अब तक: जापानी याकूज़ा-खूनी ताकानोरी, जामुन बाबा की गुप्त शक्ति वाली मूर्ति को लेने भारत आया है। वह बाबा को नारायणपुर में खोज लेता है लेकिन वह उसके चँगुल से निकल भागने में सफल होते हैं। ताकानोरी से बचने के लिए, बाबा ने अपने वृद्धाश्रम में समाधी लेने का निर्णय लिया है। दूसरी ओर, त्रिनेत्र गुप्त-शक्ति वाले बच्चों के लिए गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम चलाता है, वह अपने साथ पाँच बच्चों को ले कर मजूली में जामुन बाबा की सहायता करने जाना चाहता है। आगे पढ़िये:
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अध्याय 07
गँगटोक, सिक्किम, 2 मार्च 2026
दोपहर में बच्चे जब स्कूल से लौटे तो त्रिनेत्र ने रंगनाथ से बाकी शिष्यों को अखाड़े में बुलाने के लिए कहा। थोड़ी देर में ही पाँचों वहाँ आ गये।
त्री ने कहा, “गार्गी, ज़रा देखो कि यहाँ कोई हमारी बात तो नहीं सुन रहा?”
"दादा, और तो कोई नहीं है लेकिन आश्रम में तीन शक्ति-लहरें महसूस हो रही हैं, उनमें से कोई सुन भी सकता है।"
रंगनाथ के माथे पर बल पड़ गये, बोला, “यह तीसरा कौन है?
त्री बोला, “तीसरी आभा है, लेकिन उसकी शक्ति पूरी विकसित नहीं हुई है", फ़िर माधव से बोला, “क्या तुम देख सकते हो उसकी शक्ति का रंग कौन सा है?”
माधव ने आँखें बन्द कर लीं और कुछ क्षणों के लिए आभा पर ध्यान केन्द्रित किया, फ़िर बोला, “नहीं दादा, उनकी लहर का रंग बहुत हल्का है।"
तब त्री ने वसंत से कहा, "अखाड़े के आसपास अभेद्य दीवार बनाओ, ताकि वह तीनों भी हमारी बातें नहीं सुनें।वसंत पेड़ों के माध्यम से हवा में अवरोध पैदा करवा सकता है, जिससे ध्वनि की लहरें रुक जाती हैं और परिधि के बाहर कोई नहीं सुन सकता। उसने कुछ पल के लिए आँखें बन्द कीं, फ़िर मुस्करा कर धीरे से सिर हिलाया।
त्री बोला, “तुम्हें इसलिए बुलाया है क्योंकि हमें एक विपदा का सामना करना है। मेरे गुरु जी के पीछे बहुत सालों से एक जापानी गैंग लगा हैं, आज सुबह वह लोग उन्हें खोजने में सफल हुए हैं। गुरु जी ने ऐसी परिस्थितियों का पहले भी सामना किया है, वह नहीं चाहते कि हम उनकी चिंता करें। लेकिन इस बार उनका पीछा करने वाला कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है, उसके पास गुप्त-शक्ति है, उसने उन्हें अन्वेषण-किरण से खोजा है। आज गुरु जी वहाँ से बच कर निकल आये, लेकिन अगले दिनों में उन्हें खतरा है। मैं उन्हें वहाँ अकेला नहीं छोड़ना चाहता, मैंने फैसला किया है कि मैं उनके पास जाऊँगा।"
सभी शिष्य उसकी ओर गम्भीरता से देख रहे थे।
रंगनाथ ने पूछा, “दादा, वह लोग उनके पीछे क्यों लगे हैं?”
“तुम्हें जितना कम मालूम हो उतना अच्छा है।"
गार्गी बोली, “दादा, क्या आप वहाँ अकेले जाओगे?”
"हाँ, मैं तुम लोगों को खतरे में नहीं डालना चाहता। जब मैं जाऊँगा तब तुम्हें, विशेषकर रंगनाथ और गार्गी को, यहाँ की देखभाल की ज़िम्मेदारी सम्भालनी पड़ेगी।"
रंगनाथ बोला, “दादा, अगर गुरु जी का पीछा करने वालों के पास अन्वेषण-किरण है, तो आप को अपनी शक्ति ढकने की ज़रुरत पड़ सकती है, नहीं तो वह आप को भी खोज लेंगे। आप हमें अपने साथ ले कर जाओ। हम बच्चे हैं, अगर वह जान भी जायेंगे कि हमारे पास शक्तियाँ हैं, तब भी हमें अधिक महत्व नहीं देंगे, वे छोटे बच्चों से नहीं डरेंगे। लेकिन हमारी शक्तियाँ इस लड़ाई में आप के काम आ सकती हैं।"
“मैं जानता हूँ कि तुम्हारी शक्तियाँ इस लड़ाई में मेरे काम आ सकती हैं, लेकिन अगर तुममें से किसी को कुछ हो गया तो मैं अपने आप को कभी क्षमा नहीं करूँगा।"
माधव बोला, “दादा, और अगर आप को कुछ हो गया तो हमारा ध्यान कौन रखेगा? अगर हम आप के साथ में होंगे तो जैसे रंगा दादा कहते हैं, कोई बच्चों को अधिक महत्व नहीं देगा और हम आप की मदद कर सकते हैं। आप ठीक रहोगे तो बाद में हमारी देखभाल भी करोगे।"
गार्गी बोली, “आप हमें उनसे लड़ाई के समय साथ नहीं रखना चाहते, तो भी हम लोग वहाँ पास में कहीं पर रह सकते हैं और वहाँ से आप की कुछ मदद कर सकते हैं।"
त्री कुछ देर तक सोचता रहा, फ़िर बोला, “मैं यह निर्णय लेने से पहले महादेव का मार्गदर्शन चाहता हूँ।" जब वह मुश्किल में होता है और उसे समझ नहीं आता कि क्या निर्णय लेना चाहिये, तो वह मंदिर में शिव जी के सामने ध्यान लगाता है और उनसे पूछता है। उसे लगता है कि शिव जी हमेशा उसके अंतरमन के प्रश्नों के उत्तर देते हैं, उसका मार्गदर्शन करते हैं।
वसंत ने पूछा, “दादा, गुरु जी ने और क्या कहा?”
“गुरु जी आज सुबह नारायणपुर गये थे। उनके और मेरे बीच एक मानसिक तार जुड़ा है, वह जब चाहें, मेरे मन में बात कह सकते हैं, लेकिन आज उन्होंने यह बात मुझे टेलीफोन पर बतायी। इसका मतलब है कि उस समय उन्होंने अपनी शक्ति को ढक लिया था, वह उसका प्रयोग नहीं कर सकते थे। तब से मैं उनसे सीधा सम्पर्क नहीं कर पाया हूँ, शायद वह नहीं चाहते कि उनका पीछा करने वालों को उनके आश्रम का पता चले।"
गार्गी बोली, “अगर उन्होंने गुरु जी को अन्वेषण-किरण से खोजा है तो उन्हें केवल एक शक्ति-लहर की अनुभूति हुई होगी, उसे पक्का पता नहीं होगा कि वह गुरु जी ही हैं?”
वसंत बोला, “अगर अब वह लोग गुरु जी की शक्ति-लहर को नहीं खोज पा रहे, और उन्हें वहाँ पर हममें से कोई बच्चा मिल जाये, तो शायद वह सोच सकते हैं कि जो शक्ति-लहर उन्होंने महसूस की थी, वह गुरु जी नहीं थी, बल्कि हमारी थी?”
माधव बोला, “अगर हम लोग नारायणपुर जायें तो रंगा भैया उनकी बातें दूर से सुन सकते हैं और पता लगा सकते हैं कि वह कितना जानते हैं और उनकी आगे की क्या योजना है?”
त्री ने हाथ उठा कर उन्हें चुप कराया, बोला, “तुमने जो कहना था वह कह दिया, अब मुझे सोचने का समय दो और तुम लोग यहाँ से जाओ।"
बच्चे वहाँ से गये तो त्रिनेत्र मन्दिर में नटराज की प्रतिमा के सामने पद्मासन लगा कर बैठ गया और शिव जी का ध्यान लगा कर उनसे मार्गदर्शन माँगा।
कुछ देर के बाद जब वह अखाड़े से बाहर निकला तो देखा कि वहाँ एक पेड़ के पास आभा बैठी है। उसे देख कर वह उठ कर आयी, बोली, “मैं आप से मिलने आयी थी, लेकिन बच्चों ने मुझे कहा कि आप व्यस्त हैं, कोई भीतर नहीं जा सकता।"
“कहिये", त्री ने कहा।
“मैंने विशाल को टेलीफोन किया था, वह मुझे लेने आज नहीं आ सकता, क्या मैं यहाँ से कल सुबह जा सकती हूँ?”
“हाँ, आप विशाल को कहिये कि उसे यहाँ आने की आवश्यकता नहीं, कल सुबह हम लोग रास्ते में आप को वहाँ पर छोड़ देंगे।"
“बच्चे कह रहे थे कि यहाँ एक अखाड़ा है जहाँ वह व्यायाम करते हैं, क्या मैं आप के अखाड़े को देख सकती हूँ?” आभा ने पूछा।
त्री ने एक पल के लिए सोचा कि उसे मना कर दे, फ़िर बोला, “आईये, मैं आप को दिखाता हूँ।"
उसने अखाड़े का द्वार खोला और वह दोनों भीतर घुसे। आभा वहीं दरवाज़े के पास रुक गयी, बोली, “हरे पत्तों की छाया में ढकी यह जगह बहुत सुंदर है, किसी जँगल का हिस्सा लगती है। यहाँ बहुत शाँति है।" फ़िर उसने मन्दिर की ओर देखा, बोली, “वहाँ क्या है? लगता है जैसे कोई मुझे उस ओर खींच रहा है। मुझे भीतर से कुछ अजीब सा महसूस हो रहा है।"
इससे पहले कि वह उसे कुछ कहता, आभा ने आँखें बन्द कर लीं और उसके शरीर का ऊपरी हिस्सा धीरे-धीरे आगे-पीछे डोलने लगा। त्री को लगा कि वह ध्यान में चली गयी है।
इसके साथ ही अखाड़े में लगे पेड़-पौधों से अजीब सी सरसराहट की आवाज़ें आने लगी। कुछ ही देर में उनके आसपास की सारी धरती, जीव-जन्तुओं से भर गयी - उनमें कुछ गिलहरियाँ, चूहे और साँप थे, और उनके साथ हज़ारों छोटे-बड़े कीड़े-मकोड़े थे। सभी जीव-जन्तु किसी तंद्रा में डूबे लग रहे थे, वह उनके आसपास चक्कर लगाने लगे।
त्री घबराया, उसने आभा के कँधे पर हाथ रख कर उसे पुकारा तो उसका डोलना रुका। उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं, लेकिन उसकी दृष्टि खाली घूम रही थी, जैसे कि वह कुछ देख नहीं पा रही हो। तब त्री ने ज़ोर से ताली बजायी तो आभा के सिर को झटका लगा और वह जैसे नींद से जागी। उसी क्षण में जिस शक्ति ने उन जीव-जन्तुओं बाहर बुलाया था, वह क्षीण हो गई तो वह सभी अपने बिलों या पेड़ों की ओर चले गये। एक मिनट में सभी जीव-जन्तु वहाँ से गुम हो गये।
आभा ने आश्चर्य से उन्हें जाते हुए देखा। अक्सर लोग साँपों, कीड़ों-मकोड़ों से डरते हैं, लेकिन उसकी दृष्टि में बिल्कुल भी भय नहीं था। उसने त्री से पूछा, “यह कैसे किया तुमने? मुझे लगा कि मैं कोई सपना देख रही हूँ।"
जब वह कुछ नहीं बोला तो वह बोली, “तुम कोई जादूगर हो? बताओ, तुमने यह कैसे किया?”
त्री ने उसका हाथ पकड़ा, बोला, “चलो, यहाँ से बाहर चलते हैं, फ़िर तुम्हें बताऊँगा।"
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उपन्यास का अगला भाग बृहस्पतिवार 25 जून को पढ़ सकते हैं।






