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मंगलवार, सितंबर 22, 2026

लेखन यात्रा - अलका सरावगी

अलका जी मेरी जान-पहचान बीस-पच्चीस साल पहले अशोक जी (अशोक सेकसरिया) की वजह से हुई थी। अशोक जी, जैसा कि आप अलका जी के साक्षात्कार में पढ़ेंगे, ने उनके सृजनात्मक जीवन में महत्वपूर्ण भाग निभाया था। वैसे मैं अशोक जी को बचपन से जानता था जब वह दिल्ली में रहते थे और मेरे पिता ओम प्रकाश दीपक के साथ समाजवादी पत्रिका 'जन' में काम करते थे और अक्सर हमारे घर आते थे।

अलका सरावगी 2016 में इटली में वेनिस युनिवर्सिटी में - तस्वीर डॉ. सुनील दीपक

उसके बाद बीच-बीच में किसी न किसी वजह से अलका जी से पत्राचार होता रहता था। उनके तीन उपन्यास इतालवी भाषा में अनुवादित हो कर छपे हैं और उन्हें इतालवी सरकार का Order of the Star Cavelier सम्मान भी मिल चुका है।

कुछ साल पहले वह वेनिस युनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में अपने लेखन के बारे में बोलने आयीं थीं तो मैं उन्हें सुनने गया था, लेकिन घर लौटने वाली ट्रेन के छूटने की चिंता में, बाद में वहाँ रुक कर उनसे बात नहीं कर पाया था। पिछले साल कलकत्ता जा कर उनसे मिलने की बात थी, पर वह भी नहीं बन पाई थी।

बहुत समय से सोच रहा था कि अपने इस ब्लॉग के लिए उनसे बातचीत करूँ। यह आलेख एक प्रश्न-उत्तर के रूप में शुरु हुआ था। उसमें मैंने उनके कुछ वीडियो देख कर, कुछ अन्य बातें जोड़ीं। इस बातचीत को आप अलका जी की जुबानी ही पढ़ सकते हैं।  

अलका सरावगी की जुबानी

व्यक्तिगत

हमारा एक मध्यवर्गीय मारवाड़ी परिवार था, जहां लड़कियों को रोका-टोका जाता है कि ऐसे मत करो, वैसे मत बोलो। इसे मैंने बहुत रज़िस्ट किया। घर के काम देखने-सीखने में मेरा मन नहीं लगता था, इसलिए खाना बनाना भी नहीं सीखा जबकि मां बहुत अच्छा खाना बनाती थी। घर के काम में मन इसलिए भी शायद नहीं लगा क्योंकि बहुत प्यार करने वाली दादी ने बचपन में कान में फूंक दिया था कि भगवान ने तुम्हें चौका-चूल्हा घर-वर संभालने नहीं भेजा है।

जब सब सहेलियाँ मिल कर कोई फिल्म देखने जाती थीं तो हमें अनुमति नहीं मिलती थी। इन सब बातों को ले कर मन में गुस्सा और विद्रोह का भाव था, और पिता जी की बहुत सी बातें गलत लगती थीं। बारह-तेरह साल की थी जब पीरियड शुुरु हुए तो सब कहते कि यहां मत बैठो, वहां मत बैठो, यह मत छूओ, वगैरा, तो उससे बहुत घुटन होती थी। 

मेरे पिता जी अपनी लड़कियों को आगे बढ़ाना चाहते थे, उन्हें गाड़ी चलाना सिखवाया था। स्कूल में स्विमिंग पूल था तो मैंने तैरना भी सीखा था। एन.सी.सी में भर्ती हुई थी और उसके कैम्प में रोने-धोने के बाद जाने दिया गया था। कांचरापाड़ा कैम्प में पिता गाड़ी की डिक्की भरकर पच्चीस लड़कियों का खाना लेकर पहुंचे थे। वे छह फुट लंबे शानदार व्यक्तित्व वाले थे। स्कूल के वार्षिक समारोह में किसी नाटक के बाद मुख्य पात्र निभाने वाली लड़की को उन्होंने हॉल में खड़े हो कर अपनी तरफ़ से मेडल घोषित कर दिया था। उन पर गर्व करने के हमारे पास तमाम कारण थे। मेरे हमेशा फर्स्ट आने पर उन्हें भी बहुत गर्व था, पर मेरे साथ ही पढ़ने वाली बड़ी बहन के कारण वे इसे छुपा लेते थे। या शायद इसलिए कि मेरे पाँव धरती पर रहें।

दो बड़ी बहनों की कम उम्र में शादी हुई तो उनके जीवन को देख कर लगता था कि आगे मुझे भी वैसा ही जीवन मिलेगा। स्कूल के दिनों में "सारा आकाश" पढ़ रही थी और मन ही मन में विद्रोही बन रही थी, सोचती थी कि उस उपन्यास की प्रभा जैसा ही मुझे भी कोई ससुराल मिलेगा जहां लोग तरह-तरह के ताने कसेंगे। मां से कहती थी कि बंगाली घर में पैदा होती तो अच्छा होता, वह लोग मेरे पढ़ने लिखने पर खुश होते। मेरी बहनों का तो बीे.ए. भी नहीं हुआ था जब उनकी शादी हुई थी। ग़नीमत थी कि मेरी शादी बीस साल की उम्र में जाकर हुई, जब मैंने बी.ए. पास कर लिया था।

बाहरी तौर पर मेरे ससुराल का परिवार उस तरह से मॉर्डन नहीं था जैसा पीहर में था। पिता पैंट-शर्ट पहनते और शौक से रहते। अंग्रेज़ी में फर्राटे से बोलते और शेरो-शायरी उन्हें कंठस्थ थी। ससुर धोती-कुरते वाले थे और सास सीधे पल्ले से साड़ी पहनतीं, जबकि माँ उल्टे पल्लेवाले आधुनिक अंदाज़ में।

लेकिन, ससुराल में अपेक्षकृत पिता की तरह मजबूती से मुझे  हां या नहीं कहने वाले लोग नहीं थे। पिता की इच्छा के सामने अपनी चलाई नहीं जा सकती थी। उनके गुस्से से भी सबको डर लगता था। मेरी सास की तरफ से सहयोग था, वह पढ़ने-लिखने की बहुत क़दर करती थीं। वे बहुत धार्मिक थीं और शायद इसीलिए हर आत्मा को उसके प्रवाह से रोकने के पक्ष में नहीं थीं। उनका हमेशा सहयोग रहा।

मैंने शादी के बाद ही एम.ए. किया, फिर एम.फिल. किया। पति कहते थे कि बिना झगड़ा-झमेला किये जो कर सकती हो वह करो। वह समर्थन करते थे। लेकिन वैसी उन लोगों का सोच नहीं थी, यह बिना कहे ही ज़ाहिर था कि उस समय अगर कोई घर का काम होता तो वही ज्यादा ज़रूरी माना जाता था। 

जब मेरे एम.ए. के इम्तहान चल रहे थे तो मेरे ससुर ने मुझे बुलाया, पूछा कि क्या कर रही हो, तो मैंने कहा कि पढ़ रही हूँ। बोले कि इतना पढ़ना क्या जरूरी है? मुझे समझ में नहीं आया कि क्या कहूं। अगर बचपन से स्कूल में टॉपर रहे हों तो मन में हमेशा टॉपर रहने की भावना रहती है। वहां हमारी स्पेस मेरा बैडरूम ही था, वहां पर हर ओर किताबें ही किताबें बिछा रखी थीं। एम.ए. में फर्स्ट क्लास फर्स्ट आया तो सब खुश भी हुए।

उन दिनों में कुछ लिखने की याद तो बिल्कुल नहीं है। तब तक मैंने पी.एच.डी. और लेक्चरार बनने की परीक्षाएं दे डाली थीं। एक कॉलेज में पार्ट-टाइम नौकरी मिली, तो समझ में आया कि पढ़ाना मेरे बस की बात नहीं है। मैं अपनी ऊर्जा सिर्फ़ लिखने के लिए बचाना चाहती थी।

मेरी दादी

मेरे ख्याल से मैं तीन या चार साल की थी, मेरी दादी सुंदरकांड का पाठ करती थीं। तब मुझे पढ़ना नहीं आता था, पर दादी से सुन कर मुझे सुंदरकांड पूरा याद हो गया था। मैं उसे पूरा रिसाइट कर सकती थी, जो कि काफी बड़ा है। तब हमारे घर में यह चलन था कि अगर कोई भी बाहर का आदमी आता तो कहते कि सुंदरकांड वाली लड़की को बुलाओ। सबके सामने कहा जाता कि सुंदरकांड सुनाओ तो मैं सुना देती थी, पर लोग सुनते-सुनते बोर हो जाते थे, तो कहते थे, अच्छा, ठीक है।

मुझे अपनी दादी से बहुत प्रेम था। वह मुझे अपने जीवन की बहुत सी बातें बताती थीं, कि कैसे वह लोग राजस्थान से कलकत्ता आये, कलकत्ता में शादी होने के बाद वह वापस राजस्थान चली गयीं, वहां से आते-जाते रहे, परिवार में क्या-क्या घटनाएं - दुर्घटनाएं घटीं, वह क्या खाती-पीती थी, कैसे उनका जीवन बदल गया। उन्हें मुझ में एक श्रोता मिला हुआ था, और मुझे उनकी बातों में बहुत रस आता था। उनके चेहरे की एक-एक रेखा, एक-एक झुर्री तक, मुझे आज भी याद है।

वह मुझे कहती थीं कि ऊपरवाले ने तुम्हें यह सब सामान्य काम करने के लिए नहीं, कुछ और करने के लिए बनाया है। वह और काम क्या था या क्या हो सकता है, उसकी उन्हें कोई स्पष्ट कल्पना नहीं थी। लेकिन उनकी यह बात मेरे भीतर कहीं पर रह गयी और पनपती रही।

बचपन

हमारे बचपन के ज़माने में स्क्रीन तो था नहीं। किताबें और पत्रिकाएं घर में आती थीं और चाव से पढ़ी जाती थीं। माँ पापुलर उपन्यास पढ़ती थीं—शिवानी, रानू,ओम प्रकाश शर्मा, आचार्य चतुरसेन, ये कुछ नाम तो बिलकुल याद हैं। मुझे बचपन से पढ़ने का बेहद शौक़ था। जो कुछ मिल जाए उसे पढ़ डालती थी। धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान आदि पत्रिकाएँ, चंदामामा और चंपक के साथ पढ़ी जाती थीं। अक्सर मैं अपनी उम्र से ज़्यादा बड़ी किताब पढ़ लेती थी। बाद में चौदह साल की उम्र से अंग्रेजी में एनिड ब्लाइटन की किताब जन्मदिन पर किसी ने दी। उसके बाद उनका चस्का लगा और फिर आगे चलकर शेरलॉक होम्स, अगाथा क्रिस्टी, सिडनी शेल्डन पढ़ी गईं। जो कुछ मिल जाए वही पढ़ा जाता था। मेरी दादी दोस्तोवेस्की का हिंदी अनुवाद पढ़ती थीं। घर में साकेत, यशोधरा जैसी मैथिली शरण गुप्त की रचनाएँ थीं। पिता ग़ज़ल और गीतों के शौकीन थे और बाकायदा एक कॉपी रखते थे जिसमें उन्हें उतारते थे।

स्कूल में पढ़ने में अच्छी थी इसलिए शिक्षिकाओं की प्रिय थी। स्कूल की लायब्रेरियन भी मुझे अच्छी विद्यार्थी समझती थी, आठवीं में आते-आते मैंने प्रेमचंद के मानसरोवर के सारे खंड, और अन्य जो लेखक हमारे स्लेबस में होते और लायब्रेरी में उनकी किताबें मिल जातीं तो उनको पढ़ने लग जाती थी।

इस तरह से शब्दों से मेरा लगाव गहरा था और सब को मालूम था। बचपन में स्कूल की पत्रिका के लिए एकाध बार कुछ लिखा, पर विशेष कुछ नहीं लिखा। अलबत्ता परीक्षा में निबंध में हमेशा सबसे अधिक मार्क्स मिलते रहे। घर पर खाना खाते हुए पढ़ना मना था, पिता जी नाराज होते थे, इसलिए जब उनकी आवाज़ सुनती थी तो किताब को कुर्सी पर अपने नीचे रख कर उस पर बैठ जाती थी। पंडित रामचन्द्र शुक्ल का हिंदी साहित्य का इतिहास घर में पता नहीं कहां से आया था, वह भी पढ़ती रहती थी। हिंदी साहित्य से मेरा परिचय उसके माध्यम से हुआ, वह पुरानी प्रति अभी भी मेरे पास सुरक्षित है।

पढ़ना

कॉलेज के दिनों में अंग्रेज़ी की बहुत किताबें पढ़ी गईं । एक सहेली के घर में बहुत सारी किताबें थीं - आर्थर हेली, लियोन यूरी खासकर पढ़े गए। ऐन रेंड की ‘फ़ाउंटेनहेड’ ने मुझे बहुत प्रभावित किया। अंग्रेज़ी के बेस्टसेलर टाइप के तमाम उपन्यास पढ़े जो मिल जाते थे। सॉमरसेट मॉम के उपन्यास और कहानियाँ पढ़ना याद है।

मैंने हिंदी साहित्य जो मैंने दसवीं-ग्याहरवीं क्लास तक पढ़ा था, उसके बाद कॉलेज में पढ़ते समय वह छूट गया था, तब अंग्रेजी साहित्य पर अधिक जोर था। अशोक जी से मिलने के बाद मैं हिंदी साहित्य की ओर लौटी। अशोक जी कहते थे कि हमेशा एक डायरी रखिए और उसमें लिखिये। इसलिए डायरी रखी, जिसमें उनकी बातें सुनकर लिख लेती कि कौन सी किताबें पढ़नी है।

संयुक्त परिवार में रहते हुए और बच्चों के कारण, मेरे पास अपने लिए समय बहुत कम होता था। मैं अक्सर अपने उपन्यास की थीम से संबंधित नॉन-फिक्शन की किताबें पढ़ती रहती हूँ। समकालीन हिंदी साहित्य भी काफ़ी पढ़ती हूँ। प्रकाशक या लेखक मित्र कविता, कहानी, उपन्यास की किताबें भेज देते हैं, तो कोशिश करती हूँ कि उन्हें पढ़ कर फेसबुक पर ही सही, कुछ लिखूँ। मोबाइल पर ऑनलाइन वेब-साइट्स पर लेख और कहानियाँ पढ़ी जाती हैं। पत्रिकाओं में प्रकाशित किसी कहानी की चर्चा हो तो उसे खोज कर पढ़ती हूँ।

मेरा बेटा अंग्रेज़ी के बुकर और नोबेल पुरस्कृत लेखकों को बहुत पढ़ता है। पर वे किताबें आसपास रहते हुए भी नहीं पढ़ पाती हूँ, इसका अफ़सोस रहता है।

अशोक सेकसरिया और लेखन की शुरुआत

पच्चीस साल की उम्र में, जब मेरी शादी और दो बच्चे हो चुके थे, मुझे मेरे गुरु लेखक-पत्रकार अशोक सेक्सरिया मिले। बच्चों के लिए शब्दकोश बनाने के प्रोजेक्ट में उनसे परिचय मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट था। जिस दिन मैं पहली बार बालकोश के दफ्तर में गयी, तभी समझ गयी थी कि मेरे जीवन का यही अर्थ है। वहां चारों ओर किताबें थीं, बातें थीं, लोग थे। अशोक सेकसरिया मुझे वहाँ मिले, वही मेरे गुरु और मैंटोर बने। वह एक जाने माने लेखक और पत्रकार थे। उसके बाद मैंने सोचा नहीं कि इस माहोल के बाहर भी मेरा कोई जीवन है।

अशोक सेकसरिया व अलका सरावगी - तस्वीर अलका सरावगी के सौजन्य से

अशोक जी को अपने बारे में कुछ भी बताने से वह कहते थे, इसे लिख डालिए। मुझे लगता कि इतनी मामूली बातों को कौन पढ़ेगा? बहरहाल मैंने 'अंग्रेज़ी स्कूल में पहला दिन' शीर्षक से एक फीचर लिख डाला जो कलकत्ता की एक पत्रिका में छपा, जिसके राजकिशोर जी संपादक थे। जब मैंने उसे पढ़ा तो मैंने उसमें एक वाक्य था, "कितना कातर था वह बचपन", तो उसमें अशोक जी ने 'कातर' शब्द को काट करके कुछ और शब्द लिख दिया था, तो मुझे बहुत बुरा लगा। मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने उस पर काफी बहस की। तब अशोक जी ने अपनी गलती मान ली कि उन्हे उस शब्द को बदलना नहीं चाहिए था और खासकर कि मुझसे बिना पूछे। बाद में आगे चलकर अशोक जी ने मुझे बताया कि इस बात से उनको लगा था कि मैं अपने शब्दों के प्रति बहुत सजग हूं और अपने शब्द के लिए मैं उनसे लड़ पड़ी थी तो इस बात के लिए उनके मन में मेरे प्रति बहुत सम्मान हुआ था।

समाजवादी आंदोलन के लोगों की पत्रिका "सामयिक वार्ता" निकलती थी, अशोक जी उसके लिए बहुत काम करते थे, हर समय उसके लिए अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद करते रहते थे। सच्चिदानंद सिन्हा, किशन पटनायक जैसे लोग वहाँ आते रहते थे। मेरी पॉलीटिकल अवेयरनेस की शिक्षा-दीक्षा उनके कमरे में हुई, जो कि रेलवे प्लेटफार्म की तरह का कमरा था जिसमें सिर्फ किताबें और सिगरेट का धुआं और धूल रहती थी। अशोक जी की खटिया थी, हमेशा उस पर बैठे रहते थे। पास में कुछ टूटी-फूटी कुर्सियाँ रहती थी जिन पर हम लोग बैठे रहते थे।

उनके घर पर बहुत सारे लेखकों से मेरा परिचय और मिलना हुआ - कृष्णा सोबती, निर्मल वर्मा, गिरधर राठी, अशोक वाजपेयी, विभूति नारायण राय। यह सारे लोग जब कलकत्ता आते तो अशोक जी से मिलने आते और मेरे लिए यह एक ट्रेनिंग स्कूल था, जहाँ सुनने के लिए बहुत सारी बातें मिलती थी और सुनने में बड़ा आनंद आता था।

जब मुझे साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला तो अशोकजी इस बारे में बहुत चिंतित थे। उन्हें लगा मैं आगे लिख नहीं पाऊँगी।  खैर पुरस्कार मिला और उसके बाद भी मैं लिखती रही। अशोक जी को शायद इससे आश्वासन भी मिला होगा कि एक पुरस्कार मुझे नष्ट नहीं कर पाया, जैसा कि मैं उनको बार-बार कहती थी कि ऐसा नहीं होगा।

मेरे लेखन में और मेरे जीवन जीने के तरीके में, अशोक जी की एक बहुत बड़ी उपस्थिति हमेशा रही। वह ऐसे गुरु थे जो कुछ भी नहीं सिखाता है, कुछ भी नहीं पढ़ाता है,  फिर भी उसका होना ही एक तरह की एक मिसाल थी। 

कहानियाँ

तीस साल की उम्र में पहली कहानी छपने के बाद, मैं उत्साह में भर कर लगातार लिखती गई।

शायद 1989 में, हम सब परिवार सहित कलकत्ते के पास किसी के घर में दो दिन के लिए गए थे। वहां मुझे एक शक्स दिखाई दिया जो कुछ अजीब सा दिखता था, मुंह फाड़ कर मुस्कराता था, ऐसा ढीला पजामा पहने था कि वह लहंगे की तरह फट-फट करता चलता था। वह हंसता रहता था और हमारी सेवा-टहल ऐसे करता था जैसे घर का नौकर हो, लेकिन वह खाता हम सब के साथ में था और रहता भी उसी घर में सब के साथ था। घर में उसका स्थान क्या है, मुझे यह समझ में नहीं आता था। जब हम लौट रहे थे तब मैंने देखा कि वह रो रहा था। इसलिए जब गाड़ी चल पड़ी तो मैं बड़ी उदास हुई और मैंने उसके बारे में जानना चाहा। पहले तो उन लोगों को समझ में नहीं आया कि हम किसकी बात कर रहे हैं, क्योंकि अन्य लोगों के लिए जैसे वह था ही नहीं, अदृश्य सा था। बोले, कौन, वह पागल? तो मैंने कहा कि वह पागल नहीं है, तो सब हंस पड़े और खूब हंसे।

उस पर मैंने एक कहानी लिखी - "आपकी हँसी"। अशोक जी ने कहा कि रवींद्र कालिया है और यह उनका पता है यह भेज दीजिए। इस तरह से उस कहानी को "वर्तमान साहित्य" के महाविशेषांक में भेजा। निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती जैसे लेखकों के साथ, वह 'प्रथम रचना' करके छपी और चर्चित हुई। मेरे पास बहुत सारी चिट्ठियां आईं कि ऐसा आदमी, हाशिए पर फेंका हुआ मार्जिनलाइज्ड आदमी, जिसकी तरफ हम कभी ध्यान भी नहीं देते हैं और वह दिखता ही नहीं है, उन सबकी ज़िंदगी में कहीं न कहीं मौजूद था।

1996 में मेरा पहला कहानी संग्रह आया। वह कहानियाँ आसपास के जीवन और उससे जुड़े सोच पर आधारित थीं। कुछ स्त्री होने के अनुभव पर भी थीं, हालाँकि उनमें स्त्री-विमर्श या फेमिनिज्म नहीं था। शिल्प की दृष्टि से उनमें कुछ नयापन भी था।

उपन्यास

कलिकथा की शुरुआत भी एक कहानी की तरह हुई थी। उसका शीर्षक था, "बीच वाला कमरा कहाँ है"। यह हमारे किसी परिचित के हार्ट के बाइपास करवा कर लौटने पर कही गई बात पर आधारित थी। पर वह कहानी दो पैराग्राफ के बाद रुक गई थी। आज़ादी के पहले जब बीच वाला कमरा नहीं था, उस समय को खोजते हुए इस कहानी ने उपन्यास का विराट रूप धारण कर लिया।

अलका सरावगी व प्रो. थॉमस दाह्नहार्ट, 2016 में इटली में वेनिस युनिवर्सिटी में - तस्वीर डॉ. सुनील दीपक

 

मेरी कहानियाँ ‘आधार प्रकाशन’ ने हज़ारों प्रूफ की गलतियों के साथ छापी थीं। कलकत्ता के पुस्तक मेले में आए प्रकाशक को मैंने चाय पर घर बुलाया और कह दिया कि मेरे पास बन्दूक होती तो मैं उन्हें गोली मार देती। फिर अपने गुस्से का प्रायश्चित करने के लिए उन्हें ही उपन्यास दिया। उन्होंने भी उसे ऐसा बढ़िया छापा कि निर्मल वर्मा तक हाथ में लेकर देर तक कवर देखते रहे। कलिकथा पर अनेक पत्र आए— समीक्षाएँ भी झोली भर कर आयीं। यह सब मेरी आशा से परे था।

कलिकथा के बाद कुछ एक ऐसी दुर्घटना घटी जिससे मैं डिप्रेशन में चली गई। पांच-छह महीने तक किसी की कोई बात सुनने-कहने का, कुछ भी करने का, दिल नहीं होता था। तब एक मीटिंग के लिए फोन आया। घर वाले भी सब कह रहे थे कि तुम उठो, घर के बाहर निकलो, तो मैंने सोचा कि चलो ठीक है, वहां जा कर बैठ जाते हैं।

मैं वहां गई तो मुझे एक महिला मिलीं, उन्होंने बिल्कुल दादी की जैसी सफ़ेद साड़ी पहनी थी, दादी जैसा उनका स्नेहिल  चेहरा था। उन्होंने कहा कि अरे हमने तुम्हारी कलिकथा पढ़ी है। वह मुझे अपने जीवन की कहानियां सुनाने लगींं, तो मैंने उन्हें कहा कि आप की कहानियां इतनी सशक्त हैं, आप इन पर क्यों नहीं लिखती हैं। इस पर उन्होंने कहा कि नहीं, मैं लिख नहीं सकती, तुम्हें लिखना हो तो तुम लिखो। इस तरह से "शेष कादंबरी" की शुरुआत हुई और उसे लिखते हुए मेरा डिप्रेशन गायब हो गया और मैंने अपने आप को जैसे फिर से डिस्कवर किया, कि अल्टीमेटली मैं लेखक हूं और जीवन में चाहे कितना भी बड़ा कुछ भी हो जाए, मैं हार नहीं मान सकती। "शेष कादंबरी" ने इस तरह से मेरा उद्धार किया। मेरे शब्दों ने और लेखन ने मुझे फिर से जीवन जीने की हिम्मत दी है।

मेरे उपन्यास "गांधी और सरलादेवी चौधरानी" में गांधी जी एक मुख्य पात्र के रूप में है। गांधी जी को जानना भी मेरे लिए एक यात्रा थी, यह समझना कि किस तरह से उन्होंने अपने को बनाया, किस तरह से उन्होंने उस समाज को बनाया जिसने आजादी के लिए लड़ाई लड़ी। गांधी की क्या सोच थी, उनकी कितनी अंदरूनी ताकत थी जिसके भरोसे वह खड़े हो जाते थे, उन्हें भरोसा होता था कि वह ऐसा बदलाव ला सकेंगे। मैंने इस किताब में गांधी के जीवन का एक साल का पीरियड लिया है जो जलियांवाला बाग के 6 महीने बाद से शुरू होता है जब गांधी जी पहली बार लाहौर गए थे।

सरलादेवी चौधरानी, लाहौर के देशभक्त वकील-पत्रकार रामभज दत्त चौधरी की पत्नी थी और रवींद्रनाथ टैगोर की बहन की लड़की थीं। गांधी जी उन्हें एक सहयोगी नेता की तरह देख रहे थे क्योंकि वह इस देश की औरतों में जागृति लाना चाहते थे। सरलादेवी चौधरानी के साथ उनका यह एक साल का जीवन, उसे आप प्रेम प्रसंग भी कह सकते हैं या एक तरह का सपना जो वह देख रहे थे। सरला देवी एक ऐसा चरित्र है जो अपने समय के बहुत आगे देख सकता है, सोच सकता है।

गांधी और सरलादेवी में बहुत ही फोकस है, देश ही उनके लिए सब कुछ है और देश की आज़ादी के अलावा कुछ नहीं था। व्यक्तिगत कुछ भी महत्व नहीं रखता है। प्रेम के लिए वे दोनों तैयार नहीं थे। पर प्रेम हुआ और गांधी ने अपने पत्र में इसे साफ़ स्वीकार किया। इस तरह से यह एक ह्यूमन साइकोलॉजी का, एक स्त्री पुरुष के बीच के संबंधों का, दोनों ही का एक बहुत ही अनयूजुअल चरित्र हैं।  वह सम्बंध क्यों टूटता है और किस तरह टूटता है,यह उपन्यास उसकी बात कहता है।

मेरे पांचवें उपन्यास, "जानकीदास तेजपाल मेन्शन" को अपेक्षित सराहना नहीं मिली, ऐसा मुझे लगा। अपने बच्चे सबको श्रेष्ठ लगते हैं, इसलिए अपनी राय को ज़्यादा महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। कई साल बाद उसे इंदु शर्मा कथा यू.के. में सम्मान मिला, तो तसल्ली ज़रूर हुई। 

लिखना

मैं यह कह सकती हूँ कि पात्र का चुनाव और विषय बहुत कुछ संयोग पर आधारित होता है। अचानक कोई कहानी आप को पकड़ लेती है और आप उसमें धँसते चले जाते हैं। वह सोते-जागते नए रूप लेती रहती है और जीवन के जिस छोटे ग्राफ से वह शुरू हुई थी, वह फैलता जाता है। पात्र बिल्कुल वही नहीं रहते जहाँ से उन्हें शुरू में देखा था। वे जैसे ख़ुद को लिखवाते हैं जिसमें आप का पढ़ा- लिखा- देखा- सुना हुआ अनायास जुड़ता जाता है। कोई योजना से वे नहीं चलते।

लिखते हुए यदि यह भय रहे कि कोई आपको ग़लत समझ लेगा या कोई शख़्स उसे असली ज़िंदगी में पहचान कर आप से नाराज़ हो जाएगा, तो लिखा जा नहीं सकता। मेरे साथ ऐसा हुआ भी है। पर यह ख़तरा उठाये बिना जीवन रचा नहीं जा सकता।

हमको पहले का सब कुछ अनलर्न करके लिखना होता है और अगर आप अनलर्न नहीं कर पाते हैं तो फिर आप कहीं न कहीं अपने आप को दोहराने लग जाते हैं।

पात्र लेखक को अपनी अंगुली पकड़ा कर मनमाने तरीके से चलाते हैं। उसमें बहुत कुछ प्रीमेडीटेटेड नहीं होता, वह भी एक यात्रा होती है, डिस्कवरी की। पात्रों के साथ चलते हुए, आप लिखते भी हैं और साथ-साथ अपने आप को भी जानते चलते हैं, क्योंकि लिखा किरदार आपसे अलग भी होता है और वह आपका अपना ही होता है, खासकर जब तक किताब छप नहीं जाए।

अन्य लेखक

हिंदी के अन्य लेखकों से अधिकतर मेरे औपचारिक संबंध ही रहे हैं क्योंकि कलकत्ता में रहते हुए मिलना-जुलना कम होता है। अनामिका, गीतांजलि श्री, प्रत्यक्षा, प्रियदर्शन, रजनी गुप्त, उदयन वाजपेयी, यतीश कुमार, अम्बर पांडे कुछ नाम हैं जिनसे अपनापन महसूस हुआ है। अन्य भाषाओं के लेखकों में असम के नीलिम कुमार हैं। अभी उनकी आत्मकथा पढ़ रही हूँ। गुजराती में ग़ुलाम मोहम्मद शेख हैं। बांग्ला और अंग्रेज़ी के कई लेखक हैं। 


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बुधवार, अगस्त 19, 2026

ब्लॉग या सबस्टैक

हिंदी के पहले ब्लॉग 2004-05 के आसपास बनने शुरु हुए थे। मैंने यह अपना ब्लॉग 2005 में गूगल के ब्लॉगर पर बनाया था। पिछले इक्कीस सालों में अपनी बात को लोगों तक पहुँचाने वाले माध्यमों में बहुत से परिवर्तन आये हैं। गूगल के अतिरिक्त, ब्लॉग बनाने के अन्य बहुत से प्लेटफॉर्म आये और गये, उनमें से कुछ जैसे कि वर्डप्रैस आज भी जीवित हैं। लेकिन स्थिति बदलती रहती है, जब भी फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम जैसे नये प्लेटफॉर्म निकलते हैं तो कुछ ब्लॉग लिखने वाले उन पर लिखने लगते हैं और अपने पुराने ब्लॉगों को बंद कर देते हैं, कुछ साथ-साथ ब्लाग को भी चालू रखते हैं।

कुछ वर्ष पहले सबस्टैक नाम का एक नया प्लेटफॉर्म निकला तो बहुत से ब्लॉग वहाँ चले गये हैं। कुछ दिन पहले किसी ने मेरी राय पूछी कि सामान्य ब्लॉग बनाना चाहिये या सबस्टैक वाला ब्लॉग, तो मैंने इस विषय पर सोचा। साथ में इस बात पर भी विचार किया कि इक्कीस साल के बाद भी मैं इस ब्लॉग पर क्यों लिखता रहता हूँ?

इस आलेख में ब्लॉग बनाम सबस्टैक, और आज की दुनिया में जब अपनी बात लोगों तक पहुँचाने के लिए इतने सारे माध्यम है, ब्लॉग लिखने का महत्व, जैसी बातों के बारे में अपनी सोच और अनुभव साझा करना चाहता हूँ।

यह सबस्टैक क्या है?

सबस्टैक के पाठकों के लिए दो चेहरे हैं - उसका प्रमुख चेहरा है इलैक्ट्रोनिक न्यूजलैटर का, यानि अगर आप किसी सबस्टैक के सदस्य बनेंगे तो उसके आलेख आप के ईमेल से आप तक पहुँचेंगे। उसका दूसरा चेहरा है कि आप उन्हीं आलेखों को ब्लॉग की तरह भी इंटरनैट पर या सबस्टैक एप्प पर पढ़ सकते हैं।

सबस्टैक के लेखक अपने पाठकों से अपने आलेखों को पढ़ने के लिए फीस माँग सकते हैं, आप से कह सकते हैं कि आप उनके सदस्य बनिये और अगर फीस दे कर आप सदस्य नहीं बनते तो उनके आलेखों को नहीं पढ़ सकते।

सबस्टैक 2017-18 के आसपास बनने शुरु हुए थे। गूगल से पूछा तो पता चला कि दुनिया में इस समय करीब एक लाख सबस्टैक लेखक हैं जो नियमित लिखते हैं और उन्हें पढ़ने के लिए पैसे दे कर सदस्य बनना आवश्यक है। उनके अतिरिक्त अन्य कई लाख फ्री सबस्टैक हैं, जिन्हें पढ़ने की कोई फीस नहीं लगती।

भारत से निकलने वाले लोकप्रिय सबस्टैक हैं रोहण वैंकट का इंडिया इनसाईड-आऊट, प्रणय कोटास्थाने का एन्टीसिपेटिन्ग द अनइनटैंडिड, महिमा वशिष्ठ का वूमैंनिन्ग इन इंडिया, द वायर का इंडिया केबल और श्रेयास शैंदे का इंडियालॉग।

जहाँ तक मुझे मालूम है अभी तक दुनिया मे हिंदी में कोई सबस्टैक नहीं चल रहा है। सदस्यता वाले सबस्टैक भारत में रह कर चलाना कठिन है क्योंकि उसके पैसे केवल स्ट्राईप पैयमैंट सिस्टम से मिलते हैं जिससे जुड़ने के लिए भारत में आप को रजिस्टर्ड बिज़नैस होना आवश्यक है, इसलिए आम व्यक्ति जो अपना व्यक्तिगत सबस्टैक बनाना चाहते हैं वह उसके माध्यम से कमा नहीं सकते। मैंने कुछ भारतीय सबस्टैक में देखा है कि वह आप से सदस्यता नहीं माँगते, लेकिन आलेखों के अंत में लिंक डाल देते हैं "हमारी सहायता कीजिये और हमे चाय या कॉफी पिलाईये" और वहाँ आप से पैसे देने के लिए कहते हैं। ऐसी ही एक लिंक पर क्लिक किया तो उन्होंने मुझसे कॉफी के लिए 5 यूरो यानि पाँच सौ रुपये देने के लिए कहा।

यूरोप के कुछ लोकप्रिय सबस्टैकों के कुछ उदाहरण हैं - तकनीकी के बारे में हॉलैंड से "द प्रेगमैटिक इंजीनियर" जिसके लाखों सदस्य हैं, साँस्कृतिक विषय पर इटली से "वाले तूत्तो" जिसके ढाई लाख सदस्य हैं, मैनेजमैंट के बारे में इटली से "रिफैक्टरिन्ग" जिसके डेढ़ लाख सदस्य हैं, और फाईनैन्स के विषय पर इंग्लैंड से "नेट इंडरस्ट"।

अमरीका के कुछ लोकप्रिय सबस्टैकों के उदाहरण हैं - अमरीकी राजनीति पर "लैटर्स फ्रोम एन अमेरिकन" और "द बुलवार्क", समाचारों पर "द फ्री प्रैस", नीतियों और आर्थिक विषयों पर "स्लो बोरिन्ग", और समाचारों पर व्यंग करने वाला, "द बोरोविट्ज़ रिपोर्ट"।

ब्लॉग या सबस्टैक पर लिखने के फायदे

मेरे विचार में इनका सबसे बड़ा फायदा है कि दुनिया के किसी भी कोने में लोग आप को पढ़ सकते हैं।

दूसरा फायदा है कि यह बने-बनाये प्लेटफॉर्म हैं, इसमें फॉन्ट, लेआऊट, तस्वीर लगाना आदि बहुत आसान है, इसे आप एक दिन में बिना किसी की सहायता के सीख सकते हैं।

इसका तीसरा फायदा है कि जब तक वह प्लेटफॉर्म रहेगा, आप का लिखा सुरक्षित है, जैसे कि मैं अपने बीस साल पहले लिखे आलेखों को आसानी से देख-खोज सकता हूँ, अगर उनमें कुछ नया जोड़ना चाहूँ या बदलना चाहूँ तो वह सब कर सकता हूँ। चूँकि कम्पनियाँ फेल हो जाती हैं, उनके प्लेटफॉर्म कभी भी बंद हो सकते हैं, इसलिए आप अपने ब्लॉग के आरकाइव को डाउनलोड करके उसकी एक कॉपी अपने पास सम्भाल कर भी रख सकते हैं।

इसका चौथा फायदा है कि आप अपने पाठकों की टिप्पणियाँ तुरंत देख सकते हैं और उनसे विचारों का आदान-प्रदान भी कर सकते हैं। एक ज़माने में लोग कम्प्यूटर से अधिक पढ़ते थे, तब टिप्पणियाँ अधिक मिलती थीं, आजकल लोग ट्रेन या बस में बैठे-बैठे मोबाइल पर ब्लॉग पढ़ते हैं इसलिए टिप्पणियाँ मिलना बहुत कम हो गया है।

ब्लॉगर पर बहुत सी एप्प हैं जिनकी सहायता से आप आसानी से जान सकते हैं कि कितने लोगों ने आप का आलेख पढ़ा है, वह कौन से देशों से हैं, महीने में कितने लोग आप के ब्लॉग को पढ़ते हैं। जैसे कि मेरे इस ब्लॉग को आजकल हर महीने बारह-पंद्रह हज़ार लोग पढ़ते हैं, इसके कुछ आलेख बहुत लोकप्रिय हैं, उन्हें बीस-पच्चीस हज़ार लोग पढ़ चुके हैं।

अगर आप चाहें तो ब्लॉग से कमा भी सकते हैं। ब्लॉगर आप को गूगल-एड डालने का मौका देता है, अन्य प्लेटफॉर्म वाले यह मौका नहीं देते लेकिन आप खुद अपने स्पॉन्सर या विज्ञापन खोज सकते हैं। जिन्होंने गूगल विज्ञापनों से कमाने की कोशिश की है, वह कहते हैं कि यह आसान नहीं है और कई बार गूगल अपने विज्ञापकों की वजह से आप से अपने लिखे को बदलने या हटाने के लिए कह सकता है। लेकिन गूगल-एड में कोई जबरदस्ती नहीं है, मैं ब्लॉग से कमाना नहीं चाहता, इसलिए मैं इसमें कोई व्यवसायिक आलेख या विज्ञापन नहीं स्वीकारता।

हो सकता है कि अपने ब्लॉग पर भी आप "मुझे चाय पिलाईये" जैसी लिंक डाल सकते हैं जिसके लिए आप यू.पी.आई. के किसी सिस्टम से पाठकों से कुछ पैसे देने के लिए कह सकते हैं। मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं है, न ही मैं जानता हूँ कि यह भारतीय कानून के हिसाब से कानूनी है या नहीं। इसे करने से पहले वकील आदि से सलाह लीजिये।

मेरा अनुभव है कि ब्लॉग या सबस्टैक से पैसा कमाना कठिन है। कुछ प्रसिद्ध सबस्टैक जिनके नाम ऊपर दिये हैं वह लाखों डालर कमाते हैं लेकिन वहाँ हम लाखों में से एक की बात कर रहे हैं, वह भी उसकी जो किसी क्षेत्र में बहुत ज्ञान रखता है और बहुत मेहनत करता है, हर हफ्ते नयी जानकारी ले कर आ रहा है।   

ब्लॉग और सबस्टैक में अंतर

कुछ अंतरों के बारे में ऊपर बात हुई है, जैसे कि ब्लॉग को उसकी वेबसाइट पर पढ़ते हैं जबकि सबस्टैक आप की ईमेल में न्यूजलैटर की तरह से आ सकता है। 

एक अन्य बड़ा अंतर है कि सबस्टैक का ले-आऊट (शब्द संयोजन) बदला नहीं जा सकता, जबकि ब्लॉग में आप रंग, तस्वीरें, ले-आऊट आदि सरलता से बदल सकते हैं।

ब्लॉगर बिल्कुल फ्री होता है, आप जितने चाहें, अलग-अलग भाषाओं में ब्लॉग बना सकते हैं। जबकि सबस्टैक में अगर आप सदस्यता की फीस नहीं लेते तो वह भी फ्री है, लेकिन अगर आप सदस्यता फीस लेते हैं तो आप को उसकी कमीशन देनी होती है। बाकी ब्लॉग प्लेटफॉर्म, जैसे कि स्कावयरस्पेस, को वार्षिक फीस देनी पड़ती है।

ब्लॉगर और सबस्टैक दोनों पर आप के आलेखों को, पाठक अपनी भाषा में अनुवादित देख और पढ़ सकते हैं। यानि आप के हिंदी ब्लॉग को फ्राँसिसी या स्पैनिश बोलने वाले भी पढ़ सकते हैं।

अगर आप ऐसे विषयों के बारे में लिखेंगे जिसके बारे में दुनिया जानना चाहती है तो लोग आप को किसी भी भाषा में पढ़ेंगे। पर अधिक पाठक खोजना जरूरी नहीं है, अगर ब्लॉग आप की आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम है, तो कौन-कितने वाली बातें भूल जाईये, जिसमें आप के मन को संतोष मिलता है, वह लिखिये। मेरी अपनी सोच यही रही है।

ब्लॉगर गूगल का है, अगर एक बार गूगल को विश्वास हो जाये कि आप बिना कहीं से नकल किये, अपनी जानकारी से और अच्छी भाषा में अच्छी तरह से लिखते हैं, तो वह पाठकों को आप के ब्लॉग में भेजता है, जबकि सबस्टैक को यह मदद नहीं मिलती। ब्लॉग और सबस्टैक, दोनों फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि की सहायता से भी अपने पाठक खोज सकते हैं।   

अंत में

हिंदी ब्लॉग जगत को जानने और पढ़ने के लिए आप पाँच लिंको का आनन्द, हिंदी ब्लाग जगत, ब्लाग4वार्ता, ब्लोगोदय, जैसे ब्लॉग प्लेटफार्म से तरह-तरह के हिंदी ब्लॉगों को देख सकते हैं। 

दस-पंद्रह साल पहले तक हिंदी के हज़ारों ब्लॉग होते थे, आज उनकी संख्या बहुत कम हो गयी है, बहुत से लोग अन्य सोशल मीडिया, विशेषकर फेसबुक के माध्यम से अपने लेखन को दूसरो तक पहुँचाते हैं। फेसबुक पर "हिंदी ब्लाग" खोजेंगे तो वहाँ ऐसे पन्ने मिलेंगे जहाँ पर आप अपने हिंदी लेखन के बारे में समाचार या विज्ञापन दे सकते हैं। 

मेरे लिए मेरा ब्लॉग मेरी डायरी है, मैं इसे सबसे पहले अपने संतोष के लिए लिखता हूँ। पहले के मुकाबले में आजकल पाठकों की टिप्पणियाँ मिलना बहुत कम हो गया है, लेकिन मैं देख सकता हूँ कि हर रोज़ पाँच सौ से ले कर एक हज़ार लोग इस ब्लॉग पर कुछ न कुछ पढ़ने आते हैं, मेरे लिए यही संतोष की बात है। कुछ महीने पहले मैंने अपने नये फैंतासी उपन्यास को भी अपने ब्लॉग से प्रकाशित किया है, इस तरह मुझे नये प्रयोग करना अच्छा लगता है।

अगर आप के मन में लिखने की और आत्म-अभिव्यक्ति की इच्छा है तो मेरी राय है कि अपना ब्लॉग बनाईये, इसके लिए आप को किसी अन्य पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा। आप के पास कम्प्यूटर या लेपटाप हो तो यह आसान होगा, मोबाइल से ब्लॉग लिखने में शायद कुछ मुश्किलें हों। एक बार लेखन का अभ्यास बढ़ेगा तो कल आप पत्रिकाओं और प्रकाशकों के लिए भी लिख सकते हैं।

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रविवार, जुलाई 26, 2026

बाघा जतिन और उनके पौत्र

करीब तेरह साल पहले मुझे पैरिस से पृथ्वीन्द्र मुखर्जी की ईमेल मिली, कि उनके दादा बाघा जतिन पर फ़िल्म निर्देशक हरिसाधन दासगुप्ता ने एक फ़िल्म बनायी थी और वह हरिसाधन जी के पुत्र फ़िल्म निर्देशक राजा दासगुप्ता का सम्पर्क खोज रहे थे। मैंने बचपन में बाघा जतिन का नाम सुना था लेकिन उनके बारे में अधिक जानकारी नहीं थी, बस इतना जानता था कि वह अंग्रेज़ी सरकार से लड़ने वाले एक क्राँतिकारी थे। मैंने सोचा कि बाघा जतिन के पौत्र से सम्पर्क हुआ है तो इसका फायदा उठाना चाहिये और उनसे उनके दादा के बारे में जानने की कोशिश करनी चाहिये।

इस तरह से पृथ्वीन्द्र जी से कुछ संदेशों का आदान-प्रदान हुआ। तब मैं एक शोध रिपोर्ट पर काम कर रहा था, सोचा कि उसे पूरा करके पृथ्वीन्द्र जी से बातचीत करूँगा लेकिन जैसा अक्सर होता है, कुछ दिनों में मैं इस बात को भूल गया। दो साल पहले जब उनके देहांत की खबर पढ़ी तो अपनी वह पुरानी बातचीत याद आयी, बहुत दुख हुआ कि मैंने उस समय उनसे बात क्यों नहीं की।

कुछ ऐसा ही मेरे साथ पहले भी एक बार हुआ था जब मैंने दिल्ली में मित्र कर्बान अली से कहा था कि जब दिल्ली आऊँगा तो उनके पिता जी कप्तान अब्बास अली से बातचीत करने आऊँगा। कप्तान अब्बास अली जी ने 1940 के दशक में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के साथ आज़ाद हिंद फौज में भाग लिया था, वहीं पर वह कप्तान बने थे। जब 2014 में उनकी मृत्यु की खबर मिली थी तब भी यही दुख हुआ था कि समय रहते उनसे क्यों नहीं मिला था।

खैर इस बार मैंने सोचा कि बाघा जतिन के बारे में इंटरनैट पर खोज करके लिखूँ। यही सोचते-सोचते दो साल बीत गये हैं, पर आखिर में वह आलेख लिखने का समय मुझे मिल ही गया।

बाघा जतिन - जतिन्द्रनाथ मुखर्जी

जतिन्द्रनाथ का जन्म सन् 1879 में उनकी ननिहाल कुष्टिया जिले के केया गाँव में हुआ था। उनका पैतृिक घर वहाँ से करीब 40 किलोमीटर दक्षिण में साधुहाटी में था, जहाँ वह बड़े हुए। यह दोनों जगहें अब बँगलादेश के खुलना डिविज़न का हिस्सा हैं। हाई स्कूल के बाद 1895 में वह कलकत्ता सैंट्रल कॉलेज में पढ़ने गये।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में वह स्वामी विवेकानन्द और बहन निवेदिता से मिले। स्वामी विवेकानन्द के अतिरिक्त उनकी मुलाकात अरविंदो घोष, रासबिहारी बोस आदि व्यक्तियों के सम्पर्क में आये। इस तरह से वह भारत की स्वतंत्रता के लिए काम करने वाले युगांतर अभियान तथा अनुशीलन समिति से जुड़े और भारत के स्वाधीनता संग्राम का हिस्सा बन गये। अनुशीलन समिति में बंकिमचन्द्र चैटर्जी और स्वामी विवेकानन्द के हिन्दू-शक्ता आध्यात्मिक विचारधारा की सोच वाले लोग थे जो स्वाधीनता के लिए सशस्त्र क्राँति का रास्ता खोज रहे थे।

1906 में अपने गाँव से लौटते समय जतिन्द्रनाथ का जँगल में एक बाघ से सामना हुआ और वह अपनी छुरी से उसे मारने में सफल हुए जिसके लिए उन्हें अंग्रेज़ सरकार की ओर से बाघ का खिताब मिला और लोग उन्हें बाघा जतिन बुलाने लगे।

1908-09 में मुज़्ज़फरपुर के मजिस्ट्रेट की हत्या की साजिश का मुकदमा चला जिसमें अरविंद घोष के साथ अन्य आरोपियों में जतिन्द्रनाथ भी थे। इस मुकदमें में अनुशीलन समिति को बैन कर दिया गया, बहुत लोगों को सजा मिली लेकिन जतिन्द्रनाथ को सबूत न मिलने पर बरी किया गया, लेकिन कुछ समय बाद उन्हें "हावड़ा-शिवपुर साजिश" के मुकदमें में दोबारा गिरफ्तार किया गया और वह ग्यारह महीनों तक हावड़ा जेल में रहे।

उन्होंने जर्मनी में हथियारों के लिए सम्पर्क किया लेकिन अंग्रेज़ों को उनके हथियारों के आने की खबर मिल गयी, और उनकी फौज से संघर्ष करते हुए 10 सितम्बर 1915 को जतिन्द्रनाथ का देहांत हो गया, उस समय वह छत्तीस साल के थे।

बाघा जतिन के पौत्र पृथ्वीन्द्र मुखर्जी

सन् 1900 में जतिन्द्रनाथ का विवाह इन्दुबाला बैनर्जी से हुआ, उनके चार बच्चे हुए, एक बेटी आशालता और तीन बेटे, अतीन्द्र, तेजेन्द्र और बिरेन्द्र। जिस समय जतिन्द्रनाथ की मृत्यु हुई, तेजेन्द्रनाथ उस समय केवल छह साल के थे। उनके पहले पुत्र अतीन्द्र की मृत्यु बचपन में ही हो गयी थी, इसलिए तेजेन्द्र को उनका बड़ा बेटा मानते हैं।

तेजेन्द्रनाथ के तीन बेटे थे, रथीन्द्रनाथ, पृथ्वीन्द्रनाथ और ध्रितीन्द्रनाथ।

पृथ्वीन्द्र का जन्म 20 अक्टूबर 1936 में हुआ। जब वह पाँच साल के थे उन्हें पोलियो हो गया जिससे उनकी टाँग कमज़ोर हो गयी और वह चल या खड़े नहीं हो पाते थे। उनके मामा प्रबोधकुमार चैटर्जी ने उन्हें विज्ञान पढ़ाया और उनके फूफा ललितकुमार रायचौधरी ने उन्हें संस्कृत पढ़ायी। जब वह बारह वर्ष के थे जब वह परिवार के साथ पाँडेचैरी में अरविंद आश्रम में रहने आये और वहाँ पढ़ाई पूरी करके 1956 से श्री ओरोबिन्दो आश्रम के अंतरराष्ट्रीय शिक्षा केन्द्र में तीन भाषाएँ (अंग्रेज़ी, बंगाली और फ्राँसिसी) पढ़ाने लगे। 

पृथ्वीन्द्र को बचपन से कविता लिखने का शौक था, वह बंगाली और अंग्रेज़ी में कविता लिखते थे। 1955 में उन्होंने भारत में गाँधी जी से पहले, विषेशकर स्वामी अरविंद और अपने दादा जतिन्द्रनाथ के समय में भारत की स्वतंत्रता की कोशिशों के बारे में शोध करना शुरु किया। यह शोध पहले एक बंगाली पत्रिका बासुमति और फ़िर पुस्तक रूप में छपा। साथ ही उनका कविता लेखन चलता रहा और बंगाली व अंग्रेज़ी कविताओं के संकलन भी छपे। साथ ही वह फ्राँसिसी के कुछ प्रसिद्ध लेखकों की किताबों का बंगाली में अनुवाद कर रहे थे। इस तरह से पच्चीस वर्ष के होते-होते वह कवि, लेखक और अनुवादक के रूप में जाने जाने लगे।

पृथ्वीन्द्र को बचपन से संगीत में भी रुचि थी। उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन और पश्चिमी संगीत दोनों सीखे। वह भारतीय रागों और पश्चिमी संगीत के सिद्धातों को मिला कर संगीत रचना चाहते थे। इस तरह से वह भारतीय-पश्चिमी मिला-जुला आरकेस्ट्रा बना कर उनकी कन्सर्ट आयोजित करने लगे और उन्होंने श्री ओरोबिन्दु आश्रम का बैंड-दल बनाया। 

तीस वर्ष की आयु में 1966 में फ्राँसिसी सरकार की छात्रवित्ति ले कर वह पैरिस पहुँचे। फ्राँस में उनकी टाँग के आपरेशन भी हुए जिससे उनके लिए बैसाखी से चलना कुछ आसान हो गया। वहाँ उन्होंने 1970 में श्री ओरोबिन्दो के दर्शन पर पीएचडी की, और उसके बाद पैरिस के विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे, साथ ही रेडियो के कार्यक्रम तथा पत्रकारिता में लग गये। 1981 में उन्हें फुलब्राईट छात्रवित्ति मिली जिससे वह अमरीका गये। फ्राँस लौटने के बाद वह पैरिस में बँगाली पढ़ाने लगे। उन्होंने अंग्रेज़ी, बंगाली और फ्राँसिसी भाषाओं में करीब सत्तर पुस्तकें लिखीं। उन्हें श्री ओरोबिन्दो पुरस्कार, फ्राँस सरकार से शिवालिएर और भारतीय सरकार से पद्मश्री सम्मान मिले। 

पृथ्वीन्द्र ने दो विवाह किये और उनके तीन बच्चे हुए, दो बेटियाँ अद्या और अमृता, और एक पुत्र, अर्जव।

अंत में - बाहरी क्राँति से आंतरिक क्राँति

जतिन बाघा की कहानी स्वामी अरविंद या ओरोबिन्दो से जुड़ी हुई है। बीसवीं सदी के प्रारम्भ में दोनों सशस्त्र क्राँति की बात कर रहे थे। स्वामी ओरोबिन्दो को 1908 में अलीपुर बम्ब विस्फोट केस में जेल हुई। जतिन को 1910 में हावड़ा-शिबपुर केस में। स्वामी ओरोबिन्दो को जेल में आध्यात्मिक ज्योति मिली, जब वह बाहर आये तो वह बदल चुके थे। वह भारत की स्वतंत्रता की बात करते थे, पर वह आत्मा के विकास और स्वाधीनता के प्रति अधिक सजग थे। जतिन बाघा ने शस्त्र क्राँति का सपना नहीं छोड़ा और 1915 में पुलिस की गोलियों से घायल हो कर उनका देहांत हुआ। उनके पोत्र पृथ्वीन्द्र, अपनी माँ तथा भाईयों के साथ पाँडेचैरी के स्वामी ओरोबिन्दो के आश्रम में बड़े हुए और उनका परिवार आजीवन "माँ" (मिर्रा अलफस्सा, स्वामी ओरोबिन्दो की संगनी) के आध्यात्मिक सानिध्य में रहा।

यानि सोचिये कि शस्त्र क्राँति या देश की स्वाधीनता की कामना, कहीं पर आत्मा की क्राँती के साथ कब, क्यों और कैसे जुड़ जाती है?  

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नोट: इस आलेख में उपयोग की गयी तीनों तस्वीरें इंटरनेट से साभार ली गयी हैं

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बुधवार, दिसंबर 31, 2025

मध्य-युगीन कृष्ण-भक्ति ब्रज-भाषा काव्य

यह आलेख डॉ. सावित्री सिन्हा की लिखी और 1962 में नेशनल पब्लिशिन्ग हाउज़ द्वारा छापी पुस्तक "ब्रज भाषा के कृष्ण भक्ति काव्य में अभिव्यंजना शिल्प" की भूमिका का एक अंश है। आप चाहें तो इस पूरे आलेख को कल्पना पर पढ़ सकते हैं या पीडीएफ में डाउनलोड कर सकते हैं।

डॉ. सावित्री सिन्हा ने यह पुस्तक अपने माता-पिता (और मेरे दादा-दादी द्वारकाप्रसाद और जयदेवी) को इन शब्दों के साथ समर्पित की थी: "स्वर्गीय पिता जी की आंसूभरी, धूमिल बाल-स्मृतियों को तथा मां के असीम साहस, धैर्य, त्याग और वात्सल्य को"

मध्य युगीन कृष्ण-भक्ति ब्रज-भाषा काव्य - डॉ. सावित्री सिन्हा

 

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सूरदास से पूर्व कृष्ण-भक्ति काव्य में अभिव्यंजना-शिल्प की स्थिति - एक विहंगावलोकन

डॉ. शिवप्रसाद सिंह के शोध के फलस्वरूप अभी हाल में ही सूरदास के समय से पहले का ब्रजभाषा काव्य प्रकाश में आया है। 'सूर-पूर्व ब्रजभाषा और उसका साहित्य' नामक उनके शोध-प्रबंध में उपलब्ध साहित्य के व्यख्यान के साथ ही कुछ अनुपलब्ध साहित्य भी प्रकाश में लाया गया है और सूरदास से पहले ब्रजभाषा कवियों के अस्तित्व को सिद्ध करने का प्रयास किया गया है। नामदेव, कबीर और रैदास की अनुभूतिपरक रचनाओं को लेखक ने कृष्ण-भक्ति काव्य के विकास का एक सोपान माना है। इस निर्णय को स्वीकार करने के पक्ष और विपक्ष दोनों ही ओर से अनेक तर्क दिये जा सकते हैं। परन्तु यह प्रश्न यहां पर अप्रासंगिक है।

संतमत के कवियों के अतिरिक्त उन्होंने कृष्ण-भक्ति काव्य के विकास में संगीतकार कवियों का महत्वपूर्ण योग स्वीकार किया है। उनके शब्दों में, “संगीतज्ञ कवियों ने न केवल अपनी स्वर-साधना से भाषा को परिष्कार और मधुर अभिव्यंजना प्रदान की, तथा अप्रतिम नाद-सौंदर्य से कविता को अधिक दीर्घयुगी बनाया परन्तु अपनी सम्पूर्ण संगीत-प्रतिभा को आराध्य कृष्ण के चरणों पर लुटा भी दिया। गोपाल नायक और बैजू बावरा के पदों में आत्मनिवेदन, गोपी-प्रेम और भक्ति के विविध पक्षों का बड़ा ही विशद और मार्मिक चित्रण हुआ है। गोपाल नायक के एक पद में रास का चित्रण इस प्रकार मिलता है -

कांधे कामरी गो आलाप के नाचे जमुना तीर, नाचे जमुना तीर

पीछे रे पांवरे लेती नाचि लोई मांगवा --

भुव आलि मृदंग बांसुरी बजावै गोपाल वैन वतरस ले आनन्द। (राग कल्पद्रुम)

बैजू बावरा का उल्लेख भी इस प्रसंग में किया गया है तथा राग कल्पद्रुम में संकलित उनके पदों के आधार पर उन्हें ब्रजभाषा का कवि सिद्ध किया गया है। राग कल्पद्रुम की यह रचनायें शुद्ध ब्रजभाषा में हैं -

आंगन भीर भई ब्रजपति के आज नन्द महोत्सव आनन्द भयो।

हरद दूब दधि अक्षत रोरी ले छिरकत परस्पर गावत मंगलचार नयो।

ब्रह्मा ईस नारद सुर नर मुनि हरषित विमानन पुष्प बरस रंग ठयो।

धन धन बैजू संतन हित प्रकट नन्द जसोदा ये सुख जो दयो। (राग कल्पद्रुम)

इन दोनों ही कवियों की रचनाओं में निहित संगीत तत्व परवर्ती कृष्ण-भक्त कवियों की संगीत-साधना की पृष्ठभूमि से जान पड़ते हैं, परन्तु जहां तक अभिव्यंजना शैली का प्रश्न है यह रचनायें परवर्ती रचनओं के सामने पासंग भर भी नहीं ठहरतीं।

इन रचनाओं के अतिरिक्त शोधकर्ता ने निम्नलिखित ७ अप्रकाशित पुस्तकों का परिचय-परीक्षण भी प्रस्तुत किया है - अग्रवाल कवि की प्रद्युमनचरित; विष्णुदास की महाभारत कथा, स्वर्गारोहड़, रुक्मिणी मंगल, स्वर्गारोहड़ पर्व और स्नेह लीला; थेघ नाथ की गीता भाषा।

कृष्णभक्ति सम्बंधी अप्रकाशित ग्रंथों को लेखक ने जिस रूप में हमारे सामने रखा है, उसे उसी रूप में स्वीकार कर लेने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं है। उनके मतों को उद्धृत करके विषय-विस्तार करने से कुछ लाभ नहीं होगा। जो कुछ भी सामग्री प्रकाश में आयी है उसके अध्ययन द्वारा ये निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं -

तत्कालीन ब्रजभाषा के दो रूप थे (१) अपभ्रंश मिश्रित ब्रजभाषा (२) तद्भव प्रधान ब्रजभाषा। संस्कृति के तत्सम शब्दों के प्रयोग द्वारा तत्कालीन ब्रजभाषा का रूप परिनिष्ठित नहीं हो पाया था। प्रथम कोटि की भाषा के उदाहरण के रूप में डूंगर कवि की एक रचना उद्धृत की जा रही है -

ऋतु बसंत उलहणी विविह वणराय फलह सहू।

कंटक विकट करीर पंत पिकखंत किंपि नहु।

धाराहर वर धवल बारि वरसंत घनघोर वन।

कुरलतंउ मूल मंत्री सर्प नहीम मानहिं दुर्जन।

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औषधि मूल मंत्री सर्प नहिं मानहिं दुर्जन।

सर्प डसी वेदना एही दिट्ठइ हुई, गुंजन।

लागइ दोष अनन्त कियइ संसर्ग एनि परि।

तवडी जल हरइ घड़ी पीटियइ सुफल्लरि।

द्वितीय कोटि के उदाहरण के रूप में विष्णुदास रचित 'सनेह लीला' की ये पंक्तियां ली जा सकती हैं -

महलन मोहन करत विलास।

कहां मोहन कहां रमन रानी और कोऊ नहिं पास।

रुकमन चरन सिरावत पिय के पूजी मन की आस।

जो चाहे थी सो अब पायो हरि पति देवकी सास।

तुम बिन और कौन थो मेरौ धरति पताल आकास।

पल सुमिरन करत तिहारौ ससि पूस परगास।

इन कवियों की रचनाओं में प्रबुद्ध कला-चेतना का पूर्ण अभाव है। अभिव्यंजना-शैली की दृष्टि से ये अत्यंत साधारण कोटि की रचनायें हैं। उनकी शैली अधिकतर वर्णनात्मक और विवरणात्मक है। अप्रस्तुत योजना, लक्षित चित्र-योजना, वाग्वैदग्घय आदि तत्व बहुत ही कम हैं।

विषय-वस्तु के क्षेत्र में कुछ ऎसे तत्व अवश्य मिलते हैं जिन्हें परवर्ती कृष्ण-भक्ति काव्य का पूर्वाभास कहा जा सकता है। यह प्रभाव मुख्य रूप से दो क्षेत्रों में दिखाई पड़ता है: (१) लोक संस्कृति के चित्रण में (२) शास्त्रीय संगीत के समावेश में।

गोस्वामी विष्णुदास रचित रुक्मणि मंगल की ये पंक्तियां प्रथम वर्ग के उदाहरण के रूप में ली जा सकती हैं:

मोतियन चौक पुराय के कियौ आरती माय।

अति आनन्द भयौ है नगर में घर घर मंगल साजै।

मनमोहन प्रभु ब्याह कर आये पुरी द्वारका राजै।

अंगन तन में भूषन पहिने सब मिलि करत समाज।

बाजै बाजन कानन सुनियत, नौबत घन ज्यूं बाज।

नर नारिन मिलि देत बधाई सुख उपजै दुखभाज।

नाचत गावत मृदंग बाजत रंग बसावत आज।।

दूसरे वर्ग की रचनाओं के अन्तर्गत गोपाल नायक और बैजू बावरा की रचनायें रखी जा सकती हैं। डॉ. सिंह ने इन रचनाओं को काव्य-कल्पद्रुम से संकलित किया है। संगीत कला के क्षेत्र में इस ग्रंथ का महत्वपूर्ण स्थान है परन्तु भाषा और साहित्य की दृष्टि से उसमें संकलित पदों को प्रमाणिक माना जा सकता है या नहीं यह प्रश्न विवादरहित नहीं है। यदि उन्हें प्रमाणिक मान लिया जाये तो गोपाल नायक और बैजू बावरा के पदों को परवर्ती कृष्ण-भक्त कवियों के ध्रुपद शैली में रचित पदों का पूर्वरूप माना जा सकता है। शास्त्रीय संगीत के तत्वों का उल्लेख तथा ध्रुपद शैली के अनुकूल पद-योजना इन रचनाओं में प्राप्त होती है -

सप्त स्वर तीन ग्राम इकइस मूर्छन बाइस सुर्त

उनचास कोट ताल लाग डाट

गोपाल नायक हो सब लायक आहत अनाहत शब्द,

सो ध्यायो नाद ईश्वर बसे मो घाट

तथा

मार्ग देसी कर मूर्छना गुन उपजे मति सिद्ध गुरु साध चावै।

सो पंचम मघ दर पावै।

बैजू बावरा के पदों की योजना भी ध्रपुद शैली की श्वास-साधना के निमित्त की हुई जान पड़ती है:

बोलियो न डोलियो ले आऊं हूं प्यारी को,

सुन हौ सुघर वर अब हीं पै जाऊं हूं।

मानिनि मनाय के तिहारे पाय ल्याय के,

मधुर बुलाय के तो चरण गहाऊं हूं।

सुन री सुंदर नारि काहे करत एति रार,

मदन डारत पार चलत पल तुझाऊं हूं।

मेरी सीख मान कर मान न करो तुम,

हे जु प्रभु प्यारे सो बहियां गहाऊं हूं।

बधाई के लोक-गीत भी उनके नाम से प्राप्त होते हैं:

आंगन भीर भई ब्रजपति के आज नन्द महोत्वस आनन्द भयौ।

हरद दूब दघि अक्षत रोरी ले छिरकत परस्पर गावत मंगलचार नयो।

ब्रह्मा ईस नारद सुर नर मुनि हरषित विमानन पुष्प बरस रंग ठयो।

धन धन बैजू संतन हित प्रकट नन्द जसोदा ये सुख जो दयो।

अधिकतर कवियों ने दोहा, चोपाई और छप्पय का प्रयोग किया है। कुछ पदों के ऊपर गौरी, धनाश्री और पूर्वी रागों का उल्लेख भी हुआ है।

इस सामग्री के अध्ययन के उपरान्त सूरदास से पूर्व ब्रज-भाषा काव्य के अस्तित्व की स्वीकृति में आचार्य शुक्ल का अनुमान आंशिक रूप में ही सत्य माना जा सकता है। सूरदास के काव्य-सौष्ठव पर विचार करते हुए आचार्य शुक्ल ने कहा था, ‘इन पदों के सम्बंध में सबसे पहली बात ध्यान देने की यह है कि चलती हुई ब्रजभाषा में सबसे पहली साहित्यिक रचना होने पर भी ये इतनी सुडोल और परिमार्जित है, यह रचना इतनी प्रगल्भ और काव्यांग-पूर्ण है कि आगे होने वाले कवियों की उक्तियां सूर की जूठी सी जान पड़ती हैं। अत: सूर-सागर किसी चली आती हुई गीति काव्य परम्परा का - चाहे वह मौखिक ही रही हो - पूर्ण विकास सा प्रतीत होता है।"

इन कृतियों के प्रकाश में आने पर भी कलाकार के रूप में सूर अपने पूर्व-स्थान पर ही शोभित हैं। इस काल के दर्जन कवियों में से एक भी ऎसा नहीं है जो अष्टछाप के अन्य कवियों के समकक्ष खड़ा रह सके, सूरदास तो दूर की बात है। जहां तक पूर्व-परम्परा की स्थापना का प्रश्न है यह तथ्य उसी रूप में स्वीकार किया जा सकता है जैसे हम यह कहें कि छायावादी कविता के बीज द्विवेदी-युग की रचनाओं में भी पाये जाते हैं।

सूर-पूर्व ब्रजभाषा काव्य में गीति-काव्य की मौखिक परम्परा भी स्थापित की जा सकती है, ब्रजभाषा का अस्तित्व भी माना जा सकता है पर उसमें कला-सौष्ठव का कोई ऎसा आधार नहीं मिलता जिसके कारण यह कहा जा सके कि सूरदास के पदों की प्रगल्भता और काव्यांगपूर्णता को कोई पूर्व आधार हिन्दी जगत् में विद्यमान था। कला के क्षेत्र में नये मार्गों का उद्घाटन सूरदास, नन्ददास और उनके समकालीन भक्तों ने ही किया। उनकी कला-चेतना का प्रादुर्भाव तत्कालीन परिस्थितियों के फलस्वरूप हुआ था। कला के पुनुर्त्थान युग में उनकी प्रतिभा प्रस्फुटित हो कर विकसित हुई। उत्तराधिकार रूप में उन्हें जो परम्परा प्राप्त हुई थी वह पूर्ण अविकसित थी, भाव, भाषा, शैली, किसी भी दृष्टि से मध्यकालीन कृष्ण-भक्त कवियों पर उनका ऋण नहीं स्वीकार किया जा सकता।

कृष्ण-काव्य परम्परा के विकास का संक्षिप्त परिचय

कृष्ण-काव्य परम्परा के विकास का प्रमुख श्रेय आचार्य वल्लभ और उनके पुत्र विट्ठलदास जी को है। आचार्य वल्लभ द्वारा प्रवर्तित 'पुष्टि मार्ग' को आधार बना कर श्री विट्ठलदास द्वारा स्थापित अष्टछाप के कवियों ने हिन्दी में अमर कृष्ण-भक्ति-काव्य की रचना की। पुष्टि मार्ग की अनुभूति मूलक साधना के कारण इन कवियों ने कृष्ण के व्यक्तित्व के लीला-प्रधान अंशों को ही ग्रहण किया है। राजनीतिज्ञ कृष्ण उनके आलम्बन नहीं हैं। कृष्ण के व्यक्तित्व में उन्होंने शक्ति के साथ माधुर्य और प्रेम का समन्वय कर दिया। अलौकिक आलम्बन में सहज और मधुर मानव का आरोपण उन्होंने जिस मनोवैज्ञानिक कौशल से किया है उसमें सार्वभौम उपादानों का समावेश हुआ है।

ऎतिहासिक क्रम से अष्टछाप के कवियों का उल्लेख इस प्रकार है - कुभंनदास, सूरदास, परमानन्ददास, कृष्णदास, नन्ददास, चतुर्भुजदास, छीतस्वामी और गोविन्दस्वामी। सूरदास प्रधान रूप से वात्सल्य और शृंगार रस के कवि हैं, परमानन्द जी के काव्य में वात्सल्य का अनुपात महत्वपूर्ण है। अन्य कवियों की रचनाओं में श्रंगार रस का ही प्राधान्य है, उसमें वात्सल्य तो है ही नहीं या अत्यंत गौणरूप में प्रयुक्त है। इन सभी के प्रतिपाद्य में साहित्यकता, पार्थिव अनुभूतियों और आध्यात्मिकता का सुंदर सामन्जस्य मिलता है। विभिन्न कवियों के व्यक्तित्व के अनुसार तीनों तत्वों का अनुपात उनकी रचनाओं में भिन्न-भिन्न है। साहित्यिक महत्व की दृष्टि से सूरदास के बाद नन्ददास का नाम आता है। उनकी अभिव्यंजना में सचेष्ट कलाकार का शिल्प है।

पूर्वमध्यकाल के इन पुष्टिमार्गी कवियों के बाद परिमाण और गुण दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण योग राधावल्लभ सम्प्रदाय के आचार्य हितहरिवंश तथा उनके शिष्यों और अनुयायियों ने दिया। राधावल्लभ सम्प्रदाय की उपासना पद्धति अन्य सम्प्रदायों से भिन्न थी। इस मत के सिद्धांतों के अनुसार राधा ही परम इष्ट हैं और कृष्ण की मान्यता इसीलिए है कि वह राधा के प्रियतम हैं। वे इष्ट नहीं हैं। भक्तजन राधा की सखी रूप में होते हैं। वे सखी रूप में उनके साथ परकीया गोपियों के समान स्वतंत्र रूप से सम्बंध स्थापित नहीं करते और न राधा के प्रति उनका सपत्नि भाव होता है। इस सम्प्रदाय में हितहरिवंश के अतिरिक्त ध्रुवदास की कला का महत्वपूर्ण स्थान है।

किसी विशिष्ठ सम्प्रदाय के बंधनों से मुक्त मतवाली मीरा और रसखान की रचनाओं का भी पूर्व-मध्यकालीन कृष्ण-भक्ति साहित्य में बड़ा महत्व है। मीराबाई द्वारा रचित कई ग्रंथों का उल्लेख प्राप्त होता है। नरसी का मायरा, गीत-गोविन्द की टीका, पद तथा गर्व गीत उनकी प्रमुख रचनायें मानी जाती हैं। उनका साहित्य और उसका स्वरूप दोनों ही संदिग्ध हैं। उनके काव्य में गिरधरगोपाल के प्रति उनकी आकुल भावनायें विर्बाध रूप से व्यक्त हुई हैं। जहां भावनायें उन्मुक्त हुईं, आकांक्षायें उच्छृंखल हो कर असंयत हो जाती हैं पर मीरा के काव्य की सबसे बड़ी सफलता यही है कि भावनाओं की निर्बाधता में असंयत और अनियंत्रित श्रृंगार की स्थूलताओं का समावेश नहीं होने पाया है। उनकी कला का एक अपूर्व ही सौंदर्य है जो कला सम्बंधी परिपक्वताओं से वंचित रहने पर भी पूर्ण है।

मुसलमान कृष्ण-भक्त कवि रसखान का नाम इस परम्परा में अमर है। उनके व्यक्तित्व में प्रधान प्रेम-तत्व ने लौकिक आलम्बन के अस्थायित्व के कारण अलौकिक कृष्ण का सहारा लिया और उनकी भावनायें भक्त हृदय के सुंदर उद्गारों के रूप में व्यक्त हो उठीं। भावानाओ की तीव्रता और उत्कटता के साथ ही साथ उनके काव्य का कलापक्ष भी प्रौढ़ और सबल है। 'प्रेम वाटिका' और 'सुजान रस सागर' उनके दो छोटे-छोटे ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं।

उत्तर-मध्य काल में भी कृष्ण-काव्य परम्परा विभिन्न सम्प्रदायों के संरक्षण में पल्लवित और पुष्पित होती रही। पूर्व-मध्य काल (भक्तिकाल) में कृष्ण-भक्ति-पद्धति में नैसर्गिक आलम्बन के प्रति मानवीय भावनाओं का जो उन्नयन हुआ उसमें राग और साधना का अपूर्व सामंजस्य था। इस परम्परा में रागतत्व के प्राधान्य के कारण ही १९वीं शती तक भक्ति-युग की परिष्कृत माधुर्य भावना लौकिकता में रंजित होने लगी। उत्तर-मध्य कालीन कृष्ण-काव्य परम्परा में आलम्बन और साधना दोनों पक्षों में अपार्थिव अंश केवल नाम-मात्र को ही शेष रह गया।

रीतिकालीन कृष्ण-भक्ति काव्य में श्रृंगारिक तत्वों का इतना प्राधान्य हो गया कि उसके फलस्वरूप ब्रह्मा की असीमता भी मानवीय क्रिया-कलापों में लिपट कर रह गई। साहित्य की रूढ़ परम्पराओं के अनुसार 'ब्रह्मा की प्रेमिकाओं' पर भी नायिका-भेद के विविध रूपों का आरोपण किया गया। हिन्दी काव्य जगत् में सतरहवीं शताब्दी के उपरान्त कृष्ण और गोपिकाओं के नाम पर श्रृंगारपरक ऎहिक भावनाओं की अभिव्यक्ति प्रधान हो उठी।

उत्तर-मध्य काल में वल्लभ सम्प्रदाय का कोई उल्लेखनीय कवि नहीं हुआ। केवल ब्रजवासीदास ने सूरसागर के आधार पर अपने ग्रंथ 'ब्रजविलास' की रचना की। राधावल्लभ सम्प्रदाय के हित वृंदावनदास ने 'लाड़ सागर' और 'ब्रज प्रेमानन्द सागर' ग्रंथों की रचना की। इसके अतिरिक्त निम्बार्क सम्प्रदाय के घनानन्द, नागरीदास, हठी जी, भगवत रसिक जी, रूप रसिक जी, सहचरिशरण ने कृष्ण-भक्ति सम्बन्धी रचनायें लिखीं, जिनमें उस युग की काव्य-चेतना की स्मस्त विशेषताओं का समावेश हो गया है।

प्रतिपाद्य के प्रति उनके दृष्टिकोण और उनकी अभिव्यंजना-कला का विवेचन आगामी अध्यायों में किया जायेगा।

आधुनिक काल नये संदेशों और नये जीवन-दर्शन से युक्त सामने आया। मध्यकालीन सामन्तीय व्यवस्था बीत चुकी थी। बौद्धिक जागरण और विज्ञान के इस युग में धार्मिकता और विशेषकर उपास्य के प्रति रागात्मक वृत्ति के उन्नयन को अंध-विश्वास और रूढ़िवादिता का नाम दिया गया। उत्तर-मध्य काल में कृष्ण-भक्ति में निहित श्रृंगार तत्व ने लौकिक श्रृंगार का रूप धारण कर लिया था, आधुनिक काल में केवल उसका अंधकार पक्ष ही अवशिष्ट रह गया। भक्ति के नाम पर भ्रष्टाचार, अंधविश्वास और पाखंड ने तत्कालीन सुधारवादी और बौद्धिक प्रवृत्तियों को अपने विरुद्ध आवाज़ उठाने की चुनौती दी। सूक्ष्म रागात्मक प्रवृत्तियों का आश्रित भक्ति बौद्धिक और ऎहिक जीवन-दर्शन के भार के नीचे दब गई। उसकी विकृति ही शेष रह गई।

मध्यकाल में भक्ति ने एक आंदोलन का रूप ग्रहण किया था। वह जनता के व्यक्तिगत और समष्टिगत संघर्षों और समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने आई थी। आधुनिक काल में उसका क्षेत्र 'व्यक्ति' की सीमा में ही संकीर्ण हो गया। परिवार के संसर्ग और वैयक्तिक संस्कार इत्यादि कारणों से 'धर्म' तत्व एक संकीर्ण दायरे में ही शेष रह गया। भारतेन्दु हरीशचन्द्र, जगन्नाथदास रत्नाकर, सत्यनारायण कविरत्न इत्यादि कवियों ने कृष्ण-भक्ति काव्य की रचना की जिसकी प्रेरणा स्थूल रूप में तीन प्रकार की मानी सकती है - (१) परम्परा-पालक (२) कृष्ण-चरित के गान द्वारा प्राचीन गौरव की स्थापना तथा (३) वैयक्तिक संस्कारजन्य आस्था। वल्लभाचार्य के शिष्यों द्वारा प्रवर्तित कृष्ण-काव्य परम्परा उत्थान और पतन के विविध सोपानों पर चढ़ती-गिरती आधुनिक काल तक चली आई। वल्लभ सम्प्रदाय के ही निष्ठावान भक्त भारतेन्दु हरीशचन्द्र ने उनमें पुन: माधुर्य-भक्ति की परिष्कृति और सूक्ष्मता के समावेश का प्रयत्न किया, परन्तु अब इस प्रकार की भक्ति का समय बीत चुका था, देश के सामने यथार्थ नग्न मुँह बाये खड़ा था, पाश्चात्य देशों का बुद्धिवाद भारत की आध्यात्मिकता को चुनौती दे रहा था, जिसके सूक्ष्म तन्तु बाह्य स्थूलताओं के सामने हार मान चुके थे। साहित्य में व्यवहारिक भाषा के अभाव के फलस्वरूप ब्रजभाषा का स्थान खड़ी-बोली ले रही थी, ऎसी स्थिति में ब्रजनायक से सम्बद्ध काव्य-परम्परा और ब्रजभाषा दोनों के विकास का मार्ग अवरुद्ध हो गया।

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रविवार, सितंबर 14, 2025

शब्दों की हिंसा

कुछ दिन पहले भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने टीवी के प्रोग्राम वाले श्री समय रैना और अन्य विदूषकों को आदेश दिया कि वे अपने कार्यक्रम में विकलांग और बीमार व्यक्तियों की खिल्ली उड़ाने के लिए उनसे क्षमा माँगें।

हर भाषा में कमज़ोर, अल्पसंख्यक, नीचे देखे-माने जाने वाले समुदायों के व्यक्तियों के लिए ऐसे शब्द होते हैं जिनसे उनकी कमज़ोर तथा अवाँछनीय सामाजिक स्थिति पर ज़ोर दिया जाता है। वैश्या, अँधा, बहरा, लूला, अछूत, गँवार, पागल जैसे शब्द इनके कुछ उदाहरण हैं।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद १९४८ में संयुक्त राष्ट्र संघ ने सार्वभौमिक मानव अधिकारों के घोषणापत्र को अपनाया। उसके बाद से विभिन्न वंचित समुदायों ने शब्दों की हिंसा के बारे में बात करनी शुरु की और कहा कि उनके लिए नये शब्द होने चाहिए जिनसे उनकी मानव अस्मिता को स्वीकारा जाये और उनकी छवि सकारात्मक बने।

लेकिन यह संघर्ष बहुत पहले से चल रहे थे। जैसे कि गाँधीजी ने "हरिजन" शब्द का प्रयोग १९३२ में किया था क्योंकि वह सोचते थे कि अछूत की जगह हरिजन कहने से अस्पृश्यता निवारण में मदद मिलेगी।

लेकिन केवल भाषा बदलने से व्यक्तियों की स्थिति नहीं सुधरती और कई बार, समय के साथ नये शब्द भी नकारात्मक बन जाते हैं। जैसे कि समय के साथ 'हरिजन' शब्द के बदले 'दलित' शब्द का उपयोग बेहतर माना गया, जबकि आजकल कुछ लोग भीमटा या भीमवादी शब्द का प्रयोग भी करते हैं।

इस तरह के समय के साथ नये शब्दों के नकारात्मक बदलाव एक अन्य उदाहरण है मन्दबुद्धि बच्चों के लिए अंग्रेज़ी में पहले 'इम्बेसाईल' (नासमझ) शब्द का प्रयोग होता था, उसे बदल कर 'ईडियट' (बेवकूफ) किया गया, फ़िर जब ईडियट शब्द को बुरा माना गया तो 'लो इटेलिजैंस' (मन्द बुद्धि), 'इटेलेक्चुअल डिसएबिल्टी' (मानसिक विकलाँता) जैसे शब्द खोजे गये। आजकल इन सभी शब्दों का प्रयोग न करने के लिए कहते हैं और उनकी जगह पर 'लर्निन्ग डिसएबिल्टी' (सीखने की विकलाँगता)  शब्द का प्रयोग करने के लिए कहते हैं। (नीचे की छवि इसी विषय पर हुई मंगोलिया में एक मीटिन्ग से है)

विकलाँगता के सही शब्द कौन से हों, मंगोलिया की मिटिन्ग - छवि डॉ. सुनील दीपक की

  

शब्दों के बदलाव में जिस समुदाय की बात हो रही हो, उसके लोग स्वयं अपने लिए शब्द चुनना पसंद करते हैं। जैसे कि कुछ वर्ष पहले भारत सरकार ने 'विकलाँग' के बदले 'दिव्याँग' शब्द का प्रयोग रखा, लेकिन बहुत से विकलाँग व्यक्तियों ने इस नये शब्द का विरोध किया है।

शब्दों से जुड़ी हिंसा की बहसें सबसे अधिक अंग्रेज़ी भाषा के शब्दों के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, विषेशकर संयुक्त राष्ट्र संघ के स्तर पर होती हैं कि अंतर्राष्ट्रीय घोषणापत्रों और समझौतों में कौन से शब्दों का प्रयोग होना चाहिये। कई बार मुझे लगता है कि सालों तक इन बहसों में लड़ने-झगड़ने वाले लोगों को अपने आप को बड़ा एक्टिविस्ट दिखाने और बढ़-चढ़ कर बोलने में अधिक दिलचस्पी होती है, जबकि उनके देशों में गाँवों-शहरों में रहने वाले लोगों को इस सबसे कुछ फायदा नहीं होता क्योंकि इन बहसों का उनकी अपनी भाषाओ में कुछ सार्थिकता नहीं होती।

जैसे कि विकलांगों के सम्बंध में मैंने सालों तक 'डिसएब्लड पर्सन' (विकलाँग व्यक्ति) और 'पर्सन विद डिसएबिलिटी' (व्यक्ति जो विकलाँग है) में से कौन सा शब्द बेहतर है इस पर हज़ारों अंतर्राष्ट्रीय बहसें देखी हैं। अंत में यह फैसला हुआ कि 'पर्सन विद डिसएबिल्टी' का प्रयोग होना चाहिेये क्योंकि इसमें पर्सन (व्यक्ति) शब्द पहले आता है, जिससे उसकी विकलाँगता को नहीं बल्कि उसके व्यक्ति होने को अधिक महत्व देते हैं। आज अगर आप किसी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में गलती से 'डिसएब्लड पर्सन' बोल दें तो कुछ लोग बहुत क्रोधित हो जाते हैं, आप को निकालने की धमकियाँ देते हैं।

मैं सोचता हूँ कि इस सारी बहस का हमारे देशों में रहने वाले लाखों विकलाँग व्यक्तियों पर क्या असर पड़ता है? कितने हिंदी बोलने वाले, 'विकलाँग व्यक्ति' के बदले में 'व्यक्ति जो विकलाँग हैं' बोलना चाहेंगे?

मेरे विचार में भाषाओं में हिंसा होती है, क्योंकि समाजों में हिँसा होती है और भाषाएँ समाजों के प्रतिबिम्ब होती हैं। समाज की हिंसा से लड़े बिना, भाषा की हिंसा से लड़ने का क्या फायदा है?

मेरे विचार में व्यक्तियों को नीचा दिखाने वाले शब्दों को बदलने का पहला कदम उन व्यक्तियों की आत्मचेतना है जिससे उन्हें अपनी स्थिति की समझ आये, वह स्वयं उस शब्द को अस्वीकार करें। यह पहला कदम आसान नहीं है क्योंकि हम जिन समाजों में पलते और बड़े होते हैं, वह बचपन से हमारी सोच को प्रभावित करता है। बचपन से अपने लिए सुनी नकारत्मक बातें हमारे भीतर घर बना कर रहती हैं, हम खुद अपने आप को नीचा, कमज़ोर, मानने लगते हैं। 

इसका दूसरा कदम है कि अपने लिए नया शब्द चुनना और उसके लिए लड़ना, लेकिन वह केवल शब्द बदलने की लड़ाई नहीं होती। उसके साथ एक दूसरी बड़ी लड़ाई भी होती है जिसमें वह अपनी सामाजिक स्थिति के बदलाव तथा उत्थान के लिए भी लड़ते हैं। 

अगर आप किसी ऐसे समुदाय से हैं जिनके लिए नकारात्मक शब्दों का प्रयोग होता है, तो आप इस बारे में अपनी राय टिप्पणी के माध्यम से अवश्य दें कि आप  इस विषय में क्या सोचते हैं और आप का व्यक्तिगत अनुभव क्या बताता है? 

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बुधवार, जुलाई 02, 2025

यौन दुराचरण और हमारी चुप्पियाँ

पिछले कुछ दिनों में फेसबुक पर साहित्यकारों से जुड़ी यौन दुराचरण की एक बहस चल रही है। मैं फेसबुक पर कम ही जाता हूँ और कोशिश करता हूँ कि नकारात्मक बातें न पढ़ू, फ़िर भी इस बहस के कुछ हिस्सों पर मेरी नज़र पड़ी। उस बहस में जिन व्यक्तियों की और जिस घटना की बात हो रही है, मैं दोनों से अपरिचित हूँ, इसलिए उसके बारे में कुछ नहीं लिखना चाहता।

लेकिन इस बात से मुझे अपने कार्य-जीवन से जुड़ीं यौन दुराचरण की बातें याद आ गईं। यह आलेख मेरी उन यादों, अनुभवों, तथा विचारों के बारे में है।


आप क्या करेंगे?  

अगर आप को पता चले कि आप का मित्र या ऐसा व्यक्ति जिसे आप बहुत मानते हैं वह यौन-दुराचरण कर रहा है तो आप क्या करेंगे? यह बातें फ़िल्मों में देख कर या दैनिक या पत्रिका में पढ़ कर आसान लगती है, और हम सोचते हैं कि इसके विरुद्ध आवाज़ उठानी चाहिए। 

जैसे कि मीरा नायर की फ़िल्म "मॉनसून वेडिन्ग" में यह प्रश्न उठता है, जब पता चलता है कि परिवार का एक सम्मानित आदमी जिसने परिवार की कई अवसरों पर मदद की है, घर की बच्ची के साथ जबरदस्ती यौन सम्बंध करता था। उस फ़िल्म में परिवार के वरिष्ठ लोग उस आदमी को वहाँ से चले जाने के लिए कहते हैं। लेकिन फ़िल्मों के बाहर की दुनिया में क्या होता है? वहाँ अक्सर इस विषय पर चुप्पियाँ मिलती हैं, और लोग इस बारे में बात करने में असहज हो जाते हैं।

मेरे व्यक्तिगत अनुभव भी यही बताते है कि सामान्य जीवन में इस तरह के निर्णय लेना कभी-कभी बहुत कठिन हो सकता है। अगर आप को यौन विषय पर पढ़ने-सुनने से परेशानी होती है, तो मेरी सलाह है कि आप इस आलेख को आगे नहीं पढ़िये।

दो जाने-माने नाम

एब्बे पिएर फ्राँस में १९१२ में पैदा हुए थे और उनकी मृत्यु सन् २००७ में हुई थी। उन्हें लोग संत मानते-बुलाते थे। सन् १९४९ में एब्बे पिएर ने यूरोप में एम्माउस नाम की संस्था बनाई थी जो गरीबों, विकलांगों, कुष्ठ रोगियों, शरणार्थियों आदि के साथ सक्रिय थीं। उनकी संस्था से प्रभावित हो कर बहुत सी अन्य एम्माउस एसोसियेशन भी बनीं। चूँकि मैं भी कुष्ठ रोग और विकलांगता के क्षेत्र में सक्रिय था, उनमें से कई संस्थाओं के साथ मेरे सम्पर्क बने और उनके साथ बहुत बार काम भी किया।

करीब तीस-पैंतीस साल पहले, नब्बे के दशक में मैं एब्बे पिएर से एक बार मिला था और उनकी बातों और सोच से बहुत प्रभावित हुआ था। इसलिए जब पिछले वर्ष (२०२४ में), एब्बे पिएर के बारे में खबरें आईं कि उन्होंने बहुत सी बच्चियों के साथ यौन दुराचार किया था, तो मुझे बहुत धक्का लगा था। इस विषय पर एक नई किताब आई है जिसकी लेखिकाओं ने इस विषय पर छानबीन की है जिससे स्पष्ट होता है कि उनके यौन दुराचार की बातें लोगों को बहुत पहले से मालूम थीं लेकिन इसके बारे में कोई खुल कर नहीं बोलता था। ३३ स्त्रियों ने बचपन में उनके इस तरह के व्यवहार के व्यक्तिगत अनुभवों के बारे में गवाही दी है।

जब इस तरह की बातें पता चलती हैं तो पहला प्रश्न जो मेरे मन में उठता है वह है - उस व्यक्ति के अच्छे कामों के बारे में क्या किया जाये? उन्हें भुला दिया जाना चाहिये? किसी व्यक्ति की बात करते हुए  उसके अच्छे और बुरे कर्मों को किस तराजू में कैसे तोला जाये?

दूसरी बात है समय की। एब्बे पिएर को गुज़रे हुए सतरह साल हो चुके हैं तो अब यह बातें कहने का क्या लाभ है? मेरे विचार में सच्ची बात को अभिव्यक्त करना भी आवश्यक है। इस समाचार के बाद कुछ एम्माउस संस्थाओं ने अपनी वेबसाईट आदि से एब्बे पिएर का नाम हटा दिया है। लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि इतने सालों के बाद की उन औरतों की स्मृति पर भरोसा नहीं किया जा सकता, या फ़िर किसी को मानसिक रोग हो तो वह गलत सम्बंध की बात की कल्पना भी कर सकता है, इसलिए इन बातों पर पूरा विश्वास करना कठिन है। लेकिन मुझे लगता है कि इतनी सारी औरतों की शिकायतों को मानसिक रोग कहना सच्चाई से मुँह छुपाना है।

दूसरी बात डेविड वर्नर की है। पिछड़े और विकासशील देशों के ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले बहुत सारे लोग डेविड वर्नर की दो किताबों को जानते हैं, "जहाँ कोई डॉक्टर नहीं है" और "गाँव के विकलांग बच्चे"। १९८०-९० के समय में यह दोनों किताबें बहुत प्रसिद्ध थीं और इनसे प्रेरणा पा कर इस तरह की अन्य कई किताबें भी लिखी गईं जैसे कि "जहाँ कोई डैंटिस्ट नहीं है", "जहाँ कोई मनोरोग विषेशज्ञ नहीं है", आदि।

मैंं डेविड से पहली बार १९८८ में मिला था और विकलांगता से सम्बंधित विषयों पर उसकी सोच-समझ को प्रेरणादायक पाया था।

२००३-४ के आसपास मैंने सुना कि उस पर आरोप लगा है कि मैक्सिको के जिस गाँव में रहता और काम करता था, वहाँ के कई बच्चों के साथ उसके यौन सम्बंध भी थे। मुझे विश्वास नहीं हुआ, लेकिन मेरी एक अंग्रेज़ी मित्र ने मुझे उसकी एक चिट्ठी दिखायी जिसमें वह इस तरह के "प्रेम सम्बंधों" को वह बच्चों के मानसिक विकास के लिए सही बता रहा था। हमारे मित्रों के गुट ने उस समय उससे सब सम्बंध तोड़ लिए थे। बाद में मैंने सुना कि वह अपनी बात से पलट गया है, वह इंकार करता है कि उसने ऐसा कुछ किया था।

डेविड मुझसे करीब बीस साल बड़ा था, अगर वह आज जीवित है तो नब्बे साल का होगा। बहुत सालों से मेरा उससे सम्पर्क नहीं है। लेकिन इसके बारे में मेरे मन में दुविधा है। उसकी जिन किताबों की वजह से लाखों लोगों को लाभ भी हुआ था और आज भी होता होगा, उनके लिए उसके योगदान को कैसे देखा जाये? मैं कई विकलांग लोगों को जानता हूँ जो कहते हैं कि उसकी किताबों में उन्होंने अपना जीवन जीने की राह पाई है।

मी टू - व्यस्कों में सम्बंधों की जटिलताएँ

कुछ वर्ष पहले "मी टू" (मुझे भी) के नाम से यौन दुराचार की बहुत सी बातें बाहर निकलीं, कई लोगों पर आरोप लगे जिसमें बड़ी उम्र के जाने-पहचाने या प्रसिद्ध या उच्चे पद के अफसरों-अधिकारियों ने अपने नीचे काम करने वाली युवतियों को सैक्स के लिए मजबूर किया था। कानूनी जाँच में बहुत से ऐसे आरोप सही निकले और कुछ में आरोपितों को सजा मिली या नौकरी से निकाला गया। कुछ ऐसे आरोप झूठे भी निकले। 

कुछ स्त्रियों का कहना है कि जिस समय यह हादसा हुआ था, यह इतना अप्रत्याशित था कि उस समय वह कुछ नहीं कह पायीं। अगर महिला ने रोका नहीं या स्पष्ट मना नहीं किया तो क्या इसे गलतफहमी का नतीजा भी माना जा सकता है?

यह भी सच है कि नीचे काम करने वाले को दबाव महसूस होता है कि अगर वह ऐसे सम्बंधों को नहीं स्वीकारेंगे तो उनके केरियर पर बुरा असर पड़ेगा। इसलिए कुछ लोग कहते हैं कि इस तरह के सम्बंध हमेशा गलत होते हैं। लेकिन ऐसे कई दम्पत्ति हैं जिनकी जानपहचान और प्रेम साथ में काम करने की वजह से हुए, जब उनमें से एक ऊँचे पदवे पर था और दूसरा नीचे। इसलिए यह सोचना कि ऊँचे और नीचे पद वालों के बीच किसी तरह के सम्बंध नहीं बने, को लागू करना कठिन होगा।

यह भी हो सकता है कि कैरियर में आगे बढ़ने के लिए या किसी लाभ की आशा से कुछ व्यक्ति इस तरह के सम्बंध सोच-समझ कर बनायें, लेकिन बाद में प्रमोशन या लाभ न मिलने पर गुस्सा हो जायें और बदला लेने के लिए कहें कि उनके साथ जबरदस्ती हुई है। यह बात सोच कर मुझे व्यस्क व्यक्तियों के बीच हुए सम्बंधों का मामला अधिक कठिन लगता है। 

समलैंगिक यौन दुराचरण की जटिलतायें

नब्बे के दशक में एक अधेड़ उम्र की नर्स हमारे एक प्रोजेक्ट में काम करने तीन महीने के लिए विदेश गईं। उन्होंने लौट कर मुझसे शिकायत की वहाँ काम करने वाली, उनसे दस वर्ष बड़ी हमारे प्रोजेक्ट की प्रमुख ने उनसे यौन सम्बंध बनाने की कोशिश की। वह चाहती थीं कि हम उस प्रोजेक्ट प्रमुख को नौकरी से निकाल दें। जहाँ तक मुझे समझ में आया शिकायत करने वाली महिला के साथ किसी तरह की कोई जबरदस्ती नहीं हुई थी, बल्कि वह सोचती थीं कि लेसबियन होना गलत है और ऐसी औरतों को प्रोजक्ट में ज़िम्मेदारी के पद पर नहीं रखना चाहिए। जबकि मुझे लगा कि लेसबियन होना और व्यस्क महिला से सम्बंध के लिए कहना या पूछना कोई जुर्म नहीं है। अंत में मैंने इस शिकायत के बारे में कुछ नहीं किया।

एक बार भारत में एक कुष्ठआश्रम के काम करने वाली यूरोपीय मूल की नर्स-नन के बारे में भी मुझे यही शिकायत मिली कि वह लेसबियन है। मैं उन्हें बहुत सालों से जानता था और मुझे लगा कि वह बहुत मेहनत तथा प्यार से रोगियों की सेवा करती थीं। मैंने सोचा कि लेसबियन होना अपराध नहीं है, और अगर वह किसी से जबरदस्ती नहीं कर रहीं तो यह उनका निजि मामला है। बाद में मुझे खबर मिली कि उनकी संस्था (कोनग्रेगशन) ने उन्हें संस्था से निकाल दिया है और वह यूरोप वापस लौट आईं।

कुछ साल पहले अमरीकी अभिनेता केविन स्पेसी पर भी कुछ पुरुषों ने आरोप लगाये थे कि कुछ दशक पहले जब वह नाबालिग थे तब स्पेसी ने उनके साथ जबरदस्ती सम्बंध बनाये थे। इन आरोपों की वजह से स्पेसी को कई फिल्मों और सीरियल से निकाल दिया गया, लेकिन बाद में न्यायालय ने उन आरोपों को सही नहीं माना। एक ओर से यह हो सकता है कि इतने पुराने ज़ुर्म को अदालत में साबित करना आसान नहीं है, लेकिन दूसरी ओर यह भी हो सकता है कि प्रसिद्ध और पैसे वाले व्यक्ति पर झूठा आरोप लगाने का कारण व्यक्तिगत लाभ की आशा हो। 

एक और अनुभव

मेरा तीसरा अनुभव एक यूरोपी पुरुष से जुड़ा है जो करीब बीस साल से अफ्रीका में काम करते थे। उन्होंने वहाँ की महिला से विवाह किया था और उनके बच्चे भी थे, जिनमें वहाँ के कुछ गोद लिए हुए बच्चे भी थे। उन्होंने बहुत से बच्चों को छात्रवृति दिलवा कर यूरोप पढ़ने भेजा था। एक दिन उनके विरुद्ध शिकायत आई कि वह वहाँ अनाथाश्रम के बच्चों से यौन सम्बंध बनाते हैं। इस बात की जाँच के लिए वहाँ एक व्यक्ति को भेजा गया। तीन सप्ताह तक उस व्यक्ति ने वहाँ के बच्चों से, वहाँ काम करने वालों से, आदि से साक्षात्कार किये, और इस बारे में प्रश्न पूछे। पता चला कि आरोप लगाने वालों में कुछ लोगों का उनसे झगड़ा हुआ था, लेकिन किसी बच्चे से इसके बारे में बातचीत से कोई संदेहजनक बात नहीं निकली। आखिर में कुछ सबूत नहीं मिलने से यह जाँच बंद कर दी गयी और उनके विरुद्ध कुछ कार्यवाही नहीं की गई।

इस बात के चार-पाँच साल के बाद उस देश की सरकार ने उन्हें अपने देशवासियों की सेवा के लिए विषेश पुरस्कार दिया। इस बात को बीस-पच्चीस साल हो गये हैं और वह सज्जन, जो अब वृद्ध हैं, आज भी उसी देश में रहते हैं और उसी अनाथाश्रम में स्वयंसेवक की तरह काम करते हैं।

सच कहूँ तो आज भी मेरे मन में इस घटना के बारे में दुविधाएँ हैं, हालाँकि उनके अपने गोद लिए हुए बच्चे, जो अब व्यस्क हैं, कहते हैं कि उनके पिता पर लगे आरोप झूठे थे। आप बताईये कि आप इस मामले में क्या करते?

अंत में

मेरे लिए, व्यक्तिगत स्तर पर, इस विषय पर सबसे बड़ी दुविधा का कारण है कि जहाँ बलात्कार जैसे सबूत नहीं हों, किसी पर लगे आरोपों को कैसे जाँचा जाये? बाद में मन में संदेह रह जाता है, उसे निकालना असम्भव होता है, तो यह लगता है कि आरोप लगाना बहुत आसान है, लोग कुछ भी कह सकते हैं। लेकिन इसका दूसरा पहलू है कि जब कोई औरत, अतीत में हुई किसी बात को बताती है, तो उसके लिए यह कहना आसान नहीं होता, उसे कैसे गम्भीरता से न लिया जाये?

अंत में बात घूम-फ़िर कर वहीं आ जाती है कि उपन्यासों, फ़िल्मों या अखबारों या फेसबुक में यह बातें आसान लग सकती हैं, कि यह हुआ, ऐसा या वैसा करना चाहिए था। फेसबुक जैसे सोशल मीडिया में कुछ भी लिखना आसान है। लेकिन जब आप को निर्णय लेना पड़े तो यह कभी-कभी बहुत कठिन हो सकता है। 

पटना की घटना से जुड़ी बहस पर साहित्यकारों और साहित्य की बात करते हुए, मित्र ओम थानवी ने लिखा है, "अच्छा या बड़ा लेखक जाति, विचार, चरित्र, आचरण के बावजूद अच्छा या बड़ा होता है। कम-से-कम इस तरह के आधारों पर उसे त्याज्य या उपेक्षणीय नहीं माना जा सकता।" कुछ यही बात अन्य क्षेत्रों में काम करने वालों के लिए भी कही जा सकती है।

आप बताईये आप इस विषय के बारे में क्या सोचते हैं? 

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शुक्रवार, जून 20, 2025

राशन की चीनी

आज सुबह चाय बना रहा था तो अचानक मन में बचपन की एक याद कौंधी। 

यह बात १९६३-६४ की है। मैं और मेरी छोटी बहन, हम दोनों अपनी छोटी बुआ के पास मेरठ में गर्मियों की छुट्टियों पर गये थे। १०१ नम्बर का उनका घर साकेत में था। साथ में और सामने बहुत सी खुली जगह थी। बुआ के घर में पीछे पपीते का पेड़ लगा था और साथ वाले घर में अंगूर लगे थे। एक बार दोपहर में जब अन्य लोग सो रहे थे, पड़ोसी घर से अंगूर चुरा कर खाने की सजा भी मिली थी। बुआ के यहाँ अजीत नाम के गढ़वाली सज्जन रसोईये का काम करते थे।

तब मैं नौ-दस साल का था और सुबह दूध पीता था। दिल्ली में घर पर दूध में चीनी मिला कर पीते थे। उन दिनों में चीनी राशन से मिलती थी और शायद मेरठ में उसकी कमी चल रही थी, इसलिए वहाँ दूध फीका पीना पड़ता था। ऐसी आदत पड़ी थी कि बिना चीनी का दूध पीया ही नहीं जाता था, मतली आने लगती थी। तब अजीत कहता कि गुड़ का टुकड़ा मुँह में रख लो और साथ में दूध का घूँट पीयो, चीनी की कमी महसूस नहीं होगी।

पिछले दस-पंद्रह सालों से मैं दूध, चाय और कॉफी बिना चीनी के पीता हूँ। मसूढ़ों में तकलीफ रहती थी तब डैन्टिस्ट ने कहा कि शायद मेरे मसूढ़ों को चीनी और कॉफी का सम्मिश्रिण सूट नहीं करता, इसलिए मुझे कुछ दिन तक बिना चीनी की कॉफी पी कर देखना चाहिए। एक बार कॉफी से शुरु किया तो चाय और दूध में भी चीनी डालना छोड़ दिया।

तब से फीका पीने की ऐसी आदत पड़ी है कि अगर चाय में चीनी हो तो मुझसे पी नहीं जाती, मतली आने लगती है। भारत में छोटे-बड़े शहरों में घूमते हुए कई बार ऐसा होता है कि वह लोग चाय बना कर रख लेते हैं जिसमें चीनी मिली होती है और आप उनसे बिना चीनी की चाय माँगिये तो वह मना कर देते हैं। रेल में भी यही होता है।

कर्णटक में एक पशु मेले में चाय बेचने वाली - Image by Sunil Deepak

तब सोचता हूँ कि जीवन भी कितना विचित्र है। कभी चीनी न होने पर उसके लिए तरसते थे और आज चीनी होने पर तरसते हैं।

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साठ-सत्तर के दशक के बारे में सोचो तो मन में प्रश्न उठता है कि अगर गुड़ मिलने में कोई कठिनाई नहीं होती थी तो चीनी क्यों नहीं मिलती थी? गुड़ से चीनी बनाना ऐसा कठिन नहीं है। शायद तब बात गन्ने या गुड़ की कमी की नहीं थी बल्कि फैक्टरियों को चीनी बनाने के कोटा मिलना की थी, क्योंकि कोई फैक्टरी वाला, जितनी अनुमति मिली हो उससे अधिक चीनी का उत्पादन नहीं कर सकता था। अगर वह कोटे से अधिक उत्पादन करते थे तो सरकारी बाबू उन पर जुर्माना लगा देते थे।

यह कोटे वाली बात आज की पीढ़ी के लिए समझना आसान नहीं है। एक बार मैंने विक्स बनाने वाली कम्पनी के अधीक्षक का एक साक्षात्कार सुना था जिसमें उन्होंने बताया कि इंदिरा गाँधी की सरकार के समय में एक साल फ्लू का बुखार बहुत फ़ैला। इसलिए विक्स की माँग बहुत थी तो कम्पनी ने उत्पादन बढ़ा दिया। इस बात के कुछ महीने बाद उन्हें दिल्ली के एक अफसर ने बुलाया, वह अपने वकील के साथ गये। उन्हें कहा गया कि तुमने कोटे से अधिक विक्स बना कर अपराध किया है, उसका जुर्माना देना पड़ेगा।

आज का हिन्दुस्तान में बहुत सी बातें बदली हैं, अब फैक्टरियों को कोटे से अधिक बनाने का जुर्माना नहीं लगता, क्योकि अब कोटे नहीं होते। लेकिन कई क्षेत्रों में कुछ सरकारी बाबूओं की सोच में बहुत बदलाव नहीं हुआ है। उनका ध्येय जनसेवा नहीं, जब तक आप उनके हाथ गर्म नहीं करें तब तक उनका काम आप के काम में अड़चने डालना है।

आप की क्या राय है, हिन्दुस्तान में क्या बदलना चाहिए जो अभी भी नहीं बदला?

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शनिवार, जून 07, 2025

झाड़ू-पौंछे का रोबोट

बचपन से देखा था कि माँ सुबह स्कूल में पढ़ाने जाने से पहले घर में झाड़ू लगा कर जाती थी, अक्सर झाड़ू के बाद गीला पौंछा भी लगता था। जब मेरी छोटी बहनें बड़ी हुईं तो कभी-कभी वह भी माँ का हाथ बँटाती थीं। जब से इटली में आया तो हमेशा पत्नी को यही काम करते देखा। यह हमारी झाड़ू-पौंछे की पुरानी दुनिया थी।

चीन में सड़क की सफाई करने वाले कर्मचारी

पहले गर्मियों की छुट्टियों में जब बेटे को ले कर पत्नी महीने-दो महीने के लिए समुद्र तट वाले घर में रहने चली जाती, तो मैं उनसे मिलने जाने के लिए सप्ताह-अंत की प्रतीक्षा करता था। लेकिन उन दिनों में घर की सफाई की ज़िम्मेदारी मेरी होती थी। तब मैं हफ्ते में एक बार झाड़ू लगाता था, और कभी-कभी पौंछा भी लगाता था। साथ में यह ध्यान रखता था कि जिस दिन पत्नी को घर लौटना है, उससे पहले घर की सफाई ठीक से की जाये। लेकिन कई बार ऐसा हुआ कि वह लोग छुट्टियों से एक-दो दिन पहले घर लौट आये और मुझे ठीक से सफाई करने का मौका नहीं मिला। तब पत्नी के माथे पर बल पड़ जाते कि "अरे, घर कितना गंदा हो रहा है"।

करीब दस साल पहले, मैं दो साल के लिए गौहाटी में काम करने गया तो वहाँ किराये के घर में अकेला रहता था। वहाँ घर में एक झाड़ू-पौंछा लगाने वाली आती थी। पिछले तीस-चालीस सालों में मुझे यहाँ पर एकदम साफ-सुथरे में रहने की ऐसी आदत हो गई थी कि मुझे लगता कि गौहाटी की झाड़ू-पौंछा लगाने वाली ठीक से काम नहीं करती थी, जल्दी-जल्दी दो हाथ चलाती और चली जाती। मैं एक-दो बार तो उसे ठीक से सफाई करने को कहा, जब देखा कि उनका काम तो उसे हटा कर एक अन्य महिला को रखा। जब समझ में आया कि काम तो वैसे ही होगा तो उन्हें काम पर आने से मना कर दिया। तब मैं खुद ही सुबह घर में अच्छी तरह से झाड़ू-पौंछा लगा कर ही काम पर जाता था।

नयी दुनिया की नयी सफाई

कुछ साल पहले हमने सफाई करने वाला रोबोट खरीदा। यह घर की धूल, मिट्टी, कूड़ा जमा करने में बढ़िया काम करता है, हालाँकि मेरी पत्नी को उससे संतोष नहीं होता, वह कई बार, इसकी सफाई के बाद, अलग से वेक्यूम क्लीनर ले कर उससे दोबारा सफाई करती है। लेकिन अब जब पत्नी गर्मियों में एक-दो महीने के लिए समुद्र तट पर रहने चली जाती है (और मैं वहाँ नहीं जाता क्योंकि मैं वहाँ तीन-चार दिन में ऊब जाता हूँ), तो घर में मेरे मित्र रोबोट जी ही सफाई करते हैं।

रोबोट से कालीन की सफाई

घर के पिछवाड़े में इस रोबोट का बिस्तर लगा है, वहाँ रख दो तो पूरा चार्ज हो जाते हैं। हर दूसरे-तीसरे दिन इन्हें काम पर लगा देता हूँ। गोल-गोल घूम कर यह कमरे के कोने-कोने में जाते हैं। इनके भीतर कम्पयूटर लगा है, इनके पास घर का पूरा नक्शा है कि कहाँ  क्या रखा है, सोफे और मेज़ आदि के चक्कर लगाना आता है, और यह सीढ़ियों से नीचे नहीं गिरते। ऊँचाई कम है इसलिए यह अलमारियों, बिस्तरों आदि के नीचे घुस कर सफाई कर सकते हैं। इन्हें चलाने से पहले, मैं कमरे की जो चीज़ें आसानी से हट सकती हैं, उन्हें वहाँ से हटा लेता हूँ ताकि यह खुले घूमें।

रोबोट अलमारियों, बिस्तर आदि के नीचे भी घुस जाता है

छोटे-मोटे कालीन आदि भी झाड़ कर हटा देता हूँ, जबकि मोटे कालीन को वहीं अपनी जगह पर छोड़ देता हूँ ताकि उसके  ऊपर से भी अच्छी तरह से सफाई हो जाये। 

जब यह काम कर लेता है तो वापस अपने बिस्तर की ओर लौट जाता है और अपने आप को रिचार्ज के लिए लगा लेता है। चूँकि हमारे पिछवाड़े में बारिश के समय पानी जमा हो जाता है, इसलिए हमने इनका बिस्तर ज़मीन से उठा कर चबूतरे पर बनाया है, तो जब रिचार्ज करना हो बेचारा चबूतरे के पास जा कर थोड़ी देर तक तड़पता है, फ़िर वहीं बत्ती बुझा कर बैठा रहता है कि हम इसे उठा कर इसके रिचार्ज-पोर्ट पर रखें।

सफाई वाले रोबोट का रिचार्ज

हमारे मॉडल में केवल वैक्यूम से कूड़ा खींचने वाला झाड़ू है, लेकिन बाज़ार में दूसरे मॉडल मिलते हैं जिनमें पौंछा लगाने की सुविधा भी है। हमने अपना सस्ता सफाई का रोबोट मॉडल, दो-तीन साल पहले, करीब दो सौ यूरो (पंद्रह-सोलह हज़ार रुपये) का खरीदा था। आजकल यहाँ इटली में घर में सफाई का काम करने वाले लोग एक घंटे का करीब दस यूरो (आठ-नौ सौ रुपये) लेते हैं, उस हिसाब इन्हें खरीदना कम खर्चीला है। इसका बटन है, जिसे दबाओ तो कूड़े वाला हिस्सा बाहर निकल आता है और उसे साफ करना आसान है। 

बटन दबा कर रोबोट से कूड़ा बाहर निकालना

 जब यह रोबोट जी मेरे आस-पास घुर-घुर करके घूम रहे होते हैं, तो मैं कभी-कभी इनसे बातें भी करता हूँ। कल जब मानव-शरीर जैसे रोबोट बनेंगे तो शायद उनसे पूछूँगा, "भाई साहब, आप चाय पीयेंगे?"

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शनिवार, मई 31, 2025

महाबुद्धिमानों के वंशज

इटली के सबसे प्रसिद्ध कलाकारों में दो नाम सबसे ऊपर हैं, लेयोनार्दो द विंची और माईकलएँजेलो। लेयोनार्दो को उनकी चित्रकला और माईकलएँजेलो को उनकी शिल्पकला के लिए जाना जाता है। पैरिस के लूव्र संग्रहालय में रखी लेयोनार्दो की कलाकृति "मोनालिज़ा" शायद दुनिया की सबसे प्रसिद्ध कलाकृति है।

इस पहली तस्वीर में लेयोनार्दो के गाँव विंची में उनकी एक कलाकृति पर आधारित स्मारक दिखाया गया है। विंची का गाँव, रोम से करीब दो सौ किलोमीटर उत्तर में इटली के तस्कनी प्रदेश में अपेनीनी पहाड़ों में स्थित है।

Leonardo da Vinci, his descendents, his village in Tuscany .. Images by Sunil Deepak

चित्रकला के साथ-साथ, लेयोनार्दो को विभिन्न आविष्कारों के लिए भी जाना जाता है। अपनी डायरी में उन्होंने विभिन्न आविष्कारों के चित्र और उन्हें कैसे बनाया जाये, इसकी विधियाँ लिखीं थीं। उन आविष्कारों में हवाई जहाज़, हैलीकोप्टर, टैंक, पानी का पम्प आदि शामिल हैं, जिन्हें कई सौ सालों के बाद मानव ने बनाया। इनकी वजह से लेयोनार्दो को जीनियस यानि महाबुद्धिमान मानते हैं।

यह आलेख उनके वंशजों से ले कर उनके गाँव विंची से होता हुआ उनके बनाये शेर के खिलौने तक जाता है। 

लेयोनार्दो के महाबुद्धिमान वशंज

लेयोनार्दो का जन्म विंची नाम के पहाड़ी गाँव में सन् १४५२ में हुआ और उनकी मृत्यु ६८ साल की उम्र में फ्राँस में हुई। कुछ समय पहले उनके वंशज-पुरुषों में उनकी डी.एन.ए. की जाँच की गई ताकि यह पता चले कि उनमें से कितनो को लेयोनार्दो के जीन्स मिले हैं, जिनसे वह भी जीनियस हो सकते हैं।

मानव शरीर के कोषों में डी.एन.ए. के २३ धागों के जोड़े होते हैं जिन्हें क्रोमोज़ोम कहते हैं, हर क्रोमोज़ोम पर जीन्स होते हैं। मनुष्यों में लिंग के हिसाब से एक क्रोमोज़ोम के जोड़े को सैक्स क्रोमोज़ोम कहते हैं, जो बच्चियों में एक जैसे होते हैं, एक्स और एक्स, जबकि लड़कों में इस सैक्स क्रोमोज़ोम के जोड़े में दो विभिन्न धागे होते हैं, एक्स और वाई। वाई क्रोमोज़ोम केवल उनके पिता से मिलता है, जबकि एक्स क्रोमोज़ोम पिता या माता किसी से भी मिल सकता है।

लियोनार्दो के वंशजों को खोजने के लिए उनके परिवार के लड़कों के डी.एन.ए. की जाँच की गई। उनके वंशजों की छह शाखाएँ मिलीं, उनमें से ३९ पुरुषों में से छह पुरुषों में पाया गया कि उनका वाई क्रोमोज़ोम बिल्कुल लेयोनार्दो जैसा था। नीचे की इस तस्वीर में, जो एक इतालवी अखबार से ली गई है, आप उनमें से पाँच लोगों को देख सकते हैं।

Leonardo da Vinci, his descendents, his village in Tuscany .. Images by Sunil Deepak

हालाँकि उनका वाई जीन्स लेयोनार्दो जैसा है, लेकिन वह सभी सामान्य सफलता वाले लोग हैं, उनमें से कोई भी जीनियस और जगप्रसिद्ध कलाकार नहीं है। उनमें से एक कुर्सियों पर कपड़ा चढ़ाने का काम करते हैं, एक बैंक में लगे हैं, एक नगरपालिका में काम करते हैं, एक अन्य दफ्तर में। लेकिन नम्बर दो पर ८९ साल के दलमाज़िओ ने कुछ छोटे-मोटे आविष्कार अवश्य किये हैं, जबकि माउरो के कुर्सियों, सोफों आदि के कपड़ा चढ़ाने के हुनर को बड़े-बड़े लोग मानते हैं, उन्होंने दुनिया के कई प्रसिद्ध नेताओं-अभिनेताओं के लिए फर्नीचर तैयार करने का काम किया है। 

इनके परिवारों की कहानियों में इनके लक्कड़दादा के लक्कड़दादा लेयोनार्दो को छोड़ कर, ऐसे किसी व्यक्ति की बात नहीं सुनने को मिलती जिससे लगे कि वह महाबुद्धिमान थे।

लेयोनार्दो का घर

Leonardo da Vinci, his descendents, his village in Tuscany .. Images by Sunil Deepak

करीब पंद्रह साल पहले, एक दिन घूमते हुए हम लोग लियोनार्दो के गाँव विंची में पहुँच गये। यह गाँव फ्लोरैंस शहर के करीब के पहाड़ों पर बसा है। उनके घर को संग्रहालय की तरह रखा गया है लेकिन वहाँ लियोनार्दो की कोई कलाकृति आदि नहीं है, क्योंकि उनकी हर कृति की कीमत करोड़ों में आँकी जाती है और उन्हें छोटी-मोटी जगहों पर नहीं रखते। ऊपर वाली तस्वीर में लेयोनार्दो के घर का एक हिस्सा है और नीचे वाली तस्वीर में, उनके घर के बाहर का रास्ता है।

Leonardo da Vinci, his descendents, his village in Tuscany .. Images by Sunil Deepak
 

लेयोनार्दो का शेर

लेयोनार्दो को चाभी से चलने वाले खिलौने बनाने का बहुत शौक था। उनके बनाये खिलौनों को उस समय के राजा-महाराजों को उपहार के लिए दिया जाता था। मुझे एक बार बोलोनिया में एक प्रदर्शनी में उनके बनाये चाभी से चलने वाले छोटा सा लकड़ी का शेर को देखने का मौका मिला, जिसमें चाभी भरते थे तो वह पिछले पैरों पर खड़ा हो कर अपनी छाती खोल देता था, जहाँ फ़ूलों का गुलदस्ता लगा होता था। कहते हैं कि इस शेर को खतरनाक माना गया क्योंकि वह अपने भीतर फ़ूलों की जगह पर बम भी छुपा सकता था, जिससे राजा को मार सकते थे।

Leonardo's lion - Leonardo da Vinci, his descendents, his village in Tuscany .. Images by Sunil Deepak

ऐसा ही एक चाभी से चलने वाला चीता हिन्दुस्तान में टीपू सुल्तान के पास भी था, जिसे अब लंदन के विक्टोरिआ-एल्बर्ट संग्रहालय में देखा जा सकता है। यह लकड़ी का चीता आकार में बहुत बड़ा था और किसी यूरोप के सिपाही को मार कर खाता दिखता था। इसकी चाभी चलाओ यह चीता मुँह चलाता और मरे सिपाही की बाजू हिलती थी। चीता और सिपाही भारत के किसी कारीगर ने बनाये लेकिन उनके भीतर के मशीनी हिस्से यूरोप से लाये गये थे। 

Tipu's tiger in Victoria and Albert Museum, London, UK - Image by Sunil Deepak

 

अंत में

बात शुरु हुई अखबार के समाचार से जिसमें लियोनार्दो के वंशजों की बात थी, वहाँ से गई लियोनार्दो के गाँव विंची में और फ़िर वहाँ से लेयोनार्दो के शेर से होते हुए, टीपू सुल्तान की चीते तक पहुँची। आशा है कि आप को यह यात्रा मज़ेदार लगी। नीचे की आखिरी तस्वीर में लेयोनार्दो के घर से पहाड़ का विहंगम दृष्य है, सोचिये कि जब वह बच्चे थे और सुबह उठ कर बाहर देखते थे तो उन्हें यह दृष्य दिखता था।

Leonardo da Vinci, his descendents, his village in Tuscany .. Images by Sunil Deepak

 

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