सोमवार, अगस्त 03, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 19

अब तक की कहानी:  ताकानोरी जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी मूर्ति चाहता है। उससे बचने के लिए बाबा समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनकी समाधी को खोदने की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं होता। उधर, बाबा का शिष्य त्रिनेत्र पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चों और आभा के साथ मजूली पहुँचा है। त्री, रंगा और गार्गी बाबा के आश्रम आते हैं। पीछे से ताकानोरी आभा, वसंत और तृप्ति को उठा कर नारायणपुर ले जा रहा है। इसके आगे पढ़िये ...

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अध्याय 19 

मजूली से नारायणपुर, असम, 4 मार्च 2026

ताकानोरी ने जून-मिन की समाधी लेने की खबर तुरंत रिकू को दी थी और उसने उसे ऐसे डाँटा था मानो इसमें उसकी कोई गलती हो। एक पल के लिए ओरी को बहुत गुस्सा आया था, फ़िर उसने अपने आप को समझाया कि वह यह काम रिकू के लिए नहीं, बल्कि उसके दादा जी के लिए कर रहा है और जब तक वह कोई काम करेगा, उसका धर्म है उसे पूरे मन और निष्ठा से करना। अगर वह रिकू से बदला लेने के लिए दादा जी से विश्वासघात करेगा तो वह अपने आप को समुराई नहीं मान सकता, सचमुच अधर्मी याकूज़ा बन जायेगा। 

उसने अपने गुस्से को दबा कर, त्रिनेत्र के बारे में सोचा था कि वह उसे कैसे खोजे। जून-मिन और उसके शिष्य का मामला उतना साफ नहीं था जितना वह दोनों दिखाने की कोशिश कर रहे थे। जिस तरह से वीडियो में दिखता था कि जून-मिन एक बक्से में बंद हो कर, धरती के गर्भ में दबाया गया था, उसका मतलब था कि वह मर गया होगा। लेकिन वह इतनी आसानी से क्यों मरेगा? इसमें अवश्य कोई धोखा है। तीस वर्षों से लापता व्यक्ति, एक अन्वेषण-किरण को महसूस करके, उसी दिन समाधी ले कर आत्महत्या कर ले, क्यों? यह कोई संयोग नहीं लगता, इसके पीछे अवश्य उनकी कुछ चाल है।

जून-मिन के शिष्य की प्रतीक्षा करने, वह सुबह ही जीप ले कर कमलाबाड़ी आ गया था। उसने अपनी जीप फैरी घाट से कुछ दूर, घरों के पीछे छुपा कर खड़ी की और वहाँ से अन्वेषण-किरण से हर आने वाली फैरी की जाँच करने लगा। आखिर में, दोपहर में उसने शक्ति-लहरें आने वाली फैरी से नहीं बल्कि कमलाबाड़ी के पूर्व में एक मैदान से आती हुई महसूस कीं। उसने तुरंत अपने नये ड्राईवर से उधर जाने के लिए कहा।

दस मिनट में उनकी जीप उस मैदान में पहुँच गई जहाँ से शक्ति-लहरें महसूस हो रहीं थीं। वहाँ जून-मिन के शिष्य की जगह पर एक युवती और दो बच्चे को पक्षियों के बीच में खेलते हुए देख कर उसे अचरज हुआ। उसने अपने गुँडों से उन तीनों को उठा कर कार में लाने के लिए कहा और वे सब तुरंत वहाँ से भाग निकले। उन्होंने फैरी ली और पहले वह लोग मरियानी की ओर गये और वहाँ से वह जीप में नारायणपुर की ओर निकले।

ओरी ने सोचा कि वह तीनों अवश्य ही त्रिनेत्र के साथी हैं, नहीं तो इतने सारे शक्तिवान लोग वहाँ पर क्यों एकत्रित हो गये थे? वह यह सोच कर खुश हो रहा है कि अब त्रिनेत्र उससे नहीं बच पायेगा, उस युवती और उन बच्चों को बचाने वह अपने आप उसके पास आयेगा।

वह सबसे पीछे वाली सीट पर आभा के साथ बैठा था। उनके आगे वाली सीट पर दोनों बच्चे और एक गुँडा बैठे थे। साथ में उनका नया ड्राईवर और एक अन्य गुँडा था। रिकू ने उसके लिए इन नये गुँडों का प्रबंध किया था।

रास्ते में उसने फ़िर से आभा के दिमाग में खोजा। वह भी तुरंत समझ गयी कि वह उसके दिमाग में घुस रहा है, क्योंकि उसे इस शक्ति का ठीक से प्रयोग करना नहीं आता था। गार्गी जब उसके दिमाग में झाँकती थी तो ऐसा महसूस होता था मानो किसी ने प्यार से सहलाया हो। जबकि ओरी का दिमाग में घुसना हथौड़े मारने जैसा था। आभा ने ओरी को रोकने की कोशिश की, लेकिन नहीं रोक पायी और वह समझ गया कि त्रिनेत्र कहीं बाहर गया है।

उसने वसंत और तृप्ति के दिमाग खंगालने की भी कोशिश की लेकिन वहाँ से उसे कुछ नयी जानकारी नहीं मिली। उस लड़के के दिमाग में उसे हर ओर घने जंगल और पेड़ दिखे, जैसे वहाँ पर हरे रंग का समुद्र हो जिसमें कुछ भी देखना या खोजना असम्भव था। बच्ची की शक्ति ठीक से विकसित नहीं हुई थी लेकिन वहाँ से उसे त्रिनेत्र की कुछ छवियाँ मिलीं। इस जाँच के बाद उसने सोचा कि शायद आभा त्रिनेत्र की पत्नी है और वह दोनों उनके बच्चे हैं।

उनके दिमागों की इस जाँच से वह जल्दी ही थक गया और उसने उनसे अन्य प्रश्न नहीं किये, सोचा कि नारायणपुर में घर पहुँच कर ठीक से पूछताछ करेगा और फ़िर त्रिनेत्र को पकड़ने का प्लैन बनायेगा। वह तीनों भी कार में चुपचाप बैठे थे, पर आभा उसके गुदे हुए शरीर के रंग-बिरंगे टैटू को कौतूहल से देख रही थी। वह उनके बारे में जानना चाहती थी, अंत में वह अपने आप को नहीं रोक पायी, पूछा, “तुम्हारे सारे शरीर पर यह चित्र क्यों बने हैं?”

ओरी को अपने टैटू वाले त्वचा-चित्रों पर बहुत गर्व है, बोला, “इन्हें जापानी में इरेज़ूमी कहते हैं। यह सामान्य टैटू नहीं हैं जो मशीन से बनाते हैं, मैंने इन्हें पाराम्परिक विधि से गुदवाया है, जिसमें दर्द सहना पड़ता है”, उसने अपनी कमीज़ के बटन खोल खोल कर अपनी छाती और कँधे दिखाये, वह सारा हिस्सा उन रंगीन टैटू-चित्रों से ढका था। वह मुस्करा कर बोला, "मेरी पीठ, छाती, पेट, जाँघें, मेरे शरीर की हर जगह चित्रित है।"

वह मोर की तरह ऐसे इतरा रहा था कि आभा को हँसी आने लगी, उसे छुपाने के लिए वह खिड़की से बाहर देखने लगी। कुछ देर बाद ओरी ने पूछा, “क्या तुम त्रिनेत्र की पत्नि हो?”

जब उसने उत्तर नहीं दिया तो ओरी ने उसकी कलाई  को पकड़ लिया और दबाते हुए बोला, "जब तुमसे कुछ पूछूँ तो मुझे उसका जवाब तुरंत चाहिये, समझी?"

उस समय उनकी जीप एक रैड लाईट पर रुकी हुई थी। उसके दबाने से आभा की कलाई में पीड़ा हुई तो वह बोली, “मेरा हाथ छोड़िये, मुझे दर्द हो रहा है।"

सड़क के किनारे एक साँड घास चर रहा था, शायद उसने आभा के दिमाग की पीड़ा-लहर को महसूस किया तो वह अचानक जैसे नींद से जागा और सिर उठा कर उनकी जीप की ओर भागा आया। ड्राईवर ने अपने साथ वाली खिड़की खुली रखी हुई थी, साँड ने वहीं से उस पर हमला किया और खिड़की से सीर जीप के भीतर घुसा कर मारा। यह सब कुछ इतना अचानक हुआ कि किसी को समझ नहीं आया कि क्या हो रहा है।

ओरी ने तुरंत आभा की ओर देखा, उसने महसूस किया कि आभा की शक्ति-लहरें उत्तेजित हो कर उसके सिर के आसपास मँडरा रही हैं, तो उसने तुरंत उसकी कलाई छोड दी। वह समझ गया कि उस साँड का हमला आभा की वजह से हुआ है, वह चिल्लाया, “रोको उसे, ऐसे मत करो।" लेकिन आभा को कुछ समझ नहीं आया।

सीट के पीछे ओरी की तलवार रखी थी, उसके बिना वह कहीं नहीं जाता था। उसने उसे उठाया, उसमें से तलवार बाहर निकाली, पीछे वाला दरवाज़ा खोल कर जीप से उतरा और सीधा साँड की गर्दन पर वार किया। साँड की गर्दन से खून निकला तो शायद आभा को उस जन्तु का दर्द महसूस हुआ और उसकी शक्ति-लहर शाँत हो गयी। जब उसके और साँड के बीच का तार टूट गया तो वह वहाँ से भाग गया।   

ताकानोरी ने अपने ड्राईवर को देखा कि साँड के सींग से उसके माथे पर बड़े घाव बन गये थे और खून से उसके चेहरा, गर्दन और कमीज लाल हो रहे थे। उसने ड्राईवर को अपना रुमाल निकाल कर दिया, कहा कि उसे अपने माथे पर खून रोकने के लिए दबा कर रखे।

उसके गुँडों ने पास के डॉक्टर का पता पूछा और घायल ड्राईवर को वहाँ ले गये। उसके उपचार में समय लगना था, उन्होंने उसे वहीं छोड दिया और ओरी ने दूसरे आदमी से गाड़ी चलाने के लिए कहा। तब तक अँधेरा होने लगा था।

उसने आभा से पूछा, “तुमने उस जानवर से हमारी जीप पर हमला क्यों करवाया?”

“मैंने जानबूझ कर कुछ नहीं किया, तुमने मेरी कलाई को ज़ोर से दबाया था, तो मुझे दर्द हो रहा था, इसलिए वह मुझे बचाने आया।"

अचानक ओरी ने हाथ बढ़ा कर अगली सीट पर बैठे वसंत के सिर के बाल पकड़ कर खींचे, तो वह दर्द से चिल्लाया, लेकिन उसने उसके बालों को नहीं छोड़ा, बोला, “तुम झूठ बोल रही हो। मुझे ठीक से उत्तर नहीं दोगी तो तुम्हारे बेटे का गला काट दूँगा।"

आभा घबरा कर चिल्लाई, “छोड़ो उसे, उसने कुछ नहीं किया। मैंने तुम्हें कहा है कि मैंने जानबूझ कर कुछ नहीं किया।"

उस समय उनके साथ में सड़क पर एक बैलगाड़ी जा रही थी। जब वह चिल्लायी तो अचानक उसका बैल उनकी जीप की ओर घूम कर आगे आने लगा। ताकानोरी ने उसे देखते ही घबरा कर वसंत के बालों को छोड़ दिया और ड्राईवर से बोला, "जीप को तेजी से आगे निकाल लो, नहीं तो वह बैल हम पर हमला करेगा।"

ड्राईवर तुरंत तेज़ चला कर जीप को आगे ले गया। बैल के साथ बैलगाड़ी भी थी, वह उनका पीछा नहीं कर पाया।

ओरी कुछ शाँत हुआ तो उसने आभा के दिमाग के भीतर दोबारा झाँका, तो महसूस किया कि वहाँ पर उथल-पुथल मची है, शक्ति को केन्द्रित करके चलाने के लिए जो एकाग्रता और ध्यान चाहिये, वहाँ वैसा नहीं है। वह बोला, “तुम्हें अपनी शक्ति पर ठीक से काबू करना नहीं आता, क्यों? त्रिनेत्र ने तुम्हें यह शिक्षा नहीं दी?”

आभा बोली, “मैं उसे ठीक से नहीं जानती। वह मेरा गुरु नहीं है, वह एक अनाथाश्रम चलाता है और मैं उसके मित्र की बहन हूँ, विधवा हूँ।"

“उसका अनाथाश्रम कहाँ है?”

आभा को समझ नहीं आया कि क्या कहे। अगर वह उसे गँगटोक कहेगी तो वह वहाँ उनके अनाथाश्रम पर हमला कर सकता है, बोली, “वह मणिपुर में है, यहाँ से करीब आठ सौ किलोमीटर दूर है।"

ओरी ने तुरंत उसके दिमाग में झाँका तो उसे वहाँ अनाथाश्रम की बिल्डिंग दिखी, जिसके आसपास खेत और पहाड़ थे। उसे लगा कि आभा ने उसे जगह का नाम सही नहीं बताया है, लेकिन उसे समझ नहीं आया कि वह उससे वहाँ का सही नाम कैसे जान सकता है? उसने पूछा, “और यह दोनों बच्चे? यह किसके हैं?”

“यह दोनों भी अनाथ हैं", वह बोली।

ताकानोरी सोच में डूब गया। आभा के पास शक्ति है, और उन दोनों बच्चों में भी शक्ति है। शक्ति वाले इतने लोग एक जगह पर, एक साथ इकट्ठे कैसे हो गये? जापान में जब वह बड़ा हो रहा था तब यामागुचि सान के पास वह अकेला शक्ति वाला बच्चा था।

वह जानता है कि जून-मिन की मूर्ति से बच्चों की गुप्त-शक्ति विकसित होती है। शायद वह मूर्ति त्रिनेत्र के पास है, और उसकी मदद से ही उसने इन सब की शक्तियों को विकसित किया है?

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अगला अध्याय बृहस्पतिवार 6 अगस्त 2026 से पढ़ सकते हैं

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गुरुवार, जुलाई 30, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 18

अब तक की कहानी: ताकानोरी जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी मूर्ति चाहता है। उससे बचने के लिए बाबा समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में लोगों को जान से मारने की धमकी देता है। वह उनकी समाधी को खोदने की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं होता। उधर, बाबा का शिष्य त्रिनेत्र एक अनाथाश्रम चलाता है, जहाँ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा भी हैं। वे बाबा को बचाने के लिए, मजूली पहुँच कर, उनके आश्रम आते हैं। समाधी के दर्शन करके वह बाहर आ रहे हैं जब त्री को जगदीश बाबू दिख जाते हैं। इसके आगे पढ़िये ...

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अध्याय 18

मजूली द्वीप, असम, 4 मार्च 2026, शाम

गार्गी जगदीश बाबू को बुलाने गयी, बोली, “बाबू जी, हमारे बापू की तबियत ठीक नहीं है …”, और त्री की ओर इशारा किया।

जगदीश बाबू ने रास्ते के किनारे पर सिर झुका कर बैठे हुए त्री को देखा, लेकिन पहचान नहीं पाये। वह उसके पास आये, पूछा, “क्या हुआ भाई?”

त्री ने सिर ऊपर नहीं उठाया पर उनके साथ खड़ी गार्गी ने उन्हें धीरे से कहा, “जगदीश बाबू हमें आप से अकेले में ज़रूरी बात करनी है, हमें अपने दफ्तर में ले चलिये।"

उन्हें उसकी बात समझने में थोड़ी देर लगी पर शायद वह त्री को पहचान गये, आवाज़ ऊँची करके बोले, “हाँ, मैं तुम्हें दवाई देता हूँ, तुम लोग मेरे साथ चलो, तुम्हारे बापू की तबियत ठीक नहीं है।"

त्री और गार्गी जगदीश बाबू के साथ चले, त्री सिर झुका कर और लँगड़ा कर चल रहा था। रंगनाथ उनके पीछे कुछ दूर पर था और देख रहा था कि कोई उनका पीछा तो नहीं कर रहा। जब उसे विश्वास हो गया कि किसी ने उनकी बातचीत पर ध्यान नहीं दिया है, तो वह भी उनके पीछे जगदीश बाबू के दफ्तर की ओर आया। वहाँ उसने बाहर बैठे हुए सोमचाई को देखा, तो उसके पास जा कर बैठ गया और जेब से रंग-बिरंगे कँचे निकाल कर उन्हें हाथों में उछालने लगा।

वह कँचों को उछालने के खेल में माहिर है, जब वह उनसे खेलता है तो ऐसा लगता है मानो वह कँचे धीरे-धीरे हवा में तैर रहे हैं और नीचे नहीं गिरते। जब उसने एक साथ हवा में चार कँचे घुमाये तो सोमचाई का ध्यान उसके खेल पर लग गया। तब उसने कँचे सोमचाई की ओर बढ़ाये और उसे उन्हें उछालने के लिए कहा। सोमचाई को समझ नहीं आया कि वह क्या कह रहा है, तो उसने मुस्करा कर, हाथ से उन्हें उछालने का इशारा किया। सोमचाई ने उसे सिर हिला कर मना किया, लेकिन इतनी देर में जगदीश बाबू, त्री और गार्गी को आश्रम के भीतर के किसी कमरे में ले जा चुके थे।

भीतर जा कर जगदीश बाबू रोने लगे, त्री से बोले, “त्रिनेत्र बेटा, तुम्हें क्या बताऊँ। बाबा ने समाधी ले ली, हमें अनाथ कर दिया। लेकिन हमारे लिए यही दुख कम नहीं था, एक और आफत सिर पर आ पड़ी है। कल ताकानोरी और उसके गुँडे यहाँ आ धमके, उन्होंने हमारे एक बच्चे की गर्दन काटने की धमकी दी और बाबा ने तुम्हारे लिए जो चिट्ठी छोड़ी थी, उसे ले लिया। कल रात को उन्होंने बाबा की समाधी को तोड़ने की कोशिश की। इसमें उनके एक आदमी की आँख फूट गयी और दूसरे के पैर में गोली लगी है। वह कहता है कि वह किसी मूर्ति को खोज रहा है और जब तक उसे वह नहीं मिलेगी, वह हमें छोड़ेगा नहीं। अब हम क्या करें, हमें इन पापियों से कैसे मुक्ति मिलेगी?"

त्री ने उन्हें ढाढ़स बँधाया, “काका आप चिंता नहीं कीजिये, हमारे गुरु जी इतने कमज़ोर नहीं हैं कि एक गुँडे से हार जायेंगे। आप धीरज रखिये, सब ठीक हो जायेगा। गुरु जी ने जो चिट्ठी मेरे लिए छोड़ी थी, आप को मालूम है कि उसमें क्या लिखा है?” 

“उसमें एक कविता जैसी लिखी है, जिसका अर्थ उन्हें समझ नहीं आ रहा है। तब उन्होंने मुझे उसका अंग्रेज़ी अनुवाद करने के लिए कहा। मैंने अनुवाद तो कर दिया है, लेकिन मुझे भी समझ नहीं आया कि बाबा क्या कहना चाहते थे", उन्होंने उसकी ओर एक कागज़ बढ़ाया, “जब अनुवाद कर रहा था तो मैंने उनकी चिट्ठी की बातों को यहाँ लिख लिया है। शायद यह कोई पहेली है? ताकानोरी कह रहा था कि जब तुम आओगे तो तुमसे इसका अर्थ पूछेगा।"

त्री ने उस कागज़ पर जल्दी से नज़र घुमायी और उसे तह करके जेब में रख लिया, बोला, “मैं समझ गया कि गुरु जी मुझे क्या कहना चाहते हैं। आप इस कविता की बिल्कुल चिंता नहीं कीजिये। जाने से पहले मैं आप से एक बात कहना चाहता हूँ। अगले दिनों में अगर आप मुझे ताकानोरी के साथ देखें तो उस समय मैं चाहे कुछ भी कहूँ या करूँ, आप ऐसा दिखाईये कि मुझे नहीं पहचानते और उनके सामने मुझसे बात करने की कोशिश भी नहीं कीजिये, समझे?”

जगदीश बाबू ने हामी भरी तो वह दोनों उठ कर पीछे के रास्ते से वृद्धाश्रम के गेट की ओर निकल गये। रंगनाथ ने उन्हें जाते देखा तो उसने मुस्करा कर सोमचाई से विदा ली और गेट की ओर आया।

वहाँ से वे सीधा फुलानीबाड़ी घाट की ओर गये, और घाट से श्री भोला मन्दिर के लिए मोटर-बोट ली, और फ़िर वहाँ से पैदल चल कर सुबह वाले रास्ते से लौटे। तब तक अँधेरा होने लगा था। जब वह सुरंग द्वार वाले पीपल के पेड़ के पास पहुँचे तो अचानक गार्गी रुक गयी, बोली, “माधव की शक्ति-लहर महसूस हो रही है, वह यहाँ आसपास कहीं छिपा हुआ है।" उसने आवाज़ लगाई, “माधव, हम हैं, बाहर आ जाओ।"

तब माधव झाड़ियों के नीचे से बाहर निकला। उसके कपड़ों और चेहरे पर धूल लगी थी और उस धूल में आँसू बहने के निशान दिख रहे थे।

त्री ने आगे बढ़ कर उसे बाहों में जकड़ लिया, पूछा, “क्या हुआ?”

माधव की आँखें फ़िर से भर आयीं, बोला, “एक आदमी आया था, मोटा, लम्बा-चौड़ा, पहलवान जैसा, वह आभा दीदी, वसंत और तृप्ति को जबरदस्ती अपनी जीप में बिठा कर ले गया।"

पता चला कि दोपहर को ज़रीना ने उनके लिए खाना बनाया था। खाने के बाद उन्होंने कुछ देर आराम किया था, फ़िर वे सुरंग से होते हुए जँगल में घूमने आये थे।

त्री ने पूछा, “जब तुम लोग सुरंग से बाहर निकले तो किसी खुली जगह पर तो नहीं गये?”

“पहले तो हम जँगल में ही घूम रहे थे। लेकिन फ़िर पता नहीं कैसे, तीन सफेद बगुले जैसे पक्षी थे, वह आभा दीदी के एकदम पास आ गये। वह बहुत सुंदर पक्षी थे, उनकी पीली चोंच और सिर पर पीली कलगी थी और उन्हें हमसे बिल्कुल डर नहीं लग रहा था। हम उनके साथ खेलने लगे और उनके पीछे-पीछे चलते गये। उनके साथ हम एक मैदान में पहुँचे, वहाँ और भी बहुत सारे पक्षी जमा हो गये, वह सभी आभा दीदी के आसपास घूम रहे थे। हमें बहुत मज़ा आ रहा था। तब मुझे सू-सू आया था, तो मैं एक झाड़ी के पीछे सू-सू करने चला गया। तभी मैदान में एक जीप आयी, तो मैं छुप गया। जीप से तीन आदमी उतरे और उन्होंने आभा दीदी, वसंत और तृप्ति को पकड़ लिया। फ़िर वह पहलवान आदमी जीप से उतरा, उसने आभा दीदी से कुछ पूछा और जब दीदी ने उत्तर नहीं दिया तो उसने उन्हें चाँटा मारा। फ़िर वह लोग उन्हें जीप में बिठा कर कहीं ले गये", माधव ने बताया।

त्री ने लम्बी साँस ली, बोला, “इसीलिए आज हमें वृद्धाश्रम के आसपास ताकानोरी की शक्ति महसूस नहीं हो रही थी, क्योंकि वह मुझे खोजने कमलाबाड़ी घाट की ओर आया था और उसने आभा और बच्चों की शक्ति-लहरों को देख लिया। यह कितनी देर पहले की बात है?”

“करीब आधा घंटा पहले की।"

त्री ने कहा, “शायद वह लोग अभी यहाँ से बहुत दूर नहीं गये, गार्गी, तुम उनकी शक्ति-लहर को खोजने की कोशिश करो।"

गार्गी ने आँखें बंद कीं और कुछ क्षणों के बाद बोली, “वह लोग किसी नाव या फैरी बोट में बैठे हैं, वह नाव नदी पार करके मरियानी की ओर जा रही है।"

त्री ने रंगनाथ को इशारा किया तो उसने भी नदी की दिशा में ध्यान लगाया, बोला, “ताकानोरी सोमचाई से टेलीफोन पर बात कर रहा है, कहता है कि उसे तीन लोग मिले हैं जो त्रिनेत्र के साथी लगते हैं और वह उन्हें घर ले कर जा रहा है।"

“कौन से घर?”

“यह तो उसने नहीं कहा।"

त्री ने कुछ देर तक सोचा, फ़िर गार्गी से कहा, “ताकानोरी के पास अन्वेषण-शक्ति है, तुम हमारी शक्ति-लहरों को ढक दो ताकि वह हमें नहीं देख पाये।"

गार्गी बोली, “दादा, मुझे बच्ची नहीं समझो, मैंने यहाँ आते ही हम सब की शक्ति-लहरों को ढक दिया था।"

त्री बोला, “अब हमें सोचना है कि हम उन तीनों तक संदेश कैसे पहुँचायें कि वह चिंता नहीं करें, हम उन्हें छुड़वाने का कोई रास्ता खोज निकलेंगे।"

गार्गी बोली, “दादा, मैं वसंत से बात कर सकती हूँ।"

"नहीं गार्गी, मैं नहीं चाहता कि हम ऐसा कुछ करें जिससे ताकानोरी को हमारा पता चल जाये।"

सोच कर रंगनाथ बोला, “दादा, वह सब लोग हमेशा तो एक साथ नहीं रहेंगे और वह उन्हें जहाँ भी ले कर जायेगा, चौबिस घंटे उनके पास नहीं रहेगा। जब वह उन्हें अकेला छोड़ेगा, तब हम उनसे बात कर सकते हैं, तब तक गार्गी उन पर नज़र रखेगी।"

अचानक माधव बोला, “उस केले के पेड़ को देखो, कैसे हिल रहा है, इसका मतलब है कि वसंत हमें कुछ कह रहा है।" सब ने उधर देखा, उस पेड़ के लम्बे हरे पत्ते, हाथी के कानों की तरह आगे-पीछे हिल रहे थे।

त्री बोला, “शायद वह पेड़ों के माध्यम से हमारी बातें सुन रहा है। वसंत अगर तुम मेरी आवाज़ सुन सकते हो, तो केले के साथ वाले पेड़ की पत्तियाँ हिलाओ।"

तुरंत केले के साथ वाले पेड़ की शाखाएँ भी ऊपर-नीचे हिलने लगीं।

त्री मुस्कराया, बोला, “बहुत बढ़िया वसंत। तुम लोग कोई चिंता नहीं करो, समय आने पर हम तुम्हें वहाँ से छुड़ा लेंगे। तुम हमें संदेश भिजवा देना कि तुम कहाँ हो और सब ठीक हो या नहीं। जब तुम लोग अकेले होगे, तब गार्गी भी तुमसे बात करेगी। अगर ताकानोरी तुमसे कुछ पूछे तो उसे मेरे मोबाइल का नम्बर दे देना, कहना कि मैं उससे बात करना चाहता हूँ।"

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सोमवार, जुलाई 27, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 17

अब तक की कहानी: ताकानोरी जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी मूर्ति चाहता है। उससे बचने के लिए बाबा समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में लोगों को जान से मारने की धमकी देता है। वह उनकी समाधी को खोदने की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं होता। उधर, बाबा का शिष्य त्रिनेत्र एक अनाथाश्रम चलाता है, जहाँ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा भी हैं। वे बाबा को बचाने के लिए, मजूली पहुँच कर, उनके आश्रम आते हैं। इसके आगे पढ़िये ...

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अध्याय 17

 मजूली द्वीप, असम, 4 मार्च 2026, दोपहर

 गुरु जी का तहखाने वाला घर काफ़ी बड़ा था। उसमें चार कमरे थे। त्री ने इशारा करके कहा, "वह गुरु जी का कमरा है, उसमें नहीं जाओ, बाकी घर में तुम जहाँ चाहो वहाँ जा सकते हो।

जब वह वहाँ पहुँचे तो दोपहर हो चुकी थी और तीनों को भूख लगी थी। गार्गी बोली, “यहाँ रसोई में गैस का चूल्हा रखा है, क्या हम कुछ खाना पका सकते हैं?”

त्री ने मना किया, बोला, “खाना बनायेंगे तो चिमनी की पाईप से धूँआ और गँध ऊपर जा सकते हैं, उससे लोगों को शक हो जायेगा, इस समय यह खतरा लेना ठीक नहीं। उधर अलमारी में देखो, वहाँ कुछ फ़ल, गाजर, मूली आदि रखे होंगे, उन्हें खाना बेहतर होगा।"

फ़ल-सब्जियाँ खा कर त्री ने गार्गी और रंगनाथ से कहा, “तुम दोनों ऊपर जा कर पता लगाओ कि वृद्धाश्रम में क्या हो रहा है?" वह उसे सीढ़ियों की ओर ले कर गया।

रंगनाथ ने ऊपर देखा तो बोला, “यह सीढ़ियाँ तो कुछ अजीब सी लगती हैं।" वह सीढ़ियाँ कमरे की छत तक जा कर रुक जाती थीं।

त्री बोला, “क्योंकि वहाँ एक छिपा हुआ दरवाज़ा है।" उसने सीढ़ियाँ चढ़ कर दीवार पर लगा एक बटन दबाया तो ऊपर से छत का एक हिस्सा खुल गया। उसने सिर को बाहर निकाल कर आसपास देखा। जब कोई नहीं दिखा तो उन्हें ऊपर आने का इशारा किया।

वह सीढ़ियाँ झाड़-झँखाड़ के बीच में एक खण्डहर के पीछे निकलीं, वहाँ आसपास घना जँगल था। त्री ने उन्हें इशारे से बताया, “उधर जाओ, वहाँ एक बाग है, उससे हो कर गुरु जी के घर के पिछले दरवाज़े तक पहुँच जाओगे, जो खुला होगा। उनके घर की खिड़कियों से वृद्धाश्रम का गेट दिखता है, तुम बस वहाँ से देख कर आओ।"

वह दोनों उस दिशा में बढ़े, धीरे-धीरे देखभाल कर कदम रख रहे थे ताकि बिल्कुल शोर नहीं हो, हालाँकि रंगनाथ ने अपनी श्रवण शक्ति से जाँच लिया था कि वहाँ कोई नहीं है। पेड़ों के बीच से हो कर वह गुरु जी के घर के पिछवाड़े वाले बाग में घुसे, देखा कि उसका पीछे वाला दरवाज़ा खुला हुआ है। गार्गी ने वहीं से कुछ क्षणों तक आँखें बंद करके, मन की दृष्टि से घर के भीतर खोजा और जब किसी व्यक्ति का भास नहीं हुआ तो वह दोनों दबे पाँव भीतर गये।

घर में देखा कि वहाँ किसी ने कुछ खोजने की कोशिश की है। सारे संदूक, दराज़ और अलमारियाँ खुले थे और चद्दर-कपड़े बाहर बिखरे हुए थे। वह खिड़की की ओर गये और छिप कर बाहर देखा। रंगनाथ ने आश्रम के भीतर से आते-जाते लोगों की बातों को सुना।

गेट के सामने एक कच्ची सड़क थी जो वृद्धाश्रम की ओर जा रही थी और जिस पर लोगों की कतार लगी थी, वह लोग एक-एक करके, धीरे-धीरे वृद्धाश्रम के भीतर जा रहे थे, और साथ से लोग बाहर निकल रहे थे। बाहर कोई पहरेदार या गार्ड नहीं था।

दोनों दबे पाँव, जैसे गये थे, वैसे ही वापस खण्डहर तक लौट कर आये। फ़िर नीचे तहखाने में आ कर त्री को सारी बात बतायी।

गार्गी बोली, “मैंने पूरे क्षेत्र को जाँचा लेकिन आश्रम में किसी की शक्ति-लहर महसूस नहीं हुई। इसका मतलब है कि ताकानोरी इस समय यहाँ नहीं है।"

“नदी की दूसरी ओर, नारायणपुर की तरफ भी शक्ति-लहर को खोजा? शायद वह वहाँ हो?” त्री ने पूछा।

“हाँ मैंने उस ओर भी देखा, वहाँ भी ऐसा कुछ महसूस नहीं हुआ।"

रंगनाथ बोला, “मैंने आश्रम से निकलने वाले लोगों के बातें सुनीं, लेकिन कोई विशेष बात नहीं पता चली, केवल गुरु जी की बातें कर रहे थे, और कह रहे थे कि आश्रम वालों को समाधी देखने वालों के लिए पानी पिलाने की व्यवस्था करनी चाहिये।"  

त्री बोला, “ठीक है, हम भी ऊपर जा कर समाधी देखने वालों की कतार में खड़े हो जायेंगे। यहाँ सब लोग गुरु जी को जामुन बाबा कहते हैं, अगर कोई पूछेगा तो हम भी यही कहेंगे कि उनकी समाधी को देखने आये हैं। लेकिन जहाँ तक हो सके, तुम दोनों कुछ नहीं बोलना, मुझे बात करने देना। आश्रम के गेट से घुसते ही, दायीं ओर की बिल्डिंग में उनके संचालक जगदीश बाबू का दफ्तर है, मुझे उनसे मिल कर बात करनी है। लेकिन वहाँ ताकानोरी का कम्प्यूटर वाला आदमी सोमचाई भी हो सकता है, हमें उससे बचना है। रंगनाथ, तुम उस ओर ध्यान लगा कर सुनने की कोशिश करना, अगर तुम्हें जगदीश बाबू या सोमचाई का नाम सुनाई दे तो मुझे बताना।"

वह तीनों तहखाने से निकल आये, फ़िर जँगल से निकल कर वृद्धाश्रम की ओर गये और वहाँ खड़ी कतार में लग गये।

कतार में खड़े लोग आपस में बातें कर रहे थे। जब किसी ने त्री से पूछा तो उसने कहा कि वे अलीपुर द्वार के एक चाय-बागान से आये हैं और केवल बँगाली बोलते-समझते हैं, असमियाँ नहीं जानते। बाबा का नाम बँगाल तक फ़ैल गया है, और लोग उनकी समाधी देखने इतनी दूर से आ रहे हैं, यह सुन कर लोगों को अचरज हुआ। कतार धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी और उनके पीछे नये लोग आ कर जुड़ते जाते थे।

जब तक उनकी गेट से भीतर घुसने की बारी आयी, तब तक शाम होने वाली थी और कतार छोटी सी रह गयी थी। जब वह लोग वृद्धाश्रम की बिल्डिंग के पास से गुज़रे तो रंगनाथ ने अपनी श्रवण शक्ति लगा कर आसपास हो रही बातों को सुनने की कोशिश की। थोड़ी देर में ही उसने सोमचाई की आवाज़ को पकड़ लिया, और उसकी बातों को ध्यान से सुना। कुछ देर तक सुनने के बाद उसने त्री को कहा, “दादा, सोमचाई टेलीफोन पर ताकानोरी से बात कर रहा था, बोला कि बटेर को जोरहाट ले कर गये हैं, वहाँ उसकी आँख का ओपरेशन हुआ है और मटरू भी अस्पताल में भर्ती है।"

त्री ने पूछा, “ताकानोरी ने जवाब में कुछ कहा कि वह कहाँ पर है?”

“नहीं", रंगनाथ ने सिर हिला कर मना किया।

“ठीक है, तुम जगदीश बाबू का पता लगाने की कोशिश करो कि वह कहाँ हैं।"

तब तक वे समाधी-स्थल पर पहुँच गये। चूँकि अब भीड कम हो गयी थी इसलिए लोगों को वहाँ रुकने का अधिक समय मिल रहा था। लोग समाधी स्थल की परिक्रमा कर रहे थे और कुछ लोग वहाँ हाथ जोड कर प्रार्थना भी कर रहे थे।

समाधी के पास पहुँचे तो त्री ने धीरे से गार्गी से कहा, “ज़रा कोशिश करके देखो कि क्या समाधी में गुरु जी की शक्ति-लहर महसूस होती है?”

वह तीनों वहाँ आँखें बंद करके, हाथ जोड़ कर खड़े थे। रंगनाथ ने सुना कि एक बूढ़ा दूसरे से कह रहा है, “यह भीड़ सम्भालने का काम बहुत थकाने वाला है, पता नहीं यह सब कितने दिन चलेगा। मैं कल जगदीश बाबू से कहूँगा कि मेरी तबियत ठीक नहीं है।"

वहाँ से चलने लगे तो गार्गी बोली, “समाधी से बहुत हलका सा शक्ति का भास होता है, शायद उनकी शक्ति कमज़ोर हो रही है, या वह बहुत गहराई में हैं।"

त्री का चेहरा गम्भीर हो गया, बोला, “उनकी शक्ति इतनी आसानी से क्षीण नहीं होगी, वह अवश्य ही गहराई में हैं।"

रंगनाथ ने पूछा, “दादा, ज़मीन के नीचे दबने के बाद गुरु जी साँस कैसे लेंगे?”

त्री ने उसके प्रश्न का उत्तर नहीं दिया, पूछा, “जगदीश बाबू का पता नहीं चला?”

रंगनाथ ने फ़िर से अपनी श्रवण-शक्ति का ध्यान लगा कर  उसे आसपास घुमाया और बोला, “आश्रम में कई लोग उनकी बात कर रहे हैं लेकिन अभी तक किसी को उन्हें उनके नाम से बुलाते हुए नहीं सुना। मैं उनकी आवाज़ नहीं पहचानता, उनका पता कैसे लगाऊँगा?”

वे वापस वृद्धालय के गेट की ओर जा रहे थे जब अचानक त्री रुक गया, बोला, “वह सामने हैं जगदीश बाबू, वह इधर ही आ रहे हैं। उनके साथ दो अन्य लोग हैं, हमें उनसे अकेले में बात करने का कोई बहाना चाहिये।"

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रविवार, जुलाई 26, 2026

बाघा जतिन और उनके पौत्र

करीब तेरह साल पहले मुझे पैरिस से पृथ्वीन्द्र मुखर्जी की ईमेल मिली, कि उनके दादा बाघा जतिन पर फ़िल्म निर्देशक हरिसाधन दासगुप्ता ने एक फ़िल्म बनायी थी और वह हरिसाधन जी के पुत्र फ़िल्म निर्देशक राजा दासगुप्ता का सम्पर्क खोज रहे थे। मैंने बचपन में बाघा जतिन का नाम सुना था लेकिन उनके बारे में अधिक जानकारी नहीं थी, बस इतना जानता था कि वह अंग्रेज़ी सरकार से लड़ने वाले एक क्राँतिकारी थे। मैंने सोचा कि बाघा जतिन के पौत्र से सम्पर्क हुआ है तो इसका फायदा उठाना चाहिये और उनसे उनके दादा के बारे में जानने की कोशिश करनी चाहिये।

इस तरह से पृथ्वीन्द्र जी से कुछ संदेशों का आदान-प्रदान हुआ। तब मैं एक शोध रिपोर्ट पर काम कर रहा था, सोचा कि उसे पूरा करके पृथ्वीन्द्र जी से बातचीत करूँगा लेकिन जैसा अक्सर होता है, कुछ दिनों में मैं इस बात को भूल गया। दो साल पहले जब उनके देहांत की खबर पढ़ी तो अपनी वह पुरानी बातचीत याद आयी, बहुत दुख हुआ कि मैंने उस समय उनसे बात क्यों नहीं की।

कुछ ऐसा ही मेरे साथ पहले भी एक बार हुआ था जब मैंने दिल्ली में मित्र कर्बान अली से कहा था कि जब दिल्ली आऊँगा तो उनके पिता जी कप्तान अब्बास अली से बातचीत करने आऊँगा। कप्तान अब्बास अली जी ने 1940 के दशक में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के साथ आज़ाद हिंद फौज में भाग लिया था, वहीं पर वह कप्तान बने थे। जब 2014 में उनकी मृत्यु की खबर मिली थी तब भी यही दुख हुआ था कि समय रहते उनसे क्यों नहीं मिला था।

खैर इस बार मैंने सोचा कि बाघा जतिन के बारे में इंटरनैट पर खोज करके लिखूँ। यही सोचते-सोचते दो साल बीत गये हैं, पर आखिर में वह आलेख लिखने का समय मुझे मिल ही गया।

बाघा जतिन - जतिन्द्रनाथ मुखर्जी

जतिन्द्रनाथ का जन्म सन् 1879 में उनकी ननिहाल कुष्टिया जिले के केया गाँव में हुआ था। उनका पैतृिक घर वहाँ से करीब 40 किलोमीटर दक्षिण में साधुहाटी में था, जहाँ वह बड़े हुए। यह दोनों जगहें अब बँगलादेश के खुलना डिविज़न का हिस्सा हैं। हाई स्कूल के बाद 1895 में वह कलकत्ता सैंट्रल कॉलेज में पढ़ने गये।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में वह स्वामी विवेकानन्द और बहन निवेदिता से मिले। स्वामी विवेकानन्द के अतिरिक्त उनकी मुलाकात अरविंदो घोष, रासबिहारी बोस आदि व्यक्तियों के सम्पर्क में आये। इस तरह से वह भारत की स्वतंत्रता के लिए काम करने वाले युगांतर अभियान तथा अनुशीलन समिति से जुड़े और भारत के स्वाधीनता संग्राम का हिस्सा बन गये। अनुशीलन समिति में बंकिमचन्द्र चैटर्जी और स्वामी विवेकानन्द के हिन्दू-शक्ता आध्यात्मिक विचारधारा की सोच वाले लोग थे जो स्वाधीनता के लिए सशस्त्र क्राँति का रास्ता खोज रहे थे।

1906 में अपने गाँव से लौटते समय जतिन्द्रनाथ का जँगल में एक बाघ से सामना हुआ और वह अपनी छुरी से उसे मारने में सफल हुए जिसके लिए उन्हें अंग्रेज़ सरकार की ओर से बाघ का खिताब मिला और लोग उन्हें बाघा जतिन बुलाने लगे।

1908-09 में मुज़्ज़फरपुर के मजिस्ट्रेट की हत्या की साजिश का मुकदमा चला जिसमें अरविंद घोष के साथ अन्य आरोपियों में जतिन्द्रनाथ भी थे। इस मुकदमें में अनुशीलन समिति को बैन कर दिया गया, बहुत लोगों को सजा मिली लेकिन जतिन्द्रनाथ को सबूत न मिलने पर बरी किया गया, लेकिन कुछ समय बाद उन्हें "हावड़ा-शिवपुर साजिश" के मुकदमें में दोबारा गिरफ्तार किया गया और वह ग्यारह महीनों तक हावड़ा जेल में रहे।

उन्होंने जर्मनी में हथियारों के लिए सम्पर्क किया लेकिन अंग्रेज़ों को उनके हथियारों के आने की खबर मिल गयी, और उनकी फौज से संघर्ष करते हुए 10 सितम्बर 1915 को जतिन्द्रनाथ का देहांत हो गया, उस समय वह छत्तीस साल के थे।

बाघा जतिन के पौत्र पृथ्वीन्द्र मुखर्जी

सन् 1900 में जतिन्द्रनाथ का विवाह इन्दुबाला बैनर्जी से हुआ, उनके चार बच्चे हुए, एक बेटी आशालता और तीन बेटे, अतीन्द्र, तेजेन्द्र और बिरेन्द्र। जिस समय जतिन्द्रनाथ की मृत्यु हुई, तेजेन्द्रनाथ उस समय केवल छह साल के थे। उनके पहले पुत्र अतीन्द्र की मृत्यु बचपन में ही हो गयी थी, इसलिए तेजेन्द्र को उनका बड़ा बेटा मानते हैं।

तेजेन्द्रनाथ के तीन बेटे थे, रथीन्द्रनाथ, पृथ्वीन्द्रनाथ और ध्रितीन्द्रनाथ।

पृथ्वीन्द्र का जन्म 20 अक्टूबर 1936 में हुआ। जब वह पाँच साल के थे उन्हें पोलियो हो गया जिससे उनकी टाँग कमज़ोर हो गयी और वह चल या खड़े नहीं हो पाते थे। उनके मामा प्रबोधकुमार चैटर्जी ने उन्हें विज्ञान पढ़ाया और उनके फूफा ललितकुमार रायचौधरी ने उन्हें संस्कृत पढ़ायी। जब वह बारह वर्ष के थे जब वह परिवार के साथ पाँडेचैरी में अरविंद आश्रम में रहने आये और वहाँ पढ़ाई पूरी करके 1956 से श्री ओरोबिन्दो आश्रम के अंतरराष्ट्रीय शिक्षा केन्द्र में तीन भाषाएँ (अंग्रेज़ी, बंगाली और फ्राँसिसी) पढ़ाने लगे। 

पृथ्वीन्द्र को बचपन से कविता लिखने का शौक था, वह बंगाली और अंग्रेज़ी में कविता लिखते थे। 1955 में उन्होंने भारत में गाँधी जी से पहले, विषेशकर स्वामी अरविंद और अपने दादा जतिन्द्रनाथ के समय में भारत की स्वतंत्रता की कोशिशों के बारे में शोध करना शुरु किया। यह शोध पहले एक बंगाली पत्रिका बासुमति और फ़िर पुस्तक रूप में छपा। साथ ही उनका कविता लेखन चलता रहा और बंगाली व अंग्रेज़ी कविताओं के संकलन भी छपे। साथ ही वह फ्राँसिसी के कुछ प्रसिद्ध लेखकों की किताबों का बंगाली में अनुवाद कर रहे थे। इस तरह से पच्चीस वर्ष के होते-होते वह कवि, लेखक और अनुवादक के रूप में जाने जाने लगे।

पृथ्वीन्द्र को बचपन से संगीत में भी रुचि थी। उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन और पश्चिमी संगीत दोनों सीखे। वह भारतीय रागों और पश्चिमी संगीत के सिद्धातों को मिला कर संगीत रचना चाहते थे। इस तरह से वह भारतीय-पश्चिमी मिला-जुला आरकेस्ट्रा बना कर उनकी कन्सर्ट आयोजित करने लगे और उन्होंने श्री ओरोबिन्दु आश्रम का बैंड-दल बनाया। 

तीस वर्ष की आयु में 1966 में फ्राँसिसी सरकार की छात्रवित्ति ले कर वह पैरिस पहुँचे। फ्राँस में उनकी टाँग के आपरेशन भी हुए जिससे उनके लिए बैसाखी से चलना कुछ आसान हो गया। वहाँ उन्होंने 1970 में श्री ओरोबिन्दो के दर्शन पर पीएचडी की, और उसके बाद पैरिस के विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे, साथ ही रेडियो के कार्यक्रम तथा पत्रकारिता में लग गये। 1981 में उन्हें फुलब्राईट छात्रवित्ति मिली जिससे वह अमरीका गये। फ्राँस लौटने के बाद वह पैरिस में बँगाली पढ़ाने लगे। उन्होंने अंग्रेज़ी, बंगाली और फ्राँसिसी भाषाओं में करीब सत्तर पुस्तकें लिखीं। उन्हें श्री ओरोबिन्दो पुरस्कार, फ्राँस सरकार से शिवालिएर और भारतीय सरकार से पद्मश्री सम्मान मिले। 

पृथ्वीन्द्र ने दो विवाह किये और उनके तीन बच्चे हुए, दो बेटियाँ अद्या और अमृता, और एक पुत्र, अर्जव।

अंत में - बाहरी क्राँति से आंतरिक क्राँति

जतिन बाघा की कहानी स्वामी अरविंद या ओरोबिन्दो से जुड़ी हुई है। बीसवीं सदी के प्रारम्भ में दोनों सशस्त्र क्राँति की बात कर रहे थे। स्वामी ओरोबिन्दो को 1908 में अलीपुर बम्ब विस्फोट केस में जेल हुई। जतिन को 1910 में हावड़ा-शिबपुर केस में। स्वामी ओरोबिन्दो को जेल में आध्यात्मिक ज्योति मिली, जब वह बाहर आये तो वह बदल चुके थे। वह भारत की स्वतंत्रता की बात करते थे, पर वह आत्मा के विकास और स्वाधीनता के प्रति अधिक सजग थे। जतिन बाघा ने शस्त्र क्राँति का सपना नहीं छोड़ा और 1915 में पुलिस की गोलियों से घायल हो कर उनका देहांत हुआ। उनके पोत्र पृथ्वीन्द्र, अपनी माँ तथा भाईयों के साथ पाँडेचैरी के स्वामी ओरोबिन्दो के आश्रम में बड़े हुए और उनका परिवार आजीवन "माँ" (मिर्रा अलफस्सा, स्वामी ओरोबिन्दो की संगनी) के आध्यात्मिक सानिध्य में रहा।

यानि सोचिये कि शस्त्र क्राँति या देश की स्वाधीनता की कामना, कहीं पर आत्मा की क्राँती के साथ कब, क्यों और कैसे जुड़ जाती है?  

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नोट: इस आलेख में उपयोग की गयी तीनों तस्वीरें इंटरनेट से साभार ली गयी हैं

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गुरुवार, जुलाई 23, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 16

अब तक की कहानी: ताकानोरी जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी मूर्ति चाहता है। उससे बचने के लिए बाबा समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में लोगों को जान से मारने की धमकी देता है। वह उनकी समाधी को खोदने की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं होता। उधर, बाबा का शिष्य त्रिनेत्र एक अनाथाश्रम चलाता है, जहाँ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा भी हैं। वे बाबा को बचाने के लिए, वहाँ पहुँचते हैं। इसके आगे पढ़िये ...

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अध्याय 16

मजूली द्वीप, असम, 4 मार्च 2026, सुबह

त्री, रंगनाथ और गार्गी वृद्धाश्रम की ओर जाने के लिए तैयार हो गये।

त्री ने आभा से कहा, “हम सीढ़ियों से ऊपर नहीं जायेंगे बल्कि एक गुप्त सुरंग से बाहर निकलेंगे। तुम भी हमारे साथ चल कर सुरंग का रास्ता देख लो और जब यहाँ तहखाने में बैठे-बैठे बोर हो जाओ तो बच्चों को कुछ देर तक बाहर घुमा सकती हो। वसंत तुम्हारी शक्ति-लहरों को ढक कर तुम्हें उस जापानी की अन्वेषण-किरण से छुपा लेगा, लेकिन यह काम वह पेड़ों की सहायता से करता है, अगर तुम लोग खुले में जाओगे तो वहाँ वह तुम्हें नहीं छुपा सकता, इसलिए तुम बच्चों को खुली जगह में नहीं जाने देना।"

नाश्ते के बाद माधव और तृप्ति सोने के लिए वापस बिस्तर पर लौट गये, लेकिन वसंत वहीं बैठा उनकी बातें सुन रहा था, बोला, “मैं भी आप के साथ चलता हूँ, आभा दीदी के साथ लौट आऊँगा।"

आभा बोली, “क्या माधव और तृप्ति को यहाँ अकेले छोड़ना ठीक होगा?”

“इस घर में उन्हें कोई खतरा नहीं है। ज़रीना, वह लड़की जो ऊपर रहती है और हमें रात को मिली थी, वह हमारी साथी है। फरीद, वह नाव वाला जो हमें रात को मजूली ले कर आया था, ज़रीना उसकी बेटी है। वह सुन-बोल नहीं सकती, लेकिन इशारों की वर्णमाला जानती है और लिख-पढ़ सकती है। गुरु जी ने उसे गूँगे-बहरों के स्कूल में पढ़ने भिजवाया था, इसलिए वह लोग गुरु जी को बहुत मानते हैं। जब हमें अपने छुपने के लिए कमलाबाड़ी घाट के पास जगह चाहिये थी, तब गुरु जी ने यह घर बनवाया था और बाहर जाने के लिए सुरंग भी बनवायी। तुम्हें कुछ भी ज़रूरत हो तो ज़रीना को कहो", त्री ने सारी बात बतायी।

रंगनाथ ने पूछा, “दादा, यह इशारों की वर्णमाला क्या होती है?”

“जैसे अक्षरों की वर्णमाला होती है, वैसे ही हम हर अक्षर के लिए उंगलियों से भिन्न मुद्रा बना सकते हैं, वह मुद्राओं की वर्णमाला होती है। जैसे कि तुम्हारे नाम को अगर मुद्राओं की भाषा में कहना हो तो 'र' कहने के लिए तर्जनी और मध्यमा उंगलियों से क्रोस बनाओ और बाकी दोनों उंगलियों पर अंगूठा रख दो। 'न' कहने के लिए सभी उंगलियों के सिरों को अंगूठे के सिरे से मिलाओ। फ़िर 'ग' कहने के लिए 'न' वाली मुद्रा में मध्यमा को ऊपर उठाओ", यह कहते हुए उसने अपने हाथों से मुद्राएँ बदल कर अक्षर बना कर दिखाये, बोला, “इस तरह से यह 'रंग' शब्द बन गया।"  

रंगनाथ बोला, “यह भाषा तो बहुत कठिन लगती है।"

त्री मुस्कराया, “जब कोई चीज़ नहीं करनी आती तो वह कठिन लगती है। अगर तुम हर रोज़ मुद्रा की भाषा की एक-दो नयी मुद्राएँ सीख लो और हर रोज़ उनका अभ्यास करो तो एक महीने में इशारों में फटाफट बोलने लगोगे।"

गार्गी बोली, “जब हम घर लौटेंगे तो मैं यह इशारों की भाषा भी सीखूँगी ताकि ज़रूरत पड़े तो मैं आप को इशारों से गुप्त संदेश दे सकती हूँ।" रंगनाथ बोला, “केवल तुम्हारे सीखने से कुछ नहीं होगा, उसे समझने वाला भी चाहिये, नहीं तो क्या अपने आप से बातें करोगी?"

गार्गी ने पूछा, “दादा, कल रात जब हम यहाँ आये तो आप ने घंटी बजायी थी? ज़रीना दीदी ने उसे कैसे सुना?”

त्री मुस्कराया, “ऊपर जब घंटी बजाओ तो घंटी बजती है और साथ में एक बल्ब जलता-बुझता है, ज़रीना उसे देख सकती है।"

रंगनाथ ने पूछा, “ज़रीना दीदी टेलीफोन पर कही बातें भी समझ सकती हैं?”

“हाँ, उसके मोबाइल में एक एप्प है, तुम उसे कुछ कहोगे तो वह एप्प उसे मुद्रा की भाषा में वही बात वीडियो में दिखायेगी", कह कर त्री खड़ा हो गया, "चलो, अब हमें चलना चाहिये"।

वह तहखाने की रसोई में गया और एक अलमारी के पास जा कर, उसने एक जगह दबाया तो वह अलमारी दरवाज़े की तरह खुल गयी। उसके पीछे एक गुप्त रास्ता छिपा था। जैसे ही वह भीतर घुसा, वहाँ एक बत्ती जल गयी। उसके पीछे रंगनाथ और गार्गी गये और उनके पीछे आभा और वसंत।

त्री ने आभा को दिखाया कि सुरंग खोलने के लिए अलमारी को कैसे खोलते-बंद करते हैं। वह बोला, “इस सुरंग में सैन्सर लगे हैं, तुम जिधर जाओ, वहाँ की बत्ती अपने आप जल जाती है और पीछे वाली कुछ देर बाद अपने आप बुझ जाती है।"

सुरंग का रास्ता पार करने में उन्हें करीब आधा घंटा लगा और जब वह दरवाज़ा खोल कर बाहर निकले तो देखा कि उस सुरंग का दरवाज़ा एक मोटे तने वाले पीपल के पेड़ का हिस्सा था। जब वह बंद होता था और उसे ध्यान से नहीं देखो, तो दिखाई नहीं देता था।

वसंत बोला, “देखो, यह तो बहुत बड़ा पीपल का पेड़ है, इसके भीतर पूरा कमरा है।"

त्री बोला, “यहाँ के लोग इस पेड़ को पवित्र मानते हैं, इसे संत माधवदेव का पेड़ भी कहते हैं क्योंकि इसके नीचे एक बार संत माधव देव रहे थे। उनका गाँव हरिसिंगबरा, यहाँ से अधिक दूर नहीं है।"

वसंत ने पूछा, “यह पेड़ कितना पुराना होगा, दो सौ साल?”

“संत माधव देव करीब पाँच सौ साल पहले पैदा हुए थे, और कहते हैं कि उनके समय में भी इस पेड़ को बहुत प्राचीन मानते थे। इसलिए हो सकता है कि यह पेड़ एक हज़ार साल या उससे भी पुराना हो। यहाँ सब लोग इसे जानते हैं। अगर तुम आसपास कहीं खो जाओ तो लोगों से पूछो कि संत माधव देव का पीपल का पेड़ कहाँ है, वह तुम्हें यहाँ का रास्ता दिखा देंगे”, त्री ने समझाया, फ़िर बोला, “आभा और वसंत, तुम लोग अब वापस जाओ।"

आभा बोली, “बाद में जब माधव और तृप्ति जागेंगे, उन्हें साथ ले कर हम लोग यहाँ लौटेंगे।" वह  दोनों पीपल के पेड़ की ओर लौट गये।

त्री, रंगनाथ और गार्गी आगे चले। उन्होंने गाँव के गरीब लोगों जैसे कपड़े पहने थे, जैसे कि एक पिता अपने बच्चों के साथ कहीं जा रहा हो। करीब एक घंटा चल कर वे श्री भोला मन्दिर पहुँचे और वहाँ से मोटरबोट ली जो उन्हें फुलानीबाड़ी के घाट तक ले गयी। त्री उस क्षेत्र में पहले कई बार आ चुका था, इसलिए उसने अपना चेहरा गमछे से ढक लिया था। घाट पर पहुँचने से पहले ही गार्गी ने तीनों की शक्ति-लहरों को ढक लिया।    

फुलानीबाड़ी के घाट से जो रास्ता गाँव की ओर जाता है, वहाँ आगे जा कर पेड़ों के पीछे एक छोटा सा मैदान है, जिसके एक किनारे पर झाड़ियाँ के पीछे एक चबूतरा बना था। वह जगह सड़क से छिपी हुई थी। उस चबूतरे के पीछे जा कर त्री ने उसकी एक ईंट हटा कर दबाया तो उसमें एक छोटा सा गुप्त द्वार खुल गया, जिसमें वह तीनों झुक कर घुस गये।

वहाँ पर एक अन्य सुरंग थी जो नीचे जा रही थी, उसमें घुसने के बाद त्री ने गार्गी से कहा कि वहाँ शक्ति ढकने की आवश्यकता नहीं है।

रंगनाथ बोला, “दादा, हर जगह सुरंगें बनी हैं, इसका मतलब है कि गुरु जी बहुत सालों से इस खतरे का सामना करने के लिए तैयारी कर रहे थे?”

त्री ने धीरे से सिर हिला कर हामी भरी। वह जानता है कि बच्चे समझदार हैं, वह उनसे पूरी बात नहीं छुपा सकता। लेकिन अगर उनमें से कोई उस जापानी याकूज़ा के चँगुल में आ गया तो वह इनके दिमाग में घुस कर सब बातों को जान जायेगा, इसलिए वह उन्हें सब बातें नहीं बताना चाहता।

गार्गी बोली, “वह जापानी आदमी गुरु जी का पीछा क्यों कर रहा है? वह उनसे क्या चाहता है?”

“गुरु जी कोरिया से हैं। वह भी अनाथ थे और उन्हें भी एक बौद्ध भिक्षुक ने पाला था, जो बाद में उनके गुरु बने। उनके गुरु जी का नाम कूवी महाराज था और उनके पास हरिताश्म पत्थर की बनी माँ तारा की एक मूर्ति थी, जिसके प्रभाव से बच्चों की गुप्त-शक्तियाँ विकसित हो जाती हैं। कुछ जापानी लोग उस मूर्ति को पाना चाहते हैं", त्री ने बताया।

“यह हरिताश्म पत्थर क्या होता है?”

“हरिताश्म को अंग्रेज़ी में जेड कहते हैं, यह हरे रंग के संगमरमर जैसा होता है, लेकिन मुलायम होता है। उसकी मालाएँ और गहने भी बनाते हैं।"

“क्या यह पत्थर भारत में मिलता है? हमारे अखाड़े में भी तो हरे रंग की माँ तारा की कई मूर्तियाँ हैं?”

“यह पत्थर भारत में नहीं मिलता", त्री ने बताया, “हमारे उत्तर-पूर्व में एक देश है म्यंमार, उसे पहले बर्मा कहते थे, वहाँ पर हरिताश्म की खानें हैं। लेकिन सुना है कि हमारे मिज़ोराम में, म्यंमार की सीमा के पास भी, शायद यह पत्थर मिलते हैं।"

“इसका मतलब है कि जापानी लोग गुरु जी का चालीस-पैंतालिस सालों से पीछा कर रहे हैं?” रंगनाथ ने पूछा।

गार्गी बोली, “इतने सालों में तकनीकी ने इतनी तरक्की कर ली है, आज तो बहुत से अपराध इंटरनेट के माध्यम से होते हैं। इतने सालों के बाद भी वह लोग इस पुरानी बात के पीछे क्यों पड़े हैं?”

त्री मुस्कराया, बोला, “गुरु जी कहते हैं कि इस बात को यामागुचि नहीं भूल सकता, यह उसके आत्म-सम्मान की बात बन गयी है। तीन बार गुरु जी उसके चँगुल में आये और तीनों बार वह उसे चकमा दे कर भाग गये। आखिरी बार उसने गुरु जी को थाईलैंड में 1996 में खोजा था। उस बात को भी अब तीस साल हो गये। वह पहले वाले यामागुचि तो अब बहुत बूढ़े हो गये हैं, लेकिन उनका पोता है, रिकू यामागुचि, वह अब उनका गैंग चलाता है। शायद वह अपने दादा का अधूरा काम पूरा करना चाहता है।"

“पहले वह लोग गुरु जी को खोज लेते थे, तो वह उन्हें चकमा दे कर वहाँ से भाग कर नयी जगह में छिप जाते थे। लेकिन इस बार वह नहीं भागे, बल्कि उन्होंने समाधी ले ली, क्यों?”, गार्गी का दिमाग बहुत तेज़ है, वह हर अनकही बात को पकड़ लेती है। 

“क्यों कि अब गुरु जी बूढ़े हो रहे हैं, वह डरते हैं कि कहीं उनकी मृत्यु के बाद, यामागुचि के जासूस हमारे पीछे न लग जायें, और हमारे अनाथाश्रम पर हमला कर दें, क्योंकि मैं उनके उत्तराधिकारी हूँ।"

“क्या इसका मतलब है कि अब वह मूर्ति हमारे पास है? वह हमारे अनाथाश्रम में है?” गार्गी ने पूछा।

त्री फ़िर से मुस्कराया, सोचा कि गार्गी से कुछ छुपाना बहुत कठिन है, बोला, “जो मूर्ति गुरु जी कोरिया से लाये थे, कुछ साल पहले वह टूट गयी थी। उन्होंने उस मूर्ति के टुकड़ों को कुछ नयी मूर्तियों में जड़वा दिया है। उसमें से एक नयी मूर्ति हमारे पास, हमारे अनाथाश्रम में भी है।"

यह बातें करते-करते वह तीनों सुरंग को पार करके, वृद्धाश्रम से कुछ दूर, गुरु जी के ज़मीन के नीचे छिपे हुए तहखाने वाले कमरों में पहुँच गये।

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सोमवार, जुलाई 20, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 15

अब तक की कहानी: जापानी याकूज़ा ताकानोरी हिन्दुस्तान आया है और जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी शक्तिदायिनी हरित तारा की मूर्ति चुराना चाहता है। उससे बचने के लिए जामुन बाबा मजूली द्वीप में जीवित समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में अपने गुँडो के साथ आ कर, लोगों को जान से मारने की धमकी देता है और वृद्धाश्रम में बाबा की समाधी को खोदने की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं होता। उधर, जामुन बाबा का शिष्य त्रिनेत्र गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम चलाता है, जहाँ उसके साथ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा हैं। जब उन्हें ताकानोरी के बारे में पता चलता है तो जामुन बाबा को बचाने के लिए, वे गँगटोक से मजूली द्वीप के लिए निकल पड़े हैं। इसके आगे पढ़िये ...

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अध्याय 15

मजूली द्वीप की यात्रा, असम, 3-4 मार्च 2026

 रात के दस बजे अचानक त्री के मोबाइल की घंटी बजी।

“काका, क्या हुआ?” उसने पूछा।

जगदीश बाबू ने पूछा, “तुम लोग कहाँ हो और यहाँ कब पहुँच रहे हो?”

“क्यों? हम लोग कोहोरा के पास हैं, आज रात को मरियानी पहुँच कर वहीं आसपास कहीं रुक जायेंगे, बहुत थक गये हैं। हम कल मजूली की फैरी पकड़ेंगे, दोपहर तक आप के यहाँ पहुँच जायेंगे।”

जगदीश बाबू ने उसे ताकानोरी की समाधी को खुदवाने की कोशिशों के बारे में बताया, बोले, “वह अपने कम्प्यूटर वाले लड़के सोमचाई को यहाँ छोड़ कर गया है। यह सोमचाई बुरा आदमी नहीं लगता। ताकानोरी कह रहा था कि वह नारायणपुर वापस जा रहा है लेकिन मेरे विचार में वह झूठ बोल रहा था, मुझे डर है कि वह यहीं कहीं, हमारे आसपास ही छुपा हुआ है और जैसे ही तुम यहाँ पहुँचोगे, वह तुम्हें पकड़ लेगा।"

त्री बोला, “आप चिंता नहीं कीजिये काका, वहाँ आने से पहले मैं आप को खबर कर दूँगा।"

उसके साथ बैठी आभा और पीछे बैठे बच्चे, सभी सो रहे थे लेकिन फोन की आवाज़ से आभा जाग गयी। जब उसने फोन बंद किया तो

वह धीरे से बोली, “वह जापानी नारायणपुर क्यों चला गया?”

त्री बोला, “मेरा ख्याल है कि उन्होंने जगदीश काका के मोबाइल में स्पाईवेयर लगाया है, जिससे वह लोग देख सकते हैं कि वह किसे फोन कर रहे हैं और उनकी बातें भी सुन सकते हैं। इसलिए सबसे पहले हमें इस मोबाइल के सिम-कार्ड को बदलना है।" उसने अपनी जेब से एक छोटा लिफाफा निकाल कर आभा की ओर बढ़ाया, बोला, “इसमें मोबाइल खोलने वाला पिन है और एक नया सिम-कार्ड है। उसे बदल दो और पुराने सिम को खिड़की से बाहर फ़ैंक दो।"

आभा ने मोबाइल को लिया और उसका सिम कार्ड बदलने लगी, तो त्री बोला, “मैंने काका से झूठ बोला है। हम लोग मरियानी नहीं रुकेंगे, आज रात को ही मजूली पहुँच जायेंगे। मेरे ख्याल में वह जापानी वहीं आसपास छुपा हुआ होगा और अपनी अन्वेषण-किरण से हमें खोजेगा, लेकिन हम उसके लिए तैयार होंगे।"

वह बोली, “तुम आज सुबह से लगातार गाड़ी चला रहे हो, हम लोग रास्ते में खाने के लिए भी बहुत थोड़ी देर के लिए रुके। हमने तो कुछ आराम किया है लेकिन तुम, क्या तुम्हें आराम भी बिल्कुल आवश्यकता नहीं है?”

त्री मुस्कराया लेकिन कुछ नहीं बोला।

वह लोग रात को साढ़े ग्यारह बजे के करीब गोसाईंगाँव के घाट पर पहुँचे। बच्चों को जगाने में कुछ समय लगा, त्री ने उन्हें पानी की बोतल दी और सबसे आँखो पर पानी के छींटें मारने के लिए कहा। कार को पार्किन्ग में छोड़ कर वह आगे पैदल ही बढ़े।

गुरु जी का पुराना नाववाला मछुआरा फरीद, अपनी नाव के साथ अँधेरे में उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। जैसा उन्होंने पहले से निश्चित किया था, यह बताने के लिए कि वहाँ कोई खतरा नहीं है, वह मिसिन्ग भाषा में एक गीत गा रहा था, “ओकोल कापे दूदोने नो, केराद कमाइ मेमोदाग ...”।

उसके गीत की आवाज़ सुनते हुए, त्री उन्हें वहाँ तक ले आया। फरीद की नाव घाट पर तैयार खड़ी थी, और घाट खाली था। उसने उन्हें नाव में बिठाया और बिना आवाज़ किये, धीरे-धीरे चप्पु चलाते हुए, उसे ब्रह्मपुत्र नदी की धारा के बीच में ले आया।

आभा ने फुसफुसा कर त्री से पूछा, “यह आदमी ऐसे ही अँधेरे में नाव कैसे चलायेगा? कहीं फँस गये तो?”

त्री ने धीरे से उसका हाथ दबाया, कुछ बोला नहीं। गोसाईंगाँव से कमलाबाड़ी का फैरी टर्मिनल करीब दस किलोमीटर दूर था। त्री थका हुआ था, जल्दी ही आँखें बंद करके बैठे-बैठे सो गया। अँधेरे में बच्चे भी दोबारा सो गये। केवल आभा डरी हुई थी, वह जाग रही थी।

वह एक बार पहले भी मजूली आयी थी, जानती थी कि वहाँ नदी के बीच में बहुत सारे द्वीप हैं, जिनके आसपास पानी की गहराई कम हो जाती है और वहाँ पर नाव फँस सकती है। लेकिन वह यह नहीं जानती थी कि नाव वाला फरीद वहीं पैदा हुआ है और बचपन से उसने वहाँ नाव चलाई है, वह रास्ते को अच्छी तरह से जानता है।

उन्हें मजूली पहुँचने में करीब तीन घंटे लगे। उन्हें कमलाबाड़ी उतार कर फरीद वहाँ रुका नहीं, त्री को नमस्कार करके तुरंत चला गया।

त्री ने गार्गी से कहा, “हमारी सबकी शक्ति-लहरों को ढक दो।"

गार्गी ने तुरंत सबकी शक्ति लहर को ढका, फ़िर बोली, “दादा, हम बहुत लोग हैं, मैं थक जाऊँगी, अधिक देर नहीं कर पाऊँगी।"

त्री बोला, “हमें थोड़ी देर के लिए ही चाहिये, केवल दस मिनट की बात है।" 

वह उन्हें घाट से कुछ दूर बामुनगाँव नामघर की ओर ले गया। नामघर के पीछे दो-तीन घर थे, उनमें से एक घर के दरवाज़े पर उसने तीन बार घंटी बजायी तो दरवाज़ा खुला। भीतर साड़ी पहने हुए एक लड़की खड़ी थी, उसने त्री को हाथ जोड़ कर नमस्ते की लेकिन कुछ नहीं बोली और उन्हें सीधा एक कोठरी में ले गयी, जहाँ पर नीचे जाती हुई सीढ़ियाँ थीं। उसने उन्हें नीचे जाने का इशारा किया।

करीब चालिस सीढ़ियाँ थीं, नीचे जाते हुए त्री ने गार्गी से कहा, “अब हमारी शक्ति-लहरों को ढकने की आवश्यकता नहीं है।"

आभा ने पूछा, “ज़मीन की सतह के नीचे से शक्ति-लहर का पता नहीं चलता?” तो गार्गी ने सिर हिला कर हामी भरी।

नीचे तहखाने में बिजली लगी थी। एक ओर गुसलखाना और टॉयलेट बने थे, दूसरी ओर रसोई थी और बीच में दीवार के साथ तीन-टायर वाले रेलगाड़ी के डिब्बे जैसे बिस्तर लगे थे। बाकी सबको आराम करने के लिए कह कर, त्री, वसंत और माधव, वह तीनों कुछ सीढ़ियाँ चढ़ कर आधे रास्ते तक ऊपर आये। उन्हें ऊपर जाते देख कर आभा भी उनके पीछे ऊपर आयी।

वहाँ त्री ने वसंत से कहा, “कोशिश करके देखो कि क्या तुम बाहर के पेड़-पत्तों से बात कर सकते हो?”

वसंत ने एक मिनट आँखें बंद की, फ़िर सिर हिला कर मना किया, तो वह लोग कुछ अन्य सीढ़ियाँ चढ़ कर थोड़ा और ऊपर आये। वहाँ पहुँच कर वसंत ने फ़िर से आँखें बंद कीं और त्री से बोला, “दादा, यहाँ से मैं उनसे बात कर सकता हूँ।"

"पूछो कि मजूली में और हमारे आसपास कहीं पर कोई शक्ति-लहर दिख रही है?”

वसंत ने आँखें बंद कर लीं, कुछ देर के बाद आँखें खोल कर बोला, “वह कहते हैं कि दक्षिण में जहाँ पर मजूली द्वीप समाप्त होता है,

वहाँ पर नदी के दूसरी ओर छह-सात किलोमीटर दूर जा कर एक शक्ति-लहर दिखती है।"

त्री ने थोड़ी देर तक सोचा, फ़िर माधव को घुमाया और कहा, “सामने उस दिशा में देखो, यहाँ से करीब तीस किलोमीटर दूर, तुम्हें वहाँ कोई शक्ति-लहर महसूस होती है?”

माधव ने भी कुछ क्षणों के लिए आँखें बंद की फ़िर बोला, “नहीं दादा, मुझे ऐसा कुछ नहीं दिखा।"

त्री बोला, “इसका मतलब है कि ताकानोरी ने ठीक कहा था, वह सचमुच नारायणपुर में ही है। दूसरी बात है कि उसकी शक्ति-लहर कमज़ोर है, क्योंकि वह माधव को यहाँ से नहीं दिखी। इसका मतलब है कि वह हमें इतनी दूर से नहीं खोज सकता, अवश्य कल हमें यहाँ पर खोजने आयेगा।" 

वह चारों नीचे लौट आये और त्री ने उन्हें भी सोने के लिए कहा। आभा चुपचाप, जिस बिस्तर पर तृप्ति सोई थी, उसके साथ जा कर लेट गयी। अपनी बेटी को खोने के बाद यह पहली बार थी कि वह किसी बच्चे के साथ इस तरह से बिस्तर पर लेटी थी। अचानक उसे अपनी बेटी की बहुत याद आयी और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। बहुत देर तक वह चुपचाप रोती रही, फ़िर उसे भी नींद आ गयी।

सुबह आठ बजे त्री ने सबको जगाया और मुँह-हाथ धो कर नाश्ता करने के लिए कहा। नाश्ते के लिए तहखाने की रसोई में केले, अनानास और पका हुआ कटहल रखे थे। जब सबने अपनी प्लेटों में नाश्ता ले लिया तो त्री बोला, “नाश्ते के बाद तीन लोग - मैं, रंगनाथ और गार्गी, हम गुरु जी के वृद्धाश्रम की जाँच करने जायेंगे। उनका आश्रम यहाँ से करीब तीस किलोमीटर दूर है। मेरे विचार में उस जापानी की अन्वेषण-किरण केवल तीन-चार किलोमीटर की परिधि में काम करती है, लेकिन फ़िर भी वहाँ पहुँचते ही गार्गी करीब बीस-पच्चीस मिनट के लिए हमारी शक्ति-लहरों को ढक लेगी। वहाँ जाँच करके हम लोग शाम तक लौट आयेंगे।"

"और हम लोग? क्या हम सारा दिन इस तहखाने में बंद रहेंगे?”, आभा ने पूछा।

“तुम लोग यहीं रहोगे, पर मैं तुम्हें एक गुप्त रास्ता दिखाऊँगा, तुम लोग वहाँ से आसपास थोड़ा-बहुत घूम सकते हो, पर दूर नहीं जा सकते।"

आभा बोली, “अच्छा बताओ, रात को वसंत ने उस जापानी व्यक्ति की शक्ति-लहर को कैसे खोजा था?”

त्री ने उसे बताया कि पेड़-पौधे भी गुप्त-शक्ति की लहरों को महसूस कर सकते हैं और आपस में संदेश भेज सकते हैं। इस तरह से वसंत चाहे तो उसे पेड़ों से, बहुत दूर की खबरें भी आसानी से मिल जाती हैं। उसने अपना मोबाइल निकाल कर उस पर गूगल मैप खोला और मजूली द्वीप के दक्षिणी भाग को आभा को दिखाया, बोला, “हमें यहाँ जाना है, गुरु जी का वृद्धाश्रम वहीं है। वह जापानी नदी के दूसरे ओर, उनके आश्रम से करीब छह-सात किलोमीटर दूर है, वहाँ हमारी प्रतीक्षा कर रहा है।"

आभा ने थोड़ी देर सोचा, फ़िर पूछा, “रात को तुमने माधव से भी आँखें बंद करके शक्ति-लहर को देखने के लिए कहा था?”

“क्योंकि माधव की दो दृष्टि-शक्तियाँ है, वह अपनी आँखों से और मन की आँखों से, दोनों से दस-बारह किलोमीटर की दूरी तक देख सकता है। शक्ति-लहरों से एक विशेष तरह का प्रकाश निकलता है, वह उसे पहचान लेता है। वैसे तो वह जापानी बहुत दूर है, इसलिए मुझे पता था कि माधव को उसकी शक्ति-लहर नहीं दिखेगी, लेकिन मैंने उससे यह इस लिए पूछा था ताकि हमें डबल पक्का हो जाये कि आसपास हमें खोजने वाला कोई नहीं है।"

आभा बोली, “यह शक्ति वाली बातें मेरे लिए नयी हैं, इन्हें समझने में मुझे कुछ समय लगेगा।"

कुछ देर बाद त्री ने उससे पूछा, “जब तुम सोने गयीं थीं, उस समय कुछ हुआ था?”

“क्यों?”

“क्योंकि मैंने देखा कि अचानक ही फर्श पर चिलचट्टे, कानखजूरे, बिच्छू, छिपकलियाँ, आदि जीव-जन्तु निकल आये, और वह सब तुम्हारे बिस्तर के आसपास घूम रहे थे। मुझे लगा कि वह तुम्हारी पहरेदारी कर रहे हैं। थोड़ी देर के बाद शायद तुम सो गयीं और वह सभी अपने बिलों में वापस लौट गये। जब वह दिखते हैं तो मुझे पता चल जाता है कि तुम्हारी शक्ति जागृत है।"

उसकी बात सुन कर आभा कुछ देर तक सोचती रही, फ़िर रुँधे स्वर में बोली, “बेटी खोने के बाद आज पहली बार एक छोटी बच्ची के साथ इस तरह से लेटी थी, इसलिए उसकी याद आ गयी तो मुझे रोना आ गया।"

त्री सोचता हुआ बोला, “इसका मतलब है कि जब तुम्हारे मन में भावनायें तीव्र होती हैं, तब तुम्हारी शक्ति आपने आप जागृत हो जाती है।"

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गुरुवार, जुलाई 16, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 14

अब तक की कहानी: जापानी याकूज़ा ताकानोरी हिन्दुस्तान आया है और जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी शक्तिदायिनी हरित तारा की मूर्ति चुराना चाहता है। उससे बचने के लिए जामुन बाबा मजूली द्वीप में जीवित समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में अपने गुँडो के साथ आ कर, लोगों को जान से मारने की धमकी देता है और वृद्धाश्रम में बाबा की समाधी को खोद कर भीतर देखना चाहता है। उधर, जामुन बाबा का शिष्य त्रिनेत्र गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम चलाता है, जहाँ उसके साथ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा हैं। जब उन्हें ताकानोरी के बारे में पता चलता है तो जामुन बाबा को बचाने के लिए, वे गँगटोक से मजूली द्वीप के लिए निकल पड़ते हैं। इसके आगे पढ़िये ...

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अध्याय 14

 मजूली द्वीप, असम, 3 मार्च 2026 रात्रि

शाम को जामुन बाबा की समाधी को देखने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ कम हो गयी। जब सूरज डूबा और श्रद्धालु चले गये तो वृद्धाश्रम के द्वार बंद हो गये।

ताकानोरी ने पहले से ही बाबा की समाधी को खुदवाने के लिए मजदूर बुलवा लिये थे।

जगदीश बाबू ने एक बार फ़िर उसे रोकने की कोशिश की, बोले, “आपने देखा कि आज कितने लोग उनकी समाधी पर प्रार्थना करने आये? बाबा को यहाँ के लोग बहुत मानते हैं। कल उन्हें पता चलेगा कि किसी ने उनकी समाधी को तोड़ा है तो वह बहुत गुस्सा होंगे और यहाँ दंगा भी हो सकता है।"

ताकानोरी बोला, “मुझे वार्निन्ग देने के लिए धन्यवाद। उसे खोद कर, भीतर देख कर, हम उसे बंद कर देंगे, और यह सारा काम रातों-रात पूरा हो जायेगा। कल किसी को पता नहीं लगना चाहिये कि हमने समाधी को खोदा है। ध्यान रहे कि अगर यह खबर बाहर फ़ैली तो सबसे पहले मैं तुम्हारी गर्दन काट कर, तुम्हारे सिर को गेट पर टाँग दूँगा।"

उन्होंने आठ मजदूर बुलाये थे। जब बटेर ने उन्हें बताया कि क्या काम करना है तो उन्होंने तुरंत मना कर दिया, बोले कि उन्हें पैसे नहीं चाहिये, वह यह काम नहीं कर सकते।

ओरी वहीं खड़ा था, उसने अपनी कताना तलवार निकाल ली, बोला, “जो यह काम नहीं करेगा, मैं  उसे काट कर यहीं गड़वा दूँगा, तब तुम अपने बाबा जी के साथ रह कर, हमेशा के लिए उनकी सेवा करते रहना।"

बटेर, लक्की और मटरू ने पिस्तौलें निकाल लीं और मजदूरों को घेर लिया। डरे हुए मजदूरों ने आखिर में फावड़े उठा लिये। सबसे पहला काम था समाधी वाली जगह से काला पत्थर हटाना। उस पत्थर को मजदूरों ने एक दिन पहले ही वहाँ रखा था, उसे हटाने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिये थी, लेकिन बहुत मेहनत के बाद भी, मजदूर उसे अपनी जगह से नहीं हिला पाये।

बटेर ने मटरू को इशारा किया, कहा, “यह सब लोग बेकार की ड्रामेबाजी कर रहे हैं। तुम वह लोहे का सरिया ले कर उसे इस पत्थर की साईड में घुसा दो, जब उस पर जोर लगायेंगे तो यह पत्थर आराम से ऊपर उठ जायेगा।"

मटरू ने लोहे का नुकीली नोक वाला सरिया लिया और जहाँ पत्थरों में जोड़ था, उस पर हथौड़े मार कर उसे वहाँ घुसाने की कोशिश की। पता नहीं कैसे, पत्थर का एक टुकड़ा टूट कर सीधा बटेर की बायीं आँख में लगा और उसे चीरता हुआ आँख के भीतर घुस गया। बटेर के हाथ से पिस्तौल छूट कर नीचे गिरी और चीख मार कर उसने हाथों से अपनी आँख को ढकने की कोशिश की, कुछ क्षणों में उसका हाथ और चेहरा उसके खून से सन गये।

जब उसकी पिस्तौल नीचे गिरी तो फर्श के पत्थर से टकरा कर उसका ट्रिगर चल गया और गोली निकल कर मटरू के दायें पैर में जा लगी। गालियाँ देते हुए मटरू वहीं पैर पकड़ कर ज़मीन पर बैठ गया, उसके हाथ से लोहे का सरिया छूट कर गिर गया।

ओरी बहुत गुस्सा हुआ, बोला, “तुम लोग आदमी हो या जोकर? एक छोटा सा काम करने में तुम लोगों ने यह क्या तमाशा लगाया है?”

जगदीश बाबू बोले, “समाधी-स्थल पर खुदाई की कोशिश करके तुमने घोर पाप किया है, इसीलिए आज यहाँ पर इतना खून बहा है। अभी भी समय है, मैं कहता हूँ कि तुम लोग रुक जाओ।"

मटरू चिल्लाया, “हमें डॉक्टर की ज़रूरत है, अस्पताल जाना है, एम्बुलैंस को बुलाओ।"

उधर बटेर "हाय, हाय" करके चिल्ला रहा था। जगदीश बाबू ने उसका हाथ हटा कर उसकी आँख को देखा, वह पत्थर उसकी आँख के भीतर घुसा हुआ था। वह बोले, “इसकी यह आँख तो पूरी नष्ट हो गयी है, इसे तुरंत अस्पताल ले जाना होगा। हमारा प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र, कमलाबाड़ी सत्र के पास है, यहाँ से बीस-बाईस किलोमीटर का रास्ता होगा, वहाँ पहुँचने में कम से कम घंटा-डेढ़ घंटा लगेगा। बीच में कुछ रास्ता कच्ची सड़क का है और अँधेरे में वहाँ जाना आसान नहीं होगा।"

बटेर को चक्कर आ रहे थे, वह बेहोश सा हो कर ज़मीन पर लेट गया। उसकी आँख से खून बहना नहीं रुका था और वह खून उसके सिर के आसपास जमा हो रहा था।

मटरू के पैर के आसपास भी फर्श खून से लाल हो गया था, वह ज़मीन पर बैठ कर चिल्ला रहा था। लक्की उनके पास खड़ा था, उसे गुस्सा आ गया, वह ताकानोरी से बोला, “अरे, इनके लिए कुछ करो, तुम इंसान हो या हैवान?”

ओरी को समझ नहीं आया कि उसने क्या कहा, लेकिन उसके बोलने के अन्दाज़ से समझ गया कि वह अपने साथियों के लिए मदद माँग रहा है, बोला, “यह सब तुम लोगों की लापरवाही से हुआ है, अब तुम उसका फ़ल भुगतो।"

जगदीश बाबू बोले, “आप की कार में इन्हें अस्पताल भेज देते हैं, बेचारे बहुत पीड़ा में हैं।”

ओरी बोला, “मेरी कार में नहीं, इन्हें अस्पताल ले जाने के लिए किसी दूसरी गाड़ी का प्रबंध करो।" फ़िर मजदूरों से बोला, “इन दोनों आदमियों को उठा कर उधर किनारे पर बिठा दो, और तुम उस पत्थर को हटाओ।"

जगदीश बाबू को मालूम था कि फुलानीबाड़ी के स्कूल के करीब एक आदमी आटोरिक्शा चलाता है, उन्होंने उसे बुलाने के लिए अपने एक व्यक्ति को भेजा।

बटेर और मटरू के घायल होने से मजदूर और भी डर गये थे, ओरी के कहने के बाद भी वह अपनी जगह से नहीं हिले, बल्कि अपने फावड़े वहीं रख कर वे वहाँ से जाने लगे।

ओरी गुस्से में आग-बबूला हो गया, उसने पिस्तौल निकाल ली और मजदूरों की ओर निशाना लगाते हुए बोला, “एक कदम भी आगे बढ़ाया तो तुम्हें भून कर रख दूँगा।"

जगदीश बाबू ने पास जा कर उसे धीरे से कहा, “गोलियाँ चलीं तो शोर होगा और आसपास के घरों से लोग यहाँ आ जायेंगे। कितनों को मारेंगे? कल सुबह तक यह बात सारे मजूली द्वीप में फ़ैल जायेगी और लोग डँडे-हँसली-छुरी-चाकू जो मिलेगा, उसे ले कर तुमसे लड़ने आ जायेंगे, तो क्या तुम पाँच सौ लोगों का सामना कर पाओगे? और उसके बाद तुम यहाँ से जीवित निकल पाओगे?”

मजदूर चले गये और ओरी वहाँ पर हाथ मसलता हुआ खड़ा रह गया। थोड़ी देर में फुलानीबाड़ी से आटो वाला आ गया तो लक्की अपने दोनों साथियों को उसमें बिठा कर उन्हें कमलाबाड़ी के प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र में ले गया।

सोमचाई ने यह सारा तमाशा दूर से देखा। जब उसे लगा कि ओरी कुछ शाँत हुआ है तो वह उसके पास आया, बोला, “आप तलवार और बंदूक, सब कुछ चला सकते हैं, लड़ भी सकते हैं, लेकिन मुझे तो सिर्फ कम्प्यूटर का काम आता है। मैंने जीवन में कभी किसी से लड़ाई नहीं की। अब हम यहाँ अकेले रह गये हैं, हमें आगे का भी सोचना होगा। यहाँ के लोगों से बात करने के लिए हमारे पास स्थानीय आदमी होने चाहियें।”

ओरी सोच में पड़ गया, बोला, “ठीक है, मैं फोन करके कुछ और आदमी बुलाता हूँ।" उसे चिंता होने लगी कि जब वह यह बातें रिकू यामागुचि को बतायेगा तो वह बहुत गुस्सा होगा कि क्या वह एक पत्थर भी नहीं हटवा पाया? अंत में उसने सोचा कि वह रिकू को कुछ नहीं बतायेगा। वह बोला, “लेकिन यहाँ से जाने से पहले, मैं इस पत्थर को हटाना चाहता हूँ।"

जब ओरी ने आगे बढ़ कर ज़मीन से लोहे का सरिया उठाया तो उस पर मटरू का खून लगा हुआ था।

जगदीश बाबू बोले, “आप ने देखा कि जिसने भी बाबा की समाधी की मर्यादा भंग करने की कोशिश की, उनका क्या हुआ? फ़िर भी आप नहीं समझे? आप क्यों अपनी जान को खतरे में डालना चाहते हैं?”

ओरी ने यह दिखाने के लिए कि उसे इन अँधविश्वासों की बिल्कुल परवाह नहीं है, हथोड़ा उठा कर उससे सरिये को पत्थरों के बीच में घुसाने के लिए मारने लगा। शायद उस पर लगे खून की वजह से सरिया चिकना हो गया था और फिसल रहा था, या शायद उसने हथोड़ा ठीक से नहीं मारा। जो भी कारण था, वह सरिया पत्थरों के बीच में जाने के बजाय, फर्श की सतह पर फ़िसल गया और ताकानोरी भी उसके पीछे फिसल कर गिरा। वैसे उसे कहीं विशेष चोट नहीं लगी लेकिन उसे गिरा हुआ देख कर जगदीश बाबू और सोमचाई हँसने लगे।

जगदीश बाबू बोले, “साहिब, अभी भी मान जाईये। जब तक बाबा खुद नहीं चाहेंगे, आप उनकी समाधी में बाधा नहीं डाल सकते।"

ओरी को बहुत गुस्सा आ रहा था, उसका मन किया कि वह जगदीश बाबू और सोमचाई, दोनों के सिर अपनी तलवार से काट दे, लेकिन उसने आत्मसंयम दिखाते हुए अपने गुस्से को दबाया और उठ कर खड़ा हुआ। सोमचाई से बोला, “वह स्कूल के लड़कों वाले वीडियो जो तुमने मुझे दिखाये थे, मैं उन्हें दोबारा देखना चाहता हूँ।"

सोमचाई ने तुरंत मोबाइल निकाल कर एक वीडियो को खोला और उसे दिखाया। ओरी ने उसे तीन-चार बार देखा, फ़िर एक जगह पर उसे रोक कर सोमचाई को दिखाया, बोला, “वह बाबा जब समाधी के लिए जा रहा था तो उसके कटोरे में एक मूर्ति थी, वह इस वीडियो में दिखती है, तुम बताओ कि वह कितनी बड़ी है?”

सोमचाई ने वीडियो को ध्यान से देखा, उसमें कटोरे में रखी मूर्ति साफ दिख रही थी। वह बोला, “उनके हाथों के आकार से तुलना करें तो वह तीन-साढ़े तीन इँच की लगती है।"

ओरी बोला, “यह वह प्रतिमा नहीं है, जो यामागुचि को चाहिये। जो हमें चाहिये, वह प्रतिमा आठ-साढ़े आठ इँच से बड़ी होनी चाहिये। यानि वह उसे अपने साथ समाधी में ले कर नहीं गया।"

जगदीश बाबू ने उनकी बातें सुनी तो मन ही मन मुस्कराये, लेकिन उन्होंने अपनी खुशी को चेहरे पर ज़ाहिर नहीं होने दिया।

ताकानोरी बोला, “इस समय यहाँ रुकने से मेरा कुछ फायदा नहीं है। बाबा का उत्तराधिकारी कल यहाँ पहुँचेगा। सोमचाई, तुम यहाँ रुको और जब वह आये तो मुझे खबर करो॑। मैं आज रात को ही नारायणपुर लौट जाता हूँ, वहाँ से अन्य आदमियों का प्रबंध भी करूँगा।"

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