अब तक: जापानी याकूज़ा-खूनी ताकानोरी, जामुन बाबा की गुप्त शक्ति वाली मूर्ति को लेने भारत आया है। वह बाबा को नारायणपुर में खोज लेता है लेकिन वह उसके चँगुल से निकल भागने में सफल होते हैं। ताकानोरी से बचने के लिए, बाबा ने अपने वृद्धाश्रम में समाधी लेने का निर्णय लिया है।
दूसरी ओर, त्रिनेत्र गुप्त-शक्ति वाले बच्चों के लिए गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम चलाता है। अचानक उनकी मेहमान आभा की गुप्त-शक्ति जाग जाती है। आगे पढ़िये:
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अध्याय 08
गँगटोक, सिक्किम, 2 मार्च 2026
वह दोनों अखाड़े से बाहर आये तो देखा कि रंगनाथ, गार्गी, वसंत, माधव और तृप्ति उधर भागे आ रहे हैं। उनके पीछे, अनाथाश्रम के कुछ कुत्ते और बिल्लियाँ भी थे।
गार्गी ने पूछा, “क्या हुआ? मुझे लगा कि जैसे इधर कोई भूचाल आ रहा हो और कोई मुझे यहाँ खींच रहा हो।"
रंगनाथ बोला, “हाँ, घूँ-घूँ की अजीब सी आवाज़ें आ रही थीं।"
माधव मुस्कराया, बोला, “अखाड़े के ऊपर इन्द्रधनुष जैसी रोशनियाँ डिस्को डाँस कर रही थीं और पशुशाला में मुर्गियाँ, गायें, भैंसे, बछड़े, सभी बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे।"
त्री बोला, “चलो, मेरे घर चलते हैं, वहाँ बात करेंगे।"
त्री का छोटा सा घर, पेड़ों के झुरमुट के बीच में है और अखाड़े से अधिक दूर नहीं है। उसके घर में, एक कमरे में एक ओर कुछ कपड़े टंगे थे और एक स्टूल पर कुछ किताबें रखी थीं, बस, बाकी का सारा घर खाली था।त्री ने एक दरवाज़े के पीछे से एक लिपटी हुई चटाई को निकाल कर बीच में बिछा दिया, बोला, “यहाँ बैठो", फ़िर वसंत से कहा, “घर के आसपास अभेद्य दीवार बना दो ताकि कोई हमारी बात नहीं सुन सके।"
इस सारे समय में आभा चुप थी, उनके बातें ध्यान से सुन रही थी।
त्री बच्चों से बोला, “तुमने ठीक देखा था, आभा के भीतर भी गुप्त-शक्ति है। आज जब हम अखाड़े में गये तब वह शक्ति अचानक जाग गयी। मैंने ऐसी शक्ति के बारे में पहले कभी नहीं सुना था। वह जीव-जन्तुओं को, विशेषकर कीड़ों-मकोड़ों को बुला सकती है। हो सकता है कि वह उनसे बातें भी कर सकती है।"
आभा बोली, “तुम लोग मेरे बारे में ऐसे बातें क्यों कर रहे हो जैसे कि मैं यहाँ नहीं हूँ? तुम यह कौन सी गुप्त-शक्ति की बातें कर रहे हो? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा।"
त्री ने गार्गी को इशारा किया तो उसने आभा के मस्तिष्क में एक क्षण के लिए एक शक्ति-लहर भेजी। आभा को जैसे बिजली का झटका लगा, लेकिन वह समझ गयी कि जो अनुभूति उसने महसूस की है, उसे गार्गी ने भेजा है। उसने आश्चर्य से गार्गी को देखा, पूछा,
“तुमने यह क्या किया और कैसे किया?”
तब रंगनाथ बोला, “दीदी, दुनिया में हमारे जैसे कुछ लोग एक गुप्त-शक्ति के साथ पैदा होते हैं। त्री दादा के साथ, हम लोग हर रोज़ ध्यान, व्यायाम और अभ्यास से, उस शक्ति को साधते हैं। अगर बचपन में इस शक्ति को साधा नहीं जाये तो समय के साथ यह मुरझा जाती है। शायद आप भी एक गुप्त-शक्ति के साथ पैदा हुई थीं, लेकिन किसी वजह से आप की शक्ति मुरझाई नहीं, उसका बीज आप के भीतर आज भी जीवित है। हमारी शक्तियों की वजह से, हमारे अखाड़े की मिट्टी में ऐसा वातावरण बना है, जिससे व्यक्तियों के भीतर छिपी शक्तियाँ विकसित और प्रबल हो जाती है। आज अखाड़े में आप के भीतर सोयी हुई शक्ति जाग गयी है।"
“तुम यह क्या कह रहे हो, मुझे कुछ समझ नहीं आया", आभा बोली।
तो रंगनाथ ने तृप्ति से कहा, “उस लोटे को उठाओ।"
स्टूल के पास ज़मीन पर एक लोटा रखा था, तृप्ति ने उसे देखा तो वह हिलने लगा और फ़िर अपने आप सरक कर वह उसके पास आ गया।
रंगनाथ बोला, “आप ने देखा? तृप्ती की शक्ति धातुओं के साथ काम करती है, अपनी शक्ति से वह उस लोटे को अपने पास खींच लायी। वैसे ही वसंत की शक्ति पेड़-पौधों के साथ काम करती है", उसने वसंत को इशारा किया।
कमरे की खिड़की के बाहर एक बेल लगी थी जिसमें लाल और सफेद रंग के फ़ूल खिले थे। वसंत ने उस ओर देखा तो बेल का एक हिस्सा हिलने लगा, फ़िर मुड़ कर वह कमरे में घुस आया और दीवार के साथ-साथ चलता हुआ, जितनी दूर आ सकता था वहाँ आ कर रुक गया।
तृप्ति और वसंत के कारनामों को आभा ने हैरानी से देखा।
माधव बोला, “आभा दीदी की शक्ति का रंग अब दिखने लगा है, वह गुलाबी है।"
गार्गी बोली, “आप के पास भी ऐसी एक शक्ति है, उससे आप कीड़ों-मकोड़ों और जीव-जन्तुओं को बुला सकती हैं।”
त्री बोला, “लगता है कि तुम्हारी शक्ति ताकतवर है, लेकिन अभी तुम्हें उस पर नियंत्रण करना नहीं आता।"
आभा ने उबासी ली, बोली, “तुम लोग यह क्या कह रहे हो, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। साथ में मेरा सिर झन्ना रहा है और मुझे बहुत थकान लग रही है।"
तृप्ति बोली, “दीदी, जब तक हम ठीक से शक्ति-साधना नहीं सीखते, तब तक उसका उपयोग करने से ऐसा ही होता है। मैंने अभी तुम्हें लोटा हिला कर दिखाया था, मुझे भी बहुत थकान हो गयी है।"
आभा की आँखें बैठे-बैठे नींद से बंद हो रही थीं। त्री ने रंगनाथ को अलमारी से एक तकिया निकाल कर लाने के लिए कहा, और आभा से बोला, “थोड़ी देर तुम यहीं चटाई पर लेट जाओ, कुछ देर आराम करने से तुम्हारी थकान ठीक हो जायेगी।"
आभा ने उठने की कोशिश की, बोली कि वह छात्रावास में अपने कमरे में जायेगी, लेकिन चटाई से उठ नहीं पायी। आखिर में उसने तकिये पर सिर रख कर आँखें बंद कर लीं।
तृप्ति बोली, “मैं भी थोड़ी देर दीदी के साथ आराम करूँगी", और वह भी आभा के पास लेट गयी।
त्री उठ खड़ा हुआ, बाकी चारों बच्चों को ले कर बाहर आ गया, बोला, “मैंने फैसला किया है कि कल तुम सभी मेरे साथ चलोगे। हम लोग सुबह नाश्ते के बाद निकलेंगे, रास्ते में आभा को उसके भाई के पास छोड कर, हम लोग मजूली जायेंगे।"
सभी बच्चे खुश हो गये तो त्री ने उन्हें शोर न करने का इशारा किया, बोला, “तुम लोग अपना सामान तैयार कर लो क्योंकि हमें वहाँ कुछ दिन रुकना होगा।"
रंगनाथ ने पूछा, “और हमारे हथियार? उन्हें ले कर चलेंगे?”
त्री ने कुछ देर सोचा फ़िर बोला, “नहीं, बेहतर होगा कि हम अपने साथ कोई हथियार नहीं ले कर जायें। वैसे भी तुम उनका प्रयोग अभी सीख रहे हो। लेकिन अगर तुममें से कोई दुश्मन के हाथ आ गया और उसने देखा कि तुम्हारे पास कोई हथियार हैं तो वह तुम्हें जान से भी मार सकता है। अच्छा होगा कि तुम उन्हें सामान्य बच्चे लगो। हमारी शक्तियाँ ही हमारा हथियार हैं।"
वसंत बोला, “यह हमारे तिरंगा-यौद्धाओं की सैना का पहला युद्ध होगा, हम बड़े गुरु जी की रक्षा करेंगे।"
शुरु में जब त्री के साथ केवल रंगनाथ और गार्गी थे, तो रंगा ने अपने नामों के पहले अक्षर जोड़ कर अपने आप को तिरंगा-योद्धा कहना शुरु किया था। बाद में अन्य बच्चों के आने के बावजूद, वही पुराना नाम उन्हें अभी भी अच्छा लगता है, हालाँकि त्री ने उन्हें कई बार समझाया है कि वह किसी पर हमला करने वाले यौद्धा नहीं है, वह केवल रक्षा के लिए युद्ध करते हैं।
बच्चे वहाँ से चले गये और त्री वहीं बैठ कर प्रतीक्षा करता रहा। कुछ देर के बाद उसने देखा कि तृप्ति की आँखें खुली हैं तो उसे उठने का इशारा किया, “चलो, मैं तुम्हें तुम्हारे कमरे तक छोड आता हूँ।"
“दादा, आभा दीदी बहुत अच्छी हैं, क्या वह हमारे साथ नहीं रह सकतीं?”, रास्ते में उसने पूछा।
त्री को केवल इतना पता है कि आभा का गाँव मणिपुर में लोकटक झील के पास में है। वह बोला, “आभा का गाँव में अपना घर-परिवार है, वह उन्हें छोड़ कर हमारे साथ कैसे रुकेगी?"
तृप्ति को छात्रावास में छोड़ कर वह अनाथाश्रम के संचालक से बात करने उनके दफ्तर गया और उन्हें कहा, "कल सुबह मैं, रंगनाथ, गार्गी, वसंत, माधव और तृप्ति, हम छह लोग कुछ दिनों के लिए आसाम जा रहे हैं। आभा भी हमारे साथ जायेगी, उसे रास्ते में कुर्स्यांग छोड़ते हुए जायेंगे। हम कुछ दिन बाहर रहेंगे।"
जब वह घर लौटा तो देखा कि आभा अभी भी बेसुध सी गहरी नींद में सो रही है, उसके जागने की प्रतीक्षा में वह वहाँ पालथी मार कर बैठ गया।






