सोमवार, जून 08, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 03

अब तक: त्रिनेत्र को उसके गुरु जी जामुन बाबा (कोरिया से आये बौद्ध भिक्षुक जून मिन) ने पाला था। जब वह अठारह वर्ष का हुआ तो गुरु जी ने उसे एक अनाथाश्रम खोल कर उसमें शक्ति वाले बच्चों को तैयार करने के लिए कहा था। दूसरी ओर, जापान में यामागुची गैंग ने अपने याकूज़ा खूनी ताकानोरी को जामुन बाबा की गुप्त शक्ति वाली मूर्ति को लाने भारत भेजा है। इससे आगे पढ़िये इस तीसरे भाग में।

प्रारम्भ से पढ़िये - पिछला अध्याय पढ़िये

अध्याय 03

मजूली, असम, 2 मार्च 2026

सुबह मुँह-अँधेरे जब बाबा अपने आश्रम से निकले, तो उन्हें पहचानना कठिन था। उन्होंने भिक्षुक के केसरी वस्त्र को उतार कर, गंदे मटमैले सा कुर्ता-पजामा पहने थे, उनका सिर और चेहरा गमछे से ढका था और कँधों पर एक पुराना कम्बल लिपटा था। वह कोई गरीब गाँववाला लगते थे। अँधेरे में वह वृक्षों और झाड़ियों के बीच में से छाया की तरह जा रहे थे।

उनकी छोटी सी नाव, नदी के तट के पास पुराने चिथड़ों और सूखे पत्तों से ढ़की थी, जो आसानी से नहीं दिखती थी। वह उसे धकेल कर नदी में ले गये और उसमें बैठे। उनका चप्पू इस कोण से नदी के जल में घुसता है, जैसे मक्खन में गर्म चाकू, ज़रा सी भी आवाज़ नहीं होती। उस दिन भी उनकी नाव पानी को तीर की तरह चीरती हुई जा रही थी।

जब त्री उनसे पूछता है, "गुरु जी, आप का कभी अपने कोरिया देश लौटने का मन नहीं करता?"

तो वह कहते हैं, "मेरे लिए तो तुम ही मेरा परिवार हो, वहाँ लौट कर मैं क्या करूँगा? वहाँ मुझे जानने वाला अब कोई नहीं है।"  

नदी पार करके, चंगेली-सूती द्वीप पर उन्होंने नाव को झाड़ियों के बीच में छुपा दिया। इस द्वीप के चप्पे-चप्पे को वह अच्छी तरह पहचानते हैं। तब तक क्षितिज पर अँधेरा कम गहरा होने लगा था। यहाँ भी वह पेड़ों और झाड़ियों के बीच से छाया की तरह निकले। द्वीप पर इक्का-दुक्का घर ही हैं, लेकिन वहाँ कुत्ते हैं, इसलिए वह उन घरों से दूर से, लम्बा चक्कर लगा कर गये।

द्वीप के दूसरे किनारे पर, उन्होंने एक झोपड़ी के बाहर चारपाई पर सोये एक आदमी के कँधे पर हाथ रख कर जगाया, फुसफुसा कर बोले,  “जागो शिबेन, सुबह हो गयी, अभी तक सो रहे हो?”

शिबेन उन्हें कई सालों से जानता है। हर बार वह ऐसे ही आते हैं, सुबह मुँह-अँधेरे, और उसे इसी तरह जगाते हैं। वह आँखे मलते हुए, उबासी लेते हुए उठा। पहले उनके पैर छूए, बोला, “कैसे हो बाबा? इस बार इधर बहुत दिनों के बाद आये?”

उसे पता है कि अक्सर वह भिक्षुक-वस्त्र उतार कर, भेस बदल कर आते हैं। कभी वह गँजे सिर वाला बूढ़ा बनते हैं, तो कभी लम्बी मूछों वाला पहलवान। बाबा ने उसे बताया था, “कुछ लोग मेरे पीछे पड़े हैं, वह मुझे मारने की धमकी देते हैं, इसलिए आश्रम से बाहर निकलूँ तो मुझे भेस बदलना पड़ता है। कोई तुमसे मेरे बारे में पूछे तो कहना कि मुझे नहीं जानते, कि मैं तुम्हारे यहाँ कभी नहीं आया।"

आज शिबेन ने जब उनका भेस देखा तो हँसने लगा, “आज क्या बने हैं? गाँव वाले या मछुआरा? जो भी है, आप ने अच्छा भेस बनाया है, बिल्कुल पहचान में नहीं आते। कहिये, आज किधर जाना है?”

“जल्दी चलो, मुझे चापोड़ी में किसी से मिलने जाना है।"

“एक चाय भी नहीं पीयेंगे?”, शिबेन ने पूछा। सुबह-सुबह बिना चाय पीये उसका काम करने का मन नहीं करता।

बाबा बोले, "आज नहीं, मुझे जल्दी है।"

तब उसने एक बाल्टी से पानी ले कर अपना मुँह धोया। उसकी नाव नदी के तट पर एक खूँटे से बँधी थी। उन्हें नाव में बिठाया और तेज़ी से उसे मिस्सामोरा-चापोड़ी के घाट की ओर ले गया। वहाँ पहुँचने में उन्हें करीब बीस मिनट लगे।

जब वह नाव से उतरे तब तक पूर्व में पेड़ों के पीछे से आकाश में हलकी सी लालिमा झलकने लगी थी। उसे पैसे दे कर वह आगे बढ़े।

चापोड़ी से उन्हें नारायणपुर जाना है, लेकिन वहाँ जाने वाले आटो इतनी सुबह नहीं मिलते। घाट के पास दो-तीन ढाबे हैं, बाबा उनमें से एक ढाबे पर गये और चाय के लिए कहा। वहाँ उन्हें किसी ने नहीं पहचाना। चाय का कुल्हड़ ले कर, वह वहाँ चुपचाप अलग हो कर बैठे, कम्बल सिर पर लपेट लिया, किसी से बात नहीं की। 

जब सूरज आकाश में ऊपर चढ़ा और सड़क पर लोग आने-जाने लगे तो आटो वाले भी आ गये। तब वह भी उठे और नारायणपुर के लिए आटो खोजने निकले।

इस यात्रा का निर्णय उन्होंने आज सुबह-सुबह ही किया था। पता नहीं क्यों उनकी नींद समय से पहले खुल गयी थी और उनके भीतर से विचार उठा था कि आज उन्हें नारायणपुर जाना चाहिये। वह अपने अंतरमन को जानते हैं, इसलिए जब उन्हें ऐसे संकेत मिलते हैं तो वह सोचते नहीं हैं, उन्हें स्वीकार कर लेते हैं। ऐसे संकेतों ने पहले कई बार उनकी जान बचायी है।

वह डकरोंग पोस्ट आफिस वाली सड़क के कोने पर आटो से उतरे और सीधा ब्राइट बुक स्टोर की ओर बढ़े। दुकान अभी बंद थी, लेकिन उसके साथ जो सीढ़ियाँ ऊपर जा रही थीं, उनका दरवाज़ा खुला था। वह सीढ़ियाँ चढ़े और ऊपर जा कर घर का दरवाज़ा खटखटाया।

एक लड़के ने दरवाज़ा खोला, वह उन्हें पहचान नहीं पाया, पूछा, “कौन हो तुम? क्या चाहिये?”

बाबा ने धीरे से कहा, “बेटा, अपने दादू से कहो कि जामुन बाबा आये हैं।"

उनका नाम सुन कर वह लड़का उन्हें पहचान गया, बोला, “बाबा, आज आप ने यह कैसा भेस बनाया हैं? आईये, भीतर आ जाईये।”

उन्हें बिठा कर वह भीतर अपने दादा जी को जगाने गया और दो मिनट बाद लौटा, बोला, “दादू अभी आते हैं।"

थोड़ी देर के बाद ब्राइट बुक स्टोर के मालिक बोरा साहब, हाथ-मुँह धो कर बाहर आये, हाथ जोड़ कर उनका अभिवादन किया और बोले, “बाबा, नीचे चलते हैं, आप की एक चिट्ठी आयी थी, वह वहीं रखी है।" फ़िर उन्होंने अपने पोते को आवाज़ लगायी, “छोटू, माँ से कहो कि चाय बना दे और उसे नीचे ले आओ।"

बोरा साहब भी उनकी भेस बदलने की आदत को जानते हैं, बोले, "आज भेस बदलने के लिए आप को साफ़ कपड़े नहीं मिले थे क्या?”

नीचे सीढ़ियों के पीछे से दुकान में जाने का भीतरी दरवाज़ा है, उन्होंने उसका ताला खोला, बत्ती जलायी और बाबा को भीतर बिठाया। फ़िर दराज़ से एक चिट्ठी निकाल कर उन्हें दी, कहा, “यह आप की यह चिट्ठी है, पिछले हफ्ते आई थी।"

बाबा ने चिट्ठी ली, देखा कि त्री की है और उसे अपने झोले में रख लिया। फ़िर उस झोले से एक प्लास्टिक का डिब्बा निकाला, बोले, “आप की दीदी ने आप के लिए यह गोंद के लड्डू बना कर भेजे हैं।"

बोरा साहब की बड़ी बहन विधवा हैं। वह मुश्किल में थीं, क्योंकि उनके बेटे की बहू उनसे बुरा व्यवहार करती थी। बोरा साहब बहन के लिए बहुत चिंतित थे, उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि उसकी कैसे मदद करें। तब बाबा ने उनकी बहन को अपने वृद्धाश्रम में जगह दी थी। इस तरह से उनकी जान-पहचान बनी थी।

डिब्बे को ले कर बोरा साहब की बाछें खिल गयीं, बोले, “ऐसे लड्डू मेरी माँ बनाती थी, इन्हें खाता हूँ तो बचपन के दिन याद आ जाते हैं। माँ कहती थीं कि इनसे जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है, इसलिए सर्दियों में इन्हें बनाती थी। वही परम्परा अब दीदी चला रही हैं।"

तब तक ऊपर से उनका पोता चाय ले कर आ गया। उसे पीते हुए उन्होंने कुछ देर तक वृद्धाश्रम की बातें कीं। 

बोरा साहब बोले, “पहले घरों के बड़े-बूढ़े, हमारे परिवारों का हिस्सा होते थे, यहाँ पूरे क्षेत्र में कोई वृद्धाश्रम नहीं था क्योंकि उसकी आवश्यकता ही नहीं थी। लेकिन आजकल हमारे बच्चे शहरों में रहने चले जाते हैं, और उनके बूढ़े माता-पिता घर में अकेले रह जाते हैं। कई बार, पैसे न होने से, बेचारे सड़कों पर रहने और भीख माँग कर जीने के लिए बाध्य होते हैं। गुवाहाटी में मैंने देखा, कि बहुत से बूढ़े लोग पुलों के नीचे रहते हैं।"

बाबा बोले, "इसीलिए हर महीने हमारे यहाँ एक-दो नये लोग आ रहे हैं। मैं चाहता हूँ कि हमारा वृद्धाश्रम आत्मनिर्भर होना चाहिये, ताकि मेरे बाद भी वह चलता रहे।"

बोरा साहब बोले, “लेकिन आप का स्वास्थ्य तो ठीक चल रहा है न?”

बाबा हँसे, बोले, “स्वास्थ्य तो ठीक है लेकिन उम्र हो रही है। पतझड़ का पत्ता, पता नहीं कब वृक्ष से गिर जाये? इसलिए वृद्धाश्रम की सारी ज़िम्मेदारी उनके सहकारी संघ को सौंपी है।"

थोड़ी देर तक बातें करने के बाद बाबा उठ खड़े हुए, "अच्छा बोरा साहब, अब मैं चलता हूँ, मुझे आश्रम के लिए बाज़ार से कुछ सामान खरीदना है। ईश्वर चाहेंगे तो अगली बार मुलाकात होगी।" यह कह कर वह उन्हें हाथ जोड़ कर दुकान से बाहर निकल आये।

बोरा साहब भी उनके साथ बाहर आये, बोले, “दीदी को मेरा प्रणाम कहियेगा, मुझे जैसे ही मौका मिलेगा, मैं उनसे मिलने आऊँगा।"

अचानक बाबा को करंट सा लगा। ऐसा लगा मानो किसी ने उनके दिमाग के भीतर उन्हें बिजली से छुआ हो। जैसे ही वह अनुभूति महसूस हुई, उनका आत्म-संयम और प्रशिक्षण ऐसे थे कि उन्हें सोचना नहीं पड़ा, उन्होंने तुरंत अपने मस्तिष्क की शक्ति-लहर को ढक लिया। वह समझ गये कि किसी ने अन्वेषण-किरण की शक्ति से उनके मस्तिष्क को छुआ है।

बोरा साहब ने बाबा के चेहरे पर पीड़ा का भाव देखा, बोले, “क्या हुआ बाबा? तबियत ठीक नहीं है?”

जामुन बाबा समझ गये थे कि कोई उन्हें खोजते हुए नारायणपुर आया है। कुछ ही देर में वह यहाँ भी आयेगा और बोरा साहब से उनके बारे में पूछताछ करेगा। इसलिए उन्हें और उनके परिवार को इस खतरे से बचाने के लिए यहाँ से कहीं दूर भेजना चाहिये।

वह बोले, “देव-कृपा से मुझे आने वाले खतरों के संकेत मिल जाते हैं। मुझे लगता है कि एक जानलेवा खतरा आप के परिवार की ओर आ रहा है। आप घर लौटिये और जल्दी से अपना सामान तैयार कीजिये, मैं तुरंत आप के लिए गाड़ी का प्रबंध करता हूँ। आप सब लोग आज सुबह ही एक सप्ताह के लिए गुवाहाटी चले जाईये, मैं आप के लिए वहाँ रहने का प्रबंध भी कर दूँगा। जाने से पहले अड़ोस-पड़ोस में सबसे झूठमूठ कह दीजिये कि आप लोग एक महीने के लिए दिल्ली जा रहे हैं। मेरी बात समझ गये? जैसा मैंने कहा है, वैसा करिये। मैं आप सब के लिए प्रार्थना करूँगा कि आप का अमँगल न हो।"

“कैसा खतरा?”, बोरा साहब घबरा गये, “क्या होने वाला है?”

“अभी बात करने का समय नहीं है, जब विपदा टल जायेगी तब आप को बताऊँगा। अभी आप तुरंत घर जाईये और एक सप्ताह के लिए सामान तैयार कर लीजिये।"

बोरा साहब सीढ़ियों की ओर भागे और बाबा ने अपनी जान-पहचान वाले ट्रैवल-एजैंट को फोन करके बोरा साहब के लिए कार और गुवाहाटी में रहने का प्रबंध करने के लिए कहा, फ़िर तेज़ चल कर उसी सड़क पर थोड़ा आगे गये।

सड़क की बायीं ओर एक झोपड़ी थी, जिसके बाहर एक महिला एक चबूतरे पर कपड़े प्रेस कर रही थी, पास में एक चारपाई बिछी थी। बाबा ने स्वर को कातर बना कर उसे कहा, “बेटी, मुझे चक्कर आ रहे हैं, मेरी तबियत ठीक नहीं है। मैं उधर नाली के पास थोड़ी देर बैठ कर आराम कर लूँ?"

“उधर गन्दगी में मत बैठो, यहाँ चारपाई पर लेट जाओ", वह महिला बोली और झोपड़ी से उनके लिए एक लोटे में पानी ले आयी।

बाबा चारपाई पर लेट गये, शरीर को कँबल से ढक लिया, बोले, "बस थोड़ी देर आराम कर लूँ, फ़िर चला जाऊँगा।" उनकी दृष्टि गली के दूसरे सिरे पर, बोरा साहब की दुकान पर लगी थी। वह महिला वापस अपने कपड़े प्रैस करने के काम में लग गयी।

अभी तक बाबा को यामागुचि के भेजे आदमियों से बच कर भागने में दिक्कत नहीं हुई थी। लेकिन वह समझ गये कि इस बार उनका पीछा करने वाला कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है। इस बार यामागुचि ने जिस आदमी को उन्हें खोजने भेजा है, उसके पास अन्वेषण-किरण की गुप्त-शक्ति है, इस बार उन्हें बहुत सावधान रहना पड़ेगा।

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अगला भाग बृहस्पतिवार 11 जून 2026 को प्रकाशित होगा। 

गुरुवार, जून 04, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 02

अध्याय 02 

टोकियो, जापान, 1 जनवरी 2026

नये वर्ष के पहले दिन, रिकू यामागुची ने ताकानोरी को टेलीफोन करके अपने घर बुलाया, “ओरी सान, तुम्हारे लिए एक काम है।"

ओरी ने रात को देर तक जश्न मनाया था और सुबह तीन बजे थक कर, दो युवतियों के साथ सोने गया था। फ़िर भी, हर रोज़ की तरह वह सुबह सात बजे उठ कर तैयार हो कर दोजो में व्यायाम करने गया था। 'दोजो' एक पाराम्परिक व्यायामशाला है, जहाँ वह प्रतिदिन सशस्त्र और शस्त्रहीन लड़ाई के अभ्यास करता है।

वहाँ जाते हुए वह सोच रहा था कि वह तीस साल का हो चुका है, अब यह मारा-मारी और लड़ाई के काम वह अधिक दिनों तक नहीं कर पायेगा। लेकिन अगर वह यह नहीं करेगा तो क्या करेगा? उसने बचपन से केवल यही सीखा है। सब जानते हैं कि उसके जैसा काबिल खूनी पूरे टोकियो में, या शायद पूरे जापान में और कोई नहीं है।

जिस काम को कोई और नहीं कर पाता, वह कर लेता है। उसके शिकार कितनी भी कोशिश कर लें, वह उनकी छिपी हुई कमज़ोरियों में से, उन्हें मारने का कोई न कोई रास्ता निकाल लेता है। जापानी भाषा में उसके जैसे लोगों को याकूज़ा कहते हैं लेकिन वह अपने आप को समुराई-योद्धा मानता है। किसी में हिम्मत नहीं है कि उसके मुँह पर उसे याकूज़ा कह सके।

दोजो में उसके गुरु जी उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे, उसने झुक कर उनका अभिवादन किया। उसके गुरु जी उसे बचपन से जानते हैं, उन्हें वह पिता समान मानता है। उस दिन जब उसने अभ्यास पूरा किया और वहाँ से जाने लगा तो गुरु जी ने उसे रुकने का इशारा किया, झुक कर बोले, “ओरी सान, आज मेरा यहाँ आखिरी दिन है, मैं तुमसे विदा लेता हँ।"

ओरी को उनकी बात समझ में नहीं आयी, पूछा, “आखिरी दिन? इसका क्या मतलब?”

“यामागुचि सान का आदेश है। वह कहते हैं कि मेरे रिटायर होने का समय आ गया है।"

यामागुचि सान, यानि रिकू यामागुचि। रिकू जानता है कि गुरु जी उसके लिए कितने महत्वपूर्ण हैं, उसने यह जानबूझ कर किया है। ताकानोरी के मन में आग सी लग गयी, एक क्षण के लिए उसने सोचा कि वह जा कर उसे मार डाले।

गुरु जी उसके मन की बात बिना कहे ही समझ गये, उसकी बाजू पर हाथ रखा, धीरे से बोले, “क्रोध में दिमाग काम नहीं करता, कुछ करने से पहले ठँडे दिमाग से सोचो। यह सच है कि मैं बूढ़ा हो गया हूँ और इस दोजो को नये और जवान शिक्षकों की आवश्यकता है। आज नहीं तो कल मुझे रिटायर होना ही है। लेकिन तुम इतने सालों से उनके लिए वफ़ादारी से काम करते हो, यामागुचि सान को मुझे यह बात कहने से पहले तुमसे बात करनी चाहिये थी।"

“मैं अब उसके लिए काम नहीं करूँगा।"

गुरु जी ने सिर हिला कर मना किया, बोले, “समझदार व्यक्ति जल्दबाज़ी में निर्णय नहीं लेता। शायद वह चाहते हैं कि तुम गुस्से में ऐसा कोई निर्णय लो? तुम उसका उल्टा करो, उन्हें ऐसे दिखाओ कि तुम्हें मेरी कुछ परवाह नहीं है, और यह समझने की कोशिश करो कि वह तुम्हें रास्ते से क्यों हटाना चाहते हैं?”

चौबिस सालों से वह गुरु जी का शिष्य रहा है। उनके बिना उसे यह दोजो ही नहीं, अपना जीवन भी अधूरा सा लगेगा। वह सोच में पड़ गया।

गुरु जी बोले, “ओरी सान, मुझे वचन दो कि तुम जल्दबाजी में कुछ नहीं करोगे।"

ताकानोरी ने धीरे से सिर हिला कर हामी भरी।

अंत में जाते हुए वह बोले, "मैं आज-कल में अपने गाँव लौट जाऊँगा। जब तुम्हें समय मिले, तब मुझसे मिलने घर आना। मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा।"

कुछ घंटे बाद, ताकानोरी घर में बैठा था जब रिकू का टेलीफोन आया। तब तक उसका गुस्सा ठँडा हो गया था। उसने फैसला किया कि जैसी सलाह गुरु जी ने दी है, वह रिकू से गुरु जी के बारे में कुछ नहीं कहेगा।

उसने जल्दी से कपड़े पहने और यामागुचि सान के घर आया। उनका घर ऊँची चारदीवारी से घिरा है, और चारों ओर पहरेदार हैं। भीतर अलग-अलग घर बने हैं। यामागुचि दादा जी करीब नब्बे साल के हैं, और कोने वाले छोटे से घर में रहते हैं। उनकी यादाश्त कमज़ोर हो गयी है, इसलिए उनके साथ हमेशा एक नर्स रहती है। वह पहले उनसे मिलने गया।

दादा जी की सभी नर्सें उसे पहचानती हैं। रिकू की तरह वह भी उन्हें ओजीसान यानि दादा जी बुलाता है। जब वह वहाँ पहुँचा तो वह नाश्ता कर रहे थे। उसे देख कर मुस्कराये तो वह बोला, “ओजीसान, कैसे हैं आप?”

दादा जी, सब को देख कर मुस्कराते हैं लेकिन किसी को पहचानते नहीं हैं। वह कुछ नहीं बोले, चुपचाप नाश्ता करते रहे।

ताकानोरी अपने पिता की मृत्यु के बाद पैदा हुआ था और अक्को शहर में अपनी माँ के साथ रहता था। उसके पिता भी यामागुचि परिवार के लिए काम करते थे। उस समय यामागुचि दादा जी सारा काम देखते थे। उनके कई धँधे थे - जूएघर चलाना, वैश्याघर और एस्कोर्ट का धँधा, नशीले पदार्थों की तस्करी और बेचना, और लोगों के खून करवाना। दादा जी उसकी माँ को घर चलाने के लिए पैसे देते थे। उनका पोता रिकू जिस स्कूल में पढ़ता था, उन्होंने ताकानोरी को उसी स्कूल में पढ़ने भेजा था।

जब वह सात साल का था, जब दादा जी ने उसकी गुप्त-शक्ति को पहचान लिया था और कहा था कि वह उनके लिए काम करेगा। उसे मार्शियल आर्ट और विभिन्न शस्त्रों की ट्रेनिन्ग दी गयी थी। लेकिन गुप्त-शक्ति के बारे में दादा जी की जानकारी सीमित थी और उनकी अपनी शक्ति विशेष प्रबल नहीं थी, इसलिए वह उसकी शक्ति को पूरा विकसित नहीं करा पाये थे।

ताकानोरी की दो गुप्त-शक्तियाँ हैं, लोगों के मन की बात को पढ़ना और दूर से गुप्त-शक्ति वाले व्यक्तियों की शक्ति-लहरों को खोजना। लेकिन उसकी इन शक्तियों के बारे में दादा जी भी पूरी तरह से नहीं जानते थे।

जब उसकी स्कूल की पढ़ाई पूरी हुई थी, तब तक दादा जी रिटायर हो गये थे और उनका बेटा बिज़नेस चलाता था। एक साल पहले, एक दर्घटना में उनके बेटे के सिर में चोट आयी थी। उसके बाद से बिज़नेस की ज़िम्मेदारी रिकू ने सम्भाल ली है। वह ओरी से करीब दस साल बड़ा है।

ओरी को लगता है कि रिकू उससे जलता है। उनके धँधे में उसका बहुत नाम है, जिसे कोई नहीं मार पाता, उसे वह मार सकता है। शायद रिकू को यह बात अच्छी नहीं लगती?

दादा जी के पास कुछ देर बैठ कर, वह रिकू से मिलने आया। वह भीतर घुसा तो देखा कि रिकू चटाई पर पालथी मार कर बैठा चाय पी रहा है।

“कोन्नीछिवा बॉस", कह कर उसने हलका सा झुक कर, मुस्कराते हुए उसका अभिवादन किया।

शायद रिकू सोच रहा था कि वह गुस्से में होगा और उसे मुस्कराता देख कर उसे थोड़ा सा आश्चर्य हुआ। वह बोला, “ओजीसान से मिल आये? आओ, यहाँ बैठो", और उसके लिए चाय लाने का इशारा किया, “तुम्हारे लिए एक विषेश काम है, तुम्हें तुरंत इंडिया जाना है और वहाँ से हमारे लिए एक प्रतिमा खोज कर लानी है।"

एक प्रतिमा? उसने सोचा कि वह याकूज़ा है, इस तरह के छोटे-मोटे काम के लिए क्या उनके पास अन्य व्यक्ति नहीं हैं? लेकिन गुरु जी की बात को याद करके, वह कुछ नहीं बोला, चुपचाप रिकू की ओर देखता रहा।

“पिता जी कहते हैं कि यह काम तुम्हें सौंपना चाहिये, वह सोचते हैं कि तुम उस मूर्ति को पहचान लोगे क्योंकि उसमें कुछ विशेष शक्ति है। हम उसे बहुत सालों से खोजने की कोशिश कर रहे हैं। कई बार हमें उसकी खबर मिली, लेकिन हर बार वह भिक्षुक हमसे बच कर भाग गया। अब यह काम तुम्हें करना है।"

"इतने सालों के बाद, हमें उस भिक्षुक का पता कैसे चला?” ओरी ने पूछा।

“तुम हरूकी को जानते हो? उसने उस भिक्षुक को एक वीडियो में देख कर पहचान लिया और हमें खबर की। बहुत साल पहले, एक बार हरूकी उस भिक्षुक को पकड़ने थाईलैंड गया था, पर वह उसके वहाँ पहुँचने से पहले ही भाग गया था। यह वीडियो हिन्दुस्तान के उत्तर-पूर्व में जोरहाट नाम के शहर से है। तुम्हें वहाँ जा कर उस भिक्षुक को खोजना है और उस प्रतिमा को लाना है। किसी भी कीमत पर हमें वह मूर्ति चाहिये। कहते हैं कि उस भिक्षुक के पास कोई गुप्त शक्ति है, इसीलिए वह किसी की पकड़ में नहीं आता।"

“गुप्त शक्ति?”

“इस बात में कितना सच है, मैं नहीं जानता।"

ओरी ने अपना चेहरा निर्विकार रखा लेकिन यह बात सुन कर उसके मन में खलबली सी मच गयी। उसने अपनी शक्तियों को सबसे छुपाया है। अगर भिक्षुक में उसके जैसी कोई शक्ति है, तो उससे इस बारे में बात करना बहुत दिलचस्प हो सकता है।

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सोमवार, जून 01, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 01

 बिष्णुपुर, बांकुरा, पश्चिम बंगाल, 2014

उस मंदिर की दीवारों पर राधा और कृष्ण की कहानियाँ लाल पक्की मिट्टी की शिल्पकला से सजी हुईं थीं। मंदिर के सामने, सड़क के पार, दो बड़े तालाब थे, जिनके किनारों पर ऊँचे-घने पेड़ों की कतारें थीं। उनके पीछे तीन गोलाकार छोटे तालाब और थे, जिनमें काई की वजह से उनके जल का रंग हरे पन्ने जैसा चमकता था। उन तालाबों के पीछे घरों की कतारें थीं, लेकिन उनके बीच में भी बहुत से छोटे-बड़े ताल-तलैया थे।

ऐसे ही एक छोटे से तालाब के किनारे वह झोपड़ी थी, जहाँ पर त्री अपने पिता समान गुरु जी के साथ बड़ा हुआ था।

विष्णुपुर के पक्की मिट्टी की शिल्प कला से सजे वैष्णव मंदिर, बंगाल ही में नहीं, सारे भारत में प्रसिद्ध हैं। शायद उन्हीं से प्रेरणा पा कर त्री शिल्पकार बना है। उसकी लाल रंग की पक्की मिट्टी की  घोड़ों की मूर्तियाँ, मंदिर में आने वाले तीर्थयात्रियों और पर्यटकों में खूब बिकती हैं और उनसे उसकी अच्छी कमाई होती है।

वह गुरु जी से कहता है, “अब मैं अच्छा कमा लेता हूँ, फ़िर जब आप के घटनों में दर्द हो रहा है, तो आप हर रोज़ भिक्षा माँगने के लिए यहाँ-वहाँ क्यों भटकते हैं? आप को आराम करना चाहिये।”

लोग उसके गुरु जी को जामुन बाबा बुलाते हैं, हालाँकि उनका असली नाम जून-मिन है। वह कोरिया देश से आये हैं। वह कहते हैं, "बेटा तुम कमाते हो तो अपने पैसे जोड कर रखना सीखो, एक दिन तुम्हारे काम आयेंगे। मैं तो भिक्षुक हूँ, भिक्षा माँगना मेरा धर्म है।"

सुबह उठ कर गुरु जी अपना कटोरा ले कर भिक्षा माँगने निकल जाते हैं और शाम को घर लौटते हैं। त्री सुबह शिल्प बनाता है और फ़िर सारा दिन मंदिर के बाहर ग्राहक ढूँढ़ता है। सालों से उनका जीवन ऐसे ही चल रहा था, लेकिन एक दिन उनकी यह दिनचर्या बदल गयी।

उस दिन वह सुबह मुँह-अँधेरे, ईंट वाली भट्टी पर अपनी मूर्तियों को पकाने गया था। पक्की मिट्टी के शिल्प को पकाने के लिए बड़ा कौशल चाहिये। पहली बात है कि मूर्तियाँ पूरी तरह से सूखी होनी चाहिये। दूसरी बात, भट्टी का तापमान सही होना चाहिये। और तीसरी, पकने के बाद उन्हें धीरे-धीरे ठंडा करना चाहिये। अगर इन बातों का ध्यान न रखो, तो मूर्तियाँ टूट जाती हैं और सारी मेहनत बेकार हो जाती है।

वह ठेले से मूर्तियाँ उतार कर झोपड़ी में रख रहा था जब गुरु जी ने उसे बुलाया।

“क्या हुआ गुरु जी, आज आप की तबियत ठीक नहीं है?” इस समय तक वह अपनी भिक्षा का कटोरा ले कर निकल गये होते हैं, लेकिन उस दिन वह घर पर थे।

“भीतर से माँ की प्रतिमा उठा लो और मेरे साथ चलो", गुरु जी ने कहा, वह गम्भीर लग रहे थे।

उनके यहाँ एक हरे रंग की माँ तारा की देवी मूर्ति है। गुरु जी कहते हैं कि बौद्धिसत्व अवलोकितेश्वर की करुणामयी आँखों से जब आँसू निकले तो दाहिनी आँख के आँसू से हरित तारा बनी। वह मूर्ति करीब बारह इँच की है, लेकिन भारी नहीं है।

त्री ने अपने ठेले को प्लास्टिक की तिरपाल से ढका और उस मूर्ति को ले आया। तालाबों के बीच से होते हुए, वह मंदिर की ओर आये और उसके प्रांगण के दक्षिण में बनी कीर्तनशाला के चबूतरे पर बैठ गये।

उस समय वहाँ मंदिर देखने वाले इक्का-दुक्का पर्यटक थे, और कीर्तनशाला वाला हिस्सा खाली था। त्री ने माँ तारा की मूर्ति को ध्यान से पास में रख दिया। वह समझ गया था कि आज गुरु जी को कोई विशेष बात करनी है, क्योंकि उससे पहले वह कभी उस मूर्ति को उसके पूजा-स्थान से उठा कर बाहर नहीं लाये थे।

“बताओ गुरु जी, क्या हो गया?” उसने चिंता के साथ पूछा।

गुरु जी कुछ देर तक उसकी ओर देखते रहे, उनकी करुणामय आँखों में नमी चमक रही थी। फ़िर धीरे से बोले, “तुम्हारे यहाँ से जाने का समय आ गया है।"

त्री स्तब्ध रह गया, कुछ बोल नहीं पाया। बचपन से गुरु जी ने उसे कई बार कहा था कि एक दिन उनके जीवन की राहें अलग हो जायेंगी और तब उसे उन्हें छोड कर कहीं दूर जाना पड़ेगा, लेकिन उसे विश्वास नहीं होता था कि ऐसा कभी होगा।

वह बोले, “भिक्षुक सब कुछ त्याग देता है, घर, परिवार, रिश्ते, नाते, उसके लिए कुछ नहीं होते। मैंने भी बहुत कोशिश की, कि तुमसे स्नेह और लगाव न बने, लेकिन मैं उसमें असफल रहा। तुम्हें अपने से दूर भेजना, मेरे लिए आसान नहीं है, लेकिन करना ही होगा।"

“क्यों?”

“क्योंकि अब तुम्हें अपने जीवन की नयी राह बनानी है। मैं तुम्हें हमेशा के लिए अपने से दूर नहीं भेज रहा, हम लोग मिलते रहेंगे। लेकिन मैं चाहता हूँ कि जितना मैंने तुम्हें सिखाया है, तुम उसके लिए एक नया भविष्य बनाओ ताकि वह हमारे साथ समाप्त नहीं हो, आगे चलता रहे।"

त्री ने धीरे से सिर हिला कर हामी भरी।

"तुमने अपने माता-पिता के बारे में मुझसे कई बार पूछा है, आज मैं तुम्हें वह सारी बात बताऊँगा। तुम मुझे गुवाहाटी में मिले थे। जहाँ गुवाहाटी का हवाई अड्डा है, उसके पास एक झील है, दीपोर बील। झील के बीच में एक पुल है जहाँ से रेल गुज़रती है। पुल के दूसरी ओर झील का एक छोटा सा कटा हुआ हिस्सा है, जहाँ मैं रहता था। झील के पास, एक कूड़े की पहाड़ी थी। दिन भर शहर से ट्रक आते थे और उस पहाड़ी पर कूड़ा गिराते थे। वहाँ पास में कुछ गरीब लोग रहते थे, जो उस कूड़े में काम की चीज़ें खोजते और बेचते थे। एक दिन शाम को मैं वहाँ से गुज़र रहा था, अँधेरा होने लगा था और कूड़े में खोजने वाले सब लोग चले गये थे। वहाँ मैंने तुम्हें देखा, तुम सड़क के किनारे बैठे थे, तीन-चार साल के थे।"

“वहाँ पास में रशीद नाम का कबाड़ी वाला रहता था, जिसे मैं जानता था। मैंने तुम्हारा हाथ पकड़ा और रशीद के पास गया, पता चला कि तुम्हारी माँ की मृत्यु हो गयी थी और तुम्हारा और कोई नहीं था। वह बोला कि पुलिस थाने में खबर दे दी है, तुम्हें अनाथाश्रम ले जाने के लिए वह किसी को भेजेंगे। मैं तुम्हें वहाँ अकेला नहीं छोड़ना चाहता था, तुम्हारे पास बैठ गया, सोचा कि जब पुलिसवाला तुम्हें लेने आयेगा, तब मैं अपनी कुटिया में लौट जाऊँगा। लेकिन रात हो गयी, कोई नहीं आया। तब मैंने सोचा कि उस रात को तुम मेरी कुटिया में रह सकते हो, तुम्हें अपने साथ ले आया। मैं चकित था कि तुम एक बार भी नहीं रोये, न ही कुछ कहा। चुपचाप उठ कर मेरे साथ कुटिया में आ गये। मेरे पास एक ही दरी थी जिस पर मैं सोता था, तुम मेरे साथ ही सोये।"

त्री मूक गुरु जी को देख रहा था, उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

“उस रात मेरे सपने में माँ तारा आयीं, वैसा सपना मैंने पहले कभी नहीं देखा था। माँ मेरे सिरहाने खड़ी थीं, चारों ओर उनका प्रकाश फ़ैला था। माँ ने मेरे माथे पर हाथ रखा और मुस्करायीं, तब मैंने देखा कि सपने में तुम भी हो। उस सपने में और क्या हुआ, मुझे याद नहीं, लेकिन जब सुबह हुई तो माँ की वह स्मृति मेरे मन में जीवित थी। उसी दिन मैंने अपनी दरी, भिक्षा की कटोरी और माँ की प्रतिमा समेट लीं, तुम्हें साथ लिया और यात्रा पर निकल पड़ा। घूमते-घूमते, डेढ़-दो साल के बाद हम यहाँ विष्णुपुर आये और रुक गये। जिस दिन तुम मुझे मिले थे, वह आज का ही दिन था, अठारह फरवरी, और इस बात को आज चौदह साल हो गये हैं।"

कुछ देर तक त्री रोता रहा, फ़िर आँसू पोंछ कर बोला, “मेरा नाम, त्रिनेत्र, मुझे आप ने ही दिया?”

गुरु जी ने एक थैली से एक काला धागा निकाला जिस पर एक छोटा सा त्रिशूल लटक रहा था, उसकी ओर बढ़ाते हुए बोले, “जब तुम मिले तब यह धागा तुम्हारे गले में था, शायद तुम्हारी माँ शिव-भक्त थीं? त्रिनेत्र माने शिव जी का तीसरा नेत्र, उसे आत्म-ज्ञान और दिव्य दृष्टि का प्रतीक मानते हैं। तुम्हारी गुप्त शक्ति की वजह से मैंने तुम्हारे लिए यह नाम चुना।"

“मेरी गुप्त शक्ति के बारे में आप को कब पता चला?”

गुरु जी मुस्कराये, बोले, “जब मैंने कूड़े की पहाड़ी के पास तुम्हें बैठे देखा था, तभी मुझे तुम्हारे भीतर छिपी शक्ति की अनुभूति हो गयी थी।"

त्री की गुप्त शक्ति है कि वह जब चाहे तब गुम हो सकता है। एक क्षण पहले वह सामने बैठा है और दूसरे क्षण, वह चाहे तो दिखाई नहीं देता। लगता है जैसे उसकी शक्ति से उसके शरीर के अणु-परमाणु बेरंग या पारदर्शी हो जाते हैं। बचपन से उसने गुरु जी से ध्यान लगाना, मन को एकाग्र करना और उस शक्ति पर नियंत्रण करना सीखा है। अब वह उस शक्ति के संचालन में इतना दक्ष है कि उसे न दिखाई देने के लिए सोचना नहीं पड़ता।

गुरु जी फ़िर मुस्कराये, बोले, “लेकिन मैंने तुम्हें कभी अपनी गुप्त शक्ति के बारे में नहीं बताया।"

त्री भौचक्का हो गया, बोला, “आप भी लुप्त हो सकते हैं?”

“नहीं", गुरु जी ने सिर हिला कर मना किया, बोले, “मेरी गुप्त शक्ति तुमसे भिन्न है। दुनिया में दस हज़ार में से एक बच्चे में गुप्त शक्ति की छिपी हुई सम्भावना होती है। अगर उसे बचपन में जागृत और विकसित न किया जाये तो वह शक्ति मुरझा कर मर जाती है। किसी की श्रवण शक्ति होती है, किसी की दृष्टि शक्ति और किसी की मानस-शक्ति। हमारी यह माँ तारा की प्रतिमा", उन्होंने पास रखी मूर्ति की ओर इशारा किया, “यह सामान्य मूर्ति नहीं है, जब यह पास हो तो इससे बच्चों की गुप्त शक्ति जागृत, विकसित और प्रबल हो जाती है।"

“माँ की इस मूर्ति से शक्ति जागृत होती है?”

“हाँ, और इस प्रतिमा की रक्षा के लिए सालों से मैं अपना देश त्याग कर भटक रहा हूँ। कुछ बुरे लोग हैं जो इसे छीनना चाहते हैं। वह शक्ति का प्रयोग गलत कामों के लिए करना चाहते हैं, बच्चों को चोर, डाकू और खूनी बनाना चाहते हैं। उन्होंने इसके लिए मेरे गुरु जी को मार दिया। मैं चाहता हूँ कि तुम इस प्रतिमा को ले कर कहीं दूर चले जाओ, वहाँ एक अनाथाश्रम खोलो और गुप्त-शक्ति वाले बच्चे खोज कर, उनकी शक्तियाँ विकसित करके, उन्हें अच्छे कामों के लिए तैयार करो।"


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अगला अध्याय पढ़िये

गुरुवार, मई 28, 2026

नया धारावाहिक उपन्यास

करीब एक-डेढ़ महीना पहले मैंने एक नया फैंतेसी उपन्यास लिखा, "देवी प्रतिमा के रक्षक"। यह एक छोटा सा हल्का-फुल्का उपन्यास है, जिसमें ताकानोरी नाम का एक जापानी याकूज़ा-गुँडा, एक गुप्त-शक्ति वाली मूर्ति की खोज में हिन्दुस्तान आता है और उसका मुकाबला एक अनाथालय में काम करने वाले युवक त्रिनेत्र और वहाँ रहने वाले अनाथ बच्चे करते हैं।

साथ की तस्वीर में उपन्यास के तीन प्रधान पात्र हैं - कोरिया के बौद्ध भिक्षुक जून मिन जिन्हें उनके भारतीय भक्त जामुन बाबा के नाम से जानते हैं, जापानी याकूज़ा ताकानोरी और अनाथाश्रम में काम करने वाला त्रिनेत्र। अगले सोमवार, 1 जून 2026 से आप इस उपन्यास को इसी ब्लाग पर पढ़ सकेंगे। 

अमेज़न या अन्य ओन-लाईन पर्टल या प्रकाशक के पास अपने उपन्यास को छपवाने की जगह पर मैंने अपने उपन्यास को ब्लॉग पर डालने का निर्णय क्यों लिया, इस आलेख में मैं इसकी बात करना चाहता हूँ।  

बचपन की यादें

जब मैं छोटा था तब बहुत सी हिंदी पत्रिकाएँ छपती थीं। पहले चँदामामा पत्रिका में रामायण की कथा छपती थी, वह पढ़ता था। कुछ बड़ा हुआ तो हमारे घर पर धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी सप्ताहिक पत्रिकाएँ आती थीं। उनमें अक्सर धारावाहिक उपन्यास छपते थे, यानि हर सप्ताह उपन्यास का एक नया अध्याय पढ़ने को मिलता था। तब पत्रिका आने और उपन्यास पढने की बहुत प्रतीक्षा रहती थी। शिवानी, शंकर, किशन चंदर, अन्नपूर्णा देवी और बिमल मित्र जैसे लेखकों से मेरा इसी तरह से परिचय हुआ था।

आजकल हिंदी की वैसी साप्ताहिक पत्रिकाएँ आनी बंद हो गयीं हैं। हिंदी की कुछ मासिक पत्रिकाएँ हैं लेकिन मुझे नहीं लगता कि उपन्यास के एक अध्याय को पढ़ने के लिए कोई एक महीने तक प्रतीक्षा करेगा। बल्कि, एक महीने पहले क्या पढ़ा था, उसे याद रखना कठिन होगा। मैं सोच रहा था कि पहले जैसा धारावाहिक उपन्यास पढ़ने का अनुभव आज के पाठकों को कैसे दिया जा सकता है? तब उसे ब्लाग में छापने की बात मन में आयी।

इस ब्लाग के आलेखों को दो सौ - तीन सौ पाठक आसानी से मिल जाते हैं, और कुछ लोकप्रिय आलेखों को पढ़ने वालों की संख्या कुछ हज़ार तक पहुँच जाती है। मैंने सोचा है कि अगर मेरे उपन्यास को ब्लाग से सौ - दो सौ पाठक मिल जायें तो मेरे लिए काफ़ी हैं और इसके लिए मुझे किसी अन्य पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा।

मुझे अच्छी पैंशन मिलती है, मुझे और पैसे की आवश्यकता नहीं है। वैसे भी जहाँ तक मुझे मालूम है, आम हिंदी लेखकों की किताबों से कमायी अधिक नहीं होती।   

हिंदी किताबों के प्रकाशक 

हिंदी प्रकाशनों के बारे में जितना पढ़ा-जाना है, उससे लगता है किताब छपवाना बहुत कठिन है, और वह मेरे बस की बात नहीं है। मेरे एक अन्य उपन्यास को छापने की मित्र अरविंद मोहन की सहायता से एक प्रतिष्ठित प्रकाशक से करीब तीन साल पहले बात हुई थी, वह अभी तक नहीं छपा और न ही उसके छपने के कुछ आसार दिखाई देते हैं।

कुछ दिन पहले जाने-माने पत्रकार और लेखक प्रिय दर्शन ने कुछ दिन पहले फेसबुक पर हिंदी लेखकों की स्थिति के बारे में लिखा था, कि "लेखक का पारिश्रमिक या तो बंद हो चुका है या घटता जा रहा है। जो वेब पोर्टल पहले लेखक को पैसे देते थे, उन्होंने पारिश्रमिक देना बंद कर दिया है, क्योंकि वे 'घाटे' में चल रहे हैं। किताबों की रॉयल्टी इतनी कम मिलती है कि बताने में कोई शर्मिंदा हो जाए। ... प्रकाशन की दुनिया में पैसे देकर- या अपनी अफ़सरी या नेतागीरी के बूते किताबें बिकवा कर- किताबें छपवाने का जो नया चलन शुरू हुआ है, उसने लेखकों के सामने एक नई मुश्किल पैदा कर दी है। उनकी किताबें प्रकशकों के यहां पड़ी रहती हैं- उनका प्रकाशन टलता जाता है। किताबों के प्रचार का ज़िम्मा भी लेखक का है प्रकाशक का नहीं"।

वैसे अगर मैं चाहूँ तो मैं अपने उपन्यास को पैसे दे भी कर छपवा सकता हूँ, पर मुझे लगता है कि उससे मैं अपने उपन्यास को कुछ जान-पहचान के लोगों को भेज दूँगा, लेकिन उसे सामान्य पाठक नहीं मिलेंगे। वैसे भी यह हल्का-फुल्का जासूसी किस्म का उपन्यास है, शायद इसे ब्लाग पर अधिक लोग पढ़ेंगे।

वैसे तो दुनिया में एमाज़ॉन और नॉटनुल जैसी वेबसाईट हैं जहाँ किताबें छापी जा सकती हैं। मुझे एमाज़ॉन के किन्डल प्रकाशन का अनुभव नहीं है, लेकिन मैं नॉटनुल पर नियमित हिंदी पत्रिकाएँ पढ़ता हूँ। उनमें किताबें छपवा सकता हूँ, लेकिन मुझे लगा कि अगर मुझे लेखन की कमाई नहीं चाहिए, तो मैं अन्य झंझट क्यों करूँ?

कुछ अन्य ख्याली पुलाव

एक बार उपन्यास का धारावाहिक प्रकाशन पूरा हो जायेगा तो सोचा है कि जो पाठक चाहेंगे मैं उन्हें इस उपन्यास को उन्हें ईमेल से पीडीएफ, इपब और मोबी फॉरमैट में भी भेज सकता हूँ, ताकि जो लोग मेरे ब्लाग को नहीं पढ़ना चाहते, वह भी इसे पढ सकते हैं।

मैं यह भी चाहता हूँ कि युवा लोग हिंदी में पढ़ें और लिखें। उन्हें प्रोत्साहन देने के लिए मैं युवा पाठकों के लिए "आलोचना पुरस्कार" आयोजित करने की भी सोच रहा हूँ, यानि सोचा है कि मेरे उपन्यासों की सार्थक आलोचना लिखने वाले पाँच-दस युवाओं को मैं कुछ पुरस्कार दे सकता हूँ और उनकी आलोचना को ब्लाग पर जगह दे सकता हूँ - इसके बारे में भी सोच कर अगले दिनों में कुछ निर्णय लूँगा।

आशा है कि अगले सोमवार एक जून से आप मेरे उपन्यास "देवी प्रतिमा के रक्षक" को पढ़ेंगे और मुझे अपनी राय भेजेंगे। बाकी की सब बातें अभी दिमाग में घूम रही हैं, अगले कुछ दिनों में मैं इस विषय में निर्णय लूँगा। इस बारे में मेरे साथी ब्लॉग लेखक और पाठक मुझे कुछ सलाह देना चाहें तो उसके लिए आप को अग्रिम धन्यवाद।

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मंगलवार, अप्रैल 28, 2026

गुवाहाटी जाने की यात्रा

आज से दस साल पहले अप्रैल 2016 में, मैं भारत में दो साल के गुवाहाटी प्रवास के बाद इटली लौटा था।

आज जब उस दसवीं वर्षगाँठ की बात अचानक याद आ गयी तो सोचा कि क्यों न उन दिनों की यादों को ताज़ा किया जाये और उन दिनों पर एक आलेख लिखा जाये। तीन दशकों तक विदेश में रह कर स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने के बाद, जब 2014 में मैंने भारत जाने की सोची थी तब गुवाहाटी जाने का विचार मन में नहीं था, बल्कि कुछ अन्य काम करने की सोची थी।

सोचता था कि कहीं मन का काम नहीं मिलेगा तो किसी मन-पसंद छोटे शहर में जगह को खोज कर वहाँ अपना छोटा सा क्लीनिक खोल लूँगा। लेकिन अपना क्लीनिक खोलने से पहले, मैं कुछ मित्रों के पास रह कर देखना चाहता था कि शायद उनके साथ मन लग जाये, सोचता था कि वह बेहतर होगा क्यों कि मैं अकेले रहने के विचार से डरता था।

हम कुछ सोच कर चलते हैं और नियति हमें किसी ओर दिशा में ले जाती है। आज के इस आलेख में मेरी गुवाहाटी पहुँचने की उस यात्रा के विभिन्न पड़ावों की बाते हैं। 

केसला, मध्यप्रदेश 

सारा जीवन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने के बाद मैंने निश्चय किया था कि 2014 में, अपनी साठवीं वर्षगाँठ पर मैं नौकरी से इस्तीफा दे कर कुछ समय भारत में बिताने जाऊँगा। मेरी वह यात्रा केसला के गाँव से शुरु हुई।

मेरी बात सबसे पहले इटारसी के पास, केसला (मध्यप्रदेश) में ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत समाजवादी विचारधारा वाले सुनील जी से हुई थी। वह वहाँ पर बहुत समय से गरीब लोगों के विकास और मानव अधिकारों के लिए काम कर रहे थे। मैंने सोचा था कि उनके साथ काम करूँगा। जब अप्रैल 2014 में मुझे उनकी अकस्मात मृत्यु का समचार मिला तो गहरा धक्का लगा। मुझे लगा कि उनके बिना शायद वहाँ पर काम करना नहीं हो पायेगा, फ़िर भी भारत पहुँच कर सबसे पहले मैं उनके घर पर केसला ही गया था।

केसला गाँव, मध्यप्रदेश

सुनील जी की पत्नि मॉन्टी (स्मिता) से मेरा दूर का रिश्ता भी है, और हमारी पुरानी जान-पहचान भी थी। केसला में मैं कुछ दिन उनके साथ उनके घर पर रहा, सुनील की के विभिन्न साथियों से मेरी जान-पहचान हुई। लेकिन मुझे लगा कि सुनील जी के अचानक जाने की वजह से वहाँ जो जगह रिक्त हुई थी, उसका घाव उस समय बिल्कुल ताज़ा था। मैंने सोचा कि पता नहीं, उनके बिना, बाकी के उनके साथी उस काम को किस तरह आगे चला पायेंगे?

यह भी सोचा कि वहाँ सुनील जी के न होने से, वहाँ रह कर स्वास्थ्य के क्षेत्र में कुछ नया काम शुरु करना मेरे लिए कठिन होगा। यह सोच कर मैं वहाँ से चल पड़ा।

बिलासपुर, छत्तीसगढ़ 

तब मैं केसला से बिलासपुर गया। वहाँ पर गनियारी में जन स्वास्थ्य सहयोग के अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के बारे में बहुत प्रशंसा सुनी थी। उन्होंने मुझे वहाँ पर कुष्ठ रोग उपचार और विकलांगता कार्यक्रम में काम करने के लिए कहा, उस काम का विचार भी मुझे बहुत अच्छा लगा था।

जन स्वास्थ्य सहयोग संस्था को डॉ. योगेश जैन जैसे आदर्शवादी डॉक्टरों ने शुरु किया था, उनके साथ काम करने का विचार मुझे बहुत आकर्षित कर रहा था। मैं उनके सामुदायिक स्वस्थ्य कर्मचारियों के साथ कुछ गाँवों के क्लिनिक देखने भी गया।

जन स्वास्थ्य सहयोग का मानपुर गाँव में क्लिनिक, छत्तीसगढ़

लेकिन एक दिक्कत थी, कि उनके होस्टल में जगह नहीं थी, वहाँ काम करने का मतलब था कि मुझे पास के किसी गाँव में अलग घर ले कर रहना पड़ता। मैं अकेला रहने के विचार से डर रहा था। दो-तीन दिन वहाँ रहा, बहुत सोचा, पर मुझे लगा कि मैं वहाँ गाँव में अकेला नहीं रह पाऊँगा। आखिर में मैं वहाँ से निकल पड़ा।

जीवन में कभी-कभी ऐसे अवसर आते हैं जब आप कुछ करने से रुक जाते हैं लेकिन उसके निशान आप के मन में रह जाते हैं। उसके बाद सालों तक आप अपने आप से पूछते हैं कि अगर मैंने वह रास्ता चुन लिया होता तो मेरा जीवन कैसा होता? गनियारी के जन स्वास्थ्य सहयोग में काम करने के बारे में मुझे ऐसा ही लगता रहा है, दुख होता है कि मैंने वहाँ पर अकेले रहने की कोशिश क्यों नहीं की।  

लखनऊ, उत्तर प्रदेश

बिलासपुर से मैं लखनऊ गया जहाँ पर मेरी पुरानी मित्र डॉ. ब्रिजिता का सैंट मेरी क्लीनिक, अस्पताल और नर्सिन्ग कॉलेज था। 

सैंट मेरी की नर्सिन्ग की छात्राएँ, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

अस्पताल और नर्सिन्ग स्कूल के काम के साथ-साथ डॉ. ब्रिजिता आसपास के जिलों में बहुत से ग्रामीण क्षेत्रों में भी सामुदायिक स्वास्थ्य तथा विकलाँग जनों के लिए कार्यक्रम चला रही थीं। मैं उनके पास करीब एक मास रुका।

उनके साथ ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यक्रम में काम करने का विचार था लेकिन भीषण गर्मी में गाँवों में घूमने के एक-दो अनुभवों के बाद मैं समझ गया कि मैं गाँवों के उस कठिन वातावरण में अधिक दिन तक नहीं रह पाऊँगा। इस तरह से मैंने डॉ. ब्रिजिता से भी विदा ली।

मनाली, हिमाचल प्रदेश

मेरे एक अन्य मित्र के पिता मनाली के क्षेत्र में एक स्वयंसेवी संस्था चला रहे थे, जहाँ वह सामुदायिक विकास के साथ-साथ, स्वास्थ्य कर्मियों के साथ भी काम करते थे। लखनऊ के बाद मैं कुछ दिन उनके पास रहने गया। उनकी संस्था का डॉक्टर काम छोड कर चला गया था, उन्हें एक डॉक्टर की आवश्यकता थी। 

उनकी संस्था का अधिकाँश काम मनाली शहर में था पर उनका घर शहर के बाहर, कुछ दूर जा कर था। उनके घर के साथ उनका एक अन्य फ्लैट भी था, उन्होंने कहा कि अगर मैं उनके साथ काम करूँगा तो उस फ्लैट में रह सकता हूँ।

वहाँ बाकी सब कुछ बढ़िया था, लेकिन पहाड़ों के बीच में, सर्दियों में ठंड और हिमपात के साथ, शहर के बाहर उस बहुत सुंदर लेकिन सुनसान जगह में रहने के विचार से मुझे डर लगा। इतनी सुंदर जगह पर रहने का सोच कर अच्छा भी लगता था, पर शहर से बिल्कुल बाहर, सुनसान जगह का डर भी था।

शुरु गाँव, मनाली, हिमाचल प्रदेश

उन्हीं दिनों में मुझे एक अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रैंस के लिए आयरलैंड जाना था, सोचा कि वहाँ से लौट कर ही निर्णय लूँगा कि मनाली में काम स्वीकारूँ या नहीं।

उन दिनों में मन में थोड़ी सी मायूसी भी थी कि अभी तक कोई ऐसी जगह नहीं मिली थी जहाँ मुझे पूरे दिल से लगे कि हाँ, मैं यहाँ रह कर, इस जगह में काम करना चाहता हूँ। हर जगह की कुछ बातें अच्छी लगती थीं, कुछ नहीं।

सोचा कि शायद मुझे अपना क्लिनिक खोलने के लिए अपनी पसंद का छोटा गाँव खोजना पड़ेगा, जो किसी शहर से बहुत दूर नहीं हो, और जहाँ अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बहुत दूर न हो। ऐसी कोई जगह सचमुच हो सकती है, इसका मुझे शक था।

गुवाहाटी, असम

आयरलैंड और इटली में कुछ दिन बिता कर मैं वापस भारत लौटा तो विश्व स्वास्थ्य संस्थान के मेरे पुराने मित्र चपल खासनबिस के माध्यम से मुझे बँगलौर की स्वयंसेवी संस्था "मोबिलिटी इंडिया" के लिए गुवाहाटी में विकलांग जनों के लिए नया कार्यक्रम प्रारम्भ करने के काम का आफर मिला।

मैं कुछ साल पहले, एक अन्य स्वास्थ्य कार्यक्रम के सिलसिले में एक बार पहले गुवाहाटी गया था और वहाँ करीब दस दिन रहा था, इसलिए वह शहर मेरे लिए अनजाना नहीं था।  

मैं गुवाहटी पहुँचा, कुछ मित्रों के माध्यम से मैंने उज़ान बाज़ार क्षेत्र के एक होटल में कमरा बुक किया था। मेरा विचार था कि वहाँ पर सप्ताह-दस दिन रुक कर, वहाँ की स्वास्थ्य के क्षेत्र में सक्रिय विभिन्न सरकारी व स्वयंसेवी संस्थाओं से मिलूँगा, और विकलांग जनों के लिए नया कार्यक्रम शुरु हो सकता है या नहीं, इसकी बात समझने की कोशिश करूँगा।

पहले दिन सुबह मुझे एक संस्था के दफ्तर में किसी से मिलने जाना था, होटल से निकला और कुछ दूर पर मेरी मुलाकात बतखों के एक दल से हो गयी। सड़क के किनारे पर वह बतखें एक कतार में चल रही थीं, सुबह का दफ्तर जाने वाला सारा ट्रैफिक, उनके पास धीमा करके जा रहा था ताकि उन्हें दिक्कत नहीं हो। पता चला कि वह पास के उग्रतारा मंदिर की बतखें हैं।

उग्रतारा मंदिर की बतखें, गुवाहाटी, असम

पता नहीं क्यों, उन बतखों को देख कर मुझे लगा मानो नियति ने मुझे संदेश भेजा हो कि इसी शहर में मुझे रुकना है, सोचा कि जिस शहर के लोग बतखों के सड़क पर चलने का ध्यान रख सकते हैं, वहाँ रहना अच्छा होगा।

अंत में

जिस दिन मैं गुवाहाटी में उग्रतारा की बतखों से मिला था, उसी दिन मेरी मुलाकात फादर पॉल से भी हुई, जिनके साथ मैं बहुत समय तक रहा और जो असम के उन दिनों में मेरे सबसे करीबी मित्र बने।

यही मेरी किस्मत में लिखा था कि मैं गुवाहाटी में रहूँ और वहाँ बहुत से लोगों से मित्रता बने और उत्तर-पूर्वी भारत के क्षेत्र को जानू और समझूँ। 

*** 

शुक्रवार, मार्च 20, 2026

मेरा फैंतासी उपन्यास

बहुत सालों से मैं एक हल्का-फुल्का सा जासूसी उपन्यास, जेम्स बॉन्ड जैसा कुछ, लिखना चाहता था। बचपन में ऐसी किताबें पढ़ना मुझे बहुत अच्छा लगता था।

साठ के दशक में, घर पर पापा की अलमारी में बहुत सी गम्भीर साहित्य वाली किताबें थीं, जिन्हें मैंने बहुत छोटी उम्र में पढ़ना शुरु कर दिया था - नानक सिंह, रांगेय राघव, किशन चंदर, चतुरसेन, जैसे बहुत से लेखक मुझे अच्छे लगते थे। घर में सारिका, धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी पत्रिकाएँ भी आती थीं जिनमें मुझे शिवानी, शंकर, बिमल मित्र जैसे लेखकों को पढ़ना भी अच्छा लगता था।

लेकिन गम्भीर साहित्य के साथ हल्का-फुल्का साहित्य भी मुझे प्रिय था। मेरी मौसी की सहेली जो हमारी पड़ोसी थी, उनके यहाँ जासूसी उपन्यास पढ़ने को मिलते थे। मौसी के अपने सबसे प्रिय लेखक थे गुलशन नन्दा, जिनकी बहुत सी किताबें मैंने गर्मियों की छुट्टियों में पढ़ी थीं। छुट्टियों में हम कई बार बड़ी मौसी के यहाँ पश्चिमी बंगाल में अलीपुर द्वार जाते थे, जहाँ जाने की यात्रा में तीन दिन लगते थे, तब रास्ते भर मैं स्टेशन से खरीदी जासूसी और गुलशन नन्दा किस्म की किताबें पढ़ता था।

नया उपन्यास - देवी प्रतिमा के रक्षक 

आखिर में मैं अपना सपना पूरा करने में सफल हुआ। असल में इसे लघु उपन्यास कहना चाहिये, और इसे लिखने में मुझे बहुत मज़ा आया। मैं इसके प्रकाशन के बारे में सोच रहा हूँ, नये लेखकों के लिए हिंदी किताबों के प्रकाशक मिलना कठिन लगता है, और चूँकि मैं विदेश में रहता हूँ, प्रकाशित करवाने में और भी दिक्कते हैं। वैसे तो सुना है कि हिंदी किताबों के लेखन की कमाई से जीवन-यापन कठिन है, लेकिन मेरे पास मेरी पैंशन है, मुझे पैसे की आवश्यकता भी नहीं है, इसलिए मैंने सोचा है कि इसे अपने इस ब्लाग पर ही प्रकाशित कर चाहिये। आप की क्या राय है?

उपन्यास "देवी प्रतिमा के रक्षक" का कवर चित्र

यह उपन्यास लिखने की यात्रा

मेरे पहले दो उपन्यास साहित्यिक विषयों पर थे। एक उपन्यास लिखने में मुझे दो-तीन साल लगते थे, लेकिन मन कभी संतुष्ट नहीं होता था, इसलिए मैं उन्हें बार-बार लिखता, दस-पंद्रह बार भी। जबकि इस फैंतासी उपन्यास लिखने में सिर्फ दो महीने लगे।

शुरु में सोचा था कि उपन्यास एक रहमदिल खूनी पर होगा, जिसे अपने खून-खराबे पर पछतावा है और जो अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए अब केवल बुरे लोगों को मारता है, यानि कि वह एक तरह का रोबिनहुड-खूनी है। लेकिन जब उसे लिखने लगा तो वह कहानी उस खूनी के हृदय परिवर्तन की बात पर केन्द्रित हो गयी, यानि कि उस खूनी का दिल क्यों और कैसे बदलता है।

मेरे उपन्यास का खूनी, ताकानोरी ओकामो, एक जापानी याकूज़ा है, जिसे दक्षिण कोरिया के एक बुद्ध भिक्षुक की विशेष शक्ति वाली मूर्ति की खोज है। वह भिक्षुक जी उस मूर्ति के साथ कई सालों से भारत में एक वृद्धाश्रम में छिपे हुए रहते हैं।

उपन्यास लिखते हुए कथानक में एक और परिवर्तन हुआ, कि उस खूनी की कहानी के साथ, यह एक अनाथाश्रम में रहने वाले कुछ गुप्त-शक्तियों वाले बच्चों की कहानी भी बन गयी। उपन्यास पूरा करने के बाद मुझे लगा कि शायद मेरी कहानी के नायक त्रिनेत्र और उनके साथी बच्चे "मिस्टर इंडिया" फ़िल्म से कुछ हद तक प्रभावित हैं।

शायद यह उपन्यास बड़े बच्चों, किशोरों और नवजवानों के लिए अधिक उपयुक्त है, पर यह निर्णय तो पाठक ही कर सकते हैं। यह उपन्यास भारत के उत्तर-पूर्व की पृष्ठभूमि पर है, इसका एक बड़ा हिस्सा, असम के मजूली द्वीप पर केन्द्रित है, उसके अलावा इसमें विष्णुपुर, गंगटोक और मणिपुर भी हैं।  

उपन्यास का कवर

मेरे बेटे ने कृत्रिम बुद्धि (ए.आई.) यानि आर्टिफीशियल इन्टैलिजैंस से इसके लिए बहुत से कवर बना कर दिये, जिनके कुछ नमूने आप नीचे देख सकते हैं।

ए.आई. से बने मूल चित्र

अंत में मैंने जो कवर चुना, मुझे लगा कि उसके रंग अच्छे नहीं हैं, वह स्पष्ट रूप से दिखता है कि ए.आई. से बना है। मैंने उसके रंग हटा कर उन्हें कम्प्यूटर पर हाथ से रंगा और कुछ फिल्टर लगा कर देखे। जब उपन्यास निकलेगा, तब आप को इस पर राय देने का मौका मिलेगा। 

अंत में

पाठकों को यह उपन्यास कैसा लगेगा, पता नहीं, लेकिन मुझे इसे लिखने में बहुत आनन्द आया। यह लिखा भी फटाफट ही गया। जून में मेरा जन्मदिन होता है, सोचा है कि इस अवसर पर, "देवी प्रतिमा के रक्षक" को इसी ब्लॉग पर पाठकों के लिए किश्तों में प्रकाशित किया जाये।

मेरे मन में एक और ख्वाहिश भी है, साईन्स फिक्शन का उपन्यास लिखने की। फैंतासी लिखने में इतना मज़ा आया, मुझे आशा है कि साईन्स फिक्शन लिखने में भी उतना ही आनन्द आयेगा। अभी उसकी पलैनिन्ग शुरु की है।

*** 

बुधवार, जनवरी 14, 2026

फ़िल्मों के आदर्शवादी धर्मेन्द्र

कुछ सप्ताह पहले फ़िल्म अभिनेता धर्मेन्द्र की मृत्यु हुई थी। उन्होंने बहुत सी फ़िल्मों में भिन्न तरह के किरदार निभाये थे। वह फ़िल्मों में कई बार आदर्शवादी व्यक्ति, विषेशकर लेखक या कवि के रूप में भी आये थे, जो मुझे बहुत अच्छी लगती थीं। आज मैं उनमें से कुछ फ़िल्मों की बात करना चाहता हूँ।

Stills of Dharmendra from the film Satyakam

 

बन्दिनी (बिमल रॉय, 1963)

मैं नौ साल का था जब पापा के साथ दिल्ली के ओडियन सिनेमा में 'बन्दिनी' देखने गया था। मैंने बंगाली लेखक जरासंध के बंगाली उपन्यास 'तामसी' का हिन्दी अनुवाद पढ़ा था जिस पर यह फ़िल्म आधारित थी, और वह उपन्यास मुझे बहुत अच्छा लगा था। 'बन्दिनी' की नायिका कल्याणी (नूतन) को अपने गाँव में कैद काट रहे स्वतंत्रता-संग्रामी विकास (अशोक कुमार) से प्रेम हो जाता है, लेकिन वहाँ से जाने के बाद वह उसे भूल सा जाता है।

बदनामी की वजह से गाँव से निकाली कल्याणी एक खून के अपराध के लिए जेल काट रही है, जहाँ वह आदर्शवादी डॉ. देवेन (धर्मेन्द्र) से मिलती है। देवेन उससे प्रेम करता है और उससे विवाह करना चाहता है लेकिन अंत में कल्याणी बीमार विकास के पास लौट जाती है।

कोई पढ़ा-लिखा, सुन्दर नवजवान क्या किसी का खून करने वाली युवती से इतना प्रेम कर सकता है कि उससे विवाह करना चाहेगा, चाहे वह कितनी भी सुन्दर और सुशील क्यों न हो और चाहे वह खून उसने परिस्थिति से मजबूर हो कर ही किया हो? सोचूँ तो यह कुछ अविश्वास्नीय सी बात लगती है लेकिन धर्मेन्द्र और नूतन दोनों ही इस फ़िल्म में इतने अच्छे थे कि उसे विश्वास्नीय बना देते हैं।

अनुपमा (ऋषिकेश मुखर्जी, 1966)

उमा (शर्मिला टैगोर) को जन्म देते हुए उसकी माँ की मृत्यु हो गयी थी। इसी अपराध-बोध में पली-बड़ी हुई उमा चुपचाप रहने वाली अंतर्मुखी नवयुवती है। उसका विवाह एक अच्छे परिवार के युवक से तय हुआ है। बीमार पिता के साथ पहाड़ पर आयी उमा की मुलाकात आदर्शवादी कवि-लेखक अशोक (धर्मेन्द्र) से होती है, जो उमा की भावनाओं को समझता है। आखिर में उमा पिता के तय किये रिश्ते को छोड़ कर कम पैसे वाले अशोक को चुनती है।

इस फ़िल्म के सभी गाने बहुत सुंदर थे। उनमें से एक गीत, "या दिल की सुनो दुनिया वालों", अशोक के आदर्शवाद का घोषणापत्र है।

बहारें फ़िर भी आयेंगी (शाहिद लतीफ, 1966)

अखबार प्रकाशन जगत पर बनी इस फ़िल्म के प्रोड्यूसर-नायक पहले गुरुदत्त थे, लेकिन उनकी आत्महत्या के बाद यह भाग धर्मेन्द्र को मिला। इसमें उन्होंने खान मजदूरों के शोषण के बारे में लिखने वाले आदर्शवादी पत्रकार जीतेन (धर्मेन्द्र) का भाग निभाया था। जिस अखबार के लिए वह काम करते हैं उसकी मालकिन अमिता (माला सिन्हा) उनसे प्रेम करने लगती हैं लेकिन जीतेन को उनकी छोटी बहन सुनीता (तनूजा) से प्रेम है।  

सत्यकाम (ऋषिकेश मुखर्जी, 1969)

सत्यकाम आचार्य (धर्मेन्द्र) अपने दादा जी (अशोक कुमार) के पास बड़ा हुआ है जिन्होंने उसे जीवन में हर हाल में सच बोलने और सच का साथ देने की शिक्षा दी है। सत्यकाम की मुलाकात रंजना (शर्मीला टैगोर) से होती है, जिसका बलात्कार हुआ है और वह गर्भवति है। सब कुछ जान कर भी वह उससे विवाह कर लेता है और उसके बेटे को अपना लेता है।

सच बोलने और घूस न लेने की आदतों की वजह से सत्यकाम को कार्यक्षेत्र में सफलता नहीं मिलती, उसके तबादले होते रहते हैं और उसके साथ काम करने वाले उससे चिढ़ते हैं लेकिन वह अपने आदर्श नहीं छोड़ता। टीबी से बीमार सत्यकाम की कम उम्र में मृत्यु हो जाती है।

मैंने यह फ़िल्म दिल्ली के पटेल नगर में 'विवेक' सिनेमा पर देखी थी और इसका मुझ पर गहरा असर पड़ा था। फ़िल्म के अंत के पास एक दृश्य है जिसमें सत्यकाम अस्पताल में भर्ती है, वह खाँसता है तो उसके रुमाल पर खून की बूँदें आ जाती हैं जिन्हें उसकी पत्नी देख लेती है और इस तरह से पति की गम्भीर परिस्थिति को समझ जाती है। इस दृश्य में धर्मेन्द्र की आँखों के भाव ने मेरे मन को छू लिया था। कुछ ऐसा ही एक दृश्य गुलज़ार की 'परिचय' फ़िल्म में भी था जिसमें संजीव कुमार और जया भादुड़ी थे, हालाँकि लोग संजीव कुमार को बेहतर अभिनेता मानते हैं, लेकिन मेरे विचार में उस भाव को दर्शाने में सत्यकाम के धर्मेन्द्र उनसे बेहतर थे।

नया ज़माना (प्रमोद चक्रवर्ती, 1971)

इस फ़िल्म की कहानी बिमल रॉय की 1945 की फ़िल्म 'हमराही' से मिलती-जुलती थी।

अनूप (धर्मेन्द्र) एक नये लेखक हैं जिन्होंने मजदूरों की यूनियन के संघर्ष पर "नया ज़माना" नाम की किताब लिखी है। अनूप को सीमा (हेमा मालिनी) से प्रेम है लेकिन सीमा के उद्योगपति भाई राजन/राजेन्द्र (प्राण) को यह रिश्ता स्वीकार नहीं। राजन उनके उपन्यास "नया ज़माना" को अपने नाम से छपवा लेते हैं और गरीबों के घर जलवा कर अनूप पर दोष लगवा देते हैं। सीमा अपने भाई से लड़ती है। इस फ़िल्म का गीत "नया ज़माना आयेगा", साम्यवाद और मज़दूर युनियनों के अधिकारों की बात करता है।

अंत में

इन फ़िल्मों के अतिरिक्त अन्य बहुत सी फ़िल्मों में धर्मेन्द्र ने आदर्शवादी, बौद्धिक, मध्यमवर्गीय पुरुषों के बाग निभाये थे जैसे कि आदमी और इन्सान, फागुन, इत्यादि।

मेरे विचार में उन्हें एक्शन हीरो की तरह अधिक देखा गया और उनकी अभिनय प्रतिभा को वह पहचान नहीं मिली जो मिलनी चाहिये थी।

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