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गुरुवार, जुलाई 23, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 16

अब तक की कहानी: ताकानोरी जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी मूर्ति चाहता है। उससे बचने के लिए बाबा समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में लोगों को जान से मारने की धमकी देता है। वह उनकी समाधी को खोदने की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं होता। उधर, बाबा का शिष्य त्रिनेत्र एक अनाथाश्रम चलाता है, जहाँ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा भी हैं। वे बाबा को बचाने के लिए, वहाँ पहुँचते हैं। इसके आगे पढ़िये ...

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अध्याय 16

मजूली द्वीप, असम, 4 मार्च 2026, सुबह

त्री, रंगनाथ और गार्गी वृद्धाश्रम की ओर जाने के लिए तैयार हो गये।

त्री ने आभा से कहा, “हम सीढ़ियों से ऊपर नहीं जायेंगे बल्कि एक गुप्त सुरंग से बाहर निकलेंगे। तुम भी हमारे साथ चल कर सुरंग का रास्ता देख लो और जब यहाँ तहखाने में बैठे-बैठे बोर हो जाओ तो बच्चों को कुछ देर तक बाहर घुमा सकती हो। वसंत तुम्हारी शक्ति-लहरों को ढक कर तुम्हें उस जापानी की अन्वेषण-किरण से छुपा लेगा, लेकिन यह काम वह पेड़ों की सहायता से करता है, अगर तुम लोग खुले में जाओगे तो वहाँ वह तुम्हें नहीं छुपा सकता, इसलिए तुम बच्चों को खुली जगह में नहीं जाने देना।"

नाश्ते के बाद माधव और तृप्ति सोने के लिए वापस बिस्तर पर लौट गये, लेकिन वसंत वहीं बैठा उनकी बातें सुन रहा था, बोला, “मैं भी आप के साथ चलता हूँ, आभा दीदी के साथ लौट आऊँगा।"

आभा बोली, “क्या माधव और तृप्ति को यहाँ अकेले छोड़ना ठीक होगा?”

“इस घर में उन्हें कोई खतरा नहीं है। ज़रीना, वह लड़की जो ऊपर रहती है और हमें रात को मिली थी, वह हमारी साथी है। फरीद, वह नाव वाला जो हमें रात को मजूली ले कर आया था, ज़रीना उसकी बेटी है। वह सुन-बोल नहीं सकती, लेकिन इशारों की वर्णमाला जानती है और लिख-पढ़ सकती है। गुरु जी ने उसे गूँगे-बहरों के स्कूल में पढ़ने भिजवाया था, इसलिए वह लोग गुरु जी को बहुत मानते हैं। जब हमें अपने छुपने के लिए कमलाबाड़ी घाट के पास जगह चाहिये थी, तब गुरु जी ने यह घर बनवाया था और बाहर जाने के लिए सुरंग भी बनवायी। तुम्हें कुछ भी ज़रूरत हो तो ज़रीना को कहो", त्री ने सारी बात बतायी।

रंगनाथ ने पूछा, “दादा, यह इशारों की वर्णमाला क्या होती है?”

“जैसे अक्षरों की वर्णमाला होती है, वैसे ही हम हर अक्षर के लिए उंगलियों से भिन्न मुद्रा बना सकते हैं, वह मुद्राओं की वर्णमाला होती है। जैसे कि तुम्हारे नाम को अगर मुद्राओं की भाषा में कहना हो तो 'र' कहने के लिए तर्जनी और मध्यमा उंगलियों से क्रोस बनाओ और बाकी दोनों उंगलियों पर अंगूठा रख दो। 'न' कहने के लिए सभी उंगलियों के सिरों को अंगूठे के सिरे से मिलाओ। फ़िर 'ग' कहने के लिए 'न' वाली मुद्रा में मध्यमा को ऊपर उठाओ", यह कहते हुए उसने अपने हाथों से मुद्राएँ बदल कर अक्षर बना कर दिखाये, बोला, “इस तरह से यह 'रंग' शब्द बन गया।"  

रंगनाथ बोला, “यह भाषा तो बहुत कठिन लगती है।"

त्री मुस्कराया, “जब कोई चीज़ नहीं करनी आती तो वह कठिन लगती है। अगर तुम हर रोज़ मुद्रा की भाषा की एक-दो नयी मुद्राएँ सीख लो और हर रोज़ उनका अभ्यास करो तो एक महीने में इशारों में फटाफट बोलने लगोगे।"

गार्गी बोली, “जब हम घर लौटेंगे तो मैं यह इशारों की भाषा भी सीखूँगी ताकि ज़रूरत पड़े तो मैं आप को इशारों से गुप्त संदेश दे सकती हूँ।" रंगनाथ बोला, “केवल तुम्हारे सीखने से कुछ नहीं होगा, उसे समझने वाला भी चाहिये, नहीं तो क्या अपने आप से बातें करोगी?"

गार्गी ने पूछा, “दादा, कल रात जब हम यहाँ आये तो आप ने घंटी बजायी थी? ज़रीना दीदी ने उसे कैसे सुना?”

त्री मुस्कराया, “ऊपर जब घंटी बजाओ तो घंटी बजती है और साथ में एक बल्ब जलता-बुझता है, ज़रीना उसे देख सकती है।"

रंगनाथ ने पूछा, “ज़रीना दीदी टेलीफोन पर कही बातें भी समझ सकती हैं?”

“हाँ, उसके मोबाइल में एक एप्प है, तुम उसे कुछ कहोगे तो वह एप्प उसे मुद्रा की भाषा में वही बात वीडियो में दिखायेगी", कह कर त्री खड़ा हो गया, "चलो, अब हमें चलना चाहिये"।

वह तहखाने की रसोई में गया और एक अलमारी के पास जा कर, उसने एक जगह दबाया तो वह अलमारी दरवाज़े की तरह खुल गयी। उसके पीछे एक गुप्त रास्ता छिपा था। जैसे ही वह भीतर घुसा, वहाँ एक बत्ती जल गयी। उसके पीछे रंगनाथ और गार्गी गये और उनके पीछे आभा और वसंत।

त्री ने आभा को दिखाया कि सुरंग खोलने के लिए अलमारी को कैसे खोलते-बंद करते हैं। वह बोला, “इस सुरंग में सैन्सर लगे हैं, तुम जिधर जाओ, वहाँ की बत्ती अपने आप जल जाती है और पीछे वाली कुछ देर बाद अपने आप बुझ जाती है।"

सुरंग का रास्ता पार करने में उन्हें करीब आधा घंटा लगा और जब वह दरवाज़ा खोल कर बाहर निकले तो देखा कि उस सुरंग का दरवाज़ा एक मोटे तने वाले पीपल के पेड़ का हिस्सा था। जब वह बंद होता था और उसे ध्यान से नहीं देखो, तो दिखाई नहीं देता था।

वसंत बोला, “देखो, यह तो बहुत बड़ा पीपल का पेड़ है, इसके भीतर पूरा कमरा है।"

त्री बोला, “यहाँ के लोग इस पेड़ को पवित्र मानते हैं, इसे संत माधवदेव का पेड़ भी कहते हैं क्योंकि इसके नीचे एक बार संत माधव देव रहे थे। उनका गाँव हरिसिंगबरा, यहाँ से अधिक दूर नहीं है।"

वसंत ने पूछा, “यह पेड़ कितना पुराना होगा, दो सौ साल?”

“संत माधव देव करीब पाँच सौ साल पहले पैदा हुए थे, और कहते हैं कि उनके समय में भी इस पेड़ को बहुत प्राचीन मानते थे। इसलिए हो सकता है कि यह पेड़ एक हज़ार साल या उससे भी पुराना हो। यहाँ सब लोग इसे जानते हैं। अगर तुम आसपास कहीं खो जाओ तो लोगों से पूछो कि संत माधव देव का पीपल का पेड़ कहाँ है, वह तुम्हें यहाँ का रास्ता दिखा देंगे”, त्री ने समझाया, फ़िर बोला, “आभा और वसंत, तुम लोग अब वापस जाओ।"

आभा बोली, “बाद में जब माधव और तृप्ति जागेंगे, उन्हें साथ ले कर हम लोग यहाँ लौटेंगे।" वह  दोनों पीपल के पेड़ की ओर लौट गये।

त्री, रंगनाथ और गार्गी आगे चले। उन्होंने गाँव के गरीब लोगों जैसे कपड़े पहने थे, जैसे कि एक पिता अपने बच्चों के साथ कहीं जा रहा हो। करीब एक घंटा चल कर वे श्री भोला मन्दिर पहुँचे और वहाँ से मोटरबोट ली जो उन्हें फुलानीबाड़ी के घाट तक ले गयी। त्री उस क्षेत्र में पहले कई बार आ चुका था, इसलिए उसने अपना चेहरा गमछे से ढक लिया था। घाट पर पहुँचने से पहले ही गार्गी ने तीनों की शक्ति-लहरों को ढक लिया।    

फुलानीबाड़ी के घाट से जो रास्ता गाँव की ओर जाता है, वहाँ आगे जा कर पेड़ों के पीछे एक छोटा सा मैदान है, जिसके एक किनारे पर झाड़ियाँ के पीछे एक चबूतरा बना था। वह जगह सड़क से छिपी हुई थी। उस चबूतरे के पीछे जा कर त्री ने उसकी एक ईंट हटा कर दबाया तो उसमें एक छोटा सा गुप्त द्वार खुल गया, जिसमें वह तीनों झुक कर घुस गये।

वहाँ पर एक अन्य सुरंग थी जो नीचे जा रही थी, उसमें घुसने के बाद त्री ने गार्गी से कहा कि वहाँ शक्ति ढकने की आवश्यकता नहीं है।

रंगनाथ बोला, “दादा, हर जगह सुरंगें बनी हैं, इसका मतलब है कि गुरु जी बहुत सालों से इस खतरे का सामना करने के लिए तैयारी कर रहे थे?”

त्री ने धीरे से सिर हिला कर हामी भरी। वह जानता है कि बच्चे समझदार हैं, वह उनसे पूरी बात नहीं छुपा सकता। लेकिन अगर उनमें से कोई उस जापानी याकूज़ा के चँगुल में आ गया तो वह इनके दिमाग में घुस कर सब बातों को जान जायेगा, इसलिए वह उन्हें सब बातें नहीं बताना चाहता।

गार्गी बोली, “वह जापानी आदमी गुरु जी का पीछा क्यों कर रहा है? वह उनसे क्या चाहता है?”

“गुरु जी कोरिया से हैं। वह भी अनाथ थे और उन्हें भी एक बौद्ध भिक्षुक ने पाला था, जो बाद में उनके गुरु बने। उनके गुरु जी का नाम कूवी महाराज था और उनके पास हरिताश्म पत्थर की बनी माँ तारा की एक मूर्ति थी, जिसके प्रभाव से बच्चों की गुप्त-शक्तियाँ विकसित हो जाती हैं। कुछ जापानी लोग उस मूर्ति को पाना चाहते हैं", त्री ने बताया।

“यह हरिताश्म पत्थर क्या होता है?”

“हरिताश्म को अंग्रेज़ी में जेड कहते हैं, यह हरे रंग के संगमरमर जैसा होता है, लेकिन मुलायम होता है। उसकी मालाएँ और गहने भी बनाते हैं।"

“क्या यह पत्थर भारत में मिलता है? हमारे अखाड़े में भी तो हरे रंग की माँ तारा की कई मूर्तियाँ हैं?”

“यह पत्थर भारत में नहीं मिलता", त्री ने बताया, “हमारे उत्तर-पूर्व में एक देश है म्यंमार, उसे पहले बर्मा कहते थे, वहाँ पर हरिताश्म की खानें हैं। लेकिन सुना है कि हमारे मिज़ोराम में, म्यंमार की सीमा के पास भी, शायद यह पत्थर मिलते हैं।"

“इसका मतलब है कि जापानी लोग गुरु जी का चालीस-पैंतालिस सालों से पीछा कर रहे हैं?” रंगनाथ ने पूछा।

गार्गी बोली, “इतने सालों में तकनीकी ने इतनी तरक्की कर ली है, आज तो बहुत से अपराध इंटरनेट के माध्यम से होते हैं। इतने सालों के बाद भी वह लोग इस पुरानी बात के पीछे क्यों पड़े हैं?”

त्री मुस्कराया, बोला, “गुरु जी कहते हैं कि इस बात को यामागुचि नहीं भूल सकता, यह उसके आत्म-सम्मान की बात बन गयी है। तीन बार गुरु जी उसके चँगुल में आये और तीनों बार वह उसे चकमा दे कर भाग गये। आखिरी बार उसने गुरु जी को थाईलैंड में 1996 में खोजा था। उस बात को भी अब तीस साल हो गये। वह पहले वाले यामागुचि तो अब बहुत बूढ़े हो गये हैं, लेकिन उनका पोता है, रिकू यामागुचि, वह अब उनका गैंग चलाता है। शायद वह अपने दादा का अधूरा काम पूरा करना चाहता है।"

“पहले वह लोग गुरु जी को खोज लेते थे, तो वह उन्हें चकमा दे कर वहाँ से भाग कर नयी जगह में छिप जाते थे। लेकिन इस बार वह नहीं भागे, बल्कि उन्होंने समाधी ले ली, क्यों?”, गार्गी का दिमाग बहुत तेज़ है, वह हर अनकही बात को पकड़ लेती है। 

“क्यों कि अब गुरु जी बूढ़े हो रहे हैं, वह डरते हैं कि कहीं उनकी मृत्यु के बाद, यामागुचि के जासूस हमारे पीछे न लग जायें, और हमारे अनाथाश्रम पर हमला कर दें, क्योंकि मैं उनके उत्तराधिकारी हूँ।"

“क्या इसका मतलब है कि अब वह मूर्ति हमारे पास है? वह हमारे अनाथाश्रम में है?” गार्गी ने पूछा।

त्री फ़िर से मुस्कराया, सोचा कि गार्गी से कुछ छुपाना बहुत कठिन है, बोला, “जो मूर्ति गुरु जी कोरिया से लाये थे, कुछ साल पहले वह टूट गयी थी। उन्होंने उस मूर्ति के टुकड़ों को कुछ नयी मूर्तियों में जड़वा दिया है। उसमें से एक नयी मूर्ति हमारे पास, हमारे अनाथाश्रम में भी है।"

यह बातें करते-करते वह तीनों सुरंग को पार करके, वृद्धाश्रम से कुछ दूर, गुरु जी के ज़मीन के नीचे छिपे हुए तहखाने वाले कमरों में पहुँच गये।

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शनिवार, जून 27, 2026

अजेय की कविता में खड़ा आदमी

अजेय की एक प्रसिद्ध कविता है, जो मुझे बहुत अच्छी लगती है। लेकिन जब भी मैं उसे याद करता हूँ तो हर बार उसके एक शब्द पर अटक जाता हूँ। वह शब्द एक क्रिया है, जो मुझे अधूरी लगती है। और उसके अधूरेपन में कुछ ऐसा है जो मुझे बार-बार उस कविता की ओर खींचता है।


वह कविता है:

पहले एक गोरैया होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी इतना ऊँचा उड़ा
कि गोरैया खो गई।
 
पहले एक पहाड़ होता था
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे तन कर खड़ा
कि पहाड़ ढह गया।
 
पहले एक नदी होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे वेग से बहा
कि नदी सो गयी
 
पहले एक पेड़ होता था
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे जोर से झूमा
कि पेड़ सूख गया।
 
पहले एक पृथ्वी होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी इतनी जोर से घूमा
कि पृथ्वी रो पड़ी।
रो पड़ी ...
कि पहले एक आदमी होता था।

इसे पढ़ते हुए जिस क्रिया पर मैं अटक जाता हूँ, वह 'खड़ा' है, पहाड़ वाले अंतरे में। उड़ा, खड़ा, बहा, झूमा और घूमा में मुझे केवल 'खड़ा' वाली बात क्यों अधूरी लगती है? कवि को गिन कर शब्द लिखने होते हैं ताकि कविता की लय बनी रहे और 'खड़ा' को देख कर मैं अपने मन में उसे 'खड़ा हुआ' कर देता हूँ, लेकिन कहीं पर कुछ फँसा रह जाता है।

मैंने हिंदी आठवीं कक्षा तक ही पढ़ी थी, मुझे उसकी व्याकरण और साहित्य का विधिवत पढ़ने-समझने का मौका नहीं मिला था। खड़ा क्यों बाकी क्रियाओं से भिन्न है, शायद आप में से कोई हिन्दी व्याकरण के ज्ञानी मुझे समझा सकते हैं?

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टिप्पणी: पहले मैंने अजेय की जगह इसे अज्ञेय की कविता समझा था, एक सुधी पाठक, अनूप सेठी जी, जो स्वयं जाने माने हिंदी कवि हैं, ने इस गलती के बारे में मुझे बताया। उन्हें इसके लिए दिल से धन्यवाद। 

अजय कुमार "अजेय" की यह कविता (एक आदमी होता था) और अन्य कविताएँ आप कविता-कोष पर भी पढ़ सकते हैं।

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बुधवार, दिसंबर 31, 2025

मध्य-युगीन कृष्ण-भक्ति ब्रज-भाषा काव्य

यह आलेख डॉ. सावित्री सिन्हा की लिखी और 1962 में नेशनल पब्लिशिन्ग हाउज़ द्वारा छापी पुस्तक "ब्रज भाषा के कृष्ण भक्ति काव्य में अभिव्यंजना शिल्प" की भूमिका का एक अंश है। आप चाहें तो इस पूरे आलेख को कल्पना पर पढ़ सकते हैं या पीडीएफ में डाउनलोड कर सकते हैं।

डॉ. सावित्री सिन्हा ने यह पुस्तक अपने माता-पिता (और मेरे दादा-दादी द्वारकाप्रसाद और जयदेवी) को इन शब्दों के साथ समर्पित की थी: "स्वर्गीय पिता जी की आंसूभरी, धूमिल बाल-स्मृतियों को तथा मां के असीम साहस, धैर्य, त्याग और वात्सल्य को"

मध्य युगीन कृष्ण-भक्ति ब्रज-भाषा काव्य - डॉ. सावित्री सिन्हा

 

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सूरदास से पूर्व कृष्ण-भक्ति काव्य में अभिव्यंजना-शिल्प की स्थिति - एक विहंगावलोकन

डॉ. शिवप्रसाद सिंह के शोध के फलस्वरूप अभी हाल में ही सूरदास के समय से पहले का ब्रजभाषा काव्य प्रकाश में आया है। 'सूर-पूर्व ब्रजभाषा और उसका साहित्य' नामक उनके शोध-प्रबंध में उपलब्ध साहित्य के व्यख्यान के साथ ही कुछ अनुपलब्ध साहित्य भी प्रकाश में लाया गया है और सूरदास से पहले ब्रजभाषा कवियों के अस्तित्व को सिद्ध करने का प्रयास किया गया है। नामदेव, कबीर और रैदास की अनुभूतिपरक रचनाओं को लेखक ने कृष्ण-भक्ति काव्य के विकास का एक सोपान माना है। इस निर्णय को स्वीकार करने के पक्ष और विपक्ष दोनों ही ओर से अनेक तर्क दिये जा सकते हैं। परन्तु यह प्रश्न यहां पर अप्रासंगिक है।

संतमत के कवियों के अतिरिक्त उन्होंने कृष्ण-भक्ति काव्य के विकास में संगीतकार कवियों का महत्वपूर्ण योग स्वीकार किया है। उनके शब्दों में, “संगीतज्ञ कवियों ने न केवल अपनी स्वर-साधना से भाषा को परिष्कार और मधुर अभिव्यंजना प्रदान की, तथा अप्रतिम नाद-सौंदर्य से कविता को अधिक दीर्घयुगी बनाया परन्तु अपनी सम्पूर्ण संगीत-प्रतिभा को आराध्य कृष्ण के चरणों पर लुटा भी दिया। गोपाल नायक और बैजू बावरा के पदों में आत्मनिवेदन, गोपी-प्रेम और भक्ति के विविध पक्षों का बड़ा ही विशद और मार्मिक चित्रण हुआ है। गोपाल नायक के एक पद में रास का चित्रण इस प्रकार मिलता है -

कांधे कामरी गो आलाप के नाचे जमुना तीर, नाचे जमुना तीर

पीछे रे पांवरे लेती नाचि लोई मांगवा --

भुव आलि मृदंग बांसुरी बजावै गोपाल वैन वतरस ले आनन्द। (राग कल्पद्रुम)

बैजू बावरा का उल्लेख भी इस प्रसंग में किया गया है तथा राग कल्पद्रुम में संकलित उनके पदों के आधार पर उन्हें ब्रजभाषा का कवि सिद्ध किया गया है। राग कल्पद्रुम की यह रचनायें शुद्ध ब्रजभाषा में हैं -

आंगन भीर भई ब्रजपति के आज नन्द महोत्सव आनन्द भयो।

हरद दूब दधि अक्षत रोरी ले छिरकत परस्पर गावत मंगलचार नयो।

ब्रह्मा ईस नारद सुर नर मुनि हरषित विमानन पुष्प बरस रंग ठयो।

धन धन बैजू संतन हित प्रकट नन्द जसोदा ये सुख जो दयो। (राग कल्पद्रुम)

इन दोनों ही कवियों की रचनाओं में निहित संगीत तत्व परवर्ती कृष्ण-भक्त कवियों की संगीत-साधना की पृष्ठभूमि से जान पड़ते हैं, परन्तु जहां तक अभिव्यंजना शैली का प्रश्न है यह रचनायें परवर्ती रचनओं के सामने पासंग भर भी नहीं ठहरतीं।

इन रचनाओं के अतिरिक्त शोधकर्ता ने निम्नलिखित ७ अप्रकाशित पुस्तकों का परिचय-परीक्षण भी प्रस्तुत किया है - अग्रवाल कवि की प्रद्युमनचरित; विष्णुदास की महाभारत कथा, स्वर्गारोहड़, रुक्मिणी मंगल, स्वर्गारोहड़ पर्व और स्नेह लीला; थेघ नाथ की गीता भाषा।

कृष्णभक्ति सम्बंधी अप्रकाशित ग्रंथों को लेखक ने जिस रूप में हमारे सामने रखा है, उसे उसी रूप में स्वीकार कर लेने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं है। उनके मतों को उद्धृत करके विषय-विस्तार करने से कुछ लाभ नहीं होगा। जो कुछ भी सामग्री प्रकाश में आयी है उसके अध्ययन द्वारा ये निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं -

तत्कालीन ब्रजभाषा के दो रूप थे (१) अपभ्रंश मिश्रित ब्रजभाषा (२) तद्भव प्रधान ब्रजभाषा। संस्कृति के तत्सम शब्दों के प्रयोग द्वारा तत्कालीन ब्रजभाषा का रूप परिनिष्ठित नहीं हो पाया था। प्रथम कोटि की भाषा के उदाहरण के रूप में डूंगर कवि की एक रचना उद्धृत की जा रही है -

ऋतु बसंत उलहणी विविह वणराय फलह सहू।

कंटक विकट करीर पंत पिकखंत किंपि नहु।

धाराहर वर धवल बारि वरसंत घनघोर वन।

कुरलतंउ मूल मंत्री सर्प नहीम मानहिं दुर्जन।

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औषधि मूल मंत्री सर्प नहिं मानहिं दुर्जन।

सर्प डसी वेदना एही दिट्ठइ हुई, गुंजन।

लागइ दोष अनन्त कियइ संसर्ग एनि परि।

तवडी जल हरइ घड़ी पीटियइ सुफल्लरि।

द्वितीय कोटि के उदाहरण के रूप में विष्णुदास रचित 'सनेह लीला' की ये पंक्तियां ली जा सकती हैं -

महलन मोहन करत विलास।

कहां मोहन कहां रमन रानी और कोऊ नहिं पास।

रुकमन चरन सिरावत पिय के पूजी मन की आस।

जो चाहे थी सो अब पायो हरि पति देवकी सास।

तुम बिन और कौन थो मेरौ धरति पताल आकास।

पल सुमिरन करत तिहारौ ससि पूस परगास।

इन कवियों की रचनाओं में प्रबुद्ध कला-चेतना का पूर्ण अभाव है। अभिव्यंजना-शैली की दृष्टि से ये अत्यंत साधारण कोटि की रचनायें हैं। उनकी शैली अधिकतर वर्णनात्मक और विवरणात्मक है। अप्रस्तुत योजना, लक्षित चित्र-योजना, वाग्वैदग्घय आदि तत्व बहुत ही कम हैं।

विषय-वस्तु के क्षेत्र में कुछ ऎसे तत्व अवश्य मिलते हैं जिन्हें परवर्ती कृष्ण-भक्ति काव्य का पूर्वाभास कहा जा सकता है। यह प्रभाव मुख्य रूप से दो क्षेत्रों में दिखाई पड़ता है: (१) लोक संस्कृति के चित्रण में (२) शास्त्रीय संगीत के समावेश में।

गोस्वामी विष्णुदास रचित रुक्मणि मंगल की ये पंक्तियां प्रथम वर्ग के उदाहरण के रूप में ली जा सकती हैं:

मोतियन चौक पुराय के कियौ आरती माय।

अति आनन्द भयौ है नगर में घर घर मंगल साजै।

मनमोहन प्रभु ब्याह कर आये पुरी द्वारका राजै।

अंगन तन में भूषन पहिने सब मिलि करत समाज।

बाजै बाजन कानन सुनियत, नौबत घन ज्यूं बाज।

नर नारिन मिलि देत बधाई सुख उपजै दुखभाज।

नाचत गावत मृदंग बाजत रंग बसावत आज।।

दूसरे वर्ग की रचनाओं के अन्तर्गत गोपाल नायक और बैजू बावरा की रचनायें रखी जा सकती हैं। डॉ. सिंह ने इन रचनाओं को काव्य-कल्पद्रुम से संकलित किया है। संगीत कला के क्षेत्र में इस ग्रंथ का महत्वपूर्ण स्थान है परन्तु भाषा और साहित्य की दृष्टि से उसमें संकलित पदों को प्रमाणिक माना जा सकता है या नहीं यह प्रश्न विवादरहित नहीं है। यदि उन्हें प्रमाणिक मान लिया जाये तो गोपाल नायक और बैजू बावरा के पदों को परवर्ती कृष्ण-भक्त कवियों के ध्रुपद शैली में रचित पदों का पूर्वरूप माना जा सकता है। शास्त्रीय संगीत के तत्वों का उल्लेख तथा ध्रुपद शैली के अनुकूल पद-योजना इन रचनाओं में प्राप्त होती है -

सप्त स्वर तीन ग्राम इकइस मूर्छन बाइस सुर्त

उनचास कोट ताल लाग डाट

गोपाल नायक हो सब लायक आहत अनाहत शब्द,

सो ध्यायो नाद ईश्वर बसे मो घाट

तथा

मार्ग देसी कर मूर्छना गुन उपजे मति सिद्ध गुरु साध चावै।

सो पंचम मघ दर पावै।

बैजू बावरा के पदों की योजना भी ध्रपुद शैली की श्वास-साधना के निमित्त की हुई जान पड़ती है:

बोलियो न डोलियो ले आऊं हूं प्यारी को,

सुन हौ सुघर वर अब हीं पै जाऊं हूं।

मानिनि मनाय के तिहारे पाय ल्याय के,

मधुर बुलाय के तो चरण गहाऊं हूं।

सुन री सुंदर नारि काहे करत एति रार,

मदन डारत पार चलत पल तुझाऊं हूं।

मेरी सीख मान कर मान न करो तुम,

हे जु प्रभु प्यारे सो बहियां गहाऊं हूं।

बधाई के लोक-गीत भी उनके नाम से प्राप्त होते हैं:

आंगन भीर भई ब्रजपति के आज नन्द महोत्वस आनन्द भयौ।

हरद दूब दघि अक्षत रोरी ले छिरकत परस्पर गावत मंगलचार नयो।

ब्रह्मा ईस नारद सुर नर मुनि हरषित विमानन पुष्प बरस रंग ठयो।

धन धन बैजू संतन हित प्रकट नन्द जसोदा ये सुख जो दयो।

अधिकतर कवियों ने दोहा, चोपाई और छप्पय का प्रयोग किया है। कुछ पदों के ऊपर गौरी, धनाश्री और पूर्वी रागों का उल्लेख भी हुआ है।

इस सामग्री के अध्ययन के उपरान्त सूरदास से पूर्व ब्रज-भाषा काव्य के अस्तित्व की स्वीकृति में आचार्य शुक्ल का अनुमान आंशिक रूप में ही सत्य माना जा सकता है। सूरदास के काव्य-सौष्ठव पर विचार करते हुए आचार्य शुक्ल ने कहा था, ‘इन पदों के सम्बंध में सबसे पहली बात ध्यान देने की यह है कि चलती हुई ब्रजभाषा में सबसे पहली साहित्यिक रचना होने पर भी ये इतनी सुडोल और परिमार्जित है, यह रचना इतनी प्रगल्भ और काव्यांग-पूर्ण है कि आगे होने वाले कवियों की उक्तियां सूर की जूठी सी जान पड़ती हैं। अत: सूर-सागर किसी चली आती हुई गीति काव्य परम्परा का - चाहे वह मौखिक ही रही हो - पूर्ण विकास सा प्रतीत होता है।"

इन कृतियों के प्रकाश में आने पर भी कलाकार के रूप में सूर अपने पूर्व-स्थान पर ही शोभित हैं। इस काल के दर्जन कवियों में से एक भी ऎसा नहीं है जो अष्टछाप के अन्य कवियों के समकक्ष खड़ा रह सके, सूरदास तो दूर की बात है। जहां तक पूर्व-परम्परा की स्थापना का प्रश्न है यह तथ्य उसी रूप में स्वीकार किया जा सकता है जैसे हम यह कहें कि छायावादी कविता के बीज द्विवेदी-युग की रचनाओं में भी पाये जाते हैं।

सूर-पूर्व ब्रजभाषा काव्य में गीति-काव्य की मौखिक परम्परा भी स्थापित की जा सकती है, ब्रजभाषा का अस्तित्व भी माना जा सकता है पर उसमें कला-सौष्ठव का कोई ऎसा आधार नहीं मिलता जिसके कारण यह कहा जा सके कि सूरदास के पदों की प्रगल्भता और काव्यांगपूर्णता को कोई पूर्व आधार हिन्दी जगत् में विद्यमान था। कला के क्षेत्र में नये मार्गों का उद्घाटन सूरदास, नन्ददास और उनके समकालीन भक्तों ने ही किया। उनकी कला-चेतना का प्रादुर्भाव तत्कालीन परिस्थितियों के फलस्वरूप हुआ था। कला के पुनुर्त्थान युग में उनकी प्रतिभा प्रस्फुटित हो कर विकसित हुई। उत्तराधिकार रूप में उन्हें जो परम्परा प्राप्त हुई थी वह पूर्ण अविकसित थी, भाव, भाषा, शैली, किसी भी दृष्टि से मध्यकालीन कृष्ण-भक्त कवियों पर उनका ऋण नहीं स्वीकार किया जा सकता।

कृष्ण-काव्य परम्परा के विकास का संक्षिप्त परिचय

कृष्ण-काव्य परम्परा के विकास का प्रमुख श्रेय आचार्य वल्लभ और उनके पुत्र विट्ठलदास जी को है। आचार्य वल्लभ द्वारा प्रवर्तित 'पुष्टि मार्ग' को आधार बना कर श्री विट्ठलदास द्वारा स्थापित अष्टछाप के कवियों ने हिन्दी में अमर कृष्ण-भक्ति-काव्य की रचना की। पुष्टि मार्ग की अनुभूति मूलक साधना के कारण इन कवियों ने कृष्ण के व्यक्तित्व के लीला-प्रधान अंशों को ही ग्रहण किया है। राजनीतिज्ञ कृष्ण उनके आलम्बन नहीं हैं। कृष्ण के व्यक्तित्व में उन्होंने शक्ति के साथ माधुर्य और प्रेम का समन्वय कर दिया। अलौकिक आलम्बन में सहज और मधुर मानव का आरोपण उन्होंने जिस मनोवैज्ञानिक कौशल से किया है उसमें सार्वभौम उपादानों का समावेश हुआ है।

ऎतिहासिक क्रम से अष्टछाप के कवियों का उल्लेख इस प्रकार है - कुभंनदास, सूरदास, परमानन्ददास, कृष्णदास, नन्ददास, चतुर्भुजदास, छीतस्वामी और गोविन्दस्वामी। सूरदास प्रधान रूप से वात्सल्य और शृंगार रस के कवि हैं, परमानन्द जी के काव्य में वात्सल्य का अनुपात महत्वपूर्ण है। अन्य कवियों की रचनाओं में श्रंगार रस का ही प्राधान्य है, उसमें वात्सल्य तो है ही नहीं या अत्यंत गौणरूप में प्रयुक्त है। इन सभी के प्रतिपाद्य में साहित्यकता, पार्थिव अनुभूतियों और आध्यात्मिकता का सुंदर सामन्जस्य मिलता है। विभिन्न कवियों के व्यक्तित्व के अनुसार तीनों तत्वों का अनुपात उनकी रचनाओं में भिन्न-भिन्न है। साहित्यिक महत्व की दृष्टि से सूरदास के बाद नन्ददास का नाम आता है। उनकी अभिव्यंजना में सचेष्ट कलाकार का शिल्प है।

पूर्वमध्यकाल के इन पुष्टिमार्गी कवियों के बाद परिमाण और गुण दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण योग राधावल्लभ सम्प्रदाय के आचार्य हितहरिवंश तथा उनके शिष्यों और अनुयायियों ने दिया। राधावल्लभ सम्प्रदाय की उपासना पद्धति अन्य सम्प्रदायों से भिन्न थी। इस मत के सिद्धांतों के अनुसार राधा ही परम इष्ट हैं और कृष्ण की मान्यता इसीलिए है कि वह राधा के प्रियतम हैं। वे इष्ट नहीं हैं। भक्तजन राधा की सखी रूप में होते हैं। वे सखी रूप में उनके साथ परकीया गोपियों के समान स्वतंत्र रूप से सम्बंध स्थापित नहीं करते और न राधा के प्रति उनका सपत्नि भाव होता है। इस सम्प्रदाय में हितहरिवंश के अतिरिक्त ध्रुवदास की कला का महत्वपूर्ण स्थान है।

किसी विशिष्ठ सम्प्रदाय के बंधनों से मुक्त मतवाली मीरा और रसखान की रचनाओं का भी पूर्व-मध्यकालीन कृष्ण-भक्ति साहित्य में बड़ा महत्व है। मीराबाई द्वारा रचित कई ग्रंथों का उल्लेख प्राप्त होता है। नरसी का मायरा, गीत-गोविन्द की टीका, पद तथा गर्व गीत उनकी प्रमुख रचनायें मानी जाती हैं। उनका साहित्य और उसका स्वरूप दोनों ही संदिग्ध हैं। उनके काव्य में गिरधरगोपाल के प्रति उनकी आकुल भावनायें विर्बाध रूप से व्यक्त हुई हैं। जहां भावनायें उन्मुक्त हुईं, आकांक्षायें उच्छृंखल हो कर असंयत हो जाती हैं पर मीरा के काव्य की सबसे बड़ी सफलता यही है कि भावनाओं की निर्बाधता में असंयत और अनियंत्रित श्रृंगार की स्थूलताओं का समावेश नहीं होने पाया है। उनकी कला का एक अपूर्व ही सौंदर्य है जो कला सम्बंधी परिपक्वताओं से वंचित रहने पर भी पूर्ण है।

मुसलमान कृष्ण-भक्त कवि रसखान का नाम इस परम्परा में अमर है। उनके व्यक्तित्व में प्रधान प्रेम-तत्व ने लौकिक आलम्बन के अस्थायित्व के कारण अलौकिक कृष्ण का सहारा लिया और उनकी भावनायें भक्त हृदय के सुंदर उद्गारों के रूप में व्यक्त हो उठीं। भावानाओ की तीव्रता और उत्कटता के साथ ही साथ उनके काव्य का कलापक्ष भी प्रौढ़ और सबल है। 'प्रेम वाटिका' और 'सुजान रस सागर' उनके दो छोटे-छोटे ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं।

उत्तर-मध्य काल में भी कृष्ण-काव्य परम्परा विभिन्न सम्प्रदायों के संरक्षण में पल्लवित और पुष्पित होती रही। पूर्व-मध्य काल (भक्तिकाल) में कृष्ण-भक्ति-पद्धति में नैसर्गिक आलम्बन के प्रति मानवीय भावनाओं का जो उन्नयन हुआ उसमें राग और साधना का अपूर्व सामंजस्य था। इस परम्परा में रागतत्व के प्राधान्य के कारण ही १९वीं शती तक भक्ति-युग की परिष्कृत माधुर्य भावना लौकिकता में रंजित होने लगी। उत्तर-मध्य कालीन कृष्ण-काव्य परम्परा में आलम्बन और साधना दोनों पक्षों में अपार्थिव अंश केवल नाम-मात्र को ही शेष रह गया।

रीतिकालीन कृष्ण-भक्ति काव्य में श्रृंगारिक तत्वों का इतना प्राधान्य हो गया कि उसके फलस्वरूप ब्रह्मा की असीमता भी मानवीय क्रिया-कलापों में लिपट कर रह गई। साहित्य की रूढ़ परम्पराओं के अनुसार 'ब्रह्मा की प्रेमिकाओं' पर भी नायिका-भेद के विविध रूपों का आरोपण किया गया। हिन्दी काव्य जगत् में सतरहवीं शताब्दी के उपरान्त कृष्ण और गोपिकाओं के नाम पर श्रृंगारपरक ऎहिक भावनाओं की अभिव्यक्ति प्रधान हो उठी।

उत्तर-मध्य काल में वल्लभ सम्प्रदाय का कोई उल्लेखनीय कवि नहीं हुआ। केवल ब्रजवासीदास ने सूरसागर के आधार पर अपने ग्रंथ 'ब्रजविलास' की रचना की। राधावल्लभ सम्प्रदाय के हित वृंदावनदास ने 'लाड़ सागर' और 'ब्रज प्रेमानन्द सागर' ग्रंथों की रचना की। इसके अतिरिक्त निम्बार्क सम्प्रदाय के घनानन्द, नागरीदास, हठी जी, भगवत रसिक जी, रूप रसिक जी, सहचरिशरण ने कृष्ण-भक्ति सम्बन्धी रचनायें लिखीं, जिनमें उस युग की काव्य-चेतना की स्मस्त विशेषताओं का समावेश हो गया है।

प्रतिपाद्य के प्रति उनके दृष्टिकोण और उनकी अभिव्यंजना-कला का विवेचन आगामी अध्यायों में किया जायेगा।

आधुनिक काल नये संदेशों और नये जीवन-दर्शन से युक्त सामने आया। मध्यकालीन सामन्तीय व्यवस्था बीत चुकी थी। बौद्धिक जागरण और विज्ञान के इस युग में धार्मिकता और विशेषकर उपास्य के प्रति रागात्मक वृत्ति के उन्नयन को अंध-विश्वास और रूढ़िवादिता का नाम दिया गया। उत्तर-मध्य काल में कृष्ण-भक्ति में निहित श्रृंगार तत्व ने लौकिक श्रृंगार का रूप धारण कर लिया था, आधुनिक काल में केवल उसका अंधकार पक्ष ही अवशिष्ट रह गया। भक्ति के नाम पर भ्रष्टाचार, अंधविश्वास और पाखंड ने तत्कालीन सुधारवादी और बौद्धिक प्रवृत्तियों को अपने विरुद्ध आवाज़ उठाने की चुनौती दी। सूक्ष्म रागात्मक प्रवृत्तियों का आश्रित भक्ति बौद्धिक और ऎहिक जीवन-दर्शन के भार के नीचे दब गई। उसकी विकृति ही शेष रह गई।

मध्यकाल में भक्ति ने एक आंदोलन का रूप ग्रहण किया था। वह जनता के व्यक्तिगत और समष्टिगत संघर्षों और समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने आई थी। आधुनिक काल में उसका क्षेत्र 'व्यक्ति' की सीमा में ही संकीर्ण हो गया। परिवार के संसर्ग और वैयक्तिक संस्कार इत्यादि कारणों से 'धर्म' तत्व एक संकीर्ण दायरे में ही शेष रह गया। भारतेन्दु हरीशचन्द्र, जगन्नाथदास रत्नाकर, सत्यनारायण कविरत्न इत्यादि कवियों ने कृष्ण-भक्ति काव्य की रचना की जिसकी प्रेरणा स्थूल रूप में तीन प्रकार की मानी सकती है - (१) परम्परा-पालक (२) कृष्ण-चरित के गान द्वारा प्राचीन गौरव की स्थापना तथा (३) वैयक्तिक संस्कारजन्य आस्था। वल्लभाचार्य के शिष्यों द्वारा प्रवर्तित कृष्ण-काव्य परम्परा उत्थान और पतन के विविध सोपानों पर चढ़ती-गिरती आधुनिक काल तक चली आई। वल्लभ सम्प्रदाय के ही निष्ठावान भक्त भारतेन्दु हरीशचन्द्र ने उनमें पुन: माधुर्य-भक्ति की परिष्कृति और सूक्ष्मता के समावेश का प्रयत्न किया, परन्तु अब इस प्रकार की भक्ति का समय बीत चुका था, देश के सामने यथार्थ नग्न मुँह बाये खड़ा था, पाश्चात्य देशों का बुद्धिवाद भारत की आध्यात्मिकता को चुनौती दे रहा था, जिसके सूक्ष्म तन्तु बाह्य स्थूलताओं के सामने हार मान चुके थे। साहित्य में व्यवहारिक भाषा के अभाव के फलस्वरूप ब्रजभाषा का स्थान खड़ी-बोली ले रही थी, ऎसी स्थिति में ब्रजनायक से सम्बद्ध काव्य-परम्परा और ब्रजभाषा दोनों के विकास का मार्ग अवरुद्ध हो गया।

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रविवार, सितंबर 14, 2025

शब्दों की हिंसा

कुछ दिन पहले भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने टीवी के प्रोग्राम वाले श्री समय रैना और अन्य विदूषकों को आदेश दिया कि वे अपने कार्यक्रम में विकलांग और बीमार व्यक्तियों की खिल्ली उड़ाने के लिए उनसे क्षमा माँगें।

हर भाषा में कमज़ोर, अल्पसंख्यक, नीचे देखे-माने जाने वाले समुदायों के व्यक्तियों के लिए ऐसे शब्द होते हैं जिनसे उनकी कमज़ोर तथा अवाँछनीय सामाजिक स्थिति पर ज़ोर दिया जाता है। वैश्या, अँधा, बहरा, लूला, अछूत, गँवार, पागल जैसे शब्द इनके कुछ उदाहरण हैं।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद १९४८ में संयुक्त राष्ट्र संघ ने सार्वभौमिक मानव अधिकारों के घोषणापत्र को अपनाया। उसके बाद से विभिन्न वंचित समुदायों ने शब्दों की हिंसा के बारे में बात करनी शुरु की और कहा कि उनके लिए नये शब्द होने चाहिए जिनसे उनकी मानव अस्मिता को स्वीकारा जाये और उनकी छवि सकारात्मक बने।

लेकिन यह संघर्ष बहुत पहले से चल रहे थे। जैसे कि गाँधीजी ने "हरिजन" शब्द का प्रयोग १९३२ में किया था क्योंकि वह सोचते थे कि अछूत की जगह हरिजन कहने से अस्पृश्यता निवारण में मदद मिलेगी।

लेकिन केवल भाषा बदलने से व्यक्तियों की स्थिति नहीं सुधरती और कई बार, समय के साथ नये शब्द भी नकारात्मक बन जाते हैं। जैसे कि समय के साथ 'हरिजन' शब्द के बदले 'दलित' शब्द का उपयोग बेहतर माना गया, जबकि आजकल कुछ लोग भीमटा या भीमवादी शब्द का प्रयोग भी करते हैं।

इस तरह के समय के साथ नये शब्दों के नकारात्मक बदलाव एक अन्य उदाहरण है मन्दबुद्धि बच्चों के लिए अंग्रेज़ी में पहले 'इम्बेसाईल' (नासमझ) शब्द का प्रयोग होता था, उसे बदल कर 'ईडियट' (बेवकूफ) किया गया, फ़िर जब ईडियट शब्द को बुरा माना गया तो 'लो इटेलिजैंस' (मन्द बुद्धि), 'इटेलेक्चुअल डिसएबिल्टी' (मानसिक विकलाँता) जैसे शब्द खोजे गये। आजकल इन सभी शब्दों का प्रयोग न करने के लिए कहते हैं और उनकी जगह पर 'लर्निन्ग डिसएबिल्टी' (सीखने की विकलाँगता)  शब्द का प्रयोग करने के लिए कहते हैं। (नीचे की छवि इसी विषय पर हुई मंगोलिया में एक मीटिन्ग से है)

विकलाँगता के सही शब्द कौन से हों, मंगोलिया की मिटिन्ग - छवि डॉ. सुनील दीपक की

  

शब्दों के बदलाव में जिस समुदाय की बात हो रही हो, उसके लोग स्वयं अपने लिए शब्द चुनना पसंद करते हैं। जैसे कि कुछ वर्ष पहले भारत सरकार ने 'विकलाँग' के बदले 'दिव्याँग' शब्द का प्रयोग रखा, लेकिन बहुत से विकलाँग व्यक्तियों ने इस नये शब्द का विरोध किया है।

शब्दों से जुड़ी हिंसा की बहसें सबसे अधिक अंग्रेज़ी भाषा के शब्दों के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, विषेशकर संयुक्त राष्ट्र संघ के स्तर पर होती हैं कि अंतर्राष्ट्रीय घोषणापत्रों और समझौतों में कौन से शब्दों का प्रयोग होना चाहिये। कई बार मुझे लगता है कि सालों तक इन बहसों में लड़ने-झगड़ने वाले लोगों को अपने आप को बड़ा एक्टिविस्ट दिखाने और बढ़-चढ़ कर बोलने में अधिक दिलचस्पी होती है, जबकि उनके देशों में गाँवों-शहरों में रहने वाले लोगों को इस सबसे कुछ फायदा नहीं होता क्योंकि इन बहसों का उनकी अपनी भाषाओ में कुछ सार्थिकता नहीं होती।

जैसे कि विकलांगों के सम्बंध में मैंने सालों तक 'डिसएब्लड पर्सन' (विकलाँग व्यक्ति) और 'पर्सन विद डिसएबिलिटी' (व्यक्ति जो विकलाँग है) में से कौन सा शब्द बेहतर है इस पर हज़ारों अंतर्राष्ट्रीय बहसें देखी हैं। अंत में यह फैसला हुआ कि 'पर्सन विद डिसएबिल्टी' का प्रयोग होना चाहिेये क्योंकि इसमें पर्सन (व्यक्ति) शब्द पहले आता है, जिससे उसकी विकलाँगता को नहीं बल्कि उसके व्यक्ति होने को अधिक महत्व देते हैं। आज अगर आप किसी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में गलती से 'डिसएब्लड पर्सन' बोल दें तो कुछ लोग बहुत क्रोधित हो जाते हैं, आप को निकालने की धमकियाँ देते हैं।

मैं सोचता हूँ कि इस सारी बहस का हमारे देशों में रहने वाले लाखों विकलाँग व्यक्तियों पर क्या असर पड़ता है? कितने हिंदी बोलने वाले, 'विकलाँग व्यक्ति' के बदले में 'व्यक्ति जो विकलाँग हैं' बोलना चाहेंगे?

मेरे विचार में भाषाओं में हिंसा होती है, क्योंकि समाजों में हिँसा होती है और भाषाएँ समाजों के प्रतिबिम्ब होती हैं। समाज की हिंसा से लड़े बिना, भाषा की हिंसा से लड़ने का क्या फायदा है?

मेरे विचार में व्यक्तियों को नीचा दिखाने वाले शब्दों को बदलने का पहला कदम उन व्यक्तियों की आत्मचेतना है जिससे उन्हें अपनी स्थिति की समझ आये, वह स्वयं उस शब्द को अस्वीकार करें। यह पहला कदम आसान नहीं है क्योंकि हम जिन समाजों में पलते और बड़े होते हैं, वह बचपन से हमारी सोच को प्रभावित करता है। बचपन से अपने लिए सुनी नकारत्मक बातें हमारे भीतर घर बना कर रहती हैं, हम खुद अपने आप को नीचा, कमज़ोर, मानने लगते हैं। 

इसका दूसरा कदम है कि अपने लिए नया शब्द चुनना और उसके लिए लड़ना, लेकिन वह केवल शब्द बदलने की लड़ाई नहीं होती। उसके साथ एक दूसरी बड़ी लड़ाई भी होती है जिसमें वह अपनी सामाजिक स्थिति के बदलाव तथा उत्थान के लिए भी लड़ते हैं। 

अगर आप किसी ऐसे समुदाय से हैं जिनके लिए नकारात्मक शब्दों का प्रयोग होता है, तो आप इस बारे में अपनी राय टिप्पणी के माध्यम से अवश्य दें कि आप  इस विषय में क्या सोचते हैं और आप का व्यक्तिगत अनुभव क्या बताता है? 

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बुधवार, जून 11, 2025

लेखक की दुविधाएँ

बारह ड्राफ्ट के बाद, मेरा दूसरा उपन्यास लगभग तैयार है। इसे आज से इक्कीस साल पहले अंग्रेज़ी में लिखना शुरु किया था और तब इसमें कहानी थी एक नवयुवक की जो दिल्ली में अपनी नानी के पास बड़ा हुआ है और जिसने बचपन से सुना है कि उसके माता-पिता की विदेश में मृत्यु हो गई थी। 

समय के साथ, बार-बार लिखने से इसके कथानक में कुछ बदलाव आये हैं। जैसे कि नवयुवक के बदले, यह बीसवीं सदी के प्रारम्भ की उसकी नानी की कहानी बन गई है, जिसकी पृष्ठभूमि में आसाम के चाय बागान में काम करने वाली एक गिरमिटिया युवती की कहानी भी है। इस उपन्यास की कहानी सुन कर नीचे वाला कवर मेरी मित्र विमला दीपक ने बना कर दिया है।

इस आलेख के माध्यम से मैं आप से सलाह माँगना चाहता हूँ कि अगर मुझे लेखन से पैसा कमाने की आवश्यकता न हो, तो क्या उपन्यास को किसी प्रकाशक से छपवाना महत्वपूर्ण है या उसे अमेज़न जैसे आनलाईन पोर्टल से छपवाना भी चल सकता है?

मेरे फेसबुक मित्रों में बहुत से अनुभवी लेखक हैं, मैंने पहले सोचा कि उन्हें सीधा लिख कर सलाह माँगनी चाहिये, फ़िर मुझे लगा कि ऐसा करना ठीक नहीं होगा, क्योंकि कोई जब मेरे साथ ऐसा करता है तो मुझे अच्छा नहीं लगता, जबरदस्ती सी लगती है।  इसलिए सोचा कि इसके बारे में ब्लाग पर लिखूँ।

उपन्यास लिखने की यात्रा

इक्कीस साल पहले लिखा उपन्यास अधूरा था। उसके बाद, कई बार इस उपन्यास को लिखने की कोशिशें कीं लेकिन हर बार यह अधूरा ही रह जाता था।

तब मैं अपने आप से कहता था कि जब रिटायर होऊँगा, तब इसे लिखूँगा। रिटायर हुए भी सात-आठ साल बीत गये, लेकिन मेरा काम और यात्राएँ समाप्त नहीं हुईं। दो-ढाई साल पहले दो ऐसी बातें हुईं जिनसे मुझे लगा कि अगर सचमुच मैं अपने उपन्यास को लिखना चाहता हूँ तो मुझे बाकी के सब काम छोड़ने पड़ेंगे।

पहली बात काम से जुड़ी थी। मुझे एक देश में विकलांगों के लिए नई स्वास्थ्य सेवाओं को लागू करने का बड़ा काँट्रेक्ट मिला था, जिसके लिए तीन साल तक मैंने बहुत मेहनत की। मेरा काम पूरा हुआ लेकिन उस देश में चुनावों के बाद नयी सरकार आयी, तो उन्होंने हमारे सारे काम को रोक दिया क्योंकि उनकी दृष्टि में वह काम महत्वपूर्ण नहीं था। मुझे लगा कि मैंने जीवन के तीन साल बेकार कर दिये, मैंने पैसा कमाया पर मेहनत का कुछ फायदा नहीं हुआ।

दूसरी बात मेरे अपने स्वास्थ्य से जुड़ी थी। मेरी आँखों में रेटिना में घाव हो गये जिनसे दिखना कम हो गया और डर था कि वह घाव बढ़ेंगे तो लिखना-पढ़ना पूरा बन्द हो जायेगा। सौभाग्य से अभी तक वह घाव जैसे थे वैसे ही हैं, बढ़े नहीं हैं, इसलिए दिखता कुछ कम है लेकिन मेरा लिखना-पढ़ना जारी है।

इसलिए मैंने फैसला किया कि अब उपन्यास पूरे करने पर ही ध्यान दूँगा और हिन्दी में लिखूँगा। इस तरह से मैंने २०२३ में अपना पहला उपन्यास पूरा किया था। मित्र अरविंद मोहन जी की सहायता से दिल्ली के एक प्रकाशक ने दो साल पहले उसे छापने के लिए स्वीकार भी किया था, लेकिन पता नहीं कब छपेगा। अब मेरा दूसरा उपन्यास भी लगभग तैयार है।

मन की दुविधाएँ

मैं चाहता हूँ कि अधिक से अधिक लोग मेरे लिखे को पढ़ें, लेकिन मैं इन किताबों से कुछ कमाना नहीं चाहता। तो क्या मुझे अपने उपन्यास को प्रकाशकों के पास भेजना चाहिए? मुझे चिंता है कि प्रकाशक निर्णय लेने में कई महीने लगायेंगे और फ़िर छापने में न जाने कितने साल निकाल देंगे।

क्या इसे सीधा अमेज़न या उसके जैसे किसे भारतीय पोर्टल पर मुफ्त देना बेहतर नहीं होगा, ताकि जो इसे ईबुक रूप में पढ़ना चाहते हैं वह इसे मुफ्त डाउनलोड करें और अगर कोई छपी हुई किताब पढ़ना चाहे तो वह इसकी छपाई की कीमत दे कर छपवा ले? जिन्हें अनुभव है वह बतायें कि किस पोर्टल पर डालना बेहतर होगा?

उपन्यास पढ़ना चाहने वाले

अगर आप मेरे उपन्यास को ई-बुक या पीडीएफ रूप में पढ़ना चाहते हैं तो मुझे ईमेल भेजिये, मेरा पता है sunil(at)kalpana.it (ईमेल भेजते समय '(at)' के बदले में '@' लगा दीजिये)। अगर आप उसे पढ़ कर उसके बारे में अपनी आलोचना या सुझाव देंगे तो मुझे और भी अच्छा लगेगा। 

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सोमवार, दिसंबर 30, 2024

इंदो-अमरीकी लेखिका सोमा वीरा

कभी-कभी जीवन आप को बरसों पुरानी, एक पुरानी भूली-बिसरी याद के सामने ला कर खड़ा देता है, और आप चकित रह जाते हैं। मुझे कुछ ऐसा ही लगा जब अचानक एक दिन, एक पुरानी पत्रिका में कुछ खोजते हुए मेरी हिन्दी लेखिका सोमा वीरा से मुलाकात हो गई।

नीचे की इस तस्वीर में उन्नीस सौ पचास और नब्बे के दशकों की सोमा वीरा जी की तस्वीरें हैं (तस्वीरों को बड़ा करके देखने के लिए, उन पर क्लिक करें)।

इंदो-अमरीकी लेखिका सोमा वीरा

सोमा जी की हिन्दी कहानियों का संग्रह, "धरती की बेटी", आत्माराम एण्ड सन्स ने १९६२ में प्रकाशित की थी। यह किताब मुझे बहुत प्रिय थी और मैंने इसे बचपन में पढ़ा था।

आज से करीब बीस साल पहले, २००६ में, मैंने अपने मन-पसंद हिन्दी लेखकों की बात करते हुए सोमा वीरा जी की इस किताब के बारे में लिखा था। उस आलेख के कुछ साल बाद, हिन्दी पत्रिका अभिव्यक्ति निकालने वाली लेखिका पूर्णिमा वर्मन जी ने मुझे ईमेल भेजा कि क्या उस किताब के कवर पर सोमा वीरा की कोई तस्वीर है? उन्होंने ही मुझे बताया था कि सोमा वीरा अमरीका चली गईं थीं, जहाँ उनकी २००४ में मृत्यु हुई थी, लेकिन उनकी कोई तस्वीर नहीं मिल रही थी। इस किताब के पीछे भी सोमा वीरा जी की तस्वीर नहीं थी, मैंने पूर्णिमा जी को लिखा था। लेकिन इतने वर्षों पहले की यह बात मैं भूला नहीं था, जब भी मेरी दृष्टि मेरी अलमारी में रखी "धरती की बेटी" की ओर जाती थी तो यह बात मुझे याद आ जाती थी।

फ़िर अचानक कुछ दिन पहले जब एक पुरानी पत्रिका में उनकी एक कहानी दिखी और साथ में उनकी तस्वीर भी दिखी, तो लगा कि कोई दुर्लभ वस्तु मिल गई हो। आज के मेरे इस आलेख में उसी पुरानी सोमा वीरा की कुछ बातें हैं। लेकिन सबसे पहले देखते हैं कि इंटरनेट पर उनके बारे में क्या जानकारी मिलती है।

सोमा वीरा का परिचय

इंटरनेट पर खोजें तो अभिव्यक्ति की वेबसाईट पर उनके बारे में एक पृष्ठ मिलता है, जिसके अनुसार उन्होंने अमरीका में विश्वविद्यालय स्तर पर कार्य किया, उन्हें अमरीकी लेखक के रूप में भी जाना और सम्मानित किया गया था।
 
ई-पुस्तकालय पर उनकी एक किताब "साथी हाथ बढ़ाना" पीडीएफ में पढ़ सकते हैं। लेकिन उनकी कहानियों की किताब "धरती की बेेटी" कहीं नहीं दिखी। (यह किताब मेरे पास है, मेरे विचार में अब इसका कॉपीराईट नहीं होगा। अगर इसे पीडीएफ में इंटरनेट पर डालना चाहें तो क्या करना चाहिये, इसके लिए सुझाव दीजिये)।
इंदो-अमरीकी लेखिका सोमा वीरा / अंग्रेज़ी किताब का कवर

अमरीका के साईन्स फिक्शन डाटाबेस के अनुसार उनका जन्म २० नवम्बर १९३२ को लखनऊ में हुआ था। इस डाटाबेस में उनके कुछ अंग्रेज़ी उपन्यासों के नाम भी हैं और वहीं से, एक किताब के पीछे लगी, मुझे उनकी नब्बे की दशक वाली तस्वीर भी मिली (साथ में बायें)।
 
नब्बे के दशक में उन्होंने साईन्स फिक्शन विधा पर अंग्रेज़ी के बहुत से उपन्यास लिखे जो अमेज़न पर उपलब्ध हैं। अमेज़न पर ही उनके एक उपन्यास के पीछे उनके परिचय में लिखा है कि उन्होंने अमरीका में कोलोराडो विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिग्री ली और उसके बाद न्यू योर्क विश्वविद्यालय से अंतर्राष्ट्रीय सम्बंध तथा आर्थिक विकास विषय में पी.एच.डी. की। वह न्यू योर्क में रहती थीं और वहीं पर, संयुक्त राष्ट्र संस्थान के साथ लेकचर्र का काम करती थीं। वह अमरीका के प्रवासी भारतीय एसोसिएशन से भी जुड़ी थीं। (नीचे उनकी एक अंग्रेज़ी किताब का कवर, अमेजोन की वेबसाईट से)

इंदो-अमरीकी लेखिका सोमा वीरा/ अंग्रेज़ी किताब का कवर
 

पचास के दशक की सोमा वीरा से मेरी मुलाकात

मैं अपनी वेबसाईट कल्पना पर हर साल अपने पिता ओमप्रकाश दीपक के कुछ पुराने लेख व कहानियाँ टाईप करके जोड़ता रहता हूँ। गुड़गाँव में मेरी छोटी बहन ने एक अलमारी में उनके कुछ कागज़ सम्भाल कर रखे हैं। कुछ सप्ताह पहले कुछ दिनों के लिए गुड़गाँव गया था तो उसी अलमारी में पापा के कागज़ देख रहा था कि अब किस आलेख को इंटरनेट पर डालना चाहिये।

तब हाथ में हिन्दी पत्रिका "सरिता" का एक अंक आया जिसमें पापा की एक कहानी छपी थी। उसके पन्ने पलट रहा था कि देखा कि उस अंक में सोमा वीरा की एक कहानी भी छपी थी, "ढहती कगारें" जो उनके कथा-संग्रह "धरती की बेटी" में भी थी। जुलाई १९५८ की सरिता के उस अंक के शुरु में "सरिता के लेखक" पृष्ठ पर सोमा वीरा जी की तस्वीर और उनका परिचय भी था। उस परिचय में लिखा था:

"पच्चीस वर्षीय सोमा वीर शाहजहांपुर में अपने परिवार के कामधंधों के बीच भी कहानियाँ लिखने के लिए भी कैसे समय निकाल लेती हैं इसके पीछे एक मनोरंजक घटना छिपी है। सातवीं क्लास में एक प्रसिद्ध लेखक की कहानी पढ़ने के बाद जब आप ने कहा कि ऐसी कहानी तो मैं भी लिख सकती हूँ तो आप के भाई ने व्यंग किया था: "पुस्तकें पढ़-पढ़ कर यदि दो-चार विचार मस्तिष्क में उभर भी आयें तो क्या! तुम्हें कहानी लिखने का सिर-पैर भी नहीं आता।"

तभी से सोमा वीर ने उच्चतम शिक्षा प्राप्त करने की ठान ली और प्रेमचंद व शरत जैसे महान लेखकों की कृतियों का अध्ययन करने लगीं। शिक्षा तो दसवीं से ज़्यादा न प्राप्त कर सकीं - विवाह हो गया - पर उच्चतम हिंदी साहित्य का अध्ययन चलता रहा। कुछ कहानियाँ लिखीं जो प्रकाशित न हुईं। उन्हें फाड़ कर फैंक दिया। निराशा हुई पर साहस नहीं छोड़ा। सरिता के नये अंकुर स्तम्भ में जब पहली बार कहानी छपी तो साहस बढ़ा। एक-दो कहानियाँ और भी छपीं, पाठकों ने उनका स्वागत किया। भाषा मंजती गई, विचार परिपक्व होते गये। आगे भी लिखते रहने का साहस बढ़ गया। इसी अंक में एक कहानी "ढहती कगारें" प्रकाशित हुई है। शीघ्र ही एक कहानी संग्रह भी प्रकाशित होने वाला है।"

सोमा वीरा की जीवन यात्रा

आत्माराम एण्ड संस द्वारा १९६२ में प्रकाशित "धरती की बेटी" की भूमिका प्रसिद्ध हिंदी लेखक विष्णु प्रभाकर ने लिखी थी और यह किताब वीरा जी ने अपने पिता को समर्पित करते हुए लिखा था - "महामना पिता श्री श्यामलाल को, जिनके युगान्तकारी विचारों ने मेरे व्यक्तित्व के 'अहम्' को जन्म दिया"।

अपनी भूमिका में प्रभाकर जी ने लिखा था, "सोमा बहन हार मानने में विश्वास नहीं करतीं। वह चुनौती को स्वीकार करती हैं। उनकी लेखनी में जीने की तीव्र आकांक्षा है। इसलिए वह प्रहार करती हैं ... वह कई वर्षों से अमरीका में अध्ययन कर रही हैं। उनका जीवन संघर्षों के बीच से गुज़रा है। अपने पैरों पर खड़े हो कर उन्होंने अंधकार के बीच से राह बनाई है।"

उनकी जीवन-यात्रा क्या थी, मुझे नहीं मालूम, मैं अटकलें ही लगा सकता हूँ। जुलाई १९५८ में जब सरिता में उनकी कहानी छपी थी, तब वह शाहजहांपुर में रहती थीं और १९६२ में जब उनका कहानी-संग्रह छपा तब वह "कुछ वर्षों से" अमरीका में पढ़ रही थीं। १९५८ में वह "दसवीं पास" ग्रहणी थीं तो अमरीका में पढ़ने कैसे गईं?

शायद उनके पति अमरीका में पढ़ने गये थे और वहाँ जा कर उन्होंने हाई स्कूल पूरा किया, फ़िर विश्वविद्यालय में पढ़ीं? और साईन्स फिक्शन के विषय पर लेखन की ओर वह कब व कैसे गईं?

अंत में

अपने प्रिय लेखकों के बारे में जानना-समझना सभी को अच्छा लगता है। जब खोई हुई जानकारी मिल जाये तो और भी खुशी होती है। बहुत साल पहले पूर्णिमा जी की ईमेल ने मेरे मन में जो जिज्ञासा जगाई थी, संयोगवश अब उसके कुछ उत्तर मिल गये। क्या जाने कि उनके परिवार का कोई सदस्य इस आलेख को पढ़ कर उनके बारे में और जानकारी साझा करे!


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शुक्रवार, जून 28, 2024

आयुर्वेद और वैज्ञानिक शोध

आयुर्वेद में सदियों के अनुभवों से निर्मित भारतीय मानव-चिकित्सा का ज्ञान और समझ संचित है। इस ज्ञान में एक ओर से जड़ी-बूटियों से ले कर हर तरह के प्राकृतिक पदार्थों से जुड़ी जानकारी है। आयुर्वेद में मानव शरीर कैसे बना है, उसके अंगों, क्रियाओं और रोगोत्पत्ति व रोग-उपचार की प्राचीन सोच-समझ भी है। कुछ बातों में आयुर्वेद के विचार आज के वैज्ञानिक विचारों से भिन्न है, इसलिए आधुनिक अनुसंधानों से इस समझ के प्रमाण खोजने की आवश्यकता है।

अगर वैज्ञानिक अनुसंधान के बाद आयुर्वेद की कुछ बातों के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते तो उन्हें बदलना चाहिये या नहीं, और कैसे बदलना चाहिए, यह बहस व निर्णय आयुर्वेद के विशेषज्ञ ही ले सकते हैं।

पिछली कुछ सदियों में आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान की सोच तथा पद्धति विकसित हुई है जिसमें चिकित्सा के विषय पर वैज्ञानिक शोध व अनुसंधान कैसे किया जाना चाहिए की बात भी है। आज दुनिया में कोई भी चिकित्सा परम्परा हो, उसे इसी वैज्ञानिक शोध की कसौटी पर जाँचा जाता है।

यह आलेख आयुर्वेद और वैज्ञानिक अनुसंधान के विषय पर है।

International Meetingon Traditional Medcine in Asia, Bangalore, India, 2006

मैं, आयुर्वेद और शोध

मैं एलोपैथी का डॉक्टर हूँ और मुझे वैज्ञानिक शोध के क्षेत्र में अनुभव है। करीब बीस साल पहले, मैंने "एशिया की पाराम्परिक चिकित्सा पद्धितियों" के विषय पर बंगलौर में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सभा में हिस्सा लिया था, जिसमें मेरा आयुर्वेद से परिचय हुआ। उस समय मुझे बंगलौर में एक आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज जाने का मौका भी मिला था। इस आलेख की सभी तस्वीरें  २००६ की उसी सभा तथा वहाँ के आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज से हैं।

पिछले कुछ वर्षों में मुझे केरल में आयुर्वेदिक चिकित्सा करवाने का सकारात्मक अनुभव हुए थे। इसके साथ मुझे कुछ अन्य आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों में जाने और वहाँ के शिक्षकों से बातचीत का मौका भी मिला। उससे मुझे लगा कि बहुत से आयुर्वेदिक चिकित्सकों तथा प्रोफैसरों में चिकित्सा से जुड़े वैज्ञानिक शोध-पद्धितियों की समझ कुछ सीमित है। मेरे विचार में वैज्ञानिक शोध एक महत्वपूर्ण विषय है और आयुर्वेद के मेडिकल कॉलिजों को इस विषय में पढ़ने व सीखने की बहुत आवश्यकता है।

International Meetingon Traditional Medcine in Asia, Bangalore, India, 2006

जब हमें किसी उपचार से अच्छा अनुभव है, तो वैज्ञानिक शोध क्यों?

मेरे विचार में आयुर्वेदिक उपचारों पर वैज्ञानिक शोध करने के तीन प्रमुख कारण हैं -

(१) जब कोई दवा या उपचार रोगियों को राहत देते हैं, तब शोध से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि वे उपचार कितने प्रतिशत मरीजों को राहत देते हैं? वह राहत कितने समय तक रहती है? वे उपचार किस तरह से या क्यों सफल होते हैं? क्या उस उपचार के रोगियों पर कुछ अवांछनीय या नकारात्मक प्रभाव भी हैं? इस तरह के प्रश्नों के उत्तर खोजने से उन उपचारों को बेहतर किया जा सकता है।

(२) चिकित्सा-शोध ने दिखाया है कि जब रोगियों को डॉक्टर पर और उसके इलाज पर भरोसा होता है तो केवल यह विश्वास ही कुछ प्रतिशत मरीज़ों को ठीक कर देता है, इसे प्लेसेबो प्रभाव (placebo) कहते हैं। प्लेसबो प्रभाव को दवा या उपचार के प्रभाव से अलग समझना आवश्यक है। वैज्ञानिक शोध से हम यह समझ सकते हैं कि कितने लोग आयुर्वेद उपचार से इस तरह के विश्वास-प्रभाव की वजह से ठीक होते हैं, और कितने लोग सचमुच आयुर्वेद की दवाओं या उपचार से।

(३) एलोपैथी वाले कुछ चिकित्सक सोचते हैं कि आयुर्वेद सचमुच का ज्ञान नहीं है, यह जादू-टोना या अंधविश्वास है। आयुर्वेद पर वैज्ञानिक शोध से इस तरह के आरोपों से लड़ा जा सकता है।

International Meetingon Traditional Medcine in Asia, Bangalore, India, 2006

आयुर्वेद चिकित्सा का विकास कई सौ या हजारों वर्षों के अनुभव का नतीजा है, लेकिन विज्ञान कभी रुकता नहीं है, आगे बढ़ता रहता है, इसलिए आयुर्वेद को भविष्य में किस ओर जाना चाहिये, इसे समझने के लिए शोधकार्य चलता रहना चाहिये। आयुर्वेद में प्राचीन ज्ञान को बहुत महत्व दिया जाता है, लेकिन मेरे विचार में प्राचीन ज्ञान के साथ नया ज्ञान जोड़ना भी महत्वपूर्ण है। 

पश्चिमी वैज्ञानिक, चिकित्सक एवं शोधकर्ता स्वीकारते हैं कि आयुर्वेद जैसी प्राचीन परम्पराओं में वनस्पति जगत से जुड़ा गहरा ज्ञान है। जैसे कि किस पत्ते या जड़ आदि से किस रोग का उपचार हो सकता है। इसलिए वे लोग अक्सर इस जानकारी से उन पौधों से दवा खोजने और उसके रसायन पदार्थों को अलग करने के शोध करते हैं, लेकिन इन्हें आयुर्वेद-शोध नहीं कह सकते, क्योंकि वह लोग आयुर्वेद की सोच के अनुसार कुछ नहीं करना चाहते, बल्कि वह केवल अपनी पश्चिमी वैज्ञानिक सोच से नई दवाओं की खोज में लगे हैं।

वैज्ञानिक शोध कैसे करते हैं?

अनुसंधान करने का अर्थ है वैज्ञानिक मापदंडों के साथ निष्पक्ष प्रयोग या परीक्षण करना। इसे वैज्ञानिक शोध तभी माना जा सकता है अगर निम्नलिखित तीनों बातों को पूरा किया जाये - 

(१) शोध-प्रयोगों का लिखित प्रोटोकॉल होना चाहिए, जिसे अनुसंधान से पहले तैयार किया जाना चाहिए, और इसे एक वैज्ञानिक शोध कमेटी से मंजूरी मिलनी चाहिए। वैज्ञानिक शोध कमेटी के सदस्यों तथा शोध करने वाले के बीच में कोई व्यक्तिगत सम्बंध नहीं होना चाहिए, ताकि वह निष्पक्ष निर्णय लें। प्रोटोकॉल की मंजूरी के बाद, पूरे अनुसंधान को उस प्रोटोकॉल के अनुसार किया जाना चाहिए जिसमें उसके हर कदम को निष्पक्ष तरीके से देख कर जाँचा और मापा जाना चाहिये, और इसकी लिखित रिपोर्ट तैयार की जानी चाहिए।

(२) उस अनुसंधान के सभी सकारात्मक व नकारात्मक नतीजों को सांख्यकी (statistics) के मानदंडों से परखना चाहिए।

(३) उस अनुसंधान के हर चरण के प्रमाणों को सही तरीके से संजो कर रखना चाहिए, ताकि कोई भी वैज्ञानिक उस सारी प्रक्रिया और उसके हर कदम की स्वतंत्र जाँच कर सके।

इन तीनों बातों में से एक भी बात अधूरी हो, तो उस वैज्ञानिक शोध को विश्वास्नीय नहीं माना जा सकता। वैज्ञानिक शोधों की रिपोर्टों को ऐसी पत्रिकाओं में छापते हैं जिनमें छापने से पहले अन्य वैज्ञानिक आप के शोध को जाँच-परख सकते हैं। इन्हें पियर रिव्यू (Peer reviewed) यानि अन्य वैज्ञानिकों द्वारा जाँचे आलेखों की पत्रिकाएँ कहते हैं।

आयुर्वेद की वैज्ञानिक पत्रिकाएँ 

अगर हम आयुर्वेद से जुड़े विषयों पर शोध करना चाहते हैं तो सबसे पहला प्रश्न है कि क्या भारत में ऐसी पियर-रिव्यू वाली आयुर्वेद चिकित्सा की पत्रिकाएँ हैं और अगर हैं तो किस तरह की वैज्ञानिक क्षमता वाले लोग उसके साथ जुड़े हैं जो उसमें छपने वाले आलेखों की जाँच करते हैं?

इस विषय पर इंटरनेट पर खोज करने से मुझे निम्नलिखित आयुर्वेद की वैज्ञानिक पत्रिकाएँ मिलीं:

हिंदी में आयुर्वेदीक-अनुसंधान की भी शायद कुछ पत्रिकाएँ छपती हैं, लेकिन इनके पीडीएफ अंक इंटरनेट पर कठिनाई से मिलते हैं और इनके बारे में जानकारी सुलभ नहीं है। जैसे कि "आयुर्वेद एवं सिद्ध अनुसंधान पत्रिका", जिसकी वेबसाईट पुरानी शैली की है और जिसके कुछ आलेख मुझे अंग्रेजी में दिखे।

आयुर्वेद-अनुसंधान के विषय पर कुछ कार्यशाला आयोजित करने की भी छिटपुट खबरें मिलती हैं लेकिन जिस स्तर पर यह काम होना चाहिये, उससे मुझे यह बहुत कम लगता है।

अगर उपरोक्त जानकारी के अतिरिक्त अगर आयुर्वेद-शोध-अनुसंधान के विषय पर अन्य वैज्ञानिक पत्रिकाएँ छपती हैं हैं तो कृपया नीचे टिप्पणी करके उनकी सूचना दीजिये। इन विषयों पर अगर भारतीय भाषाओं में छपने वाली अन्य पत्रिकाएँ हैं तो उनकी जानकारी भी नीचे टिप्पणियों में दीजिये।

आयुर्वेदिक-शोधों में कमियाँ

मैंने उपरोक्त पत्रिकाओं में छपने वाले शोधों के कुछ आलेख पढ़े। मुझे उनमें कुछ कमियाँ दिखीं, जैसे कि:

  • अक्सर लेखक ऐसे शब्द या परिभाषाएँ उपयोग में लाते हैं जिनके अर्थ स्पष्ट नहीं हैं। जैसे कि एक आलेख में आयुर्वेद के मूलभूत मूल्यों की बात थी लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि वह मूलभूत मूल्य कौन से थे और कैसे निर्धारित किये गये थे? आयुर्वेद में वात, कफ, पित्त आदि शब्दों का भी प्रयोग होता है लेकिन उनके अर्थ भी मुझे स्पष्ट नहीं लगे। जब इस तरह के शब्द या परिभाषाएँ उपयोग करते हैं तो यह समझना आवश्यक है कि आयुर्वेद से जुड़े कितने प्रतिशत लोग उन मूल्यों या अर्थों से सहमत हैं? मुझे यह कमी आयुर्वेद से सम्बंधित बहुत से विचारों, शब्दों, अर्थों और मूल्यों के बारे में महसूस होती है। जब तक हर एक शब्द या विचार की सर्वसम्मत या बहुमत-स्वीकृत स्पष्ट परिभाषा नहीं होगी, तब तक उन पर वैज्ञानिक शोध करना कठिन ही नहीं, असम्भव होगा। आयुर्वेद-विशेषज्ञों को इस दिशा में सबसे पहले निर्णय लेने चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञों का डेल्फी सर्वे करके परिभाषाओं को स्पष्ट करना चाहिये।   
  • आयुर्वेद की नींव संस्कृत के ग्रंथों पर टिकी है, अक्सर भाषा बदलने से अंग्रेज़ी में उन संस्कृत शब्दों के सही अर्थ खोजना कठिन काम हो जाता है, इसलिए आयुर्वेद की संस्कृत या भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक पत्रिकाएँ उपलब्ध होना बहुत महत्वपूर्ण और आवश्यक है। बहुत खोजने पर इंटरनेट पर संस्कृत, हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में आयुर्वेदी-शोध की वैज्ञानिक पत्रिका नहीं मिली, यह मुझे बहुत गम्भीर कमी लगती है। मेरे विचार में असली शोध भारतीय भाषाओं में होना चाहिये, उसके बाद उनका अंग्रेज़ी में अनुवाद करना चाहिये ताकि शोध से जुड़े शब्दों को  उनकी सही परिभाषा में समझा जा सके।
  • मैंने ऊपर दी गई पत्रिकाओं में छपे कुछ आलेख देखे, जिन्हें पूर्ण रुप से वैज्ञानिक शोध नहीं कह सकते। जैसा मैंने ऊपर लिखा, चिकित्सा सम्बंधी शोध-प्रोटोकॉल कैसे तैयार किये जाते हैं, लगता है कि इसकी जानकारी कम है और अधिक लोगों तक पहुँचनी चाहिये। इस विषय पर आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलिजों द्वारा प्रोफैसरों, स्नातकों तथा विद्यार्थियों के लिए कार्यशालाओं का आयोजन होना चाहिये।

चीन में उनकी परम्परागत चिकित्सा (एकपंक्चर, आदि) पर बहुत शोध हुआ है। यह सब शोध और वैज्ञानिक शोध वे लोग चीनी भाषा में करते हैं और चीनी भाषा में वैज्ञानिक शोध की बहुत सी पत्रिकाएँ हैं। लेकिन यह बात नहीं है कि वह बाकी दुनिया में होने वाले शोधों से अनभिज्ञय हैं। वहाँ पर अंग्रेजी, फ्राँसिसी, स्पेनी आदि भाषाओ में छपने वाले महत्वपूर्ण शोधों के चीनी अनुवाद किये हुए सार या पूरे आलेख छापने वाली चीनी पत्रिकाएँ भी हैं, ताकि स्थानीय शोधकर्ताओं को खबर रहे कि दुनिया में क्या हो रहा है। आयुर्वेद से जुड़े शोध के लिए भारतीय भाषाओ में ऐसी पत्रिकाओं की आवश्यकता है क्योंकि इस चिकित्सा पद्धिति के मूल विचार संस्कृत में हैं और उन्हें अंग्रेजी में अनुवाद करने से उनकी सही परिभाषाएँ निश्चित करना कठिन हो जाता है।

नये कदम

भारत सरकार ने आयुर्वेदिक विज्ञान-शोध की राष्ट्रीय परिषद (Central Council for Research in Ayurvedic Sciences, CCRAS) स्थापित की है। इनकी सन २००० की अनुसंधान पोलिसी भी है। इनकी सूची भी है कि किस राज्य में कौन से शोध किये जा रहे हैं (लेकिन इसमें यह नहीं लिखा कि यह सूची किस साल की है)। इनका एक अंग्रेजी में शोध-पोर्टल है जिसे बहुत जटिल बनाया गया है और जिसमें कोई आलेख खोजना मुझे आसान नहीं लगा, शायद यह शोध विशेषज्ञों के लिए बना है।

विश्व स्वास्थ्य संस्थान ने भी, भारत सरकार के सहयोग से एक अंतर्राष्ट्रीय पारम्परिक चिकित्सा केन्द्र (Global Traditional Medicine Centre - GTMC) की जामनगर-गुजरात (भारत) में स्थापना की है।

आशा करता हूँ कि इन नये संस्थाओं से आने वाले समय में आयुर्वेद से जुड़े शोध करना पहले से अधिक आसान होगा। 

अंत में

आयुर्वेद की मेरी समझ सतही है। लेकिन मेरे विचार में आयुर्वेद के विषयों पर वैज्ञानिक शोध और उस शोध के परिणामों को वैज्ञानिक पत्रिकाओं में लोगों को लोगों को उपलब्ध कराने में बहुत सा काम बाकी है।
 
अगर आप आयुर्वेद से जुड़े किसी क्षेत्र में अनुसंधान करने की सोच रहे हैं और आप के मन में उसके प्रोटोकॉल से सम्बंधित कुछ प्रश्न हैं तो मुझसे सम्पर्क करें, मैं आयुर्वेद के बारे में नहीं जानता लेकिन चिकित्सा के शोध-प्रोटोकॉल कैसे बनाये इसमें मदद कर सकता हूँ।  आप मेरे शोध-आलेखों की लिन्क इस ब्लाग के दायें हाशिये पर खोज सकते हैं, मेरे शोध क्षेत्र कुष्ठ रोग और विकलांगता से जुड़े हैं।
 
International Meetingon Traditional Medcine in Asia, Bangalore, India, 2006
 
टिप्पणी: इस आलेख के साथ लगी सभी तस्वीरें २००६ की परम्परागत चिकित्सा की बंगलौर कौन्फ्रैंस से हैं।
 
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बुधवार, अप्रैल 17, 2024

ब्रह्मी से देवनागरी की लिपि यात्रा

उत्तर भारत की सबसे प्राचीन भाषा जिसके आज लिखित प्रमाण हैं, वह वैदिक संस्कृत थी और इसका प्रमाण है ऋग्वेद जो ईसा से करीब १५०० वर्ष पहले लिखा गया। विशेषज्ञ कहते हैं कि इसे सबसे पहले ब्रह्मी लिपि में लिखा गया। नीचे की तस्वीर में ओडिशा में धौलागिरि की वह चट्टान है जिस पर सम्राट अशोक के संदेश ब्रह्मी लिपि में लिखे हैं। 

धौलागिरि चट्टान जिसपर सम्राट अशोक का संदेश ब्रह्मी लिपि में अंकित है

फ़िर समय के साथ ब्रह्मी से देवनागरी लिपि विकसित हुई। ब्रह्मी से ही मराठी, गुजराती, बंगाली और गुरुमुखी जैसी भारतीय भाषाओं की लिपियाँ बनीं जो देवनागरी से मिलती जुलती है, लेकिन उनमें भिन्नताएँ भी हैं। मैं सोचता था कि भाषाएँ तो यूरोप की भी बहुत भिन्न हैं, जैसे कि अंग्रेज़ी, स्पेनी, फ्राँसिसी, इतालवी, आइरिश, आदि, लेकिन उन सबकी लिपि एक जैसी है, जिसे रोमन वर्णमाला कहते हैं जो लेटिन पर आधारित है।

इसलिए मेरे मन में प्रश्न उठता था कि हमने भारत की भिन्न भाषाओ के लिए एक जैसी देवनागरी लिपि या कोई और लिपि क्यों नहीं अपनाई, उससे हमारी भाषाओं को सीखना शायद कुछ अधिक आसान हो जाता। 

कुछ दिनों से मैं आचार्य चतुर सेन की १९४६ में प्रकाशित हुई किताब "हिंदी भाषा और साहित्य का इतिहास" पढ़ रहा था, जिसमें उन्होंने अठाहरवीं शताब्दी में भारत में प्रिन्टिन्ग प्रैस के आने के बाद की भारतीय भाषाओं को लिपिबद्ध करने के बारे में जानकारी दी है, जिसमें मेरे प्रश्न का उत्तर था कि हमारी भाषाओं की लिपिया भिन्न क्यों हैं? यह आलेख इसी विषय पर है।

ब्रह्मी और देवनागरी लिपियों की वर्णमाला

सबसे पहले अगर हम स्वरों को देखें तो देवनागरी तथा ब्रह्मी भाषा की लिपि के अंतर देख सकते हैं - 

अ आ - 𑀅 𑀆    इ ई - 𑀇 𑀈    उ ऊ - 𑀉 𑀊   ए ऐ - 𑀏 𑀐    ओ औ - 𑀑 𑀒

अं अः - 𑀅𑀁 𑀅𑀂    ऋ -𑀋

और अब आप इन दो लिपियों में व्यंजनों के स्वरूप तथा अंतर देख सकते हैं -

क ख ग घ ङ  -  𑀓 𑀔 𑀕 𑀖 𑀗       च छ ज झ ञ - 𑀘 𑀙 𑀚 𑀛 𑀜    ट ठ ड ढ ण - 𑀝 𑀞 𑀟 𑀠 𑀡          

त थ द ध न - 𑀢 𑀣 𑀤 𑀥 𑀦          प फ ब भ म - 𑀧 𑀨 𑀩 𑀪 𑀫        य र ल व - 𑀬 𑀭 𑀮 𑀯

श ष स ह - 𑀰 𑀱 𑀲 𑀳

प्रारम्भ में अंग्रेज़ ब्रह्मी लिपि को पिन-मैन (Pin-man) लिपि कहते थे क्योंकि यह माचिस की तीलियों या छोटी डंडियों से बनी आकृतियों जैसी लगती थी। समय के साथ इस लिपी के स्वरूप भी कुछ बदले लेकिन पांचवीं शताब्दी ईस्वी में गुप्त साम्राज्य काल तक इसे ब्रह्मी लिपि ही कहते है। नीचे तस्वीर में दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय से वह चट्टान जिसपर सम्राट अशोक का संदेश ब्रह्मी लिपि में लिखा है।

दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में सम्राट अशोक का ब्रह्मी लिपि में लिखा संदेश
छठी शताब्दी के बाद से ब्रह्मी लिपि के बदलाव अधिक मुखर हुए और उन्हें नये नाम दिये गये। उत्तर भारत में ब्रह्मी से नागरी, सिद्धम तथा शारदा लिपियाँ बनी जबकि दक्षिण भारत में कदम्ब, पल्लव, आदि लिपियाँ बनी।

चूंकि दक्षिण भारत में ग्रंथों को नुकीली कलम से ताड़ के पत्तों पर खरोंच कर लिखने की परम्परा थी, उन पर नागरी की सीधी रेखाओं वाली लिपि से पत्ते कट जाते थे, इसलिए वहाँ गोलाकार लिपियाँ विकसित हुईं जिनमें शब्दों को देवनागरी की तरह ऊपरी रेखा से जोड़ा नहीं जाता था।

बोलचाल की बोली में बदलाव

एक ओर लिपि में बदलाव हो रहे थे, तो दूसरी ओर बोलने वाली भाषा भी बदल रही थी, क्योंकि जन सामान्य को बोलचाल की भाषा में सरलता चाहिये, वह भाषा की कठिन ध्वनियों को और जटिल व्याकरण नियमों की जगह आसान ध्वनियों और सरल व्याकरण को प्राथमिकता देते हैं। इस तरह से उत्तर भारत में समय के साथ, संस्कृत से लौकिक संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंष, खड़ी बोली और अन्य बोलियाँ बनी।
 
जब समाज बदलते हैं, और नये ज्ञान से नयी समझ और तकनीकी बदलती है, तो नये औज़ार, अस्त्र, कार्यक्षेत्र, कार्यकौशल, आदि बनते हैं, जिनके लिए भाषाओं को नये शब्द चाहिये। दूसरी ओर, जब सड़कें नहीं हों और यातायात के साधन सीमित हों तो कुछ लोग ही लम्बी यात्राएँ कर पाते हैं। इन दोनों बातों की वजह से, समय के साथ, एक ही भाषा विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न स्वरूप बदल-बदल कर विकसित होती है।
 
इस तरह से उत्तरभारत में प्राकृत भाषा, देश के विभिन्न क्षेत्रों में डिन्गल, पिन्गल, ब्रज, खड़ी बोली, अवधी, मैथिली, भोजपुरी आदि लोकभाषाओं में विकसित हुई। यही नहीं, इनमें से हर लोकभाषा में कुछ-कुछ कोस की दूरी पर कुछ शब्दों में अंतर आ जाते थे और स्थानीय बोलियाँ बन जाती थीं, जैसे कि आज़मगढ़, जौनपुर और सुल्तानपुर, सभी में अवधी बोलते थे लेकिन उनकी अवधी एक जैसी नहीं थी, उसमें कुछ अंतर थे।
 
बीसवीं सदी में दुनिया के बदलने की गति और तेज़ हो गयी। सड़कों और यातायात के साधनों की वृद्धि से लोग अधिक यात्रा करने लगे हैं, और फ़िर, रेडियो-टीवी-फ़िल्म-इंटरनेट-यूट्यूब आदि नये संचार माध्यमों के आविष्कार से, लोगों के बीच दूरियाँ कम होने लगीं, इस वजह भाषाओं की छोटी-मोटी स्थानीय भिन्नताएँ भी लुप्त होने लगीं। आज के बच्चे स्कूल में, उपन्यासों में, फ़िल्मों और टीवी पर जो भाषा सुनते हैं, वही बोलने लगते हैं और अपने घर-परिवार-गांव की बोली को भूलने लगते हैं।
 
भाषा के कुछ बदलाव दो उल्टी दिशाओं में जा रहे हैं। एक ओर भविष्य में नौकरी अच्छी मिले, यह सोच कर हम अपने बच्चों को अंग्रेज़ी बुलवाने में गौरव महसूस करते हैं इसलिए शहरों के समृ्द्ध परिवारों में बच्चे केवल अंग्रेज़ी पढ़ते-बोलते हैं।
 
दूसरी ओर, यूट्यूब, टिक-टॉक आदि एप्प से छोटे शहरों और गावों में स्थानीय बोलियों के गीत-संगीत-नाटक-शिक्षा-ज्ञान से आय के नये साधन निर्मित हो रहे हैं, जिनसे उन बोलियों के उपयोग को बढ़ावा मिल रहा है।
 
कृत्रिम बुद्धि के अनुवादक की सहायता से आप किसी भी भाषा के लेखन, फ़िल्म, नाटक आदि को आसानी से समझ सकते हैं। गूगल के आटोमेटिक अनुवादक से आप केवल हिंदी, इतालवी, फ्रांसिसी या स्पेनी भाषाओं में ही नहीं, असमिया, भोजपुरी, मैथिली जैसी भाषाओं में अनुवाद कर सकते हैं। आने वाली सदियों में इन सब बदलावों का हमारी बोलियों और भाषाओं पर क्या असर पड़ेगा, यह कहना मुझे कठिन लगता है। 

छपाईखानों की तकनीकी से जुड़े लिपि के बदलाव

आचार्य चतुरसेन अपनी पुस्तक "हिंदी भाषा और साहित्य का इतिहास" में इस विषय पर दिलचस्प जानकारी देते हैं।
 
छापेखाने यानि प्रिन्टिन्ग प्रैस का प्रारम्भिक विकास चीन में हुआ था, लेकिन इसे बड़े पैमाने पर विकसित किया जर्मनी के जोहान गूटनबर्ग ने जिन्होंने १४४८ ई. में पहली बाईबल की किताब छापी। इससे पहले किताबें हस्तलिपि से ही लिखी जाती थीं और केवल एक-दो पन्नों के इश्तहार आदि छापने के लिए आप लकड़ी पर उल्टे शब्द काट कर उस पर स्याही लगा कर उन्हें छाप सकते थे। हस्तलिपि से किताब लिखना और पूरे पन्ने को लकड़ी में काट कर छापना, दोनों मेहनत के काम थे और बहुत मंहगे थे।
 
गूटनबर्ग ने वर्णमाला के हर अक्षर को धातू में बनाया, फ़िर इन अक्षरों को लोहे की प्लेट पर चिपका कर आप एक पृष्ठ की हज़ारों प्रतियाँ छाप सकते थे। उस पृष्ठ को छापने के बाद, उन्हीं अक्षरों को उसी लोहे की प्लेट पर उनकी जगह बदल कर आप दोबारा प्रयोग कर सकते थे और नया पृष्ठ छाप सकते थे। छपाई प्रेस के जगह-बदलने वाले अक्षरों से किताबों की छपाई में क्रांति आ गई।
 
इसी तकनीक की प्रेरणा से बाद में टाईप-राईटर का भी आविष्कार हुआ। एक बार यह छपाई वाले अक्षर बने तो यूरोप के भिन्न देशों ने उन्हें अपना लिया और सबने रोमन वर्णमाला में अपनी भाषाओं के ग्रंथों को छापना शुरु किया। सबसे पहले और सबसे अधिक छपाई बाईबल ग्रंथ की हुई। इस तरह से सबकी भाषाएँ अलग रहीं लेकिन लिपि एक जैसी हो गयी।
 
भारत में हर क्षेत्र में अलग बोलियाँ थीं जिन्हें लोग हस्तलिपि से लिखते थे। इनकी लिपि जो नागरी पर आधारित थी, समय के साथ हर क्षेत्र में कुछ भिन्न तरीके से विकसित हुई। अठाहरवीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारत में ईसाई मिशनरी बाईबल को स्थानीय भाषाओं में छापना चाहते थे। उन्होंने पहले सोचा कि हर भारतीय भाषा को रोमन वर्णमाला में ही छापा जाये, ताकि नये अक्षर न बनाने पड़ें, लेकिन उन्हें इसमें सफलता नहीं मिली, क्योंकि भारतीय भाषाओं में ध्वनियाँ अधिक थीं जिनके लिए रोमन वर्णमाला में लिखे शब्दों के अर्थ समझना कठिन था। तब उन्होंने हर क्षेत्र में स्थानीय हस्तलिपि को ले कर उसके लिए अक्षर बनाये, इस तरह से उनकी किताबें स्थानीय भाषाओं में छपीं। भारत की विभिन्न भाषाओं में अक्षर बनाने का काम कठिन था और इसमें करीब सौ/डेढ़ सौ साल लगे। इसका यह नतीजा हुआ कि हमारे हर क्षेत्र की हस्तलिपियों पर आधारित भिन्न लिपियाँ विकसित हुईं।
 
बाद में जब विभिन्न लिपियों की कठिनाईयाँ समझ में आयीं तब उनके एकीकरण, यानि भारत की हर भाषा को एक लिपि में लिखा जाये, की कई कोशिशें हुईं लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। लोगों को एक बार जिस लिपि में अपनी भाषा पढ़ने की आदत पड़ी, वह उसे बदलना नहीं चाहते थे।

आचार्य चतुर सेन देवनागरी लिपि की छपाई की कुछ अन्य कठिनाईयों पर भी विस्तार से बताते हैं, विषेशकर मात्राओं और संयुक्ताक्षरों की छपाई से जुड़ी कठिनाईयाँ, जिनके लिए विभिन्न उपाय खोजे गये लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली या सीमित सफलता मिली। उनकी यह किताब पीडीएफ में इंटरनेट पर उपलब्ध है।

अंत में

आचार्य चतुरसेन का भाषा और साहित्य का इतिहास भारत की स्वतंत्रता से कुछ पहले तक की कहानी कहता है। उसे पढ़ते समय मुझे पिछले तीस वर्ष की इंटरनेट पर देवनागरी और अन्य भारतीय भाषाएँ लिखने से जुड़ी बातों की याद आ रही थी।
 
१९९० के दशक में जब इंटरनेट फ़ैलने लगा तो प्रारम्भ में हर वेबसाईट के अपने फोन्ट होते थे। मैंने १९९४ में अमरीका में बोस्टन के संग्रहालय में इंटरनेट क्या होता है वह देखा, तो इटली में घर लौट कर तुरंत इंटरनेट का कनेक्शन ले लिया। तब इंटरनेट में देवनागरी में कुछ नहीं मिलता था।
 
सन् २००० के आसपास कम्पयूटर पर इक्का-दुक्का देवनागरी दिखने लगी लेकिन तब देवनागरी के लिए कृतिदेव, मंगल आदि फोन्ट का प्रयोग होता था। उनकी कठिनाई थी कि अगर आप के कम्पयूटर पर वह वाला फोन्ट नहीं है तो आप उसे नहीं पढ़ सकते थे, आप को हर जगह केवल चकौर डिब्बे दिखते थे।
 
तब रोमन वर्णमाला के युनिकोड के फोन्ट ऐसे बनाये गये थे कि उन्हें कोई भी कम्पयूटर समझ सकता था। हम पूछते थे कि हिंदी का युनीकोड कब आयेगा। सबसे पहले हिंदी को युनीकोड में लिखने के लिए ASCII कोड आया लेकिन एक-एक अक्षर के लिए कोड नम्बर लिखना बहुत कठिन काम था।

जहाँ तक मुझे याद है, मैं २००३ तक शूशा फोंट से लिखता था। उस समय सुनते थे कि युनिकोड के हिंदी फोन्ट बन रहे थे। शायद यह काम २००४-०५ के आसपास पूरा हुआ। शुरु में जब यनिकोड के फोन्ट बन गये तब भी यह दिक्कत थी कि अंग्रेज़ी कीबोर्ड से उन्हें कैसे लिखा जाये, इसके सोफ्टवेयर को प्रयोग करना आसान नहीं था।
 
मैंने युनिकोड के रघू फोन्ट का उपयोग जून २००५ में अपना ब्लाग बना कर शुरु किया। आप चाहें तो २००५ की मेरी उस ब्लोगपोस्ट में युनीकोड उपलब्धी के बारे में मेरी खुशी के बारे में पढ़ सकते हैं। उन दिनों में युनीकोड में लिखना भी आसान नहीं था, उन प्रारम्भिक कठिनाईयों के बारे में पढ़ सकते हैं।
 
जब भारत से मेरे इंटरनेट के मित्र पंकज ने मुझे "तख्ती" प्रोग्राम के बारे में बताया। उन दिनों में हिंदी में ब्लाग लिखने वालों का हमारा गुट था जिसमें कई इन्फोरमेशन तकनीकी के विशेषज्ञ थे, जो हम सब को सलाह देते थे। अगस्त २००५ में अनूप शुक्ला ने अनुगूँज नाम का ब्लाग बनाया था जिसमें हम सब चिट्ठा लेखक उनकी दी गयी थीम पर आलेख लिखते थे। मार्च २००६ में हमारे ब्लाग साथी देवाषीश ने "द एशियन एज" अखबार में आलेख में हिंदी और भारतीय चिट्ठाजगत के बारे में आलेख लिखा था।
 
करीब दो साल पहले तक, मैं अपना सारा हिंदी लेखन उसी "तख्ती" पर करता था, और वहाँ से कॉपी-पेस्ट करके हर जगह चेप देता था। इतने साल तक बहुत कोशिश करने के बाद भी विन्डोज पर हिंदी लेखन का कीबोर्ड याद करना मुझे कठिन लगता था। बहुत सालों तक मैंने भारत में हिंदी का कम्पयूटर कीबोर्ड खरीदने की कोशिश की लेकिन उसमें सफलता नहीं मिली। क्या मालूम अब वह आसान हुआ है नहीं?
 
दो साल पहले, २०२१ में पुराने ब्लागर साथी रवि रतलामी, जो अब नहीं रहे, उनकी सलाह से मुझे लीनक्स पर हिंदी लिखने के लिए "का-पा-गा" सोफ्टवेयर मिला जिसे मैंने अंग्रेज़ी कीबोर्ड पर लिखना आसानी से सीख लिया, तब जा कर मेरा जीवन आसान हुआ।
 
लेकिन आज भी अगर विन्डोज़ वाला कम्पयूटर हो, जैसे कि यात्राओं में लैपटॉप का प्रयोग करना हो, तो अभी भी "तख्ती" पर ही लिखता हूँ, क्योंकि उनका हिंदी कीबोर्ड मुझे कठिन लगता है। अगर आज कोई हिंदी भाषा और साहित्य का इतिहास लिखे तो उसे इन सब बदलावों के बारे में भी जानकारी होनी चाहिये।

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