैर करते हुए इतनी ठँडी हवा थी कि कँपकपी होने लगी और दाँत बजने लगे. बोलोनिया में भी हवा में कुछ ठँडक थी, विषेशकर सुबह सुबह, लेकिन बिबियोने में तो जैसे अभी भी सर्दी का मौसम चल रहा था. मैं सपने देख रहा था कि समुद्र में नहाऊँगा पर पानी में पैर का अँगूठा भी गीला करने की हिम्मत नहीं हुई. चुपचाप घर में आ कर, खिड़कियाँ दरवाज़े बंद करके, कँबल लपेट कर बैठ गये.

सोच कर निर्णय लिया कि समुद्र तट पर छुट्टी बिताने का विचार छोड़ कर, आसपास घूमने की जगह पर जाना का सोचना अधिक बेहतर होगा. दोपहर को हिम्मत करके हम लोग काओर्ले शहर की ओर घूमने निकले. यह समुद्रतट पर बसा प्राचीन शहर अपने रँगबिरँगे गुड़िया जैसे घरों के लिए प्रसिद्ध है और यहाँ करीब 1000 ईस्वी का बना सुंदर गिरजाघर और साथ में जुड़ा गोलाकार घँटाघर है. 

यहाँ हर वर्ष समुद्रतट पर रखे पत्थरों पर शिल्पकारी करने के लिए देश विदेश के प्रसिद्ध शिल्पकारों को आमंत्रित किया जाता है, जिससे समुद्र तट पर सैर करने का अर्थ है कि शिल्प प्रदर्शनी को देख सकते हैं. यहाँ सर्दी भी बिबियोने के मुकाबले कुछ कम थी तो घूमना कुछ आसान रहा.



***
दूसरे दिन सुबह हम लोग कार ले कर उत्तर की ओर निकल पड़े, जहाँ एल्प के पहाड़ हैं. यहाँ तारवीजियो नाम के शहर पर आस्ट्रिया से इटली की सीमा मिलती है. तारवीजियो के आसपास का इलाका बहुत सुंदर लगा, हरी भरी घाटियों और बर्फ़ से ढके पहाड़ों से भरा. चूँकि दोनो देश यूरोपियन यूनियन का हिस्सा हैं तो इटली से आस्ट्रिया जाने में न पासपोर्ट की जाँच की आवश्यकता है न ही पैसे बदलने की, क्योंकि दोनो देशों में यूरो चलता है. फर्क है कि इटली में हाईवे पर जितनी बार जाओ हर बार कुछ पैसे देने पड़ते हैं, जबकि आस्ट्रिया में घुसते ही आप साढ़े सात यूरो की टेक्स स्टेम्प खरीद कर कार पर लगा लीजिये, जिससे आप 10 दिन तक आस्ट्रिया में कहीं भी हाईवे पर कार चला सकते हैं.

बिबियोने से करीब दो घँटे की यात्रा के बाद हम लोग करीब पच्चीस किलोमीटर लम्बी वोर्थर झील के किनारे बसे शहर क्लिंगमफर्ट पहुँचे. इटली के मुकाबले में झील के किनारे बिल्कुल सर्दी नहीं थी, बल्कि हल्की सी गर्मआहट थी. हम कुछ देर घूमे फ़िर वहीं झील के किनारे खाना खाया.



तब तक दोपहर का एक बजने लगा था. तो फ़िर से कार ली और इस बार पूर्व की ओर मुड़े, थोड़ी देर में ही हम आस्ट्रिया छोड़ कर स्लोवेनिया में पहुँच गये. स्लोवेनिया जो कि पहले यूगोस्लाविया का हिस्सा होता था, अब स्वतंत्र देश है और यूरोपियन यूनियन का हिस्सा है इसलिए यहाँ जाने के लिए भी पासपोर्ट की जाँच की आवश्यकता नहीं और न ही पैसे बदलने की. हाँ दोनो देशों के बीच बनी आठ किलोमीटर लम्बी कारावंकल सुरंग में जाने के लिए 3 यूरो की फीस देनी पड़ी. दोपहर को तीन बजे हम स्लोवेनिया की राजधानी ल्युबल्याना पहुँच गये. शहर के पुराने केंद्र के करीब ही तिवोली बाग हैं जहाँ हमें कार पार्क करने की जगह मिल गयी.




ल्युबल्याना शहर का पुराना हिस्सा बहुत सुंदर है. दो घँटे कैसे बीते पता ही नहीं चला हाँलाकि हम लोग केवल शहर के बीचो बीच गुजरती ल्युबल्यानिका नदी के आसपास का हिस्सा ही देख पाये, जाँ पेसेरेन स्काव्यर है, नदी पर साथ साथ तीन पुल बने हैं. शहर के पुराने नक्काशी और चित्रकारी से सजे भवन, भव्य मूर्तियाँ, नदी के आसपास सुंदर कैफे सब ने मन मोह लिया. यहाँ भी हल्की हल्की गर्मी थी, सुहाना मौसम था.

पाँच बजे के करीब वापस चले दक्षिण में इटली की ओर और रात को आठ बजे के करीब हम लोग बिबियोने में घर में थे, फ़िर से सर्दी से ठिठुरते. एक दिन में हमने करीब पाँच सौ किलोमीटर की यात्रा की थी, और इटली के अलावा दो देशो में हो कर आये थे. कुछ थकान भी थी, पर संतोष भी था.

***
तीसरे दिन सुबह उठने में थोड़ी देर हो गयी. पिछले दिन की यात्रा की थकान जो थी. खैर सुबह ग्यारह बजे फ़िर से निकले और उत्तर में त्रियस्ते होते हुए स्लोवेनिया में कोज़ीना पहुँचे, जहाँ दोपहर का भोजन किया और गाँव की दुकान से एक टोपी खरीदी. फ़िर कार ले कर हम लोग रूपा होते हुए क्रोएशिया में घुसे. क्रोएशिया चूँकि यूरोपियन यूनियन का हिस्सा नहीं तो यहाँ घुसने के लिए पासपोर्ट देखे गये, कुछ पैसे भी बदलवाये. क्रोएशिया के पैसे को कूना कहते हैं और एक यूरो के 7.30 कूना मिलते हैं यानि कि एक कूना की कीमत हुई करीब आठ रुपये.

हम लोग समुद्र तट पर बसे शहर रियिका पहुँचे. स्लोवेनिया के मुकाबले में यहाँ अधिक गरीबी दिख रही थी, घर और भवन कम साफ़, अधिक पुराने और खस्ता हालत के लग रहे थे. कार पार्क करके हम लोग समुद्र के सामने वाले हिस्से में घूमे, एक बार में बैठ कर काफी पी.



अगर उस दोपहर के बारे में सोचूँ तो सबसे पहली याद आती है शहर के पुराने हिस्से में एक पुराने टूटे हुए घर की हवा में तैरती सीड़ियाँ. जाने किसने वह घर प्यार से बनवाया हो, अवश्य कोई पैसे वाला था, जाने उन सीढ़ियों ने कितने लोगों की आम जीवन की कितनी हँसी, आँसू, झगड़े देखे हों, और आज वह वस्त्रहीन हो कर, गिरने का इंतज़ार कर रहीं हैं. 


आज फ़िर इटली से बाहर दो देशों में घूम कर आने का संतोष था.

***
छुट्टी का चौथा दिन, घूमने के लिए अंतिम दिन था. सोचा कि आज अधिक दूर न जा कर, बल्कि करीब के दो छोटे शहरों को देखा जाये, ओदेर्जो और पोर्तो बूफेले. पहले ओदेर्जो पहुँचे तो पार्किंग खोजने में देर लगी, समझ में नहीं आया कि इतने छोटे से शहर इतनी कारें कहाँ से आ गयीं कि पार्किंग करने को जगह न मिले. शहर के मुख्य स्काव्यर पहुँचे तो समझ में आया, वहाँ कारों की प्रदर्शनी और सेल लगी थी. कारों में एक टाटा इंडिका भी दिखी, पहली बार इटली में टाटा की कार दिखी थी.



थोड़ी देर में ही हम भीड़ से थक कर पोर्तो बूफेले की ओर चले जिसे छोटा वेनिस भी कहते हैं. वहाँ पहुँचे तो कारों की भीड़ देख कर और भी हैरान हुई, इतनी भीड़ की शहर में घुसने से पहले ही, बाहर सड़क पर कारों की लाईन लगी थी. किस्मत अच्छी थी कि जैसे ही हम पहुँचे, एक कार जा रही थी और हमें वह जगह मिल गयी.

पोर्तो बुफेले शहर नहीं, छोटा सा गाँव है और उस दिन वहाँ पुरानी वस्तुओं यानि एंटीक को बेचने वाला मेला लगा था जिसके लिए दूर दूर से लोग आये थे. एक दुकान में मुझे एक एंटीक कपड़े रखने वाला रैक दिखा जो मुझे बहुत अच्छा लगा और थोड़े से पैसों में मिल गया.


भीड़ में घूमने का उतना मज़ा नहीं था लेकिन पुरानी वस्तुओं को देखना अच्छा लगा.

***
बोलोनिया में घर वापस आये तो बहुत थकान लग रही थी. इस छोटी सी छुट्टी में घूम घूम कर अपनी चटनी बन गयी थी. फ़िर भी मुझसे रहा नहीं गया, दोपहर को रंग खरीद कर लाया और पोर्तो बुफेले में जो पुराना कपड़ों का रैक ले कर आया था उसे रँगा. अब वह बिल्कुल पुराना नहीं लगता, बल्कि बहुत सुंदर लगता है. कई मित्र मुझसे पूछ चुके हैं कि इतना सुंदर रैक कहाँ से लिया. यही इन छुट्टियों की यादगार रहेगा.


चार दिनों की घुमाई में जो चक्कर लगाये, उन्हें आप इस नक्शे में देख सकते हैं.

शनिवार, मई 16, 2009

पुरानी फ़िल्में

कहानी क्या थी, विषय क्या था, यह सब कुछ याद नहीं था. याद थीं बस गाने की दो पक्तियाँ, "मेरे मन के दिये, यूँ ही घुट घुट के जल तू मेरे लाडले, ओ मेरे लाडले" और याद थी अँधेरे में दिया लिए तुलसी के पौधे के सामने पूजा करतीं सीधी सादी अभिनेत्री साधना जो उस समय बहुत अच्छी लगी थी. जहाँ तक याद है, वह फ़िल्म मैंने 1966 या 1967 में टेलीविजन पर देखी थी. वह श्वेत श्याम टीवी का ज़माना था जब शाम को कुछ घँटों के लिए दूरदर्शन का प्रसारण आता था. हमारे घर पर टीवी नहीं था इसलिए जब चित्रहार और रविवार की फ़िल्म प्रसारित होती तो पड़ोस में एक घर में उसे देखने जाते थे. फ़िल्म का यह गाना मन को बहुत भाया था, पर दोबारा उसे कभी सुना नहीं था.

पिछले महीने, चालीस साल बाद दिल्ली के पालिका बाज़ार में जब बिमल राय की 1960 की फ़िल्म "परख" की डीवीडी देखी तो तुरंत वही गाना मन में गूँज गया और डीवीडी खरीदी.



कुछ दिन पहले जब यह फ़िल्म देखी तो उतना आनंद नहीं आया, जिसकी बिमल राय की फ़िल्मों से अपेक्षा होती थी. शायद इसकी वजह हो कि मुझे गम्भीर फ़ल्में अधिक पसंद हैं जबकि "परख" हल्की फ़ुल्की फ़िल्म है जिसका विषय है समाज में पैसे का लालच और झूठ मूठ की बनावट. कहानी है गरीब लेकिन ईमानदार गाँव के पोस्टमास्टर की, जिन्हें ज़िम्मेदारी मिलती है कि एक बड़ी रकम को किसी अच्छे काम के लिए उपयोग किया जाये और कैसे उस बड़ी रकम को पाने के लिए सारे गाँव के बड़े लोग, यानि ज़मीनदार, डाक्टर, पुजारी आदि सब लोग तिकड़म लगाते हैं.



कहानी में पोस्टमास्टर की बेटी और गाँव के आदर्शवादी अध्यापक का प्रेम प्रसंग भी है, पर यह फ़िल्म का छोटा सा हिस्सा है. फ़िल्म में बड़े हीरो हीरोईन नहीं, पर उस समय के जाने माने बहुत से अभिनेता अभिनेत्रियाँ हैं जिनमें मोतीलाल, नज़ीर हुसैन, लीला चिटनिस, जयंत, कन्हैयालाल, असित सेन जैसे लोग हैं. पोस्टमास्टर की बेटी के भाग में हैं साधना, जिनकी यह प्रारम्भिक फ़िल्मों में से थी, और गाँव के अध्यापक के भाग में हैं बसंत चौधरी. फ़िल्म की कहानी और संगीत सलिल चौधरी का है.

सीधी साधी ग्लैमरविहीन साधना जिन्होंने इस तरह के भाग फ़िल्मों में कम ही किये, इस फ़िल्म में बहुत अच्छी लगती हैं. और फ़िल्म का संगीत बहुत बढ़िया है. "ओ सजना, बरखा बहार आयी", "गिरा है किसी का झुमका", "बंसी क्यों गाये, मुझे क्यों बनाये" जैसे लता मँगेशकर के गाने अभी भी सुनने को मिल जाते हैं. हाँ जो गीत मुझे सबसे अधिक प्रिय था, "मेरे मन के दिये", वह न जाने क्यों सफ़ल नहीं हुआ था, पर चालिस साल बाद दोबारा सुनना बहुत अच्छा लगा.

अगर आप यह गीत सुनना चाहें तो इसे यहाँ सुन सकते हैं

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एक मित्र ने पिछले क्रिसमस पर मुझे एक पुरानी रुसी फ़िल्म की डीवीडी भेंट दी, अँद्रेई तारकोव्स्की की फ़िल्म "इवान का बचपन" (Ivanovo Detstvo). यह फ़िल्म 1962 से है. अँद्रेई को रुसी सिनेमा को जानने वाले, बिमल राय जैसा ही बढ़िया सिनेमा बनाने वाला मानते हैं. मित्र बोले, तुम्हें गम्भीर फ़िल्में अच्छी लगती हैं तो यह भी अच्छी लगेगी. मैंने डीवीडी को लिया और संभाल कर रख लिया पर देखने का मन नहीं किया. लगा कि बोर करने वाली फ़िल्म होगी.



"परख" देखी तो जाने क्यों मन में आया कि "इवान का बचपन" को भी देखा जाये. फ़िल्म बहुत अच्छी लगी, इसका प्रिंट भी बहुत बढ़िया है, हर दृश्य साफ़ चमकता हुआ. फ़िल्म रूसी में थी जिसपर अँग्रेज़ी के सबटाईटल थे. फिल्म के कई दृश्य ऐसे लगते हैं कि मानो किसी चित्रकार ने तस्वीरें बनायीं हों. फिल्म की कहानी है द्वितीय महायुद्ध के समय में रूस और जर्मनी की लड़ाई की, जिसमें इवान, एक रूसी बच्चा छिप कर जर्मन हिस्से में जासूसी करने जाता है और रूसी सेना को सारी दुशमन की सारी खबर ला कर देता है. ईवान के पूरे परिवार को उसके सामने जर्मन सिपाहियों ने मार दिया था जिससे वह प्रतिशोध की आग में जल रहा है.

जब यह फ़िल्म बनी, रूस में यह समय स्टालिन की मृत्यु के बाद का था. शायद रूसी सिनेमाकार अधिक स्वतंत्र महसूस करते थे, उनमें नयी चेतना जागी थी जो फ़िल्म में झलकती है. फ़िल्म रूसी साम्यवाद की भावनाओं से भरी है और साथ ही रूसी दृष्टिकोण दिखाती है, यानि रुसी सभी अच्छे और नेकदिल लोग दिखाये गये हैं जो बच्चों को प्यार करते हैं, अच्छे कपड़े पहनते हैं, अच्छा खाना खाता हैं, गाना गाते हैं, साफ़ सुथरे रहते हैं, आदि. दूसरी तरफ़, जर्मन सभी क्रूर और हृदयहीन जानवर जैसे दिखाये गये हैं. पर इस सब के बावजूद फ़िल्म इस तरह से बनायी गयी है कि इसकी रोचकता कम नहीं होती.



तकनीकी दृष्टि से फ़िल्म बहुत सुंदर है. फ़िल्म का पहला दृष्य जिसमें एक बच्चा धूप में घास पर खेल रहा है, एक स्वपन का दृष्य है जो तब समझ में आता है जब बम गिरते हैं और सोया इवान नींद से चौंक कर उठ जाता है, बहुत सुंदर है. दृष्यों का कम्पोज़ीशन, रोशनी और छाया का प्रयोग, इत्यादि बहुत सुंदर हैं. फ़िल्म को दोबारा देखने का मन करता है, यही सब तकनीकी बातें बेहतर समझने के लिए. ईवान का भाग करने वाले बच्चे का अभिनय बहुत बढ़िया है.

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