गुरुवार, जनवरी 18, 2007

मैसूर का बाघ

बचपन में विद्यालय में मैसूर के बाघ, टीपू सुलतान की कहानी पढ़ी थी कि कैसे उसने अँग्रेजी शासन से लड़ाई की. कुछ वर्ष पहले, मैसूर के पास श्रीरंगापट्नम में उनका महल और मकबरा भी देखा. पिछले महीने, दिसम्बर में जब बंगलूरु में था तो उनका राज भवन भी देखने गया और फ़िर वर्ष के अंत में, अँग्रेज़ी पत्रिका "द वीक" में टीपू के बारे में अँग्रेज़ी मूल के लेखक विलियम डारलिमपल का एक लेख भी पढ़ा, कि कैसे अँग्रेज़ी शासकों ने उनके विरुद्ध आरोप लगाये और इतिहास में उनकी गलत छवि बनाई.

विकिपीडिया टीपू की जनछवि से जुड़ी विभिन्न मान्यताओं के बारे में बताता है, कि अधिकतर हिंदू बहुल्य वाले भाग में टीपू को मुस्लिम शासक होने की वजह से अपनी वैधता स्थापित करने की कठिनाई थी. एक तरफ़ वह स्वयं को धर्मपरायण मुसलमान दिखाना चाहते थे पर साथ ही संतुलित विचारों वाले ताकि अपनी प्रजा से सही नाता बना सकते. उनकी धार्मिक धरोहर के विषय में उपमहाद्वीप में बहुत विवादग्रस्त है. पाकिस्तान में कुछ गुटों का दावा है कि वह घाज़ी यानि धर्म के लिए लड़ने वाले बड़े यौद्धा थे और भारत में कुछ गुट कहते हैं कि उन्होंने बहुत से हिंदुओं को मारा. कई इतिहासकारों का कहना है कि टीपू ने हिंदुओं तथा ईसाईयों के विरुद्ध बहुत से काम किये थे और पूरे भारत में एक मुस्लिम राज्य की स्थापना करने का सपना देखते थे.

विलियम डारलिमपल का लेख टीपू पर अँग्रेज़ी हमले की तुलना, अमरीका के ईराक पर हमले से करते हैं. एतिहासिक दस्तावेज़ों के अध्ययन से वह यह निष्कर्ष निकालते हैं कि सन 1790 के आसपास अँग्रेज़ी शासन रूढ़िवादियों के हाथ में था जो अपने देश को दुनिया की सबसे बड़ी ताकत देखना चाहते थे, फ्राँस के बहुत विरुद्ध थे और अपनी ताकत को बढ़ाने के लिए उन सभी शासकों को हटाना चाहते थे जिनसे उन्हें कोई खतरा हो सकता था.

अँग्रेज़ी शासन को जिन लोगों से खतरा हो सकता था उनमें टीपू का नाम काफ़ी ऊपर था. उसने अपने शासित हिस्से में सड़के आदि बनवायीं थी, शासन के स्पष्ट नियम बनवाये थे, सेना के लिए फ्राँस से नयी बंदूकें और हथियार बनवाये थे. अँग्रेज़ो़ को लगा कि अगर टीपू इस तरह अपने शासन को सुदृढ़ करता रहा तो बाद में उसे हराना और भी कठिन हो जायेगा. इसलिए टीपू पर हमले का बहाना ढूँढ़ने के लिए उन्होंने टीपू के विरुद्ध मीडिया अभियान शुरु किया कुछ वैसे ही जैसे अमरीका ने सद्दाम हुसैन के विरुद्ध किया था. वह कहने लगे कि टीपू धार्मिक कट्टरवादी था, हिंदुओं और ईसाईयों को मार रहा था, उसे हटाना बहुत जरुरी था और इस तरह टीपू पर युद्ध किया.

डारलिमपल का कहना है कि दस्तावेज़ों से टीपू की जो छवि निकलती है वह उस तरह की नहीं हैं जैसी अंग्रेज़ी इतिहासकारों द्वारा बनाई गयी बल्कि और जटिल है. शासक के रुप में टीपू नये विचारों वाला, जनप्रगति और शासन दृढ़ बनाने, नयी तकनीकों को अपनाने वाला था. उसने पश्चिमों देशों के सामाजिक संगठन को देख कर उससे सीख ली और वैसी ही नीतियाँ अपने ही शासन में चलानी चाहीं. उनके निजि पुस्तकालय में 2000 से अधिक किताबें थीं, न केवल धर्म, सूफ़ी आदि के बारे में बल्कि इतिहास, गणित, नक्षत्रविज्ञान जैसे विषयों पर भी. वह कला को प्रोत्साहन देते थे. एक तरफ़ युद्ध में जीते प्राँतों में उन्होंने हिंदू मंदिर नष्ट करवाये और लोगों को जबरदस्ती धर्म बदलने के लिए मजबूर करवाया, दूसरी ओर अपने शासित प्राँत भाग में हिंदू मंदिरों को सरकारी सुरक्षा मिलती थी और सरकारी दान भी. उन्होंने कई मंदिरों को क्वार्टज़ाईट के शिवलिंगों का दान किया. श्रृंगेरी मंदिर जो एक मराठा युद्ध में नष्ट हुआ था, उसे दोबारा बनवाने के लिए दान दिया.

नीचे की तस्वीरों में टीपू का बंगलूरु का महल.





बुधवार, जनवरी 17, 2007

निडर तस्लीमा

अँग्रेज़ी की पत्रिका आऊटलुक में बँगलादेशी मूल की लेखिका सुश्री तस्लीमा नसरीन का नया लेख निकला है जिसमें तस्लीमा कुरान में दिये गये स्त्री के परदे के नियमों के बारे बतातीं हैं और कहतीं हैं इस्लाम और कुरान दोनों औरतों को परदे से सारा शरीर ढकने का आदेश देते हैं. उनका कहना है कि परदे का विरोध यह कह कर करना कि यह कुरान में नहीं लिखा है, नहीं किया जा सकता. बल्कि परदे का विरोध इस लिए किया जाना चाहिये क्योंकि यह औरत के सम्मान के विरुद्ध हैं. वह कहती हैं कि परदा औरत के शोषण का माध्यम है जिससे औरत को पुरुषों की सम्पत्ती बनाये रखा जा सके, जिससे औरतों को काबू में रखा जा सके.

इस तरह की कोई भी बात कहने के लिए आज बहुत साहस की आवश्यकता है. आप तस्लीमा जी की बातों से सहमत हों या न हों, यह मानने से इन्कार करना कठिन होगा कि इस तरह वही लिख सकता है जिसने अपने मार दिये जाने के बारे में सोच लिया हो और सिर पर कफ़न बाँध लिया हो.

शुक्रवार, जनवरी 12, 2007

इज़्ज़त

एक अँग्रेजी के चिट्ठे में 18 अक्टूबर 1946 के एक अँग्रेजी अखबार में छपे समाचार के बारे में पढ़ा जिसमें गाँधी जी ने पूर्वी बँगाल प्रोविंस में हो रहे हिंदु मुस्लिम दँगों में, नोआखली की एक हरिजन कोलोनी में लोगों को सलाह दी थी कि इज़्ज़त पर खतरा हो तो ज़हर खा कर या चाकू से अपनी जान दी जा सकती है. उनकी यह सलाह विषेशकर औरतों के लिए थी.

इसी बहस को पढ़ कर सोच रहा था कि कैसे बचपन में कही सुनी बातें हमारे सोच विचार को सारा जीवन अपने चगुँल में लपेटे रहती हैं और जिनसे बाहर निकलना आसान नहीं होता. स्त्री का धर्म लज्जा है, उसका काम तो सहना है, वह तो सीता माता है, इज़्जत बचा कर रखना बहुत जरुरी है, स्त्री बदन को ढक कर रखना चाहिये जैसी बातें हमें बचपन से ही सुनने को मिलती थीं. आदर्श स्त्री तो अग्नी परीक्षा देने वाली, धरती में समाने वाली सीता ही थी, पाँच पतियों के साथ रहने वाली द्रौपदी नहीं, यही सिखाया गया था. माँ अच्छी है क्यों कि सबको खाना खिला कर खुद बचा खुचा खाती है, यही सोचते थे.

1965 में एक फ़िल्म आयी थी "नयी उम्र की नयी फसल" जिसमें नये गीतकार नीरज ने बहुत सुंदर गीत लिखे थे और जिसका एक गीत मुझे बहुत अच्छा लगता था जिसकी अंत की पँक्तिया थीं:


राणा अधीर हो कर बोला
ला ले आ ले आ सैनाणी
कपड़ा जब मगर हटाया तो
लहू लुहान रानी का सर
मुस्काता रखा थाली पर
हा रानी, हा मेरी रानी
तू सचमुच ही थी छत्राणी
अदभुत है तेरी कुर्बानी
फ़िर एड़ लगायी घोड़े को
धरती बोली जय हो, जय हो
अँबर बोला जय हो, जय हो
हाड़ी रानी तेरी जय हो
जिस हाड़ी की रानी की कुर्बानी का सोच कर बचपन में रौँगटे खड़े हो जाते थे, उसका धर्म था कि पति का ध्यान न बटे, उसके लिए अपना सिर काट कर देना. रानी पद्मनी का अलाऊद्दीन खिलजी के हाथों न पड़ने के लिए, अन्य स्त्रियों के साथ जौहर करने की गाथा में भी यही बात थी. आज भी पर्यटकों को वहाँ के गाईड गर्व से वह जगह दिखाते हें कि यहाँ जली थी हमारी रानी पद्मनी. रूप कँवर पति की आग में जलती है तो उसके लिए सती मंदिर बन जाता है. सिर पर स्कार्फ लपेटे, ऊपर से नीचे तक ढकी मुसलमान युवती पैरिस में कहती है कि शरीर को ढकना उनका अधिकार है और वह अपनी मर्जी से अपना शरीर ढकती हैं, या विद्वान जब फैसला सुनाते हें कि युवती को बलात्कार करने वाले ससुर के साथ उसकी पत्नी बन कर रहना चाहिये, तो भी शायद वही बात हो रही है?

मुझे लगता है कि हर बार बात केवल एक ही है वही स्त्री शरीर की लज्जा की, इज्जत की. "खामोश पानी" में जब किरण खेर का पात्र इज्जत बचाने के लिए कूँए में कूदने से मना कर देता है और पूछता है कि स्त्री को ही क्यों अपनी इज्जत बचानी होती है, तो सोचने को मजबूर करती है. स्त्री की इज्जत की बात, उसके गर्भ में पलने वाले बच्चे से जुड़ी होती है और यह कैसे कोई समाज मान ले कि उनकी औरतें विधर्मी, बलात्कारियों के बच्चे पालें?

आज मानव अधिकारों, स्त्री पुरुष समानता बनाने की कोशिशें, जात पात के बँधनों से बाहर निकलने की कोशिशें, यह सब इस लिए भी कठिन हैं क्योंकि बचपन से घुट्टी में मिले सँदेश हमारे भीतर तक छुपे रहते हैं और भीतर से हमें क्या सही है, क्या गलत है यह कहते रहते हैं. केवल तर्क या पढ़ लिख कर अर्जित ज्ञान से यह मन में छुपे सँदेश नहीं मरते या बदलते.

शायद थोड़े बहुत लोगों को छोड़ कर बाकी का समाज आज भी यही संदेश अपने बच्चों को सिखा रहा है. परिवर्तन आ तो रहा है, पर बहुत धीरे धीरे. अगर पैदा होने से पहले गर्भपात से मार दी जाने वाली लड़कियों की बात देखें तो बजाय सुधरने के, स्थिति और बिगड़ रही है. तो क्या रास्ता होगा, इससे बाहर निकलने का?

रविवार, जनवरी 07, 2007

तृतीय प्रकृति के द्वँद

हाल ही में 800 मीटर की दौड़ में पदक जीत कर "स्त्री नहीं पुरुष" होने के आरोप में उसे खोने वाली सुश्री शाँती सौंदराजन के हादसे ने अंतरलैगिक जीवन से जुड़ी हुई बहुत सी मानव अधिकार समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित किया है. जिस तरह से यह बात समाचार पत्रों तथा टेलीविजन पर प्रस्तुत की गयी, उनमें मानव अधिकारों की उपेक्षा भी थी और सहज सँवेदना की कमी भी. साथ ही यह भी स्पष्ट था कि अँतरलैंगिक (transgender) विषय पर आम जानकारी कितनी कम है.

जबकि समलैंगिक (homosexual) और द्वीलैंगिक (bisexual) विषयों पर पिछले कुछ वर्षों में कुछ बहस और विमर्श हुआ है, अँतरलैंगिक विषय पर बात अधिक आगे नहीं बढ़ी है. अँतरलैंगिक शब्द का प्रयोग विभिन्न परिस्थितियों में किया जाता है जैसे किः
  • जब व्यक्ति का शारीरिक लिंग उसके मानसिक लिंग से भिन्न हो, जैसे कि स्त्री शरीर हो कर भीतर से पुरुष महसूस करना या पुरुष शरीर में अंदर से स्वयं को स्त्री महसूस करना.
  • जब यौन अंग ठीक से न बने हों जिससे यह कहना कठिन हो कि व्यक्ति पुरुष है या स्त्री

इनसे मिलती जुलती एक अन्य परिस्थिति है जिसमें व्यक्ति अपने से विभिन्न लिंग के वस्त्र धारण करना चाहते हैं लेकिन वह अपने लिंग को नहीं बदलना चाहते (transvestites or cross-dressers).

अपने अंतर में अपने आप को स्त्री या पुरुष महसूस करना (sexual identity) और अपने यौन जीवन के लिए स्त्री या पुरुष का साथ चाहना (sexual orientation), यह दो अलग अलग बातें हैं जिनके बारे में अक्सर लोग ठीक से नहीं समझते हैं और इन सब लोगों को समलैंगिक समझते हैं, जोकि सही नहीं है. अगर आप के शारीरिक और मानसिक लिंग भिन्न हों तो आज विकसित देशों में, शल्य चिकित्सा के द्वारा लिंग बदलना सँभव है. इसकी वजह से लिँग और यौन सम्बंधों के बहुत से विभिन्न गुट बन सकते हैं, जिनकी अपनी विभिन्न कठिनाईयाँ होती हैं.

बोलोनिया में मेरी जान पहचान के एक व्यक्ति शादीशुदा हैं, अपनी पत्नी से बहुत प्यार करते हैं पर साथ ही मन ही मन में वह अपने आप को स्त्री देखते हैं. कुछ समय से वह होरमोन से इलाज करवा रहे हैं ताकि उनके शरीर में पुरुष भाव कम हों और स्त्री भाव तीव्र हों. वह अपने मित्रों के बीच स्त्री पौशाक पहनते हैं और मन में साहस जुटा रहे हैं कि घर से बाहर भी स्त्री रुप में रह सकें. उनकी आशा है कि एक दिन भविष्य में वह शल्य चिकित्सा से शारीरिक रुप में भी स्त्री बन जायेंगे. जहाँ काम करते हें वहाँ अभी यह बात उन्होंने नहीं बताई है पर कभी न कभी, उन्हें वहाँ भी अपना भेद खोलने की हिम्मत करनी पड़ेगी. दुनिया के लिए वह साधारण विषमलैंगिक व्यक्ति हैं पर अपने मन में समलैंगिक, लैसबियन. यह सब कितनी कठिनाईयों से जुड़ा है उसका अंदाज लगाना कठिन है और वह मनोयोग चिकित्सक से इलाज भी करवा रहे हैं ताकि अपने स्त्री होने या पुरुष होने के मानसिक द्वंद को समझ सकें. उनकी बेटी उनसे बात नहीं करती पर उनकी खुशकिस्मती हैं कि इस कठिनाई में उनकी पत्नी और उनकी वृद्ध माँ, उनके साथ हैं.

मानव अधिकारों की दृष्टि से देखें तो हर व्यक्ति को अपने बारे में यह निर्धारित करना का हक है कि वह क्या चाहता है, स्त्री होना या पुरुष होना. इतालवी कानून इस बात की अनुमति देता है कि लिंग बदलाव के बाद, वह कानूनी तौर से स्त्री बन सकते हें और अपना नाम आदि बदल सकते हैं.

जब यौन अँग ठीक से न बने हों तब भी, यह व्यक्तिगत निर्णय पर निर्भर करता है कि उस व्यक्ति को पुरुष माना जाये या स्त्री. पर क्योंकि यह निर्णय अक्सर बचपन में बच्चे के माँ बाप द्वारा लिया जाता है, जैसा कि शाँती सौदराजन के साथ हुआ, तब बड़े हो कर उन व्यक्तियों को यह छूट मिलनी चाहिये कि वह स्वेछा से अपना सामाजिक लिंग निर्धारित कर सकें. इससे सभी कठिनाईयाँ तो नहीं मिटती पर कुछ आसानी होती है.

भारत में इन सब व्यकितयों को जिनका लिंग स्पष्ट न हो "हिँजड़ा" श्रेणी में रखा जाता है पर असलियत में विभिन्न शौध कार्यों नें दिखाया है कि "हिँजड़ा" कहे जाने वाले बहुत से लोग समलैंगिक पुरुष होते हैं. वात्सयायन के "काम शास्त्र" में "तृतीय प्रकृति" की बात की गयी है जिसका अर्थ अधिकतर समलैंगिक पुरुषों से जुड़ा है पर वैचारिक दृष्टि से यह शब्द अंतरलैंगिक की तरह हैं जिसकी अधिक खुली परीभाषा हो सकती है जिसमें विभिन्न परिस्थितियों वाले लोग अपनी पहचान खोज सकते हैं.

हिंदू धार्मिक ग्रँथों में इन सब विषयों पर विभिन्न देवी देवताओं के माध्यम से सामाजिक स्वीकृति दी गयी थी, जिसे आज बहुत से लोग भूल चुके हैं. कैल्ब, नपुसँक और सँधा जैसे शब्द इन विषयों को भिन्न तरीकों से छूते हैं. शिव के रूद्र रुप और अर्धनारीश्वर रुपों में अंतरलैंगिक जीवन की स्वीकृति है तो पुराणों और महाभारत में अर्जुन अंतरलैंगिकता को व्यक्त करते हैं. महाभारत के योद्धा अर्जुन, पद्म पुराण में झील में स्नान के बाद अर्जुनी बन जाते हैं और कृष्ण से संसर्ग करते हैं. महाभारत में इंद्र के श्राप से विराट नगर में अर्जुन का एक वर्ष के लिए स्त्री वस्त्र धारण करने वाला पुरुष बुहनाला बन कर रहना इसकी एक और परिस्थिति पर्स्तुत करता है. दक्षिण भारत में भगवान अयप्पा, जिन्हें मणीकँठ भी कहते हैं और जिनकी पूजा सबरीमाला में होती है, की कहानी भी अंतरलैंगकिता दर्शाती है. ब्रह्माँड पुराण के अनुसार विष्णु के मोहिनी के रुप में, शिव के वीर्य से अयप्पा का जन्म होता है और यौद्धा अयप्पा प्रतिज्ञा करते हें कि जब तक पुरुष भक्त उनके मंदिर में पूजा करने आते रहेंगे वह शादी नहीं करेंगे.

आज विकसित पश्चिमी देशों को अंतरलैंगिक व्यक्तियों के मानव अधकारों के बारे में जागरूक समझा जाता है और विकासशील देशों को इस दिशा में पिछड़ा हुआ कहते हैं. पर मेरे विचार में भारतीय धर्म ग्रँथों में इस विषय पर गहरी समझ भी थी और सामाजिक स्वीकृति भी जिसे विकटोरियन मानसिकता ने भुला दिया है और जिसकी खोज की आवश्यकता है.

बुधवार, जनवरी 03, 2007

निष्पक्ष पत्रकारिता

एनडीटीवी की जानी मानी पत्रकार सुश्री बरखा दत्त ने जब निष्पक्ष पत्रकारिता को मीडिया द्वारा बनाया मिथिक कहा तो बहस शुरु हो गयी. अपनी विवेचना में उन्होंने कहा "निष्पक्षता का सिद्धांत समाचारों में भावनात्मक तत्वों को बढ़ाने के विरुद्ध बात करता है. एक फैशन सा हो गया है कि टेलीविजन पत्रकारों की अतीनाटकीयता की आलोचना की जाये. पर क्या भारतवासी तमिलनाडू के ग़रीब मछुआरों की दुर्दशा को समझ पाते अगर उनकी कहानियों को व्यक्तिगत रुप दे कर न प्रस्तुत किया जाता, जिससे उन्हें जीते जागते लोग महसूस किया गया बजाय कि केवल आँकड़ों की तरह देखा जाता? और यह बताईये कि राहत की राह देखते गावों में जहाँ छोटे बच्चों की सामूहिक कब्रें थीं, उसके बारे में किस तरह से निष्पक्ष रहा जा सकता है?"

मैं सुश्री दत्त की बात से सहमत हुँ. ईराक युद्ध में अमरीकी तथा अँग्रेज सिपाहियों के साथ उनकी फौज का हिस्सा बन कर जाने वाले पत्रकारों से क्या हमें निष्पक्षता की कोई उम्मीद हो सकती थी? सच तो यह है कि हर बात के बहुत से पहलू होते हैं और पत्रकार किसी न किसी पहलू को ही अधिक ज़ोर देते हैं जो उनके व्यक्तिगत सोचने के तरीके पर ही निर्भर होता है. बहुत बार देशद्रोही होने का डर पत्रकारों की कलम को अपने आप ही समाचार दबाने या छुपाने के लिए प्रभाव डालता है.

तो समाचार कौन सा सच बोलते हैं और किस पर विश्वास किया जाना चाहिये?

एमरजैंसी के दौरान या कुछ बड़ी घटनाओं पर भारतीय समाचार पत्रों और संचार माध्यमों के आत्मसैंसरशिप को सरकारी मान्यता मिली थी, जब इंदिरा गाँधी की मृत्यु पर स्वयं राजीव गाँधी ने बताया था कि सही बात जानने के लिए उन्होंने बीबीसी रेडियों को सुनना चाहा था क्योंकि आल इंडिया रेडियों की बात पर विश्वास नहीं किया जा सकता था! क्या अनेक टेलीविजन समाचार चैनलों के आने से स्थिति कुछ बदली है?

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समाचारों की विश्वसनीयता के बारे में बीबीसी का नाम प्रसिद्ध था पर पिछले कुछ वर्षों में इस विश्वसनीयता में कमी आई है. अमरीकी सीएनएन ने तो ईराक युद्ध के दौरान, कम से कम मेरे लिए तो, अपनी सारी विश्वसनीयता खो दी है. हालाँकि यूरोन्यूज़ भी अंतर्राष्ट्रीय समाचार चैनल है पर उसका प्रभाव बहुत कम रहा है और प्रश्न उठता है कि कैसे इन समाचारों को जाना जाये?

पर आज नये नये अंतर्राष्ट्रीय टेलीविजन चैनल आ रहे हैं जिनसे बीबीसी या सीएनएन का अधिपत्य खतरे में है. मध्यपूर्व में कतार से प्रसारित होने वाला अलज़रीरा चैनल अब अँग्रेजी में आने लगा है जो अरबी दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है. रूस ने रशिया टुडे के नाम से अँग्रेजी चैनल शुरु किया है और फ्राँस ने फ्राँस 24 के नाम से नया समाचार चैनल फ्राँसिसी और अँग्रेजी में प्रारम्भ किया है. यह सोचना कि इनमें से कोई एक चैनल "सच" बतायेगी गलत होगा पर विभिन्न सूत्रों से एक ही बात के विभिन्न पहलू सुनने को मिल सकते हैं. शायद हमें वही सच लगेगा जिसकी बात हमारे अपने दृष्टिकोण से मिलती होगी!

चिट्ठे और अंतर्जाल एक अन्य माध्यम है जो हमारे हाथों में है, जिससे हम अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत कर सकते हैं और अंतर्राष्ट्रीय समाचारों की बातों को अपनी आँखों देखी से नकार सकते हैं. डिजिटल फ़ोटोग्राफ़ी की बढ़ती आसानी हमारी बात को विश्वासनीयता दे सकती है, हालाँकि उसमे सिर का पैर दिखाना संभव है पर अंत में सच सामने आ ही जाता है.

यूट्यूब जैसी सेवाएँ हममें से हर एक को टेलीविजन पत्रकार बनने का मौका देती हैं, कम से कम उनको जिनके पास तकनीकी जानकारी और अंतर्जाल तक पहुँचने के माध्यम हैं. इन सबसे सारी समस्याएँ समाप्त नहीं होगीं पर कुछ नये विकल्प तो बनेंगे ही.

टिप्पणीः यह चिट्ठा पहले कुछ गलतियों के साथ ही छाप दिया था, फ़िर इसे ओराँगो नाम के प्रोग्राम से हिंदी वर्तनी की जाँच कर के ठीक किया है. क्या आप में से किसी को ओराँगो का अनुभव है? क्या सोचते हैं इसके बारे में?

गुरुवार, दिसंबर 07, 2006

बम और जहाज़

जितनी बार टेलीविजन पर या अखबारों में लंदन में हुए रुसी जासूस के खून की बात पढ़ता हूँ, थोड़ी सी खीझ आती है. हमारे कैंची या क्रीम और शेम्पू ले जाने पर पिछले सालों से हवाई जहाज़ों पर सुरक्षा जाँच के बहाने इतने चक्कर होते हैं और दूसरी ओर ब्रिटिश एयरवेस के कुछ जहाज़ों में रेडियोएक्टिविटी (radioactivity) पायी गयी है, जिसका असर करीब 36 हजार यात्रियों पर पड़ सकता है, यह पढ़ कर सोचता हूँ कि क्या सुरक्षा जाँच करने करवाने का क्या फ़ायदा!

यह बात भी नहीं कि हर हवाई अड्डे के सुरक्षा जाँच नियम एक जैसे हों, और उसी हवाई अड्डे से अमरीका या इँग्लैंड जाने वाले जहाज़ के यात्रियों की जाँच एक तरीके से होती है और अन्य जगह जाने वाले यात्रयों की जाँच दूसरे तरीके से. तो क्या ले जा सकते हें या क्या नहीं, यह मालूम नहीं चलता.

अँग्रेजी पत्रिका इकोनोमिस्ट (Economist) में एक अन्य समाचार पढ़ा था. हवाई जहाज में मोबाईल टेलीफ़ोन के प्रयोग न कर पाने का. हमेशा कहते हैं कि अगर आप जहाज में टेलीफोन का प्रयोग करें तो जहाज के इलेक्ट्रोनिक उपकरणों में खराबी आ सकती है. यह सुन कर मन में डर सा आ जाता है और अगर कोई जहाज़ में मोबोईल का उपयोग करने की कोशिश करे तो उसके आस पास वाले यात्री गुस्से से उसके पीछे पड़ जाते हैं कि क्यों हमारी जान को खतरे में डाल रहे हो! इकोनोमिस्ट के अनुसार, मोबाईल से जहाज़ के उपकरणों को कुछ नहीं होता बल्कि जिस जगह के ऊपर से जहाज़ गुजर रहा है वहाँ के मोबाईल जाल में दखलअंदाज़ी होती है. उनके अनुसार जहाज़ कम्पनियाँ मोबाईल जालों से समझोता कर रही हैं और अगले साल तक यह फैसला हो जायेगा कि कौन इस तरह के मोबाईल प्रयोग से कितना कमायेगा, तब हवाईजहाज़ों यात्रा के दौरान मोबाईल का प्रयोग करना आसान हो जायेगा.

यानि कि सारी बात पैसे के बाँटने की थी?

इस लेख को पढ़ कर मुझे थोड़ा सा दुख भी हुआ. रेलगाड़ी में सफर करते समय मोबाईल पर बातचीत करने वालों से बचना मुश्किल है. कुछ लोग तो अपना कच्चा पक्का सारा चिट्ठा लोगों के सामने बघार देते हैं, और एक से बात करना बँद करते हें तो दूसरे से शुरु कर देते है. हवाईजहाज़ में अब तक इस झँझट से शाँती थी, अगर यह बात सच है तो वह शाँती भी जाती रहेगी.
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नोर्वे ने अपील की है कि गुच्छे वाले बमों (cluster bombs) का प्रयोग निषेध कर दिया जाये. फरवरी 2007 में नोर्वे ने एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया है जिसका विषय होगा कि गुच्छे वाले बमों का बनाना और प्रयोग करना अंतर्राष्ट्रीय कानून में गैरकानूनी घोषित किया जाये जैसे कि मानवघाती माईनस् (antihuman mines) के साथ कुछ वर्ष पहले किया गया था.

मेरा बस चले तो दुनिया के सारे हथियार बनाने बंद हो जायें. कितनी बार यात्राओं के दौरान युद्ध में और युद्ध के बाद बचे हुए बमों से मरने वाले और घायल हो कर हाथ पाँव खोने वाले लोगों को देखा है. जब मानवघाती माईनस् को निषेध करने की बात चली थी तो मैं उनसे पूरी तरह सहमत था.

पर अहिँसावादी निति, सभी हथियार न बनाने की नीति को अव्याव्हारिक माना जाता है. यह मान सकते हें कि युद्ध में भाग लेने वाला सिपाही जब तनख्वाह लेता है तो यह भी मानता है कि मैं अपनी तरफ़ वालों के लिए मरने, कैदी होने, घायल होने के लिए तैयार हूँ. इसलिए युद्ध में उसे मारने के लिए कुछ भी हथियारों का प्रयोग किया जाये, शायद जायज होगा.

पर जब मालूम हो कि हथियार किसी सिपाही को मारने के लिए नहीं हों बल्कि सारे क्षेत्र को असुरक्षित करने के लिए हों जिनसे युद्ध के बाद भी आम लोग, स्त्री, पुरुष, बच्चे, जिन्होंने युद्ध में भाग लेने की तनख्वाह नहीं ली, वे भी कई सालों तक मरते रहेंगे, तो उन हथियारों का प्रयोग करने वाला जानता है कि वह केवल सिपाहियों को नहीं मार रहा, बल्कि आम लोगों को मार रहा है और इस तरह का उपयोग किसी भी हालत में नैतिक नहीं कहा जा सकता.

मानवघाती माईनस् की यही बात थी. ज़मीन के नीचे दबा दो, जब ऊपर से कोई गुजरे तो बम फट जाये. अँगोला, मोजामबीक, लाओस जैसे देशों में युद्धों के समाप्त होने के दस साल बाद तक इनसे लोग मरते और घायल होते रहे.

वैसी ही बात गुच्छे वाले बमों की है. एक बम के भीतर छोटे छोटे कई बम होते हैं, गिरने पर उनमें से बहुत से नहीं फटते, और युद्ध समाप्त होने के बाद जान लेते रहते हैं. द्वितीय महायुद्ध में इनका आविष्कार किया गया था और अमरीका और रुस जैसे देशों ने इनका बहुत सी लड़ाईयों में प्रयोग किया है. अभी हाल में इज़राईल ने जब इनका उपयोग लेबनान में किया तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कुछ हल्ला मचा.

कोई भी बम या माईनस् हों, दुख होता कि स्वतंत्रता और मानव अधिकारों की बात करने वाले देश जो अंतर्राष्ट्रीय हथियारों के बाजार से करोड़ों कमाते हैं, इनके निषेध के लिए तैयार नहीं. मानईस् के निषेध की बात हुई तो अमरीका और रुस जैसे देश इसके लिए तैयार नहीं थे, आज गुच्छे वाले बमों की बात हो रही है तो भी यही देश नहीं मान रहे.

पर मैं नोर्वे के साथ हूँ. और आप?

बुधवार, दिसंबर 06, 2006

दिसम्बरी खिचड़ी

दिसम्बर आता है और क्रिसमस की तैयारी शुरु हो जाती है. घर में "क्रिसमस ट्री" बनाने की बातें होने लगती हैं, कहाँ रखा जायेगा, कितना बड़ा हो, सचमुच का पेड़ लेना चाहिये या नकली, कैसे सजाया जाये, इत्यादि. इस साल घर में पहली बार पुत्रवधु भी है तो सब कुछ अधिक धूमधाम से हो रहा है. सालों की नींद से पुत्र जागा है और इस बार अपनी नववधु को सिखाने और दिखाने के चक्कर में बढ़ बढ़ कर सब काम कर रहा है. वरना पत्नी मेरे पीछे पड़ी रहती, "लाल और नीले रंग की सजावट तो पिछले साल की थी, इस साल कौन से रंग की करें?" इस बार पुत्र और पुत्रवधु का निर्णय है कि क्रिसमस के लिए जो छोटा सा चीड़ का पेड़ खरीदा गया है उसे श्वेत, चाँदी और नीले रंग से सजाया जाये.

पेड़ सजाना तो फ़िर भी आसान है, असली सिरदर्द तो भेंट खरीदने की बहस से होती है.

"किसको क्या दिया जाये? अरे फ़िर से जुराबें, याद नहीं कि पिछले साल भी तो जुराबें ही दी थीं? नहीं दस्ताने नहीं, दो साल पहले दस्ताने ही दिये थे! टोपी नहीं, वह बहुत व्यक्तिगत चीज़ है और अपनी पसंद की ही लेनी चाहिए. तुम्हारा बस चले तो सबको किताबें ही दे दो, नहीं नहीं किताबें नहीं! तुमसे तो बात करना ही बेकार है, तुम क्मप्यूटर पर बैठ कर अपना काम करो, मैं भेंटें अपने आप ही खरीद लूँगी!"

"अच्छा बड़ी दीदी पूछ रही थीं कि तुम्हें क्या दिया जाये? पैसे दे दें, यह क्या बात हुई कि तुम अपने आप खरीद लोगे? सब लोगों की रंगीन पैकेट बने होंगे पेड़ के नीचे, तुम्हारे लिए पैसे रख देगें वहाँ, कैसा लगेगा? नहीं कैमरा तो बहुत मँहगा होगा, दीदी से इतनी मँहगी भेंट माँगना ठीक नहीं. क्यों जुराबों में क्या खराबी है? अच्छा नई टाई कैसी रहेगी? अच्छा कोई परफ्यूम लें तो कैसा रहेगा? हाँ यह ठीक रहेगा. अच्छा लाऊरा पूछे कि तुम्हारे लिए क्या खरीदे तो उसे क्या कहूँ?"
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सिरदर्दी में अचानक मन सपना देखने लगता है. साँभर वड़ा, इडली और मसालेदार चटनी, पेपर दोसा और रवा दोसा के सपने. "एक शाकाहारी उत्तरी भारत की थाली", "एक बटर चिकन", मन ही मन कहता हूँ. "यह वाला पतीसा, वह चमचम, यह बेसन का लड्डू"! अच्छा कौन सी फ़िल्में देखनी है? उमराव जान, धूम २, डोन, जानेमन, बाबुल, विवाह! क्या मालूम कि होटल के पास कोई सिनेमाहाल है कि नहीं जहाँ शाम को मीटिंग समाप्त होने के बाद कोई फ़िल्म देखी जाये?

हाँ शनिवार को भारत जाना है. बँगलोर में प्राकृतिक चिकित्सा पर दक्षिण एशियाई देशों की मीटिंग है जिसके संचालन की ज़िम्मेदारी है. पहले दस दिन बँगलोर में काम करते हुए, फ़िर कुछ दिन घर पर और 28 दिसम्बर को वापस बोलोनिया.

बँगलोर के मित्रों ने बताया कि बँगलोर भी अपना नाम बदलने की ठानी है और अबसे उसे बँगलूरु कहा जाना चाहिये. बधाई हो. मेरा विचार है कि हर भाषा के लोगों को यह अधिकार है कि अपने शहर को अपनी भाषा में पुकारें. पर मेरा विचार था कि यह तो हम हमेशा से करते ही हैं, इसके लिए इतना तमाशा क्यों?

असली झगड़ा अँग्रेजी से लगता है. जहाँ तक मैं समझता हूँ, बँगलोरवासी जब आपस में कन्नड़ में बात करते हैं तो हमेशा ही अपने शहर को बँगलूरु ही कहते आये हैं. उनका यह कहना कि अँग्रेजी में भी उनके शहर को बँगलूरु कहा जाये, समझ में नहीं आता. हर भाषा में शहरों के नामों का उच्चारण भिन्न होता है. जैसे कि इतालवी भाषा में बँगलोर को "बँगलोरे" कहा जाता है. स्वयं इटली में जिस शहर को इतालवी लोग वेनेत्सिया कहते हैं, उसे अँग्रेजी वाले वेनिस कहते हें और जर्मन वाले वेनेडिग कहते हैं.

इन नाम के पीछे होने वाले झगड़ों से लगता है कि असली बात आत्मसम्मान और आत्मविश्वास की है. अगर कन्नड़, मराठी बोलने वालों को लगता है कि उनके शहर बदल रहे हैं, बाहर से आये "विदेशियों" से भर रहे हैं और अपने ही शहर में वह अल्पसँख्यक हो रहे हें और उनकी पूछ कम रही है तो वह इस तरह का बदलाव चाहते हैं? पर क्या इस नाम के बाहरी बदलाव से सचमुच उनकी स्थिति बदलती है? भूमँडलीकरण से आने वाले बदलावों में जो पीछे रह जा रहे हैं वे कैसे प्रगति में अपना हिस्सा पायें, शायद असली प्रश्न यही है?

बर्मा से बना है मयनमार, कौंगो से बना ज़ाईर और कुछ समय बाद दोबारा कौंगो, इन बदलते नामों की बीमारी केवल भारत में नहीं है. शायद यह भूमँडलीकरण का नतीजा है, दुनिया इतनी तेजी से बदल रही है और उन बदलवों को रोक पाना हमारे बस में नहीं है तो अपनी इस शक्तिहीनता को सहारा देने के लिए शहरों के नाम बदलने की बैसाखी खोजने लग जाते हैं. और कुछ न भी हो, दिल को थोड़ा सहारा तो मिल ही जाता हे कि हम भी कुछ हैं, हम भी कुछ कर सकते हैं!
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क्रिसमस के साथ साथ आजकल बोलोनिया में साँस्कृतिक कार्यक्रमों का मौसम है. परसों रात को शहर के प्रमुख स्कावयर में सँगीत का कार्क्रम था जिसमें पारदर्शी टबों में स्विमसूट पहने लड़कियों ने जलपरियों की तरह नहाने का नृत्य किया. कँकपाने वाली सर्दी की रात में उनका इस तरह का नृत्य देख कर हिंदी फ़िल्मों की हीरोईनों की याद आ गयी जिन्हें इसी तरह कम कपड़े पहना कर बर्फ़ में गाने गवाये जाते हैं! कल रात को भारत से आये उस्ताद शाहिद परवेज़ खान का सितार वादन है.

आज की तस्वीरों में हमारा क्रिसमस का पेड़ और जलपरियों का साँस्कृतिक कार्यक्रम.








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