अब तक: जापानी यामागुची गैंग का याकूज़ा-खूनी ताकानोरी जामुन बाबा की गुप्त शक्ति वाली मूर्ति को लेने भारत आया है। ताकानोरी एक दिन बाबा को नारायणपुर में खोज लेता है लेकिन वह उसके चँगुल से भागने में सफल होते हैं। बाबा अपने शिष्य त्रिनेत्र को इसकी सूचना देते हैं तो वह कहता है कि वह तुरंत वहाँ आ रहा है। इधर मजूली द्वीप में बाबा अपने वृद्धाश्रम में सबको बताते हैं कि उन्होंने समाधी लेने का निर्णय लिया है। आगे पढ़िये:
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गँगटोक, सिक्किम, 2 मार्च 2026
त्री ने सोचा कि शायद उसने आभा को वहाँ बुला कर गलती की है। वह उसके मित्र विशाल की बहन है और कुछ दिनों के लिए उनके अनाथाश्रम में रहने आयी है।
विशाल का कुर्स्यांग में होटल है, मोयरंग होटल और कैफे। उस जगह पर किसी ज़माने में एक चाय-बागान होता था। होटल-मालिक बनने से पहले विशाल कलाकार बनने के सपने देखता था। होटल मालिक बनने के बाद, अब हर साल वह अपने होटल के विस्तृत बाग में एक कला प्रदर्शिनी आयोजित करता है।
त्री पहले पक्की मिट्टी की मूर्तियाँ बनाता था, पर पिछले कई सालों से वह ताँबे की मूर्तियाँ बनाने लगा है। वह विशाल से एक कला-प्रदर्शनी में मिला था और जल्दी ही दोनों मित्र बन गये थे।
विशाल ने उसे अपनी बहन आभा की दुखद कहानी सुनायी थी। आभा का पति विवेक, एक पत्रकार था और दो साल पहले वह भारत-म्यनमार सीमा पर होने वाली तस्करी के बारे में जानकारी जमा कर रहा था जब किसी ने उसकी कार को बम विस्फोट से उड़ा दिया था। उस समय, उसके साथ उनकी चार साल की बेटी मयूरी भी थी, जो पिता के साथ उस बम विस्फोट में मरी थी।
इस घटना के बाद आभा एक गहन उदासी में डूब गयी थी और करीब एक साल तक घर से बाहर नहीं निकली थी। कुछ महीने पहले विशाल उसे कुर्स्यांग ले कर आया था, जहाँ वह त्री से मिली थी। उसने अपने भाई से त्री के अनाथाश्रम के बारे में सुना था और कला प्रदर्शनी में वह उसकी ताँबे की मूर्तियों से बहुत प्रभावित हुई थी। उसने त्री से पूछा था, “काँसे को मूर्तियों में कैसे ढालते हो? क्या उसे पहले पिघलाना पड़ता है?”
त्री ने कहा था, "यह कैसे करता हूँ उसे बता कर समझाना कठिन है, तुम कुछ दिन हमारे यहाँ आ कर देखो। मेरा अधिकतर समय तो अनाथाश्रम को चलाने में निकलता है, पर जब कुछ खाली समय मिलता है तो मैं शिल्पकार भी बन जाता हूँ। हमारे यहाँ लड़कियों का होस्टल है, तुम वहाँ ठहर सकती हो।"
आजकल त्री सात प्रतिमाओं का गुट बना रहा है, जिसमें एक कृष्ण हैं, एक राधा, एक गाय और तीन गोपियाँ। अभी तक उसने तीन गोपियों और एक गाय की प्रतिमाएँ पूरी की हैं और अब राधा को बनाने में जुटा है। यह काम करते हुए वह ताँबे को काटने वाली मशीन का उपयोग करता है, जिससे बहुत शोर होता है, इसलिए वह कानों पर शोर कम करने वाले इयरफोन लगाता है।
आभा को उनके यहाँ आये हुए करीब एक सप्ताह हुआ है। शायद बच्चियों के बीच में रह कर उसे अपनी बेटी की याद आती है। गार्गी ने त्री को बताया है कि वह अक्सर बालकनी में बैठ कर, दूर पहाड़ों को देखती रहती है, और कभी-कभी रोती भी है। त्री को समझ नहीं आता कि वह उसकी किस तरह से सहायता करे।
हर रोज़ की तरह उस दिन भी सुबह मुँह-अँधेरे, त्री ने अपने शिष्यों के साथ उनकी गुप्त-शक्ति के विकास के लिए अभ्यास किये थे। उनके अनाथाश्रम में गुप्त-शक्ति वाले कुल सात बच्चे हैं लेकिन उनमें से दो बच्चे अभी छोटे हैं, वे पाँच साल के नहीं हुए हैं, इसलिए वह प्रशिक्षण में हिस्सा नहीं लेते। बाकी के पाँच बच्चों के साथ, उनके स्कूल जाने से पहले, त्री हर रोज़ सुबह दो घंटे के लिए उन्हें विशेष अभ्यास कराता है।
यह प्रशिक्षण उनके अनाथाश्रम से कुछ दूर, पेड़ों से घिरे हुए एक अखाड़े में होता है, जिसके चारों ओर बेलों-लताओं से ढकी हुई एक ऊँची दीवार है। ड्रोन से देखें तो उस अखाड़े का पूरा क्षेत्र, पेड़ों की शाखाओं और घने पत्तों से इस तरह ढका हुआ है कि ऊपर से धरती का एक इँच भी दिखाई नहीं देता।
अखाड़े के कोने में एक छोटा सा, परन्तु सुंदर मन्दिर है, जिसमें एक ओर ताँडव नृत्य करते हुए नटराज की प्रतिमा है और दूसरी ओर ध्यानलीन बुद्ध की, उन दोनों के बीच में बौद्धिसत्व अवलोकितेश्वर की प्रतिमा है।
मंदिर के सामने, खुले में एक चबूतरा है जिसके चारों ओर सफेद और हरे रंग की माँ तारा की प्रतिमाओं की कतार बनी है। इस चबूतरे के सामने वह हर रोज़ बच्चों से विभिन्न अभ्यास तथा व्यायाम कराता है।
त्री कहता है कि उन्हें एक-दूसरे के साथ मिल कर एक-जीवात्मा की तरह सोचना सीखना है। वह उन्हें समझाता है, “हमें केवल लड़ना नहीं सीखना, हमें अपने भीतर करुणा, एकाग्रता और ध्यान के गुण भी बढ़ाने हैं, क्योंकि हम अपनी शक्तियों का प्रयोग केवल निर्बलों और शक्तिहीनों की रक्षा के लिए कर सकते हैं, किसी गलत काम या व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं।"
उसके शिष्यों में रंगनाथ सबसे बड़ा है। वह तेरह साल का है और उसकी प्रमुख शक्तियाँ हैं, सुनना और सूँघना। वह उन ध्वनियों को सुन सकता है जिन्हें सामान्य लोग नहीं सुन पाते। दो सौ मीटर दूर खड़ा व्यक्ति धीमे स्वर में क्या फुसफुसा रहा है, वह उसे सुन सकता है। वह व्यक्तियों, पशुओं, वस्तुओं आदि की गंध को सूँघ कर उन्हें पहचान सकता है। इसलिए उससे कुछ भी छिपाना बहुत कठिन है। उसके दिमाग में सिनेस्थीसिया है, यानि वह विभिन्न गंधों को अलग-अलग रंगों में देखता है।रंगनाथ के बाद, दूसरे नम्बर पर है गार्गी विनायक, जो बारह साल की है। उसकी प्रमुख गुप्त-शक्ति को वह लोग अजगर-पाश कहते हैं। वह किसी भी व्यक्ति के मस्तिष्क में घुस कर उसकी माँसपेशियों की नसों को बाँध सकती है ताकि वह अपनी जगह से हिल नहीं पाये। उसके पास विचार पढ़ने की शक्ति भी है। किसी के मन में क्या है, वह उसे जान सकती है और लोगों की शक्ति-लहरों को महसूस कर लेती है।
तीसरे नम्बर पर है नौ बरस का वसंत, जिसकी गुप्त-शक्ति विचित्र है। जब त्रिनेत्र ने उसके बारे में गुरु जी को बताया था तो वह भी चकित हो गये थे। उसकी शक्ति वनस्पति जगत से जुड़ी है, वह पेड़ों-पौधों से, यहाँ तक कि घास के तिनकों से भी, बातें कर सकता है। वह जैसा चाहे, पेड़-पौधे उसी दिशा में विकसित हो जाते हैं। अखाड़े के क्षेत्र को पेड़ों की शाखाओं और घने पत्तों से उसी ने ढका है। अगर कोई बीमार हो तो वह पेड़ों से बात करके बता सकता है कि रोगी को किस पत्ते या जड़ी-बूटी को औषधि के रूप में दिया जाये।
चौथे नम्बर पर है आठ साल का माधव, जिसके पास दृष्टि शक्ति है। उसकी आँखें सामान्य रोशनी में बहुत दूर तक देख सकती हैं। साथ ही वह अल्ट्रावायोलैट और इन्फ्रारैड रोशनी को भी देख सकता है, जो सामान्य व्यक्तियों को नहीं दिखतीं। वह लोगों की शक्ति-लहरों को भी विभिन्न रंगों में देखता है।
उनकी पाँचवी और उम्र में सबसे छोटी, छह साल की शिष्या है तृप्ति। उसकी शक्ति लोहे और स्टील जैसी धातुओं से जुड़ी है। उसे अभी अपनी शक्ति को ठीक से संचालित करना नहीं आता, इसलिए जब वह पास होती है तो अक्सर चम्मच और चाकू जैसी चीज़ें मेज़ से उठ कर हवा में उड़ने लगती हैं। उसकी श्रवण शक्ति भी अच्छी है।
उनका अनाथाश्रम कुर्स्यांग से गँगटोक जाने वाली सड़क के पास है। उनके यहाँ अधिकतर बच्चे सिक्किम, पश्चिम बंगाल, असम और उत्तर-पूर्व से आते हैं, एक-दो बच्चे भूटान और नेपाल के भी हैं।
गुरु जी ने त्री को सिखाया था कि गुप्त-शक्तियों वाले बच्चों को अक्सर पढ़ने-लिखने, बात समझने और एक जगह पर शाँत बैठने में कठिनाई होती है। इस वजह से ऐसे बच्चे अक्सर स्कूलों में पढ़ाई में कमज़ोर होते हैं और कभी-कभी तो उन्हें मानसिक रूप से विकलाँग भी समझा जाता है। इस बात को ध्यान में रख कर त्री ने उत्तर-भारत के सभी अनाथाश्रमों में कहलवाया है कि अगर उनके यहाँ कोई बच्चा ऐसा हो जिसे पढ़ने-लिखने में दिक्कत हो, तो वे उसे उनके अनाथाश्रम में भेजें। ज़रूरत पड़े तो ऐसे बच्चों की जाँच करने वह खुद भी जाता है। इस तरह से उनके यहाँ सात गुप्त-शक्ति वाले बच्चे एकत्रित हो गये हैं।
उस दिन व्यायाम और अभ्यास समाप्त होने के बाद, बाकी बच्चे चले गये, लेकिन गार्गी नहीं गयी, बोली, “त्री दादा, आप से एक बात करनी है।"
त्री बोला, “अगर चाहें तो रंगा और तृप्ति, बाहर से भी हमारी बातें सुन सकते हैं, तुम उनके सामने भी मुझसे बात कर सकती थीं, यह अकेले में क्यों?"
वह बोली, “अगर वह दोनों सुनना चाहते हैं तो सुन लें, पर मेरे ख्याल में अभी वह यहाँ नहीं रुकेंगे क्योंकि अभी टीवी पर रंगा दादा की कार्टून फ़िल्म का टाईम हो रहा है।"
त्री मुस्कराया, “अच्छा बताओ, तुम क्या बात करना चाहती हो?”
"हमारे होस्टल में जो आभा दीदी आयी हुई हैं, क्या उनमें भी कोई गुप्त-शक्ति है।"
त्री के माथे पर बल पड़ गये, बोला, “क्यों? क्या तुमने कुछ महसूस किया?”
गार्गी ने सिर हिला कर हामी भरी, बोली, “मुझे उनमें शक्ति-लहरें महसूस होती हैं। जब वह यहाँ आयीं थीं, तब नहीं होती थीं, लेकिन पिछले एक-दो दिनों में होने लगी हैं, शायद उन पर हमारा और हमारी मूर्तियों का प्रभाव पड़ा है?"
त्री सोच में डूब गया। बच्चों की शक्ति को बचपन में विकसित नहीं किया जाये तो वह मुरझा जाती है। शायद आभा का शक्ति-बीज किसी वजह से पूरा नहीं मुरझाया था, और यहाँ रहने से वह फ़िर से जाग गया है। उसने गार्गी से कहा, “तुमने मुझे बता कर अच्छा किया, मैं इसकी जाँच करूँगा।"
कुछ देर बाद वह आभा को खोजने गया। वह लड़कियों के होस्टल के बाहर एक पेड़ के नीचे बैठी कोई किताब पढ़ रही थी। त्री को देख कर वह उठने लगी तो उसने उसे बैठे रहने का इशारा किया, उसके पास रखी कुर्सी पर बैठ गया और बोला, “आप कुछ दिनों से मेरी शिल्पशाला में नहीं आईं, तो मैं सोच रहा था कि शायद आप की तबियत ठीक नहीं है, इसलिए आप से मिलने चला आया।"
वह बोली, “जब मैं यहाँ आयी थी तो सोचा था कि ताँबे से शिल्प बनाना सीखूँगी, लेकिन वह मेरे बस का नहीं है। आप की ताँबे की परत इतनी भारी होती है कि मैं उसे उठा नहीं सकती। उसे मशीन से काटना, हथौड़ों से पीट कर सीधा करना या मोड़ कर आकार देना, इस सब के लिए जो ताकत चाहिये, वह मेरे बस की बात नहीं। लेकिन यहाँ आप के पास आ कर पता नहीं कैसे, मेरा मन कुछ शाँत हो गया है।"
त्री ने भी महसूस किया कि आभा के माथे से शक्ति-लहर की हलकी सी अनुभूति आ रही है। क्या उसे आभा से इस बारे में बात करनी चाहिये? थोड़ा सा सोच कर वह इस नतीजे पर पहुँचा कि इस विषय में जल्दबाज़ी करना ठीक नहीं होगा।
वह वहाँ से उठ रहा था जब उसके मोबाइल की घंटी बजी। उसने देखा कि गुरु जी का फोन है तो वह समझ गया कि कुछ विशेष बात है क्योंकि वह उसे कभी फोन नहीं करते। उसने उनसे केवल एक मिनट तक ही बात की और फ़िर फोन बंद कर दिया।
आभा ने सुना कि उसने फोन पर किसी से कहा, “गुरु जी, हम आ रहे हैं" और उसका गम्भीर चेहरा देखा तो पूछा, “क्या हुआ? तुम्हें कहाँ जाना है?”
“एक एमरजैंसी हो गयी है, और हमें कल सुबह ही यहाँ से निकलना होगा। आप को यहाँ अकेला छोड़ना ठीक नहीं होगा, अच्छा होगा कि आप अपने भाई के पास कुर्स्यांग लौट जायें।"
“क्यों? मेरे यहाँ अकेले रहने में क्या कोई दिक्कत है?”
त्री ने सिर हिला कर मना किया, बोला, “हम लोग कुछ दिनों में लौट आयेंगे, तब आप यहाँ वापस आ सकती हैं। लेकिन इन दिनों में अगर आप विशाल के पास चली जायें तो बेहतर होगा।"
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