सोमवार, अगस्त 31, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 27

अब तक की कहानी: प्रतिमा की खोज में त्री और ओरी लखमीपारा गाँव के पास शंखासुर की पहाड़ी देखने जा रहे थे, तब रास्ते में उनका सामना कुछ गैंडों के सींग चुराने वाले तस्करों से हो गया, जो एक फॉरैस्ट गार्ड को मार रहे थे। ओर उस गार्ड को बचाने के लिए गया और तस्करों से लड़ने लगा। लड़ाई में एक तस्कर की मृत्यु हो गयी, त्री और ओरी वहाँ से भागे। गार्गी ब्रह्मपुत्र नदी पर एक मोटर-बोट से त्री से सम्पर्क बनाये हुए थी, उसने उन्हें नदी किनारे बुलाया। आगे पढ़िये ...

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अध्याय 27

बिश्वनाथ चरियाली, असम, 7 - 8 मार्च 2026

अँधेरा हो गया था। उनकी मोटरबोट बिश्वानाथ चरियाली के पूर्व में नदी किनारे खड़ी थी। वसंत की तबियत ठीक नहीं थी और गार्गी थकी हुई थी, वह दोनों सोने चले गये थे। बाकी के लोग नाव के डैक पर बैठे बातें कर रहे थे।

त्री बोला, “अब हम लोग गुरु जी की प्रतिमा को कैसे खोजेंगे? काज़ीरंगा के गार्ड पर हमला हुआ है और एक तस्कर की मृत्यु हुई है। पुलिस जाँच कर रही होगी कि क्या हुआ और किसने किया, इसलिए अगर हम वहाँ लौटें तो पुलिस हमें पकड़ सकती है।"

रंगनाथ बोला, “पहले आप लोग लखमीपारा के पश्चिम में ठहरे थे, इस बार हम वहाँ से कुछ देर, पूर्व की ओर कोई होटल खोज सकते हैं, हालाँकि वहाँ से रास्ता कुछ लम्बा पड़ेगा। दूसरी मुश्किल है कि पूरे क्षेत्र में यह खबर फैल चुकी होगी, इसलिए लोग आप को पहचान कर तुरंत पुलिस को खबर कर सकते हैं।"

आभा बोली, “जब वह गार्ड होश में आयेगा तो वह बतायेगा कि उस पर तस्करों ने हमला किया था, पर मेरे विचार में वह तस्कर पुलिस को रिपोर्ट लिखवाने नहीं जायेंगे कि उन पर किसने हमला किया था। इसलिए हो सकता है कि पुलिस तुम्हारी नहीं, केवल तस्करों की खोज कर रही हो। किसी ने तुम दोनों को वहाँ नहीं देखा, अधिक से अधिक, पंडित जी पुलिस को बता सकते हैं कि तुम दोनों उस दिन शंखासुर पहाड़ी की ओर गये थे। इसलिए पुलिस तुमसे पूछ सकती है कि तुमने वहाँ क्या देखा? मेरे विचार में एक-दो दिन में यह बात ठंडी हो जायेगी, फिर तुम लोग अपनी खोज पर जा सकते हो।"

ताकानोरी कुछ नहीं बोला लेकिन उसके चेहरे से स्पष्ट था कि वह गुस्से में है।

त्री बोला , “लेकिन वह तस्कर इसी क्षेत्र से हैं, उन्होंने हमें देखा है, वह हमें खोज रहे होंगे। अगर उनके हाथ लग गये तो हमसे कुछ पूछेंगे नहीं, सीधा गोली मार देंगे।"

आभा बोली, “तुम ठीक कहते हो, इस समय कुछ निर्णय नहीं लेना चाहिये। कल सुबह अखबार में देखेंगे कि क्या लिखा है और अगर ज़रूरत पड़ी, तो मैं, रंगनाथ और गार्गी, हम कोहोरा में पता करने जा सकते हैं। वहाँ के टैक्सी ड्राइवर, पर्यटकों को काज़ीरंगा की सफारी के लिए ले कर जाते हैं, उनसे भीतर की खबर मिल जायेगी। उसके बाद ही निर्णय लेंगे कि क्या करें।"

ओरी ने मोटरबोट वाले को बिश्वानाथ चरियाली में बियर खरीदने भेज दिया और रात को देर तक डैक पर बैठ कर बियर पीता रहा।

बाकी सब लोग सोने गये। नाव में केवल एक कमरा था, उसमें मोटी चद्दरों से बने हैम्मोक साथ-साथ लटक रहे थे, सभी उन पर सोये।

अगले दिन सुबह, त्री और रंगनाथ शहर से अखबारें और नाश्ता खरीदने गये। अखबार से पता चला कि गार्ड बच गया है और उसकी अंतिम स्मृति थी कि एक तस्कर उसे पेड़ से बाँधने के लिए घसीट रहा था। काज़ीरंगा के एक अधिकारी ने उस अज्ञात व्यक्ति को धन्यवाद दिया जिसने रुमाल बाँध कर गार्ड का खून बहना रोका था और उसकी जान बचायी थी। पुलिस के अनुसार गार्ड को बचाने वाला व्यक्ति, शायद तस्करों का कोई प्रतिद्वंदी तस्कर ही था।

ओरी बोला, “अगर उन्हें हमारे बारे में कुछ नहीं मालूम, तो हम आज वहाँ पर लौट सकते हैं।"

वसंत उनकी बात सुन रहा था, वह बोला, “दादा, अगर आप को काज़ीरंगा के आसपास कुछ खोजना है तो हम पेड़ों की सहायता से, यहीं से उस जगह को खोज सकते हैं।"

त्री बोला, “मैंने भी इस बारे में सोचा था लेकिन ताकानोरी सान उस जगह को स्वयं देखना चाहते हैं।"

वसंत बोला, “इधर-उधर भटकने से अच्छा है कि पहले मैं उस जगह को खोज लूँ, फिर आप दोनों सीधा वहाँ जा सकते हो।"

यह बात सुन कर ओरी का गुस्सा कुछ कम हुआ।

वसंत बोला, “आप मुझे बताओ कि हम किस दिशा में, क्या खोज रहे हैं?”

त्री ने टैबलेट बाहर निकाली और उस पर लखमीपारा गाँव को खोजा, उसे दिखाते हुए बोला, “यहाँ से पूर्व दिशा में जा कर एक दलदल-झील है, वहाँ के लोग उसे डाफलोंग बील कहते हैं। उसके पश्चिमी किनारे पर जो पहाड़ी है, वह शंखासुर है।"

वसंत ने आँखें बंद कर लीं और उस दिशा में ध्यान लगाया।

ओरी ने फुसफुसा कर आभा से पूछा, “क्या पेड़ भी बोलते हैं?  उन्हें डाफलोंग दलदल-झील का नाम बताओ तो वह बता देंगे कि वह किधर है?”

आभा मुस्करायी, “वसंत बता रहा था कि उसे कुछ कहना नहीं पड़ता, वह केवल अपनी संचेतना को पेड़ों की संचेतना से जोड़ देता है, पेड़ अपने आप जान लेते हैं कि वह क्या पूछ रहा है।"

गार्गी ने त्री से पूछा, “दादा, यह दलदल-झील क्या होता है?”

“जब वहाँ बारिश नहीं होती और पानी कम हो जाता है तो वहाँ दलदल रह जाती है, पर बारिश के मौसम में वह झील बन जाती है।"

वसंत ने आँखें खोलीं, बोला, “वह पहाड़ी मिल गयी, उस पर पेड़ कम हैं, अधिकतर झाड़ियाँ हैं। इस  समय पहाड़ी के साथ वाली दलदल-झील में पानी कम है, और वहाँ दलदल में एक हिरण फँसा हुआ है, वह अधिक समय तक जीवित नहीं रह पायेगा।"

त्री ने आभा से पूछा, "कविता की आगे की पंक्तियाँ क्या हैं?” तो उसने वह पंक्तियाँ सुनायीं - 

“कंदरा में गूँजती चौदह ध्वनियाँ पिनाक की,
लौटी सति पर्वतराज पिता के घर, त्रिनेत्र कहाँ है?”

वह बोला, “यानि गुफा में डमरू की चौदह ध्वनियाँ गूँज रही हैं, इसका मतलब है कि वहाँ कोई लम्बी गुफा है जिसमें चौदह कक्ष हैं, या फिर चौदह गुफाएँ हैं जो शायद डमरू की आकृति में बनी हैं। शंखासुर पहाड़ी किस दिशा में है? उससे हमें उन गुफाओं की दिशा दिखनी चाहिये।"

वसंत बोला, “उस पहाड़ी के पूर्व में तो दलदल है और पश्चिम में लखमीपारा, मैं उसके उत्तर और दक्षिण में खोज कर सकता हूँ कि वहाँ कोई गुफाएँ हैं या नहीं।" यह कह कर वह फिर से ध्यान में लीन हो गया। कुछ देर के बाद उसने आँखें खोलीं, बोला, “वहाँ आसपास कोई गुफा नहीं मिली। उस पहाड़ी के आसपास बहुत देखा लेकिन वहाँ पर दूर-दूर तक कोई गुफा नहीं है।"

ओरी को विश्वास नहीं हुआ, बोला, “शायद यह बच्चा उस क्षेत्र को ठीक से देख नहीं पाया? हमें खुद वहाँ जा कर उसकी जाँच करनी चाहिये।"

वसंत कुछ नहीं बोला, लेकिन त्री ने कहा, “यह खोज वसंत ने नहीं की है, यह इस क्षेत्र के हज़ारों पेड़ों और पौधों का काम है। ऐसा हो ही नहीं सकता कि यहाँ कोई गुफा हो और उसके आसपास के पेड़-पौधों को उसके बारे में पता नहीं हो। अगर वसंत कह रहा है कि वहाँ कोई गुफा नहीं है तो हमारा वहाँ जाना बेकार है।"

ओरी बोला, “लेकिन अगर गुफा वहाँ नहीं है, तो हम क्या करेंगे?”

“हमें फिर से कविता के अर्थ को समझने की कोशिश करनी चाहिये, शायद उनकी कोई बात हमने ठीक से नहीं समझी। आभा, गुरु जी का कागज़ निकालो, हम उस पर दोबारा विचार करेंगे।"

ओरी बोला, “मुझे लगता है कि तुम लोग कोई ड्रामा कर रहे हो। तुम्हारे गुरु ने तुम्हें अपना उत्तराधिकारी बनाया है लेकिन मूर्ति के बारे में स्पष्ट लिखने के बजाय एक पहेली बना दी है, जो तुम्हारी समझ में नहीं आ रही, यह क्या बात हुई?”

“गुरु जी ज्ञानी हैं, वह जैसा उचित समझते हैं, वैसा करते हैं", रंगनाथ बोला तो त्री ने इशारा करके उसे चुप रहने के लिए कहा और ओरी से बोला, “तुम डरते हो कि अगर हमें वह मूर्ति नहीं मिलेगी तो तुम क्या करोगे। तुम्हारी यह चिंता व्यर्थ है, हम उसे अवश्य खोज लेंगे, हमें केवल थोड़ा सा समय चाहिये।"

लेकिन ताकानोरी का गुस्सा शाँत नहीं हुआ, बोला, “मेरे पास अधिक समय नहीं है।"

आभा उठी और पास जा कर उसके कँधे पर हाथ रखा तो वह चुप हो गया, वह बोली, “कल शाम को तुमने शायद कुछ अधिक बियर पी ली, इसलिए आज तुम चिड़चिड़े हो रहे हो। मैं तुम्हारे लिए दालचीनी और सौंफ वाली चाय बनाती हूँ, उससे तुम्हारा मन शाँत होगा और तुम्हें फायदा होगा।"

तभी गार्गी बोली, “मेरे विचार में हम लोग गलत जगह पर मूर्ति खोज रहे हैं।"

सब ने मुड़ कर उसकी ओर देखा। उसके हाथ में ओरी की टैबलेट थी और वह उस पर उस क्षेत्र के नक्शे को देख रही थी। बोली, “यहाँ देखो, इस द्वीप का क्या नाम है?”

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अगला अध्याय बृहस्पतिवार 3 सितम्बर को पढ़ सकते हैं

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गुरुवार, अगस्त 27, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 26

अब तक की कहानी:  त्रिनेत्र ने ताकानोरी से कहा है वह उसे शक्तिवाहिनी मूर्ति तक ले कर जायेगा, और ओरी ने उसे वचन दिया है कि मूर्ति मिलने के बाद वह उनका और पीछा नहीं करेंगे। गुरु जी त्री के नाम एक कविता-पहेली छोड़ी थी, उसे पढ़ कर त्री, ओरी और आभा काजीरंगा के पास देवपानी के एक होटल में ठहरे थे। आज सुबह, त्री और ओरी लखमीपारा गाँव से हो कर शंखासुर की पहाड़ी को खोजने निकले थे। लखमीपारा के मन्दिर के पुजारी ने उन्हें शंखासुर जाने का रास्ता बताया है। आगे पढ़िये ...

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अध्याय 26

 शंखासुर पहाड़ी, काज़ीरंगा, असम, 7 मार्च 2026

ओरी बोला, “तुमसे एक अन्य बात पूछना चाहता था। दिल्ली और कलकत्ता में लोग तुरंत जान जाते थे कि मैं विदेशी हूँ, वह मुझसे अंग्रेज़ी में बात करते थे, जबकि यहाँ लोग मेरी ओर ध्यान नहीं देते, कुछ तो मुझसे यहाँ की भाषा में बात करते हैं, और जब वह देखते हैं कि मैं उनकी बात नहीं समझ पा रहा तो सोचते हैं कि मैं नाटक कर रहा हूँ, ऐसा क्यों है?”

त्री मुस्कराया, “आभा का चेहरा क्या तुमसे बहुत भिन्न है? वह भी थोड़ी सी जापानी नहीं लगती?”

ओरी बोला, “नहीं, वह जापानी नहीं लगती, उसका चेहरा म्यंमार और थाईलैंड के लोगों से अधिक मिलता है।"

त्री हँसा, बोला, “चीनी, जापानी, म्यंमार, थाईलैंड, मुझे उनके चेहरों को अलग-अलग पहचानना नहीं आता, मुझे सभी एक जैसे लगते हैं।"

ओरी भी हँसा, “वैसे ही, मुझे भी तुम हिन्दुस्तानी आपस में एक जैसे लगते हो।"

"लेकिन तुम नक्शे में देखो तो यहाँ पर एक ओर भूटान और चीन हैं, दूसरी ओर म्यंमार और थाईलैंड हैं। यहाँ की बहुत सी जनजातियाँ आज की राष्ट्रीय सीमाओं से बँट गयी हैं लेकिन उनके लोग नहीं बँटे हैं। शायद इसलिए तुम्हें देख कर यहाँ के लोग सोचते हैं कि तुम भी हमारी किसी जन-जाति के होगे", त्री ने कहा।

वह दोनों ऐसे ही बातें कर रहे थे कि अचानक आगे से एक गोली चलने की आवाज़ आई।

त्री रुक गया, बोला, “पंडित जी कह रहे थे कि यहाँ पर गैंडों के सींग चुराने वाले तस्कर खतरनाक हो सकते हैं, हमें आगे नहीं जाना चाहिये?”

ओरी बोला, “अगर वह लोग कोई गलत काम कर रहे हैं, तो हमें उन्हें रोकना चाहिये।"

लेकिन त्री आगे नहीं बढ़ा, बोला, “जब बचने का कोई और रास्ता नहीं हो तब मैं लड़ सकता हूँ, लेकिन मैं जबरदस्ती किसी से लड़ने नहीं जाऊँगा।"

ओरी बोला, “यह तो कायरता होगी, क्या तुम कायर हो? देखोगे भी नहीं कि वहाँ कौन हैं और वह क्या कर रहे हैं?”
त्री ने लम्बी साँस ली, बोला, “ठीक है, तुम रुको, मैं अदृश्य हो कर देख कर आता हूँ, फिर यह निर्णय लेंगे कि कुछ करना चाहिये या नहीं।"

जैसे ही उसकी शक्ति जागृत हुई वह अदृश्य हो कर आगे देखने चला गया। ओरी पाँच मिनट रुका, फिर वह भी जिस ओर से गोली चलने की आवाज आई थी उसी ओर बढ़ा।

वहाँ से करीब दो किलोमीटर आगे जा कर उन्हें कुछ आदमी दिखे। एक फोरैस्ट गार्ड जीप में उनका पीछा कर रहा था। उसके एक हाथ में वॉकी-टॉकी थी जिससे वह अपने साथियों को बुला रहा था। उसकी जीप के सामने, पेड़ों के बीच में, तीन आदमी भाग रहे थे, जिनके चेहरे रुमालों से छिपे थे और जिनके हाथों में बन्दूकें थीं। अचानक एक पेड़ पर छुपा हुआ एक आदमी, नीचे जाती हुई फोरैस्ट गार्ड की जीप पर कूदा। उसके हाथ में एक चाकू था, जिससे उसने गार्ड पर हमला कर दिया। गार्ड के बायें कँधे पर चाकू का घाव लगा तो उसके हाथ से उसका वॉकी-टॉकी छूट कर गिर गया, उसकी कमीज़ तुरंत खून से लाल हो गयी और उसने जीप को रोक कर उतरने की कोशिश की।

जो तीन आदमी आगे भाग रहे थे, वे मुड़ कर जीप की ओर आये, उनमें से एक बोला, “सिपाहिया जी, क्यों मरने का शौक लगा है जो बीच में अटका डालने के लिए कूद पड़े?”

दूसरा आदमी बोला, “इस साले को पेड़ से बाँध दो, बाद में इसके साथी आ कर इसे खोल लेंगे। वह गैंडा उस तरफ भागा है, हमें उसका पीछा करना है।"

एक आदमी के पास रस्सी थी, उसने उससे गार्ड के हाथ बाँधे, और उसे एक पेड़ की तरफ खींचने लगा तो दर्द से गार्ड चिल्लाया, तब उस आदमी ने अपनी बन्दूक के कुन्दे से उस गार्ड के सिर पर ज़ोर से मारा तो वह बेहोश हो गया।

पास में छिपा हुआ त्री सब कुछ देख रहा था, उसने सोचा कि जब वह लोग गार्ड को छोड़ कर जायेंगे तो वह उसकी रस्सी खोल देगा, लेकिन ओरी तुरंत पेड़ों के बीस से बाहर निकल आया, चिल्ला कर बोला, “उस आदमी को छोड़ दो।"

चूँकि ताकानोरी अंग्रेज़ी में बोल रहा था और उन आदमियों को शायद उसकी बात समझ नहीं आयी, उनमें से एक ने अपनी बन्दूक उठायी और उसकी ओर निशाना साधा। तब त्री ने चिल्ला कर ओरी को पुकारा। उन आदमियों ने उसकी आवाज़ सुनी लेकिन वह दिखाई नहीं दिया, वह आसपास देखने लगे। इतनी देर में ताकानोरी ने अपनी आस्तीन से एक चाकू को निकाल कर, उसे निशाना साधने वाले तस्कर की ओर फैंका। उसका निशाना इतना सधा हुआ था कि काफी दूर होने पर भी वह चाकू सीधा उस आदमी की गर्दन में घुस गया। जब वहाँ से खून का फुव्वारा निकला तो उस आदमी के हाथ से उसकी बन्दूक छूट कर गिर गयी।

अपने साथी को नीचे तड़पता देख कर बाकी दोनों आदमियों ने भी अपनी बन्दूकें उठायी तो ओरी ने आस्तीन से दो चाकू और निकाल लिए, बोला, “समझदार हो तो बन्दूकें नीचे कर लो, वरना तुम दोनों की जान भी जायेगी।" यह कह कर वह निडर हो कर उनके सामने सीना तान कर खड़ा हो गया। उसकी निडरता देख कर वह दोनों आदमी थोड़ा हिचकिचाये, तब अचानक त्री भी वहाँ प्रकट हो गया, और बंगाली में बोला, “यह आदमी बड़ा निशानेबाज है, मेरी मानो तो यहाँ से तुरंत भाग जाओ, वरना तुम दोनों की मृत्यु भी आज ही होगी।"

त्री को वहाँ अचानक प्रकट होता देख कर वह दोनों घबरा गये और अपने घायल साथी को वहीं छोड़ कर, पीछे पेड़ों में घुस कर भाग गये। उनका तीसरा साथी जो जिसने गार्ड को चाकू मारा था, वह जीप पर खड़ा सब कुछ देख रहा था, वह भी वहाँ से उतर कर भागा। 
ओरी ने घायल तस्कर की गर्दन से अपने चाकू को निकाल कर उस पर लगे खून को उसकी कमीज़ से पोंछा और वापस अपनी आस्तीन में छुपा लिया, बोला, "इस आदमी का बहुत सा खून बह गया है, इसका बचना मुश्किल होगा।"

त्री ने आगे बढ़ कर बेहोश गार्ड के हाथ से रस्सी खोली फिर उसकी कमीज़ को खोल कर उसके कँधे के घाव को देखा। वह चाकू जहाँ घुसा था, शायद वहाँ कोई खून की नस थी जिससे खून बहता जा रहा था। उसके बहते खून को देख कर त्री वहाँ मूर्ति की तरह खड़ा रह गया, उसका चेहरा फीका पड़ गया। 

ओरी ने पीछे से आ कर, अपनी जेब से एक साफ रुमाल निकाल कर उसे पहले गार्ड के घाव पर दबाया, फिर उसे कँधे पर बाँध कर टाईट खींच दिया। फिर उसने त्री से कहा, “उस वॉकी-टॉकी से इसके गार्ड साथियों को खबर करके यहाँ बुलाओ, इसे जल्दी अस्पताल ले जाना ज़रूरी है, नहीं तो यह भी नहीं बचेगा।"

त्री ने वॉकी-टॉकी का बटन दबा कर "हैलो, हैलो" बोला तो उसे उत्तर मिला। ओरी ने उसे याद दिलाया, “उन्हें हमारे बारे में कुछ मत कहना।"

त्री ने वॉकी-टॉकी से गार्ड के साथियों को उसकी और तस्करों की लड़ाई की बात बतायी, कहा कि घायल गार्ड को जल्दी से अस्पताल ले जाना ज़रूरी है। जब उन्होंने उससे पूछा कि वह कौन है तो उसने वॉकी-टॉकी को बंद कर दिया। 

ओरी बोला, “हम जितना कर सकते थे, उतना कर दिया, अब हमें यहाँ से जाना चाहिये।" उन दोनों के वस्त्रों पर भी खून के दाग लगे था, उनकी ओर इशारा करके उसने कहा, “हो सकता है कि वह गार्ड कुत्तों के साथ आयें और हमें खोजने की कोशिश करें। कुत्ते सूंघ कर देख लेंगे कि हम किधर गये हैं। उनसे बचने के लिए हमें पानी में चलना चाहिये।"

दोयाँग नदी वहाँ से अधिक दूर नहीं थी और उसके किनारे पर पानी गहरा नहीं था, उनके घुटनों से नीचे आ रहा था। वह उसमें चलते हुए लखमीपारा की ओर बढ़े।

त्री को उस लड़ाई से बहुत धक्का लगा था। अभी तक उसने गुरु जी द्वारा सिखायी लड़ने की कला को व्यायाम और अभ्यास की तरह से लिया था, उसने आजतक कभी किसी से इस तरह की मार-पिटाई नहीं की थी, न ही कभी इस तरह से खून बहाते घायल लोगों को मरते हुए देखा था। वहाँ से जाते हुए, बार-बार उसके सामने तस्कर की गर्दन में घुसे चाकू और फुव्वारे की तरह निकलते लाल खून की छवि उभर आती थी।

ओरी उसकी मनोस्थिति को समझ गया, बोला, “त्रिनेत्र, शायद आज तुमने पहली बार लड़ाई में किसी को इस तरह से मरते देखा है? तुम्हें इसके बारे में सोचने के लिए बाद में समय मिलेगा, लेकिन इस समय हमें अपने बचाव के बारे में सोचना है। हमारे कपड़ों पर खून लगा है और हो सकता है कि उन तस्करों के जासूस गाँव में हों, या हमारे होटल में भी हों। बेहतर होगा कि हम इस समय गाँव से हो कर नहीं लौटें और किसी तरह से होटल से अपना सामान ले कर यहाँ से चले जायें।"

उसकी बात सुन कर त्री थोड़ा होश में आया।

तब उसने अपने भीतर गार्गी की आवाज़ सुनी, वह कह रही थी, “दादा, आप लोग गाँव की ओर मत जाईये। बल्कि छोटी नदी को छोड़ कर, उत्तर दिशा में ब्रह्मपुत्र नदी की ओर आईये। हमारे पास नाव है, हम आप को नदी के किनारे किसी घाट से ले लेंगे। आप को होटल लौटने की भी आवश्यकता नहीं है, आभा दीदी वहाँ से सारा सामान ले आयेंगी।"

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सोमवार, अगस्त 24, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 25

अब तक की कहानी:  त्रिनेत्र ने ताकानोरी से कहा है वह उसे शक्तिवाहिनी मूर्ति तक ले कर जायेगा, और ओरी ने उसे वचन दिया है कि मूर्ति मिलने के बाद वह उनका और पीछा नहीं करेंगे। गुरु जी त्री के नाम एक कविता-पहेली छोड़ी थी, उसे पढ़ कर त्री, ओरी और आभा काजीरंगा के पास देवपानी के एक होटल में ठहरे थे। आज सुबह, त्री और ओरी लखमीपारा गाँव से हो कर शंखासुर की पहाड़ी को खोजने जा रहे हैं। आगे पढ़िये ...

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अध्याय 25

लखमीपारा, काज़ीरंगा, असम, 7 मार्च 2026 

अगले दिन सुबह आभा ने त्री से पूछा, “तुम आज लखमीपारा और शंखासुर पहाड़ी की ओर जाने की कह रहे थे। तुम्हारे ख्याल में वहाँ तुम्हें वह मूर्ति मिल जायेगी? आज मेरी तबियत ठीक नहीं है, मेरा कहीं बाहर जाने का मन नहीं है।"

त्री बोला, “मैं गुरु जी को जानता हूँ, वह कोई चीज़ किसी आसान जगह पर नहीं छुपाते, इसलिए मैं जानता हूँ कि आज उस जगह पर पहुँचना बहुत कठिन होगा। अगर तुम अभी नहीं आना चाहती तो कमरे में आराम करो। लेकिन जाने से पहले मुझे कविता की बाकी पंक्तियाँ बता दो।"

आभा ने अपने पर्स से कविता वाला कागज़ निकाल कर पढ़ा:

“कंदरा में गूँजती चौदह ध्वनियाँ पिनाक की
लौटी सति पर्वतराज पिता के घर, त्रिनेत्र कहाँ है?
वहाँ जहाँ पर लाल बकरियाँ घास चरें।"

त्री बोला, “कंदरा माने गुफा और पिनाक माने शिव जी का डमरू, शायद चौदह ध्वनियों का अर्थ है कि वहाँ चौदह स्थान या गुफाएँ हैं। शंखासुर पहाड़ी पर पहुँच कर, वहाँ गुफाओं के बारे में पता करेंगे। अब हम जाते हैं, दोपहर से पहले लौट आयेंगे।"

तबियत खराब होने का केवल बहाना था। जब वह दोनों होटल से निकले तो आभा भी फटाफट तैयार हो गयी और देवपानी घाट की ओर गयी। वहाँ उसने एक नाव किराये पर ली और उसे पूर्व दिशा में ले जाने के लिए कहा।

जब वह नाव घाट से कुछ दूर आयी तो सामने से एक मोटरबोट उसकी नाव के पास आ गयी, उसमें रंगनाथ, गार्गी और वसंत थे। करीब के एक द्वीप पर अपनी पहली नाव को छोड़ कर, वह बच्चों के साथ उनकी मोटरबोट पर चली गयी। उसने उन्हें त्री और ओरी के शंखासुर पहाड़ी की खोज में जाने के बारे में बताया, और गार्गी से बोली, “मैं उन दोनों पर नज़र रखना चाहती हूँ, तुम त्री से सम्पर्क बना कर रखो और देखो कि वे दोनों कहाँ जाते हैं और क्या करते हैं।"

उधर त्री और ओरी लखमीपारा गाँव की ओर पैदल जा रहे थे। होटल से निकलने के दस मिनट बाद वह दोयांग नदी के किनारे पहुँच गये, जिसके दोनों ओर पेड़ उगे थे। वहाँ नदी पर कोई पुल नहीं दिखा और आसपास, कोई नाव वाला भी नहीं था, लेकिन लखमीपारा जाने के लिए उन्हें वह नदी पार करनी थी। ओरी ने नदी के साथ-साथ चल कर उत्तर दिशा में जाने के लिए कहा, तो त्री मान गया, सोचा कि शायद आगे जा कर नदी पार करने का कोई रास्ता मिल जायेगा।

वहाँ पर केवल पक्षियों की चहचहाहट सुनाई दे रही थी। त्री ने जमीन पर गिरी हुई पेड़ों दो लम्बी-सीधी डालियों को खोजा, और उनकी छोटी डालियों और पत्तों को तोड़ कर उनकी छड़ियाँ बनायीं। एक छड़ी ताकानोरी को दी, और बोला, “काज़ीरंगा का सफारी पार्क नदी के उस ओर है, इसलिए मेरे विचार में खतरनाक जानवर इस ओर कम आयेंगे, लेकिन यहाँ की ऊँची घास में साँप हो सकते हैं, इस छड़ी से आगे ठक-ठक करके चलो, तो साँप और छोटे-मोटे जानवर भाग जायेंगे।"

ओरी ने पूछा, “उसके टूटने से पहले, तुमने जून-मिन की विशेष शक्ति वाली मर्ति को अवश्य देखा होगा? मैंने उसकी तस्वीरें देखी हैं और यामागुचि सान ने कहा कि वह केवल बारह इंच की है, क्या यह सच है?”

त्री ने हाथों से इशारा करके दिखाया, “जहाँ तक मुझे याद है, वह करीब इतनी बड़ी थी, हो सकता है कि बारह इंच की ही हो। लेकिन वह बहुत हलकी थी, जैसे पत्थर की मूर्तियाँ होती हैं, वैसी नहीं थी।"

"वह टूटी कैसे?”

त्री ने मुँह बनाया, बोला, “मेरी गलती से ही टूटी थी। गुरु जी मेरे लिए पिता जैसे हैं, उन्होंने मुझे बचपन से पाला है, शायद इसलिए मुझे उनके साथ खेलना और मज़ाक करना अच्छा लगता है। मेरे एक मज़ाक की वजह से वह मूर्ति टूटी थी।"

ओरी ने उसकी ओर प्रश्नात्मक दृष्टि से देखा तो उसने पूरी बात बतायी, बोला, “मैं शिल्पकार हूँ, शिल्प बनाना मुझे बहुत अच्छा लगता है। गुरु जी ने मुझे अपनी मूर्ति जैसी, सफेद और हरे पत्थरों की बारह अन्य मूर्तियाँ बनाने के लिए कहा था। जहाँ उनका समाधी-स्थल है, वह उस मन्दिर की दीवार में उन मूर्तियों को स्थापित करना चाहते थे, शायद तुमने वहाँ मेरी उन मूर्तियों को देखा होगा? उस मन्दिर के भीतर वाले कक्ष में एक अवलोकितेश्वर बौद्धिसत्व की बड़ी मूर्ति भी है, जिनकी दायीं हथेली में हरी तारा और बायीं हथेली में श्वेत तारा खड़ी हैं, वह दोनों छोटी मूर्तियाँ भी मैंने ही बनायी हैं।"

"फिर?”

“एक दिन मैं मन्दिर के प्रांगण में बैठ कर उन मूर्तियों को तराश रहा था, जब गुरु जी वहाँ आये। उस समय मैंने यह ध्यान नहीं दिया कि उनके हाथों में वह शक्तिवाहिनी प्रतिमा थी। तुम तो जानते हो कि मेरी अदृश्य होने की शक्ति है, उनके साथ खेलने के लिए कई बार मैं अदृश्य हो कर छिप जाता था और उनके पीछे से आ कर, उन्हें डराने के लिए अचानक 'हाउ-हाउ' चिल्लाते हुए प्रकट हो जाता था। मेरे उस खेल से वह डरते नहीं थे, क्योंकि शायद वह मुझे देखे बिना भी मेरी उपस्थिति को भाँप लेते थे। पता नहीं उस दिन क्या हुआ, मैं 'हाउ-हाउ' कहता हुआ उनके सामने प्रकट हुआ तो उनके हाथ से वह प्रतिमा गिर गयी", उस दिन को याद करके त्री की आँखों में आँसू आ गये, “मूर्ति के टुकड़ों को देख कर वह इतने दुखी थे कि अपनी हरकत पर मुझे बहुत पछतावा हुआ, लेकिन तब पछताने से क्या होता, वह मूर्ति तो ठीक नहीं हो सकती थी।"

नदी के साथ चलते-चलते वे दोनों, उत्तर दिशा में काफ़ी आगे आ गये थे, वहाँ उन्हें नदी पर बाँस का बना एक कच्चा पुल दिखा। देखने में वह कमज़ोर लगता था इसलिए उन्होंने उसे एक-एक कर के पार किया। नदी पार करके वह वापस दक्षिण दिशा में लखमीपारा गाँव की ओर लौटे।

ओरी बोला, “यामागुचि दादा जी कहते थे कि अगर उस मूर्ति के पास रहो तो तुम्हारी भीतर की शक्ति अपने आप सशक्त हो जाती है। मैं सोचता था कि अगर उनके पास वह मूर्ति होती तो मेरी शक्तियाँ भी पूरी तरह से विकसित हो सकती थीं। लेकिन मूर्ति टूटने के बाद, जून-मिन ने उसके टुकड़ों को नयी मूर्ति में लगवा कर, यहाँ अपने आश्रम से इतनी दूर क्यों रखवा दिया? यहाँ रखने से उसका लाभ किसे मिलेगा? क्या तुम लोगों को उसकी शक्ति की आवश्यकता नहीं है?”

“क्योंकि कई वर्ष पहले ही हमने समझ लिया था कि हमारी शक्ति को प्रबल करने के लिए, प्रतिमा के अतिरिक्त कुछ अन्य रास्ते भी हैं। जब कुछ शक्तिवान लोग साथ में रहते हैं, साथ में शक्ति-साधन का अभ्यास करते हैं तो उससे भी आपस में उनकी शक्तियाँ सशक्त और विकसित होती है। प्रतिमा से बच्चों की शक्ति बढ़ती है और शक्तिवान लोगों के पास रहने से प्रतिमा की शक्ति भी बढ़ती है। गुरु जी कहते हैं कि शक्ति एक चुम्बक है, जिसके साथ रखो, वह भी चुम्बक बन जाता है, लेकिन हर पत्थर पर उसका असर नहीं होता, उसके लिए तो विशेष हरिताष्म पत्थर ही चाहिये। जब गुरु जी की वह प्रतिमा टूटी तो उसकी कुछ धूल मैं अपने साथ ले गया और उसे मिला कर मैंने नटराज की एक मूर्ति बनायी। पहले उसकी शक्ति हलकी थी लेकिन आज, क्योंकि मेरे साथ अन्य नौ शक्तिवान बच्चे रहते हैं, हमारे सामिप्य से हमारे नटराज की शक्ति भी बढ़ गयी है", त्री ने उसे समझाया।

"यानि, यामागुचि दादा जी, अगर उस मूर्ति के बदले में कुछ शक्तिवान लोगों को खोज कर अपने साथ रखते तो भी हमारी शक्ति बढ़ कर विकसित हो जाती?”

त्री ने सिर हिला कर हामी भरी। तब तक वह लोग लखमीपारा गाँव पहुँच गये थे। वहाँ त्री ने लोगों से शंखासुर पहाड़ी के बारे में पूछा लेकिन किसी को उस पहाड़ी के बारे में नहीं पता था। किसी ने सुझाव दिया कि वह मन्दिर के पुजारी जी से पूछे तो वह उस मन्दिर की ओर गये।

वह मन्दिर एक विशालकाय पीपल के वृक्ष के नीचे बना था, जिसके आसपास लाल मौली के धागे बँधे थे और पास में एक चबूतरे पर राधा-कृष्ण की मूर्ति रखी थी। बूढ़े पंडित जी बोले, “बहुत दिनों के बाद आज शंखासुर पहाड़ी का नाम सुना। पिछले दस-पंद्रह सालों में यहाँ बहुत से नये लोग, बाहर से आ कर बस गये हैं, उन्हें यह पुराने नाम नहीं मालूम, उन्होंने जगहों को अपने नये नाम दिये हैं।" फिर, उस पहाड़ी का रास्ता बताते हुए वह बोले, “उस तरफ ध्यान से जाना। वहाँ गैंडों के सींग काटने वाले तस्कर, हाथों में हथियार लिये घूमते हैं। अगर वैसा कोई व्यक्ति दिखे तो खतरा मत लेना, क्योंकि वह लोग तुम्हें जान से मार कर तुम्हारी लाशों को जंगल में फ़ैंक देंगे तो महीनों उसे खोजते रहेंगे। उधर एक दूसरा खतरा दलदल का भी है, जहाँ कोई बड़ा कीचड़ जैसा कुछ दिखे तो उसके किनारे से चलना, जल्दबाजी करके उसके बीच में मत जाना। दलदल में फँस गये तो मृत्यु निश्चित है।"

त्री ने पूछा, “पंडित जी, शंखासुर पहाड़ी के आसपास कोई गुफाएँ भी हैं?”

वह बोले, “मैंने गुफाओं की बात तो कभी नहीं सुनी, लेकिन पिछले पचास सालों से यह संरक्षित क्षेत्र है, भीतर अगर तुम्हें काज़ीरंगा के गार्ड पकड़ लें और उन्हें पता चले कि तुम यहाँ के गाँव के नहीं हो, तो जुर्माना लगता है, इसलिए बाहर वाले लोग इधर घूमने नहीं जाते। लेकिन यहाँ अगर गुफाएँ होंगी तो शायद उन तस्करों को या पार्क में काम करने वाले गार्डों को उसका पता होगा।"

वहाँ से चले तो त्री ने ओरी से कहा, “डर तो नहीं गये? तुम चाहो तो होटल लौट सकते हो, आज मैं आगे जा कर पता लगा कर आता हूँ और अगर पता चल गया तो कल हम दोनों साथ में वहाँ जा सकते हैं।"

ओरी ठहाका मार कर हँसा, बोला, “क्या मेरे चेहरे से लगता है कि मैं डर गया हूँ? मैं हर रोज़ केन-दो, क्यू-दो और नागीनाताजुत्सु की लड़ाई का अभ्यास करता हूँ। मेरे पूर्वज एक समुराई यौद्धा थे, शायद तुमने भी उन सैंतालिस समुराइयों की कहानी सुनी होगी? उस पर हॉलीवुड वालों ने एक फ़िल्म भी बनायी थी। क्या तुम उस कहानी को जानते हो?”

त्री ने सिर हिला कर मना किया तो वह बोला, “हमारे शहर का नाम है अक्को, करीब तीन सौ साल पहले हमारे एक राजा थे, लॉर्ड असानो, जिनका धोखे से खून हुआ था। मेरे पूर्वज ओकानो उनके समुराई थे। नियम के अनुसार, जब स्वामी मरता है तो उसके समुराई आत्महत्या कर लेते हैं, इसलिए उन्हें भी आत्महत्या करनी चाहिये थी। लेकिन उन्होंने आत्महत्या करने के बजाय, पहले अपने स्वामी की हत्या का बदला लिया और फिर आत्महत्या की थी। उनकी यह कहानी पूरे जापान में प्रसिद्ध हो गयी और आज भी अक्को में राजा के किले के पास, उन सैंतालिस समुराईयों का मन्दिर बना है।"

त्री बोला, “इसका मतलब है कि अगर समुराई काम में असफल हो जाये, तो उसे आत्महत्या करनी पड़ती है? मान लो कि अगर तुम्हें वह मूर्ति न मिले तो क्या तुम्हें भी आत्महत्या करनी पड़ेगी?”

ताकानोरी ने लम्बी साँस ली, बोला, “आजकल समुराई नहीं हैं, और अब पहले जैसी पेट में तलवार घुसा कर आत्महत्या करने की परम्परा भी नहीं है। वैसे तो मैं याकूज़ा हूँ, एक अपराधी गैंग के लिए काम करने वाला खूनी। लेकिन यामागुचि दादा जी ने मुझे पाला-पोसा है, मैं उनके साथ गद्दारी नहीं कर सकता। मैं उस मूर्ति को खोजने में अपनी जान भी लगा दूँगा और जब तक वह नहीं मिलेगी, मैं उसे खोजना नहीं छोड़ूँगा। यही मेरा धर्म है।"

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गुरुवार, अगस्त 20, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 24

अब तक की कहानी:  ताकानोरी से बचने के लिए जामुन बाबा ने समाधी ले ली। ओरी उनकी एक मूर्ति चाहता है। बाबा की मदद करने, त्रिनेत्र पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चों और आभा के साथ मजूली आया है। ताकानोरी आभा, वसंत और तृप्ति कर अपहरण कर लेता है। त्री उनके पीछे गार्गी के साथ नारायणपुर आता है और अदृश्य हो कर ताकानोरी के घर में घुस कर आभा और बच्चों से बात करता है। ओरी को जब यह समझ आती है तो वह आभा और बच्चों से पूछताछ करता है लेकिन उसके पैर में बिच्छु काट लेता है। त्री ओरी से बात करने आता है, वह कहता है कि बच्चों को छोड़ दो और उससे एक वचन लेता है ... इसके आगे पढ़िये ... 

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अध्याय 24

मोरनाइगुड़ी से काज़ीरंगा, असम, 6 मार्च 2026 

ताकानोरी ने जून-मिन की चिट्ठी वाला लिफाफा, जो उसे जगदीश बाबू ने दिया था, बाहर निकाला और उसे त्री को दिया। त्री ने उसमें से गुरु जी की कविता वाला कागज़ बाहर निकाला और उसे पढ़ा -

"चन्द्र-वधु के चरण-कमल, तीन दशानन कोसे 
पद्मा की कमल-अँजुरी से बहता जल
विष्णु के शंख नाद से प्रज्जवलित अंबर के सप्त ऋषि
कंदरा में गूँजती चौदह ध्वनियाँ पिनाक की
लौटी सति पर्वतराज पिता के घर, त्रिनेत्र कहाँ है?
वहाँ जहाँ पर लाल बकरियाँ घास चरें।”

उसने कविता को धीरे-धीरे पढ़ा और मुस्कराया, बोला, “जब मैं छोटा सा था, तबसे गुरु जी मुझसे यह खेल खेलते थे। वह मेरी गेंद या खिलौना छिपा देते थे, फिर मुझे एक कविता सुनाते थे और कहते थे कि इसके शब्दों में संकेत हैं कि वह कहाँ छुपा है। कई बार मुझे अपने खिलौने खोजने में दो-तीन दिन भी लग जाते थे। उस खेल की वजह से मुझे उनकी कविताओं के संकेत समझना आता है।"

त्री, आभा और ओरी मोरनाइगुड़ी में होटल में बैठे हैं। वह लोग सुबह नारायणपुर से वहाँ आये हैं। त्री ने सभी बच्चों को मजूली भेज दिया है। वह चाहता था कि आभा भी बच्चों के साथ मजूली चली जाये, लेकिन ताकानोरी नहीं माना, बोला, “तुम मेरे सामने हो कर भी अदृष्य हो सकते हो, मैंने तुम्हारी शक्ति का वह रूप देखा है। अगर तुम मुझे रास्ते में कहीं पर अकेला छोड कर गुम हो गये तो मैं क्या करूँगा? गारँटी के लिए आभा भी हमारे साथ चलेगी।"

जब त्री ने गुरु जी की कविता पढ़ी तो ओरी बोला, “तो बताओ कि हमें वह देवी मूर्ति लेने कहाँ जाना है?”

त्री बोला, “मैंने उस मूर्ति के बारे में एक बात तुमसे छिपायी है, पहले तुम्हें वह बात बतानी है। तुम तो जानते हो कि वह मूर्ति हरे जेड पत्थर की बनी थी? पाँच साल पहले जब गुरु जी यहाँ मजूली आये तो एक दिन वह मूर्ति गिर कर टूट गयी।"

ओरी गुस्सा हो गया, बोला, “इसका मतलब है कि तुमने मुझसे झूठ बोल कर वचन लिया है? तुमने तो कहा था कि तुम मुझे उस देवी मूर्ति तक ले कर जाओगे?”

“पहले मेरी पूरी बात सुनो, फिर गुस्सा होना। जब वह मूर्ति टूटी तो उसका एक बड़ा हिस्सा था, और कुछ छोटे टुकड़े थे। उसके हर टुकड़े में वही शक्ति थी। मैंने उसके छोटे से कण में भी उसकी शक्ति को महसूस किया है और वह उतनी ही प्रबल है जितनी कि मूल मूर्ति में थी। तब गुरु जी ने फैसला किया कि हर टुकड़े को एक नयी प्रतिमा में जोड़ देंगे। उन्होंने जो कविता लिखी है, वह उस नयी प्रतिमा तक पहुँचने का संकेत है जिसमें देवी मूर्ति का सबसे बड़ा टुकड़ा जुड़ा हुआ है, इसलिए वह भी शक्तिवाहिनी मूर्ति है।"

उसकी बात सुन कर ओरी ने कुछ देर सोचा, फिर बोला, “मुझे यह बात यामागुचि सान को बतानी पड़ेगी।"

उसने जापान में फोन किया और किसी से बात की, फिर थोड़ी तक फोन हाथ में लिए किसी और से बात करने की प्रतीक्षा की, लम्बे समय तक बात करने के बाद, आखिर में फोन बंद करके बोला, “यामागुचि सान कहते हैं कि अगर उस मूर्ति में शक्ति नहीं होगी तो वह तुम सबसे बदला लेंगे, तुम्हें छोड़ेंगे नहीं।"

त्री बोला, “तुम्हारे पास अन्वेषण-किरण की शक्ति है, तुम्हें मेरी बात पर विश्वास करने की आवश्यकता नहीं होगी, तुम खुद ही जाँच कर लेना कि उस नयी प्रतिमा में कितनी शक्ति है।"

“ठीक है, अब देर लगाने की आवश्यकता नहीं, बताओ हमें कहाँ जाना है?”

“पहले हमें गुरु जी की कविता के संकेत समझने होंगे और उसके लिए हमें इस क्षेत्र के नक्शे की आवश्यकता है। शायद मोबाइल पर जो नक्शा होता है, उससे काम हो जाये", त्री बोला।

“मेरे पास हिन्दुस्तान का बड़ा नक्शा है, जिसमें हर राज्य के सारे जिले और गाँवों को देख सकते हैं", ताकानोरी ने अपने बैग से एक टैबलेट निकाली, चालू की और उसमें आसाम का नक्शा निकाला, और उसे त्री की ओर बढ़ाते हुए बोला, “यहाँ पर मजूली के दक्षिण भाग का, जहाँ पर जून-मिन का वृद्धाश्रम है, उसका नक्शा है।"

आभा अभी तक चुपचाप उनकी बातें सुन रही थी। त्री ने उसे कहा, “गुरु जी की कविता की पहली पंक्ति दोबारा पढ़ो।"

“चन्द्र-वधु के चरण-कमल, तीन दशानन कोसे", आभा ने पढ़ा।

त्री सोचने लगा, फिर बोला, “शायद गुरु जी इसमें उस जगह की दूरी और दिशा की बात बता रहे हैं। दशानन यानि दस सिर वाला, यानि रावण, और तीन दशानन यानि तीस सिर वाला, और कोसे का मतलब कोस, तो शायद यह जगह गुरु जी के आश्रम से तीस कोस दूर है।"

आभा बोली, “यह कोस क्या होता है?”

त्री बोला, “पुराने ज़माने में दूरियाँ कोसों में मापी जाती थीं, तीस कोस का मतलब हुआ करीब साठ किलोमीटर। यानि यह जगह आश्रम से साठ किलोमीटर दूर है। पहला वाक्य है, चन्द्र-वधु के चरण-कमल, चन्द्र-वधु यानि चन्द्रमा की बहू, शायद वह चंद्रकाँति यानि माँ सरस्वती की बात कर रहे हैं? तारा माँ की मूर्ति के सबसे बड़े टुकड़े को माँ सरस्वती की मूर्ति में ही लगाया गया है। इसलिए मेरा ख्याल है कि गुरु जी, माँ सरस्वति के चरण-कमलों की बात कर रहे हैं। चरण-कमल किस दिशा में होते हैं?”

ओरी बोला, “सरस्वती? जापानी भाषा में उन्हें बेन्ज़ाइतेन कहते हैं, हम भी उन्हें ज्ञान और संगीत की देवी मानते हैं।"

“अगर देवी का मस्तक उत्तर में मानते है, तो चरण-कमल दक्षिण में हुए", आभा बोली।

“मजूली के दक्षिण में साठ किलोमीटर दूर क्या है?”, त्री ने नक्शे में देखा और बोला, “वहाँ पर काज़ीरंगा का आरक्षित सफारी-पार्क है। शायद हमने उस जगह को ठीक खोजा है, क्योंकि कविता की अंतिम पंक्ति में लाल बकरियों की बात है और काज़ीरंगा का मतलब भी लाल बकरी ही होता है।"

ओरी बोला, “तो क्या हमें पता चल गया कि वह कौन सी जगह है?”

त्री ने सिर हिला कर मना किया,  बोला, "अभी तो हमें केवल दिशा और क्षेत्र पता चले हैं, लेकिन काज़ीरंगा बहुत बड़ा है, और वह मूर्ति वहाँ पर किस जगह पर छिपी रखी है, अभी हम यह नहीं समझे। कविता की दूसरी पंक्ति पढ़ो।"

आभा बोली, “पद्मा की कमल-अँजुरी से बहता जल।”

त्री बोला, "पद्मा और कमल-अँजुरी तो लक्ष्मी की ओर संकेत लगते हैं। शायद वहाँ पर लखिमपुर या लखमीपुर जैसा कोई गाँव होगा?"

आभा बोली, “वह तो जँगली पशु-पक्षियों का संरक्षित क्षेत्र है, क्या वहाँ पर गाँव भी हैं?” 

त्री ने बताया, “पिछले कुछ दशकों में वहाँ पर बहुत सारे नये गाँव बस गये हैं, जिनकी वजह से जँगली जानवरों के लिए जगह कम हो गयी है। वहाँ कुछ जानवरों के चोर भी घूमते हैं जो उनकी तस्करी करते हैं। जैसे कि गैंडे के सींगों से चीन में पारम्परिक दवाईयाँ बनाते हैं, इसलिए उनकी बहुत माँग है और वहाँ के कुछ लोग गैंडों को मार कर उनके सींग काट कर उसकी तस्करी करते हैं।"

वह कुछ देर तक टैबलेट पर काज़ीरंगा के आसपास के क्षेत्र को ध्यान से देखता रहा, फिर बोला, “काज़ीरंगा के पश्चिम में लखमीपारा नाम का गाँव है, शायद गुरु जी की कविता उसकी बात कर रही है? हमें वहाँ जा कर पता करना चाहिये क्योंकि कविता की अगली पंक्तियों में विष्णु के शंख की और गुफाओं में शिव जी के डमरू की बातें हैं। शायद वहाँ के गाँव वाले इस बारे में कुछ बता सकते हैं।"

ओरी बोला, “फिर देर करने से क्या फायदा, हमें तुरंत उस जगह के लिए रवाना होना चाहिये।"

त्री ने कहा, “ज़रूरी नहीं कि हमें वह जगह आसानी से मिल जायेगी, छुपी जगहें खोजने में गुरु जी बहुत होशियार हैं, हो सकता है कि हमें वहाँ तीन-चार दिन लग जायें और किसी होटल में रहना पड़े।"

ओरी के माथे पर बल पड़ गये, बोला, “तुम जून-मिन के बारे में ऐसे बात करते हो मानो वह अभी जीवित हो, क्या उसने समाधी नहीं ली?”

त्री मुस्कराया, “मैं सालों तक गुरु जी से बहुत दूर रहा हूँ, लेकिन मैंने उन्हें हमेशा अपने साथ महसूस किया है। उनके समाधी लेने से भी इस बात में कुछ अंतर नहीं पड़ा, जब तक मैं हूँ, तब तक वह मेरे साथ हैं।"

उन्होंने दोपहर में बनपुराई घाट से काज़ीरंगा के पास देवपानी के लिए मोटरबोट ली और करीब चार बजे वहाँ पहुँचे। वहाँ एक लॉज में उनके लिए तीन कमरे बुक थे।

लॉज वाले सज्जन ने उन्हें बताया कि वहाँ से लखमीपारा जाने के लिए पगडँडी के रास्ते से पैदल जाना आसान है, बीस-पच्चीस मिनट में वहाँ पहुँच सकते हैं। उन्होंने कहा, "यह क्षेत्र काज़ीरंगा की परिधि के साथ लगा हुआ है, इसलिए यहाँ अक्सर जँगली जानवर भी आ जाते हैं, आप उस रास्ते पर ज़रा ध्यान से रहियेगा।"

त्री ने उनसे पूछा, “लखमीपारा के आसपास क्या विष्णु या कृष्ण या शंख से जुड़ा किसी जगह का नाम है?”

वह सज्जन कुछ देर तक सोचते रहे, फिर बोले, “लखमीपारा से काज़ीरंगा की ओर जायें तो वहाँ पर शंखासुर की पहाड़ी है। पुराणों में एक कहानी है कि एक दानव के पास एक महाशंख था, जिसकी वजह से सब उसे शंखासुर बुलाते थे। विष्णु ने उसे हरा कर वह महाशंख ले लिया और उस शंख को पंचजन्य का नाम दिया।"

ओरी पास में खड़ा उन्हें बातचीत करते हुए देख रहा था, उसने त्री से पूछा, “क्या पता चला?”

“लगता है कि हमारी किस्मत अच्छी है और हम सही जगह पर आये हैं। अभी कुछ देर में अँधेरा हो जायेगा इसलिए अभी शंखासुर पहाड़ी की ओर जाने का समय नहीं है, कल सुबह चलेंगे", त्री बोला, फिर उसने आभा से कहा, “कविता की वह शंख वाली पंक्ति फिर से पढ़ो।"

“विष्णु के शंख नाद से प्रज्जवलित अंबर के सप्त ऋषि।"

त्री सोचते हुए बोला, “इसमें आसमान पर सप्तऋषि मँडल की बात है, क्यों? उसका क्या अर्थ हुआ?"

ओरी को नहीं मालूम था कि सप्तऋषि क्या है, तो त्री ने उसे बताया, “यह एक कोन्स्टेलेशन यानि तारा-समूह है, पश्चिमी देशों में उसे कानिस मेजर या बिग बैरो कहते हैं।"

आभा बोली, "सप्तऋषि ध्रुव तारे की राह भी तो दिखाते हैं?"

ओरी ने पूछा, "कौन से तारे की?”

“ध्रव तारा, नोर्थ स्टार।"

“इस कविता में इस जगह पर ध्रुव तारे का क्या अर्थ बना?”

त्री ने सोचते हुए कहा, “शायद इसका अर्थ है कि जैसे सप्तऋषि आकाश में ध्रुव तारे की दिशा दिखाते हैं, वैसे ही शंखासुर की पहाड़ी हमें प्रतिमा की दिशा दिखायेगी।"

“नक्शे में देखते हैं", ओरी को अब इस खोज में आनन्द आने लगा था, उसने टेबलेट पर उस क्षेत्र के नक्शे को बड़ा किया और कुछ देर तक देखता रहा, फिर बोला, “यहाँ कहीं पर शंखासुर की पहाड़ी का नाम नहीं है।"

त्री बोला, “तुम चिंता नहीं करो, यह पारम्परिक नाम हैं, यह नाम अक्सर नक्शों पर नहीं दिखते क्योंकि हमारे आधुनिक नक्शे अंग्रेज़ों के समय बने थे और कई बार वह लोग हमारे पाराम्परिक नामों को महत्व नहीं देते थे। लेकिन यह जानकारी हमें गाँव वालों से मिल जायेगी।" 

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बुधवार, अगस्त 19, 2026

ब्लॉग या सबस्टैक

हिंदी के पहले ब्लॉग 2004-05 के आसपास बनने शुरु हुए थे। मैंने यह अपना ब्लॉग 2005 में गूगल के ब्लॉगर पर बनाया था। पिछले इक्कीस सालों में अपनी बात को लोगों तक पहुँचाने वाले माध्यमों में बहुत से परिवर्तन आये हैं। गूगल के अतिरिक्त, ब्लॉग बनाने के अन्य बहुत से प्लेटफॉर्म आये और गये, उनमें से कुछ जैसे कि वर्डप्रैस आज भी जीवित हैं। लेकिन स्थिति बदलती रहती है, जब भी फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम जैसे नये प्लेटफॉर्म निकलते हैं तो कुछ ब्लॉग लिखने वाले उन पर लिखने लगते हैं और अपने पुराने ब्लॉगों को बंद कर देते हैं, कुछ साथ-साथ ब्लाग को भी चालू रखते हैं।

कुछ वर्ष पहले सबस्टैक नाम का एक नया प्लेटफॉर्म निकला तो बहुत से ब्लॉग वहाँ चले गये हैं। कुछ दिन पहले किसी ने मेरी राय पूछी कि सामान्य ब्लॉग बनाना चाहिये या सबस्टैक वाला ब्लॉग, तो मैंने इस विषय पर सोचा। साथ में इस बात पर भी विचार किया कि इक्कीस साल के बाद भी मैं इस ब्लॉग पर क्यों लिखता रहता हूँ?

इस आलेख में ब्लॉग बनाम सबस्टैक, और आज की दुनिया में जब अपनी बात लोगों तक पहुँचाने के लिए इतने सारे माध्यम है, ब्लॉग लिखने का महत्व, जैसी बातों के बारे में अपनी सोच और अनुभव साझा करना चाहता हूँ।

यह सबस्टैक क्या है?

सबस्टैक के पाठकों के लिए दो चेहरे हैं - उसका प्रमुख चेहरा है इलैक्ट्रोनिक न्यूजलैटर का, यानि अगर आप किसी सबस्टैक के सदस्य बनेंगे तो उसके आलेख आप के ईमेल से आप तक पहुँचेंगे। उसका दूसरा चेहरा है कि आप उन्हीं आलेखों को ब्लॉग की तरह भी इंटरनैट पर या सबस्टैक एप्प पर पढ़ सकते हैं।

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भारत से निकलने वाले लोकप्रिय सबस्टैक हैं रोहण वैंकट का इंडिया इनसाईड-आऊट, प्रणय कोटास्थाने का एन्टीसिपेटिन्ग द अनइनटैंडिड, महिमा वशिष्ठ का वूमैंनिन्ग इन इंडिया, द वायर का इंडिया केबल और श्रेयास शैंदे का इंडियालॉग

जहाँ तक मुझे मालूम है अभी तक दुनिया मे हिंदी में कोई सबस्टैक नहीं चल रहा है। सदस्यता वाले सबस्टैक भारत में रह कर चलाना कठिन है क्योंकि उसके पैसे केवल स्ट्राईप पैयमैंट सिस्टम से मिलते हैं जिससे जुड़ने के लिए भारत में आप को रजिस्टर्ड बिज़नैस होना आवश्यक है, इसलिए आम व्यक्ति जो अपना व्यक्तिगत सबस्टैक बनाना चाहते हैं वह उसके माध्यम से कमा नहीं सकते। मैंने कुछ भारतीय सबस्टैक में देखा है कि वह आप से सदस्यता नहीं माँगते, लेकिन आलेखों के अंत में लिंक डाल देते हैं "हमारी सहायता कीजिये और हमे चाय या कॉफी पिलाईये" और वहाँ आप से पैसे देने के लिए कहते हैं। ऐसी ही एक लिंक पर क्लिक किया तो उन्होंने मुझसे कॉफी के लिए 5 यूरो यानि पाँच सौ रुपये देने के लिए कहा।

यूरोप के कुछ लोकप्रिय सबस्टैकों के कुछ उदाहरण हैं - तकनीकी के बारे में हॉलैंड से "द प्रेगमैटिक इंजीनियर" जिसके लाखों सदस्य हैं, साँस्कृतिक विषय पर इटली से "वाले तूत्तो" जिसके ढाई लाख सदस्य हैं, मैनेजमैंट के बारे में इटली से "रिफैक्टरिन्ग" जिसके डेढ़ लाख सदस्य हैं, और फाईनैन्स के विषय पर इंग्लैंड से "नेट इंडरस्ट"।

अमरीका के कुछ लोकप्रिय सबस्टैकों के उदाहरण हैं - अमरीकी राजनीति पर "लैटर्स फ्रोम एन अमेरिकन" और "द बुलवार्क", समाचारों पर "द फ्री प्रैस", नीतियों और आर्थिक विषयों पर "स्लो बोरिन्ग", और समाचारों पर व्यंग करने वाला, "द बोरोविट्ज़ रिपोर्ट"।

ब्लॉग या सबस्टैक पर लिखने के फायदे

मेरे विचार में इनका सबसे बड़ा फायदा है कि दुनिया के किसी भी कोने में लोग आप को पढ़ सकते हैं।

दूसरा फायदा है कि यह बने-बनाये प्लेटफॉर्म हैं, इसमें फॉन्ट, लेआऊट, तस्वीर लगाना आदि बहुत आसान है, इसे आप एक दिन में बिना किसी की सहायता के सीख सकते हैं।

इसका तीसरा फायदा है कि जब तक वह प्लेटफॉर्म रहेगा, आप का लिखा सुरक्षित है, जैसे कि मैं अपने बीस साल पहले लिखे आलेखों को आसानी से देख-खोज सकता हूँ, अगर उनमें कुछ नया जोड़ना चाहूँ या बदलना चाहूँ तो वह सब कर सकता हूँ। चूँकि कम्पनियाँ फेल हो जाती हैं, उनके प्लेटफॉर्म कभी भी बंद हो सकते हैं, इसलिए आप अपने ब्लॉग के आरकाइव को डाउनलोड करके उसकी एक कॉपी अपने पास सम्भाल कर भी रख सकते हैं।

इसका चौथा फायदा है कि आप अपने पाठकों की टिप्पणियाँ तुरंत देख सकते हैं और उनसे विचारों का आदान-प्रदान भी कर सकते हैं। एक ज़माने में लोग कम्प्यूटर से अधिक पढ़ते थे, तब टिप्पणियाँ अधिक मिलती थीं, आजकल लोग ट्रेन या बस में बैठे-बैठे मोबाइल पर ब्लॉग पढ़ते हैं इसलिए टिप्पणियाँ मिलना बहुत कम हो गया है।

ब्लॉगर पर बहुत सी एप्प हैं जिनकी सहायता से आप आसानी से जान सकते हैं कि कितने लोगों ने आप का आलेख पढ़ा है, वह कौन से देशों से हैं, महीने में कितने लोग आप के ब्लॉग को पढ़ते हैं। जैसे कि मेरे इस ब्लॉग को आजकल हर महीने बारह-पंद्रह हज़ार लोग पढ़ते हैं, इसके कुछ आलेख बहुत लोकप्रिय हैं, उन्हें बीस-पच्चीस हज़ार लोग पढ़ चुके हैं।

अगर आप चाहें तो ब्लॉग से कमा भी सकते हैं। ब्लॉगर आप को गूगल-एड डालने का मौका देता है, अन्य प्लेटफॉर्म वाले यह मौका नहीं देते लेकिन आप खुद अपने स्पॉन्सर या विज्ञापन खोज सकते हैं। जिन्होंने गूगल विज्ञापनों से कमाने की कोशिश की है, वह कहते हैं कि यह आसान नहीं है और कई बार गूगल अपने विज्ञापकों की वजह से आप से अपने लिखे को बदलने या हटाने के लिए कह सकता है। लेकिन गूगल-एड में कोई जबरदस्ती नहीं है, मैं ब्लॉग से कमाना नहीं चाहता, इसलिए मैं इसमें कोई व्यवसायिक आलेख या विज्ञापन नहीं स्वीकारता।

हो सकता है कि अपने ब्लॉग पर भी आप "मुझे चाय पिलाईये" जैसी लिंक डाल सकते हैं जिसके लिए आप यू.पी.आई. के किसी सिस्टम से पाठकों से कुछ पैसे देने के लिए कह सकते हैं। मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं है, न ही मैं जानता हूँ कि यह भारतीय कानून के हिसाब से कानूनी है या नहीं। इसे करने से पहले वकील आदि से सलाह लीजिये।

मेरा अनुभव है कि ब्लॉग या सबस्टैक से पैसा कमाना कठिन है। कुछ प्रसिद्ध सबस्टैक जिनके नाम ऊपर दिये हैं वह लाखों डालर कमाते हैं लेकिन वहाँ हम लाखों में से एक की बात कर रहे हैं, वह भी उसकी जो किसी क्षेत्र में बहुत ज्ञान रखता है और बहुत मेहनत करता है, हर हफ्ते नयी जानकारी ले कर आ रहा है।   

ब्लॉग और सबस्टैक में अंतर

कुछ अंतरों के बारे में ऊपर बात हुई है, जैसे कि ब्लॉग को उसकी वेबसाइट पर पढ़ते हैं जबकि सबस्टैक आप की ईमेल में न्यूजलैटर की तरह से आ सकता है। 

एक अन्य बड़ा अंतर है कि सबस्टैक का ले-आऊट (शब्द संयोजन) बदला नहीं जा सकता, जबकि ब्लॉग में आप रंग, तस्वीरें, ले-आऊट आदि सरलता से बदल सकते हैं।

ब्लॉगर बिल्कुल फ्री होता है, आप जितने चाहें, अलग-अलग भाषाओं में ब्लॉग बना सकते हैं। जबकि सबस्टैक में अगर आप सदस्यता की फीस नहीं लेते तो वह भी फ्री है, लेकिन अगर आप सदस्यता फीस लेते हैं तो आप को उसकी कमीशन देनी होती है। बाकी ब्लॉग प्लेटफॉर्म, जैसे कि स्कावयरस्पेस, को वार्षिक फीस देनी पड़ती है।

ब्लॉगर और सबस्टैक दोनों पर आप के आलेखों को, पाठक अपनी भाषा में अनुवादित देख और पढ़ सकते हैं। यानि आप के हिंदी ब्लॉग को फ्राँसिसी या स्पैनिश बोलने वाले भी पढ़ सकते हैं।

अगर आप ऐसे विषयों के बारे में लिखेंगे जिसके बारे में दुनिया जानना चाहती है तो लोग आप को किसी भी भाषा में पढ़ेंगे। पर अधिक पाठक खोजना जरूरी नहीं है, अगर ब्लॉग आप की आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम है, तो कौन-कितने वाली बातें भूल जाईये, जिसमें आप के मन को संतोष मिलता है, वह लिखिये। मेरी अपनी सोच यही रही है।

ब्लॉगर गूगल का है, अगर एक बार गूगल को विश्वास हो जाये कि आप बिना कहीं से नकल किये, अपनी जानकारी से और अच्छी भाषा में अच्छी तरह से लिखते हैं, तो वह पाठकों को आप के ब्लॉग में भेजता है, जबकि सबस्टैक को यह मदद नहीं मिलती। ब्लॉग और सबस्टैक, दोनों फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि की सहायता से भी अपने पाठक खोज सकते हैं।   

अंत में

हिंदी ब्लॉग जगत को जानने और पढ़ने के लिए आप पाँच लिंको का आनन्द, हिंदी ब्लाग जगत, ब्लाग4वार्ता, ब्लोगोदय, जैसे ब्लॉग प्लेटफार्म से तरह-तरह के हिंदी ब्लॉगों को देख सकते हैं। 

दस-पंद्रह साल पहले तक हिंदी के हज़ारों ब्लॉग होते थे, आज उनकी संख्या बहुत कम हो गयी है, बहुत से लोग अन्य सोशल मीडिया, विशेषकर फेसबुक के माध्यम से अपने लेखन को दूसरो तक पहुँचाते हैं। फेसबुक पर "हिंदी ब्लाग" खोजेंगे तो वहाँ ऐसे पन्ने मिलेंगे जहाँ पर आप अपने हिंदी लेखन के बारे में समाचार या विज्ञापन दे सकते हैं। 

मेरे लिए मेरा ब्लॉग मेरी डायरी है, मैं इसे सबसे पहले अपने संतोष के लिए लिखता हूँ। पहले के मुकाबले में आजकल पाठकों की टिप्पणियाँ मिलना बहुत कम हो गया है, लेकिन मैं देख सकता हूँ कि हर रोज़ पाँच सौ से ले कर एक हज़ार लोग इस ब्लॉग पर कुछ न कुछ पढ़ने आते हैं, मेरे लिए यही संतोष की बात है। कुछ महीने पहले मैंने अपने नये फैंतासी उपन्यास को भी अपने ब्लॉग से प्रकाशित किया है, इस तरह मुझे नये प्रयोग करना अच्छा लगता है।

अगर आप के मन में लिखने की और आत्म-अभिव्यक्ति की इच्छा है तो मेरी राय है कि अपना ब्लॉग बनाईये, इसके लिए आप को किसी अन्य पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा। आप के पास कम्प्यूटर या लेपटाप हो तो यह आसान होगा, मोबाइल से ब्लॉग लिखने में शायद कुछ मुश्किलें हों। एक बार लेखन का अभ्यास बढ़ेगा तो कल आप पत्रिकाओं और प्रकाशकों के लिए भी लिख सकते हैं।

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सोमवार, अगस्त 17, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 23

अब तक की कहानी:  ताकानोरी से बचने के लिए जामुन बाबा ने समाधी ले ली। ओरी उनकी एक मूर्ति चाहता है। बाबा की मदद करने, त्रिनेत्र पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चों और आभा के साथ मजूली आया है। ताकानोरी आभा, वसंत और तृप्ति कर अपहरण कर लेता है। त्री उनके पीछे गार्गी के साथ नारायणपुर आता है और अदृश्य हो कर ताकानोरी के घर में घुस कर आभा और बच्चों से बात करता है। ओरी को जब यह समझ आती है तो वह आभा और बच्चों से पूछताछ करता है लेकिन उसके पैर में बिच्छु काट लेता है ... इसके आगे पढ़िये ... 


 

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अध्याय 23

नारायणपुर, असम, 5 मार्च 2026, शाम 

ताकानोरी के घर से जाने से पहले, त्री ने बाहर से उसका पूरा चक्कर लगाया। देखा कि रसोई का एक दरवाज़ा पीछे भी है जो खुला हुआ है, यानि ज़रूरत पड़ने पर वह वहाँ से भी घर में घुस सकता है।

घर की पिछली चारदीवारी के बाहर उसे एक कटहल का पेड़ देखा जिसकी कुछ शाखाएँ घर के भीतर तक आ रही थीं। वह उसकी एक शाखा पर चढ़ कर बाहर आ गया और वहाँ से नामघर के तालाब के पास लौट आया जहाँ गार्गी उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। उसे कुछ भी कहने-बताने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि सारा समय गार्गी उसके दिमाग से जुड़ी हुई थी और उसने उसकी हर बात सुनी थी।

उसने त्री को बताया, “दादा, जब तुम वहाँ से निकल आये तो ताकानोरी उनके कमरे में गया और वह आभा दीदी, वसंत और तृप्ति को ऊपर ले गया है, और इस समय उनसे बातें कर रहा है।" उसने उनकी बातचीत के बारे में बताया और जब कहा कि कैसे बिच्छु ने ताकानोरी के पैर को काटा तो वह दोनों भी बहुत हँसे।

वह बोली, “वह कहता है कि जापान में यामागुचि सान ने उसे केवल वह मूर्ति लाने के लिए कहा है। यानि अगर उन्हें वह मिल जायेगी तो वह गुरु जी का और हमारा पीछा छोड़ देंगे। वह कौन सी मूर्ति है और वह कैसे पहचानेगा कि वो वही असली मूर्ति है? अगर हम उसे गुरु जी की मूर्ति की जगह कोई और मूर्ति दे दें तो?”

त्री बोला, “आज हमें पता चला है कि ताकानोरी देखने में पहलवान है, वह आमने-सामने की लड़ाई में और तलवारबाज़ी में अवश्य निपुण होगा, लेकिन उसकी कुछ कमज़ोरियाँ भी हैं। उसके पहरेदार यहाँ के स्थानीय लोग हैं, जिन्हें हम आसानी से उल्लू बना सकते हैं। और अगर हम सब मिल कर उस पर हमला करें तो वह हमारा सामना नहीं कर सकता, हम उसे आसानी से हरा सकते हैं।"

गार्गी बोली, “दादा, अगर ऐसा है तो हम उससे क्यों डर रहे हैं, उसे यहाँ से भगा क्यों नहीं देते?”

“इसके दो कारण हैं। पहला कि वह लोग गुरु जी का कई दशकों से पीछा कर रहे हैं, वह उस मूर्ति को किसी भी कीमत पर पाना चाहते हैं। अगर ताकानोरी यहाँ से खाली हाथ लौटेगा, तो वह उसकी जगह किसी और को भेज देंगे, यह बात यहीं पर समाप्त नहीं होगी। दूसरी बात है कि ताकानोरी मुझे अच्छा व्यक्ति लगता है और वह हमारा शक्तिवान भाई भी है। नियति ने उसे याकूज़ा-गुँडा बना दिया है, क्योंकि दुर्भाग्य से वह यामागुचि के चँगुल में आ गया था, लेकिन वह दिल का बुरा नहीं है। जापानी यौद्धाओं के लिए आत्मसम्मान सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है, उसे हरा कर खाली हाथ वापस भेजना सही नहीं होगा", त्री ने समझाया।

“तो हम क्या करेंगे?”

“हमें कोई ऐसा उपाय खोजना है कि साँप भी मर जाये और लाठी भी नहीं टूटे।"

“यानि कि गुरु जी की मूर्ति भी बच जाये और ताकानोरी हमारा पीछा छोड कर जापान लौट जाये?”

"यही नहीं, हमें यह भी करना है कि यामागुचि सान सोचे कि उसे सफलता मिली है और वह गुरु जी का पीछा छोड़ दे। चलो, अब हम मोरनाइगुड़ी वापस चलते हैं। तुम रंगनाथ को सूचित कर दो कि यहाँ सब ठीक है और हम वापस आ रहे हैं।"

वापस लौटते समय, रास्ते भर त्री सोचता रहा कि आगे क्या और कैसे करे। मोरनाइगुड़ी पहुँच कर उसने सबको पास बिठा कर अपना प्लैन बताया और उनकी राय पूछी। कुछ देर तक उनमें बहस हुई फिर सब मान गये।

त्री ने तुरंत ओरी को फोन किया, बोला, “मैं त्रिनेत्र बोल रहा हूँ, आज शाम को आप से मिलना चाहता हूँ, क्या पाँच बजे का समय आप के लिए ठीक रहेगा?”

ओरी को उससे यह अपेक्षा नहीं थी, वह कुछ क्षण तक बोल नहीं पाया, फिर कहा, “हाँ, पाँच बजे मैं आप की प्रतीक्षा करूँगा।"

शाम को फिर से उसके साथ गार्गी भी नारायणपुर गयी, और सुबह की तरह, वह नामघर के तालाब के पास बैठ गयी। उसने तुरंत वसंत से सम्पर्क किया और बताया कि वह लोग वहाँ आ गये हैं और बाहर हैं।

त्री ताकानोरी के घर गया और चौकीदार से बोला कि उसे उनके जापानी साहब से मिलना है। चौकीदार को मालूम था कि वह आयेगा, वह उसे तुरंत ओरी के कमरे में ले गया। ओरी ने उसे बैठाया और चौकीदार से चाय भिजवाने के लिए कहा।

थोड़ी देर तक ओरी उसे चुपचाप देखता रहा। दोनों करीब तीस साल के थे, और उनकी कुछ बातें मिलती थीं जैसे कि गम्भीर चेहरे, छोटे कटे सिर के बाल और लम्बे कद। ओरी उससे करीब दो इँच अधिक लम्बा है, उसका शरीर अधिक भारी है और वह गुदवाये टैटू से भरा हुआ है। त्री श्याम वर्ण का है, और ओरी गोरा।

चौकीदार हरी चाय ले कर आया तो ओरी ने उससे केतली ले ली और उसे भेज दिया, फिर उसे प्यालों में उड़ेला और एक प्याला उसकी ओर बढ़ाया। त्री ने गुरु जी के साथ कई बार हरी चाय पी थी, इसलिए वह उसके लिए नयी नहीं थी, हालाँकि उसे सामान्य दूध वाली भारतीय चाय ज्यादा अच्छी लगती है। दोनों ने चुपचाप चाय पी, फिर मुँह को नेपकिन से पोंछ कर ओरी बोला, “मैं ओकानो गैन्ज़ो ताकानोरी, मेरे घर में आप का स्वागत है।"

“मैं त्रिनेत्र, स्वागत के लिए धन्यवाद। अब हम काम की बात कर सकते हैं?”

ओरी के चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कान कौंधी, बोला, “मैं जून-मिन की विशेष मूर्ति की खोज में आया हूँ।"

त्री ने सिर हिला कर हामी भरी, बोला, “मुझे मालूम है, और हम उसकी बात भी करेंगे, लेकिन उससे पहले मैं कुछ अन्य बातें साफ करना चाहता हूँ।"

ओरी ने धीरे से सिर हिलाया, कुछ नहीं बोला।

त्री बोला, “सबसे पहली बात है कि हमें आप से किसी तरह का डर नहीं है, अगर मैं चाहता तो आप से मिले बिना यहाँ से आभा, वसंत और तृप्ति को ले गया होता, इसलिए मैं आप के पास किसी डर की वजह से नहीं आया।"

ओरी मुस्कराया बोला, “मैं भिन्न तरह के अस्त्र-शस्त्रों की लड़ाई में माहिर हूँ, अगर हम सीधा लड़ें तो मैं दो मिनट में आप को मार सकता हूँ। लेकिन मैं जानता हूँ कि आप के पास विभिन्न शक्तियों वाले यौद्धा हैं, जिनके सामने मेरी लड़ाई की क्षमता का कुछ महत्व नहीं है। उन्हीं के कारण आज सुबह से मेरे पैर में सूजन और दर्द थे, जो अभी भी पूरी तरह से ठीक नहीं हुए हैं। लेकिन मेरे पास एक और छुपा हुआ अस्त्र है, कि मुझे अपने जीने-मरने की परवाह नहीं है, मैं चाहूँ तो इस पूरे घर को आग लगवा सकता हूँ जिसमें मेरे साथ आप और इस घर में बँधक आप के साथी, सब मर सकते हैं और आप की शक्तियाँ आप को बचा नहीं पायेंगी।"

त्री भी मुस्कराया, बोला, “आप को पक्का यकीन है कि आप इस घर में आग लगवा पायेंगे?”

“कौन रोकेगा मुझे?”

त्री बोला, “अच्छा तो आप अपने चौकीदार को बुला कर दिखाईये।"

गार्गी जो उनकी बातें सुन रही थी, उसने तुरंत ताकानोरी के दिमाग को अजगर-पाश में बाँध दिया। ओरी को लगा मानो उसके शरीर को लकवा मार गया हो, न  उसके मुँह से आवाज़ निकल रही थी, न ही वह हाथ या पाँव हिला पा रहा था। एक-दो लम्बे मिनट ऐसे ही गुज़रे, उसके बाद गार्गी ने अजगर-पाश को खोल दिया।

त्री मुस्करा कर बोला, “आप के घर में आ कर, आप के साथ इस तरह की हरकत करने के लिए मुझे क्षमा कीजिये, लेकिन अब आप समझ गये होंगे कि मैं किसी डर की वजह से आप से बात करने नहीं आया। मैं आप को शक्तिवाहिनी माँ तारा की देवी मूर्ति तक ले जाने के लिए तैयार हूँ, लेकिन उससे पहले मुझे आप का एक वचन चाहिये। अगर आप मेरी इस शर्त को मानने के लिए तैयार हैं तब हम आगे बात करेंगे, वरना मैं अभी यहाँ से चला जाऊँगा।"

ओरी का चेहरा फीका पड़ गया, बोला, “कैसा वचन?”

“कि उस मूर्ति को पाने के बाद, आप और आप के बॉस यामागुचि सान, मेरे गुरु जी जून-मिन और हमें भूल जायेंगे और दोबारा उनका या हमारा पीछा नहीं करेंगे।"

ओरी ने एक क्षण सोचा, बोला, “मैं स्वयं क्या करूँगा उसका मैं आप को वचन दे सकता हूँ, लेकिन यामागुचि सान भविष्य में क्या करेंगे, यह वचन मैं कैसे दे सकता हूँ?”

“अगर आप मुझे यह वचन नहीं दे सकते तो मैं आप को वह प्रतिमा भी नहीं दे सकता।"

ओरी थोड़ी देर तक सोचता रहा, फिर बोला, “मैं वचन दे सकता हूँ कि शक्तिवाहिनी देवी प्रतिमा को यामागुचि सान को दे कर मैं उनसे कहूँगा कि जून-मिन अब नहीं है, वह ज़मीन के गर्भ में दफन हो चुका है। यह जान कर वह उसका पीछा नहीं करेगा। मैं यह वचन भी दे सकता हूँ कि अगर यामागुचि सान के गैंग ने दोबारा तुम लोगों पर हमला करने की कोई कोशिश की, तो मैं तुम्हारे साथ उनसे लड़ूँगा।"

त्री ने सोचा, बोला, “ठीक है, मुझे तुम्हारा यह वचन स्वीकार है। अब तुम आभा, वसंत और तृप्ति को जाने दो। मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि तुम्हें शक्तिवाहिनी देवी प्रतिमा तक ले कर जाऊँगा।"

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गुरुवार, अगस्त 13, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 22

अब तक की कहानी:  ताकानोरी जामुन बाबा की मूर्ति चाहता है। उससे बचने के लिए बाबा समाधी ले लेते हैं। बाबा का शिष्य त्रिनेत्र पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चों और आभा के साथ मजूली पहुँचा है। ताकानोरी आभा, वसंत और तृप्ति को उठा कर नारायणपुर ले जाता है और उन तीनों को एक कमरे में बंद कर देता है। त्री उनके पीछे गार्गी के साथ नारायणपुर आता है और अदृश्य हो कर ताकानोरी के घर में घुस कर आभा और बच्चों से बात करता है ... इसके आगे पढ़िये ... 

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  अध्याय 22

नारायणपुर, असम, 5 मार्च 2026

 त्री कमरे से निकल रहा था जब उसे सीढ़ियों से किसी के आने की आहट हुई। गार्गी ने तुरंत उसकी शक्ति-लहर को ढक दिया। उसने केवल दरवाजे को बंद किया, उसकी कुँडी बंद नहीं की और सीढ़ियों के नीचे खड़ा हो गया।

ताकानोरी सीढ़ियों से नीचे आ रहा था। हालाँकि त्री ने बिल्कुल भी आवाज़ नहीं की थी, लेकिन ताकानोरी की श्रवण शक्ति अच्छी थी, उसे लगा कि नीचे कोई है, लेकिन वहाँ कोई नहीं दिखा। वह त्री के साथ से गुज़रा लेकिन उसे नहीं देख पाया। जब उसने आभा के कमरे का कुँडा बाहर से खुला देखा तो वह चौंक गया, उसने सोचा कि कोई उसके बंदियों को निकाल कर ले गया है। उसने तुरंत अपनी अन्वेषण-किरण से जाँचा और देखा कि कमरे के तीन लोगों की शक्ति-लहर थी तो वह कुछ शाँत हुआ।

वह द्वार की ओर आया तो दोनों पहरेदारों ने तुरंत ताश के पत्तों को समेट कर जेब में डाल लिया और खड़े हो गये।

"यहाँ पर कोई बाहर से आया था?”, उसने पूछा।

“नहीं सर", दोनों पहरेदारों ने एक साथ उत्तर दिया।

उसने अपनी पीठ से बँधी तलवार को म्यान से निकाला और इशारे से दोनों पहरेदारों को पास बुलाया, और आभा के कमरे की ओर ले गया, बोला, “यह दरवाज़ा बंद क्यों नहीं है?”

एक पहरेदार हकलाते हुए बोला, “सर, मैं .. मैं.. हमने यह.. बंद क..क..किया …”

“तुमने तो कहा कि कोई भीतर नहीं आया, तो क्या यह कुँडा अपने आप खुल गया?”

दोनों आदमी चुप हो गये।

"इसे तुरंत बंद करो", कह कर वह द्वार के पास आया और वहाँ रखी कुर्सी पर बैठ गया। कुछ क्षण बाद, कुँडा बंद करके जब दोनों पहरेदार लौटे तो वह बोला, “तुम अपने बायें हाथों को यहाँ मेज़ पर रखो। यह तुम्हारी पहली गलती है, इसलिए आज तुम्हें छोटी सजा दूँगा। लेकिन अगर ऐसी गलती दोबारा की, तो पूरी उँगली काट दूँगा, समझे?”

उसने हाथ में तलवार ऊपर उठायी तो वह दोनों समझ गये कि उन्हें कुछ गम्भीर सजा मिलने वाली है।

दोनों आदमी काँप रहे थे, लेकिन उन्होंने अपने हाथ मेज़ पर नहीं रखे। ताकानोरी उन्हें एक मिनट तक चुपचाप देखता रहा और फिर उन्हें आँखों से मुख्य द्वार से बाहर जाने का इशारा किया। दोनों आदमी चुपचाप बाहर चले गये, तब ताकानोरी ने लम्बी साँस ली और धीरे से सिर हिलाया, बोला, “यहाँ के गुँडे तो बहुत डरपोक हैं, यह जाने बिना कि सज़ा क्या होगी, पत्ते की तरह काँप रहे थे।"

उन आदमियों ने बाहर जाते समय दरवाज़ा खुला छोड़ दिया था, उनके पीछे से त्री भी बाहर निकल गया। जब वह उसके सामने से गुज़रा तो शायद एक क्षण के लिए ताकानोरी को हवा में कुछ कम्पन सा महसूस हुआ, बोला, “कौन है? कौन जा रहा है?”

त्री ने उसे कुछ उत्तर नहीं दिया लेकिन वह वहाँ से गया नहीं, दरवाज़े के बाहर, झाड़ियों के पास उनमें घुलमिल कर खड़ा हो गया। वह देखना चाहता है कि ताकानोरी अब क्या करेगा।

ताकानोरी उठ कर दरवाज़े तक आया। उसके दोनों पहरेदार, गेट के चौकीदारों को अपनी बात बता रहे थे, उसे दरवाज़े पर खड़ा देखा तो चुप हो गये और गेट खोल कर बाहर चले गये। ओरी ने आसपास ध्यान से देखा लेकिन त्री को नहीं देख पाया। गेट से प्रौढ़ वाला चौकीदार उठ कर उसके पास आया, बोला, “साहब जी, क्या हुआ? किसे खोज रहे हैं? क्या कोई भाग गया है?”

ओरी ने सिर हिला कर मना किया, कुछ बोला नहीं, फिर भीतर आ कर दरवाज़े को बंद कर दिया। उसने सोचा कि अब उसे दो-तीन नये पहरेदार खोजने पड़ेंगे, लेकिन वह इन लोगों पर पूरा भरोसा नहीं कर सकता। यह लोग सामान्य गुँडे हैं, इन्हें ठीक से काम करना नहीं आता और यह डरपोक हैं। जब तक उसे सही व्यक्ति नहीं मिलेंगे, तब तक उसे खुद ही अपने घर की सारी पहरेदारी देखनी पड़ेगी।

फिर उसने आभा के कमरे का दरवाज़ा खोला और उन तीनों को बुला कर, उन्हें ऊपर अपने कमरे में ले कर गया।
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए आभा ने पूछा, “क्या हुआ? तुम कुछ परेशान से लग रहे हो?”

ताकानोरी को आश्चर्य हुआ कि वह उसकी परेशानी को भाँप गयी है, हालाँकि वह अपने चेहरे और आवाज़ को निर्विकार रखने में बहुत कुशल है। उसके मन की परेशानी उसके चेहरे से कोई समझ नहीं पाता। उस समय वह कुछ नहीं बोला।

अपने कमरे में जा कर उसने उन्हें बैठने के लिए कहा, फिर बोला, “आज त्रिनेत्र तुमसे मिलने आया था और अभी कुछ देर पहले ही यहाँ से गया है।"

आभा हँसी, बोली, “अरे, हमें तो पता ही नहीं चला कि वह कब आया और कब गया, क्या तुमने उसे देखा?”

वसंत और तृप्ति कुछ नहीं बोले।

“तुम झूठ बोल रही हो", उसने कठोर स्वर में कहा, फिर वसंत से पूछा, “वह यहाँ कैसे घुसा? क्या उसके पास अदृष्य होने की शक्ति है?”

वसंत ने भोला चेहरा बना कर कहा, “त्री दादा? कहाँ हैं वह?”

“ठीक है, मैं अभी तुम्हें दिखाता हूँ", उसने अपनी आँखें बंद कीं और अपनी शक्ति को जगा कर, उसे तृप्ति के मस्तिष्क में घुसा दिया।

छोटी सी तृप्ति चीख उठी। उसने उसे भीतर घुसने से रोका और अपने मस्तिष्क के पटों को बंद करने की कोशिश की। हालाँकि ओरी की शक्ति अधिक तीव्र नहीं है, लेकिन उस बच्ची के लिए वह काफ़ी थी। तृप्ति दर्द से छटपटाई तो मेज़ के पास रखी ओरी की तलवार, म्यान से निकल कर, हवा में ऊपर उठी और फिर छपाक से उसके पलंग के बीच में जा कर ऐसे गड़ी कि अगर उस समय वहाँ कोई  लेटा होता तो अवश्य मर जाता।

आभा ने बच्ची की यातना देखी तो वह भी चिल्लाई, “तृप्ति को छोड़ो, बच्ची के साथ ऐसा मत करो।"

लेकिन तब तक ओरी ने तृप्ति के मानस-पटल में त्रिनेत्र के कमरे में घुसने और बच्ची को गले लगाने की छवि को देख लिया था। वह  जानना चाहता है कि त्रिनेत्र वहाँ कैसे आया और उसने उन्हें क्या कहा है?

तृप्ति, वसंत और आभा तीनों चिल्ला रहे थे, लेकिन ओरी अपनी जगह पर स्थिर बैठा ध्यान में लीन था और तृप्ति के मानस-पटल की स्मृतियों को जाँच रहा था।

अचानक कमरे के कोनों से, दरवाज़े के नीचे से, बाहर बालकनी से, कीड़े, मकोड़े, बिच्छु, आदि निकल कर बाहर आने लगे। हालाँकि वह कमरा पहली मज़िल पर है, फिर भी आभा की शक्ति की पुकार इतनी प्रबल थी कि बहुत सारे जीव-जन्तु बाहर बाग से और घर के निचले भाग से निकल कर दीवारों और सीढ़ियों से ऊपर आ रहे थे। बालकनी से एक हरे रंग का साँप भी कमरे में घुसा। उन सब जीव-जन्तुओं को देख कर वह तीनों चुप हो गये लेकिन ओरी का ध्यान नहीं टूटा। उसकी तंद्रा तब टूटी जब एक बिच्छु ने उसके पैर पर काटा।

तब उसने आँखें खोलीं और अपने आसपास फर्श पर घूमते उन  जीव-जन्तुओं को देखा तो वह कूद कर अपने बिस्तर पर चढ़ गया। तब उसे बिस्तर के बीच में गड़ी हुई अपनी तलवार दिखाई दी, तो वह और घबराया। उसके चेहरे के डरे हुए भाव को देख कर तृप्ति हँसने लगी। उसकी हँसी से आभा की पीड़ा-तंद्रा टूटी और वह जीव-जन्तु जहाँ थे वहीं रुक गये, फिर धीरे-धीरे जिधर से आये थे, उसी ओर लौटने लगे।

तब तक ओरी का पैर जहाँ बिच्छु ने काटा था, वह लाल हो कर फूलने लगा।

“किसने काटा मेरे पैर पर? क्या मुझे जहरीले साँप ने काटा है?”, उसने घबरा कर पूछा।

वसंत बोला, “नहीं, तुम्हें साँप ने नहीं, छोटे से बिच्छु ने काटा है। वैसे भी वह हरा साँप जहरीला नहीं था, वह तो केवल चूहे खाता है।"

“पर यह सूज रहा है, देखो कितना फूल गया है", ओरी ने अपने पैर की ओर इशारा किया।

आभा बोली, “इस पैर को अच्छी तरह से साबुन और ठंडे पानी से धो लो। कुछ घंटों में यह ठीक हो जायेगा, और दर्द अधिक हो तो ब्रूफैन की गोली ले लो।"

लंगड़ाता हुआ ओरी गुसलखाने में गया, तृप्ति और वसंत भी उसके साथ गये और उसका पाँव धोने में उसकी मदद की। वसंत उसकी बाहों, हाथों और पैरों पर गुदे हुए रंग-बिरंगे टैटू देख कर मुग्ध हो गया, बोला, “आप के यह टैटू बहुत सुंदर हैं, बड़ा हो कर मैं भी अपने शरीर पर ऐसे ही बनवाऊँगा।"

ओरी ने सूजन और दर्द घटाने के लिए एक गोली खाई और फिर लंगड़ाता हुआ बाहर निकल आया और कुर्सी पर बैठ गया।

तब तृप्ति ने उसे कहा, “त्री दादा कह रहे थे कि अगर आप हमें छोड दोगे तो कल या परसों वह आप से मिलने आयेंगे। वह पूछ रहे थे कि मूर्ति के अतिरिक्त आप को और क्या चाहिये? अगर आप को वह मूर्ति मिल जायेगी तो क्या आप हमारा पीछा छोड़ देंगे?”

ओरी ने आभा की ओर देखा, बोला, “तुम्हारी शक्ति तो बहुत खतरनाक है।"

वह बोली, “यह मेरे बस में नहीं है, लगता है कि जब मैं उत्तेजित होती हूँ तो यह अपने आप जागृत हो जाती है। तुम अगर मुझे परेशान नहीं करोगे तो तुम्हें डरने की कोई बात नहीं है।"

“और वह मेरी तलवार, अपनी म्यान से निकल कर वह बिस्तर पर कैसे आयी, यह किसका काम था?”

तृप्ति बोली, “दीदी की तरह, मेरी शक्ति भी मेरे बस में नहीं है। तुम मेरे दिमाग में घुसे, इसलिए वह तलवार अपने आप हवा में चल पड़ी। अगर तुम रुकते नहीं तो शायद वह बिस्तर से निकल कर तुम्हारी छाती में भी घुस सकती थी।"

“लेकिन जब मैं तुम्हारे दिमाग में झाँक कर तुम्हारी स्मृतियों को देखने की कोशिश कर रहा था, तो क्या तुम्हें दर्द हो रहा था?”

“नहीं, दर्द नहीं हो रहा था", तृप्ति बोली, “लेकिन तुम्हें ठीक तरह से मन में देखना नहीं आता। तुम झटके से और ज़ोर लगा कर घुसे तो मुझे बहुत बुरा लगा। मेरी गार्गी दीदी बहुत प्यार से और धीरे-धीरे मन में झाँकती है, तुम्हें भी उससे वैसा ही सीखना चाहिये।"

ओरी उसकी बात सुन कर चुप हो गया। कुछ देर बाद बोला, “क्या तुम सच कह रही हो कि त्रिनेत्र आपने आप मुझसे मिलने आयेगा? क्यों? क्या वह उस मूर्ति को नहीं रखना चाहता?”

इस बार आभा बोली, “उसने हमें मूर्ति के बारे में कुछ विशेष नहीं बताया, हमें केवल इतना पता है कि पिछले चालिस-पचास सालों से तुम्हारे बॉस उस मूर्ति के लिए त्री के गुरु जी का पीछा कर रहे हैं। त्री यह जानना चाहता है कि तुम्हें उस मूर्ति के अतिरिक्त और क्या चाहिये?”

ओरी कुछ देर तक उसे देखता रहा, फिर बोला, “मुझे यामागुचि सान ने मूर्ति लाने का काम सौंपा है, कहता था कि इसके लिए अगर मुझे तुम्हारे गुरु को जान से भी मारना पड़े तो मैं उसे मार दूँ। बस, और कोई आदेश नहीं दिया है। लेकिन तुम्हारे गुरु ने तो मुझसे मिले बिना ही समाधी ले ली है, इसलिए अब मुझे उसकी चिंता नहीं है, अब मुझे केवल वह मूर्ति चाहिये, और कुछ भी नहीं।"

वसंत बोला, “तुम हमे वचन दो कि अगर तुम्हें वह मूर्ति मिल जायेगी तो तुम हमारा पीछा छोड़ दोगे और भविष्य में हमे नुक्सान पहुँचाने की दोबारा कोशिश नहीं करोगे।"

ओरी बोला, “मैं वचन देता हूँ कि मुझे वह मूर्ति मिल जायेगी तो मैं तुम लोगों को और कोई कष्ट नहीं दूँगा।"

तब आभा ने कहा, “मैं तुम्हारा संदेश त्री तक पहुँचा दूँगी। वह तुम्हें बतायेगा कि तुमसे कब और कहाँ मिलेगा।"

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