रविवार, नवंबर 18, 2007

भारतीय ईसाईयों में जाति भेद

इतालवी केथोलिक पत्रिका पोपोली के अक्टूबर अंक में फादर प्रकाश लुईस का लेख है जिसमें भारत में ईसाई धर्म कें जाति भेद की समस्या को उठाया गया है.

मेरा मानना है कि जाति भेद भारत की सबसे मूलभूत समस्याओं में से है और यह स्वीकार करना कि हमारे समाज में इंसानों से अमानवीय जाति भेद होता है इस सदियों पुराने शोषण से लड़ने का पहला कदम है. इस दृष्टि से मुझे फा. लुईस का लेख महत्वपूर्ण लगा. प्रस्तुत हैं उनके इस लेख के कुछ अंश, जिनका इतालवी से हिंदी में अनुवाद मेरा हैः

भारत के 24 मिलियन यानि 2 करोड़ 40 लाख इसाईयों मे से करीब 70 प्रतिशत लोग दलित मूल के हैं. चूँकि सब सोचते हें कि सभी ईसाई समान होते हैं, धार्मिक संस्थाएँ, सरकार और समाज इस दलित ईसाईयों के साथ होने वाले भेदभाव को नहीं पहचानता. इस वजह से इस बात की गम्भीरता को ठीक से नहीं समझा जाता और भारत के बाहर इस बात की जानकारी नहीं है....सरकारी नीतियों से हिंदू, सिख तथा बुद्ध मूल के दलितों को मिलने वाले संरक्षण ईसाई दलित लोगों को नहीं मिलते. बाकी के दलित सोचते हैं कि ईसाई बनने वाले लोग दलित नहीं होते. कानून के लिए ईसाई होना और साथ ही दलित होना संभव नहीं है... ईसाई संस्थाओं में अगर दलितों की गिनती की जाये तो मिलगा कि उनमें दलित मूल के लोगों की उपस्थिति बहुत कम है. 1999 में किये गये एक सर्वेक्षण के हिसाब से ईसाई हाई स्कूलों मे दलित केवल 15.5 प्रतिशत थे और ईसाई कालिजों में केवल 10.5 प्रतिशत. यह शिक्षा संस्थाएँ अधिकतर ऊँची जाति के लोगों के काम आती हैं. ईसाईयों में जाति भेद नया नहीं है बल्कि हमेशा से रहा है. तिरुचिरापल्ली का केथेड्रल जिसका निर्माण 1840 में हुआ था, उसमें विभिन्न जातियों के ईसाई लोग अलग अलग बैठाये जाते थे. कई जगहों पर दलित ईसाईयों के अपने अलग गिरजाघर होते थे, कूछ अन्य जगहों पर वह लोग गिरजाघरों के बाहर खड़े हो कर प्रार्थना में भाग लेते थे. अगर गिरजाघर में घुस सकते थे तो उनके बैठने की जगह सबसे पीछे होती थी और प्रार्थना के अंत में पादरी के हाथ से क्मयूनियन का प्रसाद लेने वह अन्य सब लोगों के बाद ही जा सकते थे. चर्च के अधिकारी इन बातों को जानते थे पर बहुत समय तक इन बातों पर विचार विर्मश नहीं किया गया है. आज भी दलित ईसाईयों से पादरी बनने, कोई महत्वपूर्ण कार्य पद देने आदि में भेदभाव किया जाता है. तमिलनाडू में दलित ईसाई, राज्य के ईसाईयों के 75 प्रतिशत है पर दलित मूल के पादरी और नन केवल 3.8 प्रतिशत...विभिन्न जातियों के ईसाईयों के बीच में विवाह होना या केवल साथ बैठ कर खाना खाना तक संभव नहीं जैसे कि विभिन्न जाति के हिंदुओं के बीच होता है...हमें अपने धर्म में बदलाव लाना है ताकि उनकी मानव मर्यादा और गरिमा को स्वीकारा जाये, केवल अध्यात्मिक रूप में नहीं बल्कि जीवित मानव के रूप में उस धर्म के हिस्से की तरह जो बिना भेदभाव के समाज को बनाने की घोषणा करता है. जब तक हम लोग आपस में अपने शब्दों में और आचरण में सचमुच का समुदाय नहीं बनेंगे, हम कट्टरपंथियों के आरोप कि हम केवल धर्म बदवाना चाहते हैं का सामना नहीं कर सकते.


जहूर मेरे कश्मीरी मित्र कहते हैं कि भारत के मुसलमान भिन्न हैं अन्य सब देशों के मुसलमानों से, क्योंकि हमें अन्य धर्मों के साथ मिल कर रहना आता है. मुझे भारत के ईसाई समाज को करीब से देखने का मौका मिला है और मैं मानता हूँ कि भारतीय ईसाई भी बाकी सारी दुनिया के ईसाईयों से अलग हैं, उनमें विभिन्न धर्मों के साथ रहने की अपनी संवेदना है. पर इस सांझी भारतीयता का शायद यह भी अर्थ है कि चाहे हमारा धर्म कुछ भी हो, हम सबमें एक जैसी कुछ बुराईयाँ भी हैं जैसी कि जाति भेद?

पढ़े लिखे, अच्छी नौकरी करने वाले लोगों से जब मैं जाति और भेदभाव की बात सुनता हूँ तो मुझे ग्लानी भी होती है और क्षोभ भी. यह भेदभाव की जड़े हमारे दिलों में इतनी गहरी बैठीं हैं कि इनसे हम बार बार हार जाते हैं. दुर्भाग्य की बात है कि ईक्कीसिवीं सदी में भी कोई बड़ा हिंदू धर्म सुधारक नहीं हुआ जो इस बारे में खुल कर समस्त मानव जाति की समानता की बात कर सके और जाति भेद करने वालों को धर्म से बाहर घोषित कर सके. अगर अन्य धर्म वाले भी, चाहे वे मुसलमान हों, सिख हों या ईसाई, बजाय अपने धर्म के मूल संदेश को मान कर अगर हिंदू धर्म के जातिभेद को अपनाते हैं तो शोषित लोगों के लिए बाहर आने का क्या रास्ता बचेगा? इसीलिए आशा है कि ईसाई धर्म में भी फा. लुईस जैसे लोगों के हाथ मजबूत होंगे और वह अपने समाज में बदलाव लायेंगे जिससे बाकी के धर्मों को भी प्रेरणा मिल सके.

शनिवार, नवंबर 17, 2007

पड़ोसी देशों पर भारत का धार्मिक प्रभाव

आज के चीन में धर्म से जुड़ा कुछ भी आसानी से नहीं दिखता. हालाँकि लोगों ने कहा कि अगर किसी मंदिर में जाईये तो वहाँ बहुत लोग मिलेंगे और लोगों के मन में बहुत धार्मिक्ता है पर दक्षिण चीन के गाँवों में घूमते हुए मुझे इस धार्मिक्ता के बाह्य चिन्ह कुछ नहीं दिखे. 1960 में हुई माओ द्वारा की हुई साँस्कृतिक क्राँती (cultural revolution) के दौरान अधिकतर बुद्ध मंदिरों को तोड़ दिया गया था और वहाँ रहने वाले बुद्ध भिक्षुकों जेल में डाल दिया गया या कुछ कहते हैं, मार दिया गया. फ़िर पिछले बीस सालों में जो विकास हुआ तो कुछ मंदिर भी दोबारा बस गये. दक्षिण चीन के गावों में घूमते समय बहुत सी कहानियाँ सुनने को मिलीं कि उस क्राँती के समय में कहाँ पर क्या हुआ था, कैसे मंदिर तोड़े गये गये, कैसे कुछ मूर्तियाँ छुपा दी गयीं थीं और उन्हे तोड़ने से बचाया गया था. पर विकास के बाद नये बने समृद्ध गावों में कोई नया मंदिर नहीं बना दिखता. पचासों गाँव घूमने के बाद भी मैं एक भी मंदिर नहीं देख पाया.

फ़िर लूफेंग नाम के छोटे से शहर के सँग्रहालय में एक मूर्ती देखी जो दुर्गा से बहुत मिलती थी. पूछा तो बोले कि यह ताओ (Tao) धर्म की एक देवी की मूर्ती है. यह तो मालूम था कि चीन में बुद्ध धर्म भारत से पहुँचा था पर क्या हिंदू देवी देवताओं का भी कोई प्रभाव चीन में पहुँचा था, इसके बारे में कभी कुछ नहीं पढ़ा था.



बुद्ध धर्म का प्रभाव भारत से सारे एशिया में फैला था, चीन जापान, वियतनाम, कोरिया तक पर हिंदू धर्म का भी प्रभाव फैला था जिसके निशान इंदोनेशिया के बाली और कम्बोदिया के अंगकोरवाट मंदिर में दिखते हैं.

चीन यात्रा के बाद थाईलैंड आया तो वहाँ भी बुद्ध धर्म के साथ साथ हिंदू धर्म का प्रभाव दिखा. नीचे के चार तस्वीरों में हैं बैंकाक हवाईअड्डे पर बनी अमृतमंथन के दृश्य में मूँछों वाले विष्णु की मूर्ती, एक बुद्ध मंदिर में भगवान बुद्ध की प्रतिमाएँ, थाईलैंड के भूतपूर्व शासक राम तृतीय की मूर्ती, और एक सड़क के किनारे ब्रह्मा की मूर्ती.









इनको देखने के बाद मन में कई प्रश्न उठ रहे थे. बुद्ध धर्म के बारे में तो कहते हैं कि सम्राट अशोक के जमाने में बुद्ध धर्म का प्रचार हुआ पर हिंदू धर्म का प्रचार कब हुआ, किसने किया? भारतीय इतिहासकार बुद्ध धर्म के बारे में कहते हैं कि वह हिंदू धर्म के सुधारवाद का नतीजा था और जातिप्रथा आदि जैसी प्रथाओं को विरुद्ध सभी मानवों की बराबरी का संदेश देता था इसलिए हिंदू तथा बुद्ध धर्मों के बीच बहुत खिंचातानी और लड़ाई चली और बाद में बाहम्णवादियों ने बुद्ध धर्म को भारत से बिल्कुल हटा दिया, क्या अन्य देश जैसे थाईलैंड आदि, वहाँ हिंदू और बुद्ध धर्म की इस लड़ाई को कैसे देखा गया? हिंदू धर्म के साथ भारतीय जाति प्रथा क्यों अन्य देशों में नहीं फैली?

शुक्रवार, नवंबर 09, 2007

ज्योति उत्सव

जब भी कोई त्योहार आता है तो घर से दूर विदेश में होना बहुत अखरता है. बाज़ारों का शोर और धक्का मुक्की, मिठाई के डिब्बे, पड़ोसियों, दोस्तों और रिश्तेदारों से बधाई, अँधेरी रात में टिमटिमाते दिये और मोमबत्तियाँ, आज दीवाली है तो उस सब की याद आना स्वाभाविक ही है.

यहाँ तो आज एक आम दिन है, अन्य दिनों जैसा, हालाँकि हमने शाम को बाहर खाना खाने जाने का प्रोग्राम बनाया है जहाँ भरतनाट्यम नृत्य भी होगा. कल यहाँ राजस्थान के लोकनर्तकों का कार्यक्रम भी है. फ़िर हम दिल को समझाते हैं कि चलो दूरी ही अच्छी है कम से कम पटाखों के शोर और प्रदूषण से तो बचेंगे!

आज दीपावली के शुभ अवसर पर मुझे बुद्ध प्रार्थना याद आती है, तमसो मा ज्योतिर्गमय. और यही शुभकामना है मेरी कि आप के परिवार में, घर में और दिलों में ज्योति का वास हो.

नीचे वाली तस्वीरें अभी हाल में चीन यात्रा में ली ज्यांग नाम के शहर में खींचीं थीं.






मंगलवार, अक्तूबर 23, 2007

बदलता चीन

आज सुबह मुझे काम से दो सप्ताह के लिए चीन जाना है. अंतिम चीन यात्रा को बीते छह साल हो गये, जब मँगोलिया जाते समय एक दिन के लिए बेजिंग में रुका था. पर इस बार मुझे बेजिंग नहीं जाना, बेंकाक से सीधा चीन के दक्षिण पश्चिम में स्थित राज्य युनान की राजधानी कुनमिंग जाना है. पहली बार कुनमिंग 1989 में गया था और अंतिम बार 1995 में, इस बीच में वह शहर कितना बदला है यह जाने की उत्सुक्ता है.

पहली बार की बेजिंग यात्रा कुछ कुछ धुँधली सी याद है. 1988 में हवाई अड्डे से शहर जाने वाली पतली सी सड़क थी, दोनो ओर खेत और बीच में चलती साईकलें और बैलगाड़ियाँ. बेजिंग शहर के छोटे छोटे एक मंजिला पुराने तरीके के घर. सम्राट के राजमहल के अंदर घुसने के लिए चीन निवासियों के कम टिकट था और विदेशियों के लिए अधिक. विदेशियों के लिए चीनी रुपये भी अलग थे, रेनएमबी जबकि वहाँ के लोगों के रुपये थे युवान. रेनएमबी से केवल विषेश दुकानों से सामान खरीद सकते थे, जैसे कि बेजिंग का फ्रैंडशिप स्टोर जहाँ आयातित वस्तुएँ मिलती थीं और जहाँ चीनी नागरिक कुछ नहीं खरीद सकते थे. चीनी महिलाएँ और पुरुष एक जैसे काली, भूरे या नीले कोट पैंट पहनते थे, सबके एक जैसे कटे बाल, पता नहीं चलता था कि कौन नारी और कोन पुरुष? सड़क पर भीख माँगने वाला कोई नहीं था.

1989 में हाँगकाँग से मकाऊ होते हुए कानतोन यानि ग्वागज़ू गये थे, फ़िर वहाँ से कुनमिंग, कुनमिंग से सियान और अंत में बेंजिंग जहाँ तियानामेंन स्कावर्य में छात्रों का आंदोलन चल रहा था और एक बारिश भरे दिन में मैं भी छात्रों से बात करने गया था पर कोई अँग्रेजी बोलने वाला नहीं मिला था. जिस दिन बेंजिग से वापस यूरोप लौटे उसके तीन चार दिन के बाद ही छात्रों पर पुलिस ने टैंक ले कर हमला किया था.

1992 में वापस बेजिंग लौटा तो नया होटल देख कर हैरान रह गया. हवाई अड्डे से शहर जाने के लिए छह लेन वाला हाईवे बना था और हवाईअड्डे के पास ही तीस चालिस मँजिला होटल था, जिसकी खिड़की से नीचे आसपास के छोटे मोटे गरीब घर और भी गरीब लगते थे. शहर आँखों के सामने बदल रहा था. काले, भूरे कपड़ों वाले लोग कम हो रहे थे, सुंदर कपड़े पहने नवजवान बढ़ रहे थे.

1994और 1996 के बीच कई बार चीन लौटा, कभी ग्वागँडोंग, कभी ग्वाँगजी, कभी युनान, कभी बेजिंग. हर जगह मानो भूचाल आ रहा था. उन्हीं दिनो में पहली बार ग्वागज़ू के कुछ प्रोफेसरों से माओ के दिनों की कल्चरल रिवोल्यूशन के रोंगटे खड़े कर देने वाले अनुभव सुने. लोगों के मन में से सरकारी या पुलिस का डर कम हो रहा था, लोग अपने मन की बात कहने लगे थे.कुनमिंग भी बदल रहा था, छोटा सा अधसोया शहर जाग कर गगनचुँबी भवन बनाने में अन्य शहरों से पीछे कैसे रहता पर सड़कें फ़िर भी तंग थी, यातायात इस तरह का बैलगाड़ियों, कारों और साईकलों से मिला जुला.

मालूम है कि इन ग्यारह सालों में कुनमिंग का कायाकलप भी पूरा हो चुका होगा. वह छोटा सा पुराना शहर जो मेरी यादों में है, वह अब नहीं दिखेगा. पर मुझे अगले दो सप्ताहों में गाँवों मे घूमना है, यह देखना चाहूँगा कि इस बदलते चीन का गाँवों में कितना प्रभाव पड़ा है. यात्रा से आ कर उसका हाल सुनाऊँगा, तब तक पिछली चीन यात्राओं की कुछ तस्वीरें. 1989 में खींचीं यह तस्वीरें बहुत पुरानी लगतीं हैं, शायद इसलिए क्योंकि उस साल मुझे श्वेत श्याम तस्वीर खींचने का शौक चर्राया था. रंगीन तस्वीर में मैं खुद भी हूँ ग्वागँडोंग शहर के स्वास्थ्य मँत्रालय के अधिकारिओं के साथ.










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संजय नें मेधा पटकर के भाषण के बारे में पूछा है, उसकी भी रिकार्डिंग की थी पर अब तो चीन से वापस आ कर वह काम हो पायेगा.

सोमवार, अक्तूबर 22, 2007

मेधा पटकर की लड़ाई

शुक्रवार को हमारे शहर में कामगार यूनियन के द्वारा आयोजित एक सभा में मुख्य अतिथि थीं भारत में नर्मदा आंदोलन की प्रसिद्ध नेता सुश्री मेधा पटकर. मैं मेधा से कुछ वर्ष पहले एक अन्य सभा में मिल चुका था. जब वह सभा में पहुँचीं तो मुझे देख कर रुक गयीं और मुस्कुरा कर पूछा, "हरीश भाई? आप हरीश भाई ही हैं न?" (नीचे तस्वीर में मेधा और बोलोनिया कामगार यूनियन के सचिव वितोरियो सिलिनगारदी)



जब तक सभा शुरु हो, उनसे कुछ देर बात करने का मौका मिला. मेरा कहना था कि वह इतनी प्रसिद्ध हैं, बहुत सा समय सभाओं में लोगों से मिलने को जाता होगा तो यह याद रखना कि कौन कौन है, क्या नाम है, वगैरा बहुत कठिन होगा. पर उनका कहना था नहीं वह बहुत कम अंतर्राष्ट्रीय सभाओं में जातीं हैं और इस बार बहुत समय के बाद भारत से निकली हैं. इतालवी वामपंथी कामगार यूनियन चीजीएल (CGIL) के निमंत्रण पर वह यहाँ आयीं हैं और यूनियन वाले चाहते हैं कि शनिवार को वह रोम में कामगारों के एक जलूस में भाग लें. इस जलूस के बारे में वह कुछ चिंतित लगीं यह जाने के लिए कि कौन लोग आयोजित कर रहे हैं, क्या माँगें हैं उनकी इत्यादि. नहीं, मैं इस जलूस में भाग नहीं लेना चाहतीं, बोलीं.

सभा प्रारम्भ हुई तो सबसे पहले मेधा को ही बोलने के लिए कहा गया. उन्होंने बात नर्मदा आंदोलन के इतिहास से शुरु की. बीस बाईस साल हो गयें हैं उनके संघर्ष को. आज सबसे बड़ा सवाल है कि कैसे विस्थापित होने वाले लोगों को उनका हक दिला सकें. उनका कहना था कि उनकी माँग थी कि लोगों को ज़मीन के बदले में ज़मीन ही मिले, केवल कुछ पैसा दे कर उन्हें न छोड़ दिया जाये. पर राज्यसरकार के अधिकारी इस मामले में भ्रष्टाचार का फायदा उठा कर फ़िर से गरीब लोगों को ठग रहे हैं.

उन्होंने दूसरी बात उठायी विषेश आर्थिक क्षेत्रों (Special economic zones - SEZ) की और उनमें निहित विकास के विचार की. विदेशी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को दिये जाने वाले इन विषेश आर्थिक क्षेत्रों में जमीन, पहाड़, घाटियाँ, नदियाँ सब कुछ दिया जा रहा है, उन क्षेत्रों में कामगरों के कानून, अन्य कानून भी लागू नहीं होते, उनका पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ता है इसकी कोई जाँच नहीं, इत्यादि. इस तथाकथित विकास में हमेशा से उनका साथ देने वाली वामपंथी पार्टयाँ भी अब रुख बदल रहीं हैं, जैसे कि पश्चिम बंगाल की सरकार ने फियट और टाटा की फैक्टरी को लगाने के लिए किया. सरकारी अफसर दो साल की छुट्टी ले कर इन्हीं कम्पनियों में मोटी तनखाह पर नौकरी पाते हैं और अपने सरकारी सम्पर्कों से कम्पनियों का काम आसान करते हैं.

मैं मेधा का भाषण अंत तक नहीं सुन पाया, किसी से मिलना था इसलिए बीच में ही सभा छोड़ कर जाना पड़ा. जितना सुना उससे लगा मेधा जी जनसाधारण के लिए अच्छा बोलती हैं, बहुत ताकत है उनके बोलने में. हर बात को सीधा सपाट बोलती हैं. बोलने का अंदाज कुछ कुछ चुनाव रैलियों की याद दिला रहा था. लगा कि अगर जनता के बीच में खड़ी हो कर जब वह बोलती होंगी तो अवश्य बहुत प्रभावित करती होंगी.


शनिवार, अक्तूबर 20, 2007

बिमल मित्र - दायरे से बाहर

बहुत समय के बाद बिमल मित्र की कोई किताब पढ़ने को मिली. बचपन में उनके कई धारावाहिक उपन्यास साप्ताहिक हिंदुस्तान पत्रिका में छपते थे, वे मुझे बहुत अच्छे लगते थे. फ़िर घर के करीब ही दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी से ले कर भी उनकी बहुत सी किताबें पढ़ीं थीं.



18 मार्च 1912 को जन्म हुआ था बिमल मित्र का. उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम.ए. की शिक्षा पायी और सौ से भी अधिक किताबें लिखीं. उनकी एक किताब पर हिंदी फ़िल्म निर्माता और निर्देशक गुरुदत्त ने "साहब बीबी और गुलाम" फ़िल्म भी बनायी. उनका देहांत 2 दिसम्बर 1991 को हुआ.

उनकी किताब "दायरे के बाहर" को दिल्ली के सन्मार्ग प्रकाशन द्वारा 1996 में छापा गया पर किताब में यह नहीं लिखा कि उसका मूल बँगला नाम क्या था या वह पहली बार कब छपी और उसके कितने संस्करण छप चुके हैं. पुस्तक का बँगला से हिंदी अनुवाद किया है श्री हंसकुमार तिवारी ने.

"दायरे के बाहर" कुछ अजीब तरह से शुरु होती है. वैसे तो यह बिमल मित्र के लिखने का तरीका ही था कि बहुत सी किताबों के शुरु में कुछ एक दो पृष्ठ लम्बा दर्शनात्मक विवेचन होता था. पर "दायरे के बाहर" के प्रारम्भ में लिखा है कि यह उनका पहला उपन्यास था जो उन्होंने द्वितीय महायुद्ध के बाद के समय में लिखा था और तब इसका नाम था "राख". फ़िर लिखा है कि पहली बार उपन्यास जिस बात पर समाप्त हुआ था उसके बाद भी और कुछ बातें हुईं जिन्हें उन्होंने इस नये संस्करण में जोड़ दिया है. कहते हैं कि पहले जब लिखा था तो इसकी भाषा भी बहुत अच्छी नहीं थी पर उसको पूरी तरह से बदलना तो नहीं हो सकता.

इन सब बातों में कितना सच है यह तो कोई उनके साहित्य को मुझसे बेहतर जानने वाला ही बता सकता है कि यह सच था या फ़िर कहानी को नाटकीय बनाने का एक तरीका.

कहानी है सुरुचि की जो द्वितीय महायुद्ध के पहले के दिनों में कलकत्ता में अपने अध्यापक पिता सदानंद और माँ मृण्मयी के साथ रहती है. उनके घर में रहने शेखर आता है जिसे सदानंद के पुराने मित्र गौरदास ने भेजा है. शेखर और सुरुचि एक दूसरे को चाहने लगते हैं और सुरुचि गर्भवति हो जाती है. शेखर ने सुरुचि से कहा है कि वह उससे विवाह करेगा पर वह अचानक गुम हो जाता है. सुरुचि माँ और बुआ के साथ दूर गाँव में रहने जाती है, सबको कहा जाता है कि मृण्मयी गर्भवति है. द्वितीय महायुद्ध छिड़ चुका है और कलकत्ता में भी बम गिरने की आशंका है, बहुत से लोग घर छोड़ कर गाँव जा रहे है. सुरुचि के बेटा होता है और थोड़े दिन के बाद मृण्मयी का देहांत हो जाता है. सुरुचि अपने बेटे राहुल को अपना छोटा भाई कहने को मजबूर है. उसे नौकरी देते हैं प्रौढ़ विधुर उद्योगपति विलास चौधरी और साथ ही उसके पक्षघात हुए पिता सदानंद का ध्यान भी करते हैं, जब वह सुरुचि से विवाह का प्रस्ताव रखते हैं तो सुरुचि न नहीं कह पाती. केवल विवाह के बाद मिलती है अपने पति की पहली संतान से, जो जेल से छूटा शेखर है, और जो अपने पिता की नयी पत्नी को देख कर घर छोड़ कर दोबारा गुम हो जाता है. तब उसके जीवन में गौरदास आते हैं, अब वह अनाथ बच्चों के लिए आश्रम चला रहे हैं. साल बीत जाते हैं. विधवा सुरुचि जानती है कि शेखर गौरदास के लिए ही काम करता है और वह जोर देती है कि शेखर को कलकत्ता बुलाया जाये ताकि वह उससे बात कर पाये.

बिमल मित्र की अन्य किताबों की तरह यह भी बहुत दिलचस्प है, एक बार पढ़ना शुरु करो जो छोड़ी नहीं जाती. पर किताब पढ़ते हुए मेरे मन दो फ़िल्मों की कहानी याद आ रही थी. एक तो श्री जरासंध के उपन्यास "तामसी" पर बनी बिमल राय की फ़िल्म "बन्दिनी". क्राँतीकारी शेखर का सदानंद के यहाँ आ कर रहना और उसका सुरुचि से प्रेम, मुझे बन्दिनी के शेखर और कल्याणी (फ़िल्म में अशोककुमार और नूतन) की कहानी से कुछ कुछ मिलता जुलता लग रहा था. दूसरी ओर शेखर और सुरुचि का प्यार और सुरुचि का अनजाने में शेखर के पिता से विवाह होना फ़िल्म एल वी प्रसाद की फ़िल्म "शारदा" की याद दिला रहा था, जिसमें शारदा का भाग निभाया था मीना कुमारी ने और उनके प्रेमी थे राज कपूर. शायद सच ही बिमल मित्र ने यह उपन्यास द्वितीय महायुद्ध के बाद लिखा था और इससे अन्य लोगों ने प्रेरणा पायी थी?

किताब का अंतिम भाग बाद में लिखा गया हो, यह कुछ कुछ लगता है. पहले भाग में गौरदास और शेखर क्राँतीकारी हैं, हिंसा और बम की बात भी करते हैं, सुभाषचँद्र बोस की आजाद हिंद फौज का हिस्सा बन कर अँग्रेजों से लड़ने की बात भी करते हैं पर बाद के हिस्से में बही गौरदास अहिँसावादी बन जाते हैं, शेखर समाजसुधारक बन जाता है, जो कि हो सकता है कि लेखक के अपने विचार बदलने का सूचक हो.

यह अवश्य है कि उपन्यास के अंतिम भाग में लेखक ने गौरदास की बातों के द्वारा अपनी आध्यात्मिक सोच को दिखाया है. जैसे कि यह सुरुचि और गौरदास की बातों को देखिये (पृष्ठ 252):

"पुरुष कहता है, कर्म जो पदार्थ है, वह स्थूल है, आत्मा के लिए बँधन है. लेकिन आदमी में जो नारी है, वह कहती है काम चाहिये, और काम चाहिये. इसलिए कि काम में ही आत्मा की मुक्ति है. वैराग्य भी मुक्ति नहीं है, अंधकार भी मुक्ति नहीं है, आलस्य भी मुक्ति नहीं है. ये सब भयंकर बंधन हैं. इन बंधनों को काटने का एक ही हथियार है, वह है कर्म.कर्म ही आत्मा को मुक्ति देता है और यह संसार ही कर्म का स्थल है. संसार को छोड़ने से तुम्हारा कैसे चल सकता है बिटिया! यदि मुक्ति चाहती हो तो तुम्हें इस संसार में ही रहना होगा."
इस किताब का यह हिस्सा मुझे सबसे अच्छा लगा.

शुक्रवार, अक्तूबर 19, 2007

आर्यों की थाली के बैंगन

जब अरुधती के भाषण का हिंदी में अनुवाद लिख रहा था तो जब उस हिस्से पर आया जिसमें वह आर्यों के भारत में आने की बात करती हैं तो लगा कि इस बात पर गर्म बहस हो सकती है. इसी विषय पर बहुत सी अन्य बहसें अंतर्जाल पर भी पढ़ चुका हूँ. दिक्कत यह है कि दोनों ओर से इस बहस में तर्कों के साथ भाव, पहचान, धर्म आदि की बहुत सी बातें जुड़ीं हैं इसलिए मुझे नहीं लगता कि दोनों में से कोई भी किसी भी तर्क के बल पर अपनी राय बदलेगा.

एक तरफ़ से मुझे लगता है कि आदि मानव का जन्म अफ्रीका में हुआ या फ़िर किसी और जगह हुआ होगा और फ़िर वहाँ से सारे मानव सारे विश्व में फैले तो इस बात पर इतना गुस्सा करना बेकार है कि कितने साल पहले क्या हुआ?

हर देश की संस्कृति अलग अलग लोगों के मिलने से ही बनी है. यहाँ इटली में दो ढाई हजार साल पहले तक एथ्रुस्क, फोनिशियन, रोमन, इतालिक और ग्रीक, स्पेनी, उत्तरी अफ्रीका आदि के लोग थे जिनके मिलने से ही इतालवी लोग बने. आज यहाँ की नोर्दर्न लीग पार्टी वाले जब कहते हैं कि दक्षिण इटली से आये, उत्तरी अफ्रीका से आये और दूर देशों से आये प्रवासियों को हमारे यहाँ से निकालो क्योंकि इटली केवल इतालवियों का है तो मुझे लगता है इन सब बातों के पीछे आर्थिक और अन्य कारण छुपे हैं और हर देश में यही बात होती है.

मैंने स्वयं लड़कपन में डा. डी. डी कोसम्बी की "प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता" पढ़ी थी और वहाँ पढ़ा तथा विद्यालय में पढ़ा पाठ कि आर्य बाहर से तीन या चार हजार साल पहले आये थे, यही बात ठीक लगती थी. पहली बार अंतरजाल पर ही पढ़ा कि यह सब बातें यूरोपीय और विदेशी पुरातत्वजनों की थीं जिनमें भारत और भारतीयों के प्रति पूर्वाग्रह थे, और फ़िर हड़प्पा तथा मोहनजोदाड़ो की मोहरों के बारे में बताया था कि किस तरह उनमें हिंदू देव देवता ही दिखते थे. पढ़ कर लगा कि वाह, आखिर किसी भारतीय पुरातत्व विशेषज्ञ या इतिहासकार ने अँग्रेजों की बात को गलत साबित कर दिखाया.

फ़िर अमर्त्य सेन का लेख पढ़ा जिसमें उन्होने लिखा था कि वह मोहरों वाली बात धोखा था, किसी ने जानबूझ कर मोहरों पर बनी आकृतियों को गलत तरह से बना कर यह साबित करने की कोशिश की थी. इस तरह यह एक तर्क, दूसरा तर्क की तरह टेबल टेनिस का मैच सा चल रहा है.

अभी कुछ समय पहले अंतरजाल पर ही एक लेख पढ़ा था जिसमें भाषा और स्वरों का विवेचन करके यह निष्कर्श निकाला गया था कि यह कहना कि भारत में आर्य चार हजार साल पहले आये थे ठीक नहीं लगता. यह बात भी मुझे बहुत दिलचस्प लगी. यानि कि इस विषय में मेरी अपनी कोई पक्की राय नहीं बन पायी है, लगता है कि थाली का बैंगन हूँ, कभी इधर लुड़कता हूँ कभी उधर.

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