अब तक की कहानी: ताकानोरी जामुन बाबा की मूर्ति चाहता है। उससे बचने के लिए बाबा समाधी ले लेते हैं। बाबा का शिष्य त्रिनेत्र पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चों और आभा के साथ मजूली पहुँचा है। ताकानोरी आभा, वसंत और तृप्ति को उठा कर नारायणपुर ले जाता है और उन तीनों को एक कमरे में बंद कर देता है। त्री उनके पीछे गार्गी के साथ नारायणपुर आता है और अदृश्य हो कर ताकानोरी के घर में घुस कर आभा और बच्चों से बात करता है ... इसके आगे पढ़िये ...
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अध्याय 22
नारायणपुर, असम, 5 मार्च 2026
त्री कमरे से निकल रहा था जब उसे सीढ़ियों से किसी के आने की आहट हुई। गार्गी ने तुरंत उसकी शक्ति-लहर को ढक दिया। उसने केवल दरवाजे को बंद किया, उसकी कुँडी बंद नहीं की और सीढ़ियों के नीचे खड़ा हो गया।
ताकानोरी सीढ़ियों से नीचे आ रहा था। हालाँकि त्री ने बिल्कुल भी आवाज़ नहीं की थी, लेकिन ताकानोरी की श्रवण शक्ति अच्छी थी, उसे लगा कि नीचे कोई है, लेकिन वहाँ कोई नहीं दिखा। वह त्री के साथ से गुज़रा लेकिन उसे नहीं देख पाया। जब उसने आभा के कमरे का कुँडा बाहर से खुला देखा तो वह चौंक गया, उसने सोचा कि कोई उसके बंदियों को निकाल कर ले गया है। उसने तुरंत अपनी अन्वेषण-किरण से जाँचा और देखा कि कमरे के तीन लोगों की शक्ति-लहर थी तो वह कुछ शाँत हुआ।
वह द्वार की ओर आया तो दोनों पहरेदारों ने तुरंत ताश के पत्तों को समेट कर जेब में डाल लिया और खड़े हो गये।
"यहाँ पर कोई बाहर से आया था?”, उसने पूछा।
“नहीं सर", दोनों पहरेदारों ने एक साथ उत्तर दिया।
उसने अपनी पीठ से बँधी तलवार को म्यान से निकाला और इशारे से दोनों पहरेदारों को पास बुलाया, और आभा के कमरे की ओर ले गया, बोला, “यह दरवाज़ा बंद क्यों नहीं है?”
एक पहरेदार हकलाते हुए बोला, “सर, मैं .. मैं.. हमने यह.. बंद क..क..किया …”
“तुमने तो कहा कि कोई भीतर नहीं आया, तो क्या यह कुँडा अपने आप खुल गया?”
दोनों आदमी चुप हो गये।
"इसे तुरंत बंद करो", कह कर वह द्वार के पास आया और वहाँ रखी कुर्सी पर बैठ गया। कुछ क्षण बाद, कुँडा बंद करके जब दोनों पहरेदार लौटे तो वह बोला, “तुम अपने बायें हाथों को यहाँ मेज़ पर रखो। यह तुम्हारी पहली गलती है, इसलिए आज तुम्हें छोटी सजा दूँगा। लेकिन अगर ऐसी गलती दोबारा की, तो पूरी उँगली काट दूँगा, समझे?”
उसने हाथ में तलवार ऊपर उठायी तो वह दोनों समझ गये कि उन्हें कुछ गम्भीर सजा मिलने वाली है।
दोनों आदमी काँप रहे थे, लेकिन उन्होंने अपने हाथ मेज़ पर नहीं रखे। ताकानोरी उन्हें एक मिनट तक चुपचाप देखता रहा और फिर उन्हें आँखों से मुख्य द्वार से बाहर जाने का इशारा किया। दोनों आदमी चुपचाप बाहर चले गये, तब ताकानोरी ने लम्बी साँस ली और धीरे से सिर हिलाया, बोला, “यहाँ के गुँडे तो बहुत डरपोक हैं, यह जाने बिना कि सज़ा क्या होगी, पत्ते की तरह काँप रहे थे।"
उन आदमियों ने बाहर जाते समय दरवाज़ा खुला छोड़ दिया था, उनके पीछे से त्री भी बाहर निकल गया। जब वह उसके सामने से गुज़रा तो शायद एक क्षण के लिए ताकानोरी को हवा में कुछ कम्पन सा महसूस हुआ, बोला, “कौन है? कौन जा रहा है?”
त्री ने उसे कुछ उत्तर नहीं दिया लेकिन वह वहाँ से गया नहीं, दरवाज़े के बाहर, झाड़ियों के पास उनमें घुलमिल कर खड़ा हो गया। वह देखना चाहता है कि ताकानोरी अब क्या करेगा।
ताकानोरी उठ कर दरवाज़े तक आया। उसके दोनों पहरेदार, गेट के चौकीदारों को अपनी बात बता रहे थे, उसे दरवाज़े पर खड़ा देखा तो चुप हो गये और गेट खोल कर बाहर चले गये। ओरी ने आसपास ध्यान से देखा लेकिन त्री को नहीं देख पाया। गेट से प्रौढ़ वाला चौकीदार उठ कर उसके पास आया, बोला, “साहब जी, क्या हुआ? किसे खोज रहे हैं? क्या कोई भाग गया है?”
ओरी ने सिर हिला कर मना किया, कुछ बोला नहीं, फिर भीतर आ कर दरवाज़े को बंद कर दिया। उसने सोचा कि अब उसे दो-तीन नये पहरेदार खोजने पड़ेंगे, लेकिन वह इन लोगों पर पूरा भरोसा नहीं कर सकता। यह लोग सामान्य गुँडे हैं, इन्हें ठीक से काम करना नहीं आता और यह डरपोक हैं। जब तक उसे सही व्यक्ति नहीं मिलेंगे, तब तक उसे खुद ही अपने घर की सारी पहरेदारी देखनी पड़ेगी।
फिर उसने आभा के कमरे का दरवाज़ा खोला और उन तीनों को बुला कर, उन्हें ऊपर अपने कमरे में ले कर गया।
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए आभा ने पूछा, “क्या हुआ? तुम कुछ परेशान से लग रहे हो?”
ताकानोरी को आश्चर्य हुआ कि वह उसकी परेशानी को भाँप गयी है, हालाँकि वह अपने चेहरे और आवाज़ को निर्विकार रखने में बहुत कुशल है। उसके मन की परेशानी उसके चेहरे से कोई समझ नहीं पाता। उस समय वह कुछ नहीं बोला।
अपने कमरे में जा कर उसने उन्हें बैठने के लिए कहा, फिर बोला, “आज त्रिनेत्र तुमसे मिलने आया था और अभी कुछ देर पहले ही यहाँ से गया है।"
आभा हँसी, बोली, “अरे, हमें तो पता ही नहीं चला कि वह कब आया और कब गया, क्या तुमने उसे देखा?”
वसंत और तृप्ति कुछ नहीं बोले।
“तुम झूठ बोल रही हो", उसने कठोर स्वर में कहा, फिर वसंत से पूछा, “वह यहाँ कैसे घुसा? क्या उसके पास अदृष्य होने की शक्ति है?”
वसंत ने भोला चेहरा बना कर कहा, “त्री दादा? कहाँ हैं वह?”
“ठीक है, मैं अभी तुम्हें दिखाता हूँ", उसने अपनी आँखें बंद कीं और अपनी शक्ति को जगा कर, उसे तृप्ति के मस्तिष्क में घुसा दिया।
छोटी सी तृप्ति चीख उठी। उसने उसे भीतर घुसने से रोका और अपने मस्तिष्क के पटों को बंद करने की कोशिश की। हालाँकि ओरी की शक्ति अधिक तीव्र नहीं है, लेकिन उस बच्ची के लिए वह काफ़ी थी। तृप्ति दर्द से छटपटाई तो मेज़ के पास रखी ओरी की तलवार, म्यान से निकल कर, हवा में ऊपर उठी और फिर छपाक से उसके पलंग के बीच में जा कर ऐसे गड़ी कि अगर उस समय वहाँ कोई लेटा होता तो अवश्य मर जाता।
आभा ने बच्ची की यातना देखी तो वह भी चिल्लाई, “तृप्ति को छोड़ो, बच्ची के साथ ऐसा मत करो।"
लेकिन तब तक ओरी ने तृप्ति के मानस-पटल में त्रिनेत्र के कमरे में घुसने और बच्ची को गले लगाने की छवि को देख लिया था। वह जानना चाहता है कि त्रिनेत्र वहाँ कैसे आया और उसने उन्हें क्या कहा है?
तृप्ति, वसंत और आभा तीनों चिल्ला रहे थे, लेकिन ओरी अपनी जगह पर स्थिर बैठा ध्यान में लीन था और तृप्ति के मानस-पटल की स्मृतियों को जाँच रहा था।
अचानक कमरे के कोनों से, दरवाज़े के नीचे से, बाहर बालकनी से, कीड़े, मकोड़े, बिच्छु, आदि निकल कर बाहर आने लगे। हालाँकि वह कमरा पहली मज़िल पर है, फिर भी आभा की शक्ति की पुकार इतनी प्रबल थी कि बहुत सारे जीव-जन्तु बाहर बाग से और घर के निचले भाग से निकल कर दीवारों और सीढ़ियों से ऊपर आ रहे थे। बालकनी से एक हरे रंग का साँप भी कमरे में घुसा। उन सब जीव-जन्तुओं को देख कर वह तीनों चुप हो गये लेकिन ओरी का ध्यान नहीं टूटा। उसकी तंद्रा तब टूटी जब एक बिच्छु ने उसके पैर पर काटा।
तब उसने आँखें खोलीं और अपने आसपास फर्श पर घूमते उन जीव-जन्तुओं को देखा तो वह कूद कर अपने बिस्तर पर चढ़ गया। तब उसे बिस्तर के बीच में गड़ी हुई अपनी तलवार दिखाई दी, तो वह और घबराया। उसके चेहरे के डरे हुए भाव को देख कर तृप्ति हँसने लगी। उसकी हँसी से आभा की पीड़ा-तंद्रा टूटी और वह जीव-जन्तु जहाँ थे वहीं रुक गये, फिर धीरे-धीरे जिधर से आये थे, उसी ओर लौटने लगे।
तब तक ओरी का पैर जहाँ बिच्छु ने काटा था, वह लाल हो कर फूलने लगा।
“किसने काटा मेरे पैर पर? क्या मुझे जहरीले साँप ने काटा है?”, उसने घबरा कर पूछा।
वसंत बोला, “नहीं, तुम्हें साँप ने नहीं, छोटे से बिच्छु ने काटा है। वैसे भी वह हरा साँप जहरीला नहीं था, वह तो केवल चूहे खाता है।"
“पर यह सूज रहा है, देखो कितना फूल गया है", ओरी ने अपने पैर की ओर इशारा किया।
आभा बोली, “इस पैर को अच्छी तरह से साबुन और ठंडे पानी से धो लो। कुछ घंटों में यह ठीक हो जायेगा, और दर्द अधिक हो तो ब्रूफैन की गोली ले लो।"
लंगड़ाता हुआ ओरी गुसलखाने में गया, तृप्ति और वसंत भी उसके साथ गये और उसका पाँव धोने में उसकी मदद की। वसंत उसकी बाहों, हाथों और पैरों पर गुदे हुए रंग-बिरंगे टैटू देख कर मुग्ध हो गया, बोला, “आप के यह टैटू बहुत सुंदर हैं, बड़ा हो कर मैं भी अपने शरीर पर ऐसे ही बनवाऊँगा।"
ओरी ने सूजन और दर्द घटाने के लिए एक गोली खाई और फिर लंगड़ाता हुआ बाहर निकल आया और कुर्सी पर बैठ गया।
तब तृप्ति ने उसे कहा, “त्री दादा कह रहे थे कि अगर आप हमें छोड दोगे तो कल या परसों वह आप से मिलने आयेंगे। वह पूछ रहे थे कि मूर्ति के अतिरिक्त आप को और क्या चाहिये? अगर आप को वह मूर्ति मिल जायेगी तो क्या आप हमारा पीछा छोड़ देंगे?”
ओरी ने आभा की ओर देखा, बोला, “तुम्हारी शक्ति तो बहुत खतरनाक है।"
वह बोली, “यह मेरे बस में नहीं है, लगता है कि जब मैं उत्तेजित होती हूँ तो यह अपने आप जागृत हो जाती है। तुम अगर मुझे परेशान नहीं करोगे तो तुम्हें डरने की कोई बात नहीं है।"
“और वह मेरी तलवार, अपनी म्यान से निकल कर वह बिस्तर पर कैसे आयी, यह किसका काम था?”
तृप्ति बोली, “दीदी की तरह, मेरी शक्ति भी मेरे बस में नहीं है। तुम मेरे दिमाग में घुसे, इसलिए वह तलवार अपने आप हवा में चल पड़ी। अगर तुम रुकते नहीं तो शायद वह बिस्तर से निकल कर तुम्हारी छाती में भी घुस सकती थी।"
“लेकिन जब मैं तुम्हारे दिमाग में झाँक कर तुम्हारी स्मृतियों को देखने की कोशिश कर रहा था, तो क्या तुम्हें दर्द हो रहा था?”
“नहीं, दर्द नहीं हो रहा था", तृप्ति बोली, “लेकिन तुम्हें ठीक तरह से मन में देखना नहीं आता। तुम झटके से और ज़ोर लगा कर घुसे तो मुझे बहुत बुरा लगा। मेरी गार्गी दीदी बहुत प्यार से और धीरे-धीरे मन में झाँकती है, तुम्हें भी उससे वैसा ही सीखना चाहिये।"
ओरी उसकी बात सुन कर चुप हो गया। कुछ देर बाद बोला, “क्या तुम सच कह रही हो कि त्रिनेत्र आपने आप मुझसे मिलने आयेगा? क्यों? क्या वह उस मूर्ति को नहीं रखना चाहता?”
इस बार आभा बोली, “उसने हमें मूर्ति के बारे में कुछ विशेष नहीं बताया, हमें केवल इतना पता है कि पिछले चालिस-पचास सालों से तुम्हारे बॉस उस मूर्ति के लिए त्री के गुरु जी का पीछा कर रहे हैं। त्री यह जानना चाहता है कि तुम्हें उस मूर्ति के अतिरिक्त और क्या चाहिये?”
ओरी कुछ देर तक उसे देखता रहा, फिर बोला, “मुझे यामागुचि सान ने मूर्ति लाने का काम सौंपा है, कहता था कि इसके लिए अगर मुझे तुम्हारे गुरु को जान से भी मारना पड़े तो मैं उसे मार दूँ। बस, और कोई आदेश नहीं दिया है। लेकिन तुम्हारे गुरु ने तो मुझसे मिले बिना ही समाधी ले ली है, इसलिए अब मुझे उसकी चिंता नहीं है, अब मुझे केवल वह मूर्ति चाहिये, और कुछ भी नहीं।"
वसंत बोला, “तुम हमे वचन दो कि अगर तुम्हें वह मूर्ति मिल जायेगी तो तुम हमारा पीछा छोड़ दोगे और भविष्य में हमे नुक्सान पहुँचाने की दोबारा कोशिश नहीं करोगे।"
ओरी बोला, “मैं वचन देता हूँ कि मुझे वह मूर्ति मिल जायेगी तो मैं तुम लोगों को और कोई कष्ट नहीं दूँगा।"
तब आभा ने कहा, “मैं तुम्हारा संदेश त्री तक पहुँचा दूँगी। वह तुम्हें बतायेगा कि तुमसे कब और कहाँ मिलेगा।"
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