लेखक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
लेखक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, अगस्त 19, 2026

ब्लॉग या सबस्टैक

हिंदी के पहले ब्लॉग 2004-05 के आसपास बनने शुरु हुए थे। मैंने यह अपना ब्लॉग 2005 में गूगल के ब्लॉगर पर बनाया था। पिछले इक्कीस सालों में अपनी बात को लोगों तक पहुँचाने वाले माध्यमों में बहुत से परिवर्तन आये हैं। गूगल के अतिरिक्त, ब्लॉग बनाने के अन्य बहुत से प्लेटफॉर्म आये और गये, उनमें से कुछ जैसे कि वर्डप्रैस आज भी जीवित हैं। लेकिन स्थिति बदलती रहती है, जब भी फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम जैसे नये प्लेटफॉर्म निकलते हैं तो कुछ ब्लॉग लिखने वाले उन पर लिखने लगते हैं और अपने पुराने ब्लॉगों को बंद कर देते हैं, कुछ साथ-साथ ब्लाग को भी चालू रखते हैं।

कुछ वर्ष पहले सबस्टैक नाम का एक नया प्लेटफॉर्म निकला तो बहुत से ब्लॉग वहाँ चले गये हैं। कुछ दिन पहले किसी ने मेरी राय पूछी कि सामान्य ब्लॉग बनाना चाहिये या सबस्टैक वाला ब्लॉग, तो मैंने इस विषय पर सोचा। साथ में इस बात पर भी विचार किया कि इक्कीस साल के बाद भी मैं इस ब्लॉग पर क्यों लिखता रहता हूँ?

इस आलेख में ब्लॉग बनाम सबस्टैक, और आज की दुनिया में जब अपनी बात लोगों तक पहुँचाने के लिए इतने सारे माध्यम है, ब्लॉग लिखने का महत्व, जैसी बातों के बारे में अपनी सोच और अनुभव साझा करना चाहता हूँ।

यह सबस्टैक क्या है?

सबस्टैक के पाठकों के लिए दो चेहरे हैं - उसका प्रमुख चेहरा है इलैक्ट्रोनिक न्यूजलैटर का, यानि अगर आप किसी सबस्टैक के सदस्य बनेंगे तो उसके आलेख आप के ईमेल से आप तक पहुँचेंगे। उसका दूसरा चेहरा है कि आप उन्हीं आलेखों को ब्लॉग की तरह भी इंटरनैट पर या सबस्टैक एप्प पर पढ़ सकते हैं।

सबस्टैक के लेखक अपने पाठकों से अपने आलेखों को पढ़ने के लिए फीस माँग सकते हैं, आप से कह सकते हैं कि आप उनके सदस्य बनिये और अगर फीस दे कर आप सदस्य नहीं बनते तो उनके आलेखों को नहीं पढ़ सकते।

सबस्टैक 2017-18 के आसपास बनने शुरु हुए थे। गूगल से पूछा तो पता चला कि दुनिया में इस समय करीब एक लाख सबस्टैक लेखक हैं जो नियमित लिखते हैं और उन्हें पढ़ने के लिए पैसे दे कर सदस्य बनना आवश्यक है। उनके अतिरिक्त अन्य कई लाख फ्री सबस्टैक हैं, जिन्हें पढ़ने की कोई फीस नहीं लगती।

भारत से निकलने वाले लोकप्रिय सबस्टैक हैं रोहण वैंकट का इंडिया इनसाईड-आऊट, प्रणय कोटास्थाने का एन्टीसिपेटिन्ग द अनइनटैंडिड, महिमा वशिष्ठ का वूमैंनिन्ग इन इंडिया, द वायर का इंडिया केबल और श्रेयास शैंदे का इंडियालॉग

जहाँ तक मुझे मालूम है अभी तक दुनिया मे हिंदी में कोई सबस्टैक नहीं चल रहा है। सदस्यता वाले सबस्टैक भारत में रह कर चलाना कठिन है क्योंकि उसके पैसे केवल स्ट्राईप पैयमैंट सिस्टम से मिलते हैं जिससे जुड़ने के लिए भारत में आप को रजिस्टर्ड बिज़नैस होना आवश्यक है, इसलिए आम व्यक्ति जो अपना व्यक्तिगत सबस्टैक बनाना चाहते हैं वह उसके माध्यम से कमा नहीं सकते। मैंने कुछ भारतीय सबस्टैक में देखा है कि वह आप से सदस्यता नहीं माँगते, लेकिन आलेखों के अंत में लिंक डाल देते हैं "हमारी सहायता कीजिये और हमे चाय या कॉफी पिलाईये" और वहाँ आप से पैसे देने के लिए कहते हैं। ऐसी ही एक लिंक पर क्लिक किया तो उन्होंने मुझसे कॉफी के लिए 5 यूरो यानि पाँच सौ रुपये देने के लिए कहा।

यूरोप के कुछ लोकप्रिय सबस्टैकों के कुछ उदाहरण हैं - तकनीकी के बारे में हॉलैंड से "द प्रेगमैटिक इंजीनियर" जिसके लाखों सदस्य हैं, साँस्कृतिक विषय पर इटली से "वाले तूत्तो" जिसके ढाई लाख सदस्य हैं, मैनेजमैंट के बारे में इटली से "रिफैक्टरिन्ग" जिसके डेढ़ लाख सदस्य हैं, और फाईनैन्स के विषय पर इंग्लैंड से "नेट इंडरस्ट"।

अमरीका के कुछ लोकप्रिय सबस्टैकों के उदाहरण हैं - अमरीकी राजनीति पर "लैटर्स फ्रोम एन अमेरिकन" और "द बुलवार्क", समाचारों पर "द फ्री प्रैस", नीतियों और आर्थिक विषयों पर "स्लो बोरिन्ग", और समाचारों पर व्यंग करने वाला, "द बोरोविट्ज़ रिपोर्ट"।

ब्लॉग या सबस्टैक पर लिखने के फायदे

मेरे विचार में इनका सबसे बड़ा फायदा है कि दुनिया के किसी भी कोने में लोग आप को पढ़ सकते हैं।

दूसरा फायदा है कि यह बने-बनाये प्लेटफॉर्म हैं, इसमें फॉन्ट, लेआऊट, तस्वीर लगाना आदि बहुत आसान है, इसे आप एक दिन में बिना किसी की सहायता के सीख सकते हैं।

इसका तीसरा फायदा है कि जब तक वह प्लेटफॉर्म रहेगा, आप का लिखा सुरक्षित है, जैसे कि मैं अपने बीस साल पहले लिखे आलेखों को आसानी से देख-खोज सकता हूँ, अगर उनमें कुछ नया जोड़ना चाहूँ या बदलना चाहूँ तो वह सब कर सकता हूँ। चूँकि कम्पनियाँ फेल हो जाती हैं, उनके प्लेटफॉर्म कभी भी बंद हो सकते हैं, इसलिए आप अपने ब्लॉग के आरकाइव को डाउनलोड करके उसकी एक कॉपी अपने पास सम्भाल कर भी रख सकते हैं।

इसका चौथा फायदा है कि आप अपने पाठकों की टिप्पणियाँ तुरंत देख सकते हैं और उनसे विचारों का आदान-प्रदान भी कर सकते हैं। एक ज़माने में लोग कम्प्यूटर से अधिक पढ़ते थे, तब टिप्पणियाँ अधिक मिलती थीं, आजकल लोग ट्रेन या बस में बैठे-बैठे मोबाइल पर ब्लॉग पढ़ते हैं इसलिए टिप्पणियाँ मिलना बहुत कम हो गया है।

ब्लॉगर पर बहुत सी एप्प हैं जिनकी सहायता से आप आसानी से जान सकते हैं कि कितने लोगों ने आप का आलेख पढ़ा है, वह कौन से देशों से हैं, महीने में कितने लोग आप के ब्लॉग को पढ़ते हैं। जैसे कि मेरे इस ब्लॉग को आजकल हर महीने बारह-पंद्रह हज़ार लोग पढ़ते हैं, इसके कुछ आलेख बहुत लोकप्रिय हैं, उन्हें बीस-पच्चीस हज़ार लोग पढ़ चुके हैं।

अगर आप चाहें तो ब्लॉग से कमा भी सकते हैं। ब्लॉगर आप को गूगल-एड डालने का मौका देता है, अन्य प्लेटफॉर्म वाले यह मौका नहीं देते लेकिन आप खुद अपने स्पॉन्सर या विज्ञापन खोज सकते हैं। जिन्होंने गूगल विज्ञापनों से कमाने की कोशिश की है, वह कहते हैं कि यह आसान नहीं है और कई बार गूगल अपने विज्ञापकों की वजह से आप से अपने लिखे को बदलने या हटाने के लिए कह सकता है। लेकिन गूगल-एड में कोई जबरदस्ती नहीं है, मैं ब्लॉग से कमाना नहीं चाहता, इसलिए मैं इसमें कोई व्यवसायिक आलेख या विज्ञापन नहीं स्वीकारता।

हो सकता है कि अपने ब्लॉग पर भी आप "मुझे चाय पिलाईये" जैसी लिंक डाल सकते हैं जिसके लिए आप यू.पी.आई. के किसी सिस्टम से पाठकों से कुछ पैसे देने के लिए कह सकते हैं। मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं है, न ही मैं जानता हूँ कि यह भारतीय कानून के हिसाब से कानूनी है या नहीं। इसे करने से पहले वकील आदि से सलाह लीजिये।

मेरा अनुभव है कि ब्लॉग या सबस्टैक से पैसा कमाना कठिन है। कुछ प्रसिद्ध सबस्टैक जिनके नाम ऊपर दिये हैं वह लाखों डालर कमाते हैं लेकिन वहाँ हम लाखों में से एक की बात कर रहे हैं, वह भी उसकी जो किसी क्षेत्र में बहुत ज्ञान रखता है और बहुत मेहनत करता है, हर हफ्ते नयी जानकारी ले कर आ रहा है।   

ब्लॉग और सबस्टैक में अंतर

कुछ अंतरों के बारे में ऊपर बात हुई है, जैसे कि ब्लॉग को उसकी वेबसाइट पर पढ़ते हैं जबकि सबस्टैक आप की ईमेल में न्यूजलैटर की तरह से आ सकता है। 

एक अन्य बड़ा अंतर है कि सबस्टैक का ले-आऊट (शब्द संयोजन) बदला नहीं जा सकता, जबकि ब्लॉग में आप रंग, तस्वीरें, ले-आऊट आदि सरलता से बदल सकते हैं।

ब्लॉगर बिल्कुल फ्री होता है, आप जितने चाहें, अलग-अलग भाषाओं में ब्लॉग बना सकते हैं। जबकि सबस्टैक में अगर आप सदस्यता की फीस नहीं लेते तो वह भी फ्री है, लेकिन अगर आप सदस्यता फीस लेते हैं तो आप को उसकी कमीशन देनी होती है। बाकी ब्लॉग प्लेटफॉर्म, जैसे कि स्कावयरस्पेस, को वार्षिक फीस देनी पड़ती है।

ब्लॉगर और सबस्टैक दोनों पर आप के आलेखों को, पाठक अपनी भाषा में अनुवादित देख और पढ़ सकते हैं। यानि आप के हिंदी ब्लॉग को फ्राँसिसी या स्पैनिश बोलने वाले भी पढ़ सकते हैं।

अगर आप ऐसे विषयों के बारे में लिखेंगे जिसके बारे में दुनिया जानना चाहती है तो लोग आप को किसी भी भाषा में पढ़ेंगे। पर अधिक पाठक खोजना जरूरी नहीं है, अगर ब्लॉग आप की आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम है, तो कौन-कितने वाली बातें भूल जाईये, जिसमें आप के मन को संतोष मिलता है, वह लिखिये। मेरी अपनी सोच यही रही है।

ब्लॉगर गूगल का है, अगर एक बार गूगल को विश्वास हो जाये कि आप बिना कहीं से नकल किये, अपनी जानकारी से और अच्छी भाषा में अच्छी तरह से लिखते हैं, तो वह पाठकों को आप के ब्लॉग में भेजता है, जबकि सबस्टैक को यह मदद नहीं मिलती। ब्लॉग और सबस्टैक, दोनों फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि की सहायता से भी अपने पाठक खोज सकते हैं।   

अंत में

हिंदी ब्लॉग जगत को जानने और पढ़ने के लिए आप पाँच लिंको का आनन्द, हिंदी ब्लाग जगत, ब्लाग4वार्ता, ब्लोगोदय, जैसे ब्लॉग प्लेटफार्म से तरह-तरह के हिंदी ब्लॉगों को देख सकते हैं। 

दस-पंद्रह साल पहले तक हिंदी के हज़ारों ब्लॉग होते थे, आज उनकी संख्या बहुत कम हो गयी है, बहुत से लोग अन्य सोशल मीडिया, विशेषकर फेसबुक के माध्यम से अपने लेखन को दूसरो तक पहुँचाते हैं। फेसबुक पर "हिंदी ब्लाग" खोजेंगे तो वहाँ ऐसे पन्ने मिलेंगे जहाँ पर आप अपने हिंदी लेखन के बारे में समाचार या विज्ञापन दे सकते हैं। 

मेरे लिए मेरा ब्लॉग मेरी डायरी है, मैं इसे सबसे पहले अपने संतोष के लिए लिखता हूँ। पहले के मुकाबले में आजकल पाठकों की टिप्पणियाँ मिलना बहुत कम हो गया है, लेकिन मैं देख सकता हूँ कि हर रोज़ पाँच सौ से ले कर एक हज़ार लोग इस ब्लॉग पर कुछ न कुछ पढ़ने आते हैं, मेरे लिए यही संतोष की बात है। कुछ महीने पहले मैंने अपने नये फैंतासी उपन्यास को भी अपने ब्लॉग से प्रकाशित किया है, इस तरह मुझे नये प्रयोग करना अच्छा लगता है।

अगर आप के मन में लिखने की और आत्म-अभिव्यक्ति की इच्छा है तो मेरी राय है कि अपना ब्लॉग बनाईये, इसके लिए आप को किसी अन्य पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा। आप के पास कम्प्यूटर या लेपटाप हो तो यह आसान होगा, मोबाइल से ब्लॉग लिखने में शायद कुछ मुश्किलें हों। एक बार लेखन का अभ्यास बढ़ेगा तो कल आप पत्रिकाओं और प्रकाशकों के लिए भी लिख सकते हैं।

***** 

रविवार, अगस्त 09, 2026

क्या पढ़ा (1) - हिंदी कहानियाँ-आलेख

लगभग पिछले चालिस सालों से, जबसे दिल्ली छोड़ कर इटली में रहने लगा था, मेरा हिंदी पत्रिकाएँ पढ़ना बहुत कम हो गया था, जब भारत जाता था तो इक्का-दुक्का पढ़ लेता था। पिछले साल अगस्त में मैंने "नॉटनुल" की वार्षिक सदस्यता ली तो इतने सालों के बाद हिंदी की पत्रिकाएँ पढ़ने का मौका मिलने लगा। अब इस बात को करीब एक साल हो गया है, एक दिन मैं याद करने लगा कि पिछले बारह महीनों में हिंदी पत्रिकाओं में क्या अच्छा पढ़ा, तो कुछ भी याद नहीं कर पाया। तब सोचा कि आगे से मुझे जो पढ़ा हुआ अच्छा लगेगा, उसके बारे में इस ब्लॉग पर लिखने की कोशिश करनी चाहिये, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उसे याद किया जा सके।

 

मुझे आशावादी साहित्य पढ़ना अच्छा लगता है, मैं चाहता हूँ कि चाहे कितनी भी बड़ी मुश्किलें या दुख हों, लेकिन कहानी के क्षितिज पर एक आशा की छोटी सी किरण भी होनी चाहिये, सब कुछ बिल्कुल नकारात्मक नहीं होना चाहिये। दूसरी बात है कहानी का कथानक, उसके कहने का अन्दाज़, उसकी बातें। पिछले वर्ष में जब हिंदी पत्रिकाएँ पढ़ीं तो मुझे समझ में आया कि मुझे हिंदी कहानियाँ पढ़ना इतना अच्छा नहीं लगता, बल्कि आलेख पढ़ना अधिक अच्छा लगता है।

इसीलिए आज के मेरे इस आलेख में कहानियाँ कम पायेंगे और आलेख अधिक।

कथा-कहानियाँ 

चंद्रकिशोर जायसवाल की कहानी "फर्ज", नया ज्ञानोदय पत्रिका के जुलाई अंक में पढ़ी। इसमें दामोदर भगत का बेटा बैजनाथ अपनी पसंद की युवती से ब्याह करना चाहता है, पर भगत जी ने पाँच साल पहले किसी को ज़ुबान दी थी कि उनकी सुंदर, सुस्कृंत कन्या से पुत्र का ब्याह करेंगे। गुस्से में भगत जी निर्णय लेते हैं कि अगर बैजनाथ उनकी बात नहीं मानेगा तो वह उसे अपनी जयदाद से बेदखल कर देंगे। कह तो देते हैं लेकिन उनके मन में इस बारे में कुछ संशय है, इसलिए वह अपने फुलकाहा गाँव के वरिष्ठ ज्ञानी वेदानन्द गिरि से सलाह लेने जाते हैं ... जब यह कहानी शुरु हुई, तो मेरे मन में अपेक्षा थी कि वह किस दिशा में जायेगी, लेकिन कहानी ने वह घिसा-पिटा रास्ता नहीं लेती, बल्कि एक दूसरी ही दिशा में चल पड़ती है। कहानी में वेदानन्द बाबू की यादों के किस्से और उनकी भगत जी को समझाने की कोशिशें, मुझे अच्छी लगीं। कहानी का अंत थोड़ा सा कन्वीनियंट लगा, पर कहानी पढ़ने में मज़ा आया।

मुकेश नौटियाल की कहानी "सियारसिंगी", जुलाई 2026 की पाखी पत्रिका में पढ़ी। इस कहानी में दो कहानियाँ हैं, एक कहानी है एक पहाड़ी गाँव की औरत, उसके बेटे और उसके खोये हुए भाई की। और दूसरी कहानी है एक तिब्बती शरणार्थी युवती और उसके साथ रहने वाले गूँगे-बहरे लड़के की। इन दो कहानियों को स्कूल में पढ़ाने वाले एक मास्टर जी जोड़ते हैं जो गाँव वाली औरत की चिट्ठियाँ लिखते हैं और उसके भाई को खोजने देहरादून की तिब्बती बस्ती में जाते हैं। कहानी में दो लोकविश्वास की कहानियाँ भी जुड़ी हैं, एक सियारों के माथे में उगने वाली जादुई शक्ति वाली सियारसिंगी की और दूसरी, इन्सानों को आग पर पका कर उनके कपाल से निकाले जाने वाले रामतेल की। यह सारी कहानी संयोगों पर टिकी है, कहानी के हर मोड़ पर मास्टर जी हर जगह पर जो भी खोजते हैं, वह उन्हें आसानी से मिल जाता है। पर जादुई-यदार्थवाद की कहानी में तर्क की अपेक्षा करना शायद उचित भी नहीं है। इस कहानी में मुझे उसकी भाषा और पहाड़ी लोकजीवन की खुशबु अच्छी लगीं। 

नर्मदेश्वर की कहानी "सूई धागा", परिकथा पत्रिका के जुलाई अंक में पढ़ी, अच्छी लगी। छोटी सी, सीधी-साधी कहानी है, जद्दी चाचा नाम के दर्जी और संदीप नाम के लड़के की, कि कैसे समय के साथ संदीप की उनसे जान-पहचान बनती है और लड़के को समझ आती है कि ऊपर से सख्त दिखने वाले जद्दी चाचा मन के नर्मदिल हैं। कहानी में जद्दी चाचा का अपने बेटों के नाम पेट्रोल और डीज़ल देख कर कुछ अजीब सा लगा, सोचा कि लेखक को उन नामों की कहानी भी बतानी चाहिये थी। इस कहानी से मुझे बचपन के दिनों की याद आई जब दर्जी, सफाई वाले, कपड़े इस्तरी करने वाले, दुकानदार, आदि बेनाम नहीं सचमुच के लोग होते थे, हम उनके नामों और परिवारों के इतिहासों को जानते थे, और वे हमारे।

आलेख, संस्मरण, आदि 

बिपिन तिवारी, अभिषेख गुप्ता और रोहतास कुमार का सुधीर विद्यार्थी से लम्बा साक्षात्कार "विप्लव राग" शीर्षक से, बनास जन पत्रिका में पढ़ा जो मुझे अच्छा लगा। सुधीर विद्यार्थी जी 1953 में पैदा हुए थे, उन्होंने इतिहास में एमए की और बीसवीं सदी के क्राँतिकारियों के बारे में बहुत कुछ लिखा है। इस साक्षत्कार-आलेख में बहुत सी रोचक बातें जानने को मिली, जैसे कि बनारसीदास चतुर्वेदी, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ, सुंदरलाल, बाबा नागार्जुन, आदि के संस्मरण, क्राँतिकारियों के बारे में गाँधी जी और नेहरू जी के बीच मतभेद, लोगों द्वारा भगतसिंह के सिर पर पगड़ी रखने का अर्थ, पंडित परमानन्द की कहानी, सुनीति चौधरी और शांति घोष की बातें, आदि। आलेख में अपने लेखन के बारे में सुधीर जी कहते हैं, "मैं किसी लायब्रेरी में नहीं बैठा, न किसी आर्काइव में गया। उस इतिहास को मैंने देखा-सुना-जाना, क्राँतिकारियों की आँखों से, उनके शब्दों से। इतिहास को बताते हुए कई-कई बार उन्हें रोते हुए देखा ..."। 64 पन्नों का यह साक्षात्कार है, किसी छोटी किताब के बराबर लम्बा है, पर बहुत दिलचस्प है। 

प्रसिद्ध शायर बशीर बद्र का मई 2026 में 91 वर्ष की आयु में निधन हुआ। उनके बारे में दो आलेख पढ़े। एक आलेख "हँस पत्रिका" में पढ़ा जिसमें युवा शायर महेंद्र कुमार सानी ने अपने स्मृति-आलेख, "उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो", में उनके प्रिय और प्रसिद्ध शेरों को याद किया है। जबकि डॉ. जियाउर रहमान ज़ाफ़री ने "ककसाड़ पत्रिका" के जुलाई अंक में अपने आलेख, "शायर बशीर बद्र को याद करने वाले ...", में उनके जीवन की कुछ बातों बतायीं हैं जैसे कि कैसे 1987 में मेरठ के दंगे में अपना घर खो कर वह भोपाल चले आये थे, कैसे अंतिम वर्षों में उनकी यादाश्त नहीं रही थी और कैसे बड़े बाग कब्रिस्तान में उनके जनाज़े साथ केवल मोबाइल की रोशनी और थोड़े से लोग थे। यहाँ मैं बद्र साहब का वह शेर याद करना चाहूँगा जिसे मैंने अपना जीवन जीने का मंत्र बनाया है: "हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ़ भी चल देंगे, रास्ता हो जायेगा।

शिव कुमार पाण्डेय का आलेख, "बस्तर की बोली-भाषा", भी ककसाड़ पत्रिका में ही पढ़ा। मुझे जनजातियों के जीवन से जुड़े लेख पढ़ना अच्छा लगता है इसलिए "ककसाड़" मासिक पत्रिका हमेशा चाव से पढ़ता हूँ। इस आलेख में पाण्डेय जी ने बस्तर की भाषाओं और बोलियों का बहुत दिलचस्प विवरण दिया है। जैसे कि गोंडी भाषा बस्तर में कांकेर और भानुप्रतापपुर के साथ-साथ अन्य बहुत से क्षेत्रों में भी बोली जाती है जिनमें कोन्टा, भोपाल पटनम, दाँतेवाड़ा, गढ़चिरोली, बालाधार, आदि भी शामिल हैं। हर जगह की गोंडी थोड़ी सी भिन्न है, लोग एक-दूसरे की गोंडी को समझते हैं, लेकिन उत्तर अपनी गोंडी में देते हैं। गोंडी के अतिरिक्त इस आलेख में "हल्बी" भाषा का भी जिक्र है जिसे बस्तर की सम्पर्क की भाषा भी कह सकते हैं और जिसमें छत्तीगढ़िया, मराठी और उड़िया भाषाएँ मिली हुई हैं। लेकिन गोंडी, हल्बी और बस्तर की अन्य 36 बोलियों में आपस में क्या सम्बंध है, यह बात मुझे ठीक से समझ नहीं आई, इसलिए इस विषय पर और पढ़ना अच्छा लगेगा। 

अकार पत्रिका में प्रियंवद का सम्पादकीय पढ़ा जिसमें उन्होंने हिंदी के वरिष्ठ लेखक तथा पहल पत्रिका के सम्पादक ज्ञानरंजन जी के बारे में लिखा है वह अच्छा लगा। उसमें उन्होंने, अन्य लेखकों के ज्ञानरंजन जी को लिखे पत्रों के माध्यम से, उनकी मार्क्सवादी-कथाकार बनने की यात्रा और फ़िर उनका कथाकार से अधिक सम्पादक बन जाने की बात, अन्य लेखकों के साथ उनके सम्बंधों, आदि की बातें बतायी हैं। ज्ञानरंजन जी की यह बात कि "मैं अपनों के प्रति बहुत निर्मम हूँ", मुझे बहुत परिचित सी लगी, क्योंकि एक समय था जब मेरी सोच भी कुछ वैसी ही थी, मुझे भी यह लगता था कि अगर मैं आप की कड़वी आलोचना करता हूँ तो इसका मतलब है कि आप मेरे प्रिय हैं (अब मैं इस सोच से बचने की कोशिश करता हूँ)। ज्ञानरंजन जी का इस साल के प्रारम्भ में देहांत हो गया था।

अकार पत्रिका के 73 अंक में ही "मेरी रचनात्मकता: मेरे द्वंद" शीर्षक से विभिन्न लेखकों के वक्तव्य छपे हैं, इन्हें भी मैंने बहुत रुचि से पढ़ा और यह मुझे बहुत अच्छे लगे। इनमें से कुछ की बात करना चाहता हूँ, जिन्होंने मुझे गहरा छुआ:

मनोज रूपड़ा के वक्तव्य में, उनकी स्मृतियों में हिंसा की घटनाओं, कुत्तों का घायल बिल्ली को नोच कर खाने से ले कर जलती रेल की बोगी में झुलसती लाशों के विवरणों, ने दिल को हिला दिया।

जया जादवानी की जीवन गाथा पढ़ी तो लगा कि उनके जैसा जीवन जीते हुए पढ़ना और लिखना का मतलब कितनी कठिनाईयों से लड़ना है। वह लिखती हैं, "द्वंद कुछ नया सोचने का, कुछ नया रचने का अब ज़्यादा है। कुछ ऐसा जो वर्जित हो, जिसे अब तक कहा न जा सका हो। कहा भी गया हो तो उसके भीतर घुस कर नहीं। मैं चाहती हूँ मेरा सत्य मेरे होने से निकले ..."

जितेन्द्र भाटिया के वक्तव्य में उनका कहानी लिखने को वैताल के वृक्ष से "स्मृति के शव को नीचे उतारने जैसा" पढ़ कर बहुत देर तक सोचता रहा। मुझे लगा कि शायद स्मृतियाँ शव नहीं होतीं, जीवित होती हैं पर उनमें एक अलग किस्म का जीवन होता है। जैसे विक्रम के गलत उत्तर देने पर वह शव उड़ कर वापस पेड़ पर लौट जाता है, वैसे ही स्मृतियाँ भी हमारे मानसिक पटल पर उड़ती-घूमती रहती हैं। उनकी एक अन्य बात कि "कविता के मुकाबले में गद्य लेखन, प्रेरणा से अधिक एक धैर्यपूर्ण रियाज़ और अपने आगे-पीछे देखने-समझने की विवेकपूर्ण मशक्कत माँगता है", ने भी सोचने पर मजबूर किया।

दिव्या विजय की बात कि व्यक्ति अपने आप को लेखक कब महसूस करता है, मुझे दिलचस्प लगी। मैं अक्सर कला प्रदर्शनियों में कलाकारों से साक्षत्कार करता हूँ, वहाँ भी अक्सर उनके मन में यही संशय मिलता है, कि शायद मैं कलाकार नहीं हूँ, मैंने कला के लिए बलिदान वाला जीवन नहीं जिया। दिव्या जी लिखती हैं, "लिख देना, छप जाना, क्या इतने भर से लेखक बना जा सकता है? वह क्या है जो किसी व्यक्ति को लेखक में बदल देता है?"

राही डूमरचीर के वक्तव्य में संताल गाँव और मित्रों के बीच में एक प्रवासी परिवार का हिस्सा होने का द्वंद है, जो संतालों को नीचा और पिछड़ा हुआ मानता है, उनसे सम्बंध नहीं रखना चाहता, वहाँ की प्रकृति-पहाड़ की सुंदरता को नहीं देख पाता। वह लिखते हैं, "... दंभ भी आनुवांशिक होता है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्वत: हस्तांतरित होता रहता है ... आदिवासियों के प्रति हमदर्दी ही हिलोर मारती थी, प्यार नहीं कर पाता था ... जँगल में अराजकता का राज होता है, कोई कायदा, कानून नहीं होता, यह वही कह सकता है जिसे सिर्फ बगीचे वाली व्यवस्था नज़र आती है ...हमारा समय पुरखे, पेड़ों, जंगलों में निवास करता है। उनके बीच पलता-बढ़ता है। उन्हीं के साथ-साथ चलता है। उनके बीतने से हमारा समय भी बीत जाता है ... मनुष्य विरोधी हो कर तो फ़िर भी रहा जा सकता है, पर धरती विरोधी हो कर कितने दिनों तक बचे रह पायेंगे हम?" 

कथा क्रम पत्रिका के अप्रैल-जून अंक में मधुरेश जी का लम्बा आलेख "शरत चन्द्र और उनका 'शेष प्रश्न': प्रेम दृष्टि और स्त्री चिंता के सवाल" में शरत चन्द्र के उपन्यास "शेष प्रश्न" के विभिन्न पात्रों विशेषकर कमल के बारे में, विवेचना तो है ही, साथ ही इस उपन्यास के विभिन्न संस्करणों के अनुवादों की गुणवत्ता और साहित्यिक भिन्नताओं की बात भी है। इस सब के साथ, आलेख में हिंदी साहित्य के पुराने अनुवादकों और प्रकाशकों की बाते भी हैं जो मुझे बहुत दिलचस्प लगीं। उदाहरण के लिए इस उपन्यास के 1927 में निकले संस्करण जिसका अनुवाद धन्य कुमार जैन ने किया था और नाथूराम 'प्रेमी' ने प्रकाशित किया था, की बात करते हुए वह नाथूराम प्रेमी के बारे में वह पुरानी जानकारी देते हैं जिससे आज का साहित्य जगत अवश्य ही अपरिचित होगा। उन्होंने लिखा है: "नाथूराम प्रेमी किस कद-बुत के प्रकाशक थे, इसके लिए चंद उदाहरण ही काफी होंगे। वे प्रेमचन्द्र और जैनेन्द्र के ही प्रकाशक नहीं थे। हजारीप्रसाद द्विवेदी की 'बाणभट्ट की आत्मकथा', 'कबीर' और 'हिन्दी साहित्य की भूमिका' के प्रकाशक भी वही थे।"

अंत में

रिटायर होने के बाद से, हर रोज़ इतना कुछ पढ़ता हूँ, कि सब के बारे में लिखना सम्भव नहीं है, लेकिन जो पढ़ा उसमें क्या याद रखने लायक लगा, यह लिखना शायद थोड़ा सा आसान है। मेरे लिए ब्लॉग मेरी डायरी है, इस आलेख को लिखने की चेष्ठा का मेरा यही अर्थ है।

इस आलेख में जिन कहानियों और आलेखों के बारे में मैंने लिखा है, अगर आप कहें कि उसमें से चुन कर यह बताईये कि सबसे अधिक अच्छा क्या लगा, तो मेरा चुनाव होगा, अकार पत्रिका के 73 अंक में ही "मेरी रचनात्मकता: मेरे द्वंद" शीर्षक से विभिन्न लेखकों के वक्तव्य - इस बार सबसे अधिक दिलचस्प मुझे वही लगे।

***** 

 

शनिवार, जून 27, 2026

अजेय की कविता में खड़ा आदमी

अजेय की एक प्रसिद्ध कविता है, जो मुझे बहुत अच्छी लगती है। लेकिन जब भी मैं उसे याद करता हूँ तो हर बार उसके एक शब्द पर अटक जाता हूँ। वह शब्द एक क्रिया है, जो मुझे अधूरी लगती है। और उसके अधूरेपन में कुछ ऐसा है जो मुझे बार-बार उस कविता की ओर खींचता है।


वह कविता है:

पहले एक गोरैया होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी इतना ऊँचा उड़ा
कि गोरैया खो गई।
 
पहले एक पहाड़ होता था
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे तन कर खड़ा
कि पहाड़ ढह गया।
 
पहले एक नदी होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे वेग से बहा
कि नदी सो गयी
 
पहले एक पेड़ होता था
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे जोर से झूमा
कि पेड़ सूख गया।
 
पहले एक पृथ्वी होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी इतनी जोर से घूमा
कि पृथ्वी रो पड़ी।
रो पड़ी ...
कि पहले एक आदमी होता था।

इसे पढ़ते हुए जिस क्रिया पर मैं अटक जाता हूँ, वह 'खड़ा' है, पहाड़ वाले अंतरे में। उड़ा, खड़ा, बहा, झूमा और घूमा में मुझे केवल 'खड़ा' वाली बात क्यों अधूरी लगती है? कवि को गिन कर शब्द लिखने होते हैं ताकि कविता की लय बनी रहे और 'खड़ा' को देख कर मैं अपने मन में उसे 'खड़ा हुआ' कर देता हूँ, लेकिन कहीं पर कुछ फँसा रह जाता है।

मैंने हिंदी आठवीं कक्षा तक ही पढ़ी थी, मुझे उसकी व्याकरण और साहित्य का विधिवत पढ़ने-समझने का मौका नहीं मिला था। खड़ा क्यों बाकी क्रियाओं से भिन्न है, शायद आप में से कोई हिन्दी व्याकरण के ज्ञानी मुझे समझा सकते हैं?

***** 

टिप्पणी: पहले मैंने अजेय की जगह इसे अज्ञेय की कविता समझा था, एक सुधी पाठक, अनूप सेठी जी, जो स्वयं जाने माने हिंदी कवि हैं, ने इस गलती के बारे में मुझे बताया। उन्हें इसके लिए दिल से धन्यवाद। 

अजय कुमार "अजेय" की यह कविता (एक आदमी होता था) और अन्य कविताएँ आप कविता-कोष पर भी पढ़ सकते हैं।

***** 

गुरुवार, मई 28, 2026

नया धारावाहिक उपन्यास

करीब एक-डेढ़ महीना पहले मैंने एक नया फैंतेसी उपन्यास लिखा, "देवी प्रतिमा के रक्षक"। यह एक छोटा सा हल्का-फुल्का उपन्यास है, जिसमें ताकानोरी नाम का एक जापानी याकूज़ा-गुँडा, एक गुप्त-शक्ति वाली मूर्ति की खोज में हिन्दुस्तान आता है और उसका मुकाबला एक अनाथालय में काम करने वाले युवक त्रिनेत्र और वहाँ रहने वाले अनाथ बच्चे करते हैं।

साथ की तस्वीर में उपन्यास के तीन प्रधान पात्र हैं - कोरिया के बौद्ध भिक्षुक जून मिन जिन्हें उनके भारतीय भक्त जामुन बाबा के नाम से जानते हैं, जापानी याकूज़ा ताकानोरी और अनाथाश्रम में काम करने वाला त्रिनेत्र। अगले सोमवार, 1 जून 2026 से आप इस उपन्यास को इसी ब्लाग पर पढ़ सकेंगे। 

अमेज़न या अन्य ओन-लाईन पर्टल या प्रकाशक के पास अपने उपन्यास को छपवाने की जगह पर मैंने अपने उपन्यास को ब्लॉग पर डालने का निर्णय क्यों लिया, इस आलेख में मैं इसकी बात करना चाहता हूँ।  

बचपन की यादें

जब मैं छोटा था तब बहुत सी हिंदी पत्रिकाएँ छपती थीं। पहले चँदामामा पत्रिका में रामायण की कथा छपती थी, वह पढ़ता था। कुछ बड़ा हुआ तो हमारे घर पर धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी सप्ताहिक पत्रिकाएँ आती थीं। उनमें अक्सर धारावाहिक उपन्यास छपते थे, यानि हर सप्ताह उपन्यास का एक नया अध्याय पढ़ने को मिलता था। तब पत्रिका आने और उपन्यास पढने की बहुत प्रतीक्षा रहती थी। शिवानी, शंकर, किशन चंदर, अन्नपूर्णा देवी और बिमल मित्र जैसे लेखकों से मेरा इसी तरह से परिचय हुआ था।

आजकल हिंदी की वैसी साप्ताहिक पत्रिकाएँ आनी बंद हो गयीं हैं। हिंदी की कुछ मासिक पत्रिकाएँ हैं लेकिन मुझे नहीं लगता कि उपन्यास के एक अध्याय को पढ़ने के लिए कोई एक महीने तक प्रतीक्षा करेगा। बल्कि, एक महीने पहले क्या पढ़ा था, उसे याद रखना कठिन होगा। मैं सोच रहा था कि पहले जैसा धारावाहिक उपन्यास पढ़ने का अनुभव आज के पाठकों को कैसे दिया जा सकता है? तब उसे ब्लाग में छापने की बात मन में आयी।

इस ब्लाग के आलेखों को दो सौ - तीन सौ पाठक आसानी से मिल जाते हैं, और कुछ लोकप्रिय आलेखों को पढ़ने वालों की संख्या कुछ हज़ार तक पहुँच जाती है। मैंने सोचा है कि अगर मेरे उपन्यास को ब्लाग से सौ - दो सौ पाठक मिल जायें तो मेरे लिए काफ़ी हैं और इसके लिए मुझे किसी अन्य पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा।

मुझे अच्छी पैंशन मिलती है, मुझे और पैसे की आवश्यकता नहीं है। वैसे भी जहाँ तक मुझे मालूम है, आम हिंदी लेखकों की किताबों से कमायी अधिक नहीं होती।   

हिंदी किताबों के प्रकाशक 

हिंदी प्रकाशनों के बारे में जितना पढ़ा-जाना है, उससे लगता है किताब छपवाना बहुत कठिन है, और वह मेरे बस की बात नहीं है। मेरे एक अन्य उपन्यास को छापने की मित्र अरविंद मोहन की सहायता से एक प्रतिष्ठित प्रकाशक से करीब तीन साल पहले बात हुई थी, वह अभी तक नहीं छपा और न ही उसके छपने के कुछ आसार दिखाई देते हैं।

कुछ दिन पहले जाने-माने पत्रकार और लेखक प्रिय दर्शन ने कुछ दिन पहले फेसबुक पर हिंदी लेखकों की स्थिति के बारे में लिखा था, कि "लेखक का पारिश्रमिक या तो बंद हो चुका है या घटता जा रहा है। जो वेब पोर्टल पहले लेखक को पैसे देते थे, उन्होंने पारिश्रमिक देना बंद कर दिया है, क्योंकि वे 'घाटे' में चल रहे हैं। किताबों की रॉयल्टी इतनी कम मिलती है कि बताने में कोई शर्मिंदा हो जाए। ... प्रकाशन की दुनिया में पैसे देकर- या अपनी अफ़सरी या नेतागीरी के बूते किताबें बिकवा कर- किताबें छपवाने का जो नया चलन शुरू हुआ है, उसने लेखकों के सामने एक नई मुश्किल पैदा कर दी है। उनकी किताबें प्रकशकों के यहां पड़ी रहती हैं- उनका प्रकाशन टलता जाता है। किताबों के प्रचार का ज़िम्मा भी लेखक का है प्रकाशक का नहीं"।

वैसे अगर मैं चाहूँ तो मैं अपने उपन्यास को पैसे दे भी कर छपवा सकता हूँ, पर मुझे लगता है कि उससे मैं अपने उपन्यास को कुछ जान-पहचान के लोगों को भेज दूँगा, लेकिन उसे सामान्य पाठक नहीं मिलेंगे। वैसे भी यह हल्का-फुल्का जासूसी किस्म का उपन्यास है, शायद इसे ब्लाग पर अधिक लोग पढ़ेंगे।

वैसे तो दुनिया में एमाज़ॉन और नॉटनुल जैसी वेबसाईट हैं जहाँ किताबें छापी जा सकती हैं। मुझे एमाज़ॉन के किन्डल प्रकाशन का अनुभव नहीं है, लेकिन मैं नॉटनुल पर नियमित हिंदी पत्रिकाएँ पढ़ता हूँ। उनमें किताबें छपवा सकता हूँ, लेकिन मुझे लगा कि अगर मुझे लेखन की कमाई नहीं चाहिए, तो मैं अन्य झंझट क्यों करूँ?

कुछ अन्य ख्याली पुलाव

एक बार उपन्यास का धारावाहिक प्रकाशन पूरा हो जायेगा तो सोचा है कि जो पाठक चाहेंगे मैं उन्हें इस उपन्यास को उन्हें ईमेल से पीडीएफ, इपब और मोबी फॉरमैट में भी भेज सकता हूँ, ताकि जो लोग मेरे ब्लाग को नहीं पढ़ना चाहते, वह भी इसे पढ सकते हैं।

मैं यह भी चाहता हूँ कि युवा लोग हिंदी में पढ़ें और लिखें। उन्हें प्रोत्साहन देने के लिए मैं युवा पाठकों के लिए "आलोचना पुरस्कार" आयोजित करने की भी सोच रहा हूँ, यानि सोचा है कि मेरे उपन्यासों की सार्थक आलोचना लिखने वाले पाँच-दस युवाओं को मैं कुछ पुरस्कार दे सकता हूँ और उनकी आलोचना को ब्लाग पर जगह दे सकता हूँ - इसके बारे में भी सोच कर अगले दिनों में कुछ निर्णय लूँगा।

आशा है कि अगले सोमवार एक जून से आप मेरे उपन्यास "देवी प्रतिमा के रक्षक" को पढ़ेंगे और मुझे अपनी राय भेजेंगे। बाकी की सब बातें अभी दिमाग में घूम रही हैं, अगले कुछ दिनों में मैं इस विषय में निर्णय लूँगा। इस बारे में मेरे साथी ब्लॉग लेखक और पाठक मुझे कुछ सलाह देना चाहें तो उसके लिए आप को अग्रिम धन्यवाद।

*****

1 जून 2026: आप चाहें तो "देवी प्रतिमा के रक्षक" को इस ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं 

***** 

शुक्रवार, मार्च 20, 2026

मेरा फैंतासी उपन्यास

बहुत सालों से मैं एक हल्का-फुल्का सा जासूसी उपन्यास, जेम्स बॉन्ड जैसा कुछ, लिखना चाहता था। बचपन में ऐसी किताबें पढ़ना मुझे बहुत अच्छा लगता था।

साठ के दशक में, घर पर पापा की अलमारी में बहुत सी गम्भीर साहित्य वाली किताबें थीं, जिन्हें मैंने बहुत छोटी उम्र में पढ़ना शुरु कर दिया था - नानक सिंह, रांगेय राघव, किशन चंदर, चतुरसेन, जैसे बहुत से लेखक मुझे अच्छे लगते थे। घर में सारिका, धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी पत्रिकाएँ भी आती थीं जिनमें मुझे शिवानी, शंकर, बिमल मित्र जैसे लेखकों को पढ़ना भी अच्छा लगता था।

लेकिन गम्भीर साहित्य के साथ हल्का-फुल्का साहित्य भी मुझे प्रिय था। मेरी मौसी की सहेली जो हमारी पड़ोसी थी, उनके यहाँ जासूसी उपन्यास पढ़ने को मिलते थे। मौसी के अपने सबसे प्रिय लेखक थे गुलशन नन्दा, जिनकी बहुत सी किताबें मैंने गर्मियों की छुट्टियों में पढ़ी थीं। छुट्टियों में हम कई बार बड़ी मौसी के यहाँ पश्चिमी बंगाल में अलीपुर द्वार जाते थे, जहाँ जाने की यात्रा में तीन दिन लगते थे, तब रास्ते भर मैं स्टेशन से खरीदी जासूसी और गुलशन नन्दा किस्म की किताबें पढ़ता था।

नया उपन्यास - देवी प्रतिमा के रक्षक 

आखिर में मैं अपना सपना पूरा करने में सफल हुआ। असल में इसे लघु उपन्यास कहना चाहिये, और इसे लिखने में मुझे बहुत मज़ा आया। मैं इसके प्रकाशन के बारे में सोच रहा हूँ, नये लेखकों के लिए हिंदी किताबों के प्रकाशक मिलना कठिन लगता है, और चूँकि मैं विदेश में रहता हूँ, प्रकाशित करवाने में और भी दिक्कते हैं। वैसे तो सुना है कि हिंदी किताबों के लेखन की कमाई से जीवन-यापन कठिन है, लेकिन मेरे पास मेरी पैंशन है, मुझे पैसे की आवश्यकता भी नहीं है, इसलिए मैंने सोचा है कि इसे अपने इस ब्लाग पर ही प्रकाशित कर चाहिये। आप की क्या राय है?

उपन्यास "देवी प्रतिमा के रक्षक" का कवर चित्र

यह उपन्यास लिखने की यात्रा

मेरे पहले दो उपन्यास साहित्यिक विषयों पर थे। एक उपन्यास लिखने में मुझे दो-तीन साल लगते थे, लेकिन मन कभी संतुष्ट नहीं होता था, इसलिए मैं उन्हें बार-बार लिखता, दस-पंद्रह बार भी। जबकि इस फैंतासी उपन्यास लिखने में सिर्फ दो महीने लगे।

शुरु में सोचा था कि उपन्यास एक रहमदिल खूनी पर होगा, जिसे अपने खून-खराबे पर पछतावा है और जो अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए अब केवल बुरे लोगों को मारता है, यानि कि वह एक तरह का रोबिनहुड-खूनी है। लेकिन जब उसे लिखने लगा तो वह कहानी उस खूनी के हृदय परिवर्तन की बात पर केन्द्रित हो गयी, यानि कि उस खूनी का दिल क्यों और कैसे बदलता है।

मेरे उपन्यास का खूनी, ताकानोरी ओकामो, एक जापानी याकूज़ा है, जिसे दक्षिण कोरिया के एक बुद्ध भिक्षुक की विशेष शक्ति वाली मूर्ति की खोज है। वह भिक्षुक जी उस मूर्ति के साथ कई सालों से भारत में एक वृद्धाश्रम में छिपे हुए रहते हैं।

उपन्यास लिखते हुए कथानक में एक और परिवर्तन हुआ, कि उस खूनी की कहानी के साथ, यह एक अनाथाश्रम में रहने वाले कुछ गुप्त-शक्तियों वाले बच्चों की कहानी भी बन गयी। उपन्यास पूरा करने के बाद मुझे लगा कि शायद मेरी कहानी के नायक त्रिनेत्र और उनके साथी बच्चे "मिस्टर इंडिया" फ़िल्म से कुछ हद तक प्रभावित हैं।

शायद यह उपन्यास बड़े बच्चों, किशोरों और नवजवानों के लिए अधिक उपयुक्त है, पर यह निर्णय तो पाठक ही कर सकते हैं। यह उपन्यास भारत के उत्तर-पूर्व की पृष्ठभूमि पर है, इसका एक बड़ा हिस्सा, असम के मजूली द्वीप पर केन्द्रित है, उसके अलावा इसमें विष्णुपुर, गंगटोक और मणिपुर भी हैं।  

उपन्यास का कवर

मेरे बेटे ने कृत्रिम बुद्धि (ए.आई.) यानि आर्टिफीशियल इन्टैलिजैंस से इसके लिए बहुत से कवर बना कर दिये, जिनके कुछ नमूने आप नीचे देख सकते हैं।

ए.आई. से बने मूल चित्र

अंत में मैंने जो कवर चुना, मुझे लगा कि उसके रंग अच्छे नहीं हैं, वह स्पष्ट रूप से दिखता है कि ए.आई. से बना है। मैंने उसके रंग हटा कर उन्हें कम्प्यूटर पर हाथ से रंगा और कुछ फिल्टर लगा कर देखे। जब उपन्यास निकलेगा, तब आप को इस पर राय देने का मौका मिलेगा। 

अंत में

पाठकों को यह उपन्यास कैसा लगेगा, पता नहीं, लेकिन मुझे इसे लिखने में बहुत आनन्द आया। यह लिखा भी फटाफट ही गया। जून में मेरा जन्मदिन होता है, सोचा है कि इस अवसर पर, "देवी प्रतिमा के रक्षक" को इसी ब्लॉग पर पाठकों के लिए किश्तों में प्रकाशित किया जाये।

मेरे मन में एक और ख्वाहिश भी है, साईन्स फिक्शन का उपन्यास लिखने की। फैंतासी लिखने में इतना मज़ा आया, मुझे आशा है कि साईन्स फिक्शन लिखने में भी उतना ही आनन्द आयेगा। अभी उसकी पलैनिन्ग शुरु की है।

*** 

1 जून 2026: आप चाहें तो "देवी प्रतिमा के रक्षक" को इस ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं।   

*** 

बुधवार, दिसंबर 31, 2025

मध्य-युगीन कृष्ण-भक्ति ब्रज-भाषा काव्य

यह आलेख डॉ. सावित्री सिन्हा की लिखी और 1962 में नेशनल पब्लिशिन्ग हाउज़ द्वारा छापी पुस्तक "ब्रज भाषा के कृष्ण भक्ति काव्य में अभिव्यंजना शिल्प" की भूमिका का एक अंश है। आप चाहें तो इस पूरे आलेख को कल्पना पर पढ़ सकते हैं या पीडीएफ में डाउनलोड कर सकते हैं।

डॉ. सावित्री सिन्हा ने यह पुस्तक अपने माता-पिता (और मेरे दादा-दादी द्वारकाप्रसाद और जयदेवी) को इन शब्दों के साथ समर्पित की थी: "स्वर्गीय पिता जी की आंसूभरी, धूमिल बाल-स्मृतियों को तथा मां के असीम साहस, धैर्य, त्याग और वात्सल्य को"

मध्य युगीन कृष्ण-भक्ति ब्रज-भाषा काव्य - डॉ. सावित्री सिन्हा

 

***

सूरदास से पूर्व कृष्ण-भक्ति काव्य में अभिव्यंजना-शिल्प की स्थिति - एक विहंगावलोकन

डॉ. शिवप्रसाद सिंह के शोध के फलस्वरूप अभी हाल में ही सूरदास के समय से पहले का ब्रजभाषा काव्य प्रकाश में आया है। 'सूर-पूर्व ब्रजभाषा और उसका साहित्य' नामक उनके शोध-प्रबंध में उपलब्ध साहित्य के व्यख्यान के साथ ही कुछ अनुपलब्ध साहित्य भी प्रकाश में लाया गया है और सूरदास से पहले ब्रजभाषा कवियों के अस्तित्व को सिद्ध करने का प्रयास किया गया है। नामदेव, कबीर और रैदास की अनुभूतिपरक रचनाओं को लेखक ने कृष्ण-भक्ति काव्य के विकास का एक सोपान माना है। इस निर्णय को स्वीकार करने के पक्ष और विपक्ष दोनों ही ओर से अनेक तर्क दिये जा सकते हैं। परन्तु यह प्रश्न यहां पर अप्रासंगिक है।

संतमत के कवियों के अतिरिक्त उन्होंने कृष्ण-भक्ति काव्य के विकास में संगीतकार कवियों का महत्वपूर्ण योग स्वीकार किया है। उनके शब्दों में, “संगीतज्ञ कवियों ने न केवल अपनी स्वर-साधना से भाषा को परिष्कार और मधुर अभिव्यंजना प्रदान की, तथा अप्रतिम नाद-सौंदर्य से कविता को अधिक दीर्घयुगी बनाया परन्तु अपनी सम्पूर्ण संगीत-प्रतिभा को आराध्य कृष्ण के चरणों पर लुटा भी दिया। गोपाल नायक और बैजू बावरा के पदों में आत्मनिवेदन, गोपी-प्रेम और भक्ति के विविध पक्षों का बड़ा ही विशद और मार्मिक चित्रण हुआ है। गोपाल नायक के एक पद में रास का चित्रण इस प्रकार मिलता है -

कांधे कामरी गो आलाप के नाचे जमुना तीर, नाचे जमुना तीर

पीछे रे पांवरे लेती नाचि लोई मांगवा --

भुव आलि मृदंग बांसुरी बजावै गोपाल वैन वतरस ले आनन्द। (राग कल्पद्रुम)

बैजू बावरा का उल्लेख भी इस प्रसंग में किया गया है तथा राग कल्पद्रुम में संकलित उनके पदों के आधार पर उन्हें ब्रजभाषा का कवि सिद्ध किया गया है। राग कल्पद्रुम की यह रचनायें शुद्ध ब्रजभाषा में हैं -

आंगन भीर भई ब्रजपति के आज नन्द महोत्सव आनन्द भयो।

हरद दूब दधि अक्षत रोरी ले छिरकत परस्पर गावत मंगलचार नयो।

ब्रह्मा ईस नारद सुर नर मुनि हरषित विमानन पुष्प बरस रंग ठयो।

धन धन बैजू संतन हित प्रकट नन्द जसोदा ये सुख जो दयो। (राग कल्पद्रुम)

इन दोनों ही कवियों की रचनाओं में निहित संगीत तत्व परवर्ती कृष्ण-भक्त कवियों की संगीत-साधना की पृष्ठभूमि से जान पड़ते हैं, परन्तु जहां तक अभिव्यंजना शैली का प्रश्न है यह रचनायें परवर्ती रचनओं के सामने पासंग भर भी नहीं ठहरतीं।

इन रचनाओं के अतिरिक्त शोधकर्ता ने निम्नलिखित ७ अप्रकाशित पुस्तकों का परिचय-परीक्षण भी प्रस्तुत किया है - अग्रवाल कवि की प्रद्युमनचरित; विष्णुदास की महाभारत कथा, स्वर्गारोहड़, रुक्मिणी मंगल, स्वर्गारोहड़ पर्व और स्नेह लीला; थेघ नाथ की गीता भाषा।

कृष्णभक्ति सम्बंधी अप्रकाशित ग्रंथों को लेखक ने जिस रूप में हमारे सामने रखा है, उसे उसी रूप में स्वीकार कर लेने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं है। उनके मतों को उद्धृत करके विषय-विस्तार करने से कुछ लाभ नहीं होगा। जो कुछ भी सामग्री प्रकाश में आयी है उसके अध्ययन द्वारा ये निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं -

तत्कालीन ब्रजभाषा के दो रूप थे (१) अपभ्रंश मिश्रित ब्रजभाषा (२) तद्भव प्रधान ब्रजभाषा। संस्कृति के तत्सम शब्दों के प्रयोग द्वारा तत्कालीन ब्रजभाषा का रूप परिनिष्ठित नहीं हो पाया था। प्रथम कोटि की भाषा के उदाहरण के रूप में डूंगर कवि की एक रचना उद्धृत की जा रही है -

ऋतु बसंत उलहणी विविह वणराय फलह सहू।

कंटक विकट करीर पंत पिकखंत किंपि नहु।

धाराहर वर धवल बारि वरसंत घनघोर वन।

कुरलतंउ मूल मंत्री सर्प नहीम मानहिं दुर्जन।

***

औषधि मूल मंत्री सर्प नहिं मानहिं दुर्जन।

सर्प डसी वेदना एही दिट्ठइ हुई, गुंजन।

लागइ दोष अनन्त कियइ संसर्ग एनि परि।

तवडी जल हरइ घड़ी पीटियइ सुफल्लरि।

द्वितीय कोटि के उदाहरण के रूप में विष्णुदास रचित 'सनेह लीला' की ये पंक्तियां ली जा सकती हैं -

महलन मोहन करत विलास।

कहां मोहन कहां रमन रानी और कोऊ नहिं पास।

रुकमन चरन सिरावत पिय के पूजी मन की आस।

जो चाहे थी सो अब पायो हरि पति देवकी सास।

तुम बिन और कौन थो मेरौ धरति पताल आकास।

पल सुमिरन करत तिहारौ ससि पूस परगास।

इन कवियों की रचनाओं में प्रबुद्ध कला-चेतना का पूर्ण अभाव है। अभिव्यंजना-शैली की दृष्टि से ये अत्यंत साधारण कोटि की रचनायें हैं। उनकी शैली अधिकतर वर्णनात्मक और विवरणात्मक है। अप्रस्तुत योजना, लक्षित चित्र-योजना, वाग्वैदग्घय आदि तत्व बहुत ही कम हैं।

विषय-वस्तु के क्षेत्र में कुछ ऎसे तत्व अवश्य मिलते हैं जिन्हें परवर्ती कृष्ण-भक्ति काव्य का पूर्वाभास कहा जा सकता है। यह प्रभाव मुख्य रूप से दो क्षेत्रों में दिखाई पड़ता है: (१) लोक संस्कृति के चित्रण में (२) शास्त्रीय संगीत के समावेश में।

गोस्वामी विष्णुदास रचित रुक्मणि मंगल की ये पंक्तियां प्रथम वर्ग के उदाहरण के रूप में ली जा सकती हैं:

मोतियन चौक पुराय के कियौ आरती माय।

अति आनन्द भयौ है नगर में घर घर मंगल साजै।

मनमोहन प्रभु ब्याह कर आये पुरी द्वारका राजै।

अंगन तन में भूषन पहिने सब मिलि करत समाज।

बाजै बाजन कानन सुनियत, नौबत घन ज्यूं बाज।

नर नारिन मिलि देत बधाई सुख उपजै दुखभाज।

नाचत गावत मृदंग बाजत रंग बसावत आज।।

दूसरे वर्ग की रचनाओं के अन्तर्गत गोपाल नायक और बैजू बावरा की रचनायें रखी जा सकती हैं। डॉ. सिंह ने इन रचनाओं को काव्य-कल्पद्रुम से संकलित किया है। संगीत कला के क्षेत्र में इस ग्रंथ का महत्वपूर्ण स्थान है परन्तु भाषा और साहित्य की दृष्टि से उसमें संकलित पदों को प्रमाणिक माना जा सकता है या नहीं यह प्रश्न विवादरहित नहीं है। यदि उन्हें प्रमाणिक मान लिया जाये तो गोपाल नायक और बैजू बावरा के पदों को परवर्ती कृष्ण-भक्त कवियों के ध्रुपद शैली में रचित पदों का पूर्वरूप माना जा सकता है। शास्त्रीय संगीत के तत्वों का उल्लेख तथा ध्रुपद शैली के अनुकूल पद-योजना इन रचनाओं में प्राप्त होती है -

सप्त स्वर तीन ग्राम इकइस मूर्छन बाइस सुर्त

उनचास कोट ताल लाग डाट

गोपाल नायक हो सब लायक आहत अनाहत शब्द,

सो ध्यायो नाद ईश्वर बसे मो घाट

तथा

मार्ग देसी कर मूर्छना गुन उपजे मति सिद्ध गुरु साध चावै।

सो पंचम मघ दर पावै।

बैजू बावरा के पदों की योजना भी ध्रपुद शैली की श्वास-साधना के निमित्त की हुई जान पड़ती है:

बोलियो न डोलियो ले आऊं हूं प्यारी को,

सुन हौ सुघर वर अब हीं पै जाऊं हूं।

मानिनि मनाय के तिहारे पाय ल्याय के,

मधुर बुलाय के तो चरण गहाऊं हूं।

सुन री सुंदर नारि काहे करत एति रार,

मदन डारत पार चलत पल तुझाऊं हूं।

मेरी सीख मान कर मान न करो तुम,

हे जु प्रभु प्यारे सो बहियां गहाऊं हूं।

बधाई के लोक-गीत भी उनके नाम से प्राप्त होते हैं:

आंगन भीर भई ब्रजपति के आज नन्द महोत्वस आनन्द भयौ।

हरद दूब दघि अक्षत रोरी ले छिरकत परस्पर गावत मंगलचार नयो।

ब्रह्मा ईस नारद सुर नर मुनि हरषित विमानन पुष्प बरस रंग ठयो।

धन धन बैजू संतन हित प्रकट नन्द जसोदा ये सुख जो दयो।

अधिकतर कवियों ने दोहा, चोपाई और छप्पय का प्रयोग किया है। कुछ पदों के ऊपर गौरी, धनाश्री और पूर्वी रागों का उल्लेख भी हुआ है।

इस सामग्री के अध्ययन के उपरान्त सूरदास से पूर्व ब्रज-भाषा काव्य के अस्तित्व की स्वीकृति में आचार्य शुक्ल का अनुमान आंशिक रूप में ही सत्य माना जा सकता है। सूरदास के काव्य-सौष्ठव पर विचार करते हुए आचार्य शुक्ल ने कहा था, ‘इन पदों के सम्बंध में सबसे पहली बात ध्यान देने की यह है कि चलती हुई ब्रजभाषा में सबसे पहली साहित्यिक रचना होने पर भी ये इतनी सुडोल और परिमार्जित है, यह रचना इतनी प्रगल्भ और काव्यांग-पूर्ण है कि आगे होने वाले कवियों की उक्तियां सूर की जूठी सी जान पड़ती हैं। अत: सूर-सागर किसी चली आती हुई गीति काव्य परम्परा का - चाहे वह मौखिक ही रही हो - पूर्ण विकास सा प्रतीत होता है।"

इन कृतियों के प्रकाश में आने पर भी कलाकार के रूप में सूर अपने पूर्व-स्थान पर ही शोभित हैं। इस काल के दर्जन कवियों में से एक भी ऎसा नहीं है जो अष्टछाप के अन्य कवियों के समकक्ष खड़ा रह सके, सूरदास तो दूर की बात है। जहां तक पूर्व-परम्परा की स्थापना का प्रश्न है यह तथ्य उसी रूप में स्वीकार किया जा सकता है जैसे हम यह कहें कि छायावादी कविता के बीज द्विवेदी-युग की रचनाओं में भी पाये जाते हैं।

सूर-पूर्व ब्रजभाषा काव्य में गीति-काव्य की मौखिक परम्परा भी स्थापित की जा सकती है, ब्रजभाषा का अस्तित्व भी माना जा सकता है पर उसमें कला-सौष्ठव का कोई ऎसा आधार नहीं मिलता जिसके कारण यह कहा जा सके कि सूरदास के पदों की प्रगल्भता और काव्यांगपूर्णता को कोई पूर्व आधार हिन्दी जगत् में विद्यमान था। कला के क्षेत्र में नये मार्गों का उद्घाटन सूरदास, नन्ददास और उनके समकालीन भक्तों ने ही किया। उनकी कला-चेतना का प्रादुर्भाव तत्कालीन परिस्थितियों के फलस्वरूप हुआ था। कला के पुनुर्त्थान युग में उनकी प्रतिभा प्रस्फुटित हो कर विकसित हुई। उत्तराधिकार रूप में उन्हें जो परम्परा प्राप्त हुई थी वह पूर्ण अविकसित थी, भाव, भाषा, शैली, किसी भी दृष्टि से मध्यकालीन कृष्ण-भक्त कवियों पर उनका ऋण नहीं स्वीकार किया जा सकता।

कृष्ण-काव्य परम्परा के विकास का संक्षिप्त परिचय

कृष्ण-काव्य परम्परा के विकास का प्रमुख श्रेय आचार्य वल्लभ और उनके पुत्र विट्ठलदास जी को है। आचार्य वल्लभ द्वारा प्रवर्तित 'पुष्टि मार्ग' को आधार बना कर श्री विट्ठलदास द्वारा स्थापित अष्टछाप के कवियों ने हिन्दी में अमर कृष्ण-भक्ति-काव्य की रचना की। पुष्टि मार्ग की अनुभूति मूलक साधना के कारण इन कवियों ने कृष्ण के व्यक्तित्व के लीला-प्रधान अंशों को ही ग्रहण किया है। राजनीतिज्ञ कृष्ण उनके आलम्बन नहीं हैं। कृष्ण के व्यक्तित्व में उन्होंने शक्ति के साथ माधुर्य और प्रेम का समन्वय कर दिया। अलौकिक आलम्बन में सहज और मधुर मानव का आरोपण उन्होंने जिस मनोवैज्ञानिक कौशल से किया है उसमें सार्वभौम उपादानों का समावेश हुआ है।

ऎतिहासिक क्रम से अष्टछाप के कवियों का उल्लेख इस प्रकार है - कुभंनदास, सूरदास, परमानन्ददास, कृष्णदास, नन्ददास, चतुर्भुजदास, छीतस्वामी और गोविन्दस्वामी। सूरदास प्रधान रूप से वात्सल्य और शृंगार रस के कवि हैं, परमानन्द जी के काव्य में वात्सल्य का अनुपात महत्वपूर्ण है। अन्य कवियों की रचनाओं में श्रंगार रस का ही प्राधान्य है, उसमें वात्सल्य तो है ही नहीं या अत्यंत गौणरूप में प्रयुक्त है। इन सभी के प्रतिपाद्य में साहित्यकता, पार्थिव अनुभूतियों और आध्यात्मिकता का सुंदर सामन्जस्य मिलता है। विभिन्न कवियों के व्यक्तित्व के अनुसार तीनों तत्वों का अनुपात उनकी रचनाओं में भिन्न-भिन्न है। साहित्यिक महत्व की दृष्टि से सूरदास के बाद नन्ददास का नाम आता है। उनकी अभिव्यंजना में सचेष्ट कलाकार का शिल्प है।

पूर्वमध्यकाल के इन पुष्टिमार्गी कवियों के बाद परिमाण और गुण दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण योग राधावल्लभ सम्प्रदाय के आचार्य हितहरिवंश तथा उनके शिष्यों और अनुयायियों ने दिया। राधावल्लभ सम्प्रदाय की उपासना पद्धति अन्य सम्प्रदायों से भिन्न थी। इस मत के सिद्धांतों के अनुसार राधा ही परम इष्ट हैं और कृष्ण की मान्यता इसीलिए है कि वह राधा के प्रियतम हैं। वे इष्ट नहीं हैं। भक्तजन राधा की सखी रूप में होते हैं। वे सखी रूप में उनके साथ परकीया गोपियों के समान स्वतंत्र रूप से सम्बंध स्थापित नहीं करते और न राधा के प्रति उनका सपत्नि भाव होता है। इस सम्प्रदाय में हितहरिवंश के अतिरिक्त ध्रुवदास की कला का महत्वपूर्ण स्थान है।

किसी विशिष्ठ सम्प्रदाय के बंधनों से मुक्त मतवाली मीरा और रसखान की रचनाओं का भी पूर्व-मध्यकालीन कृष्ण-भक्ति साहित्य में बड़ा महत्व है। मीराबाई द्वारा रचित कई ग्रंथों का उल्लेख प्राप्त होता है। नरसी का मायरा, गीत-गोविन्द की टीका, पद तथा गर्व गीत उनकी प्रमुख रचनायें मानी जाती हैं। उनका साहित्य और उसका स्वरूप दोनों ही संदिग्ध हैं। उनके काव्य में गिरधरगोपाल के प्रति उनकी आकुल भावनायें विर्बाध रूप से व्यक्त हुई हैं। जहां भावनायें उन्मुक्त हुईं, आकांक्षायें उच्छृंखल हो कर असंयत हो जाती हैं पर मीरा के काव्य की सबसे बड़ी सफलता यही है कि भावनाओं की निर्बाधता में असंयत और अनियंत्रित श्रृंगार की स्थूलताओं का समावेश नहीं होने पाया है। उनकी कला का एक अपूर्व ही सौंदर्य है जो कला सम्बंधी परिपक्वताओं से वंचित रहने पर भी पूर्ण है।

मुसलमान कृष्ण-भक्त कवि रसखान का नाम इस परम्परा में अमर है। उनके व्यक्तित्व में प्रधान प्रेम-तत्व ने लौकिक आलम्बन के अस्थायित्व के कारण अलौकिक कृष्ण का सहारा लिया और उनकी भावनायें भक्त हृदय के सुंदर उद्गारों के रूप में व्यक्त हो उठीं। भावानाओ की तीव्रता और उत्कटता के साथ ही साथ उनके काव्य का कलापक्ष भी प्रौढ़ और सबल है। 'प्रेम वाटिका' और 'सुजान रस सागर' उनके दो छोटे-छोटे ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं।

उत्तर-मध्य काल में भी कृष्ण-काव्य परम्परा विभिन्न सम्प्रदायों के संरक्षण में पल्लवित और पुष्पित होती रही। पूर्व-मध्य काल (भक्तिकाल) में कृष्ण-भक्ति-पद्धति में नैसर्गिक आलम्बन के प्रति मानवीय भावनाओं का जो उन्नयन हुआ उसमें राग और साधना का अपूर्व सामंजस्य था। इस परम्परा में रागतत्व के प्राधान्य के कारण ही १९वीं शती तक भक्ति-युग की परिष्कृत माधुर्य भावना लौकिकता में रंजित होने लगी। उत्तर-मध्य कालीन कृष्ण-काव्य परम्परा में आलम्बन और साधना दोनों पक्षों में अपार्थिव अंश केवल नाम-मात्र को ही शेष रह गया।

रीतिकालीन कृष्ण-भक्ति काव्य में श्रृंगारिक तत्वों का इतना प्राधान्य हो गया कि उसके फलस्वरूप ब्रह्मा की असीमता भी मानवीय क्रिया-कलापों में लिपट कर रह गई। साहित्य की रूढ़ परम्पराओं के अनुसार 'ब्रह्मा की प्रेमिकाओं' पर भी नायिका-भेद के विविध रूपों का आरोपण किया गया। हिन्दी काव्य जगत् में सतरहवीं शताब्दी के उपरान्त कृष्ण और गोपिकाओं के नाम पर श्रृंगारपरक ऎहिक भावनाओं की अभिव्यक्ति प्रधान हो उठी।

उत्तर-मध्य काल में वल्लभ सम्प्रदाय का कोई उल्लेखनीय कवि नहीं हुआ। केवल ब्रजवासीदास ने सूरसागर के आधार पर अपने ग्रंथ 'ब्रजविलास' की रचना की। राधावल्लभ सम्प्रदाय के हित वृंदावनदास ने 'लाड़ सागर' और 'ब्रज प्रेमानन्द सागर' ग्रंथों की रचना की। इसके अतिरिक्त निम्बार्क सम्प्रदाय के घनानन्द, नागरीदास, हठी जी, भगवत रसिक जी, रूप रसिक जी, सहचरिशरण ने कृष्ण-भक्ति सम्बन्धी रचनायें लिखीं, जिनमें उस युग की काव्य-चेतना की स्मस्त विशेषताओं का समावेश हो गया है।

प्रतिपाद्य के प्रति उनके दृष्टिकोण और उनकी अभिव्यंजना-कला का विवेचन आगामी अध्यायों में किया जायेगा।

आधुनिक काल नये संदेशों और नये जीवन-दर्शन से युक्त सामने आया। मध्यकालीन सामन्तीय व्यवस्था बीत चुकी थी। बौद्धिक जागरण और विज्ञान के इस युग में धार्मिकता और विशेषकर उपास्य के प्रति रागात्मक वृत्ति के उन्नयन को अंध-विश्वास और रूढ़िवादिता का नाम दिया गया। उत्तर-मध्य काल में कृष्ण-भक्ति में निहित श्रृंगार तत्व ने लौकिक श्रृंगार का रूप धारण कर लिया था, आधुनिक काल में केवल उसका अंधकार पक्ष ही अवशिष्ट रह गया। भक्ति के नाम पर भ्रष्टाचार, अंधविश्वास और पाखंड ने तत्कालीन सुधारवादी और बौद्धिक प्रवृत्तियों को अपने विरुद्ध आवाज़ उठाने की चुनौती दी। सूक्ष्म रागात्मक प्रवृत्तियों का आश्रित भक्ति बौद्धिक और ऎहिक जीवन-दर्शन के भार के नीचे दब गई। उसकी विकृति ही शेष रह गई।

मध्यकाल में भक्ति ने एक आंदोलन का रूप ग्रहण किया था। वह जनता के व्यक्तिगत और समष्टिगत संघर्षों और समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने आई थी। आधुनिक काल में उसका क्षेत्र 'व्यक्ति' की सीमा में ही संकीर्ण हो गया। परिवार के संसर्ग और वैयक्तिक संस्कार इत्यादि कारणों से 'धर्म' तत्व एक संकीर्ण दायरे में ही शेष रह गया। भारतेन्दु हरीशचन्द्र, जगन्नाथदास रत्नाकर, सत्यनारायण कविरत्न इत्यादि कवियों ने कृष्ण-भक्ति काव्य की रचना की जिसकी प्रेरणा स्थूल रूप में तीन प्रकार की मानी सकती है - (१) परम्परा-पालक (२) कृष्ण-चरित के गान द्वारा प्राचीन गौरव की स्थापना तथा (३) वैयक्तिक संस्कारजन्य आस्था। वल्लभाचार्य के शिष्यों द्वारा प्रवर्तित कृष्ण-काव्य परम्परा उत्थान और पतन के विविध सोपानों पर चढ़ती-गिरती आधुनिक काल तक चली आई। वल्लभ सम्प्रदाय के ही निष्ठावान भक्त भारतेन्दु हरीशचन्द्र ने उनमें पुन: माधुर्य-भक्ति की परिष्कृति और सूक्ष्मता के समावेश का प्रयत्न किया, परन्तु अब इस प्रकार की भक्ति का समय बीत चुका था, देश के सामने यथार्थ नग्न मुँह बाये खड़ा था, पाश्चात्य देशों का बुद्धिवाद भारत की आध्यात्मिकता को चुनौती दे रहा था, जिसके सूक्ष्म तन्तु बाह्य स्थूलताओं के सामने हार मान चुके थे। साहित्य में व्यवहारिक भाषा के अभाव के फलस्वरूप ब्रजभाषा का स्थान खड़ी-बोली ले रही थी, ऎसी स्थिति में ब्रजनायक से सम्बद्ध काव्य-परम्परा और ब्रजभाषा दोनों के विकास का मार्ग अवरुद्ध हो गया।

*** 

बुधवार, जुलाई 02, 2025

यौन दुराचरण और हमारी चुप्पियाँ

पिछले कुछ दिनों में फेसबुक पर साहित्यकारों से जुड़ी यौन दुराचरण की एक बहस चल रही है। मैं फेसबुक पर कम ही जाता हूँ और कोशिश करता हूँ कि नकारात्मक बातें न पढ़ू, फ़िर भी इस बहस के कुछ हिस्सों पर मेरी नज़र पड़ी। उस बहस में जिन व्यक्तियों की और जिस घटना की बात हो रही है, मैं दोनों से अपरिचित हूँ, इसलिए उसके बारे में कुछ नहीं लिखना चाहता।

लेकिन इस बात से मुझे अपने कार्य-जीवन से जुड़ीं यौन दुराचरण की बातें याद आ गईं। यह आलेख मेरी उन यादों, अनुभवों, तथा विचारों के बारे में है।


आप क्या करेंगे?  

अगर आप को पता चले कि आप का मित्र या ऐसा व्यक्ति जिसे आप बहुत मानते हैं वह यौन-दुराचरण कर रहा है तो आप क्या करेंगे? यह बातें फ़िल्मों में देख कर या दैनिक या पत्रिका में पढ़ कर आसान लगती है, और हम सोचते हैं कि इसके विरुद्ध आवाज़ उठानी चाहिए। 

जैसे कि मीरा नायर की फ़िल्म "मॉनसून वेडिन्ग" में यह प्रश्न उठता है, जब पता चलता है कि परिवार का एक सम्मानित आदमी जिसने परिवार की कई अवसरों पर मदद की है, घर की बच्ची के साथ जबरदस्ती यौन सम्बंध करता था। उस फ़िल्म में परिवार के वरिष्ठ लोग उस आदमी को वहाँ से चले जाने के लिए कहते हैं। लेकिन फ़िल्मों के बाहर की दुनिया में क्या होता है? वहाँ अक्सर इस विषय पर चुप्पियाँ मिलती हैं, और लोग इस बारे में बात करने में असहज हो जाते हैं।

मेरे व्यक्तिगत अनुभव भी यही बताते है कि सामान्य जीवन में इस तरह के निर्णय लेना कभी-कभी बहुत कठिन हो सकता है। अगर आप को यौन विषय पर पढ़ने-सुनने से परेशानी होती है, तो मेरी सलाह है कि आप इस आलेख को आगे नहीं पढ़िये।

दो जाने-माने नाम

एब्बे पिएर फ्राँस में १९१२ में पैदा हुए थे और उनकी मृत्यु सन् २००७ में हुई थी। उन्हें लोग संत मानते-बुलाते थे। सन् १९४९ में एब्बे पिएर ने यूरोप में एम्माउस नाम की संस्था बनाई थी जो गरीबों, विकलांगों, कुष्ठ रोगियों, शरणार्थियों आदि के साथ सक्रिय थीं। उनकी संस्था से प्रभावित हो कर बहुत सी अन्य एम्माउस एसोसियेशन भी बनीं। चूँकि मैं भी कुष्ठ रोग और विकलांगता के क्षेत्र में सक्रिय था, उनमें से कई संस्थाओं के साथ मेरे सम्पर्क बने और उनके साथ बहुत बार काम भी किया।

करीब तीस-पैंतीस साल पहले, नब्बे के दशक में मैं एब्बे पिएर से एक बार मिला था और उनकी बातों और सोच से बहुत प्रभावित हुआ था। इसलिए जब पिछले वर्ष (२०२४ में), एब्बे पिएर के बारे में खबरें आईं कि उन्होंने बहुत सी बच्चियों के साथ यौन दुराचार किया था, तो मुझे बहुत धक्का लगा था। इस विषय पर एक नई किताब आई है जिसकी लेखिकाओं ने इस विषय पर छानबीन की है जिससे स्पष्ट होता है कि उनके यौन दुराचार की बातें लोगों को बहुत पहले से मालूम थीं लेकिन इसके बारे में कोई खुल कर नहीं बोलता था। ३३ स्त्रियों ने बचपन में उनके इस तरह के व्यवहार के व्यक्तिगत अनुभवों के बारे में गवाही दी है।

जब इस तरह की बातें पता चलती हैं तो पहला प्रश्न जो मेरे मन में उठता है वह है - उस व्यक्ति के अच्छे कामों के बारे में क्या किया जाये? उन्हें भुला दिया जाना चाहिये? किसी व्यक्ति की बात करते हुए  उसके अच्छे और बुरे कर्मों को किस तराजू में कैसे तोला जाये?

दूसरी बात है समय की। एब्बे पिएर को गुज़रे हुए सतरह साल हो चुके हैं तो अब यह बातें कहने का क्या लाभ है? मेरे विचार में सच्ची बात को अभिव्यक्त करना भी आवश्यक है। इस समाचार के बाद कुछ एम्माउस संस्थाओं ने अपनी वेबसाईट आदि से एब्बे पिएर का नाम हटा दिया है। लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि इतने सालों के बाद की उन औरतों की स्मृति पर भरोसा नहीं किया जा सकता, या फ़िर किसी को मानसिक रोग हो तो वह गलत सम्बंध की बात की कल्पना भी कर सकता है, इसलिए इन बातों पर पूरा विश्वास करना कठिन है। लेकिन मुझे लगता है कि इतनी सारी औरतों की शिकायतों को मानसिक रोग कहना सच्चाई से मुँह छुपाना है।

दूसरी बात डेविड वर्नर की है। पिछड़े और विकासशील देशों के ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले बहुत सारे लोग डेविड वर्नर की दो किताबों को जानते हैं, "जहाँ कोई डॉक्टर नहीं है" और "गाँव के विकलांग बच्चे"। १९८०-९० के समय में यह दोनों किताबें बहुत प्रसिद्ध थीं और इनसे प्रेरणा पा कर इस तरह की अन्य कई किताबें भी लिखी गईं जैसे कि "जहाँ कोई डैंटिस्ट नहीं है", "जहाँ कोई मनोरोग विषेशज्ञ नहीं है", आदि।

मैंं डेविड से पहली बार १९८८ में मिला था और विकलांगता से सम्बंधित विषयों पर उसकी सोच-समझ को प्रेरणादायक पाया था।

२००३-४ के आसपास मैंने सुना कि उस पर आरोप लगा है कि मैक्सिको के जिस गाँव में रहता और काम करता था, वहाँ के कई बच्चों के साथ उसके यौन सम्बंध भी थे। मुझे विश्वास नहीं हुआ, लेकिन मेरी एक अंग्रेज़ी मित्र ने मुझे उसकी एक चिट्ठी दिखायी जिसमें वह इस तरह के "प्रेम सम्बंधों" को वह बच्चों के मानसिक विकास के लिए सही बता रहा था। हमारे मित्रों के गुट ने उस समय उससे सब सम्बंध तोड़ लिए थे। बाद में मैंने सुना कि वह अपनी बात से पलट गया है, वह इंकार करता है कि उसने ऐसा कुछ किया था।

डेविड मुझसे करीब बीस साल बड़ा था, अगर वह आज जीवित है तो नब्बे साल का होगा। बहुत सालों से मेरा उससे सम्पर्क नहीं है। लेकिन इसके बारे में मेरे मन में दुविधा है। उसकी जिन किताबों की वजह से लाखों लोगों को लाभ भी हुआ था और आज भी होता होगा, उनके लिए उसके योगदान को कैसे देखा जाये? मैं कई विकलांग लोगों को जानता हूँ जो कहते हैं कि उसकी किताबों में उन्होंने अपना जीवन जीने की राह पाई है।

मी टू - व्यस्कों में सम्बंधों की जटिलताएँ

कुछ वर्ष पहले "मी टू" (मुझे भी) के नाम से यौन दुराचार की बहुत सी बातें बाहर निकलीं, कई लोगों पर आरोप लगे जिसमें बड़ी उम्र के जाने-पहचाने या प्रसिद्ध या उच्चे पद के अफसरों-अधिकारियों ने अपने नीचे काम करने वाली युवतियों को सैक्स के लिए मजबूर किया था। कानूनी जाँच में बहुत से ऐसे आरोप सही निकले और कुछ में आरोपितों को सजा मिली या नौकरी से निकाला गया। कुछ ऐसे आरोप झूठे भी निकले। 

कुछ स्त्रियों का कहना है कि जिस समय यह हादसा हुआ था, यह इतना अप्रत्याशित था कि उस समय वह कुछ नहीं कह पायीं। अगर महिला ने रोका नहीं या स्पष्ट मना नहीं किया तो क्या इसे गलतफहमी का नतीजा भी माना जा सकता है?

यह भी सच है कि नीचे काम करने वाले को दबाव महसूस होता है कि अगर वह ऐसे सम्बंधों को नहीं स्वीकारेंगे तो उनके केरियर पर बुरा असर पड़ेगा। इसलिए कुछ लोग कहते हैं कि इस तरह के सम्बंध हमेशा गलत होते हैं। लेकिन ऐसे कई दम्पत्ति हैं जिनकी जानपहचान और प्रेम साथ में काम करने की वजह से हुए, जब उनमें से एक ऊँचे पदवे पर था और दूसरा नीचे। इसलिए यह सोचना कि ऊँचे और नीचे पद वालों के बीच किसी तरह के सम्बंध नहीं बने, को लागू करना कठिन होगा।

यह भी हो सकता है कि कैरियर में आगे बढ़ने के लिए या किसी लाभ की आशा से कुछ व्यक्ति इस तरह के सम्बंध सोच-समझ कर बनायें, लेकिन बाद में प्रमोशन या लाभ न मिलने पर गुस्सा हो जायें और बदला लेने के लिए कहें कि उनके साथ जबरदस्ती हुई है। यह बात सोच कर मुझे व्यस्क व्यक्तियों के बीच हुए सम्बंधों का मामला अधिक कठिन लगता है। 

समलैंगिक यौन दुराचरण की जटिलतायें

नब्बे के दशक में एक अधेड़ उम्र की नर्स हमारे एक प्रोजेक्ट में काम करने तीन महीने के लिए विदेश गईं। उन्होंने लौट कर मुझसे शिकायत की वहाँ काम करने वाली, उनसे दस वर्ष बड़ी हमारे प्रोजेक्ट की प्रमुख ने उनसे यौन सम्बंध बनाने की कोशिश की। वह चाहती थीं कि हम उस प्रोजेक्ट प्रमुख को नौकरी से निकाल दें। जहाँ तक मुझे समझ में आया शिकायत करने वाली महिला के साथ किसी तरह की कोई जबरदस्ती नहीं हुई थी, बल्कि वह सोचती थीं कि लेसबियन होना गलत है और ऐसी औरतों को प्रोजक्ट में ज़िम्मेदारी के पद पर नहीं रखना चाहिए। जबकि मुझे लगा कि लेसबियन होना और व्यस्क महिला से सम्बंध के लिए कहना या पूछना कोई जुर्म नहीं है। अंत में मैंने इस शिकायत के बारे में कुछ नहीं किया।

एक बार भारत में एक कुष्ठआश्रम के काम करने वाली यूरोपीय मूल की नर्स-नन के बारे में भी मुझे यही शिकायत मिली कि वह लेसबियन है। मैं उन्हें बहुत सालों से जानता था और मुझे लगा कि वह बहुत मेहनत तथा प्यार से रोगियों की सेवा करती थीं। मैंने सोचा कि लेसबियन होना अपराध नहीं है, और अगर वह किसी से जबरदस्ती नहीं कर रहीं तो यह उनका निजि मामला है। बाद में मुझे खबर मिली कि उनकी संस्था (कोनग्रेगशन) ने उन्हें संस्था से निकाल दिया है और वह यूरोप वापस लौट आईं।

कुछ साल पहले अमरीकी अभिनेता केविन स्पेसी पर भी कुछ पुरुषों ने आरोप लगाये थे कि कुछ दशक पहले जब वह नाबालिग थे तब स्पेसी ने उनके साथ जबरदस्ती सम्बंध बनाये थे। इन आरोपों की वजह से स्पेसी को कई फिल्मों और सीरियल से निकाल दिया गया, लेकिन बाद में न्यायालय ने उन आरोपों को सही नहीं माना। एक ओर से यह हो सकता है कि इतने पुराने ज़ुर्म को अदालत में साबित करना आसान नहीं है, लेकिन दूसरी ओर यह भी हो सकता है कि प्रसिद्ध और पैसे वाले व्यक्ति पर झूठा आरोप लगाने का कारण व्यक्तिगत लाभ की आशा हो। 

एक और अनुभव

मेरा तीसरा अनुभव एक यूरोपी पुरुष से जुड़ा है जो करीब बीस साल से अफ्रीका में काम करते थे। उन्होंने वहाँ की महिला से विवाह किया था और उनके बच्चे भी थे, जिनमें वहाँ के कुछ गोद लिए हुए बच्चे भी थे। उन्होंने बहुत से बच्चों को छात्रवृति दिलवा कर यूरोप पढ़ने भेजा था। एक दिन उनके विरुद्ध शिकायत आई कि वह वहाँ अनाथाश्रम के बच्चों से यौन सम्बंध बनाते हैं। इस बात की जाँच के लिए वहाँ एक व्यक्ति को भेजा गया। तीन सप्ताह तक उस व्यक्ति ने वहाँ के बच्चों से, वहाँ काम करने वालों से, आदि से साक्षात्कार किये, और इस बारे में प्रश्न पूछे। पता चला कि आरोप लगाने वालों में कुछ लोगों का उनसे झगड़ा हुआ था, लेकिन किसी बच्चे से इसके बारे में बातचीत से कोई संदेहजनक बात नहीं निकली। आखिर में कुछ सबूत नहीं मिलने से यह जाँच बंद कर दी गयी और उनके विरुद्ध कुछ कार्यवाही नहीं की गई।

इस बात के चार-पाँच साल के बाद उस देश की सरकार ने उन्हें अपने देशवासियों की सेवा के लिए विषेश पुरस्कार दिया। इस बात को बीस-पच्चीस साल हो गये हैं और वह सज्जन, जो अब वृद्ध हैं, आज भी उसी देश में रहते हैं और उसी अनाथाश्रम में स्वयंसेवक की तरह काम करते हैं।

सच कहूँ तो आज भी मेरे मन में इस घटना के बारे में दुविधाएँ हैं, हालाँकि उनके अपने गोद लिए हुए बच्चे, जो अब व्यस्क हैं, कहते हैं कि उनके पिता पर लगे आरोप झूठे थे। आप बताईये कि आप इस मामले में क्या करते?

अंत में

मेरे लिए, व्यक्तिगत स्तर पर, इस विषय पर सबसे बड़ी दुविधा का कारण है कि जहाँ बलात्कार जैसे सबूत नहीं हों, किसी पर लगे आरोपों को कैसे जाँचा जाये? बाद में मन में संदेह रह जाता है, उसे निकालना असम्भव होता है, तो यह लगता है कि आरोप लगाना बहुत आसान है, लोग कुछ भी कह सकते हैं। लेकिन इसका दूसरा पहलू है कि जब कोई औरत, अतीत में हुई किसी बात को बताती है, तो उसके लिए यह कहना आसान नहीं होता, उसे कैसे गम्भीरता से न लिया जाये?

अंत में बात घूम-फ़िर कर वहीं आ जाती है कि उपन्यासों, फ़िल्मों या अखबारों या फेसबुक में यह बातें आसान लग सकती हैं, कि यह हुआ, ऐसा या वैसा करना चाहिए था। फेसबुक जैसे सोशल मीडिया में कुछ भी लिखना आसान है। लेकिन जब आप को निर्णय लेना पड़े तो यह कभी-कभी बहुत कठिन हो सकता है। 

पटना की घटना से जुड़ी बहस पर साहित्यकारों और साहित्य की बात करते हुए, मित्र ओम थानवी ने लिखा है, "अच्छा या बड़ा लेखक जाति, विचार, चरित्र, आचरण के बावजूद अच्छा या बड़ा होता है। कम-से-कम इस तरह के आधारों पर उसे त्याज्य या उपेक्षणीय नहीं माना जा सकता।" कुछ यही बात अन्य क्षेत्रों में काम करने वालों के लिए भी कही जा सकती है।

आप बताईये आप इस विषय के बारे में क्या सोचते हैं? 

*** 

बुधवार, जून 11, 2025

लेखक की दुविधाएँ

बारह ड्राफ्ट के बाद, मेरा दूसरा उपन्यास लगभग तैयार है। इसे आज से इक्कीस साल पहले अंग्रेज़ी में लिखना शुरु किया था और तब इसमें कहानी थी एक नवयुवक की जो दिल्ली में अपनी नानी के पास बड़ा हुआ है और जिसने बचपन से सुना है कि उसके माता-पिता की विदेश में मृत्यु हो गई थी। 

समय के साथ, बार-बार लिखने से इसके कथानक में कुछ बदलाव आये हैं। जैसे कि नवयुवक के बदले, यह बीसवीं सदी के प्रारम्भ की उसकी नानी की कहानी बन गई है, जिसकी पृष्ठभूमि में आसाम के चाय बागान में काम करने वाली एक गिरमिटिया युवती की कहानी भी है। इस उपन्यास की कहानी सुन कर नीचे वाला कवर मेरी मित्र विमला दीपक ने बना कर दिया है।

इस आलेख के माध्यम से मैं आप से सलाह माँगना चाहता हूँ कि अगर मुझे लेखन से पैसा कमाने की आवश्यकता न हो, तो क्या उपन्यास को किसी प्रकाशक से छपवाना महत्वपूर्ण है या उसे अमेज़न जैसे आनलाईन पोर्टल से छपवाना भी चल सकता है?

मेरे फेसबुक मित्रों में बहुत से अनुभवी लेखक हैं, मैंने पहले सोचा कि उन्हें सीधा लिख कर सलाह माँगनी चाहिये, फ़िर मुझे लगा कि ऐसा करना ठीक नहीं होगा, क्योंकि कोई जब मेरे साथ ऐसा करता है तो मुझे अच्छा नहीं लगता, जबरदस्ती सी लगती है।  इसलिए सोचा कि इसके बारे में ब्लाग पर लिखूँ।

उपन्यास लिखने की यात्रा

इक्कीस साल पहले लिखा उपन्यास अधूरा था। उसके बाद, कई बार इस उपन्यास को लिखने की कोशिशें कीं लेकिन हर बार यह अधूरा ही रह जाता था।

तब मैं अपने आप से कहता था कि जब रिटायर होऊँगा, तब इसे लिखूँगा। रिटायर हुए भी सात-आठ साल बीत गये, लेकिन मेरा काम और यात्राएँ समाप्त नहीं हुईं। दो-ढाई साल पहले दो ऐसी बातें हुईं जिनसे मुझे लगा कि अगर सचमुच मैं अपने उपन्यास को लिखना चाहता हूँ तो मुझे बाकी के सब काम छोड़ने पड़ेंगे।

पहली बात काम से जुड़ी थी। मुझे एक देश में विकलांगों के लिए नई स्वास्थ्य सेवाओं को लागू करने का बड़ा काँट्रेक्ट मिला था, जिसके लिए तीन साल तक मैंने बहुत मेहनत की। मेरा काम पूरा हुआ लेकिन उस देश में चुनावों के बाद नयी सरकार आयी, तो उन्होंने हमारे सारे काम को रोक दिया क्योंकि उनकी दृष्टि में वह काम महत्वपूर्ण नहीं था। मुझे लगा कि मैंने जीवन के तीन साल बेकार कर दिये, मैंने पैसा कमाया पर मेहनत का कुछ फायदा नहीं हुआ।

दूसरी बात मेरे अपने स्वास्थ्य से जुड़ी थी। मेरी आँखों में रेटिना में घाव हो गये जिनसे दिखना कम हो गया और डर था कि वह घाव बढ़ेंगे तो लिखना-पढ़ना पूरा बन्द हो जायेगा। सौभाग्य से अभी तक वह घाव जैसे थे वैसे ही हैं, बढ़े नहीं हैं, इसलिए दिखता कुछ कम है लेकिन मेरा लिखना-पढ़ना जारी है।

इसलिए मैंने फैसला किया कि अब उपन्यास पूरे करने पर ही ध्यान दूँगा और हिन्दी में लिखूँगा। इस तरह से मैंने २०२३ में अपना पहला उपन्यास पूरा किया था। मित्र अरविंद मोहन जी की सहायता से दिल्ली के एक प्रकाशक ने दो साल पहले उसे छापने के लिए स्वीकार भी किया था, लेकिन पता नहीं कब छपेगा। अब मेरा दूसरा उपन्यास भी लगभग तैयार है।

मन की दुविधाएँ

मैं चाहता हूँ कि अधिक से अधिक लोग मेरे लिखे को पढ़ें, लेकिन मैं इन किताबों से कुछ कमाना नहीं चाहता। तो क्या मुझे अपने उपन्यास को प्रकाशकों के पास भेजना चाहिए? मुझे चिंता है कि प्रकाशक निर्णय लेने में कई महीने लगायेंगे और फ़िर छापने में न जाने कितने साल निकाल देंगे।

क्या इसे सीधा अमेज़न या उसके जैसे किसे भारतीय पोर्टल पर मुफ्त देना बेहतर नहीं होगा, ताकि जो इसे ईबुक रूप में पढ़ना चाहते हैं वह इसे मुफ्त डाउनलोड करें और अगर कोई छपी हुई किताब पढ़ना चाहे तो वह इसकी छपाई की कीमत दे कर छपवा ले? जिन्हें अनुभव है वह बतायें कि किस पोर्टल पर डालना बेहतर होगा?

उपन्यास पढ़ना चाहने वाले

अगर आप मेरे उपन्यास को ई-बुक या पीडीएफ रूप में पढ़ना चाहते हैं तो मुझे ईमेल भेजिये, मेरा पता है sunil(at)kalpana.it (ईमेल भेजते समय '(at)' के बदले में '@' लगा दीजिये)। अगर आप उसे पढ़ कर उसके बारे में अपनी आलोचना या सुझाव देंगे तो मुझे और भी अच्छा लगेगा। 

***** 

सोमवार, दिसंबर 30, 2024

इंदो-अमरीकी लेखिका सोमा वीरा

कभी-कभी जीवन आप को बरसों पुरानी, एक पुरानी भूली-बिसरी याद के सामने ला कर खड़ा देता है, और आप चकित रह जाते हैं। मुझे कुछ ऐसा ही लगा जब अचानक एक दिन, एक पुरानी पत्रिका में कुछ खोजते हुए मेरी हिन्दी लेखिका सोमा वीरा से मुलाकात हो गई।

नीचे की इस तस्वीर में उन्नीस सौ पचास और नब्बे के दशकों की सोमा वीरा जी की तस्वीरें हैं (तस्वीरों को बड़ा करके देखने के लिए, उन पर क्लिक करें)।

इंदो-अमरीकी लेखिका सोमा वीरा

सोमा जी की हिन्दी कहानियों का संग्रह, "धरती की बेटी", आत्माराम एण्ड सन्स ने १९६२ में प्रकाशित की थी। यह किताब मुझे बहुत प्रिय थी और मैंने इसे बचपन में पढ़ा था।

आज से करीब बीस साल पहले, २००६ में, मैंने अपने मन-पसंद हिन्दी लेखकों की बात करते हुए सोमा वीरा जी की इस किताब के बारे में लिखा था। उस आलेख के कुछ साल बाद, हिन्दी पत्रिका अभिव्यक्ति निकालने वाली लेखिका पूर्णिमा वर्मन जी ने मुझे ईमेल भेजा कि क्या उस किताब के कवर पर सोमा वीरा की कोई तस्वीर है? उन्होंने ही मुझे बताया था कि सोमा वीरा अमरीका चली गईं थीं, जहाँ उनकी २००४ में मृत्यु हुई थी, लेकिन उनकी कोई तस्वीर नहीं मिल रही थी। इस किताब के पीछे भी सोमा वीरा जी की तस्वीर नहीं थी, मैंने पूर्णिमा जी को लिखा था। लेकिन इतने वर्षों पहले की यह बात मैं भूला नहीं था, जब भी मेरी दृष्टि मेरी अलमारी में रखी "धरती की बेटी" की ओर जाती थी तो यह बात मुझे याद आ जाती थी।

फ़िर अचानक कुछ दिन पहले जब एक पुरानी पत्रिका में उनकी एक कहानी दिखी और साथ में उनकी तस्वीर भी दिखी, तो लगा कि कोई दुर्लभ वस्तु मिल गई हो। आज के मेरे इस आलेख में उसी पुरानी सोमा वीरा की कुछ बातें हैं। लेकिन सबसे पहले देखते हैं कि इंटरनेट पर उनके बारे में क्या जानकारी मिलती है।

सोमा वीरा का परिचय

इंटरनेट पर खोजें तो अभिव्यक्ति की वेबसाईट पर उनके बारे में एक पृष्ठ मिलता है, जिसके अनुसार उन्होंने अमरीका में विश्वविद्यालय स्तर पर कार्य किया, उन्हें अमरीकी लेखक के रूप में भी जाना और सम्मानित किया गया था।
 
ई-पुस्तकालय पर उनकी एक किताब "साथी हाथ बढ़ाना" पीडीएफ में पढ़ सकते हैं। लेकिन उनकी कहानियों की किताब "धरती की बेेटी" कहीं नहीं दिखी। (यह किताब मेरे पास है, मेरे विचार में अब इसका कॉपीराईट नहीं होगा। अगर इसे पीडीएफ में इंटरनेट पर डालना चाहें तो क्या करना चाहिये, इसके लिए सुझाव दीजिये)।
इंदो-अमरीकी लेखिका सोमा वीरा / अंग्रेज़ी किताब का कवर

अमरीका के साईन्स फिक्शन डाटाबेस के अनुसार उनका जन्म २० नवम्बर १९३२ को लखनऊ में हुआ था। इस डाटाबेस में उनके कुछ अंग्रेज़ी उपन्यासों के नाम भी हैं और वहीं से, एक किताब के पीछे लगी, मुझे उनकी नब्बे की दशक वाली तस्वीर भी मिली (साथ में बायें)।
 
नब्बे के दशक में उन्होंने साईन्स फिक्शन विधा पर अंग्रेज़ी के बहुत से उपन्यास लिखे जो अमेज़न पर उपलब्ध हैं। अमेज़न पर ही उनके एक उपन्यास के पीछे उनके परिचय में लिखा है कि उन्होंने अमरीका में कोलोराडो विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिग्री ली और उसके बाद न्यू योर्क विश्वविद्यालय से अंतर्राष्ट्रीय सम्बंध तथा आर्थिक विकास विषय में पी.एच.डी. की। वह न्यू योर्क में रहती थीं और वहीं पर, संयुक्त राष्ट्र संस्थान के साथ लेकचर्र का काम करती थीं। वह अमरीका के प्रवासी भारतीय एसोसिएशन से भी जुड़ी थीं। (नीचे उनकी एक अंग्रेज़ी किताब का कवर, अमेजोन की वेबसाईट से)

इंदो-अमरीकी लेखिका सोमा वीरा/ अंग्रेज़ी किताब का कवर
 

पचास के दशक की सोमा वीरा से मेरी मुलाकात

मैं अपनी वेबसाईट कल्पना पर हर साल अपने पिता ओमप्रकाश दीपक के कुछ पुराने लेख व कहानियाँ टाईप करके जोड़ता रहता हूँ। गुड़गाँव में मेरी छोटी बहन ने एक अलमारी में उनके कुछ कागज़ सम्भाल कर रखे हैं। कुछ सप्ताह पहले कुछ दिनों के लिए गुड़गाँव गया था तो उसी अलमारी में पापा के कागज़ देख रहा था कि अब किस आलेख को इंटरनेट पर डालना चाहिये।

तब हाथ में हिन्दी पत्रिका "सरिता" का एक अंक आया जिसमें पापा की एक कहानी छपी थी। उसके पन्ने पलट रहा था कि देखा कि उस अंक में सोमा वीरा की एक कहानी भी छपी थी, "ढहती कगारें" जो उनके कथा-संग्रह "धरती की बेटी" में भी थी। जुलाई १९५८ की सरिता के उस अंक के शुरु में "सरिता के लेखक" पृष्ठ पर सोमा वीरा जी की तस्वीर और उनका परिचय भी था। उस परिचय में लिखा था:

"पच्चीस वर्षीय सोमा वीर शाहजहांपुर में अपने परिवार के कामधंधों के बीच भी कहानियाँ लिखने के लिए भी कैसे समय निकाल लेती हैं इसके पीछे एक मनोरंजक घटना छिपी है। सातवीं क्लास में एक प्रसिद्ध लेखक की कहानी पढ़ने के बाद जब आप ने कहा कि ऐसी कहानी तो मैं भी लिख सकती हूँ तो आप के भाई ने व्यंग किया था: "पुस्तकें पढ़-पढ़ कर यदि दो-चार विचार मस्तिष्क में उभर भी आयें तो क्या! तुम्हें कहानी लिखने का सिर-पैर भी नहीं आता।"

तभी से सोमा वीर ने उच्चतम शिक्षा प्राप्त करने की ठान ली और प्रेमचंद व शरत जैसे महान लेखकों की कृतियों का अध्ययन करने लगीं। शिक्षा तो दसवीं से ज़्यादा न प्राप्त कर सकीं - विवाह हो गया - पर उच्चतम हिंदी साहित्य का अध्ययन चलता रहा। कुछ कहानियाँ लिखीं जो प्रकाशित न हुईं। उन्हें फाड़ कर फैंक दिया। निराशा हुई पर साहस नहीं छोड़ा। सरिता के नये अंकुर स्तम्भ में जब पहली बार कहानी छपी तो साहस बढ़ा। एक-दो कहानियाँ और भी छपीं, पाठकों ने उनका स्वागत किया। भाषा मंजती गई, विचार परिपक्व होते गये। आगे भी लिखते रहने का साहस बढ़ गया। इसी अंक में एक कहानी "ढहती कगारें" प्रकाशित हुई है। शीघ्र ही एक कहानी संग्रह भी प्रकाशित होने वाला है।"

सोमा वीरा की जीवन यात्रा

आत्माराम एण्ड संस द्वारा १९६२ में प्रकाशित "धरती की बेटी" की भूमिका प्रसिद्ध हिंदी लेखक विष्णु प्रभाकर ने लिखी थी और यह किताब वीरा जी ने अपने पिता को समर्पित करते हुए लिखा था - "महामना पिता श्री श्यामलाल को, जिनके युगान्तकारी विचारों ने मेरे व्यक्तित्व के 'अहम्' को जन्म दिया"।

अपनी भूमिका में प्रभाकर जी ने लिखा था, "सोमा बहन हार मानने में विश्वास नहीं करतीं। वह चुनौती को स्वीकार करती हैं। उनकी लेखनी में जीने की तीव्र आकांक्षा है। इसलिए वह प्रहार करती हैं ... वह कई वर्षों से अमरीका में अध्ययन कर रही हैं। उनका जीवन संघर्षों के बीच से गुज़रा है। अपने पैरों पर खड़े हो कर उन्होंने अंधकार के बीच से राह बनाई है।"

उनकी जीवन-यात्रा क्या थी, मुझे नहीं मालूम, मैं अटकलें ही लगा सकता हूँ। जुलाई १९५८ में जब सरिता में उनकी कहानी छपी थी, तब वह शाहजहांपुर में रहती थीं और १९६२ में जब उनका कहानी-संग्रह छपा तब वह "कुछ वर्षों से" अमरीका में पढ़ रही थीं। १९५८ में वह "दसवीं पास" ग्रहणी थीं तो अमरीका में पढ़ने कैसे गईं?

शायद उनके पति अमरीका में पढ़ने गये थे और वहाँ जा कर उन्होंने हाई स्कूल पूरा किया, फ़िर विश्वविद्यालय में पढ़ीं? और साईन्स फिक्शन के विषय पर लेखन की ओर वह कब व कैसे गईं?

अंत में

अपने प्रिय लेखकों के बारे में जानना-समझना सभी को अच्छा लगता है। जब खोई हुई जानकारी मिल जाये तो और भी खुशी होती है। बहुत साल पहले पूर्णिमा जी की ईमेल ने मेरे मन में जो जिज्ञासा जगाई थी, संयोगवश अब उसके कुछ उत्तर मिल गये। क्या जाने कि उनके परिवार का कोई सदस्य इस आलेख को पढ़ कर उनके बारे में और जानकारी साझा करे!


***

बुधवार, अप्रैल 17, 2024

ब्रह्मी से देवनागरी की लिपि यात्रा

उत्तर भारत की सबसे प्राचीन भाषा जिसके आज लिखित प्रमाण हैं, वह वैदिक संस्कृत थी और इसका प्रमाण है ऋग्वेद जो ईसा से करीब १५०० वर्ष पहले लिखा गया। विशेषज्ञ कहते हैं कि इसे सबसे पहले ब्रह्मी लिपि में लिखा गया। नीचे की तस्वीर में ओडिशा में धौलागिरि की वह चट्टान है जिस पर सम्राट अशोक के संदेश ब्रह्मी लिपि में लिखे हैं। 

धौलागिरि चट्टान जिसपर सम्राट अशोक का संदेश ब्रह्मी लिपि में अंकित है

फ़िर समय के साथ ब्रह्मी से देवनागरी लिपि विकसित हुई। ब्रह्मी से ही मराठी, गुजराती, बंगाली और गुरुमुखी जैसी भारतीय भाषाओं की लिपियाँ बनीं जो देवनागरी से मिलती जुलती है, लेकिन उनमें भिन्नताएँ भी हैं। मैं सोचता था कि भाषाएँ तो यूरोप की भी बहुत भिन्न हैं, जैसे कि अंग्रेज़ी, स्पेनी, फ्राँसिसी, इतालवी, आइरिश, आदि, लेकिन उन सबकी लिपि एक जैसी है, जिसे रोमन वर्णमाला कहते हैं जो लेटिन पर आधारित है।

इसलिए मेरे मन में प्रश्न उठता था कि हमने भारत की भिन्न भाषाओ के लिए एक जैसी देवनागरी लिपि या कोई और लिपि क्यों नहीं अपनाई, उससे हमारी भाषाओं को सीखना शायद कुछ अधिक आसान हो जाता। 

कुछ दिनों से मैं आचार्य चतुर सेन की १९४६ में प्रकाशित हुई किताब "हिंदी भाषा और साहित्य का इतिहास" पढ़ रहा था, जिसमें उन्होंने अठाहरवीं शताब्दी में भारत में प्रिन्टिन्ग प्रैस के आने के बाद की भारतीय भाषाओं को लिपिबद्ध करने के बारे में जानकारी दी है, जिसमें मेरे प्रश्न का उत्तर था कि हमारी भाषाओं की लिपिया भिन्न क्यों हैं? यह आलेख इसी विषय पर है।

ब्रह्मी और देवनागरी लिपियों की वर्णमाला

सबसे पहले अगर हम स्वरों को देखें तो देवनागरी तथा ब्रह्मी भाषा की लिपि के अंतर देख सकते हैं - 

अ आ - 𑀅 𑀆    इ ई - 𑀇 𑀈    उ ऊ - 𑀉 𑀊   ए ऐ - 𑀏 𑀐    ओ औ - 𑀑 𑀒

अं अः - 𑀅𑀁 𑀅𑀂    ऋ -𑀋

और अब आप इन दो लिपियों में व्यंजनों के स्वरूप तथा अंतर देख सकते हैं -

क ख ग घ ङ  -  𑀓 𑀔 𑀕 𑀖 𑀗       च छ ज झ ञ - 𑀘 𑀙 𑀚 𑀛 𑀜    ट ठ ड ढ ण - 𑀝 𑀞 𑀟 𑀠 𑀡          

त थ द ध न - 𑀢 𑀣 𑀤 𑀥 𑀦          प फ ब भ म - 𑀧 𑀨 𑀩 𑀪 𑀫        य र ल व - 𑀬 𑀭 𑀮 𑀯

श ष स ह - 𑀰 𑀱 𑀲 𑀳

प्रारम्भ में अंग्रेज़ ब्रह्मी लिपि को पिन-मैन (Pin-man) लिपि कहते थे क्योंकि यह माचिस की तीलियों या छोटी डंडियों से बनी आकृतियों जैसी लगती थी। समय के साथ इस लिपी के स्वरूप भी कुछ बदले लेकिन पांचवीं शताब्दी ईस्वी में गुप्त साम्राज्य काल तक इसे ब्रह्मी लिपि ही कहते है। नीचे तस्वीर में दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय से वह चट्टान जिसपर सम्राट अशोक का संदेश ब्रह्मी लिपि में लिखा है।

दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में सम्राट अशोक का ब्रह्मी लिपि में लिखा संदेश
छठी शताब्दी के बाद से ब्रह्मी लिपि के बदलाव अधिक मुखर हुए और उन्हें नये नाम दिये गये। उत्तर भारत में ब्रह्मी से नागरी, सिद्धम तथा शारदा लिपियाँ बनी जबकि दक्षिण भारत में कदम्ब, पल्लव, आदि लिपियाँ बनी।

चूंकि दक्षिण भारत में ग्रंथों को नुकीली कलम से ताड़ के पत्तों पर खरोंच कर लिखने की परम्परा थी, उन पर नागरी की सीधी रेखाओं वाली लिपि से पत्ते कट जाते थे, इसलिए वहाँ गोलाकार लिपियाँ विकसित हुईं जिनमें शब्दों को देवनागरी की तरह ऊपरी रेखा से जोड़ा नहीं जाता था।

बोलचाल की बोली में बदलाव

एक ओर लिपि में बदलाव हो रहे थे, तो दूसरी ओर बोलने वाली भाषा भी बदल रही थी, क्योंकि जन सामान्य को बोलचाल की भाषा में सरलता चाहिये, वह भाषा की कठिन ध्वनियों को और जटिल व्याकरण नियमों की जगह आसान ध्वनियों और सरल व्याकरण को प्राथमिकता देते हैं। इस तरह से उत्तर भारत में समय के साथ, संस्कृत से लौकिक संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंष, खड़ी बोली और अन्य बोलियाँ बनी।
 
जब समाज बदलते हैं, और नये ज्ञान से नयी समझ और तकनीकी बदलती है, तो नये औज़ार, अस्त्र, कार्यक्षेत्र, कार्यकौशल, आदि बनते हैं, जिनके लिए भाषाओं को नये शब्द चाहिये। दूसरी ओर, जब सड़कें नहीं हों और यातायात के साधन सीमित हों तो कुछ लोग ही लम्बी यात्राएँ कर पाते हैं। इन दोनों बातों की वजह से, समय के साथ, एक ही भाषा विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न स्वरूप बदल-बदल कर विकसित होती है।
 
इस तरह से उत्तरभारत में प्राकृत भाषा, देश के विभिन्न क्षेत्रों में डिन्गल, पिन्गल, ब्रज, खड़ी बोली, अवधी, मैथिली, भोजपुरी आदि लोकभाषाओं में विकसित हुई। यही नहीं, इनमें से हर लोकभाषा में कुछ-कुछ कोस की दूरी पर कुछ शब्दों में अंतर आ जाते थे और स्थानीय बोलियाँ बन जाती थीं, जैसे कि आज़मगढ़, जौनपुर और सुल्तानपुर, सभी में अवधी बोलते थे लेकिन उनकी अवधी एक जैसी नहीं थी, उसमें कुछ अंतर थे।
 
बीसवीं सदी में दुनिया के बदलने की गति और तेज़ हो गयी। सड़कों और यातायात के साधनों की वृद्धि से लोग अधिक यात्रा करने लगे हैं, और फ़िर, रेडियो-टीवी-फ़िल्म-इंटरनेट-यूट्यूब आदि नये संचार माध्यमों के आविष्कार से, लोगों के बीच दूरियाँ कम होने लगीं, इस वजह भाषाओं की छोटी-मोटी स्थानीय भिन्नताएँ भी लुप्त होने लगीं। आज के बच्चे स्कूल में, उपन्यासों में, फ़िल्मों और टीवी पर जो भाषा सुनते हैं, वही बोलने लगते हैं और अपने घर-परिवार-गांव की बोली को भूलने लगते हैं।
 
भाषा के कुछ बदलाव दो उल्टी दिशाओं में जा रहे हैं। एक ओर भविष्य में नौकरी अच्छी मिले, यह सोच कर हम अपने बच्चों को अंग्रेज़ी बुलवाने में गौरव महसूस करते हैं इसलिए शहरों के समृ्द्ध परिवारों में बच्चे केवल अंग्रेज़ी पढ़ते-बोलते हैं।
 
दूसरी ओर, यूट्यूब, टिक-टॉक आदि एप्प से छोटे शहरों और गावों में स्थानीय बोलियों के गीत-संगीत-नाटक-शिक्षा-ज्ञान से आय के नये साधन निर्मित हो रहे हैं, जिनसे उन बोलियों के उपयोग को बढ़ावा मिल रहा है।
 
कृत्रिम बुद्धि के अनुवादक की सहायता से आप किसी भी भाषा के लेखन, फ़िल्म, नाटक आदि को आसानी से समझ सकते हैं। गूगल के आटोमेटिक अनुवादक से आप केवल हिंदी, इतालवी, फ्रांसिसी या स्पेनी भाषाओं में ही नहीं, असमिया, भोजपुरी, मैथिली जैसी भाषाओं में अनुवाद कर सकते हैं। आने वाली सदियों में इन सब बदलावों का हमारी बोलियों और भाषाओं पर क्या असर पड़ेगा, यह कहना मुझे कठिन लगता है। 

छपाईखानों की तकनीकी से जुड़े लिपि के बदलाव

आचार्य चतुरसेन अपनी पुस्तक "हिंदी भाषा और साहित्य का इतिहास" में इस विषय पर दिलचस्प जानकारी देते हैं।
 
छापेखाने यानि प्रिन्टिन्ग प्रैस का प्रारम्भिक विकास चीन में हुआ था, लेकिन इसे बड़े पैमाने पर विकसित किया जर्मनी के जोहान गूटनबर्ग ने जिन्होंने १४४८ ई. में पहली बाईबल की किताब छापी। इससे पहले किताबें हस्तलिपि से ही लिखी जाती थीं और केवल एक-दो पन्नों के इश्तहार आदि छापने के लिए आप लकड़ी पर उल्टे शब्द काट कर उस पर स्याही लगा कर उन्हें छाप सकते थे। हस्तलिपि से किताब लिखना और पूरे पन्ने को लकड़ी में काट कर छापना, दोनों मेहनत के काम थे और बहुत मंहगे थे।
 
गूटनबर्ग ने वर्णमाला के हर अक्षर को धातू में बनाया, फ़िर इन अक्षरों को लोहे की प्लेट पर चिपका कर आप एक पृष्ठ की हज़ारों प्रतियाँ छाप सकते थे। उस पृष्ठ को छापने के बाद, उन्हीं अक्षरों को उसी लोहे की प्लेट पर उनकी जगह बदल कर आप दोबारा प्रयोग कर सकते थे और नया पृष्ठ छाप सकते थे। छपाई प्रेस के जगह-बदलने वाले अक्षरों से किताबों की छपाई में क्रांति आ गई।
 
इसी तकनीक की प्रेरणा से बाद में टाईप-राईटर का भी आविष्कार हुआ। एक बार यह छपाई वाले अक्षर बने तो यूरोप के भिन्न देशों ने उन्हें अपना लिया और सबने रोमन वर्णमाला में अपनी भाषाओं के ग्रंथों को छापना शुरु किया। सबसे पहले और सबसे अधिक छपाई बाईबल ग्रंथ की हुई। इस तरह से सबकी भाषाएँ अलग रहीं लेकिन लिपि एक जैसी हो गयी।
 
भारत में हर क्षेत्र में अलग बोलियाँ थीं जिन्हें लोग हस्तलिपि से लिखते थे। इनकी लिपि जो नागरी पर आधारित थी, समय के साथ हर क्षेत्र में कुछ भिन्न तरीके से विकसित हुई। अठाहरवीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारत में ईसाई मिशनरी बाईबल को स्थानीय भाषाओं में छापना चाहते थे। उन्होंने पहले सोचा कि हर भारतीय भाषा को रोमन वर्णमाला में ही छापा जाये, ताकि नये अक्षर न बनाने पड़ें, लेकिन उन्हें इसमें सफलता नहीं मिली, क्योंकि भारतीय भाषाओं में ध्वनियाँ अधिक थीं जिनके लिए रोमन वर्णमाला में लिखे शब्दों के अर्थ समझना कठिन था। तब उन्होंने हर क्षेत्र में स्थानीय हस्तलिपि को ले कर उसके लिए अक्षर बनाये, इस तरह से उनकी किताबें स्थानीय भाषाओं में छपीं। भारत की विभिन्न भाषाओं में अक्षर बनाने का काम कठिन था और इसमें करीब सौ/डेढ़ सौ साल लगे। इसका यह नतीजा हुआ कि हमारे हर क्षेत्र की हस्तलिपियों पर आधारित भिन्न लिपियाँ विकसित हुईं।
 
बाद में जब विभिन्न लिपियों की कठिनाईयाँ समझ में आयीं तब उनके एकीकरण, यानि भारत की हर भाषा को एक लिपि में लिखा जाये, की कई कोशिशें हुईं लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। लोगों को एक बार जिस लिपि में अपनी भाषा पढ़ने की आदत पड़ी, वह उसे बदलना नहीं चाहते थे।

आचार्य चतुर सेन देवनागरी लिपि की छपाई की कुछ अन्य कठिनाईयों पर भी विस्तार से बताते हैं, विषेशकर मात्राओं और संयुक्ताक्षरों की छपाई से जुड़ी कठिनाईयाँ, जिनके लिए विभिन्न उपाय खोजे गये लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली या सीमित सफलता मिली। उनकी यह किताब पीडीएफ में इंटरनेट पर उपलब्ध है।

अंत में

आचार्य चतुरसेन का भाषा और साहित्य का इतिहास भारत की स्वतंत्रता से कुछ पहले तक की कहानी कहता है। उसे पढ़ते समय मुझे पिछले तीस वर्ष की इंटरनेट पर देवनागरी और अन्य भारतीय भाषाएँ लिखने से जुड़ी बातों की याद आ रही थी।
 
१९९० के दशक में जब इंटरनेट फ़ैलने लगा तो प्रारम्भ में हर वेबसाईट के अपने फोन्ट होते थे। मैंने १९९४ में अमरीका में बोस्टन के संग्रहालय में इंटरनेट क्या होता है वह देखा, तो इटली में घर लौट कर तुरंत इंटरनेट का कनेक्शन ले लिया। तब इंटरनेट में देवनागरी में कुछ नहीं मिलता था।
 
सन् २००० के आसपास कम्पयूटर पर इक्का-दुक्का देवनागरी दिखने लगी लेकिन तब देवनागरी के लिए कृतिदेव, मंगल आदि फोन्ट का प्रयोग होता था। उनकी कठिनाई थी कि अगर आप के कम्पयूटर पर वह वाला फोन्ट नहीं है तो आप उसे नहीं पढ़ सकते थे, आप को हर जगह केवल चकौर डिब्बे दिखते थे।
 
तब रोमन वर्णमाला के युनिकोड के फोन्ट ऐसे बनाये गये थे कि उन्हें कोई भी कम्पयूटर समझ सकता था। हम पूछते थे कि हिंदी का युनीकोड कब आयेगा। सबसे पहले हिंदी को युनीकोड में लिखने के लिए ASCII कोड आया लेकिन एक-एक अक्षर के लिए कोड नम्बर लिखना बहुत कठिन काम था।

जहाँ तक मुझे याद है, मैं २००३ तक शूशा फोंट से लिखता था। उस समय सुनते थे कि युनिकोड के हिंदी फोन्ट बन रहे थे। शायद यह काम २००४-०५ के आसपास पूरा हुआ। शुरु में जब यनिकोड के फोन्ट बन गये तब भी यह दिक्कत थी कि अंग्रेज़ी कीबोर्ड से उन्हें कैसे लिखा जाये, इसके सोफ्टवेयर को प्रयोग करना आसान नहीं था।
 
मैंने युनिकोड के रघू फोन्ट का उपयोग जून २००५ में अपना ब्लाग बना कर शुरु किया। आप चाहें तो २००५ की मेरी उस ब्लोगपोस्ट में युनीकोड उपलब्धी के बारे में मेरी खुशी के बारे में पढ़ सकते हैं। उन दिनों में युनीकोड में लिखना भी आसान नहीं था, उन प्रारम्भिक कठिनाईयों के बारे में पढ़ सकते हैं।
 
जब भारत से मेरे इंटरनेट के मित्र पंकज ने मुझे "तख्ती" प्रोग्राम के बारे में बताया। उन दिनों में हिंदी में ब्लाग लिखने वालों का हमारा गुट था जिसमें कई इन्फोरमेशन तकनीकी के विशेषज्ञ थे, जो हम सब को सलाह देते थे। अगस्त २००५ में अनूप शुक्ला ने अनुगूँज नाम का ब्लाग बनाया था जिसमें हम सब चिट्ठा लेखक उनकी दी गयी थीम पर आलेख लिखते थे। मार्च २००६ में हमारे ब्लाग साथी देवाषीश ने "द एशियन एज" अखबार में आलेख में हिंदी और भारतीय चिट्ठाजगत के बारे में आलेख लिखा था।
 
करीब दो साल पहले तक, मैं अपना सारा हिंदी लेखन उसी "तख्ती" पर करता था, और वहाँ से कॉपी-पेस्ट करके हर जगह चेप देता था। इतने साल तक बहुत कोशिश करने के बाद भी विन्डोज पर हिंदी लेखन का कीबोर्ड याद करना मुझे कठिन लगता था। बहुत सालों तक मैंने भारत में हिंदी का कम्पयूटर कीबोर्ड खरीदने की कोशिश की लेकिन उसमें सफलता नहीं मिली। क्या मालूम अब वह आसान हुआ है नहीं?
 
दो साल पहले, २०२१ में पुराने ब्लागर साथी रवि रतलामी, जो अब नहीं रहे, उनकी सलाह से मुझे लीनक्स पर हिंदी लिखने के लिए "का-पा-गा" सोफ्टवेयर मिला जिसे मैंने अंग्रेज़ी कीबोर्ड पर लिखना आसानी से सीख लिया, तब जा कर मेरा जीवन आसान हुआ।
 
लेकिन आज भी अगर विन्डोज़ वाला कम्पयूटर हो, जैसे कि यात्राओं में लैपटॉप का प्रयोग करना हो, तो अभी भी "तख्ती" पर ही लिखता हूँ, क्योंकि उनका हिंदी कीबोर्ड मुझे कठिन लगता है। अगर आज कोई हिंदी भाषा और साहित्य का इतिहास लिखे तो उसे इन सब बदलावों के बारे में भी जानकारी होनी चाहिये।

***

इस वर्ष के लोकप्रिय आलेख