गुरुवार, जुलाई 02, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 10

 

अभी तक की कहानी: जामुन बाबा की शक्तिमय मूर्ति की तलाश में, उनका पीछा करने वाला जापानी याकूज़ा-गुँडा ताकानोरी भारत आया है और उसने बाबा को नारायणपुर में खोज लिया है। बाबा उससे बच पर भागने में सफल होते हैं और मजूली द्वीप पर वृद्धाश्रम में लौट आते हैं। उधर, गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम में, बाबा का पुत्र-समान शिष्य त्रिनेत्र, कुछ शक्तिमय बच्चों के साथ उनके आश्रम की यात्रा पर निकलने के लिए तैयार हो यहा है। त्रिनेत्र को बताये बिना बाबा अपने वृद्धाश्रम के मंदिर के सामने समाधी ले लेते हैं। जब त्रिनेत्र को पता चलता है तो वह बहुत दुखी होता है। आगे पढ़िये ...

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अध्याय 10

नारायणपुर, असम, 3 मार्च 2026

सुबह जापान से रिकू का फोन आया, उसने इधर-उधर की बात नहीं की, सीधा पूछा, “ओरी, क्या हुआ? अभी तक जून-मिन का पता नहीं चला?”

“यामागुचि सान, हमें उसका पता चल गया है। वह बूढ़ा हो गया है, लेकिन अभी भी चालाक है। कल वह हमसे बच कर भागने में सफल हुआ लेकिन अब हमें पता चल गया है कि वह किस क्षेत्र में रहता है, आप कुछ दिन और धैर्य रखिये, मैं उसे अवश्य खोज निकालूँगा", ताकानोरी ने कहा।

“तुम्हें वहाँ गये हुए तीन महीने हो गये हैं, इतने समय में तुम उसे खोज क्यों नहीं पाये?”

“आप चिंता नहीं करें, मुझे पक्का विश्वास है कि कुछ समय में मैं उसे खोज निकालूँगा", उसने उसे आश्वासन दिया।

सोमचाई ने कम्प्यूटर के प्रोग्राम की सहायता से जून-मिन की पुरानी तस्वीर को ले कर, एक कृत्रिम-बुद्धि प्रोग्राम से उनकी नयी तस्वीरें बनायी थीं और उन्हें अपने आदमियों को दिया था ताकि वह उनको दिखा कर शहर में पूछताछ करें। कुछ घंटे बाद, बटेर खबर ले कर आया, बोला, “एक दुकानदार ने इस तस्वीर को पहचान लिया, कहा कि यह तो जामुन बाबा हैं और उसके यहाँ कभी-कभी सामान खरीदने आते हैं। लेकिन वह कहाँ रहते हैं, उसे पता नहीं था। बोला कि वह हर महीने-दो महीने में नारायणपुर आते हैं और वहाँ से तेल, साबुन वगैरा खरीद कर ले जाते हैं।"

सोमचाई ने इंटरनैट पर "जामुन बाबा" को खोजा तो उसे इंस्टाग्राम पर उसी दिन सुबह के कुछ वीडियो मिल गये। वह तुरंत मोबाइल को ले कर ताकानोरी के पास गया, बोला, “कुछ वीडियो मिले हैं। इनके अनुसार, कल शाम को जामुन बाबा यानि जून-मिन ने समाधी ले कर प्राण त्यागे हैं।"

ओरी ने वीडियो देखे। एक वीडियो में वह हिस्सा था जब बाबा एकत्रित लोगों के सामने कुछ बोल रहे थे और उनकी सफेद चद्दर उसके पीछे हवा में ऊपर उठ गयी थी। एक दूसरे वीडियो में उनके बक्से में बैठने और बक्से को ज़मीन में गाड़ने के दृश्य थे। वीडियो में लोग "जामुन बाबा" का नाम बार-बार ले रहे थे। 

“यह समाधी लेना, इसका क्या मतलब है?” ओरी ने पूछा।

“वीडियो देख कर लगता है कि कल उन्होंने अपने आप को एक गड्ढ़े में जीवित दफन करवा लिया, अब तक वह मर गये होंगे।"

“यह वीडियो झूठा भी हो सकता है? शायद उसने यह वीडियो आर्टिफीशयल इन्टैल्लीजैंस से बनवा कर हमें गुमराह करने के लिए लगवाये हों?”

“मेरी जाँच में यह आर्टिफीशयल इन्टैल्लीजैंस से नहीं बने हैं। इन्हें किसी स्कूल के लड़कों ने इंस्टाग्राम पर डाले हैं। यह झूठे नहीं लगते, लेकिन इस बात की पुष्ठी करना आसान है। यहाँ से कुछ दूर ब्रह्मपुत्र नदी के मजूली द्वीप पर उनका एक वृद्धाश्रम है, हम वहाँ जा कर उसकी जाँच कर सकते हैं", सोमचाई बोला।

ओरी ने तुरंत जीप तैयार करवायी और वे लोग चापोड़ी घाट आये। वहाँ से उन्होंने वृद्धाश्रम जाने के लिए एक नाव को किराये पर लिया।

जामुन बाबा के जीवित समाधी लेने की खबर धीरे-धीरे फ़ैल रही थी, बहुत से लोग यह बात सुन कर उनकी समाधी को देखने आ रहे थे, इसलिए वृद्धाश्रम में समाधी-स्थल को देखने वालों की भीड़ लगी थी। ओरी और उसके आदमियों ने उनके बीच से जल्दी आगे बढ़ने की कोशिश की, लेकिन वह भीड़ इतनी अधिक थी कि वह कुछ नहीं कर पाये। भीड़ के साथ-साथ वह भी धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे।

आगे आये तो देखा कि वृद्धाश्रम के द्वार से बाहर दूर तक कतार लगी है, जो बहुत धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है। ताकानोरी के आदमियों ने कतार से आगे जा कर घुसने की कोशिश की, तो कतार में खड़े हुए लोग गुस्सा हो गये। आखिर में उन्हें भी पीछे कतार में ही आना पड़ा।

ओरी को इस देरी पर बहुत गुस्सा आ रहा था, उसका बस चलता तो वह अपनी तलवार निकाल कर, लोगों को मारता-काटता आगे बढ़ जाता लेकिन सोमचाई ने उसे रोका, कहा कि अगर वह सौ लोगों को भी मार देगा तब भी बाकी के हज़ारों लोग पत्थरों से उसका सिर फोड़ देंगे।

दो घंटे के बाद जब वह समाधी-स्थल पर पहुँचे तो उसकी दृष्टि साथ में बने मन्दिर की ओर गयी। उसकी बाहरी दीवार पर बहुत सी मूर्तियाँ बनी थीं, उनके बीच मूर्तियों की एक पंक्ति ने उसका ध्यान खींचा। उस पंक्ति में श्वेत तारा और हरित तारा की मूर्तियाँ साथ-साथ लगी थी। उसने वहाँ खड़े हो कर तुरंत आँखें बंद कीं और अन्वेषण-किरण से उन मूर्तियों को जाँचा, उसे लगा कि उनमें हलकी सी शक्ति-लहर का आभास हो रहा है। यह देख कर उसके मन को चैन मिला, कि अगर जून-मिन की हरिताश्म तारा की मूर्ति नहीं भी मिलेगी, तो वह इन मूर्तियों को यामागुचि सान के लिए जापान ले जा सकता है।

उसे समाधी-स्थल पर आगे न बढ़ता देख कर, कतार में उसके पीछे वाले लोगों ने शोर मचाया तो उसके आदमियों ने उन्हें समझाया कि वह विदेश से आया बौद्ध भिक्षुक है और समाधी लेने वाले जामुन बाबा का पुराना शिष्य है, तो सब लोग चुप हो गये।

वह सोमचाई के साथ मन्दिर के प्रांगण में पीछे की ओर जा कर खड़ा हो गया, बोला, “कल सुबह मैंने उसकी शक्ति-लहर को नारायणपुर में पकड़ा था और कल शाम को ही उसने समाधी ले कर प्राण त्याग दिये, क्यों? मुझे इस बात पर शक हो रहा है। यह उस बूढ़े की हमसे बचने की कोई चाल लगती है। मान लो कि उसका समाधी लेना केवल एक ड्रामा है? हो सकता है कि जब लकड़ी का बक्सा नीचे गड्ढे में उतारा गया तो वह भीतर नहीं था, पीछे से निकल कर कहीं पर छिप गया था, तो? या उस बक्से में साँस लेने की नलकी लगी थी, रात को जब लोग चले गये तो उन्होंने गड्ढ़े को खोल कर उसे बाहर निकाल लिया हो? या फ़िर, यहाँ समाधी स्थल के नीचे कोई सुरंग बनी हुई हो, लोगों के सामने उसने समाधी ली पर नीचे जा कर, वह बक्से से निकल कर, सुरंग से कहीं भाग गया हो?”

सोमचाई बोला, “पहाड़ी के भीतर रास्ता या सुरंग बनाने आदि में बहुत समय लगेगा। अगर ऐसा हुआ तो इसका मतलब होगा कि इसकी योजना उसने बहुत पहले बनायी थी और कल जैसे ही उसे लगा कि हमने उसे तलाश कर लिया है तो उसने समाधी ले ली? लेकिन उसे यह करने की क्या आवश्यकता थी? आप ने कहा था कि वह पिछले छयालिस सालों से भाग रहा है, जब कोई उसे खोज लेता था तो वह भाग कर कहीं और चला जाता था। तो इस बार वह कहीं और क्यों नहीं गया, उसने मरने के लिए समाधी क्यों ली?”

ओरी के माथे पर बल पड़ गये, बोला, “सचमुच वह बूढ़ा बहुत चालाक है और हमसे कोई खेल खेल रहा है। मुझे बिल्कुल भी आश्चर्य नहीं होगा कि वह आसपास में कहीं पर छिप कर, हमें यहाँ बातें करता हुआ देख रहा है और हँस कर मज़े ले रहा है।" फ़िर, आसपास देखते हुए बोला, “यहाँ एक वृद्धाश्रम है, पहले यहाँ के बूढ़ों से पूछताछ करनी चाहिये। अगर ज़रूरत पड़ी तो मैं इस समाधी को खुदवा कर उसके मृत शरीर को अपनी आँखों से देखूँगा।"

सोमचाई ने समाधी को देखने आने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ की ओर देखा, बोला, “इन लोगों के सामने हम कुछ नहीं कर सकते। इनके सामने अगर हम इस समाधी को हाथ भी लगायेंगे तो यह लोग हमारी धज्जियाँ उड़ा देंगे। यही नहीं, हमारे तीनों आदमी भी इस बाबा के भक्त बन गये लगते हैं, देखो कैसे हाथ जोड़ कर खड़े हैं।"

सचमुच बटेर, लक्की और मटरू भी, अन्य श्रद्धालुओं की तरह जून-मिन की समाधी के पास हाथ जोड़ कर खड़े थे।
“एक मिनट रुको, मैं अभी आता हूँ", कह कर ओरी मन्दिर के भीतर गया।

जब उसने मन्दिर के बीच में बौद्धिसत्व अवलोकितेश्वर की मूर्ति देखी तो उसकी दृष्टि उनकी हथेलियों पर रखी हरित तारा और श्वेत तारा की प्रतिमाँओ की ओर गयी। उसने आँखें बन्द करके उनकी जाँच की, उसे लगा कि उनमें भी शक्ति का स्पंदन है।

उसने मन्दिरकक्ष की अन्य दोनों मूर्तियों, ताँडव करते शिव और ध्यानलीन बुद्ध को भी ध्यान से देखा तो उनमें भी शक्ति का कंपन महसूस किया। वह समझ गया कि यह मन्दिर, यह प्रतिमाएँ, यह कोई सामान्य जगह नहीं हैं, इनमें ईश्वर की ऊर्जा का विशेष वास है।
उसने सोचा कि उन बड़ी मूर्तियों को जापान ले जाना कठिन होगा, लेकिन वह तारा की छोटी प्रतिमाओं को यहाँ से ले जा सकता है। यामागुचि तो शक्ति वाली मूर्तियाँ चाहिये, और यहाँ पर वैसी मूर्तियों की कमी नहीं है।

जब वह मंदिर से बाहर निकला तो उसे देखते ही सोमचाई समझ गया कि मन्दिर में कुछ हुआ है। वह जब भीतर गया था तो चिड़चिड़ा लग रहा था, जबकि अब वह मुस्कराता हुआ बाहर आया है।

“उन आदमियों को बुलाओ, हम वृद्धाश्रम में बात करने जायेंगे", ओरी ने उसे कहा। 

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अगला अध्याय सोमवार 6 जुलाई 2026 को पढ़ सकते हैं। 
 
 

सोमवार, जून 29, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 09

अभी तक की कहानी: जामुन बाबा की शक्तिमय मूर्ति की तलाश में, उनका पीछा करने वाला जापानी याकूज़ा-गुँडा ताकानोरी भारत आया है और उसने बाबा को नारायणपुर में खोज लिया है। बाबा उससे बच पर भागने में सफल होते हैं और मजूली द्वीप पर वृद्धाश्रम में लौट आते हैं। उधर, गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम में, बाबा का पुत्र-समान शिष्य त्रिनेत्र, कुछ शक्तिमय बच्चों के साथ उनके आश्रम की यात्रा पर निकलने के लिए तैयार हो यहा है। बाबा अपने वृद्धाश्रम में सूचित करते हैं कि वह समाधी लेंगे। आगे पढ़िये ...

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अध्याय 09

मजूली द्वीप, असम, 2 मार्च 2026

बाबा दोपहर के साढ़े चार बजे अपने घर से निकले।

आज उन्होंने केसरिया वस्त्र की जगह पर एक सफेद चद्दर को अपने तन पर लपेटा था। उनकी भिक्षा के कटोरे में  हरिताश्म तारा की एक मूर्ति थी जिसके बिना वह कहीं नहीं जाते। आज उन्होंने अपनी खड़ाऊँ भी नहीं पहनी,  नंगे पाँव ही घर से निकले।

वह आज समाधी ले रहे हैं, यह खबर सारे क्षेत्र में फ़ैल चुकी है। आसपास के गाँवों के लोग और पास के हाई स्कूल के बहुत से छात्र, आश्रम में जमा हो गये हैं और अन्य लोग आते जा आ रहे हैं। वृद्धाश्रम का मैदान उनसे भरा है।

इस मैदान के उत्तरी कोने पर, नदी के पास, एक छोटी सी पहाड़ी पर काले पत्थर का मन्दिर बना है। इसके प्रमुख कक्ष में एक ओर नटराज हैं और दूसरी ओर ध्यानमुद्रा में महात्मा बुद्ध। कक्ष के बीच में खड़े हुए बौद्धिसत्व अवलोकितेश्वर की बड़ी मूर्ति है, जिसके दोनों हाथ छाती के सामने हैं और हथेलियाँ ऊपर उठी हुईं हैं। उनकी दायीं हथेली पर हरिताश्म तारा की मूर्ति है और बायीं ओर श्वेत तारा की। इसी मंदिर के प्रांगण में बाबा समाधी लेंगे।

मन्दिर के सामने, मजदूरों ने दोपहर को ही खोदना शुरु कर दिया था और अब उनकी समाधी के लिए दो मीटर गहरा गड्ढ़ा तैयार है।
जैसे ही वह आश्रम के गेट से भीतर घुसे तो वहाँ एकत्रित लोग उन्हें देखने के लिए उठ खड़े हुए। किसी ने पुकारा, “जामुन बाबा की जय", तो सारी भीड़ उस नारे को बार-बार दोहराने लगी। बाबा वहीं बीच में रुक गये, भिक्षा के कटोरे को हाथ में लिए, नतमस्तक हो कर चुपचाप वहाँ आँखें बंद करके खड़े हो गये। धीरे-धीरे जब भीड़ चुप हुई तब वह आगे बढ़े।

पहाड़ी के ऊपर जाने वाली सीढ़ियों के पास आश्रम में रहने वाले वृद्ध कतार बना कर खड़े थे, कई लोगों की आँखों से आँसू बह रहे थे। बाबा ने सिर उठा कर किसी की ओर नहीं देखा, नतमस्तक ही चुपचाप उनके बीच से निकले। जब वह सीढ़ियाँ चढ़ने लगे तो पीछे से

एक वृद्धा ने पुकार कर कहा, “जामुन बाबा, हमें एक अंतिम प्रवचन का दान दे दो।"

बाबा वहीं ठिठक कर सीढ़ियों पर रुक गये। एक-दो क्षण वहाँ चुपचाप खड़े रहे, फ़िर लोगों की ओर मुड़े। बहुत देर तक कुछ नहीं बोले। उनके शरीर पर लिपटी चादर का पिछला हिस्सा हवा से ऊपर उठा और कुछ क्षणों के लिए उनके ऊपर झुक कर एक शेषनाग की तरह लहराता रहा। लोग स्तब्ध हो कर इस दृष्य को देख रहे थे।

वह बोले, “मैं बहुत भाग्यवान हूँ, कि मुझे आप के साथ रहने और आप की सेवा करने का अवसर मिला। आज मेरी आत्मा, अंतहीन आकाश में ब्रह्माँड से जुड़ कर एक हो जायेगी और मुझे करुणामयी तारा माँ की गोद में चिरनिन्द्रा मिलेगी। मेरी यह आकाँक्षा सफल हो, इसके लिए आप की प्रार्थना की मुझे अपेक्षा है। आप लोगों से मेरी एक प्रार्थना भी है कि जैसे आप मेरे साथ प्रेम और शाँति के साथ रहे, मेरे बाद भी यह आश्रम वैसे ही चलायेंगे।"

उन्होंने अपने हाथों को जोड़ कर, उन्हें सिर के ऊपर उठा कर, सभी को प्रणाम किया और धीरे-धीरे बाकी सीढ़ियाँ चढ़ कर अपने समाधी-स्थान की ओर गये।

उस समय जगदीश बाबू की आँखों से भी आँसू झरने लगे और उन्होंने महामृत्यंजय मंत्र का पाठ शुरु कर दिया, "ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्, उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्"।

हालाँकि उन्होंने बार-बार वहाँ इकट्ठे लोगों से बाबा की तस्वीरें खींचने या वीडियो रिकॉर्ड करने से मना किया था, फ़िर भी कुछ लोग मोबाइल निकाल कर उनकी तस्वीरें खींच रहे थे।

ऊपर जा कर बाबा पहले मन्दिर में गये और वहाँ कुछ देर तक प्रार्थना की, फ़िर बाहर आ कर, मन्दिर की तीन बार प्रदक्षिणा की। अंत में वह खुदे हुए गड्ढ़े के पास रखे चकोराकार लकड़ी के बक्से के पास आये और हाथ में भिक्षा का कटोरा पकड़े हुए उसके भीतर आँखें बंद करके पद्मासन में बैठ गये।

मैदान में सन्नाटा छा गया। कुछ देर के बाद आश्रम की एक वृद्धा आगे आयी और लाठी के सहारे चलते हुए मन्दिर की सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर गयी। उसने बाबा के सामने हाथ जोड़े और उस बक्से के पाटों को बंद कर दिया। पीछे कुछ मजदूर तैयार खड़े थे, वह रस्सियाँ ले कर आये और उनसे उस बक्से को लपेट दिया, फ़िर रस्सियों के सहारे उठा कर उस बक्से को गड्ढ़े के भीतर रख दिया।

बक्से के ऊपर पहली मिट्टी की मुट्ठी डालने वही वृद्धा आयी। मुट्ठी में मिट्टी ले कर वह कुछ देर तक गड्ढ़े के पास खड़ी रही। उसकी आँखों से आँसू बह रह थे और उसकी सफेद साड़ी का पल्लू भी ध्वज की तरह कुछ क्षणों के लिए हवा में उड़ा। फ़िर एक लम्बी साँस ले कर उसने वह मिट्टी गड्ढ़े में फैंकी और साड़ी के कोने से आँसू पोंछते हुए सीढ़ियाँ उतर कर नीचे लौट आयी।

उसके बाद मजदूरों ने भी मिट्टी गड्ढ़े में डाली।

तब तक आश्रम के वृद्धों ने वहाँ एकत्रित लोगों को एक कतार बनाने के लिए कहा। उनमें सबसे आगे जगदीश बाबू थे। एक-एक करके सब लोग मन्दिर की सीढ़ियाँ चढ़ते, गड्ढे के पास पड़ी हुई मिट्टी को हाथ में लेते और गड्ढ़े में डाल देते।

इस काम को पूरा करने में करीब आधा घंटा लगा। जब सबने स्माधी-कुण्ड में मिट्टी डाल दी तो बची हुई मिट्टी से मजदूरों ने उस गड्ढ़े को भर दिया। समाधी-स्थल के लिए, प्रांगण के फर्श जैसा, एक चकोर कटा हुआ काला पत्थर पहले से तैयार रखा था, उसे लगा कर मजदूरों ने फर्श को पूरा कर दिया। अब वहाँ बाहर से बाबा के समाधी-स्थल का कोई निशान नहीं बचा था।

बाबा के निर्देशों के अनुसार, वहाँ एकत्रित सब लोगों को प्रसाद बाँटा गया, और फ़िर धीरे-धीरे लोग वहाँ से जाने लगे। सब यही बात कर रहे थे कि जीवित समाधी लेने वाले जामुन बाबा अब बड़े संत माने जायेंगे और वह जगह दूर-दूर तक तीर्थ-स्थान की तरह प्रसिद्ध हो जायेगी।

जब जगदीश बाबू ने त्रिनेत्र को अगले दिन सुबह टेलीफोन पर यह बात बतायी तो वह स्तब्ध रह गया, बोला, “कल शाम को? तो आप ने मुझे पहले खबर क्यों नहीं की? हम आज सुबह उनके पास आने के लिए तैयार हुए हैं।”

“बेटा, मैंने तो उन्हें बहुत कहा था कि पहले तुम्हें बुला लेना चाहिये। तुम उनके उत्तराधिकारी हो, तुम्हारा यहाँ होना बहुत ज़रूरी है, लेकिन वह नहीं माने।"

त्री रोने लगा। जगदीश बाबू कुछ देर तक उसके रोने की आवाज़ सुनते रहे, फ़िर बोले, “वह तुम्हारे लिए एक पत्र छोड़ कर गये हैं।"

“उसमें क्या लिखा है?”

“मुझे पता नहीं, लिफाफा बंद है। उन्होंने कहा कि जब तुम यहाँ आओगे, उसे तभी तुम्हें देना है।"

त्री ने अपने आँसू पोंछे, बोला, “हम लोग आज सुबह गँगटोक से चल रहे हैं, कल शाम तक वहाँ पहुँच जायेंगे।"

“तुम्हारे साथ और कौन आ रहा है?”, जगदीश बाबू ने पूछा।

“हमारे अनाथाश्रम के कुछ बच्चे हैं, उन्हें गुरु जी से मिलवाना चाहता था। अब वह उनकी समाधी को देखेंगे।"

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शनिवार, जून 27, 2026

अजेय की कविता में खड़ा आदमी

अजेय की एक प्रसिद्ध कविता है, जो मुझे बहुत अच्छी लगती है। लेकिन जब भी मैं उसे याद करता हूँ तो हर बार उसके एक शब्द पर अटक जाता हूँ। वह शब्द एक क्रिया है, जो मुझे अधूरी लगती है। और उसके अधूरेपन में कुछ ऐसा है जो मुझे बार-बार उस कविता की ओर खींचता है।


वह कविता है:

पहले एक गोरैया होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी इतना ऊँचा उड़ा
कि गोरैया खो गई।
 
पहले एक पहाड़ होता था
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे तन कर खड़ा
कि पहाड़ ढह गया।
 
पहले एक नदी होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे वेग से बहा
कि नदी सो गयी
 
पहले एक पेड़ होता था
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे जोर से झूमा
कि पेड़ सूख गया।
 
पहले एक पृथ्वी होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी इतनी जोर से घूमा
कि पृथ्वी रो पड़ी।
रो पड़ी ...
कि पहले एक आदमी होता था।

इसे पढ़ते हुए जिस क्रिया पर मैं अटक जाता हूँ, वह 'खड़ा' है, पहाड़ वाले अंतरे में। उड़ा, खड़ा, बहा, झूमा और घूमा में मुझे केवल 'खड़ा' वाली बात क्यों अधूरी लगती है? कवि को गिन कर शब्द लिखने होते हैं ताकि कविता की लय बनी रहे और 'खड़ा' को देख कर मैं अपने मन में उसे 'खड़ा हुआ' कर देता हूँ, लेकिन कहीं पर कुछ फँसा रह जाता है।

मैंने हिंदी आठवीं कक्षा तक ही पढ़ी थी, मुझे उसकी व्याकरण और साहित्य का विधिवत पढ़ने-समझने का मौका नहीं मिला था। खड़ा क्यों बाकी क्रियाओं से भिन्न है, शायद आप में से कोई हिन्दी व्याकरण के ज्ञानी मुझे समझा सकते हैं?

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टिप्पणी: पहले मैंने अजेय की जगह इसे अज्ञेय की कविता समझा था, एक सुधी पाठक, अनूप सेठी जी, जो स्वयं जाने माने हिंदी कवि हैं, ने इस गलती के बारे में मुझे बताया। उन्हें इसके लिए दिल से धन्यवाद। 

अजय कुमार "अजेय" की यह कविता (एक आदमी होता था) और अन्य कविताएँ आप कविता-कोष पर भी पढ़ सकते हैं।

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गुरुवार, जून 25, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 08

अब तक: जापानी याकूज़ा-खूनी ताकानोरी, जामुन बाबा की गुप्त शक्ति वाली मूर्ति को लेने भारत आया है। वह बाबा को नारायणपुर में खोज लेता है लेकिन वह उसके चँगुल से निकल भागने में सफल होते हैं। ताकानोरी से बचने के लिए, बाबा ने अपने वृद्धाश्रम में समाधी लेने का निर्णय लिया है।

दूसरी ओर, त्रिनेत्र गुप्त-शक्ति वाले बच्चों के लिए गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम चलाता है। अचानक उनकी मेहमान आभा की गुप्त-शक्ति जाग जाती है। आगे पढ़िये:

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अध्याय 08

       गँगटोक, सिक्किम, 2 मार्च 2026

वह दोनों अखाड़े से बाहर आये तो देखा कि रंगनाथ, गार्गी, वसंत, माधव और तृप्ति उधर भागे आ रहे हैं। उनके पीछे, अनाथाश्रम के कुछ कुत्ते और बिल्लियाँ भी थे।

गार्गी ने पूछा, “क्या हुआ? मुझे लगा कि जैसे इधर कोई भूचाल आ रहा हो और कोई मुझे यहाँ खींच रहा हो।"

रंगनाथ बोला, “हाँ, घूँ-घूँ की अजीब सी आवाज़ें आ रही थीं।"

माधव मुस्कराया, बोला, “अखाड़े के ऊपर इन्द्रधनुष जैसी रोशनियाँ डिस्को डाँस कर रही थीं और पशुशाला में मुर्गियाँ, गायें, भैंसे, बछड़े, सभी बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे।"

त्री बोला, “चलो, मेरे घर चलते हैं, वहाँ बात करेंगे।"

त्री का छोटा सा घर, पेड़ों के झुरमुट के बीच में है और अखाड़े से अधिक दूर नहीं है। उसके घर में, एक कमरे में एक ओर कुछ कपड़े टंगे थे और एक स्टूल पर कुछ किताबें रखी थीं, बस, बाकी का सारा घर खाली था।

त्री ने एक दरवाज़े के पीछे से एक लिपटी हुई चटाई को निकाल कर बीच में बिछा दिया, बोला, “यहाँ बैठो", फ़िर वसंत से कहा, “घर के आसपास अभेद्य दीवार बना दो ताकि कोई हमारी बात नहीं सुन सके।"

इस सारे समय में आभा चुप थी, उनके बातें ध्यान से सुन रही थी।

त्री बच्चों से बोला, “तुमने ठीक देखा था, आभा के भीतर भी गुप्त-शक्ति है। आज जब हम अखाड़े में गये तब वह शक्ति अचानक जाग गयी। मैंने ऐसी शक्ति के बारे में पहले कभी नहीं सुना था। वह जीव-जन्तुओं को, विशेषकर कीड़ों-मकोड़ों को बुला सकती है। हो सकता है कि वह उनसे बातें भी कर सकती है।"

आभा बोली, “तुम लोग मेरे बारे में ऐसे बातें क्यों कर रहे हो जैसे कि मैं यहाँ नहीं हूँ? तुम यह कौन सी गुप्त-शक्ति की बातें कर रहे हो? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा।"

त्री ने गार्गी को इशारा किया तो उसने आभा के मस्तिष्क में एक क्षण के लिए एक शक्ति-लहर भेजी। आभा को जैसे बिजली का झटका लगा, लेकिन वह समझ गयी कि जो अनुभूति उसने महसूस की है, उसे गार्गी ने भेजा है। उसने आश्चर्य से गार्गी को देखा, पूछा,

“तुमने यह क्या किया और कैसे किया?”

तब रंगनाथ बोला, “दीदी, दुनिया में हमारे जैसे कुछ लोग एक गुप्त-शक्ति के साथ पैदा होते हैं। त्री दादा के साथ, हम लोग हर रोज़ ध्यान, व्यायाम और अभ्यास से, उस शक्ति को साधते हैं। अगर बचपन में इस शक्ति को साधा नहीं जाये तो समय के साथ यह मुरझा जाती है। शायद आप भी एक गुप्त-शक्ति के साथ पैदा हुई थीं, लेकिन किसी वजह से आप की शक्ति मुरझाई नहीं, उसका बीज आप के भीतर आज भी जीवित है। हमारी शक्तियों की वजह से, हमारे अखाड़े की मिट्टी में ऐसा वातावरण बना है, जिससे व्यक्तियों के भीतर छिपी शक्तियाँ विकसित और प्रबल हो जाती है। आज अखाड़े में आप के भीतर सोयी हुई शक्ति जाग गयी है।"

“तुम यह क्या कह रहे हो, मुझे कुछ समझ नहीं आया", आभा बोली।

तो रंगनाथ ने तृप्ति से कहा, “उस लोटे को उठाओ।"

स्टूल के पास ज़मीन पर एक लोटा रखा था, तृप्ति ने उसे देखा तो वह हिलने लगा और फ़िर अपने आप सरक कर वह उसके पास आ गया।

रंगनाथ बोला, “आप ने देखा? तृप्ती की शक्ति धातुओं के साथ काम करती है, अपनी शक्ति से वह उस लोटे को अपने पास खींच लायी। वैसे ही वसंत की शक्ति पेड़-पौधों के साथ काम करती है", उसने वसंत को इशारा किया।

कमरे की खिड़की के बाहर एक बेल लगी थी जिसमें लाल और सफेद रंग के फ़ूल खिले थे। वसंत ने उस ओर देखा तो बेल का एक हिस्सा हिलने लगा, फ़िर मुड़ कर वह कमरे में घुस आया और दीवार के साथ-साथ चलता हुआ, जितनी दूर आ सकता था वहाँ आ कर रुक गया।

तृप्ति और वसंत के कारनामों को आभा ने हैरानी से देखा।

माधव बोला, “आभा दीदी की शक्ति का रंग अब दिखने लगा है, वह गुलाबी है।"

गार्गी बोली, “आप के पास भी ऐसी एक शक्ति है, उससे आप कीड़ों-मकोड़ों और जीव-जन्तुओं को बुला सकती हैं।”

त्री बोला, “लगता है कि तुम्हारी शक्ति ताकतवर है, लेकिन अभी तुम्हें उस पर नियंत्रण करना नहीं आता।"

आभा ने उबासी ली, बोली, “तुम लोग यह क्या कह रहे हो, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। साथ में मेरा सिर झन्ना रहा है और मुझे बहुत थकान लग रही है।"

तृप्ति बोली, “दीदी, जब तक हम ठीक से शक्ति-साधना नहीं सीखते, तब तक उसका उपयोग करने से ऐसा ही होता है। मैंने अभी तुम्हें लोटा हिला कर दिखाया था, मुझे भी बहुत थकान हो गयी है।"

आभा की आँखें बैठे-बैठे नींद से बंद हो रही थीं। त्री ने रंगनाथ को अलमारी से एक तकिया निकाल कर लाने के लिए कहा, और आभा से बोला, “थोड़ी देर तुम यहीं चटाई पर लेट जाओ, कुछ देर आराम करने से तुम्हारी थकान ठीक हो जायेगी।"

आभा ने उठने की कोशिश की, बोली कि वह छात्रावास में अपने कमरे में जायेगी, लेकिन चटाई से उठ नहीं पायी। आखिर में उसने तकिये पर सिर रख कर आँखें बंद कर लीं।

तृप्ति बोली, “मैं भी थोड़ी देर दीदी के साथ आराम करूँगी", और वह भी आभा के पास लेट गयी।

त्री उठ खड़ा हुआ, बाकी चारों बच्चों को ले कर बाहर आ गया, बोला, “मैंने फैसला किया है कि कल तुम सभी मेरे साथ चलोगे। हम लोग सुबह नाश्ते के बाद निकलेंगे, रास्ते में आभा को उसके भाई के पास छोड कर, हम लोग मजूली जायेंगे।"

सभी बच्चे खुश हो गये तो त्री ने उन्हें शोर न करने का इशारा किया, बोला, “तुम लोग अपना सामान तैयार कर लो क्योंकि हमें वहाँ कुछ दिन रुकना होगा।"

रंगनाथ ने पूछा, “और हमारे हथियार? उन्हें ले कर चलेंगे?”

त्री ने कुछ देर सोचा फ़िर बोला, “नहीं, बेहतर होगा कि हम अपने साथ कोई हथियार नहीं ले कर जायें। वैसे भी तुम उनका प्रयोग अभी सीख रहे हो। लेकिन अगर तुममें से कोई दुश्मन के हाथ आ गया और उसने देखा कि तुम्हारे पास कोई हथियार हैं तो वह तुम्हें जान से भी मार सकता है। अच्छा होगा कि तुम उन्हें सामान्य बच्चे लगो। हमारी शक्तियाँ ही हमारा हथियार हैं।" 

वसंत बोला, “यह हमारे तिरंगा-यौद्धाओं की सैना का पहला युद्ध होगा, हम बड़े गुरु जी की रक्षा करेंगे।"

शुरु में जब त्री के साथ केवल रंगनाथ और गार्गी थे, तो रंगा ने अपने नामों के पहले अक्षर जोड़ कर अपने आप को तिरंगा-योद्धा कहना शुरु किया था। बाद में अन्य बच्चों के आने के बावजूद, वही पुराना नाम उन्हें अभी भी अच्छा लगता है, हालाँकि त्री ने उन्हें कई बार समझाया है कि वह किसी पर हमला करने वाले यौद्धा नहीं है, वह केवल रक्षा के लिए युद्ध करते हैं।

बच्चे वहाँ से चले गये और त्री वहीं बैठ कर प्रतीक्षा करता रहा। कुछ देर के बाद उसने देखा कि तृप्ति की आँखें खुली हैं तो उसे उठने का इशारा किया, “चलो, मैं तुम्हें तुम्हारे कमरे तक छोड आता हूँ।"

“दादा, आभा दीदी बहुत अच्छी हैं, क्या वह हमारे साथ नहीं रह सकतीं?”, रास्ते में उसने पूछा।

त्री को केवल इतना पता है कि आभा का गाँव मणिपुर में लोकटक झील के पास में है। वह बोला, “आभा का गाँव में अपना घर-परिवार है, वह उन्हें छोड़ कर हमारे साथ कैसे रुकेगी?"

तृप्ति को छात्रावास में छोड़ कर वह अनाथाश्रम के संचालक से बात करने उनके दफ्तर गया और उन्हें कहा, "कल सुबह मैं, रंगनाथ, गार्गी, वसंत, माधव और तृप्ति, हम छह लोग कुछ दिनों के लिए आसाम जा रहे हैं। आभा भी हमारे साथ जायेगी, उसे रास्ते में कुर्स्यांग छोड़ते हुए जायेंगे। हम कुछ दिन बाहर रहेंगे।"

जब वह घर लौटा तो देखा कि आभा अभी भी बेसुध सी गहरी नींद में सो रही है, उसके जागने की प्रतीक्षा में वह वहाँ पालथी मार कर बैठ गया।

 
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सोमवार, जून 22, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 07

अब तक: जापानी याकूज़ा-खूनी ताकानोरी, जामुन बाबा की गुप्त शक्ति वाली मूर्ति को लेने भारत आया है। वह बाबा को नारायणपुर में खोज लेता है लेकिन वह उसके चँगुल से निकल भागने में सफल होते हैं। ताकानोरी से बचने के लिए, बाबा ने अपने वृद्धाश्रम में समाधी लेने का निर्णय लिया है। दूसरी ओर, त्रिनेत्र गुप्त-शक्ति वाले बच्चों के लिए गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम चलाता है, वह अपने साथ पाँच बच्चों को ले कर मजूली में जामुन बाबा की सहायता करने जाना चाहता है। आगे पढ़िये:

 प्रारम्भ से पढ़िये  -  पिछला भाग पढ़िये

अध्याय 07 

गँगटोक, सिक्किम, 2 मार्च 2026

दोपहर में बच्चे जब स्कूल से लौटे तो त्रिनेत्र ने रंगनाथ से बाकी शिष्यों को अखाड़े में बुलाने के लिए कहा। थोड़ी देर में ही पाँचों वहाँ आ गये।

त्री ने कहा, “गार्गी, ज़रा देखो कि यहाँ कोई हमारी बात तो नहीं सुन रहा?”

"दादा, और तो कोई नहीं है लेकिन आश्रम में तीन शक्ति-लहरें महसूस हो रही हैं, उनमें से कोई सुन भी सकता है।"

रंगनाथ के माथे पर बल पड़ गये, बोला, “यह तीसरा कौन है?

त्री बोला, “तीसरी आभा है, लेकिन उसकी शक्ति पूरी विकसित नहीं हुई है", फ़िर माधव से बोला, “क्या तुम देख सकते हो उसकी शक्ति का रंग कौन सा है?”

माधव ने आँखें बन्द कर लीं और कुछ क्षणों के लिए आभा पर ध्यान केन्द्रित किया, फ़िर बोला, “नहीं दादा, उनकी लहर का रंग बहुत हल्का है।"

तब त्री ने वसंत से कहा, "अखाड़े के आसपास अभेद्य दीवार बनाओ, ताकि वह तीनों भी हमारी बातें नहीं सुनें।

वसंत पेड़ों के माध्यम से हवा में अवरोध पैदा करवा सकता है, जिससे ध्वनि की लहरें रुक जाती हैं और परिधि के बाहर कोई नहीं सुन सकता। उसने कुछ पल के लिए आँखें बन्द कीं, फ़िर मुस्करा कर धीरे से सिर हिलाया। 

त्री बोला, “तुम्हें इसलिए बुलाया है क्योंकि हमें एक विपदा का सामना करना है।  मेरे गुरु जी के पीछे बहुत सालों से एक जापानी गैंग लगा हैं, आज सुबह वह लोग उन्हें खोजने में सफल हुए हैं। गुरु जी ने ऐसी परिस्थितियों का पहले भी सामना किया है, वह नहीं चाहते कि हम उनकी चिंता करें। लेकिन इस बार उनका पीछा करने वाला कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है, उसके पास गुप्त-शक्ति है, उसने उन्हें अन्वेषण-किरण से खोजा है। आज गुरु जी वहाँ से बच कर निकल आये, लेकिन अगले दिनों में उन्हें खतरा है। मैं उन्हें वहाँ अकेला नहीं छोड़ना चाहता, मैंने फैसला किया है कि मैं उनके पास जाऊँगा।"

सभी शिष्य उसकी ओर गम्भीरता से देख रहे थे।

रंगनाथ ने पूछा, “दादा, वह लोग उनके पीछे क्यों लगे हैं?”

“तुम्हें जितना कम मालूम हो उतना अच्छा है।"

गार्गी बोली, “दादा, क्या आप वहाँ अकेले जाओगे?”

"हाँ, मैं तुम लोगों को खतरे में नहीं डालना चाहता। जब मैं जाऊँगा तब तुम्हें, विशेषकर रंगनाथ और गार्गी को, यहाँ की देखभाल की ज़िम्मेदारी सम्भालनी पड़ेगी।"

रंगनाथ बोला, “दादा, अगर गुरु जी का पीछा करने वालों के पास अन्वेषण-किरण है, तो आप को अपनी शक्ति ढकने की ज़रुरत पड़ सकती है, नहीं तो वह आप को भी खोज लेंगे। आप हमें अपने साथ ले कर जाओ। हम बच्चे हैं, अगर वह जान भी जायेंगे कि हमारे पास शक्तियाँ हैं, तब भी हमें अधिक महत्व नहीं देंगे, वे छोटे बच्चों से नहीं डरेंगे। लेकिन हमारी शक्तियाँ इस लड़ाई में आप के काम आ सकती हैं।"

“मैं जानता हूँ कि तुम्हारी शक्तियाँ इस लड़ाई में मेरे काम आ सकती हैं, लेकिन अगर तुममें से किसी को कुछ हो गया तो मैं अपने आप को कभी क्षमा नहीं करूँगा।"

माधव बोला, “दादा, और अगर आप को कुछ हो गया तो हमारा ध्यान कौन रखेगा? अगर हम आप के साथ में होंगे तो जैसे रंगा दादा कहते हैं, कोई बच्चों को अधिक महत्व नहीं देगा और हम आप की मदद कर सकते हैं। आप ठीक रहोगे तो बाद में हमारी देखभाल भी करोगे।"

गार्गी बोली, “आप हमें उनसे लड़ाई के समय साथ नहीं रखना चाहते, तो भी हम लोग वहाँ पास में कहीं पर रह सकते हैं और वहाँ से आप की कुछ मदद कर सकते हैं।"

त्री कुछ देर तक सोचता रहा, फ़िर बोला, “मैं यह निर्णय लेने से पहले महादेव का मार्गदर्शन चाहता हूँ।" जब वह मुश्किल में होता है और उसे समझ नहीं आता कि क्या निर्णय लेना चाहिये, तो वह मंदिर में शिव जी के सामने ध्यान लगाता है और उनसे पूछता है। उसे लगता है कि शिव जी हमेशा उसके अंतरमन के प्रश्नों के उत्तर देते हैं, उसका मार्गदर्शन करते हैं।

वसंत ने पूछा, “दादा, गुरु जी ने और क्या कहा?” 

“गुरु जी आज सुबह नारायणपुर गये थे। उनके और मेरे बीच एक मानसिक तार जुड़ा है, वह जब चाहें, मेरे मन में बात कह सकते हैं, लेकिन आज उन्होंने यह बात मुझे टेलीफोन पर बतायी। इसका मतलब है कि उस समय उन्होंने अपनी शक्ति को ढक लिया था, वह उसका प्रयोग नहीं कर सकते थे। तब से मैं उनसे सीधा सम्पर्क नहीं कर पाया हूँ, शायद वह नहीं चाहते कि उनका पीछा करने वालों को उनके आश्रम का पता चले।"

गार्गी बोली, “अगर उन्होंने गुरु जी को अन्वेषण-किरण से खोजा है तो उन्हें केवल एक शक्ति-लहर की अनुभूति हुई होगी, उसे पक्का पता नहीं होगा कि वह गुरु जी ही हैं?”

वसंत बोला, “अगर अब वह लोग गुरु जी की शक्ति-लहर को नहीं खोज पा रहे, और उन्हें वहाँ पर हममें से कोई बच्चा मिल जाये, तो शायद वह सोच सकते हैं कि जो शक्ति-लहर उन्होंने महसूस की थी, वह गुरु जी नहीं थी, बल्कि हमारी थी?”

माधव बोला, “अगर हम लोग नारायणपुर जायें तो रंगा भैया उनकी बातें दूर से सुन सकते हैं और पता लगा सकते हैं कि वह कितना जानते हैं और उनकी आगे की क्या योजना है?”

त्री ने हाथ उठा कर उन्हें चुप कराया, बोला, “तुमने जो कहना था वह कह दिया, अब मुझे सोचने का समय दो और तुम लोग यहाँ से जाओ।"

बच्चे वहाँ से गये तो त्रिनेत्र मन्दिर में नटराज की प्रतिमा के सामने पद्मासन लगा कर बैठ गया और शिव जी का ध्यान लगा कर उनसे मार्गदर्शन माँगा।

कुछ देर के बाद जब वह अखाड़े से बाहर निकला तो देखा कि वहाँ एक पेड़ के पास आभा बैठी है। उसे देख कर वह उठ कर आयी, बोली, “मैं आप से मिलने आयी थी, लेकिन बच्चों ने मुझे कहा कि आप व्यस्त हैं, कोई भीतर नहीं जा सकता।"

“कहिये", त्री ने कहा।

“मैंने विशाल को टेलीफोन किया था, वह मुझे लेने आज नहीं आ सकता, क्या मैं यहाँ से कल सुबह जा सकती हूँ?”

“हाँ, आप विशाल को कहिये कि उसे यहाँ आने की आवश्यकता नहीं, कल सुबह हम लोग रास्ते में आप को वहाँ पर छोड़ देंगे।"

“बच्चे कह रहे थे कि यहाँ एक अखाड़ा है जहाँ वह व्यायाम करते हैं, क्या मैं आप के अखाड़े को देख सकती हूँ?” आभा ने पूछा।

त्री ने एक पल के लिए सोचा कि उसे मना कर दे, फ़िर बोला, “आईये, मैं आप को दिखाता हूँ।"

उसने अखाड़े का द्वार खोला और वह दोनों भीतर घुसे। आभा वहीं दरवाज़े के पास रुक गयी, बोली, “हरे पत्तों की छाया में ढकी यह जगह बहुत सुंदर है, किसी जँगल का हिस्सा लगती है। यहाँ बहुत शाँति है।" फ़िर उसने मन्दिर की ओर देखा, बोली, “वहाँ क्या है? लगता है जैसे कोई मुझे उस ओर खींच रहा है। मुझे भीतर से कुछ अजीब सा महसूस हो रहा है।"

इससे पहले कि वह उसे कुछ कहता, आभा ने आँखें बन्द कर लीं और उसके शरीर का ऊपरी हिस्सा धीरे-धीरे आगे-पीछे डोलने लगा। त्री को लगा कि वह ध्यान में चली गयी है।

इसके साथ ही अखाड़े में लगे पेड़-पौधों से अजीब सी सरसराहट की आवाज़ें आने लगी। कुछ ही देर में उनके आसपास की सारी धरती, जीव-जन्तुओं से भर गयी - उनमें कुछ गिलहरियाँ, चूहे और साँप थे, और उनके साथ हज़ारों छोटे-बड़े कीड़े-मकोड़े थे। सभी जीव-जन्तु किसी तंद्रा में डूबे लग रहे थे, वह उनके आसपास चक्कर लगाने लगे।

त्री घबराया, उसने आभा के कँधे पर हाथ रख कर उसे पुकारा तो उसका डोलना रुका। उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं, लेकिन उसकी दृष्टि खाली घूम रही थी, जैसे कि वह कुछ देख नहीं पा रही हो। तब त्री ने ज़ोर से ताली बजायी तो आभा के सिर को झटका लगा और वह जैसे नींद से जागी। उसी क्षण में जिस शक्ति ने उन जीव-जन्तुओं बाहर बुलाया था, वह क्षीण हो गई तो वह सभी अपने बिलों या पेड़ों की ओर चले गये। एक मिनट में सभी जीव-जन्तु वहाँ से गुम हो गये।

आभा ने आश्चर्य से उन्हें जाते हुए देखा। अक्सर लोग साँपों, कीड़ों-मकोड़ों से डरते हैं, लेकिन उसकी दृष्टि में बिल्कुल भी भय नहीं था। उसने त्री से पूछा, “यह कैसे किया तुमने? मुझे लगा कि मैं कोई सपना देख रही हूँ।"

जब वह कुछ नहीं बोला तो वह बोली, “तुम कोई जादूगर हो? बताओ, तुमने यह कैसे किया?”

त्री ने उसका हाथ पकड़ा, बोला, “चलो, यहाँ से बाहर चलते हैं, फ़िर तुम्हें बताऊँगा।" 

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उपन्यास का अगला भाग बृहस्पतिवार 25 जून को पढ़ सकते हैं। 

गुरुवार, जून 18, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 06

अब तक: जापानी यामागुची गैंग का याकूज़ा-खूनी ताकानोरी जामुन बाबा की गुप्त शक्ति वाली मूर्ति को लेने भारत आया है। ताकानोरी एक दिन बाबा को नारायणपुर में खोज लेता है लेकिन वह उसके चँगुल से भागने में सफल होते हैं। बाबा अपने शिष्य त्रिनेत्र को इसकी सूचना देते हैं तो वह कहता है कि वह तुरंत वहाँ आ रहा है। इधर मजूली द्वीप में बाबा अपने वृद्धाश्रम में सबको बताते हैं कि उन्होंने समाधी लेने का निर्णय लिया है। आगे पढ़िये:

 प्रारम्भ से पढ़िये  -  पिछला भाग पढ़िये

 गँगटोक, सिक्किम, 2 मार्च 2026

त्री ने सोचा कि शायद उसने आभा को वहाँ बुला कर गलती की है। वह उसके मित्र विशाल की बहन है और कुछ दिनों के लिए उनके अनाथाश्रम में रहने आयी है।

विशाल का कुर्स्यांग में होटल है, मोयरंग होटल और कैफे। उस जगह पर किसी ज़माने में एक चाय-बागान होता था। होटल-मालिक बनने से पहले विशाल कलाकार बनने के सपने देखता था। होटल मालिक बनने के बाद, अब हर साल वह अपने होटल के विस्तृत बाग में एक कला प्रदर्शिनी आयोजित करता है।

त्री पहले पक्की मिट्टी की मूर्तियाँ बनाता था, पर पिछले कई सालों से वह ताँबे की मूर्तियाँ बनाने लगा है। वह विशाल से एक कला-प्रदर्शनी में मिला था और जल्दी ही दोनों मित्र बन गये थे।

विशाल ने उसे अपनी बहन आभा की दुखद कहानी सुनायी थी। आभा का पति विवेक, एक पत्रकार था और दो साल पहले वह भारत-म्यनमार सीमा पर होने वाली तस्करी के बारे में जानकारी जमा कर रहा था जब किसी ने उसकी कार को बम विस्फोट से उड़ा दिया था। उस समय, उसके साथ उनकी चार साल की बेटी मयूरी भी थी, जो पिता के साथ उस बम विस्फोट में मरी थी।

इस घटना के बाद आभा एक गहन उदासी में डूब गयी थी और करीब एक साल तक घर से बाहर नहीं निकली थी। कुछ महीने पहले विशाल उसे कुर्स्यांग ले कर आया था, जहाँ वह त्री से मिली थी। उसने अपने भाई से त्री के अनाथाश्रम के बारे में सुना था और कला प्रदर्शनी में वह उसकी ताँबे की मूर्तियों से बहुत प्रभावित हुई थी। उसने त्री से पूछा था, “काँसे को मूर्तियों में कैसे ढालते हो? क्या उसे पहले पिघलाना पड़ता है?”

त्री ने कहा था, "यह कैसे करता हूँ उसे बता कर समझाना कठिन है, तुम कुछ दिन हमारे यहाँ आ कर देखो। मेरा अधिकतर समय तो अनाथाश्रम को चलाने में निकलता है, पर जब कुछ खाली समय मिलता है तो मैं शिल्पकार भी बन जाता हूँ। हमारे यहाँ लड़कियों का होस्टल है, तुम वहाँ ठहर सकती हो।"

आजकल त्री सात प्रतिमाओं का गुट बना रहा है, जिसमें एक कृष्ण हैं, एक राधा, एक गाय और तीन गोपियाँ। अभी तक उसने तीन गोपियों और एक गाय की प्रतिमाएँ पूरी की हैं और अब राधा को बनाने में जुटा है। यह काम करते हुए वह ताँबे को काटने वाली मशीन का उपयोग करता है, जिससे बहुत शोर होता है, इसलिए वह कानों पर शोर कम करने वाले इयरफोन लगाता है।

देवी प्रतिमा के रक्षकआभा को उनके यहाँ आये हुए करीब एक सप्ताह हुआ है। शायद बच्चियों के बीच में रह कर उसे अपनी बेटी की याद आती है। गार्गी ने त्री को बताया है कि वह अक्सर बालकनी में बैठ कर, दूर पहाड़ों को देखती रहती है, और कभी-कभी रोती भी है। त्री को समझ नहीं आता कि वह उसकी किस तरह से सहायता करे।

हर रोज़ की तरह उस दिन भी सुबह मुँह-अँधेरे, त्री ने अपने शिष्यों के साथ उनकी गुप्त-शक्ति के विकास के लिए अभ्यास किये थे। उनके अनाथाश्रम में गुप्त-शक्ति वाले कुल सात बच्चे हैं लेकिन उनमें से दो बच्चे अभी छोटे हैं, वे पाँच साल के नहीं हुए हैं, इसलिए वह प्रशिक्षण में हिस्सा नहीं लेते। बाकी के पाँच बच्चों के साथ, उनके स्कूल जाने से पहले, त्री हर रोज़ सुबह दो घंटे के लिए उन्हें विशेष अभ्यास कराता है।

यह प्रशिक्षण उनके अनाथाश्रम से कुछ दूर, पेड़ों से घिरे हुए एक अखाड़े में होता है, जिसके चारों ओर बेलों-लताओं से ढकी हुई एक ऊँची दीवार है। ड्रोन से देखें तो उस अखाड़े का पूरा क्षेत्र, पेड़ों की शाखाओं और घने पत्तों से इस तरह ढका हुआ है कि ऊपर से धरती का एक इँच भी दिखाई नहीं देता।

अखाड़े के कोने में एक छोटा सा, परन्तु सुंदर मन्दिर है, जिसमें एक ओर ताँडव नृत्य करते हुए नटराज की प्रतिमा है और दूसरी ओर ध्यानलीन बुद्ध की, उन दोनों के बीच में बौद्धिसत्व अवलोकितेश्वर की प्रतिमा है।

मंदिर के सामने, खुले में एक चबूतरा है जिसके चारों ओर सफेद और हरे रंग की माँ तारा की प्रतिमाओं की कतार बनी है। इस चबूतरे के सामने वह हर रोज़ बच्चों से विभिन्न अभ्यास तथा व्यायाम कराता है।

त्री कहता है कि उन्हें एक-दूसरे के साथ मिल कर एक-जीवात्मा की तरह सोचना सीखना है। वह उन्हें समझाता है, “हमें केवल लड़ना नहीं सीखना, हमें अपने भीतर करुणा, एकाग्रता और ध्यान के गुण भी बढ़ाने हैं, क्योंकि हम अपनी शक्तियों का प्रयोग केवल निर्बलों और शक्तिहीनों की रक्षा के लिए कर सकते हैं, किसी गलत काम या व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं।"

उसके शिष्यों में रंगनाथ सबसे बड़ा है। वह तेरह साल का है और उसकी प्रमुख शक्तियाँ हैं, सुनना और सूँघना। वह उन ध्वनियों को सुन सकता है जिन्हें सामान्य लोग नहीं सुन पाते। दो सौ मीटर दूर खड़ा व्यक्ति धीमे स्वर में क्या फुसफुसा रहा है, वह उसे सुन सकता है। वह व्यक्तियों, पशुओं, वस्तुओं आदि की गंध को सूँघ कर उन्हें पहचान सकता है। इसलिए उससे कुछ भी छिपाना बहुत कठिन है। उसके दिमाग में सिनेस्थीसिया है, यानि वह विभिन्न गंधों को अलग-अलग रंगों में देखता है।  

रंगनाथ के बाद, दूसरे नम्बर पर है गार्गी विनायक, जो बारह साल की है। उसकी प्रमुख गुप्त-शक्ति को वह लोग अजगर-पाश कहते हैं। वह किसी भी व्यक्ति के मस्तिष्क में घुस कर उसकी माँसपेशियों की नसों को बाँध सकती है ताकि वह अपनी जगह से हिल नहीं पाये। उसके पास विचार पढ़ने की शक्ति भी है। किसी के मन में क्या है, वह उसे जान सकती है और लोगों की शक्ति-लहरों को महसूस कर लेती है। 

तीसरे नम्बर पर है नौ बरस का वसंत, जिसकी गुप्त-शक्ति विचित्र है। जब त्रिनेत्र ने उसके बारे में गुरु जी को बताया था तो वह भी चकित हो गये थे। उसकी शक्ति वनस्पति जगत से जुड़ी है, वह पेड़ों-पौधों से, यहाँ तक कि घास के तिनकों से भी, बातें कर सकता है। वह जैसा चाहे, पेड़-पौधे उसी दिशा में विकसित हो जाते हैं। अखाड़े के क्षेत्र को पेड़ों की शाखाओं और घने पत्तों से उसी ने ढका है। अगर कोई बीमार हो तो वह पेड़ों से बात करके बता सकता है कि रोगी को किस पत्ते या जड़ी-बूटी को औषधि के रूप में दिया जाये।

चौथे नम्बर पर है आठ साल का माधव, जिसके पास दृष्टि शक्ति है। उसकी आँखें सामान्य रोशनी में बहुत दूर तक देख सकती हैं। साथ ही वह अल्ट्रावायोलैट और इन्फ्रारैड रोशनी को भी देख सकता है, जो सामान्य व्यक्तियों को नहीं दिखतीं। वह लोगों की शक्ति-लहरों को भी विभिन्न रंगों में देखता है।

उनकी पाँचवी और उम्र में सबसे छोटी, छह साल की शिष्या है तृप्ति। उसकी शक्ति लोहे और स्टील जैसी धातुओं से जुड़ी है। उसे अभी अपनी शक्ति को ठीक से संचालित करना नहीं आता, इसलिए जब वह पास होती है तो अक्सर चम्मच और चाकू जैसी चीज़ें मेज़ से उठ कर हवा में उड़ने लगती हैं। उसकी श्रवण शक्ति भी अच्छी है। 

उनका अनाथाश्रम कुर्स्यांग से गँगटोक जाने वाली सड़क के पास है। उनके यहाँ अधिकतर बच्चे सिक्किम, पश्चिम बंगाल, असम और उत्तर-पूर्व से आते हैं, एक-दो बच्चे भूटान और नेपाल के भी हैं।

गुरु जी ने त्री को सिखाया था कि गुप्त-शक्तियों वाले बच्चों को अक्सर पढ़ने-लिखने, बात समझने और एक जगह पर शाँत बैठने में कठिनाई होती है। इस वजह से ऐसे बच्चे अक्सर स्कूलों में पढ़ाई में कमज़ोर होते हैं और कभी-कभी तो उन्हें मानसिक रूप से विकलाँग भी समझा जाता है। इस बात को ध्यान में रख कर त्री ने उत्तर-भारत के सभी अनाथाश्रमों में कहलवाया है कि अगर उनके यहाँ कोई बच्चा ऐसा हो जिसे पढ़ने-लिखने में दिक्कत हो, तो वे उसे उनके अनाथाश्रम में भेजें। ज़रूरत पड़े तो ऐसे बच्चों की जाँच करने वह खुद भी जाता है। इस तरह से उनके यहाँ सात गुप्त-शक्ति वाले बच्चे एकत्रित हो गये हैं।

उस दिन व्यायाम और अभ्यास समाप्त होने के बाद, बाकी बच्चे चले गये, लेकिन गार्गी नहीं गयी, बोली, “त्री दादा, आप से एक बात करनी है।"

त्री बोला, “अगर चाहें तो रंगा और तृप्ति, बाहर से भी हमारी बातें सुन सकते हैं, तुम उनके सामने भी मुझसे बात कर सकती थीं, यह अकेले में क्यों?" 

वह बोली, “अगर वह दोनों सुनना चाहते हैं तो सुन लें, पर मेरे ख्याल में अभी वह यहाँ नहीं रुकेंगे क्योंकि अभी टीवी पर रंगा दादा की कार्टून फ़िल्म का टाईम हो रहा है।"

त्री मुस्कराया, “अच्छा बताओ, तुम क्या बात करना चाहती हो?”

"हमारे होस्टल में जो आभा दीदी आयी हुई हैं, क्या उनमें भी कोई गुप्त-शक्ति है।"

त्री के माथे पर बल पड़ गये, बोला, “क्यों? क्या तुमने कुछ महसूस किया?”

गार्गी ने सिर हिला कर हामी भरी, बोली, “मुझे उनमें शक्ति-लहरें महसूस होती हैं। जब वह यहाँ आयीं थीं, तब नहीं होती थीं, लेकिन पिछले एक-दो दिनों में होने लगी हैं, शायद उन पर हमारा और हमारी मूर्तियों का प्रभाव पड़ा है?"

त्री सोच में डूब गया। बच्चों की शक्ति को बचपन में विकसित नहीं किया जाये तो वह मुरझा जाती है। शायद आभा का शक्ति-बीज किसी वजह से पूरा नहीं मुरझाया था, और यहाँ रहने से वह फ़िर से जाग गया है। उसने गार्गी से कहा, “तुमने मुझे बता कर अच्छा किया, मैं इसकी जाँच करूँगा।"

कुछ देर बाद वह आभा को खोजने गया। वह लड़कियों के होस्टल के बाहर एक पेड़ के नीचे बैठी कोई किताब पढ़ रही थी। त्री को देख कर वह उठने लगी तो उसने उसे बैठे रहने का इशारा किया, उसके पास रखी कुर्सी पर बैठ गया और बोला, “आप कुछ दिनों से मेरी शिल्पशाला में नहीं आईं, तो मैं सोच रहा था कि शायद आप की तबियत ठीक नहीं है, इसलिए आप से मिलने चला आया।"

वह बोली, “जब मैं यहाँ आयी थी तो सोचा था कि ताँबे से शिल्प बनाना सीखूँगी, लेकिन वह मेरे बस का नहीं है। आप की ताँबे की परत इतनी भारी होती है कि मैं उसे उठा नहीं सकती। उसे मशीन से काटना, हथौड़ों से पीट कर सीधा करना या मोड़ कर आकार देना, इस सब के लिए जो ताकत चाहिये, वह मेरे बस की बात नहीं। लेकिन यहाँ आप के पास आ कर पता नहीं कैसे, मेरा मन कुछ शाँत हो गया है।"

त्री ने भी महसूस किया कि आभा के माथे से शक्ति-लहर की हलकी सी अनुभूति आ रही है। क्या उसे आभा से इस बारे में बात करनी चाहिये? थोड़ा सा सोच कर वह इस नतीजे पर पहुँचा कि इस विषय में जल्दबाज़ी करना ठीक नहीं होगा।

वह वहाँ से उठ रहा था जब उसके मोबाइल की घंटी बजी। उसने देखा कि गुरु जी का फोन है तो वह समझ गया कि कुछ विशेष बात है क्योंकि वह उसे कभी फोन नहीं करते। उसने उनसे केवल एक मिनट तक ही बात की और फ़िर फोन बंद कर दिया।

आभा ने सुना कि उसने फोन पर किसी से कहा, “गुरु जी, हम आ रहे हैं" और उसका गम्भीर चेहरा देखा तो पूछा, “क्या हुआ? तुम्हें कहाँ जाना है?”

“एक एमरजैंसी हो गयी है, और हमें कल सुबह ही यहाँ से निकलना होगा। आप को यहाँ अकेला छोड़ना ठीक नहीं होगा, अच्छा होगा कि आप अपने भाई के पास कुर्स्यांग लौट जायें।"

“क्यों? मेरे यहाँ अकेले रहने में क्या कोई दिक्कत है?”

त्री ने सिर हिला कर मना किया, बोला, “हम लोग कुछ दिनों में लौट आयेंगे, तब आप यहाँ वापस आ सकती हैं। लेकिन इन दिनों में अगर आप विशाल के पास चली जायें तो बेहतर होगा।"

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सोमवार, जून 15, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 05

अब तक: त्रिनेत्र को उसके गुरु जी जामुन बाबा (कोरिया से आये बौद्ध भिक्षुक जून मिन) ने एक अनाथाश्रम खोल कर उसमें गुप्त शक्ति वाले बच्चों को तैयार करने के लिए कहा था। दूसरी ओर, जापानी यामागुची गैंग ने अपने याकूज़ा खूनी ताकानोरी को जामुन बाबा की गुप्त शक्ति वाली मूर्ति को लाने भारत भेजा है। एक दिन बाबा एक काम से नारायणपुर जाते हैं तो उन्हें महसूस होता है कि किसी ने उनके भीतर छुआ है, वह समझ जाते हैं कि उनका पीछा करने वाला कोई वहाँ आया है। बाबा उस समय ताकानोरी के चँगुल से भागने में सफल होते हैं। आगे पढ़िये:

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अध्याय 05

 नारायणपुर से मजूली, असम, 2 मार्च 2026

जैसे ही ताकानोरी की जीप गली से गई, बाबा चारपाई से उठे। उन्होंने उस प्रैस वाली औरत से कहा, “बेटी, आराम करने से मेरी तबियत अब पहले से कुछ ठीक लग रही है। मुझे चुटियागाँव जाना है, मैं चलता हूँ।" 

वहाँ से निकल कर, कुछ दूर जा कर, वह एक पेड़ों के झुरमुट के पीछे छिप गये। वहाँ उन्होंने अपने कम्बल, गमछे और कुर्ते को उतारा और तय करके एक पेड़ के नीचे रख दिया। फ़िर, अपने थैले से एक नीला खद्दर का कुर्ता निकाल कर पहना और एक नारंगी रंग के रामनामी साफे को अपने सिर और गले पर लपेट लिया।

अभी तक वह सड़क पर बूढ़े आदमी की तरह थोड़ा सा झुक कर चल रहे थे। अब वह कमर सीधी करके सीधे चले, ताकि उम्र कम लगे।

फ़िर घरों के पीछे-पीछे से होते हुए, वहाँ लगे पेड़ों और झाड़ियों के बीच में छिपते हुए, वह मेन रोड पर आये। उन्होंने अपने मस्तिष्क की शक्ति लहरों को अभी भी ढका हुआ था। मेन रोड़ पर अब उन्हें कोई देखने वाला, सुबह वाले बूढ़े के रूप में नहीं पहचान सकता था। वह वहीं एक पेड़ के पीछे छिप कर खड़े रहे जब तक टैक्सी नहीं आई और बोरा साहब अपने परिवार के साथ वहाँ से चले नहीं गये।

उनकी टैक्सी के जाने के बाद वह पेड़ के पीछे से बाहर निकले। देखा कि गली के किनारे दो आदमी चापोड़ी जाने वाले आटो की प्रतीक्षा में खड़े हैं, वह भी उनके पास जा कर खड़े हो गये। 

चापोड़ी घाट पहुँच कर उन्होंने अपने थैले से अपना दस साल पुराना मोबाइल फोन निकाला और त्रिनेत्र को फोन किया।

"त्री, जिस पक्षी के लिए दाना डाल कर जाल बिछाया था, वह पक्षी यहाँ पहुँच चुका है।" उन्होंने उसे संक्षिप्त संदेश दिया।

“कैसे? कब? कहाँ पर? आप ठीक तो हैं?", त्री ने पूछा।

बाबा ने छोटा सा उत्तर दिया, “आज सुबह नारायणपुर में उसने मुझे खोज लिया है, उसके पास अन्वेषण-किरण है लेकिन मैं उससे बच कर निकलने में सफल हुआ।"

अन्वेषण किरण की बात सुन कर त्री ने एक क्षण के लिए सोचा, फ़िर बोला, “गुरु जी, हम वहाँ आ रहे हैं, आप जल्दबाज़ी में कोई कदम नहीं लें।"

“तुम मेरी चिंता नहीं करो। तुम सब सावधान रहना, अपना ध्यान रखना और बच्चों की जान को व्यर्थ में खतरे में मत डालना", कह कर उन्होंने फोन काट दिया। उस जापानी के लिए इतने पुराने मोबाईल के सिग्नल को खोजना कठिन होगा लेकिन फ़िर भी वह खतरा नहीं लेना चाहते थे, उन्होंने कुछ आगे जा कर एक सुनसान जगह देख कर उस मोबाइल को नदी में फैंक दिया।

फ़िर जिस रास्ते से वह सुबह मिस्सामोरा-चापोड़ी घाट आये थे, वैसे ही नाव ले कर वह पहले चंगेली सूती द्वीप लौटे, लेकिन इस बार शिबेन के घर के पास नहीं उतरे, बल्कि द्वीप के उत्तर में जा कर उतरे। अभी भी उनके मस्तिष्क की शक्ति-लहर ढकी हुई थी।

शक्ति-लहर को ढकने में बहुत उर्जा लगती है, थकान हो जाती है, लेकिन उन्होंने सारा जीवन आत्म-संयम और आत्म-नियंत्रण का अभ्यास किया है, उन्होंने उस थकान की ओर ध्यान नहीं दिया।

वहाँ से वह तेज़ी से चलते हुए उधर गये जहाँ सुबह उन्होंने अपनी छोटी नाव छुपायी थी। आसपास देखा कि कोई देख तो नहीं रहा, फ़िर नाव निकाल कर नदी में ले गये। नदी पार करके, दूसरे किनारे पर मजूली द्वीप पहुँच कर, उन्होंने फ़िर से नाव को चिथड़ों और पत्तों के नीचे छुपा दिया। मजूली द्वीप के दक्षिण में उनका वृद्धाश्रम है, जिसके साथ एक जँगल जुड़ा है। पिछले कई सालों में उन्होंने उस जँगल में और बहुत से पेड़ लगवाये हैं जिससे वह और भी घना हो गया है।

उस जँगल के बीच से छिपते हुए वह आश्रम के पास में अपने घर लौटे और पिछले गेट से घर में घुसे। घर में उन्होंने केवल पानी पीया, फ़िर तुरंत कपड़े बदल कर बौद्ध-भिक्षुक के वस्त्र पहने।

बहुत साल हो गये हैं उन्हें यामागुचि से बच कर भागते हुए। एक बार वियतनाम में और एक बार थाईलैंड में वह उसके आदमियों से बाल-बाल बचे थे। पिछले तीस सालों से, जब से वह भारत आये हैं, इस दिन के लिए उन्होंने सालों से प्रतीक्षा की है, पर कभी यह नहीं सोचा था कि यामागुचि उनके पीछे किसी गुप्त-शक्ति वाले व्यक्ति को भी भेज सकता है।

अभी तक उनका पीछा करने वाले सामान्य गुंडे थे, अपनी शक्ति की मदद से बाबा उन्हें दूर से पहचान लेते थे। लेकिन इस बार जो व्यक्ति उनका पीछा कर रहा है, उसके पास अन्वेषण-किरण के अतिरिक्त कौन सी शक्तियाँ हैं?

अब उन्हें क्या करना चाहिये? उन्होंने सोचा था कि यहीं रह कर कुछ ऐसा जाल बिछायेंगे कि शिकारी खुद ही फंदे में फँस जाये, लेकिन क्या वह इस शिकारी का सामना कर पायेंगे? और अगर इस शिकारी से लड़ने में त्री को या उसके अनाथाश्रम के किसी बच्चे को कुछ हो गया तो क्या वह अपने आप को क्षमा कर पायेंगे? कैसे फैसला करें कि उन्हें क्या करना चाहिये? 

अंत में यह निर्णय लेने के लिए वह माँ तारा की प्रतिमा के सामने कुछ देर तक ध्यान लगा कर बैठे। अब उन्हें अपना नहीं, त्रिनेत्र और उसके बच्चों के भविष्य के बारे में सोचना है।

जब वह माँ का ध्यान लगाते हैं तो उन्हें समय का पता नहीं चलता और उनका मानस सहज आनन्द की अनुभूति में खो जाता है। आज उनके ध्यान लगाने में एक बाधा थी कि उन्हें अपनी शक्ति-लहर को ढके रखना था ताकि उस जापानी को इस वृद्धाश्रम का पता नहीं चले। उस बाधा के बावजूद ध्यान लगाने पर माँ तारा ने उन्हें राह दिखायी।

उठ कर उन्होंने कुछ देर तक माँ की दिखायी राह के बारे में सोचा, फ़िर घर से निकल कर वृद्धाश्रम में आये।

आश्रम के संचालक एक रिटायर हुए हैडमास्टर जगदीशचन्द्र हैं, वह दफ्तर में बैठे कोई पत्रिका पढ़ रहे थे। जब उन्होंने बाबा को देखा तो हाथ जोड़ कर खड़े हो गये, बोले, “जामुन बाबा, इस समय आप यहाँ कैसे?”

बाबा बोले, “जगदीश बाबू, मुझे क्षमा कीजिये कि आप को पहले सूचना नहीं दे पाया, पर मुझे हमारे सहकारी संघ से एक बहुत ज़रूरी बात करनी है। क्या आप दोपहर में सभी सदस्यों को सभा-कक्ष में इकट्ठा कर सकते हैं?”

आश्रम में कुल चौबीस वृद्ध लोग रहते हैं, सतरह महिलायें और सात पुरुष। बीच-बीच में किसी की मृत्यु हो जाती है, और नये सदस्य भी आते रहते हैं, पर कई सालों से उनके सदस्य तेईस-पच्चीस के आसपास ही चल रहे हैं। वहाँ रहने वाले सभी लोग, जिससे जितना हो सके, आश्रम के दैनिक कामों में हाथ बँटाते हैं ताकि आश्रम, अधिक आत्मनिर्भर हो। कुछ लोग खेतों में सब्ज़ियाँ उगाते हैं, कुछ मधुमक्खियाँ-पालन में, कुछ मुर्गियों, गायों और भैसों की देखरेख में, कुछ सफाई में और कुछ रसोई में काम करते हैं। 

दोपहर के भोजन के बाद बाबा सभा कक्ष में आये और वहाँ एकत्रित लोगों से बोले, “यह आप लोगों के आराम करने का समय है, इस समय आप को यहाँ बुलाने के लिए आप से क्षमा माँगता हूँ।"

सभी वृद्ध लोग उनकी ओर देख रहे थे, कई लोगों के चेहरों पर चिंता झलक रही थी, क्योंकि ऐसी सभा वहाँ आज पहली बार हो रही थी।

बाबा बोले, “मैं आप को एक आवश्यक सूचना देना चाहता हूँ। मैंने आज समाधी लेने का निश्चय किया है, आज शाम को पाँच बजे मैं मंदिर के सामने समाधी लूँगा।"

उनकी बात को सुन कर सभी लोग स्तब्ध रह गये।

आखिर में जगदीश बाबू बोले, "जामुन बाबा, यह आप क्या कह रहे हैं? समाधी लेने का क्या अर्थ है?"

“कि आज मैं धरती माता के गर्भ में लौट जाऊँगा।"

“कितनी देर के लिए?”

"पता नहीं”, बाबा मुस्कराये, "सम्भव है कि हमेशा के लिए।"  

लोग आपस में घुसपुस बातें करने लगे, कुछ लोग रोने लगे। सामने बैठी एक वृद्धा रोते हुए बोली, “इसका मतलब है कि आश्रम बंद हो जायेगा और मुझे अपने बेटे के घर लौटना पड़ेगा?”

बाबा ने उन्हें शाँत करने के लिए अपने दाहिने हाथ को अभय-दान मुद्रा में ऊपर उठाया, बोले, “आप लोग शाँत रहिये। यह आश्रम हमारा सहकारी संघ चलाता है, यहाँ की ज़मीन भी सहकारी संघ की है। आप लोगों की मेहनत से आश्रम की अच्छी मासिक आय होती है। आश्रम के पास अपनी ज़मीन है, आप सब के रहने की जगह है, फ़िर यहाँ पर मेरे होने या न होने से आप को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। आप लोग यहाँ जैसे रहते हैं, वैसे ही रहेंगे। आप आश्रम में नये लोगों को भी स्वीकार कर सकते हैं, किसी को यहाँ से जाने की कोई आवश्यकता नहीं होगी। मेरे बाद, ज़रूरत पड़ने पर आप मेरे शिष्य त्रिनेत्र से बात कर सकते हैं। वह यहाँ आता रहता है, आप में से बहुत से लोग उसे जानते हैं, मेरे बाद वही मेरा उत्तराधिकारी होगा।"

कई लोग कुर्सियों से उठ कर उनके पास आने लगे तो उन्होंने इशारा करके सब को रुकने के लिए कहा, बोले, “मेरा निर्णय अब नहीं बदलेगा। मुझे अपनी समाधी की तैयारी करनी है, अभी मेरे पास आप से बात करने का समय नहीं है। लेकिन बाद में आप जब चाहें मेरी समाधी पर मुझ से बात करने आ सकते हैं। मेरा शरीर यहाँ नहीं होगा लेकिन मैं हमेशा आप के साथ रहूँगा।"

एक वृद्धा बोली, “जामुन बाबा, तुम्हारे इस आश्रम में मुझे शरण मिली है, बुढ़ापे में गरिमा से जीने का अवसर मिला है, मैं तुम्हारा यह उपकार कभी नहीं भूलूँगी।" यह बात सुन कर बहुत से अन्य लोगों ने भी सिर हिला कर हामी भरी।

लोगों को एक-एक करके नमस्कार करते और उनसे विदा लेते हुए बाबा को कुछ समय लगा।

जगदीश बाबू उनके साथ आश्रम के द्वार तक आये, बोले, “बाबा, मेरा सारा जीवन स्कूल में हैडमास्टरी करते हुए निकल गया। मैं अपने आप पर, अपने पद और ज्ञान पर अभिमान करता था, लेकिन जब मेरी पत्नि की मृत्यु हुई और मैं बिल्कुल अकेला रह गया तब समझ में आया कि समय हर अभिमान को मिट्टी में मिला देता है। मैं विदेश में बेटी के पास रहने गया लेकिन वहाँ भी सारा दिन अकेला खाली बैठा रहता था, वहाँ भी मेरा दिल नहीं लगा। मेरे जीवन के आखिरी दिनों को अन्य वृद्धों की सेवा का मौका दे कर आप ने जो मुझ पर उपकार किया है, मैं उसका ऋण कैसे चुकाऊँगा?”

बाबा बोले, “ऋण तो हम सब को इस पृथ्वी और इस प्रकृति का चुकाना है। आप जो काम कर रहे हैं वह करते रहिये और ऐसा कीजिये कि यह वृद्धाश्रम आत्मनिर्भर और स्वतंत्र बना रहे, यहाँ से कभी किसी ज़रूरतमंद वृद्ध को निराश हो कर नहीं लौटना पड़े।"

जगदीश बाबू ने सिर झुका लिया, फ़िर आँखें पोंछते हुए पूछा, “आप को तैयारी करने में कुछ मदद चाहिये हो तो मैं साथ चलूँ?”

उन्होंने सिर हिला कर मना किया, बोले, “मेरी तैयारी का मतलब माँ तारा का ध्यान करना है। आप मेरी चिंता नहीं कीजिये, मैं भिक्षुक हूँ, मेरे साथ केवल मेरी भिक्षा का कटोरा और माँ तारा की प्रतिमा जायेंगे, और कुछ भी नहीं।"

उनसे विदा ले कर वह घर लौटे, लेकिन रुके नहीं, सीधा घर के पीछे का दरवाज़ा खोल कर, वह उत्तर की ओर जाती एक पगडँडी से पीछे जंगल की ओर गये।

वहाँ से कुछ दूरी पर झाड़-झंखाड़ से ढका हुआ एक पुराना खण्डहर था, वह उस ओर गये। आसपास देखा कि कोई देख तो नहीं रहा, फ़िर खण्डहर की एक ईँट को हिलाया। बिना कोई आवाज़ किये, पास में ज़मीन पर एक चकोर द्वार खुल गया, जिसमें से नीचे जाती हुई सीढ़ियाँ दिख रही थीं।

वह उन सीढ़ियों से नीचे उतरे और साथ की दीवार पर लगे एक बटन को दबाया तो वह द्वार बंद हो गया और सीढ़ियों की बत्ती जल गयी। तब उन्होंने लम्बी साँस ली और अपने मस्तिष्क की ढकी हुई शक्ति-लहर के आवरण को हटाया। सुबह से कई घंटों से उसे ढके-ढके वह बहुत थक गये थे।

यहाँ तहखाने में उन्हें कोई खतरा नहीं है। यहाँ वह धरती के नीचे छिपे हैं और उस जापानी पुरुष की अन्वेषण-किरण उन्हें यहाँ पर नहीं खोज सकती। समाधी लेने से पहले, अब वह कुछ देर तक आराम कर सकते हैं।

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