आज से दस साल पहले अप्रैल 2016 में, मैं भारत में दो साल के गुवाहाटी प्रवास के बाद इटली लौटा था।
आज जब उस दसवीं वर्षगाँठ की बात अचानक याद आ गयी तो सोचा कि क्यों न उन दिनों की यादों को ताज़ा किया जाये और उन दिनों पर एक आलेख लिखा जाये। तीन दशकों तक विदेश में रह कर स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने के बाद, जब 2014 में मैंने भारत जाने की सोची थी तब गुवाहाटी जाने का विचार मन में नहीं था, बल्कि कुछ अन्य काम करने की सोची थी।
सोचता था कि कहीं मन का काम नहीं मिलेगा तो किसी मन-पसंद छोटे शहर में जगह को खोज कर वहाँ अपना छोटा सा क्लीनिक खोल लूँगा। लेकिन अपना क्लीनिक खोलने से पहले, मैं कुछ मित्रों के पास रह कर देखना चाहता था कि शायद उनके साथ मन लग जाये, सोचता था कि वह बेहतर होगा क्यों कि मैं अकेले रहने के विचार से डरता था।
हम कुछ सोच कर चलते हैं और नियति हमें किसी ओर दिशा में ले जाती है। आज के इस आलेख में मेरी गुवाहाटी पहुँचने की उस यात्रा के विभिन्न पड़ावों की बाते हैं।
केसला, मध्यप्रदेश
सारा जीवन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने के बाद मैंने निश्चय किया था कि 2014 में, अपनी साठवीं वर्षगाँठ पर मैं नौकरी से इस्तीफा दे कर कुछ समय भारत में बिताने जाऊँगा। मेरी वह यात्रा केसला के गाँव से शुरु हुई।
मेरी बात सबसे पहले इटारसी के पास, केसला (मध्यप्रदेश) में ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत समाजवादी विचारधारा वाले सुनील जी से हुई थी। वह वहाँ पर बहुत समय से गरीब लोगों के विकास और मानव अधिकारों के लिए काम कर रहे थे। मैंने सोचा था कि उनके साथ काम करूँगा। जब अप्रैल 2014 में मुझे उनकी अकस्मात मृत्यु का समचार मिला तो गहरा धक्का लगा। मुझे लगा कि उनके बिना शायद वहाँ पर काम करना नहीं हो पायेगा, फ़िर भी भारत पहुँच कर सबसे पहले मैं उनके घर पर केसला ही गया था।
सुनील जी की पत्नि मॉन्टी (स्मिता) से मेरा दूर का रिश्ता भी है, और हमारी पुरानी जान-पहचान भी थी। केसला में मैं कुछ दिन उनके साथ उनके घर पर रहा, सुनील की के विभिन्न साथियों से मेरी जान-पहचान हुई। लेकिन मुझे लगा कि सुनील जी के अचानक जाने की वजह से वहाँ जो जगह रिक्त हुई थी, उसका घाव उस समय बिल्कुल ताज़ा था। मैंने सोचा कि पता नहीं, उनके बिना, बाकी के उनके साथी उस काम को किस तरह आगे चला पायेंगे?
यह भी सोचा कि वहाँ सुनील जी के न होने से, वहाँ रह कर स्वास्थ्य के क्षेत्र में कुछ नया काम शुरु करना मेरे लिए कठिन होगा। यह सोच कर मैं वहाँ से चल पड़ा।
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
तब मैं केसला से बिलासपुर गया। वहाँ पर गनियारी में जन स्वास्थ्य सहयोग के अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के बारे में बहुत प्रशंसा सुनी थी। उन्होंने मुझे वहाँ पर कुष्ठ रोग उपचार और विकलांगता कार्यक्रम में काम करने के लिए कहा, उस काम का विचार भी मुझे बहुत अच्छा लगा था।
जन स्वास्थ्य सहयोग संस्था को डॉ. योगेश जैन जैसे आदर्शवादी डॉक्टरों ने शुरु किया था, उनके साथ काम करने का विचार मुझे बहुत आकर्षित कर रहा था। मैं उनके सामुदायिक स्वस्थ्य कर्मचारियों के साथ कुछ गाँवों के क्लिनिक देखने भी गया।
लेकिन एक दिक्कत थी, कि उनके होस्टल में जगह नहीं थी, वहाँ काम करने का मतलब था कि मुझे पास के किसी गाँव में अलग घर ले कर रहना पड़ता। मैं अकेला रहने के विचार से डर रहा था। दो-तीन दिन वहाँ रहा, बहुत सोचा, पर मुझे लगा कि मैं वहाँ गाँव में अकेला नहीं रह पाऊँगा। आखिर में मैं वहाँ से निकल पड़ा।
जीवन में कभी-कभी ऐसे अवसर आते हैं जब आप कुछ करने से रुक जाते हैं लेकिन उसके निशान आप के मन में रह जाते हैं। उसके बाद सालों तक आप अपने आप से पूछते हैं कि अगर मैंने वह रास्ता चुन लिया होता तो मेरा जीवन कैसा होता? गनियारी के जन स्वास्थ्य सहयोग में काम करने के बारे में मुझे ऐसा ही लगता रहा है, दुख होता है कि मैंने वहाँ पर अकेले रहने की कोशिश क्यों नहीं की।
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
बिलासपुर से मैं लखनऊ गया जहाँ पर मेरी पुरानी मित्र डॉ. ब्रिजिता का सैंट मेरी क्लीनिक, अस्पताल और नर्सिन्ग कॉलेज था।
अस्पताल और नर्सिन्ग स्कूल के काम के साथ-साथ डॉ. ब्रिजिता आसपास के जिलों में बहुत से ग्रामीण क्षेत्रों में भी सामुदायिक स्वास्थ्य तथा विकलाँग जनों के लिए कार्यक्रम चला रही थीं। मैं उनके पास करीब एक मास रुका।
उनके साथ ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यक्रम में काम करने का विचार था लेकिन भीषण गर्मी में गाँवों में घूमने के एक-दो अनुभवों के बाद मैं समझ गया कि मैं गाँवों के उस कठिन वातावरण में अधिक दिन तक नहीं रह पाऊँगा। इस तरह से मैंने डॉ. ब्रिजिता से भी विदा ली।
मनाली, हिमाचल प्रदेश
मेरे एक अन्य मित्र के पिता मनाली के क्षेत्र में एक स्वयंसेवी संस्था चला रहे थे, जहाँ वह सामुदायिक विकास के साथ-साथ, स्वास्थ्य कर्मियों के साथ भी काम करते थे। लखनऊ के बाद मैं कुछ दिन उनके पास रहने गया। उनकी संस्था का डॉक्टर काम छोड कर चला गया था, उन्हें एक डॉक्टर की आवश्यकता थी।
उनकी संस्था का अधिकाँश काम मनाली शहर में था पर उनका घर शहर के बाहर, कुछ दूर जा कर था। उनके घर के साथ उनका एक अन्य फ्लैट भी था, उन्होंने कहा कि अगर मैं उनके साथ काम करूँगा तो उस फ्लैट में रह सकता हूँ।
वहाँ बाकी सब कुछ बढ़िया था, लेकिन पहाड़ों के बीच में, सर्दियों में ठंड और हिमपात के साथ, शहर के बाहर उस बहुत सुंदर लेकिन सुनसान जगह में रहने के विचार से मुझे डर लगा। इतनी सुंदर जगह पर रहने का सोच कर अच्छा भी लगता था, पर शहर से बिल्कुल बाहर, सुनसान जगह का डर भी था।
उन्हीं दिनों में मुझे एक अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रैंस के लिए आयरलैंड जाना था, सोचा कि वहाँ से लौट कर ही निर्णय लूँगा कि मनाली में काम स्वीकारूँ या नहीं।
उन दिनों में मन में थोड़ी सी मायूसी भी थी कि अभी तक कोई ऐसी जगह नहीं मिली थी जहाँ मुझे पूरे दिल से लगे कि हाँ, मैं यहाँ रह कर, इस जगह में काम करना चाहता हूँ। हर जगह की कुछ बातें अच्छी लगती थीं, कुछ नहीं।
सोचा कि शायद मुझे अपना क्लिनिक खोलने के लिए अपनी पसंद का छोटा गाँव खोजना पड़ेगा, जो किसी शहर से बहुत दूर नहीं हो, और जहाँ अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बहुत दूर न हो। ऐसी कोई जगह सचमुच हो सकती है, इसका मुझे शक था।
गुवाहाटी, असम
आयरलैंड और इटली में कुछ दिन बिता कर मैं वापस भारत लौटा तो विश्व स्वास्थ्य संस्थान के मेरे पुराने मित्र चपल खासनबिस के माध्यम से मुझे बँगलौर की स्वयंसेवी संस्था "मोबिलिटी इंडिया" के लिए गुवाहाटी में विकलांग जनों के लिए नया कार्यक्रम प्रारम्भ करने के काम का आफर मिला।
मैं कुछ साल पहले, एक अन्य स्वास्थ्य कार्यक्रम के सिलसिले में एक बार पहले गुवाहाटी गया था और वहाँ करीब दस दिन रहा था, इसलिए वह शहर मेरे लिए अनजाना नहीं था।
मैं गुवाहटी पहुँचा, कुछ मित्रों के माध्यम से मैंने उज़ान बाज़ार क्षेत्र के एक होटल में कमरा बुक किया था। मेरा विचार था कि वहाँ पर सप्ताह-दस दिन रुक कर, वहाँ की स्वास्थ्य के क्षेत्र में सक्रिय विभिन्न सरकारी व स्वयंसेवी संस्थाओं से मिलूँगा, और विकलांग जनों के लिए नया कार्यक्रम शुरु हो सकता है या नहीं, इसकी बात समझने की कोशिश करूँगा।
पहले दिन सुबह मुझे एक संस्था के दफ्तर में किसी से मिलने जाना था, होटल से निकला और कुछ दूर पर मेरी मुलाकात बतखों के एक दल से हो गयी। सड़क के किनारे पर वह बतखें एक कतार में चल रही थीं, सुबह का दफ्तर जाने वाला सारा ट्रैफिक, उनके पास धीमा करके जा रहा था ताकि उन्हें दिक्कत नहीं हो। पता चला कि वह पास के उग्रतारा मंदिर की बतखें हैं।
पता नहीं क्यों, उन बतखों को देख कर मुझे लगा मानो नियति ने मुझे संदेश भेजा हो कि इसी शहर में मुझे रुकना है, सोचा कि जिस शहर के लोग बतखों के सड़क पर चलने का ध्यान रख सकते हैं, वहाँ रहना अच्छा होगा।
अंत में
जिस दिन मैं गुवाहाटी में उग्रतारा की बतखों से मिला था, उसी दिन मेरी मुलाकात फादर पॉल से भी हुई, जिनके साथ मैं बहुत समय तक रहा और जो असम के उन दिनों में मेरे सबसे करीबी मित्र बने।
यही मेरी किस्मत में लिखा था कि मैं गुवाहाटी में रहूँ और वहाँ बहुत से लोगों से मित्रता बने और उत्तर-पूर्वी भारत के क्षेत्र को जानू और समझूँ।
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