अब तक की कहानी: ताकानोरी जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी मूर्ति चाहता है। उससे बचने के लिए बाबा समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में लोगों को जान से मारने की धमकी देता है। वह उनकी समाधी को खोदने की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं होता। उधर, बाबा का शिष्य त्रिनेत्र एक अनाथाश्रम चलाता है, जहाँ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा भी हैं। वे बाबा को बचाने के लिए, वहाँ पहुँचते हैं। इसके आगे पढ़िये ...
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अध्याय 16
मजूली द्वीप, असम, 4 मार्च 2026, सुबह
त्री, रंगनाथ और गार्गी वृद्धाश्रम की ओर जाने के लिए तैयार हो गये।
त्री ने आभा से कहा, “हम सीढ़ियों से ऊपर नहीं जायेंगे बल्कि एक गुप्त सुरंग से बाहर निकलेंगे। तुम भी हमारे साथ चल कर सुरंग का रास्ता देख लो और जब यहाँ तहखाने में बैठे-बैठे बोर हो जाओ तो बच्चों को कुछ देर तक बाहर घुमा सकती हो। वसंत तुम्हारी शक्ति-लहरों को ढक कर तुम्हें उस जापानी की अन्वेषण-किरण से छुपा लेगा, लेकिन यह काम वह पेड़ों की सहायता से करता है, अगर तुम लोग खुले में जाओगे तो वहाँ वह तुम्हें नहीं छुपा सकता, इसलिए तुम बच्चों को खुली जगह में नहीं जाने देना।"
नाश्ते के बाद माधव और तृप्ति सोने के लिए वापस बिस्तर पर लौट गये, लेकिन वसंत वहीं बैठा उनकी बातें सुन रहा था, बोला, “मैं भी आप के साथ चलता हूँ, आभा दीदी के साथ लौट आऊँगा।"
आभा बोली, “क्या माधव और तृप्ति को यहाँ अकेले छोड़ना ठीक होगा?”
“इस घर में उन्हें कोई खतरा नहीं है। ज़रीना, वह लड़की जो ऊपर रहती है और हमें रात को मिली थी, वह हमारी साथी है। फरीद, वह नाव वाला जो हमें रात को मजूली ले कर आया था, ज़रीना उसकी बेटी है। वह सुन-बोल नहीं सकती, लेकिन इशारों की वर्णमाला जानती है और लिख-पढ़ सकती है। गुरु जी ने उसे गूँगे-बहरों के स्कूल में पढ़ने भिजवाया था, इसलिए वह लोग गुरु जी को बहुत मानते हैं। जब हमें अपने छुपने के लिए कमलाबाड़ी घाट के पास जगह चाहिये थी, तब गुरु जी ने यह घर बनवाया था और बाहर जाने के लिए सुरंग भी बनवायी। तुम्हें कुछ भी ज़रूरत हो तो ज़रीना को कहो", त्री ने सारी बात बतायी।रंगनाथ ने पूछा, “दादा, यह इशारों की वर्णमाला क्या होती है?”
“जैसे अक्षरों की वर्णमाला होती है, वैसे ही हम हर अक्षर के लिए उंगलियों से भिन्न मुद्रा बना सकते हैं, वह मुद्राओं की वर्णमाला होती है। जैसे कि तुम्हारे नाम को अगर मुद्राओं की भाषा में कहना हो तो 'र' कहने के लिए तर्जनी और मध्यमा उंगलियों से क्रोस बनाओ और बाकी दोनों उंगलियों पर अंगूठा रख दो। 'न' कहने के लिए सभी उंगलियों के सिरों को अंगूठे के सिरे से मिलाओ। फ़िर 'ग' कहने के लिए 'न' वाली मुद्रा में मध्यमा को ऊपर उठाओ", यह कहते हुए उसने अपने हाथों से मुद्राएँ बदल कर अक्षर बना कर दिखाये, बोला, “इस तरह से यह 'रंग' शब्द बन गया।"
रंगनाथ बोला, “यह भाषा तो बहुत कठिन लगती है।"
त्री मुस्कराया, “जब कोई चीज़ नहीं करनी आती तो वह कठिन लगती है। अगर तुम हर रोज़ मुद्रा की भाषा की एक-दो नयी मुद्राएँ सीख लो और हर रोज़ उनका अभ्यास करो तो एक महीने में इशारों में फटाफट बोलने लगोगे।"
गार्गी बोली, “जब हम घर लौटेंगे तो मैं यह इशारों की भाषा भी सीखूँगी ताकि ज़रूरत पड़े तो मैं आप को इशारों से गुप्त संदेश दे सकती हूँ।" रंगनाथ बोला, “केवल तुम्हारे सीखने से कुछ नहीं होगा, उसे समझने वाला भी चाहिये, नहीं तो क्या अपने आप से बातें करोगी?"
गार्गी ने पूछा, “दादा, कल रात जब हम यहाँ आये तो आप ने घंटी बजायी थी? ज़रीना दीदी ने उसे कैसे सुना?”
त्री मुस्कराया, “ऊपर जब घंटी बजाओ तो घंटी बजती है और साथ में एक बल्ब जलता-बुझता है, ज़रीना उसे देख सकती है।"
रंगनाथ ने पूछा, “ज़रीना दीदी टेलीफोन पर कही बातें भी समझ सकती हैं?”
“हाँ, उसके मोबाइल में एक एप्प है, तुम उसे कुछ कहोगे तो वह एप्प उसे मुद्रा की भाषा में वही बात वीडियो में दिखायेगी", कह कर त्री खड़ा हो गया, "चलो, अब हमें चलना चाहिये"।
वह तहखाने की रसोई में गया और एक अलमारी के पास जा कर, उसने एक जगह दबाया तो वह अलमारी दरवाज़े की तरह खुल गयी। उसके पीछे एक गुप्त रास्ता छिपा था। जैसे ही वह भीतर घुसा, वहाँ एक बत्ती जल गयी। उसके पीछे रंगनाथ और गार्गी गये और उनके पीछे आभा और वसंत।
त्री ने आभा को दिखाया कि सुरंग खोलने के लिए अलमारी को कैसे खोलते-बंद करते हैं। वह बोला, “इस सुरंग में सैन्सर लगे हैं, तुम जिधर जाओ, वहाँ की बत्ती अपने आप जल जाती है और पीछे वाली कुछ देर बाद अपने आप बुझ जाती है।"
सुरंग का रास्ता पार करने में उन्हें करीब आधा घंटा लगा और जब वह दरवाज़ा खोल कर बाहर निकले तो देखा कि उस सुरंग का दरवाज़ा एक मोटे तने वाले पीपल के पेड़ का हिस्सा था। जब वह बंद होता था और उसे ध्यान से नहीं देखो, तो दिखाई नहीं देता था।
वसंत बोला, “देखो, यह तो बहुत बड़ा पीपल का पेड़ है, इसके भीतर पूरा कमरा है।"
त्री बोला, “यहाँ के लोग इस पेड़ को पवित्र मानते हैं, इसे संत माधवदेव का पेड़ भी कहते हैं क्योंकि इसके नीचे एक बार संत माधव देव रहे थे। उनका गाँव हरिसिंगबरा, यहाँ से अधिक दूर नहीं है।"
वसंत ने पूछा, “यह पेड़ कितना पुराना होगा, दो सौ साल?”
“संत माधव देव करीब पाँच सौ साल पहले पैदा हुए थे, और कहते हैं कि उनके समय में भी इस पेड़ को बहुत प्राचीन मानते थे। इसलिए हो सकता है कि यह पेड़ एक हज़ार साल या उससे भी पुराना हो। यहाँ सब लोग इसे जानते हैं। अगर तुम आसपास कहीं खो जाओ तो लोगों से पूछो कि संत माधव देव का पीपल का पेड़ कहाँ है, वह तुम्हें यहाँ का रास्ता दिखा देंगे”, त्री ने समझाया, फ़िर बोला, “आभा और वसंत, तुम लोग अब वापस जाओ।"
आभा बोली, “बाद में जब माधव और तृप्ति जागेंगे, उन्हें साथ ले कर हम लोग यहाँ लौटेंगे।" वह दोनों पीपल के पेड़ की ओर लौट गये।
त्री, रंगनाथ और गार्गी आगे चले। उन्होंने गाँव के गरीब लोगों जैसे कपड़े पहने थे, जैसे कि एक पिता अपने बच्चों के साथ कहीं जा रहा हो। करीब एक घंटा चल कर वे श्री भोला मन्दिर पहुँचे और वहाँ से मोटरबोट ली जो उन्हें फुलानीबाड़ी के घाट तक ले गयी। त्री उस क्षेत्र में पहले कई बार आ चुका था, इसलिए उसने अपना चेहरा गमछे से ढक लिया था। घाट पर पहुँचने से पहले ही गार्गी ने तीनों की शक्ति-लहरों को ढक लिया।
फुलानीबाड़ी के घाट से जो रास्ता गाँव की ओर जाता है, वहाँ आगे जा कर पेड़ों के पीछे एक छोटा सा मैदान है, जिसके एक किनारे पर झाड़ियाँ के पीछे एक चबूतरा बना था। वह जगह सड़क से छिपी हुई थी। उस चबूतरे के पीछे जा कर त्री ने उसकी एक ईंट हटा कर दबाया तो उसमें एक छोटा सा गुप्त द्वार खुल गया, जिसमें वह तीनों झुक कर घुस गये।
वहाँ पर एक अन्य सुरंग थी जो नीचे जा रही थी, उसमें घुसने के बाद त्री ने गार्गी से कहा कि वहाँ शक्ति ढकने की आवश्यकता नहीं है।
रंगनाथ बोला, “दादा, हर जगह सुरंगें बनी हैं, इसका मतलब है कि गुरु जी बहुत सालों से इस खतरे का सामना करने के लिए तैयारी कर रहे थे?”
त्री ने धीरे से सिर हिला कर हामी भरी। वह जानता है कि बच्चे समझदार हैं, वह उनसे पूरी बात नहीं छुपा सकता। लेकिन अगर उनमें से कोई उस जापानी याकूज़ा के चँगुल में आ गया तो वह इनके दिमाग में घुस कर सब बातों को जान जायेगा, इसलिए वह उन्हें सब बातें नहीं बताना चाहता।
गार्गी बोली, “वह जापानी आदमी गुरु जी का पीछा क्यों कर रहा है? वह उनसे क्या चाहता है?”
“गुरु जी कोरिया से हैं। वह भी अनाथ थे और उन्हें भी एक बौद्ध भिक्षुक ने पाला था, जो बाद में उनके गुरु बने। उनके गुरु जी का नाम कूवी महाराज था और उनके पास हरिताश्म पत्थर की बनी माँ तारा की एक मूर्ति थी, जिसके प्रभाव से बच्चों की गुप्त-शक्तियाँ विकसित हो जाती हैं। कुछ जापानी लोग उस मूर्ति को पाना चाहते हैं", त्री ने बताया।
“यह हरिताश्म पत्थर क्या होता है?”
“हरिताश्म को अंग्रेज़ी में जेड कहते हैं, यह हरे रंग के संगमरमर जैसा होता है, लेकिन मुलायम होता है। उसकी मालाएँ और गहने भी बनाते हैं।"
“क्या यह पत्थर भारत में मिलता है? हमारे अखाड़े में भी तो हरे रंग की माँ तारा की कई मूर्तियाँ हैं?”
“यह पत्थर भारत में नहीं मिलता", त्री ने बताया, “हमारे उत्तर-पूर्व में एक देश है म्यंमार, उसे पहले बर्मा कहते थे, वहाँ पर हरिताश्म की खानें हैं। लेकिन सुना है कि हमारे मिज़ोराम में, म्यंमार की सीमा के पास भी, शायद यह पत्थर मिलते हैं।"
“इसका मतलब है कि जापानी लोग गुरु जी का चालीस-पैंतालिस सालों से पीछा कर रहे हैं?” रंगनाथ ने पूछा।
गार्गी बोली, “इतने सालों में तकनीकी ने इतनी तरक्की कर ली है, आज तो बहुत से अपराध इंटरनेट के माध्यम से होते हैं। इतने सालों के बाद भी वह लोग इस पुरानी बात के पीछे क्यों पड़े हैं?”
त्री मुस्कराया, बोला, “गुरु जी कहते हैं कि इस बात को यामागुचि नहीं भूल सकता, यह उसके आत्म-सम्मान की बात बन गयी है। तीन बार गुरु जी उसके चँगुल में आये और तीनों बार वह उसे चकमा दे कर भाग गये। आखिरी बार उसने गुरु जी को थाईलैंड में 1996 में खोजा था। उस बात को भी अब तीस साल हो गये। वह पहले वाले यामागुचि तो अब बहुत बूढ़े हो गये हैं, लेकिन उनका पोता है, रिकू यामागुचि, वह अब उनका गैंग चलाता है। शायद वह अपने दादा का अधूरा काम पूरा करना चाहता है।"
“पहले वह लोग गुरु जी को खोज लेते थे, तो वह उन्हें चकमा दे कर वहाँ से भाग कर नयी जगह में छिप जाते थे। लेकिन इस बार वह नहीं भागे, बल्कि उन्होंने समाधी ले ली, क्यों?”, गार्गी का दिमाग बहुत तेज़ है, वह हर अनकही बात को पकड़ लेती है।
“क्यों कि अब गुरु जी बूढ़े हो रहे हैं, वह डरते हैं कि कहीं उनकी मृत्यु के बाद, यामागुचि के जासूस हमारे पीछे न लग जायें, और हमारे अनाथाश्रम पर हमला कर दें, क्योंकि मैं उनके उत्तराधिकारी हूँ।"
“क्या इसका मतलब है कि अब वह मूर्ति हमारे पास है? वह हमारे अनाथाश्रम में है?” गार्गी ने पूछा।
त्री फ़िर से मुस्कराया, सोचा कि गार्गी से कुछ छुपाना बहुत कठिन है, बोला, “जो मूर्ति गुरु जी कोरिया से लाये थे, कुछ साल पहले वह टूट गयी थी। उन्होंने उस मूर्ति के टुकड़ों को कुछ नयी मूर्तियों में जड़वा दिया है। उसमें से एक नयी मूर्ति हमारे पास, हमारे अनाथाश्रम में भी है।"
यह बातें करते-करते वह तीनों सुरंग को पार करके, वृद्धाश्रम से कुछ दूर, गुरु जी के ज़मीन के नीचे छिपे हुए तहखाने वाले कमरों में पहुँच गये।
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अगला अध्याय सोमवार 27 जुलाई को पढ़ सकेंगे
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