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रविवार, अक्टूबर 04, 2026

कुँवर नारायण - तीन कविताएँ

"कल्पना" पत्रिका हैदराबाद से निकलती थी। इसका कार्यालय 516 सुल्तान बाज़ार में था और इसके प्रकाशक मधुसूदन चतुर्वेदी थे। जुलाई 1960 में इसके सम्पादक मँडल के सदस्य थे - डा. आयेन्द्र शर्मा (प्रधान), मधुसूदन चतुर्वेदी, बद्रीविशाल पित्ती, मुनीन्द्र, जगदीश मित्तल (कला), गौतम राव।

उन दिनों में मेरे पिता ओम प्रकाश दीपक हैदराबाद में रहते थे और "मैनकाईन्ड" नाम की अंग्रेज़ी पत्रिका के लिए काम करते थे जिसका दफ्तर "कल्पना" के साथ जुड़ा था, और दोनों पत्रिकाएँ एक ही प्रकाशक द्वारा, एक ही प्रिटिन्ग प्रैस से छपती थीं।

साथ की हमारी पारिवारिक तस्वीर उन्हीं दिनों की है। यह जून 1960 में ही ली गयी थी जब हम गर्मियों की छुट्टियों में हैदराबाद गये थे, और राजा दुबे के घर पर ठहरे थे। इस तस्वीर में जाने माने उद्योगपति और डॉ. लोहिया की समाजवादी पार्टी के सहयोगी बद्रीविशाल पित्ती भी हैं। यह मेरे छठे जन्मदिन पर खींची गयी थी। उन्हीं दिनों में पित्ती जी के घर पर प्रसिद्ध चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन साहब से भी मुलाकात याद है। 

खैर "कल्पना" के जुलाई 1960 अंक में मेरे पिता की एक कहानी छपी थी, जिसे इस ब्लॉग पर छापने की बहुत दिनों से सोच रहा था। आज जब वह पत्रिका निकाली तो उसमें कुँवर नारायण की तीन कविताएँ देखीं जो मेरे विचार में इंटरनैट पर उपलब्ध नहीं हैं। उन्हें साझा कर रहा हूँ। अगले दिनों में "कल्पना" के इस अंक से कुछ अन्य सामग्री भी साझा करने का विचार है।

***

कुँवर नारायण की तीन कविताएँ

बन्धु यह तो ...

डूब कर जो कुछ उबारा
ज़िन्दगी है;
टूट कर जो कुछ सँवारा
ज़िन्दगी है;
आँख के नम आईने में चकमकाती सूरतें
सूरज नहीं हैं
जो छलक कर दूसरा सूरज बना लें !
दीखती हैं क्यों कि कोई देखता है,
देखती हैं क्योंकि कोई दीखता है;
और वह स्रष्टा
वही स्रष्टा नहीं है
आस्था जिसके सृजन में
कभी रक्खी कभी चकनाचूर की ।
 
ज़िन्दगी आखिर रहे क्यों
याचना जैसे किसी मजबूर की ?
बन्धु, यह तो
देन है अच्युत लबालब आत्मा की,
सृष्टी छलकन है किसी भरपूर की ।
 

सवेरे-सवेरे

 
कार्तिक की एक हँसमुख सुबह ।
नदी-तट से लौटती गंगा नहा कर
सुवासित भीगी हवाएँ
सदा पावन
माँ सरीखी
अभी जैसे मन्दिर में चढ़ा कर खुशरंग फूल
ठंड से सीत्कारती घर में घुसी हों,
और सोते देख मुझको जगाती हों ----
सिरहाने रख एक अँजुलि फूल हरसिंगार के,
नर्म ठंडी उँगलियों से गाल छू कर प्यार से,
बाल बिखरे हुए तनिक सँवार के ...
 

कार्निस पर

 
कार्निस पर
एक नटखट किरण बच्चे-सी
खड़ी जंगला पकड़ कर,
किलकती है, "मुझे देखो !"
 
साँस रोके ---
बाँह फैलाए खड़ा गुलमुहर ...
कब वह कूद कर आ जाये उसकी गोद में !
 
*** 

शुक्रवार, सितंबर 18, 2026

क्या पढ़ा (2) - कहानी, कविता, आलेख

कुछ माह पहले मैंने निश्चय किया था कि मैं अपनी डायरी लिखूँगा कि हिंदी में क्या पढ़ा जो अच्छा लगा और इस डायरी का पहला भाग अगस्त के प्रारम्भ में लिखा था। आज इस डायरी का दूसरा भाग प्रस्तुत है।

मैं अधिकतर तीन भाषाओं में लिखता-पढ़ता हूँ - हिंदी, अंग्रेज़ी और इतालवी, पर कभी-कभी फ्राँसिसी और पुर्तगाली में भी पढ़ना पड़ता है। जैसे कि सुबह हिंदी, अंग्रेज़ी और इतालवी में अखबार पढ़ी, फिर कोई हिंदी पत्रिका पढ़ी, दोपहर में अंग्रेज़ी उपन्यास पढ़ा और रात को सोने से पहले कोई इतालवी पत्रिका पढ़ी। सपने भी इन तीनों भाषाओं में देखता हूँ। मेरे विचार में हर भाषा में हमारे सोचने का तरीका बदल जाता है, तो मेरे इस तरह से तीनों भाषाओं में लगातार बदलने से मेरे सोचने पर क्या असर पड़ता है, यह प्रश्न भी अक्सर मन में उठता है लेकिन समझ नहीं आता कि उसका उत्तर कैसे खोजा जाये?

इस बार मैंने जो हिंदी में पढ़ा उसे तीन भागों में बाँटा है - आलेख, कहानियाँ और कविताएँ। यह सब कुछ मैंने विभिन्न पत्रिकाओं में ॲानलाइन पोर्टल नॉटनुल पर पढ़ा।


 

खैर, अब उस पर आते हैं कि इस बार मुझे क्या पढ़ना अच्छा लगा, और शुरुआत करते हैं आलेखों से। अच्छा लगने के मूल्यांकन की मेरी पहली और सबसे बड़ी कसौटी है कि मैं किसी कहानी या आलेख को अंत तक पढ़ पाया या नहीं। पढ़ने को इतना कुछ है और दिन में केवल 24 घंटे होते हैं, जिसमें रुचि नहीं जागे, उसे तुरंत वहीं छोड देता हूँ।

हिंदी आलेख 

हँस पत्रिका के अगस्त 2026 अंक में अनुज लुगुन का अतिथि संपादकीय: हँस का यह अंक जनजातियों की संस्कृति, भाषाओं और जीवन पर केन्द्रित है, मुझे यह अंक पढ़ना बहुत अच्छा लगा। लुगुन जी अपने सम्पादकीय में 1970 के दशक में शुरु हुआ कोइलकारो बांध के विरुद्ध जन आंदोलन जो तीस सालों तक चला, से शुरु करके विभिन्न विषयों को छूते हैं जैसे कि - मूलनिवासियों के सांस्कृतिक-अध्यात्मिक पुनर्निवास की माँग, आदिवासी नागरिकों को दो संवैधानिक अनुच्छेदों में बाँटना (पाँचवीं और छठी अनुसूची), कानजी पटेल के "अनुत्तरित लोग" में आदिवासी कवियों का संकलन जिसमें 141 आदिवासी भाषाओं में 382 कवियों की कविताएँ मूलभाषा और हिंदी में संकलित की गयीं, आदिवासी यानि असुर-राक्षस के रूप में स्वयं अपनेआप को देखते हैं।

हँस के इसी अंक में सावित्री बड़ाईक का एक रोचक आलेख भी है, "असुरों की सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेज", जिसमें वह बताती हैं कि हिंदू ग्रंथों में जिन्हें असुर कहा गया है वह छोटानागपुर के पठार में रहते हैं, आदि। इस आलेख को पढ़ कर सोच रहा था की प्राचीन सीरिया के असुर राजाओं, जैसे कि असुर बनिपाल, जिनकी कहानियाँ और इतिहास मेसोपोटेमिया की पक्की मिट्टी की तख्तियों पर मिली हैं और भारत की असुर जनजातियों में क्या सम्बंध था या कोई सीधा सम्बंध नहीं था? 

हँस में ही अनामिका अनु द्वारा लिखी तीजन बाई की जीवनी का एक अंश, शीर्षक "अपनी नाक खुद सम्भाले यह समाज" जिसमें तेरह साल की लड़की के घर से निकाले जाने की बात है क्योंकि पाण्डवानी को ऊँचे स्वर और जोश में ही गा कर उसका अभ्यास करना पड़ता है और कोई उसे गाते हुए सुन लेता था, अच्छा लगा। इस आलेख की पहली पंक्ति, "धूँए से उठी, लोगों की आँखों में लगी", बहुत सुंदर लगी, उसमें तीजन बाई के जीवन का सार दिखता है।

पाखी के अगस्त अंक में "पाखी संवाद - जहाँ शब्द डरते नहीं" में शिवकुमार बटालवी और ताराशंकर वंद्योपाध्याय का स्मृति आलेख अच्छा लगा। वंद्योपाध्याय के लेखन की बात करते हुए कहते हैं, "इस उपन्यास में उन्होंने समाज के उस हिस्से को केन्द्र में रखा जिसे मुख्यधारा का साहित्य अक्सर अनदेखा कर देता था। वहाँ के लोगों की भाषा, उनके रीति-रिवाज, उनके भय, उनकी आस्थाएँ और उनके सपने - सब कुछ इतनी प्रमाणिकता से चित्रित है कि पाठक स्वयं उस संसार का हिस्सा बन जाते हैं।" मुझे भी हिंदी कहानियाँ-उपन्यास पढ़ते समय, लेखकों का यही कौशल आकर्षित करता है, कि अनदेखे-अनजाने लोगों के जीवन की झलक मिले। पाखी संवाद के इन आलेखों से मुझे उनकी पाखी संवाद यूट्यूब की चैनल का भी पता चला, और अब उनके विडियो देखने-सुनने का मौका भी मिलेगा।  

अकार पत्रिका के अगस्त अंक के प्रारम्भ और अंत में मुख्यपृष्ठों के पीछे मिर्ज़ा हादी रुसवा के उपन्यास उमराव जान अदा के हिंदी अनुवाद का एक छोटा सा अंश दिया है जो बहुत सुंदर लगा। इस अंश में पता चलता है कि उमराव जान के समय में तवायफों की तालीम में और उपन्यास लिखने वाले लेखक को, शास्त्रीय संगीत के विभिन्न रागों और उनके सुरों की गहरी पहचान होती थी। यह जान कर भी थोड़ा सा आश्चर्य हुआ कि उपन्यास का यह अनुवाद गुलशन नन्दा ने किया था। अपने समय में गुलशन नन्दा जी शायद हिंदी के सबसे प्रसिद्ध लेखक थे। बचपन की रेलयात्राओं में मुझे उनके विभिन्न उपन्यास पढ़ना याद है। उनके बहुत से उपन्यासों पर सफल फिल्में भी बनी थीं। लेकिन जैसा हिंदी लेखन जगत में अक्सर होता है, लोकप्रियता को अ-साहित्यिक माना जाता है, और जब हिंदी के बड़े लेखकों की बात होती है, शायद कोई गुलशन नन्दा को उनमें नहीं गिनता।

अकार पत्रिका के अगस्त अंक में प्रियंवद जी का संपादकीय, जहाँगीर के अंग्रेज सलाहकार हॉकिन्स द्वारा लिखे बादशाह जहाँगीर के एक दिन के ब्यौरे के बारे में है। उसे पढ़ते हुए सोच रहा कि उस जमाने में और आज में किंतना अंतर आया है, जो चीजे हमें इतनी आसानी से मिल जाती हैं कि हम उनके बारे में सोचते भी नहीं हैं, उस समय वह बादशाह को भी नहीं मिलती थीं। अगर जहाँगीर के पास ट्विटर, टिकटॉक, इंस्टाग्राम होते तो वह अपना सारा दिन कैसे बिताते? अगर उनके पास फ्रिज होता तो वह उसमें अपने लिए कौन सी आईसक्रीम रखवाते? अगर उनके पास टीवी होता तो क्या वह किस तरह के प्रोग्राम व फिल्में देखते या शायद वह भी अमिताभ बच्चन के फैन हो जाते? अगर उनके पास माईक्रोवेव होता तो क्या वह अपने लिए कॉफी बना कर पीते? या फिर, हवाई जहाज में घूमते हुए ट्रम्प या पुतिन से दोस्ती बनाते? या फिर, अनुराग कश्यप की फिल्म देख कर कहते, "कितनी गालियाँ लगाता है यह आदमी अपनी फिल्मों में, लाहोल विला कुव्वत! इसे फाँसी पर चढ़ा दिया जाये।"

कथाक्रम के सितम्बर अंक में ही लोकबाबू के उपन्यास "बस्तर-बस्तर" पर जयप्रकाश मानस का आलोचनात्मक आलेख, "जहाँ जंगल स्मृति है और आदमी धीरे-धीरे गायब होता हुआ वर्तमान" अच्छा लगा और इसे पढ़ कर "बस्तर-बस्तर" को पढ़ने की इच्छा भी हुई। मानस जी लिखते हैं, "बस्तर रूपक है उस देश का, जो अपने ही भीतर कुछ दूर छूट गया है - जहाँ विकास की सड़कें पहुँचते-पहुँचते थक जाती हैं, और पगडँडियाँ अब भी अपने होने पर अड़ी रहती हैं। बस्तर कविता है उस आदिम लय की जिसे किसी छंद में बांधना सम्भव नही; वह महुए की गंध की तरह फैलती है - धीरे, अनाम, लेकिन गहरे तक उतरती हुई।"

कथाक्रम के सितम्बर अंक में अर्चना पैन्यूली के उपन्यास "अलकनंदा सुन" पर संजीव जयसवाल 'संजय' का आलोचनात्मक आलेख, "माटी की गंध और स्मृतियों की सरिता" भी अच्छा लगा। इस उपन्यास के कथन-विन्यास के बारे में उन्होंने लिखा है, "यह उपन्यास शिवानंद के जीवन को किसी सर्वज्ञ कथावचाक के माध्यम से नहीं, बल्कि उसके बच्चों की दृष्टि से प्रस्तुत करता है - पहले बड़ा बेटा, फिर दूसरा बेटा और अंत में पुत्री। इस क्रमिक परिवर्तन से कथा केवल आगे ही नहीं बढ़ती, बल्कि भावनात्मक रूप से अधिक गहरी होती जाती है।" इस बात से भी इस उपन्यास पढ़ने का मन किया।

बनास जन पत्रिका के 88वें अंक में विद्यासागर नौटियाल के बारे में पढ़ रहा था। उनके लेखन के बारे में लिखा है: "उनके उपन्यासों और कहानियों का संसार उत्तराखंड के साधारण लोगों के जीवन संघर्षों का दस्तावेज बन गया है। वह सहज भाषा और सरल कथा-शिल्प में अपने लोगों की यातनाओं को दर्ज करते हैं। इतिहास और संस्कृति उनके लिए गौरव का स्मारक न हो कर साधारण लोगों की मुक्ति चेतना के वाहक बनते हैं।" ऐसे ही बातें कुछ अन्य आलेखों में भी थीं और मैंने अक्सर अन्य लेखकों के बारे में भी पढ़ी हैं। इसे पढ़ कर सोच रहा था कि क्यों हिंदी  में लेखकों के साधारण आदमियों की पीड़ा, शोषण, यातनाओं की बात करना ही अच्छा साहित्य समझा जाता है? जबकि मेरे मन में वही किताबें रहती हैं जिनमें मानव जीवन का और रिश्तों का सजीव चित्रण हो, उनमें केवल दुख, पीड़ा और कठिनाईयाँ देखना उसका अधूरापन नहीं बन जायेगा? मैंने नौटियाल जी की कोई किताब नहीं पढ़ी इसलिए मेरी यह टिप्पणी उनके लेखन के बारे में नहीं है, बल्कि अच्छा साहित्यकार किसे माना जाये का मूल्यांकन करने वाली दृष्टि के बारे में है। 

तद्भव पत्रिका के जनवरी-जून 2026 अंक में विश्वनाथ त्रिपाठी के संस्मरण "अस निबहुर देसू" का आठवाँ भाग बहुत रुचि से पढ़ा जिसमें उनके दिल्ली आने और यहाँ रहने के 1950-60 के वर्णन हैं। उनकी बातें पढ़ कर मुझे भी अपनी बचपन की वह घटनाएँ याद आयीं, जब मैं बच्चा था। उनका जामामस्जिद जा कर कबाब खाना, जमुनापार दिलशाद गार्डन में रहने के बारे में कहना "नानक दुखिया सब संसार, सबसे दुखिया जमुना पार", श्रीकाँत वर्मा और मन्मथनाथ गुप्त की चीन के बारे में बहस, सैम मानिकशा और जनरल करिअप्पा की बातें, ऐसी बहुत सी घटनाओं के बारे में पढ़ना अच्छा लगा।

तद्भव में ही राजाराम भादू का धर्मवीर भारती की जन्म शताब्दी के अवसर पर "एक पुनरावलोकन" आलेख भी अच्छा लगा। 1983-84 के आसपास मेरी एक कहानी धर्मयुग में छपी थी, तब भारती जी से कुछ पत्रचार हुआ था। वह मेरे पिता को जानते थे, दोनों इलाहाबाद के थे, करीब-करीब हमउम्र थे और दोनों के परिवार आर्यसमाजी थे। मैंने लड़कपन में भारती की "गुनाहों का देवता" पढ़ी थी और उनके लाखों प्रशंसकों में मैं भी आ गया था। मैं उनकी एक कविता को भी बहुत पसंद करता हूँ - "दिन यूँ ही बीत गया, अंजुरी में भरा हुआ जल जैसे रीत गया।"

तद्भव में आकांक्षा बरनवाल के लम्बे आलेख "परंपरा का मूल्यांकन और औपनिवेशिक आधुनिकता" में महाभारत के संदर्भ में, एक ओर है पश्चिमी तर्क, समझ और श्रेणीकरण, और दूसरी ओर हैं भारतीय समझ और परम्परा। वह इन दोनों के बीच के विरोधाभासों पर पश्चिमी सोच से प्रभावित महाभारत के "क्रिटिकल एडिशन" बना कर ग्रंथ के "मूल तथा प्रमाणिक" रूपों की खोज-दृष्टि, और दूसरी ओर, उसके विभिन्न संस्करणों-लेखकों की गतिशील, समय के साथ बदलने वाली भारतीय समझ की दृष्टि के अंतरों की बात करती हैं।

इस सिलसिले में वह लिखती हैं, "जो विद्वान वैज्ञानिक पाठालोचन की पद्धिति और मूल पाठ की अवधारणा के समर्थक हैं उन्हें शिकायत है कि सुकथांकर और उनके सहयोगियों ने बहुत से परवर्ती प्रक्षेप अपने क्रिटिकल एडिशन में शामिल कर लिए। जो विद्वान महाभारत को एक स्थिर रचना की बजाय एक गतिशील और जीवंत प्रवाह की तरह देखते हैं उन्हें यह शिकायत है कि क्रिटिकल एडिशन के संपादकों ने ऐसे प्रसंगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया जो भारतीय जनमानस में महाभारत की प्रसिद्धि और लोकप्रियता के आधारस्तंभ हैं।" इस संदर्भ में वह एस. एन. बालगंगाधर की बात रखती हैं, "इतिहास हमें 'तथ्य' देता है, अतीत हमें 'स्मृति' और 'मूल्य' देता है।" अपने निष्कर्ष में वह कहती हैं कि "आज हम जिस 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' का उदय देख रहे हैं, विडम्बना यह है कि वह भी उसी औपनिवेशिक जाल में फंसा हुआ है जिसका शिकार बंकिमचंद्र और सुकथांकर जैसे विद्वान हुए थे। एक तरफ आज का राजनीतिक विमर्श पश्चिम का विरोध करता है और भारतीयता की बात करता है, किन्तु दूसरी तरफ अपनी महानता सिद्ध करने के लिए वह पैमाना (standard) आज भी पश्चिम का ही उपयोग कर रहा है। जब आज का नैतृत्व या उसके बुद्धिजीवि यह दावा करते हैं कि 'महाभारत काल में इंटरनेट था' या 'वैदिक काम में हवाई जहाज थे' तो वह अनजाने में यह स्वीकार कर रहे होते हैं कि महान होने का एकमात्र अर्थ तकनीक और विज्ञान में आगे होना है, जो पूरी तरह से एक आधुनिक, पश्चिमी पैमाना है।" यह आलेख पढ़ कर बहुत सी बातें और प्रश्न मन में उठे और इसलिए यह बहुत अच्छा लगा। 

हिंदी कहानियाँ

विभिन्न पत्रिकाएँ पढ़ते हुए एक बात मेरे मन में आई कि अंग्रेजी, इतालवी, फ्रैंच आदि भाषाओं में विभिन्न श्रेणियों की कहानियाँ होती हैं - रोमांस, रहस्य, जासूसी, एडवैंचर, साईंस फिक्शन, फैतासी, डरावनी, आदि। भारत में भी अंग्रेजी के लेखन में अधिक विविधता है। लेकिन मुझे लगता है कि हिंदी कहानियों का संसार अधिकतर दुखों, संघर्ष, भेद-भाव, परिवार, जैसे दायरों आदि में ही घूमता रहता है, उसमें उतनी विविधता नहीं होती। यही बात मृणाल पाण्डे जी के एक साक्षात्कार में भी सुनी, जब उनसे पूछा गया कि उनकी कहानियाँ मध्यम वर्ग पर क्यों होती हैं, और गरीब, शोषित वर्ग के लोगों के बारे में क्यों नहीं होतीं? यानि लेखकों को गम्भीरता से तभी लिया जा सकता है अगर वह कुछ विशेष विषयों पर ही लिखें? पर ऐसा करना क्या हिंदी साहित्य को पिंजरों में बंद करना नहीं हो जायेगा?

हँस में ज्ञानचन्द बागड़ी की कहानी "धधकती ज़मीन" में मणिपुर की स्थिति की कहानी है जिसमें एक बाहर से आया प्रोफैसर आदित्य समझना चाहता है कि लड़ाईयाँ किसके बीच और क्यों हो रही है, लेकिन उनकी बातें स्थिति समझने में विशेष मदद नहीं करती। कहानी का भूगौलिक परिपेक्ष्य समझ में नहीं आता कि जिन गाँवों-जँगलों की बात हो रही है वे कहाँ हैं, न ही उसके पात्र किन जनजातियों के हैं, लड़ाई किसके बीच है, यह सब कुछ समझ नहीं आता। शायद यही वहाँ की सच्चाई है कि कुछ भी समझना कठिन है। एक जगह पर एक पात्र कहता है, कि शहर के लोग पहाड़ी लोगों की ज़मीन लेने के लिए यह कर रहे हैं। दूसरी जगह एक पात्र समझाता है कि विभिन्न जनजातियाँ हैं, राजनीति करने वाले हैं, उग्रवादी हैं, सेना वाले हैं, बाहरी ताकते हैं, सबका इस लड़ाई में हाथ है, सब अपने को सही समझते हैं और दूसरे को गलत। यह कहानी लड़ने वालों के धर्मों की बात नहीं करती। कहानी में घरों का जलना, लोगों का मरना, परिवारों का विस्थापित होना, आदि घटनाओं का दर्द महसूस होता है, लेकिन उसका क्या होगा या क्या करना चाहिये, इसकी झलक नहीं मिलती।

हँस में अनिशा मिंज की कहानी "फिर एक कोड़ा राजी" में एक चाय बागान में रहने वाली बुघनी नाम की बच्ची की कहानी है, जो स्कूल नहीं जाती क्योंकि उसकी शिक्षका कहती है कि वह हिंदी ठीक से नहीं जानती। बुघनी माँ के पीछे-पीछे चाय-बागान में जाती है, वहाँ काम में माँ की मदद करती है और लोगों से उनके अपने गाँव छोड कर चाय-बागानों में आने के इतिहास की बातें पूछती है। दिन समाप्त होता तो माँ को पगार अधिक मिलती है क्योंकि बुघनी की सहायता से उसने पत्तियाँ अधिक तोड़ी हैं। लेकिन रात को झोपड़ी में आग लगने से उसके माता-पिता मर जाते हैं, और कहानी का अंतिम भाग कलकत्ता में है जहाँ सोलह साल की बघनी एक घर में काम करती है, शोषित होती है और चायबगान के दिनों को याद करती है। कहानी की बनावट कमज़ोर है, लेकिन उसकी चायबागान की बोली और उनके गीत, यह दोनों बातें अच्छी लगीं।

हँस में विनोद कुमार की कहानी "वह राम नहीं था" में दो बेटियों की माँ आदिवासी परिवार की सुमारी है, जो एक "बाहरी" आदमी के साथ चली जाती है और कुछ महीनों बाद घर लौट आती है। मास्टर जी जो इस कहानी को सुना रहे हैं, इस बात को सुन कर उसकी तुलना रामायण के राम और गर्भवति सीता के वनवास से करते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि एक स्त्री-पुरुष के रिश्ते को केवल एक अच्छा या बुरा में बाँटना इतना आसान नहीं लगता, क्योंकि इसमें हम उनकी भावनाओं को अनदेखा कर रहे हैं। अपनी मर्जी से घर छोड़ कर नये साथी के साथ जाने के कुछ महीनों बाद पहले साथी के पास लौट आना, यह आदिवासी परिवार में हो या गैर-आदिवासी परिवार में हो, उसे केवल यौन-शुचिता की दृष्टि से तोलना, मुझे अधूरा सा लगता है। अगर दूसरे मर्द के साथ गयी स्त्री के घर वापस लौटने पर उसे स्वीकारना विकासशीलता का मापदंड है, तब दूसरी औरतों के साथ जाने वाले पुरुष के घर लौटने पर स्वीकारना क्या होगा? खैर इस कहानी ने इस विषय के बारे में सोचने का मौका दिया, इसलिए यह कहानी अच्छी लगी।

पाखी के अगस्त अंक में विद्याभूषण की कहानी "बनवारी बाबू का मकान" में उत्तर भारत के छोटे शहर के पारिवारिक रिश्तों की बातें हैं, जहाँ दो कमरों के घर में महीनों रहने वाले भाँजे-भतीजे ही नहीं, भाँजे के मित्र पेयिन्ग गैस्ट भी हैं, पैसा अधिक कमाने वाले बेटे का परिवार के निर्णयों पर अधिकार है, बेटी की शादी करने के लिए दान-दहेज क्या और कैसे तैयार किया जाये की बातें भी हैं, और सबसे बड़ी बात की मन-मुटाव हो या पुरानी यादों के साथ हँसना-हँसाना, जीवन नहीं रुकता, वह चलता रहता है। 

अकार में जीवेश प्रभाकर की कहानी "फ्री बर्डस" में धर्म और रिश्तों की नाजुकता की बात बहुत अच्छे तरीके से कही गयी है। रानी की माँ मुसलमान हैं और पिता हिंदू। समय के साथ उनके अपने परिवारों के साथ रिश्ते बदलते हैं लेकिन रानी के भाई की घर वालों द्वारा पक्की की हुई शादी में दिक्कत आती हैं क्योंकि लोग उनके परिवार के बारे में जान कर मना कर देते हैं। रानी के विवाह में भी मुश्किलें आयेंगी, इसलिए उसके मामा उसके लिए एक मुसलमान लड़के का रिश्ता लाते हैं लेकिन रानी का भी अपना एक रहस्य है जिसे उसने सबसे छुपाया है .. कहानी के अंत का सरप्राइज़ अच्छा है। कहानी में माँ और पिता के धर्मों की बात नहीं की है, कि क्या उनमें से किसी ने धर्म बदला था या नहीं, पर शायद उस बात को जोड़ने से कहानी की सरंचना थोड़ी जटिल बन जाती। 

सम्मुख में दो सौ शब्दों की कुछ लघु-कथाएँ पढ़ीं - कुछ कहानियाँ अच्छी लगीं जैसे कि बेजी जैसन की कहानी "भरम", अंजू शर्मा की "जीत", हरि मृदुल का "रोना", लकी राजीव की "अनायक", आदित्य शुक्ल की कहानी "पंख", और, आकांक्षा पारे काशिव की "न्यौता"। कुछ अन्य कहानियों में लगा कि उनका मूल विचार अच्छा था, लेकिन कथा-संरचना को थोड़ा और असरदार किया जा सकता था, जैसे कि , अनिर्बाण साधु का "रंग धनुष", देवेश पथ की "तुर्किश आइसक्रीम", उषा कुमारी की "वायरल विकास", और पल्लवी विनोद की "फोटोग्राफर"। खैर, अभी सभी लघु-कथाएँ नहीं पढ़ पाया हूँ।

कथाक्रम के सितम्बर 2026 अंक में गोविंद मिश्र की कहानी "काम ... मुझे भी" में वृद्ध सज्जन हैं जो अकेले रहते हैं पर बुढ़ापे के साथ तकलीफें बढ़ी हैं इसलिए किसी सहायक को खोज रहे हैं और एक एजैंसी से बात करते हैं। लेकिन शुरु में जितने युवक रखते हैं उनके साथ अनुभव अच्छा नहीं होता, जब एजैंसी वाला एक ऐसे युवक की बात करता है जिसका पारिवारिक इतिहास संदेहनीय है .. छोटी सी कहानी में कोई नाटकीय मोड़ नहीं हैं, बस विश्वास बनने की बात है। यह कहानी आज की दुनिया में अकेले वृद्धों की बढ़ती संख्या और नवयुवकों को नौकरी मिलने की दिक्कतें, इन दोनों समस्याओं को जोड़ती है।

संवेद पत्रिका के जनवरी 2026 अंक में दिव्या विजय की कहानी "कृष्ण पंखुरी" की कहानी सुरमा की है जिसकी बस्ती में सब लड़कियाँ घरों में बाथरूम साफ करने जाती हैं और सुरमा को एक मॉल के बाथरूम की सफाई की नौकरी मिलती है। आसपास सब काम करने वाली लड़कियों को ईर्श्या है कि सुरमा इतनी अच्छी जगह पर इज़्जतदार नौकरी करती है, लेकिन दिक्कत यह है कि जब मॉल में आने वाली लड़कियों की तरह, सफाईवाली के कपड़े-बाल छोड़ कर मॉल वाली लड़कियों के फैशन करने की कोशिश करती है तो उसके पास उनके क्रूर शब्दों से लड़ने के लिए साहस नहीं है, वह हार मान लेती है। पर, कुछ महीने बाद, उसे भी उनमें से एक युवती से बदला लेने का मौका मिलता है तो ... कहानी में अपने आत्मसम्मान के लिए लड़ने की कमज़ोरी का चित्रण अच्छा लगा।

तद्भव में मृत्युंजय कुमार सिंह की कहानी "जल्लाद उर्फ हैंगमैंन" में जेल के पुराने फांसी लगाने वाले बाबुल मसीह हैं, उनकी पत्नी बिल्किस है, उनका बेटा अब्दुल्ला है और जेल का कैदी तारक सकुल है। तारक ने लोगों की हत्या की है और जिस दिन तारक को फांसी लगने वाली है, उस दिन बाबुल मसीह उसे फांसी पर लटकाने वाली रस्सी को तैयार करते हुए उससे बातें करते हैं। छोटी सी कहानी में एक छोटी सी बात है, लेकिन मृत्युंजय जी की काबलियत है कि उस कहानी को ऐसे रचते हैं कि अंत तक बांधे रखती है।  

हिंदी कविता 

मुझे कविताएँ कम ही अच्छी लगती हैं, मैं अंग्रेज़ी और इतालवी में कविताएँ बिल्कुल नहीं पढ़ पाता, पढ़ूँ तो उनमें सौंदर्यबोध या भावबोध नहीं होता। हिंदी कविताओं में भी मुझे पुराने कवि ही अच्छे लगते हैं, नयी कविता मुझे प्रभावित नहीं करती। लेकिन आज के इस आलेख में दो आधुनिक कवि भी हैं - विनय सौरभ और दिनेश शुक्ल। 

अकार पत्रिका में  विनय सौरभ की कविताओं में छोटी-छोटी बातों में छिपी हुई लम्बी कहानियाँ हैं। "असंभावित के विरुद्ध" की कहानी में घर से भागी हुई एक लड़की है, और उसके सालों बाद अपने गाँव में लौटने की बात है। "माँ के शाल" में माँ और मौसी के सम्बंधों का रस है।

सौरभ जी की "अपने ही स्टेशन से गुज़रना" में छूटे हुए गाँव की यादों की बात है, उनकी कविताओं में मुझे यह कविता-कहानी सबसे अधिक अच्छी लगी - इसकी पहली पंक्तियाँ हैं, "एक रोज यात्री बन कर गुजरते हो/ अपने ही गाँव के स्टेशन से/ एक उदासी भीतर फैल जाती है अचानक/  खिड़की से बाहर तलाशते हो, कोई चेहरा दिख जाये परिचित/"।  उनकी एक अन्य कविता, "वे ही!" में अपने आप से प्रश्न हैं कि हम लोगों के सुख-दुख में, उनकी मृत्यु आदि पर क्यों नहीं हिस्सा ले पाते। इसकी कुछ पंक्तियाँ हैं - "यह ख्याल आता है अक्सर देर रात गये/ या आधी नीँद के बीच/ जैसे कोई पत्थर आज भी सीने में लुढ़कता रहता है/ आत्मग्लानी का भार लिए/"। 

ककसाड़ के अगस्त अंक में मुझे दिनेश शुक्ल की दो गज़लें पसंद आयीं। उनकी पहली गज़ल की यह पंक्तियाँ देखिये: "यह चादर वक्त की जर्जर हवा से थरथराती है/ गरीबी पर लगी तुरपाइयाँ रह-रह उधड़ती हैं/" और "दुखी सपनों के किस्से, रात की टूटी हुई नींदें/ सुबह परछाईयाँ इक सीढ़ियाँ चढ़ती उतरती हैं/"।

और उनकी दूसरी गज़ल की पहली पंक्तियाँ भी मुझे बहुत अच्छी लगीं: "किस्सा मत पूछिये, टूटी हुई थकानों का, इसके आगे है सफर, रेत के मकानों का।"

अंत में 

आज के इस आलेख के अंत में तद्भव से आकांक्षा बरनवाल के आलेख से कुछ अन्य पंक्तियां जो मुझे विचारनीय लगीं: "जिस प्रकार 19वीं सदी के सुधारकों ने 'पौरुषहीन (effeminate) कहलाने के डर से अपने धर्म को 'कठोर' और 'एकेश्वर वादी' बनाने का प्रयास किया था, वैसा ही आज की राजनीति इतिहास-2 (लोक परंपरा और मिथक) को जबरन इतिहास-1 (तथ्यात्मक इतिहास) बनाने पर तुली है। दीपेश चर्कवर्ती कहते हैं कि गाँधी ने इतिहास-2 (लोक परंपरा, मिथक और भावनाओं) की भाषा बोली। जब गांधी ने रामराज्य कहा तो उसका मतलब किसी ऐतिहासिक समय या राजा की वापसी नहीं बल्कि राज्य की ऐसी परिकल्पना देना था जिसे किसान भी समझता था। जब गांधी ने नमक उठाया या चरखा चलाया, तो वह कोई आर्थिक सिद्धांत देने से अधिक भारत की आत्मा को छूना चाहते थे। ... आज के नेता इतिहास-1 की भाषा बोलते हैं। यहां तक कि जब वे धर्म की बात भी करते हैं तो उसे 'वैज्ञानिक' सिद्ध करने में लगे रहते हैं ...लेकिन दोनों ही स्थितियों में वह पश्चिमी इतिहासबोध की ही नकल कर रहे हैं। यह सांस्कृतिक युद्ध तब तक शांत नहीं होगा जब तक हम गांधी की या जे. कृष्णमूर्ति की भांति उस हीन भावना से मुक्त नहीं हो जाते, जो हमें हर क्षण पश्चिम के समक्ष खुद को सही और ऐतिहासिक सिद्ध करने के लिए विवश करती है।" 

इस बार जो पढ़ा उसमें मुझे आकांक्षा बरनवाल के आलेख के अतिरिक्त हँस पत्रिका का आदिवासी जीवन और साहित्य पर केन्द्रित अंक सबसे अधिक रोचक लगा। 

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शनिवार, जून 27, 2026

अजेय की कविता में खड़ा आदमी

अजेय की एक प्रसिद्ध कविता है, जो मुझे बहुत अच्छी लगती है। लेकिन जब भी मैं उसे याद करता हूँ तो हर बार उसके एक शब्द पर अटक जाता हूँ। वह शब्द एक क्रिया है, जो मुझे अधूरी लगती है। और उसके अधूरेपन में कुछ ऐसा है जो मुझे बार-बार उस कविता की ओर खींचता है।


वह कविता है:

पहले एक गोरैया होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी इतना ऊँचा उड़ा
कि गोरैया खो गई।
 
पहले एक पहाड़ होता था
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे तन कर खड़ा
कि पहाड़ ढह गया।
 
पहले एक नदी होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे वेग से बहा
कि नदी सो गयी
 
पहले एक पेड़ होता था
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे जोर से झूमा
कि पेड़ सूख गया।
 
पहले एक पृथ्वी होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी इतनी जोर से घूमा
कि पृथ्वी रो पड़ी।
रो पड़ी ...
कि पहले एक आदमी होता था।

इसे पढ़ते हुए जिस क्रिया पर मैं अटक जाता हूँ, वह 'खड़ा' है, पहाड़ वाले अंतरे में। उड़ा, खड़ा, बहा, झूमा और घूमा में मुझे केवल 'खड़ा' वाली बात क्यों अधूरी लगती है? कवि को गिन कर शब्द लिखने होते हैं ताकि कविता की लय बनी रहे और 'खड़ा' को देख कर मैं अपने मन में उसे 'खड़ा हुआ' कर देता हूँ, लेकिन कहीं पर कुछ फँसा रह जाता है।

मैंने हिंदी आठवीं कक्षा तक ही पढ़ी थी, मुझे उसकी व्याकरण और साहित्य का विधिवत पढ़ने-समझने का मौका नहीं मिला था। खड़ा क्यों बाकी क्रियाओं से भिन्न है, शायद आप में से कोई हिन्दी व्याकरण के ज्ञानी मुझे समझा सकते हैं?

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टिप्पणी: पहले मैंने अजेय की जगह इसे अज्ञेय की कविता समझा था, एक सुधी पाठक, अनूप सेठी जी, जो स्वयं जाने माने हिंदी कवि हैं, ने इस गलती के बारे में मुझे बताया। उन्हें इसके लिए दिल से धन्यवाद। 

अजय कुमार "अजेय" की यह कविता (एक आदमी होता था) और अन्य कविताएँ आप कविता-कोष पर भी पढ़ सकते हैं।

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बुधवार, दिसंबर 31, 2025

मध्य-युगीन कृष्ण-भक्ति ब्रज-भाषा काव्य

यह आलेख डॉ. सावित्री सिन्हा की लिखी और 1962 में नेशनल पब्लिशिन्ग हाउज़ द्वारा छापी पुस्तक "ब्रज भाषा के कृष्ण भक्ति काव्य में अभिव्यंजना शिल्प" की भूमिका का एक अंश है। आप चाहें तो इस पूरे आलेख को कल्पना पर पढ़ सकते हैं या पीडीएफ में डाउनलोड कर सकते हैं।

डॉ. सावित्री सिन्हा ने यह पुस्तक अपने माता-पिता (और मेरे दादा-दादी द्वारकाप्रसाद और जयदेवी) को इन शब्दों के साथ समर्पित की थी: "स्वर्गीय पिता जी की आंसूभरी, धूमिल बाल-स्मृतियों को तथा मां के असीम साहस, धैर्य, त्याग और वात्सल्य को"

मध्य युगीन कृष्ण-भक्ति ब्रज-भाषा काव्य - डॉ. सावित्री सिन्हा

 

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सूरदास से पूर्व कृष्ण-भक्ति काव्य में अभिव्यंजना-शिल्प की स्थिति - एक विहंगावलोकन

डॉ. शिवप्रसाद सिंह के शोध के फलस्वरूप अभी हाल में ही सूरदास के समय से पहले का ब्रजभाषा काव्य प्रकाश में आया है। 'सूर-पूर्व ब्रजभाषा और उसका साहित्य' नामक उनके शोध-प्रबंध में उपलब्ध साहित्य के व्यख्यान के साथ ही कुछ अनुपलब्ध साहित्य भी प्रकाश में लाया गया है और सूरदास से पहले ब्रजभाषा कवियों के अस्तित्व को सिद्ध करने का प्रयास किया गया है। नामदेव, कबीर और रैदास की अनुभूतिपरक रचनाओं को लेखक ने कृष्ण-भक्ति काव्य के विकास का एक सोपान माना है। इस निर्णय को स्वीकार करने के पक्ष और विपक्ष दोनों ही ओर से अनेक तर्क दिये जा सकते हैं। परन्तु यह प्रश्न यहां पर अप्रासंगिक है।

संतमत के कवियों के अतिरिक्त उन्होंने कृष्ण-भक्ति काव्य के विकास में संगीतकार कवियों का महत्वपूर्ण योग स्वीकार किया है। उनके शब्दों में, “संगीतज्ञ कवियों ने न केवल अपनी स्वर-साधना से भाषा को परिष्कार और मधुर अभिव्यंजना प्रदान की, तथा अप्रतिम नाद-सौंदर्य से कविता को अधिक दीर्घयुगी बनाया परन्तु अपनी सम्पूर्ण संगीत-प्रतिभा को आराध्य कृष्ण के चरणों पर लुटा भी दिया। गोपाल नायक और बैजू बावरा के पदों में आत्मनिवेदन, गोपी-प्रेम और भक्ति के विविध पक्षों का बड़ा ही विशद और मार्मिक चित्रण हुआ है। गोपाल नायक के एक पद में रास का चित्रण इस प्रकार मिलता है -

कांधे कामरी गो आलाप के नाचे जमुना तीर, नाचे जमुना तीर

पीछे रे पांवरे लेती नाचि लोई मांगवा --

भुव आलि मृदंग बांसुरी बजावै गोपाल वैन वतरस ले आनन्द। (राग कल्पद्रुम)

बैजू बावरा का उल्लेख भी इस प्रसंग में किया गया है तथा राग कल्पद्रुम में संकलित उनके पदों के आधार पर उन्हें ब्रजभाषा का कवि सिद्ध किया गया है। राग कल्पद्रुम की यह रचनायें शुद्ध ब्रजभाषा में हैं -

आंगन भीर भई ब्रजपति के आज नन्द महोत्सव आनन्द भयो।

हरद दूब दधि अक्षत रोरी ले छिरकत परस्पर गावत मंगलचार नयो।

ब्रह्मा ईस नारद सुर नर मुनि हरषित विमानन पुष्प बरस रंग ठयो।

धन धन बैजू संतन हित प्रकट नन्द जसोदा ये सुख जो दयो। (राग कल्पद्रुम)

इन दोनों ही कवियों की रचनाओं में निहित संगीत तत्व परवर्ती कृष्ण-भक्त कवियों की संगीत-साधना की पृष्ठभूमि से जान पड़ते हैं, परन्तु जहां तक अभिव्यंजना शैली का प्रश्न है यह रचनायें परवर्ती रचनओं के सामने पासंग भर भी नहीं ठहरतीं।

इन रचनाओं के अतिरिक्त शोधकर्ता ने निम्नलिखित ७ अप्रकाशित पुस्तकों का परिचय-परीक्षण भी प्रस्तुत किया है - अग्रवाल कवि की प्रद्युमनचरित; विष्णुदास की महाभारत कथा, स्वर्गारोहड़, रुक्मिणी मंगल, स्वर्गारोहड़ पर्व और स्नेह लीला; थेघ नाथ की गीता भाषा।

कृष्णभक्ति सम्बंधी अप्रकाशित ग्रंथों को लेखक ने जिस रूप में हमारे सामने रखा है, उसे उसी रूप में स्वीकार कर लेने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं है। उनके मतों को उद्धृत करके विषय-विस्तार करने से कुछ लाभ नहीं होगा। जो कुछ भी सामग्री प्रकाश में आयी है उसके अध्ययन द्वारा ये निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं -

तत्कालीन ब्रजभाषा के दो रूप थे (१) अपभ्रंश मिश्रित ब्रजभाषा (२) तद्भव प्रधान ब्रजभाषा। संस्कृति के तत्सम शब्दों के प्रयोग द्वारा तत्कालीन ब्रजभाषा का रूप परिनिष्ठित नहीं हो पाया था। प्रथम कोटि की भाषा के उदाहरण के रूप में डूंगर कवि की एक रचना उद्धृत की जा रही है -

ऋतु बसंत उलहणी विविह वणराय फलह सहू।

कंटक विकट करीर पंत पिकखंत किंपि नहु।

धाराहर वर धवल बारि वरसंत घनघोर वन।

कुरलतंउ मूल मंत्री सर्प नहीम मानहिं दुर्जन।

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औषधि मूल मंत्री सर्प नहिं मानहिं दुर्जन।

सर्प डसी वेदना एही दिट्ठइ हुई, गुंजन।

लागइ दोष अनन्त कियइ संसर्ग एनि परि।

तवडी जल हरइ घड़ी पीटियइ सुफल्लरि।

द्वितीय कोटि के उदाहरण के रूप में विष्णुदास रचित 'सनेह लीला' की ये पंक्तियां ली जा सकती हैं -

महलन मोहन करत विलास।

कहां मोहन कहां रमन रानी और कोऊ नहिं पास।

रुकमन चरन सिरावत पिय के पूजी मन की आस।

जो चाहे थी सो अब पायो हरि पति देवकी सास।

तुम बिन और कौन थो मेरौ धरति पताल आकास।

पल सुमिरन करत तिहारौ ससि पूस परगास।

इन कवियों की रचनाओं में प्रबुद्ध कला-चेतना का पूर्ण अभाव है। अभिव्यंजना-शैली की दृष्टि से ये अत्यंत साधारण कोटि की रचनायें हैं। उनकी शैली अधिकतर वर्णनात्मक और विवरणात्मक है। अप्रस्तुत योजना, लक्षित चित्र-योजना, वाग्वैदग्घय आदि तत्व बहुत ही कम हैं।

विषय-वस्तु के क्षेत्र में कुछ ऎसे तत्व अवश्य मिलते हैं जिन्हें परवर्ती कृष्ण-भक्ति काव्य का पूर्वाभास कहा जा सकता है। यह प्रभाव मुख्य रूप से दो क्षेत्रों में दिखाई पड़ता है: (१) लोक संस्कृति के चित्रण में (२) शास्त्रीय संगीत के समावेश में।

गोस्वामी विष्णुदास रचित रुक्मणि मंगल की ये पंक्तियां प्रथम वर्ग के उदाहरण के रूप में ली जा सकती हैं:

मोतियन चौक पुराय के कियौ आरती माय।

अति आनन्द भयौ है नगर में घर घर मंगल साजै।

मनमोहन प्रभु ब्याह कर आये पुरी द्वारका राजै।

अंगन तन में भूषन पहिने सब मिलि करत समाज।

बाजै बाजन कानन सुनियत, नौबत घन ज्यूं बाज।

नर नारिन मिलि देत बधाई सुख उपजै दुखभाज।

नाचत गावत मृदंग बाजत रंग बसावत आज।।

दूसरे वर्ग की रचनाओं के अन्तर्गत गोपाल नायक और बैजू बावरा की रचनायें रखी जा सकती हैं। डॉ. सिंह ने इन रचनाओं को काव्य-कल्पद्रुम से संकलित किया है। संगीत कला के क्षेत्र में इस ग्रंथ का महत्वपूर्ण स्थान है परन्तु भाषा और साहित्य की दृष्टि से उसमें संकलित पदों को प्रमाणिक माना जा सकता है या नहीं यह प्रश्न विवादरहित नहीं है। यदि उन्हें प्रमाणिक मान लिया जाये तो गोपाल नायक और बैजू बावरा के पदों को परवर्ती कृष्ण-भक्त कवियों के ध्रुपद शैली में रचित पदों का पूर्वरूप माना जा सकता है। शास्त्रीय संगीत के तत्वों का उल्लेख तथा ध्रुपद शैली के अनुकूल पद-योजना इन रचनाओं में प्राप्त होती है -

सप्त स्वर तीन ग्राम इकइस मूर्छन बाइस सुर्त

उनचास कोट ताल लाग डाट

गोपाल नायक हो सब लायक आहत अनाहत शब्द,

सो ध्यायो नाद ईश्वर बसे मो घाट

तथा

मार्ग देसी कर मूर्छना गुन उपजे मति सिद्ध गुरु साध चावै।

सो पंचम मघ दर पावै।

बैजू बावरा के पदों की योजना भी ध्रपुद शैली की श्वास-साधना के निमित्त की हुई जान पड़ती है:

बोलियो न डोलियो ले आऊं हूं प्यारी को,

सुन हौ सुघर वर अब हीं पै जाऊं हूं।

मानिनि मनाय के तिहारे पाय ल्याय के,

मधुर बुलाय के तो चरण गहाऊं हूं।

सुन री सुंदर नारि काहे करत एति रार,

मदन डारत पार चलत पल तुझाऊं हूं।

मेरी सीख मान कर मान न करो तुम,

हे जु प्रभु प्यारे सो बहियां गहाऊं हूं।

बधाई के लोक-गीत भी उनके नाम से प्राप्त होते हैं:

आंगन भीर भई ब्रजपति के आज नन्द महोत्वस आनन्द भयौ।

हरद दूब दघि अक्षत रोरी ले छिरकत परस्पर गावत मंगलचार नयो।

ब्रह्मा ईस नारद सुर नर मुनि हरषित विमानन पुष्प बरस रंग ठयो।

धन धन बैजू संतन हित प्रकट नन्द जसोदा ये सुख जो दयो।

अधिकतर कवियों ने दोहा, चोपाई और छप्पय का प्रयोग किया है। कुछ पदों के ऊपर गौरी, धनाश्री और पूर्वी रागों का उल्लेख भी हुआ है।

इस सामग्री के अध्ययन के उपरान्त सूरदास से पूर्व ब्रज-भाषा काव्य के अस्तित्व की स्वीकृति में आचार्य शुक्ल का अनुमान आंशिक रूप में ही सत्य माना जा सकता है। सूरदास के काव्य-सौष्ठव पर विचार करते हुए आचार्य शुक्ल ने कहा था, ‘इन पदों के सम्बंध में सबसे पहली बात ध्यान देने की यह है कि चलती हुई ब्रजभाषा में सबसे पहली साहित्यिक रचना होने पर भी ये इतनी सुडोल और परिमार्जित है, यह रचना इतनी प्रगल्भ और काव्यांग-पूर्ण है कि आगे होने वाले कवियों की उक्तियां सूर की जूठी सी जान पड़ती हैं। अत: सूर-सागर किसी चली आती हुई गीति काव्य परम्परा का - चाहे वह मौखिक ही रही हो - पूर्ण विकास सा प्रतीत होता है।"

इन कृतियों के प्रकाश में आने पर भी कलाकार के रूप में सूर अपने पूर्व-स्थान पर ही शोभित हैं। इस काल के दर्जन कवियों में से एक भी ऎसा नहीं है जो अष्टछाप के अन्य कवियों के समकक्ष खड़ा रह सके, सूरदास तो दूर की बात है। जहां तक पूर्व-परम्परा की स्थापना का प्रश्न है यह तथ्य उसी रूप में स्वीकार किया जा सकता है जैसे हम यह कहें कि छायावादी कविता के बीज द्विवेदी-युग की रचनाओं में भी पाये जाते हैं।

सूर-पूर्व ब्रजभाषा काव्य में गीति-काव्य की मौखिक परम्परा भी स्थापित की जा सकती है, ब्रजभाषा का अस्तित्व भी माना जा सकता है पर उसमें कला-सौष्ठव का कोई ऎसा आधार नहीं मिलता जिसके कारण यह कहा जा सके कि सूरदास के पदों की प्रगल्भता और काव्यांगपूर्णता को कोई पूर्व आधार हिन्दी जगत् में विद्यमान था। कला के क्षेत्र में नये मार्गों का उद्घाटन सूरदास, नन्ददास और उनके समकालीन भक्तों ने ही किया। उनकी कला-चेतना का प्रादुर्भाव तत्कालीन परिस्थितियों के फलस्वरूप हुआ था। कला के पुनुर्त्थान युग में उनकी प्रतिभा प्रस्फुटित हो कर विकसित हुई। उत्तराधिकार रूप में उन्हें जो परम्परा प्राप्त हुई थी वह पूर्ण अविकसित थी, भाव, भाषा, शैली, किसी भी दृष्टि से मध्यकालीन कृष्ण-भक्त कवियों पर उनका ऋण नहीं स्वीकार किया जा सकता।

कृष्ण-काव्य परम्परा के विकास का संक्षिप्त परिचय

कृष्ण-काव्य परम्परा के विकास का प्रमुख श्रेय आचार्य वल्लभ और उनके पुत्र विट्ठलदास जी को है। आचार्य वल्लभ द्वारा प्रवर्तित 'पुष्टि मार्ग' को आधार बना कर श्री विट्ठलदास द्वारा स्थापित अष्टछाप के कवियों ने हिन्दी में अमर कृष्ण-भक्ति-काव्य की रचना की। पुष्टि मार्ग की अनुभूति मूलक साधना के कारण इन कवियों ने कृष्ण के व्यक्तित्व के लीला-प्रधान अंशों को ही ग्रहण किया है। राजनीतिज्ञ कृष्ण उनके आलम्बन नहीं हैं। कृष्ण के व्यक्तित्व में उन्होंने शक्ति के साथ माधुर्य और प्रेम का समन्वय कर दिया। अलौकिक आलम्बन में सहज और मधुर मानव का आरोपण उन्होंने जिस मनोवैज्ञानिक कौशल से किया है उसमें सार्वभौम उपादानों का समावेश हुआ है।

ऎतिहासिक क्रम से अष्टछाप के कवियों का उल्लेख इस प्रकार है - कुभंनदास, सूरदास, परमानन्ददास, कृष्णदास, नन्ददास, चतुर्भुजदास, छीतस्वामी और गोविन्दस्वामी। सूरदास प्रधान रूप से वात्सल्य और शृंगार रस के कवि हैं, परमानन्द जी के काव्य में वात्सल्य का अनुपात महत्वपूर्ण है। अन्य कवियों की रचनाओं में श्रंगार रस का ही प्राधान्य है, उसमें वात्सल्य तो है ही नहीं या अत्यंत गौणरूप में प्रयुक्त है। इन सभी के प्रतिपाद्य में साहित्यकता, पार्थिव अनुभूतियों और आध्यात्मिकता का सुंदर सामन्जस्य मिलता है। विभिन्न कवियों के व्यक्तित्व के अनुसार तीनों तत्वों का अनुपात उनकी रचनाओं में भिन्न-भिन्न है। साहित्यिक महत्व की दृष्टि से सूरदास के बाद नन्ददास का नाम आता है। उनकी अभिव्यंजना में सचेष्ट कलाकार का शिल्प है।

पूर्वमध्यकाल के इन पुष्टिमार्गी कवियों के बाद परिमाण और गुण दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण योग राधावल्लभ सम्प्रदाय के आचार्य हितहरिवंश तथा उनके शिष्यों और अनुयायियों ने दिया। राधावल्लभ सम्प्रदाय की उपासना पद्धति अन्य सम्प्रदायों से भिन्न थी। इस मत के सिद्धांतों के अनुसार राधा ही परम इष्ट हैं और कृष्ण की मान्यता इसीलिए है कि वह राधा के प्रियतम हैं। वे इष्ट नहीं हैं। भक्तजन राधा की सखी रूप में होते हैं। वे सखी रूप में उनके साथ परकीया गोपियों के समान स्वतंत्र रूप से सम्बंध स्थापित नहीं करते और न राधा के प्रति उनका सपत्नि भाव होता है। इस सम्प्रदाय में हितहरिवंश के अतिरिक्त ध्रुवदास की कला का महत्वपूर्ण स्थान है।

किसी विशिष्ठ सम्प्रदाय के बंधनों से मुक्त मतवाली मीरा और रसखान की रचनाओं का भी पूर्व-मध्यकालीन कृष्ण-भक्ति साहित्य में बड़ा महत्व है। मीराबाई द्वारा रचित कई ग्रंथों का उल्लेख प्राप्त होता है। नरसी का मायरा, गीत-गोविन्द की टीका, पद तथा गर्व गीत उनकी प्रमुख रचनायें मानी जाती हैं। उनका साहित्य और उसका स्वरूप दोनों ही संदिग्ध हैं। उनके काव्य में गिरधरगोपाल के प्रति उनकी आकुल भावनायें विर्बाध रूप से व्यक्त हुई हैं। जहां भावनायें उन्मुक्त हुईं, आकांक्षायें उच्छृंखल हो कर असंयत हो जाती हैं पर मीरा के काव्य की सबसे बड़ी सफलता यही है कि भावनाओं की निर्बाधता में असंयत और अनियंत्रित श्रृंगार की स्थूलताओं का समावेश नहीं होने पाया है। उनकी कला का एक अपूर्व ही सौंदर्य है जो कला सम्बंधी परिपक्वताओं से वंचित रहने पर भी पूर्ण है।

मुसलमान कृष्ण-भक्त कवि रसखान का नाम इस परम्परा में अमर है। उनके व्यक्तित्व में प्रधान प्रेम-तत्व ने लौकिक आलम्बन के अस्थायित्व के कारण अलौकिक कृष्ण का सहारा लिया और उनकी भावनायें भक्त हृदय के सुंदर उद्गारों के रूप में व्यक्त हो उठीं। भावानाओ की तीव्रता और उत्कटता के साथ ही साथ उनके काव्य का कलापक्ष भी प्रौढ़ और सबल है। 'प्रेम वाटिका' और 'सुजान रस सागर' उनके दो छोटे-छोटे ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं।

उत्तर-मध्य काल में भी कृष्ण-काव्य परम्परा विभिन्न सम्प्रदायों के संरक्षण में पल्लवित और पुष्पित होती रही। पूर्व-मध्य काल (भक्तिकाल) में कृष्ण-भक्ति-पद्धति में नैसर्गिक आलम्बन के प्रति मानवीय भावनाओं का जो उन्नयन हुआ उसमें राग और साधना का अपूर्व सामंजस्य था। इस परम्परा में रागतत्व के प्राधान्य के कारण ही १९वीं शती तक भक्ति-युग की परिष्कृत माधुर्य भावना लौकिकता में रंजित होने लगी। उत्तर-मध्य कालीन कृष्ण-काव्य परम्परा में आलम्बन और साधना दोनों पक्षों में अपार्थिव अंश केवल नाम-मात्र को ही शेष रह गया।

रीतिकालीन कृष्ण-भक्ति काव्य में श्रृंगारिक तत्वों का इतना प्राधान्य हो गया कि उसके फलस्वरूप ब्रह्मा की असीमता भी मानवीय क्रिया-कलापों में लिपट कर रह गई। साहित्य की रूढ़ परम्पराओं के अनुसार 'ब्रह्मा की प्रेमिकाओं' पर भी नायिका-भेद के विविध रूपों का आरोपण किया गया। हिन्दी काव्य जगत् में सतरहवीं शताब्दी के उपरान्त कृष्ण और गोपिकाओं के नाम पर श्रृंगारपरक ऎहिक भावनाओं की अभिव्यक्ति प्रधान हो उठी।

उत्तर-मध्य काल में वल्लभ सम्प्रदाय का कोई उल्लेखनीय कवि नहीं हुआ। केवल ब्रजवासीदास ने सूरसागर के आधार पर अपने ग्रंथ 'ब्रजविलास' की रचना की। राधावल्लभ सम्प्रदाय के हित वृंदावनदास ने 'लाड़ सागर' और 'ब्रज प्रेमानन्द सागर' ग्रंथों की रचना की। इसके अतिरिक्त निम्बार्क सम्प्रदाय के घनानन्द, नागरीदास, हठी जी, भगवत रसिक जी, रूप रसिक जी, सहचरिशरण ने कृष्ण-भक्ति सम्बन्धी रचनायें लिखीं, जिनमें उस युग की काव्य-चेतना की स्मस्त विशेषताओं का समावेश हो गया है।

प्रतिपाद्य के प्रति उनके दृष्टिकोण और उनकी अभिव्यंजना-कला का विवेचन आगामी अध्यायों में किया जायेगा।

आधुनिक काल नये संदेशों और नये जीवन-दर्शन से युक्त सामने आया। मध्यकालीन सामन्तीय व्यवस्था बीत चुकी थी। बौद्धिक जागरण और विज्ञान के इस युग में धार्मिकता और विशेषकर उपास्य के प्रति रागात्मक वृत्ति के उन्नयन को अंध-विश्वास और रूढ़िवादिता का नाम दिया गया। उत्तर-मध्य काल में कृष्ण-भक्ति में निहित श्रृंगार तत्व ने लौकिक श्रृंगार का रूप धारण कर लिया था, आधुनिक काल में केवल उसका अंधकार पक्ष ही अवशिष्ट रह गया। भक्ति के नाम पर भ्रष्टाचार, अंधविश्वास और पाखंड ने तत्कालीन सुधारवादी और बौद्धिक प्रवृत्तियों को अपने विरुद्ध आवाज़ उठाने की चुनौती दी। सूक्ष्म रागात्मक प्रवृत्तियों का आश्रित भक्ति बौद्धिक और ऎहिक जीवन-दर्शन के भार के नीचे दब गई। उसकी विकृति ही शेष रह गई।

मध्यकाल में भक्ति ने एक आंदोलन का रूप ग्रहण किया था। वह जनता के व्यक्तिगत और समष्टिगत संघर्षों और समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने आई थी। आधुनिक काल में उसका क्षेत्र 'व्यक्ति' की सीमा में ही संकीर्ण हो गया। परिवार के संसर्ग और वैयक्तिक संस्कार इत्यादि कारणों से 'धर्म' तत्व एक संकीर्ण दायरे में ही शेष रह गया। भारतेन्दु हरीशचन्द्र, जगन्नाथदास रत्नाकर, सत्यनारायण कविरत्न इत्यादि कवियों ने कृष्ण-भक्ति काव्य की रचना की जिसकी प्रेरणा स्थूल रूप में तीन प्रकार की मानी सकती है - (१) परम्परा-पालक (२) कृष्ण-चरित के गान द्वारा प्राचीन गौरव की स्थापना तथा (३) वैयक्तिक संस्कारजन्य आस्था। वल्लभाचार्य के शिष्यों द्वारा प्रवर्तित कृष्ण-काव्य परम्परा उत्थान और पतन के विविध सोपानों पर चढ़ती-गिरती आधुनिक काल तक चली आई। वल्लभ सम्प्रदाय के ही निष्ठावान भक्त भारतेन्दु हरीशचन्द्र ने उनमें पुन: माधुर्य-भक्ति की परिष्कृति और सूक्ष्मता के समावेश का प्रयत्न किया, परन्तु अब इस प्रकार की भक्ति का समय बीत चुका था, देश के सामने यथार्थ नग्न मुँह बाये खड़ा था, पाश्चात्य देशों का बुद्धिवाद भारत की आध्यात्मिकता को चुनौती दे रहा था, जिसके सूक्ष्म तन्तु बाह्य स्थूलताओं के सामने हार मान चुके थे। साहित्य में व्यवहारिक भाषा के अभाव के फलस्वरूप ब्रजभाषा का स्थान खड़ी-बोली ले रही थी, ऎसी स्थिति में ब्रजनायक से सम्बद्ध काव्य-परम्परा और ब्रजभाषा दोनों के विकास का मार्ग अवरुद्ध हो गया।

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सोमवार, मार्च 18, 2024

हमारी भाषा कैसे बनी

कुछ दिन पहले मैंने भारत के जाने-माने डॉक्यूमैंट्री फ़िल्म निर्देशक अरुण चढ़्ढ़ा की १८५७ के लोक-गीतों पर बनी फ़िल्म के बारे में लिखा था। आज उन्हीं की एक अन्य फ़िल्म, "जिस तरह हम बोलते हैं" पर लिख रहा हूँ।

इस फ़िल्म को बनाने में उन्होंने हिंदी भाषा के विकास के प्रख्यात जानकार लोगों का सहयोग लिया, जिनमें प्रो. नामवर सिंह का नाम सबसे पहले आता है, वह इस फ़िल्म के सूत्रधार थे। अन्य विद्वान जिन्होंने फ़िल्म में सहयोग दिया उनमें प्रमुख नाम हैं वाराणसी के प्रो. जुगल किशोर मिश्र तथा प्रो. शुकदेव सिंह, उज्जैन के डॉ. कमलदत्त त्रिपाठी और दिल्ली विश्वविद्यलय के प्रो. अजय तिवारी।

नीचे फ़िल्म के पहले वीडियो क्लिप में प्रो. नामवर सिंह।

फ़िल्म में संस्कृत से पालि, प्राकृत तथा अपभ्रंश के रास्ते से हो कर आज की भाषाओं और बोलियों के विकास की गाथा चित्रित की गई थी। यह फ़िल्म २००४-०५ के आसपास दूरदर्शन इंटरनेशनल चैनल पर तथा अमरीका में विश्व हिंदी दिवस समारोह में दिखायी गई थी।

जब मैंने यह फ़िल्म पहली बार देखी थी तो मुझे लगा था कि इसमें हमारी भाषाओं और बोलियों के बारे में बहुत सी दिलचस्प जानकारी है, और इस फ़िल्म को जितना महत्व मिलना चाहिये था, वह नहीं मिला था। इसलिए नवम्बर २०२२ में मैंने इसे अरुण के साथ दोबारा देखा और उससे फ़िल्म में दिखायी बातों पर लम्बी बातचीत को रिकॉर्ड किया। कई महीनों से इसके बारे में लिखने की सोच रहा था, आखिरकार यह काम कर ही दिया।

फ़िल्म में दी गई कुछ जानकारी मुझे गूढ़ तथा कठिन लगी। चूँकि फ़िल्म में सबटाईटल नहीं हैं, हो सकता है कि कुछ बातें मुझे ठीक से समझ नहीं आयी हों, इसके लिए मैं पाठकों से क्षमा मांगता हूँ। मेरे विचार में दूरदर्शन को इस फ़िल्म को इंटरनेट पर भारतीय भाषाओं के विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध कराना चाहिये।

"जिस तरह हम बोलते हैं" - फ़िल्म के बारे में निर्देशक अरुण चढ़्ढ़ा से बातचीत

अरुण चढ़्ढ़ा: "हम लोग स्कूल में पढ़ते थे कि भारत की बहुत सी भाषाएँ हैं, हर प्रदेश की अपनी भाषा है, और हर भाषा की बहुत सी बोलियाँ हैं। कहते हैं कि यात्रा करो तो हर दो कोस पर बोली बदल जाती है। इसी बात से मैं सोच रहा था कि हिंदी कैसे विकसित हुई, और हिंदी से जुड़ी कौन सी प्रमुख बोलियाँ हैं, उनके आपस में क्या सम्बंध हैं, उनके संस्कृत से क्या सम्बंध हैं। एक बार इसके बारे में जानने की कोशिश की तो पता चला कि जिसे हम एक भाषा कहते हैं, उसमें कई तरह के भेद हैं। जैसे कि संस्कृत भी दो प्रमुख तरह की है, वैदिक संस्कृत तथा लौकिक संस्कृत। तो मेरे मन में आया कि हमारी भाषाओं के विकास में यह सब अंतर कैसे आये और क्यों आये? (नीचे तस्वीर में फ़िल्म-निर्देशक अरुण चढ़्ढ़ा)

हमारी हिंदी की जड़े कम से कम चार हज़ार वर्ष पुरानी हैं और आज की भाषा उस प्राचीन भाषा से बहुत भिन्न है, उनमें ज़मीन-आसमान का अंतर है। अगर कोई भाषा जीवित है तो वह समय के साथ बदलेगी। लोग कहते हैं कि हमारी भाषा में मिलावट हो रही है, भाषा की शुचिता को बचा कर रखना चाहिये, लेकिन अगर भाषा जीवित है तो उसका बदलते रहना ही उसका जीवन है। जयशंकर प्रसाद, मैथिलीचरण गुप्त और निराला जैसे साहित्यकारों ने, हर एक ने अपने साहित्य में अपने समय की भाषा का उपयोग किया है। 

यही सब सोच कर मुझे लगा कि इस विषय पर फ़िल्म बनानी चाहिये कि प्राचीन समय से ले कर हमारी भाषा कैसे विकसित हुई, कैसे कालांतर में उससे अन्य भाषाएँ और बोलियाँ बनी। सबसे पहले मैंने इसके बारे में नेहरु संग्रहालय के एक लायब्रेरियन से बात की, फ़िर उनके सुझाव पर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में बात की, वहाँ प्रोफेसर सब्यसांची ने सलाह दी, इस तरह से इस विषय पर सामग्री एकत्रित करनी शुरु की। तब प्रो. नामवर सिंह से बात हुई, जानकारी देने के साथ-साथ उन्होंने इस फ़िल्म का सूत्रधार बनना स्वीकार कर लिया। फ़िर, उज्जैन की संस्कृत एकादमी के निदेशक के. एम. त्रिपाठी साहब मिले, वाराणसी संस्कृत विद्यापीठ के प्रो. जुगल किशोर मिश्रा और अन्य बहुत से लोग इस काम में साथ चले, उन सबके सहयोग के बिना इस फ़िल्म को नहीं बना सकता था। (नीचे फ़िल्म के वीडियो-क्लिप में प्रो. युगलकिशोर मिश्रा लौकिक संस्कृत से प्राकृत के बारे में बताते हैं)

चूँकि भाषा लिखने, पढ़ने और बोलने का माध्यम है, यह दुविधा थी कि उस पर फ़िल्म कैसे बनाई जाये। मुझे लगा कि फ़िल्म के माध्यम से हम यह दिखा सकते हैं कि बोली हुई भाषा के उच्चारण कैसे होते हैं। जैसे कि उज्जैन में त्रिपाठी साहब को प्राकृत भाषा के उच्चारण की जो जानकारी थी वह अपने आप में अनूठी थी। वाराणसी में प्रो. मिश्र थे जिनके विद्यार्थयों का संस्कृत थियेटर का दल था, उन लोगों ने संस्कृत नाटकों के मंचन से फ़िल्म में सहयोग दिया था।

इस फ़िल्म की सारी रिकॉर्डिन्ग लोकेशन पर ही की गई, मैं इसकी डबिन्ग नहीं चाहता था। खुली जगहों में, भीड़ में, कैसे लाइव रिकॉर्डिन्ग की जाये, यह हमारी चुनौती थी। यह फ़िल्म बीस-बीस मिनट के पाँच भागों में प्रसारित की गई थी, बाद में उन्हें जोड़ कर मैंने एक घंटे की फ़िल्म भी बनाई थी। (टिप्पणी सुनील - इस आलेख के लिए मैंने वह एक घंटे वाली फ़िल्म देखी थी)

वैदिक तथा लौकिक संस्कृत और उसकी व्याकरण

फ़िल्म का प्रारम्भ जयशंकर प्रसाद की "कामायनी" की एक कविता से होता है। फ़िर नामवर सिंह बताते हैं कि "ऋग्वेद की पहली ऋचा वाक-सूक्त है, जिसमें वाक् यानि भाषा की महिमा गाई गई है। हडप्पा में मूर्तियाँ, चित्र, भवन, सब कुछ मिलते हैं लेकिन अभी तक उनकी लिपी नहीं पढ़ी जा सकी। इस तरह से हम उनकी सभ्यता के बारे में बहुत कुछ जानते हैं लेकिन उनके साहित्य के बारे में कुछ नहीं जानते। किसी भी समाज, संस्कृति, सभ्यता की, बिना उसकी भाषा जाने, उसकी पहचान पूरी नहीं होती।"

वैदिक संस्कृत दो हज़ार वर्ष पहले जैसी बोली जाती थी, आज भी वैसी ही बोली और लिखी जाती है, इसके शब्दों को आगे-पीछे नहीं कर सकते। फ़िल्म में वैदिक संस्कृत के मंत्रो के उच्चारण को छाऊ नृत्य के साथ दिखाया गया है।

लेकिन विभिन्न वेदों में मंत्रों के उच्चारण और ताल में अंतर आ जाता है। जैसे कि हिरण्यगर्भ समवर्ताग्रह ऋचा है जो तीन वेद ग्रंथों (ऋग्वेद, कृष्ण यजुर्वेद तथा शुक्ल यजुर्वेद) में मिलती है, इसके शब्द नहीं बदल सकते, लेकिन हर वेद के साथ उसका उच्चारण और ताल बदल जाते हैं। यह इस लिए होता है क्योंकि यह स्वाराघात-युक्त भाषा है, इसमें सात स्वरों का समावेश है, इसलिए उनका उच्चारण भी सप्त स्वर-नियमों के अनुसार होता है। यह सप्त सुर सामवेद में स्फटित रूप में मिलते हैं, जबकि ऋग्वेद, कृष्ण यजुर्वेद तथा शुक्ल यजुर्वेद में यह सात सुर तीन स्वरों (उदात्त, अनुदात्त और छड़िज) में समाहित हो जाते हैं। उदात्त में निशाद और गंधार मिल जाते हैं, अनुदात्त में ऋषभ और भैवत, और छड़िज में षड़ज, मध्यम और पंचम मिल जाते हैं। इस वजह से हर वेद की उच्चारण शैली में अंतर होता है।

वेद ग्रंथ वैदिक संस्कृत में लिखे गये हैं, जबकि रामायण और भगवद्गीता जैसे ग्रंथ लौकिक संस्कृत में लिखे गये हैं, जिनकी भाषा में समय के साथ बदलाव हो सकता है। पाणिनी व कात्यायन जैसे आचार्यों ने व्याकरण के नियमों की व्याख्या करके संस्कृत को व्यवस्था दी, उन्हीं नियमों का प्रयोग हिंदी जैसी भाषाएँ भी करती हैं।

फ़िल्म में बताया गया है कि, "पाणिनी की व्याकरण संस्कृत ही नहीं, किसी भी भाषा की पहली व्याकरण थी, जिसे उन्होंने १४०० सूत्रों में लिखा था। कहते हैं कि शिव जी ने चौदह बार डमरू बजाया, उस डमरू पर १४ स्वरों वाले "अइउड़ सूत्र" से संस्कृत की उत्पत्ति हुई, उन्हीं सूत्रों पर ही पाणिनी ने अष्टाध्यायी व्याकरण लिखी। उन्होंने संस्कृत की मुख्य धातुओं को निश्चित किया, जिनमें उत्सर्ग, प्रत्येय आदि जोड़ कर भाषा के शब्द बनाते हैं।"

फ़िल्म में लौकिक संस्कृत के उदाहरण कालीदास के नाटक के माध्यम से दिखाये गये हैं। उज्जैन के त्रिपाठी जी बताते हैं कि महाकवि कालीदास के समय में लौकिक संस्कृत संचार की भाषा थी और उसकी प्रवृति धीरे-धीरे प्राकृत भाषा में मुखरित हो रही थी, क्योंकि आम व्यक्ति जब उसे बोलते थे तो उनकी बोली में उच्चारण और व्याकरण का सरलीकरण हो जाता था। (नीचे फ़िल्म से वीडियो-क्लिप में डॉ. कमलेश दत्त त्रिवेदी)


 संस्कृत की परम्परा दक्षिण भारत में भी रही है। जैसे कि केरल के मन्दिरों में संरक्षित संगीत तथा नाट्य पद्धिति कुड़ीयट्टम का इतिहास दो हज़ार वर्ष पुराना है। करीब तीन सौ साल पहले इसका कथ्थकली स्वरूप विकसित हुआ है। इन पद्धतियों में वैदिक गान को तीन स्वरों (उदात्त, अनुदत्त और छड़िज) में ही गाते हैं, लेकिन कुड़ीयट्टम शैली में उनमें भावों को भी जोड़ देते हैं।

प्राकृत भाषा

ईसा से करीब छह सौ साल पहले, प्राकृत भाषाएँ लौकिक संस्कृत के सरलीकरण से बनने लगीं। समय के साथ प्राकृत के कई रुप बदले, इसलिए प्राकृत कई भाषाएँ थीं। सरलीकरण से संस्कृत के तीन वचन से दो वचन हो गये, कुछ स्वर जैसे ऋ, क्ष, आदि प्राकृत में नहीं मिलते थे। भगवान बुद्ध ने जिस प्राकृत भाषा में अपनी बात कही उसे "पालि" कहते हैं। जैन तीर्थांकर महावीर और सम्राट अशोक ने भी प्राकृत में ही अपने संदेश दिये। समय के साथ इनसे अपभ्रंश तथा आधुनिक आर्य भाषाओं का जन्म हुआ।

भारत के नाट्यशास्त्र में ४२ तरह की भाषाओं की बात की गई है, जबकि कोवल्य वाक्यमाला ग्रंथ में १८ तरह की प्राकृत की बात की गई है, जिनमें तीन प्रमुख मानी जाती थीं - मगधी, महाराष्ट्री और शौरसैनी। महाकवि कालीदास ने तीनों प्राकृत भाषाओं का अपने नाटकों में सुन्दर उपयोग किया था। जैसे कि उनके रचे एक नाटक में एक पात्र लौकिक संस्कृत बोलता है, गद्य में बोलने वाले पात्र शौरसैनी बोलते हैं और इसके गीत महाराष्ट्री में हैं। 

अपभ्रंश, औघड़ी, अवधी, ब्रज, हिन्दवी, खड़ी बोली ...

संस्कृत से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश, अपभ्रंश से औघड़, इस तरह से शताब्दियों के साथ भाषाएँ बदलती रहीं। महाकवि कालीदास ने विक्रमवेशी में अपभ्रंश का उपयोग भी किया और पतांजलि ने अपना महाभाष्य अपभ्रंश में लिखा।

अपभ्रंश से पश्चिम में गुजरात तथा राजस्थान में पुरानी हिंदी और ब्रज भाषाएँ निकलीं जिनका वीर रस की रचनाओं के सृजन में प्रयोग किया गया। दलपत राय ने खुमान रासो, चंदबरदाई ने पृथ्वीराज रासो, आदि ने अपनी रचनाओ के लिए इन्हीं भाषाओं का उपयोग किया। राजस्थान में इन रचनाओं को डिन्गल तथा पिन्गल भाषाओं में गाने की परम्पराएँ बनी। डिन्गल भाषा में शक्ति, ओज, और उत्साह अधिक होता है, जबकि पिन्गल में अधिक कोमलता है, वह ब्रज भाषा के अधिक करीब है। डिन्गल भाषा में युद्ध से पहले राजा और योद्धाओ को उत्साहित करने के लिए गाते थे। (नीचे वीडियो में श्री शक्तिदान कवि डिन्गल और पिन्गल के बेद के बारे में बताते हैं)

मैथिल कवि विद्यापति ने अवहट भाषा में लिखा, जैसे कि - "कुसमित कानन कुंज वसि, नयनक काजर घोरि मसि। नखसौ लिखल नलिनि दल पात, लिखि पठाओल आखर सात।" (नीचे के वीडियो-क्लिप में फ़िल्म से प्रो. शुकदेव सिंह विद्यापति की अवहट के बारे में)



बाहरवीं-तेहरवीं शताब्दी में हिंदी का स्वरूप सामने आने लगा। निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य अमीर खुसरो ने बहुत सी रचनाएँ इसी हिन्दवी भाषा में लिखीं, जैसे कि उनका यह गीत, "छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके, प्रेम भटी का मदवा पिलाइके, मतवारी कर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके। गोरी गोरी बईयाँ, हरी हरी चूड़ियाँ, बईयाँ पकड़ धर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके", बहुत प्रसिद्ध हुआ। खुसरो ने एक नया प्रयोग भी किया जिसे "दो सुखने" कहते हैं, कविताएँ जिनका एक हिस्सा फारसी में था और दूसरा हिंदी में।

मौलाना दाउद ने अवधी भाषा में "चांदायन" महाकाव्य की रचना की जिसमें उन्होंने चौपाई और दोहों को लिखा, यह ग्रंथ तुलसीदास के मानस से करीब दो-ढाई सौ साल पहले था। उन्होंने जिस तरह से चांदायन में रूप और प्रेम की पीड़ा का वर्णन किया, वह अनोखा था। इस तरह से हिंदी में सूफी काव्यधारा की परम्परा का प्रारम्भ हुआ।

अवधी लेखन की परम्परा में आगे चल कर मालिक मुहम्मद जायसी ने "पद्मावत" को रचा। अवधी भाषा का क्षेत्र बहुत बड़ा था और उसमें एक जगह से दूसरी जगह में कुछ अंतर थे। जायसी की अवधी, जौनपुर और सुल्तानपुर की अवधी थी, वह बहुत लोकप्रिय हुई लेकिन सबसे समझी नहीं गई।

तुलसीदास जी बहुत घूमे थे, उन्होंने अपनी अवधी को अखिल भारतीय रूप दिया, अपनी बात को सरल भाषा में कहा जिसे आम लोग, हलवाई, हज्जाम भी बोलते-समझते थे। उनके काव्य में इतनी उक्तियाँ हैं जिन्हें गाँव के अनपढ़ लोग भी याद रखते हैं और आम जीवन में बोलते हैं। (नीचे के वीडियो-क्लिप में फ़िल्म से प्रो. अजय तिवारी जायसी और तुलसीदास की अवधी के बारे में बताते हैं)




१४वीं - १७वीं शताब्दियों में "खड़ी बोली" सामने आई। कबीर जैसे संत-कवियों ने खड़ी बोली में अंधविश्वास, कर्मकाँड, छूआ-छूत के विरुद्ध कविताएँ गाईं, जो आज तक लोकप्रिय हैं।
 
हिंदी का सारा साहित्य ब्रज भाषा और अवधी में लिखा गया। जो मिठास ब्रज भाषा में मिलती है, वह अवधी में नहीं है। इस मिठास का सारा श्रेय महाकवि सूरदास को जाता है जिन्होंने ब्रज भाषा में लिखा, उसे विकसित किया और लोकप्रिय बनाया।
 
अठाहरवीं शताब्दी में हैदराबाद में ख्वाज़ा बंदानवाज़ ने मिली-जुली भाषा की बुनियाद रखी जिसमें हिंदी, उर्दू और फारसी मिली-जुली थीं। इसकी लिपी हिंदी थी और यह दखिनी हिंदी या दखिनी उर्दू कहलाती है।
 
१८७३ में भारतेन्दू हरीशचन्द्र ने ऐसी कविताएँ लिखीं जिनसे हिंदी नयी चाल में ढली। उनकी कविताएँ ब्रज भाषा में थीं, लेकिन उन्होंने अपना सारा गद्य-लेखन और नाटक खड़ी-बोली में लिखे। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में देवकीनन्दन खत्री, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, यशवंत, निराला, दिनकर, महादेवी वर्मा जैसे लेखकों ने भारत के विभिन्न वर्गों, स्तरों, क्षेत्रों, समाजों से, स्थानीय शब्दों को ले कर अपनी लेखनी से जोड़ा जिससे खड़ी-बोली समृद्ध हुई और हिंदी का विकास व विस्तार हुआ।

निराला ने एक ओर जटिल विचारों की अभिव्यक्ति, "नव गति, नव लय, ताल छंद नव, नवल कंठ नव जलद मंद्र रव। नव नभ के नव विहग वृंद को नव पर नव स्वर दे" जैसे शब्दों में की, जबकि "जीवन संग्राम" जैसी कविता में उसी निराला ने सामान्य बोलचाल की भाषा का उपयोग किया। 

पिछले पचास वर्षों में हिंदी तेज़ी से बदली है। सामाजिक गतिशीलता, आर्थिक बदलावों, बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय सम्पर्कों तथा प्रवासी संस्कृति का प्रभाव हमारी भाषा पर दिखता है। मीडिया ने इसे फैलाने में मदद की है। यह वह हिंदी है जिसमें अंग्रेज़ी, उर्दू आदि के साथ, गुजराती, मराठी आदि भाषाओं के शब्द भी मिल रहे हैं।

अंत में

इस आलेख में हिंदी और उत्तर भारत की भाषाओं के बारे में जो जानकारी है, वह भाषा और इतिहास पढ़ने वालों के लिए नयी नहीं होगी, लेकिन मेरे लिए नयी थी। आज एक ओर भाषा की शुद्धता को बचाने और उसे संस्कृत से जोड़ने की कोशिशें हैं, और दूसरी ओर, उसके सरलीकरण तथा उसमें अन्य भाषाओ से शब्दों को जोड़ने का क्रम भी है।
 
सौ साल बाद हिंदी होगी या नहीं, और होगी तो कैसी होगी? कत्रिम बुद्धि का जिस तरह से विकास हो रहा है उससे भाषाओं की विविधता बनी रहेगी या लुप्त हो जायेगी? इन प्रश्नों के उत्तर मेरे पास नहीं हैं, लेकिन पिछले दो-तीन हज़ार वर्षों का इतिहास यही सिखाता है कि समय के साथ बदले बिना भाषा जीवित नहीं रह पाती।

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रविवार, मार्च 12, 2017

लेखकों के कुछ पुराने पत्र

परिवार के पुराने कागजों में कुछ खोज रहा था, तो उनके बीच में कुछ पत्र भी दिखे. इन पत्रों में हिन्दी साहित्य के जाने माने लेखक भी थे. उनमें से कुछ पत्र प्रस्तुत हैं।

यह पत्र मेरे पिता स्व. श्री ओमप्रकाश दीपक के नाम थे, जो कि १९५०-६० की कुछ समाजवादी पत्रिकाओं, जैसे कल्पना, चौखम्बा तथा जन, से जुड़े थे, तथा स्वयं लेखक, पत्रकार, अनुवादक व आलोचक भी थे. पत्रों को लिखने वाले थे राजकमल चौधरी, उपेन्द्रनाथ अश्क तथा शरद जोशी।



पहला पत्र, लेखक राजकमल चौधरी

वर्ष १९६१
राजकलम चौधरी, पोस्ट आफिस पुटिआरी पूर्व, कलकत्ता

प्रिय भाई,

आप का पत्र पा कर प्रसन्नता हुई, जोकि इस बात से जाहिर है कि मैं दूसरे ही दिन उसका उत्तर भेज रहा हूँ। आपने अपने पत्र में पता नहीं लिखा, खैर "जनमुख कार्यालय" से पता लगा लूँगा।

"जनमुख" में प्रकाशित मेरा लेख आपके विचारों से मतभेद रखता है। आप राजनीति में सक्रिय भाग लेते हैं, मैं लेखन कार्य (गैर राजनीतिक) में अधिक व्यस्त रहता हूँ। इसलिए ज़रूर आप ही ज़्यादा सही हैं। लेकिन मेरी रचनाओं या मेरी समीक्षाओं या मेरे साहित्यक लेखों से आपको असहमती है, तो मैं यहाँ हमेशा यही कहूँगा कि मैं ही ज़्यादा सही हूँ, और हमेशा सबसे ज़्यादा सही होने की कोशिश करता रहता हूँ - क्योंकि साहित्य मेरा पेशा है, साथ ही मेरी ज़िन्दगी भी है।

आपने "मानवी" के बारे में लिखा है। मैंने पुस्तक पढ़ी थी और जहाँ तक याद है, जगदीश भाई की "इकाई" में उसकी समीक्षा भी लिखी थी। मैं अपनी उस समीक्षा तथा आप की बात से सहमत हूँ कि "मानवी" दूसरे दर्जे का उपन्यास है। और "मानवी" की कहानी से ज़्याद, बहुत ज़्यादा बेहतर कहानियाँ आपने १९५५-५६-५७ में "ज्ञानोदय" पत्रिका में लिखी थीं।

आप क्या हमेशा दिल्ली में ही रहते हैं? मैं समझता था कि आपका स्थायी निवास हैदराबाद में है और आप वहीं रह कर "चौखम्बा" संपादित करते हैं।

आप ने "मानवी" लिखी। जबकि मुझे पूरा विश्वास है, "मानवी" के कथा विषय तथा चरित्रों से आप का अधिक परिचय नहीं है। आप का संघर्ष आप को उस जीवन क्षेत्र से दूर ही रखता होगा। "मानवी" के विषय से उर्दू में सदाअत हसन मन्तो का परिचय था, हिन्दी में राजकमल चौधरी को परिचय है ("ये कोठेवालियाँ" में अमृतलाल नागर तक रिपोर्टर बन कर रह गये हैं।) आपको राजनीतिक उपन्यास लिखने चाहिये, नहीं तो चतुरसेन (आचार्य), गुरुदत्त, सीताराम गोयल, जैनेन्द्र ("जयवर्धन" तो आपने पढ़ा ही होगा), लक्षमी नारायण लाल ("रूपजीवा" की समीक्षा आपने ही "कल्पना" में लिखी थी), आदि की गलतियाँ स्थायी ही रह जायेंगी। और हिन्दी को अपने एक अपटन सिन्क्लेयर की बड़ी ज़रूरत है। कृपया इसे आप advice unwanted नहीं मानेगे, brotherly request ही स्वीकार करेंगे।

इधर मेरी एक मामूली सी किताब "नदी बहती थी" आयी है। अगले पत्र के साथ सेवा में भेजूँगा।

इन दिनों एक प्रकाशक के लिए अंग्रेज़ी में पूर्वीय सौन्दर्यशात्र (मेरा शिक्षा का प्रधान विषय यही रहा है) पर एक बड़ी किताब लिख रहा हूँ। वैसे पत्र पत्रिकाओं में तो लिखते रहना ही पड़ता है। कलकत्ते में स्थायी (१९५८ से, और इसी साल से मैंने हिन्दी में लिखना भी शुरु किया है) रहता हूँ। पत्नी है, दो साल की एक बच्ची भी है। कहीं नौकरी नहीं करता हूँ, करने का इरादा अब तक नहीं है।

आप क्या लिख पढ़ रहे हैं, सूचित करेंगे। अनुगत,

कमल, १५.१२.६१

दूसरा पत्र, लेखक उपेन्द्रनाथ अश्क

वर्षः १९६२
उपेन्द्रनाथ अश्क, ५ खुसरो बाग रोड, इलाहाबाद

प्रिय दीपक,

आशा है तुम सपरिवार स्वस्थ और सानन्द हो।

तुम्हारा एक पत्र आया था, पर उस पर तुमने कोई पता नहीं लिखा, जिस कारण मैं उसका उत्तर नहीं दे सका। पित्ती साहब से तुम्हारा पता मिल गया है तो यह चन्द पंक्तियाँ लिख रहा हूँ।

पत्र तो तुम्हारा अब कहीं ढूँढ़े से नहीं मिल रहा। याद से ही उत्तर दे रहा हूँ।

पहली बात तो भाई यह है कि पत्र जो "कल्पना" में छपा, छपने के ख्याल से नहीं लिखा गया था। मेरा ख्याल था कि तुम कहीं राजा दुबे के पास रहते हो, मेरी बात वह तुम तक मज़ाक मज़ाक में पहुँचा देगा। छपने के लिए जो पत्र लिखे जाते हैं, वे दूसरी तरह के होते हैं। यदि उसे छापना अभीष्ट था तो उसमें कुछ पंक्तियाँ काट देनी चाहिये थीं। बहरहाल मुझे तुम्हारी आलोचनाएँ अच्छी लगी थीं। नया नाम होने के कारण तुम्हारा एक नोट पढ़ कर मैं दूसरा भी पढ़ गया था और तब जो impression था, मैंने राजा दुबे को लिख दिया था।

मेरी कहानियों के बारे में तुम जो सोचते हो, हो सकता है वह ठीक हो। गत पैंतिस वर्षों से लिखते लिखते मेरी कुछ निश्चित धारणाएँ बन गई हैं और मैं उन्हीं के अनुसार लिखता हूँ। एक आध बार सरसरी नज़र से पढ़ कर जो लोग फतवे दे देते हैं, वे प्रायः गलत सिद्ध हो जाते हैं। इधर "पलंग" की कहानियों को ले कर पत्र पत्रिकाओं में बड़ी चर्चा है। कभी कोई कहानी की गहराई को पकड़ लेता है, तब खुशी होती है, नहीं पकड़ पाता तो दुख नहीं होता, क्योंकि यह हर किसी के बस की बात नहीं है।

"सड़कों पे ढ़ले साये" की भूमिका मैंने व्यंग विनोद की शैली में ही लिखी थी। कुछ लोगों ने समझ लिया कि सचमुच में इस बात पर परेशान हुआ कि "आचार्य जी" ने मुझे "नया कवि" नहीं सकझा और मैं परेशान हुआ। हालाँकि यह लिखने का और गहरी बातों को मनोरंजक ढ़ंग से कहने का एक स्टाइल है। मैंने जो बातें अपनी भूमिका में उठायीं - इतनी आलोचनाओं में किसी लेखक ने भी उन पर बहस नहीं की। सवाल सही या गलत का नहीं है, नयी कविता के क्राइसिस का है। क्या यह सही नहीं है कि नयी कविता महज़ form पर ज़ोर दे रही है, या पश्चिम की स्थितियों और मनोभावों को अपने ऊपर नये कवि टूटन की निराशा की कविताएँ कर रहे हैं, या नया कवि शब्दों को अप्रयास समझ रहा हो, वगैरह वगैरह ... चूँकि ऐसी सभी बातें मैंने कहानी के ढ़ंग से कहीं, लोगों ने समझ लिया कि सचमुच कहीं मेरा अपमान हुआ है और मैं अपने आपको नया कवि मनवाने के लिए हाथ पैर पटक रहा हूँ।

कुछ ऐसी ही बात कहानियों के सम्बन्ध में भी है। कहानियों के माध्यम से जो मैं कहना चाहता हूँ, उसे जानने के लिए दो एक बार कहानियों को ध्यान से तो पढ़ना पड़ेगा ही। इस पर भी हर लेख की अपनी सीमाएँ होती हैं और उन्हें पार करना कई बार कठिन होता है।

पता नहीं तुमने मेरा नया कथा संग्रह "पलंग" या कविता संग्रह "सड़कों पे ढले साये" पढ़ा कि नहीं। न पढ़ा हो तो लिखना.

इधर नीलाभ से मेरी ५९वीं वर्षगाँठ पर एक बड़ी मनोरंजक पुस्तक निकली है। उसकी एक प्रति तुम्हें भेजने के लिए मैंने दफ्तर में फोन किया है, मिले तो पहुँच और राय कौशल्या को भेजना.

स. उपेन्द्र

दो पत्र, लेखक शरद जोशी

वर्षः १९६३
नवलेखन, हनुमानगंज, भोपाल

प्रिय भाई,

बहुत दिनों से नवलेखन को रचना भेजने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया है। पर ऐसा वोट आफ नो विश्वास पास न करें। नवलेखन का सातवाँ अंक निकल रहा है, आठवां प्रेस में जा रहा है। अब से हम कहानियों की संख्या बढ़ाएगे और थोड़ा बहुत पारिश्रमिक भी देंगे। बहुत अधिक तो नहीं होगा, पर कुछ अवश्य की शुरुआत हो। नवलेखन के लिए यह साहसी कदम है। दाद दीजिये और शीघ्र वैसी ही एक घाटी कहानी भेजें कि आइना देखूँ तो जिस्म अपना ही ...

मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ कि कुछ शीघ्र भेजेंगे। नवलेखन का विषेशाँक भी निकाला जाना है, उसके लिए कुछ सुझाव भेजो। आशा है प्रसन्न हो।

कथा संकलन उत्तर की प्रतीक्षा में,

तुम्हारा

शरद जोशी

वर्षः १९६३
भोपाल से

डीअर दीपक,

लेख दुरस्त कर दिया है, जैसा तुम चाहते थे। पत्र नहीं लिख पाया क्योंकि बुरा फँसा हूँ. इस कार्ड को भी पत्र न मानना और गालियाँ देना ही। दिवाली बाद लिखूँगा। संपादक की खसलत नहीं यह दोस्त की खसलत है कि जवाब नहीं देता। संपादक तो साले तुरंत उत्तर देते हैं "आपकी रचना प्राप्त हुई ... यों ... यों ... कृपा बनाए रखे वगैरा" + मैं अभी कहाँ हुआ संपादक। महेन्द्र कुलश्रेष्ठ के नाम कुल तीन गाली नामें अब तक प्राप्त हो चुके हैं, दो इस बार छाप रहा है। "जन" कब निकल रहा है? ओमप्रकाश निर्मल यहाँ आये थे, चर्चा कर रहे थे। प्रसन्न है न।

तु. शरद जोशी

एक आमन्त्रण कार्ड
वर्षः १९६५, दिल्ली

"कृतिकार और उसका संसार" विषय पर रविवार १९ दिसम्बर १९६५ को प्रातः साढ़े नौ बजे श्री शामलाल की अध्यक्षता में दिल्ली के सृजनात्मक कलाकारों की एक गोष्ठी आयोजित की गयी है।

आप सादर आमन्त्रित हैं।

स्थानः विट्ठल भाई पटेल भवन, रफी मार्ग, नयी दिल्ली

भवदीयः मकबूल फ़िदा हुसेन, राम कुमार, मोहन राकेश, रिचर्ड बार्थोलोम्यु, रघुबीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, ओमप्रकाश दीपक, जितेन्द्र सिंह, अम्बा दास, जे. स्वामीनाथन, श्रीकांत वर्मा

कार्यक्रम

उद्घाटन भाषणः आक्टेवियो पाँज
विषय प्रस्तावनाः अज्ञेय
प्रमुख वक्ताः देवीशंकर अवस्थी, जे. स्वामीनाथन, रिचर्ड बार्थोलोम्यु, मोहन राकेश, ओमप्रकाश दीपक, रभुवीर सहाय, कृष्ण खन्ना, इब्राहीम अलकाज़ी, सुरेश अवस्थी तथा श्रीकांत वर्मा

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शुक्रवार, फ़रवरी 18, 2011

नारी मुक्ति की संत

शरीर की नग्नता में क्या नारी मुक्ति का मार्ग छुपा हो सकता है? कर्णाटक की संत महादेवी ने वस्त्रों का त्याग करके अपने समय के सामाजिक नियमों को तोड़ा था. क्यों?

Akka Mahadevi - Scribbles on Akka
मधुश्री दत्ता की सन् 2000 की डाक्यूमेंटरी फ़िल्म "स्क्रिब्बल्स आन अक्का" (अक्का पर लिखे कुछ शब्द - Scribbles on Akka) देखने का मौका मिला जो बाहरवीं शताब्दी की दक्षिण भारतीय संत अक्का महादेवी की कविताओं के माध्यम से उनके क्राँतिकारी व्यक्तित्व को विभिन्न दृष्टिकोणों से देखने का प्रयास है. फ़िल्म उन असुविधाजनक व्यक्तित्वों के बारे में सोचने पर बाध्य करती है जो समाज के हो कर भी धर्म के नाम पर, समाज के नियमों को तोड़ने का काम करते हैं पर जिनका समाज पर इतना गहरा प्रभाव होता है कि चाह कर भी उनको छुपाया या भुलाया नहीं जा सकता.

महादेवी या अक्का (दीदी) बाहरवीं शताब्दी की वीरशैव धार्मिक आंदोलन का हिस्सा मानी जाती हैं. वीरशैव आंदोलन में वैदिक कर्मकांड, मूर्तिपूजा, जाति भेदभाव, अवतारवाद, अंधश्रद्धा आदि को बाधक ठहराया और अल्लमप्रभु, अक्कमहादेवी, चेन्न-बंसव तथा सिद्धराम जैसे संतों ने जातिरहित, वर्णरहित, वर्गरहित समाज के निर्माण की कोशिश की. इन संतों के लेखन वचन साहित्य के नाम से प्रसिद्ध हुए जो कि गद्य शैली में लिखी कविताएँ हैं.

कणार्टक में शिमोगा के पास के उड़ुथाड़ी गाँव में जन्मी अक्कमहादेवी ने जब सन्यास लिया तो केवल घर परिवार ही नहीं छोड़ा, वस्त्रों का भी त्याग किया और उनके लेखन ने नारी शरीर और नारी यौनता के विषयों को जिस तरह खुल कर छुआ, वह सामान्य नहीं है. जैसे सुश्री लवलीन द्वारा अनुवादित अक्कमहादेवी की इस कविता को देखियेः
वस्त्र उतर जाएँ
गुप्त अंगों पर से तो
लज्जा व्याकुल हो जाते है जन
तू स्वामि जगत का, सर्वव्यापि
एक कण भी नहीं , जहाँ तू नहीं
फिर लज्जा किस से?
चेनामल्लिक अर्जुना देखे जग को
बन स्वयं नेत्र
फिर कैसे कोई ढके,
छिपाए अपने को?
(डा. रति सक्सेना द्वारा सम्पादित वेबपत्रिका "कृत्या" से )

मधुश्री दत्ता की डाक्युमेंटरी में आज की आधुनिक व्यवस्था में अक्का महादेवी किस रूप में जीवित हैं, इसको विभिन्न दृष्टिकोणों से देखने की चेष्ठा है. गाँव में गणदेवी की तरह, औरतों के कोपोरेटिव में, जहाँ उनके नाम से पापड़ और अचार बनते हैं, काम करने वाली औरतों की दृष्टि में, म़ंदिर के पुजारी और धर्म ज्ञान की विवेचना करने वाले शास्त्री की दृष्टि में, फेमिनिस्ट लेखन और चित्रकला में, महादेवी विभिन्न रूपों में दिखती हैं. इन विभिन्न रूपों में सामान्य जन में उनका रूप उनके व्यक्तित्व को धर्म मिथिकों में छुपा कर, मन्दिर में पूजने वाली देवी बना देता है, जिसमें उनके वचनों की क्राँति को ढक दिया जाता है. लेकिन फ़िल्म में उनकी एक भक्त का साक्षात्कार भी है जिसने गाँव में अक्का महादेवी के मंदिर के आसपास भक्तों के लिए सुविधाएँ बनवायी हैं और जो महादेवी के असुविधाजनक संदेश को छुपाने के प्रयास पर हँसती है.

Akka Mahadevi - Scribbles on Akka

फ़िल्म में महादेवी के कुछ वचनों को गीतों के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिन्हें सुश्री सीमा बिस्वास पर विभिन्न परिवेशों में फ़िल्माया गया है, जिनमें एक परिवेश है एक ईसाई गिरजाघर में एक स्त्री द्वारा नन बनने की रीति, यानि महादेवी की बात को एक धर्म की सीमित दायरे से निकाल कर इन्सान के मन में ईश्वर से मिलने की ईच्छा के रूप में देखने की चेष्ठा.

Akka Mahadevi - Scribbles on Akka

फ़िल्म को देख कर मानुषी में पढ़े मधु किश्वर के एक पुराने आलेख की याद आ गयी जिसमें बात थी किस तरह गाँव में रहने वाली औरतें सीता मैया के पाराम्परिक गीतों के माध्यम से नारी मुक्ति की बात उठाती हैं. परम्परागत समाज में जहाँ नारी चारों ओर से नियमों में बँधी हो जिनमें उसकी अपनी इच्छाओं आकाँक्षाओं के लिए जगह न हो, वहाँ महादेवी जैसी नारी के विचारों को धर्म स्वीकृति मिलना थोड़ी सी जगह बना सकता है जहाँ सामाजिक नियमों की परिधि से बाहर जाने की अभिलाषा की अभिव्यक्ति हो सकती है.

महादेवी का व्यक्तित्व शारीरिक नग्नता को केवल लज्जा का कारण सोचने पर भी प्रश्न उठाता है. फ़िल्म में कुछ चित्रकार अक्का महादेवी के नग्न शरीर को ईश्वर का प्रतिरूप देखते हैं, तो कुछ इसमें नारी मुक्ति की चिंगारी. परम्परागत समाज को चुनौती देती महादेवी की छवि की जटिलता को ब्राह्मण विद्वान भी स्वीकारते हैं और आम व्यक्ति भी.

Akka Mahadevi - Scribbles on Akka

मेरी दृष्टि में फ़िल्म का अंतिम संदेश यही है कि भारत के विभिन्न हिस्सों में धर्म के संदेश को अलग अलग दृष्टिकोणों से देखा और समझा गया है. यही अनेकरूप विभिन्नता ही हिंदू धर्म की शक्ति रही है. इस जटिलता को सहेजना आज के भूमण्डलिकरण से जकड़े संसार में परम आवश्यक है, जहाँ सामाजिक जटिलताओं का सरलीकरण एवं ऐकाकीकरण करने की लालसाएँ बढ़ती जा रही हैं.

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रविवार, फ़रवरी 06, 2011

प्रेम निवेदन

हिन्दी फ़िल्मों के गानों में हमारे जीवन के सभी सुखों दुखों का हाल छिपा है. चाहे कोई भी मौका हो, मुंडन से ले कर मैंहदी तक, करवाचौथ से ले कर क्रियाकर्म तक, खाना बनाते समय सब्ज़ी जल गयी हो या काम पर जाते समय बस छूट गयी हो, प्रेयसी मिलने आये या दगा दे जाये, पापा गुस्सा हों या माँ ने मन पसंद खीर बनायी हो, कुछ भी मौका हो, बस उसका गीत मन में अपने आप आ जाता है. और चाहे उसे गायें या न गायें, मन में अपने आप ही गूँज जाता है. क्या आप को भी लगता है कि बिना इन गानों के जीवन का रस कुछ कम हो जायेगा?

और क्या आप के साथ कभी ऐसा हुआ है कि अचानक कोई गीत सुनते सुनते, अपने जीवन की वह बात समझ में आ जाती है जिस पर कभी ठीक से नहीं सोचा था? मेरे साथ यह अक्सर होता है.

अगले वर्ष मेरे विवाह को तीस साल हो जायेंगे. काम के लिए अक्सर देश विदेश घूमता भटकता रहता हूँ. इन्हीं यात्राओं से जुड़ी एक बात थी, जो अचानक "तनु वेड्स मनु" का एक गाना सुनते समय समझ आ गयी.

गाना के बोल लिखे हैं राजशेखर ने और गाया है मोहित चौहान ने . गाने के बोल हैं -
कितने दफ़े मुझको लगा
तेरे साथ उड़ते हुए
आसमानी दुकानो से ढूँढ़ के
पिघला दूँ यह चाँद मैं
तुम्हारे इन कानों में पहना ही दूँ
बूँदे बना
फ़िर यह मैं सोच लूँ समझेगी तू
जो मैं न कह सका
पर डरता हूँ कहीं
न यह तू पूछे कहीं
क्यों लाये हो ये यूँ ही
गाना सुना तो लगा कि वाह गीतकार ने सचमुच मेरे मन की बात को कैसे पकड़ लिया.

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देश विदेश में घूमते समय कई बार कुछ दिख जाता है जो लगता है कि बहुत सुन्दर लगेगा मेरी पत्नि पर. पर साथ में मन में यह भी भाव होता है कि शायद वह बिना कहे ही समझ जायेगी वह बात जो कह नहीं पाता हूँ. पर अक्सर होता है कि वह मेरी भेंट देख कर नाक सिकोड़ लेती है, "यह क्या ले आये? बिल्कुल ऐसा ही तो पहले भी था." या फ़िर, "क्यों बेकार में पैसे खर्च करते हो, तुम्हे मालूम है कि मैं इस तरह की चीज़ें नहीं पहनती."

और मन छोटा सा हो जाता है. सोचता हूँ, यूँ ही बेकार खरीद लिया. आगे से नहीं खरीदूँगा. पर अगली यात्रा में फ़िर भूल जाता हूँ. प्रेम निवेदन कैसे हो? यह नहीं होता, शायद उम्र का दोष है. आजकल के जोड़े तो आपस में "लव" या "माई लव" करके बोलते हैं, पर मुझसे इस तरह नहीं बोला जाता.

हर बार आशा रहती है कि वह मेरे मन की बात को बिना कहे ही समझ जाये. कभी लगता है कि वह मेरे मन की बात को समझती ही है, उसमें भेंट लाने या न लाने से कुछ नहीं होता?

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शनिवार, फ़रवरी 05, 2011

गालिब खड़े बाज़ार में

अमरीकी विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका और कवयत्री रीटा डोव का  डिजिटल युग की कविता के बारे में वीडियो देख रहा था. इस तरह के वीडियो देखना मुझे बहुत अच्छा लगता है. अपने मन पसंद विषयों पर कवियों, विचारकों, वैज्ञानिकों, लेखकों, दर्शकों, इतिहासकारों आदि को सुनना, जब जी करे तब. बिना यह चिन्ता करे कि कितने बजे टीवी या रेडियो पर आयेगा, अपनी मर्ज़ी से जब जी चाहे देखो और जितनी बार चाहे देखो कि अब ऐसी आदत पड़ी है कि सामान्य टीवी बहुत कम देखता हूँ.

बिग थिंक, टेड, 99 प्रतिशत, पोपटेक, जेल वीडियो कोनफ्रैंस, रिसर्च चैनल, वीडियो लेक्चर, जाने कितनी जगहें हैं जहाँ पर जानने समझने के लिए खजाने भरे हैं, और कोई फीस या घर से बाहर जाने की भी आवश्यकता नहीं. जब हम स्कूल जाते थे तो किसी विषय पर कुछ जानने समझने के लिए बस स्कूल की किताबें ही थीं. एनसाईक्लोपीडिया या फ़िर विषेश किताबें कभी पुस्कालय में पढ़ने को मिल जाती, पर यह कभी कभी ही होता. आज आप सरकारी स्कूल में हों या कानवैंट में, विश्वविद्यालय में हों या मेरे जैसे घर में बैठ कर दिलचस्पी रखने वाले, कोई भी विषय हो, दुनिया के जाने माने विशेषज्ञ उसके बारे में क्या कहते हैं, हार्वर्ड, कैमब्रिज या मिट जैसे जगतविख्यात विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर क्या पढ़ाते हैं, जाने माने डाक्यूमैंट्री बनाने वालों ने उस पर क्या फ़िल्म बनायी है, सब कुछ देखना सुनना  आसान. बस इंटरनेट चाहिये. चाहे अभी भी अधिकाँश स्कूल पाठ्यक्रम में रखी किताबों के रट्टे ही लगवायें, पर भविष्य में ज्ञान जाँचने के तरीके अवश्य बदलने पड़ेंगे.

कवयत्री रीटा डोव कहती हैं कि साहित्य की सभी विधाओं में से कविता आज के डिजिटल युग के सबसे उपयुक्त है, क्योंकि आज कल लोगों का ध्यान किसी बात पर थोड़ी सी देर के लिए ही जुड़ता है. कविता को ट्विटर के माध्यम से आसानी से बाँटा जा सकता है, दुनिया में कहीं भी पलों में पहुँचा सकते हैं, जो डिजिटल युग में कविता के बहुत उपयोगी है. आज जिस तरह से इंटरनेट पर वीडियो देखना आसान हो गया है, इससे यह भी आवश्यक नहीं कि आप कविता को पढ़ें, बल्कि आप कविता को उसके कवि के मुख से भी सुन सकते हैं. सुश्री डोव की बातें मुझे बहुत दिलचस्प लगीं, अगर आप चाहें तो उनकी पूरी बात को सुन सकते हैं.

रीटा डोव का वीडियो देखने के बाद सोच रहा था कि समय के साथ कविता कैसे बदली. उस समय जब किताबें नहीं थीं, प्रिटिंग प्रेस का आविष्कार नहीं हुआ था, तब कविता केवल बोलने और गाने के माध्यम से ही जानी जा सकती थी. गाँवों में घूमने वाले कविता कहानियाँ गाने वाले पारम्परिक कलाकार उन्हें कँठस्थ याद करते थे, इसलिए कविता और कथा का विषेश तरह से विकास हुआ जिसमें याद करने और गाने में आसानी हो. शायद इसी तरह गज़ल और शेरों का भी प्रचलन हुआ क्योंकि उनमें शब्दों का दोहराव और धुन, बोल कर या गा कर सुनाने के लिए ही बने थे.

फ़िर समय आया छपाई की प्रेस का और किताबों का. एक दशक पहले तक छपाई की तकनीक आसान नहीं थी और कुछ छपवाने में पैसा भी लगता था. तभी किताब छापना, बेचना, जैसे व्यव्साय बने, किताबें छापने वाले बने.

आज की दुनिया में लिखने पढ़ने की नयी क्राँती आ रही है. इंटरनेट, ईमेल, फेसबुक जैसे माध्यमों ने कविता, कहानी और उपन्यास, लिखना, पढ़ना, बाँटना, सबको बदल दिया है. लेखकों का गणतंत्र है, हर कोई चिट्ठा बना ले, जो मन में आये लिख ले. अगले ही क्षण, चाहे तो आप पढ़िये, उस पर टिप्पणी लिखिये, उसकी आलोचना कीजिये या प्रशँसा.

पर इतनी भीड़ में अच्छे लेखक और कवि कहीं खो तो नहीं जायेंगे? सचमुच सब अच्छे कवि लेखक, क्या इंटरनेट और फैसबुक से अपने पढ़नेवालों तक पहुँच पायेंगे? यानि अगर आज गालिब या महादेवी वर्मा लिखना शुरु करते, अपना चिट्ठा बनाते, फैसबुक पर पन्ना बनाते, तो क्या सचमुच गालिब और महादेवी वर्मा जैसा बन पाते? और आज के गालिब या महादेवी वर्मा को अगर न चिट्ठा लिखने में दिलचस्पी हो, न उनका कोई फैसबुक पर पन्ना हो, तो क्या आज वह गालिब और महादेवी वर्मा बन पायेंगे?

Ghalib Mahadevi Varma, collage

फैसबुक पर मिर्ज़ा गालिब के पन्ने के चालिस हज़ार से अधिक फैन हैं, जबकि महादेवी वर्मा के पन्ने को केवल छः सौ लोग चाहते हैं.

पर जिन्हें इन माध्यमों से खुद को बेचना आता है, जिन्हें अड़ोसियों पड़ोसियों को बेझिझक संदेश भेज कर अपनी प्रशँसा करना करवाना आता है, जिन्हें प्रतियोगिताओं में अपने लिए वोट माँगना आता है, उनके पीछे तो लाखों जाते हैं, उनके सामने क्या भविष्य के गालिब जी या महादेवी जी टिक पायेंगे? और अगर आप शर्मीलें हैं, खुद को बेझिझक बेच नहीं सकते तो क्या आप का लेखन घटिया माना जाये?

अगर गालिब या महादेवी आज ज़िन्दा होते तो क्या उन्हें अपनी कला को समझने वाले मिलते? आप का क्या विचार है?

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सोमवार, सितंबर 20, 2010

ज़ंग लगे गुलाब

हल्की हल्की बारिश आ रही है. हवा की ठंडक से झुरझुरी सी आ रही है. ग्रीष्म ऋतु कब गयी और शिशर कब आया, पता ही नहीं चला. पेड़ों के कथ्थई, भूरे, पीले पत्तों की चादर बिछी है बाग में, उन पर चलो तो छपक छपक की गीली आवाज़ आती है और जूतों पर चिपक जाते हैं. लगता है कि बस पलक झपकूँगा तो वर्ष बीत जायेगा, समय इतनी तेज़ी से निकल रहा है. विश्वास नहीं होता कि कल लगभग इसी समय मैं मापूतो शहर में था.

चमकती हरी घास पर पानी की बूँदें. तम्बारा के बूढ़े नवयुवकों के चेहरे सामने आ जाते हैं. बालों में, आँखों में, नाक में धूल भर गयी थी. सात घँटों तक कच्ची सड़क पर जीप के धक्के खाने से कमर दर्द कर रही थी, सुबह सुबह चाय के साथ बस एक केला खाया था, भूख भी लगी थी. वे सब हमारे इन्तज़ार में स्वयंसेवकों की संस्था के दफ़्तर में बैठे थे. आसपास कोई और पक्का घर नहीं था, केवल झोपड़ियाँ. "स्वास्थ्य के अतिरिक्त और क्या समस्याएँ हैं यहाँ की?" मैंने टीबी, कुष्ठ रोग और एड्स की रिपोर्ट पढ़ने वाले नवयुवक से पूछा था. मुझे कुछ देर तक देखता रहा था, फ़िर धीरे से बोला था, "भूख, भूख है हमारी सबसे बड़ी समस्या, कुछ खाने को नहीं मिलता." उसके पिचके गाल और निराश आँखों में दबे गुस्से से हतप्रभ रह गया था, अपने आप पर बहुत शर्म आयी थी.

दस साल बीत गये लड़ाई को खत्म हुए, अब जगह जगह दबे बम जिससे बच्चों की टाँगें उड़ जाती है, बहुत कम हैं. लेकिन बीहड़ जंगल में अब भी कोई चिड़िया पशु आसानी से नहीं दिखते, लड़ाई में सब खत्म हो गया. थोड़ी दूर ही बहती है जम्बेज़ी नदी, जिसका पाट इतना चौड़ा है कि दूसरा सिरा नहीं दिखता, पर गाँव वाले बारिश के पानी के लिए तरस रहे हैं. हथियार मिल जाते हैं इस दुनिया में, बम मिल जाते हैं, सड़क, पानी नहीं मिलते.

"मेरा एक साल का बेटा मरा, पेट खराब हुआ था उसका", "मेरी छः महीने की बेटी मरी, मीसल्स से", "मेरा तीन महीने का बच्चा मरा मलेरिया से", मेरे एक अन्य प्रश्न के उत्तर में उनके मरे हुए छोटे बच्चों की सूची खत्म होने को नहीं आती थी.

"यह सब सोचने से क्या फ़ायदा", मैं स्वयं से कहता हूँ. यहाँ हरे भरे बाग में कुत्ते को सैर कराते समय, अफ्रीकी गाँव की धूल मिट्टी सपना सा लगती है.

छप छप करते हैं जूते पानी पर. क्यारी में लगे पीले गुलाब को देख कर पोलैंड के कवियत्री मारिया पाउलीकोव्सका की कविता की पंक्तियाँ याद आती हैं
पतझड़ के जंग लगे गुलाब
बारिश के सफेद हाशिये को देखते हैं - बारिश आसमान को धरती से सिल रही है
झुरझुरियों और टाँकों के साथ
कश्मीर में भी गुलाबों को जंग लगा होगा. पत्थर फैंकने वाले किशोरों की लाशों का. उनकी माँओं के आँसुओं से अब तक झील में बाढ़ नहीं आयी क्या?

शनिवार, अगस्त 21, 2010

अंतिम श्रद्धाँजलि - राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त

टिप्पणीः यह आलेख स्व. डा. सावित्री सिन्हा के आलेख संग्रह "तुला और तारे", (नेशनल पब्लिशिंग हाउस दिल्ली, 1966) से है. दद्दा (राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त) का देहांत 12 दिसंबर 1964 में हुआ.

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India's national poet Maithili SharanGupt
उस दिन दद्दा की विदा के बाद हम सबका मन भारी हो रहा था. स्टेशन के वेटिंग रूम में थोड़ी देर के लिए उनके गले में जलन सी होने लगी थी, इसलिए हमारी चिन्ता और भी बढ़ गयी थी. रात में दो तीन बार आँखें खुल गयीं. सुबह तड़के ही मुझसे रहा न गया और झाँसी के लिए ट्रंककाल बुक करवायी, न जाने मन में कैसी कैसी दुश्चिताएँ उठती रहीं, परन्तु टेलीफोन एक्सचेंज की कृपा से काल झाँसी नहीं, राँची की मिली, वह भी ग्यारह बजे दिन को. मेरे क्लास का समय हो रहा था इसलिए विवश हो कर उसे कैंसल करवाना पड़ा. पत्र लिखने की सोच रही थी कि ज्वरग्रस्त हो गयी और फ़िर उसी ज्वर में खबर मिली कि दद्दा नहीं रहे. जीवन की कुछ अमूल्य निधियों में मेरे लिए सबसे गौरवपूर्ण निधि दद्दा का अकारण स्नेह था. कहाँ मैं, एक अकिंचन, महत्वहीन तुच्छ व्यक्ति, और कहाँ भारत के महान राष्ट्रकवि के वात्सल्य का अगाध समुद्र. आज लग रहा है जैसे मेरी अपात्रता और अकिंचता ने ही मुझे उस अपार वैभव से वंचित कर दिया है. न जाने कौन सा सूत्र पिछले तीन दिनों से दद्दा के लिए बैचेन कर रहा था. निधन का समाचार कान में पड़ते ही मैं भरे बुखार में रजाई छोड़ कर उठ खड़ी हुई, डा. नगेन्द्र के घर फोन किया, मालूम पड़ा कि जब से चिरगाँव से ट्रंककाल आयी है, डा. साहब कमरा बन्द किये बैठे हैं. डा. विजयेनद्र स्नातक जी के यहाँ फोन किया तो मालूम हुआ उन्हें यह सन्देश डा. साहब के यहाँ से ही मिला था. मेरी अस्वस्थता और रुग्णता के कारण मुझे खबर नहीं दी गयी. मन किया किसी तरह चिरगाँव उड़ जाऊँ. दद्दा के अन्तिम दर्शन तो मिल जायेंगे, परन्तु फोन से पता चला कि उनकी अन्त्येष्टि क्रिया के लिए निर्धारित समय तक पहुंचना सम्भव नहीं है. और फ़िर दद्दा की बातें, उनकी हँसी, उनके लाड़ दुलार, कानों में गूँजते रहे, उनकी तस्वीर आँखों के आँसुओं के साथ उभरती रही.

दद्दा की त्रयोदशी में सम्मिलित होने के लिए दिल्ली से एक स्पेशल बोगी का प्रबन्ध हो गया था. यात्रियों में से अधिक ऐसे थे जिन्हें दद्दा चिरगाँव आने का निमन्त्रण दे गये थे, पर अपने अतिथियों को हाथों हाथ लेने वाला अतिथेय, अपने स्वभाव और संस्कार के विरुद्ध सबको अपने घर बुला कर स्वयं अदृष्य हो गया था. रात को लगभग डेढ़ बजे गाड़ी झाँसी पहुँच गयी, और वहीं हमारा डिब्बा कट गया. झाँसी का स्टेशन फ़िर अपने साथ अनेक स्मृतियाँ ले कर सामने खड़ा हो गया. पिछली दो बार जब हम आये थे, दद्दा स्टेशन पर आतुरता से हमारा इन्तजार करते हुए मिले थे, उनके चेहरे पर उमड़ता हुआ वह आह्लाद, वह स्फटिक सा व्यवहार आज इस लेखनी में कैसे बाँधू -
"छिन्न भी है, भिन्न भी है हाय,
क्यों न रोवे लेखनी निरुपाय?"
जितनी देर हमारे सामान इत्यादि की व्यवस्था होती रही, दद्दा वहीं प्लेटफार्म पर पड़ी हुई लकड़ी की बैंच पर बैठे रहे, और आते जाते लोग उनके सामने सिर झुका झुका कर जाते रहे. जनता का यह नमन किसी खद्दरधारी राजनीतिज्ञ के प्रति नहीं था, उनकी श्रद्धामयी आँखों में और मुग्ध भावाभिव्यक्ति में भक्ति का आह्लाद ही था आतंकजन्य विनय नहीं. एक जीर्ण शीर्ण वस्त्रधारी भिखारी दद्दा के चरणों के पास आ कर साष्टांग प्रणाम करके लेट गया, उनकी दयार्द्र आँखों ने उसे कुछ दिलवा कर विदा किया, एक अर्ध विक्षिप्त सा व्यक्ति बाल बिखराये उनके निकट आ कर प्रलाप करता रहा, और दद्दा बड़ी सहिष्णुता और सुहानुभूति के साथ उसे देखते और उसकी बात सुनते रहे. मैंने कई बार बड़े बड़े मठाधिकारियों और धर्म के संरक्षकों का व्यवहार इस वर्ग के प्रति देख रखा था. पीड़ित दुखी जनता के प्रति उनकी दुरदुराहट की तीव्र प्रतिक्रिया के फ़लस्वरूप ही मेरा मन मिशनों, धर्म संस्थाओं और आध्यात्मिक व्यक्तित्वों से विमुख हो गया है, पर उस दिन स्वच्छता और छूत पाक के वैष्णव विधान पर पूर्ण विश्वास करने वाले दद्दा का वैष्णव नहीं केवल मानव रूप देखा. आज झाँसी के उसी महामानव और हिन्दी संसार के दद्दा के स्नेहपूर्ण स्वागत के बिना स्टेशन भाँय भाँय कर रहा था.

हिन्दी के प्रसिद्ध उपन्यासकार श्रद्धेय वृन्दावनलाल वर्मा के प्रेस में हमारे भोजन की व्यवस्था थी. निःशब्द भोजन चल रहा था जैसे यह कोई यांत्रिक काम था जिसे किसी तरह पूरा करना था. ग्रास थाली से हाथ में आ कर मुँह में जा रहे थे और पिछली बार झाँसी की हवेली में भोजन करते हुए दद्दा के स्नेहपूर्ण आग्रह कान में गूँज रहे थे. श्रुतिपुट से आयी दद्दा की स्मृतियाँ पलकों में न समा सकने के कारण आँसू बन कर बिखर रही थीं.

भोजनोपरान्त, हम बस में बैठ कर चिरगाँव चले. चारों ओर की हरियाली भरी पहाड़ियों का हमारे लिए कोई अर्थ नहीं था, अतीत के मौन ताने बाने में बस की घरघराहट और आसपास का शोर गुल जैसे लुप्त हो गया था और फ़िर उसके बाद हम बेतवा के बाँध पर आये. यह स्थान दद्दा को बहुत प्रिय था, मेरे मानस चक्षु के सामने दद्दा बोल रहे थे, "पंडित जी (पं. जवाहरलाल नेहरू) को यह स्थान बहुत अच्छा लगा था, वे इसे देख कर भाव विभोर काफ़ी देर तक खड़े रहे, हमारे मना करते करते भागते दौड़ते वहाँ .. वहाँ.. दूर तक पहुँच गये थे." उस दिन दद्दा बेतवा के किनारे खड़े हो कर दिवंगत राष्ट्रनायक को भरे गले से याद कर रहे थे और आज राष्ट्रकवि के अभाव में बेतवा की पछाड़ खाती लहरों के निकट ठहरने का हमें साहस नहीं हुआ. उदास और क्लांत हृदय यात्री बस से उतर पैदल मौन गुप्त बंधुओं की प्रसिद्ध बखरी की ओर चले, "चिरगाँव की शोभा" को झुक झुक प्रणाम करने वाली, हाट की जनता हमारी ओर उदास नेत्रों और म्लान मुख से देख रही थी, जैसे उन्हें यह पूछने की आवश्यकता ही नहीं थी कि हम वहाँ किस उद्देश्य से गये हैं. बखरी के फाटक पर गम्भीर विषाद से युक्त गिरधारी ने मौन विनयाचार में हाथ जोड़े, उसके होंठ सिहरे और आँखें आँसुओं से भर आयीं. गुप्त बंधुओं की पुश्तैनी बखरी मौन साधे सविषाद पाषाण बनी खड़ी थी, हमारे पहुँचते ही प्रस्तर मूर्तियों की तरह निश्चल खड़े दद्दा के स्वजन यन्त्रवत चल कर निकट आये और फ़िर बखरी में कुहराम मच गया, दद्दा के पुत्र उर्मिल जी डा. नगेन्द्र के अंक में मुँह छिपा कर क्रन्दन कर उठे और फ़िर सारी बखरी में रुदन और विलाप का स्वर छा गया.

हिम्मत नहीं होती थी अंदर जाने की. "गौरवमंण्डित सुहागनी" के करुण वैधव्य का सामना करने का साहस मुझे नहीं हो रहा था, मैं बड़ी हिम्मत करके अन्दर गयी और जिया के वलयशून्य हाथों ने मुझे लपेट लिया, उनकी आँखों से निरन्तर आँसू बहते रहे, साकेत की "मूर्तिमति ममता माया" आज अपना मुँह अवगुण्ठन में लपेटे वटवृक्ष की छाया से छिन्न लता सी क्लांत, शिथिल हो रही थी. शान्ति, दद्दा की पुत्रवधू अपनी गोद में नन्ही सी बिटिया को लिए बिलख रही थी.

श्राद्ध पूरा हुआ. होम का धूँआ सारी बखरी पर छा गया, जिया ने लाल जोड़ा उतार कर श्वेत वस्त्र धारण किया और गु्प्त कुल की बखरी की दीवारें जैसे सिर धुन धुन कर रोने लगीं. उसके इतिहास का उज्जवलतम अध्याय अब नये चरण में प्रवेश कर रहा था, वह माई का लाल जिसने पितृव्यों को भौतिक ऋण से मुक्त किया था, अपने कुल के उपास्यदेव राम की नयी प्रतिष्ठा द्वारा उनका आध्यात्मिक ऋण चुकाया. जिसकी वाणी से सारा राष्ट्र प्रेरणा स्फूर्त हो उठा आज इस बखरी से सदा के लिए विदा ले चुका था. शेष रह गयी थी मस्तिष्क में एक दूसरे को ढकेलती हुई उसकी असंख्य स्मृतियाँ, उसकी दिव्य साधना के भौतिक अवशेष.

दर्शक उनके शयन कक्ष, अध्ययन कक्ष और बैठक के सामने सिर नवा कर अपनी श्रद्धा अर्पित कर रहे थे और मेरे मानस चक्षु के सामने दद्दा बोल रहे थे, "यह देखिए सावित्री जी, इसी कमरे में दोपहरी बिताता हूँ, पीछे का दरवाजा खोल देता हूँ, खूब अच्छी हवा आती है. यह ऊपर वाला कमरा मैंने जब विनोबा जी आने वाले थे तब बनवाया था ..बहुत दिल्ली देखी है, जरा गवंई गाँव भी देखिए."

और फ़िर चिरगाँव की शोकसभा का अविस्मरणीय दृश्य, बूढ़े बच्चे, चिरगाँव की अवगुण्ठनवती स्त्रियाँ और झाँसी की जाग्रत महिलाएँ सब आँसू बरसाते, श्रद्धा के सुमन चढ़ाते हुए. वहाँ का दृश्य देख कर साहित्यिक मनीषियों और कवियों के शब्द चुक गये. सर्वेश्वर दयाल की कविता के पाठ पर बूढ़ों की पुरानी पीढ़ी करुण आर्द्रता से सिर हिलाती रही, अज्ञेय का वक्तव्य भीड़ पर छा गया. एक युग समाप्त हुआ, इतिहास का एक पृष्ठ पलट गया, हिन्दी का सबसे बड़ा स्तम्भ गिर गया. नये और पुराने, बूढ़े और जवान, कृषक और कवि, स्त्री और पुरुष, एक भाव, एक रस में निमग्न हो गये, सब करुणा प्लावित, सब असहाय.
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मैथिलीशरण गुप्त की मूल तस्वीर कविताकोष के साभार

इस वर्ष के लोकप्रिय आलेख