जीवन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
जीवन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, अक्टूबर 08, 2026

दिमाग से जुड़ी विकलाँगताएँ

कुछ विकलांगताएँ इंसान के मस्तिष्क (दिमाग या ब्रेन) से जुड़ी होती हैं, जैसे कि सेरिब्रल पाल्सी (cerebral palsy), डाउन सिंड्रोम (Down syndrome), डिस्लेक्सिया (dyslexia), आउटिज़्म (autism), इत्यादी।

इन्हें स्नायु-तंत्र की विकलांगता (neurological disability) कहते हैं क्योंकि इनमें दिमाग और स्नायु (nerves) की कुछ कमी या कमजोरी या बीमारी होती है। इन्हें बाल विकास की विकालंगता (developmental disability) भी कहते हैं क्योंकि अक्सर यह बचपन में पता चलती हैं जब बच्चा ठीक से, शारीरिक या मानसिक रूप से विकसित नहीं होता है। लेकिन दिमाग से जुड़ी कुछ विकलांगताएँ बड़े उम्र के लोगों में भी हो सकती हैं, जैसे कि दुर्घटना में सिर पर चोट लगने से।

सरलता के लिए, इस आलेख में इन सभी विकलांगताओं के लिए मैं "विकास-विकालंगता" शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ।


 

यह आलेख विकास-विकालंगता वाले बच्चों-किशोरों और उनके परिवारों के लिए लिख रहा हूँ, ताकि वह अपने शारीरिक व कार्य-क्षमता के सशक्तिकरण की आवश्यकताओं (rehabilitation needs) को समझ सकें, ज़रूरत पड़ने पर उनके बारे में डॉक्टरों और थैरापिस्टों से बात कर सकें और स्वयं अपने बारे में निर्णय ले सकें।

आलेख लिखने के कारण

(1) विकास-विकालंगता सारा जीवन रहती है और उम्र के साथ व्यक्ति की ज़रूरतें बदलती रहती हैं। इसलिए आप को अक्सर डॉक्टरों या फिज़ियोथैरापिस्ट या अन्य थैरापिस्ट के पास जाना पड़ता है। इस आलेख से आप को अपने शरीर की कठिनाईयों की समझ आयेगी जिससे आप उन्हें अपनी बात बेहतर समझा सकते हैं।

(2) चूँकि विकास-विकालंगता सारा जीवन रहेगी तो आप हर बात के लिए डॉक्टर या थैरापिस्ट के पास नहीं जा सकते। इसलिए आप को अपनी देखभाल करना खुद सीखनी चाहिए ताकि आप घर पर अपने शरीर की क्षमता बनाये रखने के लिए नियमित रूप से वर्जिश, दिमागी एक्सरसाइज़, आदि कर सकें।

(3) आधुनिक तकनीकी (एप्प, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धि) की मदद से आप दुनिया भर के अपने जैसी कठिनाई के साथ जीने वाले अन्य लोगों से सम्पर्क कर सकते हैं, उनके अनुभवों से सीख सकते हैं, और उनके साथ अपने अनुभव बाँट सकते हैं। 

दिमाग के विभिन्न काम और उनसे जुड़ी विकलांगताएँ

इंसान का दिमाग अलग-अलग काम करता है, और विकास-विकलांगता की कठिनाईयाँ उनमें से किसी एक या कुछ कामों से जुड़ी होती हैं। विकास-विकलांगता को समझने के लिए, हम यह काम मुख्य रूप से तीन तरह के सोच सकते हैं - (1) माँसपेशियों को चलाना; (2)  सोचना, समझना, गिनना, पढ़ना, आदि; (3)  सामाजिक सम्बंध, भावनाएँ, प्रेम, स्नेह आदि जताना। आईये अब इन्हें एक-एक करके देखें।

1. माँसपेशियों को चलाना:

माँसपेशियों को चलाना जीवन के लिए ज़रूरी है क्योंकि उनकी सहायता से हम चलते-फिरते, खाते-पीते, पढ़ते-लिखते सब तरह के काम करते हैं। इस क्षमता को विकास-विकलांगता समझने के लिए तीन अलग-अलग श्रेणियों में बाँट कर जाँचा जा सकता है - 

(अ) उँगलियों से महीन काम जैसे कढ़ाई करने या सूई में धागा डालने या लिखने की क्षमता। (Fine movement coordination and strength) - कुछ विकास-विकलांगताओं में केवल महीन काम करने में कठिनाई होती है।

(ए) बड़ी माँसपेशियों से मेहनत या ताकत वाला काम करना जैसे चलना, सामान उठाना या तीर चलाना या क्रिकेट का बल्ला घुमाना। (Gross movement coordination & strength)

(इ) मुँह-गले की माँसपेशियों द्वारा खाना चबाने और निगलने की क्षमता। अगर बच्चा ठीक से खाना नहीं सकता या जल-दूध आदि नहीं पी सकता तो बच्चे का स्वास्थ्य कमजोर हो जायेगा।

कुछ विकलांगताओं में जैसे कि सेरिब्रल पाल्सी में शरीर के कुछ हिस्सों में यह क्षमता सही नहीं होती, जिससे वह अपनी माँस-पेशियों से सही तरीके से काम नहीं करवा पाते। 

आउटिज़्म में दिमाग में बाहर से सूचना लाने वाले स्नायु सैंसिटिव हो जाते हैं या अधिक काम करते हैं जिसकी वजह से वह किसी को छूना या अधिक पास आना, या शोर या तेज रोशनी पसंद नहीं करते। 

अगर आप को या परिवार में किसी को विकास-विकलांगता है तो इन तीनों तरह की माँस-पेशियों की क्षमता की अलग जाँच करनी चाहिये, क्योंकि इन सब का उपचार करने के लिए भिन्न तरीके हैं और हर व्यक्ति को उसकी ज़रूरत के अनुसार वर्जिश या अन्य उपचार की सलाह दे सकते हैं।

2. सोचना, समझना, गिनना, पढ़ना, आदि: 

दिमाग के अलग-अलग हिस्सों में सोचने-समझने की भी अलग-अलग क्षमताएँ होती हैं। दिमाग का कोई हिस्सा यादाश्त का काम करता है, कोई दूसरा हिस्सा सुनी हुई बात को समझने का काम करता है, एक अन्य हिस्सा पढ़ी हुई बात को समझने का काम करता है, और अन्य हिस्सा गिनती का काम करता है, या अन्य हिस्सा भाषा या तर्क की समझ करता है। इसलिए यह जानना ज़रूरी है कि किस तरह की सोचने-समझने की क्षमता में कमी या कमज़ोरी है। अगर दिमाग का एक बड़ा हिस्सा पूरा काम नहीं कर रहा तो उससे बहुत सी क्षमताओं पर असर पड़ सकता है, जबकि अगर दिमाग का केवल कोई विशेष हिस्सा ठीक से काम नहीं कर रहा तो उसमें केवल किसी एक या दो क्षमताओं पर असर पड़ सकता है। हर व्यक्ति भिन्न होता है, यह जानना कि वह किस बात में कमज़ोर है और किस बात में नॉरमल है, बहुत ज़रूरी है।

अक्सर बच्चे की एक तरह की समझ में कमी को, उसके पूरे दिमाग की कमज़ोरी समझ लेते हैं। 

डाउन सिंड्रोम में यादाश्त या सोचने-समझने की क्षमता में कमजोरी हो सकती है, डिमैंशिया में यादाश्त काम नहीं करती, डिस्लेक्सिया में पढ़ने और लिखने में कठिनाई होती है। जब स्कूल जाने वाले बच्चों में यह विकलांगता हो तो उसे "सीखने की विकलांगता" (learning disability) भी कहते हैं।

 कई तरह की आउटिज़्म में भी समझ की कठिनाई हो सकती है जैसे कि आउसबर्गर सिंड्रोम आउटिज़्म में लोग शब्दों के संकेतात्मक अर्थ समझने में कठिनाई महसूस करते हैं, जैसे कि कोई कहे "अरे कितना बढ़िया गाना गाया, मार डाला रे" में "मार डाला" को सचमुच मारना समझ सकते हैं।

आधुनिक शोध ने दिखाया है कि अगर दिमाग के एक हिस्से में कमी है तो उसका दूसरा हिस्सा उस कमी को कुछ हद तक पूरा कर सकता है, लेकिन उसके लिए पढ़ाने और समझाने के नये तरीके सोचने पड़ सकते हैं। 

3. सामाजिक सम्बंध, भावनाएँ, प्रेम, स्नेह आदि: 

हमारे मन की सारी भावनाएँ भी दिमाग में ही बनती हैं। अगर दिमाग का यह हिस्सा ठीक से काम न करे तो वह लोग अपनी भावनाओं जैसे प्रेम या स्नेह को ठीक से अभिव्यक्त नहीं कर पाते या उनका अपने व्यवहार पर नियंत्रण नहीं रहता।

इस तरह की कठिनाईयाँ अधिकतर आउटिज़्म में दिखती हैं, जिनकी वजह से वह लोग किसी के प्रति प्रेम नहीं जता पाते और मित्र नहीं बना पाते। इन कठिनाईयों की वजह से कई बार विकास-विकालंगता वाले कुछ लोग अपने गलत व्यवहार या अपनी इच्छाओं पर कंट्रोल नहीं कर पाते। 

अगर आप के परिवार में किसी बच्चे या किशोर को विकास-विकालंगता है

अगर आप के परिवार के बच्चे या किशोर को किसी तरह की विकास-विकालंगता है तो यह देखना चाहिये कि उस पर ऊपर बताई गई तीन तरह की क्षमताओं पर क्या असर है:

माँसपेशियों पर क्या असर है? ऊँगलियों के महीन काम पर क्या असर है? ताकत/मेहनत वाली बड़ी माँसपेशियों पर क्या असर है? खाना चबाने, निगलने पर क्या असर है?

सोचने-समझने की शक्ति पर क्या असर है? किस तरह की सोच-समझ पर कितना असर है जैसे कि गणित पर, तर्क समझने पर, सुनी बात पर, पड़ी बात पर, लिखने में, आदि। 

भावनाओं-व्यवहार पर क्या असर है?

केवल यह कहना काफी नहीं है कि विकास-विकालंगता है, दिमाग और शरीर के किस भाग पर उसका क्या असर है, जब तक वह पता नहीं चलेगा, उसकी ठीक से थैरेपी नहीं की जा सकती। अक्सर डॉक्टरों और थैरेपिस्ट को यह समझ नहीं होती या उनके पास समय नहीं होता कि वह हर बात की ठीक से जाँच करे और उसके लिए क्या करना चाहिये यह सलाह आप को धैर्य से समझायें। लेकिन अगर आप को यह समझ है तो आप अपने बच्चे के लिए सही उपचार खोज सकते हैं।

अगर बच्चे की कुछ माँसपेशियों में कोर्डिनेशन या संतुलन की कमी है तो उसकी थैरेपी भिन्न होगी, अगर उन माँसपेशियों में ताकत कम है तो उसकी थैरेपी अलग होगी। सोचिये कि अगर बच्चा लिखा हुआ पढ़ने में नहीं समझ पाता तो क्या उसके लिए सुन कर समझना या चित्रों से समझना अधिक आसान है? अगर उसे कहानी समझने में मुश्किल है तो क्या गणित में भी मुश्किल है? हर बात को अलग-अलग देखना और जाँचना चाहिये।

आधुनिक तकनीकी की सहायता

एक समय था जब हम सोचते थे कि अगर दिमाग के स्नायु-कोष (nerve cell) नष्ट हो गये हैं तो उसका कुछ नहीं हो सकता, वह नष्ट ही रहेंगे। जबकि आज की सोच है कि अगर दिमाग का एक हिस्सा काम नहीं कर रहा तो दिमाग के बाकी के हिस्से उस काम को कुछ हद तक करना सीख-सिखा सकते हैं।

अक्सर बच्चों-बड़ों के मन में लोगों की बातें सुन कर डर बैठ जाता है कि लोग हँसेंगे या बुरा-भला कहेंगे आदि। आप को मन में बैठे उन डरों की खुल कर बात करनी चाहिये और व्यक्ति को परिस्थिति से लड़ने की हिम्मत देनी चाहिये कि किसी के कहने-सोचने की परवाह मत करो। जब नये उपचार करते हैं तो उनका असर होने में समय लगता है, इसलिए हिम्मत बनाये रखना बहुत ज़रूरी है। अगर आप को बच्चा कुछ नहीं कर पा रहा तो उसकी आलोचना नहीं करनी चाहिये, लेकिन अगर वह थोड़ा सा भी सुधार ला रहा है तो उसकी सराहना अवश्य करनी चाहिये।

यह सोचना कि थैरेपी से सारी कठिनाईयाँ ठीक हो जायेंगी, गलत है। कई बार, जो कमी बन गई है, उसमें सब कोशिश के बाद कोई अंतर नहीं आयेगा। लेकिन हर बच्चे के साथ इतनी कोशिश की जानी चाहिये कि उसका जितना विकास हो सकता है, उसे उसका मौका मिले। कई बार लोग सोचते हैं कि अगर बच्चा ठीक से चल नहीं पा रहा या बोल नहीं पा रहा तो बिना कोई जाँच किये सोच लेते हैं कि इसका दिमाग भी कमज़ोर है, वह बच्चे को मौका और सहारा नहीं देते। 

आज दुनिया भर के विकलांग लोग अपने और अपने परिवार वालों के अनुभव व्हाटसएप्प, फेसबुक, यूट्यूब आदि से बाँटते हैं, और आप उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं। दुनिया की कोई भी भाषा हो, यूट्यूब पर आप उसके वीडियो के साथ अपनी भाषा में सबटाईटल के साथ देख सकते हैं। उदाहरण के लिए, अगर आप के बच्चे को सेरिब्रल पाल्सी है और उसे उँगलियों से महीन काम करने में कमजोरी है तो आप यूट्यूब पर इस विषय पर बहुत सारे वीडियो पायेंगे कि उँगलियों को महीन काम करने के लिए कौन सी एक्सरसाइज़ या थैरेपी कैसे करें।

बहुत से थैरेपिस्ट और विशेषज्ञ इस तरह के वीडियो बनाते हैं और बहुत से माता-पिता या विकलांग व्यक्ति अपने अनुभवों के वीडियो बनाते हैं,  जिनसे आप घर बैठे सीख सकते हैं। वीडियो का फायदा है कि आप घर बैठे अपनी भाषा में सीख सकते हो और अपनी कोशिशों को मोबाइल से इंटरनेट पर डाल कर लोगों से सलाह माँग सकते हो।

अंत में

करीब पैंतिस-चालिस साल पहले जब मैंने विकलांग बच्चों के साथ काम करना शुरु किया था, उस समय स्थिति बहुत खराब थी। गाँव और छोटे शहरों में रहने वाले लोगों के पास न सही अस्पताल या उपचार केन्द्र थे, न थैरेपिस्ट और विशेषज्ञ। तब हम ऐसे विषयों पर सरल किताबें बनाते थे, और विभिन्न देशों के गाँवों जा कर वहाँ स्वास्थ्य सेवकों, स्वयंसेवको और परिवार वालों को सिखाते थे कि विकलांग व्यक्ति या बच्चे के लिए क्या करें, कैसे करें। आज अस्पताल, थैरेपिस्ट आदि भी अधिक हैं पर उससे भी महत्वपूर्ण बात है कि लोगों को इस बारे में जानकारी मिलना अधिक आसान हो सकता है और आप एक-दूसरे से भी सीख सकते हो।

आधुनिक तकनीकी, इंटरनेट और कृत्रिम-बुद्धि आदि की मदद से आप खुद इसके बारे में अधिक जानकारी पा कर, अपने लिए और अपने परिवार के लिए बेहतर उपचार खोज सकते हैं। 

बहुत से देशों में विकलांग एसोसियशन बनी हैं जो इस काम में आप को सहारा दे सकती हैं। सरकारों ने भी इस दिशा में नये कानून और सेवाएँ शुरु की हैं। आप को अपने क्षेत्र की विकलांग एसोसिएशन से संबध बनाने चाहिये और अगर आप के क्षेत्र में नहीं हो तो आप को खुद ऐसी एसोसिएशन बनाने का सोचना चाहिये।

अगर इस बारे में आप को कोई प्रश्न या सुझाव हैं तो नीचे टिप्पणी लिखें, मैं उसका उत्तर देने की कोशिश अवश्य करूँगा।

*****


रविवार, अक्टूबर 04, 2026

कुँवर नारायण - तीन कविताएँ

"कल्पना" पत्रिका हैदराबाद से निकलती थी। इसका कार्यालय 516 सुल्तान बाज़ार में था और इसके प्रकाशक मधुसूदन चतुर्वेदी थे। जुलाई 1960 में इसके सम्पादक मँडल के सदस्य थे - डा. आयेन्द्र शर्मा (प्रधान), मधुसूदन चतुर्वेदी, बद्रीविशाल पित्ती, मुनीन्द्र, जगदीश मित्तल (कला), गौतम राव।

उन दिनों में मेरे पिता ओम प्रकाश दीपक हैदराबाद में रहते थे और "मैनकाईन्ड" नाम की अंग्रेज़ी पत्रिका के लिए काम करते थे जिसका दफ्तर "कल्पना" के साथ जुड़ा था, और दोनों पत्रिकाएँ एक ही प्रकाशक द्वारा, एक ही प्रिटिन्ग प्रैस से छपती थीं।

साथ की हमारी पारिवारिक तस्वीर उन्हीं दिनों की है। यह जून 1960 में ही ली गयी थी जब हम गर्मियों की छुट्टियों में हैदराबाद गये थे, और राजा दुबे के घर पर ठहरे थे। इस तस्वीर में जाने माने उद्योगपति और डॉ. लोहिया की समाजवादी पार्टी के सहयोगी बद्रीविशाल पित्ती भी हैं। यह मेरे छठे जन्मदिन पर खींची गयी थी। उन्हीं दिनों में पित्ती जी के घर पर प्रसिद्ध चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन साहब से भी मुलाकात याद है। 

खैर "कल्पना" के जुलाई 1960 अंक में मेरे पिता की एक कहानी छपी थी, जिसे इस ब्लॉग पर छापने की बहुत दिनों से सोच रहा था। आज जब वह पत्रिका निकाली तो उसमें कुँवर नारायण की तीन कविताएँ देखीं जो मेरे विचार में इंटरनैट पर उपलब्ध नहीं हैं। उन्हें साझा कर रहा हूँ। अगले दिनों में "कल्पना" के इस अंक से कुछ अन्य सामग्री भी साझा करने का विचार है।

***

कुँवर नारायण की तीन कविताएँ

बन्धु यह तो ...

डूब कर जो कुछ उबारा
ज़िन्दगी है;
टूट कर जो कुछ सँवारा
ज़िन्दगी है;
आँख के नम आईने में चकमकाती सूरतें
सूरज नहीं हैं
जो छलक कर दूसरा सूरज बना लें !
दीखती हैं क्यों कि कोई देखता है,
देखती हैं क्योंकि कोई दीखता है;
और वह स्रष्टा
वही स्रष्टा नहीं है
आस्था जिसके सृजन में
कभी रक्खी कभी चकनाचूर की ।
 
ज़िन्दगी आखिर रहे क्यों
याचना जैसे किसी मजबूर की ?
बन्धु, यह तो
देन है अच्युत लबालब आत्मा की,
सृष्टी छलकन है किसी भरपूर की ।
 

सवेरे-सवेरे

 
कार्तिक की एक हँसमुख सुबह ।
नदी-तट से लौटती गंगा नहा कर
सुवासित भीगी हवाएँ
सदा पावन
माँ सरीखी
अभी जैसे मन्दिर में चढ़ा कर खुशरंग फूल
ठंड से सीत्कारती घर में घुसी हों,
और सोते देख मुझको जगाती हों ----
सिरहाने रख एक अँजुलि फूल हरसिंगार के,
नर्म ठंडी उँगलियों से गाल छू कर प्यार से,
बाल बिखरे हुए तनिक सँवार के ...
 

कार्निस पर

 
कार्निस पर
एक नटखट किरण बच्चे-सी
खड़ी जंगला पकड़ कर,
किलकती है, "मुझे देखो !"
 
साँस रोके ---
बाँह फैलाए खड़ा गुलमुहर ...
कब वह कूद कर आ जाये उसकी गोद में !
 
*** 

मंगलवार, सितंबर 22, 2026

लेखन यात्रा - अलका सरावगी

अलका जी मेरी जान-पहचान बीस-पच्चीस साल पहले अशोक जी (अशोक सेकसरिया) की वजह से हुई थी। अशोक जी, जैसा कि आप अलका जी के साक्षात्कार में पढ़ेंगे, ने उनके सृजनात्मक जीवन में महत्वपूर्ण भाग निभाया था। वैसे मैं अशोक जी को बचपन से जानता था जब वह दिल्ली में रहते थे और मेरे पिता ओम प्रकाश दीपक के साथ समाजवादी पत्रिका 'जन' में काम करते थे और अक्सर हमारे घर आते थे।

अलका सरावगी 2016 में इटली में वेनिस युनिवर्सिटी में - तस्वीर डॉ. सुनील दीपक

उसके बाद बीच-बीच में किसी न किसी वजह से अलका जी से पत्राचार होता रहता था। उनके तीन उपन्यास इतालवी भाषा में अनुवादित हो कर छपे हैं और उन्हें इतालवी सरकार का Order of the Star Cavelier सम्मान भी मिल चुका है।

कुछ साल पहले वह वेनिस युनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में अपने लेखन के बारे में बोलने आयीं थीं तो मैं उन्हें सुनने गया था, लेकिन घर लौटने वाली ट्रेन के छूटने की चिंता में, बाद में वहाँ रुक कर उनसे बात नहीं कर पाया था। पिछले साल कलकत्ता जा कर उनसे मिलने की बात थी, पर वह भी नहीं बन पाई थी।

बहुत समय से सोच रहा था कि अपने इस ब्लॉग के लिए उनसे बातचीत करूँ। यह आलेख एक प्रश्न-उत्तर के रूप में शुरु हुआ था। उसमें मैंने उनके कुछ वीडियो देख कर, कुछ अन्य बातें जोड़ीं। इस बातचीत को आप अलका जी की जुबानी ही पढ़ सकते हैं।  

अलका सरावगी की जुबानी

व्यक्तिगत

हमारा एक मध्यवर्गीय मारवाड़ी परिवार था, जहां लड़कियों को रोका-टोका जाता है कि ऐसे मत करो, वैसे मत बोलो। इसे मैंने बहुत रज़िस्ट किया। घर के काम देखने-सीखने में मेरा मन नहीं लगता था, इसलिए खाना बनाना भी नहीं सीखा जबकि मां बहुत अच्छा खाना बनाती थी। घर के काम में मन इसलिए भी शायद नहीं लगा क्योंकि बहुत प्यार करने वाली दादी ने बचपन में कान में फूंक दिया था कि भगवान ने तुम्हें चौका-चूल्हा घर-वर संभालने नहीं भेजा है।

जब सब सहेलियाँ मिल कर कोई फिल्म देखने जाती थीं तो हमें अनुमति नहीं मिलती थी। इन सब बातों को ले कर मन में गुस्सा और विद्रोह का भाव था, और पिता जी की बहुत सी बातें गलत लगती थीं। बारह-तेरह साल की थी जब पीरियड शुुरु हुए तो सब कहते कि यहां मत बैठो, वहां मत बैठो, यह मत छूओ, वगैरा, तो उससे बहुत घुटन होती थी। 

मेरे पिता जी अपनी लड़कियों को आगे बढ़ाना चाहते थे, उन्हें गाड़ी चलाना सिखवाया था। स्कूल में स्विमिंग पूल था तो मैंने तैरना भी सीखा था। एन.सी.सी में भर्ती हुई थी और उसके कैम्प में रोने-धोने के बाद जाने दिया गया था। कांचरापाड़ा कैम्प में पिता गाड़ी की डिक्की भरकर पच्चीस लड़कियों का खाना लेकर पहुंचे थे। वे छह फुट लंबे शानदार व्यक्तित्व वाले थे। स्कूल के वार्षिक समारोह में किसी नाटक के बाद मुख्य पात्र निभाने वाली लड़की को उन्होंने हॉल में खड़े हो कर अपनी तरफ़ से मेडल घोषित कर दिया था। उन पर गर्व करने के हमारे पास तमाम कारण थे। मेरे हमेशा फर्स्ट आने पर उन्हें भी बहुत गर्व था, पर मेरे साथ ही पढ़ने वाली बड़ी बहन के कारण वे इसे छुपा लेते थे। या शायद इसलिए कि मेरे पाँव धरती पर रहें।

दो बड़ी बहनों की कम उम्र में शादी हुई तो उनके जीवन को देख कर लगता था कि आगे मुझे भी वैसा ही जीवन मिलेगा। स्कूल के दिनों में "सारा आकाश" पढ़ रही थी और मन ही मन में विद्रोही बन रही थी, सोचती थी कि उस उपन्यास की प्रभा जैसा ही मुझे भी कोई ससुराल मिलेगा जहां लोग तरह-तरह के ताने कसेंगे। मां से कहती थी कि बंगाली घर में पैदा होती तो अच्छा होता, वह लोग मेरे पढ़ने लिखने पर खुश होते। मेरी बहनों का तो बीे.ए. भी नहीं हुआ था जब उनकी शादी हुई थी। ग़नीमत थी कि मेरी शादी बीस साल की उम्र में जाकर हुई, जब मैंने बी.ए. पास कर लिया था।

बाहरी तौर पर मेरे ससुराल का परिवार उस तरह से मॉर्डन नहीं था जैसा पीहर में था। पिता पैंट-शर्ट पहनते और शौक से रहते। अंग्रेज़ी में फर्राटे से बोलते और शेरो-शायरी उन्हें कंठस्थ थी। ससुर धोती-कुरते वाले थे और सास सीधे पल्ले से साड़ी पहनतीं, जबकि माँ उल्टे पल्लेवाले आधुनिक अंदाज़ में।

लेकिन, ससुराल में अपेक्षकृत पिता की तरह मजबूती से मुझे  हां या नहीं कहने वाले लोग नहीं थे। पिता की इच्छा के सामने अपनी चलाई नहीं जा सकती थी। उनके गुस्से से भी सबको डर लगता था। मेरी सास की तरफ से सहयोग था, वह पढ़ने-लिखने की बहुत क़दर करती थीं। वे बहुत धार्मिक थीं और शायद इसीलिए हर आत्मा को उसके प्रवाह से रोकने के पक्ष में नहीं थीं। उनका हमेशा सहयोग रहा।

मैंने शादी के बाद ही एम.ए. किया, फिर एम.फिल. किया। पति कहते थे कि बिना झगड़ा-झमेला किये जो कर सकती हो वह करो। वह समर्थन करते थे। लेकिन वैसी उन लोगों का सोच नहीं थी, यह बिना कहे ही ज़ाहिर था कि उस समय अगर कोई घर का काम होता तो वही ज्यादा ज़रूरी माना जाता था। 

जब मेरे एम.ए. के इम्तहान चल रहे थे तो मेरे ससुर ने मुझे बुलाया, पूछा कि क्या कर रही हो, तो मैंने कहा कि पढ़ रही हूँ। बोले कि इतना पढ़ना क्या जरूरी है? मुझे समझ में नहीं आया कि क्या कहूं। अगर बचपन से स्कूल में टॉपर रहे हों तो मन में हमेशा टॉपर रहने की भावना रहती है। वहां हमारी स्पेस मेरा बैडरूम ही था, वहां पर हर ओर किताबें ही किताबें बिछा रखी थीं। एम.ए. में फर्स्ट क्लास फर्स्ट आया तो सब खुश भी हुए।

उन दिनों में कुछ लिखने की याद तो बिल्कुल नहीं है। तब तक मैंने पी.एच.डी. और लेक्चरार बनने की परीक्षाएं दे डाली थीं। एक कॉलेज में पार्ट-टाइम नौकरी मिली, तो समझ में आया कि पढ़ाना मेरे बस की बात नहीं है। मैं अपनी ऊर्जा सिर्फ़ लिखने के लिए बचाना चाहती थी।

मेरी दादी

मेरे ख्याल से मैं तीन या चार साल की थी, मेरी दादी सुंदरकांड का पाठ करती थीं। तब मुझे पढ़ना नहीं आता था, पर दादी से सुन कर मुझे सुंदरकांड पूरा याद हो गया था। मैं उसे पूरा रिसाइट कर सकती थी, जो कि काफी बड़ा है। तब हमारे घर में यह चलन था कि अगर कोई भी बाहर का आदमी आता तो कहते कि सुंदरकांड वाली लड़की को बुलाओ। सबके सामने कहा जाता कि सुंदरकांड सुनाओ तो मैं सुना देती थी, पर लोग सुनते-सुनते बोर हो जाते थे, तो कहते थे, अच्छा, ठीक है।

मुझे अपनी दादी से बहुत प्रेम था। वह मुझे अपने जीवन की बहुत सी बातें बताती थीं, कि कैसे वह लोग राजस्थान से कलकत्ता आये, कलकत्ता में शादी होने के बाद वह वापस राजस्थान चली गयीं, वहां से आते-जाते रहे, परिवार में क्या-क्या घटनाएं - दुर्घटनाएं घटीं, वह क्या खाती-पीती थी, कैसे उनका जीवन बदल गया। उन्हें मुझ में एक श्रोता मिला हुआ था, और मुझे उनकी बातों में बहुत रस आता था। उनके चेहरे की एक-एक रेखा, एक-एक झुर्री तक, मुझे आज भी याद है।

वह मुझे कहती थीं कि ऊपरवाले ने तुम्हें यह सब सामान्य काम करने के लिए नहीं, कुछ और करने के लिए बनाया है। वह और काम क्या था या क्या हो सकता है, उसकी उन्हें कोई स्पष्ट कल्पना नहीं थी। लेकिन उनकी यह बात मेरे भीतर कहीं पर रह गयी और पनपती रही।

बचपन

हमारे बचपन के ज़माने में स्क्रीन तो था नहीं। किताबें और पत्रिकाएं घर में आती थीं और चाव से पढ़ी जाती थीं। माँ पापुलर उपन्यास पढ़ती थीं—शिवानी, रानू,ओम प्रकाश शर्मा, आचार्य चतुरसेन, ये कुछ नाम तो बिलकुल याद हैं। मुझे बचपन से पढ़ने का बेहद शौक़ था। जो कुछ मिल जाए उसे पढ़ डालती थी। धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान आदि पत्रिकाएँ, चंदामामा और चंपक के साथ पढ़ी जाती थीं। अक्सर मैं अपनी उम्र से ज़्यादा बड़ी किताब पढ़ लेती थी। बाद में चौदह साल की उम्र से अंग्रेजी में एनिड ब्लाइटन की किताब जन्मदिन पर किसी ने दी। उसके बाद उनका चस्का लगा और फिर आगे चलकर शेरलॉक होम्स, अगाथा क्रिस्टी, सिडनी शेल्डन पढ़ी गईं। जो कुछ मिल जाए वही पढ़ा जाता था। मेरी दादी दोस्तोवेस्की का हिंदी अनुवाद पढ़ती थीं। घर में साकेत, यशोधरा जैसी मैथिली शरण गुप्त की रचनाएँ थीं। पिता ग़ज़ल और गीतों के शौकीन थे और बाकायदा एक कॉपी रखते थे जिसमें उन्हें उतारते थे।

स्कूल में पढ़ने में अच्छी थी इसलिए शिक्षिकाओं की प्रिय थी। स्कूल की लायब्रेरियन भी मुझे अच्छी विद्यार्थी समझती थी, आठवीं में आते-आते मैंने प्रेमचंद के मानसरोवर के सारे खंड, और अन्य जो लेखक हमारे स्लेबस में होते और लायब्रेरी में उनकी किताबें मिल जातीं तो उनको पढ़ने लग जाती थी।

इस तरह से शब्दों से मेरा लगाव गहरा था और सब को मालूम था। बचपन में स्कूल की पत्रिका के लिए एकाध बार कुछ लिखा, पर विशेष कुछ नहीं लिखा। अलबत्ता परीक्षा में निबंध में हमेशा सबसे अधिक मार्क्स मिलते रहे। घर पर खाना खाते हुए पढ़ना मना था, पिता जी नाराज होते थे, इसलिए जब उनकी आवाज़ सुनती थी तो किताब को कुर्सी पर अपने नीचे रख कर उस पर बैठ जाती थी। पंडित रामचन्द्र शुक्ल का हिंदी साहित्य का इतिहास घर में पता नहीं कहां से आया था, वह भी पढ़ती रहती थी। हिंदी साहित्य से मेरा परिचय उसके माध्यम से हुआ, वह पुरानी प्रति अभी भी मेरे पास सुरक्षित है।

पढ़ना

कॉलेज के दिनों में अंग्रेज़ी की बहुत किताबें पढ़ी गईं । एक सहेली के घर में बहुत सारी किताबें थीं - आर्थर हेली, लियोन यूरी खासकर पढ़े गए। ऐन रेंड की ‘फ़ाउंटेनहेड’ ने मुझे बहुत प्रभावित किया। अंग्रेज़ी के बेस्टसेलर टाइप के तमाम उपन्यास पढ़े जो मिल जाते थे। सॉमरसेट मॉम के उपन्यास और कहानियाँ पढ़ना याद है।

मैंने हिंदी साहित्य जो मैंने दसवीं-ग्याहरवीं क्लास तक पढ़ा था, उसके बाद कॉलेज में पढ़ते समय वह छूट गया था, तब अंग्रेजी साहित्य पर अधिक जोर था। अशोक जी से मिलने के बाद मैं हिंदी साहित्य की ओर लौटी। अशोक जी कहते थे कि हमेशा एक डायरी रखिए और उसमें लिखिये। इसलिए डायरी रखी, जिसमें उनकी बातें सुनकर लिख लेती कि कौन सी किताबें पढ़नी है।

संयुक्त परिवार में रहते हुए और बच्चों के कारण, मेरे पास अपने लिए समय बहुत कम होता था। मैं अक्सर अपने उपन्यास की थीम से संबंधित नॉन-फिक्शन की किताबें पढ़ती रहती हूँ। समकालीन हिंदी साहित्य भी काफ़ी पढ़ती हूँ। प्रकाशक या लेखक मित्र कविता, कहानी, उपन्यास की किताबें भेज देते हैं, तो कोशिश करती हूँ कि उन्हें पढ़ कर फेसबुक पर ही सही, कुछ लिखूँ। मोबाइल पर ऑनलाइन वेब-साइट्स पर लेख और कहानियाँ पढ़ी जाती हैं। पत्रिकाओं में प्रकाशित किसी कहानी की चर्चा हो तो उसे खोज कर पढ़ती हूँ।

मेरा बेटा अंग्रेज़ी के बुकर और नोबेल पुरस्कृत लेखकों को बहुत पढ़ता है। पर वे किताबें आसपास रहते हुए भी नहीं पढ़ पाती हूँ, इसका अफ़सोस रहता है।

अशोक सेकसरिया और लेखन की शुरुआत

पच्चीस साल की उम्र में, जब मेरी शादी और दो बच्चे हो चुके थे, मुझे मेरे गुरु लेखक-पत्रकार अशोक सेक्सरिया मिले। बच्चों के लिए शब्दकोश बनाने के प्रोजेक्ट में उनसे परिचय मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट था। जिस दिन मैं पहली बार बालकोश के दफ्तर में गयी, तभी समझ गयी थी कि मेरे जीवन का यही अर्थ है। वहां चारों ओर किताबें थीं, बातें थीं, लोग थे। अशोक सेकसरिया मुझे वहाँ मिले, वही मेरे गुरु और मैंटोर बने। वह एक जाने माने लेखक और पत्रकार थे। उसके बाद मैंने सोचा नहीं कि इस माहोल के बाहर भी मेरा कोई जीवन है।

अशोक सेकसरिया व अलका सरावगी - तस्वीर अलका सरावगी के सौजन्य से

अशोक जी को अपने बारे में कुछ भी बताने से वह कहते थे, इसे लिख डालिए। मुझे लगता कि इतनी मामूली बातों को कौन पढ़ेगा? बहरहाल मैंने 'अंग्रेज़ी स्कूल में पहला दिन' शीर्षक से एक फीचर लिख डाला जो कलकत्ता की एक पत्रिका में छपा, जिसके राजकिशोर जी संपादक थे। जब मैंने उसे पढ़ा तो मैंने उसमें एक वाक्य था, "कितना कातर था वह बचपन", तो उसमें अशोक जी ने 'कातर' शब्द को काट करके कुछ और शब्द लिख दिया था, तो मुझे बहुत बुरा लगा। मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने उस पर काफी बहस की। तब अशोक जी ने अपनी गलती मान ली कि उन्हे उस शब्द को बदलना नहीं चाहिए था और खासकर कि मुझसे बिना पूछे। बाद में आगे चलकर अशोक जी ने मुझे बताया कि इस बात से उनको लगा था कि मैं अपने शब्दों के प्रति बहुत सजग हूं और अपने शब्द के लिए मैं उनसे लड़ पड़ी थी तो इस बात के लिए उनके मन में मेरे प्रति बहुत सम्मान हुआ था।

समाजवादी आंदोलन के लोगों की पत्रिका "सामयिक वार्ता" निकलती थी, अशोक जी उसके लिए बहुत काम करते थे, हर समय उसके लिए अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद करते रहते थे। सच्चिदानंद सिन्हा, किशन पटनायक जैसे लोग वहाँ आते रहते थे। मेरी पॉलीटिकल अवेयरनेस की शिक्षा-दीक्षा उनके कमरे में हुई, जो कि रेलवे प्लेटफार्म की तरह का कमरा था जिसमें सिर्फ किताबें और सिगरेट का धुआं और धूल रहती थी। अशोक जी की खटिया थी, हमेशा उस पर बैठे रहते थे। पास में कुछ टूटी-फूटी कुर्सियाँ रहती थी जिन पर हम लोग बैठे रहते थे।

उनके घर पर बहुत सारे लेखकों से मेरा परिचय और मिलना हुआ - कृष्णा सोबती, निर्मल वर्मा, गिरधर राठी, अशोक वाजपेयी, विभूति नारायण राय। यह सारे लोग जब कलकत्ता आते तो अशोक जी से मिलने आते और मेरे लिए यह एक ट्रेनिंग स्कूल था, जहाँ सुनने के लिए बहुत सारी बातें मिलती थी और सुनने में बड़ा आनंद आता था।

जब मुझे साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला तो अशोकजी इस बारे में बहुत चिंतित थे। उन्हें लगा मैं आगे लिख नहीं पाऊँगी।  खैर पुरस्कार मिला और उसके बाद भी मैं लिखती रही। अशोक जी को शायद इससे आश्वासन भी मिला होगा कि एक पुरस्कार मुझे नष्ट नहीं कर पाया, जैसा कि मैं उनको बार-बार कहती थी कि ऐसा नहीं होगा।

मेरे लेखन में और मेरे जीवन जीने के तरीके में, अशोक जी की एक बहुत बड़ी उपस्थिति हमेशा रही। वह ऐसे गुरु थे जो कुछ भी नहीं सिखाता है, कुछ भी नहीं पढ़ाता है,  फिर भी उसका होना ही एक तरह की एक मिसाल थी। 

कहानियाँ

तीस साल की उम्र में पहली कहानी छपने के बाद, मैं उत्साह में भर कर लगातार लिखती गई।

शायद 1989 में, हम सब परिवार सहित कलकत्ते के पास किसी के घर में दो दिन के लिए गए थे। वहां मुझे एक शक्स दिखाई दिया जो कुछ अजीब सा दिखता था, मुंह फाड़ कर मुस्कराता था, ऐसा ढीला पजामा पहने था कि वह लहंगे की तरह फट-फट करता चलता था। वह हंसता रहता था और हमारी सेवा-टहल ऐसे करता था जैसे घर का नौकर हो, लेकिन वह खाता हम सब के साथ में था और रहता भी उसी घर में सब के साथ था। घर में उसका स्थान क्या है, मुझे यह समझ में नहीं आता था। जब हम लौट रहे थे तब मैंने देखा कि वह रो रहा था। इसलिए जब गाड़ी चल पड़ी तो मैं बड़ी उदास हुई और मैंने उसके बारे में जानना चाहा। पहले तो उन लोगों को समझ में नहीं आया कि हम किसकी बात कर रहे हैं, क्योंकि अन्य लोगों के लिए जैसे वह था ही नहीं, अदृश्य सा था। बोले, कौन, वह पागल? तो मैंने कहा कि वह पागल नहीं है, तो सब हंस पड़े और खूब हंसे।

उस पर मैंने एक कहानी लिखी - "आपकी हँसी"। अशोक जी ने कहा कि रवींद्र कालिया है और यह उनका पता है यह भेज दीजिए। इस तरह से उस कहानी को "वर्तमान साहित्य" के महाविशेषांक में भेजा। निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती जैसे लेखकों के साथ, वह 'प्रथम रचना' करके छपी और चर्चित हुई। मेरे पास बहुत सारी चिट्ठियां आईं कि ऐसा आदमी, हाशिए पर फेंका हुआ मार्जिनलाइज्ड आदमी, जिसकी तरफ हम कभी ध्यान भी नहीं देते हैं और वह दिखता ही नहीं है, उन सबकी ज़िंदगी में कहीं न कहीं मौजूद था।

1996 में मेरा पहला कहानी संग्रह आया। वह कहानियाँ आसपास के जीवन और उससे जुड़े सोच पर आधारित थीं। कुछ स्त्री होने के अनुभव पर भी थीं, हालाँकि उनमें स्त्री-विमर्श या फेमिनिज्म नहीं था। शिल्प की दृष्टि से उनमें कुछ नयापन भी था।

उपन्यास

कलिकथा की शुरुआत भी एक कहानी की तरह हुई थी। उसका शीर्षक था, "बीच वाला कमरा कहाँ है"। यह हमारे किसी परिचित के हार्ट के बाइपास करवा कर लौटने पर कही गई बात पर आधारित थी। पर वह कहानी दो पैराग्राफ के बाद रुक गई थी। आज़ादी के पहले जब बीच वाला कमरा नहीं था, उस समय को खोजते हुए इस कहानी ने उपन्यास का विराट रूप धारण कर लिया।

अलका सरावगी व प्रो. थॉमस दाह्नहार्ट, 2016 में इटली में वेनिस युनिवर्सिटी में - तस्वीर डॉ. सुनील दीपक

 

मेरी कहानियाँ ‘आधार प्रकाशन’ ने हज़ारों प्रूफ की गलतियों के साथ छापी थीं। कलकत्ता के पुस्तक मेले में आए प्रकाशक को मैंने चाय पर घर बुलाया और कह दिया कि मेरे पास बन्दूक होती तो मैं उन्हें गोली मार देती। फिर अपने गुस्से का प्रायश्चित करने के लिए उन्हें ही उपन्यास दिया। उन्होंने भी उसे ऐसा बढ़िया छापा कि निर्मल वर्मा तक हाथ में लेकर देर तक कवर देखते रहे। कलिकथा पर अनेक पत्र आए— समीक्षाएँ भी झोली भर कर आयीं। यह सब मेरी आशा से परे था।

कलिकथा के बाद कुछ एक ऐसी दुर्घटना घटी जिससे मैं डिप्रेशन में चली गई। पांच-छह महीने तक किसी की कोई बात सुनने-कहने का, कुछ भी करने का, दिल नहीं होता था। तब एक मीटिंग के लिए फोन आया। घर वाले भी सब कह रहे थे कि तुम उठो, घर के बाहर निकलो, तो मैंने सोचा कि चलो ठीक है, वहां जा कर बैठ जाते हैं।

मैं वहां गई तो मुझे एक महिला मिलीं, उन्होंने बिल्कुल दादी की जैसी सफ़ेद साड़ी पहनी थी, दादी जैसा उनका स्नेहिल  चेहरा था। उन्होंने कहा कि अरे हमने तुम्हारी कलिकथा पढ़ी है। वह मुझे अपने जीवन की कहानियां सुनाने लगींं, तो मैंने उन्हें कहा कि आप की कहानियां इतनी सशक्त हैं, आप इन पर क्यों नहीं लिखती हैं। इस पर उन्होंने कहा कि नहीं, मैं लिख नहीं सकती, तुम्हें लिखना हो तो तुम लिखो। इस तरह से "शेष कादंबरी" की शुरुआत हुई और उसे लिखते हुए मेरा डिप्रेशन गायब हो गया और मैंने अपने आप को जैसे फिर से डिस्कवर किया, कि अल्टीमेटली मैं लेखक हूं और जीवन में चाहे कितना भी बड़ा कुछ भी हो जाए, मैं हार नहीं मान सकती। "शेष कादंबरी" ने इस तरह से मेरा उद्धार किया। मेरे शब्दों ने और लेखन ने मुझे फिर से जीवन जीने की हिम्मत दी है।

मेरे उपन्यास "गांधी और सरलादेवी चौधरानी" में गांधी जी एक मुख्य पात्र के रूप में है। गांधी जी को जानना भी मेरे लिए एक यात्रा थी, यह समझना कि किस तरह से उन्होंने अपने को बनाया, किस तरह से उन्होंने उस समाज को बनाया जिसने आजादी के लिए लड़ाई लड़ी। गांधी की क्या सोच थी, उनकी कितनी अंदरूनी ताकत थी जिसके भरोसे वह खड़े हो जाते थे, उन्हें भरोसा होता था कि वह ऐसा बदलाव ला सकेंगे। मैंने इस किताब में गांधी के जीवन का एक साल का पीरियड लिया है जो जलियांवाला बाग के 6 महीने बाद से शुरू होता है जब गांधी जी पहली बार लाहौर गए थे।

सरलादेवी चौधरानी, लाहौर के देशभक्त वकील-पत्रकार रामभज दत्त चौधरी की पत्नी थी और रवींद्रनाथ टैगोर की बहन की लड़की थीं। गांधी जी उन्हें एक सहयोगी नेता की तरह देख रहे थे क्योंकि वह इस देश की औरतों में जागृति लाना चाहते थे। सरलादेवी चौधरानी के साथ उनका यह एक साल का जीवन, उसे आप प्रेम प्रसंग भी कह सकते हैं या एक तरह का सपना जो वह देख रहे थे। सरला देवी एक ऐसा चरित्र है जो अपने समय के बहुत आगे देख सकता है, सोच सकता है।

गांधी और सरलादेवी में बहुत ही फोकस है, देश ही उनके लिए सब कुछ है और देश की आज़ादी के अलावा कुछ नहीं था। व्यक्तिगत कुछ भी महत्व नहीं रखता है। प्रेम के लिए वे दोनों तैयार नहीं थे। पर प्रेम हुआ और गांधी ने अपने पत्र में इसे साफ़ स्वीकार किया। इस तरह से यह एक ह्यूमन साइकोलॉजी का, एक स्त्री पुरुष के बीच के संबंधों का, दोनों ही का एक बहुत ही अनयूजुअल चरित्र हैं।  वह सम्बंध क्यों टूटता है और किस तरह टूटता है,यह उपन्यास उसकी बात कहता है।

मेरे पांचवें उपन्यास, "जानकीदास तेजपाल मेन्शन" को अपेक्षित सराहना नहीं मिली, ऐसा मुझे लगा। अपने बच्चे सबको श्रेष्ठ लगते हैं, इसलिए अपनी राय को ज़्यादा महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। कई साल बाद उसे इंदु शर्मा कथा यू.के. में सम्मान मिला, तो तसल्ली ज़रूर हुई। 

लिखना

मैं यह कह सकती हूँ कि पात्र का चुनाव और विषय बहुत कुछ संयोग पर आधारित होता है। अचानक कोई कहानी आप को पकड़ लेती है और आप उसमें धँसते चले जाते हैं। वह सोते-जागते नए रूप लेती रहती है और जीवन के जिस छोटे ग्राफ से वह शुरू हुई थी, वह फैलता जाता है। पात्र बिल्कुल वही नहीं रहते जहाँ से उन्हें शुरू में देखा था। वे जैसे ख़ुद को लिखवाते हैं जिसमें आप का पढ़ा- लिखा- देखा- सुना हुआ अनायास जुड़ता जाता है। कोई योजना से वे नहीं चलते।

लिखते हुए यदि यह भय रहे कि कोई आपको ग़लत समझ लेगा या कोई शख़्स उसे असली ज़िंदगी में पहचान कर आप से नाराज़ हो जाएगा, तो लिखा जा नहीं सकता। मेरे साथ ऐसा हुआ भी है। पर यह ख़तरा उठाये बिना जीवन रचा नहीं जा सकता।

हमको पहले का सब कुछ अनलर्न करके लिखना होता है और अगर आप अनलर्न नहीं कर पाते हैं तो फिर आप कहीं न कहीं अपने आप को दोहराने लग जाते हैं।

पात्र लेखक को अपनी अंगुली पकड़ा कर मनमाने तरीके से चलाते हैं। उसमें बहुत कुछ प्रीमेडीटेटेड नहीं होता, वह भी एक यात्रा होती है, डिस्कवरी की। पात्रों के साथ चलते हुए, आप लिखते भी हैं और साथ-साथ अपने आप को भी जानते चलते हैं, क्योंकि लिखा किरदार आपसे अलग भी होता है और वह आपका अपना ही होता है, खासकर जब तक किताब छप नहीं जाए।

अन्य लेखक

हिंदी के अन्य लेखकों से अधिकतर मेरे औपचारिक संबंध ही रहे हैं क्योंकि कलकत्ता में रहते हुए मिलना-जुलना कम होता है। अनामिका, गीतांजलि श्री, प्रत्यक्षा, प्रियदर्शन, रजनी गुप्त, उदयन वाजपेयी, यतीश कुमार, अम्बर पांडे कुछ नाम हैं जिनसे अपनापन महसूस हुआ है। अन्य भाषाओं के लेखकों में असम के नीलिम कुमार हैं। अभी उनकी आत्मकथा पढ़ रही हूँ। गुजराती में ग़ुलाम मोहम्मद शेख हैं। बांग्ला और अंग्रेज़ी के कई लेखक हैं। 


***** 

 

मंगलवार, अप्रैल 28, 2026

गुवाहाटी जाने की यात्रा

आज से दस साल पहले अप्रैल 2016 में, मैं भारत में दो साल के गुवाहाटी प्रवास के बाद इटली लौटा था।

आज जब उस दसवीं वर्षगाँठ की बात अचानक याद आ गयी तो सोचा कि क्यों न उन दिनों की यादों को ताज़ा किया जाये और उन दिनों पर एक आलेख लिखा जाये। तीन दशकों तक विदेश में रह कर स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने के बाद, जब 2014 में मैंने भारत जाने की सोची थी तब गुवाहाटी जाने का विचार मन में नहीं था, बल्कि कुछ अन्य काम करने की सोची थी।

सोचता था कि कहीं मन का काम नहीं मिलेगा तो किसी मन-पसंद छोटे शहर में जगह को खोज कर वहाँ अपना छोटा सा क्लीनिक खोल लूँगा। लेकिन अपना क्लीनिक खोलने से पहले, मैं कुछ मित्रों के पास रह कर देखना चाहता था कि शायद उनके साथ मन लग जाये, सोचता था कि वह बेहतर होगा क्यों कि मैं अकेले रहने के विचार से डरता था।

हम कुछ सोच कर चलते हैं और नियति हमें किसी ओर दिशा में ले जाती है। आज के इस आलेख में मेरी गुवाहाटी पहुँचने की उस यात्रा के विभिन्न पड़ावों की बाते हैं। 

केसला, मध्यप्रदेश 

सारा जीवन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने के बाद मैंने निश्चय किया था कि 2014 में, अपनी साठवीं वर्षगाँठ पर मैं नौकरी से इस्तीफा दे कर कुछ समय भारत में बिताने जाऊँगा। मेरी वह यात्रा केसला के गाँव से शुरु हुई।

मेरी बात सबसे पहले इटारसी के पास, केसला (मध्यप्रदेश) में ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत समाजवादी विचारधारा वाले सुनील जी से हुई थी। वह वहाँ पर बहुत समय से गरीब लोगों के विकास और मानव अधिकारों के लिए काम कर रहे थे। मैंने सोचा था कि उनके साथ काम करूँगा। जब अप्रैल 2014 में मुझे उनकी अकस्मात मृत्यु का समचार मिला तो गहरा धक्का लगा। मुझे लगा कि उनके बिना शायद वहाँ पर काम करना नहीं हो पायेगा, फ़िर भी भारत पहुँच कर सबसे पहले मैं उनके घर पर केसला ही गया था।

केसला गाँव, मध्यप्रदेश

सुनील जी की पत्नि मॉन्टी (स्मिता) से मेरा दूर का रिश्ता भी है, और हमारी पुरानी जान-पहचान भी थी। केसला में मैं कुछ दिन उनके साथ उनके घर पर रहा, सुनील की के विभिन्न साथियों से मेरी जान-पहचान हुई। लेकिन मुझे लगा कि सुनील जी के अचानक जाने की वजह से वहाँ जो जगह रिक्त हुई थी, उसका घाव उस समय बिल्कुल ताज़ा था। मैंने सोचा कि पता नहीं, उनके बिना, बाकी के उनके साथी उस काम को किस तरह आगे चला पायेंगे?

यह भी सोचा कि वहाँ सुनील जी के न होने से, वहाँ रह कर स्वास्थ्य के क्षेत्र में कुछ नया काम शुरु करना मेरे लिए कठिन होगा। यह सोच कर मैं वहाँ से चल पड़ा।

बिलासपुर, छत्तीसगढ़ 

तब मैं केसला से बिलासपुर गया। वहाँ पर गनियारी में जन स्वास्थ्य सहयोग के अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के बारे में बहुत प्रशंसा सुनी थी। उन्होंने मुझे वहाँ पर कुष्ठ रोग उपचार और विकलांगता कार्यक्रम में काम करने के लिए कहा, उस काम का विचार भी मुझे बहुत अच्छा लगा था।

जन स्वास्थ्य सहयोग संस्था को डॉ. योगेश जैन जैसे आदर्शवादी डॉक्टरों ने शुरु किया था, उनके साथ काम करने का विचार मुझे बहुत आकर्षित कर रहा था। मैं उनके सामुदायिक स्वस्थ्य कर्मचारियों के साथ कुछ गाँवों के क्लिनिक देखने भी गया।

जन स्वास्थ्य सहयोग का मानपुर गाँव में क्लिनिक, छत्तीसगढ़

लेकिन एक दिक्कत थी, कि उनके होस्टल में जगह नहीं थी, वहाँ काम करने का मतलब था कि मुझे पास के किसी गाँव में अलग घर ले कर रहना पड़ता। मैं अकेला रहने के विचार से डर रहा था। दो-तीन दिन वहाँ रहा, बहुत सोचा, पर मुझे लगा कि मैं वहाँ गाँव में अकेला नहीं रह पाऊँगा। आखिर में मैं वहाँ से निकल पड़ा।

जीवन में कभी-कभी ऐसे अवसर आते हैं जब आप कुछ करने से रुक जाते हैं लेकिन उसके निशान आप के मन में रह जाते हैं। उसके बाद सालों तक आप अपने आप से पूछते हैं कि अगर मैंने वह रास्ता चुन लिया होता तो मेरा जीवन कैसा होता? गनियारी के जन स्वास्थ्य सहयोग में काम करने के बारे में मुझे ऐसा ही लगता रहा है, दुख होता है कि मैंने वहाँ पर अकेले रहने की कोशिश क्यों नहीं की।  

लखनऊ, उत्तर प्रदेश

बिलासपुर से मैं लखनऊ गया जहाँ पर मेरी पुरानी मित्र डॉ. ब्रिजिता का सैंट मेरी क्लीनिक, अस्पताल और नर्सिन्ग कॉलेज था। 

सैंट मेरी की नर्सिन्ग की छात्राएँ, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

अस्पताल और नर्सिन्ग स्कूल के काम के साथ-साथ डॉ. ब्रिजिता आसपास के जिलों में बहुत से ग्रामीण क्षेत्रों में भी सामुदायिक स्वास्थ्य तथा विकलाँग जनों के लिए कार्यक्रम चला रही थीं। मैं उनके पास करीब एक मास रुका।

उनके साथ ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यक्रम में काम करने का विचार था लेकिन भीषण गर्मी में गाँवों में घूमने के एक-दो अनुभवों के बाद मैं समझ गया कि मैं गाँवों के उस कठिन वातावरण में अधिक दिन तक नहीं रह पाऊँगा। इस तरह से मैंने डॉ. ब्रिजिता से भी विदा ली।

मनाली, हिमाचल प्रदेश

मेरे एक अन्य मित्र के पिता मनाली के क्षेत्र में एक स्वयंसेवी संस्था चला रहे थे, जहाँ वह सामुदायिक विकास के साथ-साथ, स्वास्थ्य कर्मियों के साथ भी काम करते थे। लखनऊ के बाद मैं कुछ दिन उनके पास रहने गया। उनकी संस्था का डॉक्टर काम छोड कर चला गया था, उन्हें एक डॉक्टर की आवश्यकता थी। 

उनकी संस्था का अधिकाँश काम मनाली शहर में था पर उनका घर शहर के बाहर, कुछ दूर जा कर था। उनके घर के साथ उनका एक अन्य फ्लैट भी था, उन्होंने कहा कि अगर मैं उनके साथ काम करूँगा तो उस फ्लैट में रह सकता हूँ।

वहाँ बाकी सब कुछ बढ़िया था, लेकिन पहाड़ों के बीच में, सर्दियों में ठंड और हिमपात के साथ, शहर के बाहर उस बहुत सुंदर लेकिन सुनसान जगह में रहने के विचार से मुझे डर लगा। इतनी सुंदर जगह पर रहने का सोच कर अच्छा भी लगता था, पर शहर से बिल्कुल बाहर, सुनसान जगह का डर भी था।

शुरु गाँव, मनाली, हिमाचल प्रदेश

उन्हीं दिनों में मुझे एक अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रैंस के लिए आयरलैंड जाना था, सोचा कि वहाँ से लौट कर ही निर्णय लूँगा कि मनाली में काम स्वीकारूँ या नहीं।

उन दिनों में मन में थोड़ी सी मायूसी भी थी कि अभी तक कोई ऐसी जगह नहीं मिली थी जहाँ मुझे पूरे दिल से लगे कि हाँ, मैं यहाँ रह कर, इस जगह में काम करना चाहता हूँ। हर जगह की कुछ बातें अच्छी लगती थीं, कुछ नहीं।

सोचा कि शायद मुझे अपना क्लिनिक खोलने के लिए अपनी पसंद का छोटा गाँव खोजना पड़ेगा, जो किसी शहर से बहुत दूर नहीं हो, और जहाँ अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बहुत दूर न हो। ऐसी कोई जगह सचमुच हो सकती है, इसका मुझे शक था।

गुवाहाटी, असम

आयरलैंड और इटली में कुछ दिन बिता कर मैं वापस भारत लौटा तो विश्व स्वास्थ्य संस्थान के मेरे पुराने मित्र चपल खासनबिस के माध्यम से मुझे बँगलौर की स्वयंसेवी संस्था "मोबिलिटी इंडिया" के लिए गुवाहाटी में विकलांग जनों के लिए नया कार्यक्रम प्रारम्भ करने के काम का आफर मिला।

मैं कुछ साल पहले, एक अन्य स्वास्थ्य कार्यक्रम के सिलसिले में एक बार पहले गुवाहाटी गया था और वहाँ करीब दस दिन रहा था, इसलिए वह शहर मेरे लिए अनजाना नहीं था।  

मैं गुवाहटी पहुँचा, कुछ मित्रों के माध्यम से मैंने उज़ान बाज़ार क्षेत्र के एक होटल में कमरा बुक किया था। मेरा विचार था कि वहाँ पर सप्ताह-दस दिन रुक कर, वहाँ की स्वास्थ्य के क्षेत्र में सक्रिय विभिन्न सरकारी व स्वयंसेवी संस्थाओं से मिलूँगा, और विकलांग जनों के लिए नया कार्यक्रम शुरु हो सकता है या नहीं, इसकी बात समझने की कोशिश करूँगा।

पहले दिन सुबह मुझे एक संस्था के दफ्तर में किसी से मिलने जाना था, होटल से निकला और कुछ दूर पर मेरी मुलाकात बतखों के एक दल से हो गयी। सड़क के किनारे पर वह बतखें एक कतार में चल रही थीं, सुबह का दफ्तर जाने वाला सारा ट्रैफिक, उनके पास धीमा करके जा रहा था ताकि उन्हें दिक्कत नहीं हो। पता चला कि वह पास के उग्रतारा मंदिर की बतखें हैं।

उग्रतारा मंदिर की बतखें, गुवाहाटी, असम

पता नहीं क्यों, उन बतखों को देख कर मुझे लगा मानो नियति ने मुझे संदेश भेजा हो कि इसी शहर में मुझे रुकना है, सोचा कि जिस शहर के लोग बतखों के सड़क पर चलने का ध्यान रख सकते हैं, वहाँ रहना अच्छा होगा।

अंत में

जिस दिन मैं गुवाहाटी में उग्रतारा की बतखों से मिला था, उसी दिन मेरी मुलाकात फादर पॉल से भी हुई, जिनके साथ मैं बहुत समय तक रहा और जो असम के उन दिनों में मेरे सबसे करीबी मित्र बने।

यही मेरी किस्मत में लिखा था कि मैं गुवाहाटी में रहूँ और वहाँ बहुत से लोगों से मित्रता बने और उत्तर-पूर्वी भारत के क्षेत्र को जानू और समझूँ। 

*** 

सोमवार, दिसंबर 08, 2025

डायबिटीज़ का डर और वज़न घटाने की यात्रा

पहली बार मेरा वज़न बढ़ा जब मैं तीस-पैंतिस साल का था। करीब दस किलो बढ़ा फ़िर वहीं पर स्टेबल हो गया। उसके बाद करीब बीस-पच्चीस सालों तक मेरा वज़न एक ही जगह टिका हुआ था, और खून-पिशाब आदि के सब टैस्ट सही चल रहे थे। पाँच साल पहले जब मैं 66-67 साल का हुआ, मेरा वज़न फ़िर से बढ़ने लगा, एक साल में ही दस-बारह किलो और बढ़ गया, सब कपड़े नये लेने पड़े।

चार साल पहले ब्लड टैस्ट कराया तो उसमें सुबह का भूखे पेट वाला ब्लड शुगर बढ़ा हुआ आया। पहले यह मात्रा 90-95 मि.ग्र. से अधिक नहीं आती थी, उस बार 110 आयी।

तब सोचा कि ब्लड शुगर की बेहतर जाँच करने वाला एचबीएवन (HbA1) टैस्ट करवाना चाहिये। वह करवाया तो 6.1 आया, यानि डायबिटीज़ होने का खतरा था। नॉर्मल लोगों में यह टैस्ट 5.5 आता है। जब यह 5.6 से 6.4 तक हो तो इसे प्री-डायबिटीज़ यानि शुगर की बीमारी होने के खतरे का स्तर मानते हैं और खाने पर कन्ट्रोल करने के लिए कहते हैं।। अगर 6.5 या उससे अधिक हो तो डायबिटीज़ की दवा लेनी चाहिये।

इसलिए मैंने तब चीनी और मीठी चीज़ें खाना कम कर दीं। छह महीने बाद यह टैस्ट दोबारा कराया तो घटने के बजाय शुगर बढ़ गयी थी, यह 6.3 आया। मेरी डॉक्टर बोली कि स्थिति तेज़ी से बिगड़ रही है, मुझे दवा लेना शुरु कर देना चाहिये, लेकिन मैंने उन्हें कहा कि छह महीने और प्रतीक्षा कर लेते हैं। इसके बाद मैंने तुरंत वज़न कम करने के नये प्रयास किये।

पिछले ढाई-तीन सालों में मैने बारह किलो वज़न कम किया है और चार महीने पहले जब मैंने टैस्ट कराये तो मेरा ब्लड शुगर 91 और एचबीएवन 5.7 आये। इसके अतिरिक्त जोड़ो के दर्द तथा अन्य तकलीफों में भी राहत मिली है।

आज की इस पोस्ट में मैं अपनी वज़न और ब्लड शुगर घटाने की यात्रा की बात करना चाहता हूँ।

 

डायबिटीज़ टाईप 1 एवं 2

डायबिटीज़ की बीमारी मुख्यत: दो तरह की होती है। एक कम उम्र में होने वाली डायबीटीज़ होती है जिसमें लोगों की पैनक्रियास ग्रंथी चीनी का पाचन करने वाले हॉरमोन इन्सुलिन (insulin) को बनाना बंद कर देती है। क्योंकि उनके शरीर में यह हॉरमोन होता ही नहीं, तो उनसे चीनी नहीं पचाई जाती और खून में उसकी मात्रा बढ़ जाती है। उन्हें नियमित इन्सुलिन के इन्जैक्शन लगवाने पड़ते हैं (अभी तक गोली की तरह लेने वाली इन्सुलिन नहीं बनी है, उसके इन्जैक्शन ही लगवाने पड़ते हैं)। इसे टाईप 1 की डायबीटीज़ कहते है।

दूसरी तरह की डायबीटीज़, अधिकतर अधेड़ उम्र के बाद होती है, विषेशकर उन लोगों में जिनका वज़न बढ़ा हुआ होता है। उनके शरीर में इन्सुलिन सामान्य या अधिक बनती है लेकिन उसका शरीर पर असर रुक जाता है या कम हो जाता है, जिससे वह हॉरमोन उनके शरीर में ठीक से काम नहीं कर पाता। यह टाईप 2 की डायबीटीज़ है। दुनिया में और विषेशकर भारत में पिछले कुछ दशकों में इस तरह की डायबीटीज़ बहुत अधिक बढ़ी है। इसमें शरीर में इन्सुलिन है लेकिन वह काम नहीं करती, इसलिए वह चीनी नहीं पचा पाते और उसकी खून में मात्रा बढ़ जाती है, जिसके लिए दवा की गोलियाँ मिलती हैं।

जब खून में शुगर बढ़ जाती है तो उससे खून की रगें बंद होने का खतरा होता है जिससे हृदय, गुर्दों, आँखों, पैरों आदि में रगें बंद होने से शरीर के अंग नष्ट हो सकते हैं। इस आलेख में मैं केवल दूसरी तरह की डायबीटीज़ की बात कर रहा हूँ।

ब्लड शुगर तथा एचबीएवन टैस्टों में अंतर

रक्त में चीनी की मात्रा मापने को ब्लड शुगर टैस्ट कहते हैं। यह कई तरीकों से करते हैं, सबसे आम तरीका है सारी रात भूखा रहने के बाद सुबह-सुबह भूखे पेट के समय रक्त की चीनी को मापा जाये। यह 85-95 के आसपास होनी चाहिये। अगर यह 120 से अधिक आये तो इसका मतलब है आप को डायबीटीज़ की बीमारी हो सकती है। जब खून में चीनी की मात्रा अधिक आती है तो अक्सर उन व्यक्तियों के पिशाब में भी शुगर मिलती है।

एचबीएवन (HbA1) टैस्ट रक्त के लाल कोषों में होने वाले हिमोग्लोबिन से जुड़ी हुई चीनी को मापता है। यह टैस्ट उस समय खून में कितनी शुगर है उसे नहीं देखता, बल्कि यह देखता है कि पिछले तीन हफ्तों में  खून में चीनी का औसत स्तर कितना रहा और वह मात्रा कितनी बार बढ़ी या घटी। यानि यह टैस्ट केवल एक समय में रक्त में चीनी है को नहीं देखता, बल्कि पिछले तीन हप्तों की रक्त की चीनी किस स्तर पर रही है, उस पर निर्भर करता है। यह डायबीटीज़ का बेहतर टैस्ट माना जाता है। नॉर्मल टैस्ट 5.5 या उससे कम होता है।

मेरे शुरु के प्रयास

जब मुझे पता चला कि मेरा एचबीएवन बढ़ा कर 6.1 हो गया है तो पहले मैंने नियमित वर्ज़िश करना शुरु किया और रात को खाना खा कर एक घंटे की सैर करने लगा। खाने पर भी बहुत कंट्रोल किया, खाने की मात्रा कम की, साथ में चीनी, घी-तेल वाली चीज़ें बिल्कुल कम कर दीं। यह छह महीने किया और वह समय बहुत मुश्किल से कटा। सारा समय मेरा ध्यान खाने पर होता था और मीठी चीज़ें, बिस्कुट, चिप्स वगैरा खाने का बहुत मन करता था। इतनी मेहनत के बाद जब ब्लड टैस्ट कराया तो एचबीएवन 6.3 आया, यानि मेरी शुगर घटने के बजाय बढ़ गई थी।

तब मैंने इसके बारे में कुछ किताबें पढ़ीं। कई विशेषज्ञ इंटरमिटैंट फास्टिन्ग की सलाह दे रहे थे, यानि जितना भी खाना हो उसे दिन में छह-आठ घंटे के समय के भीतर खाईये, उस समय के बाहर कुछ नहीं खाना। मैंने भी यही रास्ता ट्राई करने का फैसला किया।

इंटरमिटैंट फास्टिन्ग या प्रतिदिन कुछ घंटों का व्रत 

इंटरमिटैंट फास्टिन्ग के विशेषज्ञ कहते हैं कि हर रोज़ कुछ घंटे का व्रत रखिये। इसके लिए वह चार सुझाव देते हैं:

1. उनका पहला सुझाव है कि रात को जब हम सोते हैं, तो हमारा सात-आठ घंटों का व्रत अपनेआप हो जाता है। वह कहते हैं कि बजाय सुबह-सुबह नाश्ता करने के, हमें उसी व्रत को कुछ घंटे और बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिये। यानि आप सुबह नाश्ता करने की जगह पर दस-ग्यारह बजे नाश्ता कीजिये। उनके अनुसार, केवल इतने व्रत से शरीर की इन्सुलिन बेहतर काम करने लगती है और ब्लड शुगर कम होने लगती है। वह कहते हैं कि अगर आप को सुबह जल्दी चाय-कॉफी की आदत है और उसके बिना नहीं रह सकते तो आप उन्हें बिना चीनी और दूध के पीजिये।

व्रत में पानी, तथा बिना चीनी और दूध की चाय-कॉफ़ी पी सकते हैं, लेकिन और किसी चीज़ का एक छोटा सा दाना भी नहीं खाना चाहिये। कुछ ज़रा सा भी खाओ, चाहे वह नींबू की दो बँदें ही क्यों न हों, हमारा शरीर सोचता है खाना आने वाला है और इन्सुलिन बनाना शुरु कर देता है, जबकि व्रत रखने का उद्देश्य है कि 14-16 घंटो तक हमारे शरीर को इन्सुलिन बिल्कुल भी न बनानी पड़े।    

2. अगर हम शुगर के साथ वज़न भी घटाना चाहते हैं तो उनका दूसरा सुझाव है कि एक समय के खाने से अन्न को बिल्कुल निकाल दीजिये या जितना हो सके कम कर दीजिये, उस समय केवल सब्जियाँ और प्रोटीन-प्रधान भोजन (जैसे कि माँस, मछली, अंडे, दाल, राजमाँ, लोभिया, साग, दूध, दही, अखरोट, बादाम, मूँगफली आदि को प्रोटीन प्रधान भोजन मानते हैं) जैसी चीज़ें खाईये। फ़ल खा सकते हैं लेकिन कम और अधिक मीठे फ़ल जैसे कि केले, किवी, संतरे आदि कम या न खायें।

3. शरीर को स्वस्थ करने के लिए हर हफ्ते कम से कम तीस या अधिक तरह की विभिन्न दालें, सब्जियाँ, फल, ड्राई फ्रूट, मसाले आदि खाईये। यानि हर रोज़ खाना बदल-बदल कर खाईये।

4. नियमित व्यायाम कीजिये जैसे कि खाने के बाद सैर करना, वर्जिश करना आदि।

मेरी प्रारम्भ की इंटरमिटैंट फास्टिन्ग

मैंने सोचा कि मैं सुबह नाश्ता करना बिल्कुल बंद कर दूँगा। केवल दोपहर में बारह बजे से शाम के साढ़े सात बजे के बीच में खाऊँगा। लेकिन बिना चाय-कॉफ़ी के सुबह मुश्किल लगती थी, सोचा कि सुबह केवल बिना चीनी और दूध की कॉफ़ी पीयूँगा।

दोपहर के खाने के लिए मैंने केवल कच्ची सब्जियाँ और फ़ल चुने। बारह बजते ही मैं गाजर, मूली, खीरा, शिमला मिर्च, टमाटर, ओलिव, बंद गोभी, शलजम, अवोकादो, सेब, आदि मिला कर मैं पूरी प्लेट भर कर के खाता था, ताकि पेट भर जाये, मुझे यह नहीं लगे कि मैं भूखा हूँ। चूँकि मेरी एचबीएवन बढ़ी हुई थी, मैंने दोपहर को अवोकादो को छोड़ कर अन्य फ़ल कम या बिल्कुल नहीं खाये।

दोपहर में तीन बजे मैं एक मुट्ठी काजू, बादाम आदि के साथ दूध वाली चाय लेता था,और शाम को सात बजे नॉर्मल पूरा खाना खाता था। इटली में वाईन हर जगह मिलती है, मैं रात के खाने के साथ आधा गिलास लाल वाईन का भी लेता था। 

साथ ही मैंने केक, मिठाई, बिस्किट, आईसक्रीम आदि बंद कर दिये, उन्हें कभी-कभार, यानि हफ्ते-दस दिन में एक बार सीमित मात्रा में खाता था।

शाम को खाने के बाद सैर तो पहले से कर रहा था, अब स्टैप्पर, वर्जिश वाले इलास्टिक आदि खरीदे और हफ्ते में चार बार, सुबह भूखे पेट व्यायाम भी करने लगा। मेरे एक मित्र जो ओर्थोपीडिक्स के सर्जन हैं, वह अपने व्यक्तिगत अनुभव से कहते हैं कि हर सुबह दस बार सूर्यनमस्कार करना सबसे अच्छा व्यायाम है, लेकिन मुझसे सूर्यनमस्कार पूरा नहीं किया जाता।

इससे मेरा वज़न घटने लगा, हर महीने में एक-डेढ़ किलो कम होने लगा। करीब सात-आठ महीनों में बारह किलो घट गया और शुगर के टैस्ट भी ठीक हो गये।

यह सब करना शुरु में बहुत मुश्किल लगा। दोपहर बारह बजे तक खाने की प्रतीक्षा करना मेरे लिए सबसे कठिन था। कभी खाने में बारह की बजाय साढ़े बारह या एक बज जाते तो मैं चिड़चिड़ा और झगड़ालू हो जाता। रात को सोते समय मुझे खाने के सपने आते थे। पहला महीना सबसे कठिन था, उसके बाद धीरे-धीरे आदत हो गयी।

और आज

एक बार खाने की आदत बदली तो मैं दोबारा अपने पुराने ढर्रे पर नहीं लौटा हूँ। आज भी मैं हर रोज़ कुछ घंटों का व्रत रखता हूँ, आम तौर पर सुबह दस बजे से रात आठ बजे के बीच में खाता हूँ, यानि चौदह घंटे का व्रत होता है। कई बार व्यस्त होता हूँ तो बारह बजे तक भी कुछ नहीं खाता, अब उसमें कुछ कठिनाई नहीं लगती।

दोपहर का खाना अब भी सब्जियों का है, लेकिन अब उनके साथ अधिक फ़ल भी खाता हूँ और साथ में दो अंडे भी। रात को नॉर्मल खाना खाता हूँ।

लेकिन खाने के इस बदलाव ने मेरी इच्छाओं को भी बदल दिया है, अब मुझे बाज़ारी खाना अच्छा नहीं लगता। लेकिन जब पार्टी हो या रैस्टोरैंट जायें तॊ मैं सब कुछ खाता हूँ। बीच में भारत गया था, तब पूरी-भाजी, छोले-भटूरे, नान-चिकन आदि खाये लेकिन उन्हें खाने में पहले जैसा आनंद नहीं आया। सत्तू की बर्फी नियमित खायी, वह मुझे अच्छी भी लगी। 

वैसे तो अब मीठा कम ही खाता हूँ लेकिन रात को अक्सर दही में शक्कर, तिल, चिया, आदि मिला कर खाना मुझे अच्छा लगता है। मैंने व्यायाम और सैर भी नहीं छोड़े।

वज़न और शुगर कम होने के साथ मुझे लगता है मेरे जोड़ों के दर्द और सामान्य स्वास्थ्य को भी इस बदलाव से फायदा हुआ है। हालाँकि वज़न कम होने के बाद मैंने खाना बढ़ा दिया है, लेकिन एक बार जो बारह किलो वज़न कम हुआ वह अभी तक नहीं लौटा है।

***   

शुक्रवार, नवंबर 21, 2025

नशीले पदार्थ और आध्यात्मिक सोच

यह बात 1990 के दशक के प्रारम्भ की है। मैं ब्राज़ील के उत्तर-पश्चिमी भाग में मनाउस शहर में एक मित्र से उसके यानोमामी जनजाति से जुड़े अनुभवों की बात कर रहा था। यानोमामी जनजाति के लोग अमेज़न जंगल में रहते हैं और बाहर के लोगों से बहुत कम मिलते या सम्पर्क बनाते हैं। मेरा मित्र उनके एक गुट के साथ कुछ समय तक रह कर आया था। वह बोला, "एक दिन एक झोपड़ी में उनके शमान (पारम्परिक वैद्य) और अन्य कुछ लोग बैठ कर एक नशीले पौधे की पत्तियों की चिल्लम पी रहे थे। चिल्लम के कश लगा कर, वह शमान आँखें बंद करके समाधी में चला गया। कुछ देर बाद उसने आँखें खोल कर कहा कि मेहमानों के स्वागत की तैैयारी करो, क्योंकि दूर गाँव का एक यानोमामी गुट उनके यहाँ आ रहा है।" कुछ घंटे बाद सचमुच जब दूसरे गाँव के लोग वहाँ पहुँचे तब मेरे मित्र की समझ में आया कि शमान ने नशे से मिली दूर-दृष्टि से उन्हें वहाँ आते हुए देखा था।

इसका अर्थ है कि सचमुच कुछ मादक पौधों की सहायता से हमें शरीर के बंधनों से ऊपर उठ कर विशेष शक्तियाँ मिल सकती हैं, जैसे कि दूर-दृष्टि की शक्ती? कुछ दिन पहले इस विषय पर एक वैज्ञानिक शोध के बारे में पढ़ा। 

मई 2025 की अमरीकी पत्रिका 'द न्यू योर्कर' में माईकल पोल्लान के आलेख 'हाइ प्रीइस्टस' (उच्च पुजारी) में आध्यात्मिक अनुभवों और नशीली खुम्बों (मशरूम) तथा अयाहुआस्का (Ayahuasca) जैसे कुछ अन्य नशीले पदार्थों के सम्बंधों पर शोध की बात है। शोध के लिए, कुछ पुजारियों-पादरियों-इमाम आदि व्यक्तियों को, मध्य तथा दक्षिण अमरीका के पारम्परिक वैद्यों द्वारा प्रयोग किये जाने वाले कुछ नशीले पौधों दिये गये। वह जानना चाहते थे कि क्या इन मादक पदार्थों से लोगों को आध्यात्मिक अनुभव आसान हो जाता है? उनका निष्कर्ष निकला कि हाँ, ऐसे पदार्थों के सेवन से लोगों के लिए आध्यात्मिक अनुभव आसान हो जाते हैं। विभिन्न धर्मों के व्यक्ति जिन्होंने इस शोध में हिस्सा लिया, ने कहा कि उनके अधिकाँश अनुभव अपने धर्मों की विशिष्ठ सोच वाले ईश्वर के नहीं थे, बल्कि उन्हें निरंकार, निर्गुण परमात्मा का अहसास हुआ। इस शोध में किसी हिंदू पुजारी ने भाग नहीं लिया था।

आलेख को पढ़ कर एक अन्य बात याद आयी कि 1950-60 के दशकों में पश्चिमी देशों के युवाओं में नशीले पदार्थों के सेवन का फैशन चला था। तब भारत में भाँग-चरस-गाँजे के सेवन की परम्परायें थीं इसलिए हिप्पी बन कर बहुत से पश्चिमी युवा भारत आते थे। कुछ सालों के बाद, पहले पश्चिमी देशों और फ़िर भारत ने भी, ऐसे पदार्थों के सेवन को गैरकानूनी घोषित कर दिया था। लेकिन पिछले एक-दो दशकों में ऐसे कुछ पदार्थ, जैसे कि सिलोसाइब, एलएसडी, आयाहुआस्का, आदि, के विभिन्न बीमारियों जैसे कि मानसिक रोग, कैंसर, पीड़ा आदि की दवाओं के रूप में प्रयोग तथा शोध किये जा रहे हैं।

मादक द्रव्य और आध्यात्म
 

भारतीय आध्यात्मिक सोच के विकास में मादक पेय की भूमिका?

इस बारे में सोचते हुए मेरे मन में एक अन्य प्रश्न उठा - वेदों तथा उपनिषद की आध्यात्मिक सोच दुनिया में सबसे निराली और अलग क्यों है? अन्य धर्मों में भगवान को पिता जैसे रूप में देखा गया है, जो अपने अनुयायियों से नियमित निष्ठा, अर्चना, बलिदान माँगता है और दैनिक जीवन के नियम पालन करने के लिए कहता है। जबकि हिंदू शास्त्रों में एक ओर अन्य धर्मों की तरह से मन्दिर, देवी-देवता, रीति-रिवाज़ और नियम हैं तो साथ ही, दूसरी ओर, वेद-उपानिषदों में भगवान का सर्वव्यापी, निरंकार, निर्गुण समस्त ब्रह्माँड को जोड़ती हुई चेतना वाला रूप भी है।

तब मेरे मन में ऋग्वेद के सोम रस की बात आयी। ऋग्वेद में सोम रस को बहुत महत्व दिया गया है, यह उसके नौंवे मंडल का प्रमुख विषय है, उसमें सोम रस पर 120 सूक्त और करीब ग्यारह सौ ऋचाएँ हैं। इस तरह से ऋग्वेद में सोम रस का स्थान, अग्नि और इन्द्र के बाद तीसरे नम्बर पर आता है।

ऋग्वेद में सोम रस का वर्णन एक विशेष
औषधी पौधे के रूप में किया गया है, जिसे यज्ञों में देवताओं को अर्पित किया जाता था और जिसका उपयोग स्वास्थ्य, बल और आयु बढ़ाने के लिए होता था। इसे मूसल से कुचलकर, छानकर और फिर दूध, शहद आदि के साथ मिलाकर बनाया जाता था। इसकी पहचान आज तक स्पष्ट नहीं है, लेकिन कुछ लोग इसे एफैड्रीन के पौधे जैसा मानते हैं। एफैड्रीन दवा है जो मस्तिष्क तथा तंत्रियों की क्रिया शक्ति को उकसाती और बढ़ाती है और एलोपैथी में इसका उपयोग विभिन्न रोगों के लिए किया जाता है।

मैंने सोचा कि शायद इस सोम रस के उपयोग ने ही प्राचीन भारत के ऋषियों को ऐसी अंतर्दृष्टि, ज्ञान और समझ दी जिनसे भारतीय अध्यात्म में ब्रह्म और ब्रह्मण विचारधारों का ऐसा विकास हुआ, जिसका वर्णन उपानिषदों में है।

अंत में

कहते हैं कि सही मानों में मानव सभ्यता का विकास खेती-बाड़ी के साथ हुआ था, क्योंकि जब आदि-मानव खेती करने लगा तो उसे हर रोज भूख मिटाने के उपाय खोजने की चिंता से मुक्ति मिली और कुछ अन्य सोचने-समझने का समय मिला। कुछ दिन पहले मानव विकास से सम्बंधित एक किताब में मैंने पढ़ा था कि खेती का आविष्कार मानव समूहों ने भूख मिटाने के लिए नहीं, बल्कि शराब बनाने के लिए किया था। मादक शराब का लालच था तभी आदि-मानव मेहनत से अन्न बोते थे और महीनों तक उसकी देखभाल करते थे।

क्या वैसे ही सोमरस के मादक पेय ने मानव सभ्यता को वेद-उपनिषदों के निर्गुण, निरंकार परमात्मा से मिलने का रास्ता भी दिया था? आप की क्या राय है?

 ***

मंगलवार, अक्टूबर 14, 2025

यात्रा की तैयारी

मेरी दिल्ली जाने की तैयारी शुरु हो गयी है। अगले सप्ताह भारत पहुँच रहा हूँ। तैयारी करते हुए सोच रहा था कि पहले की यात्राओं और अब की यात्राओं में कितना कुछ बदल गया है।

लाने-ले जाने वाली बदलती दुनिया 

एक ज़माना था जब भारत जाने से पहले लम्बी लिस्टें बनाता था कि कौन से मसाले, कौन सी दालें, कौन से गानों के कैसेट, कौन सी फिल्मों के वीडियो कैसेट, वगैरा लाना भूलना नहीं है। उन लिस्टों में और भी न जाने क्या क्या होता था। तब सबसे बड़ी चिन्ता होती थी कि सूटकेस का वज़न अधिक हो गया तो सामान एयरपोर्ट पर न छोड़ना पड़े।

फ़िर समय बीता, सन् दो हज़ार के आसपास कैसेट के बदले में सी.डी. या डी.वी.डी. आ गयीं। तभी यहाँ इटली में भी प्रवासी आने लगे तो यहाँ भी एशिआई दुकाने खुलने लगीं। इसलिए पहले दालों और मसालों को लाना कम हुआ फ़िर बिल्कुल समाप्त हो गया। फ़िर हर तरह के फ़ल-सब्जियाँ भी यहाँ मिलने लगे। 

जैसे-जैसे समय बीत रहा है, अधिक चीज़े यहाँ मिलने लगी हैं और उनकी क्वालिटी बेहतर हो रही है। एक उदाहरण आमों का। वैसे तो सुपरमार्किट में ब्राज़ीली या अफ्रीकी आम भी मिलते हैं, लेकिन पिछले दस-पंद्रह सालों से पाकिस्तानी आम भी आने लगे थे, जो स्वाद में अच्छे थे लेकिन बहुत मँहगे होते थे, सात-आठ यूरो का एक किलो। इस साल यहाँ स्पेन से एक बहुत बढ़िया आम मिल रहा है, ढाई यूरो का एक किलो। हर साल इस तरह से कुछ न कुछ अन्य चीज़ें बिकने लगी हैं, जैसे कि हल्दीराम के गोलगप्पे के डिब्बे। 

हमारे छोटे से शहर में भारतीय दो ही हैं लेकिन यहाँ बँगलादेश और पाकिस्तान के बहुत से प्रवासी हैं, इसलिए यहाँ उनकी दुकाने भी खुली हैं और हर तरह का सामान भी मिलने लगा है। पहले जाने से, दो पहीने पहले से सपने आने लगते थे कि आम खाने हैं, मिठाई खानी है, मेथी, भिंडी और करेले की सब्ज़ी खानी है, इन दुकानों की वजह से अब वह सब बहुत कम हो गया है।

एक ओर लाने वाले सामान में कमी हुई है तो दूसरी ओर भारत ले जाने वाले सामान में बड़ा बदलाव आया है। 

सबसे बड़ी दिक्कत है कि घर के लोगों के लिए क्या गिफ्ट ले कर जाओ?  वहाँ पर अब सब कुछ मिलने लगा है। पहले चॉकलेट, व्हिस्की जैसी गिफ्ट ले कर जाता था, अब बहुत सोचना पड़ता कि किसके लिए क्या ले कर जाऊँ, अधिकाँश के लिए कुछ नहीं ले कर जाता। कई बार कपड़े ले कर गया हूँ लेकिन अक्सर उन पर भी "मेड इन इंडिया", या बंगलादेश या चीन या वियतनाम का नाम लिखा होता है, इसलिए लगता है कि उन्हें ले कर जाना बेकार है। 

वहाँ हिन्दुस्तान की शहर-सड़कें इतनी तेज़ी से बदल रहीं हैं कि मन में थोड़ा सा यह डर भी होता कि वहाँ जाऊँगा तो सब कुछ बदला-बदला दिखेगा। पहले प्लैन बनते थे कि इस दोस्त से मिलना है, वहाँ रिश्तेदार के यहाँ जाना है, वगैरा। वह भी अब बहुत कम हो गया है क्योंकि व्हाटसएप्प और फेसबुक से सबकी खबर मिलती रहती है, कभी कभी वीडियो कॉल से बात भी हो जाती है, तो लगता नहीं कि उनसे बहुत दिनों से नहीं मिले, अब मिलना चाहिये।

लेकिन अभी भी कुछ चीज़ें हैं 

इटली में हमारे शहर में अभी दोसा, पूरी-भाजी और छोले-भटूरे जैसी चीज़ें नहीं मिलती, इसलिए सोचता हूँ कि उन्हें खाना है। आयुर्वेदिक दवाएँ खरीद कर लानी हैं। सिनेमा हॉल में जा कर नयी फ़िल्में देखने का आकर्षण भी है। वैसे तो यहाँ सब फ़िल्में देखने को मिल जाती हैं लेकिन हिन्दुस्तान में सिनेमा हॉल में कोई हिट फ़िल्म देखने का मज़ा कुछ और है, बस एक बात अच्छी नहीं लगती कि लोग अक्सर वहाँ भी मोबाइलों पर लगे दिखते हैं।

मुझे संग्रहालय जाने, चिड़ियाघर जाने, बाज़ार में घूमने, संगीत और नृत्य के कार्यक्रम देखने आदि भी बहुत अच्छे लगते हैं, इसलिए इसकी लिस्ट भी बनती है कि कौन सी जगहों पर जाना है। पिछली बार गया था तो इंडिया गेट के पास नये सैनिक स्मारक को और मैहरोली पुरात्तव पार्क को देखने गया था। इस बार के.एम. कला संग्रहालय और दिल्ली आर्ट गैलरी की नयी प्रदर्शनी को देखना है। करीब दो-तीन दशकों के बाद इस बार मैडिकल कॉलेज के कुछ पुराने साथियों से मिलने की योजना भी है। चूँकि घुटनों में दर्द रहता है, लम्बी यात्रा करने का कोई कार्यक्रम नहीं बनाया।

लेकिन हिन्दुस्तान जाने में घरवालों से मिलने की चाह अभी भी सबसे प्रबल होती है, सबके साथ बैठना, बतियाना, गप्प मारना, वहाँ जाने का सबसे बड़ा सुख और आकर्षण यही लगता है। अमरीका से मेरी दूसरी बहन भी वहाँ आयेगी, तब भाई-बहन साथ में बैठ कर खूब गप्प मारेंगे, अतीत की बातों और जो लोग नहीं रहे उन्हें याद करेंगे, कुछ बहसें और लड़ाईयाँ भी होंगी। घर लौटने का सबसे बड़ा सुख यही होगा। नीचे वाली तस्वीर पिछली यात्रा से है।


 

*** 

रविवार, सितंबर 14, 2025

शब्दों की हिंसा

कुछ दिन पहले भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने टीवी के प्रोग्राम वाले श्री समय रैना और अन्य विदूषकों को आदेश दिया कि वे अपने कार्यक्रम में विकलांग और बीमार व्यक्तियों की खिल्ली उड़ाने के लिए उनसे क्षमा माँगें।

हर भाषा में कमज़ोर, अल्पसंख्यक, नीचे देखे-माने जाने वाले समुदायों के व्यक्तियों के लिए ऐसे शब्द होते हैं जिनसे उनकी कमज़ोर तथा अवाँछनीय सामाजिक स्थिति पर ज़ोर दिया जाता है। वैश्या, अँधा, बहरा, लूला, अछूत, गँवार, पागल जैसे शब्द इनके कुछ उदाहरण हैं।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद १९४८ में संयुक्त राष्ट्र संघ ने सार्वभौमिक मानव अधिकारों के घोषणापत्र को अपनाया। उसके बाद से विभिन्न वंचित समुदायों ने शब्दों की हिंसा के बारे में बात करनी शुरु की और कहा कि उनके लिए नये शब्द होने चाहिए जिनसे उनकी मानव अस्मिता को स्वीकारा जाये और उनकी छवि सकारात्मक बने।

लेकिन यह संघर्ष बहुत पहले से चल रहे थे। जैसे कि गाँधीजी ने "हरिजन" शब्द का प्रयोग १९३२ में किया था क्योंकि वह सोचते थे कि अछूत की जगह हरिजन कहने से अस्पृश्यता निवारण में मदद मिलेगी।

लेकिन केवल भाषा बदलने से व्यक्तियों की स्थिति नहीं सुधरती और कई बार, समय के साथ नये शब्द भी नकारात्मक बन जाते हैं। जैसे कि समय के साथ 'हरिजन' शब्द के बदले 'दलित' शब्द का उपयोग बेहतर माना गया, जबकि आजकल कुछ लोग भीमटा या भीमवादी शब्द का प्रयोग भी करते हैं।

इस तरह के समय के साथ नये शब्दों के नकारात्मक बदलाव एक अन्य उदाहरण है मन्दबुद्धि बच्चों के लिए अंग्रेज़ी में पहले 'इम्बेसाईल' (नासमझ) शब्द का प्रयोग होता था, उसे बदल कर 'ईडियट' (बेवकूफ) किया गया, फ़िर जब ईडियट शब्द को बुरा माना गया तो 'लो इटेलिजैंस' (मन्द बुद्धि), 'इटेलेक्चुअल डिसएबिल्टी' (मानसिक विकलाँता) जैसे शब्द खोजे गये। आजकल इन सभी शब्दों का प्रयोग न करने के लिए कहते हैं और उनकी जगह पर 'लर्निन्ग डिसएबिल्टी' (सीखने की विकलाँगता)  शब्द का प्रयोग करने के लिए कहते हैं। (नीचे की छवि इसी विषय पर हुई मंगोलिया में एक मीटिन्ग से है)

विकलाँगता के सही शब्द कौन से हों, मंगोलिया की मिटिन्ग - छवि डॉ. सुनील दीपक की

  

शब्दों के बदलाव में जिस समुदाय की बात हो रही हो, उसके लोग स्वयं अपने लिए शब्द चुनना पसंद करते हैं। जैसे कि कुछ वर्ष पहले भारत सरकार ने 'विकलाँग' के बदले 'दिव्याँग' शब्द का प्रयोग रखा, लेकिन बहुत से विकलाँग व्यक्तियों ने इस नये शब्द का विरोध किया है।

शब्दों से जुड़ी हिंसा की बहसें सबसे अधिक अंग्रेज़ी भाषा के शब्दों के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, विषेशकर संयुक्त राष्ट्र संघ के स्तर पर होती हैं कि अंतर्राष्ट्रीय घोषणापत्रों और समझौतों में कौन से शब्दों का प्रयोग होना चाहिये। कई बार मुझे लगता है कि सालों तक इन बहसों में लड़ने-झगड़ने वाले लोगों को अपने आप को बड़ा एक्टिविस्ट दिखाने और बढ़-चढ़ कर बोलने में अधिक दिलचस्पी होती है, जबकि उनके देशों में गाँवों-शहरों में रहने वाले लोगों को इस सबसे कुछ फायदा नहीं होता क्योंकि इन बहसों का उनकी अपनी भाषाओ में कुछ सार्थिकता नहीं होती।

जैसे कि विकलांगों के सम्बंध में मैंने सालों तक 'डिसएब्लड पर्सन' (विकलाँग व्यक्ति) और 'पर्सन विद डिसएबिलिटी' (व्यक्ति जो विकलाँग है) में से कौन सा शब्द बेहतर है इस पर हज़ारों अंतर्राष्ट्रीय बहसें देखी हैं। अंत में यह फैसला हुआ कि 'पर्सन विद डिसएबिल्टी' का प्रयोग होना चाहिेये क्योंकि इसमें पर्सन (व्यक्ति) शब्द पहले आता है, जिससे उसकी विकलाँगता को नहीं बल्कि उसके व्यक्ति होने को अधिक महत्व देते हैं। आज अगर आप किसी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में गलती से 'डिसएब्लड पर्सन' बोल दें तो कुछ लोग बहुत क्रोधित हो जाते हैं, आप को निकालने की धमकियाँ देते हैं।

मैं सोचता हूँ कि इस सारी बहस का हमारे देशों में रहने वाले लाखों विकलाँग व्यक्तियों पर क्या असर पड़ता है? कितने हिंदी बोलने वाले, 'विकलाँग व्यक्ति' के बदले में 'व्यक्ति जो विकलाँग हैं' बोलना चाहेंगे?

मेरे विचार में भाषाओं में हिंसा होती है, क्योंकि समाजों में हिँसा होती है और भाषाएँ समाजों के प्रतिबिम्ब होती हैं। समाज की हिंसा से लड़े बिना, भाषा की हिंसा से लड़ने का क्या फायदा है?

मेरे विचार में व्यक्तियों को नीचा दिखाने वाले शब्दों को बदलने का पहला कदम उन व्यक्तियों की आत्मचेतना है जिससे उन्हें अपनी स्थिति की समझ आये, वह स्वयं उस शब्द को अस्वीकार करें। यह पहला कदम आसान नहीं है क्योंकि हम जिन समाजों में पलते और बड़े होते हैं, वह बचपन से हमारी सोच को प्रभावित करता है। बचपन से अपने लिए सुनी नकारत्मक बातें हमारे भीतर घर बना कर रहती हैं, हम खुद अपने आप को नीचा, कमज़ोर, मानने लगते हैं। 

इसका दूसरा कदम है कि अपने लिए नया शब्द चुनना और उसके लिए लड़ना, लेकिन वह केवल शब्द बदलने की लड़ाई नहीं होती। उसके साथ एक दूसरी बड़ी लड़ाई भी होती है जिसमें वह अपनी सामाजिक स्थिति के बदलाव तथा उत्थान के लिए भी लड़ते हैं। 

अगर आप किसी ऐसे समुदाय से हैं जिनके लिए नकारात्मक शब्दों का प्रयोग होता है, तो आप इस बारे में अपनी राय टिप्पणी के माध्यम से अवश्य दें कि आप  इस विषय में क्या सोचते हैं और आप का व्यक्तिगत अनुभव क्या बताता है? 

***   

बुधवार, जुलाई 02, 2025

यौन दुराचरण और हमारी चुप्पियाँ

पिछले कुछ दिनों में फेसबुक पर साहित्यकारों से जुड़ी यौन दुराचरण की एक बहस चल रही है। मैं फेसबुक पर कम ही जाता हूँ और कोशिश करता हूँ कि नकारात्मक बातें न पढ़ू, फ़िर भी इस बहस के कुछ हिस्सों पर मेरी नज़र पड़ी। उस बहस में जिन व्यक्तियों की और जिस घटना की बात हो रही है, मैं दोनों से अपरिचित हूँ, इसलिए उसके बारे में कुछ नहीं लिखना चाहता।

लेकिन इस बात से मुझे अपने कार्य-जीवन से जुड़ीं यौन दुराचरण की बातें याद आ गईं। यह आलेख मेरी उन यादों, अनुभवों, तथा विचारों के बारे में है।


आप क्या करेंगे?  

अगर आप को पता चले कि आप का मित्र या ऐसा व्यक्ति जिसे आप बहुत मानते हैं वह यौन-दुराचरण कर रहा है तो आप क्या करेंगे? यह बातें फ़िल्मों में देख कर या दैनिक या पत्रिका में पढ़ कर आसान लगती है, और हम सोचते हैं कि इसके विरुद्ध आवाज़ उठानी चाहिए। 

जैसे कि मीरा नायर की फ़िल्म "मॉनसून वेडिन्ग" में यह प्रश्न उठता है, जब पता चलता है कि परिवार का एक सम्मानित आदमी जिसने परिवार की कई अवसरों पर मदद की है, घर की बच्ची के साथ जबरदस्ती यौन सम्बंध करता था। उस फ़िल्म में परिवार के वरिष्ठ लोग उस आदमी को वहाँ से चले जाने के लिए कहते हैं। लेकिन फ़िल्मों के बाहर की दुनिया में क्या होता है? वहाँ अक्सर इस विषय पर चुप्पियाँ मिलती हैं, और लोग इस बारे में बात करने में असहज हो जाते हैं।

मेरे व्यक्तिगत अनुभव भी यही बताते है कि सामान्य जीवन में इस तरह के निर्णय लेना कभी-कभी बहुत कठिन हो सकता है। अगर आप को यौन विषय पर पढ़ने-सुनने से परेशानी होती है, तो मेरी सलाह है कि आप इस आलेख को आगे नहीं पढ़िये।

दो जाने-माने नाम

एब्बे पिएर फ्राँस में १९१२ में पैदा हुए थे और उनकी मृत्यु सन् २००७ में हुई थी। उन्हें लोग संत मानते-बुलाते थे। सन् १९४९ में एब्बे पिएर ने यूरोप में एम्माउस नाम की संस्था बनाई थी जो गरीबों, विकलांगों, कुष्ठ रोगियों, शरणार्थियों आदि के साथ सक्रिय थीं। उनकी संस्था से प्रभावित हो कर बहुत सी अन्य एम्माउस एसोसियेशन भी बनीं। चूँकि मैं भी कुष्ठ रोग और विकलांगता के क्षेत्र में सक्रिय था, उनमें से कई संस्थाओं के साथ मेरे सम्पर्क बने और उनके साथ बहुत बार काम भी किया।

करीब तीस-पैंतीस साल पहले, नब्बे के दशक में मैं एब्बे पिएर से एक बार मिला था और उनकी बातों और सोच से बहुत प्रभावित हुआ था। इसलिए जब पिछले वर्ष (२०२४ में), एब्बे पिएर के बारे में खबरें आईं कि उन्होंने बहुत सी बच्चियों के साथ यौन दुराचार किया था, तो मुझे बहुत धक्का लगा था। इस विषय पर एक नई किताब आई है जिसकी लेखिकाओं ने इस विषय पर छानबीन की है जिससे स्पष्ट होता है कि उनके यौन दुराचार की बातें लोगों को बहुत पहले से मालूम थीं लेकिन इसके बारे में कोई खुल कर नहीं बोलता था। ३३ स्त्रियों ने बचपन में उनके इस तरह के व्यवहार के व्यक्तिगत अनुभवों के बारे में गवाही दी है।

जब इस तरह की बातें पता चलती हैं तो पहला प्रश्न जो मेरे मन में उठता है वह है - उस व्यक्ति के अच्छे कामों के बारे में क्या किया जाये? उन्हें भुला दिया जाना चाहिये? किसी व्यक्ति की बात करते हुए  उसके अच्छे और बुरे कर्मों को किस तराजू में कैसे तोला जाये?

दूसरी बात है समय की। एब्बे पिएर को गुज़रे हुए सतरह साल हो चुके हैं तो अब यह बातें कहने का क्या लाभ है? मेरे विचार में सच्ची बात को अभिव्यक्त करना भी आवश्यक है। इस समाचार के बाद कुछ एम्माउस संस्थाओं ने अपनी वेबसाईट आदि से एब्बे पिएर का नाम हटा दिया है। लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि इतने सालों के बाद की उन औरतों की स्मृति पर भरोसा नहीं किया जा सकता, या फ़िर किसी को मानसिक रोग हो तो वह गलत सम्बंध की बात की कल्पना भी कर सकता है, इसलिए इन बातों पर पूरा विश्वास करना कठिन है। लेकिन मुझे लगता है कि इतनी सारी औरतों की शिकायतों को मानसिक रोग कहना सच्चाई से मुँह छुपाना है।

दूसरी बात डेविड वर्नर की है। पिछड़े और विकासशील देशों के ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले बहुत सारे लोग डेविड वर्नर की दो किताबों को जानते हैं, "जहाँ कोई डॉक्टर नहीं है" और "गाँव के विकलांग बच्चे"। १९८०-९० के समय में यह दोनों किताबें बहुत प्रसिद्ध थीं और इनसे प्रेरणा पा कर इस तरह की अन्य कई किताबें भी लिखी गईं जैसे कि "जहाँ कोई डैंटिस्ट नहीं है", "जहाँ कोई मनोरोग विषेशज्ञ नहीं है", आदि।

मैंं डेविड से पहली बार १९८८ में मिला था और विकलांगता से सम्बंधित विषयों पर उसकी सोच-समझ को प्रेरणादायक पाया था।

२००३-४ के आसपास मैंने सुना कि उस पर आरोप लगा है कि मैक्सिको के जिस गाँव में रहता और काम करता था, वहाँ के कई बच्चों के साथ उसके यौन सम्बंध भी थे। मुझे विश्वास नहीं हुआ, लेकिन मेरी एक अंग्रेज़ी मित्र ने मुझे उसकी एक चिट्ठी दिखायी जिसमें वह इस तरह के "प्रेम सम्बंधों" को वह बच्चों के मानसिक विकास के लिए सही बता रहा था। हमारे मित्रों के गुट ने उस समय उससे सब सम्बंध तोड़ लिए थे। बाद में मैंने सुना कि वह अपनी बात से पलट गया है, वह इंकार करता है कि उसने ऐसा कुछ किया था।

डेविड मुझसे करीब बीस साल बड़ा था, अगर वह आज जीवित है तो नब्बे साल का होगा। बहुत सालों से मेरा उससे सम्पर्क नहीं है। लेकिन इसके बारे में मेरे मन में दुविधा है। उसकी जिन किताबों की वजह से लाखों लोगों को लाभ भी हुआ था और आज भी होता होगा, उनके लिए उसके योगदान को कैसे देखा जाये? मैं कई विकलांग लोगों को जानता हूँ जो कहते हैं कि उसकी किताबों में उन्होंने अपना जीवन जीने की राह पाई है।

मी टू - व्यस्कों में सम्बंधों की जटिलताएँ

कुछ वर्ष पहले "मी टू" (मुझे भी) के नाम से यौन दुराचार की बहुत सी बातें बाहर निकलीं, कई लोगों पर आरोप लगे जिसमें बड़ी उम्र के जाने-पहचाने या प्रसिद्ध या उच्चे पद के अफसरों-अधिकारियों ने अपने नीचे काम करने वाली युवतियों को सैक्स के लिए मजबूर किया था। कानूनी जाँच में बहुत से ऐसे आरोप सही निकले और कुछ में आरोपितों को सजा मिली या नौकरी से निकाला गया। कुछ ऐसे आरोप झूठे भी निकले। 

कुछ स्त्रियों का कहना है कि जिस समय यह हादसा हुआ था, यह इतना अप्रत्याशित था कि उस समय वह कुछ नहीं कह पायीं। अगर महिला ने रोका नहीं या स्पष्ट मना नहीं किया तो क्या इसे गलतफहमी का नतीजा भी माना जा सकता है?

यह भी सच है कि नीचे काम करने वाले को दबाव महसूस होता है कि अगर वह ऐसे सम्बंधों को नहीं स्वीकारेंगे तो उनके केरियर पर बुरा असर पड़ेगा। इसलिए कुछ लोग कहते हैं कि इस तरह के सम्बंध हमेशा गलत होते हैं। लेकिन ऐसे कई दम्पत्ति हैं जिनकी जानपहचान और प्रेम साथ में काम करने की वजह से हुए, जब उनमें से एक ऊँचे पदवे पर था और दूसरा नीचे। इसलिए यह सोचना कि ऊँचे और नीचे पद वालों के बीच किसी तरह के सम्बंध नहीं बने, को लागू करना कठिन होगा।

यह भी हो सकता है कि कैरियर में आगे बढ़ने के लिए या किसी लाभ की आशा से कुछ व्यक्ति इस तरह के सम्बंध सोच-समझ कर बनायें, लेकिन बाद में प्रमोशन या लाभ न मिलने पर गुस्सा हो जायें और बदला लेने के लिए कहें कि उनके साथ जबरदस्ती हुई है। यह बात सोच कर मुझे व्यस्क व्यक्तियों के बीच हुए सम्बंधों का मामला अधिक कठिन लगता है। 

समलैंगिक यौन दुराचरण की जटिलतायें

नब्बे के दशक में एक अधेड़ उम्र की नर्स हमारे एक प्रोजेक्ट में काम करने तीन महीने के लिए विदेश गईं। उन्होंने लौट कर मुझसे शिकायत की वहाँ काम करने वाली, उनसे दस वर्ष बड़ी हमारे प्रोजेक्ट की प्रमुख ने उनसे यौन सम्बंध बनाने की कोशिश की। वह चाहती थीं कि हम उस प्रोजेक्ट प्रमुख को नौकरी से निकाल दें। जहाँ तक मुझे समझ में आया शिकायत करने वाली महिला के साथ किसी तरह की कोई जबरदस्ती नहीं हुई थी, बल्कि वह सोचती थीं कि लेसबियन होना गलत है और ऐसी औरतों को प्रोजक्ट में ज़िम्मेदारी के पद पर नहीं रखना चाहिए। जबकि मुझे लगा कि लेसबियन होना और व्यस्क महिला से सम्बंध के लिए कहना या पूछना कोई जुर्म नहीं है। अंत में मैंने इस शिकायत के बारे में कुछ नहीं किया।

एक बार भारत में एक कुष्ठआश्रम के काम करने वाली यूरोपीय मूल की नर्स-नन के बारे में भी मुझे यही शिकायत मिली कि वह लेसबियन है। मैं उन्हें बहुत सालों से जानता था और मुझे लगा कि वह बहुत मेहनत तथा प्यार से रोगियों की सेवा करती थीं। मैंने सोचा कि लेसबियन होना अपराध नहीं है, और अगर वह किसी से जबरदस्ती नहीं कर रहीं तो यह उनका निजि मामला है। बाद में मुझे खबर मिली कि उनकी संस्था (कोनग्रेगशन) ने उन्हें संस्था से निकाल दिया है और वह यूरोप वापस लौट आईं।

कुछ साल पहले अमरीकी अभिनेता केविन स्पेसी पर भी कुछ पुरुषों ने आरोप लगाये थे कि कुछ दशक पहले जब वह नाबालिग थे तब स्पेसी ने उनके साथ जबरदस्ती सम्बंध बनाये थे। इन आरोपों की वजह से स्पेसी को कई फिल्मों और सीरियल से निकाल दिया गया, लेकिन बाद में न्यायालय ने उन आरोपों को सही नहीं माना। एक ओर से यह हो सकता है कि इतने पुराने ज़ुर्म को अदालत में साबित करना आसान नहीं है, लेकिन दूसरी ओर यह भी हो सकता है कि प्रसिद्ध और पैसे वाले व्यक्ति पर झूठा आरोप लगाने का कारण व्यक्तिगत लाभ की आशा हो। 

एक और अनुभव

मेरा तीसरा अनुभव एक यूरोपी पुरुष से जुड़ा है जो करीब बीस साल से अफ्रीका में काम करते थे। उन्होंने वहाँ की महिला से विवाह किया था और उनके बच्चे भी थे, जिनमें वहाँ के कुछ गोद लिए हुए बच्चे भी थे। उन्होंने बहुत से बच्चों को छात्रवृति दिलवा कर यूरोप पढ़ने भेजा था। एक दिन उनके विरुद्ध शिकायत आई कि वह वहाँ अनाथाश्रम के बच्चों से यौन सम्बंध बनाते हैं। इस बात की जाँच के लिए वहाँ एक व्यक्ति को भेजा गया। तीन सप्ताह तक उस व्यक्ति ने वहाँ के बच्चों से, वहाँ काम करने वालों से, आदि से साक्षात्कार किये, और इस बारे में प्रश्न पूछे। पता चला कि आरोप लगाने वालों में कुछ लोगों का उनसे झगड़ा हुआ था, लेकिन किसी बच्चे से इसके बारे में बातचीत से कोई संदेहजनक बात नहीं निकली। आखिर में कुछ सबूत नहीं मिलने से यह जाँच बंद कर दी गयी और उनके विरुद्ध कुछ कार्यवाही नहीं की गई।

इस बात के चार-पाँच साल के बाद उस देश की सरकार ने उन्हें अपने देशवासियों की सेवा के लिए विषेश पुरस्कार दिया। इस बात को बीस-पच्चीस साल हो गये हैं और वह सज्जन, जो अब वृद्ध हैं, आज भी उसी देश में रहते हैं और उसी अनाथाश्रम में स्वयंसेवक की तरह काम करते हैं।

सच कहूँ तो आज भी मेरे मन में इस घटना के बारे में दुविधाएँ हैं, हालाँकि उनके अपने गोद लिए हुए बच्चे, जो अब व्यस्क हैं, कहते हैं कि उनके पिता पर लगे आरोप झूठे थे। आप बताईये कि आप इस मामले में क्या करते?

अंत में

मेरे लिए, व्यक्तिगत स्तर पर, इस विषय पर सबसे बड़ी दुविधा का कारण है कि जहाँ बलात्कार जैसे सबूत नहीं हों, किसी पर लगे आरोपों को कैसे जाँचा जाये? बाद में मन में संदेह रह जाता है, उसे निकालना असम्भव होता है, तो यह लगता है कि आरोप लगाना बहुत आसान है, लोग कुछ भी कह सकते हैं। लेकिन इसका दूसरा पहलू है कि जब कोई औरत, अतीत में हुई किसी बात को बताती है, तो उसके लिए यह कहना आसान नहीं होता, उसे कैसे गम्भीरता से न लिया जाये?

अंत में बात घूम-फ़िर कर वहीं आ जाती है कि उपन्यासों, फ़िल्मों या अखबारों या फेसबुक में यह बातें आसान लग सकती हैं, कि यह हुआ, ऐसा या वैसा करना चाहिए था। फेसबुक जैसे सोशल मीडिया में कुछ भी लिखना आसान है। लेकिन जब आप को निर्णय लेना पड़े तो यह कभी-कभी बहुत कठिन हो सकता है। 

पटना की घटना से जुड़ी बहस पर साहित्यकारों और साहित्य की बात करते हुए, मित्र ओम थानवी ने लिखा है, "अच्छा या बड़ा लेखक जाति, विचार, चरित्र, आचरण के बावजूद अच्छा या बड़ा होता है। कम-से-कम इस तरह के आधारों पर उसे त्याज्य या उपेक्षणीय नहीं माना जा सकता।" कुछ यही बात अन्य क्षेत्रों में काम करने वालों के लिए भी कही जा सकती है।

आप बताईये आप इस विषय के बारे में क्या सोचते हैं? 

*** 

शुक्रवार, जून 20, 2025

राशन की चीनी

आज सुबह चाय बना रहा था तो अचानक मन में बचपन की एक याद कौंधी। 

यह बात १९६३-६४ की है। मैं और मेरी छोटी बहन, हम दोनों अपनी छोटी बुआ के पास मेरठ में गर्मियों की छुट्टियों पर गये थे। १०१ नम्बर का उनका घर साकेत में था। साथ में और सामने बहुत सी खुली जगह थी। बुआ के घर में पीछे पपीते का पेड़ लगा था और साथ वाले घर में अंगूर लगे थे। एक बार दोपहर में जब अन्य लोग सो रहे थे, पड़ोसी घर से अंगूर चुरा कर खाने की सजा भी मिली थी। बुआ के यहाँ अजीत नाम के गढ़वाली सज्जन रसोईये का काम करते थे।

तब मैं नौ-दस साल का था और सुबह दूध पीता था। दिल्ली में घर पर दूध में चीनी मिला कर पीते थे। उन दिनों में चीनी राशन से मिलती थी और शायद मेरठ में उसकी कमी चल रही थी, इसलिए वहाँ दूध फीका पीना पड़ता था। ऐसी आदत पड़ी थी कि बिना चीनी का दूध पीया ही नहीं जाता था, मतली आने लगती थी। तब अजीत कहता कि गुड़ का टुकड़ा मुँह में रख लो और साथ में दूध का घूँट पीयो, चीनी की कमी महसूस नहीं होगी।

पिछले दस-पंद्रह सालों से मैं दूध, चाय और कॉफी बिना चीनी के पीता हूँ। मसूढ़ों में तकलीफ रहती थी तब डैन्टिस्ट ने कहा कि शायद मेरे मसूढ़ों को चीनी और कॉफी का सम्मिश्रिण सूट नहीं करता, इसलिए मुझे कुछ दिन तक बिना चीनी की कॉफी पी कर देखना चाहिए। एक बार कॉफी से शुरु किया तो चाय और दूध में भी चीनी डालना छोड़ दिया।

तब से फीका पीने की ऐसी आदत पड़ी है कि अगर चाय में चीनी हो तो मुझसे पी नहीं जाती, मतली आने लगती है। भारत में छोटे-बड़े शहरों में घूमते हुए कई बार ऐसा होता है कि वह लोग चाय बना कर रख लेते हैं जिसमें चीनी मिली होती है और आप उनसे बिना चीनी की चाय माँगिये तो वह मना कर देते हैं। रेल में भी यही होता है।

कर्णटक में एक पशु मेले में चाय बेचने वाली - Image by Sunil Deepak

तब सोचता हूँ कि जीवन भी कितना विचित्र है। कभी चीनी न होने पर उसके लिए तरसते थे और आज चीनी होने पर तरसते हैं।

***

साठ-सत्तर के दशक के बारे में सोचो तो मन में प्रश्न उठता है कि अगर गुड़ मिलने में कोई कठिनाई नहीं होती थी तो चीनी क्यों नहीं मिलती थी? गुड़ से चीनी बनाना ऐसा कठिन नहीं है। शायद तब बात गन्ने या गुड़ की कमी की नहीं थी बल्कि फैक्टरियों को चीनी बनाने के कोटा मिलना की थी, क्योंकि कोई फैक्टरी वाला, जितनी अनुमति मिली हो उससे अधिक चीनी का उत्पादन नहीं कर सकता था। अगर वह कोटे से अधिक उत्पादन करते थे तो सरकारी बाबू उन पर जुर्माना लगा देते थे।

यह कोटे वाली बात आज की पीढ़ी के लिए समझना आसान नहीं है। एक बार मैंने विक्स बनाने वाली कम्पनी के अधीक्षक का एक साक्षात्कार सुना था जिसमें उन्होंने बताया कि इंदिरा गाँधी की सरकार के समय में एक साल फ्लू का बुखार बहुत फ़ैला। इसलिए विक्स की माँग बहुत थी तो कम्पनी ने उत्पादन बढ़ा दिया। इस बात के कुछ महीने बाद उन्हें दिल्ली के एक अफसर ने बुलाया, वह अपने वकील के साथ गये। उन्हें कहा गया कि तुमने कोटे से अधिक विक्स बना कर अपराध किया है, उसका जुर्माना देना पड़ेगा।

आज का हिन्दुस्तान में बहुत सी बातें बदली हैं, अब फैक्टरियों को कोटे से अधिक बनाने का जुर्माना नहीं लगता, क्योकि अब कोटे नहीं होते। लेकिन कई क्षेत्रों में कुछ सरकारी बाबूओं की सोच में बहुत बदलाव नहीं हुआ है। उनका ध्येय जनसेवा नहीं, जब तक आप उनके हाथ गर्म नहीं करें तब तक उनका काम आप के काम में अड़चने डालना है।

आप की क्या राय है, हिन्दुस्तान में क्या बदलना चाहिए जो अभी भी नहीं बदला?

*****       

शनिवार, जून 07, 2025

झाड़ू-पौंछे का रोबोट

बचपन से देखा था कि माँ सुबह स्कूल में पढ़ाने जाने से पहले घर में झाड़ू लगा कर जाती थी, अक्सर झाड़ू के बाद गीला पौंछा भी लगता था। जब मेरी छोटी बहनें बड़ी हुईं तो कभी-कभी वह भी माँ का हाथ बँटाती थीं। जब से इटली में आया तो हमेशा पत्नी को यही काम करते देखा। यह हमारी झाड़ू-पौंछे की पुरानी दुनिया थी।

चीन में सड़क की सफाई करने वाले कर्मचारी

पहले गर्मियों की छुट्टियों में जब बेटे को ले कर पत्नी महीने-दो महीने के लिए समुद्र तट वाले घर में रहने चली जाती, तो मैं उनसे मिलने जाने के लिए सप्ताह-अंत की प्रतीक्षा करता था। लेकिन उन दिनों में घर की सफाई की ज़िम्मेदारी मेरी होती थी। तब मैं हफ्ते में एक बार झाड़ू लगाता था, और कभी-कभी पौंछा भी लगाता था। साथ में यह ध्यान रखता था कि जिस दिन पत्नी को घर लौटना है, उससे पहले घर की सफाई ठीक से की जाये। लेकिन कई बार ऐसा हुआ कि वह लोग छुट्टियों से एक-दो दिन पहले घर लौट आये और मुझे ठीक से सफाई करने का मौका नहीं मिला। तब पत्नी के माथे पर बल पड़ जाते कि "अरे, घर कितना गंदा हो रहा है"।

करीब दस साल पहले, मैं दो साल के लिए गौहाटी में काम करने गया तो वहाँ किराये के घर में अकेला रहता था। वहाँ घर में एक झाड़ू-पौंछा लगाने वाली आती थी। पिछले तीस-चालीस सालों में मुझे यहाँ पर एकदम साफ-सुथरे में रहने की ऐसी आदत हो गई थी कि मुझे लगता कि गौहाटी की झाड़ू-पौंछा लगाने वाली ठीक से काम नहीं करती थी, जल्दी-जल्दी दो हाथ चलाती और चली जाती। मैं एक-दो बार तो उसे ठीक से सफाई करने को कहा, जब देखा कि उनका काम तो उसे हटा कर एक अन्य महिला को रखा। जब समझ में आया कि काम तो वैसे ही होगा तो उन्हें काम पर आने से मना कर दिया। तब मैं खुद ही सुबह घर में अच्छी तरह से झाड़ू-पौंछा लगा कर ही काम पर जाता था।

नयी दुनिया की नयी सफाई

कुछ साल पहले हमने सफाई करने वाला रोबोट खरीदा। यह घर की धूल, मिट्टी, कूड़ा जमा करने में बढ़िया काम करता है, हालाँकि मेरी पत्नी को उससे संतोष नहीं होता, वह कई बार, इसकी सफाई के बाद, अलग से वेक्यूम क्लीनर ले कर उससे दोबारा सफाई करती है। लेकिन अब जब पत्नी गर्मियों में एक-दो महीने के लिए समुद्र तट पर रहने चली जाती है (और मैं वहाँ नहीं जाता क्योंकि मैं वहाँ तीन-चार दिन में ऊब जाता हूँ), तो घर में मेरे मित्र रोबोट जी ही सफाई करते हैं।

रोबोट से कालीन की सफाई

घर के पिछवाड़े में इस रोबोट का बिस्तर लगा है, वहाँ रख दो तो पूरा चार्ज हो जाते हैं। हर दूसरे-तीसरे दिन इन्हें काम पर लगा देता हूँ। गोल-गोल घूम कर यह कमरे के कोने-कोने में जाते हैं। इनके भीतर कम्पयूटर लगा है, इनके पास घर का पूरा नक्शा है कि कहाँ  क्या रखा है, सोफे और मेज़ आदि के चक्कर लगाना आता है, और यह सीढ़ियों से नीचे नहीं गिरते। ऊँचाई कम है इसलिए यह अलमारियों, बिस्तरों आदि के नीचे घुस कर सफाई कर सकते हैं। इन्हें चलाने से पहले, मैं कमरे की जो चीज़ें आसानी से हट सकती हैं, उन्हें वहाँ से हटा लेता हूँ ताकि यह खुले घूमें।

रोबोट अलमारियों, बिस्तर आदि के नीचे भी घुस जाता है

छोटे-मोटे कालीन आदि भी झाड़ कर हटा देता हूँ, जबकि मोटे कालीन को वहीं अपनी जगह पर छोड़ देता हूँ ताकि उसके  ऊपर से भी अच्छी तरह से सफाई हो जाये। 

जब यह काम कर लेता है तो वापस अपने बिस्तर की ओर लौट जाता है और अपने आप को रिचार्ज के लिए लगा लेता है। चूँकि हमारे पिछवाड़े में बारिश के समय पानी जमा हो जाता है, इसलिए हमने इनका बिस्तर ज़मीन से उठा कर चबूतरे पर बनाया है, तो जब रिचार्ज करना हो बेचारा चबूतरे के पास जा कर थोड़ी देर तक तड़पता है, फ़िर वहीं बत्ती बुझा कर बैठा रहता है कि हम इसे उठा कर इसके रिचार्ज-पोर्ट पर रखें।

सफाई वाले रोबोट का रिचार्ज

हमारे मॉडल में केवल वैक्यूम से कूड़ा खींचने वाला झाड़ू है, लेकिन बाज़ार में दूसरे मॉडल मिलते हैं जिनमें पौंछा लगाने की सुविधा भी है। हमने अपना सस्ता सफाई का रोबोट मॉडल, दो-तीन साल पहले, करीब दो सौ यूरो (पंद्रह-सोलह हज़ार रुपये) का खरीदा था। आजकल यहाँ इटली में घर में सफाई का काम करने वाले लोग एक घंटे का करीब दस यूरो (आठ-नौ सौ रुपये) लेते हैं, उस हिसाब इन्हें खरीदना कम खर्चीला है। इसका बटन है, जिसे दबाओ तो कूड़े वाला हिस्सा बाहर निकल आता है और उसे साफ करना आसान है। 

बटन दबा कर रोबोट से कूड़ा बाहर निकालना

 जब यह रोबोट जी मेरे आस-पास घुर-घुर करके घूम रहे होते हैं, तो मैं कभी-कभी इनसे बातें भी करता हूँ। कल जब मानव-शरीर जैसे रोबोट बनेंगे तो शायद उनसे पूछूँगा, "भाई साहब, आप चाय पीयेंगे?"

***** 

इस वर्ष के लोकप्रिय आलेख