कुछ माह पहले मैंने निश्चय किया था कि मैं अपनी डायरी लिखूँगा कि हिंदी में क्या पढ़ा जो अच्छा लगा और इस डायरी का पहला भाग अगस्त के प्रारम्भ में लिखा था। आज इस डायरी का दूसरा भाग प्रस्तुत है।
मैं अधिकतर तीन भाषाओं में लिखता-पढ़ता हूँ - हिंदी, अंग्रेज़ी और इतालवी, पर कभी-कभी फ्राँसिसी और पुर्तगाली में भी पढ़ना पड़ता है। जैसे कि सुबह हिंदी, अंग्रेज़ी और इतालवी में अखबार पढ़ी, फिर कोई हिंदी पत्रिका पढ़ी, दोपहर में अंग्रेज़ी उपन्यास पढ़ा और रात को सोने से पहले कोई इतालवी पत्रिका पढ़ी। सपने भी इन तीनों भाषाओं में देखता हूँ। मेरे विचार में हर भाषा में हमारे सोचने का तरीका बदल जाता है, तो मेरे इस तरह से तीनों भाषाओं में लगातार बदलने से मेरे सोचने पर क्या असर पड़ता है, यह प्रश्न भी अक्सर मन में उठता है लेकिन समझ नहीं आता कि उसका उत्तर कैसे खोजा जाये?
इस बार मैंने जो हिंदी में पढ़ा उसे तीन भागों में बाँटा है - आलेख, कहानियाँ और कविताएँ। यह सब कुछ मैंने विभिन्न पत्रिकाओं में ॲानलाइन पोर्टल नॉटनुल पर पढ़ा।
खैर, अब उस पर आते हैं कि इस बार मुझे क्या पढ़ना अच्छा लगा, और शुरुआत करते हैं आलेखों से। अच्छा लगने के मूल्यांकन की मेरी पहली और सबसे बड़ी कसौटी है कि मैं किसी कहानी या आलेख को अंत तक पढ़ पाया या नहीं। पढ़ने को इतना कुछ है और दिन में केवल 24 घंटे होते हैं, जिसमें रुचि नहीं जागे, उसे तुरंत वहीं छोड देता हूँ।
हिंदी आलेख
हँस पत्रिका के अगस्त 2026 अंक में अनुज लुगुन का अतिथि संपादकीय: हँस का यह अंक जनजातियों की संस्कृति, भाषाओं और जीवन पर केन्द्रित है, मुझे यह अंक पढ़ना बहुत अच्छा लगा। लुगुन जी अपने सम्पादकीय में 1970 के दशक में शुरु हुआ कोइलकारो बांध के विरुद्ध जन आंदोलन जो तीस सालों तक चला, से शुरु करके विभिन्न विषयों को छूते हैं जैसे कि - मूलनिवासियों के सांस्कृतिक-अध्यात्मिक पुनर्निवास की माँग, आदिवासी नागरिकों को दो संवैधानिक अनुच्छेदों में बाँटना (पाँचवीं और छठी अनुसूची), कानजी पटेल के "अनुत्तरित लोग" में आदिवासी कवियों का संकलन जिसमें 141 आदिवासी भाषाओं में 382 कवियों की कविताएँ मूलभाषा और हिंदी में संकलित की गयीं, आदिवासी यानि असुर-राक्षस के रूप में स्वयं अपनेआप को देखते हैं।
हँस के इसी अंक में सावित्री बड़ाईक का एक रोचक आलेख भी है, "असुरों की सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेज", जिसमें वह बताती हैं कि हिंदू ग्रंथों में जिन्हें असुर कहा गया है वह छोटानागपुर के पठार में रहते हैं, आदि। इस आलेख को पढ़ कर सोच रहा था की प्राचीन सीरिया के असुर राजाओं, जैसे कि असुर बनिपाल, जिनकी कहानियाँ और इतिहास मेसोपोटेमिया की पक्की मिट्टी की तख्तियों पर मिली हैं और भारत की असुर जनजातियों में क्या सम्बंध था या कोई सीधा सम्बंध नहीं था?
हँस में ही अनामिका अनु द्वारा लिखी तीजन बाई की जीवनी का एक अंश, शीर्षक "अपनी नाक खुद सम्भाले यह समाज" जिसमें तेरह साल की लड़की के घर से निकाले जाने की बात है क्योंकि पाण्डवानी को ऊँचे स्वर और जोश में ही गा कर उसका अभ्यास करना पड़ता है और कोई उसे गाते हुए सुन लेता था, अच्छा लगा। इस आलेख की पहली पंक्ति, "धूँए से उठी, लोगों की आँखों में लगी", बहुत सुंदर लगी, उसमें तीजन बाई के जीवन का सार दिखता है।
पाखी के अगस्त अंक में "पाखी संवाद - जहाँ शब्द डरते नहीं" में शिवकुमार बटालवी और ताराशंकर वंद्योपाध्याय का स्मृति आलेख अच्छा लगा। वंद्योपाध्याय के लेखन की बात करते हुए कहते हैं, "इस उपन्यास में उन्होंने समाज के उस हिस्से को केन्द्र में रखा जिसे मुख्यधारा का साहित्य अक्सर अनदेखा कर देता था। वहाँ के लोगों की भाषा, उनके रीति-रिवाज, उनके भय, उनकी आस्थाएँ और उनके सपने - सब कुछ इतनी प्रमाणिकता से चित्रित है कि पाठक स्वयं उस संसार का हिस्सा बन जाते हैं।" मुझे भी हिंदी कहानियाँ-उपन्यास पढ़ते समय, लेखकों का यही कौशल आकर्षित करता है, कि अनदेखे-अनजाने लोगों के जीवन की झलक मिले। पाखी संवाद के इन आलेखों से मुझे उनकी पाखी संवाद यूट्यूब की चैनल का भी पता चला, और अब उनके विडियो देखने-सुनने का मौका भी मिलेगा।
अकार पत्रिका के अगस्त अंक के प्रारम्भ और अंत में मुख्यपृष्ठों के पीछे मिर्ज़ा हादी रुसवा के उपन्यास उमराव जान अदा के हिंदी अनुवाद का एक छोटा सा अंश दिया है जो बहुत सुंदर लगा। इस अंश में पता चलता है कि उमराव जान के समय में तवायफों की तालीम में और उपन्यास लिखने वाले लेखक को, शास्त्रीय संगीत के विभिन्न रागों और उनके सुरों की गहरी पहचान होती थी। यह जान कर भी थोड़ा सा आश्चर्य हुआ कि उपन्यास का यह अनुवाद गुलशन नन्दा ने किया था। अपने समय में गुलशन नन्दा जी शायद हिंदी के सबसे प्रसिद्ध लेखक थे। बचपन की रेलयात्राओं में मुझे उनके विभिन्न उपन्यास पढ़ना याद है। उनके बहुत से उपन्यासों पर सफल फिल्में भी बनी थीं। लेकिन जैसा हिंदी लेखन जगत में अक्सर होता है, लोकप्रियता को अ-साहित्यिक माना जाता है, और जब हिंदी के बड़े लेखकों की बात होती है, शायद कोई गुलशन नन्दा को उनमें नहीं गिनता।
अकार पत्रिका के अगस्त अंक में प्रियंवद जी का संपादकीय, जहाँगीर के अंग्रेज सलाहकार हॉकिन्स द्वारा लिखे बादशाह जहाँगीर के एक दिन के ब्यौरे के बारे में है। उसे पढ़ते हुए सोच रहा कि उस जमाने में और आज में किंतना अंतर आया है, जो चीजे हमें इतनी आसानी से मिल जाती हैं कि हम उनके बारे में सोचते भी नहीं हैं, उस समय वह बादशाह को भी नहीं मिलती थीं। अगर जहाँगीर के पास ट्विटर, टिकटॉक, इंस्टाग्राम होते तो वह अपना सारा दिन कैसे बिताते? अगर उनके पास फ्रिज होता तो वह उसमें अपने लिए कौन सी आईसक्रीम रखवाते? अगर उनके पास टीवी होता तो क्या वह किस तरह के प्रोग्राम व फिल्में देखते या शायद वह भी अमिताभ बच्चन के फैन हो जाते? अगर उनके पास माईक्रोवेव होता तो क्या वह अपने लिए कॉफी बना कर पीते? या फिर, हवाई जहाज में घूमते हुए ट्रम्प या पुतिन से दोस्ती बनाते? या फिर, अनुराग कश्यप की फिल्म देख कर कहते, "कितनी गालियाँ लगाता है यह आदमी अपनी फिल्मों में, लाहोल विला कुव्वत! इसे फाँसी पर चढ़ा दिया जाये।"
कथाक्रम के सितम्बर अंक में ही लोकबाबू के उपन्यास "बस्तर-बस्तर" पर जयप्रकाश मानस का आलोचनात्मक आलेख, "जहाँ जंगल स्मृति है और आदमी धीरे-धीरे गायब होता हुआ वर्तमान" अच्छा लगा और इसे पढ़ कर "बस्तर-बस्तर" को पढ़ने की इच्छा भी हुई। मानस जी लिखते हैं, "बस्तर रूपक है उस देश का, जो अपने ही भीतर कुछ दूर छूट गया है - जहाँ विकास की सड़कें पहुँचते-पहुँचते थक जाती हैं, और पगडँडियाँ अब भी अपने होने पर अड़ी रहती हैं। बस्तर कविता है उस आदिम लय की जिसे किसी छंद में बांधना सम्भव नही; वह महुए की गंध की तरह फैलती है - धीरे, अनाम, लेकिन गहरे तक उतरती हुई।"
कथाक्रम के सितम्बर अंक में अर्चना पैन्यूली के उपन्यास "अलकनंदा सुन" पर संजीव जयसवाल 'संजय' का आलोचनात्मक आलेख, "माटी की गंध और स्मृतियों की सरिता" भी अच्छा लगा। इस उपन्यास के कथन-विन्यास के बारे में उन्होंने लिखा है, "यह उपन्यास शिवानंद के जीवन को किसी सर्वज्ञ कथावचाक के माध्यम से नहीं, बल्कि उसके बच्चों की दृष्टि से प्रस्तुत करता है - पहले बड़ा बेटा, फिर दूसरा बेटा और अंत में पुत्री। इस क्रमिक परिवर्तन से कथा केवल आगे ही नहीं बढ़ती, बल्कि भावनात्मक रूप से अधिक गहरी होती जाती है।" इस बात से भी इस उपन्यास पढ़ने का मन किया।
बनास जन पत्रिका के 88वें अंक में विद्यासागर नौटियाल के बारे में पढ़ रहा था। उनके लेखन के बारे में लिखा है: "उनके उपन्यासों और कहानियों का संसार उत्तराखंड के साधारण लोगों के जीवन संघर्षों का दस्तावेज बन गया है। वह सहज भाषा और सरल कथा-शिल्प में अपने लोगों की यातनाओं को दर्ज करते हैं। इतिहास और संस्कृति उनके लिए गौरव का स्मारक न हो कर साधारण लोगों की मुक्ति चेतना के वाहक बनते हैं।" ऐसे ही बातें कुछ अन्य आलेखों में भी थीं और मैंने अक्सर अन्य लेखकों के बारे में भी पढ़ी हैं। इसे पढ़ कर सोच रहा था कि क्यों हिंदी में लेखकों के साधारण आदमियों की पीड़ा, शोषण, यातनाओं की बात करना ही अच्छा साहित्य समझा जाता है? जबकि मेरे मन में वही किताबें रहती हैं जिनमें मानव जीवन का और रिश्तों का सजीव चित्रण हो, उनमें केवल दुख, पीड़ा और कठिनाईयाँ देखना उसका अधूरापन नहीं बन जायेगा? मैंने नौटियाल जी की कोई किताब नहीं पढ़ी इसलिए मेरी यह टिप्पणी उनके लेखन के बारे में नहीं है, बल्कि अच्छा साहित्यकार किसे माना जाये का मूल्यांकन करने वाली दृष्टि के बारे में है।
तद्भव पत्रिका के जनवरी-जून 2026 अंक में विश्वनाथ त्रिपाठी के संस्मरण "अस निबहुर देसू" का आठवाँ भाग बहुत रुचि से पढ़ा जिसमें उनके दिल्ली आने और यहाँ रहने के 1950-60 के वर्णन हैं। उनकी बातें पढ़ कर मुझे भी अपनी बचपन की वह घटनाएँ याद आयीं, जब मैं बच्चा था। उनका जामामस्जिद जा कर कबाब खाना, जमुनापार दिलशाद गार्डन में रहने के बारे में कहना "नानक दुखिया सब संसार, सबसे दुखिया जमुना पार", श्रीकाँत वर्मा और मन्मथनाथ गुप्त की चीन के बारे में बहस, सैम मानिकशा और जनरल करिअप्पा की बातें, ऐसी बहुत सी घटनाओं के बारे में पढ़ना अच्छा लगा।
तद्भव में ही राजाराम भादू का धर्मवीर भारती की जन्म शताब्दी के अवसर पर "एक पुनरावलोकन" आलेख भी अच्छा लगा। 1983-84 के आसपास मेरी एक कहानी धर्मयुग में छपी थी, तब भारती जी से कुछ पत्रचार हुआ था। वह मेरे पिता को जानते थे, दोनों इलाहाबाद के थे, करीब-करीब हमउम्र थे और दोनों के परिवार आर्यसमाजी थे। मैंने लड़कपन में भारती की "गुनाहों का देवता" पढ़ी थी और उनके लाखों प्रशंसकों में मैं भी आ गया था। मैं उनकी एक कविता को भी बहुत पसंद करता हूँ - "दिन यूँ ही बीत गया, अंजुरी में भरा हुआ जल जैसे रीत गया।"
तद्भव में आकांक्षा बरनवाल के लम्बे आलेख "परंपरा का मूल्यांकन और औपनिवेशिक आधुनिकता" में महाभारत के संदर्भ में, एक ओर है पश्चिमी तर्क, समझ और श्रेणीकरण, और दूसरी ओर हैं भारतीय समझ और परम्परा। वह इन दोनों के बीच के विरोधाभासों पर पश्चिमी सोच से प्रभावित महाभारत के "क्रिटिकल एडिशन" बना कर ग्रंथ के "मूल तथा प्रमाणिक" रूपों की खोज-दृष्टि, और दूसरी ओर, उसके विभिन्न संस्करणों-लेखकों की गतिशील, समय के साथ बदलने वाली भारतीय समझ की दृष्टि के अंतरों की बात करती हैं।
इस सिलसिले में वह लिखती हैं, "जो विद्वान वैज्ञानिक पाठालोचन की पद्धिति और मूल पाठ की अवधारणा के समर्थक हैं उन्हें शिकायत है कि सुकथांकर और उनके सहयोगियों ने बहुत से परवर्ती प्रक्षेप अपने क्रिटिकल एडिशन में शामिल कर लिए। जो विद्वान महाभारत को एक स्थिर रचना की बजाय एक गतिशील और जीवंत प्रवाह की तरह देखते हैं उन्हें यह शिकायत है कि क्रिटिकल एडिशन के संपादकों ने ऐसे प्रसंगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया जो भारतीय जनमानस में महाभारत की प्रसिद्धि और लोकप्रियता के आधारस्तंभ हैं।" इस संदर्भ में वह एस. एन. बालगंगाधर की बात रखती हैं, "इतिहास हमें 'तथ्य' देता है, अतीत हमें 'स्मृति' और 'मूल्य' देता है।" अपने निष्कर्ष में वह कहती हैं कि "आज हम जिस 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' का उदय देख रहे हैं, विडम्बना यह है कि वह भी उसी औपनिवेशिक जाल में फंसा हुआ है जिसका शिकार बंकिमचंद्र और सुकथांकर जैसे विद्वान हुए थे। एक तरफ आज का राजनीतिक विमर्श पश्चिम का विरोध करता है और भारतीयता की बात करता है, किन्तु दूसरी तरफ अपनी महानता सिद्ध करने के लिए वह पैमाना (standard) आज भी पश्चिम का ही उपयोग कर रहा है। जब आज का नैतृत्व या उसके बुद्धिजीवि यह दावा करते हैं कि 'महाभारत काल में इंटरनेट था' या 'वैदिक काम में हवाई जहाज थे' तो वह अनजाने में यह स्वीकार कर रहे होते हैं कि महान होने का एकमात्र अर्थ तकनीक और विज्ञान में आगे होना है, जो पूरी तरह से एक आधुनिक, पश्चिमी पैमाना है।" यह आलेख पढ़ कर बहुत सी बातें और प्रश्न मन में उठे और इसलिए यह बहुत अच्छा लगा।
हिंदी कहानियाँ
विभिन्न पत्रिकाएँ पढ़ते हुए एक बात मेरे मन में आई कि अंग्रेजी, इतालवी, फ्रैंच आदि भाषाओं में विभिन्न श्रेणियों की कहानियाँ होती हैं - रोमांस, रहस्य, जासूसी, एडवैंचर, साईंस फिक्शन, फैतासी, डरावनी, आदि। भारत में भी अंग्रेजी के लेखन में अधिक विविधता है। लेकिन मुझे लगता है कि हिंदी कहानियों का संसार अधिकतर दुखों, संघर्ष, भेद-भाव, परिवार, जैसे दायरों आदि में ही घूमता रहता है, उसमें उतनी विविधता नहीं होती। यही बात मृणाल पाण्डे जी के एक साक्षात्कार में भी सुनी, जब उनसे पूछा गया कि उनकी कहानियाँ मध्यम वर्ग पर क्यों होती हैं, और गरीब, शोषित वर्ग के लोगों के बारे में क्यों नहीं होतीं? यानि लेखकों को गम्भीरता से तभी लिया जा सकता है अगर वह कुछ विशेष विषयों पर ही लिखें? पर ऐसा करना क्या हिंदी साहित्य को पिंजरों में बंद करना नहीं हो जायेगा?
हँस में ज्ञानचन्द बागड़ी की कहानी "धधकती ज़मीन" में मणिपुर की स्थिति की कहानी है जिसमें एक बाहर से आया प्रोफैसर आदित्य समझना चाहता है कि लड़ाईयाँ किसके बीच और क्यों हो रही है, लेकिन उनकी बातें स्थिति समझने में विशेष मदद नहीं करती। कहानी का भूगौलिक परिपेक्ष्य समझ में नहीं आता कि जिन गाँवों-जँगलों की बात हो रही है वे कहाँ हैं, न ही उसके पात्र किन जनजातियों के हैं, लड़ाई किसके बीच है, यह सब कुछ समझ नहीं आता। शायद यही वहाँ की सच्चाई है कि कुछ भी समझना कठिन है। एक जगह पर एक पात्र कहता है, कि शहर के लोग पहाड़ी लोगों की ज़मीन लेने के लिए यह कर रहे हैं। दूसरी जगह एक पात्र समझाता है कि विभिन्न जनजातियाँ हैं, राजनीति करने वाले हैं, उग्रवादी हैं, सेना वाले हैं, बाहरी ताकते हैं, सबका इस लड़ाई में हाथ है, सब अपने को सही समझते हैं और दूसरे को गलत। यह कहानी लड़ने वालों के धर्मों की बात नहीं करती। कहानी में घरों का जलना, लोगों का मरना, परिवारों का विस्थापित होना, आदि घटनाओं का दर्द महसूस होता है, लेकिन उसका क्या होगा या क्या करना चाहिये, इसकी झलक नहीं मिलती।
हँस में अनिशा मिंज की कहानी "फिर एक कोड़ा राजी" में एक चाय बागान में रहने वाली बुघनी नाम की बच्ची की कहानी है, जो स्कूल नहीं जाती क्योंकि उसकी शिक्षका कहती है कि वह हिंदी ठीक से नहीं जानती। बुघनी माँ के पीछे-पीछे चाय-बागान में जाती है, वहाँ काम में माँ की मदद करती है और लोगों से उनके अपने गाँव छोड कर चाय-बागानों में आने के इतिहास की बातें पूछती है। दिन समाप्त होता तो माँ को पगार अधिक मिलती है क्योंकि बुघनी की सहायता से उसने पत्तियाँ अधिक तोड़ी हैं। लेकिन रात को झोपड़ी में आग लगने से उसके माता-पिता मर जाते हैं, और कहानी का अंतिम भाग कलकत्ता में है जहाँ सोलह साल की बघनी एक घर में काम करती है, शोषित होती है और चायबगान के दिनों को याद करती है। कहानी की बनावट कमज़ोर है, लेकिन उसकी चायबागान की बोली और उनके गीत, यह दोनों बातें अच्छी लगीं।
हँस में विनोद कुमार की कहानी "वह राम नहीं था" में दो बेटियों की माँ आदिवासी परिवार की सुमारी है, जो एक "बाहरी" आदमी के साथ चली जाती है और कुछ महीनों बाद घर लौट आती है। मास्टर जी जो इस कहानी को सुना रहे हैं, इस बात को सुन कर उसकी तुलना रामायण के राम और गर्भवति सीता के वनवास से करते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि एक स्त्री-पुरुष के रिश्ते को केवल एक अच्छा या बुरा में बाँटना इतना आसान नहीं लगता, क्योंकि इसमें हम उनकी भावनाओं को अनदेखा कर रहे हैं। अपनी मर्जी से घर छोड़ कर नये साथी के साथ जाने के कुछ महीनों बाद पहले साथी के पास लौट आना, यह आदिवासी परिवार में हो या गैर-आदिवासी परिवार में हो, उसे केवल यौन-शुचिता की दृष्टि से तोलना, मुझे अधूरा सा लगता है। अगर दूसरे मर्द के साथ गयी स्त्री के घर वापस लौटने पर उसे स्वीकारना विकासशीलता का मापदंड है, तब दूसरी औरतों के साथ जाने वाले पुरुष के घर लौटने पर स्वीकारना क्या होगा? खैर इस कहानी ने इस विषय के बारे में सोचने का मौका दिया, इसलिए यह कहानी अच्छी लगी।
पाखी के अगस्त अंक में विद्याभूषण की कहानी "बनवारी बाबू का मकान" में उत्तर भारत के छोटे शहर के पारिवारिक रिश्तों की बातें हैं, जहाँ दो कमरों के घर में महीनों रहने वाले भाँजे-भतीजे ही नहीं, भाँजे के मित्र पेयिन्ग गैस्ट भी हैं, पैसा अधिक कमाने वाले बेटे का परिवार के निर्णयों पर अधिकार है, बेटी की शादी करने के लिए दान-दहेज क्या और कैसे तैयार किया जाये की बातें भी हैं, और सबसे बड़ी बात की मन-मुटाव हो या पुरानी यादों के साथ हँसना-हँसाना, जीवन नहीं रुकता, वह चलता रहता है।
अकार में जीवेश प्रभाकर की कहानी "फ्री बर्डस" में धर्म और रिश्तों की नाजुकता की बात बहुत अच्छे तरीके से कही गयी है। रानी की माँ मुसलमान हैं और पिता हिंदू। समय के साथ उनके अपने परिवारों के साथ रिश्ते बदलते हैं लेकिन रानी के भाई की घर वालों द्वारा पक्की की हुई शादी में दिक्कत आती हैं क्योंकि लोग उनके परिवार के बारे में जान कर मना कर देते हैं। रानी के विवाह में भी मुश्किलें आयेंगी, इसलिए उसके मामा उसके लिए एक मुसलमान लड़के का रिश्ता लाते हैं लेकिन रानी का भी अपना एक रहस्य है जिसे उसने सबसे छुपाया है .. कहानी के अंत का सरप्राइज़ अच्छा है। कहानी में माँ और पिता के धर्मों की बात नहीं की है, कि क्या उनमें से किसी ने धर्म बदला था या नहीं, पर शायद उस बात को जोड़ने से कहानी की सरंचना थोड़ी जटिल बन जाती।
सम्मुख में दो सौ शब्दों की कुछ लघु-कथाएँ पढ़ीं - कुछ कहानियाँ अच्छी लगीं जैसे कि बेजी जैसन की कहानी "भरम", अंजू शर्मा की "जीत", हरि मृदुल का "रोना", लकी राजीव की "अनायक", आदित्य शुक्ल की कहानी "पंख", और, आकांक्षा पारे काशिव की "न्यौता"। कुछ अन्य कहानियों में लगा कि उनका मूल विचार अच्छा था, लेकिन कथा-संरचना को थोड़ा और असरदार किया जा सकता था, जैसे कि , अनिर्बाण साधु का "रंग धनुष", देवेश पथ की "तुर्किश आइसक्रीम", उषा कुमारी की "वायरल विकास", और पल्लवी विनोद की "फोटोग्राफर"। खैर, अभी सभी लघु-कथाएँ नहीं पढ़ पाया हूँ।
कथाक्रम के सितम्बर 2026 अंक में गोविंद मिश्र की कहानी "काम ... मुझे भी" में वृद्ध सज्जन हैं जो अकेले रहते हैं पर बुढ़ापे के साथ तकलीफें बढ़ी हैं इसलिए किसी सहायक को खोज रहे हैं और एक एजैंसी से बात करते हैं। लेकिन शुरु में जितने युवक रखते हैं उनके साथ अनुभव अच्छा नहीं होता, जब एजैंसी वाला एक ऐसे युवक की बात करता है जिसका पारिवारिक इतिहास संदेहनीय है .. छोटी सी कहानी में कोई नाटकीय मोड़ नहीं हैं, बस विश्वास बनने की बात है। यह कहानी आज की दुनिया में अकेले वृद्धों की बढ़ती संख्या और नवयुवकों को नौकरी मिलने की दिक्कतें, इन दोनों समस्याओं को जोड़ती है।
संवेद पत्रिका के जनवरी 2026 अंक में दिव्या विजय की कहानी "कृष्ण पंखुरी" की कहानी सुरमा की है जिसकी बस्ती में सब लड़कियाँ घरों में बाथरूम साफ करने जाती हैं और सुरमा को एक मॉल के बाथरूम की सफाई की नौकरी मिलती है। आसपास सब काम करने वाली लड़कियों को ईर्श्या है कि सुरमा इतनी अच्छी जगह पर इज़्जतदार नौकरी करती है, लेकिन दिक्कत यह है कि जब मॉल में आने वाली लड़कियों की तरह, सफाईवाली के कपड़े-बाल छोड़ कर मॉल वाली लड़कियों के फैशन करने की कोशिश करती है तो उसके पास उनके क्रूर शब्दों से लड़ने के लिए साहस नहीं है, वह हार मान लेती है। पर, कुछ महीने बाद, उसे भी उनमें से एक युवती से बदला लेने का मौका मिलता है तो ... कहानी में अपने आत्मसम्मान के लिए लड़ने की कमज़ोरी का चित्रण अच्छा लगा।
तद्भव में मृत्युंजय कुमार सिंह की कहानी "जल्लाद उर्फ हैंगमैंन" में जेल के पुराने फांसी लगाने वाले बाबुल मसीह हैं, उनकी पत्नी बिल्किस है, उनका बेटा अब्दुल्ला है और जेल का कैदी तारक सकुल है। तारक ने लोगों की हत्या की है और जिस दिन तारक को फांसी लगने वाली है, उस दिन बाबुल मसीह उसे फांसी पर लटकाने वाली रस्सी को तैयार करते हुए उससे बातें करते हैं। छोटी सी कहानी में एक छोटी सी बात है, लेकिन मृत्युंजय जी की काबलियत है कि उस कहानी को ऐसे रचते हैं कि अंत तक बांधे रखती है।
हिंदी कविता
मुझे कविताएँ कम ही अच्छी लगती हैं, मैं अंग्रेज़ी और इतालवी में कविताएँ बिल्कुल नहीं पढ़ पाता, पढ़ूँ तो उनमें सौंदर्यबोध या भावबोध नहीं होता। हिंदी कविताओं में भी मुझे पुराने कवि ही अच्छे लगते हैं, नयी कविता मुझे प्रभावित नहीं करती। लेकिन आज के इस आलेख में दो आधुनिक कवि भी हैं - विनय सौरभ और दिनेश शुक्ल।
अकार पत्रिका में विनय सौरभ की कविताओं में छोटी-छोटी बातों में छिपी हुई लम्बी कहानियाँ हैं। "असंभावित के विरुद्ध" की कहानी में घर से भागी हुई एक लड़की है, और उसके सालों बाद अपने गाँव में लौटने की बात है। "माँ के शाल" में माँ और मौसी के सम्बंधों का रस है।
सौरभ जी की "अपने ही स्टेशन से गुज़रना" में छूटे हुए गाँव की यादों की बात है, उनकी कविताओं में मुझे यह कविता-कहानी सबसे अधिक अच्छी लगी - इसकी पहली पंक्तियाँ हैं, "एक रोज यात्री बन कर गुजरते हो/ अपने ही गाँव के स्टेशन से/ एक उदासी भीतर फैल जाती है अचानक/ खिड़की से बाहर तलाशते हो, कोई चेहरा दिख जाये परिचित/"। उनकी एक अन्य कविता, "वे ही!" में अपने आप से प्रश्न हैं कि हम लोगों के सुख-दुख में, उनकी मृत्यु आदि पर क्यों नहीं हिस्सा ले पाते। इसकी कुछ पंक्तियाँ हैं - "यह ख्याल आता है अक्सर देर रात गये/ या आधी नीँद के बीच/ जैसे कोई पत्थर आज भी सीने में लुढ़कता रहता है/ आत्मग्लानी का भार लिए/"।
ककसाड़ के अगस्त अंक में मुझे दिनेश शुक्ल की दो गज़लें पसंद आयीं। उनकी पहली गज़ल की यह पंक्तियाँ देखिये: "यह चादर वक्त की जर्जर हवा से थरथराती है/ गरीबी पर लगी तुरपाइयाँ रह-रह उधड़ती हैं/" और "दुखी सपनों के किस्से, रात की टूटी हुई नींदें/ सुबह परछाईयाँ इक सीढ़ियाँ चढ़ती उतरती हैं/"।
और उनकी दूसरी गज़ल की पहली पंक्तियाँ भी मुझे बहुत अच्छी लगीं: "किस्सा मत पूछिये, टूटी हुई थकानों का, इसके आगे है सफर, रेत के मकानों का।"
अंत में
आज के इस आलेख के अंत में तद्भव से आकांक्षा बरनवाल के आलेख से कुछ अन्य पंक्तियां जो मुझे विचारनीय लगीं: "जिस प्रकार 19वीं सदी के सुधारकों ने 'पौरुषहीन (effeminate) कहलाने के डर से अपने धर्म को 'कठोर' और 'एकेश्वर वादी' बनाने का प्रयास किया था, वैसा ही आज की राजनीति इतिहास-2 (लोक परंपरा और मिथक) को जबरन इतिहास-1 (तथ्यात्मक इतिहास) बनाने पर तुली है। दीपेश चर्कवर्ती कहते हैं कि गाँधी ने इतिहास-2 (लोक परंपरा, मिथक और भावनाओं) की भाषा बोली। जब गांधी ने रामराज्य कहा तो उसका मतलब किसी ऐतिहासिक समय या राजा की वापसी नहीं बल्कि राज्य की ऐसी परिकल्पना देना था जिसे किसान भी समझता था। जब गांधी ने नमक उठाया या चरखा चलाया, तो वह कोई आर्थिक सिद्धांत देने से अधिक भारत की आत्मा को छूना चाहते थे। ... आज के नेता इतिहास-1 की भाषा बोलते हैं। यहां तक कि जब वे धर्म की बात भी करते हैं तो उसे 'वैज्ञानिक' सिद्ध करने में लगे रहते हैं ...लेकिन दोनों ही स्थितियों में वह पश्चिमी इतिहासबोध की ही नकल कर रहे हैं। यह सांस्कृतिक युद्ध तब तक शांत नहीं होगा जब तक हम गांधी की या जे. कृष्णमूर्ति की भांति उस हीन भावना से मुक्त नहीं हो जाते, जो हमें हर क्षण पश्चिम के समक्ष खुद को सही और ऐतिहासिक सिद्ध करने के लिए विवश करती है।"
इस बार जो पढ़ा उसमें मुझे आकांक्षा बरनवाल के आलेख के अतिरिक्त हँस पत्रिका का आदिवासी जीवन और साहित्य पर केन्द्रित अंक सबसे अधिक रोचक लगा।
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