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गुरुवार, अक्टूबर 08, 2026

दिमाग से जुड़ी विकलाँगताएँ

कुछ विकलांगताएँ इंसान के मस्तिष्क (दिमाग या ब्रेन) से जुड़ी होती हैं, जैसे कि सेरिब्रल पाल्सी (cerebral palsy), डाउन सिंड्रोम (Down syndrome), डिस्लेक्सिया (dyslexia), आउटिज़्म (autism), इत्यादी।

इन्हें स्नायु-तंत्र की विकलांगता (neurological disability) कहते हैं क्योंकि इनमें दिमाग और स्नायु (nerves) की कुछ कमी या कमजोरी या बीमारी होती है। इन्हें बाल विकास की विकालंगता (developmental disability) भी कहते हैं क्योंकि अक्सर यह बचपन में पता चलती हैं जब बच्चा ठीक से, शारीरिक या मानसिक रूप से विकसित नहीं होता है। लेकिन दिमाग से जुड़ी कुछ विकलांगताएँ बड़े उम्र के लोगों में भी हो सकती हैं, जैसे कि दुर्घटना में सिर पर चोट लगने से।

सरलता के लिए, इस आलेख में इन सभी विकलांगताओं के लिए मैं "विकास-विकालंगता" शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ।


 

यह आलेख विकास-विकालंगता वाले बच्चों-किशोरों और उनके परिवारों के लिए लिख रहा हूँ, ताकि वह अपने शारीरिक व कार्य-क्षमता के सशक्तिकरण की आवश्यकताओं (rehabilitation needs) को समझ सकें, ज़रूरत पड़ने पर उनके बारे में डॉक्टरों और थैरापिस्टों से बात कर सकें और स्वयं अपने बारे में निर्णय ले सकें।

आलेख लिखने के कारण

(1) विकास-विकालंगता सारा जीवन रहती है और उम्र के साथ व्यक्ति की ज़रूरतें बदलती रहती हैं। इसलिए आप को अक्सर डॉक्टरों या फिज़ियोथैरापिस्ट या अन्य थैरापिस्ट के पास जाना पड़ता है। इस आलेख से आप को अपने शरीर की कठिनाईयों की समझ आयेगी जिससे आप उन्हें अपनी बात बेहतर समझा सकते हैं।

(2) चूँकि विकास-विकालंगता सारा जीवन रहेगी तो आप हर बात के लिए डॉक्टर या थैरापिस्ट के पास नहीं जा सकते। इसलिए आप को अपनी देखभाल करना खुद सीखनी चाहिए ताकि आप घर पर अपने शरीर की क्षमता बनाये रखने के लिए नियमित रूप से वर्जिश, दिमागी एक्सरसाइज़, आदि कर सकें।

(3) आधुनिक तकनीकी (एप्प, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धि) की मदद से आप दुनिया भर के अपने जैसी कठिनाई के साथ जीने वाले अन्य लोगों से सम्पर्क कर सकते हैं, उनके अनुभवों से सीख सकते हैं, और उनके साथ अपने अनुभव बाँट सकते हैं। 

दिमाग के विभिन्न काम और उनसे जुड़ी विकलांगताएँ

इंसान का दिमाग अलग-अलग काम करता है, और विकास-विकलांगता की कठिनाईयाँ उनमें से किसी एक या कुछ कामों से जुड़ी होती हैं। विकास-विकलांगता को समझने के लिए, हम यह काम मुख्य रूप से तीन तरह के सोच सकते हैं - (1) माँसपेशियों को चलाना; (2)  सोचना, समझना, गिनना, पढ़ना, आदि; (3)  सामाजिक सम्बंध, भावनाएँ, प्रेम, स्नेह आदि जताना। आईये अब इन्हें एक-एक करके देखें।

1. माँसपेशियों को चलाना:

माँसपेशियों को चलाना जीवन के लिए ज़रूरी है क्योंकि उनकी सहायता से हम चलते-फिरते, खाते-पीते, पढ़ते-लिखते सब तरह के काम करते हैं। इस क्षमता को विकास-विकलांगता समझने के लिए तीन अलग-अलग श्रेणियों में बाँट कर जाँचा जा सकता है - 

(अ) उँगलियों से महीन काम जैसे कढ़ाई करने या सूई में धागा डालने या लिखने की क्षमता। (Fine movement coordination and strength) - कुछ विकास-विकलांगताओं में केवल महीन काम करने में कठिनाई होती है।

(ए) बड़ी माँसपेशियों से मेहनत या ताकत वाला काम करना जैसे चलना, सामान उठाना या तीर चलाना या क्रिकेट का बल्ला घुमाना। (Gross movement coordination & strength)

(इ) मुँह-गले की माँसपेशियों द्वारा खाना चबाने और निगलने की क्षमता। अगर बच्चा ठीक से खाना नहीं सकता या जल-दूध आदि नहीं पी सकता तो बच्चे का स्वास्थ्य कमजोर हो जायेगा।

कुछ विकलांगताओं में जैसे कि सेरिब्रल पाल्सी में शरीर के कुछ हिस्सों में यह क्षमता सही नहीं होती, जिससे वह अपनी माँस-पेशियों से सही तरीके से काम नहीं करवा पाते। 

आउटिज़्म में दिमाग में बाहर से सूचना लाने वाले स्नायु सैंसिटिव हो जाते हैं या अधिक काम करते हैं जिसकी वजह से वह किसी को छूना या अधिक पास आना, या शोर या तेज रोशनी पसंद नहीं करते। 

अगर आप को या परिवार में किसी को विकास-विकलांगता है तो इन तीनों तरह की माँस-पेशियों की क्षमता की अलग जाँच करनी चाहिये, क्योंकि इन सब का उपचार करने के लिए भिन्न तरीके हैं और हर व्यक्ति को उसकी ज़रूरत के अनुसार वर्जिश या अन्य उपचार की सलाह दे सकते हैं।

2. सोचना, समझना, गिनना, पढ़ना, आदि: 

दिमाग के अलग-अलग हिस्सों में सोचने-समझने की भी अलग-अलग क्षमताएँ होती हैं। दिमाग का कोई हिस्सा यादाश्त का काम करता है, कोई दूसरा हिस्सा सुनी हुई बात को समझने का काम करता है, एक अन्य हिस्सा पढ़ी हुई बात को समझने का काम करता है, और अन्य हिस्सा गिनती का काम करता है, या अन्य हिस्सा भाषा या तर्क की समझ करता है। इसलिए यह जानना ज़रूरी है कि किस तरह की सोचने-समझने की क्षमता में कमी या कमज़ोरी है। अगर दिमाग का एक बड़ा हिस्सा पूरा काम नहीं कर रहा तो उससे बहुत सी क्षमताओं पर असर पड़ सकता है, जबकि अगर दिमाग का केवल कोई विशेष हिस्सा ठीक से काम नहीं कर रहा तो उसमें केवल किसी एक या दो क्षमताओं पर असर पड़ सकता है। हर व्यक्ति भिन्न होता है, यह जानना कि वह किस बात में कमज़ोर है और किस बात में नॉरमल है, बहुत ज़रूरी है।

अक्सर बच्चे की एक तरह की समझ में कमी को, उसके पूरे दिमाग की कमज़ोरी समझ लेते हैं। 

डाउन सिंड्रोम में यादाश्त या सोचने-समझने की क्षमता में कमजोरी हो सकती है, डिमैंशिया में यादाश्त काम नहीं करती, डिस्लेक्सिया में पढ़ने और लिखने में कठिनाई होती है। जब स्कूल जाने वाले बच्चों में यह विकलांगता हो तो उसे "सीखने की विकलांगता" (learning disability) भी कहते हैं।

 कई तरह की आउटिज़्म में भी समझ की कठिनाई हो सकती है जैसे कि आउसबर्गर सिंड्रोम आउटिज़्म में लोग शब्दों के संकेतात्मक अर्थ समझने में कठिनाई महसूस करते हैं, जैसे कि कोई कहे "अरे कितना बढ़िया गाना गाया, मार डाला रे" में "मार डाला" को सचमुच मारना समझ सकते हैं।

आधुनिक शोध ने दिखाया है कि अगर दिमाग के एक हिस्से में कमी है तो उसका दूसरा हिस्सा उस कमी को कुछ हद तक पूरा कर सकता है, लेकिन उसके लिए पढ़ाने और समझाने के नये तरीके सोचने पड़ सकते हैं। 

3. सामाजिक सम्बंध, भावनाएँ, प्रेम, स्नेह आदि: 

हमारे मन की सारी भावनाएँ भी दिमाग में ही बनती हैं। अगर दिमाग का यह हिस्सा ठीक से काम न करे तो वह लोग अपनी भावनाओं जैसे प्रेम या स्नेह को ठीक से अभिव्यक्त नहीं कर पाते या उनका अपने व्यवहार पर नियंत्रण नहीं रहता।

इस तरह की कठिनाईयाँ अधिकतर आउटिज़्म में दिखती हैं, जिनकी वजह से वह लोग किसी के प्रति प्रेम नहीं जता पाते और मित्र नहीं बना पाते। इन कठिनाईयों की वजह से कई बार विकास-विकालंगता वाले कुछ लोग अपने गलत व्यवहार या अपनी इच्छाओं पर कंट्रोल नहीं कर पाते। 

अगर आप के परिवार में किसी बच्चे या किशोर को विकास-विकालंगता है

अगर आप के परिवार के बच्चे या किशोर को किसी तरह की विकास-विकालंगता है तो यह देखना चाहिये कि उस पर ऊपर बताई गई तीन तरह की क्षमताओं पर क्या असर है:

माँसपेशियों पर क्या असर है? ऊँगलियों के महीन काम पर क्या असर है? ताकत/मेहनत वाली बड़ी माँसपेशियों पर क्या असर है? खाना चबाने, निगलने पर क्या असर है?

सोचने-समझने की शक्ति पर क्या असर है? किस तरह की सोच-समझ पर कितना असर है जैसे कि गणित पर, तर्क समझने पर, सुनी बात पर, पड़ी बात पर, लिखने में, आदि। 

भावनाओं-व्यवहार पर क्या असर है?

केवल यह कहना काफी नहीं है कि विकास-विकालंगता है, दिमाग और शरीर के किस भाग पर उसका क्या असर है, जब तक वह पता नहीं चलेगा, उसकी ठीक से थैरेपी नहीं की जा सकती। अक्सर डॉक्टरों और थैरेपिस्ट को यह समझ नहीं होती या उनके पास समय नहीं होता कि वह हर बात की ठीक से जाँच करे और उसके लिए क्या करना चाहिये यह सलाह आप को धैर्य से समझायें। लेकिन अगर आप को यह समझ है तो आप अपने बच्चे के लिए सही उपचार खोज सकते हैं।

अगर बच्चे की कुछ माँसपेशियों में कोर्डिनेशन या संतुलन की कमी है तो उसकी थैरेपी भिन्न होगी, अगर उन माँसपेशियों में ताकत कम है तो उसकी थैरेपी अलग होगी। सोचिये कि अगर बच्चा लिखा हुआ पढ़ने में नहीं समझ पाता तो क्या उसके लिए सुन कर समझना या चित्रों से समझना अधिक आसान है? अगर उसे कहानी समझने में मुश्किल है तो क्या गणित में भी मुश्किल है? हर बात को अलग-अलग देखना और जाँचना चाहिये।

आधुनिक तकनीकी की सहायता

एक समय था जब हम सोचते थे कि अगर दिमाग के स्नायु-कोष (nerve cell) नष्ट हो गये हैं तो उसका कुछ नहीं हो सकता, वह नष्ट ही रहेंगे। जबकि आज की सोच है कि अगर दिमाग का एक हिस्सा काम नहीं कर रहा तो दिमाग के बाकी के हिस्से उस काम को कुछ हद तक करना सीख-सिखा सकते हैं।

अक्सर बच्चों-बड़ों के मन में लोगों की बातें सुन कर डर बैठ जाता है कि लोग हँसेंगे या बुरा-भला कहेंगे आदि। आप को मन में बैठे उन डरों की खुल कर बात करनी चाहिये और व्यक्ति को परिस्थिति से लड़ने की हिम्मत देनी चाहिये कि किसी के कहने-सोचने की परवाह मत करो। जब नये उपचार करते हैं तो उनका असर होने में समय लगता है, इसलिए हिम्मत बनाये रखना बहुत ज़रूरी है। अगर आप को बच्चा कुछ नहीं कर पा रहा तो उसकी आलोचना नहीं करनी चाहिये, लेकिन अगर वह थोड़ा सा भी सुधार ला रहा है तो उसकी सराहना अवश्य करनी चाहिये।

यह सोचना कि थैरेपी से सारी कठिनाईयाँ ठीक हो जायेंगी, गलत है। कई बार, जो कमी बन गई है, उसमें सब कोशिश के बाद कोई अंतर नहीं आयेगा। लेकिन हर बच्चे के साथ इतनी कोशिश की जानी चाहिये कि उसका जितना विकास हो सकता है, उसे उसका मौका मिले। कई बार लोग सोचते हैं कि अगर बच्चा ठीक से चल नहीं पा रहा या बोल नहीं पा रहा तो बिना कोई जाँच किये सोच लेते हैं कि इसका दिमाग भी कमज़ोर है, वह बच्चे को मौका और सहारा नहीं देते। 

आज दुनिया भर के विकलांग लोग अपने और अपने परिवार वालों के अनुभव व्हाटसएप्प, फेसबुक, यूट्यूब आदि से बाँटते हैं, और आप उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं। दुनिया की कोई भी भाषा हो, यूट्यूब पर आप उसके वीडियो के साथ अपनी भाषा में सबटाईटल के साथ देख सकते हैं। उदाहरण के लिए, अगर आप के बच्चे को सेरिब्रल पाल्सी है और उसे उँगलियों से महीन काम करने में कमजोरी है तो आप यूट्यूब पर इस विषय पर बहुत सारे वीडियो पायेंगे कि उँगलियों को महीन काम करने के लिए कौन सी एक्सरसाइज़ या थैरेपी कैसे करें।

बहुत से थैरेपिस्ट और विशेषज्ञ इस तरह के वीडियो बनाते हैं और बहुत से माता-पिता या विकलांग व्यक्ति अपने अनुभवों के वीडियो बनाते हैं,  जिनसे आप घर बैठे सीख सकते हैं। वीडियो का फायदा है कि आप घर बैठे अपनी भाषा में सीख सकते हो और अपनी कोशिशों को मोबाइल से इंटरनेट पर डाल कर लोगों से सलाह माँग सकते हो।

अंत में

करीब पैंतिस-चालिस साल पहले जब मैंने विकलांग बच्चों के साथ काम करना शुरु किया था, उस समय स्थिति बहुत खराब थी। गाँव और छोटे शहरों में रहने वाले लोगों के पास न सही अस्पताल या उपचार केन्द्र थे, न थैरेपिस्ट और विशेषज्ञ। तब हम ऐसे विषयों पर सरल किताबें बनाते थे, और विभिन्न देशों के गाँवों जा कर वहाँ स्वास्थ्य सेवकों, स्वयंसेवको और परिवार वालों को सिखाते थे कि विकलांग व्यक्ति या बच्चे के लिए क्या करें, कैसे करें। आज अस्पताल, थैरेपिस्ट आदि भी अधिक हैं पर उससे भी महत्वपूर्ण बात है कि लोगों को इस बारे में जानकारी मिलना अधिक आसान हो सकता है और आप एक-दूसरे से भी सीख सकते हो।

आधुनिक तकनीकी, इंटरनेट और कृत्रिम-बुद्धि आदि की मदद से आप खुद इसके बारे में अधिक जानकारी पा कर, अपने लिए और अपने परिवार के लिए बेहतर उपचार खोज सकते हैं। 

बहुत से देशों में विकलांग एसोसियशन बनी हैं जो इस काम में आप को सहारा दे सकती हैं। सरकारों ने भी इस दिशा में नये कानून और सेवाएँ शुरु की हैं। आप को अपने क्षेत्र की विकलांग एसोसिएशन से संबध बनाने चाहिये और अगर आप के क्षेत्र में नहीं हो तो आप को खुद ऐसी एसोसिएशन बनाने का सोचना चाहिये।

अगर इस बारे में आप को कोई प्रश्न या सुझाव हैं तो नीचे टिप्पणी लिखें, मैं उसका उत्तर देने की कोशिश अवश्य करूँगा।

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मंगलवार, अप्रैल 28, 2026

गुवाहाटी जाने की यात्रा

आज से दस साल पहले अप्रैल 2016 में, मैं भारत में दो साल के गुवाहाटी प्रवास के बाद इटली लौटा था।

आज जब उस दसवीं वर्षगाँठ की बात अचानक याद आ गयी तो सोचा कि क्यों न उन दिनों की यादों को ताज़ा किया जाये और उन दिनों पर एक आलेख लिखा जाये। तीन दशकों तक विदेश में रह कर स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने के बाद, जब 2014 में मैंने भारत जाने की सोची थी तब गुवाहाटी जाने का विचार मन में नहीं था, बल्कि कुछ अन्य काम करने की सोची थी।

सोचता था कि कहीं मन का काम नहीं मिलेगा तो किसी मन-पसंद छोटे शहर में जगह को खोज कर वहाँ अपना छोटा सा क्लीनिक खोल लूँगा। लेकिन अपना क्लीनिक खोलने से पहले, मैं कुछ मित्रों के पास रह कर देखना चाहता था कि शायद उनके साथ मन लग जाये, सोचता था कि वह बेहतर होगा क्यों कि मैं अकेले रहने के विचार से डरता था।

हम कुछ सोच कर चलते हैं और नियति हमें किसी ओर दिशा में ले जाती है। आज के इस आलेख में मेरी गुवाहाटी पहुँचने की उस यात्रा के विभिन्न पड़ावों की बाते हैं। 

केसला, मध्यप्रदेश 

सारा जीवन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने के बाद मैंने निश्चय किया था कि 2014 में, अपनी साठवीं वर्षगाँठ पर मैं नौकरी से इस्तीफा दे कर कुछ समय भारत में बिताने जाऊँगा। मेरी वह यात्रा केसला के गाँव से शुरु हुई।

मेरी बात सबसे पहले इटारसी के पास, केसला (मध्यप्रदेश) में ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत समाजवादी विचारधारा वाले सुनील जी से हुई थी। वह वहाँ पर बहुत समय से गरीब लोगों के विकास और मानव अधिकारों के लिए काम कर रहे थे। मैंने सोचा था कि उनके साथ काम करूँगा। जब अप्रैल 2014 में मुझे उनकी अकस्मात मृत्यु का समचार मिला तो गहरा धक्का लगा। मुझे लगा कि उनके बिना शायद वहाँ पर काम करना नहीं हो पायेगा, फ़िर भी भारत पहुँच कर सबसे पहले मैं उनके घर पर केसला ही गया था।

केसला गाँव, मध्यप्रदेश

सुनील जी की पत्नि मॉन्टी (स्मिता) से मेरा दूर का रिश्ता भी है, और हमारी पुरानी जान-पहचान भी थी। केसला में मैं कुछ दिन उनके साथ उनके घर पर रहा, सुनील की के विभिन्न साथियों से मेरी जान-पहचान हुई। लेकिन मुझे लगा कि सुनील जी के अचानक जाने की वजह से वहाँ जो जगह रिक्त हुई थी, उसका घाव उस समय बिल्कुल ताज़ा था। मैंने सोचा कि पता नहीं, उनके बिना, बाकी के उनके साथी उस काम को किस तरह आगे चला पायेंगे?

यह भी सोचा कि वहाँ सुनील जी के न होने से, वहाँ रह कर स्वास्थ्य के क्षेत्र में कुछ नया काम शुरु करना मेरे लिए कठिन होगा। यह सोच कर मैं वहाँ से चल पड़ा।

बिलासपुर, छत्तीसगढ़ 

तब मैं केसला से बिलासपुर गया। वहाँ पर गनियारी में जन स्वास्थ्य सहयोग के अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के बारे में बहुत प्रशंसा सुनी थी। उन्होंने मुझे वहाँ पर कुष्ठ रोग उपचार और विकलांगता कार्यक्रम में काम करने के लिए कहा, उस काम का विचार भी मुझे बहुत अच्छा लगा था।

जन स्वास्थ्य सहयोग संस्था को डॉ. योगेश जैन जैसे आदर्शवादी डॉक्टरों ने शुरु किया था, उनके साथ काम करने का विचार मुझे बहुत आकर्षित कर रहा था। मैं उनके सामुदायिक स्वस्थ्य कर्मचारियों के साथ कुछ गाँवों के क्लिनिक देखने भी गया।

जन स्वास्थ्य सहयोग का मानपुर गाँव में क्लिनिक, छत्तीसगढ़

लेकिन एक दिक्कत थी, कि उनके होस्टल में जगह नहीं थी, वहाँ काम करने का मतलब था कि मुझे पास के किसी गाँव में अलग घर ले कर रहना पड़ता। मैं अकेला रहने के विचार से डर रहा था। दो-तीन दिन वहाँ रहा, बहुत सोचा, पर मुझे लगा कि मैं वहाँ गाँव में अकेला नहीं रह पाऊँगा। आखिर में मैं वहाँ से निकल पड़ा।

जीवन में कभी-कभी ऐसे अवसर आते हैं जब आप कुछ करने से रुक जाते हैं लेकिन उसके निशान आप के मन में रह जाते हैं। उसके बाद सालों तक आप अपने आप से पूछते हैं कि अगर मैंने वह रास्ता चुन लिया होता तो मेरा जीवन कैसा होता? गनियारी के जन स्वास्थ्य सहयोग में काम करने के बारे में मुझे ऐसा ही लगता रहा है, दुख होता है कि मैंने वहाँ पर अकेले रहने की कोशिश क्यों नहीं की।  

लखनऊ, उत्तर प्रदेश

बिलासपुर से मैं लखनऊ गया जहाँ पर मेरी पुरानी मित्र डॉ. ब्रिजिता का सैंट मेरी क्लीनिक, अस्पताल और नर्सिन्ग कॉलेज था। 

सैंट मेरी की नर्सिन्ग की छात्राएँ, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

अस्पताल और नर्सिन्ग स्कूल के काम के साथ-साथ डॉ. ब्रिजिता आसपास के जिलों में बहुत से ग्रामीण क्षेत्रों में भी सामुदायिक स्वास्थ्य तथा विकलाँग जनों के लिए कार्यक्रम चला रही थीं। मैं उनके पास करीब एक मास रुका।

उनके साथ ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यक्रम में काम करने का विचार था लेकिन भीषण गर्मी में गाँवों में घूमने के एक-दो अनुभवों के बाद मैं समझ गया कि मैं गाँवों के उस कठिन वातावरण में अधिक दिन तक नहीं रह पाऊँगा। इस तरह से मैंने डॉ. ब्रिजिता से भी विदा ली।

मनाली, हिमाचल प्रदेश

मेरे एक अन्य मित्र के पिता मनाली के क्षेत्र में एक स्वयंसेवी संस्था चला रहे थे, जहाँ वह सामुदायिक विकास के साथ-साथ, स्वास्थ्य कर्मियों के साथ भी काम करते थे। लखनऊ के बाद मैं कुछ दिन उनके पास रहने गया। उनकी संस्था का डॉक्टर काम छोड कर चला गया था, उन्हें एक डॉक्टर की आवश्यकता थी। 

उनकी संस्था का अधिकाँश काम मनाली शहर में था पर उनका घर शहर के बाहर, कुछ दूर जा कर था। उनके घर के साथ उनका एक अन्य फ्लैट भी था, उन्होंने कहा कि अगर मैं उनके साथ काम करूँगा तो उस फ्लैट में रह सकता हूँ।

वहाँ बाकी सब कुछ बढ़िया था, लेकिन पहाड़ों के बीच में, सर्दियों में ठंड और हिमपात के साथ, शहर के बाहर उस बहुत सुंदर लेकिन सुनसान जगह में रहने के विचार से मुझे डर लगा। इतनी सुंदर जगह पर रहने का सोच कर अच्छा भी लगता था, पर शहर से बिल्कुल बाहर, सुनसान जगह का डर भी था।

शुरु गाँव, मनाली, हिमाचल प्रदेश

उन्हीं दिनों में मुझे एक अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रैंस के लिए आयरलैंड जाना था, सोचा कि वहाँ से लौट कर ही निर्णय लूँगा कि मनाली में काम स्वीकारूँ या नहीं।

उन दिनों में मन में थोड़ी सी मायूसी भी थी कि अभी तक कोई ऐसी जगह नहीं मिली थी जहाँ मुझे पूरे दिल से लगे कि हाँ, मैं यहाँ रह कर, इस जगह में काम करना चाहता हूँ। हर जगह की कुछ बातें अच्छी लगती थीं, कुछ नहीं।

सोचा कि शायद मुझे अपना क्लिनिक खोलने के लिए अपनी पसंद का छोटा गाँव खोजना पड़ेगा, जो किसी शहर से बहुत दूर नहीं हो, और जहाँ अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बहुत दूर न हो। ऐसी कोई जगह सचमुच हो सकती है, इसका मुझे शक था।

गुवाहाटी, असम

आयरलैंड और इटली में कुछ दिन बिता कर मैं वापस भारत लौटा तो विश्व स्वास्थ्य संस्थान के मेरे पुराने मित्र चपल खासनबिस के माध्यम से मुझे बँगलौर की स्वयंसेवी संस्था "मोबिलिटी इंडिया" के लिए गुवाहाटी में विकलांग जनों के लिए नया कार्यक्रम प्रारम्भ करने के काम का आफर मिला।

मैं कुछ साल पहले, एक अन्य स्वास्थ्य कार्यक्रम के सिलसिले में एक बार पहले गुवाहाटी गया था और वहाँ करीब दस दिन रहा था, इसलिए वह शहर मेरे लिए अनजाना नहीं था।  

मैं गुवाहटी पहुँचा, कुछ मित्रों के माध्यम से मैंने उज़ान बाज़ार क्षेत्र के एक होटल में कमरा बुक किया था। मेरा विचार था कि वहाँ पर सप्ताह-दस दिन रुक कर, वहाँ की स्वास्थ्य के क्षेत्र में सक्रिय विभिन्न सरकारी व स्वयंसेवी संस्थाओं से मिलूँगा, और विकलांग जनों के लिए नया कार्यक्रम शुरु हो सकता है या नहीं, इसकी बात समझने की कोशिश करूँगा।

पहले दिन सुबह मुझे एक संस्था के दफ्तर में किसी से मिलने जाना था, होटल से निकला और कुछ दूर पर मेरी मुलाकात बतखों के एक दल से हो गयी। सड़क के किनारे पर वह बतखें एक कतार में चल रही थीं, सुबह का दफ्तर जाने वाला सारा ट्रैफिक, उनके पास धीमा करके जा रहा था ताकि उन्हें दिक्कत नहीं हो। पता चला कि वह पास के उग्रतारा मंदिर की बतखें हैं।

उग्रतारा मंदिर की बतखें, गुवाहाटी, असम

पता नहीं क्यों, उन बतखों को देख कर मुझे लगा मानो नियति ने मुझे संदेश भेजा हो कि इसी शहर में मुझे रुकना है, सोचा कि जिस शहर के लोग बतखों के सड़क पर चलने का ध्यान रख सकते हैं, वहाँ रहना अच्छा होगा।

अंत में

जिस दिन मैं गुवाहाटी में उग्रतारा की बतखों से मिला था, उसी दिन मेरी मुलाकात फादर पॉल से भी हुई, जिनके साथ मैं बहुत समय तक रहा और जो असम के उन दिनों में मेरे सबसे करीबी मित्र बने।

यही मेरी किस्मत में लिखा था कि मैं गुवाहाटी में रहूँ और वहाँ बहुत से लोगों से मित्रता बने और उत्तर-पूर्वी भारत के क्षेत्र को जानू और समझूँ। 

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सोमवार, दिसंबर 08, 2025

डायबिटीज़ का डर और वज़न घटाने की यात्रा

पहली बार मेरा वज़न बढ़ा जब मैं तीस-पैंतिस साल का था। करीब दस किलो बढ़ा फ़िर वहीं पर स्टेबल हो गया। उसके बाद करीब बीस-पच्चीस सालों तक मेरा वज़न एक ही जगह टिका हुआ था, और खून-पिशाब आदि के सब टैस्ट सही चल रहे थे। पाँच साल पहले जब मैं 66-67 साल का हुआ, मेरा वज़न फ़िर से बढ़ने लगा, एक साल में ही दस-बारह किलो और बढ़ गया, सब कपड़े नये लेने पड़े।

चार साल पहले ब्लड टैस्ट कराया तो उसमें सुबह का भूखे पेट वाला ब्लड शुगर बढ़ा हुआ आया। पहले यह मात्रा 90-95 मि.ग्र. से अधिक नहीं आती थी, उस बार 110 आयी।

तब सोचा कि ब्लड शुगर की बेहतर जाँच करने वाला एचबीएवन (HbA1) टैस्ट करवाना चाहिये। वह करवाया तो 6.1 आया, यानि डायबिटीज़ होने का खतरा था। नॉर्मल लोगों में यह टैस्ट 5.5 आता है। जब यह 5.6 से 6.4 तक हो तो इसे प्री-डायबिटीज़ यानि शुगर की बीमारी होने के खतरे का स्तर मानते हैं और खाने पर कन्ट्रोल करने के लिए कहते हैं।। अगर 6.5 या उससे अधिक हो तो डायबिटीज़ की दवा लेनी चाहिये।

इसलिए मैंने तब चीनी और मीठी चीज़ें खाना कम कर दीं। छह महीने बाद यह टैस्ट दोबारा कराया तो घटने के बजाय शुगर बढ़ गयी थी, यह 6.3 आया। मेरी डॉक्टर बोली कि स्थिति तेज़ी से बिगड़ रही है, मुझे दवा लेना शुरु कर देना चाहिये, लेकिन मैंने उन्हें कहा कि छह महीने और प्रतीक्षा कर लेते हैं। इसके बाद मैंने तुरंत वज़न कम करने के नये प्रयास किये।

पिछले ढाई-तीन सालों में मैने बारह किलो वज़न कम किया है और चार महीने पहले जब मैंने टैस्ट कराये तो मेरा ब्लड शुगर 91 और एचबीएवन 5.7 आये। इसके अतिरिक्त जोड़ो के दर्द तथा अन्य तकलीफों में भी राहत मिली है।

आज की इस पोस्ट में मैं अपनी वज़न और ब्लड शुगर घटाने की यात्रा की बात करना चाहता हूँ।

 

डायबिटीज़ टाईप 1 एवं 2

डायबिटीज़ की बीमारी मुख्यत: दो तरह की होती है। एक कम उम्र में होने वाली डायबीटीज़ होती है जिसमें लोगों की पैनक्रियास ग्रंथी चीनी का पाचन करने वाले हॉरमोन इन्सुलिन (insulin) को बनाना बंद कर देती है। क्योंकि उनके शरीर में यह हॉरमोन होता ही नहीं, तो उनसे चीनी नहीं पचाई जाती और खून में उसकी मात्रा बढ़ जाती है। उन्हें नियमित इन्सुलिन के इन्जैक्शन लगवाने पड़ते हैं (अभी तक गोली की तरह लेने वाली इन्सुलिन नहीं बनी है, उसके इन्जैक्शन ही लगवाने पड़ते हैं)। इसे टाईप 1 की डायबीटीज़ कहते है।

दूसरी तरह की डायबीटीज़, अधिकतर अधेड़ उम्र के बाद होती है, विषेशकर उन लोगों में जिनका वज़न बढ़ा हुआ होता है। उनके शरीर में इन्सुलिन सामान्य या अधिक बनती है लेकिन उसका शरीर पर असर रुक जाता है या कम हो जाता है, जिससे वह हॉरमोन उनके शरीर में ठीक से काम नहीं कर पाता। यह टाईप 2 की डायबीटीज़ है। दुनिया में और विषेशकर भारत में पिछले कुछ दशकों में इस तरह की डायबीटीज़ बहुत अधिक बढ़ी है। इसमें शरीर में इन्सुलिन है लेकिन वह काम नहीं करती, इसलिए वह चीनी नहीं पचा पाते और उसकी खून में मात्रा बढ़ जाती है, जिसके लिए दवा की गोलियाँ मिलती हैं।

जब खून में शुगर बढ़ जाती है तो उससे खून की रगें बंद होने का खतरा होता है जिससे हृदय, गुर्दों, आँखों, पैरों आदि में रगें बंद होने से शरीर के अंग नष्ट हो सकते हैं। इस आलेख में मैं केवल दूसरी तरह की डायबीटीज़ की बात कर रहा हूँ।

ब्लड शुगर तथा एचबीएवन टैस्टों में अंतर

रक्त में चीनी की मात्रा मापने को ब्लड शुगर टैस्ट कहते हैं। यह कई तरीकों से करते हैं, सबसे आम तरीका है सारी रात भूखा रहने के बाद सुबह-सुबह भूखे पेट के समय रक्त की चीनी को मापा जाये। यह 85-95 के आसपास होनी चाहिये। अगर यह 120 से अधिक आये तो इसका मतलब है आप को डायबीटीज़ की बीमारी हो सकती है। जब खून में चीनी की मात्रा अधिक आती है तो अक्सर उन व्यक्तियों के पिशाब में भी शुगर मिलती है।

एचबीएवन (HbA1) टैस्ट रक्त के लाल कोषों में होने वाले हिमोग्लोबिन से जुड़ी हुई चीनी को मापता है। यह टैस्ट उस समय खून में कितनी शुगर है उसे नहीं देखता, बल्कि यह देखता है कि पिछले तीन हफ्तों में  खून में चीनी का औसत स्तर कितना रहा और वह मात्रा कितनी बार बढ़ी या घटी। यानि यह टैस्ट केवल एक समय में रक्त में चीनी है को नहीं देखता, बल्कि पिछले तीन हप्तों की रक्त की चीनी किस स्तर पर रही है, उस पर निर्भर करता है। यह डायबीटीज़ का बेहतर टैस्ट माना जाता है। नॉर्मल टैस्ट 5.5 या उससे कम होता है।

मेरे शुरु के प्रयास

जब मुझे पता चला कि मेरा एचबीएवन बढ़ा कर 6.1 हो गया है तो पहले मैंने नियमित वर्ज़िश करना शुरु किया और रात को खाना खा कर एक घंटे की सैर करने लगा। खाने पर भी बहुत कंट्रोल किया, खाने की मात्रा कम की, साथ में चीनी, घी-तेल वाली चीज़ें बिल्कुल कम कर दीं। यह छह महीने किया और वह समय बहुत मुश्किल से कटा। सारा समय मेरा ध्यान खाने पर होता था और मीठी चीज़ें, बिस्कुट, चिप्स वगैरा खाने का बहुत मन करता था। इतनी मेहनत के बाद जब ब्लड टैस्ट कराया तो एचबीएवन 6.3 आया, यानि मेरी शुगर घटने के बजाय बढ़ गई थी।

तब मैंने इसके बारे में कुछ किताबें पढ़ीं। कई विशेषज्ञ इंटरमिटैंट फास्टिन्ग की सलाह दे रहे थे, यानि जितना भी खाना हो उसे दिन में छह-आठ घंटे के समय के भीतर खाईये, उस समय के बाहर कुछ नहीं खाना। मैंने भी यही रास्ता ट्राई करने का फैसला किया।

इंटरमिटैंट फास्टिन्ग या प्रतिदिन कुछ घंटों का व्रत 

इंटरमिटैंट फास्टिन्ग के विशेषज्ञ कहते हैं कि हर रोज़ कुछ घंटे का व्रत रखिये। इसके लिए वह चार सुझाव देते हैं:

1. उनका पहला सुझाव है कि रात को जब हम सोते हैं, तो हमारा सात-आठ घंटों का व्रत अपनेआप हो जाता है। वह कहते हैं कि बजाय सुबह-सुबह नाश्ता करने के, हमें उसी व्रत को कुछ घंटे और बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिये। यानि आप सुबह नाश्ता करने की जगह पर दस-ग्यारह बजे नाश्ता कीजिये। उनके अनुसार, केवल इतने व्रत से शरीर की इन्सुलिन बेहतर काम करने लगती है और ब्लड शुगर कम होने लगती है। वह कहते हैं कि अगर आप को सुबह जल्दी चाय-कॉफी की आदत है और उसके बिना नहीं रह सकते तो आप उन्हें बिना चीनी और दूध के पीजिये।

व्रत में पानी, तथा बिना चीनी और दूध की चाय-कॉफ़ी पी सकते हैं, लेकिन और किसी चीज़ का एक छोटा सा दाना भी नहीं खाना चाहिये। कुछ ज़रा सा भी खाओ, चाहे वह नींबू की दो बँदें ही क्यों न हों, हमारा शरीर सोचता है खाना आने वाला है और इन्सुलिन बनाना शुरु कर देता है, जबकि व्रत रखने का उद्देश्य है कि 14-16 घंटो तक हमारे शरीर को इन्सुलिन बिल्कुल भी न बनानी पड़े।    

2. अगर हम शुगर के साथ वज़न भी घटाना चाहते हैं तो उनका दूसरा सुझाव है कि एक समय के खाने से अन्न को बिल्कुल निकाल दीजिये या जितना हो सके कम कर दीजिये, उस समय केवल सब्जियाँ और प्रोटीन-प्रधान भोजन (जैसे कि माँस, मछली, अंडे, दाल, राजमाँ, लोभिया, साग, दूध, दही, अखरोट, बादाम, मूँगफली आदि को प्रोटीन प्रधान भोजन मानते हैं) जैसी चीज़ें खाईये। फ़ल खा सकते हैं लेकिन कम और अधिक मीठे फ़ल जैसे कि केले, किवी, संतरे आदि कम या न खायें।

3. शरीर को स्वस्थ करने के लिए हर हफ्ते कम से कम तीस या अधिक तरह की विभिन्न दालें, सब्जियाँ, फल, ड्राई फ्रूट, मसाले आदि खाईये। यानि हर रोज़ खाना बदल-बदल कर खाईये।

4. नियमित व्यायाम कीजिये जैसे कि खाने के बाद सैर करना, वर्जिश करना आदि।

मेरी प्रारम्भ की इंटरमिटैंट फास्टिन्ग

मैंने सोचा कि मैं सुबह नाश्ता करना बिल्कुल बंद कर दूँगा। केवल दोपहर में बारह बजे से शाम के साढ़े सात बजे के बीच में खाऊँगा। लेकिन बिना चाय-कॉफ़ी के सुबह मुश्किल लगती थी, सोचा कि सुबह केवल बिना चीनी और दूध की कॉफ़ी पीयूँगा।

दोपहर के खाने के लिए मैंने केवल कच्ची सब्जियाँ और फ़ल चुने। बारह बजते ही मैं गाजर, मूली, खीरा, शिमला मिर्च, टमाटर, ओलिव, बंद गोभी, शलजम, अवोकादो, सेब, आदि मिला कर मैं पूरी प्लेट भर कर के खाता था, ताकि पेट भर जाये, मुझे यह नहीं लगे कि मैं भूखा हूँ। चूँकि मेरी एचबीएवन बढ़ी हुई थी, मैंने दोपहर को अवोकादो को छोड़ कर अन्य फ़ल कम या बिल्कुल नहीं खाये।

दोपहर में तीन बजे मैं एक मुट्ठी काजू, बादाम आदि के साथ दूध वाली चाय लेता था,और शाम को सात बजे नॉर्मल पूरा खाना खाता था। इटली में वाईन हर जगह मिलती है, मैं रात के खाने के साथ आधा गिलास लाल वाईन का भी लेता था। 

साथ ही मैंने केक, मिठाई, बिस्किट, आईसक्रीम आदि बंद कर दिये, उन्हें कभी-कभार, यानि हफ्ते-दस दिन में एक बार सीमित मात्रा में खाता था।

शाम को खाने के बाद सैर तो पहले से कर रहा था, अब स्टैप्पर, वर्जिश वाले इलास्टिक आदि खरीदे और हफ्ते में चार बार, सुबह भूखे पेट व्यायाम भी करने लगा। मेरे एक मित्र जो ओर्थोपीडिक्स के सर्जन हैं, वह अपने व्यक्तिगत अनुभव से कहते हैं कि हर सुबह दस बार सूर्यनमस्कार करना सबसे अच्छा व्यायाम है, लेकिन मुझसे सूर्यनमस्कार पूरा नहीं किया जाता।

इससे मेरा वज़न घटने लगा, हर महीने में एक-डेढ़ किलो कम होने लगा। करीब सात-आठ महीनों में बारह किलो घट गया और शुगर के टैस्ट भी ठीक हो गये।

यह सब करना शुरु में बहुत मुश्किल लगा। दोपहर बारह बजे तक खाने की प्रतीक्षा करना मेरे लिए सबसे कठिन था। कभी खाने में बारह की बजाय साढ़े बारह या एक बज जाते तो मैं चिड़चिड़ा और झगड़ालू हो जाता। रात को सोते समय मुझे खाने के सपने आते थे। पहला महीना सबसे कठिन था, उसके बाद धीरे-धीरे आदत हो गयी।

और आज

एक बार खाने की आदत बदली तो मैं दोबारा अपने पुराने ढर्रे पर नहीं लौटा हूँ। आज भी मैं हर रोज़ कुछ घंटों का व्रत रखता हूँ, आम तौर पर सुबह दस बजे से रात आठ बजे के बीच में खाता हूँ, यानि चौदह घंटे का व्रत होता है। कई बार व्यस्त होता हूँ तो बारह बजे तक भी कुछ नहीं खाता, अब उसमें कुछ कठिनाई नहीं लगती।

दोपहर का खाना अब भी सब्जियों का है, लेकिन अब उनके साथ अधिक फ़ल भी खाता हूँ और साथ में दो अंडे भी। रात को नॉर्मल खाना खाता हूँ।

लेकिन खाने के इस बदलाव ने मेरी इच्छाओं को भी बदल दिया है, अब मुझे बाज़ारी खाना अच्छा नहीं लगता। लेकिन जब पार्टी हो या रैस्टोरैंट जायें तॊ मैं सब कुछ खाता हूँ। बीच में भारत गया था, तब पूरी-भाजी, छोले-भटूरे, नान-चिकन आदि खाये लेकिन उन्हें खाने में पहले जैसा आनंद नहीं आया। सत्तू की बर्फी नियमित खायी, वह मुझे अच्छी भी लगी। 

वैसे तो अब मीठा कम ही खाता हूँ लेकिन रात को अक्सर दही में शक्कर, तिल, चिया, आदि मिला कर खाना मुझे अच्छा लगता है। मैंने व्यायाम और सैर भी नहीं छोड़े।

वज़न और शुगर कम होने के साथ मुझे लगता है मेरे जोड़ों के दर्द और सामान्य स्वास्थ्य को भी इस बदलाव से फायदा हुआ है। हालाँकि वज़न कम होने के बाद मैंने खाना बढ़ा दिया है, लेकिन एक बार जो बारह किलो वज़न कम हुआ वह अभी तक नहीं लौटा है।

***   

शुक्रवार, जून 28, 2024

आयुर्वेद और वैज्ञानिक शोध

आयुर्वेद में सदियों के अनुभवों से निर्मित भारतीय मानव-चिकित्सा का ज्ञान और समझ संचित है। इस ज्ञान में एक ओर से जड़ी-बूटियों से ले कर हर तरह के प्राकृतिक पदार्थों से जुड़ी जानकारी है। आयुर्वेद में मानव शरीर कैसे बना है, उसके अंगों, क्रियाओं और रोगोत्पत्ति व रोग-उपचार की प्राचीन सोच-समझ भी है। कुछ बातों में आयुर्वेद के विचार आज के वैज्ञानिक विचारों से भिन्न है, इसलिए आधुनिक अनुसंधानों से इस समझ के प्रमाण खोजने की आवश्यकता है।

अगर वैज्ञानिक अनुसंधान के बाद आयुर्वेद की कुछ बातों के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते तो उन्हें बदलना चाहिये या नहीं, और कैसे बदलना चाहिए, यह बहस व निर्णय आयुर्वेद के विशेषज्ञ ही ले सकते हैं।

पिछली कुछ सदियों में आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान की सोच तथा पद्धति विकसित हुई है जिसमें चिकित्सा के विषय पर वैज्ञानिक शोध व अनुसंधान कैसे किया जाना चाहिए की बात भी है। आज दुनिया में कोई भी चिकित्सा परम्परा हो, उसे इसी वैज्ञानिक शोध की कसौटी पर जाँचा जाता है।

यह आलेख आयुर्वेद और वैज्ञानिक अनुसंधान के विषय पर है।

International Meetingon Traditional Medcine in Asia, Bangalore, India, 2006

मैं, आयुर्वेद और शोध

मैं एलोपैथी का डॉक्टर हूँ और मुझे वैज्ञानिक शोध के क्षेत्र में अनुभव है। करीब बीस साल पहले, मैंने "एशिया की पाराम्परिक चिकित्सा पद्धितियों" के विषय पर बंगलौर में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सभा में हिस्सा लिया था, जिसमें मेरा आयुर्वेद से परिचय हुआ। उस समय मुझे बंगलौर में एक आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज जाने का मौका भी मिला था। इस आलेख की सभी तस्वीरें  २००६ की उसी सभा तथा वहाँ के आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज से हैं।

पिछले कुछ वर्षों में मुझे केरल में आयुर्वेदिक चिकित्सा करवाने का सकारात्मक अनुभव हुए थे। इसके साथ मुझे कुछ अन्य आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों में जाने और वहाँ के शिक्षकों से बातचीत का मौका भी मिला। उससे मुझे लगा कि बहुत से आयुर्वेदिक चिकित्सकों तथा प्रोफैसरों में चिकित्सा से जुड़े वैज्ञानिक शोध-पद्धितियों की समझ कुछ सीमित है। मेरे विचार में वैज्ञानिक शोध एक महत्वपूर्ण विषय है और आयुर्वेद के मेडिकल कॉलिजों को इस विषय में पढ़ने व सीखने की बहुत आवश्यकता है।

International Meetingon Traditional Medcine in Asia, Bangalore, India, 2006

जब हमें किसी उपचार से अच्छा अनुभव है, तो वैज्ञानिक शोध क्यों?

मेरे विचार में आयुर्वेदिक उपचारों पर वैज्ञानिक शोध करने के तीन प्रमुख कारण हैं -

(१) जब कोई दवा या उपचार रोगियों को राहत देते हैं, तब शोध से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि वे उपचार कितने प्रतिशत मरीजों को राहत देते हैं? वह राहत कितने समय तक रहती है? वे उपचार किस तरह से या क्यों सफल होते हैं? क्या उस उपचार के रोगियों पर कुछ अवांछनीय या नकारात्मक प्रभाव भी हैं? इस तरह के प्रश्नों के उत्तर खोजने से उन उपचारों को बेहतर किया जा सकता है।

(२) चिकित्सा-शोध ने दिखाया है कि जब रोगियों को डॉक्टर पर और उसके इलाज पर भरोसा होता है तो केवल यह विश्वास ही कुछ प्रतिशत मरीज़ों को ठीक कर देता है, इसे प्लेसेबो प्रभाव (placebo) कहते हैं। प्लेसबो प्रभाव को दवा या उपचार के प्रभाव से अलग समझना आवश्यक है। वैज्ञानिक शोध से हम यह समझ सकते हैं कि कितने लोग आयुर्वेद उपचार से इस तरह के विश्वास-प्रभाव की वजह से ठीक होते हैं, और कितने लोग सचमुच आयुर्वेद की दवाओं या उपचार से।

(३) एलोपैथी वाले कुछ चिकित्सक सोचते हैं कि आयुर्वेद सचमुच का ज्ञान नहीं है, यह जादू-टोना या अंधविश्वास है। आयुर्वेद पर वैज्ञानिक शोध से इस तरह के आरोपों से लड़ा जा सकता है।

International Meetingon Traditional Medcine in Asia, Bangalore, India, 2006

आयुर्वेद चिकित्सा का विकास कई सौ या हजारों वर्षों के अनुभव का नतीजा है, लेकिन विज्ञान कभी रुकता नहीं है, आगे बढ़ता रहता है, इसलिए आयुर्वेद को भविष्य में किस ओर जाना चाहिये, इसे समझने के लिए शोधकार्य चलता रहना चाहिये। आयुर्वेद में प्राचीन ज्ञान को बहुत महत्व दिया जाता है, लेकिन मेरे विचार में प्राचीन ज्ञान के साथ नया ज्ञान जोड़ना भी महत्वपूर्ण है। 

पश्चिमी वैज्ञानिक, चिकित्सक एवं शोधकर्ता स्वीकारते हैं कि आयुर्वेद जैसी प्राचीन परम्पराओं में वनस्पति जगत से जुड़ा गहरा ज्ञान है। जैसे कि किस पत्ते या जड़ आदि से किस रोग का उपचार हो सकता है। इसलिए वे लोग अक्सर इस जानकारी से उन पौधों से दवा खोजने और उसके रसायन पदार्थों को अलग करने के शोध करते हैं, लेकिन इन्हें आयुर्वेद-शोध नहीं कह सकते, क्योंकि वह लोग आयुर्वेद की सोच के अनुसार कुछ नहीं करना चाहते, बल्कि वह केवल अपनी पश्चिमी वैज्ञानिक सोच से नई दवाओं की खोज में लगे हैं।

वैज्ञानिक शोध कैसे करते हैं?

अनुसंधान करने का अर्थ है वैज्ञानिक मापदंडों के साथ निष्पक्ष प्रयोग या परीक्षण करना। इसे वैज्ञानिक शोध तभी माना जा सकता है अगर निम्नलिखित तीनों बातों को पूरा किया जाये - 

(१) शोध-प्रयोगों का लिखित प्रोटोकॉल होना चाहिए, जिसे अनुसंधान से पहले तैयार किया जाना चाहिए, और इसे एक वैज्ञानिक शोध कमेटी से मंजूरी मिलनी चाहिए। वैज्ञानिक शोध कमेटी के सदस्यों तथा शोध करने वाले के बीच में कोई व्यक्तिगत सम्बंध नहीं होना चाहिए, ताकि वह निष्पक्ष निर्णय लें। प्रोटोकॉल की मंजूरी के बाद, पूरे अनुसंधान को उस प्रोटोकॉल के अनुसार किया जाना चाहिए जिसमें उसके हर कदम को निष्पक्ष तरीके से देख कर जाँचा और मापा जाना चाहिये, और इसकी लिखित रिपोर्ट तैयार की जानी चाहिए।

(२) उस अनुसंधान के सभी सकारात्मक व नकारात्मक नतीजों को सांख्यकी (statistics) के मानदंडों से परखना चाहिए।

(३) उस अनुसंधान के हर चरण के प्रमाणों को सही तरीके से संजो कर रखना चाहिए, ताकि कोई भी वैज्ञानिक उस सारी प्रक्रिया और उसके हर कदम की स्वतंत्र जाँच कर सके।

इन तीनों बातों में से एक भी बात अधूरी हो, तो उस वैज्ञानिक शोध को विश्वास्नीय नहीं माना जा सकता। वैज्ञानिक शोधों की रिपोर्टों को ऐसी पत्रिकाओं में छापते हैं जिनमें छापने से पहले अन्य वैज्ञानिक आप के शोध को जाँच-परख सकते हैं। इन्हें पियर रिव्यू (Peer reviewed) यानि अन्य वैज्ञानिकों द्वारा जाँचे आलेखों की पत्रिकाएँ कहते हैं।

आयुर्वेद की वैज्ञानिक पत्रिकाएँ 

अगर हम आयुर्वेद से जुड़े विषयों पर शोध करना चाहते हैं तो सबसे पहला प्रश्न है कि क्या भारत में ऐसी पियर-रिव्यू वाली आयुर्वेद चिकित्सा की पत्रिकाएँ हैं और अगर हैं तो किस तरह की वैज्ञानिक क्षमता वाले लोग उसके साथ जुड़े हैं जो उसमें छपने वाले आलेखों की जाँच करते हैं?

इस विषय पर इंटरनेट पर खोज करने से मुझे निम्नलिखित आयुर्वेद की वैज्ञानिक पत्रिकाएँ मिलीं:

हिंदी में आयुर्वेदीक-अनुसंधान की भी शायद कुछ पत्रिकाएँ छपती हैं, लेकिन इनके पीडीएफ अंक इंटरनेट पर कठिनाई से मिलते हैं और इनके बारे में जानकारी सुलभ नहीं है। जैसे कि "आयुर्वेद एवं सिद्ध अनुसंधान पत्रिका", जिसकी वेबसाईट पुरानी शैली की है और जिसके कुछ आलेख मुझे अंग्रेजी में दिखे।

आयुर्वेद-अनुसंधान के विषय पर कुछ कार्यशाला आयोजित करने की भी छिटपुट खबरें मिलती हैं लेकिन जिस स्तर पर यह काम होना चाहिये, उससे मुझे यह बहुत कम लगता है।

अगर उपरोक्त जानकारी के अतिरिक्त अगर आयुर्वेद-शोध-अनुसंधान के विषय पर अन्य वैज्ञानिक पत्रिकाएँ छपती हैं हैं तो कृपया नीचे टिप्पणी करके उनकी सूचना दीजिये। इन विषयों पर अगर भारतीय भाषाओं में छपने वाली अन्य पत्रिकाएँ हैं तो उनकी जानकारी भी नीचे टिप्पणियों में दीजिये।

आयुर्वेदिक-शोधों में कमियाँ

मैंने उपरोक्त पत्रिकाओं में छपने वाले शोधों के कुछ आलेख पढ़े। मुझे उनमें कुछ कमियाँ दिखीं, जैसे कि:

  • अक्सर लेखक ऐसे शब्द या परिभाषाएँ उपयोग में लाते हैं जिनके अर्थ स्पष्ट नहीं हैं। जैसे कि एक आलेख में आयुर्वेद के मूलभूत मूल्यों की बात थी लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि वह मूलभूत मूल्य कौन से थे और कैसे निर्धारित किये गये थे? आयुर्वेद में वात, कफ, पित्त आदि शब्दों का भी प्रयोग होता है लेकिन उनके अर्थ भी मुझे स्पष्ट नहीं लगे। जब इस तरह के शब्द या परिभाषाएँ उपयोग करते हैं तो यह समझना आवश्यक है कि आयुर्वेद से जुड़े कितने प्रतिशत लोग उन मूल्यों या अर्थों से सहमत हैं? मुझे यह कमी आयुर्वेद से सम्बंधित बहुत से विचारों, शब्दों, अर्थों और मूल्यों के बारे में महसूस होती है। जब तक हर एक शब्द या विचार की सर्वसम्मत या बहुमत-स्वीकृत स्पष्ट परिभाषा नहीं होगी, तब तक उन पर वैज्ञानिक शोध करना कठिन ही नहीं, असम्भव होगा। आयुर्वेद-विशेषज्ञों को इस दिशा में सबसे पहले निर्णय लेने चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञों का डेल्फी सर्वे करके परिभाषाओं को स्पष्ट करना चाहिये।   
  • आयुर्वेद की नींव संस्कृत के ग्रंथों पर टिकी है, अक्सर भाषा बदलने से अंग्रेज़ी में उन संस्कृत शब्दों के सही अर्थ खोजना कठिन काम हो जाता है, इसलिए आयुर्वेद की संस्कृत या भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक पत्रिकाएँ उपलब्ध होना बहुत महत्वपूर्ण और आवश्यक है। बहुत खोजने पर इंटरनेट पर संस्कृत, हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में आयुर्वेदी-शोध की वैज्ञानिक पत्रिका नहीं मिली, यह मुझे बहुत गम्भीर कमी लगती है। मेरे विचार में असली शोध भारतीय भाषाओं में होना चाहिये, उसके बाद उनका अंग्रेज़ी में अनुवाद करना चाहिये ताकि शोध से जुड़े शब्दों को  उनकी सही परिभाषा में समझा जा सके।
  • मैंने ऊपर दी गई पत्रिकाओं में छपे कुछ आलेख देखे, जिन्हें पूर्ण रुप से वैज्ञानिक शोध नहीं कह सकते। जैसा मैंने ऊपर लिखा, चिकित्सा सम्बंधी शोध-प्रोटोकॉल कैसे तैयार किये जाते हैं, लगता है कि इसकी जानकारी कम है और अधिक लोगों तक पहुँचनी चाहिये। इस विषय पर आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलिजों द्वारा प्रोफैसरों, स्नातकों तथा विद्यार्थियों के लिए कार्यशालाओं का आयोजन होना चाहिये।

चीन में उनकी परम्परागत चिकित्सा (एकपंक्चर, आदि) पर बहुत शोध हुआ है। यह सब शोध और वैज्ञानिक शोध वे लोग चीनी भाषा में करते हैं और चीनी भाषा में वैज्ञानिक शोध की बहुत सी पत्रिकाएँ हैं। लेकिन यह बात नहीं है कि वह बाकी दुनिया में होने वाले शोधों से अनभिज्ञय हैं। वहाँ पर अंग्रेजी, फ्राँसिसी, स्पेनी आदि भाषाओ में छपने वाले महत्वपूर्ण शोधों के चीनी अनुवाद किये हुए सार या पूरे आलेख छापने वाली चीनी पत्रिकाएँ भी हैं, ताकि स्थानीय शोधकर्ताओं को खबर रहे कि दुनिया में क्या हो रहा है। आयुर्वेद से जुड़े शोध के लिए भारतीय भाषाओ में ऐसी पत्रिकाओं की आवश्यकता है क्योंकि इस चिकित्सा पद्धिति के मूल विचार संस्कृत में हैं और उन्हें अंग्रेजी में अनुवाद करने से उनकी सही परिभाषाएँ निश्चित करना कठिन हो जाता है।

नये कदम

भारत सरकार ने आयुर्वेदिक विज्ञान-शोध की राष्ट्रीय परिषद (Central Council for Research in Ayurvedic Sciences, CCRAS) स्थापित की है। इनकी सन २००० की अनुसंधान पोलिसी भी है। इनकी सूची भी है कि किस राज्य में कौन से शोध किये जा रहे हैं (लेकिन इसमें यह नहीं लिखा कि यह सूची किस साल की है)। इनका एक अंग्रेजी में शोध-पोर्टल है जिसे बहुत जटिल बनाया गया है और जिसमें कोई आलेख खोजना मुझे आसान नहीं लगा, शायद यह शोध विशेषज्ञों के लिए बना है।

विश्व स्वास्थ्य संस्थान ने भी, भारत सरकार के सहयोग से एक अंतर्राष्ट्रीय पारम्परिक चिकित्सा केन्द्र (Global Traditional Medicine Centre - GTMC) की जामनगर-गुजरात (भारत) में स्थापना की है।

आशा करता हूँ कि इन नये संस्थाओं से आने वाले समय में आयुर्वेद से जुड़े शोध करना पहले से अधिक आसान होगा। 

अंत में

आयुर्वेद की मेरी समझ सतही है। लेकिन मेरे विचार में आयुर्वेद के विषयों पर वैज्ञानिक शोध और उस शोध के परिणामों को वैज्ञानिक पत्रिकाओं में लोगों को लोगों को उपलब्ध कराने में बहुत सा काम बाकी है।
 
अगर आप आयुर्वेद से जुड़े किसी क्षेत्र में अनुसंधान करने की सोच रहे हैं और आप के मन में उसके प्रोटोकॉल से सम्बंधित कुछ प्रश्न हैं तो मुझसे सम्पर्क करें, मैं आयुर्वेद के बारे में नहीं जानता लेकिन चिकित्सा के शोध-प्रोटोकॉल कैसे बनाये इसमें मदद कर सकता हूँ।  आप मेरे शोध-आलेखों की लिन्क इस ब्लाग के दायें हाशिये पर खोज सकते हैं, मेरे शोध क्षेत्र कुष्ठ रोग और विकलांगता से जुड़े हैं।
 
International Meetingon Traditional Medcine in Asia, Bangalore, India, 2006
 
टिप्पणी: इस आलेख के साथ लगी सभी तस्वीरें २००६ की परम्परागत चिकित्सा की बंगलौर कौन्फ्रैंस से हैं।
 
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मंगलवार, फ़रवरी 20, 2024

पति, पत्नी और वह

पत्नी कल कुछ दिनों के लिए बेटे के पास गई थी और मैं घर पर अकेला था, तभी इस लघु-कथा का प्लॉट दिमाग में आया।

*****

सुबह नींद खुली तो बाहर अभी भी अंधेरा था। कुछ देर तक फोन पर इमेल, फेसबुक, आदि चैक किये, फ़िर सोचा कि उठ कर कॉफी बना लूँ। नीचे आ रहा था कि सीढ़ी पर पाँव ठीक से नहीं रखा, गिर ही जाता पर समय पर हाथ बढ़ा कर दीवार से सहारा ले लिया, इसलिए गिरा नहीं केवल पैर थोड़ा सा मुड़ गया।

मेरे मुँह से "हाय राम" निकला तो वह बोली, “देख कर चलो, ध्यान दिया करो।"

“ठीक है, सुबह-सुबह उपदेश मत दो", मैंने उत्तर दिया।

“एक दिन ऐसे ही हड्डी टूट जायेगी, फ़िर मेरे उपदेशों को याद करना", उसने चिढ़ कर कहा।

कॉफी पी कर कमप्यूटर पर बैठा तो समय का पता ही नहीं चला। साढ़े आठ बज रहे थे, उसने कहा, “आज सारा दिन यहीं बैठे रहोगे क्या? नहाना-धोना नहीं है?”

“उठता हूँ, बस यह वीडियो पूरा देख लूँ।"

“यह वीडियो कहीं जा रहा है? इसे पॉज़ कर दो, पहले नहा लो, फ़िर बाकी का देख लेना।"

“अच्छा, अच्छा, अभी थोड़ी देर में जाता हूँ, तुम जिस बात के पीछे पड़ जाती हो तो उसे छोड़ती नहीं", मुझे भी गुस्सा आ गया।

“नहाने के बाद तुम्हें दूध और सब्ज़ी लेने भी जाना है", वह मुस्करा कर बोली।

वह बहुत ज़िद्दी है, जब तक अपनी बात नहीं मनवा लेती, चुप नहीं होती, इसलिए अंत में मुझे उठना ही पड़ा। नहा कर निकला ही था कि बन्नू का फोन आ गया।

बोला, “दोपहर को मिल सकता है? गर्मी बहुत हो रही है, कहीं बियर पीने चलते हैं, फ़िर बाहर खाना खा लेंगे।"

मैंने कहा, “नहीं यार, सच में गर्मी बहुत है, दोपहर को बाहर निकलने का मन नहीं कर रहा। शाम को मिलते हैं।"

उसने कहा, “सारा दिन घर पर अकेले बोर हो रहा हूँ, चल न, कहीं गपशप मारेंगे।"

मैं हँसा, बोला, “एक नयी एप्प आई है, जीवनसाथी एप्प, अपने फोन पर डाऊनलोड कर ले, सारा अकेलापन दूर हो जायेगा।"

फोन रखा तो वह बोली, “अपने दोस्त से मेरी इतनी तारीफें कर रहे थे, अब एप्प रिवयू में मुझे पाँच स्टार देना, समझे?”

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शनिवार, अगस्त 06, 2022

लम्बे कोविड के खतरे

टिप्पणी (२९ अगस्त २०२२)


पिछले कुछ महीनों (विषेशकर अप्रैल २०२२ के अंत के बाद से) से यूरोप, अमरीका आदि कुछ देशों में वर्ष के इस समय में होने वाली औसत मृत्यु दर से करीब दस से १२ प्रतिशत अधिक हो रही हैं। ईंग्लैंड और अमरीका दोनों देशों में मृत्यु के आकणें यह बढ़ी मत्यु दर दिखला रही हैं। कल (२८ अगस्त २०२२ को) स्कॉटलैंड की सरकार ने इस बात को स्वीकारा है। यह बढ़ी मृत्यु दर कोविड से होने वाली मृत्यु से अलग है। इनमें विषेशरूप से घर पर अचानक मरने वालों की संख्या अधिक है। चूँकि कोविड के वजह से पिछले दो वर्षों में बूढ़े और अन्य बिमारियों वाले बहुत से लोगों की मृत्यु हुई थी तो इस साल औसत मृत्यु दर में कमी आनी चाहिये थी, उसमें बढ़ौती का होना चिंताजनक है। वैज्ञानिकों को संदेह है कि शायद इन अधिक मृत्यु के पीछे कोचिड वैक्सीन का प्रभाव न हो इसलिए वैज्ञानिक कह रहे हें कि देशों के मृत्यु के आकणों, कारणों तथा आटोप्सी रिपोर्ट पर तुरंत शोध करना चाहिये। 

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लम्बे कोविड के खतरे


कोविड की बीमारी दो साल पहले, 2020 के प्रारम्भ में चीन से सारे विश्व में फ़ैली। चूँकि यह बीमारी चीन में 2019 में शुरु हुई, इसमें मरीज़ों को साँस लेने में कठिनाई होती थी और यह कोरोना वायरस से इन्फेक्शन से हुई थी इसे सार्स-कोविड-19 (Severe Acute Respiratory Syndrome - Corona Virus Disease) का नाम दिया गया। अब तक इस बीमारी से दुनियाँ में करोड़ों लोग प्रभावित हुए हैं और लाखों लोगों की मृत्यु हुई है। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश हो जहाँ यह बीमारी न पहुँची हो।



अधिकाँश लोगों को जब यह बीमारी हुई तो उन्हें अधिक परेशानी नहीं हुई और वह जल्दी ठीक हो गये। करीब 2 प्रतिशत लोगों की तबियत अधिक बिगड़ी और उन्हें अस्पताल में भरती होना पड़ा। अस्पताल में भर्ती होने वाले लोगों में से करीब एक प्रतिशत लोग नहीं बचे, बाकी के लोग धीरे धीरे ठीक हो गये। बीमारी के प्रारम्भ में, जब इससे लड़ने के लिए वैक्सीन का आविष्कार नहीं हुआ था, बीमार होने वाले और मरने वाले अधिक थे। बहुत से देशों में इस बीमारी के लिए विषेश अस्पताल खोले गये। अधिकाँश देशों में 2020-21 में महीनों तक लॉक-डाउन रहे जिससे दुकानदारों, फैक्टरी वालों, स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थियों, उद्योग चलाने वालों, रैस्टोरेंट वालों, कलाकारों, फ़िल्म वालों आदि सब पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ा।

जिन लोगों को यह कोविड की बीमारी हुई उनमें से कुछ लोगों में इस बीमारी का लम्बा प्रभाव पड़ा है, यानि वह इस बीमारी के बाद, कई महीनों या सालों तक ठीक नहीं हो पाये। इन लोगों की बीमारी को "लम्बे कोविड" (Long Covid) का नाम दिया गया है। कुछ दिन पहले, 28 जुलाई 2022 को, लम्बे कोविड के बारे में एक नया और महत्वपूर्ण शोध के परिणाम आये हैं जिनसे इस लम्बे कोविड की बीमारी और उसके शरीर पर होने वाले प्रभावों को समझने में मदद मिलती है। इस आलेख में कोविड का वायरस कैसे शरीर पर प्रभाव करता है और लम्बे कोविड की बीमारी से जुड़े इस शोध के परिणामों की चर्चा हैं।

लम्बे कोविड का शोध

इस शोध के लिए ईंग्लैंड में उन लोगों को चुना गया जिन्हें गम्भीर स्तर का कोविड का इन्फेक्शन हुआ था और बीमारी शुरु होने के २८ दिनों के बाद भी जिनकी तबियत पूरी तरह से नहीं सुधरी थी। इसमें कुल मिला कर तीन लाख छत्तीस हजार लोगों को लिया गया। इन लोगों को स्मार्ट फोन का एक एप्प दिया गया और उनसे नियमित रूप से स्वास्थ्य सम्बंधी जानकारी इकट्ठी की गयी। इसके अधिकतर शोधकर्ता लँडन के किन्गस कॉलेज से जुड़े थे।

कोविड का वायरस जो चीन में निकला, वह समय के साथ बदलता रहा है और उन बदलते हुए वायरसों को अलग अलग नाम दिये जाते हैं जैसे कि अल्फा, डेल्टा, आदि। इस शोध में उन सभी विभिन्न तरह से वायरसों से बीमार व्यक्तियों ने हिस्सा लिया।

जिन तीन लाख छत्तीस हज़ार रोगियों ने इसमें हिस्सा लिया, उनमें से एक हज़ार चार सौ उनसठ (1,459) रोगियों को "लम्बा कोविड" हुआ यानि उनकी बीमारी होने के तीन महीने बाद भी उनकी तबियत ठीक नहीं हुई थी। इसका अर्थ है कि इस शोध में हिस्सा लेने वाले हर 230 रोगियों में से एक व्यक्ति को लम्बा कोविड हुआ, जिससे मालूम चलता है कि गम्भीर कोविड होने वाले लोगों में से तकरीबन 0.4 प्रतिशत लोगों को लम्बा कोविड होने का खतरा हो सकता है।।

कोविड का शरीर पर असर

कोविड की बीमारी हमारे शरीर पर किस तरह से असर करती है, इसको जानने के लिए हमारे शरीर की आत्मरक्षा व्यवस्था (immunological system) को समझना ज़रूरी है।

जब हमारे शरीर में कोई भी बीमारी वाला किटाणु घुसता है तो हमारा शरीर उससे लड़ने की कोशिश करता है। बीमारी फैलाने वाले किटाणुओं से लड़ने वाली आत्मरक्षा की क्षमता को शरीर की इम्यूनुलोजिकल सिस्टम या शरीर-आत्मरक्षा व्यवस्था कहते हैं। हमारी यह आत्मरक्षा क्षमता मुख्यतः दो तरह की होती है - रक्त में घूमने वाली एँटीबॉडी (antobodies) और सुरक्षा-कोष (cellular immunity)।

एँटीबॉडी को शरीर की रक्त धमनियों में घूमने वाला सिपाही समझिये, जैसे ही किसी अनजाने किटाणु को देखता है, उसको पकड़ कर उससे लिपट जाता है और मदद के लिए चिल्लाता है, जिससे की मेक्रोफेज (macrophage) नाम के कोष वहाँ आ कर उन किटाणुओं को निगल जाते हैं और मार कर पचा लेते हैं।

अगर आप के शरीर ने उस किटाणु को पहले नहीं देखा, जब यह नया किटाणु शरीर में घुसता है तो एँटीबॉडी उनको पहचान नहीं पाती और इन किटाणुओं को शरीर में फ़ैलने का मौका मिल जाता है। तो इन्हें रोकने की ज़िम्मेदारी सुरक्षा कोषों पर आती है, इनका काम है नये किटाणुओं को पहचानना, लड़ना और उनसे लड़ने के लिए नये तरीके की एँटीबॉडी बनवाना। इस काम में थोड़ी देर लगती है और तब तक बीमारी शरीर में फैलती रहती है।

वैज्ञानिक कुछ घातक किटाणुओं जिनसे जानलेवा या गम्भीर बीमारी हो सकती है, उनसे बचने के लिए वैक्सीन बनाते हैं। वैक्सीन में मरे या अधमरे किटाणु, जिनसे बीमारी होने का खतरा नहीं हो, शरीर में टीके से या ड्रापस से भेजे जाते हैं, ताकि शरीर उनको पहचान कर उनसे लड़ने वाली एँटीबॉडी बनाने लगे। इस तरह से जब वह किटाणु आप के शरीर में घुसते हैं तो वे आप की आत्मरक्षा व्यव्स्था के लिए नये नहीं हैं और उनसे लड़ने वाली एँटीबोडी पहले से ही तैयार उनकी घात में बैठी हैं।

जब शरीर किसी किटाणु से लड़ता है, तो कई बार उस लड़ाई की वजह से भी शरीर पर कुछ दुष्प्रभाव हो सकते हैं, जैसे कि शरीर का तापमान बढ़ना। इसलिए जब शरीर में कोई भी इन्फेक्शन हो, बुखार आ जाता है।

कोविड के वायरस शरीर में साँस के साथ घुसते हैं और सबसे पहले फेफड़ों में फ़ैलते हैं। अगर शरीर में इन्हें तुरंत रोकने की शक्ति नहीं हो, तो इनकी संख्या में तेजी से बढ़ोतरी होती है। जब तक शरीर इन किटाणुओं से लड़ने के लिए एँटीबॉडी बनाता है तब तक कुछ लोगों के फेफड़ों में इतने किटाणु बन गये होते हैं कि जब एँटीबॉडी उन पर हमला करती हैं तो वहाँ पानी जमा हो सकता है या फेफड़ों की संकरी धमनियाँ उन किटाणु-एँटीबॉडी के गट्ठरों से बंद हो जाती हैं, जिनसे मरीजों को साँस लेने में कठिनाई होती है, उनके शरीर की आक्सीजन कम होने लगती है। इसके अतिरिक्त, फेफड़ों से किटाणु शरीर के अन्य भागों में जाते हैं और वायरस विभिन्न अंगों के कोषों को नुक्सान दे सकता है। यही सब बीमारी के लक्षण बन कर प्रकट होते हैं।

लम्बे कोविड के कारण

कोविड का वायरस फेफड़ों से घुस कर शरीर के विभिन्न हिस्सों में फ़ैल जाता है, और शरीर के महत्वपूर्ण अंगों के कोषों को नुकसान हो सकता है। अगर कोषों को नुकसान टेम्परेरी है जैसे कि उनमें स्वैलिंग आ जाती है, तो धीरे धीरे यह ठीक हो जाता है। लेकिन अगर महत्वपूर्ण अंगों के कोष बीमारी की वजह से मर जाते हैं तो अक्सर वह दोबारा ठीक नहीं होते।

जैसे कि हमारे दिमाग में विभिन्न गँधों को पहचानने वाले कोष होते हैं, जो अक्सर कोविड से प्रभावित होते हैं। अगर वह कोष बीमारी में मर जाते हैं तो हो सकता है कि उस व्यक्ति की सूँघने की शक्ति पूरी तरह से कभी नहीं लौटे। लम्बे कोविड से प्रभावित लोगों में पाया गया है कि उनके विभिन्न शरीर के हिस्सों में जैसे कि दिमाग में, दिल में, फेफड़ों मे, शरीर के कोषों को परमानैंट डेमेज हो गया है जिसकी वजह से वह ठीक नहीं हो पा रहे।

लम्बे कोविड के प्रभाव

इस शोध में लम्बे कोविड बीमारी होने वाले व्यक्तियों में तीन तरह के लक्षण पाये गये हैंः

(१) दिमाग और नसों से जुड़े लक्षण - जैसे कि सूँघने की क्षमता खोना, थकान होना, सोचने की शक्ति कमज़ोर होना, डिप्रेशन होना, सिरदर्द होना, आदि।

(२) हृदय और फेफड़ों से जुड़े लक्षण - जैसे कि साँस लेने में कठिनाई, हाँफना, जल्दी थक जाना, दिल की धड़कन बढ़ना, आदि।

(३) शरीर के अन्य अंगों से जुड़े लक्षण - जैसे कि बुखार रहना, गुर्दों की तकलीफ़ होना, जोड़ों में तकलीफ़ होना, आदि।

इस शोध में शामिल लम्बे कोविड से पीड़ित व्यक्तियों में उपर बताये लक्षणों में से सबसे अधिक लोगों को दिमाग तथा नसों से जुड़ी तकलीफ़ें पायी गयीं।

अंत में

कोविड की वैक्सीन के दुष्प्रभावों के बारे में भी बहुत चर्चा हुई हैं और यह दुष्प्रभाव अनेक शोधों में दिखाये गये हैं, लेकिन यह थोड़े ही लोगों में हुए हैं। कोविड की वैक्सीन की एक कमी यह भी है कि इसका असर थोड़े समय के लिए लगता है और वैक्सीन लगवाये कई लोगों को भी कोविड हुआ है। लेकिन विभिन्न शोध यह भी दिखाते हैं कि वैक्सीन लगवाये हुए लोगों को बीमारी कम गम्भीर हुई, उनमें से बहुत कम लोगों को अस्पताल में भर्ती होनी की ज़रूरत हुई और उनमें से इस बीमारी से बहुत कम लोग मरे।

मेरी राय में अगर आप को अभी तक कोविड नहीं हुआ है, या आप को मालूम नहीं कि आप को लक्षणविहीन कोविड हुआ या नहीं हुआ, तो कोविड की वैक्सीन लगवाना बेहतर है। अब हर दूसरे महीने इसके नये वेरिएन्ट वायरस निकल रहे हैं जिनसे यह बीमारी तेज़ी से फ़ैलती है लेकिन बहुत कम लोगों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है, इसलिए सरकारों ने अब इसकी चिंता करना कम कर दिया है। इसका मतलब है कि अगले महीनों और वर्षों में यह बीमारी आम हो जायेगी, तो कोई भी इससे बच नहीं सकता। अगर आप ने अभी तक वैक्सीन नहीं लगवायी, तो हो सकता है कि आप खुशकिस्मत हो और कोविड होगा भी तो आप को नुक्सान नहीं पहुँचायेगा, लेकिन ऐसा कोई टेस्ट नहीं जो यह बता सके। बाकी तो अगर आप इस आलेख को पढ़ रहे हैं तो जाहिर है कि आप समझदार हैं।


बुधवार, मई 25, 2022

अरे ओ साम्बा, कित्ती छोरियाँ थीं?

भारत में कितनी औरतें हैं यह प्रश्न गब्बर सिंह ने नहीं पूछा था, लेकिन यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है।

कुछ माह पहले भारत सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने 2019 से 2021 के बीच में किये गये राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के नतीजों की रिपोर्ट निकाली थी। इस रिपोर्ट के अनुसार आधुनिक भारत के इतिहास में पहली बार देश में लड़कियों तथा औरतों की कुल जनसंख्या लड़कों तथा पुरुषों की कुल जनसंख्या से अधिक हुई है। यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है जिससे देश की सामाजिक, आर्थिक व स्वास्थ्य की स्थिति के बारे में जानकारी मिलती है। यह भारत के लिए गर्व की बात है। अपने इस आलेख में मैंने इस बदलाव की राष्ट्रीय तथा राज्यीय स्तर पर कुछ विषलेशण करने की कोशिश की है।



नारी और पुरुष जनसंख्या के अनुपात

कुल जनसंख्या में लड़कियों तथा औरतों की संख्या लड़कों तथा पुरुषों की संख्या से अधिक होनी चाहिए। अगर गर्भ में भ्रूण के बनते समय उसका नर या मादा होने के मौके एक बराबर ही होते हैं, तो समाज में नर और नारियों की संख्या भी एक बराबर होनी चाहिये। तो पुरुषों की संख्या औरतों से कम क्यों होती है? इसके कई कारण होते हैं। सबसे पहले हम नर तथा नारी जनसंख्या पर पड़ने वाले विभिन्न प्रभावों को देख सकते हैं। 

नर भ्रूणों को स्वभाविक गर्भपात का खतरा अधिक होता है, इस लिए पैदा होने वाले बच्चों में लड़कियाँ अधिक होती हैं। 

पैदा होने के बाद भी लड़के कई बीमारियों का सामना करने में लड़कियों से कमजोर होते हैं। समूचे जीवन काल में, बचपन से ले कर बुढ़ापे तक, चाहे एक्सीडैंट हों या आत्महत्या, चाहे शराब अधिक पीना हो या नशे की वजह हो, चाहे लड़ाईयाँ हों या सामान्य हिँसा, लड़के व पुरुष ही अधिक मरते हैं। लड़कों व पुरुषों की हड्डियाँ व माँस पेशियाँ अधिक मजबूत होती हैं, वह अधिक ऊँचे और शक्तिशाली होते हैं, लेकिन वह मजबूत शरीर बीमारियों से लड़ने तथा मानसिक दृष्टि से कम शक्तिशाली होते हैं। 

जबकि औरतों के जीवन में सबसे बड़ा स्वास्थ्य से जुड़ा खतरा होता है उनका गर्भवति होना और बच्चे को जन्म देना। पिछड़े व गरीब समाजों में औरतों की उर्वरता दर अधिक होती है, यानि बच्चों की संख्या अधिक होती है। कृषि से जुड़े गरीब समाजों को बच्चों के बाहुबल की आवश्यकता होती है। गरीब देशों की स्वास्थ्य सेवाएँ भी निम्न स्तर की होती हैं, तो बच्चों को टीके नहीं लगाये जाते या बीमार होने पर उनका सही उपचार नहीं हो पाता। इन सब वजहों से गरीब समाजों में बच्चे अधिक होते हैं। इसलिए गर्भवति होने वाली उम्र में गरीब समाजों में नवयुतियों के मरने का खतरा अधिक होता है। जबकि विकसित समाजों में, विषेशकर अगर लड़कियाँ पढ़ी लिखी हों, तो उनके बच्चे देर से पैदा होते हैं और उनकी संख्या कम हो जाती है। 

नारी शरीर की दूसरी कमजोरी का कारण है मासिक माहवारी। अगर उन्हें सही खाना मिलता रहे तो सामान्य माहवारी का उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर नहीं पड़ता, वरना इससे उनके रक्त में लोहे की कमी से अनीमिया होने का खतरा रहता है। लेकिन अगर प्रसव तथा माहवारी से जुड़े खतरों को छोड़ दें तो नारी शरीर में बीमारियों से लड़ने की अधिक शक्ति होती है। नारी शरीर के हारमोन उनकी बहुत सारी बिमारियों से, जैसे कि बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर तथा हृद्यरोग आदि से जब तक माहवारी चलती है, तब तक उनकी रक्षा करते हैं, उन बीमारियों से पुरुष अधिक मरते हैं। बुढ़ापे में भी नारी हारमोन उनकी कुछ हद तक रक्षा करते हैं जिससे कि औरतों की औसत जीवन अपेक्षा पुरुषों से अधिक होती है। 

प्राकृतिक स्वास्थ्य संबंधी कारणों के अतिरिक्त नर-नारी जनसंख्या पर सामाजिक सोच का असर पड़ता है। बहुत से समाजों में लड़कियों को पैदा होने से पहले ही गर्भपात करवा कर मरवा देते हैं, क्योंकि वे सोचते हैं कि लड़कों से परिवार और संस्कृतियाँ चलती हैं। पैदा होने के बाद बेटों के तुलना में उन्हें खाना कम दिया जाता है, खेलकूद और पढ़ायी के अवसर कम मिलते हैं। और जब वह बीमार होती हैं तो उनका इलाज देर से करवाया जाता है और कम करवाया जाता है।



देशों में कुल जनसंख्या में नर अधिक होंगे या नारियाँ, उस आकंणे पर ऊपर बताये गये सब भिन्न प्रभावों के नतीजों को जोड़ कर देखना पड़ेगा। विश्व स्तर पर उन आकंणों को देखें तो हम पाते हैं कि विकसित देशों में जनसंख्या में नारियाँ अधिक होती हैं, जबकि कम विकसित तथा गरीब देशों में पुरुषों की संख्या अधिक होती है। जैसे जैसे समाज विकसित होने लगते हैं, औरतें अधिक पढ़ती लिखती हैं, नौकरी करके स्वंतत्र रहने के काबिल बन जाती हैं और आवश्यकता पड़ने पर माता पिता की देखभाल भी कर सकती हैं, तो जनसंख्या में उनका अनुपात बढ़ने लगता है। 

अन्य देशों से नर-नारी अनुपात के कुछ आकंणे

नये भारतीय सर्वेषण के नतीजों को देखने से पहले आईये पहले हम कुछ अन्य देशों में नर-नारी अनुपात की क्या स्थिति है उसको देखते हैं।

इस दृष्टि से पहले दुनिया के कुछ विकसित देशों की स्थिति कैसी है, पहले उसके आकणें देखते हैं। 1000 पुरुषों के अनुपात में देखें तो फ्राँस में 1054 औरतें हैं, जर्मनी में 1039, ईंग्लैंड और स्पेन में 1024, इटली में 1035, अमरीका में 1030, तथा जापान में 1057। यानि हर विकसित देश में लड़कियों व औरतों की संख्या लड़कों तथा पुरुषों की संख्या से अधिक है। 

आईये अब भारत के आसपास के देशों की स्थिति देखें। यहाँ पर 1000 पुरुषों के अनुपात में पाकिस्तान में 986 औरतें हैं, बँगलादेश में 976, नेपाल में 1016, और चीन में 953। यानि नेपाल में स्थिति बेहतर हैं जबकि चीन, पाकिस्तान व बँगलादेश में खराब है। हाँलाकि पिछले दो दशकों में चीन बहुत अधिक विकसित हुआ है लेकिन चीन में अभी कुछ समय पहले तक नियम था कि परिवार में एक से अधिक बच्चे नहीं होने चाहिये, और वहाँ की सामाजिक सोच इस तरह की है जिसमें वह सोचते हैं कि लड़के ही पैदा होंने चाहिए, इसके दुष्प्रभाव पड़े हैं।

विभिन्न देशों के आंकणें देखते समय वहाँ की अन्य परिस्थितयों के असर के बारे में सोचना चाहिये। जहाँ युद्ध हो रहे हैं वहाँ पुरुषों की संख्या और भी कम हो सकती है। कुछ जगहों में पुरुषों को घर-गाँव छोड़ कर पैसा कमाने के लिए दूर कहीं जाना पड़ता है, तो वहाँ भी जनसंख्या में पुरुषों की संख्या कम हो जायेगी, जबकि जिन जगहों पर पुरुष प्रवासी काम खोजने आते हैं, वहाँ पर उनका अनुपात बढ़ जाता है। जब आंकणों में किसी जगह पर बहुत अधिक पुरुष या नारियाँ दिखें तो वहाँ की सामाजिक स्थिति के बारे में अन्य कारणों को समझना आवश्यक हो जाता है।

भारत के राष्ट्रीय स्तर के आंकणे

राष्ट्रीय स्तर पर यह आकंणे सन् 1901 के बाद से जमा किये जाते रहे हैं। चूँकि सौ वर्ष पहले के भारत में आज के पाकिस्तान, बँगलादेश तथा कुछ हद तक मयनमार भी शामिल थे तो उनके आंकणों की आधुनिक भारत के आंकणों से पूरी तरह तुलना नहीं की जा सकती लेकिन उनसे हमारी स्थिति के बारे में कुछ जानकारी तो मिलती है।

1901 में भारत में हर 1000 पुरुषों से सामने 972 औरतें थीं, जबकि 1970 में उनकी संख्या 930 रह गयी थी। 2005-06 में जब तृतीय राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेषण में यह जानकारी जमा की गयी तो भी स्थिति में बदलाव नहीं आया था, 1000 पुरुषों के सामने 939 औरतें थीं। 2015-16 में जब चौथा सर्वेषण किया गया तो पहली बार महत्वपूर्ण बदलाव दिखा जब औरतों की संख्या बढ़ कर 991 हो गयी थी। इस वर्ष आये परिणामों में स्थिति और मजबूत हुई है, इस बार 1000 पुरुषों के मुकाबले में 1020 औरतें हैं।

इन आकंणो से हम क्या निष्कर्श निकाल सकते हैं? मेरे विचार में सौ साल पहले औरतों की संख्या कम होने का कारण था उन्हें खाना अच्छा न मिलना, बच्चे अधिक होना, और प्रसव के समय स्वास्थ्य सेवाओं की कमी। यह सभी बातें 1970 के सर्वेषण तक अधिक नहीं बदली थीं। 1990 के दशक में भारत में विकास बढ़ा, साथ में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बेहतर हुई लेकिन साथ ही गर्भवति औरतों के लिए अल्ट्रासाँऊड टेस्ट कराने की सुविधाएँ भी तेजी सी बढ़ी जिनसे परिवारों के लिए होने वाले बच्चे का लिंग जानना बहुत आसान हो गया, जिससे बच्चियों की भ्रूण बहुत अधिक संख्या में गिरवाये जाने लगे। इसका असर 2005-06 के सर्वेषण पर पड़ा और बच्चे कम होने, भोजन बेहतर होने व स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतर होने के बावजूद औरतों की संख्या कम ही रही।

भारत में बच्चियों का गर्भपात

हालाँकि भारत सरकार ने गर्भवति औरतों में अल्ट्रासाऊँड टेस्ट से लिंग ज्ञात करने की रोकथाम के लिए 1994 से कानून बनाया था, इसे 2005-06 के सर्वेषण के बाद सही तरह से लागू किया गया जब डाक्टरों पर सजा को बढ़ाया गया। लेकिन सामाजिक स्तर पर भारत में बेटियों की स्थिति अधिक नहीं बदली, इस कानून का भी कुछ विषेश असर नहीं पड़ा है।

भारत में बच्ची होने पर गर्भपात कराने की परम्परा अभी महत्वपूर्ण तरीके से नहीं बदली, यह हम एक अन्य आंकणे से समझ सकते हैं - छः वर्ष से छोटे बच्चों में लड़कों और लड़कियों के अनुपात को देखा जाये। 2001 में छः वर्ष से छोटे बच्चों की जनसंख्या में हर 1000 लड़कों के सामने 927 लड़कियाँ थीं। 2005-06 में यह संख्या घट कर 918 हो गयी। 2015-16 में यह संख्या बदली नहीं थी, 919 थी। और, 2019-21 के नये सर्वेषण में भी यह अधिक नहीं बदली, 924 है।

इसका अर्थ है कि औरतों की संख्या में बढ़ोतरी का बदलाव जो 2019-21 के सर्वेषण में दिखता है वह अन्य वजहों से हुआ है जैसे कि उन्हें पोषण बेहतर मिलना, छोटी उम्र में विवाह कम होना, विवाह के बाद बच्चे कम होना और प्रसव के समय बेहतर स्वास्थ्य सेवा मिलना।

ग्रामीण तथा शहरी क्षत्रों में अंतर

राष्ट्रीय स्तर पर और बहुत से प्रदेशों में ग्रामीण क्षेत्रों में औरतों की स्थिति शहरों से बेहतर है। राष्ट्रीय स्तर पर 1998-99 में 1000 पुरुषों के अनुपात में शहरी क्षेत्रों में 928 औरतें थीं जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी संख्या 957 थी। बाईस साल बाद, 2019-21 के सर्वेषण में राष्ट्रीय स्तर के आंकणों में दोनों क्षेत्रों में स्थिति सुधरी है, शहरों में उनकी संख्या 985 हो गयी है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में संख्या 1037 हो गयी है।

लेकिन यह बदलाव बड़े शहरों से जुड़े ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं आया। दिल्ली, चंदीगढ़, पुड्डूचेरी जैसे शहरों के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में औरतों की संख्या शहरों से कम है। यह आंकणे देख कर मुझे लगा कि इन क्षेत्रों में स्थिति को समझने के लिए विषेश शोध किये जाने चाहिये। एक कारण हो सकता है कि यहाँ बच्चियों का गर्भपात अधिक होता हो? शायद उससे भी बड़ा कारण है कि देश के अन्य राज्यों से आने वाले प्रवासी युवक इन गाँवों में सस्ती रहने की जगह पाते हैं जिसकी वजह से यहाँ पुरुषों की संख्या अधिक हो जाती है?

अन्य कुछ बातें भी हैं। जैसे कि सामान्य सोच है कि गाँवों में समाज अधिक पाराम्परिक या रूढ़िवादी होते हैं, वहाँ सामाजिक सोच को बदलने में समय लगता है। वहाँ स्वास्थ्य सेवाओं को पाना भी कठिन हो सकता है, हालाँकि प्राथमिक सेवा केंद्रों तथा आशा कर्मियों से बहुत जगहों पर स्थिति में बहुत सुधार आया है। लेकिन इन सबको ठीक से समझने के लिए विषेश शोध होने चाहिये।

राज्य स्तर के आंकणे

अंत में राज्य स्तर के आंकणों के बारे में कुछ जानकारी प्रस्तुत है। जैसा कि मैंने ऊपर बताया है, इन आंकणों पर अन्य बहुत सी बातों का असर पड़ता है इसलिए उनके महत्व को ठीक से समझने के लिए सावधानी बरतनी चाहिये।

मेरे विचार में राज्यों की स्थिति को देश के विभिन्न भागों में बाँट कर देखना अधिक आसान है। मैंने राज्यों को चार भागों में बाँटा है - पहले भाग में हैं उत्तरपूर्व को छोड़ कर उत्तरी व मध्य भारत की सभी राज्य; दूसरे भाग में मैंने दक्षिण भारत के राज्यों को रखा है, जिनमें गोवा भी है; तीसरा भाग है उत्तरपूर्व के राज्य जिनमें सिक्किम भी है; और चौथा भाग है केन्द्रीय प्रशासित क्षेत्र जैसे कि अँडमान या चँदी गढ़, इनमें दिल्ली भी है।

उत्तर तथा मध्य भारत के राज्य

2015-16 के आंकणों के अनुसार, उत्तर व मध्य भारत में सात राज्यों में औरतों की संख्या की स्थिति नकरात्मक थी - हरियाणा 876, राजस्थान 887, पँजाब 905, गुजरात 950, महाराष्ट्र 952, एवं जम्मु कश्मीर में 971। उत्तरप्रदेश में स्थिति बाकियों के मुकाबले में कुछ ठीक थी, 995। बाकी के सभी प्रदेशों में (झारखँड, पश्चिम बँगाल, उत्तरखँड, छत्तीसगढ़, ओडीशा, बिहार व हिमाचल प्रदेश) में औरतों की संख्या पुरुष अनुपात में 1000 से अधिक थी, उनमें से सबसे उच्चस्थान पर थे बिहार 1062 तथा हिमाचल प्रदेश 1087।

2019-21 के आंकणें देखें तो कुछ बदलाव दिखते हैं। जम्मू कश्मीर को छोड़ कर अन्य सभी राज्यों में स्थिति में कुछ सुधार आया है, हालाँकि पँजाब व राजस्थान में सुधार की मात्रा थोड़ी सी ही है। इन परिवर्तनों के बाद सबसे अधिक नकारात्मक स्थितियाँ इन राज्यों में हैं - राजस्थान 891, हरियाणा 926, पँजाब 938, जम्मू कश्मीर 948, गुजरात 965, महाराष्ट्र 966, और मध्यप्रदेश 970। बाकी सभी राज्यों में औरतों का अनुपात 1000 से ऊपर है। सबसे बेहतर स्थिति है ओडीशा में 1063 तथा बिहार में 1090। मेरे विचार में जिन राज्यों में स्थिति सकारात्मक दिखती है वहाँ के आंकणों पर अधिक पुरुषों के प्रवासी होने का भी प्रभाव है।

दक्षिण भारत के राज्य

गोवा सहित दक्षिण भारत के राज्यों में 2015-16 में स्थिति केवल कर्णाटक में नकारात्मक थी, 979, बाकी सभी राज्यों में स्थिति सकारात्मक थी।

2019-21 के सर्वेक्षण में इन सभी राज्यों में स्थिति सकारात्मक हो गयी थी।

उत्तरपूर्वी भारत के राज्य

उत्तरपूर्वी भारत के आठ राज्यों में से 2015-16 में 3 राज्यों में स्थिति नकारात्मक थी - सिक्किम 942, अरुणाचल 958 तथा नागालैंड 968। दो राज्यों में स्थिति थोड़ी सी नकारात्मक थी, असम में 993 और त्रिपुरा में 998, जबकि मेघालय, मिजोरम तथा मणीपुर में स्थिति सकारात्मक थी।

इस बार के 2019-21 सर्वेक्षण में इन सभी राज्यों में स्थिति सुधरी है, हालाँकि अभी भी सिक्किम में 990 तथा अरुणाचल में 997 होने से थोड़ी सी नकारात्मक है।

दिल्ली तथा केन्द्र प्रशासित भाग

अंत में दिल्ली तथा केन्द्र प्रशासित भागों में देखें तो 2015-16 में चार क्षेत्रों में स्थिति गम्भीर थी - दादरा, नगर हवेली, दमन, दीव 813, दिल्ली 854, चंदीगढ़ 934 तथा अँडमान 977। सभी जगहों पर इन क्षेत्रों के ग्रामीण हिस्सों की स्थिति और भी गम्भीर थी, जिसका एक कारण अन्य राज्यों से आने वाले प्रवासी पुरुष हो सकता है।

2019-21 में स्थिति में कुछ सुधार हुआ और कुछ स्थिति और भी नकारात्मक हुई - दादरा, नगर हवेली आदि 827, दिल्ली 913, चंदीगढ़ 917, अँडमान 963, लदाख 971। अँडमान में कितने प्रवासी है, वहाँ क्या कारण हो सकते हैं, उसके आंकणों से मुझे थोड़ी हैरानी हुई।


अंत में

अगर हम पूरे भारत के स्तर पर विभिन्न राज्यों में नारी और पुरुष जनसंख्या के अनुपात में आये परिवर्तनों को देखें तो पाते हैं कि बहुत राज्यों में स्थिति सुधरी है, विषेशकर लक्षद्वीप, केरल, कर्णाटक, तमिलनाडू, हरियाणा, सिक्किम, झारखँड, नागालैंड तथा अरुणाचल में। कुछ जगहों पर अनुपात कुछ घटा है जैसे कि हिमाचल प्रदेश, हालाँकि कुछ स्थिति अभी भी सकारात्मक है।

राज्य स्तर के आंकणों में आने वाले बदलावों को ठीक से समझना आसान नहीं है क्योंकि उस पर अन्य कारणों के साथ साथ पुरुषों के काम की खोज में अन्य राज्यों में जाने से भी बहुत असर पड़ता है। इसकी वजह से समृद्ध राज्य जहाँ प्रवासी आते हैं उनकी पुरुष संख्या बढ़ी दिखती है और पिछड़े राज्य, जहाँ से पुरुष प्रवासी बन कर निकलते हैं, उनके आंकड़े सच्चाई से बेहतर दिखते हैं।

राज्यों की स्थिति चाहे जो भी हो, राष्ट्रीय स्तर पर भारत की जनसंख्या में औरतों के अनुपात में इस तरह से बढ़ौती बहुत सकारात्मक बदलाव है। केवल एक आंकणे पर अधिक बातें कहना सही बात नहीं होगी, उसके लिए हमें स्वास्थ्य से संबंधित अन्य आंकणों को देखना पड़ेगा। लेकिन यह स्थिति भारत को विकास की ओर बढ़ाने में यह सही राह पर होने का आभास देती है।

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