अब तक की कहानी: प्रतिमा की खोज में त्री और ओरी लखमीपारा गाँव के पास शंखासुर की पहाड़ी देखने जा रहे थे, तब रास्ते में उनका सामना कुछ गैंडों के सींग चुराने वाले तस्करों से हो गया, जो एक फॉरैस्ट गार्ड को मार रहे थे। ओरी उस गार्ड को बचाने के लिए गया और तस्करों से लड़ने लगा। लड़ाई में एक तस्कर की मृत्यु हो गयी, त्री और ओरी वहाँ से भागे। वसंत ने पेड़ों से बात करके बताया कि शंखासुर पहाड़ी के क्षेत्र में कोई गुफाएँ नहीं हैं। गार्गी ने कहा कि उसके अनुसार वह गलत दिशा में खोज रहे थे और उन्हें डमरू द्वीप दिखाया, जहाँ बहुत सी गुफाएँ थीं। आगे पढ़िये ...
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अध्याय 28
डमरू द्वीप, काज़ीरंगा, असम, 8 मार्च 2026
गार्गी ने कविता के शब्द दोहराये:
"चन्द्र-वधु के चरण-कमल, तीन दशानन कोसे
पद्मा की कमल-अँजुरी से बहता जल
विष्णु के शंख नाद से प्रज्जवलित अंबर के सप्त ऋषि
कंदरा में गूँजती चौदह ध्वनियाँ पिनाक की
लौटी सति पर्वतराज पिता के घर, त्रिनेत्र कहाँ है?
वहाँ जहाँ पर लाल बकरियाँ घास चरें।"
फिर बोली, "मेरे विचार में हमने कविता की पहली और अंतिम पंक्तियाँ सही समझी हैं, यानि कि हम काज़ीरंगा की बात कर रहे हैं। लेकिन 'पद्मा की कमल अँजुरी' का अर्थ लखमीपारा नहीं है, बल्कि लखमी चापोड़ी द्वीप है। इस नक्शे में देखो, उसके नीचे इस छोटे द्वीप की आकृति क्या शंख से नहीं मिलती? और जहाँ पर शंख की नोक है, ठीक उसके नीचे वाले द्वीप की आकृति आधे डमरू जैसी नहीं है?”
त्री ने टैबलेट ली, देखा और हँसा, बोला, “शाबाश गार्गी, शायद तुमने गुरु जी की पहेली को सही पहचाना है।"
ओरी बोला, “मुझे भी दिखाओ।"
गार्गी काज़ीरंगा आरक्षित क्षेत्र के पास ब्रह्मपुत्र नदी के द्वीपों की बात कर रही थी। उसने वसंत से कहा, “यह डमरू वाला द्वीप यहाँ से दक्षिण दिशा में है, तुम उस द्वीप के पेड़ों से पूछो कि वहाँ कोई गुफाएँ हैं या नहीं?”
वसंत ने आँखें बंद करके ध्यान लगाया, और कुछ क्षणों के बाद आँखें खोल कर बोला, “वहाँ पर बहुत सारी गुफाएँ हैं।"
ओरी उत्साहित हो कर बोला, “वह जगह यहाँ से बहुत दूर नहीं है, चलो हम अभी, इसी समय वहाँ चलते हैं।"
त्री ने एक मिनट के लिए सोचा, फिर बोला, “सबको वहाँ ले जाने की आवश्यकता नहीं है, मैं एक दूसरी मोटर बोट का प्रबंध करता हूँ, केवल मैं और ओरी ही वहाँ जायेंगे। अगर चाहे तो आभा हमारे साथ आ सकती है। "
गार्गी ने पूछा , “क्यों दादा? हम तुम्हारे साथ क्यों नहीं आ सकते?”
त्री बोला, “तुम सभी बच्चे मेरी ज़िम्मेदारी हो। कल जो हादसा हुआ, उसके बारे में तो तुमने सुना है। कब, कहाँ पर, कुछ अप्रत्याशित हो जाये, कुछ पता नहीं चलता। बेकार खतरा लेने से क्या फायदा? वैसे भी तुम मेरी चेतना से जुड़ कर मेरे साथ सब कुछ देख सकती हो, क्या वह काफी नहीं है?”
यह बात सुन कर बच्चे चुप हो गये, पर आभा बोली कि वह उनके साथ जायेगी। त्री ने घाट से एक अन्य मोटर बोट का प्रबंध किया और तीनों उस पर डमरू द्वीप की ओर निकल पड़े।
मोटर बोट वाले ने उसे कहा, “बाबू जी, वहाँ पर बहुत से घड़ियाल होंगे क्योंकि आजकल उनका मौसम चल रहा है। मैं वहाँ पर आप को उतार दूँगा लेकिन नाव को वहाँ रोक कर आप की प्रतीक्षा नहीं करूँगा, कहीं दूसरी जगह जहाँ घड़ियाल न हों, वहाँ रुकूँगा। जब आप लोगों का लौटने का समय हो तो मुझे फोन कर देना, मैं पंद्रह-बीस मिनट में आप को लेने पहुँच जाऊँगा।"
ओरी उनकी बात सुन रहा था, उसने त्री से पूछा, “यह किस जानवर की बात कर रहा है?”
त्री को मालूम नहीं था कि घड़ियाल को अंग्रेज़ी में क्या कहते हैं, बोला, “यह मगरमच्छ की एक प्रजाती है जो भारत की नदियों में मिलती है। मगरमच्छ के सिर का आगे वाला हिस्सा चपटा सा होता है, जबकि घड़ियाल के सिर का आगे वाला हिस्सा बहुत लम्बा और संकरा होता है, और उनकी नाक पर गेंद जैसा फूला हुआ एक गोल हिस्सा होता है जिसे हम लोग घड़ा कहते हैं और उसकी वजह से उन्हें घड़ियाल बुलाते हैं।"
मगरमच्छों की बात सुन कर ताकानोरी थोड़ा सा घबराया।
डमरू द्वीप तक पहुँचने में उन्हें करीब आधा घंटा लगा और वहाँ पहुँचने से पहले, दूर से ही उन्हें घड़ियालों की आवाज़ें सुनाई देने लगीं। उनके फूले हुए नाक के घड़ों से 'घूँ-घूँ' की आवाज़ आ रही थी मानो वह खुर्राटे ले रहे हों। पास जा कर देखा तो द्वीप के रेतीले किनारे पर कम से कम पचास घड़ियाल धूप में घूँ-घूँ करते हुए आगे-पीछे घूम रहे थे।
मोटर-बोट वाला बोला, “मादा को आकर्षित करने के लिए यह आवाज़ नर-घड़ियाल करते हैं। बोलिये आप को कहाँ पर उतारूँ?”
त्री ने ओरी और आभा की ओर देखा। ओरी का चेहरा फीका पड़ गया था।
आभा बोली, “मैं इन जानवरों के बीच में नहीं जाना चाहती, तुम लोग उतर कर जहाँ घूमना है वहाँ घूम आओ।"
त्री ने मोटरबोट वाले से पूछा, “क्या इसके अतिरिक्त यहाँ उतरने की कोई अन्य जगह नहीं है? आप थोड़ा द्वीप का चक्कर लगाईये, शायद इससे आसान कोई दूसरी जगह मिल जाये?”
दिक्कत यह थी कि द्वीप के आसपास नुकीली चट्टाने थीं जिनकी वजह से वहाँ उतरना असम्भव था। द्वीप के आगे-पीछे चक्कर लगा कर उनकी मोटर-बोट वापस घड़ियालों की जगह पर ही लौट आई।
त्री ने आभा से कहा, “तुम अपनी शक्ति से इन घड़ियालों से सम्पर्क बना कर देखो, शायद तुम्हारी बात मान कर, यह यहाँ से कुछ देर के लिए हट जायें?”
वह बोली, “तुम तो जानते हो कि मुझे अपनी शक्ति को नियंत्रित करना नहीं आता, अभी तक जितनी बार भी उस शक्ति ने काम किया है, वह मेरे भय की वजह से किया है।"
त्री बोला, “हम नाव की साइड में एक रस्सी की सीढ़ी लटका देते हैं, तुम उस पर थोड़ा सा नीचे, उनके करीब जाओ, शायद तुम्हारे पास होने से वह शाँत हो जायें।"
इस बात को सुन कर आभा घबरा गयी, बोली, “नहीं, वह मुझसे नहीं होगा। इनके दाँत देखो, किसी घड़ियाल ने उछल कर मेरी टाँग को पकड़ लिया तो?”
त्री बोला, “बस थोड़ी सी कोशिश करो, पाँच मिनट के लिए। प्लीज़!"
तो आभा और घबराई। शायद इस बात से उसकी शक्ति जागृत हो गयी और सभी घड़ियाल उनकी नाव की ओर आने लगे।
उनके झुँड को नाव की ओर आता देख कर ओरी भी परेशान हो गया, बोला, “उस पर जबरदस्ती नहीं करो, वरना यह मगरमच्छ हमारी मोटर-बोट में चढ़ आयेंगे।"
मोटर-बोट वाला भी डर गया, बोला, “साहब यह तो खतरनाक हो रहे हैं", और बोट को द्वीप से कुछ दूर ले आया।
त्री ने आभा का हाथ पकड़ लिया, बोला, “तुम घबराओ नहीं, जैसे मैं कहता हूँ तुम वैसे करो। वहाँ जाने की और नीचे उतरने की तुम्हें कोई आवश्यकता नहीं है। तुम्हारे डरने से वह घड़ियाल तुम्हें बचाने के लिए नाव की ओर आने लगे, इससे हमें यह पता चलता है कि उन पर तुम्हारी शक्ति का असर हो रहा है। मैंने यही देखने के लिए तुमसे रस्सी की सीढ़ी वाली बात कही थी।"
आभा ने भयभीत आँखों से उसकी ओर देखा। उसने उसे अपने पास एक कुर्सी पर बिठाया और धीरे-धीरे बोलने लगा, "तुम आँखें बंद कर लो और अपनी साँस पर ध्यान दो, धीरे-धीरे लम्बी साँस लो। जैसा मैं कहता हूँ, तुम वैसा करो, मैं तुम्हें नाव से उतरने के लिए नहीं कह रहा। मैंने सभी बच्चों को अपनी शक्ति पर नियंत्रण करना सिखाया है, मैं तुम्हारे साथ भी एक बार कोशिश करना चाहता हूँ। तुम बस आँखें बंद करो, धीरे-धीरे साँस लो और अपनी साँस पर ध्यान दो, कुछ और नहीं सोचो, उन घड़ियालों को भूल जाओ।"
कुछ समय बाद जब आभा की साँस की गति धीमी हुई तो द्वीप पर जमा घड़ियाल भी वापस तट की ओर लौट गये और पहले की तरह इधर-उधर घूमने लगे।
तब त्री ने पूछा, “अब तुम अपने मन को स्थिर करके देखो कि क्या तुम उन घड़ियालों को अपने आसपास महसूस कर सकती हो? अगर नहीं, तो कोई बात नहीं, तुम वापस अपनी साँस पर ध्यान दो।” हर पाँच मिनट के बाद, वह उससे यही बात पूछता था कि वह उन घड़ियालों को महसूस कर सकती है या नहीं?
करीब आधे घंटे के बाद जब उसने पूछा तो आभा ने धीरे से सिर हिलाया कि हाँ, वह घड़ियालों को महसूस कर रही है।
तब त्री बोला, “अब सोचो कि वह सभी घड़ियाल दायीं ओर जा रहे हैं। अपनी कल्पना में देखो कि सभी घड़ियाल तट के दायीं ओर जा रहे हैं। थोड़ी देर तक यही कल्पना करने की कोशिश करो।"
सचमुच द्वीप पर इकट्ठे घड़ियाल तट के दायीं ओर जाने लगे और बायीं ओर वाला हिस्सा खाली होने लगा। तब उसने आभा से आँखें खोलने के लिए कहा और उसे दिखाया, “वह देखो, जैसा तुमने सोचा, वह सभी सचमुच दायीं ओर चले गये। इसका मतलब है कि वह तुम्हारी बात सुन और समझ रहे हैं।"
आभा ने घड़ियालों को देखा तो आश्चर्यचकित रह गयी, बोली, “यह मेरे सोचने से हुआ?”
त्री बोला, “इस समय तुमने आँखें खोल ली हैं फिर भी देखो वह वहीं पर रुके हुए हैं, इस ओर नहीं आ रहे। तुम दोबारा बैठ कर पहले की तरह ध्यान लगाओ और फिर से उन्हें दायीं ओर जाने के लिए कहो। हमें पाँच-दस मिनट का समय मिल जायेगा तो हम भाग कर पीछे पहाड़ी वाले हिस्से तक तट से कुछ ऊपर पहुँच जायेंगे, उसके बाद तुम ध्यान तोड़ सकती हो। जब हम लौटेंगे तो तुम्हें वहीं पहाड़ी से इशारा करेंगे और अगर आवश्यकता होगी तो तुम दोबारा ध्यान लगा कर उन्हें दायें करवा देना।"
फिर उसने मोटर-बोट वाले से कहा, “आप तैयार रहिये, जब सब घड़ियाल तट के दायीं ओर जायेंगे तो आप इस बोट को तट के बायीं ओर, जितना करीब ले जा सकते हैं, ले जाईये।"
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उपन्यास का अगला भाग सोमवार 7 सितम्बर को पढ़ सकते हैं
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