शुक्रवार, सितंबर 18, 2026

क्या पढ़ा (2) - कहानी, कविता, आलेख

कुछ माह पहले मैंने निश्चय किया था कि मैं अपनी डायरी लिखूँगा कि हिंदी में क्या पढ़ा जो अच्छा लगा और इस डायरी का पहला भाग अगस्त के प्रारम्भ में लिखा था। आज इस डायरी का दूसरा भाग प्रस्तुत है।

मैं अधिकतर तीन भाषाओं में लिखता-पढ़ता हूँ - हिंदी, अंग्रेज़ी और इतालवी, पर कभी-कभी फ्राँसिसी और पुर्तगाली में भी पढ़ना पड़ता है। जैसे कि सुबह हिंदी, अंग्रेज़ी और इतालवी में अखबार पढ़ी, फिर कोई हिंदी पत्रिका पढ़ी, दोपहर में अंग्रेज़ी उपन्यास पढ़ा और रात को सोने से पहले कोई इतालवी पत्रिका पढ़ी। सपने भी इन तीनों भाषाओं में देखता हूँ। मेरे विचार में हर भाषा में हमारे सोचने का तरीका बदल जाता है, तो मेरे इस तरह से तीनों भाषाओं में लगातार बदलने से मेरे सोचने पर क्या असर पड़ता है, यह प्रश्न भी अक्सर मन में उठता है लेकिन समझ नहीं आता कि उसका उत्तर कैसे खोजा जाये?

इस बार मैंने जो हिंदी में पढ़ा उसे तीन भागों में बाँटा है - आलेख, कहानियाँ और कविताएँ। यह सब कुछ मैंने विभिन्न पत्रिकाओं में ॲानलाइन पोर्टल नॉटनुल पर पढ़ा।


 

खैर, अब उस पर आते हैं कि इस बार मुझे क्या पढ़ना अच्छा लगा, और शुरुआत करते हैं आलेखों से। अच्छा लगने के मूल्यांकन की मेरी पहली और सबसे बड़ी कसौटी है कि मैं किसी कहानी या आलेख को अंत तक पढ़ पाया या नहीं। पढ़ने को इतना कुछ है और दिन में केवल 24 घंटे होते हैं, जिसमें रुचि नहीं जागे, उसे तुरंत वहीं छोड देता हूँ।

हिंदी आलेख 

हँस पत्रिका के अगस्त 2026 अंक में अनुज लुगुन का अतिथि संपादकीय: हँस का यह अंक जनजातियों की संस्कृति, भाषाओं और जीवन पर केन्द्रित है, मुझे यह अंक पढ़ना बहुत अच्छा लगा। लुगुन जी अपने सम्पादकीय में 1970 के दशक में शुरु हुआ कोइलकारो बांध के विरुद्ध जन आंदोलन जो तीस सालों तक चला, से शुरु करके विभिन्न विषयों को छूते हैं जैसे कि - मूलनिवासियों के सांस्कृतिक-अध्यात्मिक पुनर्निवास की माँग, आदिवासी नागरिकों को दो संवैधानिक अनुच्छेदों में बाँटना (पाँचवीं और छठी अनुसूची), कानजी पटेल के "अनुत्तरित लोग" में आदिवासी कवियों का संकलन जिसमें 141 आदिवासी भाषाओं में 382 कवियों की कविताएँ मूलभाषा और हिंदी में संकलित की गयीं, आदिवासी यानि असुर-राक्षस के रूप में स्वयं अपनेआप को देखते हैं।

हँस के इसी अंक में सावित्री बड़ाईक का एक रोचक आलेख भी है, "असुरों की सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेज", जिसमें वह बताती हैं कि हिंदू ग्रंथों में जिन्हें असुर कहा गया है वह छोटानागपुर के पठार में रहते हैं, आदि। इस आलेख को पढ़ कर सोच रहा था की प्राचीन सीरिया के असुर राजाओं, जैसे कि असुर बनिपाल, जिनकी कहानियाँ और इतिहास मेसोपोटेमिया की पक्की मिट्टी की तख्तियों पर मिली हैं और भारत की असुर जनजातियों में क्या सम्बंध था या कोई सीधा सम्बंध नहीं था? 

हँस में ही अनामिका अनु द्वारा लिखी तीजन बाई की जीवनी का एक अंश, शीर्षक "अपनी नाक खुद सम्भाले यह समाज" जिसमें तेरह साल की लड़की के घर से निकाले जाने की बात है क्योंकि पाण्डवानी को ऊँचे स्वर और जोश में ही गा कर उसका अभ्यास करना पड़ता है और कोई उसे गाते हुए सुन लेता था, अच्छा लगा। इस आलेख की पहली पंक्ति, "धूँए से उठी, लोगों की आँखों में लगी", बहुत सुंदर लगी, उसमें तीजन बाई के जीवन का सार दिखता है।

पाखी के अगस्त अंक में "पाखी संवाद - जहाँ शब्द डरते नहीं" में शिवकुमार बटालवी और ताराशंकर वंद्योपाध्याय का स्मृति आलेख अच्छा लगा। वंद्योपाध्याय के लेखन की बात करते हुए कहते हैं, "इस उपन्यास में उन्होंने समाज के उस हिस्से को केन्द्र में रखा जिसे मुख्यधारा का साहित्य अक्सर अनदेखा कर देता था। वहाँ के लोगों की भाषा, उनके रीति-रिवाज, उनके भय, उनकी आस्थाएँ और उनके सपने - सब कुछ इतनी प्रमाणिकता से चित्रित है कि पाठक स्वयं उस संसार का हिस्सा बन जाते हैं।" मुझे भी हिंदी कहानियाँ-उपन्यास पढ़ते समय, लेखकों का यही कौशल आकर्षित करता है, कि अनदेखे-अनजाने लोगों के जीवन की झलक मिले। पाखी संवाद के इन आलेखों से मुझे उनकी पाखी संवाद यूट्यूब की चैनल का भी पता चला, और अब उनके विडियो देखने-सुनने का मौका भी मिलेगा।  

अकार पत्रिका के अगस्त अंक के प्रारम्भ और अंत में मुख्यपृष्ठों के पीछे मिर्ज़ा हादी रुसवा के उपन्यास उमराव जान अदा के हिंदी अनुवाद का एक छोटा सा अंश दिया है जो बहुत सुंदर लगा। इस अंश में पता चलता है कि उमराव जान के समय में तवायफों की तालीम में और उपन्यास लिखने वाले लेखक को, शास्त्रीय संगीत के विभिन्न रागों और उनके सुरों की गहरी पहचान होती थी। यह जान कर भी थोड़ा सा आश्चर्य हुआ कि उपन्यास का यह अनुवाद गुलशन नन्दा ने किया था। अपने समय में गुलशन नन्दा जी शायद हिंदी के सबसे प्रसिद्ध लेखक थे। बचपन की रेलयात्राओं में मुझे उनके विभिन्न उपन्यास पढ़ना याद है। उनके बहुत से उपन्यासों पर सफल फिल्में भी बनी थीं। लेकिन जैसा हिंदी लेखन जगत में अक्सर होता है, लोकप्रियता को अ-साहित्यिक माना जाता है, और जब हिंदी के बड़े लेखकों की बात होती है, शायद कोई गुलशन नन्दा को उनमें नहीं गिनता।

अकार पत्रिका के अगस्त अंक में प्रियंवद जी का संपादकीय, जहाँगीर के अंग्रेज सलाहकार हॉकिन्स द्वारा लिखे बादशाह जहाँगीर के एक दिन के ब्यौरे के बारे में है। उसे पढ़ते हुए सोच रहा कि उस जमाने में और आज में किंतना अंतर आया है, जो चीजे हमें इतनी आसानी से मिल जाती हैं कि हम उनके बारे में सोचते भी नहीं हैं, उस समय वह बादशाह को भी नहीं मिलती थीं। अगर जहाँगीर के पास ट्विटर, टिकटॉक, इंस्टाग्राम होते तो वह अपना सारा दिन कैसे बिताते? अगर उनके पास फ्रिज होता तो वह उसमें अपने लिए कौन सी आईसक्रीम रखवाते? अगर उनके पास टीवी होता तो क्या वह किस तरह के प्रोग्राम व फिल्में देखते या शायद वह भी अमिताभ बच्चन के फैन हो जाते? अगर उनके पास माईक्रोवेव होता तो क्या वह अपने लिए कॉफी बना कर पीते? या फिर, हवाई जहाज में घूमते हुए ट्रम्प या पुतिन से दोस्ती बनाते? या फिर, अनुराग कश्यप की फिल्म देख कर कहते, "कितनी गालियाँ लगाता है यह आदमी अपनी फिल्मों में, लाहोल विला कुव्वत! इसे फाँसी पर चढ़ा दिया जाये।"

कथाक्रम के सितम्बर अंक में ही लोकबाबू के उपन्यास "बस्तर-बस्तर" पर जयप्रकाश मानस का आलोचनात्मक आलेख, "जहाँ जंगल स्मृति है और आदमी धीरे-धीरे गायब होता हुआ वर्तमान" अच्छा लगा और इसे पढ़ कर "बस्तर-बस्तर" को पढ़ने की इच्छा भी हुई। मानस जी लिखते हैं, "बस्तर रूपक है उस देश का, जो अपने ही भीतर कुछ दूर छूट गया है - जहाँ विकास की सड़कें पहुँचते-पहुँचते थक जाती हैं, और पगडँडियाँ अब भी अपने होने पर अड़ी रहती हैं। बस्तर कविता है उस आदिम लय की जिसे किसी छंद में बांधना सम्भव नही; वह महुए की गंध की तरह फैलती है - धीरे, अनाम, लेकिन गहरे तक उतरती हुई।"

कथाक्रम के सितम्बर अंक में अर्चना पैन्यूली के उपन्यास "अलकनंदा सुन" पर संजीव जयसवाल 'संजय' का आलोचनात्मक आलेख, "माटी की गंध और स्मृतियों की सरिता" भी अच्छा लगा। इस उपन्यास के कथन-विन्यास के बारे में उन्होंने लिखा है, "यह उपन्यास शिवानंद के जीवन को किसी सर्वज्ञ कथावचाक के माध्यम से नहीं, बल्कि उसके बच्चों की दृष्टि से प्रस्तुत करता है - पहले बड़ा बेटा, फिर दूसरा बेटा और अंत में पुत्री। इस क्रमिक परिवर्तन से कथा केवल आगे ही नहीं बढ़ती, बल्कि भावनात्मक रूप से अधिक गहरी होती जाती है।" इस बात से भी इस उपन्यास पढ़ने का मन किया।

बनास जन पत्रिका के 88वें अंक में विद्यासागर नौटियाल के बारे में पढ़ रहा था। उनके लेखन के बारे में लिखा है: "उनके उपन्यासों और कहानियों का संसार उत्तराखंड के साधारण लोगों के जीवन संघर्षों का दस्तावेज बन गया है। वह सहज भाषा और सरल कथा-शिल्प में अपने लोगों की यातनाओं को दर्ज करते हैं। इतिहास और संस्कृति उनके लिए गौरव का स्मारक न हो कर साधारण लोगों की मुक्ति चेतना के वाहक बनते हैं।" ऐसे ही बातें कुछ अन्य आलेखों में भी थीं और मैंने अक्सर अन्य लेखकों के बारे में भी पढ़ी हैं। इसे पढ़ कर सोच रहा था कि क्यों हिंदी  में लेखकों के साधारण आदमियों की पीड़ा, शोषण, यातनाओं की बात करना ही अच्छा साहित्य समझा जाता है? जबकि मेरे मन में वही किताबें रहती हैं जिनमें मानव जीवन का और रिश्तों का सजीव चित्रण हो, उनमें केवल दुख, पीड़ा और कठिनाईयाँ देखना उसका अधूरापन नहीं बन जायेगा? मैंने नौटियाल जी की कोई किताब नहीं पढ़ी इसलिए मेरी यह टिप्पणी उनके लेखन के बारे में नहीं है, बल्कि अच्छा साहित्यकार किसे माना जाये का मूल्यांकन करने वाली दृष्टि के बारे में है। 

तद्भव पत्रिका के जनवरी-जून 2026 अंक में विश्वनाथ त्रिपाठी के संस्मरण "अस निबहुर देसू" का आठवाँ भाग बहुत रुचि से पढ़ा जिसमें उनके दिल्ली आने और यहाँ रहने के 1950-60 के वर्णन हैं। उनकी बातें पढ़ कर मुझे भी अपनी बचपन की वह घटनाएँ याद आयीं, जब मैं बच्चा था। उनका जामामस्जिद जा कर कबाब खाना, जमुनापार दिलशाद गार्डन में रहने के बारे में कहना "नानक दुखिया सब संसार, सबसे दुखिया जमुना पार", श्रीकाँत वर्मा और मन्मथनाथ गुप्त की चीन के बारे में बहस, सैम मानिकशा और जनरल करिअप्पा की बातें, ऐसी बहुत सी घटनाओं के बारे में पढ़ना अच्छा लगा।

तद्भव में ही राजाराम भादू का धर्मवीर भारती की जन्म शताब्दी के अवसर पर "एक पुनरावलोकन" आलेख भी अच्छा लगा। 1983-84 के आसपास मेरी एक कहानी धर्मयुग में छपी थी, तब भारती जी से कुछ पत्रचार हुआ था। वह मेरे पिता को जानते थे, दोनों इलाहाबाद के थे, करीब-करीब हमउम्र थे और दोनों के परिवार आर्यसमाजी थे। मैंने लड़कपन में भारती की "गुनाहों का देवता" पढ़ी थी और उनके लाखों प्रशंसकों में मैं भी आ गया था। मैं उनकी एक कविता को भी बहुत पसंद करता हूँ - "दिन यूँ ही बीत गया, अंजुरी में भरा हुआ जल जैसे रीत गया।"

तद्भव में आकांक्षा बरनवाल के लम्बे आलेख "परंपरा का मूल्यांकन और औपनिवेशिक आधुनिकता" में महाभारत के संदर्भ में, एक ओर है पश्चिमी तर्क, समझ और श्रेणीकरण, और दूसरी ओर हैं भारतीय समझ और परम्परा। वह इन दोनों के बीच के विरोधाभासों पर पश्चिमी सोच से प्रभावित महाभारत के "क्रिटिकल एडिशन" बना कर ग्रंथ के "मूल तथा प्रमाणिक" रूपों की खोज-दृष्टि, और दूसरी ओर, उसके विभिन्न संस्करणों-लेखकों की गतिशील, समय के साथ बदलने वाली भारतीय समझ की दृष्टि के अंतरों की बात करती हैं।

इस सिलसिले में वह लिखती हैं, "जो विद्वान वैज्ञानिक पाठालोचन की पद्धिति और मूल पाठ की अवधारणा के समर्थक हैं उन्हें शिकायत है कि सुकथांकर और उनके सहयोगियों ने बहुत से परवर्ती प्रक्षेप अपने क्रिटिकल एडिशन में शामिल कर लिए। जो विद्वान महाभारत को एक स्थिर रचना की बजाय एक गतिशील और जीवंत प्रवाह की तरह देखते हैं उन्हें यह शिकायत है कि क्रिटिकल एडिशन के संपादकों ने ऐसे प्रसंगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया जो भारतीय जनमानस में महाभारत की प्रसिद्धि और लोकप्रियता के आधारस्तंभ हैं।" इस संदर्भ में वह एस. एन. बालगंगाधर की बात रखती हैं, "इतिहास हमें 'तथ्य' देता है, अतीत हमें 'स्मृति' और 'मूल्य' देता है।" अपने निष्कर्ष में वह कहती हैं कि "आज हम जिस 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' का उदय देख रहे हैं, विडम्बना यह है कि वह भी उसी औपनिवेशिक जाल में फंसा हुआ है जिसका शिकार बंकिमचंद्र और सुकथांकर जैसे विद्वान हुए थे। एक तरफ आज का राजनीतिक विमर्श पश्चिम का विरोध करता है और भारतीयता की बात करता है, किन्तु दूसरी तरफ अपनी महानता सिद्ध करने के लिए वह पैमाना (standard) आज भी पश्चिम का ही उपयोग कर रहा है। जब आज का नैतृत्व या उसके बुद्धिजीवि यह दावा करते हैं कि 'महाभारत काल में इंटरनेट था' या 'वैदिक काम में हवाई जहाज थे' तो वह अनजाने में यह स्वीकार कर रहे होते हैं कि महान होने का एकमात्र अर्थ तकनीक और विज्ञान में आगे होना है, जो पूरी तरह से एक आधुनिक, पश्चिमी पैमाना है।" यह आलेख पढ़ कर बहुत सी बातें और प्रश्न मन में उठे और इसलिए यह बहुत अच्छा लगा। 

हिंदी कहानियाँ

विभिन्न पत्रिकाएँ पढ़ते हुए एक बात मेरे मन में आई कि अंग्रेजी, इतालवी, फ्रैंच आदि भाषाओं में विभिन्न श्रेणियों की कहानियाँ होती हैं - रोमांस, रहस्य, जासूसी, एडवैंचर, साईंस फिक्शन, फैतासी, डरावनी, आदि। भारत में भी अंग्रेजी के लेखन में अधिक विविधता है। लेकिन मुझे लगता है कि हिंदी कहानियों का संसार अधिकतर दुखों, संघर्ष, भेद-भाव, परिवार, जैसे दायरों आदि में ही घूमता रहता है, उसमें उतनी विविधता नहीं होती। यही बात मृणाल पाण्डे जी के एक साक्षात्कार में भी सुनी, जब उनसे पूछा गया कि उनकी कहानियाँ मध्यम वर्ग पर क्यों होती हैं, और गरीब, शोषित वर्ग के लोगों के बारे में क्यों नहीं होतीं? यानि लेखकों को गम्भीरता से तभी लिया जा सकता है अगर वह कुछ विशेष विषयों पर ही लिखें? पर ऐसा करना क्या हिंदी साहित्य को पिंजरों में बंद करना नहीं हो जायेगा?

हँस में ज्ञानचन्द बागड़ी की कहानी "धधकती ज़मीन" में मणिपुर की स्थिति की कहानी है जिसमें एक बाहर से आया प्रोफैसर आदित्य समझना चाहता है कि लड़ाईयाँ किसके बीच और क्यों हो रही है, लेकिन उनकी बातें स्थिति समझने में विशेष मदद नहीं करती। कहानी का भूगौलिक परिपेक्ष्य समझ में नहीं आता कि जिन गाँवों-जँगलों की बात हो रही है वे कहाँ हैं, न ही उसके पात्र किन जनजातियों के हैं, लड़ाई किसके बीच है, यह सब कुछ समझ नहीं आता। शायद यही वहाँ की सच्चाई है कि कुछ भी समझना कठिन है। एक जगह पर एक पात्र कहता है, कि शहर के लोग पहाड़ी लोगों की ज़मीन लेने के लिए यह कर रहे हैं। दूसरी जगह एक पात्र समझाता है कि विभिन्न जनजातियाँ हैं, राजनीति करने वाले हैं, उग्रवादी हैं, सेना वाले हैं, बाहरी ताकते हैं, सबका इस लड़ाई में हाथ है, सब अपने को सही समझते हैं और दूसरे को गलत। यह कहानी लड़ने वालों के धर्मों की बात नहीं करती। कहानी में घरों का जलना, लोगों का मरना, परिवारों का विस्थापित होना, आदि घटनाओं का दर्द महसूस होता है, लेकिन उसका क्या होगा या क्या करना चाहिये, इसकी झलक नहीं मिलती।

हँस में अनिशा मिंज की कहानी "फिर एक कोड़ा राजी" में एक चाय बागान में रहने वाली बुघनी नाम की बच्ची की कहानी है, जो स्कूल नहीं जाती क्योंकि उसकी शिक्षका कहती है कि वह हिंदी ठीक से नहीं जानती। बुघनी माँ के पीछे-पीछे चाय-बागान में जाती है, वहाँ काम में माँ की मदद करती है और लोगों से उनके अपने गाँव छोड कर चाय-बागानों में आने के इतिहास की बातें पूछती है। दिन समाप्त होता तो माँ को पगार अधिक मिलती है क्योंकि बुघनी की सहायता से उसने पत्तियाँ अधिक तोड़ी हैं। लेकिन रात को झोपड़ी में आग लगने से उसके माता-पिता मर जाते हैं, और कहानी का अंतिम भाग कलकत्ता में है जहाँ सोलह साल की बघनी एक घर में काम करती है, शोषित होती है और चायबगान के दिनों को याद करती है। कहानी की बनावट कमज़ोर है, लेकिन उसकी चायबागान की बोली और उनके गीत, यह दोनों बातें अच्छी लगीं।

हँस में विनोद कुमार की कहानी "वह राम नहीं था" में दो बेटियों की माँ आदिवासी परिवार की सुमारी है, जो एक "बाहरी" आदमी के साथ चली जाती है और कुछ महीनों बाद घर लौट आती है। मास्टर जी जो इस कहानी को सुना रहे हैं, इस बात को सुन कर उसकी तुलना रामायण के राम और गर्भवति सीता के वनवास से करते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि एक स्त्री-पुरुष के रिश्ते को केवल एक अच्छा या बुरा में बाँटना इतना आसान नहीं लगता, क्योंकि इसमें हम उनकी भावनाओं को अनदेखा कर रहे हैं। अपनी मर्जी से घर छोड़ कर नये साथी के साथ जाने के कुछ महीनों बाद पहले साथी के पास लौट आना, यह आदिवासी परिवार में हो या गैर-आदिवासी परिवार में हो, उसे केवल यौन-शुचिता की दृष्टि से तोलना, मुझे अधूरा सा लगता है। अगर दूसरे मर्द के साथ गयी स्त्री के घर वापस लौटने पर उसे स्वीकारना विकासशीलता का मापदंड है, तब दूसरी औरतों के साथ जाने वाले पुरुष के घर लौटने पर स्वीकारना क्या होगा? खैर इस कहानी ने इस विषय के बारे में सोचने का मौका दिया, इसलिए यह कहानी अच्छी लगी।

पाखी के अगस्त अंक में विद्याभूषण की कहानी "बनवारी बाबू का मकान" में उत्तर भारत के छोटे शहर के पारिवारिक रिश्तों की बातें हैं, जहाँ दो कमरों के घर में महीनों रहने वाले भाँजे-भतीजे ही नहीं, भाँजे के मित्र पेयिन्ग गैस्ट भी हैं, पैसा अधिक कमाने वाले बेटे का परिवार के निर्णयों पर अधिकार है, बेटी की शादी करने के लिए दान-दहेज क्या और कैसे तैयार किया जाये की बातें भी हैं, और सबसे बड़ी बात की मन-मुटाव हो या पुरानी यादों के साथ हँसना-हँसाना, जीवन नहीं रुकता, वह चलता रहता है। 

अकार में जीवेश प्रभाकर की कहानी "फ्री बर्डस" में धर्म और रिश्तों की नाजुकता की बात बहुत अच्छे तरीके से कही गयी है। रानी की माँ मुसलमान हैं और पिता हिंदू। समय के साथ उनके अपने परिवारों के साथ रिश्ते बदलते हैं लेकिन रानी के भाई की घर वालों द्वारा पक्की की हुई शादी में दिक्कत आती हैं क्योंकि लोग उनके परिवार के बारे में जान कर मना कर देते हैं। रानी के विवाह में भी मुश्किलें आयेंगी, इसलिए उसके मामा उसके लिए एक मुसलमान लड़के का रिश्ता लाते हैं लेकिन रानी का भी अपना एक रहस्य है जिसे उसने सबसे छुपाया है .. कहानी के अंत का सरप्राइज़ अच्छा है। कहानी में माँ और पिता के धर्मों की बात नहीं की है, कि क्या उनमें से किसी ने धर्म बदला था या नहीं, पर शायद उस बात को जोड़ने से कहानी की सरंचना थोड़ी जटिल बन जाती। 

सम्मुख में दो सौ शब्दों की कुछ लघु-कथाएँ पढ़ीं - कुछ कहानियाँ अच्छी लगीं जैसे कि बेजी जैसन की कहानी "भरम", अंजू शर्मा की "जीत", हरि मृदुल का "रोना", लकी राजीव की "अनायक", आदित्य शुक्ल की कहानी "पंख", और, आकांक्षा पारे काशिव की "न्यौता"। कुछ अन्य कहानियों में लगा कि उनका मूल विचार अच्छा था, लेकिन कथा-संरचना को थोड़ा और असरदार किया जा सकता था, जैसे कि , अनिर्बाण साधु का "रंग धनुष", देवेश पथ की "तुर्किश आइसक्रीम", उषा कुमारी की "वायरल विकास", और पल्लवी विनोद की "फोटोग्राफर"। खैर, अभी सभी लघु-कथाएँ नहीं पढ़ पाया हूँ।

कथाक्रम के सितम्बर 2026 अंक में गोविंद मिश्र की कहानी "काम ... मुझे भी" में वृद्ध सज्जन हैं जो अकेले रहते हैं पर बुढ़ापे के साथ तकलीफें बढ़ी हैं इसलिए किसी सहायक को खोज रहे हैं और एक एजैंसी से बात करते हैं। लेकिन शुरु में जितने युवक रखते हैं उनके साथ अनुभव अच्छा नहीं होता, जब एजैंसी वाला एक ऐसे युवक की बात करता है जिसका पारिवारिक इतिहास संदेहनीय है .. छोटी सी कहानी में कोई नाटकीय मोड़ नहीं हैं, बस विश्वास बनने की बात है। यह कहानी आज की दुनिया में अकेले वृद्धों की बढ़ती संख्या और नवयुवकों को नौकरी मिलने की दिक्कतें, इन दोनों समस्याओं को जोड़ती है।

संवेद पत्रिका के जनवरी 2026 अंक में दिव्या विजय की कहानी "कृष्ण पंखुरी" की कहानी सुरमा की है जिसकी बस्ती में सब लड़कियाँ घरों में बाथरूम साफ करने जाती हैं और सुरमा को एक मॉल के बाथरूम की सफाई की नौकरी मिलती है। आसपास सब काम करने वाली लड़कियों को ईर्श्या है कि सुरमा इतनी अच्छी जगह पर इज़्जतदार नौकरी करती है, लेकिन दिक्कत यह है कि जब मॉल में आने वाली लड़कियों की तरह, सफाईवाली के कपड़े-बाल छोड़ कर मॉल वाली लड़कियों के फैशन करने की कोशिश करती है तो उसके पास उनके क्रूर शब्दों से लड़ने के लिए साहस नहीं है, वह हार मान लेती है। पर, कुछ महीने बाद, उसे भी उनमें से एक युवती से बदला लेने का मौका मिलता है तो ... कहानी में अपने आत्मसम्मान के लिए लड़ने की कमज़ोरी का चित्रण अच्छा लगा।

तद्भव में मृत्युंजय कुमार सिंह की कहानी "जल्लाद उर्फ हैंगमैंन" में जेल के पुराने फांसी लगाने वाले बाबुल मसीह हैं, उनकी पत्नी बिल्किस है, उनका बेटा अब्दुल्ला है और जेल का कैदी तारक सकुल है। तारक ने लोगों की हत्या की है और जिस दिन तारक को फांसी लगने वाली है, उस दिन बाबुल मसीह उसे फांसी पर लटकाने वाली रस्सी को तैयार करते हुए उससे बातें करते हैं। छोटी सी कहानी में एक छोटी सी बात है, लेकिन मृत्युंजय जी की काबलियत है कि उस कहानी को ऐसे रचते हैं कि अंत तक बांधे रखती है।  

हिंदी कविता 

मुझे कविताएँ कम ही अच्छी लगती हैं, मैं अंग्रेज़ी और इतालवी में कविताएँ बिल्कुल नहीं पढ़ पाता, पढ़ूँ तो उनमें सौंदर्यबोध या भावबोध नहीं होता। हिंदी कविताओं में भी मुझे पुराने कवि ही अच्छे लगते हैं, नयी कविता मुझे प्रभावित नहीं करती। लेकिन आज के इस आलेख में दो आधुनिक कवि भी हैं - विनय सौरभ और दिनेश शुक्ल। 

अकार पत्रिका में  विनय सौरभ की कविताओं में छोटी-छोटी बातों में छिपी हुई लम्बी कहानियाँ हैं। "असंभावित के विरुद्ध" की कहानी में घर से भागी हुई एक लड़की है, और उसके सालों बाद अपने गाँव में लौटने की बात है। "माँ के शाल" में माँ और मौसी के सम्बंधों का रस है।

सौरभ जी की "अपने ही स्टेशन से गुज़रना" में छूटे हुए गाँव की यादों की बात है, उनकी कविताओं में मुझे यह कविता-कहानी सबसे अधिक अच्छी लगी - इसकी पहली पंक्तियाँ हैं, "एक रोज यात्री बन कर गुजरते हो/ अपने ही गाँव के स्टेशन से/ एक उदासी भीतर फैल जाती है अचानक/  खिड़की से बाहर तलाशते हो, कोई चेहरा दिख जाये परिचित/"।  उनकी एक अन्य कविता, "वे ही!" में अपने आप से प्रश्न हैं कि हम लोगों के सुख-दुख में, उनकी मृत्यु आदि पर क्यों नहीं हिस्सा ले पाते। इसकी कुछ पंक्तियाँ हैं - "यह ख्याल आता है अक्सर देर रात गये/ या आधी नीँद के बीच/ जैसे कोई पत्थर आज भी सीने में लुढ़कता रहता है/ आत्मग्लानी का भार लिए/"। 

ककसाड़ के अगस्त अंक में मुझे दिनेश शुक्ल की दो गज़लें पसंद आयीं। उनकी पहली गज़ल की यह पंक्तियाँ देखिये: "यह चादर वक्त की जर्जर हवा से थरथराती है/ गरीबी पर लगी तुरपाइयाँ रह-रह उधड़ती हैं/" और "दुखी सपनों के किस्से, रात की टूटी हुई नींदें/ सुबह परछाईयाँ इक सीढ़ियाँ चढ़ती उतरती हैं/"।

और उनकी दूसरी गज़ल की पहली पंक्तियाँ भी मुझे बहुत अच्छी लगीं: "किस्सा मत पूछिये, टूटी हुई थकानों का, इसके आगे है सफर, रेत के मकानों का।"

अंत में 

आज के इस आलेख के अंत में तद्भव से आकांक्षा बरनवाल के आलेख से कुछ अन्य पंक्तियां जो मुझे विचारनीय लगीं: "जिस प्रकार 19वीं सदी के सुधारकों ने 'पौरुषहीन (effeminate) कहलाने के डर से अपने धर्म को 'कठोर' और 'एकेश्वर वादी' बनाने का प्रयास किया था, वैसा ही आज की राजनीति इतिहास-2 (लोक परंपरा और मिथक) को जबरन इतिहास-1 (तथ्यात्मक इतिहास) बनाने पर तुली है। दीपेश चर्कवर्ती कहते हैं कि गाँधी ने इतिहास-2 (लोक परंपरा, मिथक और भावनाओं) की भाषा बोली। जब गांधी ने रामराज्य कहा तो उसका मतलब किसी ऐतिहासिक समय या राजा की वापसी नहीं बल्कि राज्य की ऐसी परिकल्पना देना था जिसे किसान भी समझता था। जब गांधी ने नमक उठाया या चरखा चलाया, तो वह कोई आर्थिक सिद्धांत देने से अधिक भारत की आत्मा को छूना चाहते थे। ... आज के नेता इतिहास-1 की भाषा बोलते हैं। यहां तक कि जब वे धर्म की बात भी करते हैं तो उसे 'वैज्ञानिक' सिद्ध करने में लगे रहते हैं ...लेकिन दोनों ही स्थितियों में वह पश्चिमी इतिहासबोध की ही नकल कर रहे हैं। यह सांस्कृतिक युद्ध तब तक शांत नहीं होगा जब तक हम गांधी की या जे. कृष्णमूर्ति की भांति उस हीन भावना से मुक्त नहीं हो जाते, जो हमें हर क्षण पश्चिम के समक्ष खुद को सही और ऐतिहासिक सिद्ध करने के लिए विवश करती है।" 

इस बार जो पढ़ा उसमें मुझे आकांक्षा बरनवाल के आलेख के अतिरिक्त हँस पत्रिका का आदिवासी जीवन और साहित्य पर केन्द्रित अंक सबसे अधिक रोचक लगा। 

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सोमवार, सितंबर 14, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अंतिम अध्याय

अब तक की कहानी: आभा की सहायता से त्री और ओरी घड़ियालों से बच कर डमरू द्वीप की उस गुफा में पहुँच गये जहाँ नीचे तहखाने में शक्तिवाहिनी सरस्वती की मूर्ति छिपी थी। मूर्ति को ले कर वह लौटे और ओरी जापान लौट गया। त्री वृद्धाश्रम गया तो अचानक मंदिर की घंटियाँ बजने लगीं, त्री बोला कि इसका मतलब है कि उसके गुरु जी की समाधी समाप्त हो गयी है।

अब आगे पढ़िये उपन्यास का अंतिम भाग

प्रारम्भ से पढ़िये - पिछला भाग पढ़िये 

 

अध्याय 31

अंतिम अध्याय 

गँगटोक, सिक्किम, 24 अप्रैल 2026

 

“गँगटोक की पहाड़ी हवा बहुत अच्छी है, लेकिन यहाँ की ऊपर-नीचे जाती हुई सड़कों पर चलना थोड़ा कठिन है", गुरु जी बोले। वह त्री के साथ अखाड़े में बैठे थे।

त्री हँसा, बोला, “गुरु जी, मैं आप को जानता हूँ। आप अभी भी कमज़ोर हैं, लेकिन मैं शर्त लगा कर कह सकता हूँ कि और एक महीने के अंदर आप बिना थके, यहाँ से देवराली बौद्ध-विहार तक का पूरा चक्कर लगा कर आयेंगे। बस आप हर रोज, सुबह-शाम सैर करना नहीं छोड़िये।”

गुरु जी भी मुस्कराये, बोले, “जब तुम छोटे थे तो मैं तुम्हें कहता था कि एक बार और कोशिश करो, मैं पक्का जानता हूँ कि तुम अगली बार इसे बेहतर करोगे। अब मैं बूढ़ा हूँ तो तुम मुझे वही सबक सिखाते हो।" 

थोड़ी देर के बाद जब आभा वहाँ चाय ले कर आयी तो देखा कि वह दोनों शतरंज खेल रहे हैं। कुर्सी पास खींच कर वह उनके करीब बैठ कर उनका खेल देखनी लगी।

त्री ने चाय पीते हुए उससे पूछा, “ओरी से बात हुई?”

आभा ने सिर हिला कर मना किया, बोली, “पिछले हफ्ते हुई थी। उसके बाद मैंने उसे मैसेज भी भेजे, लेकिन उसका उत्तर नहीं आया।"

गुरु जी बोले, “चिंता नहीं करो बेटी, कुछ ही दिनों की बात है, उसने कहा है कि वह यहाँ आयेगा, और वह अपने वचन का पक्का है, जो कहता है, उसे अवश्य करता है।”

त्री बोला, “गुरु जी, आप ने अच्छा प्लैन बनाया, एक तो हमें यामागुचि से छुट्टी मिल गयी, और साथ में आभा को ताकानोरी भी मिल गया।"

"क्या मतलब, कैसा प्लैन? मुझे भी बताओ”, वह बोली। मजूली से लौट कर वह मणिपुर में अपने गाँव चली गयी थी और कुछ दिन पहले ही उनके अनाथाश्रम में लौटी है।

“कई दशकों से यामागुचि के आदमी गुरु जी का पीछा कर रहे थे। करीब दस साल पहले जब मैंने यहाँ यह अनाथाश्रम खोला, तब मैंने गुरु जी से यहाँ आने के लिए बहुत कहा, लेकिन वह नहीं माने। वह डरते थे कि यामागुचि के आदमी उन्हें खोजते हुए यहाँ भी आ जायेंगे और उनकी वजह से हमारे अनाथाश्रम के बच्चों की जान को खतरा हो जायेगा", त्री ने बताया।

“माँ तारा की मेरी वह मूर्ति, जिसे मैं कोरिया से ले कर आया था और जिसे यामागुचि लेना चाहता था, दस साल पहले मैंने वह मूर्ति त्री को दे दी थी। तब से वह मूर्ति यहीं रखी है। हमने देखा था कि जब शक्ति वाले लोग साथ रहते हैं तो उनकी शक्ति बढ़ जाती है। यहाँ पर त्री ने उस मूर्ति के साथ कुछ नये प्रयोग किये जिससे हमें पता चला कि अगर हम बिना शक्ति वाले हरिताश्म पत्थरों को, माँ तारा की शक्तिवाहिनी मूर्ति के पास रखें तो उनमें शक्ति आ जाती है। वैसे ही हरिताश्म पत्थरों के आसपास अगर शक्ति वाले लोग रहें तब भी उन पत्थरों में भी शक्ति आ जाती है। लेकिन यह सभी हरिताश्म पत्थरों में नहीं होता। तब हमने उन पत्थरों की वैज्ञानिक जाँच करवायी, इससे पता चला कि हरिताश्म पत्थर कई तरह के होते हैं। कुछ पत्थरों के भीतर के क्रिस्टल ऐसे होते हैं कि उनमें शक्ति-लहरों के प्रभाव से शक्ति जमा होने लगती है। जैसे कि बैटरी में ऊर्जा भरते हैं, वैसे ही उनमें शक्ति भर जाती है", गुरु जी बोले।

त्री हँसा, बोला, “सबसे पहले इस बात को गार्गी ने पहचाना। एक दिन वह बोली कि हमारी नटराज की प्रतिमा में भी शक्ति महसूस होती है। हमने उस मूर्ति की जाँच की, तब समझे कि शक्ति पूरी मूर्ति में नहीं थी, केवल उसके हरिताश्म पत्थर के बने मोतियों में थी। दूसरी बात जो हम समझे, वह है कि अगर मूर्ति को शक्ति वाले लोगों का साथ नहीं मिले तो धीरे-धीरे उनकी शक्ति क्षीण हो जाती है। यानि यह शक्ति जल की तरह है, जब तक बहती रहती है, तभी तक जीवित रहती है। इसलिए हमने सोचा कि अगर यामागुचि उस मूर्ति के लिए इतना तरस रहा है, तो क्यों न हम उसे एक शक्ति वाली मूर्ति बना कर दें?"

गुरु जी बोले, "पहले मैं डरता था कि अगर यामागुचि को वह प्रतिमा मिल गयी तो वह शक्ति का गलत कामों के लिए उपयोग कर सकता है। लेकिन त्री बोला कि केवल मूर्ति से उसका कुछ नहीं होगा, उसे शक्ति वाले बच्चे भी खोजने हैं और उन्हें खोजना इतना आसान नहीं है। इस तरह से त्री ने यह सारा प्लैन बनाया।"

त्री बोला, “पहले मैंने सरस्वती की मूर्ति बनायी और उसमें हरिताश्म पत्थर के टुकड़े लगाये। उसे दिन में इस अखाड़े में रखते थे और रात को रंगनाथ, वसंत और माधव उसके पास सोते थे। करीब छह महीने पहले जब हमें लगा कि अब उस मूर्ति में शक्ति बहुत प्रबल हो गयी है तो हमने उसे डमरू द्वीप की गुफा में लगा दिया। फिर हमने गुरु जी के वीडियो बनाये और उन्हें फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, वगैरा पर चढ़ा दिया, और उनके साथ लिखा कि वह वीडियो एक कोरियन भिक्षुक के हैं। तब से हम प्रतीक्षा कर रहे थे कि यामागुचि के आदमी उसे देखें और वह किसी को गुरु जी को खोजने के लिए भेजे।"

"यानि, तुम दोनों ने यामागुचि को फसाने के लिए एक जाल फ़ैंका था, और उसने ताकानोरी को यहाँ भेज दिया। पर क्या गुरु जी की समाधी लेने में खतरा नहीं था?”, आभा ने पूछा।

त्री बोला, “मुझे मालूम है कि गुरु जी समाधी में एक महीने तक, कम अक्सीजन और खाने-पीने के बिना भी जीवित रह सकते हैं। लेकिन साथ ही हम लोग, विशेषकर गार्गी, दूर से ही गुरु जी के स्वास्थ्य पर नजर रखे हुए थे। मजूली के वृद्धाश्रम के पास वाले खण्डहर के नीचे जो गुरु जी का छुपा हुआ तहखाना है, वहाँ से गार्गी आसानी से गुरु जी की मानसिक लहरों को महसूस कर सकती थी। वह वहाँ से नियमित जाँच कर लेती थी कि गुरु जी की तबियत कैसी है।"

“यानि, मुझे छोड़ कर तुम सबको मालूम था कि यह एक ड्रामा है?”

त्री मुस्कराया, “यह पूरा ड्रामा नहीं था। हमने प्लैन बनाया था लेकिन उसकी हर चीज हमारे हाथ में नहीं थी। तुम्हारे अतिरिक्त, वसंत, माधव और तृप्ति को भी यह सब बातें पता नहीं थीं, तभी तो ताकानोरी जब तुम्हें पकड़ कर ले गया और उसने तुम्हारे दिमाग में देखा, फिर भी उसे कुछ पता नहीं चला। लेकिन काज़ीरंगा में हमारी गैंडों के तस्करों से टक्कर हो जायेगी, इस बात का हमें अंदाज़ा नहीं था, और न ही हमने सोचा था कि ताकानोरी एक गार्ड को बचाने के लिए एक तस्कर को मार देगा। हमें डमरू द्वीप पर इतने सारे घड़ियालों के इकट्ठा होने वाली बात का भी पता नहीं था। सौभाग्य से उस समय तुम हमारे साथ थीं, वरना हमारा सारा प्लैन बेकार हो जाता।"

“और डमरू द्वीप की उस गुफा में छिपी हुई सीढ़ियाँ और नीचे जाने का रास्ता, क्या वह भी तुमने बनाया था? क्या तुम सचमुच वहाँ पर नयी मूर्ति लगाओगे?”

त्री बोला, “वह गुफा सचमुच बहुत पुरानी है और उसमें बने भित्तिचित्र आदिमानव के समय के हैं, हज़ारों साल पुराने हैं। सदियों से हर साल वहाँ पर दूर-दूर से तीर्थयात्री आते हैं। हमने वहाँ दीवार पर एक खाली जगह पर केवल घड़ियाल और गँगा का चित्र बनाया था। वह सीढ़ियाँ और तालाब वहाँ पर पहले से थे, और उस तालाब में एक पुरानी सरस्वती की मूर्ति लगी थी, हमने उसकी जगह पर वहाँ एक नयी मूर्ति रख दी और उसके ऊपर खुलने-बंद होने वाला गुप्त दरवाज़ा लगा दिया। अब वह सारी जगह जैसे पहले थी, बिल्कुल वैसी ही हो गयी है, क्योंकि ऐसी जगहें हमारी एतिहासिक और साँस्कृतिक सम्पदा हैं, हम उनकी रक्षा करना चाहते हैं।"

गुरु जी बोले, “मेरी आशा है कि यामागुचि उस मूर्ति को पा कर खुश होगा और अब वह मुझे भूल जायेगा। इसलिए अब मैं यहाँ आया हूँ और त्री और बच्चों के बीच में रह सकता हूँ। त्री ही मेरा परिवार है और बुढ़ापे में, उसके और छोटे बच्चों के साथ रह पाना, मेरे लिए बहुत सुखदायक है। मेरी यही कामना है कि हम लोग शक्तिवान बच्चों की एक सैना बनायें, जिसके तिरंगा यौद्धा अपनी शक्ति से निर्बल, शोषित और असहाय लोगों को आत्मनिर्भर बनने में सहायता करें, प्रकृति और वातावरण की रक्षा करें और इस पृथ्वी को ऐसा बेहतर स्थान बनायें जहाँ मानव के साथ-साथ, सभी प्राणी भी फलें-फूलें।"

थोड़ी देर के बाद जब गुरु जी सैर करने गये तो त्री आभा को अपनी शिल्पशाला में ले कर गया, बोला, "देखो, यह मेरी नयी कलाकृति है, बताओ कैसी लगी?”

आभा ने देखा कि उसकी नयी कलाकृति, ताँबे की दोमुही मूर्ति है, जिसमें एक ओर शिव जी हैं और दूसरी ओर महात्मा बुद्ध, और दोनों योगमुद्रा में हैं। उसने पूछा, “शिव और बुद्ध, एक साथ, क्या यह कोई नया एक्सपैरिमैंट कर रहे हो?”

त्री बोला , “मैं शिव का भक्त हूँ और गुरु जी बुद्ध के, इसलिए मैंने सोचा कि उन दोनों को एक साथ बनाऊँ। अंत में परमेश्वर तो एक ही है, हम मानव उसे भिन्न रूपों में देखते हैं और उसकी पूजा के भिन्न रीति-रिवाज़ अपनाते हैं। वैसे भी हमारे भारत में धर्मों के बीच में दीवारें नहीं हैं, बल्कि वह नदी की धाराओं जैसे हैं, जो कभी मिलती हैं, कभी अलग हो जाती हैं और अंत में सभी एक ही सागर की ओर जाती हैं। गुरु जी के साथ रह कर धर्म के बारे में मुझे यही समझ में आया है। यह मूर्ति इसी भाव को अभिव्यक्त करती है। लेकिन इस मूर्ति में एक और बात है, इसमें शिव जी और महात्मा बुद्ध, दोनों की आँखें हरिताश्म पत्थर की बनी हैं।"

वह दोनों यही बातें कर रहे थे, जब तृप्ति भागती हुई आई, बाहर से ही चिल्ला कर बोली, “दीदी, तुम्हारे जापानी भैया आये हैं।" त्री ज़ोर से हँसा, बोला, “ताकानोरी आ गया? लेकिन वह तुम्हारी दीदी का भैया नहीं है, तुम्हारा भैया है।"

दो मिनट बाद, बच्ची के पीछे-पीछे ताकानोरी भी वहाँ आया और सबसे पहले उसने आभा को बाहों में जकड़ा और उसके गाल पर चूमा। यह सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि आभा उसे रोक नहीं पायी, न कुछ कह पायी। त्री मुस्कराया तो आभा का चेहरा शर्म से लाल हो गया।

जब ओरी ने देखा कि तृप्ति उन्हें बड़ी-बड़ी आँखों से देख रही थी, तो उसने उसकी ओर और फिर आभा की ओर हाथ जोड़ दिये, बोला, “सॉरी, तुम्हें देख कर … तुम इतने दिनों के बाद मिली हो, मुझसे रहा नहीं गया।"

वह सभी लोग हँसते हुए अनाथाश्रम को पार करके वहाँ लगे वृक्षों की ओर बढ़े। वहाँ एक लकड़ी की कुटिया बनी थी। ओरी ने पूछा, “यह कौन सी जगह है?”

त्री बोला , “तुम्हें एक और व्यक्ति से मिलवाना है, जिससे तुम अभी तक नहीं मिले।"

वह लोग जब कुटिया के पास पहुँचे, तभी दूसरी ओर से त्री ने गुरु जी को सैर से लौटते देखा। उसने ओरी से कहा, “वह देखो कौन है? आओ, मैं तुम्हें अपने गुरु जी से मिलवाऊँ।"

"कौन से गुरु जी?”

“जून-मिन गुरु जी, जिन्हें तुम खोजने आये थे।"

“लेकिन उन्होंने तो समाधी ले ली थी?” ओरी को विश्वास नहीं हुआ।

“समाधी ली तो थी, लेकिन जब उनका लक्ष्य पूरा हो गया तो वह मेरे पास लौट आये, क्योंकि वह मेरे पिता समान हैं। उनका शरीर अभी भी बहुत कमज़ोर है, लेकिन उनके मन की शक्ति, वह बिल्कुल कमजोर नहीं हुई है", त्री ने उसके कँधे पर हाथ रख कर कहा।

ओरी ने आगे बढ़ कर, तीन बार झुक कर गुरु जी का जापानी अभिवादन किया। बाद में आभा ने उसे मोबाइल पर गुरु जी के समाधी से बाहर निकलने का वीडियो दिखाया, तो वह बोला, “वीडियो में तो आप बहुत कमज़ोर दिखते हैं।"

गुरुजी  बोले, “यहाँ मैं तुम सब लोगों की शक्ति से घिरा हुआ हूँ, उसकी वजह से मुझे बहुत जल्दी स्वास्थ्य-लाभ हुआ है। तुम बताओ, तुम्हारे यामागुचि सान उस प्रतिमा से खुश हैं?”

ओरी ने लम्बी साँस ली, बोला, “हाँ वह मूर्ति से खुश हैं लेकिन कहते हैं कि अब शक्तिवाले बच्चों को कैसे खोजें? उन्होंने मुझे कहा कि इस अनाथाश्रम के कुछ बच्चों को उठा कर जापान लाते हैं, तो मैंने तुरंत मना कर दिया, कहा कि उसके लिए उन्हें पहले मुझसे लड़ना पड़ेगा क्योंकि अब मैं उन बच्चों का रक्षक बन कर यहाँ रहूँगा। वह यह भी कह रहे थे कि त्री से पूछना कि क्या वह उनके लिए काम करेगा? त्री, अगर तुम उनके याकूज़ा बनना चाहते हो तो उनसे सीधा सम्पर्क करो, क्योंकि मैंने उनकी नौकरी को त्याग दिया है।”

शाम को जब अँधेरा हुआ तो आभा और ताकानोरी घूमते हुए अखाड़े में गये और वहाँ एक चबूतरे पर बैठ गये। वह बोला, “यहाँ पर, इस अखाड़े में कितनी शाँति है और यहाँ ऐसा लगता है जैसे कि हम एक शक्ति-धारा में स्नान कर रहे हैं, भीतर आत्मा तक मुझे यहाँ पर शक्ति की ऊर्जा महसूस हो रही है।"

आभा बोली, “हर रोज़ यहाँ पर त्री बच्चों को शक्ति-जागरण का अभ्यास करवाता है, और गुरु जी उन्हें ध्यान करना और मन को एकाग्र करना सिखाते हैं। यहाँ के कण-कण में शक्ति है। तुम चाहो तो तुम भी उनके विद्यार्थी बन सकते हो।"

ओरी बोला, "उसके बारे में बाद में सोचेंगे, पहले मुझे एक और महत्वपूर्ण काम करना है।" वह उठा और उसके सामने एक घुटना मोड़ कर ज़मीन पर बैठ गया, उसके हाथ में एक अँगूठी थी, बोला, “तुमसे तीन महीने दूर रहा तो समझा हूँ कि मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता। क्या तुम मुझसे विवाह करोगी?”

आभा ने कनखियों से चबूतरे के पीछे दीवार में लगी माँ तारा की हरिताश्म प्रतिमा को देखा, मुस्करा कर बोली, “मैं भी यही सपना देख रही हूँ कि तुम मुझसे यह कहोगे। लेकिन अपनी अँगूठी देने में इतनी जल्दी नहीं करो।"

“क्यों?” ओरी के माथे पर बल पड़ गये, बोला, “तुम मुझसे विवाह नहीं करना चाहती?”

“क्या मैंने ऐसा कहा?”

“तो तुमने मेरी अँगूठी क्यों नहीं स्वीकार की?”

“क्योंकि मैं जल्दबाज़ी में कुछ नहीं करना चाहती। हम लोग कुछ दिन साथ रहे हैं, अभी हम एक दूसरे को ठीक से नहीं जानते। कुछ दिन साथ रहेंगे, एक दूसरे को जानेंगे, मैं तुम्हें अपने भैया से मिलवाऊँगी, और तुम्हें अपना गाँव दिखाने मणिपुर ले कर जाऊँगी, फिर आराम से यह निर्णय भी ले लेंगे।" 

*****
इति

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पाठकों से एक निवेदन

आप ने मेरे उपन्यास को पढ़ा, इसके लिए धन्यवाद। यह आप को कैसा लगा, कृपया इस बारे में अपनी राय नीचे एक टिप्पणी लिख कर मुझे अवश्य दें।

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धन्यवाद

 

गुरुवार, सितंबर 10, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 30

अब तक की कहानी: प्रतिमा की खोज में त्री, आभा और ओरी डमरू द्वीप पहुँचे जहाँ पर शक्तिवान प्रतिमा एक गुफा में छिपी थी। द्वीप पर उतरना कठिन था क्योंकि बहुत से घड़ियाल थे। तब आभा ने अपनी शक्ति से उन्हें वहाँ से हटाया और फिर, त्री और ओरी उस द्वीप पर उतरे। वहाँ उन्हें एक गुफा में सरस्वती मां की एक शक्तिवान मूर्ति मिली, उसे ले कर वह मोटरबोट में लौटे। आगे पढ़िये ...

प्रारम्भ से पढ़िये - पिछला भाग पढ़िये 

 

अध्याय 30

 मजूली, असम, 8 - 9 मार्च 2026

काज़ीरंगा से लौटते समय त्री ने ओरी से पूछा, “याकूज़ा का क्या काम होता है?”

“उनका सबसे बड़ा काम है लोगों को डराना और धमकाना, ताकि लोग चुपचाप अपना ऋण चुका दें, या प्रतिद्वंदी हमारे क्षेत्र में धँधा नहीं करें या दुश्मन हम पर हमला नहीं करें। इसलिए याकूज़ा का शरीर और भाव ऐसे होने चाहिये कि उन्हें देख कर ही लोग डर जायें। अगर डराने से काम नहीं चलता तो याकूज़ा को मार-पिटाई भी करनी पड़ती है, विशेषकर प्रतिद्वंदियों के गुँडों की। जब बॉस कहें तो याकूज़ा किसी को जान से भी मार सकते हैं।"

“लोगों का खून कर देते हैं? किसका?”

“किसी को भी मार सकते हैं, हमारा काम प्रश्न पूछना नहीं है, आदेश का पालन करना है। याकूज़ा, वह सही-गलत की बहस में नहीं पड़ते, जिसे मारने का आदेश मिले और जिस तरह से मारने का आदेश मिले, उसे वैसे ही मार देते हैं।"

“जिस तरह से मारने का आदेश मिले, इसका क्या मतलब है?”

“अगर किसी को चेतावनी देनी हो कि वह लोग हमसे डर कर रहें, तो हम खुले आम, लोगों के बीच में भी किसी का सिर काट सकते हैं। अगर किसी को केवल रास्ते से हटाना है तो उसे चुपचाप, दूर से गोली भी मार सकते हैं। कभी-कभी किसी को ऐसे मारते हैं कि वह एक्सीडैंट लगे। यह बॉस के आदेश पर निर्भर करता है।"

"औरतों और बच्चों को भी?”

ओरी ने सिर हिला कर मना किया, बोला, “मैं छोटे बच्चों को नहीं मारता और औरतों को मारने से पहले कारण पूछता हूँ, अगर ठीक नहीं लगे तो मना कर देता हूँ। वैसे मैंने अभी तक किसी औरत को नहीं मारा।"

“तुम इस रास्ते पर कैसे आये?”

“यामागुचि दादा जी, अक्को में हमारे पड़ोसी थे। वहाँ उनका परिवार जूएखाने चलाता था और उन्होंने बहुत पैसा बनाया था। मेरे पिता उनके लिए काम करते थे। जब वह गुज़र गये तो यामागुचि सान ने मेरी माँ को घर चलाने का पैसा दिया और मुझे स्कूल भेजा। जब मैं थोड़ा सा बड़ा हुआ तो उन्होंने मुझे अपनी छत्रछाया में ले लिया। उन्होंने मेरी शक्ति को पहचाना और मुझे याकूज़ा बनने की शिक्षा और प्रशिक्षण दिलवाया, उसके बाद मैं उनका याकूज़ा बन गया।"

“और अब, इस काम के बाद?”, त्री ने पूछा।

वह मुस्कराया, बोला, "यह मूर्ति उन्हें दे कर मैं उनका ऋृण चुका दूँगा। जैसे तुम्हारे गुरु जी कहते हैं, शायद शक्ति का उपयोग दुनिया के भले के लिए करना बेहतर है। अगर हो सकेगा तो मैं कुछ समय भारत में तुम लोगों के साथ बिताना चाहता हूँ। यह मूर्ति उन्हें दे कर, मैं तुम्हारे यहाँ लौट कर आऊँगा।"

उन्होंने मोटरबोट में ही खाना खाया, तब ओरी आभा के पास बैठा था, उससे बातें कर रहा था। गार्गी ने त्री से धीरे से कहा, “दादा, मेरे विचार में इन दोनों का मामला फिट हो गया है।"

“क्या आभा को भी वह अच्छा लगता है?” उसने पूछा तो गार्गी ने सिर हिला कर हामी भरी।  

बच्चों को मजूली उतार कर, त्री और आभा, ओरी को छोड़ने नारायणपुर गये। बच्चों से विदा लेते हुए ताकानोरी ने कहा, “एक दिन मैं तुम्हारे अनाथाश्रम में तुम लोगों के साथ रहने आऊँगा। तब मैं तुम्हें जूदो, आइकीदो, जिजुत्सु, वगैरा जापानी मार्शियल आर्टस् और लड़ाई करना सिखाऊँगा। अगर तुम सचमुच के योद्धा बनना चाहते हो तो केवल शक्ति से काम नहीं चलेगा, योद्धा को लड़ना भी आना चाहिये।

नारायणपुर में घर पहुँच कर, ओरी ने जापान में अपने बॉस को वीडियो-कॉल किया और उसे सरस्वती माँ की मूर्ति दिखायी, बताया कि उसने मूर्ति को जाँचा है और स्वयं उस मूर्ति की प्रबल शक्ति को महसूस किया है। बोला, “इस प्रतिमा के पास रहो तो मन में शाँति की अनुभूति होती है।"

जापान लौटने के लिए जब ओरी ने अपना सामान पैक कर लिया, तब तीनों ने साथ बैठ कर रात का खाना खाया। ओरी ने सबके लिए रामेन का सूप बनवाया, बोला, “अभी मेरे पास इन जापानी नूडल्स के बहुत सारे पैकेट बचे हुए हैं, मैं उन्हें तुम्हारे लिए छोड जाऊँगा।"

आभा बोली, “हम इसमें सब्जियाँ, मिर्ची, मसाला डाल कर इस रामेन को अपने तरीके से बनायेंगे और जब तुम लौट कर आओगे तब तुम्हें हिन्दुस्तानी रामेन खिलायेंगे।"

अगले दिन सुबह ताकानोरी को कलकत्ता के लिए रवाना होना है, जहाँ से उसे जापान के लिए हवाई जहाज़ मिलेगा।
*
ओरी से विदा ले कर, त्री और आभा को वृद्धाश्रम में लौटे हुए करीब आधा घंटा हुआ था और वे दोनों कैंटीन में बैठ कर जगदीश बाबू के साथ चाय पी रहे थे जब अचानक मन्दिर की घंटियाँ बजने लगीं। घंटियों की आवाज़ कैंटीन में भी स्पष्ट आ रही थी।

जगदीश बाबू घबरा कर उठ खड़े हुए, बोले, “ऐसी घंटियाँ की ध्वनि तो मैंने यहाँ पहले कभी नहीं सुनी थी, शायद कोई तूफान आ रहा है?”

त्री बोला, “जगदीश बाबू, मेरे विचार में यह घंटियाँ गुरु जी बजा रहे हैं और कह रहे हैं कि उनकी समाधी समाप्त हो गयी है।"
जगदीश बाबू को विश्वास नहीं हुआ, बोले, “इतने दिनों तक धरती में दबे रहने के बाद भी क्या जामुन बाबा जीवित हैं?”

वह तीनों उठ कर बाहर आये तो देखा कि वृद्धाश्रम के अन्य बहुत से लोग उनकी तरह वहाँ खड़े हो कर मंदिर की ओर देख रहे थे। वह तीनों मंदिर की ओर आगे बढ़े तो उनके पीछे-पीछे अन्य लोगों की भीड़ भी आ गयी।

त्री मंदिर वाली पहाड़ी की सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर गया। उसके पीछे-पीछे बाकी के सब लोग आ रहे थे। उसने हाथ उठा कर लोगों से रुकने का इशारा किया, फिर बोला, “गुरु जी जिस तपस्या के लिए समाधी में लीन हुए थे, उनकी वह तपस्या पूरी हुई है। यह घंटियाँ उनके प्रभाव से बज रही हैं, वह कह रहे हैं कि उनकी समाधी का समय समाप्त हो गया है, वह हमारे जगत में लौट रहे हैं। जगदीश बाबू, तुरंत उन मजदूरों को बुलाईये, जिन्होंने गुरु जी की समाधी बनायी थी।" उसके यह कहने के बाद मंदिर की घंटियाँ बजनी अपने आप थम गयीं।

जगदीश बाबू ने मजदूर बुलाने के लिए लोग भेजे, फिर बोले, “जब ताकानोरी ने इस समाधी को खुलवाने की कोशिश की थी तो वह इसे नहीं खोद पाये थे, तो अब यह मजदूर क्या इसे खोल पायेंगे?”

त्री हँसा, “जब गुरु जी कह रहे हैं कि उनकी समाधी पूर्ण हो गयी तो अब इसे खोदनें में कोई कठिनाई नहीं आयेगी।"

इस बार मजदूरों को समाधी का पत्थर हटाने में ज़रा सी भी दिक्कत नहीं हुई। समाधी का बक्सा करीब दस फुट मिट्टी के नीचे दबा था, वहाँ से उस मिट्टी को हटाने में करीब दो घंटे लगे। जब वह बक्से तक पहुँचे तो मैदान लोगों से भर चुका था और यह सुन कर कि बाबा की समाधी का बक्सा दिखने लगा है, उन लोगों ने "जामुन बाबा" का नाम जपना शुरु कर दिया।

आसपास की सारी मिट्टी हटाने और बक्से को बाहर निकालने में करीब आधा घंटा और लगा। उसके आगे-पीछे रस्सियाँ लपेट कर मजदूरों ने डिब्बे को ऊपर उठाया तो उत्तेजित हो कर सब लोग चिल्लाने लगे।

त्री ने आगे बढ़ कर बक्से के पाट खोले, भीतर उसके गुरु जी पद्मासन में आँखें बंद किये बैठे थे, उनकी गोद में उनकी भिक्षा का कटोरा था और उसमें तारा की मूर्ति थी। सारे मैदान में सन्नाटा छा गया। लोग हाथ जोड़ कर उस दृश्य को देख रहे थे। त्री ने झुक कर अपने गुरु जी के चरण छूए लेकिन गुरु जी बहुत देर तक वैसे ही बिना हिले-डुले बैठे रहे।

फिर उनकी पलकें थरथराईं और उन्होंने धीरे-धीरे आँखें खोलीं, सारे मैदान में "जय जामुन बाबा" की ध्वनि गूँज उठी, लोग तालियाँ बजाने लगे, कुछ लोग भावविभूत हो कर रोने लगे। गुरु जी कुछ देर तक चुपचाप सबको देखते रहे फिर उन्होंने बक्से के बाहर टाँगें निकाली और बाहर निकल आये, त्री ने उन्हें खड़े होने के लिए सहारा दिया।

आभा और जगदीश बाबू, दोनों ने झुक कर उनके पैर छूए। वह पहले भी दुबले-पतले थे, लेकिन अब वह इतने कमज़ोर हो गये थे कि उनके शरीर की सभी हड्डियाँ दिख रही थीं, लगता था कि हड्डियों और चमड़ी के बीच में माँसपेशियाँ बिल्कल ही नहीं हों।    

गुरु जी चुपचाप बिना किसी सहारे के मंदिर की ओर बढ़े, हाथ उठा कर उन्होंने बाहर वाला घंटा बजाया, फिर मंदिर की ओर नमन किया और हाथ ऊपर उठा कर मैदान में खड़े लोगों का अभिवादन किया। फिर वह त्री की ओर मुड़े, बोले, “बेटा, मैं थक गया हूँ, मुझे घर ले चलो।"

एक हाथ त्री के कँधे पर और दूसरा आभा के कंधे पर रख कर, वह धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरे और लोगों की भीड़ के बीच में अपने घर की ओर चले। जिस जगह वह पैर रख रहे थे, बहुत से लोग उस जगह से मिट्टी ले कर उसे अपने माथे पर लगा रहे थे।

घर के प्रांगण में बच्चे उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। रंगनाथ, गार्गी, वसंत, माधव और तृप्ति ने उन्हें प्रणाम किया और उन्होंने सबके सिर पर प्यार से हाथ रख कर सहलाया। जब तृप्ति की बारी आयी तो वह धीरे से बोले, “तुमने कितनी ज़ोर से घंटियाँ बजायीं, ज़मीन के नीचे से भी मुझे उनकी गूँज सुनाई दे रही थी।" तृप्ति खुश हो कर मुस्करायी।

गुरु जी ने कुछ फलाहार किया और थोड़ा सा दूध पिया, फिर उन्होंने जगदीश बाबू को पास बुलाया, बोले, “अब यहाँ पर मेरा काम समाप्त हो गया है। प्रभु ने मुझे अपना बाकी का जीवन, प्रार्थना में बिताने की आज्ञा दी है। कुछ दिनों में मैं यहाँ से चला जाऊँगा। अब यह वृद्धाश्रम आप को और यहाँ के रहने वाले लोगों को ही चलाना होगा।”

जगदीश बाबू रोने लगे, बोले, “बाबा, आप ने इस आश्रम को जन्म दिया है, आप की कृपा से मेरे जैसे लोगों को, जिनके परिवार नहीं हैं या जिन्हें उनके बच्चे अकेला छोड कर चले गये हैं, हमें गरिमा से जीने का मौका दिया है। आप के बिना हम इसकी ज़िम्मेदारी कैसे उठायेंगे?”

गुरुजी मुस्कराये, बोले, “जब मैंने समाधी ली थी, तब नहीं जानता था कि इस समाधी से लौटूँगा या नहीं। तब आप ने मेरा निर्णय स्वीकार किया था और वृद्धाश्रम को चलाने की ज़िम्मेदारी ली थी, तो अब क्या हो गया? हम वृद्ध अवश्य हैं, लेकिन निस्सहाय नहीं हैं, और दुनिया का कोई काम ऐसा नहीं है जिसे हम लोग नहीं कर सकते। क्या आप इस बात को भूल गये हैं? आप के साथ आप का सहकारी संघ है, आप के साथी हैं, मुझे पूरा विश्वास है कि आप के नेतृत्व में यह वृद्धाश्रम और भी समृद्ध तथा विकसित होगा।"

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सोमवार, सितंबर 07, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 29

अब तक की कहानी: प्रतिमा की खोज में त्री, आभा और ओरी डमरू द्वीप पहुँचे जहाँ पर शक्तिवान प्रतिमा एक गुफा में छिपी थी। द्वीप पर उतरना कठिन था क्योंकि बहुत से घड़ियाल थे। तब त्री ने आभा को  दिखाया, कि कैसे वह घड़ियालों से सम्पर्क करके उन्हें वहाँ से जाने के लिए कह सकती थी। जब आभा वह करना सीख गयी तो त्री और ओरी डमरू द्वीप पर उतरने के लिए तैयार हो गये। आगे पढ़िये ...

प्रारम्भ से पढ़िये - पिछला भाग पढ़िये 

 

अध्याय 29

 डमरू द्वीप, काज़ीरंगा, असम, 8 मार्च 2026

जब वह दोनों नाव से उतरे, उस समय तट के उस हिस्से में एक भी घड़ियाल नहीं था, सभी दूसरी ओर चले गये थे, लेकिन ओरी फिर भी घबरा रहा था, उसने हाथ में अपनी तलवार पकड़ी हुई थी।

त्री ने उसका हाथ पकड़ लिया और रेत पर भागते हुए, उसे साथ खींचता हुआ तेज़ी से पहाड़ी की ओर बढ़ा। पहाड़ी के बीच-बीच में कुछ काली नुकीली चट्टानें निकल रही थीं, उन पर पैर टिका कर वह दोनों तेज़ी से ऊपर चढ़ गये। वहाँ पहुँच कर देखा कि ऊपर कोई घड़ियाल नहीं थे, तो त्री ने मुड़ कर मोटरबोट की ओर हाथ हिला कर इशारा किया, और उन्हेंं वहाँ से जाने के लिए कहा।

घड़ियालों से बच कर निकल आने से ओरी भी खुश हो गया, बोला, “आभा की शक्ति तो बहुत काम की है।"

त्री ने अपनी जेब से वसंत का बनाया नक्शा निकाला जिस पर गुफाएँ बनी हुई थीं और उसे ओरी को दिखाया, बोला, “इस समय, यहाँ पर हम लोग डमरू के बीच के संकरे हिस्से में हैं, जबकि यह गुफाएँ द्वीप के उत्तरी और दक्षिणी किनारों की ओर हैं। हमें चुनना है कि हम उत्तर से शुरु करें या दक्षिण से, तुम क्या कहते हो, हम किस ओर जायें?”

ओरी बोला, “अगर मुझे गुफाओं को नम्बर देना हो तो मैं बायें से, यानि दक्षिण से शुरु करूँगा। इसलिए हमें बायें जा कर, वहाँ से गिन कर, चौदही गुफा को खोजना चाहिये। अगर उसमें मूर्ति नहीं मिलेगी, तो हम उत्तर से शुरु करके चौदहवीं गुफा को खोज सकते हैं।"

त्री कुछ नहीं बोला, तुरंत बायीं दिशा में चल पड़ा। ओरी उसके पीछे-पीछे आया, बोला, “क्या यह सब ब्रह्मपुत्र नदी के द्वीप हैं? यह नदी तो बहुत बड़ी लगती है, इसका पाट कई किलोमीटर चौड़ा लगता है।”

“हाँ, यहाँ पर नदी का पाट छह-सात किलोमीटर चौड़ा है और यह नदी धाराओं में बँट कर बह रही है, इसलिए धाराओं के बीच में इसमें बहुत से द्वीप हैं", त्री ने बताया, “लेकिन जब बारिश का मौसम आता है, तब नदी के पानी का स्तर बढ़ जाता है और छोटे वाले सारे द्वीप पानी में पूरे डूब जाते हैं। केवल यह बड़े द्वीप, जहाँ पहाड़ियाँ है, चट्टाने हैं, यह पूरे नहीं डूबते और तब इस डमरू द्वीप पर उतरना कठिन हो जाता होगा।"

पंद्रह-बीस मिनट तक चल कर जब वह गुफाओं वाले हिस्से में पहुँचे तो देखा कि वहाँ की चट्टानें सफेद, सलेटी और मटमैले से हरे रंग के पत्थर की थीं, और वह पहले वाली काली चट्टानों की तरह नुकीली भी नहीं थीं। सदियों की सीली हवा और पानी की वजह से घिसते-घिसते उन चट्टानों का नुकीलापन खत्म हो गया था। वहाँ ऊँची-नीची पहाड़ियाँ थीं, जिनके बीच में गुफाएँ दिख रही थीं। गुफाओं के बीच में पगडँडियाँ दिख रही थीं।

त्री ने इशारा किया और बोला, “इन पगडँडियों को देखो, इनका मतलब है कि यहाँ पर श्रद्धालु आते हैं। शायद वह घड़ियाल यहाँ सारा साल नहीं रहते, केवल अँडे देने के समय आते हैं और फिर चले जाते हैं। क्योंकि अगर वह घड़ियाल यहाँ सारा साल रहते हों तो तीर्थयात्री यहाँ नहीं आ सकते।"

ओरी बोला, “मैंने गिना है, उधर तीन गुफाए हैं, यह सामने वाली चौथी गुफा है। ऐसे गिन कर हमें चौदह नम्बर की गुफा को पहले देखना चाहिये। मैंने अन्वेषण-किरण से देखा है, उस ओर से मुझे शक्ति का एक प्रबल स्रोत दिख रहा है। इसका मतलब है कि हम सही जगह पर आये हैं।"

त्री को पीछे छोड़ कर, अब ओरी तेज़ी से आगे बढ़ा, वह उस मूर्ति को देखने के लिए बेचैन था। जब उसे चौदहवीं गुफा दिखी तो सीधा उसमें घुस गया। उस गुफा का रास्ता कुछ नीचे जा कर था और उसका द्वार थोड़ा छोटा था, उसमें घुसने के लिए उसे नीचे झुकना पड़ा। भीतर पहुँचा तो देखा कि गुफा का कक्ष बहुत बड़ा है और उसकी छत में एक छेद है जहाँ से भीतर सूरज की रोशनी आ रही है। गुफा की खुरदरी दीवारों पर कत्थई खड़िया मिट्टी और सफेद चूने से आदिमानवों के बनाये चित्र दिख रहे थे, जिनमें विभिन्न पशु-पक्षी और उनका शिकार करते हुए मानव दिख रहे थे।

जब त्री वहाँ पहुँचा तो देखा कि ओरी एक खाली गुफा में खड़ा है, वहाँ कोई मूर्ति नहीं दिख रही थी।

ओरी बोला, “इस गुफा की धरती के भीतर एक शक्ति-स्रोत छुपा हुआ है, मैं उसे महसूस कर सकता हूँ, लेकिन मैं समझ नहीं पाया कि उसका रास्ता कहाँ से है।"

त्री हँसा, बोला, “तुम वह कविता भूल गये? उसमें गुरु जी पूछते हैं कि त्रिनेत्र कहाँ है? इसका मतलब है कि मेरे बिना तुम्हें वह मूर्ति नहीं मिलेगी।"

वह घूम कर गुफा की दीवारों को देखने लगा, बोला, “देखो, क्या कहीं पर शिव जी का कोई चिन्ह दिख रहा है? गुरु जी जब त्रिनेत्र के बारे में पूछ रहे हैं, इसका मतलब है कि हमें इस गुफा में शिव जी के किसी चिन्ह को खोजना है।”

ओरी को पता नहीं था कि शिव जी कौन से चिन्ह होते हैं, उसे त्री की बात समझ में नहीं आई, तो त्री बोला, “त्रिशूल, डमरू या नाग देवता या चंद्रमा, यह सभी शिव जी के चिन्ह हैं, क्या गुफा की दीवारों पर इनमें से कुछ दिख रहा है?”
दोनों गुफा में घूम-घूम कर चित्रों को देखने लगे, तब ओरी बोला, “देखो, इधर एक घड़ियाल बना है।"

त्री वहाँ गया तो देखा कि वहाँ घड़ियाल के ऊपर लम्बे बालों वाली एक युवती की आकृति बनी है, बोला, “हाँ, यही है शिव जी का चिन्ह, गंगा माँ और उनका वाहन घड़ियाल। गंगा माँ भी शिव जी की जटाओं में ही रहती हैं।"

उसने पास जा कर गंगा की आकृति पर हाथ के सामने हाथ फिराया तो पीछे से सर्र-सर्र की आवाज़ आयी और गुफा के बीचों-बीच, ज़मीन में एक रास्ता खुल गया।  वहाँ से नीचे जाती हुई बारह सीढ़ियाँ दिख रही थीं और अंत में एक छोटा सा गोल तालाब बना था, जिसके बीच में सफेद पत्थर की, हँस पर बैठी हुई, वीणावादिनी सरस्वती की मूर्ति लगी थी। ओरी ने महसूस किया कि उस मूर्ति से शक्ति का प्रचंड स्पंदन निकल रहा था, वह तुरंत सीढ़ियाँ उतर कर नीचे गया।

त्री थोड़ी देर तक ऊपर ही खड़ा रहा, फिर धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतर कर नीचे पहुँचा तो देखा कि ओरी सरस्वती प्रतिमा के सामने हाथ जोड़े हुए, आँखें बंद करके खड़ा है। वह भी उसके पास जा कर हाथ जोड कर खड़ा हो गया।

कुछ देर के बाद जब त्री ने आँखें खोलीं तो देखा कि ओरी की आँखों से आँसू बह रहे हैं। वह कुछ नहीं बोला।

ओरी  उसी जगह पर घुटनों के बल बैठ गया, धीरे से बोला, “इस शक्ति में स्नान करना मेरे लिए अभूतपूर्व अनुभव है। मुझे लगता है कि शक्ति की लहरें मेरे भीतर, मेरे तन और मन के सभी घावों को भर कर मुझे शांति दे रही हैं। इस पवित्र मूर्ति को क्या यहाँ से ले जाना उचित होगा?”

त्री बोला, “मैंने तुम्हें बताया था न कि यह मूर्ति गुरु जी ने पाँच साल पहले बनवायी थी। माँ तारा की हरिताश्म मूर्ति इससे बहुत छोटी थी, उसके अधिकतर टुकड़े इस प्रतिमा में लगे हैं, जैसे कि उनके माथे की बिन्दी में, उनके गले के हार में और उनकी करधनी के मोतियों में। तुम इसे लेने आये हो, ले जाओ, मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि कुछ महीनों में इस जगह पर मैं अपने हाथों से माँ सरस्वती की ऐसी ही एक नयी मूर्ति बना कर लगाऊँगा ताकि श्रद्धालुओं की पूजा में बाधा नहीं आये।"

ओरी चुपचाप मूर्ति को देखता रहा।

त्री बोला, “अब मुझे गुरु जी की कविता की वह पंक्ति समझ में आयी जिसमें वह सती के पर्वतराज के यहाँ लौटने की बात करते हैं। सती यानि पार्वती, वह हिमालय पर्वत की बेटी और शिव की पत्नि थीं और अपने पिता के घर यज्ञ के लिए लौटी थीं। शायद गुरु जी कहना चाहते हैं कि उसी तरह से माँ सरस्वती भी प्रकृति का हिस्सा बन कर यहाँ पर लौटी हैं।"

ओरी बोला, “मैं इस मूर्ति को यहाँ से नहीं ले जा सकता, मैं इसे नहीं तोड सकता। मुझे लगता है कि इस पवित्र जगह से इस मूर्ति को हटाना पाप होगा।"

त्री मुस्कराया, बोला, “तुम्हें कुछ तोड़ना नहीं पड़ेगा। मैं अपने गुरु जी को जानता हूँ। अगर वह नहीं चाहते कि तुम इस प्रतिमा को यहाँ से ले कर जाओ, तो वह उस कविता को लिख कर नहीं जाते। उन्होंने ही हमें यहाँ पर आने का रास्ता दिखाया है, तुम संकोच मत करो। इस प्रतिमा को उठा कर देखो, यह आसानी से उठ जायेगी, तुम्हें कुछ तोड़-फोड़ करने की आवश्यकता ही नहीं होगी।"

जब उसने देखा कि ओरी वहाँ पर निश्चल खड़ा है, आगे नहीं बढ़ रहा, तो त्री उस तालाब में घुसा। उसका पानी गहरा नहीं था। पानी के बीच में जा कर उसने माँ के चरणों में सिर झुका कर प्रणाम किया, फिर उसे दोनों हाथों में उठा कर अपने सिर पर रख लिया। वह प्रतिमा पत्थर के चबूतरे पर रखी हुई थी, उससे जुड़ी हुई नहीं थी, इसलिए आसानी से उठायी गयी। वह भीतर से खोखली थी, इसलिए भारी नहीं थी और उसे उठाना आसान था।

तालाब से निकल कर त्री सीढ़ियाँ चढ़ने लगा, लेकिन ओरी अपनी जगह से नहीं हिला, वह मूर्ति की खाली जगह को देख रहा था और उसके आँसू नहीं रुक रहे थे।

त्री ने उसे कहा, “तुम अपनी आँखें बंद करके, उस मूर्ति के स्थान को अपने मन की दृष्टि से देखो, तुम्हें उस खाली जगह पर एक ज्योति की लौ दिखेगी।" वह ऊपर आया और मूर्ति के साथ ज़मीन पर बैठ गया, बोला, “मैं सोचता था कि इन पाँच साल में, इसकी शक्ति हम सबसे दूर रह कर कमज़ोर हो गयी होगी, लेकिन यह तो अब भी बहुत प्रबल है। इसे छूने में एक अजीब से अनुभूति होती है, लगता है कि जैसे शक्ति की धारा मेरे भीतर बह रही हो।"

ओरी कुछ देर तक तालाब के पास आँखें बंद करके बैठा रहा। जैसा कि त्री ने कहा था, आँखें बंद करके उसे मूर्ति की जगह पर एक ज्योति-पुंज दिख रहा था।

जब वह ऊपर आया तो उसने देखा कि छत के छेद से आने वाली सूर्य की किरणें सीधा मूर्ति पर पड़ रही थी और उसके साथ ज़मीन पर बैठा, मुस्कराता हुआ त्री भी उसी रोशनी में प्रज्जवलित हो रहा था।

ताकानोरी उसे देखता रह गया, फिर धीरे से बोला, “यह एक दिव्य प्रतिमा है और यामागुचि बड़ा गुँडा है। उसके जूआघर हैं, वह युवतियों को वैश्या बनवा कर उनसे धँधा करवाता है, और नवजवानों को नशा बेचता है, इस दिव्य प्रतिमा को उसके पास ले कर जाना क्या सही होगा?”

त्री बोला, “मेरे गुरु जी कहते हैं कि हर बात में हमें मैं, मेरा, मुझे, वगैरा नहीं सोचना चाहिये। हमें याद रखना चाहिये कि हम केवल निमित्त हैं, हमारे पीछे इच्छा माँ तारा, बौद्धिसत्व और माँ सरस्वती की है। शायद वह तुम्हारे यामागुचि सान के जीवन की दिशा बदलना चाहते हैं, इसीलिए गुरु जी चाहते हैं कि तुम यह प्रतिमा उनके पास ले कर जाओ।”

ओरी ने आगे बढ़ कर प्रतिमा को छुआ, बोला, “मैं मां के सिर की कसम खाता हूँ कि इसके बाद मैं यामागुचि के याकूज़ा के जीवन को त्याग दूँगा। इस मूर्ति को उनके पास ले जा कर, मेरा और उनका रिश्ता समाप्त हो जायेगा।"

त्री उठ कर खड़ा हुआ, उसने प्रतिमा को उठाया और उसे ताकानोरी को दिया, बोला, “डरो नहीं, इसे हाथ में ले कर देखो। सौभाग्य से नियति ने तुम्हें यह मौका दिया है कि तुम इसकी शक्ति को अपने तन-मन और अंतरात्मा में महसूस करो, इस मौके को व्यर्थ मत जाने दो। चलो, अब हम वापस चलें।"

फिर वह गुफा की दीवार पर बने गँगा माँ और घड़ियाल के चित्र की ओर गया और उसके सामने हाथ फेरा, तो सर्र-सर्र की आवाज़ से ज़मीन में खुला रास्ता फिर से बंद हो गया।

वह दोनों गुफा से बाहर निकले और मोटरबोट की ओर चल पड़े। उन्हें वहाँ पर आये हुए करीब एक घंटा हुआ था लेकिन उन्हें लग रहा था मानो वह वहाँ पर बहुत समय से हों। ओरी ने मूर्ति को अपनी छाती से लगाया हुआ था।

जब वह द्वीप के घड़ियालों वाले तट के पास पहुँचे तो त्री ने पहाड़ी से हाथ हिला कर आभा को इशारा किया, क्योंकि वह रास्ता फिर से घड़ियालों से भर गया था। आभा ने ध्यान लगाया तो थोड़ी देर में ही घड़ियाल उनका रास्ता छोड कर एक ओर चले गये।

मोटरबोट की ओर जाते हुए त्री बोला, “थोड़े से अभ्यास से ही, आभा उन घड़ियालों से सम्पर्क बनाने में कुशल हो गयी है। अब उसकी शक्ति का विकास और भी आसान हो जायेगा।"

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गुरुवार, सितंबर 03, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 28

अब तक की कहानी: प्रतिमा की खोज में त्री और ओरी लखमीपारा गाँव के पास शंखासुर की पहाड़ी देखने जा रहे थे, तब रास्ते में उनका सामना कुछ गैंडों के सींग चुराने वाले तस्करों से हो गया, जो एक फॉरैस्ट गार्ड को मार रहे थे। ओरी उस गार्ड को बचाने के लिए गया और तस्करों से लड़ने लगा। लड़ाई में एक तस्कर की मृत्यु हो गयी, त्री और ओरी वहाँ से भागे। वसंत ने पेड़ों से बात करके बताया कि शंखासुर पहाड़ी के क्षेत्र में कोई गुफाएँ नहीं हैं। गार्गी ने कहा कि उसके अनुसार वह गलत दिशा में खोज रहे थे और उन्हें डमरू द्वीप दिखाया, जहाँ बहुत सी गुफाएँ थीं। आगे पढ़िये ...

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अध्याय 28

 डमरू द्वीप, काज़ीरंगा, असम, 8 मार्च 2026

 गार्गी ने कविता के शब्द दोहराये:

"चन्द्र-वधु के चरण-कमल, तीन दशानन कोसे 
पद्मा की कमल-अँजुरी से बहता जल 
विष्णु के शंख नाद से प्रज्जवलित अंबर के सप्त ऋषि 
कंदरा में गूँजती चौदह ध्वनियाँ पिनाक की
लौटी सति पर्वतराज पिता के घर, त्रिनेत्र कहाँ है?
वहाँ जहाँ पर लाल बकरियाँ घास चरें।"

फिर बोली, "मेरे विचार में हमने कविता की पहली और अंतिम पंक्तियाँ सही समझी हैं, यानि कि हम काज़ीरंगा की बात कर रहे हैं। लेकिन 'पद्मा की कमल अँजुरी' का अर्थ लखमीपारा नहीं है, बल्कि लखमी चापोड़ी द्वीप है। इस नक्शे में देखो, उसके नीचे इस छोटे द्वीप की आकृति क्या शंख से नहीं मिलती? और जहाँ पर शंख की नोक है, ठीक उसके नीचे वाले द्वीप की आकृति आधे डमरू जैसी नहीं है?”

त्री ने टैबलेट ली, देखा और हँसा, बोला, “शाबाश गार्गी, शायद तुमने गुरु जी की पहेली को सही पहचाना है।"

ओरी बोला, “मुझे भी दिखाओ।"

गार्गी काज़ीरंगा आरक्षित क्षेत्र के पास ब्रह्मपुत्र नदी के द्वीपों की बात कर रही थी। उसने वसंत से कहा, “यह डमरू वाला द्वीप यहाँ से दक्षिण दिशा में है, तुम उस द्वीप के पेड़ों से पूछो कि वहाँ कोई गुफाएँ हैं या नहीं?”

वसंत ने आँखें बंद करके ध्यान लगाया, और कुछ क्षणों के बाद आँखें खोल कर बोला, “वहाँ पर बहुत सारी गुफाएँ हैं।"

ओरी उत्साहित हो कर बोला, “वह जगह यहाँ से बहुत दूर नहीं है, चलो हम अभी, इसी समय वहाँ चलते हैं।"

त्री ने एक मिनट के लिए सोचा, फिर बोला, “सबको वहाँ ले जाने की आवश्यकता नहीं है, मैं एक दूसरी मोटर बोट का प्रबंध करता हूँ, केवल मैं और ओरी ही वहाँ जायेंगे। अगर चाहे तो आभा हमारे साथ आ सकती है। "

गार्गी ने पूछा , “क्यों दादा? हम तुम्हारे साथ क्यों नहीं आ सकते?”

त्री बोला, “तुम सभी बच्चे मेरी ज़िम्मेदारी हो। कल जो हादसा हुआ, उसके बारे में तो तुमने सुना है। कब, कहाँ पर, कुछ अप्रत्याशित हो जाये, कुछ पता नहीं चलता। बेकार खतरा लेने से क्या फायदा? वैसे भी तुम मेरी चेतना से जुड़ कर मेरे साथ सब कुछ देख सकती हो, क्या वह काफी नहीं है?”

यह बात सुन कर बच्चे चुप हो गये, पर आभा बोली कि वह उनके साथ जायेगी। त्री ने घाट से एक अन्य मोटर बोट का प्रबंध किया और तीनों उस पर डमरू द्वीप की ओर निकल पड़े।

मोटर बोट वाले ने उसे कहा, “बाबू जी, वहाँ पर बहुत से घड़ियाल होंगे क्योंकि आजकल उनका मौसम चल रहा है। मैं वहाँ पर आप को उतार दूँगा लेकिन नाव को वहाँ रोक कर आप की प्रतीक्षा नहीं करूँगा, कहीं दूसरी जगह जहाँ घड़ियाल न हों, वहाँ रुकूँगा। जब आप लोगों का लौटने का समय हो तो मुझे फोन कर देना, मैं पंद्रह-बीस मिनट में आप को लेने पहुँच जाऊँगा।"

ओरी उनकी बात सुन रहा था, उसने त्री से पूछा, “यह किस जानवर की बात कर रहा है?”

त्री को मालूम नहीं था कि घड़ियाल को अंग्रेज़ी में क्या कहते हैं, बोला, “यह मगरमच्छ की एक प्रजाती है जो भारत की नदियों में मिलती है। मगरमच्छ के सिर का आगे वाला हिस्सा चपटा सा होता है, जबकि घड़ियाल के सिर का आगे वाला हिस्सा बहुत लम्बा और संकरा होता है, और उनकी नाक पर गेंद जैसा फूला हुआ एक गोल हिस्सा होता है जिसे हम लोग घड़ा कहते हैं और उसकी वजह से उन्हें घड़ियाल बुलाते हैं।"

मगरमच्छों की बात सुन कर ताकानोरी थोड़ा सा घबराया।

डमरू द्वीप तक पहुँचने में उन्हें करीब आधा घंटा लगा और वहाँ पहुँचने से पहले, दूर से ही उन्हें घड़ियालों की आवाज़ें सुनाई देने लगीं। उनके फूले हुए नाक के घड़ों से 'घूँ-घूँ' की आवाज़ आ रही थी मानो वह खुर्राटे ले रहे हों। पास जा कर देखा तो द्वीप के रेतीले किनारे पर कम से कम पचास घड़ियाल धूप में घूँ-घूँ करते हुए आगे-पीछे घूम रहे थे।

मोटर-बोट वाला बोला, “मादा को आकर्षित करने के लिए यह आवाज़ नर-घड़ियाल करते हैं। बोलिये आप को कहाँ पर उतारूँ?”

त्री ने ओरी और आभा की ओर देखा। ओरी का चेहरा फीका पड़ गया था।

आभा बोली, “मैं इन जानवरों के बीच में नहीं जाना चाहती, तुम लोग उतर कर जहाँ घूमना है वहाँ घूम आओ।"

त्री ने मोटरबोट वाले से पूछा, “क्या इसके अतिरिक्त यहाँ उतरने की कोई अन्य जगह नहीं है? आप थोड़ा द्वीप का चक्कर लगाईये, शायद इससे आसान कोई दूसरी जगह मिल जाये?”

दिक्कत यह थी कि द्वीप के आसपास नुकीली चट्टाने थीं जिनकी वजह से वहाँ उतरना असम्भव था। द्वीप के आगे-पीछे चक्कर लगा कर उनकी मोटर-बोट वापस घड़ियालों की जगह पर ही लौट आई।

त्री ने आभा से कहा, “तुम अपनी शक्ति से इन घड़ियालों से सम्पर्क बना कर देखो, शायद तुम्हारी बात मान कर, यह यहाँ से कुछ देर के लिए हट जायें?”

वह बोली, “तुम तो जानते हो कि मुझे अपनी शक्ति को नियंत्रित करना नहीं आता, अभी तक जितनी बार भी उस शक्ति ने काम किया है, वह मेरे भय की वजह से किया है।"

त्री बोला, “हम नाव की साइड में एक रस्सी की सीढ़ी लटका देते हैं, तुम उस पर थोड़ा सा नीचे, उनके करीब जाओ, शायद तुम्हारे पास होने से वह शाँत हो जायें।"

इस बात को सुन कर आभा घबरा गयी, बोली, “नहीं, वह मुझसे नहीं होगा। इनके दाँत देखो, किसी घड़ियाल ने उछल कर मेरी टाँग को पकड़ लिया तो?”

त्री बोला, “बस थोड़ी सी कोशिश करो, पाँच मिनट के लिए। प्लीज़!"

तो आभा और घबराई। शायद इस बात से उसकी शक्ति जागृत हो गयी और सभी घड़ियाल उनकी नाव की ओर आने लगे।

उनके झुँड को नाव की ओर आता देख कर ओरी भी परेशान हो गया, बोला, “उस पर जबरदस्ती नहीं करो, वरना यह मगरमच्छ हमारी मोटर-बोट में चढ़ आयेंगे।"

मोटर-बोट वाला भी डर गया, बोला, “साहब यह तो खतरनाक हो रहे हैं", और बोट को द्वीप से कुछ दूर ले आया।

त्री ने आभा का हाथ पकड़ लिया, बोला, “तुम घबराओ नहीं, जैसे मैं कहता हूँ तुम वैसे करो। वहाँ जाने की और नीचे उतरने की तुम्हें कोई आवश्यकता नहीं है। तुम्हारे डरने से वह घड़ियाल तुम्हें बचाने के लिए नाव की ओर आने लगे, इससे हमें यह पता चलता है कि उन पर तुम्हारी शक्ति का असर हो रहा है। मैंने यही देखने के लिए तुमसे रस्सी की सीढ़ी वाली बात कही थी।"

आभा ने भयभीत आँखों से उसकी ओर देखा। उसने उसे अपने पास एक कुर्सी पर बिठाया और धीरे-धीरे बोलने लगा, "तुम आँखें बंद कर लो और अपनी साँस पर ध्यान दो, धीरे-धीरे लम्बी साँस लो। जैसा मैं कहता हूँ, तुम वैसा करो, मैं तुम्हें नाव से उतरने के लिए नहीं कह रहा। मैंने सभी बच्चों को अपनी शक्ति पर नियंत्रण करना सिखाया है, मैं तुम्हारे साथ भी एक बार कोशिश करना चाहता हूँ। तुम बस आँखें बंद करो, धीरे-धीरे साँस लो और अपनी साँस पर ध्यान दो, कुछ और नहीं सोचो, उन घड़ियालों को भूल जाओ।"

कुछ समय बाद जब आभा की साँस की गति धीमी हुई तो द्वीप पर जमा घड़ियाल भी वापस तट की ओर लौट गये और पहले की तरह इधर-उधर घूमने लगे।

तब त्री ने पूछा, “अब तुम अपने मन को स्थिर करके देखो कि क्या तुम उन घड़ियालों को अपने आसपास महसूस कर सकती हो? अगर नहीं, तो कोई बात नहीं, तुम वापस अपनी साँस पर ध्यान दो।” हर पाँच मिनट के बाद, वह उससे यही बात पूछता था कि वह उन घड़ियालों को महसूस कर सकती है या नहीं?

करीब आधे घंटे के बाद जब उसने पूछा तो आभा ने धीरे से सिर हिलाया कि हाँ, वह घड़ियालों को महसूस कर रही है।

तब त्री बोला, “अब सोचो कि वह सभी घड़ियाल दायीं ओर जा रहे हैं। अपनी कल्पना में देखो कि सभी घड़ियाल तट के दायीं ओर जा रहे हैं। थोड़ी देर तक यही कल्पना करने की कोशिश करो।"

सचमुच द्वीप पर इकट्ठे घड़ियाल तट के दायीं ओर जाने लगे और बायीं ओर वाला हिस्सा खाली होने लगा। तब उसने आभा से आँखें खोलने के लिए कहा और उसे दिखाया, “वह देखो, जैसा तुमने सोचा, वह सभी सचमुच दायीं ओर चले गये। इसका मतलब है कि वह तुम्हारी बात सुन और समझ रहे हैं।"

आभा ने  घड़ियालों को देखा तो आश्चर्यचकित रह गयी, बोली, “यह मेरे सोचने से हुआ?”

त्री बोला, “इस समय तुमने आँखें खोल ली हैं फिर भी देखो वह वहीं पर रुके हुए हैं, इस ओर नहीं आ रहे। तुम दोबारा बैठ कर पहले की तरह ध्यान लगाओ और फिर से उन्हें दायीं ओर जाने के लिए कहो। हमें पाँच-दस मिनट का समय मिल जायेगा तो हम भाग कर पीछे पहाड़ी वाले हिस्से तक तट से कुछ ऊपर पहुँच जायेंगे, उसके बाद तुम ध्यान तोड़ सकती हो। जब हम लौटेंगे तो तुम्हें वहीं पहाड़ी से इशारा करेंगे और अगर आवश्यकता होगी तो तुम दोबारा ध्यान लगा कर उन्हें दायें करवा देना।"

फिर उसने मोटर-बोट वाले से कहा, “आप तैयार रहिये, जब सब घड़ियाल तट के दायीं ओर जायेंगे तो आप इस बोट को तट के बायीं ओर, जितना करीब ले जा सकते हैं, ले जाईये।"

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सोमवार, अगस्त 31, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 27

अब तक की कहानी: प्रतिमा की खोज में त्री और ओरी लखमीपारा गाँव के पास शंखासुर की पहाड़ी देखने जा रहे थे, तब रास्ते में उनका सामना कुछ गैंडों के सींग चुराने वाले तस्करों से हो गया, जो एक फॉरैस्ट गार्ड को मार रहे थे। ओर उस गार्ड को बचाने के लिए गया और तस्करों से लड़ने लगा। लड़ाई में एक तस्कर की मृत्यु हो गयी, त्री और ओरी वहाँ से भागे। गार्गी ब्रह्मपुत्र नदी पर एक मोटर-बोट से त्री से सम्पर्क बनाये हुए थी, उसने उन्हें नदी किनारे बुलाया। आगे पढ़िये ...

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अध्याय 27

बिश्वनाथ चरियाली, असम, 7 - 8 मार्च 2026

अँधेरा हो गया था। उनकी मोटरबोट बिश्वानाथ चरियाली के पूर्व में नदी किनारे खड़ी थी। वसंत की तबियत ठीक नहीं थी और गार्गी थकी हुई थी, वह दोनों सोने चले गये थे। बाकी के लोग नाव के डैक पर बैठे बातें कर रहे थे।

त्री बोला, “अब हम लोग गुरु जी की प्रतिमा को कैसे खोजेंगे? काज़ीरंगा के गार्ड पर हमला हुआ है और एक तस्कर की मृत्यु हुई है। पुलिस जाँच कर रही होगी कि क्या हुआ और किसने किया, इसलिए अगर हम वहाँ लौटें तो पुलिस हमें पकड़ सकती है।"

रंगनाथ बोला, “पहले आप लोग लखमीपारा के पश्चिम में ठहरे थे, इस बार हम वहाँ से कुछ देर, पूर्व की ओर कोई होटल खोज सकते हैं, हालाँकि वहाँ से रास्ता कुछ लम्बा पड़ेगा। दूसरी मुश्किल है कि पूरे क्षेत्र में यह खबर फैल चुकी होगी, इसलिए लोग आप को पहचान कर तुरंत पुलिस को खबर कर सकते हैं।"

आभा बोली, “जब वह गार्ड होश में आयेगा तो वह बतायेगा कि उस पर तस्करों ने हमला किया था, पर मेरे विचार में वह तस्कर पुलिस को रिपोर्ट लिखवाने नहीं जायेंगे कि उन पर किसने हमला किया था। इसलिए हो सकता है कि पुलिस तुम्हारी नहीं, केवल तस्करों की खोज कर रही हो। किसी ने तुम दोनों को वहाँ नहीं देखा, अधिक से अधिक, पंडित जी पुलिस को बता सकते हैं कि तुम दोनों उस दिन शंखासुर पहाड़ी की ओर गये थे। इसलिए पुलिस तुमसे पूछ सकती है कि तुमने वहाँ क्या देखा? मेरे विचार में एक-दो दिन में यह बात ठंडी हो जायेगी, फिर तुम लोग अपनी खोज पर जा सकते हो।"

ताकानोरी कुछ नहीं बोला लेकिन उसके चेहरे से स्पष्ट था कि वह गुस्से में है।

त्री बोला , “लेकिन वह तस्कर इसी क्षेत्र से हैं, उन्होंने हमें देखा है, वह हमें खोज रहे होंगे। अगर उनके हाथ लग गये तो हमसे कुछ पूछेंगे नहीं, सीधा गोली मार देंगे।"

आभा बोली, “तुम ठीक कहते हो, इस समय कुछ निर्णय नहीं लेना चाहिये। कल सुबह अखबार में देखेंगे कि क्या लिखा है और अगर ज़रूरत पड़ी, तो मैं, रंगनाथ और गार्गी, हम कोहोरा में पता करने जा सकते हैं। वहाँ के टैक्सी ड्राइवर, पर्यटकों को काज़ीरंगा की सफारी के लिए ले कर जाते हैं, उनसे भीतर की खबर मिल जायेगी। उसके बाद ही निर्णय लेंगे कि क्या करें।"

ओरी ने मोटरबोट वाले को बिश्वानाथ चरियाली में बियर खरीदने भेज दिया और रात को देर तक डैक पर बैठ कर बियर पीता रहा।

बाकी सब लोग सोने गये। नाव में केवल एक कमरा था, उसमें मोटी चद्दरों से बने हैम्मोक साथ-साथ लटक रहे थे, सभी उन पर सोये।

अगले दिन सुबह, त्री और रंगनाथ शहर से अखबारें और नाश्ता खरीदने गये। अखबार से पता चला कि गार्ड बच गया है और उसकी अंतिम स्मृति थी कि एक तस्कर उसे पेड़ से बाँधने के लिए घसीट रहा था। काज़ीरंगा के एक अधिकारी ने उस अज्ञात व्यक्ति को धन्यवाद दिया जिसने रुमाल बाँध कर गार्ड का खून बहना रोका था और उसकी जान बचायी थी। पुलिस के अनुसार गार्ड को बचाने वाला व्यक्ति, शायद तस्करों का कोई प्रतिद्वंदी तस्कर ही था।

ओरी बोला, “अगर उन्हें हमारे बारे में कुछ नहीं मालूम, तो हम आज वहाँ पर लौट सकते हैं।"

वसंत उनकी बात सुन रहा था, वह बोला, “दादा, अगर आप को काज़ीरंगा के आसपास कुछ खोजना है तो हम पेड़ों की सहायता से, यहीं से उस जगह को खोज सकते हैं।"

त्री बोला, “मैंने भी इस बारे में सोचा था लेकिन ताकानोरी सान उस जगह को स्वयं देखना चाहते हैं।"

वसंत बोला, “इधर-उधर भटकने से अच्छा है कि पहले मैं उस जगह को खोज लूँ, फिर आप दोनों सीधा वहाँ जा सकते हो।"

यह बात सुन कर ओरी का गुस्सा कुछ कम हुआ।

वसंत बोला, “आप मुझे बताओ कि हम किस दिशा में, क्या खोज रहे हैं?”

त्री ने टैबलेट बाहर निकाली और उस पर लखमीपारा गाँव को खोजा, उसे दिखाते हुए बोला, “यहाँ से पूर्व दिशा में जा कर एक दलदल-झील है, वहाँ के लोग उसे डाफलोंग बील कहते हैं। उसके पश्चिमी किनारे पर जो पहाड़ी है, वह शंखासुर है।"

वसंत ने आँखें बंद कर लीं और उस दिशा में ध्यान लगाया।

ओरी ने फुसफुसा कर आभा से पूछा, “क्या पेड़ भी बोलते हैं?  उन्हें डाफलोंग दलदल-झील का नाम बताओ तो वह बता देंगे कि वह किधर है?”

आभा मुस्करायी, “वसंत बता रहा था कि उसे कुछ कहना नहीं पड़ता, वह केवल अपनी संचेतना को पेड़ों की संचेतना से जोड़ देता है, पेड़ अपने आप जान लेते हैं कि वह क्या पूछ रहा है।"

गार्गी ने त्री से पूछा, “दादा, यह दलदल-झील क्या होता है?”

“जब वहाँ बारिश नहीं होती और पानी कम हो जाता है तो वहाँ दलदल रह जाती है, पर बारिश के मौसम में वह झील बन जाती है।"

वसंत ने आँखें खोलीं, बोला, “वह पहाड़ी मिल गयी, उस पर पेड़ कम हैं, अधिकतर झाड़ियाँ हैं। इस  समय पहाड़ी के साथ वाली दलदल-झील में पानी कम है, और वहाँ दलदल में एक हिरण फँसा हुआ है, वह अधिक समय तक जीवित नहीं रह पायेगा।"

त्री ने आभा से पूछा, "कविता की आगे की पंक्तियाँ क्या हैं?” तो उसने वह पंक्तियाँ सुनायीं - 

“कंदरा में गूँजती चौदह ध्वनियाँ पिनाक की,
लौटी सति पर्वतराज पिता के घर, त्रिनेत्र कहाँ है?”

वह बोला, “यानि गुफा में डमरू की चौदह ध्वनियाँ गूँज रही हैं, इसका मतलब है कि वहाँ कोई लम्बी गुफा है जिसमें चौदह कक्ष हैं, या फिर चौदह गुफाएँ हैं जो शायद डमरू की आकृति में बनी हैं। शंखासुर पहाड़ी किस दिशा में है? उससे हमें उन गुफाओं की दिशा दिखनी चाहिये।"

वसंत बोला, “उस पहाड़ी के पूर्व में तो दलदल है और पश्चिम में लखमीपारा, मैं उसके उत्तर और दक्षिण में खोज कर सकता हूँ कि वहाँ कोई गुफाएँ हैं या नहीं।" यह कह कर वह फिर से ध्यान में लीन हो गया। कुछ देर के बाद उसने आँखें खोलीं, बोला, “वहाँ आसपास कोई गुफा नहीं मिली। उस पहाड़ी के आसपास बहुत देखा लेकिन वहाँ पर दूर-दूर तक कोई गुफा नहीं है।"

ओरी को विश्वास नहीं हुआ, बोला, “शायद यह बच्चा उस क्षेत्र को ठीक से देख नहीं पाया? हमें खुद वहाँ जा कर उसकी जाँच करनी चाहिये।"

वसंत कुछ नहीं बोला, लेकिन त्री ने कहा, “यह खोज वसंत ने नहीं की है, यह इस क्षेत्र के हज़ारों पेड़ों और पौधों का काम है। ऐसा हो ही नहीं सकता कि यहाँ कोई गुफा हो और उसके आसपास के पेड़-पौधों को उसके बारे में पता नहीं हो। अगर वसंत कह रहा है कि वहाँ कोई गुफा नहीं है तो हमारा वहाँ जाना बेकार है।"

ओरी बोला, “लेकिन अगर गुफा वहाँ नहीं है, तो हम क्या करेंगे?”

“हमें फिर से कविता के अर्थ को समझने की कोशिश करनी चाहिये, शायद उनकी कोई बात हमने ठीक से नहीं समझी। आभा, गुरु जी का कागज़ निकालो, हम उस पर दोबारा विचार करेंगे।"

ओरी बोला, “मुझे लगता है कि तुम लोग कोई ड्रामा कर रहे हो। तुम्हारे गुरु ने तुम्हें अपना उत्तराधिकारी बनाया है लेकिन मूर्ति के बारे में स्पष्ट लिखने के बजाय एक पहेली बना दी है, जो तुम्हारी समझ में नहीं आ रही, यह क्या बात हुई?”

“गुरु जी ज्ञानी हैं, वह जैसा उचित समझते हैं, वैसा करते हैं", रंगनाथ बोला तो त्री ने इशारा करके उसे चुप रहने के लिए कहा और ओरी से बोला, “तुम डरते हो कि अगर हमें वह मूर्ति नहीं मिलेगी तो तुम क्या करोगे। तुम्हारी यह चिंता व्यर्थ है, हम उसे अवश्य खोज लेंगे, हमें केवल थोड़ा सा समय चाहिये।"

लेकिन ताकानोरी का गुस्सा शाँत नहीं हुआ, बोला, “मेरे पास अधिक समय नहीं है।"

आभा उठी और पास जा कर उसके कँधे पर हाथ रखा तो वह चुप हो गया, वह बोली, “कल शाम को तुमने शायद कुछ अधिक बियर पी ली, इसलिए आज तुम चिड़चिड़े हो रहे हो। मैं तुम्हारे लिए दालचीनी और सौंफ वाली चाय बनाती हूँ, उससे तुम्हारा मन शाँत होगा और तुम्हें फायदा होगा।"

तभी गार्गी बोली, “मेरे विचार में हम लोग गलत जगह पर मूर्ति खोज रहे हैं।"

सब ने मुड़ कर उसकी ओर देखा। उसके हाथ में ओरी की टैबलेट थी और वह उस पर उस क्षेत्र के नक्शे को देख रही थी। बोली, “यहाँ देखो, इस द्वीप का क्या नाम है?”

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गुरुवार, अगस्त 27, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 26

अब तक की कहानी:  त्रिनेत्र ने ताकानोरी से कहा है वह उसे शक्तिवाहिनी मूर्ति तक ले कर जायेगा, और ओरी ने उसे वचन दिया है कि मूर्ति मिलने के बाद वह उनका और पीछा नहीं करेंगे। गुरु जी त्री के नाम एक कविता-पहेली छोड़ी थी, उसे पढ़ कर त्री, ओरी और आभा काजीरंगा के पास देवपानी के एक होटल में ठहरे थे। आज सुबह, त्री और ओरी लखमीपारा गाँव से हो कर शंखासुर की पहाड़ी को खोजने निकले थे। लखमीपारा के मन्दिर के पुजारी ने उन्हें शंखासुर जाने का रास्ता बताया है। आगे पढ़िये ...

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अध्याय 26

 शंखासुर पहाड़ी, काज़ीरंगा, असम, 7 मार्च 2026

ओरी बोला, “तुमसे एक अन्य बात पूछना चाहता था। दिल्ली और कलकत्ता में लोग तुरंत जान जाते थे कि मैं विदेशी हूँ, वह मुझसे अंग्रेज़ी में बात करते थे, जबकि यहाँ लोग मेरी ओर ध्यान नहीं देते, कुछ तो मुझसे यहाँ की भाषा में बात करते हैं, और जब वह देखते हैं कि मैं उनकी बात नहीं समझ पा रहा तो सोचते हैं कि मैं नाटक कर रहा हूँ, ऐसा क्यों है?”

त्री मुस्कराया, “आभा का चेहरा क्या तुमसे बहुत भिन्न है? वह भी थोड़ी सी जापानी नहीं लगती?”

ओरी बोला, “नहीं, वह जापानी नहीं लगती, उसका चेहरा म्यंमार और थाईलैंड के लोगों से अधिक मिलता है।"

त्री हँसा, बोला, “चीनी, जापानी, म्यंमार, थाईलैंड, मुझे उनके चेहरों को अलग-अलग पहचानना नहीं आता, मुझे सभी एक जैसे लगते हैं।"

ओरी भी हँसा, “वैसे ही, मुझे भी तुम हिन्दुस्तानी आपस में एक जैसे लगते हो।"

"लेकिन तुम नक्शे में देखो तो यहाँ पर एक ओर भूटान और चीन हैं, दूसरी ओर म्यंमार और थाईलैंड हैं। यहाँ की बहुत सी जनजातियाँ आज की राष्ट्रीय सीमाओं से बँट गयी हैं लेकिन उनके लोग नहीं बँटे हैं। शायद इसलिए तुम्हें देख कर यहाँ के लोग सोचते हैं कि तुम भी हमारी किसी जन-जाति के होगे", त्री ने कहा।

वह दोनों ऐसे ही बातें कर रहे थे कि अचानक आगे से एक गोली चलने की आवाज़ आई।

त्री रुक गया, बोला, “पंडित जी कह रहे थे कि यहाँ पर गैंडों के सींग चुराने वाले तस्कर खतरनाक हो सकते हैं, हमें आगे नहीं जाना चाहिये?”

ओरी बोला, “अगर वह लोग कोई गलत काम कर रहे हैं, तो हमें उन्हें रोकना चाहिये।"

लेकिन त्री आगे नहीं बढ़ा, बोला, “जब बचने का कोई और रास्ता नहीं हो तब मैं लड़ सकता हूँ, लेकिन मैं जबरदस्ती किसी से लड़ने नहीं जाऊँगा।"

ओरी बोला, “यह तो कायरता होगी, क्या तुम कायर हो? देखोगे भी नहीं कि वहाँ कौन हैं और वह क्या कर रहे हैं?”
त्री ने लम्बी साँस ली, बोला, “ठीक है, तुम रुको, मैं अदृश्य हो कर देख कर आता हूँ, फिर यह निर्णय लेंगे कि कुछ करना चाहिये या नहीं।"

जैसे ही उसकी शक्ति जागृत हुई वह अदृश्य हो कर आगे देखने चला गया। ओरी पाँच मिनट रुका, फिर वह भी जिस ओर से गोली चलने की आवाज आई थी उसी ओर बढ़ा।

वहाँ से करीब दो किलोमीटर आगे जा कर उन्हें कुछ आदमी दिखे। एक फोरैस्ट गार्ड जीप में उनका पीछा कर रहा था। उसके एक हाथ में वॉकी-टॉकी थी जिससे वह अपने साथियों को बुला रहा था। उसकी जीप के सामने, पेड़ों के बीच में, तीन आदमी भाग रहे थे, जिनके चेहरे रुमालों से छिपे थे और जिनके हाथों में बन्दूकें थीं। अचानक एक पेड़ पर छुपा हुआ एक आदमी, नीचे जाती हुई फोरैस्ट गार्ड की जीप पर कूदा। उसके हाथ में एक चाकू था, जिससे उसने गार्ड पर हमला कर दिया। गार्ड के बायें कँधे पर चाकू का घाव लगा तो उसके हाथ से उसका वॉकी-टॉकी छूट कर गिर गया, उसकी कमीज़ तुरंत खून से लाल हो गयी और उसने जीप को रोक कर उतरने की कोशिश की।

जो तीन आदमी आगे भाग रहे थे, वे मुड़ कर जीप की ओर आये, उनमें से एक बोला, “सिपाहिया जी, क्यों मरने का शौक लगा है जो बीच में अटका डालने के लिए कूद पड़े?”

दूसरा आदमी बोला, “इस साले को पेड़ से बाँध दो, बाद में इसके साथी आ कर इसे खोल लेंगे। वह गैंडा उस तरफ भागा है, हमें उसका पीछा करना है।"

एक आदमी के पास रस्सी थी, उसने उससे गार्ड के हाथ बाँधे, और उसे एक पेड़ की तरफ खींचने लगा तो दर्द से गार्ड चिल्लाया, तब उस आदमी ने अपनी बन्दूक के कुन्दे से उस गार्ड के सिर पर ज़ोर से मारा तो वह बेहोश हो गया।

पास में छिपा हुआ त्री सब कुछ देख रहा था, उसने सोचा कि जब वह लोग गार्ड को छोड़ कर जायेंगे तो वह उसकी रस्सी खोल देगा, लेकिन ओरी तुरंत पेड़ों के बीस से बाहर निकल आया, चिल्ला कर बोला, “उस आदमी को छोड़ दो।"

चूँकि ताकानोरी अंग्रेज़ी में बोल रहा था और उन आदमियों को शायद उसकी बात समझ नहीं आयी, उनमें से एक ने अपनी बन्दूक उठायी और उसकी ओर निशाना साधा। तब त्री ने चिल्ला कर ओरी को पुकारा। उन आदमियों ने उसकी आवाज़ सुनी लेकिन वह दिखाई नहीं दिया, वह आसपास देखने लगे। इतनी देर में ताकानोरी ने अपनी आस्तीन से एक चाकू को निकाल कर, उसे निशाना साधने वाले तस्कर की ओर फैंका। उसका निशाना इतना सधा हुआ था कि काफी दूर होने पर भी वह चाकू सीधा उस आदमी की गर्दन में घुस गया। जब वहाँ से खून का फुव्वारा निकला तो उस आदमी के हाथ से उसकी बन्दूक छूट कर गिर गयी।

अपने साथी को नीचे तड़पता देख कर बाकी दोनों आदमियों ने भी अपनी बन्दूकें उठायी तो ओरी ने आस्तीन से दो चाकू और निकाल लिए, बोला, “समझदार हो तो बन्दूकें नीचे कर लो, वरना तुम दोनों की जान भी जायेगी।" यह कह कर वह निडर हो कर उनके सामने सीना तान कर खड़ा हो गया। उसकी निडरता देख कर वह दोनों आदमी थोड़ा हिचकिचाये, तब अचानक त्री भी वहाँ प्रकट हो गया, और बंगाली में बोला, “यह आदमी बड़ा निशानेबाज है, मेरी मानो तो यहाँ से तुरंत भाग जाओ, वरना तुम दोनों की मृत्यु भी आज ही होगी।"

त्री को वहाँ अचानक प्रकट होता देख कर वह दोनों घबरा गये और अपने घायल साथी को वहीं छोड़ कर, पीछे पेड़ों में घुस कर भाग गये। उनका तीसरा साथी जो जिसने गार्ड को चाकू मारा था, वह जीप पर खड़ा सब कुछ देख रहा था, वह भी वहाँ से उतर कर भागा। 
ओरी ने घायल तस्कर की गर्दन से अपने चाकू को निकाल कर उस पर लगे खून को उसकी कमीज़ से पोंछा और वापस अपनी आस्तीन में छुपा लिया, बोला, "इस आदमी का बहुत सा खून बह गया है, इसका बचना मुश्किल होगा।"

त्री ने आगे बढ़ कर बेहोश गार्ड के हाथ से रस्सी खोली फिर उसकी कमीज़ को खोल कर उसके कँधे के घाव को देखा। वह चाकू जहाँ घुसा था, शायद वहाँ कोई खून की नस थी जिससे खून बहता जा रहा था। उसके बहते खून को देख कर त्री वहाँ मूर्ति की तरह खड़ा रह गया, उसका चेहरा फीका पड़ गया। 

ओरी ने पीछे से आ कर, अपनी जेब से एक साफ रुमाल निकाल कर उसे पहले गार्ड के घाव पर दबाया, फिर उसे कँधे पर बाँध कर टाईट खींच दिया। फिर उसने त्री से कहा, “उस वॉकी-टॉकी से इसके गार्ड साथियों को खबर करके यहाँ बुलाओ, इसे जल्दी अस्पताल ले जाना ज़रूरी है, नहीं तो यह भी नहीं बचेगा।"

त्री ने वॉकी-टॉकी का बटन दबा कर "हैलो, हैलो" बोला तो उसे उत्तर मिला। ओरी ने उसे याद दिलाया, “उन्हें हमारे बारे में कुछ मत कहना।"

त्री ने वॉकी-टॉकी से गार्ड के साथियों को उसकी और तस्करों की लड़ाई की बात बतायी, कहा कि घायल गार्ड को जल्दी से अस्पताल ले जाना ज़रूरी है। जब उन्होंने उससे पूछा कि वह कौन है तो उसने वॉकी-टॉकी को बंद कर दिया। 

ओरी बोला, “हम जितना कर सकते थे, उतना कर दिया, अब हमें यहाँ से जाना चाहिये।" उन दोनों के वस्त्रों पर भी खून के दाग लगे था, उनकी ओर इशारा करके उसने कहा, “हो सकता है कि वह गार्ड कुत्तों के साथ आयें और हमें खोजने की कोशिश करें। कुत्ते सूंघ कर देख लेंगे कि हम किधर गये हैं। उनसे बचने के लिए हमें पानी में चलना चाहिये।"

दोयाँग नदी वहाँ से अधिक दूर नहीं थी और उसके किनारे पर पानी गहरा नहीं था, उनके घुटनों से नीचे आ रहा था। वह उसमें चलते हुए लखमीपारा की ओर बढ़े।

त्री को उस लड़ाई से बहुत धक्का लगा था। अभी तक उसने गुरु जी द्वारा सिखायी लड़ने की कला को व्यायाम और अभ्यास की तरह से लिया था, उसने आजतक कभी किसी से इस तरह की मार-पिटाई नहीं की थी, न ही कभी इस तरह से खून बहाते घायल लोगों को मरते हुए देखा था। वहाँ से जाते हुए, बार-बार उसके सामने तस्कर की गर्दन में घुसे चाकू और फुव्वारे की तरह निकलते लाल खून की छवि उभर आती थी।

ओरी उसकी मनोस्थिति को समझ गया, बोला, “त्रिनेत्र, शायद आज तुमने पहली बार लड़ाई में किसी को इस तरह से मरते देखा है? तुम्हें इसके बारे में सोचने के लिए बाद में समय मिलेगा, लेकिन इस समय हमें अपने बचाव के बारे में सोचना है। हमारे कपड़ों पर खून लगा है और हो सकता है कि उन तस्करों के जासूस गाँव में हों, या हमारे होटल में भी हों। बेहतर होगा कि हम इस समय गाँव से हो कर नहीं लौटें और किसी तरह से होटल से अपना सामान ले कर यहाँ से चले जायें।"

उसकी बात सुन कर त्री थोड़ा होश में आया।

तब उसने अपने भीतर गार्गी की आवाज़ सुनी, वह कह रही थी, “दादा, आप लोग गाँव की ओर मत जाईये। बल्कि छोटी नदी को छोड़ कर, उत्तर दिशा में ब्रह्मपुत्र नदी की ओर आईये। हमारे पास नाव है, हम आप को नदी के किनारे किसी घाट से ले लेंगे। आप को होटल लौटने की भी आवश्यकता नहीं है, आभा दीदी वहाँ से सारा सामान ले आयेंगी।"

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