रविवार, फ़रवरी 27, 2011

रँगबिरँगे मुखोटों का त्योहार

बहुत सालों से वेनिस के रँगबिरँगे मुखोटों के कार्नेवाल को देखने की इच्छा थी, लेकिन हर बार बीच में कोई न कोई अड़चन आ जाती थी. हमारे शहर बोलोनिया से वेनिस कुछ विषेश दूर नहीं, रेलगाड़ी से केवल दो घँटे का रास्ता है. करीब तीस वर्ष पहले जब इटली में नया था तब अस्पताल में साथ काम करने वाले मित्र मुझे शाम को साथ वेनिस ले गये थे, लेकिन तब वाइन पी कर हुल्लड़ करने में हमारी अधिक दिलचस्पी थी, तो क्या देखा था उसकी मन में बस कुछ धुँधली सी यादें थीं. इसलिए कल जब मौका मिला छोटा कार्नेवाल देखने का, तो उसे खोना नहीं चाहा. आज उसी वेनिस के मुखोटों वाले कार्नेवाल की कुछ तस्वीरें प्रस्तुत हैं.

Venice carneval, 2011

कार्नेवाल शब्द लेटिन से बना है, जिसका अर्थ है "कारने लेवारे" (Carne=meat, levare=remove), यानि "माँस को हटा दीजिये". जैसे मुसलमानों में रोज़े होते हैं, कुछ उसी तरह कैथोलिक ईसाई अपने त्योहार ईस्टर के पहले 40 या 44 दिनों का खाने का परहेज़ करते हैं, जिसमें माँस खाना वर्जित होता है. ईस्टर की तारीख रोमन कैलेंडर से नहीं बल्कि वसंत की पूर्णमासी से निर्धारित की जाती है, इसलिए हर साल अलग दिन पड़ती है. कार्नेवाल का दिन मँगलवार का होता है जिसे "मोटा मँगलवार" (Mardì Gras) कहते हैं, क्योंकि इस दिन खाने में माँस हटाने से पहले, लोग जी भर के माँस खाते हैं, पीते पिलाते हैं, मजे करते हैं. इस वर्ष मोटा मँगलवार, यानि कार्नेवाल होगा 8 मार्च को. पर अब यह केवल मस्ती का त्योहार ही रह गया है क्योंकि अब अधिकतर लोग खाने में कम खाने, सादा खाने या माँस न खाने में विश्वास नहीं करते.

कार्नेवाल के त्योहार को विभिन्न शहर अपने अपने ढंग से मनाते हैं, हाँलाकि हर कार्नेवाल में एक जलूस का होना आवश्यक होता है. ब्राज़ील में रियो दे जानेइरो शहर का कार्नेवाल अपनी रंगीन झाँकियों और थोड़े से वस्त्र पहने हुए साम्बा नाचने वालों के लिए प्रसिद्ध है. इस समय में वहाँ सेक्स की स्वच्छँदता भी बहुत होती है. भारत में गोवा का कार्नेवाल भी अपनी झाँकियों और मस्ती के लिए प्रसिद्ध है. इटली में बहुत से शहर अपने जलूसों और झाँकियों के कार्नेवाल के लिए जाने जाते हैं, लेकिन वेनिस का कार्नेवाल सबसे अनोखा माना जाता है क्योंकि इसमें सतारहवीं और अठाहरवीं शताब्दी की पोशाकों के साथ रँगबिरँगे मुखोटे जुड़े हैं.

आजकल कार्नेवाल में लोग बहुत मेहनत करते हैं, लाखों रुपये खर्च करते हैं वस्त्र और झाँकिया बनवाने में. साथ ही इसमें व्यवसायिक लाभ की बात भी जुड़ गयी है क्योंकि लाखों पर्यटक कार्नेवाल को देखने देश विदेश से आते हैं. तो कार्नेवाल की अवधि बढ़ा दी गयी है, "मोटे मँगलवार" के बड़े जलूस और असली कार्नेवाल के दो तीन सप्ताह पहले ही, शनिवार और रविवार को छोटे कार्नेवाल आयोजित किये जाते हैं ताकि अधिक से अधिक पर्यटक उन्हें देखने आयें.

कल 26 फरवरी को वेनिस में कार्नेवाल का पहला जलूस था. इसकी खासियत थी "सात मारिया की यात्रा", जिसमें शहर की सात सुबसे सुन्दर युवतियों को चुना जाता है, और शहर के युवक उन्हें पालकी में कँधे पर उठा कर ले जाते हैं, उनके पीछे पीछे शहर के जाने माने व्यक्ति प्राचीन पौशाकें पहन कर चलते हैं. वेनिस कार्नेवाल के अखिरी दिन, इन्हीं सात मारियों का नावों का जलूस निकलेगा, और सबसे सुन्दर युवती को "वेनिस की मारिया" का खिताब मिलेगा. कार्नेवाल के आखिरी दिन सबसे सुन्दर मुखोटे और पौशाक वाले व्यक्ति को भी चुना जायेगा.

कल की इसी वेनिस यात्रा से कार्नेवाल की कुछ तस्वीरें प्रस्तुत हैं. इन्हे देख कर आप स्वयं निर्णय ले सकते हैं कि वेनिस का कार्नेवाल अनूठा है या नहीं. घँटों चल चल कर और भीड़ में धक्के खा कर थकान से चूर हो कर घर लौटा पर मुझे लगा कि वाह, बहुत सुन्दर और रँगबिरँगा कार्नेवाल है.

Venice carneval, 2011

Venice carneval, 2011

Venice carneval, 2011

Venice carneval, 2011

Venice carneval, 2011

Venice carneval, 2011

Venice carneval, 2011

Venice carneval, 2011

Venice carneval, 2011

Venice carneval, 2011

Venice carneval, 2011

Venice carneval, 2011


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गुरुवार, फ़रवरी 24, 2011

मलदान मिलेगा?

कोई अगर अपनी जान बचाने के लिए आप से आप का थोड़ा सा ताज़ा किया हुआ पाखाना माँगे तो क्या आप देंगे? आप सोच रहे होंगे कि शायद यह कोई मज़ाक है। लेकिन यह कोई मज़ाक नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक खोज का विषय है, जिसकी कहानी न्यु साईन्टिस्ट पत्रिका में श्री अनिल अनन्तस्वामी ने लिखी है।

Scene from Pushpak, Kamalahassan
"पाखाना" शब्द ही कुछ ऐसा है जिसका सामाजिक प्रभाव छोटी उम्र से ही बहुत तेज़ होता है, जिसकी वजह से शब्द से भी कुछ घिन सी आने लगती है। कमालहसन की एक पुरानी फ़िल्म थी "पुष्पक" जिसमें कोई डायलाग नहीं थे, उसमें पाखाने से जुड़े कुछ दृश्य थे। अगर आप ने यह फ़िल्म देखी है तो मेरे विचार में इन दृश्यों को भूलना कठिन है। फ़िल्म में हीरो ने एक पुरुष को घर में कैद किया है, और उसके पाखाने को छुपाने के लिए उसे हर रोज़ एक डिब्बे में बँद करके, उस पर रंगीन कागज़ चढ़ा कर, किसी बसस्टाप के पास रख आता है। वहाँ उस सुंदर डिब्बे को ले कर जो भी व्यक्ति खोलता है वह पाखाना देख कर उल्टी कर देता है। तब रंगीन डिब्बों में बम आदि छोड़ने का टेरोरिस्टों-आतंकवादियों का काम और भय नहीं शुरु हुआ था, इसलिए यह दृश्य विश्वस्नीय था, आज तो डिब्बा खोलने से पहले ही शायद कोई पुलिस बम विस्फोट टीम के साथ हाज़िर हो जायेगी।

खैर बात मज़ाक या फ़िल्म की नहीं, सचमुच की बीमारी की है।

हमारी आँतों में रहने वाले सूक्ष्म किटाणु (बैक्टीरिया) विटामिन बनाते हैं, खाना हज़म करने में सहायता करते हैं, मोटा होने से बचाते हैं और शरीर को स्वस्थ रखते हैं। अगर आप को कुछ दिन एँटीबायटिक खाने पड़े तो अक्सर दस्त लग जाते हैं, क्योंकि एँटीबायटिक से हमारे शरीर के अच्छे बैक्टीरिया मर जाते हैं। अधिकतर तो यह दस्त की तकलीफ़ थोड़े से दिन ही रहती है, और धीरे धीरे, आँतों के अच्छे बैक्टीरिया-किटाणुओं का विकास होने के साथ, वह तकलीफ अपने आप ठीक हो जाती है।
 
लेकिन कभी कभी, अगर एँटीबायटिक से इलाज लम्बा करना पड़े या फ़िर व्यक्ति के शरीर में पहले से अन्य बीमारियों की कमज़ोरी हो, तो एँटीबायटिक की वजह से हुए दस्त जानलेवा भी हो सकते हैं। ऐसे में अक्सर आँतों में नये बीमारी वाले बैक्टीरिया-किटाणु बढ़ने लगते हैं जिन पर ऐटीबायटिक काम नहीं करते और जिन्हें शरीर से हटाना बहुत कठिन होता है। ऐसे एक बैक्टीरिया का नाम है क्लोस्ट्रिडियम दिफ़िसिल (Claostridium difficile), जो अगर आँतों में बस जाये तो बहुत से लोगों की जान को खतरा हो जाता है।

अभी तक क्लास्ट्रिडियम दिफ़िसल जैसे बैक्टीरिया-किटाणुओं का इलाज़ कुछ नये और बहुत शक्तिशाली एँटीबायटिक से है किया जाता है जो मँहगे तो होते हैं पर फ़िर भी अक्सर मरीज़ को बचा नहीं पाते।

इस बीमारी का नया इलाज निकाला केनेडा के कालगरी शहर के अस्पताल में काम करने वाले कुछ चिकित्सकों ने। वह मरीज़ के परिवार वाले किसी व्यक्ति से, जिसे दस्त वगैरा न लगे हों और कोई बीमारी नहीं हो, अपना थोड़ा सा सामान्य पाखाना देने के लिए कहते हैं, जिसे नलकी द्वारा मरीज़ की आँतों के उस हिस्से में छोड़ा जाता है जहाँ यह नये बैक्टीरिया घर बना कर बैठे होते हैं और उनकी संख्या अधिक होती है। उन्होंने पाया कि पाखाने में पाये जाने वाले सामान्य बैक्टीरिया इन नये बीमारी के किटाणुओं से लड़ने में एँटीबायटिक दवाईयों के मुकाबले में अधिक सफ़ल होते हैं, और कुछ दिनों में ही उनका सफ़ाया कर देते हैं। एक शौध ने दिखाया कि इस तरह परिवार के पाखाने से मिले अच्छे बैक्टीरिया मरीज़ के शरीर में 24 सप्ताह तक रह कर उसकी रक्षा कर सकते हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार हमारा पाखाना बैक्टीरिया, वायरस और अन्य किटाणुओं के चिड़ियाघर की तरह है, जिसमें 25 हज़ार तरह के विभिन्न किटाणु करोड़ों की संख्या में मिल सकते हैं। इनमें से बहुत से किटाणु सिमबायटिक होते हैं, यानी मानव शरीर के साथ परस्पर फायदा करने वाले - वह अगर मानव शरीर से कुछ लेते हैं तो साथ ही मानव शरीर का फायदा भी करते हैं, जैसे कि विटामिन बना के, खाने को पचा के या हानिकारक किटाणुओं से लड़ कर। अपनी आँतों में रहने वाली इस किटाणु सम्पदा की रक्षा करने के लिए आवश्यक है हमें छोटी-मोटी बीमारी या इन्फैक्शन के लिए एँटीबायटिक दवाईयाँ नहीं खानी चाहिये, क्योंकि उनसे हमारे शरीर के अच्छे बैक्टीरिया भी मर जाते हैं।

एँटीबायटिक यानि वह दवाईयाँ जो बीमारी फ़ैलाने वाले सूक्ष्म बैक्टीरिया-किटाणुओं को मारती हैं, बहुत काम की चीज़ हैं। इनकी वजह से ही आज हम टीबी, कुष्ठ रोग, न्यूमोनिया, एन्सेफलाइटिस, जैसी बीमारियों को काबू में ला सकते हैं और इनकी वजह से लाखों जानें बचती हैं। आम उपयोग में आने वाली एँटीबायटिक हैं पैनिसिलिन, एमोक्सिसिलीन, एम्पीसिलिन, जैंटामाइसिन, बेक्ट्रिम, रिफैम्पिसिन, आदि।

एँटीबायटिक का असर वायरस पर नहीं पड़ता - वायरस एक तरह के अतिसूक्ष्म किटाणू या जीवन कण होते हैं जिनसे फ्लू से ले कर एडस जैसी बीमारियाँ होती हैं। लेकिन अक्सर लोग उनके लिए भी एँटीबायटिक लेते हैं, जिनसे उनके रोग को कुछ फायदा नहीं होता और उनकी आँतों के अच्छे बैक्टीरिया बेकार में मर जाते हैं।
 
दूसरी आम गलती है कि एक बार एँटीबायटिक का प्रयोग शुरु किया जाये तो कम से कम तीन या पाँच दिन दिन अवश्य लेना चाहिये लेकिन लोग सोचते हैं कि अब "तबियत अब ठीक हो गयी है" अब इसे बंद कर देते हैं, इस तरह से बीमारी वाले बैक्टीरिया पूरी तरह नहीं मरते और कभी कभी ऐसे ड्रग-रज़िसटैंट किटाणुओं को जन्म देते हैं जिनपर किसी दवाई का असर नहीं होता.

पाखाने से इलाज का सुन कर कुछ दवा कम्पनियों ने तुरंत आपत्ति उठायी है, कहते हैं कि यह इलाज गैरवैज्ञानिक सबूतों की बिनाह पर किया जा रहा है, क्योंकि इस तरह के इलाज होंगे तो दवा की बिक्री भी कम होगी, इसलिए भी कुछ दवा कम्पिनयाँ चिंता करती हैं. इसलिए इस चिकित्सा विधि पर कई जगह वैज्ञानिक शौध भी किये जा रहे हैं, जैसे कि होलैंड में और प्रारम्भिक परिणाम भी अच्छे लग रहे हैं.

design about excretion donation

यानि वह दिन भी आ सकता है जब अस्पताल में आप का प्रियजन दाखिल हो, तो जैसे रक्तदान के लिए कहते हैं, कभी कभी, डाक्टर आप से थोड़ा सा मलदान कीजिये के लिए भी कह सकते हैं. अक्सर रक्तदान का सुन कर रिश्तेदार भाग उठते हैं, लेकिन मलदान में यह दिक्कत नहीं आनी चाहिये.

आप का क्या विचार है, इस इलाज के बारे में?

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सितम्बर 2026: पंद्रह साल पहले जब यह आलेख लिखा था तब यह नयी बात थी लेकिन आज आँतों में रहने वाले बैक्टीरिया का स्वास्थ्य पर असर सभी वैज्ञानिक मानते हैं। इसे माईक्रोबायोम का नाम दिया गया है।
 
जब ड्रग-रज़िस्टैंट बैक्टीरिया का इन्फैक्शन हो जो किसी एँटीबायटिक से ठीक नहीं हो रहा हो तो उसके लिए अच्छे बैक्टीरिया वाले पाखाने के कैपसूल मिलने लगे हैं। सब्जियाँ खाओ, काँजी पीयो, दही खाओ, प्रोबायोटिक बैक्टीरिया के कैपसूल लो, आदि बहुत से उपचार आज सामान्य हो गये हैं।
 
इसी ज्ञान की वजह से कुछ लोगों का कहना है कि घर में गोबर लीपना या गौमूत्र अच्छा मानना जैसे विचारों के पीछे भी ऐसी ही कोई बात थी और इस पर भी हिन्दुस्तान में कुछ शोध शुरु किये जा रहे हैं।
 
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मंगलवार, फ़रवरी 22, 2011

बात निकलेगी तो ..

तीस पैंतीस साल पहले जगजीत सिंह का एक गीत था जो मुझे बहुत प्रिय था, "बात निकलेगी तो बहुत दूर तलक जायेगी ..". आज अचानक इटली के "फासीवाद" के बारे में छोटी सी बात से एक खोज शुरु की, वह मुझे ऐसे ही जाने कहाँ कहाँ घुमाते हुए बहुत दूर तक ले आयी. दरअसल बात शुरु हुई थी शहीद भगत सिंह से.

मैं पढ़ रहा था शहीद भगत सिंह के दस्तावेज़. लखनऊ की राहुल फाऊँडेशन ने 2006 में, श्री सत्यम द्वारा सम्पादित यह नया संस्करण छापा था जिसमें भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़ संकलित हैं. दिल्ली के क्नाट प्लेस की एक दुकान में इस किताब के मुख्यपृष्ठ ने मेरा ध्यान आकर्षित किया था जिस पर नवयुवक भगतसिंह हैं और तस्वीर देख कर सोचा था कि भारत में भगतसिंह का नाम जानने वाले तो थोड़े बहुत अब भी मिल जायेंगे, लेकिन उनकी तस्वीर देख कर पहचानने वाले मुश्किल से मिलेंगे. उनका नाम सोचो तो मन में मनोज कुमार या अजय देवगन या बोबी देवल द्वारा अभिनीत भगत सिंह की छवियाँ ही मन में आती हैं.

Book Cover - documents of Bhagat Singh

जेल में लिखी डायरियों में भगत सिंह ने कई बार इटली के स्वतंत्रता युद्ध और देश को जोड़ने वाले व्यक्तियों जैसे कि माजीनी (Mazzini), कावूर (Cavour) और गरीबाल्दी (Garibaldi) का भी नाम लिया था और उनसे प्रेरणा ले कर भारत का स्वतंत्र स्वरूप कैसे हो इस पर सोचा था. इनके अतिरिक्त, वे विभिन्न इतालवी कम्यूनिस्ट विचारक, जैसे कि अंतोनियो ग्रामशी और रोज़ा लक्समबर्ग, के विचारों से भी प्रभावित थे. इस प्रभाव का एक कारण यह भी था कि 1861 में जब इटली एक देश बना था उस समय उसकी हालत कुछ कुछ पराधीन भारत जैसी थी, छोटे छोटे राजों महाराजों में बँटा देश जो आपस में लड़ते मरते और जिन पर अन्य पड़ोसी देश शासन करते थे.

भगत सिंह की बात सोचते हुए मन में इटली के दूसरे प्रभाव का ध्यान आया, फासीवाद के प्रभाव का, जिससे नाता था भारत के एक अन्य स्वतंत्रता सैनामी का, यानि सुभाष चन्द्र बोस. बोस भी भगत सिंह की तरह इतालवी देश एकाकरण के प्रमुख व्यक्ति जैसे माजीनी और गरीबाल्दी से प्रभावित थे, लेकिन साथ ही वह मुसोलीनी के फासीवाद से भी प्रभावित थे. द्वितीय महायुद्ध के दौरान जब वह कलकत्ता में ब्रिटिश सिपाहियों से बच कर भाग निकले थे, काबुल में इतालवी दूतावास ने उन्हें काऊँट ओरलान्दो मात्जो़त्ता के नाम का झूठा इतालवी पासपोर्ट बनवा कर यूरोप में यात्रा करवायी थी. उनकी सहायता के पीछे, मुसोलीनी का भारत प्रेम नहीं था, बल्कि "दुश्मनों का दुश्मन हमारा दोस्त" का विचार था कि बोस की सहायता करके वह अपने और हिटलर के दुश्मन अंग्रेजों के लिए झँझट बढ़वा रहे थे, लेकिन उन दिनों कुछ समय के लिए सुभाष इटली में रहे थे.

मुसोलीनी के फासीवाद से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निर्माता भी प्रभावित थे और उसी प्रेरणा से उन्होंने अपनी संस्था का निर्माण किया था. क्या अर्थ था फासीवाद का और कहाँ से आया था यह शब्द? फासीवाद को तीसरा मार्ग घोषित किया गया. पहले दो मार्ग थे पूँजीवाद और कम्युनिस्म. फासीवाद राष्ट्रवादी तानीशाही का रास्ता था, जिसमें आज्ञाकारी और अनुशासित प्रजा होना आवश्यक था.

फासीवाद या फाशिस्म शब्द इटली के स्वतंत्रता संग्राम और फ्राँस की क्राँती से ही आया था. इस कथा का प्रारम्भ हुआ 1789 में फ्राँस की गणतंत्र क्राँती से, जिसका नारा था सब लोगों को बराबर अधिकार और स्वतंत्रता. इस क्राँती के 7 वर्ष बाद नेपोलियन की फौज उत्तरी इटली में घुस आयी. उस समय बोलोनिया शहर कैथोलिक धर्म के पोप के साम्राज्य का हिस्सा था और उनका साथ आस्ट्रिया की फौज देती थी. बोलोनिया में आस्ट्रिया की फौज हार गयी, और पोप के निर्युक्त गवर्नर को शहर छोड़ कर भागना पड़ा. उत्तरी इटली में नये गणतंत्र की स्थापना हुई, जिसका नाम रखा गया चिसपादाना और जिसकी राजधानी थी बोलोनिया. फ्राँस की क्राँती के चिन्ह "फाशियो लितोरियो" (Fascio Littorio), यानि रस्सी से बँधी लकड़ियाँ जिनका अर्थ था कि "एकता में शक्ति है", को पोप के नियुक्त गवर्नर के भवन में, पुराने धार्मिक निशान हटा कर, हर तरफ़ बनाया गया. तभी इतालवी झँडे को बनाया गया और उसके तीन रंगों को, लाल सफ़ेद और हरे रंगों को भी भवन में हर तरफ़ बनाया गया. यह गणतंत्र केवल तीन वर्ष चला. फ़िर पोप की सैनायें जीत कर वापस आ गयीं और उन्होंने झँडे के तीन रंगो को ढक दिया. कुछ वर्ष के बाद, नेपोलियन की फौजें फ़िर लौट आयीं, और इस बार पहले से भी बड़ा गणतंत्र बना जिसका नाम रखा गया चिसअल्पाईन और जिसकी राजधानी मिलान बना. फ़िर कभी आस्ट्रिया की मदद से पोप की सैना दोबारा शासन में आती, कभी गणतंत्र वालों का पलड़ा भारी होता. (तस्वीर में बोलोनिया के पुराने गवर्नर के भवन में फाशियो लितोरियो के चिन्ह)

Fascio littorio in Palazzo d'accursio of Bologna

यही दिन थे जब माजीनी, कावूर, गरीबाल्दी जैसे लोगों ने इटली के एकीकरण और स्वतंत्रता का सपना देखना शुरु किया जो 1861 में जा कर पूरा हुआ. इस वर्ष इस एकीकरण की 150वीं वर्षगाँठ मनायी जा रही है. जब मुसोलीनी का समय आया और 1925 में उन्होंने फासीवाद की स्थापना की, तो उनकी प्रेरणा स्वतंत्रता और एकीकरण संग्राम के वही पुराने चिन्ह थे, फाशियो लितोरियो, यानि रस्सी से बँधी लकड़ियाँ, यानि देश की एकता का चिन्ह, उसी फाशियो से फ़ाशिस्तवाद का नाम रखा गया.

यानि बात जहाँ से शुरु हुई थी, घूम कर वहीं वापस आ गयी, और हम सब माजीनी, गरिबाल्दी के साथ जुड़े इतिहास के इन पन्नों को भूल गये, जिन्होंने भगत सिंह और सुभाष चन्द्र बोस को प्रेरणा दी थी.

कभी यूरोप में आने वाले भारतीयों के लिए इटली से हो कर जाना आवश्यक था, क्योंकि सुएज़ कनाल से हो कर आने वाले पानी के जहाज़ दक्षिण इटली के बारी शहर में रुकते थे, फ़िर बारी से बर्लिन, पेरिस और लंदन तक की यात्रा रेलगाड़ी से की जाती थी. महात्मा गाँधी, रविन्द्रनाथ टैगोर, सुभाषचन्द्र बोस, जवाहरलाल नेहरू, राम मनोहर लोहिया, मदन मोहन मालवीय, सरदार पटेल, सब लोग कभी न कभी इटली से गुज़रे थे. (तस्वीर में बारी की बंदरगाह)

Port of Bari, 2008

तब बोलोनिया शहर का रेलवे स्टेश्न उत्तर तथा मध्य इटली को जोड़ता था, अक्सर यहीं पर गाड़ी बदलनी पड़ती थी. शहर में घूमते समय कभी सोचो कि शायद एक बार यहाँ सुभाष बाबू आये थे, कहाँ रुके होंगे? किसके साथ थे, क्या सोचते होगे? तब तो उन्हें यहाँ के लोग नहीं जानते थे, किसने सहारा दिया होगा ऊन्हें? मन करता है कि बीते हुए कल में जाने वाली चिड़िया बन जाऊँ, इस सारे इतिहास को देखने और समझने.

बातों से बातों का सिलसिला जुड़ता जाता है, और मन कभी एक ओर जाता है, कभी दूसरी. बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी ...

शुक्रवार, फ़रवरी 18, 2011

नारी मुक्ति की संत

शरीर की नग्नता में क्या नारी मुक्ति का मार्ग छुपा हो सकता है? कर्णाटक की संत महादेवी ने वस्त्रों का त्याग करके अपने समय के सामाजिक नियमों को तोड़ा था. क्यों?

Akka Mahadevi - Scribbles on Akka
मधुश्री दत्ता की सन् 2000 की डाक्यूमेंटरी फ़िल्म "स्क्रिब्बल्स आन अक्का" (अक्का पर लिखे कुछ शब्द - Scribbles on Akka) देखने का मौका मिला जो बाहरवीं शताब्दी की दक्षिण भारतीय संत अक्का महादेवी की कविताओं के माध्यम से उनके क्राँतिकारी व्यक्तित्व को विभिन्न दृष्टिकोणों से देखने का प्रयास है. फ़िल्म उन असुविधाजनक व्यक्तित्वों के बारे में सोचने पर बाध्य करती है जो समाज के हो कर भी धर्म के नाम पर, समाज के नियमों को तोड़ने का काम करते हैं पर जिनका समाज पर इतना गहरा प्रभाव होता है कि चाह कर भी उनको छुपाया या भुलाया नहीं जा सकता.

महादेवी या अक्का (दीदी) बाहरवीं शताब्दी की वीरशैव धार्मिक आंदोलन का हिस्सा मानी जाती हैं. वीरशैव आंदोलन में वैदिक कर्मकांड, मूर्तिपूजा, जाति भेदभाव, अवतारवाद, अंधश्रद्धा आदि को बाधक ठहराया और अल्लमप्रभु, अक्कमहादेवी, चेन्न-बंसव तथा सिद्धराम जैसे संतों ने जातिरहित, वर्णरहित, वर्गरहित समाज के निर्माण की कोशिश की. इन संतों के लेखन वचन साहित्य के नाम से प्रसिद्ध हुए जो कि गद्य शैली में लिखी कविताएँ हैं.

कणार्टक में शिमोगा के पास के उड़ुथाड़ी गाँव में जन्मी अक्कमहादेवी ने जब सन्यास लिया तो केवल घर परिवार ही नहीं छोड़ा, वस्त्रों का भी त्याग किया और उनके लेखन ने नारी शरीर और नारी यौनता के विषयों को जिस तरह खुल कर छुआ, वह सामान्य नहीं है. जैसे सुश्री लवलीन द्वारा अनुवादित अक्कमहादेवी की इस कविता को देखियेः
वस्त्र उतर जाएँ
गुप्त अंगों पर से तो
लज्जा व्याकुल हो जाते है जन
तू स्वामि जगत का, सर्वव्यापि
एक कण भी नहीं , जहाँ तू नहीं
फिर लज्जा किस से?
चेनामल्लिक अर्जुना देखे जग को
बन स्वयं नेत्र
फिर कैसे कोई ढके,
छिपाए अपने को?
(डा. रति सक्सेना द्वारा सम्पादित वेबपत्रिका "कृत्या" से )

मधुश्री दत्ता की डाक्युमेंटरी में आज की आधुनिक व्यवस्था में अक्का महादेवी किस रूप में जीवित हैं, इसको विभिन्न दृष्टिकोणों से देखने की चेष्ठा है. गाँव में गणदेवी की तरह, औरतों के कोपोरेटिव में, जहाँ उनके नाम से पापड़ और अचार बनते हैं, काम करने वाली औरतों की दृष्टि में, म़ंदिर के पुजारी और धर्म ज्ञान की विवेचना करने वाले शास्त्री की दृष्टि में, फेमिनिस्ट लेखन और चित्रकला में, महादेवी विभिन्न रूपों में दिखती हैं. इन विभिन्न रूपों में सामान्य जन में उनका रूप उनके व्यक्तित्व को धर्म मिथिकों में छुपा कर, मन्दिर में पूजने वाली देवी बना देता है, जिसमें उनके वचनों की क्राँति को ढक दिया जाता है. लेकिन फ़िल्म में उनकी एक भक्त का साक्षात्कार भी है जिसने गाँव में अक्का महादेवी के मंदिर के आसपास भक्तों के लिए सुविधाएँ बनवायी हैं और जो महादेवी के असुविधाजनक संदेश को छुपाने के प्रयास पर हँसती है.

Akka Mahadevi - Scribbles on Akka

फ़िल्म में महादेवी के कुछ वचनों को गीतों के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिन्हें सुश्री सीमा बिस्वास पर विभिन्न परिवेशों में फ़िल्माया गया है, जिनमें एक परिवेश है एक ईसाई गिरजाघर में एक स्त्री द्वारा नन बनने की रीति, यानि महादेवी की बात को एक धर्म की सीमित दायरे से निकाल कर इन्सान के मन में ईश्वर से मिलने की ईच्छा के रूप में देखने की चेष्ठा.

Akka Mahadevi - Scribbles on Akka

फ़िल्म को देख कर मानुषी में पढ़े मधु किश्वर के एक पुराने आलेख की याद आ गयी जिसमें बात थी किस तरह गाँव में रहने वाली औरतें सीता मैया के पाराम्परिक गीतों के माध्यम से नारी मुक्ति की बात उठाती हैं. परम्परागत समाज में जहाँ नारी चारों ओर से नियमों में बँधी हो जिनमें उसकी अपनी इच्छाओं आकाँक्षाओं के लिए जगह न हो, वहाँ महादेवी जैसी नारी के विचारों को धर्म स्वीकृति मिलना थोड़ी सी जगह बना सकता है जहाँ सामाजिक नियमों की परिधि से बाहर जाने की अभिलाषा की अभिव्यक्ति हो सकती है.

महादेवी का व्यक्तित्व शारीरिक नग्नता को केवल लज्जा का कारण सोचने पर भी प्रश्न उठाता है. फ़िल्म में कुछ चित्रकार अक्का महादेवी के नग्न शरीर को ईश्वर का प्रतिरूप देखते हैं, तो कुछ इसमें नारी मुक्ति की चिंगारी. परम्परागत समाज को चुनौती देती महादेवी की छवि की जटिलता को ब्राह्मण विद्वान भी स्वीकारते हैं और आम व्यक्ति भी.

Akka Mahadevi - Scribbles on Akka

मेरी दृष्टि में फ़िल्म का अंतिम संदेश यही है कि भारत के विभिन्न हिस्सों में धर्म के संदेश को अलग अलग दृष्टिकोणों से देखा और समझा गया है. यही अनेकरूप विभिन्नता ही हिंदू धर्म की शक्ति रही है. इस जटिलता को सहेजना आज के भूमण्डलिकरण से जकड़े संसार में परम आवश्यक है, जहाँ सामाजिक जटिलताओं का सरलीकरण एवं ऐकाकीकरण करने की लालसाएँ बढ़ती जा रही हैं.

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रविवार, फ़रवरी 06, 2011

प्रेम निवेदन

हिन्दी फ़िल्मों के गानों में हमारे जीवन के सभी सुखों दुखों का हाल छिपा है. चाहे कोई भी मौका हो, मुंडन से ले कर मैंहदी तक, करवाचौथ से ले कर क्रियाकर्म तक, खाना बनाते समय सब्ज़ी जल गयी हो या काम पर जाते समय बस छूट गयी हो, प्रेयसी मिलने आये या दगा दे जाये, पापा गुस्सा हों या माँ ने मन पसंद खीर बनायी हो, कुछ भी मौका हो, बस उसका गीत मन में अपने आप आ जाता है. और चाहे उसे गायें या न गायें, मन में अपने आप ही गूँज जाता है. क्या आप को भी लगता है कि बिना इन गानों के जीवन का रस कुछ कम हो जायेगा?

और क्या आप के साथ कभी ऐसा हुआ है कि अचानक कोई गीत सुनते सुनते, अपने जीवन की वह बात समझ में आ जाती है जिस पर कभी ठीक से नहीं सोचा था? मेरे साथ यह अक्सर होता है.

अगले वर्ष मेरे विवाह को तीस साल हो जायेंगे. काम के लिए अक्सर देश विदेश घूमता भटकता रहता हूँ. इन्हीं यात्राओं से जुड़ी एक बात थी, जो अचानक "तनु वेड्स मनु" का एक गाना सुनते समय समझ आ गयी.

गाना के बोल लिखे हैं राजशेखर ने और गाया है मोहित चौहान ने . गाने के बोल हैं -
कितने दफ़े मुझको लगा
तेरे साथ उड़ते हुए
आसमानी दुकानो से ढूँढ़ के
पिघला दूँ यह चाँद मैं
तुम्हारे इन कानों में पहना ही दूँ
बूँदे बना
फ़िर यह मैं सोच लूँ समझेगी तू
जो मैं न कह सका
पर डरता हूँ कहीं
न यह तू पूछे कहीं
क्यों लाये हो ये यूँ ही
गाना सुना तो लगा कि वाह गीतकार ने सचमुच मेरे मन की बात को कैसे पकड़ लिया.

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देश विदेश में घूमते समय कई बार कुछ दिख जाता है जो लगता है कि बहुत सुन्दर लगेगा मेरी पत्नि पर. पर साथ में मन में यह भी भाव होता है कि शायद वह बिना कहे ही समझ जायेगी वह बात जो कह नहीं पाता हूँ. पर अक्सर होता है कि वह मेरी भेंट देख कर नाक सिकोड़ लेती है, "यह क्या ले आये? बिल्कुल ऐसा ही तो पहले भी था." या फ़िर, "क्यों बेकार में पैसे खर्च करते हो, तुम्हे मालूम है कि मैं इस तरह की चीज़ें नहीं पहनती."

और मन छोटा सा हो जाता है. सोचता हूँ, यूँ ही बेकार खरीद लिया. आगे से नहीं खरीदूँगा. पर अगली यात्रा में फ़िर भूल जाता हूँ. प्रेम निवेदन कैसे हो? यह नहीं होता, शायद उम्र का दोष है. आजकल के जोड़े तो आपस में "लव" या "माई लव" करके बोलते हैं, पर मुझसे इस तरह नहीं बोला जाता.

हर बार आशा रहती है कि वह मेरे मन की बात को बिना कहे ही समझ जाये. कभी लगता है कि वह मेरे मन की बात को समझती ही है, उसमें भेंट लाने या न लाने से कुछ नहीं होता?

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शनिवार, फ़रवरी 05, 2011

गालिब खड़े बाज़ार में

अमरीकी विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका और कवयत्री रीटा डोव का  डिजिटल युग की कविता के बारे में वीडियो देख रहा था. इस तरह के वीडियो देखना मुझे बहुत अच्छा लगता है. अपने मन पसंद विषयों पर कवियों, विचारकों, वैज्ञानिकों, लेखकों, दर्शकों, इतिहासकारों आदि को सुनना, जब जी करे तब. बिना यह चिन्ता करे कि कितने बजे टीवी या रेडियो पर आयेगा, अपनी मर्ज़ी से जब जी चाहे देखो और जितनी बार चाहे देखो कि अब ऐसी आदत पड़ी है कि सामान्य टीवी बहुत कम देखता हूँ.

बिग थिंक, टेड, 99 प्रतिशत, पोपटेक, जेल वीडियो कोनफ्रैंस, रिसर्च चैनल, वीडियो लेक्चर, जाने कितनी जगहें हैं जहाँ पर जानने समझने के लिए खजाने भरे हैं, और कोई फीस या घर से बाहर जाने की भी आवश्यकता नहीं. जब हम स्कूल जाते थे तो किसी विषय पर कुछ जानने समझने के लिए बस स्कूल की किताबें ही थीं. एनसाईक्लोपीडिया या फ़िर विषेश किताबें कभी पुस्कालय में पढ़ने को मिल जाती, पर यह कभी कभी ही होता. आज आप सरकारी स्कूल में हों या कानवैंट में, विश्वविद्यालय में हों या मेरे जैसे घर में बैठ कर दिलचस्पी रखने वाले, कोई भी विषय हो, दुनिया के जाने माने विशेषज्ञ उसके बारे में क्या कहते हैं, हार्वर्ड, कैमब्रिज या मिट जैसे जगतविख्यात विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर क्या पढ़ाते हैं, जाने माने डाक्यूमैंट्री बनाने वालों ने उस पर क्या फ़िल्म बनायी है, सब कुछ देखना सुनना  आसान. बस इंटरनेट चाहिये. चाहे अभी भी अधिकाँश स्कूल पाठ्यक्रम में रखी किताबों के रट्टे ही लगवायें, पर भविष्य में ज्ञान जाँचने के तरीके अवश्य बदलने पड़ेंगे.

कवयत्री रीटा डोव कहती हैं कि साहित्य की सभी विधाओं में से कविता आज के डिजिटल युग के सबसे उपयुक्त है, क्योंकि आज कल लोगों का ध्यान किसी बात पर थोड़ी सी देर के लिए ही जुड़ता है. कविता को ट्विटर के माध्यम से आसानी से बाँटा जा सकता है, दुनिया में कहीं भी पलों में पहुँचा सकते हैं, जो डिजिटल युग में कविता के बहुत उपयोगी है. आज जिस तरह से इंटरनेट पर वीडियो देखना आसान हो गया है, इससे यह भी आवश्यक नहीं कि आप कविता को पढ़ें, बल्कि आप कविता को उसके कवि के मुख से भी सुन सकते हैं. सुश्री डोव की बातें मुझे बहुत दिलचस्प लगीं, अगर आप चाहें तो उनकी पूरी बात को सुन सकते हैं.

रीटा डोव का वीडियो देखने के बाद सोच रहा था कि समय के साथ कविता कैसे बदली. उस समय जब किताबें नहीं थीं, प्रिटिंग प्रेस का आविष्कार नहीं हुआ था, तब कविता केवल बोलने और गाने के माध्यम से ही जानी जा सकती थी. गाँवों में घूमने वाले कविता कहानियाँ गाने वाले पारम्परिक कलाकार उन्हें कँठस्थ याद करते थे, इसलिए कविता और कथा का विषेश तरह से विकास हुआ जिसमें याद करने और गाने में आसानी हो. शायद इसी तरह गज़ल और शेरों का भी प्रचलन हुआ क्योंकि उनमें शब्दों का दोहराव और धुन, बोल कर या गा कर सुनाने के लिए ही बने थे.

फ़िर समय आया छपाई की प्रेस का और किताबों का. एक दशक पहले तक छपाई की तकनीक आसान नहीं थी और कुछ छपवाने में पैसा भी लगता था. तभी किताब छापना, बेचना, जैसे व्यव्साय बने, किताबें छापने वाले बने.

आज की दुनिया में लिखने पढ़ने की नयी क्राँती आ रही है. इंटरनेट, ईमेल, फेसबुक जैसे माध्यमों ने कविता, कहानी और उपन्यास, लिखना, पढ़ना, बाँटना, सबको बदल दिया है. लेखकों का गणतंत्र है, हर कोई चिट्ठा बना ले, जो मन में आये लिख ले. अगले ही क्षण, चाहे तो आप पढ़िये, उस पर टिप्पणी लिखिये, उसकी आलोचना कीजिये या प्रशँसा.

पर इतनी भीड़ में अच्छे लेखक और कवि कहीं खो तो नहीं जायेंगे? सचमुच सब अच्छे कवि लेखक, क्या इंटरनेट और फैसबुक से अपने पढ़नेवालों तक पहुँच पायेंगे? यानि अगर आज गालिब या महादेवी वर्मा लिखना शुरु करते, अपना चिट्ठा बनाते, फैसबुक पर पन्ना बनाते, तो क्या सचमुच गालिब और महादेवी वर्मा जैसा बन पाते? और आज के गालिब या महादेवी वर्मा को अगर न चिट्ठा लिखने में दिलचस्पी हो, न उनका कोई फैसबुक पर पन्ना हो, तो क्या आज वह गालिब और महादेवी वर्मा बन पायेंगे?

Ghalib Mahadevi Varma, collage

फैसबुक पर मिर्ज़ा गालिब के पन्ने के चालिस हज़ार से अधिक फैन हैं, जबकि महादेवी वर्मा के पन्ने को केवल छः सौ लोग चाहते हैं.

पर जिन्हें इन माध्यमों से खुद को बेचना आता है, जिन्हें अड़ोसियों पड़ोसियों को बेझिझक संदेश भेज कर अपनी प्रशँसा करना करवाना आता है, जिन्हें प्रतियोगिताओं में अपने लिए वोट माँगना आता है, उनके पीछे तो लाखों जाते हैं, उनके सामने क्या भविष्य के गालिब जी या महादेवी जी टिक पायेंगे? और अगर आप शर्मीलें हैं, खुद को बेझिझक बेच नहीं सकते तो क्या आप का लेखन घटिया माना जाये?

अगर गालिब या महादेवी आज ज़िन्दा होते तो क्या उन्हें अपनी कला को समझने वाले मिलते? आप का क्या विचार है?

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गुरुवार, फ़रवरी 03, 2011

फुरसत के रात दिन

कुछ दिन पहले पंडित भीमसेन जोशी के देहावसान का समाचार पढ़ा तो 1975-76 के वो दिन याद आ गये जब उन्हें पहली बार सुना था. पहले तो परम्परागत शास्त्रीय संगीत में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं थी, लगता था कि बस "आ आ" करते रहते हैं जिसमें मुझे कोई रस नहीं मिलता था. तब छोटी बुआ दिल्ली के जानकीदेवी महाविद्यालय में पढ़ाती थीं और महाविद्यालय परिसर के अन्दर ही हँसध्वनि के घरों में रहती थीं. मेरा खाली समय अक्सर वहीं गुज़रता था. दीदी या भाँजे के साथ बड़े मैदान में घूमते घूमते, बाते चुकती ही नहीं थीं.

जानकी देवी में नहीं होता था तो शंकर रोड पर मित्रों के साथ होता. कालिज से घर आ कर, एक बार मित्रों के साथ घूमने और गप्प मारने के लिए निकलता तो रात को देर तक घर वापस नहीं लौटता था. तब सब मित्रों के नाम, काका, मुन्ना, शिशु, नानी, पप्पू, आदि, सभी छोटे बच्चों को प्यार से पुकारने वाले नाम ही थे.

वहीं जानकी देवी में हँसध्वनि वाले घर में ही पहली बार शास्त्रीय संगीत की सुंदरता मन में समझ आयी थी जब पहली बार फ़ूफ़ा ने कुमार गंधर्व का निरगुणी भजनों वाला रिकार्ड सुनवाया था.
उड़ जायेगा, उड़ जायेगा
हँस अकेला
जग दर्शन का मेला
एक बार मन को शास्त्रीय संगीत का रस चखने का स्वाद लगा तो फ़िर तो लत ही पड़ गयी. उन्हीं दिनों में शाम को जानकी देवी महाविद्यालय वालों की तरफ़ से, छात्राओं की शास्त्रीय संगीत से पहचान कराने के लिए जाने माने गायकों और संगीतकारों को बुलाया जाने लगा. तब कुमार गँधर्व को सुना, पंडित भीमसेन जोशी को सुना, पंडित जसराज को सुना. कालेज के रंगमँच पर जब वह गाने की तैयारी करते तो हम बच्चे लोग वहीं आसपास घूमते, वैसे भी सुनने वालों की बहुत भीड़ नहीं होती थी, बस पचास सौ लोग जमा हो जाते थे. तो उन्हें सुनने के साथ साथ, व्यक्ति को भी करीब से देखने का मौका मिलता था.

अब पैंतीस साल बाद, शास्त्रीय संगीत को सुने ज़माना बीत गया. कुछ वर्ष पहले सुश्री अश्विनी भिड़े देशपाँडे और श्री उदय भवालकर जब बोलोनिया आये थे, तभी अखिरी बार ठीक से बैठ कर उन्हें सुना था. भारत से कोई गायक आये तो उसे सुनने जाना और बैठ कर ठीक से सुनना तो हो जाता है, लेकिन आम दिनों में अब नहीं सुना जाता, शायद क्योंकि अब ध्यान को एक जगह या एक बात पर रोकने की आदत कम होती जा रही है. इस लिए नयी फ़िल्म का गाना हो या भीमसेन जोशी का भजन, कुछ अन्य काम करते हुए साथ साथ सुनते रहो, यह तो होता है लेकिन ध्यान से बैठ कर पाँच दस मिनट से अधिक कुछ सुनना पड़े तो मन अधीर हो जाता है.

फेसबुक पर 700 से अधिक मित्र हैं. क्या नाम हैं, कौन क्या करता है, कहाँ रहता है, इस सब से कुछ मतलब नहीं. कभी किसी की लिखी किसी बात पर नज़र पड़ी तो "लाइक" का बटन दबा दिया, या फ़िर बहुत अच्छा लगा तो कुछ लिख भी दिया, दो मिनट बाद ही याद नहीं रहता कि किसको क्या लिखा था. मित्र सुख दुख के नहीं, नलके की टूटी हैं, जब दिल किया खोल कर एक घूँट पिया, नहीं किया तो टूटी बंद रखी. लगे कि अधिक बातें करके मित्र हमारा समय बरबाद कर रहे हैं तो कहा कि हम व्यस्त हैं और गूगल चेट को बंद कर दिया. दो मिनट कोई वीडियो देखा, विषेश आनन्द नहीं मिला तो बन्द किया और कुछ अन्य पन्ना खोल लिया.

तो ऐसे में लम्बी तान ले कर राग शुरु होगा, तो कैसे चलेगा? इसे तो धीमे स्वर में वातावरण बनाने के लिए चलाईये, बस पृष्ठभूमि हल्की सी आवाज़ आये. आवाज़ तेज़ होगी तो परेशानी होगी, जिससे काम ठीक से नहीं होता.

हाँ भूपेन्द्र का गाना आये कि "दिल ढूँढ़ता है फ़िर वही फुरसत के रात दिन", तो एक पल के लिए मन भावुक हो जाता है. कितने अच्छे दिन थे! कैसा लगा था जब पहली बार प्रभा अत्रे को सुना था, या जब पहली बार किशोरी आमोनकर का "म्हारो प्रणाम" सुना था. फ़िर कुछ क्षणों में मन किसी और बात में लग जाता है.

बस मस्त रहिये जी, अधिक सोचा नहीं करते, यही ब्रह्ममंत्र है आज का. बहुत भावुकता आ रही हो तो फेसबुक पर लिख दीजिये, "आज हम उदास हैं", आप के दसियों मित्र आप का "लाईक" का बटन दबा कर, या कुछ लिख कर, उदासी को भगा देंगे.

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