अब तक की कहानी: ताकानोरी से बचने के लिए जामुन बाबा ने समाधी ले ली। ओरी उनकी एक मूर्ति चाहता है। बाबा की मदद करने, त्रिनेत्र पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चों और आभा के साथ मजूली आया है। ताकानोरी आभा, वसंत और तृप्ति कर अपहरण कर लेता है। त्री उनके पीछे गार्गी के साथ नारायणपुर आता है और अदृश्य हो कर ताकानोरी के घर में घुस कर आभा और बच्चों से बात करता है। ओरी को जब यह समझ आती है तो वह आभा और बच्चों से पूछताछ करता है लेकिन उसके पैर में बिच्छु काट लेता है ... इसके आगे पढ़िये ...
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अध्याय 23
नारायणपुर, असम, 5 मार्च 2026, शाम
ताकानोरी के घर से जाने से पहले, त्री ने बाहर से उसका पूरा चक्कर लगाया। देखा कि रसोई का एक दरवाज़ा पीछे भी है जो खुला हुआ है, यानि ज़रूरत पड़ने पर वह वहाँ से भी घर में घुस सकता है।
घर की पिछली चारदीवारी के बाहर उसे एक कटहल का पेड़ देखा जिसकी कुछ शाखाएँ घर के भीतर तक आ रही थीं। वह उसकी एक शाखा पर चढ़ कर बाहर आ गया और वहाँ से नामघर के तालाब के पास लौट आया जहाँ गार्गी उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। उसे कुछ भी कहने-बताने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि सारा समय गार्गी उसके दिमाग से जुड़ी हुई थी और उसने उसकी हर बात सुनी थी।
उसने त्री को बताया, “दादा, जब तुम वहाँ से निकल आये तो ताकानोरी उनके कमरे में गया और वह आभा दीदी, वसंत और तृप्ति को ऊपर ले गया है, और इस समय उनसे बातें कर रहा है।" उसने उनकी बातचीत के बारे में बताया और जब कहा कि कैसे बिच्छु ने ताकानोरी के पैर को काटा तो वह दोनों भी बहुत हँसे।
वह बोली, “वह कहता है कि जापान में यामागुचि सान ने उसे केवल वह मूर्ति लाने के लिए कहा है। यानि अगर उन्हें वह मिल जायेगी तो वह गुरु जी का और हमारा पीछा छोड़ देंगे। वह कौन सी मूर्ति है और वह कैसे पहचानेगा कि वो वही असली मूर्ति है? अगर हम उसे गुरु जी की मूर्ति की जगह कोई और मूर्ति दे दें तो?”
त्री बोला, “आज हमें पता चला है कि ताकानोरी देखने में पहलवान है, वह आमने-सामने की लड़ाई में और तलवारबाज़ी में अवश्य निपुण होगा, लेकिन उसकी कुछ कमज़ोरियाँ भी हैं। उसके पहरेदार यहाँ के स्थानीय लोग हैं, जिन्हें हम आसानी से उल्लू बना सकते हैं। और अगर हम सब मिल कर उस पर हमला करें तो वह हमारा सामना नहीं कर सकता, हम उसे आसानी से हरा सकते हैं।"
गार्गी बोली, “दादा, अगर ऐसा है तो हम उससे क्यों डर रहे हैं, उसे यहाँ से भगा क्यों नहीं देते?”
“इसके दो कारण हैं। पहला कि वह लोग गुरु जी का कई दशकों से पीछा कर रहे हैं, वह उस मूर्ति को किसी भी कीमत पर पाना चाहते हैं। अगर ताकानोरी यहाँ से खाली हाथ लौटेगा, तो वह उसकी जगह किसी और को भेज देंगे, यह बात यहीं पर समाप्त नहीं होगी। दूसरी बात है कि ताकानोरी मुझे अच्छा व्यक्ति लगता है और वह हमारा शक्तिवान भाई भी है। नियति ने उसे याकूज़ा-गुँडा बना दिया है, क्योंकि दुर्भाग्य से वह यामागुचि के चँगुल में आ गया था, लेकिन वह दिल का बुरा नहीं है। जापानी यौद्धाओं के लिए आत्मसम्मान सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है, उसे हरा कर खाली हाथ वापस भेजना सही नहीं होगा", त्री ने समझाया।
“तो हम क्या करेंगे?”
“हमें कोई ऐसा उपाय खोजना है कि साँप भी मर जाये और लाठी भी नहीं टूटे।"
“यानि कि गुरु जी की मूर्ति भी बच जाये और ताकानोरी हमारा पीछा छोड कर जापान लौट जाये?”
"यही नहीं, हमें यह भी करना है कि यामागुचि सान सोचे कि उसे सफलता मिली है और वह गुरु जी का पीछा छोड़ दे। चलो, अब हम मोरनाइगुड़ी वापस चलते हैं। तुम रंगनाथ को सूचित कर दो कि यहाँ सब ठीक है और हम वापस आ रहे हैं।"
वापस लौटते समय, रास्ते भर त्री सोचता रहा कि आगे क्या और कैसे करे। मोरनाइगुड़ी पहुँच कर उसने सबको पास बिठा कर अपना प्लैन बताया और उनकी राय पूछी। कुछ देर तक उनमें बहस हुई फिर सब मान गये।
त्री ने तुरंत ओरी को फोन किया, बोला, “मैं त्रिनेत्र बोल रहा हूँ, आज शाम को आप से मिलना चाहता हूँ, क्या पाँच बजे का समय आप के लिए ठीक रहेगा?”
ओरी को उससे यह अपेक्षा नहीं थी, वह कुछ क्षण तक बोल नहीं पाया, फिर कहा, “हाँ, पाँच बजे मैं आप की प्रतीक्षा करूँगा।"
शाम को फिर से उसके साथ गार्गी भी नारायणपुर गयी, और सुबह की तरह, वह नामघर के तालाब के पास बैठ गयी। उसने तुरंत वसंत से सम्पर्क किया और बताया कि वह लोग वहाँ आ गये हैं और बाहर हैं।
त्री ताकानोरी के घर गया और चौकीदार से बोला कि उसे उनके जापानी साहब से मिलना है। चौकीदार को मालूम था कि वह आयेगा, वह उसे तुरंत ओरी के कमरे में ले गया। ओरी ने उसे बैठाया और चौकीदार से चाय भिजवाने के लिए कहा।
थोड़ी देर तक ओरी उसे चुपचाप देखता रहा। दोनों करीब तीस साल के थे, और उनकी कुछ बातें मिलती थीं जैसे कि गम्भीर चेहरे, छोटे कटे सिर के बाल और लम्बे कद। ओरी उससे करीब दो इँच अधिक लम्बा है, उसका शरीर अधिक भारी है और वह गुदवाये टैटू से भरा हुआ है। त्री श्याम वर्ण का है, और ओरी गोरा।
चौकीदार हरी चाय ले कर आया तो ओरी ने उससे केतली ले ली और उसे भेज दिया, फिर उसे प्यालों में उड़ेला और एक प्याला उसकी ओर बढ़ाया। त्री ने गुरु जी के साथ कई बार हरी चाय पी थी, इसलिए वह उसके लिए नयी नहीं थी, हालाँकि उसे सामान्य दूध वाली भारतीय चाय ज्यादा अच्छी लगती है। दोनों ने चुपचाप चाय पी, फिर मुँह को नेपकिन से पोंछ कर ओरी बोला, “मैं ओकानो गैन्ज़ो ताकानोरी, मेरे घर में आप का स्वागत है।"
“मैं त्रिनेत्र, स्वागत के लिए धन्यवाद। अब हम काम की बात कर सकते हैं?”
ओरी के चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कान कौंधी, बोला, “मैं जून-मिन की विशेष मूर्ति की खोज में आया हूँ।"
त्री ने सिर हिला कर हामी भरी, बोला, “मुझे मालूम है, और हम उसकी बात भी करेंगे, लेकिन उससे पहले मैं कुछ अन्य बातें साफ करना चाहता हूँ।"
ओरी ने धीरे से सिर हिलाया, कुछ नहीं बोला।
त्री बोला, “सबसे पहली बात है कि हमें आप से किसी तरह का डर नहीं है, अगर मैं चाहता तो आप से मिले बिना यहाँ से आभा, वसंत और तृप्ति को ले गया होता, इसलिए मैं आप के पास किसी डर की वजह से नहीं आया।"
ओरी मुस्कराया बोला, “मैं भिन्न तरह के अस्त्र-शस्त्रों की लड़ाई में माहिर हूँ, अगर हम सीधा लड़ें तो मैं दो मिनट में आप को मार सकता हूँ। लेकिन मैं जानता हूँ कि आप के पास विभिन्न शक्तियों वाले यौद्धा हैं, जिनके सामने मेरी लड़ाई की क्षमता का कुछ महत्व नहीं है। उन्हीं के कारण आज सुबह से मेरे पैर में सूजन और दर्द थे, जो अभी भी पूरी तरह से ठीक नहीं हुए हैं। लेकिन मेरे पास एक और छुपा हुआ अस्त्र है, कि मुझे अपने जीने-मरने की परवाह नहीं है, मैं चाहूँ तो इस पूरे घर को आग लगवा सकता हूँ जिसमें मेरे साथ आप और इस घर में बँधक आप के साथी, सब मर सकते हैं और आप की शक्तियाँ आप को बचा नहीं पायेंगी।"
त्री भी मुस्कराया, बोला, “आप को पक्का यकीन है कि आप इस घर में आग लगवा पायेंगे?”
“कौन रोकेगा मुझे?”
त्री बोला, “अच्छा तो आप अपने चौकीदार को बुला कर दिखाईये।"
गार्गी जो उनकी बातें सुन रही थी, उसने तुरंत ताकानोरी के दिमाग को अजगर-पाश में बाँध दिया। ओरी को लगा मानो उसके शरीर को लकवा मार गया हो, न उसके मुँह से आवाज़ निकल रही थी, न ही वह हाथ या पाँव हिला पा रहा था। एक-दो लम्बे मिनट ऐसे ही गुज़रे, उसके बाद गार्गी ने अजगर-पाश को खोल दिया।
त्री मुस्करा कर बोला, “आप के घर में आ कर, आप के साथ इस तरह की हरकत करने के लिए मुझे क्षमा कीजिये, लेकिन अब आप समझ गये होंगे कि मैं किसी डर की वजह से आप से बात करने नहीं आया। मैं आप को शक्तिवाहिनी माँ तारा की देवी मूर्ति तक ले जाने के लिए तैयार हूँ, लेकिन उससे पहले मुझे आप का एक वचन चाहिये। अगर आप मेरी इस शर्त को मानने के लिए तैयार हैं तब हम आगे बात करेंगे, वरना मैं अभी यहाँ से चला जाऊँगा।"
ओरी का चेहरा फीका पड़ गया, बोला, “कैसा वचन?”
“कि उस मूर्ति को पाने के बाद, आप और आप के बॉस यामागुचि सान, मेरे गुरु जी जून-मिन और हमें भूल जायेंगे और दोबारा उनका या हमारा पीछा नहीं करेंगे।"
ओरी ने एक क्षण सोचा, बोला, “मैं स्वयं क्या करूँगा उसका मैं आप को वचन दे सकता हूँ, लेकिन यामागुचि सान भविष्य में क्या करेंगे, यह वचन मैं कैसे दे सकता हूँ?”
“अगर आप मुझे यह वचन नहीं दे सकते तो मैं आप को वह प्रतिमा भी नहीं दे सकता।"
ओरी थोड़ी देर तक सोचता रहा, फिर बोला, “मैं वचन दे सकता हूँ कि शक्तिवाहिनी देवी प्रतिमा को यामागुचि सान को दे कर मैं उनसे कहूँगा कि जून-मिन अब नहीं है, वह ज़मीन के गर्भ में दफन हो चुका है। यह जान कर वह उसका पीछा नहीं करेगा। मैं यह वचन भी दे सकता हूँ कि अगर यामागुचि सान के गैंग ने दोबारा तुम लोगों पर हमला करने की कोई कोशिश की, तो मैं तुम्हारे साथ उनसे लड़ूँगा।"
त्री ने सोचा, बोला, “ठीक है, मुझे तुम्हारा यह वचन स्वीकार है। अब तुम आभा, वसंत और तृप्ति को जाने दो। मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि तुम्हें शक्तिवाहिनी देवी प्रतिमा तक ले कर जाऊँगा।"
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अगला अध्याय बृहस्पतिवार 20 अगस्त को पढ़ सकते हैं
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