गुरुवार, जुलाई 09, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 12

अब तक की कहानी: ताकानोरी ने जामुन बाबा को खोज लिया था, लेकिन उससे बचने के लिए बाबा ने जीवित समाधी ले ली थी। गँगटोक से त्रिनेत्र अपने साथ पाँच बाल-तिरंगा यौद्धाओ को साथ ले कर बाबा की रक्षा के लिए मजूली के वृद्धाश्रम में जाने के लिए निकल चुका है, उनके साथ आभा भी आ रही है। इधर ताकानोरी ने बाबा के वृद्धाश्रम का पता लगा लिया और वहाँ पर अपने साथी सोमचाई और 3 गुँडों के साथ वहाँ पहुँच गया है। ताकानोरी को जामुन बाबा की गुप्त शक्ति वाली हरित तारा की मर्ति खोजनी है। इससे आगे पढ़िये ...

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अध्याय 12

मजूली द्वीप, असम, 3 मार्च 2026

आश्रम के दफ्तर का द्वार खुला था लेकिन भीतर कोई नहीं था, सब लोग बाहर मैदान में थे।

जगदीश बाबू वहाँ पास में खड़े थे, उन्होंने ताकानोरी और उसके आदमियों को दफ्तर में जाते देखा तो वह उनके पीछे-पीछे आये, बोले,

“अगर आप को जामुन बाबा की समाधी देखनी है तो बाहर कतार में खड़ा होना पड़ेगा, यहाँ वृद्धाश्रम में आप को कुछ नहीं मिलेगा।"

ओरी ने अंग्रेज़ी में पूछा, “यह बाबा आश्रम में कहाँ रहते थे? हम उनका कमरा देखना चाहते हैं।"

जगदीश बाबू के माथे पर बल पड़ गये, बोले, “बाहर के लोगों को वहाँ जाने की अनुमति नहीं है।"

बटेर ने आगे बढ़ कर जगदीश बाबू के कँधे पर ज़ोर से हाथ मारा, बोला, “बुढ़ऊ, जिन्दा रहना है या नहीं? साहिब जो पूछें उसका सीधा जवाब दो, वरना ऐसा झापड़ दूँगा कि तुम्हारी नकली बतीसी मुँह से निकल कर तुम्हारे हाथ में आ जायेगी।"

शोर सुन कर बाहर से दो अन्य वृद्ध वहाँ आये, एक पुरुष और एक स्त्री। उन्होंने बटेर को जगदीश बाबू को मारते देखा तो दरवाज़े से चिल्लाये, “कौन हो तुम? क्या कर रहे हो? जगदीश बाबू को हाथ मत लगाओ।"

ओरी ने बटेर को इशारा किया तो वह पीछे हट गया, उसने दोबारा पूछा, “उनका कमरा कौन सा है?”

जगदीश बाबू के उसे घूर कर देखा, कुछ उत्तर नहीं दिया। ताकानोरी के इशारे पर बटेर ने जगदीश बाबू को चटाक से एक थप्पड़ मारा, वह लड़खड़ा कर वहीं गिर पड़े और उनकी नाक से खून बहने लगा, उनकी ऐनक दूसरी ओर गिरी, पर सौभाग्यवश टूटी नहीं।

ताकानोरी के इशारे पर लक्की और मटरू दरवाज़े पर खड़े लोगों के पास गये, बोले, “बाहर से आश्रम के सभी लोगों को यहाँ बुलाओ, हमें तुम सबसे बात करनी है।"

बटेर ने जगदीश बाबू की गर्दन से उनका कुर्ता पकड़ कर उठाया और एक कुर्सी पास खींच कर उन्हें बैठा दिया, बोला, “बुढ़ऊ, अगर आज तुम्हें अपने जामुन बाबा से मिलने स्वर्ग लोक जाने की जल्दी नहीं हो, तो साहब जो पूछें उसका सीधा और तुरंत जवाब चाहिये। ज़्यादा चालाकी दिखाओगे तो साहिब मुँडी काट कर हाथ में थमा देंगे।"

जगदीश बाबू फ़िर भी कुछ नहीं बोले और उसे घूरते रहे। ताकानोरी ने लम्बी साँस ली और वह भी एक कुर्सी पर बैठ गया।

केवल सोमचाई नहीं बैठा, उसने आगे बढ़ कर ज़मीन से जगदीश बाबू की ऐनक उठा कर उन्हें दी, फ़िर वहीं पीछे जा कर खड़ा हो गया। वह कम्प्यूटर का काम करता है, उसने कभी मारा-मारी नहीं की है और जगदीश बाबू की नाक से बहता खून देख कर उसका जी घबराने लगा था। उन्हें एक बूढ़े आदमी को इस तरह से मारते देख कर भी उसे धक्का लगा था।

धीरे-धीरे आश्रम के सभी वृद्ध उस कक्ष में आ कर इक्ट्ठे हो गये। बटेर ने पूछा, “यहाँ कितने लोग रहते हैं?”

एक वृद्धा बोली, “सतरह औरतें और सात आदमी, हम कुल चौबीस लोग और हमारे संचालक, जगदीश बाबू, पच्चीस।"

बटेर ने कमरे में एकत्रित लोगों को गिना, बोला, “फ़िर यहाँ पर सत्ताईस लोग कैसे हैं?”

एक बूढ़ा आदमी बोला, “मुझसे मिलने मेरी बेटी और नाती बाहर से आये हैं", उसने एक युवती और एक किशोर की ओर इशारा किया।

उनका नाती चौदह-पंद्रह साल का लगता था। बटेर ने इशारा करके उसे आगे बुलाया और उसके कँधे पर हाथ रख लिया, बोला, “हमारे पास टाईम कम है, इसलिए साहिब जो पूछेंगे, उसका ठीक से जवाब दो। अगर सही जवाब नहीं मिलेगा तो मैं इस लड़के को मार डालूँगा, समझे?”

कक्ष में सन्नाटा छा गया। उस लड़के के नाना बोले, “मेरे बच्चे को जाने दो। यह लोग यहाँ नहीं रहते, इन्हें कुछ नहीं मालूम, मारना है तो मुझे मारो।"

बटेर ने कुछ उत्तर नहीं दिया, बस अपना हाथ कँधे से उठा कर उस लड़के को सिर के बालों से पकड़ लिया और दूसरे हाथ में खुला हुआ रामपुरिया चाकू निकाल कर, उसे उसके गले के साथ सटा दिया।

ओरी मुस्कराया और बोला, “यह बाबा कहाँ रहते थे? उनका कमरा किधर है?”

इस बार जगदीश बाबू ने काँपती आवाज़ में उत्तर दिया, बोले, “आश्रम के गेट के बाहर, बायीं ओर पेड़ों के बीच में उनका घर है।"

ओरी के इशारे पर लक्की और मटरू, बाबा का घर खोजने गये।

ताकानोरी बोला, “समाधी के पास जो मन्दिर है, वहाँ पर तारा माँ की सफेद और हरी, दो रंगों की मूर्तियाँ लगीं हैं। मैं वैसी ही एक विशेष हरी मूर्ति खोज रहा हूँ। क्या बाबा के पास ऐसी कोई विशेष मूर्ति थी?”

“माँ तारा की मूर्तियाँ?”, एक वृद्धा बोली, “वे तो यहाँ आश्रम में हर जगह मिलेंगीं। उनमें विशे़ष कौन सी है, यह तो भगवान जानें। बाबा ने जब समाधी ली, तब भी उनके हाथ में एक कटोरा था जिसमें हरे रंग की माँ तारा की मूर्ति थी।"

जगदीश बाबू बोले, “जामुन बाबा को माँ तारा की मूर्तियों से बहुत प्रेम था, यहाँ पर वैसी बहुत सी मूर्तियाँ मिलेंगीं। लेकिन उनमें कोई विशेष मूर्ति हमें नहीं मालूम।"

ओरी ने आँखें बन्द कर लीं और अपनी अन्वेषण-किरण से धीरे-धीरे सारे वृद्धाश्रम का निरीक्षण किया लेकिन उसे वहाँ शक्ति लहर का स्पंदन महसूस नहीं हुआ। इसका मतलब है कि बाबा ने वह मूर्ति वृद्धाश्रम के भीतर नहीं है, शायद उसे बाहर कहीं छिपाया गया है या वह धरती के नीचे गहरी दबी हुई है, जहाँ उसकी अन्वेषण-किरण नहीं पहुँच रही। शायद बाबा ने उस मूर्ति के साथ समाधी ली है और अगर ऐसा है तो उन्हें उनकी समाधी को खोदना पड़ेगा?

उसने पूछा, “बाबा ने समाधी लेने से पहले क्या किसी के लिए कुछ निर्देश छोड़े?”

“कैसे निर्देश?” जगदीश बाबू को उसका प्रश्न समझ नहीं आया।

"किसी के लिए कोई कागज़, चिट्ठी या संदेश?”

जब जगदीश बाबू ने उत्तर नहीं दिया तो ओरी के इशारे पर बटेर ने फ़िर से चाकू निकाल कर लड़के के गले से सटा दिया, बोला, “बुढ़ऊ, सोच लो, जवाब नहीं दोगे तो इसकी गर्दन काट दूँगा, फ़िर मत रोना।"

जगदीश बाबू को झुरझुरी सी आयी, घबरा कर बोले, “एक चिट्ठी दी है, त्रिनेत्र के नाम है।"

“त्रिनेत्र कौन है?”

"उनका शिष्य और उत्तराधिकारी, वह यहाँ नहीं रहता।"

“चिट्ठी दिखाओ।"

जगदीश बाबू लड़खड़ाते हुए अपनी कुर्सी से उठे, बोले, “मेरे दफ्तर में रखी है, मैं ले कर आता हूँ।"

ताकानोरी ने सोमचाई को उनके साथ जाने का इशारा किया। जगदीश बाबू ने दालान पार किया और पीछे अपने दफ्तर के कमरे में गये। तब तक उनकी नाक से खून बहना बंद हो गया था पर उसके दाग उनके कुर्ते पर जमे हुए थे।

सोमचाई बोला, “ताकानोरी एक जापानी याकूज़ा है। यह लोग बहुत क्रूर होते हैं। इसलिए उसकी बात मानने में ही आप सब की भलाई है, अगर वह गुस्सा हो गया, तो अपनी कताना-तलवार से सबके सिर काट देगा।"

जगदीश बाबू ने उसकी बात का उत्तर नहीं दिया, अपनी मेज़ पर रखी जामुन बाबा की चिट्ठी को उठा कर सोमचाई को दिया और दोनों लौट आये। कमरे में घुसे तो देखा कि लक्की और मटरू भी बाबा के घर से कुछ सामान ले कर आ गये हैं।

उस सामान को मेज़ पर रखते हुए लक्की बोला, “वह छोटा सा घर है, बस दो कमरे है। वहाँ हमें केवल यही सामान मिला।"

सामान में कुछ संस्कृत की किताबें थीं, एक रुद्राक्ष की माला, एक तुलसी की माला और एक बौद्ध भिक्षुक की मूर्ति थी। मूर्ति पर सालों से अगरबत्तियों के धूँए की कालिख के निशान जम गये थे।

ओरी ने तुरंत हाथ जोड़ कर उस मूर्ति को प्रणाम किया, बोला, “यह बाबा के गुरु साबुनिम कीवू की मूर्ति है।" फ़िर लक्की से बोला,

“जाओ इस सामान को जहाँ से उठाया है, वहीं पर ठीक से रख कर आओ, और मूर्ति को ध्यान से ले कर जाना, टूटनी नहीं चाहिये।"
फ़िर उसने सोमचाई को चिट्ठी देने का इशारा किया।

जगदीश बाबू निढ़ाल हो कर कुर्सी पर बैठ गये, उनके चेहरे का रंग फीका पड़ गया था, मानो अपने दफ्तर तक जाने में उन्होंने बहुत मेहनत की हो।

ओरी ने उनसे पूछा, “बाबा का शिष्य कौन है? वह कहाँ रहता है और यहाँ कब आयेगा?”

“जामुन बाबा के निर्देश अनुसार, मैंने उसे आज सुबह फोन किया था। उसने कहा था कि वह जल्दी आयेगा, कल शाम तक यहाँ पहुँच जायेगा। लेकिन वह कहाँ रहता है, मुझे नहीं मालूम। वह यहाँ आता रहता है, उसकी उम्र तीस साल के आसपास की होगी।"

“उसका मोबाइल नम्बर सोमचाई को दीजिये।" नम्बर ले कर सोमचाई ने अपना लैपटॉप कम्प्यूटर खोला और उसके बारे में जानकारी खोजने लगा।

ताकानोरी ने बाबा की चिट्ठी को खोला, उसमें केवल एक कागज़ था जिस पर हिंदी में कुछ लिखा था। उसने बटेर से उसे पढ़ने के लिए कहा।

कागज़ हाथ में ले कर बटेर मुस्कराया, बोला, “यह तो कोई कविता लगती है।"

“पढ़ो।"

“चन्द्र-वधु के चरण-कमल, तीन दशानन कोसे, 
पद्मा की कमल-अँजुरी से बहता जल।
विष्णु के शंख नाद से प्रज्जवलित अंबर के सप्त ऋषि,
कंदरा में गूँजती चौदह ध्वनियाँ पिनाक की।
लौटी सति पर्वतराज पिता के घर, बोली
त्रिनेत्र कहाँ हैं, उन्हें निमंत्रण क्यों नहीं भेजा?
वहाँ जहाँ पर लाल बकरियाँ घास चरें।"

बटेर ने कविता पढ़ तो ली लेकिन उसका अनुवाद करके उसे ताकानोरी को समझाना आसान नहीं था। वह बोला, “इसमें लक्ष्मी, विष्णु और शिव जी की बातें हैं, शायद यह कोई प्रार्थना है।"

ओरी ने उससे वह कागज़ लिया और जगदीश बाबू से कहा, “आप की अंग्रेज़ी अच्छी है, आप इसका अनुवाद करके मुझे दीजिये।" उन्होंने चुपचाप उससे वह कागज़ ले लिया।

इतने में सोमचाई ने ताकानोरी को बुलाया और अपने लैपटॉप पर दिखाते हुए बोला, “इस मोबाइल नम्बर का सिम-कार्ड पहली बार 1998 में बनारस में खरीदा गया था। उसके बाद उसे 2014 में दिल्ली में बदला गया, पर नम्बर नहीं बदला। यह प्रीपेड लगता है और इसका नम्बर किसी दूसरे सिम-कार्ड से जुड़ा हुआ है, इसके बारे में पता करना आसान नहीं है, मुझे कुछ दिन लगेंगे।"

ताकानोरी सोचते हुए बोला, “बाबा के शिष्य आज चलेगा और कल शाम को पहुँचेगा, इसका मतलब है कि वह कहीं दूर रहता है। हो सकता है कि वह प्रतिमा उसके पास हो? खैर हम जल्दबाज़ी में कुछ नहीं करेंगे। आज रात को जब लोगों की भीड़ नहीं होगी, उस समय हम वह समाधी खोद कर बाबा के शव और उनकी मूर्ति की जाँच करेंगे। जब वह शिष्य यहाँ आयेगा, तो उससे इस कविता का अर्थ भी पूछेंगे।"

जगदीश बाबू, जामुन बाबा की कविता का अनुवाद करने में लगे थे, लेकिन उनके कान ताकानोरी और सोमचाई की बातें सुन रहे थे, ताकि मौका मिलते ही त्रिनेत्र को खबर कर सकें। जब उन्होंने सुना कि वह लोग गुरु जी की समाधी को खोद कर उनके शरीर को बाहर निकालने का प्रोग्राम बना रहे हैं तो उन्हें बहुत गुस्सा आया। लेकिन उन्होंने सोचा कि जामुन बाबा सामान्य व्यक्ति नहीं थे, वह अपनी समाधी की रक्षा स्वयं करेंगे।

बटेर, लक्की और मटरू को भी किसी संत पुरुष की समाधी खोदने की बात अच्छी नहीं लगी। वह गुँडे अवश्य हैं, लेकिन संतों के प्रकोप से डरते हैं। पर वह यह भी जानते हैं कि जापानी साहिब को यह काम करने से रोकना कठिन होगा।

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अगला अध्याय सोमवार 13 जुलाई 2026 से पढ़ सकते हैं। 

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सोमवार, जुलाई 06, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 11

अब तक की कहानी: ताकानोरी ने जामुन बाबा को खोज लिया है लेकिन बाबा उसके जाल से निकल जाते हैं और वृद्धाश्रम में जीवित समाधी ले लेते हैं। गँगटोक में त्रिनेत्र के अनाथाश्रम में उसके मित्र की बहन आभा आई है। उन्हें समझ में आता है कि आभा की भी एक गुप्त-शक्ति है, कि वह कीड़े-मकोड़ों से बातें कर सकती है। त्रिनेत्र अपने साथ अनाथाश्रम के गुप्त शक्ति वाले पाँच बच्चों के साथ, बाबा की रक्षा के लिए मजूली के वृद्धाश्रम में जाने के लिए तैयार हो रहा है। इधर ताकानोरी अपने साथी सोमचाई और तीन गुँडों के साथ वृद्धाश्रम में पहुँच गया है और शक्ति वाली हरित तारा की मूर्ति को खोज रहा है। इससे आगे पढ़िये ...

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अध्याय 11

गँगटोक से असम की ओर, 3 मार्च 2026

भोजनालय में आभा और बच्चे चुपचाप त्रिनेत्र को देख रहे थे। टेलीफोन पर अपने गुरु जी के समाधी लेने की बात सुन कर जब वह रोया था तो वह वहीं थे।

उस रात को जब उसके घर में आभा जागी थी तो त्री ने उसे कहा था, “चलो तुम्हें छात्रावास छोड़ कर आता हूँ।"

“क्यों? अगर मैं तुम्हारे कमरे में रुकी तो तुम्हारा नाम बदनाम हो जायेगा?”, आभा ने पूछा था।

“नहीं, यहाँ कोई नहीं है जो मेरा या तुम्हारा नाम बदनाम करे", त्री मुस्कराया था, “लेकिन कुछ घंटे बाद हमें एक लम्बी यात्रा पर जाना है। तुम अपने कमरे में जाओगी तो मैं अपनी चटाई पर ठीक से सो सकूँगा।"

“तुम बच्चों को ले कर कहाँ जा रहे हो?”

त्री एक पल उसे चुपचाप देखता रहा, बोला, “हम ऐसे ही घूमने जा रहे हैं।"

“घूमने जा रहे हो, तो कल रात को हथियारों की बात क्यों हो रही थी?”

त्री ने उसे उत्तर नहीं दिया तो वह बोली, “मैं बच्ची नहीं हूँ, मैंने अपने पति और बेटी को खोया है। अगर कोई कठिन परिस्थिति आई है, जिसके बारे में तुम बच्चों से बात कर सकते हो तो मुझे क्यों नहीं बता सकते?”

फ़िर भी जब त्री ने कुछ नहीं कहा तो वह बोली, “कल पहले तुम्हारे अखाड़े में मुझे वह अजीब सा अनुभव हुआ। फ़िर,  तुम लोग किसी गुप्त-शक्ति की बात रहे थे, कि मेरी शक्ति कीड़े-मकोड़ों और जीव-जंतुओं से जुड़ी है। उसके बाद, जब मैं यहाँ भीतर सो रही थी तो मुझे बाहर से तुम्हारी बातें स्पष्ट सुनाई दे रहीं थीं, ऐसा लग रहा था जैसे कि मेरे दिमाग का एक हिस्सा सोया हो और दूसरा, जागा हुआ सतर्क हो।"

त्री ने लम्बी साँस ली, बोला, “जो गुप्त-शक्ति मुझमें और बच्चों में हैं, वह तुममें भी हैं, लेकिन तुम्हारी शक्ति ठीक से विकसित नहीं हुई हैं, तुम उस पर नियंत्रण करना नहीं जानती। तुममें जीव-जन्तुओं से बात करने की शक्ति है और तुम्हारी श्रवण शक्ति भी विकसित लगती है। अगर तुम इन शक्तियों को पूर्ण विकसित करना चाहती हो तो तुम्हें कुछ समय यहाँ हमारे पास रहना पड़ेगा। अगर तुम अपने भाई के पास या गाँव में लौट जाओगी, तो हो सकता है कि तुम्हारी यह शक्ति जो यहाँ जागृत हुई है, वह फ़िर से सो जाये।"

“कल रात को तृप्ति ने अपनी मनोशक्ति से एक लोटे को उठाया था और गार्गी ने मुझे अंतरमन के भीतर से छुआ था?"

त्री ने सिर हिला कर हामी भरी, बोला, “हाँ, उनकी यही शक्तियाँ हैं। कुछ दिनों में जब हम लौटेंगे, तुम भी यहाँ वापस आ सकती हो, हम तुम्हारी शक्तियों को विकसित करने में तुम्हारी मदद करेंगे।"

“शक्ति विकसित करने से क्या फायदा है?”

“यह लाभ-नुकसान की बात नहीं है, शक्ति का होना एक ज़िम्मेदारी है। इनसे हम गरीब, निर्बल, असहाय और शोषित जनों की मदद करते हैं। तुम कह सकती हो कि हम शक्ति-यौद्धा हैं और यह हमारा धर्म है।"

“कल रात को वसंत किसी तिरंगा यौद्धा की बात कर रहा था?”

त्री मुस्कराया, बोला, “जब वसंत यहाँ आया था, तब उसने हमारे नामों के पहले अक्षर, त, र और ग को मिला कर तिरंगा बना दिया था। तब से बच्चे हम सब को तिरंगा-यौद्धा भी कहते हैं।"

“तो मुझे भी बताओ कि कल सुबह तुम तिरंगा यौद्धा किसकी मदद के लिए युद्ध पर जाओगे?”

“मेरे गुरु जी मुश्किल में हैं। मैं असम में गुवाहाटी के पास पैदा हुआ था और बचपन में अनाथ हो गया था। गुरु जी ने मुझे शरण दी, मुझे पाला-पोसा, मेरी शक्ति को पहचाना और उसे विकसित किया। उनके कहने पर ही मैंने यह अनाथाश्रम खोला है। कुछ लोग बहुत सालों से उनका पीछा कर रहे हैं। कल सुबह गुरु जी ने मुझे बताया कि उन लोगों ने उन्हें खोज लिया है, इससे उनकी जान को खतरा है, और हम उनकी रक्षा करने जा रहे हैं।"

आभा चुप हो गयी थी और वह उसे लड़कियों के छात्रावास के पास छोड़ कर लौट आया था।

आज सुबह जब वह बच्चों के साथ नाश्ता कर रहा था और जगदीश बाबू ने उसे गुरु जी की समाधी लेने का समाचार दिया, उस समय आभा वहाँ थी।

जब वे गाड़ी में बैठे तो आभा उसके साथ आगे वाली सीट पर बैठी। उनकी कार अनाथाश्रम से बाहर निकली ही थी कि वह बोली, “मैं भी तुम्हारे साथ चलना चाहती हूँ।"

त्री ने कहा, “नहीं, तुम हमारे साथ नहीं आ सकतीं।"

“क्यों?”

“क्योंकि इसमें खतरा है।"

“अगर छह साल की तृप्ति तुम्हारे साथ जा सकती है तो मैं क्यों नहीं?”

“क्योंकि जिसे तुम छह साल की बच्ची कहती हो, वह चाहे तो अपनी शक्ति से चाकू-तलवार चला कर अपनी रक्षा कर सकती है और हमारे युद्ध में योगदान दे सकती है।"

आभा कुछ सोच कर बोली, “दो साल पहले तस्करों ने बम से मेरे पति की कार उड़ा कर, उनकी और मेरी बेटी की जान ली थी। तब मैंने कई महीनों तक आत्महत्या करने की सोची थी। लेकिन अब मैं जीना चाहती हूँ और उन लोगों से बदला लेना चाहती हूँ। मैं भी तुम्हारी तरह यौद्धा बनना चाहती हूँ, डर कर घर में छिप कर जीना नहीं चाहती। मेरी शक्ति तुम लोगों की तरह विकसित नहीं है, मुझे लड़ाई करनी भी ठीक से नहीं आती, लेकिन मैं सीधी-साधी सामान्य औरत दिखती हूँ और तुमने देखा कि मेरी श्रवण शक्ति बहुत अच्छी है, मैं सोते हुए भी दूर से बातें सुन सकती हूँ। अगर मैं तुम्हारे साथ रहूँगी तो हम लोग एक परिवार जैसा लगेंगे और गुँडों को धोखा देना अधिक आसान होगा।"

पीछे बैठे बच्चे उनकी बातों को ध्यान से सुन रहे थे लेकिन उनमें से कोई कुछ नहीं बोला।

“और वहाँ तुम कुछ हो गया तो?” त्री बोला।

“अधिक से अधिक वह मुझे मार देंगे और क्या? मैं मरने से नहीं डरती।"

“और अगर मरो नहीं, पर सारे जीवन के लिए अपाहिज हो जाओ तो?”

“क्यों, क्या अपाहिज लोग इन्सान नहीं होते? अगर बुरे लोगों के साथ युद्ध में मैं घायल होती हूँ या मर जाती हूँ तो मुझे इसका रत्ती भर भी रंज नहीं होगा।"

यह बातें करते हुए, वह लोग रानी खोला पुल पर पहुँच गये थे। वहाँ से कुर्स्यांग जाने वाली सड़क अधिक दूर नहीं थी, इसलिए त्री को वहाँ पहुँचने से पहले ही यह निर्णय लेना था, वह बोला, “विशाल से बात करते हैं।"

आभा गुस्सा हो गयी, बोली, “इसमें भैया से पूछने की क्या ज़रूरत है? मैं क्या उन पर निर्भर करती हूँ? मैं उनके यहाँ कुछ दिन के लिए आयी थी, लेकिन मेरा अपना घर है, मैं अपना जीवन जीने के लिए स्वतंत्र हूँ। वैसे भी वह मेरे बड़े भाई हैं, तुम उनसे पूछोगे कि इसे युद्ध में ले जायें या नहीं, तो वह क्या कहेंगे? वह तो मना ही करेंगे।”

पीछे से गार्गी बोली, “आभा दीदी ठीक कहती हैं, उन्हें साथ ले जाने, या न ले जाने का निर्णय तो आप को ही लेना पड़ेगा। इनके भाई से पूछने की कोई आवश्यकता नहीं है, यह कोई बच्ची नहीं हैं।"

आखिर में त्री बोला, “ठीक है, तुम हमारे साथ चलना चाहती हो तो चलो।"

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गुरुवार, जुलाई 02, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 10

 

अभी तक की कहानी: जामुन बाबा की शक्तिमय मूर्ति की तलाश में, उनका पीछा करने वाला जापानी याकूज़ा-गुँडा ताकानोरी भारत आया है और उसने बाबा को नारायणपुर में खोज लिया है। बाबा उससे बच पर भागने में सफल होते हैं और मजूली द्वीप पर वृद्धाश्रम में लौट आते हैं। उधर, गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम में, बाबा का पुत्र-समान शिष्य त्रिनेत्र, कुछ शक्तिमय बच्चों के साथ उनके आश्रम की यात्रा पर निकलने के लिए तैयार हो यहा है। त्रिनेत्र को बताये बिना बाबा अपने वृद्धाश्रम के मंदिर के सामने समाधी ले लेते हैं। जब त्रिनेत्र को पता चलता है तो वह बहुत दुखी होता है। आगे पढ़िये ...

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अध्याय 10

नारायणपुर, असम, 3 मार्च 2026

सुबह जापान से रिकू का फोन आया, उसने इधर-उधर की बात नहीं की, सीधा पूछा, “ओरी, क्या हुआ? अभी तक जून-मिन का पता नहीं चला?”

“यामागुचि सान, हमें उसका पता चल गया है। वह बूढ़ा हो गया है, लेकिन अभी भी चालाक है। कल वह हमसे बच कर भागने में सफल हुआ लेकिन अब हमें पता चल गया है कि वह किस क्षेत्र में रहता है, आप कुछ दिन और धैर्य रखिये, मैं उसे अवश्य खोज निकालूँगा", ताकानोरी ने कहा।

“तुम्हें वहाँ गये हुए तीन महीने हो गये हैं, इतने समय में तुम उसे खोज क्यों नहीं पाये?”

“आप चिंता नहीं करें, मुझे पक्का विश्वास है कि कुछ समय में मैं उसे खोज निकालूँगा", उसने उसे आश्वासन दिया।

सोमचाई ने कम्प्यूटर के प्रोग्राम की सहायता से जून-मिन की पुरानी तस्वीर को ले कर, एक कृत्रिम-बुद्धि प्रोग्राम से उनकी नयी तस्वीरें बनायी थीं और उन्हें अपने आदमियों को दिया था ताकि वह उनको दिखा कर शहर में पूछताछ करें। कुछ घंटे बाद, बटेर खबर ले कर आया, बोला, “एक दुकानदार ने इस तस्वीर को पहचान लिया, कहा कि यह तो जामुन बाबा हैं और उसके यहाँ कभी-कभी सामान खरीदने आते हैं। लेकिन वह कहाँ रहते हैं, उसे पता नहीं था। बोला कि वह हर महीने-दो महीने में नारायणपुर आते हैं और वहाँ से तेल, साबुन वगैरा खरीद कर ले जाते हैं।"

सोमचाई ने इंटरनैट पर "जामुन बाबा" को खोजा तो उसे इंस्टाग्राम पर उसी दिन सुबह के कुछ वीडियो मिल गये। वह तुरंत मोबाइल को ले कर ताकानोरी के पास गया, बोला, “कुछ वीडियो मिले हैं। इनके अनुसार, कल शाम को जामुन बाबा यानि जून-मिन ने समाधी ले कर प्राण त्यागे हैं।"

ओरी ने वीडियो देखे। एक वीडियो में वह हिस्सा था जब बाबा एकत्रित लोगों के सामने कुछ बोल रहे थे और उनकी सफेद चद्दर उसके पीछे हवा में ऊपर उठ गयी थी। एक दूसरे वीडियो में उनके बक्से में बैठने और बक्से को ज़मीन में गाड़ने के दृश्य थे। वीडियो में लोग "जामुन बाबा" का नाम बार-बार ले रहे थे। 

“यह समाधी लेना, इसका क्या मतलब है?” ओरी ने पूछा।

“वीडियो देख कर लगता है कि कल उन्होंने अपने आप को एक गड्ढ़े में जीवित दफन करवा लिया, अब तक वह मर गये होंगे।"

“यह वीडियो झूठा भी हो सकता है? शायद उसने यह वीडियो आर्टिफीशयल इन्टैल्लीजैंस से बनवा कर हमें गुमराह करने के लिए लगवाये हों?”

“मेरी जाँच में यह आर्टिफीशयल इन्टैल्लीजैंस से नहीं बने हैं। इन्हें किसी स्कूल के लड़कों ने इंस्टाग्राम पर डाले हैं। यह झूठे नहीं लगते, लेकिन इस बात की पुष्ठी करना आसान है। यहाँ से कुछ दूर ब्रह्मपुत्र नदी के मजूली द्वीप पर उनका एक वृद्धाश्रम है, हम वहाँ जा कर उसकी जाँच कर सकते हैं", सोमचाई बोला।

ओरी ने तुरंत जीप तैयार करवायी और वे लोग चापोड़ी घाट आये। वहाँ से उन्होंने वृद्धाश्रम जाने के लिए एक नाव को किराये पर लिया।

जामुन बाबा के जीवित समाधी लेने की खबर धीरे-धीरे फ़ैल रही थी, बहुत से लोग यह बात सुन कर उनकी समाधी को देखने आ रहे थे, इसलिए वृद्धाश्रम में समाधी-स्थल को देखने वालों की भीड़ लगी थी। ओरी और उसके आदमियों ने उनके बीच से जल्दी आगे बढ़ने की कोशिश की, लेकिन वह भीड़ इतनी अधिक थी कि वह कुछ नहीं कर पाये। भीड़ के साथ-साथ वह भी धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे।

आगे आये तो देखा कि वृद्धाश्रम के द्वार से बाहर दूर तक कतार लगी है, जो बहुत धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है। ताकानोरी के आदमियों ने कतार से आगे जा कर घुसने की कोशिश की, तो कतार में खड़े हुए लोग गुस्सा हो गये। आखिर में उन्हें भी पीछे कतार में ही आना पड़ा।

ओरी को इस देरी पर बहुत गुस्सा आ रहा था, उसका बस चलता तो वह अपनी तलवार निकाल कर, लोगों को मारता-काटता आगे बढ़ जाता लेकिन सोमचाई ने उसे रोका, कहा कि अगर वह सौ लोगों को भी मार देगा तब भी बाकी के हज़ारों लोग पत्थरों से उसका सिर फोड़ देंगे।

दो घंटे के बाद जब वह समाधी-स्थल पर पहुँचे तो उसकी दृष्टि साथ में बने मन्दिर की ओर गयी। उसकी बाहरी दीवार पर बहुत सी मूर्तियाँ बनी थीं, उनके बीच मूर्तियों की एक पंक्ति ने उसका ध्यान खींचा। उस पंक्ति में श्वेत तारा और हरित तारा की मूर्तियाँ साथ-साथ लगी थी। उसने वहाँ खड़े हो कर तुरंत आँखें बंद कीं और अन्वेषण-किरण से उन मूर्तियों को जाँचा, उसे लगा कि उनमें हलकी सी शक्ति-लहर का आभास हो रहा है। यह देख कर उसके मन को चैन मिला, कि अगर जून-मिन की हरिताश्म तारा की मूर्ति नहीं भी मिलेगी, तो वह इन मूर्तियों को यामागुचि सान के लिए जापान ले जा सकता है।

उसे समाधी-स्थल पर आगे न बढ़ता देख कर, कतार में उसके पीछे वाले लोगों ने शोर मचाया तो उसके आदमियों ने उन्हें समझाया कि वह विदेश से आया बौद्ध भिक्षुक है और समाधी लेने वाले जामुन बाबा का पुराना शिष्य है, तो सब लोग चुप हो गये।

वह सोमचाई के साथ मन्दिर के प्रांगण में पीछे की ओर जा कर खड़ा हो गया, बोला, “कल सुबह मैंने उसकी शक्ति-लहर को नारायणपुर में पकड़ा था और कल शाम को ही उसने समाधी ले कर प्राण त्याग दिये, क्यों? मुझे इस बात पर शक हो रहा है। यह उस बूढ़े की हमसे बचने की कोई चाल लगती है। मान लो कि उसका समाधी लेना केवल एक ड्रामा है? हो सकता है कि जब लकड़ी का बक्सा नीचे गड्ढे में उतारा गया तो वह भीतर नहीं था, पीछे से निकल कर कहीं पर छिप गया था, तो? या उस बक्से में साँस लेने की नलकी लगी थी, रात को जब लोग चले गये तो उन्होंने गड्ढ़े को खोल कर उसे बाहर निकाल लिया हो? या फ़िर, यहाँ समाधी स्थल के नीचे कोई सुरंग बनी हुई हो, लोगों के सामने उसने समाधी ली पर नीचे जा कर, वह बक्से से निकल कर, सुरंग से कहीं भाग गया हो?”

सोमचाई बोला, “पहाड़ी के भीतर रास्ता या सुरंग बनाने आदि में बहुत समय लगेगा। अगर ऐसा हुआ तो इसका मतलब होगा कि इसकी योजना उसने बहुत पहले बनायी थी और कल जैसे ही उसे लगा कि हमने उसे तलाश कर लिया है तो उसने समाधी ले ली? लेकिन उसे यह करने की क्या आवश्यकता थी? आप ने कहा था कि वह पिछले छयालिस सालों से भाग रहा है, जब कोई उसे खोज लेता था तो वह भाग कर कहीं और चला जाता था। तो इस बार वह कहीं और क्यों नहीं गया, उसने मरने के लिए समाधी क्यों ली?”

ओरी के माथे पर बल पड़ गये, बोला, “सचमुच वह बूढ़ा बहुत चालाक है और हमसे कोई खेल खेल रहा है। मुझे बिल्कुल भी आश्चर्य नहीं होगा कि वह आसपास में कहीं पर छिप कर, हमें यहाँ बातें करता हुआ देख रहा है और हँस कर मज़े ले रहा है।" फ़िर, आसपास देखते हुए बोला, “यहाँ एक वृद्धाश्रम है, पहले यहाँ के बूढ़ों से पूछताछ करनी चाहिये। अगर ज़रूरत पड़ी तो मैं इस समाधी को खुदवा कर उसके मृत शरीर को अपनी आँखों से देखूँगा।"

सोमचाई ने समाधी को देखने आने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ की ओर देखा, बोला, “इन लोगों के सामने हम कुछ नहीं कर सकते। इनके सामने अगर हम इस समाधी को हाथ भी लगायेंगे तो यह लोग हमारी धज्जियाँ उड़ा देंगे। यही नहीं, हमारे तीनों आदमी भी इस बाबा के भक्त बन गये लगते हैं, देखो कैसे हाथ जोड़ कर खड़े हैं।"

सचमुच बटेर, लक्की और मटरू भी, अन्य श्रद्धालुओं की तरह जून-मिन की समाधी के पास हाथ जोड़ कर खड़े थे।
“एक मिनट रुको, मैं अभी आता हूँ", कह कर ओरी मन्दिर के भीतर गया।

जब उसने मन्दिर के बीच में बौद्धिसत्व अवलोकितेश्वर की मूर्ति देखी तो उसकी दृष्टि उनकी हथेलियों पर रखी हरित तारा और श्वेत तारा की प्रतिमाँओ की ओर गयी। उसने आँखें बन्द करके उनकी जाँच की, उसे लगा कि उनमें भी शक्ति का स्पंदन है।

उसने मन्दिरकक्ष की अन्य दोनों मूर्तियों, ताँडव करते शिव और ध्यानलीन बुद्ध को भी ध्यान से देखा तो उनमें भी शक्ति का कंपन महसूस किया। वह समझ गया कि यह मन्दिर, यह प्रतिमाएँ, यह कोई सामान्य जगह नहीं हैं, इनमें ईश्वर की ऊर्जा का विशेष वास है।
उसने सोचा कि उन बड़ी मूर्तियों को जापान ले जाना कठिन होगा, लेकिन वह तारा की छोटी प्रतिमाओं को यहाँ से ले जा सकता है। यामागुचि तो शक्ति वाली मूर्तियाँ चाहिये, और यहाँ पर वैसी मूर्तियों की कमी नहीं है।

जब वह मंदिर से बाहर निकला तो उसे देखते ही सोमचाई समझ गया कि मन्दिर में कुछ हुआ है। वह जब भीतर गया था तो चिड़चिड़ा लग रहा था, जबकि अब वह मुस्कराता हुआ बाहर आया है।

“उन आदमियों को बुलाओ, हम वृद्धाश्रम में बात करने जायेंगे", ओरी ने उसे कहा। 

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सोमवार, जून 29, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 09

अभी तक की कहानी: जामुन बाबा की शक्तिमय मूर्ति की तलाश में, उनका पीछा करने वाला जापानी याकूज़ा-गुँडा ताकानोरी भारत आया है और उसने बाबा को नारायणपुर में खोज लिया है। बाबा उससे बच पर भागने में सफल होते हैं और मजूली द्वीप पर वृद्धाश्रम में लौट आते हैं। उधर, गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम में, बाबा का पुत्र-समान शिष्य त्रिनेत्र, कुछ शक्तिमय बच्चों के साथ उनके आश्रम की यात्रा पर निकलने के लिए तैयार हो यहा है। बाबा अपने वृद्धाश्रम में सूचित करते हैं कि वह समाधी लेंगे। आगे पढ़िये ...

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अध्याय 09

मजूली द्वीप, असम, 2 मार्च 2026

बाबा दोपहर के साढ़े चार बजे अपने घर से निकले।

आज उन्होंने केसरिया वस्त्र की जगह पर एक सफेद चद्दर को अपने तन पर लपेटा था। उनकी भिक्षा के कटोरे में  हरिताश्म तारा की एक मूर्ति थी जिसके बिना वह कहीं नहीं जाते। आज उन्होंने अपनी खड़ाऊँ भी नहीं पहनी,  नंगे पाँव ही घर से निकले।

वह आज समाधी ले रहे हैं, यह खबर सारे क्षेत्र में फ़ैल चुकी है। आसपास के गाँवों के लोग और पास के हाई स्कूल के बहुत से छात्र, आश्रम में जमा हो गये हैं और अन्य लोग आते जा आ रहे हैं। वृद्धाश्रम का मैदान उनसे भरा है।

इस मैदान के उत्तरी कोने पर, नदी के पास, एक छोटी सी पहाड़ी पर काले पत्थर का मन्दिर बना है। इसके प्रमुख कक्ष में एक ओर नटराज हैं और दूसरी ओर ध्यानमुद्रा में महात्मा बुद्ध। कक्ष के बीच में खड़े हुए बौद्धिसत्व अवलोकितेश्वर की बड़ी मूर्ति है, जिसके दोनों हाथ छाती के सामने हैं और हथेलियाँ ऊपर उठी हुईं हैं। उनकी दायीं हथेली पर हरिताश्म तारा की मूर्ति है और बायीं ओर श्वेत तारा की। इसी मंदिर के प्रांगण में बाबा समाधी लेंगे।

मन्दिर के सामने, मजदूरों ने दोपहर को ही खोदना शुरु कर दिया था और अब उनकी समाधी के लिए दो मीटर गहरा गड्ढ़ा तैयार है।
जैसे ही वह आश्रम के गेट से भीतर घुसे तो वहाँ एकत्रित लोग उन्हें देखने के लिए उठ खड़े हुए। किसी ने पुकारा, “जामुन बाबा की जय", तो सारी भीड़ उस नारे को बार-बार दोहराने लगी। बाबा वहीं बीच में रुक गये, भिक्षा के कटोरे को हाथ में लिए, नतमस्तक हो कर चुपचाप वहाँ आँखें बंद करके खड़े हो गये। धीरे-धीरे जब भीड़ चुप हुई तब वह आगे बढ़े।

पहाड़ी के ऊपर जाने वाली सीढ़ियों के पास आश्रम में रहने वाले वृद्ध कतार बना कर खड़े थे, कई लोगों की आँखों से आँसू बह रहे थे। बाबा ने सिर उठा कर किसी की ओर नहीं देखा, नतमस्तक ही चुपचाप उनके बीच से निकले। जब वह सीढ़ियाँ चढ़ने लगे तो पीछे से

एक वृद्धा ने पुकार कर कहा, “जामुन बाबा, हमें एक अंतिम प्रवचन का दान दे दो।"

बाबा वहीं ठिठक कर सीढ़ियों पर रुक गये। एक-दो क्षण वहाँ चुपचाप खड़े रहे, फ़िर लोगों की ओर मुड़े। बहुत देर तक कुछ नहीं बोले। उनके शरीर पर लिपटी चादर का पिछला हिस्सा हवा से ऊपर उठा और कुछ क्षणों के लिए उनके ऊपर झुक कर एक शेषनाग की तरह लहराता रहा। लोग स्तब्ध हो कर इस दृष्य को देख रहे थे।

वह बोले, “मैं बहुत भाग्यवान हूँ, कि मुझे आप के साथ रहने और आप की सेवा करने का अवसर मिला। आज मेरी आत्मा, अंतहीन आकाश में ब्रह्माँड से जुड़ कर एक हो जायेगी और मुझे करुणामयी तारा माँ की गोद में चिरनिन्द्रा मिलेगी। मेरी यह आकाँक्षा सफल हो, इसके लिए आप की प्रार्थना की मुझे अपेक्षा है। आप लोगों से मेरी एक प्रार्थना भी है कि जैसे आप मेरे साथ प्रेम और शाँति के साथ रहे, मेरे बाद भी यह आश्रम वैसे ही चलायेंगे।"

उन्होंने अपने हाथों को जोड़ कर, उन्हें सिर के ऊपर उठा कर, सभी को प्रणाम किया और धीरे-धीरे बाकी सीढ़ियाँ चढ़ कर अपने समाधी-स्थान की ओर गये।

उस समय जगदीश बाबू की आँखों से भी आँसू झरने लगे और उन्होंने महामृत्यंजय मंत्र का पाठ शुरु कर दिया, "ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्, उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्"।

हालाँकि उन्होंने बार-बार वहाँ इकट्ठे लोगों से बाबा की तस्वीरें खींचने या वीडियो रिकॉर्ड करने से मना किया था, फ़िर भी कुछ लोग मोबाइल निकाल कर उनकी तस्वीरें खींच रहे थे।

ऊपर जा कर बाबा पहले मन्दिर में गये और वहाँ कुछ देर तक प्रार्थना की, फ़िर बाहर आ कर, मन्दिर की तीन बार प्रदक्षिणा की। अंत में वह खुदे हुए गड्ढ़े के पास रखे चकोराकार लकड़ी के बक्से के पास आये और हाथ में भिक्षा का कटोरा पकड़े हुए उसके भीतर आँखें बंद करके पद्मासन में बैठ गये।

मैदान में सन्नाटा छा गया। कुछ देर के बाद आश्रम की एक वृद्धा आगे आयी और लाठी के सहारे चलते हुए मन्दिर की सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर गयी। उसने बाबा के सामने हाथ जोड़े और उस बक्से के पाटों को बंद कर दिया। पीछे कुछ मजदूर तैयार खड़े थे, वह रस्सियाँ ले कर आये और उनसे उस बक्से को लपेट दिया, फ़िर रस्सियों के सहारे उठा कर उस बक्से को गड्ढ़े के भीतर रख दिया।

बक्से के ऊपर पहली मिट्टी की मुट्ठी डालने वही वृद्धा आयी। मुट्ठी में मिट्टी ले कर वह कुछ देर तक गड्ढ़े के पास खड़ी रही। उसकी आँखों से आँसू बह रह थे और उसकी सफेद साड़ी का पल्लू भी ध्वज की तरह कुछ क्षणों के लिए हवा में उड़ा। फ़िर एक लम्बी साँस ले कर उसने वह मिट्टी गड्ढ़े में फैंकी और साड़ी के कोने से आँसू पोंछते हुए सीढ़ियाँ उतर कर नीचे लौट आयी।

उसके बाद मजदूरों ने भी मिट्टी गड्ढ़े में डाली।

तब तक आश्रम के वृद्धों ने वहाँ एकत्रित लोगों को एक कतार बनाने के लिए कहा। उनमें सबसे आगे जगदीश बाबू थे। एक-एक करके सब लोग मन्दिर की सीढ़ियाँ चढ़ते, गड्ढे के पास पड़ी हुई मिट्टी को हाथ में लेते और गड्ढ़े में डाल देते।

इस काम को पूरा करने में करीब आधा घंटा लगा। जब सबने स्माधी-कुण्ड में मिट्टी डाल दी तो बची हुई मिट्टी से मजदूरों ने उस गड्ढ़े को भर दिया। समाधी-स्थल के लिए, प्रांगण के फर्श जैसा, एक चकोर कटा हुआ काला पत्थर पहले से तैयार रखा था, उसे लगा कर मजदूरों ने फर्श को पूरा कर दिया। अब वहाँ बाहर से बाबा के समाधी-स्थल का कोई निशान नहीं बचा था।

बाबा के निर्देशों के अनुसार, वहाँ एकत्रित सब लोगों को प्रसाद बाँटा गया, और फ़िर धीरे-धीरे लोग वहाँ से जाने लगे। सब यही बात कर रहे थे कि जीवित समाधी लेने वाले जामुन बाबा अब बड़े संत माने जायेंगे और वह जगह दूर-दूर तक तीर्थ-स्थान की तरह प्रसिद्ध हो जायेगी।

जब जगदीश बाबू ने त्रिनेत्र को अगले दिन सुबह टेलीफोन पर यह बात बतायी तो वह स्तब्ध रह गया, बोला, “कल शाम को? तो आप ने मुझे पहले खबर क्यों नहीं की? हम आज सुबह उनके पास आने के लिए तैयार हुए हैं।”

“बेटा, मैंने तो उन्हें बहुत कहा था कि पहले तुम्हें बुला लेना चाहिये। तुम उनके उत्तराधिकारी हो, तुम्हारा यहाँ होना बहुत ज़रूरी है, लेकिन वह नहीं माने।"

त्री रोने लगा। जगदीश बाबू कुछ देर तक उसके रोने की आवाज़ सुनते रहे, फ़िर बोले, “वह तुम्हारे लिए एक पत्र छोड़ कर गये हैं।"

“उसमें क्या लिखा है?”

“मुझे पता नहीं, लिफाफा बंद है। उन्होंने कहा कि जब तुम यहाँ आओगे, उसे तभी तुम्हें देना है।"

त्री ने अपने आँसू पोंछे, बोला, “हम लोग आज सुबह गँगटोक से चल रहे हैं, कल शाम तक वहाँ पहुँच जायेंगे।"

“तुम्हारे साथ और कौन आ रहा है?”, जगदीश बाबू ने पूछा।

“हमारे अनाथाश्रम के कुछ बच्चे हैं, उन्हें गुरु जी से मिलवाना चाहता था। अब वह उनकी समाधी को देखेंगे।"

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शनिवार, जून 27, 2026

अजेय की कविता में खड़ा आदमी

अजेय की एक प्रसिद्ध कविता है, जो मुझे बहुत अच्छी लगती है। लेकिन जब भी मैं उसे याद करता हूँ तो हर बार उसके एक शब्द पर अटक जाता हूँ। वह शब्द एक क्रिया है, जो मुझे अधूरी लगती है। और उसके अधूरेपन में कुछ ऐसा है जो मुझे बार-बार उस कविता की ओर खींचता है।


वह कविता है:

पहले एक गोरैया होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी इतना ऊँचा उड़ा
कि गोरैया खो गई।
 
पहले एक पहाड़ होता था
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे तन कर खड़ा
कि पहाड़ ढह गया।
 
पहले एक नदी होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे वेग से बहा
कि नदी सो गयी
 
पहले एक पेड़ होता था
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे जोर से झूमा
कि पेड़ सूख गया।
 
पहले एक पृथ्वी होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी इतनी जोर से घूमा
कि पृथ्वी रो पड़ी।
रो पड़ी ...
कि पहले एक आदमी होता था।

इसे पढ़ते हुए जिस क्रिया पर मैं अटक जाता हूँ, वह 'खड़ा' है, पहाड़ वाले अंतरे में। उड़ा, खड़ा, बहा, झूमा और घूमा में मुझे केवल 'खड़ा' वाली बात क्यों अधूरी लगती है? कवि को गिन कर शब्द लिखने होते हैं ताकि कविता की लय बनी रहे और 'खड़ा' को देख कर मैं अपने मन में उसे 'खड़ा हुआ' कर देता हूँ, लेकिन कहीं पर कुछ फँसा रह जाता है।

मैंने हिंदी आठवीं कक्षा तक ही पढ़ी थी, मुझे उसकी व्याकरण और साहित्य का विधिवत पढ़ने-समझने का मौका नहीं मिला था। खड़ा क्यों बाकी क्रियाओं से भिन्न है, शायद आप में से कोई हिन्दी व्याकरण के ज्ञानी मुझे समझा सकते हैं?

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टिप्पणी: पहले मैंने अजेय की जगह इसे अज्ञेय की कविता समझा था, एक सुधी पाठक, अनूप सेठी जी, जो स्वयं जाने माने हिंदी कवि हैं, ने इस गलती के बारे में मुझे बताया। उन्हें इसके लिए दिल से धन्यवाद। 

अजय कुमार "अजेय" की यह कविता (एक आदमी होता था) और अन्य कविताएँ आप कविता-कोष पर भी पढ़ सकते हैं।

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गुरुवार, जून 25, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 08

अब तक: जापानी याकूज़ा-खूनी ताकानोरी, जामुन बाबा की गुप्त शक्ति वाली मूर्ति को लेने भारत आया है। वह बाबा को नारायणपुर में खोज लेता है लेकिन वह उसके चँगुल से निकल भागने में सफल होते हैं। ताकानोरी से बचने के लिए, बाबा ने अपने वृद्धाश्रम में समाधी लेने का निर्णय लिया है।

दूसरी ओर, त्रिनेत्र गुप्त-शक्ति वाले बच्चों के लिए गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम चलाता है। अचानक उनकी मेहमान आभा की गुप्त-शक्ति जाग जाती है। आगे पढ़िये:

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अध्याय 08

       गँगटोक, सिक्किम, 2 मार्च 2026

वह दोनों अखाड़े से बाहर आये तो देखा कि रंगनाथ, गार्गी, वसंत, माधव और तृप्ति उधर भागे आ रहे हैं। उनके पीछे, अनाथाश्रम के कुछ कुत्ते और बिल्लियाँ भी थे।

गार्गी ने पूछा, “क्या हुआ? मुझे लगा कि जैसे इधर कोई भूचाल आ रहा हो और कोई मुझे यहाँ खींच रहा हो।"

रंगनाथ बोला, “हाँ, घूँ-घूँ की अजीब सी आवाज़ें आ रही थीं।"

माधव मुस्कराया, बोला, “अखाड़े के ऊपर इन्द्रधनुष जैसी रोशनियाँ डिस्को डाँस कर रही थीं और पशुशाला में मुर्गियाँ, गायें, भैंसे, बछड़े, सभी बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे।"

त्री बोला, “चलो, मेरे घर चलते हैं, वहाँ बात करेंगे।"

त्री का छोटा सा घर, पेड़ों के झुरमुट के बीच में है और अखाड़े से अधिक दूर नहीं है। उसके घर में, एक कमरे में एक ओर कुछ कपड़े टंगे थे और एक स्टूल पर कुछ किताबें रखी थीं, बस, बाकी का सारा घर खाली था।

त्री ने एक दरवाज़े के पीछे से एक लिपटी हुई चटाई को निकाल कर बीच में बिछा दिया, बोला, “यहाँ बैठो", फ़िर वसंत से कहा, “घर के आसपास अभेद्य दीवार बना दो ताकि कोई हमारी बात नहीं सुन सके।"

इस सारे समय में आभा चुप थी, उनके बातें ध्यान से सुन रही थी।

त्री बच्चों से बोला, “तुमने ठीक देखा था, आभा के भीतर भी गुप्त-शक्ति है। आज जब हम अखाड़े में गये तब वह शक्ति अचानक जाग गयी। मैंने ऐसी शक्ति के बारे में पहले कभी नहीं सुना था। वह जीव-जन्तुओं को, विशेषकर कीड़ों-मकोड़ों को बुला सकती है। हो सकता है कि वह उनसे बातें भी कर सकती है।"

आभा बोली, “तुम लोग मेरे बारे में ऐसे बातें क्यों कर रहे हो जैसे कि मैं यहाँ नहीं हूँ? तुम यह कौन सी गुप्त-शक्ति की बातें कर रहे हो? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा।"

त्री ने गार्गी को इशारा किया तो उसने आभा के मस्तिष्क में एक क्षण के लिए एक शक्ति-लहर भेजी। आभा को जैसे बिजली का झटका लगा, लेकिन वह समझ गयी कि जो अनुभूति उसने महसूस की है, उसे गार्गी ने भेजा है। उसने आश्चर्य से गार्गी को देखा, पूछा,

“तुमने यह क्या किया और कैसे किया?”

तब रंगनाथ बोला, “दीदी, दुनिया में हमारे जैसे कुछ लोग एक गुप्त-शक्ति के साथ पैदा होते हैं। त्री दादा के साथ, हम लोग हर रोज़ ध्यान, व्यायाम और अभ्यास से, उस शक्ति को साधते हैं। अगर बचपन में इस शक्ति को साधा नहीं जाये तो समय के साथ यह मुरझा जाती है। शायद आप भी एक गुप्त-शक्ति के साथ पैदा हुई थीं, लेकिन किसी वजह से आप की शक्ति मुरझाई नहीं, उसका बीज आप के भीतर आज भी जीवित है। हमारी शक्तियों की वजह से, हमारे अखाड़े की मिट्टी में ऐसा वातावरण बना है, जिससे व्यक्तियों के भीतर छिपी शक्तियाँ विकसित और प्रबल हो जाती है। आज अखाड़े में आप के भीतर सोयी हुई शक्ति जाग गयी है।"

“तुम यह क्या कह रहे हो, मुझे कुछ समझ नहीं आया", आभा बोली।

तो रंगनाथ ने तृप्ति से कहा, “उस लोटे को उठाओ।"

स्टूल के पास ज़मीन पर एक लोटा रखा था, तृप्ति ने उसे देखा तो वह हिलने लगा और फ़िर अपने आप सरक कर वह उसके पास आ गया।

रंगनाथ बोला, “आप ने देखा? तृप्ती की शक्ति धातुओं के साथ काम करती है, अपनी शक्ति से वह उस लोटे को अपने पास खींच लायी। वैसे ही वसंत की शक्ति पेड़-पौधों के साथ काम करती है", उसने वसंत को इशारा किया।

कमरे की खिड़की के बाहर एक बेल लगी थी जिसमें लाल और सफेद रंग के फ़ूल खिले थे। वसंत ने उस ओर देखा तो बेल का एक हिस्सा हिलने लगा, फ़िर मुड़ कर वह कमरे में घुस आया और दीवार के साथ-साथ चलता हुआ, जितनी दूर आ सकता था वहाँ आ कर रुक गया।

तृप्ति और वसंत के कारनामों को आभा ने हैरानी से देखा।

माधव बोला, “आभा दीदी की शक्ति का रंग अब दिखने लगा है, वह गुलाबी है।"

गार्गी बोली, “आप के पास भी ऐसी एक शक्ति है, उससे आप कीड़ों-मकोड़ों और जीव-जन्तुओं को बुला सकती हैं।”

त्री बोला, “लगता है कि तुम्हारी शक्ति ताकतवर है, लेकिन अभी तुम्हें उस पर नियंत्रण करना नहीं आता।"

आभा ने उबासी ली, बोली, “तुम लोग यह क्या कह रहे हो, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। साथ में मेरा सिर झन्ना रहा है और मुझे बहुत थकान लग रही है।"

तृप्ति बोली, “दीदी, जब तक हम ठीक से शक्ति-साधना नहीं सीखते, तब तक उसका उपयोग करने से ऐसा ही होता है। मैंने अभी तुम्हें लोटा हिला कर दिखाया था, मुझे भी बहुत थकान हो गयी है।"

आभा की आँखें बैठे-बैठे नींद से बंद हो रही थीं। त्री ने रंगनाथ को अलमारी से एक तकिया निकाल कर लाने के लिए कहा, और आभा से बोला, “थोड़ी देर तुम यहीं चटाई पर लेट जाओ, कुछ देर आराम करने से तुम्हारी थकान ठीक हो जायेगी।"

आभा ने उठने की कोशिश की, बोली कि वह छात्रावास में अपने कमरे में जायेगी, लेकिन चटाई से उठ नहीं पायी। आखिर में उसने तकिये पर सिर रख कर आँखें बंद कर लीं।

तृप्ति बोली, “मैं भी थोड़ी देर दीदी के साथ आराम करूँगी", और वह भी आभा के पास लेट गयी।

त्री उठ खड़ा हुआ, बाकी चारों बच्चों को ले कर बाहर आ गया, बोला, “मैंने फैसला किया है कि कल तुम सभी मेरे साथ चलोगे। हम लोग सुबह नाश्ते के बाद निकलेंगे, रास्ते में आभा को उसके भाई के पास छोड कर, हम लोग मजूली जायेंगे।"

सभी बच्चे खुश हो गये तो त्री ने उन्हें शोर न करने का इशारा किया, बोला, “तुम लोग अपना सामान तैयार कर लो क्योंकि हमें वहाँ कुछ दिन रुकना होगा।"

रंगनाथ ने पूछा, “और हमारे हथियार? उन्हें ले कर चलेंगे?”

त्री ने कुछ देर सोचा फ़िर बोला, “नहीं, बेहतर होगा कि हम अपने साथ कोई हथियार नहीं ले कर जायें। वैसे भी तुम उनका प्रयोग अभी सीख रहे हो। लेकिन अगर तुममें से कोई दुश्मन के हाथ आ गया और उसने देखा कि तुम्हारे पास कोई हथियार हैं तो वह तुम्हें जान से भी मार सकता है। अच्छा होगा कि तुम उन्हें सामान्य बच्चे लगो। हमारी शक्तियाँ ही हमारा हथियार हैं।" 

वसंत बोला, “यह हमारे तिरंगा-यौद्धाओं की सैना का पहला युद्ध होगा, हम बड़े गुरु जी की रक्षा करेंगे।"

शुरु में जब त्री के साथ केवल रंगनाथ और गार्गी थे, तो रंगा ने अपने नामों के पहले अक्षर जोड़ कर अपने आप को तिरंगा-योद्धा कहना शुरु किया था। बाद में अन्य बच्चों के आने के बावजूद, वही पुराना नाम उन्हें अभी भी अच्छा लगता है, हालाँकि त्री ने उन्हें कई बार समझाया है कि वह किसी पर हमला करने वाले यौद्धा नहीं है, वह केवल रक्षा के लिए युद्ध करते हैं।

बच्चे वहाँ से चले गये और त्री वहीं बैठ कर प्रतीक्षा करता रहा। कुछ देर के बाद उसने देखा कि तृप्ति की आँखें खुली हैं तो उसे उठने का इशारा किया, “चलो, मैं तुम्हें तुम्हारे कमरे तक छोड आता हूँ।"

“दादा, आभा दीदी बहुत अच्छी हैं, क्या वह हमारे साथ नहीं रह सकतीं?”, रास्ते में उसने पूछा।

त्री को केवल इतना पता है कि आभा का गाँव मणिपुर में लोकटक झील के पास में है। वह बोला, “आभा का गाँव में अपना घर-परिवार है, वह उन्हें छोड़ कर हमारे साथ कैसे रुकेगी?"

तृप्ति को छात्रावास में छोड़ कर वह अनाथाश्रम के संचालक से बात करने उनके दफ्तर गया और उन्हें कहा, "कल सुबह मैं, रंगनाथ, गार्गी, वसंत, माधव और तृप्ति, हम छह लोग कुछ दिनों के लिए आसाम जा रहे हैं। आभा भी हमारे साथ जायेगी, उसे रास्ते में कुर्स्यांग छोड़ते हुए जायेंगे। हम कुछ दिन बाहर रहेंगे।"

जब वह घर लौटा तो देखा कि आभा अभी भी बेसुध सी गहरी नींद में सो रही है, उसके जागने की प्रतीक्षा में वह वहाँ पालथी मार कर बैठ गया।

 
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सोमवार, जून 22, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 07

अब तक: जापानी याकूज़ा-खूनी ताकानोरी, जामुन बाबा की गुप्त शक्ति वाली मूर्ति को लेने भारत आया है। वह बाबा को नारायणपुर में खोज लेता है लेकिन वह उसके चँगुल से निकल भागने में सफल होते हैं। ताकानोरी से बचने के लिए, बाबा ने अपने वृद्धाश्रम में समाधी लेने का निर्णय लिया है। दूसरी ओर, त्रिनेत्र गुप्त-शक्ति वाले बच्चों के लिए गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम चलाता है, वह अपने साथ पाँच बच्चों को ले कर मजूली में जामुन बाबा की सहायता करने जाना चाहता है। आगे पढ़िये:

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अध्याय 07 

गँगटोक, सिक्किम, 2 मार्च 2026

दोपहर में बच्चे जब स्कूल से लौटे तो त्रिनेत्र ने रंगनाथ से बाकी शिष्यों को अखाड़े में बुलाने के लिए कहा। थोड़ी देर में ही पाँचों वहाँ आ गये।

त्री ने कहा, “गार्गी, ज़रा देखो कि यहाँ कोई हमारी बात तो नहीं सुन रहा?”

"दादा, और तो कोई नहीं है लेकिन आश्रम में तीन शक्ति-लहरें महसूस हो रही हैं, उनमें से कोई सुन भी सकता है।"

रंगनाथ के माथे पर बल पड़ गये, बोला, “यह तीसरा कौन है?

त्री बोला, “तीसरी आभा है, लेकिन उसकी शक्ति पूरी विकसित नहीं हुई है", फ़िर माधव से बोला, “क्या तुम देख सकते हो उसकी शक्ति का रंग कौन सा है?”

माधव ने आँखें बन्द कर लीं और कुछ क्षणों के लिए आभा पर ध्यान केन्द्रित किया, फ़िर बोला, “नहीं दादा, उनकी लहर का रंग बहुत हल्का है।"

तब त्री ने वसंत से कहा, "अखाड़े के आसपास अभेद्य दीवार बनाओ, ताकि वह तीनों भी हमारी बातें नहीं सुनें।

वसंत पेड़ों के माध्यम से हवा में अवरोध पैदा करवा सकता है, जिससे ध्वनि की लहरें रुक जाती हैं और परिधि के बाहर कोई नहीं सुन सकता। उसने कुछ पल के लिए आँखें बन्द कीं, फ़िर मुस्करा कर धीरे से सिर हिलाया। 

त्री बोला, “तुम्हें इसलिए बुलाया है क्योंकि हमें एक विपदा का सामना करना है।  मेरे गुरु जी के पीछे बहुत सालों से एक जापानी गैंग लगा हैं, आज सुबह वह लोग उन्हें खोजने में सफल हुए हैं। गुरु जी ने ऐसी परिस्थितियों का पहले भी सामना किया है, वह नहीं चाहते कि हम उनकी चिंता करें। लेकिन इस बार उनका पीछा करने वाला कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है, उसके पास गुप्त-शक्ति है, उसने उन्हें अन्वेषण-किरण से खोजा है। आज गुरु जी वहाँ से बच कर निकल आये, लेकिन अगले दिनों में उन्हें खतरा है। मैं उन्हें वहाँ अकेला नहीं छोड़ना चाहता, मैंने फैसला किया है कि मैं उनके पास जाऊँगा।"

सभी शिष्य उसकी ओर गम्भीरता से देख रहे थे।

रंगनाथ ने पूछा, “दादा, वह लोग उनके पीछे क्यों लगे हैं?”

“तुम्हें जितना कम मालूम हो उतना अच्छा है।"

गार्गी बोली, “दादा, क्या आप वहाँ अकेले जाओगे?”

"हाँ, मैं तुम लोगों को खतरे में नहीं डालना चाहता। जब मैं जाऊँगा तब तुम्हें, विशेषकर रंगनाथ और गार्गी को, यहाँ की देखभाल की ज़िम्मेदारी सम्भालनी पड़ेगी।"

रंगनाथ बोला, “दादा, अगर गुरु जी का पीछा करने वालों के पास अन्वेषण-किरण है, तो आप को अपनी शक्ति ढकने की ज़रुरत पड़ सकती है, नहीं तो वह आप को भी खोज लेंगे। आप हमें अपने साथ ले कर जाओ। हम बच्चे हैं, अगर वह जान भी जायेंगे कि हमारे पास शक्तियाँ हैं, तब भी हमें अधिक महत्व नहीं देंगे, वे छोटे बच्चों से नहीं डरेंगे। लेकिन हमारी शक्तियाँ इस लड़ाई में आप के काम आ सकती हैं।"

“मैं जानता हूँ कि तुम्हारी शक्तियाँ इस लड़ाई में मेरे काम आ सकती हैं, लेकिन अगर तुममें से किसी को कुछ हो गया तो मैं अपने आप को कभी क्षमा नहीं करूँगा।"

माधव बोला, “दादा, और अगर आप को कुछ हो गया तो हमारा ध्यान कौन रखेगा? अगर हम आप के साथ में होंगे तो जैसे रंगा दादा कहते हैं, कोई बच्चों को अधिक महत्व नहीं देगा और हम आप की मदद कर सकते हैं। आप ठीक रहोगे तो बाद में हमारी देखभाल भी करोगे।"

गार्गी बोली, “आप हमें उनसे लड़ाई के समय साथ नहीं रखना चाहते, तो भी हम लोग वहाँ पास में कहीं पर रह सकते हैं और वहाँ से आप की कुछ मदद कर सकते हैं।"

त्री कुछ देर तक सोचता रहा, फ़िर बोला, “मैं यह निर्णय लेने से पहले महादेव का मार्गदर्शन चाहता हूँ।" जब वह मुश्किल में होता है और उसे समझ नहीं आता कि क्या निर्णय लेना चाहिये, तो वह मंदिर में शिव जी के सामने ध्यान लगाता है और उनसे पूछता है। उसे लगता है कि शिव जी हमेशा उसके अंतरमन के प्रश्नों के उत्तर देते हैं, उसका मार्गदर्शन करते हैं।

वसंत ने पूछा, “दादा, गुरु जी ने और क्या कहा?” 

“गुरु जी आज सुबह नारायणपुर गये थे। उनके और मेरे बीच एक मानसिक तार जुड़ा है, वह जब चाहें, मेरे मन में बात कह सकते हैं, लेकिन आज उन्होंने यह बात मुझे टेलीफोन पर बतायी। इसका मतलब है कि उस समय उन्होंने अपनी शक्ति को ढक लिया था, वह उसका प्रयोग नहीं कर सकते थे। तब से मैं उनसे सीधा सम्पर्क नहीं कर पाया हूँ, शायद वह नहीं चाहते कि उनका पीछा करने वालों को उनके आश्रम का पता चले।"

गार्गी बोली, “अगर उन्होंने गुरु जी को अन्वेषण-किरण से खोजा है तो उन्हें केवल एक शक्ति-लहर की अनुभूति हुई होगी, उसे पक्का पता नहीं होगा कि वह गुरु जी ही हैं?”

वसंत बोला, “अगर अब वह लोग गुरु जी की शक्ति-लहर को नहीं खोज पा रहे, और उन्हें वहाँ पर हममें से कोई बच्चा मिल जाये, तो शायद वह सोच सकते हैं कि जो शक्ति-लहर उन्होंने महसूस की थी, वह गुरु जी नहीं थी, बल्कि हमारी थी?”

माधव बोला, “अगर हम लोग नारायणपुर जायें तो रंगा भैया उनकी बातें दूर से सुन सकते हैं और पता लगा सकते हैं कि वह कितना जानते हैं और उनकी आगे की क्या योजना है?”

त्री ने हाथ उठा कर उन्हें चुप कराया, बोला, “तुमने जो कहना था वह कह दिया, अब मुझे सोचने का समय दो और तुम लोग यहाँ से जाओ।"

बच्चे वहाँ से गये तो त्रिनेत्र मन्दिर में नटराज की प्रतिमा के सामने पद्मासन लगा कर बैठ गया और शिव जी का ध्यान लगा कर उनसे मार्गदर्शन माँगा।

कुछ देर के बाद जब वह अखाड़े से बाहर निकला तो देखा कि वहाँ एक पेड़ के पास आभा बैठी है। उसे देख कर वह उठ कर आयी, बोली, “मैं आप से मिलने आयी थी, लेकिन बच्चों ने मुझे कहा कि आप व्यस्त हैं, कोई भीतर नहीं जा सकता।"

“कहिये", त्री ने कहा।

“मैंने विशाल को टेलीफोन किया था, वह मुझे लेने आज नहीं आ सकता, क्या मैं यहाँ से कल सुबह जा सकती हूँ?”

“हाँ, आप विशाल को कहिये कि उसे यहाँ आने की आवश्यकता नहीं, कल सुबह हम लोग रास्ते में आप को वहाँ पर छोड़ देंगे।"

“बच्चे कह रहे थे कि यहाँ एक अखाड़ा है जहाँ वह व्यायाम करते हैं, क्या मैं आप के अखाड़े को देख सकती हूँ?” आभा ने पूछा।

त्री ने एक पल के लिए सोचा कि उसे मना कर दे, फ़िर बोला, “आईये, मैं आप को दिखाता हूँ।"

उसने अखाड़े का द्वार खोला और वह दोनों भीतर घुसे। आभा वहीं दरवाज़े के पास रुक गयी, बोली, “हरे पत्तों की छाया में ढकी यह जगह बहुत सुंदर है, किसी जँगल का हिस्सा लगती है। यहाँ बहुत शाँति है।" फ़िर उसने मन्दिर की ओर देखा, बोली, “वहाँ क्या है? लगता है जैसे कोई मुझे उस ओर खींच रहा है। मुझे भीतर से कुछ अजीब सा महसूस हो रहा है।"

इससे पहले कि वह उसे कुछ कहता, आभा ने आँखें बन्द कर लीं और उसके शरीर का ऊपरी हिस्सा धीरे-धीरे आगे-पीछे डोलने लगा। त्री को लगा कि वह ध्यान में चली गयी है।

इसके साथ ही अखाड़े में लगे पेड़-पौधों से अजीब सी सरसराहट की आवाज़ें आने लगी। कुछ ही देर में उनके आसपास की सारी धरती, जीव-जन्तुओं से भर गयी - उनमें कुछ गिलहरियाँ, चूहे और साँप थे, और उनके साथ हज़ारों छोटे-बड़े कीड़े-मकोड़े थे। सभी जीव-जन्तु किसी तंद्रा में डूबे लग रहे थे, वह उनके आसपास चक्कर लगाने लगे।

त्री घबराया, उसने आभा के कँधे पर हाथ रख कर उसे पुकारा तो उसका डोलना रुका। उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं, लेकिन उसकी दृष्टि खाली घूम रही थी, जैसे कि वह कुछ देख नहीं पा रही हो। तब त्री ने ज़ोर से ताली बजायी तो आभा के सिर को झटका लगा और वह जैसे नींद से जागी। उसी क्षण में जिस शक्ति ने उन जीव-जन्तुओं बाहर बुलाया था, वह क्षीण हो गई तो वह सभी अपने बिलों या पेड़ों की ओर चले गये। एक मिनट में सभी जीव-जन्तु वहाँ से गुम हो गये।

आभा ने आश्चर्य से उन्हें जाते हुए देखा। अक्सर लोग साँपों, कीड़ों-मकोड़ों से डरते हैं, लेकिन उसकी दृष्टि में बिल्कुल भी भय नहीं था। उसने त्री से पूछा, “यह कैसे किया तुमने? मुझे लगा कि मैं कोई सपना देख रही हूँ।"

जब वह कुछ नहीं बोला तो वह बोली, “तुम कोई जादूगर हो? बताओ, तुमने यह कैसे किया?”

त्री ने उसका हाथ पकड़ा, बोला, “चलो, यहाँ से बाहर चलते हैं, फ़िर तुम्हें बताऊँगा।" 

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उपन्यास का अगला भाग बृहस्पतिवार 25 जून को पढ़ सकते हैं। 

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