रविवार, जुलाई 26, 2026

बाघा जतिन और उनके पौत्र

करीब तेरह साल पहले मुझे पैरिस से पृथ्वीन्द्र मुखर्जी की ईमेल मिली, कि उनके दादा बाघा जतिन पर फ़िल्म निर्देशक हरिसाधन दासगुप्ता ने एक फ़िल्म बनायी थी और वह हरिसाधन जी के पुत्र फ़िल्म निर्देशक राजा दासगुप्ता का सम्पर्क खोज रहे थे। मैंने बचपन में बाघा जतिन का नाम सुना था लेकिन उनके बारे में अधिक जानकारी नहीं थी, बस इतना जानता था कि वह अंग्रेज़ी सरकार से लड़ने वाले एक क्राँतिकारी थे। मैंने सोचा कि बाघा जतिन के पौत्र से सम्पर्क हुआ है तो इसका फायदा उठाना चाहिये और उनसे उनके दादा के बारे में जानने की कोशिश करनी चाहिये।

इस तरह से पृथ्वीन्द्र जी से कुछ संदेशों का आदान-प्रदान हुआ। तब मैं एक शोध रिपोर्ट पर काम कर रहा था, सोचा कि उसे पूरा करके पृथ्वीन्द्र जी से बातचीत करूँगा लेकिन जैसा अक्सर होता है, कुछ दिनों में मैं इस बात को भूल गया। दो साल पहले जब उनके देहांत की खबर पढ़ी तो अपनी वह पुरानी बातचीत याद आयी, बहुत दुख हुआ कि मैंने उस समय उनसे बात क्यों नहीं की।

कुछ ऐसा ही मेरे साथ पहले भी एक बार हुआ था जब मैंने दिल्ली में मित्र कर्बान अली से कहा था कि जब दिल्ली आऊँगा तो उनके पिता जी कप्तान अब्बास अली से बातचीत करने आऊँगा। कप्तान अब्बास अली जी ने 1940 के दशक में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के साथ आज़ाद हिंद फौज में भाग लिया था, वहीं पर वह कप्तान बने थे। जब 2014 में उनकी मृत्यु की खबर मिली थी तब भी यही दुख हुआ था कि समय रहते उनसे क्यों नहीं मिला था।

खैर इस बार मैंने सोचा कि बाघा जतिन के बारे में इंटरनैट पर खोज करके लिखूँ। यही सोचते-सोचते दो साल बीत गये हैं, पर आखिर में वह आलेख लिखने का समय मुझे मिल ही गया।

बाघा जतिन - जतिन्द्रनाथ मुखर्जी

जतिन्द्रनाथ का जन्म सन् 1879 में उनकी ननिहाल कुष्टिया जिले के केया गाँव में हुआ था। उनका पैतृिक घर वहाँ से करीब 40 किलोमीटर दक्षिण में साधुहाटी में था, जहाँ वह बड़े हुए। यह दोनों जगहें अब बँगलादेश के खुलना डिविज़न का हिस्सा हैं। हाई स्कूल के बाद 1895 में वह कलकत्ता सैंट्रल कॉलेज में पढ़ने गये।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में वह स्वामी विवेकानन्द और बहन निवेदिता से मिले। स्वामी विवेकानन्द के अतिरिक्त उनकी मुलाकात अरविंदो घोष, रासबिहारी बोस आदि व्यक्तियों के सम्पर्क में आये। इस तरह से वह भारत की स्वतंत्रता के लिए काम करने वाले युगांतर अभियान तथा अनुशीलन समिति से जुड़े और भारत के स्वाधीनता संग्राम का हिस्सा बन गये। अनुशीलन समिति में बंकिमचन्द्र चैटर्जी और स्वामी विवेकानन्द के हिन्दू-शक्ता आध्यात्मिक विचारधारा की सोच वाले लोग थे जो स्वाधीनता के लिए सशस्त्र क्राँति का रास्ता खोज रहे थे।

1906 में अपने गाँव से लौटते समय जतिन्द्रनाथ का जँगल में एक बाघ से सामना हुआ और वह अपनी छुरी से उसे मारने में सफल हुए जिसके लिए उन्हें अंग्रेज़ सरकार की ओर से बाघ का खिताब मिला और लोग उन्हें बाघा जतिन बुलाने लगे।

1908-09 में मुज़्ज़फरपुर के मजिस्ट्रेट की हत्या की साजिश का मुकदमा चला जिसमें अरविंद घोष के साथ अन्य आरोपियों में जतिन्द्रनाथ भी थे। इस मुकदमें में अनुशीलन समिति को बैन कर दिया गया, बहुत लोगों को सजा मिली लेकिन जतिन्द्रनाथ को सबूत न मिलने पर बरी किया गया, लेकिन कुछ समय बाद उन्हें "हावड़ा-शिवपुर साजिश" के मुकदमें में दोबारा गिरफ्तार किया गया और वह ग्यारह महीनों तक हावड़ा जेल में रहे।

उन्होंने जर्मनी में हथियारों के लिए सम्पर्क किया लेकिन अंग्रेज़ों को उनके हथियारों के आने की खबर मिल गयी, और उनकी फौज से संघर्ष करते हुए 10 सितम्बर 1915 को जतिन्द्रनाथ का देहांत हो गया, उस समय वह छत्तीस साल के थे।

बाघा जतिन के पौत्र पृथ्वीन्द्र मुखर्जी

सन् 1900 में जतिन्द्रनाथ का विवाह इन्दुबाला बैनर्जी से हुआ, उनके चार बच्चे हुए, एक बेटी आशालता और तीन बेटे, अतीन्द्र, तेजेन्द्र और बिरेन्द्र। जिस समय जतिन्द्रनाथ की मृत्यु हुई, तेजेन्द्रनाथ उस समय केवल छह साल के थे। उनके पहले पुत्र अतीन्द्र की मृत्यु बचपन में ही हो गयी थी, इसलिए तेजेन्द्र को उनका बड़ा बेटा मानते हैं।

तेजेन्द्रनाथ के तीन बेटे थे, रथीन्द्रनाथ, पृथ्वीन्द्रनाथ और ध्रितीन्द्रनाथ।

पृथ्वीन्द्र का जन्म 20 अक्टूबर 1936 में हुआ। जब वह पाँच साल के थे उन्हें पोलियो हो गया जिससे उनकी टाँग कमज़ोर हो गयी और वह चल या खड़े नहीं हो पाते थे। उनके मामा प्रबोधकुमार चैटर्जी ने उन्हें विज्ञान पढ़ाया और उनके फूफा ललितकुमार रायचौधरी ने उन्हें संस्कृत पढ़ायी। जब वह बारह वर्ष के थे जब वह परिवार के साथ पाँडेचैरी में अरविंद आश्रम में रहने आये और वहाँ पढ़ाई पूरी करके 1956 से श्री ओरोबिन्दो आश्रम के अंतरराष्ट्रीय शिक्षा केन्द्र में तीन भाषाएँ (अंग्रेज़ी, बंगाली और फ्राँसिसी) पढ़ाने लगे। 

पृथ्वीन्द्र को बचपन से कविता लिखने का शौक था, वह बंगाली और अंग्रेज़ी में कविता लिखते थे। 1955 में उन्होंने भारत में गाँधी जी से पहले, विषेशकर स्वामी अरविंद और अपने दादा जतिन्द्रनाथ के समय में भारत की स्वतंत्रता की कोशिशों के बारे में शोध करना शुरु किया। यह शोध पहले एक बंगाली पत्रिका बासुमति और फ़िर पुस्तक रूप में छपा। साथ ही उनका कविता लेखन चलता रहा और बंगाली व अंग्रेज़ी कविताओं के संकलन भी छपे। साथ ही वह फ्राँसिसी के कुछ प्रसिद्ध लेखकों की किताबों का बंगाली में अनुवाद कर रहे थे। इस तरह से पच्चीस वर्ष के होते-होते वह कवि, लेखक और अनुवादक के रूप में जाने जाने लगे।

पृथ्वीन्द्र को बचपन से संगीत में भी रुचि थी। उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन और पश्चिमी संगीत दोनों सीखे। वह भारतीय रागों और पश्चिमी संगीत के सिद्धातों को मिला कर संगीत रचना चाहते थे। इस तरह से वह भारतीय-पश्चिमी मिला-जुला आरकेस्ट्रा बना कर उनकी कन्सर्ट आयोजित करने लगे और उन्होंने श्री ओरोबिन्दु आश्रम का बैंड-दल बनाया। 

तीस वर्ष की आयु में 1966 में फ्राँसिसी सरकार की छात्रवित्ति ले कर वह पैरिस पहुँचे। फ्राँस में उनकी टाँग के आपरेशन भी हुए जिससे उनके लिए बैसाखी से चलना कुछ आसान हो गया। वहाँ उन्होंने 1970 में श्री ओरोबिन्दो के दर्शन पर पीएचडी की, और उसके बाद पैरिस के विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे, साथ ही रेडियो के कार्यक्रम तथा पत्रकारिता में लग गये। 1981 में उन्हें फुलब्राईट छात्रवित्ति मिली जिससे वह अमरीका गये। फ्राँस लौटने के बाद वह पैरिस में बँगाली पढ़ाने लगे। उन्होंने अंग्रेज़ी, बंगाली और फ्राँसिसी भाषाओं में करीब सत्तर पुस्तकें लिखीं। उन्हें श्री ओरोबिन्दो पुरस्कार, फ्राँस सरकार से शिवालिएर और भारतीय सरकार से पद्मश्री सम्मान मिले। 

पृथ्वीन्द्र ने दो विवाह किये और उनके तीन बच्चे हुए, दो बेटियाँ अद्या और अमृता, और एक पुत्र, अर्जव।

अंत में - बाहरी क्राँति से आंतरिक क्राँति

जतिन बाघा की कहानी स्वामी अरविंद या ओरोबिन्दो से जुड़ी हुई है। बीसवीं सदी के प्रारम्भ में दोनों सशस्त्र क्राँति की बात कर रहे थे। स्वामी ओरोबिन्दो को 1908 में अलीपुर बम्ब विस्फोट केस में जेल हुई। जतिन को 1910 में हावड़ा-शिबपुर केस में। स्वामी ओरोबिन्दो को जेल में आध्यात्मिक ज्योति मिली, जब वह बाहर आये तो वह बदल चुके थे। वह भारत की स्वतंत्रता की बात करते थे, पर वह आत्मा के विकास और स्वाधीनता के प्रति अधिक सजग थे। जतिन बाघा ने शस्त्र क्राँति का सपना नहीं छोड़ा और 1915 में पुलिस की गोलियों से घायल हो कर उनका देहांत हुआ। उनके पोत्र पृथ्वीन्द्र, अपनी माँ तथा भाईयों के साथ पाँडेचैरी के स्वामी ओरोबिन्दो के आश्रम में बड़े हुए और उनका परिवार आजीवन "माँ" (मिर्रा अलफस्सा, स्वामी ओरोबिन्दो की संगनी) के आध्यात्मिक सानिध्य में रहा।

यानि सोचिये कि शस्त्र क्राँति या देश की स्वाधीनता की कामना, कहीं पर आत्मा की क्राँती के साथ कब, क्यों और कैसे जुड़ जाती है?  

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नोट: इस आलेख में उपयोग की गयी तीनों तस्वीरें इंटरनेट से साभार ली गयी हैं

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गुरुवार, जुलाई 23, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 16

अब तक की कहानी: ताकानोरी जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी मूर्ति चाहता है। उससे बचने के लिए बाबा समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में लोगों को जान से मारने की धमकी देता है। वह उनकी समाधी को खोदने की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं होता। उधर, बाबा का शिष्य त्रिनेत्र एक अनाथाश्रम चलाता है, जहाँ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा भी हैं। वे बाबा को बचाने के लिए, वहाँ पहुँचते हैं। इसके आगे पढ़िये ...

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अध्याय 16

मजूली द्वीप, असम, 4 मार्च 2026, सुबह

त्री, रंगनाथ और गार्गी वृद्धाश्रम की ओर जाने के लिए तैयार हो गये।

त्री ने आभा से कहा, “हम सीढ़ियों से ऊपर नहीं जायेंगे बल्कि एक गुप्त सुरंग से बाहर निकलेंगे। तुम भी हमारे साथ चल कर सुरंग का रास्ता देख लो और जब यहाँ तहखाने में बैठे-बैठे बोर हो जाओ तो बच्चों को कुछ देर तक बाहर घुमा सकती हो। वसंत तुम्हारी शक्ति-लहरों को ढक कर तुम्हें उस जापानी की अन्वेषण-किरण से छुपा लेगा, लेकिन यह काम वह पेड़ों की सहायता से करता है, अगर तुम लोग खुले में जाओगे तो वहाँ वह तुम्हें नहीं छुपा सकता, इसलिए तुम बच्चों को खुली जगह में नहीं जाने देना।"

नाश्ते के बाद माधव और तृप्ति सोने के लिए वापस बिस्तर पर लौट गये, लेकिन वसंत वहीं बैठा उनकी बातें सुन रहा था, बोला, “मैं भी आप के साथ चलता हूँ, आभा दीदी के साथ लौट आऊँगा।"

आभा बोली, “क्या माधव और तृप्ति को यहाँ अकेले छोड़ना ठीक होगा?”

“इस घर में उन्हें कोई खतरा नहीं है। ज़रीना, वह लड़की जो ऊपर रहती है और हमें रात को मिली थी, वह हमारी साथी है। फरीद, वह नाव वाला जो हमें रात को मजूली ले कर आया था, ज़रीना उसकी बेटी है। वह सुन-बोल नहीं सकती, लेकिन इशारों की वर्णमाला जानती है और लिख-पढ़ सकती है। गुरु जी ने उसे गूँगे-बहरों के स्कूल में पढ़ने भिजवाया था, इसलिए वह लोग गुरु जी को बहुत मानते हैं। जब हमें अपने छुपने के लिए कमलाबाड़ी घाट के पास जगह चाहिये थी, तब गुरु जी ने यह घर बनवाया था और बाहर जाने के लिए सुरंग भी बनवायी। तुम्हें कुछ भी ज़रूरत हो तो ज़रीना को कहो", त्री ने सारी बात बतायी।

रंगनाथ ने पूछा, “दादा, यह इशारों की वर्णमाला क्या होती है?”

“जैसे अक्षरों की वर्णमाला होती है, वैसे ही हम हर अक्षर के लिए उंगलियों से भिन्न मुद्रा बना सकते हैं, वह मुद्राओं की वर्णमाला होती है। जैसे कि तुम्हारे नाम को अगर मुद्राओं की भाषा में कहना हो तो 'र' कहने के लिए तर्जनी और मध्यमा उंगलियों से क्रोस बनाओ और बाकी दोनों उंगलियों पर अंगूठा रख दो। 'न' कहने के लिए सभी उंगलियों के सिरों को अंगूठे के सिरे से मिलाओ। फ़िर 'ग' कहने के लिए 'न' वाली मुद्रा में मध्यमा को ऊपर उठाओ", यह कहते हुए उसने अपने हाथों से मुद्राएँ बदल कर अक्षर बना कर दिखाये, बोला, “इस तरह से यह 'रंग' शब्द बन गया।"  

रंगनाथ बोला, “यह भाषा तो बहुत कठिन लगती है।"

त्री मुस्कराया, “जब कोई चीज़ नहीं करनी आती तो वह कठिन लगती है। अगर तुम हर रोज़ मुद्रा की भाषा की एक-दो नयी मुद्राएँ सीख लो और हर रोज़ उनका अभ्यास करो तो एक महीने में इशारों में फटाफट बोलने लगोगे।"

गार्गी बोली, “जब हम घर लौटेंगे तो मैं यह इशारों की भाषा भी सीखूँगी ताकि ज़रूरत पड़े तो मैं आप को इशारों से गुप्त संदेश दे सकती हूँ।" रंगनाथ बोला, “केवल तुम्हारे सीखने से कुछ नहीं होगा, उसे समझने वाला भी चाहिये, नहीं तो क्या अपने आप से बातें करोगी?"

गार्गी ने पूछा, “दादा, कल रात जब हम यहाँ आये तो आप ने घंटी बजायी थी? ज़रीना दीदी ने उसे कैसे सुना?”

त्री मुस्कराया, “ऊपर जब घंटी बजाओ तो घंटी बजती है और साथ में एक बल्ब जलता-बुझता है, ज़रीना उसे देख सकती है।"

रंगनाथ ने पूछा, “ज़रीना दीदी टेलीफोन पर कही बातें भी समझ सकती हैं?”

“हाँ, उसके मोबाइल में एक एप्प है, तुम उसे कुछ कहोगे तो वह एप्प उसे मुद्रा की भाषा में वही बात वीडियो में दिखायेगी", कह कर त्री खड़ा हो गया, "चलो, अब हमें चलना चाहिये"।

वह तहखाने की रसोई में गया और एक अलमारी के पास जा कर, उसने एक जगह दबाया तो वह अलमारी दरवाज़े की तरह खुल गयी। उसके पीछे एक गुप्त रास्ता छिपा था। जैसे ही वह भीतर घुसा, वहाँ एक बत्ती जल गयी। उसके पीछे रंगनाथ और गार्गी गये और उनके पीछे आभा और वसंत।

त्री ने आभा को दिखाया कि सुरंग खोलने के लिए अलमारी को कैसे खोलते-बंद करते हैं। वह बोला, “इस सुरंग में सैन्सर लगे हैं, तुम जिधर जाओ, वहाँ की बत्ती अपने आप जल जाती है और पीछे वाली कुछ देर बाद अपने आप बुझ जाती है।"

सुरंग का रास्ता पार करने में उन्हें करीब आधा घंटा लगा और जब वह दरवाज़ा खोल कर बाहर निकले तो देखा कि उस सुरंग का दरवाज़ा एक मोटे तने वाले पीपल के पेड़ का हिस्सा था। जब वह बंद होता था और उसे ध्यान से नहीं देखो, तो दिखाई नहीं देता था।

वसंत बोला, “देखो, यह तो बहुत बड़ा पीपल का पेड़ है, इसके भीतर पूरा कमरा है।"

त्री बोला, “यहाँ के लोग इस पेड़ को पवित्र मानते हैं, इसे संत माधवदेव का पेड़ भी कहते हैं क्योंकि इसके नीचे एक बार संत माधव देव रहे थे। उनका गाँव हरिसिंगबरा, यहाँ से अधिक दूर नहीं है।"

वसंत ने पूछा, “यह पेड़ कितना पुराना होगा, दो सौ साल?”

“संत माधव देव करीब पाँच सौ साल पहले पैदा हुए थे, और कहते हैं कि उनके समय में भी इस पेड़ को बहुत प्राचीन मानते थे। इसलिए हो सकता है कि यह पेड़ एक हज़ार साल या उससे भी पुराना हो। यहाँ सब लोग इसे जानते हैं। अगर तुम आसपास कहीं खो जाओ तो लोगों से पूछो कि संत माधव देव का पीपल का पेड़ कहाँ है, वह तुम्हें यहाँ का रास्ता दिखा देंगे”, त्री ने समझाया, फ़िर बोला, “आभा और वसंत, तुम लोग अब वापस जाओ।"

आभा बोली, “बाद में जब माधव और तृप्ति जागेंगे, उन्हें साथ ले कर हम लोग यहाँ लौटेंगे।" वह  दोनों पीपल के पेड़ की ओर लौट गये।

त्री, रंगनाथ और गार्गी आगे चले। उन्होंने गाँव के गरीब लोगों जैसे कपड़े पहने थे, जैसे कि एक पिता अपने बच्चों के साथ कहीं जा रहा हो। करीब एक घंटा चल कर वे श्री भोला मन्दिर पहुँचे और वहाँ से मोटरबोट ली जो उन्हें फुलानीबाड़ी के घाट तक ले गयी। त्री उस क्षेत्र में पहले कई बार आ चुका था, इसलिए उसने अपना चेहरा गमछे से ढक लिया था। घाट पर पहुँचने से पहले ही गार्गी ने तीनों की शक्ति-लहरों को ढक लिया।    

फुलानीबाड़ी के घाट से जो रास्ता गाँव की ओर जाता है, वहाँ आगे जा कर पेड़ों के पीछे एक छोटा सा मैदान है, जिसके एक किनारे पर झाड़ियाँ के पीछे एक चबूतरा बना था। वह जगह सड़क से छिपी हुई थी। उस चबूतरे के पीछे जा कर त्री ने उसकी एक ईंट हटा कर दबाया तो उसमें एक छोटा सा गुप्त द्वार खुल गया, जिसमें वह तीनों झुक कर घुस गये।

वहाँ पर एक अन्य सुरंग थी जो नीचे जा रही थी, उसमें घुसने के बाद त्री ने गार्गी से कहा कि वहाँ शक्ति ढकने की आवश्यकता नहीं है।

रंगनाथ बोला, “दादा, हर जगह सुरंगें बनी हैं, इसका मतलब है कि गुरु जी बहुत सालों से इस खतरे का सामना करने के लिए तैयारी कर रहे थे?”

त्री ने धीरे से सिर हिला कर हामी भरी। वह जानता है कि बच्चे समझदार हैं, वह उनसे पूरी बात नहीं छुपा सकता। लेकिन अगर उनमें से कोई उस जापानी याकूज़ा के चँगुल में आ गया तो वह इनके दिमाग में घुस कर सब बातों को जान जायेगा, इसलिए वह उन्हें सब बातें नहीं बताना चाहता।

गार्गी बोली, “वह जापानी आदमी गुरु जी का पीछा क्यों कर रहा है? वह उनसे क्या चाहता है?”

“गुरु जी कोरिया से हैं। वह भी अनाथ थे और उन्हें भी एक बौद्ध भिक्षुक ने पाला था, जो बाद में उनके गुरु बने। उनके गुरु जी का नाम कूवी महाराज था और उनके पास हरिताश्म पत्थर की बनी माँ तारा की एक मूर्ति थी, जिसके प्रभाव से बच्चों की गुप्त-शक्तियाँ विकसित हो जाती हैं। कुछ जापानी लोग उस मूर्ति को पाना चाहते हैं", त्री ने बताया।

“यह हरिताश्म पत्थर क्या होता है?”

“हरिताश्म को अंग्रेज़ी में जेड कहते हैं, यह हरे रंग के संगमरमर जैसा होता है, लेकिन मुलायम होता है। उसकी मालाएँ और गहने भी बनाते हैं।"

“क्या यह पत्थर भारत में मिलता है? हमारे अखाड़े में भी तो हरे रंग की माँ तारा की कई मूर्तियाँ हैं?”

“यह पत्थर भारत में नहीं मिलता", त्री ने बताया, “हमारे उत्तर-पूर्व में एक देश है म्यंमार, उसे पहले बर्मा कहते थे, वहाँ पर हरिताश्म की खानें हैं। लेकिन सुना है कि हमारे मिज़ोराम में, म्यंमार की सीमा के पास भी, शायद यह पत्थर मिलते हैं।"

“इसका मतलब है कि जापानी लोग गुरु जी का चालीस-पैंतालिस सालों से पीछा कर रहे हैं?” रंगनाथ ने पूछा।

गार्गी बोली, “इतने सालों में तकनीकी ने इतनी तरक्की कर ली है, आज तो बहुत से अपराध इंटरनेट के माध्यम से होते हैं। इतने सालों के बाद भी वह लोग इस पुरानी बात के पीछे क्यों पड़े हैं?”

त्री मुस्कराया, बोला, “गुरु जी कहते हैं कि इस बात को यामागुचि नहीं भूल सकता, यह उसके आत्म-सम्मान की बात बन गयी है। तीन बार गुरु जी उसके चँगुल में आये और तीनों बार वह उसे चकमा दे कर भाग गये। आखिरी बार उसने गुरु जी को थाईलैंड में 1996 में खोजा था। उस बात को भी अब तीस साल हो गये। वह पहले वाले यामागुचि तो अब बहुत बूढ़े हो गये हैं, लेकिन उनका पोता है, रिकू यामागुचि, वह अब उनका गैंग चलाता है। शायद वह अपने दादा का अधूरा काम पूरा करना चाहता है।"

“पहले वह लोग गुरु जी को खोज लेते थे, तो वह उन्हें चकमा दे कर वहाँ से भाग कर नयी जगह में छिप जाते थे। लेकिन इस बार वह नहीं भागे, बल्कि उन्होंने समाधी ले ली, क्यों?”, गार्गी का दिमाग बहुत तेज़ है, वह हर अनकही बात को पकड़ लेती है। 

“क्यों कि अब गुरु जी बूढ़े हो रहे हैं, वह डरते हैं कि कहीं उनकी मृत्यु के बाद, यामागुचि के जासूस हमारे पीछे न लग जायें, और हमारे अनाथाश्रम पर हमला कर दें, क्योंकि मैं उनके उत्तराधिकारी हूँ।"

“क्या इसका मतलब है कि अब वह मूर्ति हमारे पास है? वह हमारे अनाथाश्रम में है?” गार्गी ने पूछा।

त्री फ़िर से मुस्कराया, सोचा कि गार्गी से कुछ छुपाना बहुत कठिन है, बोला, “जो मूर्ति गुरु जी कोरिया से लाये थे, कुछ साल पहले वह टूट गयी थी। उन्होंने उस मूर्ति के टुकड़ों को कुछ नयी मूर्तियों में जड़वा दिया है। उसमें से एक नयी मूर्ति हमारे पास, हमारे अनाथाश्रम में भी है।"

यह बातें करते-करते वह तीनों सुरंग को पार करके, वृद्धाश्रम से कुछ दूर, गुरु जी के ज़मीन के नीचे छिपे हुए तहखाने वाले कमरों में पहुँच गये।

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अगला अध्याय सोमवार 27 जुलाई को पढ़ सकेंगे

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सोमवार, जुलाई 20, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 15

अब तक की कहानी: जापानी याकूज़ा ताकानोरी हिन्दुस्तान आया है और जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी शक्तिदायिनी हरित तारा की मूर्ति चुराना चाहता है। उससे बचने के लिए जामुन बाबा मजूली द्वीप में जीवित समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में अपने गुँडो के साथ आ कर, लोगों को जान से मारने की धमकी देता है और वृद्धाश्रम में बाबा की समाधी को खोदने की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं होता। उधर, जामुन बाबा का शिष्य त्रिनेत्र गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम चलाता है, जहाँ उसके साथ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा हैं। जब उन्हें ताकानोरी के बारे में पता चलता है तो जामुन बाबा को बचाने के लिए, वे गँगटोक से मजूली द्वीप के लिए निकल पड़े हैं। इसके आगे पढ़िये ...

पहले अध्याय से पढ़िये - पिछला अध्याय पढ़िये 

अध्याय 15

मजूली द्वीप की यात्रा, असम, 3-4 मार्च 2026

 रात के दस बजे अचानक त्री के मोबाइल की घंटी बजी।

“काका, क्या हुआ?” उसने पूछा।

जगदीश बाबू ने पूछा, “तुम लोग कहाँ हो और यहाँ कब पहुँच रहे हो?”

“क्यों? हम लोग कोहोरा के पास हैं, आज रात को मरियानी पहुँच कर वहीं आसपास कहीं रुक जायेंगे, बहुत थक गये हैं। हम कल मजूली की फैरी पकड़ेंगे, दोपहर तक आप के यहाँ पहुँच जायेंगे।”

जगदीश बाबू ने उसे ताकानोरी की समाधी को खुदवाने की कोशिशों के बारे में बताया, बोले, “वह अपने कम्प्यूटर वाले लड़के सोमचाई को यहाँ छोड़ कर गया है। यह सोमचाई बुरा आदमी नहीं लगता। ताकानोरी कह रहा था कि वह नारायणपुर वापस जा रहा है लेकिन मेरे विचार में वह झूठ बोल रहा था, मुझे डर है कि वह यहीं कहीं, हमारे आसपास ही छुपा हुआ है और जैसे ही तुम यहाँ पहुँचोगे, वह तुम्हें पकड़ लेगा।"

त्री बोला, “आप चिंता नहीं कीजिये काका, वहाँ आने से पहले मैं आप को खबर कर दूँगा।"

उसके साथ बैठी आभा और पीछे बैठे बच्चे, सभी सो रहे थे लेकिन फोन की आवाज़ से आभा जाग गयी। जब उसने फोन बंद किया तो

वह धीरे से बोली, “वह जापानी नारायणपुर क्यों चला गया?”

त्री बोला, “मेरा ख्याल है कि उन्होंने जगदीश काका के मोबाइल में स्पाईवेयर लगाया है, जिससे वह लोग देख सकते हैं कि वह किसे फोन कर रहे हैं और उनकी बातें भी सुन सकते हैं। इसलिए सबसे पहले हमें इस मोबाइल के सिम-कार्ड को बदलना है।" उसने अपनी जेब से एक छोटा लिफाफा निकाल कर आभा की ओर बढ़ाया, बोला, “इसमें मोबाइल खोलने वाला पिन है और एक नया सिम-कार्ड है। उसे बदल दो और पुराने सिम को खिड़की से बाहर फ़ैंक दो।"

आभा ने मोबाइल को लिया और उसका सिम कार्ड बदलने लगी, तो त्री बोला, “मैंने काका से झूठ बोला है। हम लोग मरियानी नहीं रुकेंगे, आज रात को ही मजूली पहुँच जायेंगे। मेरे ख्याल में वह जापानी वहीं आसपास छुपा हुआ होगा और अपनी अन्वेषण-किरण से हमें खोजेगा, लेकिन हम उसके लिए तैयार होंगे।"

वह बोली, “तुम आज सुबह से लगातार गाड़ी चला रहे हो, हम लोग रास्ते में खाने के लिए भी बहुत थोड़ी देर के लिए रुके। हमने तो कुछ आराम किया है लेकिन तुम, क्या तुम्हें आराम भी बिल्कुल आवश्यकता नहीं है?”

त्री मुस्कराया लेकिन कुछ नहीं बोला।

वह लोग रात को साढ़े ग्यारह बजे के करीब गोसाईंगाँव के घाट पर पहुँचे। बच्चों को जगाने में कुछ समय लगा, त्री ने उन्हें पानी की बोतल दी और सबसे आँखो पर पानी के छींटें मारने के लिए कहा। कार को पार्किन्ग में छोड़ कर वह आगे पैदल ही बढ़े।

गुरु जी का पुराना नाववाला मछुआरा फरीद, अपनी नाव के साथ अँधेरे में उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। जैसा उन्होंने पहले से निश्चित किया था, यह बताने के लिए कि वहाँ कोई खतरा नहीं है, वह मिसिन्ग भाषा में एक गीत गा रहा था, “ओकोल कापे दूदोने नो, केराद कमाइ मेमोदाग ...”।

उसके गीत की आवाज़ सुनते हुए, त्री उन्हें वहाँ तक ले आया। फरीद की नाव घाट पर तैयार खड़ी थी, और घाट खाली था। उसने उन्हें नाव में बिठाया और बिना आवाज़ किये, धीरे-धीरे चप्पु चलाते हुए, उसे ब्रह्मपुत्र नदी की धारा के बीच में ले आया।

आभा ने फुसफुसा कर त्री से पूछा, “यह आदमी ऐसे ही अँधेरे में नाव कैसे चलायेगा? कहीं फँस गये तो?”

त्री ने धीरे से उसका हाथ दबाया, कुछ बोला नहीं। गोसाईंगाँव से कमलाबाड़ी का फैरी टर्मिनल करीब दस किलोमीटर दूर था। त्री थका हुआ था, जल्दी ही आँखें बंद करके बैठे-बैठे सो गया। अँधेरे में बच्चे भी दोबारा सो गये। केवल आभा डरी हुई थी, वह जाग रही थी।

वह एक बार पहले भी मजूली आयी थी, जानती थी कि वहाँ नदी के बीच में बहुत सारे द्वीप हैं, जिनके आसपास पानी की गहराई कम हो जाती है और वहाँ पर नाव फँस सकती है। लेकिन वह यह नहीं जानती थी कि नाव वाला फरीद वहीं पैदा हुआ है और बचपन से उसने वहाँ नाव चलाई है, वह रास्ते को अच्छी तरह से जानता है।

उन्हें मजूली पहुँचने में करीब तीन घंटे लगे। उन्हें कमलाबाड़ी उतार कर फरीद वहाँ रुका नहीं, त्री को नमस्कार करके तुरंत चला गया।

त्री ने गार्गी से कहा, “हमारी सबकी शक्ति-लहरों को ढक दो।"

गार्गी ने तुरंत सबकी शक्ति लहर को ढका, फ़िर बोली, “दादा, हम बहुत लोग हैं, मैं थक जाऊँगी, अधिक देर नहीं कर पाऊँगी।"

त्री बोला, “हमें थोड़ी देर के लिए ही चाहिये, केवल दस मिनट की बात है।" 

वह उन्हें घाट से कुछ दूर बामुनगाँव नामघर की ओर ले गया। नामघर के पीछे दो-तीन घर थे, उनमें से एक घर के दरवाज़े पर उसने तीन बार घंटी बजायी तो दरवाज़ा खुला। भीतर साड़ी पहने हुए एक लड़की खड़ी थी, उसने त्री को हाथ जोड़ कर नमस्ते की लेकिन कुछ नहीं बोली और उन्हें सीधा एक कोठरी में ले गयी, जहाँ पर नीचे जाती हुई सीढ़ियाँ थीं। उसने उन्हें नीचे जाने का इशारा किया।

करीब चालिस सीढ़ियाँ थीं, नीचे जाते हुए त्री ने गार्गी से कहा, “अब हमारी शक्ति-लहरों को ढकने की आवश्यकता नहीं है।"

आभा ने पूछा, “ज़मीन की सतह के नीचे से शक्ति-लहर का पता नहीं चलता?” तो गार्गी ने सिर हिला कर हामी भरी।

नीचे तहखाने में बिजली लगी थी। एक ओर गुसलखाना और टॉयलेट बने थे, दूसरी ओर रसोई थी और बीच में दीवार के साथ तीन-टायर वाले रेलगाड़ी के डिब्बे जैसे बिस्तर लगे थे। बाकी सबको आराम करने के लिए कह कर, त्री, वसंत और माधव, वह तीनों कुछ सीढ़ियाँ चढ़ कर आधे रास्ते तक ऊपर आये। उन्हें ऊपर जाते देख कर आभा भी उनके पीछे ऊपर आयी।

वहाँ त्री ने वसंत से कहा, “कोशिश करके देखो कि क्या तुम बाहर के पेड़-पत्तों से बात कर सकते हो?”

वसंत ने एक मिनट आँखें बंद की, फ़िर सिर हिला कर मना किया, तो वह लोग कुछ अन्य सीढ़ियाँ चढ़ कर थोड़ा और ऊपर आये। वहाँ पहुँच कर वसंत ने फ़िर से आँखें बंद कीं और त्री से बोला, “दादा, यहाँ से मैं उनसे बात कर सकता हूँ।"

"पूछो कि मजूली में और हमारे आसपास कहीं पर कोई शक्ति-लहर दिख रही है?”

वसंत ने आँखें बंद कर लीं, कुछ देर के बाद आँखें खोल कर बोला, “वह कहते हैं कि दक्षिण में जहाँ पर मजूली द्वीप समाप्त होता है,

वहाँ पर नदी के दूसरी ओर छह-सात किलोमीटर दूर जा कर एक शक्ति-लहर दिखती है।"

त्री ने थोड़ी देर तक सोचा, फ़िर माधव को घुमाया और कहा, “सामने उस दिशा में देखो, यहाँ से करीब तीस किलोमीटर दूर, तुम्हें वहाँ कोई शक्ति-लहर महसूस होती है?”

माधव ने भी कुछ क्षणों के लिए आँखें बंद की फ़िर बोला, “नहीं दादा, मुझे ऐसा कुछ नहीं दिखा।"

त्री बोला, “इसका मतलब है कि ताकानोरी ने ठीक कहा था, वह सचमुच नारायणपुर में ही है। दूसरी बात है कि उसकी शक्ति-लहर कमज़ोर है, क्योंकि वह माधव को यहाँ से नहीं दिखी। इसका मतलब है कि वह हमें इतनी दूर से नहीं खोज सकता, अवश्य कल हमें यहाँ पर खोजने आयेगा।" 

वह चारों नीचे लौट आये और त्री ने उन्हें भी सोने के लिए कहा। आभा चुपचाप, जिस बिस्तर पर तृप्ति सोई थी, उसके साथ जा कर लेट गयी। अपनी बेटी को खोने के बाद यह पहली बार थी कि वह किसी बच्चे के साथ इस तरह से बिस्तर पर लेटी थी। अचानक उसे अपनी बेटी की बहुत याद आयी और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। बहुत देर तक वह चुपचाप रोती रही, फ़िर उसे भी नींद आ गयी।

सुबह आठ बजे त्री ने सबको जगाया और मुँह-हाथ धो कर नाश्ता करने के लिए कहा। नाश्ते के लिए तहखाने की रसोई में केले, अनानास और पका हुआ कटहल रखे थे। जब सबने अपनी प्लेटों में नाश्ता ले लिया तो त्री बोला, “नाश्ते के बाद तीन लोग - मैं, रंगनाथ और गार्गी, हम गुरु जी के वृद्धाश्रम की जाँच करने जायेंगे। उनका आश्रम यहाँ से करीब तीस किलोमीटर दूर है। मेरे विचार में उस जापानी की अन्वेषण-किरण केवल तीन-चार किलोमीटर की परिधि में काम करती है, लेकिन फ़िर भी वहाँ पहुँचते ही गार्गी करीब बीस-पच्चीस मिनट के लिए हमारी शक्ति-लहरों को ढक लेगी। वहाँ जाँच करके हम लोग शाम तक लौट आयेंगे।"

"और हम लोग? क्या हम सारा दिन इस तहखाने में बंद रहेंगे?”, आभा ने पूछा।

“तुम लोग यहीं रहोगे, पर मैं तुम्हें एक गुप्त रास्ता दिखाऊँगा, तुम लोग वहाँ से आसपास थोड़ा-बहुत घूम सकते हो, पर दूर नहीं जा सकते।"

आभा बोली, “अच्छा बताओ, रात को वसंत ने उस जापानी व्यक्ति की शक्ति-लहर को कैसे खोजा था?”

त्री ने उसे बताया कि पेड़-पौधे भी गुप्त-शक्ति की लहरों को महसूस कर सकते हैं और आपस में संदेश भेज सकते हैं। इस तरह से वसंत चाहे तो उसे पेड़ों से, बहुत दूर की खबरें भी आसानी से मिल जाती हैं। उसने अपना मोबाइल निकाल कर उस पर गूगल मैप खोला और मजूली द्वीप के दक्षिणी भाग को आभा को दिखाया, बोला, “हमें यहाँ जाना है, गुरु जी का वृद्धाश्रम वहीं है। वह जापानी नदी के दूसरे ओर, उनके आश्रम से करीब छह-सात किलोमीटर दूर है, वहाँ हमारी प्रतीक्षा कर रहा है।"

आभा ने थोड़ी देर सोचा, फ़िर पूछा, “रात को तुमने माधव से भी आँखें बंद करके शक्ति-लहर को देखने के लिए कहा था?”

“क्योंकि माधव की दो दृष्टि-शक्तियाँ है, वह अपनी आँखों से और मन की आँखों से, दोनों से दस-बारह किलोमीटर की दूरी तक देख सकता है। शक्ति-लहरों से एक विशेष तरह का प्रकाश निकलता है, वह उसे पहचान लेता है। वैसे तो वह जापानी बहुत दूर है, इसलिए मुझे पता था कि माधव को उसकी शक्ति-लहर नहीं दिखेगी, लेकिन मैंने उससे यह इस लिए पूछा था ताकि हमें डबल पक्का हो जाये कि आसपास हमें खोजने वाला कोई नहीं है।"

आभा बोली, “यह शक्ति वाली बातें मेरे लिए नयी हैं, इन्हें समझने में मुझे कुछ समय लगेगा।"

कुछ देर बाद त्री ने उससे पूछा, “जब तुम सोने गयीं थीं, उस समय कुछ हुआ था?”

“क्यों?”

“क्योंकि मैंने देखा कि अचानक ही फर्श पर चिलचट्टे, कानखजूरे, बिच्छू, छिपकलियाँ, आदि जीव-जन्तु निकल आये, और वह सब तुम्हारे बिस्तर के आसपास घूम रहे थे। मुझे लगा कि वह तुम्हारी पहरेदारी कर रहे हैं। थोड़ी देर के बाद शायद तुम सो गयीं और वह सभी अपने बिलों में वापस लौट गये। जब वह दिखते हैं तो मुझे पता चल जाता है कि तुम्हारी शक्ति जागृत है।"

उसकी बात सुन कर आभा कुछ देर तक सोचती रही, फ़िर रुँधे स्वर में बोली, “बेटी खोने के बाद आज पहली बार एक छोटी बच्ची के साथ इस तरह से लेटी थी, इसलिए उसकी याद आ गयी तो मुझे रोना आ गया।"

त्री सोचता हुआ बोला, “इसका मतलब है कि जब तुम्हारे मन में भावनायें तीव्र होती हैं, तब तुम्हारी शक्ति आपने आप जागृत हो जाती है।"

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गुरुवार, जुलाई 16, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 14

अब तक की कहानी: जापानी याकूज़ा ताकानोरी हिन्दुस्तान आया है और जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी शक्तिदायिनी हरित तारा की मूर्ति चुराना चाहता है। उससे बचने के लिए जामुन बाबा मजूली द्वीप में जीवित समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में अपने गुँडो के साथ आ कर, लोगों को जान से मारने की धमकी देता है और वृद्धाश्रम में बाबा की समाधी को खोद कर भीतर देखना चाहता है। उधर, जामुन बाबा का शिष्य त्रिनेत्र गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम चलाता है, जहाँ उसके साथ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा हैं। जब उन्हें ताकानोरी के बारे में पता चलता है तो जामुन बाबा को बचाने के लिए, वे गँगटोक से मजूली द्वीप के लिए निकल पड़ते हैं। इसके आगे पढ़िये ...

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अध्याय 14

 मजूली द्वीप, असम, 3 मार्च 2026 रात्रि

शाम को जामुन बाबा की समाधी को देखने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ कम हो गयी। जब सूरज डूबा और श्रद्धालु चले गये तो वृद्धाश्रम के द्वार बंद हो गये।

ताकानोरी ने पहले से ही बाबा की समाधी को खुदवाने के लिए मजदूर बुलवा लिये थे।

जगदीश बाबू ने एक बार फ़िर उसे रोकने की कोशिश की, बोले, “आपने देखा कि आज कितने लोग उनकी समाधी पर प्रार्थना करने आये? बाबा को यहाँ के लोग बहुत मानते हैं। कल उन्हें पता चलेगा कि किसी ने उनकी समाधी को तोड़ा है तो वह बहुत गुस्सा होंगे और यहाँ दंगा भी हो सकता है।"

ताकानोरी बोला, “मुझे वार्निन्ग देने के लिए धन्यवाद। उसे खोद कर, भीतर देख कर, हम उसे बंद कर देंगे, और यह सारा काम रातों-रात पूरा हो जायेगा। कल किसी को पता नहीं लगना चाहिये कि हमने समाधी को खोदा है। ध्यान रहे कि अगर यह खबर बाहर फ़ैली तो सबसे पहले मैं तुम्हारी गर्दन काट कर, तुम्हारे सिर को गेट पर टाँग दूँगा।"

उन्होंने आठ मजदूर बुलाये थे। जब बटेर ने उन्हें बताया कि क्या काम करना है तो उन्होंने तुरंत मना कर दिया, बोले कि उन्हें पैसे नहीं चाहिये, वह यह काम नहीं कर सकते।

ओरी वहीं खड़ा था, उसने अपनी कताना तलवार निकाल ली, बोला, “जो यह काम नहीं करेगा, मैं  उसे काट कर यहीं गड़वा दूँगा, तब तुम अपने बाबा जी के साथ रह कर, हमेशा के लिए उनकी सेवा करते रहना।"

बटेर, लक्की और मटरू ने पिस्तौलें निकाल लीं और मजदूरों को घेर लिया। डरे हुए मजदूरों ने आखिर में फावड़े उठा लिये। सबसे पहला काम था समाधी वाली जगह से काला पत्थर हटाना। उस पत्थर को मजदूरों ने एक दिन पहले ही वहाँ रखा था, उसे हटाने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिये थी, लेकिन बहुत मेहनत के बाद भी, मजदूर उसे अपनी जगह से नहीं हिला पाये।

बटेर ने मटरू को इशारा किया, कहा, “यह सब लोग बेकार की ड्रामेबाजी कर रहे हैं। तुम वह लोहे का सरिया ले कर उसे इस पत्थर की साईड में घुसा दो, जब उस पर जोर लगायेंगे तो यह पत्थर आराम से ऊपर उठ जायेगा।"

मटरू ने लोहे का नुकीली नोक वाला सरिया लिया और जहाँ पत्थरों में जोड़ था, उस पर हथौड़े मार कर उसे वहाँ घुसाने की कोशिश की। पता नहीं कैसे, पत्थर का एक टुकड़ा टूट कर सीधा बटेर की बायीं आँख में लगा और उसे चीरता हुआ आँख के भीतर घुस गया। बटेर के हाथ से पिस्तौल छूट कर नीचे गिरी और चीख मार कर उसने हाथों से अपनी आँख को ढकने की कोशिश की, कुछ क्षणों में उसका हाथ और चेहरा उसके खून से सन गये।

जब उसकी पिस्तौल नीचे गिरी तो फर्श के पत्थर से टकरा कर उसका ट्रिगर चल गया और गोली निकल कर मटरू के दायें पैर में जा लगी। गालियाँ देते हुए मटरू वहीं पैर पकड़ कर ज़मीन पर बैठ गया, उसके हाथ से लोहे का सरिया छूट कर गिर गया।

ओरी बहुत गुस्सा हुआ, बोला, “तुम लोग आदमी हो या जोकर? एक छोटा सा काम करने में तुम लोगों ने यह क्या तमाशा लगाया है?”

जगदीश बाबू बोले, “समाधी-स्थल पर खुदाई की कोशिश करके तुमने घोर पाप किया है, इसीलिए आज यहाँ पर इतना खून बहा है। अभी भी समय है, मैं कहता हूँ कि तुम लोग रुक जाओ।"

मटरू चिल्लाया, “हमें डॉक्टर की ज़रूरत है, अस्पताल जाना है, एम्बुलैंस को बुलाओ।"

उधर बटेर "हाय, हाय" करके चिल्ला रहा था। जगदीश बाबू ने उसका हाथ हटा कर उसकी आँख को देखा, वह पत्थर उसकी आँख के भीतर घुसा हुआ था। वह बोले, “इसकी यह आँख तो पूरी नष्ट हो गयी है, इसे तुरंत अस्पताल ले जाना होगा। हमारा प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र, कमलाबाड़ी सत्र के पास है, यहाँ से बीस-बाईस किलोमीटर का रास्ता होगा, वहाँ पहुँचने में कम से कम घंटा-डेढ़ घंटा लगेगा। बीच में कुछ रास्ता कच्ची सड़क का है और अँधेरे में वहाँ जाना आसान नहीं होगा।"

बटेर को चक्कर आ रहे थे, वह बेहोश सा हो कर ज़मीन पर लेट गया। उसकी आँख से खून बहना नहीं रुका था और वह खून उसके सिर के आसपास जमा हो रहा था।

मटरू के पैर के आसपास भी फर्श खून से लाल हो गया था, वह ज़मीन पर बैठ कर चिल्ला रहा था। लक्की उनके पास खड़ा था, उसे गुस्सा आ गया, वह ताकानोरी से बोला, “अरे, इनके लिए कुछ करो, तुम इंसान हो या हैवान?”

ओरी को समझ नहीं आया कि उसने क्या कहा, लेकिन उसके बोलने के अन्दाज़ से समझ गया कि वह अपने साथियों के लिए मदद माँग रहा है, बोला, “यह सब तुम लोगों की लापरवाही से हुआ है, अब तुम उसका फ़ल भुगतो।"

जगदीश बाबू बोले, “आप की कार में इन्हें अस्पताल भेज देते हैं, बेचारे बहुत पीड़ा में हैं।”

ओरी बोला, “मेरी कार में नहीं, इन्हें अस्पताल ले जाने के लिए किसी दूसरी गाड़ी का प्रबंध करो।" फ़िर मजदूरों से बोला, “इन दोनों आदमियों को उठा कर उधर किनारे पर बिठा दो, और तुम उस पत्थर को हटाओ।"

जगदीश बाबू को मालूम था कि फुलानीबाड़ी के स्कूल के करीब एक आदमी आटोरिक्शा चलाता है, उन्होंने उसे बुलाने के लिए अपने एक व्यक्ति को भेजा।

बटेर और मटरू के घायल होने से मजदूर और भी डर गये थे, ओरी के कहने के बाद भी वह अपनी जगह से नहीं हिले, बल्कि अपने फावड़े वहीं रख कर वे वहाँ से जाने लगे।

ओरी गुस्से में आग-बबूला हो गया, उसने पिस्तौल निकाल ली और मजदूरों की ओर निशाना लगाते हुए बोला, “एक कदम भी आगे बढ़ाया तो तुम्हें भून कर रख दूँगा।"

जगदीश बाबू ने पास जा कर उसे धीरे से कहा, “गोलियाँ चलीं तो शोर होगा और आसपास के घरों से लोग यहाँ आ जायेंगे। कितनों को मारेंगे? कल सुबह तक यह बात सारे मजूली द्वीप में फ़ैल जायेगी और लोग डँडे-हँसली-छुरी-चाकू जो मिलेगा, उसे ले कर तुमसे लड़ने आ जायेंगे, तो क्या तुम पाँच सौ लोगों का सामना कर पाओगे? और उसके बाद तुम यहाँ से जीवित निकल पाओगे?”

मजदूर चले गये और ओरी वहाँ पर हाथ मसलता हुआ खड़ा रह गया। थोड़ी देर में फुलानीबाड़ी से आटो वाला आ गया तो लक्की अपने दोनों साथियों को उसमें बिठा कर उन्हें कमलाबाड़ी के प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र में ले गया।

सोमचाई ने यह सारा तमाशा दूर से देखा। जब उसे लगा कि ओरी कुछ शाँत हुआ है तो वह उसके पास आया, बोला, “आप तलवार और बंदूक, सब कुछ चला सकते हैं, लड़ भी सकते हैं, लेकिन मुझे तो सिर्फ कम्प्यूटर का काम आता है। मैंने जीवन में कभी किसी से लड़ाई नहीं की। अब हम यहाँ अकेले रह गये हैं, हमें आगे का भी सोचना होगा। यहाँ के लोगों से बात करने के लिए हमारे पास स्थानीय आदमी होने चाहियें।”

ओरी सोच में पड़ गया, बोला, “ठीक है, मैं फोन करके कुछ और आदमी बुलाता हूँ।" उसे चिंता होने लगी कि जब वह यह बातें रिकू यामागुचि को बतायेगा तो वह बहुत गुस्सा होगा कि क्या वह एक पत्थर भी नहीं हटवा पाया? अंत में उसने सोचा कि वह रिकू को कुछ नहीं बतायेगा। वह बोला, “लेकिन यहाँ से जाने से पहले, मैं इस पत्थर को हटाना चाहता हूँ।"

जब ओरी ने आगे बढ़ कर ज़मीन से लोहे का सरिया उठाया तो उस पर मटरू का खून लगा हुआ था।

जगदीश बाबू बोले, “आप ने देखा कि जिसने भी बाबा की समाधी की मर्यादा भंग करने की कोशिश की, उनका क्या हुआ? फ़िर भी आप नहीं समझे? आप क्यों अपनी जान को खतरे में डालना चाहते हैं?”

ओरी ने यह दिखाने के लिए कि उसे इन अँधविश्वासों की बिल्कुल परवाह नहीं है, हथोड़ा उठा कर उससे सरिये को पत्थरों के बीच में घुसाने के लिए मारने लगा। शायद उस पर लगे खून की वजह से सरिया चिकना हो गया था और फिसल रहा था, या शायद उसने हथोड़ा ठीक से नहीं मारा। जो भी कारण था, वह सरिया पत्थरों के बीच में जाने के बजाय, फर्श की सतह पर फ़िसल गया और ताकानोरी भी उसके पीछे फिसल कर गिरा। वैसे उसे कहीं विशेष चोट नहीं लगी लेकिन उसे गिरा हुआ देख कर जगदीश बाबू और सोमचाई हँसने लगे।

जगदीश बाबू बोले, “साहिब, अभी भी मान जाईये। जब तक बाबा खुद नहीं चाहेंगे, आप उनकी समाधी में बाधा नहीं डाल सकते।"

ओरी को बहुत गुस्सा आ रहा था, उसका मन किया कि वह जगदीश बाबू और सोमचाई, दोनों के सिर अपनी तलवार से काट दे, लेकिन उसने आत्मसंयम दिखाते हुए अपने गुस्से को दबाया और उठ कर खड़ा हुआ। सोमचाई से बोला, “वह स्कूल के लड़कों वाले वीडियो जो तुमने मुझे दिखाये थे, मैं उन्हें दोबारा देखना चाहता हूँ।"

सोमचाई ने तुरंत मोबाइल निकाल कर एक वीडियो को खोला और उसे दिखाया। ओरी ने उसे तीन-चार बार देखा, फ़िर एक जगह पर उसे रोक कर सोमचाई को दिखाया, बोला, “वह बाबा जब समाधी के लिए जा रहा था तो उसके कटोरे में एक मूर्ति थी, वह इस वीडियो में दिखती है, तुम बताओ कि वह कितनी बड़ी है?”

सोमचाई ने वीडियो को ध्यान से देखा, उसमें कटोरे में रखी मूर्ति साफ दिख रही थी। वह बोला, “उनके हाथों के आकार से तुलना करें तो वह तीन-साढ़े तीन इँच की लगती है।"

ओरी बोला, “यह वह प्रतिमा नहीं है, जो यामागुचि को चाहिये। जो हमें चाहिये, वह प्रतिमा आठ-साढ़े आठ इँच से बड़ी होनी चाहिये। यानि वह उसे अपने साथ समाधी में ले कर नहीं गया।"

जगदीश बाबू ने उनकी बातें सुनी तो मन ही मन मुस्कराये, लेकिन उन्होंने अपनी खुशी को चेहरे पर ज़ाहिर नहीं होने दिया।

ताकानोरी बोला, “इस समय यहाँ रुकने से मेरा कुछ फायदा नहीं है। बाबा का उत्तराधिकारी कल यहाँ पहुँचेगा। सोमचाई, तुम यहाँ रुको और जब वह आये तो मुझे खबर करो॑। मैं आज रात को ही नारायणपुर लौट जाता हूँ, वहाँ से अन्य आदमियों का प्रबंध भी करूँगा।"

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सोमवार, जुलाई 13, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 13

अब तक की कहानी: जापानी याकूज़ा ताकानोरी हिन्दुस्तान आया है और वह जामुन बाबा को खोज रहा है क्योंकि उसे उनकी शक्ति वाली हरित तारा की मूर्ति चाहिये। उससे बचने के लिए जामुन बाबा मजूली द्वीप में जीवित समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में अपने गुँडो के साथ आया है और वहाँ लोगों को जान से मार देने की धमकी दे कर उनसे बाबा के बारे में पूछता है। जामुन बाबा का शिष्य त्रिनेत्र गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम चलाता है, जहाँ उसके साथ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा हैं। जब उन्हें ताकानोरी के बारे में पता चलता है तो जामुन बाबा को बचाने के लिए, त्रिनेत्र, आभा और पाँचों बच्चे गँगटोक से मजूली द्वीप की यात्रा पर निकलते हैं। इससे आगे पढ़िये ...

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अध्याय 13

असम यात्रा, 3 मार्च 2026

गार्गी ने आभा से पूछा, “दीदी, मणिपुर कैसी जगह है? आप इम्फाल में रहती हैं?”

“बहुत सुंदर है हमारा मणिपुर", आभा बोली, “लेकिन मैं इम्फाल में नहीं रहती। इम्फाल हमारी राजधानी है, बड़ा शहर है। उसके दक्षिण में एक झील है, लोकटक झील, वह बहुत सुंदर जगह है। मैं उस झील के पास एक गाँव में रहती हूँ, थमनापोकपी गाँव, वहाँ मेरे पति का पुराना घर है।"

तृप्ति बोली, “और आप के घर में कौन-कौन हैं?”

आभा की आँखें अचानक नम हो गयीं, धीरे से बोली, “बस मैं हूँ, मेरे ससुर हैं और हमारा कुत्ता है, डब्लयू। वैसे उसका नाम विलसन है लेकिन मेरे पति उसे डब्लयू बुलाते थे।"

त्री ने बात बदलने के लिए पूछा, “मणिपुर के अपने जीवन के बारे में कुछ और बताओ, हम वहाँ के बारे में कुछ नहीं जानते।"

वह बोली, “हमारा परिवार मैतेई है। हमारे मैतेई लोगों में सात वंश हैं, हमारी भाषा में उन्हें सालाई कहते हैं, जैसे कि खुमान, मैरंग, अंगोम, वगैरा। मैं मैरंग सालाई में पैदा हुई थी और मेरे पति का परिवार खुमान सालाई की ओइनम जाति का है। खुमान को ऊँची सालाई मानते हैं। हम लोगों के प्राचीन पाराम्परिक विश्वास को सनमही कहते हैं क्योंकि हम सनमही देवता को बहुत मानते हैं, जोकि हमारे सृष्टि देवता सिदाबा मापू के बेटे हैं। चार-पाँच सौ साल पहले मणिपुर में वैष्णव धर्म आया और फ़ैल गया। इस तरह से हमारे परिवार में हम वैष्णव और सनमही दोनों को मानते हैं।"

त्री बोला, “मेरे गुरु जी कहते हैं कि हमारे देशों में धर्म ऐसे ही बनते-बदलते हैं, कि नयी सोचें आती हैं और पुरानी सोच में घुल-मिल जाती है, फ़िर समय के साथ दोनों के देवी-देवता भी घुल-मिल जाते हैं। उनके कोरिया देश में पहले सिन्दो धर्म था, जिसमें मानते हैं कि प्रकृति, पहाड़, नदी, आकाश, सब में आत्मा होती है। फ़िर जब वहाँ पर बौद्ध धर्म आया तो सिन्दो और बौद्ध, वह दोनों विचार घुल-मिल गये। वैसे तो मेरे गुरु जी बौद्ध भिक्षुक हैं पर भारत आने के बाद, वह शिव-भक्त भी बन गये।"

आभा बोली, “जब मैं चित्र बनाती हूँ, तो उसमें वैष्णव और सनमही देवी-देवता मिला कर बनाती हूँ।"

गार्गी ने पूछा, “सनमही देवता कैसे होते हैं?”

आभा मुस्करायी, बोली, “यह तो देवी-देवता पर निर्भर करता है। जैसे कि पखांगबा को भूरे रंग के सींग वाले हिरण के रूप में दिखाते हैं। एक बार सिदाबा मापू ने अपने बेटों, सनमही और पखांगबा को ब्रह्माँड का चक्कर लगाने के लिए कहा तो सनमही सचमुच पूरी दुनिया का चक्कर लगाने चला गया, जबकि पखांगबा ने पिता के सिंहासन का चक्कर लगाया और बोला कि यही मेरा ब्रह्माँड है।"

त्री बोला, “बिल्कुल यही कहानी शिव जी और उनके दोनों पुत्रों, कार्तिकेय और गणेश की भी है। उसमें कार्तिकेय सारी दुनिया का चक्कर लगाने निकल जाते हैं, जबकि गणेश जी केवल अपने माता-पिता की परिक्रमा करते हैं। गुरु जी भी यही कहते हैं कि जब हमारे धर्म मिलते हैं, तो उनकी कहानियाँ भी आपस में मिल जाती हैं।"

इसी तरह बातें करते हुए उनका रास्ता कट रहा था और वे लोग अलीपुर द्वार से हो कर भाटीबाड़ी पहुँच गये। वहाँ त्री ने एक ढाबे पर कार रोकी, बोला, “असम सीमा यहाँ से करीब तीस किलोमीटर आगे है, हम यहाँ पर थोड़ी देर ही रुकेंगे। अगर हो सके तो मैं आज रात तक जोरहाट पहुँचना चाहता हूँ।"

वहाँ से खाना खा कर वह लोग चलने ही वाले थे कि जगदीश बाबू का फोन आया, बोले, “त्री बेटा, तुम कहाँ पहुँचे हो? आज सुबह जामुन बाबा को खोजते हुए यहाँ कुछ बुरे आदमी आये हैं। उनका सरदार ताकानोरी नाम का एक जापानी है। उन्होंने हमारे साथ मार-पिटाई की और आज रात को वह बाबा की समाधी खोदने का प्लैन बना रहे हैं। जो चिट्ठी बाबा ने तुम्हारे लिए छोड़ी थी, वह उन्होंने ले ली है। वह जानते हैं कि तुम आ रहे हो और वे तुम्हारे आने की प्रतीक्षा में हैं।"

त्री बोला, “काका, आप हमारी चिंता नहीं करें और वह जो चाहते हैं उन्हें करने दीजिये, आप बीच में नहीं पड़िये, समझे? आप सावधान रहिये, और जब तक कोई एमरजैंसी न हो मुझे दोबारा टेलीफोन न करें।"

जब उनकी बात खत्म हुई तो रंगनाथ ने पूछा, “दादा, उन लोगों से लड़ने के लिए हमारा क्या प्लैन है?”

“ताकानोरी के पास गुप्त-शक्तियाँ हैं। एक तो अन्वेषण-किरण है जिससे वह आसपास लोगों की शक्ति-लहरों को खोज सकता है। उसकी और कौन सी शक्तियाँ हैं, हमें नहीं मालूम। सबसे पहले हमें यह समझने की कोशिश करनी है कि उसकी शक्तियाँ कौन सी हैं, लेकिन हमें होशियार रहना पड़ेगा क्योंकि वह अन्वेषण-किरण से हमें पहचान सकता है।"

“अन्वेषण-किरण कैसे काम करती है?” वसंत ने पूछा।

“हमारी कुछ शक्तियाँ हर समय जागृत रहती हैं, जैसे माधव की दृष्टि-शक्ति और रंगनाथ की श्रवण-शक्ति। लेकिन कुछ शक्तियों को ध्यान लगा कर जगाना पड़ता है, वह हमेशा काम नहीं करतीं, जैसे मेरी गिरगिट-शक्ति और गार्गी का अजगर-पाश। अन्वेषण-किरण भी हमेशा काम नहीं करती, उसे जगाना पड़ता है।"

गार्गी बोली, “जैसे मैं लोगों के दिमाग में घुस कर देख सकती हूँ कि वह क्या सोच रहे हैं, क्या अन्वेषण-किरण भी वैसी ही होती है?”

"मेरे विचार में तुम्हारी और उसकी शक्ति भिन्न हैं। तुम लोगों के विचार पढ़ सकती हो, जबकि अन्वेषण-किरण से शक्ति वाले लोगों को खोज सकते हैं, लेकिन वह उनके विचार नहीं पढ़ सकते", त्री बोला, “लेकिन मुझे इसका पक्का पता नहीं है, हमें इसकी जाँच करनी होगी।"

गार्गी बोली, “इसका मतलब है कि हमें अपनी शक्ति-लहरों को ढक कर रखना होगा।"

आभा बोली, “मेरी जीवों को आकर्षित करने वाली शक्ति ठीक से विकसित नहीं हुई है, लेकिन मैं सोते-सोते भी दूर से लोगों की बातें सुन सकती हूँ। अगर मैं किसी बहाने से उसके पास जाऊँ तो शायद वह मुझे न पहचाने और मैं उसकी बातें सुन सकती हूँ?”

त्री, रंगनाथ और गार्गी, तीनों एक साथ बोले, “हम आप को खतरे में नहीं डाल सकते। अगर उसने आप को पकड़ लिया तो?”

तृप्ति बोली, “मैं और माधव, आभा दीदी के बच्चे बन कर इनके साथ जा सकते हैं। मेरी शक्तियाँ भी ठीक से विकसित नहीं हुईं लेकिन जरूरत पड़ने पर मैं कुछ देर के लिए अपनी और इनकी शक्ति-लहरों को ढक सकती हूँ।"

गार्गी बोली, “लेकिन माधव की शक्तियाँ विकसित हैं, तुम्हारे लिए उसे छिपाना कठिन होगा।"

तृप्ति बोली, “तो मैं और आभा दीदी, हम दोनों माँ-बेटी बन कर थोड़ी देर के लिए उनके पास जायेंगी और उनकी बातें सुन कर वापस लौट आयेंगीं?”

त्री बोला, “नहीं, ताकानोरी मेरी प्रतीक्षा कर रहा है। उसे पता नहीं है कि हम सब के पास शक्तियाँ हैं। यह हमारा रहस्य ही हमारा गुप्त-शस्त्र है, उसे इसका पता नहीं चलना चाहिये।"

गार्गी बोली, “वहाँ जा कर हम कहाँ रहेंगे? अगर उसके आसपास रहेंगे तो वह हमें खोज नहीं लेगा?”

त्री बोला, “तुम उसकी चिंता नहीं करो, हमारे लिए वहाँ एक छिपने की जगह है। अब तुम सभी थोड़ी देर सोने की कोशिश करो। हम लोग वहाँ पर कल सुबह के तीन-चार बजे से पहले नहीं पहुँचेगे, और वहाँ हमें लड़ने के लिए सतर्क और तैयार रहना है, इसलिए तुम इस समय जितना आराम करोगे उतना बेहतर होगा।"

वसंत बोला, “दादा, उन्होंने टेलीफोन पर कहा था कि गुँडे आज रात को गुरु जी की समाधी को खोदेंगे, हम उसे कैसे रोकेंगे?”

“तुम उसकी चिंता नहीं करो", त्री मुस्कराया, “गुरु जी में बहुत शक्ति है, वह अपनी रक्षा खुद कर सकते हैं।"

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गुरुवार, जुलाई 09, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 12

अब तक की कहानी: ताकानोरी ने जामुन बाबा को खोज लिया था, लेकिन उससे बचने के लिए बाबा ने जीवित समाधी ले ली थी। गँगटोक से त्रिनेत्र अपने साथ पाँच बाल-तिरंगा यौद्धाओ को साथ ले कर बाबा की रक्षा के लिए मजूली के वृद्धाश्रम में जाने के लिए निकल चुका है, उनके साथ आभा भी आ रही है। इधर ताकानोरी ने बाबा के वृद्धाश्रम का पता लगा लिया और वहाँ पर अपने साथी सोमचाई और 3 गुँडों के साथ वहाँ पहुँच गया है। ताकानोरी को जामुन बाबा की गुप्त शक्ति वाली हरित तारा की मर्ति खोजनी है। इससे आगे पढ़िये ...

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अध्याय 12

मजूली द्वीप, असम, 3 मार्च 2026

आश्रम के दफ्तर का द्वार खुला था लेकिन भीतर कोई नहीं था, सब लोग बाहर मैदान में थे।

जगदीश बाबू वहाँ पास में खड़े थे, उन्होंने ताकानोरी और उसके आदमियों को दफ्तर में जाते देखा तो वह उनके पीछे-पीछे आये, बोले,

“अगर आप को जामुन बाबा की समाधी देखनी है तो बाहर कतार में खड़ा होना पड़ेगा, यहाँ वृद्धाश्रम में आप को कुछ नहीं मिलेगा।"

ओरी ने अंग्रेज़ी में पूछा, “यह बाबा आश्रम में कहाँ रहते थे? हम उनका कमरा देखना चाहते हैं।"

जगदीश बाबू के माथे पर बल पड़ गये, बोले, “बाहर के लोगों को वहाँ जाने की अनुमति नहीं है।"

बटेर ने आगे बढ़ कर जगदीश बाबू के कँधे पर ज़ोर से हाथ मारा, बोला, “बुढ़ऊ, जिन्दा रहना है या नहीं? साहिब जो पूछें उसका सीधा जवाब दो, वरना ऐसा झापड़ दूँगा कि तुम्हारी नकली बतीसी मुँह से निकल कर तुम्हारे हाथ में आ जायेगी।"

शोर सुन कर बाहर से दो अन्य वृद्ध वहाँ आये, एक पुरुष और एक स्त्री। उन्होंने बटेर को जगदीश बाबू को मारते देखा तो दरवाज़े से चिल्लाये, “कौन हो तुम? क्या कर रहे हो? जगदीश बाबू को हाथ मत लगाओ।"

ओरी ने बटेर को इशारा किया तो वह पीछे हट गया, उसने दोबारा पूछा, “उनका कमरा कौन सा है?”

जगदीश बाबू के उसे घूर कर देखा, कुछ उत्तर नहीं दिया। ताकानोरी के इशारे पर बटेर ने जगदीश बाबू को चटाक से एक थप्पड़ मारा, वह लड़खड़ा कर वहीं गिर पड़े और उनकी नाक से खून बहने लगा, उनकी ऐनक दूसरी ओर गिरी, पर सौभाग्यवश टूटी नहीं।

ताकानोरी के इशारे पर लक्की और मटरू दरवाज़े पर खड़े लोगों के पास गये, बोले, “बाहर से आश्रम के सभी लोगों को यहाँ बुलाओ, हमें तुम सबसे बात करनी है।"

बटेर ने जगदीश बाबू की गर्दन से उनका कुर्ता पकड़ कर उठाया और एक कुर्सी पास खींच कर उन्हें बैठा दिया, बोला, “बुढ़ऊ, अगर आज तुम्हें अपने जामुन बाबा से मिलने स्वर्ग लोक जाने की जल्दी नहीं हो, तो साहब जो पूछें उसका सीधा और तुरंत जवाब चाहिये। ज़्यादा चालाकी दिखाओगे तो साहिब मुँडी काट कर हाथ में थमा देंगे।"

जगदीश बाबू फ़िर भी कुछ नहीं बोले और उसे घूरते रहे। ताकानोरी ने लम्बी साँस ली और वह भी एक कुर्सी पर बैठ गया।

केवल सोमचाई नहीं बैठा, उसने आगे बढ़ कर ज़मीन से जगदीश बाबू की ऐनक उठा कर उन्हें दी, फ़िर वहीं पीछे जा कर खड़ा हो गया। वह कम्प्यूटर का काम करता है, उसने कभी मारा-मारी नहीं की है और जगदीश बाबू की नाक से बहता खून देख कर उसका जी घबराने लगा था। उन्हें एक बूढ़े आदमी को इस तरह से मारते देख कर भी उसे धक्का लगा था।

धीरे-धीरे आश्रम के सभी वृद्ध उस कक्ष में आ कर इक्ट्ठे हो गये। बटेर ने पूछा, “यहाँ कितने लोग रहते हैं?”

एक वृद्धा बोली, “सतरह औरतें और सात आदमी, हम कुल चौबीस लोग और हमारे संचालक, जगदीश बाबू, पच्चीस।"

बटेर ने कमरे में एकत्रित लोगों को गिना, बोला, “फ़िर यहाँ पर सत्ताईस लोग कैसे हैं?”

एक बूढ़ा आदमी बोला, “मुझसे मिलने मेरी बेटी और नाती बाहर से आये हैं", उसने एक युवती और एक किशोर की ओर इशारा किया।

उनका नाती चौदह-पंद्रह साल का लगता था। बटेर ने इशारा करके उसे आगे बुलाया और उसके कँधे पर हाथ रख लिया, बोला, “हमारे पास टाईम कम है, इसलिए साहिब जो पूछेंगे, उसका ठीक से जवाब दो। अगर सही जवाब नहीं मिलेगा तो मैं इस लड़के को मार डालूँगा, समझे?”

कक्ष में सन्नाटा छा गया। उस लड़के के नाना बोले, “मेरे बच्चे को जाने दो। यह लोग यहाँ नहीं रहते, इन्हें कुछ नहीं मालूम, मारना है तो मुझे मारो।"

बटेर ने कुछ उत्तर नहीं दिया, बस अपना हाथ कँधे से उठा कर उस लड़के को सिर के बालों से पकड़ लिया और दूसरे हाथ में खुला हुआ रामपुरिया चाकू निकाल कर, उसे उसके गले के साथ सटा दिया।

ओरी मुस्कराया और बोला, “यह बाबा कहाँ रहते थे? उनका कमरा किधर है?”

इस बार जगदीश बाबू ने काँपती आवाज़ में उत्तर दिया, बोले, “आश्रम के गेट के बाहर, बायीं ओर पेड़ों के बीच में उनका घर है।"

ओरी के इशारे पर लक्की और मटरू, बाबा का घर खोजने गये।

ताकानोरी बोला, “समाधी के पास जो मन्दिर है, वहाँ पर तारा माँ की सफेद और हरी, दो रंगों की मूर्तियाँ लगीं हैं। मैं वैसी ही एक विशेष हरी मूर्ति खोज रहा हूँ। क्या बाबा के पास ऐसी कोई विशेष मूर्ति थी?”

“माँ तारा की मूर्तियाँ?”, एक वृद्धा बोली, “वे तो यहाँ आश्रम में हर जगह मिलेंगीं। उनमें विशे़ष कौन सी है, यह तो भगवान जानें। बाबा ने जब समाधी ली, तब भी उनके हाथ में एक कटोरा था जिसमें हरे रंग की माँ तारा की मूर्ति थी।"

जगदीश बाबू बोले, “जामुन बाबा को माँ तारा की मूर्तियों से बहुत प्रेम था, यहाँ पर वैसी बहुत सी मूर्तियाँ मिलेंगीं। लेकिन उनमें कोई विशेष मूर्ति हमें नहीं मालूम।"

ओरी ने आँखें बन्द कर लीं और अपनी अन्वेषण-किरण से धीरे-धीरे सारे वृद्धाश्रम का निरीक्षण किया लेकिन उसे वहाँ शक्ति लहर का स्पंदन महसूस नहीं हुआ। इसका मतलब है कि बाबा ने वह मूर्ति वृद्धाश्रम के भीतर नहीं है, शायद उसे बाहर कहीं छिपाया गया है या वह धरती के नीचे गहरी दबी हुई है, जहाँ उसकी अन्वेषण-किरण नहीं पहुँच रही। शायद बाबा ने उस मूर्ति के साथ समाधी ली है और अगर ऐसा है तो उन्हें उनकी समाधी को खोदना पड़ेगा?

उसने पूछा, “बाबा ने समाधी लेने से पहले क्या किसी के लिए कुछ निर्देश छोड़े?”

“कैसे निर्देश?” जगदीश बाबू को उसका प्रश्न समझ नहीं आया।

"किसी के लिए कोई कागज़, चिट्ठी या संदेश?”

जब जगदीश बाबू ने उत्तर नहीं दिया तो ओरी के इशारे पर बटेर ने फ़िर से चाकू निकाल कर लड़के के गले से सटा दिया, बोला, “बुढ़ऊ, सोच लो, जवाब नहीं दोगे तो इसकी गर्दन काट दूँगा, फ़िर मत रोना।"

जगदीश बाबू को झुरझुरी सी आयी, घबरा कर बोले, “एक चिट्ठी दी है, त्रिनेत्र के नाम है।"

“त्रिनेत्र कौन है?”

"उनका शिष्य और उत्तराधिकारी, वह यहाँ नहीं रहता।"

“चिट्ठी दिखाओ।"

जगदीश बाबू लड़खड़ाते हुए अपनी कुर्सी से उठे, बोले, “मेरे दफ्तर में रखी है, मैं ले कर आता हूँ।"

ताकानोरी ने सोमचाई को उनके साथ जाने का इशारा किया। जगदीश बाबू ने दालान पार किया और पीछे अपने दफ्तर के कमरे में गये। तब तक उनकी नाक से खून बहना बंद हो गया था पर उसके दाग उनके कुर्ते पर जमे हुए थे।

सोमचाई बोला, “ताकानोरी एक जापानी याकूज़ा है। यह लोग बहुत क्रूर होते हैं। इसलिए उसकी बात मानने में ही आप सब की भलाई है, अगर वह गुस्सा हो गया, तो अपनी कताना-तलवार से सबके सिर काट देगा।"

जगदीश बाबू ने उसकी बात का उत्तर नहीं दिया, अपनी मेज़ पर रखी जामुन बाबा की चिट्ठी को उठा कर सोमचाई को दिया और दोनों लौट आये। कमरे में घुसे तो देखा कि लक्की और मटरू भी बाबा के घर से कुछ सामान ले कर आ गये हैं।

उस सामान को मेज़ पर रखते हुए लक्की बोला, “वह छोटा सा घर है, बस दो कमरे है। वहाँ हमें केवल यही सामान मिला।"

सामान में कुछ संस्कृत की किताबें थीं, एक रुद्राक्ष की माला, एक तुलसी की माला और एक बौद्ध भिक्षुक की मूर्ति थी। मूर्ति पर सालों से अगरबत्तियों के धूँए की कालिख के निशान जम गये थे।

ओरी ने तुरंत हाथ जोड़ कर उस मूर्ति को प्रणाम किया, बोला, “यह बाबा के गुरु साबुनिम कीवू की मूर्ति है।" फ़िर लक्की से बोला,

“जाओ इस सामान को जहाँ से उठाया है, वहीं पर ठीक से रख कर आओ, और मूर्ति को ध्यान से ले कर जाना, टूटनी नहीं चाहिये।"
फ़िर उसने सोमचाई को चिट्ठी देने का इशारा किया।

जगदीश बाबू निढ़ाल हो कर कुर्सी पर बैठ गये, उनके चेहरे का रंग फीका पड़ गया था, मानो अपने दफ्तर तक जाने में उन्होंने बहुत मेहनत की हो।

ओरी ने उनसे पूछा, “बाबा का शिष्य कौन है? वह कहाँ रहता है और यहाँ कब आयेगा?”

“जामुन बाबा के निर्देश अनुसार, मैंने उसे आज सुबह फोन किया था। उसने कहा था कि वह जल्दी आयेगा, कल शाम तक यहाँ पहुँच जायेगा। लेकिन वह कहाँ रहता है, मुझे नहीं मालूम। वह यहाँ आता रहता है, उसकी उम्र तीस साल के आसपास की होगी।"

“उसका मोबाइल नम्बर सोमचाई को दीजिये।" नम्बर ले कर सोमचाई ने अपना लैपटॉप कम्प्यूटर खोला और उसके बारे में जानकारी खोजने लगा।

ताकानोरी ने बाबा की चिट्ठी को खोला, उसमें केवल एक कागज़ था जिस पर हिंदी में कुछ लिखा था। उसने बटेर से उसे पढ़ने के लिए कहा।

कागज़ हाथ में ले कर बटेर मुस्कराया, बोला, “यह तो कोई कविता लगती है।"

“पढ़ो।"

“चन्द्र-वधु के चरण-कमल, तीन दशानन कोसे, 
पद्मा की कमल-अँजुरी से बहता जल।
विष्णु के शंख नाद से प्रज्जवलित अंबर के सप्त ऋषि,
कंदरा में गूँजती चौदह ध्वनियाँ पिनाक की।
लौटी सति पर्वतराज पिता के घर, बोली
त्रिनेत्र कहाँ हैं, उन्हें निमंत्रण क्यों नहीं भेजा?
वहाँ जहाँ पर लाल बकरियाँ घास चरें।"

बटेर ने कविता पढ़ तो ली लेकिन उसका अनुवाद करके उसे ताकानोरी को समझाना आसान नहीं था। वह बोला, “इसमें लक्ष्मी, विष्णु और शिव जी की बातें हैं, शायद यह कोई प्रार्थना है।"

ओरी ने उससे वह कागज़ लिया और जगदीश बाबू से कहा, “आप की अंग्रेज़ी अच्छी है, आप इसका अनुवाद करके मुझे दीजिये।" उन्होंने चुपचाप उससे वह कागज़ ले लिया।

इतने में सोमचाई ने ताकानोरी को बुलाया और अपने लैपटॉप पर दिखाते हुए बोला, “इस मोबाइल नम्बर का सिम-कार्ड पहली बार 1998 में बनारस में खरीदा गया था। उसके बाद उसे 2014 में दिल्ली में बदला गया, पर नम्बर नहीं बदला। यह प्रीपेड लगता है और इसका नम्बर किसी दूसरे सिम-कार्ड से जुड़ा हुआ है, इसके बारे में पता करना आसान नहीं है, मुझे कुछ दिन लगेंगे।"

ताकानोरी सोचते हुए बोला, “बाबा के शिष्य आज चलेगा और कल शाम को पहुँचेगा, इसका मतलब है कि वह कहीं दूर रहता है। हो सकता है कि वह प्रतिमा उसके पास हो? खैर हम जल्दबाज़ी में कुछ नहीं करेंगे। आज रात को जब लोगों की भीड़ नहीं होगी, उस समय हम वह समाधी खोद कर बाबा के शव और उनकी मूर्ति की जाँच करेंगे। जब वह शिष्य यहाँ आयेगा, तो उससे इस कविता का अर्थ भी पूछेंगे।"

जगदीश बाबू, जामुन बाबा की कविता का अनुवाद करने में लगे थे, लेकिन उनके कान ताकानोरी और सोमचाई की बातें सुन रहे थे, ताकि मौका मिलते ही त्रिनेत्र को खबर कर सकें। जब उन्होंने सुना कि वह लोग गुरु जी की समाधी को खोद कर उनके शरीर को बाहर निकालने का प्रोग्राम बना रहे हैं तो उन्हें बहुत गुस्सा आया। लेकिन उन्होंने सोचा कि जामुन बाबा सामान्य व्यक्ति नहीं थे, वह अपनी समाधी की रक्षा स्वयं करेंगे।

बटेर, लक्की और मटरू को भी किसी संत पुरुष की समाधी खोदने की बात अच्छी नहीं लगी। वह गुँडे अवश्य हैं, लेकिन संतों के प्रकोप से डरते हैं। पर वह यह भी जानते हैं कि जापानी साहिब को यह काम करने से रोकना कठिन होगा।

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सोमवार, जुलाई 06, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 11

अब तक की कहानी: ताकानोरी ने जामुन बाबा को खोज लिया है लेकिन बाबा उसके जाल से निकल जाते हैं और वृद्धाश्रम में जीवित समाधी ले लेते हैं। गँगटोक में त्रिनेत्र के अनाथाश्रम में उसके मित्र की बहन आभा आई है। उन्हें समझ में आता है कि आभा की भी एक गुप्त-शक्ति है, कि वह कीड़े-मकोड़ों से बातें कर सकती है। त्रिनेत्र अपने साथ अनाथाश्रम के गुप्त शक्ति वाले पाँच बच्चों के साथ, बाबा की रक्षा के लिए मजूली के वृद्धाश्रम में जाने के लिए तैयार हो रहा है। इधर ताकानोरी अपने साथी सोमचाई और तीन गुँडों के साथ वृद्धाश्रम में पहुँच गया है और शक्ति वाली हरित तारा की मूर्ति को खोज रहा है। इससे आगे पढ़िये ...

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अध्याय 11

गँगटोक से असम की ओर, 3 मार्च 2026

भोजनालय में आभा और बच्चे चुपचाप त्रिनेत्र को देख रहे थे। टेलीफोन पर अपने गुरु जी के समाधी लेने की बात सुन कर जब वह रोया था तो वह वहीं थे।

उस रात को जब उसके घर में आभा जागी थी तो त्री ने उसे कहा था, “चलो तुम्हें छात्रावास छोड़ कर आता हूँ।"

“क्यों? अगर मैं तुम्हारे कमरे में रुकी तो तुम्हारा नाम बदनाम हो जायेगा?”, आभा ने पूछा था।

“नहीं, यहाँ कोई नहीं है जो मेरा या तुम्हारा नाम बदनाम करे", त्री मुस्कराया था, “लेकिन कुछ घंटे बाद हमें एक लम्बी यात्रा पर जाना है। तुम अपने कमरे में जाओगी तो मैं अपनी चटाई पर ठीक से सो सकूँगा।"

“तुम बच्चों को ले कर कहाँ जा रहे हो?”

त्री एक पल उसे चुपचाप देखता रहा, बोला, “हम ऐसे ही घूमने जा रहे हैं।"

“घूमने जा रहे हो, तो कल रात को हथियारों की बात क्यों हो रही थी?”

त्री ने उसे उत्तर नहीं दिया तो वह बोली, “मैं बच्ची नहीं हूँ, मैंने अपने पति और बेटी को खोया है। अगर कोई कठिन परिस्थिति आई है, जिसके बारे में तुम बच्चों से बात कर सकते हो तो मुझे क्यों नहीं बता सकते?”

फ़िर भी जब त्री ने कुछ नहीं कहा तो वह बोली, “कल पहले तुम्हारे अखाड़े में मुझे वह अजीब सा अनुभव हुआ। फ़िर,  तुम लोग किसी गुप्त-शक्ति की बात रहे थे, कि मेरी शक्ति कीड़े-मकोड़ों और जीव-जंतुओं से जुड़ी है। उसके बाद, जब मैं यहाँ भीतर सो रही थी तो मुझे बाहर से तुम्हारी बातें स्पष्ट सुनाई दे रहीं थीं, ऐसा लग रहा था जैसे कि मेरे दिमाग का एक हिस्सा सोया हो और दूसरा, जागा हुआ सतर्क हो।"

त्री ने लम्बी साँस ली, बोला, “जो गुप्त-शक्ति मुझमें और बच्चों में हैं, वह तुममें भी हैं, लेकिन तुम्हारी शक्ति ठीक से विकसित नहीं हुई हैं, तुम उस पर नियंत्रण करना नहीं जानती। तुममें जीव-जन्तुओं से बात करने की शक्ति है और तुम्हारी श्रवण शक्ति भी विकसित लगती है। अगर तुम इन शक्तियों को पूर्ण विकसित करना चाहती हो तो तुम्हें कुछ समय यहाँ हमारे पास रहना पड़ेगा। अगर तुम अपने भाई के पास या गाँव में लौट जाओगी, तो हो सकता है कि तुम्हारी यह शक्ति जो यहाँ जागृत हुई है, वह फ़िर से सो जाये।"

“कल रात को तृप्ति ने अपनी मनोशक्ति से एक लोटे को उठाया था और गार्गी ने मुझे अंतरमन के भीतर से छुआ था?"

त्री ने सिर हिला कर हामी भरी, बोला, “हाँ, उनकी यही शक्तियाँ हैं। कुछ दिनों में जब हम लौटेंगे, तुम भी यहाँ वापस आ सकती हो, हम तुम्हारी शक्तियों को विकसित करने में तुम्हारी मदद करेंगे।"

“शक्ति विकसित करने से क्या फायदा है?”

“यह लाभ-नुकसान की बात नहीं है, शक्ति का होना एक ज़िम्मेदारी है। इनसे हम गरीब, निर्बल, असहाय और शोषित जनों की मदद करते हैं। तुम कह सकती हो कि हम शक्ति-यौद्धा हैं और यह हमारा धर्म है।"

“कल रात को वसंत किसी तिरंगा यौद्धा की बात कर रहा था?”

त्री मुस्कराया, बोला, “जब वसंत यहाँ आया था, तब उसने हमारे नामों के पहले अक्षर, त, र और ग को मिला कर तिरंगा बना दिया था। तब से बच्चे हम सब को तिरंगा-यौद्धा भी कहते हैं।"

“तो मुझे भी बताओ कि कल सुबह तुम तिरंगा यौद्धा किसकी मदद के लिए युद्ध पर जाओगे?”

“मेरे गुरु जी मुश्किल में हैं। मैं असम में गुवाहाटी के पास पैदा हुआ था और बचपन में अनाथ हो गया था। गुरु जी ने मुझे शरण दी, मुझे पाला-पोसा, मेरी शक्ति को पहचाना और उसे विकसित किया। उनके कहने पर ही मैंने यह अनाथाश्रम खोला है। कुछ लोग बहुत सालों से उनका पीछा कर रहे हैं। कल सुबह गुरु जी ने मुझे बताया कि उन लोगों ने उन्हें खोज लिया है, इससे उनकी जान को खतरा है, और हम उनकी रक्षा करने जा रहे हैं।"

आभा चुप हो गयी थी और वह उसे लड़कियों के छात्रावास के पास छोड़ कर लौट आया था।

आज सुबह जब वह बच्चों के साथ नाश्ता कर रहा था और जगदीश बाबू ने उसे गुरु जी की समाधी लेने का समाचार दिया, उस समय आभा वहाँ थी।

जब वे गाड़ी में बैठे तो आभा उसके साथ आगे वाली सीट पर बैठी। उनकी कार अनाथाश्रम से बाहर निकली ही थी कि वह बोली, “मैं भी तुम्हारे साथ चलना चाहती हूँ।"

त्री ने कहा, “नहीं, तुम हमारे साथ नहीं आ सकतीं।"

“क्यों?”

“क्योंकि इसमें खतरा है।"

“अगर छह साल की तृप्ति तुम्हारे साथ जा सकती है तो मैं क्यों नहीं?”

“क्योंकि जिसे तुम छह साल की बच्ची कहती हो, वह चाहे तो अपनी शक्ति से चाकू-तलवार चला कर अपनी रक्षा कर सकती है और हमारे युद्ध में योगदान दे सकती है।"

आभा कुछ सोच कर बोली, “दो साल पहले तस्करों ने बम से मेरे पति की कार उड़ा कर, उनकी और मेरी बेटी की जान ली थी। तब मैंने कई महीनों तक आत्महत्या करने की सोची थी। लेकिन अब मैं जीना चाहती हूँ और उन लोगों से बदला लेना चाहती हूँ। मैं भी तुम्हारी तरह यौद्धा बनना चाहती हूँ, डर कर घर में छिप कर जीना नहीं चाहती। मेरी शक्ति तुम लोगों की तरह विकसित नहीं है, मुझे लड़ाई करनी भी ठीक से नहीं आती, लेकिन मैं सीधी-साधी सामान्य औरत दिखती हूँ और तुमने देखा कि मेरी श्रवण शक्ति बहुत अच्छी है, मैं सोते हुए भी दूर से बातें सुन सकती हूँ। अगर मैं तुम्हारे साथ रहूँगी तो हम लोग एक परिवार जैसा लगेंगे और गुँडों को धोखा देना अधिक आसान होगा।"

पीछे बैठे बच्चे उनकी बातों को ध्यान से सुन रहे थे लेकिन उनमें से कोई कुछ नहीं बोला।

“और वहाँ तुम कुछ हो गया तो?” त्री बोला।

“अधिक से अधिक वह मुझे मार देंगे और क्या? मैं मरने से नहीं डरती।"

“और अगर मरो नहीं, पर सारे जीवन के लिए अपाहिज हो जाओ तो?”

“क्यों, क्या अपाहिज लोग इन्सान नहीं होते? अगर बुरे लोगों के साथ युद्ध में मैं घायल होती हूँ या मर जाती हूँ तो मुझे इसका रत्ती भर भी रंज नहीं होगा।"

यह बातें करते हुए, वह लोग रानी खोला पुल पर पहुँच गये थे। वहाँ से कुर्स्यांग जाने वाली सड़क अधिक दूर नहीं थी, इसलिए त्री को वहाँ पहुँचने से पहले ही यह निर्णय लेना था, वह बोला, “विशाल से बात करते हैं।"

आभा गुस्सा हो गयी, बोली, “इसमें भैया से पूछने की क्या ज़रूरत है? मैं क्या उन पर निर्भर करती हूँ? मैं उनके यहाँ कुछ दिन के लिए आयी थी, लेकिन मेरा अपना घर है, मैं अपना जीवन जीने के लिए स्वतंत्र हूँ। वैसे भी वह मेरे बड़े भाई हैं, तुम उनसे पूछोगे कि इसे युद्ध में ले जायें या नहीं, तो वह क्या कहेंगे? वह तो मना ही करेंगे।”

पीछे से गार्गी बोली, “आभा दीदी ठीक कहती हैं, उन्हें साथ ले जाने, या न ले जाने का निर्णय तो आप को ही लेना पड़ेगा। इनके भाई से पूछने की कोई आवश्यकता नहीं है, यह कोई बच्ची नहीं हैं।"

आखिर में त्री बोला, “ठीक है, तुम हमारे साथ चलना चाहती हो तो चलो।"

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