अब तक: त्रिनेत्र को उसके गुरु जी जामुन बाबा (कोरिया से आये बौद्ध भिक्षुक जून मिन) ने एक अनाथाश्रम खोल कर उसमें गुप्त शक्ति वाले बच्चों को तैयार करने के लिए कहा था। दूसरी ओर, जापानी यामागुची गैंग ने अपने याकूज़ा खूनी ताकानोरी को जामुन बाबा की गुप्त शक्ति वाली मूर्ति को लाने भारत भेजा है। एक दिन बाबा एक काम से नारायणपुर जाते हैं तो उन्हें महसूस होता है कि किसी ने उनके भीतर छुआ है, वह समझ जाते हैं कि उनका पीछा करने वाला कोई वहाँ आया है। बाबा उस समय ताकानोरी के चँगुल से भागने में सफल होते हैं। आगे पढ़िये:
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अध्याय 05
नारायणपुर से मजूली, असम, 2 मार्च 2026
जैसे ही ताकानोरी की जीप गली से गई, बाबा चारपाई से उठे। उन्होंने उस प्रैस वाली औरत से कहा, “बेटी, आराम करने से मेरी तबियत अब पहले से कुछ ठीक लग रही है। मुझे चुटियागाँव जाना है, मैं चलता हूँ।"
वहाँ से निकल कर, कुछ दूर जा कर, वह एक पेड़ों के झुरमुट के पीछे छिप गये। वहाँ उन्होंने अपने कम्बल, गमछे और कुर्ते को उतारा और तय करके एक पेड़ के नीचे रख दिया। फ़िर, अपने थैले से एक नीला खद्दर का कुर्ता निकाल कर पहना और एक नारंगी रंग के रामनामी साफे को अपने सिर और गले पर लपेट लिया।
अभी तक वह सड़क पर बूढ़े आदमी की तरह थोड़ा सा झुक कर चल रहे थे। अब वह कमर सीधी करके सीधे चले, ताकि उम्र कम लगे।
फ़िर घरों के पीछे-पीछे से होते हुए, वहाँ लगे पेड़ों और झाड़ियों के बीच में छिपते हुए, वह मेन रोड पर आये। उन्होंने अपने मस्तिष्क की शक्ति लहरों को अभी भी ढका हुआ था। मेन रोड़ पर अब उन्हें कोई देखने वाला, सुबह वाले बूढ़े के रूप में नहीं पहचान सकता था। वह वहीं एक पेड़ के पीछे छिप कर खड़े रहे जब तक टैक्सी नहीं आई और बोरा साहब अपने परिवार के साथ वहाँ से चले नहीं गये।
उनकी टैक्सी के जाने के बाद वह पेड़ के पीछे से बाहर निकले। देखा कि गली के किनारे दो आदमी चापोड़ी जाने वाले आटो की प्रतीक्षा में खड़े हैं, वह भी उनके पास जा कर खड़े हो गये।
चापोड़ी घाट पहुँच कर उन्होंने अपने थैले से अपना दस साल पुराना मोबाइल फोन निकाला और त्रिनेत्र को फोन किया।
"त्री, जिस पक्षी के लिए दाना डाल कर जाल बिछाया था, वह पक्षी यहाँ पहुँच चुका है।" उन्होंने उसे संक्षिप्त संदेश दिया।
“कैसे? कब? कहाँ पर? आप ठीक तो हैं?", त्री ने पूछा।
बाबा ने छोटा सा उत्तर दिया, “आज सुबह नारायणपुर में उसने मुझे खोज लिया है, उसके पास अन्वेषण-किरण है लेकिन मैं उससे बच कर निकलने में सफल हुआ।"
अन्वेषण किरण की बात सुन कर त्री ने एक क्षण के लिए सोचा, फ़िर बोला, “गुरु जी, हम वहाँ आ रहे हैं, आप जल्दबाज़ी में कोई कदम नहीं लें।"
“तुम मेरी चिंता नहीं करो। तुम सब सावधान रहना, अपना ध्यान रखना और बच्चों की जान को व्यर्थ में खतरे में मत डालना", कह कर उन्होंने फोन काट दिया। उस जापानी के लिए इतने पुराने मोबाईल के सिग्नल को खोजना कठिन होगा लेकिन फ़िर भी वह खतरा नहीं लेना चाहते थे, उन्होंने कुछ आगे जा कर एक सुनसान जगह देख कर उस मोबाइल को नदी में फैंक दिया।
फ़िर जिस रास्ते से वह सुबह मिस्सामोरा-चापोड़ी घाट आये थे, वैसे ही नाव ले कर वह पहले चंगेली सूती द्वीप लौटे, लेकिन इस बार शिबेन के घर के पास नहीं उतरे, बल्कि द्वीप के उत्तर में जा कर उतरे। अभी भी उनके मस्तिष्क की शक्ति-लहर ढकी हुई थी।
शक्ति-लहर को ढकने में बहुत उर्जा लगती है, थकान हो जाती है, लेकिन उन्होंने सारा जीवन आत्म-संयम और आत्म-नियंत्रण का अभ्यास किया है, उन्होंने उस थकान की ओर ध्यान नहीं दिया।
वहाँ से वह तेज़ी से चलते हुए उधर गये जहाँ सुबह उन्होंने अपनी छोटी नाव छुपायी थी। आसपास देखा कि कोई देख तो नहीं रहा, फ़िर नाव निकाल कर नदी में ले गये। नदी पार करके, दूसरे किनारे पर मजूली द्वीप पहुँच कर, उन्होंने फ़िर से नाव को चिथड़ों और पत्तों के नीचे छुपा दिया। मजूली द्वीप के दक्षिण में उनका वृद्धाश्रम है, जिसके साथ एक जँगल जुड़ा है। पिछले कई सालों में उन्होंने उस जँगल में और बहुत से पेड़ लगवाये हैं जिससे वह और भी घना हो गया है।
उस जँगल के बीच से छिपते हुए वह आश्रम के पास में अपने घर लौटे और पिछले गेट से घर में घुसे। घर में उन्होंने केवल पानी पीया, फ़िर तुरंत कपड़े बदल कर बौद्ध-भिक्षुक के वस्त्र पहने।
बहुत साल हो गये हैं उन्हें यामागुचि से बच कर भागते हुए। एक बार वियतनाम में और एक बार थाईलैंड में वह उसके आदमियों से बाल-बाल बचे थे। पिछले तीस सालों से, जब से वह भारत आये हैं, इस दिन के लिए उन्होंने सालों से प्रतीक्षा की है, पर कभी यह नहीं सोचा था कि यामागुचि उनके पीछे किसी गुप्त-शक्ति वाले व्यक्ति को भी भेज सकता है।अभी तक उनका पीछा करने वाले सामान्य गुंडे थे, अपनी शक्ति की मदद से बाबा उन्हें दूर से पहचान लेते थे। लेकिन इस बार जो व्यक्ति उनका पीछा कर रहा है, उसके पास अन्वेषण-किरण के अतिरिक्त कौन सी शक्तियाँ हैं?
अब उन्हें क्या करना चाहिये? उन्होंने सोचा था कि यहीं रह कर कुछ ऐसा जाल बिछायेंगे कि शिकारी खुद ही फंदे में फँस जाये, लेकिन क्या वह इस शिकारी का सामना कर पायेंगे? और अगर इस शिकारी से लड़ने में त्री को या उसके अनाथाश्रम के किसी बच्चे को कुछ हो गया तो क्या वह अपने आप को क्षमा कर पायेंगे? कैसे फैसला करें कि उन्हें क्या करना चाहिये?
अंत में यह निर्णय लेने के लिए वह माँ तारा की प्रतिमा के सामने कुछ देर तक ध्यान लगा कर बैठे। अब उन्हें अपना नहीं, त्रिनेत्र और उसके बच्चों के भविष्य के बारे में सोचना है।
जब वह माँ का ध्यान लगाते हैं तो उन्हें समय का पता नहीं चलता और उनका मानस सहज आनन्द की अनुभूति में खो जाता है। आज उनके ध्यान लगाने में एक बाधा थी कि उन्हें अपनी शक्ति-लहर को ढके रखना था ताकि उस जापानी को इस वृद्धाश्रम का पता नहीं चले। उस बाधा के बावजूद ध्यान लगाने पर माँ तारा ने उन्हें राह दिखायी।
उठ कर उन्होंने कुछ देर तक माँ की दिखायी राह के बारे में सोचा, फ़िर घर से निकल कर वृद्धाश्रम में आये।
आश्रम के संचालक एक रिटायर हुए हैडमास्टर जगदीशचन्द्र हैं, वह दफ्तर में बैठे कोई पत्रिका पढ़ रहे थे। जब उन्होंने बाबा को देखा तो हाथ जोड़ कर खड़े हो गये, बोले, “जामुन बाबा, इस समय आप यहाँ कैसे?”
बाबा बोले, “जगदीश बाबू, मुझे क्षमा कीजिये कि आप को पहले सूचना नहीं दे पाया, पर मुझे हमारे सहकारी संघ से एक बहुत ज़रूरी बात करनी है। क्या आप दोपहर में सभी सदस्यों को सभा-कक्ष में इकट्ठा कर सकते हैं?”
आश्रम में कुल चौबीस वृद्ध लोग रहते हैं, सतरह महिलायें और सात पुरुष। बीच-बीच में किसी की मृत्यु हो जाती है, और नये सदस्य भी आते रहते हैं, पर कई सालों से उनके सदस्य तेईस-पच्चीस के आसपास ही चल रहे हैं। वहाँ रहने वाले सभी लोग, जिससे जितना हो सके, आश्रम के दैनिक कामों में हाथ बँटाते हैं ताकि आश्रम, अधिक आत्मनिर्भर हो। कुछ लोग खेतों में सब्ज़ियाँ उगाते हैं, कुछ मधुमक्खियाँ-पालन में, कुछ मुर्गियों, गायों और भैसों की देखरेख में, कुछ सफाई में और कुछ रसोई में काम करते हैं।
दोपहर के भोजन के बाद बाबा सभा कक्ष में आये और वहाँ एकत्रित लोगों से बोले, “यह आप लोगों के आराम करने का समय है, इस समय आप को यहाँ बुलाने के लिए आप से क्षमा माँगता हूँ।"
सभी वृद्ध लोग उनकी ओर देख रहे थे, कई लोगों के चेहरों पर चिंता झलक रही थी, क्योंकि ऐसी सभा वहाँ आज पहली बार हो रही थी।
बाबा बोले, “मैं आप को एक आवश्यक सूचना देना चाहता हूँ। मैंने आज समाधी लेने का निश्चय किया है, आज शाम को पाँच बजे मैं मंदिर के सामने समाधी लूँगा।"
उनकी बात को सुन कर सभी लोग स्तब्ध रह गये।
आखिर में जगदीश बाबू बोले, "जामुन बाबा, यह आप क्या कह रहे हैं? समाधी लेने का क्या अर्थ है?"
“कि आज मैं धरती माता के गर्भ में लौट जाऊँगा।"
“कितनी देर के लिए?”
"पता नहीं”, बाबा मुस्कराये, "सम्भव है कि हमेशा के लिए।"
लोग आपस में घुसपुस बातें करने लगे, कुछ लोग रोने लगे। सामने बैठी एक वृद्धा रोते हुए बोली, “इसका मतलब है कि आश्रम बंद हो जायेगा और मुझे अपने बेटे के घर लौटना पड़ेगा?”
बाबा ने उन्हें शाँत करने के लिए अपने दाहिने हाथ को अभय-दान मुद्रा में ऊपर उठाया, बोले, “आप लोग शाँत रहिये। यह आश्रम हमारा सहकारी संघ चलाता है, यहाँ की ज़मीन भी सहकारी संघ की है। आप लोगों की मेहनत से आश्रम की अच्छी मासिक आय होती है। आश्रम के पास अपनी ज़मीन है, आप सब के रहने की जगह है, फ़िर यहाँ पर मेरे होने या न होने से आप को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। आप लोग यहाँ जैसे रहते हैं, वैसे ही रहेंगे। आप आश्रम में नये लोगों को भी स्वीकार कर सकते हैं, किसी को यहाँ से जाने की कोई आवश्यकता नहीं होगी। मेरे बाद, ज़रूरत पड़ने पर आप मेरे शिष्य त्रिनेत्र से बात कर सकते हैं। वह यहाँ आता रहता है, आप में से बहुत से लोग उसे जानते हैं, मेरे बाद वही मेरा उत्तराधिकारी होगा।"
कई लोग कुर्सियों से उठ कर उनके पास आने लगे तो उन्होंने इशारा करके सब को रुकने के लिए कहा, बोले, “मेरा निर्णय अब नहीं बदलेगा। मुझे अपनी समाधी की तैयारी करनी है, अभी मेरे पास आप से बात करने का समय नहीं है। लेकिन बाद में आप जब चाहें मेरी समाधी पर मुझ से बात करने आ सकते हैं। मेरा शरीर यहाँ नहीं होगा लेकिन मैं हमेशा आप के साथ रहूँगा।"
एक वृद्धा बोली, “जामुन बाबा, तुम्हारे इस आश्रम में मुझे शरण मिली है, बुढ़ापे में गरिमा से जीने का अवसर मिला है, मैं तुम्हारा यह उपकार कभी नहीं भूलूँगी।" यह बात सुन कर बहुत से अन्य लोगों ने भी सिर हिला कर हामी भरी।
लोगों को एक-एक करके नमस्कार करते और उनसे विदा लेते हुए बाबा को कुछ समय लगा।
जगदीश बाबू उनके साथ आश्रम के द्वार तक आये, बोले, “बाबा, मेरा सारा जीवन स्कूल में हैडमास्टरी करते हुए निकल गया। मैं अपने आप पर, अपने पद और ज्ञान पर अभिमान करता था, लेकिन जब मेरी पत्नि की मृत्यु हुई और मैं बिल्कुल अकेला रह गया तब समझ में आया कि समय हर अभिमान को मिट्टी में मिला देता है। मैं विदेश में बेटी के पास रहने गया लेकिन वहाँ भी सारा दिन अकेला खाली बैठा रहता था, वहाँ भी मेरा दिल नहीं लगा। मेरे जीवन के आखिरी दिनों को अन्य वृद्धों की सेवा का मौका दे कर आप ने जो मुझ पर उपकार किया है, मैं उसका ऋण कैसे चुकाऊँगा?”
बाबा बोले, “ऋण तो हम सब को इस पृथ्वी और इस प्रकृति का चुकाना है। आप जो काम कर रहे हैं वह करते रहिये और ऐसा कीजिये कि यह वृद्धाश्रम आत्मनिर्भर और स्वतंत्र बना रहे, यहाँ से कभी किसी ज़रूरतमंद वृद्ध को निराश हो कर नहीं लौटना पड़े।"
जगदीश बाबू ने सिर झुका लिया, फ़िर आँखें पोंछते हुए पूछा, “आप को तैयारी करने में कुछ मदद चाहिये हो तो मैं साथ चलूँ?”
उन्होंने सिर हिला कर मना किया, बोले, “मेरी तैयारी का मतलब माँ तारा का ध्यान करना है। आप मेरी चिंता नहीं कीजिये, मैं भिक्षुक हूँ, मेरे साथ केवल मेरी भिक्षा का कटोरा और माँ तारा की प्रतिमा जायेंगे, और कुछ भी नहीं।"
उनसे विदा ले कर वह घर लौटे, लेकिन रुके नहीं, सीधा घर के पीछे का दरवाज़ा खोल कर, वह उत्तर की ओर जाती एक पगडँडी से पीछे जंगल की ओर गये।
वहाँ से कुछ दूरी पर झाड़-झंखाड़ से ढका हुआ एक पुराना खण्डहर था, वह उस ओर गये। आसपास देखा कि कोई देख तो नहीं रहा, फ़िर खण्डहर की एक ईँट को हिलाया। बिना कोई आवाज़ किये, पास में ज़मीन पर एक चकोर द्वार खुल गया, जिसमें से नीचे जाती हुई सीढ़ियाँ दिख रही थीं।
वह उन सीढ़ियों से नीचे उतरे और साथ की दीवार पर लगे एक बटन को दबाया तो वह द्वार बंद हो गया और सीढ़ियों की बत्ती जल गयी। तब उन्होंने लम्बी साँस ली और अपने मस्तिष्क की ढकी हुई शक्ति-लहर के आवरण को हटाया। सुबह से कई घंटों से उसे ढके-ढके वह बहुत थक गये थे।
यहाँ तहखाने में उन्हें कोई खतरा नहीं है। यहाँ वह धरती के नीचे छिपे हैं और उस जापानी पुरुष की अन्वेषण-किरण उन्हें यहाँ पर नहीं खोज सकती। समाधी लेने से पहले, अब वह कुछ देर तक आराम कर सकते हैं।
*****
अगला भाग बृहस्पतिवार 18 जून 2026 को पढ़ सकते हैं।






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