अब तक की कहानी: आभा की सहायता से त्री और ओरी घड़ियालों से बच कर डमरू द्वीप की उस गुफा में पहुँच गये जहाँ नीचे तहखाने में शक्तिवाहिनी सरस्वती की मूर्ति छिपी थी। मूर्ति को ले कर वह लौटे और ओरी जापान लौट गया। त्री वृद्धाश्रम गया तो अचानक मंदिर की घंटियाँ बजने लगीं, त्री बोला कि इसका मतलब है कि उसके गुरु जी की समाधी समाप्त हो गयी है।
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अध्याय 31
अंतिम अध्याय
गँगटोक, सिक्किम, 24 अप्रैल 2026
“गँगटोक की पहाड़ी हवा बहुत अच्छी है, लेकिन यहाँ की ऊपर-नीचे जाती हुई सड़कों पर चलना थोड़ा कठिन है", गुरु जी बोले। वह त्री के साथ अखाड़े में बैठे थे।
त्री हँसा, बोला, “गुरु जी, मैं आप को जानता हूँ। आप अभी भी कमज़ोर हैं, लेकिन मैं शर्त लगा कर कह सकता हूँ कि और एक महीने के अंदर आप बिना थके, यहाँ से देवराली बौद्ध-विहार तक का पूरा चक्कर लगा कर आयेंगे। बस आप हर रोज, सुबह-शाम सैर करना नहीं छोड़िये।”
गुरु जी भी मुस्कराये, बोले, “जब तुम छोटे थे तो मैं तुम्हें कहता था कि एक बार और कोशिश करो, मैं पक्का जानता हूँ कि तुम अगली बार इसे बेहतर करोगे। अब मैं बूढ़ा हूँ तो तुम मुझे वही सबक सिखाते हो।"
थोड़ी देर के बाद जब आभा वहाँ चाय ले कर आयी तो देखा कि वह दोनों शतरंज खेल रहे हैं। कुर्सी पास खींच कर वह उनके करीब बैठ कर उनका खेल देखनी लगी।
त्री ने चाय पीते हुए उससे पूछा, “ओरी से बात हुई?”
आभा ने सिर हिला कर मना किया, बोली, “पिछले हफ्ते हुई थी। उसके बाद मैंने उसे मैसेज भी भेजे, लेकिन उसका उत्तर नहीं आया।"
गुरु जी बोले, “चिंता नहीं करो बेटी, कुछ ही दिनों की बात है, उसने कहा है कि वह यहाँ आयेगा, और वह अपने वचन का पक्का है, जो कहता है, उसे अवश्य करता है।”
त्री बोला, “गुरु जी, आप ने अच्छा प्लैन बनाया, एक तो हमें यामागुचि से छुट्टी मिल गयी, और साथ में आभा को ताकानोरी भी मिल गया।"
"क्या मतलब, कैसा प्लैन? मुझे भी बताओ”, वह बोली। मजूली से लौट कर वह मणिपुर में अपने गाँव चली गयी थी और कुछ दिन पहले ही उनके अनाथाश्रम में लौटी है।
“कई दशकों से यामागुचि के आदमी गुरु जी का पीछा कर रहे थे। करीब दस साल पहले जब मैंने यहाँ यह अनाथाश्रम खोला, तब मैंने गुरु जी से यहाँ आने के लिए बहुत कहा, लेकिन वह नहीं माने। वह डरते थे कि यामागुचि के आदमी उन्हें खोजते हुए यहाँ भी आ जायेंगे और उनकी वजह से हमारे अनाथाश्रम के बच्चों की जान को खतरा हो जायेगा", त्री ने बताया।
“माँ तारा की मेरी वह मूर्ति, जिसे मैं कोरिया से ले कर आया था और जिसे यामागुचि लेना चाहता था, दस साल पहले मैंने वह मूर्ति त्री को दे दी थी। तब से वह मूर्ति यहीं रखी है। हमने देखा था कि जब शक्ति वाले लोग साथ रहते हैं तो उनकी शक्ति बढ़ जाती है। यहाँ पर त्री ने उस मूर्ति के साथ कुछ नये प्रयोग किये जिससे हमें पता चला कि अगर हम बिना शक्ति वाले हरिताश्म पत्थरों को, माँ तारा की शक्तिवाहिनी मूर्ति के पास रखें तो उनमें शक्ति आ जाती है। वैसे ही हरिताश्म पत्थरों के आसपास अगर शक्ति वाले लोग रहें तब भी उन पत्थरों में भी शक्ति आ जाती है। लेकिन यह सभी हरिताश्म पत्थरों में नहीं होता। तब हमने उन पत्थरों की वैज्ञानिक जाँच करवायी, इससे पता चला कि हरिताश्म पत्थर कई तरह के होते हैं। कुछ पत्थरों के भीतर के क्रिस्टल ऐसे होते हैं कि उनमें शक्ति-लहरों के प्रभाव से शक्ति जमा होने लगती है। जैसे कि बैटरी में ऊर्जा भरते हैं, वैसे ही उनमें शक्ति भर जाती है", गुरु जी बोले।
त्री हँसा, बोला, “सबसे पहले इस बात को गार्गी ने पहचाना। एक दिन वह बोली कि हमारी नटराज की प्रतिमा में भी शक्ति महसूस होती है। हमने उस मूर्ति की जाँच की, तब समझे कि शक्ति पूरी मूर्ति में नहीं थी, केवल उसके हरिताश्म पत्थर के बने मोतियों में थी। दूसरी बात जो हम समझे, वह है कि अगर मूर्ति को शक्ति वाले लोगों का साथ नहीं मिले तो धीरे-धीरे उनकी शक्ति क्षीण हो जाती है। यानि यह शक्ति जल की तरह है, जब तक बहती रहती है, तभी तक जीवित रहती है। इसलिए हमने सोचा कि अगर यामागुचि उस मूर्ति के लिए इतना तरस रहा है, तो क्यों न हम उसे एक शक्ति वाली मूर्ति बना कर दें?"
गुरु जी बोले, "पहले मैं डरता था कि अगर यामागुचि को वह प्रतिमा मिल गयी तो वह शक्ति का गलत कामों के लिए उपयोग कर सकता है। लेकिन त्री बोला कि केवल मूर्ति से उसका कुछ नहीं होगा, उसे शक्ति वाले बच्चे भी खोजने हैं और उन्हें खोजना इतना आसान नहीं है। इस तरह से त्री ने यह सारा प्लैन बनाया।"
त्री बोला, “पहले मैंने सरस्वती की मूर्ति बनायी और उसमें हरिताश्म पत्थर के टुकड़े लगाये। उसे दिन में इस अखाड़े में रखते थे और रात को रंगनाथ, वसंत और माधव उसके पास सोते थे। करीब छह महीने पहले जब हमें लगा कि अब उस मूर्ति में शक्ति बहुत प्रबल हो गयी है तो हमने उसे डमरू द्वीप की गुफा में लगा दिया। फिर हमने गुरु जी के वीडियो बनाये और उन्हें फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, वगैरा पर चढ़ा दिया, और उनके साथ लिखा कि वह वीडियो एक कोरियन भिक्षुक के हैं। तब से हम प्रतीक्षा कर रहे थे कि यामागुचि के आदमी उसे देखें और वह किसी को गुरु जी को खोजने के लिए भेजे।"
"यानि, तुम दोनों ने यामागुचि को फसाने के लिए एक जाल फ़ैंका था, और उसने ताकानोरी को यहाँ भेज दिया। पर क्या गुरु जी की समाधी लेने में खतरा नहीं था?”, आभा ने पूछा।
त्री बोला, “मुझे मालूम है कि गुरु जी समाधी में एक महीने तक, कम अक्सीजन और खाने-पीने के बिना भी जीवित रह सकते हैं। लेकिन साथ ही हम लोग, विशेषकर गार्गी, दूर से ही गुरु जी के स्वास्थ्य पर नजर रखे हुए थे। मजूली के वृद्धाश्रम के पास वाले खण्डहर के नीचे जो गुरु जी का छुपा हुआ तहखाना है, वहाँ से गार्गी आसानी से गुरु जी की मानसिक लहरों को महसूस कर सकती थी। वह वहाँ से नियमित जाँच कर लेती थी कि गुरु जी की तबियत कैसी है।"
“यानि, मुझे छोड़ कर तुम सबको मालूम था कि यह एक ड्रामा है?”
त्री मुस्कराया, “यह पूरा ड्रामा नहीं था। हमने प्लैन बनाया था लेकिन उसकी हर चीज हमारे हाथ में नहीं थी। तुम्हारे अतिरिक्त, वसंत, माधव और तृप्ति को भी यह सब बातें पता नहीं थीं, तभी तो ताकानोरी जब तुम्हें पकड़ कर ले गया और उसने तुम्हारे दिमाग में देखा, फिर भी उसे कुछ पता नहीं चला। लेकिन काज़ीरंगा में हमारी गैंडों के तस्करों से टक्कर हो जायेगी, इस बात का हमें अंदाज़ा नहीं था, और न ही हमने सोचा था कि ताकानोरी एक गार्ड को बचाने के लिए एक तस्कर को मार देगा। हमें डमरू द्वीप पर इतने सारे घड़ियालों के इकट्ठा होने वाली बात का भी पता नहीं था। सौभाग्य से उस समय तुम हमारे साथ थीं, वरना हमारा सारा प्लैन बेकार हो जाता।"
“और डमरू द्वीप की उस गुफा में छिपी हुई सीढ़ियाँ और नीचे जाने का रास्ता, क्या वह भी तुमने बनाया था? क्या तुम सचमुच वहाँ पर नयी मूर्ति लगाओगे?”
त्री बोला, “वह गुफा सचमुच बहुत पुरानी है और उसमें बने भित्तिचित्र आदिमानव के समय के हैं, हज़ारों साल पुराने हैं। सदियों से हर साल वहाँ पर दूर-दूर से तीर्थयात्री आते हैं। हमने वहाँ दीवार पर एक खाली जगह पर केवल घड़ियाल और गँगा का चित्र बनाया था। वह सीढ़ियाँ और तालाब वहाँ पर पहले से थे, और उस तालाब में एक पुरानी सरस्वती की मूर्ति लगी थी, हमने उसकी जगह पर वहाँ एक नयी मूर्ति रख दी और उसके ऊपर खुलने-बंद होने वाला गुप्त दरवाज़ा लगा दिया। अब वह सारी जगह जैसे पहले थी, बिल्कुल वैसी ही हो गयी है, क्योंकि ऐसी जगहें हमारी एतिहासिक और साँस्कृतिक सम्पदा हैं, हम उनकी रक्षा करना चाहते हैं।"
गुरु जी बोले, “मेरी आशा है कि यामागुचि उस मूर्ति को पा कर खुश होगा और अब वह मुझे भूल जायेगा। इसलिए अब मैं यहाँ आया हूँ और त्री और बच्चों के बीच में रह सकता हूँ। त्री ही मेरा परिवार है और बुढ़ापे में, उसके और छोटे बच्चों के साथ रह पाना, मेरे लिए बहुत सुखदायक है। मेरी यही कामना है कि हम लोग शक्तिवान बच्चों की एक सैना बनायें, जिसके तिरंगा यौद्धा अपनी शक्ति से निर्बल, शोषित और असहाय लोगों को आत्मनिर्भर बनने में सहायता करें, प्रकृति और वातावरण की रक्षा करें और इस पृथ्वी को ऐसा बेहतर स्थान बनायें जहाँ मानव के साथ-साथ, सभी प्राणी भी फलें-फूलें।"
थोड़ी देर के बाद जब गुरु जी सैर करने गये तो त्री आभा को अपनी शिल्पशाला में ले कर गया, बोला, "देखो, यह मेरी नयी कलाकृति है, बताओ कैसी लगी?”
आभा ने देखा कि उसकी नयी कलाकृति, ताँबे की दोमुही मूर्ति है, जिसमें एक ओर शिव जी हैं और दूसरी ओर महात्मा बुद्ध, और दोनों योगमुद्रा में हैं। उसने पूछा, “शिव और बुद्ध, एक साथ, क्या यह कोई नया एक्सपैरिमैंट कर रहे हो?”
त्री बोला , “मैं शिव का भक्त हूँ और गुरु जी बुद्ध के, इसलिए मैंने सोचा कि उन दोनों को एक साथ बनाऊँ। अंत में परमेश्वर तो एक ही है, हम मानव उसे भिन्न रूपों में देखते हैं और उसकी पूजा के भिन्न रीति-रिवाज़ अपनाते हैं। वैसे भी हमारे भारत में धर्मों के बीच में दीवारें नहीं हैं, बल्कि वह नदी की धाराओं जैसे हैं, जो कभी मिलती हैं, कभी अलग हो जाती हैं और अंत में सभी एक ही सागर की ओर जाती हैं। गुरु जी के साथ रह कर धर्म के बारे में मुझे यही समझ में आया है। यह मूर्ति इसी भाव को अभिव्यक्त करती है। लेकिन इस मूर्ति में एक और बात है, इसमें शिव जी और महात्मा बुद्ध, दोनों की आँखें हरिताश्म पत्थर की बनी हैं।"
वह दोनों यही बातें कर रहे थे, जब तृप्ति भागती हुई आई, बाहर से ही चिल्ला कर बोली, “दीदी, तुम्हारे जापानी भैया आये हैं।" त्री ज़ोर से हँसा, बोला, “ताकानोरी आ गया? लेकिन वह तुम्हारी दीदी का भैया नहीं है, तुम्हारा भैया है।"
दो मिनट बाद, बच्ची के पीछे-पीछे ताकानोरी भी वहाँ आया और सबसे पहले उसने आभा को बाहों में जकड़ा और उसके गाल पर चूमा। यह सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि आभा उसे रोक नहीं पायी, न कुछ कह पायी। त्री मुस्कराया तो आभा का चेहरा शर्म से लाल हो गया।
जब ओरी ने देखा कि तृप्ति उन्हें बड़ी-बड़ी आँखों से देख रही थी, तो उसने उसकी ओर और फिर आभा की ओर हाथ जोड़ दिये, बोला, “सॉरी, तुम्हें देख कर … तुम इतने दिनों के बाद मिली हो, मुझसे रहा नहीं गया।"
वह सभी लोग हँसते हुए अनाथाश्रम को पार करके वहाँ लगे वृक्षों की ओर बढ़े। वहाँ एक लकड़ी की कुटिया बनी थी। ओरी ने पूछा, “यह कौन सी जगह है?”
त्री बोला , “तुम्हें एक और व्यक्ति से मिलवाना है, जिससे तुम अभी तक नहीं मिले।"
वह लोग जब कुटिया के पास पहुँचे, तभी दूसरी ओर से त्री ने गुरु जी को सैर से लौटते देखा। उसने ओरी से कहा, “वह देखो कौन है? आओ, मैं तुम्हें अपने गुरु जी से मिलवाऊँ।"
"कौन से गुरु जी?”
“जून-मिन गुरु जी, जिन्हें तुम खोजने आये थे।"
“लेकिन उन्होंने तो समाधी ले ली थी?” ओरी को विश्वास नहीं हुआ।
“समाधी ली तो थी, लेकिन जब उनका लक्ष्य पूरा हो गया तो वह मेरे पास लौट आये, क्योंकि वह मेरे पिता समान हैं। उनका शरीर अभी भी बहुत कमज़ोर है, लेकिन उनके मन की शक्ति, वह बिल्कुल कमजोर नहीं हुई है", त्री ने उसके कँधे पर हाथ रख कर कहा।
ओरी ने आगे बढ़ कर, तीन बार झुक कर गुरु जी का जापानी अभिवादन किया। बाद में आभा ने उसे मोबाइल पर गुरु जी के समाधी से बाहर निकलने का वीडियो दिखाया, तो वह बोला, “वीडियो में तो आप बहुत कमज़ोर दिखते हैं।"
गुरुजी बोले, “यहाँ मैं तुम सब लोगों की शक्ति से घिरा हुआ हूँ, उसकी वजह से मुझे बहुत जल्दी स्वास्थ्य-लाभ हुआ है। तुम बताओ, तुम्हारे यामागुचि सान उस प्रतिमा से खुश हैं?”
ओरी ने लम्बी साँस ली, बोला, “हाँ वह मूर्ति से खुश हैं लेकिन कहते हैं कि अब शक्तिवाले बच्चों को कैसे खोजें? उन्होंने मुझे कहा कि इस अनाथाश्रम के कुछ बच्चों को उठा कर जापान लाते हैं, तो मैंने तुरंत मना कर दिया, कहा कि उसके लिए उन्हें पहले मुझसे लड़ना पड़ेगा क्योंकि अब मैं उन बच्चों का रक्षक बन कर यहाँ रहूँगा। वह यह भी कह रहे थे कि त्री से पूछना कि क्या वह उनके लिए काम करेगा? त्री, अगर तुम उनके याकूज़ा बनना चाहते हो तो उनसे सीधा सम्पर्क करो, क्योंकि मैंने उनकी नौकरी को त्याग दिया है।”
शाम को जब अँधेरा हुआ तो आभा और ताकानोरी घूमते हुए अखाड़े में गये और वहाँ एक चबूतरे पर बैठ गये। वह बोला, “यहाँ पर, इस अखाड़े में कितनी शाँति है और यहाँ ऐसा लगता है जैसे कि हम एक शक्ति-धारा में स्नान कर रहे हैं, भीतर आत्मा तक मुझे यहाँ पर शक्ति की ऊर्जा महसूस हो रही है।"
आभा बोली, “हर रोज़ यहाँ पर त्री बच्चों को शक्ति-जागरण का अभ्यास करवाता है, और गुरु जी उन्हें ध्यान करना और मन को एकाग्र करना सिखाते हैं। यहाँ के कण-कण में शक्ति है। तुम चाहो तो तुम भी उनके विद्यार्थी बन सकते हो।"
ओरी बोला, "उसके बारे में बाद में सोचेंगे, पहले मुझे एक और महत्वपूर्ण काम करना है।" वह उठा और उसके सामने एक घुटना मोड़ कर ज़मीन पर बैठ गया, उसके हाथ में एक अँगूठी थी, बोला, “तुमसे तीन महीने दूर रहा तो समझा हूँ कि मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता। क्या तुम मुझसे विवाह करोगी?”
आभा ने कनखियों से चबूतरे के पीछे दीवार में लगी माँ तारा की हरिताश्म प्रतिमा को देखा, मुस्करा कर बोली, “मैं भी यही सपना देख रही हूँ कि तुम मुझसे यह कहोगे। लेकिन अपनी अँगूठी देने में इतनी जल्दी नहीं करो।"
“क्यों?” ओरी के माथे पर बल पड़ गये, बोला, “तुम मुझसे विवाह नहीं करना चाहती?”
“क्या मैंने ऐसा कहा?”
“तो तुमने मेरी अँगूठी क्यों नहीं स्वीकार की?”
“क्योंकि मैं जल्दबाज़ी में कुछ नहीं करना चाहती। हम लोग कुछ दिन साथ रहे हैं, अभी हम एक दूसरे को ठीक से नहीं जानते। कुछ दिन साथ रहेंगे, एक दूसरे को जानेंगे, मैं तुम्हें अपने भैया से मिलवाऊँगी, और तुम्हें अपना गाँव दिखाने मणिपुर ले कर जाऊँगी, फिर आराम से यह निर्णय भी ले लेंगे।"
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पाठकों से एक निवेदन
आप ने मेरे उपन्यास को पढ़ा, इसके लिए धन्यवाद। यह आप को कैसा लगा, कृपया इस बारे में अपनी राय नीचे एक टिप्पणी लिख कर मुझे अवश्य दें।
क्या आप त्री, ओरी, आभा और अनाथाश्रम के बच्चों के बारे में अन्य उपन्यास पढ़ना चाहेंगे? टिप्पणी में अपनी राय अवश्य लिखें।
अगर आप चाहें तो मुझे ईमेल लिख कर भी बता सकते हैं कि यह उपन्यास आप को कैसा लगा। मेरा ईमेल का पता है - sunil.deepak@gmail.com
धन्यवाद






