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रविवार, अक्टूबर 04, 2026

कुँवर नारायण - तीन कविताएँ

"कल्पना" पत्रिका हैदराबाद से निकलती थी। इसका कार्यालय 516 सुल्तान बाज़ार में था और इसके प्रकाशक मधुसूदन चतुर्वेदी थे। जुलाई 1960 में इसके सम्पादक मँडल के सदस्य थे - डा. आयेन्द्र शर्मा (प्रधान), मधुसूदन चतुर्वेदी, बद्रीविशाल पित्ती, मुनीन्द्र, जगदीश मित्तल (कला), गौतम राव।

उन दिनों में मेरे पिता ओम प्रकाश दीपक हैदराबाद में रहते थे और "मैनकाईन्ड" नाम की अंग्रेज़ी पत्रिका के लिए काम करते थे जिसका दफ्तर "कल्पना" के साथ जुड़ा था, और दोनों पत्रिकाएँ एक ही प्रकाशक द्वारा, एक ही प्रिटिन्ग प्रैस से छपती थीं।

साथ की हमारी पारिवारिक तस्वीर उन्हीं दिनों की है। यह जून 1960 में ही ली गयी थी जब हम गर्मियों की छुट्टियों में हैदराबाद गये थे, और राजा दुबे के घर पर ठहरे थे। इस तस्वीर में जाने माने उद्योगपति और डॉ. लोहिया की समाजवादी पार्टी के सहयोगी बद्रीविशाल पित्ती भी हैं। यह मेरे छठे जन्मदिन पर खींची गयी थी। उन्हीं दिनों में पित्ती जी के घर पर प्रसिद्ध चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन साहब से भी मुलाकात याद है। 

खैर "कल्पना" के जुलाई 1960 अंक में मेरे पिता की एक कहानी छपी थी, जिसे इस ब्लॉग पर छापने की बहुत दिनों से सोच रहा था। आज जब वह पत्रिका निकाली तो उसमें कुँवर नारायण की तीन कविताएँ देखीं जो मेरे विचार में इंटरनैट पर उपलब्ध नहीं हैं। उन्हें साझा कर रहा हूँ। अगले दिनों में "कल्पना" के इस अंक से कुछ अन्य सामग्री भी साझा करने का विचार है।

***

कुँवर नारायण की तीन कविताएँ

बन्धु यह तो ...

डूब कर जो कुछ उबारा
ज़िन्दगी है;
टूट कर जो कुछ सँवारा
ज़िन्दगी है;
आँख के नम आईने में चकमकाती सूरतें
सूरज नहीं हैं
जो छलक कर दूसरा सूरज बना लें !
दीखती हैं क्यों कि कोई देखता है,
देखती हैं क्योंकि कोई दीखता है;
और वह स्रष्टा
वही स्रष्टा नहीं है
आस्था जिसके सृजन में
कभी रक्खी कभी चकनाचूर की ।
 
ज़िन्दगी आखिर रहे क्यों
याचना जैसे किसी मजबूर की ?
बन्धु, यह तो
देन है अच्युत लबालब आत्मा की,
सृष्टी छलकन है किसी भरपूर की ।
 

सवेरे-सवेरे

 
कार्तिक की एक हँसमुख सुबह ।
नदी-तट से लौटती गंगा नहा कर
सुवासित भीगी हवाएँ
सदा पावन
माँ सरीखी
अभी जैसे मन्दिर में चढ़ा कर खुशरंग फूल
ठंड से सीत्कारती घर में घुसी हों,
और सोते देख मुझको जगाती हों ----
सिरहाने रख एक अँजुलि फूल हरसिंगार के,
नर्म ठंडी उँगलियों से गाल छू कर प्यार से,
बाल बिखरे हुए तनिक सँवार के ...
 

कार्निस पर

 
कार्निस पर
एक नटखट किरण बच्चे-सी
खड़ी जंगला पकड़ कर,
किलकती है, "मुझे देखो !"
 
साँस रोके ---
बाँह फैलाए खड़ा गुलमुहर ...
कब वह कूद कर आ जाये उसकी गोद में !
 
*** 

मंगलवार, सितंबर 22, 2026

लेखन यात्रा - अलका सरावगी

अलका जी मेरी जान-पहचान बीस-पच्चीस साल पहले अशोक जी (अशोक सेकसरिया) की वजह से हुई थी। अशोक जी, जैसा कि आप अलका जी के साक्षात्कार में पढ़ेंगे, ने उनके सृजनात्मक जीवन में महत्वपूर्ण भाग निभाया था। वैसे मैं अशोक जी को बचपन से जानता था जब वह दिल्ली में रहते थे और मेरे पिता ओम प्रकाश दीपक के साथ समाजवादी पत्रिका 'जन' में काम करते थे और अक्सर हमारे घर आते थे।

अलका सरावगी 2016 में इटली में वेनिस युनिवर्सिटी में - तस्वीर डॉ. सुनील दीपक

उसके बाद बीच-बीच में किसी न किसी वजह से अलका जी से पत्राचार होता रहता था। उनके तीन उपन्यास इतालवी भाषा में अनुवादित हो कर छपे हैं और उन्हें इतालवी सरकार का Order of the Star Cavelier सम्मान भी मिल चुका है।

कुछ साल पहले वह वेनिस युनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में अपने लेखन के बारे में बोलने आयीं थीं तो मैं उन्हें सुनने गया था, लेकिन घर लौटने वाली ट्रेन के छूटने की चिंता में, बाद में वहाँ रुक कर उनसे बात नहीं कर पाया था। पिछले साल कलकत्ता जा कर उनसे मिलने की बात थी, पर वह भी नहीं बन पाई थी।

बहुत समय से सोच रहा था कि अपने इस ब्लॉग के लिए उनसे बातचीत करूँ। यह आलेख एक प्रश्न-उत्तर के रूप में शुरु हुआ था। उसमें मैंने उनके कुछ वीडियो देख कर, कुछ अन्य बातें जोड़ीं। इस बातचीत को आप अलका जी की जुबानी ही पढ़ सकते हैं।  

अलका सरावगी की जुबानी

व्यक्तिगत

हमारा एक मध्यवर्गीय मारवाड़ी परिवार था, जहां लड़कियों को रोका-टोका जाता है कि ऐसे मत करो, वैसे मत बोलो। इसे मैंने बहुत रज़िस्ट किया। घर के काम देखने-सीखने में मेरा मन नहीं लगता था, इसलिए खाना बनाना भी नहीं सीखा जबकि मां बहुत अच्छा खाना बनाती थी। घर के काम में मन इसलिए भी शायद नहीं लगा क्योंकि बहुत प्यार करने वाली दादी ने बचपन में कान में फूंक दिया था कि भगवान ने तुम्हें चौका-चूल्हा घर-वर संभालने नहीं भेजा है।

जब सब सहेलियाँ मिल कर कोई फिल्म देखने जाती थीं तो हमें अनुमति नहीं मिलती थी। इन सब बातों को ले कर मन में गुस्सा और विद्रोह का भाव था, और पिता जी की बहुत सी बातें गलत लगती थीं। बारह-तेरह साल की थी जब पीरियड शुुरु हुए तो सब कहते कि यहां मत बैठो, वहां मत बैठो, यह मत छूओ, वगैरा, तो उससे बहुत घुटन होती थी। 

मेरे पिता जी अपनी लड़कियों को आगे बढ़ाना चाहते थे, उन्हें गाड़ी चलाना सिखवाया था। स्कूल में स्विमिंग पूल था तो मैंने तैरना भी सीखा था। एन.सी.सी में भर्ती हुई थी और उसके कैम्प में रोने-धोने के बाद जाने दिया गया था। कांचरापाड़ा कैम्प में पिता गाड़ी की डिक्की भरकर पच्चीस लड़कियों का खाना लेकर पहुंचे थे। वे छह फुट लंबे शानदार व्यक्तित्व वाले थे। स्कूल के वार्षिक समारोह में किसी नाटक के बाद मुख्य पात्र निभाने वाली लड़की को उन्होंने हॉल में खड़े हो कर अपनी तरफ़ से मेडल घोषित कर दिया था। उन पर गर्व करने के हमारे पास तमाम कारण थे। मेरे हमेशा फर्स्ट आने पर उन्हें भी बहुत गर्व था, पर मेरे साथ ही पढ़ने वाली बड़ी बहन के कारण वे इसे छुपा लेते थे। या शायद इसलिए कि मेरे पाँव धरती पर रहें।

दो बड़ी बहनों की कम उम्र में शादी हुई तो उनके जीवन को देख कर लगता था कि आगे मुझे भी वैसा ही जीवन मिलेगा। स्कूल के दिनों में "सारा आकाश" पढ़ रही थी और मन ही मन में विद्रोही बन रही थी, सोचती थी कि उस उपन्यास की प्रभा जैसा ही मुझे भी कोई ससुराल मिलेगा जहां लोग तरह-तरह के ताने कसेंगे। मां से कहती थी कि बंगाली घर में पैदा होती तो अच्छा होता, वह लोग मेरे पढ़ने लिखने पर खुश होते। मेरी बहनों का तो बीे.ए. भी नहीं हुआ था जब उनकी शादी हुई थी। ग़नीमत थी कि मेरी शादी बीस साल की उम्र में जाकर हुई, जब मैंने बी.ए. पास कर लिया था।

बाहरी तौर पर मेरे ससुराल का परिवार उस तरह से मॉर्डन नहीं था जैसा पीहर में था। पिता पैंट-शर्ट पहनते और शौक से रहते। अंग्रेज़ी में फर्राटे से बोलते और शेरो-शायरी उन्हें कंठस्थ थी। ससुर धोती-कुरते वाले थे और सास सीधे पल्ले से साड़ी पहनतीं, जबकि माँ उल्टे पल्लेवाले आधुनिक अंदाज़ में।

लेकिन, ससुराल में अपेक्षकृत पिता की तरह मजबूती से मुझे  हां या नहीं कहने वाले लोग नहीं थे। पिता की इच्छा के सामने अपनी चलाई नहीं जा सकती थी। उनके गुस्से से भी सबको डर लगता था। मेरी सास की तरफ से सहयोग था, वह पढ़ने-लिखने की बहुत क़दर करती थीं। वे बहुत धार्मिक थीं और शायद इसीलिए हर आत्मा को उसके प्रवाह से रोकने के पक्ष में नहीं थीं। उनका हमेशा सहयोग रहा।

मैंने शादी के बाद ही एम.ए. किया, फिर एम.फिल. किया। पति कहते थे कि बिना झगड़ा-झमेला किये जो कर सकती हो वह करो। वह समर्थन करते थे। लेकिन वैसी उन लोगों का सोच नहीं थी, यह बिना कहे ही ज़ाहिर था कि उस समय अगर कोई घर का काम होता तो वही ज्यादा ज़रूरी माना जाता था। 

जब मेरे एम.ए. के इम्तहान चल रहे थे तो मेरे ससुर ने मुझे बुलाया, पूछा कि क्या कर रही हो, तो मैंने कहा कि पढ़ रही हूँ। बोले कि इतना पढ़ना क्या जरूरी है? मुझे समझ में नहीं आया कि क्या कहूं। अगर बचपन से स्कूल में टॉपर रहे हों तो मन में हमेशा टॉपर रहने की भावना रहती है। वहां हमारी स्पेस मेरा बैडरूम ही था, वहां पर हर ओर किताबें ही किताबें बिछा रखी थीं। एम.ए. में फर्स्ट क्लास फर्स्ट आया तो सब खुश भी हुए।

उन दिनों में कुछ लिखने की याद तो बिल्कुल नहीं है। तब तक मैंने पी.एच.डी. और लेक्चरार बनने की परीक्षाएं दे डाली थीं। एक कॉलेज में पार्ट-टाइम नौकरी मिली, तो समझ में आया कि पढ़ाना मेरे बस की बात नहीं है। मैं अपनी ऊर्जा सिर्फ़ लिखने के लिए बचाना चाहती थी।

मेरी दादी

मेरे ख्याल से मैं तीन या चार साल की थी, मेरी दादी सुंदरकांड का पाठ करती थीं। तब मुझे पढ़ना नहीं आता था, पर दादी से सुन कर मुझे सुंदरकांड पूरा याद हो गया था। मैं उसे पूरा रिसाइट कर सकती थी, जो कि काफी बड़ा है। तब हमारे घर में यह चलन था कि अगर कोई भी बाहर का आदमी आता तो कहते कि सुंदरकांड वाली लड़की को बुलाओ। सबके सामने कहा जाता कि सुंदरकांड सुनाओ तो मैं सुना देती थी, पर लोग सुनते-सुनते बोर हो जाते थे, तो कहते थे, अच्छा, ठीक है।

मुझे अपनी दादी से बहुत प्रेम था। वह मुझे अपने जीवन की बहुत सी बातें बताती थीं, कि कैसे वह लोग राजस्थान से कलकत्ता आये, कलकत्ता में शादी होने के बाद वह वापस राजस्थान चली गयीं, वहां से आते-जाते रहे, परिवार में क्या-क्या घटनाएं - दुर्घटनाएं घटीं, वह क्या खाती-पीती थी, कैसे उनका जीवन बदल गया। उन्हें मुझ में एक श्रोता मिला हुआ था, और मुझे उनकी बातों में बहुत रस आता था। उनके चेहरे की एक-एक रेखा, एक-एक झुर्री तक, मुझे आज भी याद है।

वह मुझे कहती थीं कि ऊपरवाले ने तुम्हें यह सब सामान्य काम करने के लिए नहीं, कुछ और करने के लिए बनाया है। वह और काम क्या था या क्या हो सकता है, उसकी उन्हें कोई स्पष्ट कल्पना नहीं थी। लेकिन उनकी यह बात मेरे भीतर कहीं पर रह गयी और पनपती रही।

बचपन

हमारे बचपन के ज़माने में स्क्रीन तो था नहीं। किताबें और पत्रिकाएं घर में आती थीं और चाव से पढ़ी जाती थीं। माँ पापुलर उपन्यास पढ़ती थीं—शिवानी, रानू,ओम प्रकाश शर्मा, आचार्य चतुरसेन, ये कुछ नाम तो बिलकुल याद हैं। मुझे बचपन से पढ़ने का बेहद शौक़ था। जो कुछ मिल जाए उसे पढ़ डालती थी। धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान आदि पत्रिकाएँ, चंदामामा और चंपक के साथ पढ़ी जाती थीं। अक्सर मैं अपनी उम्र से ज़्यादा बड़ी किताब पढ़ लेती थी। बाद में चौदह साल की उम्र से अंग्रेजी में एनिड ब्लाइटन की किताब जन्मदिन पर किसी ने दी। उसके बाद उनका चस्का लगा और फिर आगे चलकर शेरलॉक होम्स, अगाथा क्रिस्टी, सिडनी शेल्डन पढ़ी गईं। जो कुछ मिल जाए वही पढ़ा जाता था। मेरी दादी दोस्तोवेस्की का हिंदी अनुवाद पढ़ती थीं। घर में साकेत, यशोधरा जैसी मैथिली शरण गुप्त की रचनाएँ थीं। पिता ग़ज़ल और गीतों के शौकीन थे और बाकायदा एक कॉपी रखते थे जिसमें उन्हें उतारते थे।

स्कूल में पढ़ने में अच्छी थी इसलिए शिक्षिकाओं की प्रिय थी। स्कूल की लायब्रेरियन भी मुझे अच्छी विद्यार्थी समझती थी, आठवीं में आते-आते मैंने प्रेमचंद के मानसरोवर के सारे खंड, और अन्य जो लेखक हमारे स्लेबस में होते और लायब्रेरी में उनकी किताबें मिल जातीं तो उनको पढ़ने लग जाती थी।

इस तरह से शब्दों से मेरा लगाव गहरा था और सब को मालूम था। बचपन में स्कूल की पत्रिका के लिए एकाध बार कुछ लिखा, पर विशेष कुछ नहीं लिखा। अलबत्ता परीक्षा में निबंध में हमेशा सबसे अधिक मार्क्स मिलते रहे। घर पर खाना खाते हुए पढ़ना मना था, पिता जी नाराज होते थे, इसलिए जब उनकी आवाज़ सुनती थी तो किताब को कुर्सी पर अपने नीचे रख कर उस पर बैठ जाती थी। पंडित रामचन्द्र शुक्ल का हिंदी साहित्य का इतिहास घर में पता नहीं कहां से आया था, वह भी पढ़ती रहती थी। हिंदी साहित्य से मेरा परिचय उसके माध्यम से हुआ, वह पुरानी प्रति अभी भी मेरे पास सुरक्षित है।

पढ़ना

कॉलेज के दिनों में अंग्रेज़ी की बहुत किताबें पढ़ी गईं । एक सहेली के घर में बहुत सारी किताबें थीं - आर्थर हेली, लियोन यूरी खासकर पढ़े गए। ऐन रेंड की ‘फ़ाउंटेनहेड’ ने मुझे बहुत प्रभावित किया। अंग्रेज़ी के बेस्टसेलर टाइप के तमाम उपन्यास पढ़े जो मिल जाते थे। सॉमरसेट मॉम के उपन्यास और कहानियाँ पढ़ना याद है।

मैंने हिंदी साहित्य जो मैंने दसवीं-ग्याहरवीं क्लास तक पढ़ा था, उसके बाद कॉलेज में पढ़ते समय वह छूट गया था, तब अंग्रेजी साहित्य पर अधिक जोर था। अशोक जी से मिलने के बाद मैं हिंदी साहित्य की ओर लौटी। अशोक जी कहते थे कि हमेशा एक डायरी रखिए और उसमें लिखिये। इसलिए डायरी रखी, जिसमें उनकी बातें सुनकर लिख लेती कि कौन सी किताबें पढ़नी है।

संयुक्त परिवार में रहते हुए और बच्चों के कारण, मेरे पास अपने लिए समय बहुत कम होता था। मैं अक्सर अपने उपन्यास की थीम से संबंधित नॉन-फिक्शन की किताबें पढ़ती रहती हूँ। समकालीन हिंदी साहित्य भी काफ़ी पढ़ती हूँ। प्रकाशक या लेखक मित्र कविता, कहानी, उपन्यास की किताबें भेज देते हैं, तो कोशिश करती हूँ कि उन्हें पढ़ कर फेसबुक पर ही सही, कुछ लिखूँ। मोबाइल पर ऑनलाइन वेब-साइट्स पर लेख और कहानियाँ पढ़ी जाती हैं। पत्रिकाओं में प्रकाशित किसी कहानी की चर्चा हो तो उसे खोज कर पढ़ती हूँ।

मेरा बेटा अंग्रेज़ी के बुकर और नोबेल पुरस्कृत लेखकों को बहुत पढ़ता है। पर वे किताबें आसपास रहते हुए भी नहीं पढ़ पाती हूँ, इसका अफ़सोस रहता है।

अशोक सेकसरिया और लेखन की शुरुआत

पच्चीस साल की उम्र में, जब मेरी शादी और दो बच्चे हो चुके थे, मुझे मेरे गुरु लेखक-पत्रकार अशोक सेक्सरिया मिले। बच्चों के लिए शब्दकोश बनाने के प्रोजेक्ट में उनसे परिचय मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट था। जिस दिन मैं पहली बार बालकोश के दफ्तर में गयी, तभी समझ गयी थी कि मेरे जीवन का यही अर्थ है। वहां चारों ओर किताबें थीं, बातें थीं, लोग थे। अशोक सेकसरिया मुझे वहाँ मिले, वही मेरे गुरु और मैंटोर बने। वह एक जाने माने लेखक और पत्रकार थे। उसके बाद मैंने सोचा नहीं कि इस माहोल के बाहर भी मेरा कोई जीवन है।

अशोक सेकसरिया व अलका सरावगी - तस्वीर अलका सरावगी के सौजन्य से

अशोक जी को अपने बारे में कुछ भी बताने से वह कहते थे, इसे लिख डालिए। मुझे लगता कि इतनी मामूली बातों को कौन पढ़ेगा? बहरहाल मैंने 'अंग्रेज़ी स्कूल में पहला दिन' शीर्षक से एक फीचर लिख डाला जो कलकत्ता की एक पत्रिका में छपा, जिसके राजकिशोर जी संपादक थे। जब मैंने उसे पढ़ा तो मैंने उसमें एक वाक्य था, "कितना कातर था वह बचपन", तो उसमें अशोक जी ने 'कातर' शब्द को काट करके कुछ और शब्द लिख दिया था, तो मुझे बहुत बुरा लगा। मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने उस पर काफी बहस की। तब अशोक जी ने अपनी गलती मान ली कि उन्हे उस शब्द को बदलना नहीं चाहिए था और खासकर कि मुझसे बिना पूछे। बाद में आगे चलकर अशोक जी ने मुझे बताया कि इस बात से उनको लगा था कि मैं अपने शब्दों के प्रति बहुत सजग हूं और अपने शब्द के लिए मैं उनसे लड़ पड़ी थी तो इस बात के लिए उनके मन में मेरे प्रति बहुत सम्मान हुआ था।

समाजवादी आंदोलन के लोगों की पत्रिका "सामयिक वार्ता" निकलती थी, अशोक जी उसके लिए बहुत काम करते थे, हर समय उसके लिए अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद करते रहते थे। सच्चिदानंद सिन्हा, किशन पटनायक जैसे लोग वहाँ आते रहते थे। मेरी पॉलीटिकल अवेयरनेस की शिक्षा-दीक्षा उनके कमरे में हुई, जो कि रेलवे प्लेटफार्म की तरह का कमरा था जिसमें सिर्फ किताबें और सिगरेट का धुआं और धूल रहती थी। अशोक जी की खटिया थी, हमेशा उस पर बैठे रहते थे। पास में कुछ टूटी-फूटी कुर्सियाँ रहती थी जिन पर हम लोग बैठे रहते थे।

उनके घर पर बहुत सारे लेखकों से मेरा परिचय और मिलना हुआ - कृष्णा सोबती, निर्मल वर्मा, गिरधर राठी, अशोक वाजपेयी, विभूति नारायण राय। यह सारे लोग जब कलकत्ता आते तो अशोक जी से मिलने आते और मेरे लिए यह एक ट्रेनिंग स्कूल था, जहाँ सुनने के लिए बहुत सारी बातें मिलती थी और सुनने में बड़ा आनंद आता था।

जब मुझे साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला तो अशोकजी इस बारे में बहुत चिंतित थे। उन्हें लगा मैं आगे लिख नहीं पाऊँगी।  खैर पुरस्कार मिला और उसके बाद भी मैं लिखती रही। अशोक जी को शायद इससे आश्वासन भी मिला होगा कि एक पुरस्कार मुझे नष्ट नहीं कर पाया, जैसा कि मैं उनको बार-बार कहती थी कि ऐसा नहीं होगा।

मेरे लेखन में और मेरे जीवन जीने के तरीके में, अशोक जी की एक बहुत बड़ी उपस्थिति हमेशा रही। वह ऐसे गुरु थे जो कुछ भी नहीं सिखाता है, कुछ भी नहीं पढ़ाता है,  फिर भी उसका होना ही एक तरह की एक मिसाल थी। 

कहानियाँ

तीस साल की उम्र में पहली कहानी छपने के बाद, मैं उत्साह में भर कर लगातार लिखती गई।

शायद 1989 में, हम सब परिवार सहित कलकत्ते के पास किसी के घर में दो दिन के लिए गए थे। वहां मुझे एक शक्स दिखाई दिया जो कुछ अजीब सा दिखता था, मुंह फाड़ कर मुस्कराता था, ऐसा ढीला पजामा पहने था कि वह लहंगे की तरह फट-फट करता चलता था। वह हंसता रहता था और हमारी सेवा-टहल ऐसे करता था जैसे घर का नौकर हो, लेकिन वह खाता हम सब के साथ में था और रहता भी उसी घर में सब के साथ था। घर में उसका स्थान क्या है, मुझे यह समझ में नहीं आता था। जब हम लौट रहे थे तब मैंने देखा कि वह रो रहा था। इसलिए जब गाड़ी चल पड़ी तो मैं बड़ी उदास हुई और मैंने उसके बारे में जानना चाहा। पहले तो उन लोगों को समझ में नहीं आया कि हम किसकी बात कर रहे हैं, क्योंकि अन्य लोगों के लिए जैसे वह था ही नहीं, अदृश्य सा था। बोले, कौन, वह पागल? तो मैंने कहा कि वह पागल नहीं है, तो सब हंस पड़े और खूब हंसे।

उस पर मैंने एक कहानी लिखी - "आपकी हँसी"। अशोक जी ने कहा कि रवींद्र कालिया है और यह उनका पता है यह भेज दीजिए। इस तरह से उस कहानी को "वर्तमान साहित्य" के महाविशेषांक में भेजा। निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती जैसे लेखकों के साथ, वह 'प्रथम रचना' करके छपी और चर्चित हुई। मेरे पास बहुत सारी चिट्ठियां आईं कि ऐसा आदमी, हाशिए पर फेंका हुआ मार्जिनलाइज्ड आदमी, जिसकी तरफ हम कभी ध्यान भी नहीं देते हैं और वह दिखता ही नहीं है, उन सबकी ज़िंदगी में कहीं न कहीं मौजूद था।

1996 में मेरा पहला कहानी संग्रह आया। वह कहानियाँ आसपास के जीवन और उससे जुड़े सोच पर आधारित थीं। कुछ स्त्री होने के अनुभव पर भी थीं, हालाँकि उनमें स्त्री-विमर्श या फेमिनिज्म नहीं था। शिल्प की दृष्टि से उनमें कुछ नयापन भी था।

उपन्यास

कलिकथा की शुरुआत भी एक कहानी की तरह हुई थी। उसका शीर्षक था, "बीच वाला कमरा कहाँ है"। यह हमारे किसी परिचित के हार्ट के बाइपास करवा कर लौटने पर कही गई बात पर आधारित थी। पर वह कहानी दो पैराग्राफ के बाद रुक गई थी। आज़ादी के पहले जब बीच वाला कमरा नहीं था, उस समय को खोजते हुए इस कहानी ने उपन्यास का विराट रूप धारण कर लिया।

अलका सरावगी व प्रो. थॉमस दाह्नहार्ट, 2016 में इटली में वेनिस युनिवर्सिटी में - तस्वीर डॉ. सुनील दीपक

 

मेरी कहानियाँ ‘आधार प्रकाशन’ ने हज़ारों प्रूफ की गलतियों के साथ छापी थीं। कलकत्ता के पुस्तक मेले में आए प्रकाशक को मैंने चाय पर घर बुलाया और कह दिया कि मेरे पास बन्दूक होती तो मैं उन्हें गोली मार देती। फिर अपने गुस्से का प्रायश्चित करने के लिए उन्हें ही उपन्यास दिया। उन्होंने भी उसे ऐसा बढ़िया छापा कि निर्मल वर्मा तक हाथ में लेकर देर तक कवर देखते रहे। कलिकथा पर अनेक पत्र आए— समीक्षाएँ भी झोली भर कर आयीं। यह सब मेरी आशा से परे था।

कलिकथा के बाद कुछ एक ऐसी दुर्घटना घटी जिससे मैं डिप्रेशन में चली गई। पांच-छह महीने तक किसी की कोई बात सुनने-कहने का, कुछ भी करने का, दिल नहीं होता था। तब एक मीटिंग के लिए फोन आया। घर वाले भी सब कह रहे थे कि तुम उठो, घर के बाहर निकलो, तो मैंने सोचा कि चलो ठीक है, वहां जा कर बैठ जाते हैं।

मैं वहां गई तो मुझे एक महिला मिलीं, उन्होंने बिल्कुल दादी की जैसी सफ़ेद साड़ी पहनी थी, दादी जैसा उनका स्नेहिल  चेहरा था। उन्होंने कहा कि अरे हमने तुम्हारी कलिकथा पढ़ी है। वह मुझे अपने जीवन की कहानियां सुनाने लगींं, तो मैंने उन्हें कहा कि आप की कहानियां इतनी सशक्त हैं, आप इन पर क्यों नहीं लिखती हैं। इस पर उन्होंने कहा कि नहीं, मैं लिख नहीं सकती, तुम्हें लिखना हो तो तुम लिखो। इस तरह से "शेष कादंबरी" की शुरुआत हुई और उसे लिखते हुए मेरा डिप्रेशन गायब हो गया और मैंने अपने आप को जैसे फिर से डिस्कवर किया, कि अल्टीमेटली मैं लेखक हूं और जीवन में चाहे कितना भी बड़ा कुछ भी हो जाए, मैं हार नहीं मान सकती। "शेष कादंबरी" ने इस तरह से मेरा उद्धार किया। मेरे शब्दों ने और लेखन ने मुझे फिर से जीवन जीने की हिम्मत दी है।

मेरे उपन्यास "गांधी और सरलादेवी चौधरानी" में गांधी जी एक मुख्य पात्र के रूप में है। गांधी जी को जानना भी मेरे लिए एक यात्रा थी, यह समझना कि किस तरह से उन्होंने अपने को बनाया, किस तरह से उन्होंने उस समाज को बनाया जिसने आजादी के लिए लड़ाई लड़ी। गांधी की क्या सोच थी, उनकी कितनी अंदरूनी ताकत थी जिसके भरोसे वह खड़े हो जाते थे, उन्हें भरोसा होता था कि वह ऐसा बदलाव ला सकेंगे। मैंने इस किताब में गांधी के जीवन का एक साल का पीरियड लिया है जो जलियांवाला बाग के 6 महीने बाद से शुरू होता है जब गांधी जी पहली बार लाहौर गए थे।

सरलादेवी चौधरानी, लाहौर के देशभक्त वकील-पत्रकार रामभज दत्त चौधरी की पत्नी थी और रवींद्रनाथ टैगोर की बहन की लड़की थीं। गांधी जी उन्हें एक सहयोगी नेता की तरह देख रहे थे क्योंकि वह इस देश की औरतों में जागृति लाना चाहते थे। सरलादेवी चौधरानी के साथ उनका यह एक साल का जीवन, उसे आप प्रेम प्रसंग भी कह सकते हैं या एक तरह का सपना जो वह देख रहे थे। सरला देवी एक ऐसा चरित्र है जो अपने समय के बहुत आगे देख सकता है, सोच सकता है।

गांधी और सरलादेवी में बहुत ही फोकस है, देश ही उनके लिए सब कुछ है और देश की आज़ादी के अलावा कुछ नहीं था। व्यक्तिगत कुछ भी महत्व नहीं रखता है। प्रेम के लिए वे दोनों तैयार नहीं थे। पर प्रेम हुआ और गांधी ने अपने पत्र में इसे साफ़ स्वीकार किया। इस तरह से यह एक ह्यूमन साइकोलॉजी का, एक स्त्री पुरुष के बीच के संबंधों का, दोनों ही का एक बहुत ही अनयूजुअल चरित्र हैं।  वह सम्बंध क्यों टूटता है और किस तरह टूटता है,यह उपन्यास उसकी बात कहता है।

मेरे पांचवें उपन्यास, "जानकीदास तेजपाल मेन्शन" को अपेक्षित सराहना नहीं मिली, ऐसा मुझे लगा। अपने बच्चे सबको श्रेष्ठ लगते हैं, इसलिए अपनी राय को ज़्यादा महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। कई साल बाद उसे इंदु शर्मा कथा यू.के. में सम्मान मिला, तो तसल्ली ज़रूर हुई। 

लिखना

मैं यह कह सकती हूँ कि पात्र का चुनाव और विषय बहुत कुछ संयोग पर आधारित होता है। अचानक कोई कहानी आप को पकड़ लेती है और आप उसमें धँसते चले जाते हैं। वह सोते-जागते नए रूप लेती रहती है और जीवन के जिस छोटे ग्राफ से वह शुरू हुई थी, वह फैलता जाता है। पात्र बिल्कुल वही नहीं रहते जहाँ से उन्हें शुरू में देखा था। वे जैसे ख़ुद को लिखवाते हैं जिसमें आप का पढ़ा- लिखा- देखा- सुना हुआ अनायास जुड़ता जाता है। कोई योजना से वे नहीं चलते।

लिखते हुए यदि यह भय रहे कि कोई आपको ग़लत समझ लेगा या कोई शख़्स उसे असली ज़िंदगी में पहचान कर आप से नाराज़ हो जाएगा, तो लिखा जा नहीं सकता। मेरे साथ ऐसा हुआ भी है। पर यह ख़तरा उठाये बिना जीवन रचा नहीं जा सकता।

हमको पहले का सब कुछ अनलर्न करके लिखना होता है और अगर आप अनलर्न नहीं कर पाते हैं तो फिर आप कहीं न कहीं अपने आप को दोहराने लग जाते हैं।

पात्र लेखक को अपनी अंगुली पकड़ा कर मनमाने तरीके से चलाते हैं। उसमें बहुत कुछ प्रीमेडीटेटेड नहीं होता, वह भी एक यात्रा होती है, डिस्कवरी की। पात्रों के साथ चलते हुए, आप लिखते भी हैं और साथ-साथ अपने आप को भी जानते चलते हैं, क्योंकि लिखा किरदार आपसे अलग भी होता है और वह आपका अपना ही होता है, खासकर जब तक किताब छप नहीं जाए।

अन्य लेखक

हिंदी के अन्य लेखकों से अधिकतर मेरे औपचारिक संबंध ही रहे हैं क्योंकि कलकत्ता में रहते हुए मिलना-जुलना कम होता है। अनामिका, गीतांजलि श्री, प्रत्यक्षा, प्रियदर्शन, रजनी गुप्त, उदयन वाजपेयी, यतीश कुमार, अम्बर पांडे कुछ नाम हैं जिनसे अपनापन महसूस हुआ है। अन्य भाषाओं के लेखकों में असम के नीलिम कुमार हैं। अभी उनकी आत्मकथा पढ़ रही हूँ। गुजराती में ग़ुलाम मोहम्मद शेख हैं। बांग्ला और अंग्रेज़ी के कई लेखक हैं। 


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मंगलवार, अप्रैल 28, 2026

गुवाहाटी जाने की यात्रा

आज से दस साल पहले अप्रैल 2016 में, मैं भारत में दो साल के गुवाहाटी प्रवास के बाद इटली लौटा था।

आज जब उस दसवीं वर्षगाँठ की बात अचानक याद आ गयी तो सोचा कि क्यों न उन दिनों की यादों को ताज़ा किया जाये और उन दिनों पर एक आलेख लिखा जाये। तीन दशकों तक विदेश में रह कर स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने के बाद, जब 2014 में मैंने भारत जाने की सोची थी तब गुवाहाटी जाने का विचार मन में नहीं था, बल्कि कुछ अन्य काम करने की सोची थी।

सोचता था कि कहीं मन का काम नहीं मिलेगा तो किसी मन-पसंद छोटे शहर में जगह को खोज कर वहाँ अपना छोटा सा क्लीनिक खोल लूँगा। लेकिन अपना क्लीनिक खोलने से पहले, मैं कुछ मित्रों के पास रह कर देखना चाहता था कि शायद उनके साथ मन लग जाये, सोचता था कि वह बेहतर होगा क्यों कि मैं अकेले रहने के विचार से डरता था।

हम कुछ सोच कर चलते हैं और नियति हमें किसी ओर दिशा में ले जाती है। आज के इस आलेख में मेरी गुवाहाटी पहुँचने की उस यात्रा के विभिन्न पड़ावों की बाते हैं। 

केसला, मध्यप्रदेश 

सारा जीवन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने के बाद मैंने निश्चय किया था कि 2014 में, अपनी साठवीं वर्षगाँठ पर मैं नौकरी से इस्तीफा दे कर कुछ समय भारत में बिताने जाऊँगा। मेरी वह यात्रा केसला के गाँव से शुरु हुई।

मेरी बात सबसे पहले इटारसी के पास, केसला (मध्यप्रदेश) में ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत समाजवादी विचारधारा वाले सुनील जी से हुई थी। वह वहाँ पर बहुत समय से गरीब लोगों के विकास और मानव अधिकारों के लिए काम कर रहे थे। मैंने सोचा था कि उनके साथ काम करूँगा। जब अप्रैल 2014 में मुझे उनकी अकस्मात मृत्यु का समचार मिला तो गहरा धक्का लगा। मुझे लगा कि उनके बिना शायद वहाँ पर काम करना नहीं हो पायेगा, फ़िर भी भारत पहुँच कर सबसे पहले मैं उनके घर पर केसला ही गया था।

केसला गाँव, मध्यप्रदेश

सुनील जी की पत्नि मॉन्टी (स्मिता) से मेरा दूर का रिश्ता भी है, और हमारी पुरानी जान-पहचान भी थी। केसला में मैं कुछ दिन उनके साथ उनके घर पर रहा, सुनील की के विभिन्न साथियों से मेरी जान-पहचान हुई। लेकिन मुझे लगा कि सुनील जी के अचानक जाने की वजह से वहाँ जो जगह रिक्त हुई थी, उसका घाव उस समय बिल्कुल ताज़ा था। मैंने सोचा कि पता नहीं, उनके बिना, बाकी के उनके साथी उस काम को किस तरह आगे चला पायेंगे?

यह भी सोचा कि वहाँ सुनील जी के न होने से, वहाँ रह कर स्वास्थ्य के क्षेत्र में कुछ नया काम शुरु करना मेरे लिए कठिन होगा। यह सोच कर मैं वहाँ से चल पड़ा।

बिलासपुर, छत्तीसगढ़ 

तब मैं केसला से बिलासपुर गया। वहाँ पर गनियारी में जन स्वास्थ्य सहयोग के अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के बारे में बहुत प्रशंसा सुनी थी। उन्होंने मुझे वहाँ पर कुष्ठ रोग उपचार और विकलांगता कार्यक्रम में काम करने के लिए कहा, उस काम का विचार भी मुझे बहुत अच्छा लगा था।

जन स्वास्थ्य सहयोग संस्था को डॉ. योगेश जैन जैसे आदर्शवादी डॉक्टरों ने शुरु किया था, उनके साथ काम करने का विचार मुझे बहुत आकर्षित कर रहा था। मैं उनके सामुदायिक स्वस्थ्य कर्मचारियों के साथ कुछ गाँवों के क्लिनिक देखने भी गया।

जन स्वास्थ्य सहयोग का मानपुर गाँव में क्लिनिक, छत्तीसगढ़

लेकिन एक दिक्कत थी, कि उनके होस्टल में जगह नहीं थी, वहाँ काम करने का मतलब था कि मुझे पास के किसी गाँव में अलग घर ले कर रहना पड़ता। मैं अकेला रहने के विचार से डर रहा था। दो-तीन दिन वहाँ रहा, बहुत सोचा, पर मुझे लगा कि मैं वहाँ गाँव में अकेला नहीं रह पाऊँगा। आखिर में मैं वहाँ से निकल पड़ा।

जीवन में कभी-कभी ऐसे अवसर आते हैं जब आप कुछ करने से रुक जाते हैं लेकिन उसके निशान आप के मन में रह जाते हैं। उसके बाद सालों तक आप अपने आप से पूछते हैं कि अगर मैंने वह रास्ता चुन लिया होता तो मेरा जीवन कैसा होता? गनियारी के जन स्वास्थ्य सहयोग में काम करने के बारे में मुझे ऐसा ही लगता रहा है, दुख होता है कि मैंने वहाँ पर अकेले रहने की कोशिश क्यों नहीं की।  

लखनऊ, उत्तर प्रदेश

बिलासपुर से मैं लखनऊ गया जहाँ पर मेरी पुरानी मित्र डॉ. ब्रिजिता का सैंट मेरी क्लीनिक, अस्पताल और नर्सिन्ग कॉलेज था। 

सैंट मेरी की नर्सिन्ग की छात्राएँ, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

अस्पताल और नर्सिन्ग स्कूल के काम के साथ-साथ डॉ. ब्रिजिता आसपास के जिलों में बहुत से ग्रामीण क्षेत्रों में भी सामुदायिक स्वास्थ्य तथा विकलाँग जनों के लिए कार्यक्रम चला रही थीं। मैं उनके पास करीब एक मास रुका।

उनके साथ ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यक्रम में काम करने का विचार था लेकिन भीषण गर्मी में गाँवों में घूमने के एक-दो अनुभवों के बाद मैं समझ गया कि मैं गाँवों के उस कठिन वातावरण में अधिक दिन तक नहीं रह पाऊँगा। इस तरह से मैंने डॉ. ब्रिजिता से भी विदा ली।

मनाली, हिमाचल प्रदेश

मेरे एक अन्य मित्र के पिता मनाली के क्षेत्र में एक स्वयंसेवी संस्था चला रहे थे, जहाँ वह सामुदायिक विकास के साथ-साथ, स्वास्थ्य कर्मियों के साथ भी काम करते थे। लखनऊ के बाद मैं कुछ दिन उनके पास रहने गया। उनकी संस्था का डॉक्टर काम छोड कर चला गया था, उन्हें एक डॉक्टर की आवश्यकता थी। 

उनकी संस्था का अधिकाँश काम मनाली शहर में था पर उनका घर शहर के बाहर, कुछ दूर जा कर था। उनके घर के साथ उनका एक अन्य फ्लैट भी था, उन्होंने कहा कि अगर मैं उनके साथ काम करूँगा तो उस फ्लैट में रह सकता हूँ।

वहाँ बाकी सब कुछ बढ़िया था, लेकिन पहाड़ों के बीच में, सर्दियों में ठंड और हिमपात के साथ, शहर के बाहर उस बहुत सुंदर लेकिन सुनसान जगह में रहने के विचार से मुझे डर लगा। इतनी सुंदर जगह पर रहने का सोच कर अच्छा भी लगता था, पर शहर से बिल्कुल बाहर, सुनसान जगह का डर भी था।

शुरु गाँव, मनाली, हिमाचल प्रदेश

उन्हीं दिनों में मुझे एक अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रैंस के लिए आयरलैंड जाना था, सोचा कि वहाँ से लौट कर ही निर्णय लूँगा कि मनाली में काम स्वीकारूँ या नहीं।

उन दिनों में मन में थोड़ी सी मायूसी भी थी कि अभी तक कोई ऐसी जगह नहीं मिली थी जहाँ मुझे पूरे दिल से लगे कि हाँ, मैं यहाँ रह कर, इस जगह में काम करना चाहता हूँ। हर जगह की कुछ बातें अच्छी लगती थीं, कुछ नहीं।

सोचा कि शायद मुझे अपना क्लिनिक खोलने के लिए अपनी पसंद का छोटा गाँव खोजना पड़ेगा, जो किसी शहर से बहुत दूर नहीं हो, और जहाँ अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बहुत दूर न हो। ऐसी कोई जगह सचमुच हो सकती है, इसका मुझे शक था।

गुवाहाटी, असम

आयरलैंड और इटली में कुछ दिन बिता कर मैं वापस भारत लौटा तो विश्व स्वास्थ्य संस्थान के मेरे पुराने मित्र चपल खासनबिस के माध्यम से मुझे बँगलौर की स्वयंसेवी संस्था "मोबिलिटी इंडिया" के लिए गुवाहाटी में विकलांग जनों के लिए नया कार्यक्रम प्रारम्भ करने के काम का आफर मिला।

मैं कुछ साल पहले, एक अन्य स्वास्थ्य कार्यक्रम के सिलसिले में एक बार पहले गुवाहाटी गया था और वहाँ करीब दस दिन रहा था, इसलिए वह शहर मेरे लिए अनजाना नहीं था।  

मैं गुवाहटी पहुँचा, कुछ मित्रों के माध्यम से मैंने उज़ान बाज़ार क्षेत्र के एक होटल में कमरा बुक किया था। मेरा विचार था कि वहाँ पर सप्ताह-दस दिन रुक कर, वहाँ की स्वास्थ्य के क्षेत्र में सक्रिय विभिन्न सरकारी व स्वयंसेवी संस्थाओं से मिलूँगा, और विकलांग जनों के लिए नया कार्यक्रम शुरु हो सकता है या नहीं, इसकी बात समझने की कोशिश करूँगा।

पहले दिन सुबह मुझे एक संस्था के दफ्तर में किसी से मिलने जाना था, होटल से निकला और कुछ दूर पर मेरी मुलाकात बतखों के एक दल से हो गयी। सड़क के किनारे पर वह बतखें एक कतार में चल रही थीं, सुबह का दफ्तर जाने वाला सारा ट्रैफिक, उनके पास धीमा करके जा रहा था ताकि उन्हें दिक्कत नहीं हो। पता चला कि वह पास के उग्रतारा मंदिर की बतखें हैं।

उग्रतारा मंदिर की बतखें, गुवाहाटी, असम

पता नहीं क्यों, उन बतखों को देख कर मुझे लगा मानो नियति ने मुझे संदेश भेजा हो कि इसी शहर में मुझे रुकना है, सोचा कि जिस शहर के लोग बतखों के सड़क पर चलने का ध्यान रख सकते हैं, वहाँ रहना अच्छा होगा।

अंत में

जिस दिन मैं गुवाहाटी में उग्रतारा की बतखों से मिला था, उसी दिन मेरी मुलाकात फादर पॉल से भी हुई, जिनके साथ मैं बहुत समय तक रहा और जो असम के उन दिनों में मेरे सबसे करीबी मित्र बने।

यही मेरी किस्मत में लिखा था कि मैं गुवाहाटी में रहूँ और वहाँ बहुत से लोगों से मित्रता बने और उत्तर-पूर्वी भारत के क्षेत्र को जानू और समझूँ। 

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शुक्रवार, मार्च 20, 2026

मेरा फैंतासी उपन्यास

बहुत सालों से मैं एक हल्का-फुल्का सा जासूसी उपन्यास, जेम्स बॉन्ड जैसा कुछ, लिखना चाहता था। बचपन में ऐसी किताबें पढ़ना मुझे बहुत अच्छा लगता था।

साठ के दशक में, घर पर पापा की अलमारी में बहुत सी गम्भीर साहित्य वाली किताबें थीं, जिन्हें मैंने बहुत छोटी उम्र में पढ़ना शुरु कर दिया था - नानक सिंह, रांगेय राघव, किशन चंदर, चतुरसेन, जैसे बहुत से लेखक मुझे अच्छे लगते थे। घर में सारिका, धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी पत्रिकाएँ भी आती थीं जिनमें मुझे शिवानी, शंकर, बिमल मित्र जैसे लेखकों को पढ़ना भी अच्छा लगता था।

लेकिन गम्भीर साहित्य के साथ हल्का-फुल्का साहित्य भी मुझे प्रिय था। मेरी मौसी की सहेली जो हमारी पड़ोसी थी, उनके यहाँ जासूसी उपन्यास पढ़ने को मिलते थे। मौसी के अपने सबसे प्रिय लेखक थे गुलशन नन्दा, जिनकी बहुत सी किताबें मैंने गर्मियों की छुट्टियों में पढ़ी थीं। छुट्टियों में हम कई बार बड़ी मौसी के यहाँ पश्चिमी बंगाल में अलीपुर द्वार जाते थे, जहाँ जाने की यात्रा में तीन दिन लगते थे, तब रास्ते भर मैं स्टेशन से खरीदी जासूसी और गुलशन नन्दा किस्म की किताबें पढ़ता था।

नया उपन्यास - देवी प्रतिमा के रक्षक 

आखिर में मैं अपना सपना पूरा करने में सफल हुआ। असल में इसे लघु उपन्यास कहना चाहिये, और इसे लिखने में मुझे बहुत मज़ा आया। मैं इसके प्रकाशन के बारे में सोच रहा हूँ, नये लेखकों के लिए हिंदी किताबों के प्रकाशक मिलना कठिन लगता है, और चूँकि मैं विदेश में रहता हूँ, प्रकाशित करवाने में और भी दिक्कते हैं। वैसे तो सुना है कि हिंदी किताबों के लेखन की कमाई से जीवन-यापन कठिन है, लेकिन मेरे पास मेरी पैंशन है, मुझे पैसे की आवश्यकता भी नहीं है, इसलिए मैंने सोचा है कि इसे अपने इस ब्लाग पर ही प्रकाशित कर चाहिये। आप की क्या राय है?

उपन्यास "देवी प्रतिमा के रक्षक" का कवर चित्र

यह उपन्यास लिखने की यात्रा

मेरे पहले दो उपन्यास साहित्यिक विषयों पर थे। एक उपन्यास लिखने में मुझे दो-तीन साल लगते थे, लेकिन मन कभी संतुष्ट नहीं होता था, इसलिए मैं उन्हें बार-बार लिखता, दस-पंद्रह बार भी। जबकि इस फैंतासी उपन्यास लिखने में सिर्फ दो महीने लगे।

शुरु में सोचा था कि उपन्यास एक रहमदिल खूनी पर होगा, जिसे अपने खून-खराबे पर पछतावा है और जो अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए अब केवल बुरे लोगों को मारता है, यानि कि वह एक तरह का रोबिनहुड-खूनी है। लेकिन जब उसे लिखने लगा तो वह कहानी उस खूनी के हृदय परिवर्तन की बात पर केन्द्रित हो गयी, यानि कि उस खूनी का दिल क्यों और कैसे बदलता है।

मेरे उपन्यास का खूनी, ताकानोरी ओकामो, एक जापानी याकूज़ा है, जिसे दक्षिण कोरिया के एक बुद्ध भिक्षुक की विशेष शक्ति वाली मूर्ति की खोज है। वह भिक्षुक जी उस मूर्ति के साथ कई सालों से भारत में एक वृद्धाश्रम में छिपे हुए रहते हैं।

उपन्यास लिखते हुए कथानक में एक और परिवर्तन हुआ, कि उस खूनी की कहानी के साथ, यह एक अनाथाश्रम में रहने वाले कुछ गुप्त-शक्तियों वाले बच्चों की कहानी भी बन गयी। उपन्यास पूरा करने के बाद मुझे लगा कि शायद मेरी कहानी के नायक त्रिनेत्र और उनके साथी बच्चे "मिस्टर इंडिया" फ़िल्म से कुछ हद तक प्रभावित हैं।

शायद यह उपन्यास बड़े बच्चों, किशोरों और नवजवानों के लिए अधिक उपयुक्त है, पर यह निर्णय तो पाठक ही कर सकते हैं। यह उपन्यास भारत के उत्तर-पूर्व की पृष्ठभूमि पर है, इसका एक बड़ा हिस्सा, असम के मजूली द्वीप पर केन्द्रित है, उसके अलावा इसमें विष्णुपुर, गंगटोक और मणिपुर भी हैं।  

उपन्यास का कवर

मेरे बेटे ने कृत्रिम बुद्धि (ए.आई.) यानि आर्टिफीशियल इन्टैलिजैंस से इसके लिए बहुत से कवर बना कर दिये, जिनके कुछ नमूने आप नीचे देख सकते हैं।

ए.आई. से बने मूल चित्र

अंत में मैंने जो कवर चुना, मुझे लगा कि उसके रंग अच्छे नहीं हैं, वह स्पष्ट रूप से दिखता है कि ए.आई. से बना है। मैंने उसके रंग हटा कर उन्हें कम्प्यूटर पर हाथ से रंगा और कुछ फिल्टर लगा कर देखे। जब उपन्यास निकलेगा, तब आप को इस पर राय देने का मौका मिलेगा। 

अंत में

पाठकों को यह उपन्यास कैसा लगेगा, पता नहीं, लेकिन मुझे इसे लिखने में बहुत आनन्द आया। यह लिखा भी फटाफट ही गया। जून में मेरा जन्मदिन होता है, सोचा है कि इस अवसर पर, "देवी प्रतिमा के रक्षक" को इसी ब्लॉग पर पाठकों के लिए किश्तों में प्रकाशित किया जाये।

मेरे मन में एक और ख्वाहिश भी है, साईन्स फिक्शन का उपन्यास लिखने की। फैंतासी लिखने में इतना मज़ा आया, मुझे आशा है कि साईन्स फिक्शन लिखने में भी उतना ही आनन्द आयेगा। अभी उसकी पलैनिन्ग शुरु की है।

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1 जून 2026: आप चाहें तो "देवी प्रतिमा के रक्षक" को इस ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं।   

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सोमवार, दिसंबर 08, 2025

डायबिटीज़ का डर और वज़न घटाने की यात्रा

पहली बार मेरा वज़न बढ़ा जब मैं तीस-पैंतिस साल का था। करीब दस किलो बढ़ा फ़िर वहीं पर स्टेबल हो गया। उसके बाद करीब बीस-पच्चीस सालों तक मेरा वज़न एक ही जगह टिका हुआ था, और खून-पिशाब आदि के सब टैस्ट सही चल रहे थे। पाँच साल पहले जब मैं 66-67 साल का हुआ, मेरा वज़न फ़िर से बढ़ने लगा, एक साल में ही दस-बारह किलो और बढ़ गया, सब कपड़े नये लेने पड़े।

चार साल पहले ब्लड टैस्ट कराया तो उसमें सुबह का भूखे पेट वाला ब्लड शुगर बढ़ा हुआ आया। पहले यह मात्रा 90-95 मि.ग्र. से अधिक नहीं आती थी, उस बार 110 आयी।

तब सोचा कि ब्लड शुगर की बेहतर जाँच करने वाला एचबीएवन (HbA1) टैस्ट करवाना चाहिये। वह करवाया तो 6.1 आया, यानि डायबिटीज़ होने का खतरा था। नॉर्मल लोगों में यह टैस्ट 5.5 आता है। जब यह 5.6 से 6.4 तक हो तो इसे प्री-डायबिटीज़ यानि शुगर की बीमारी होने के खतरे का स्तर मानते हैं और खाने पर कन्ट्रोल करने के लिए कहते हैं।। अगर 6.5 या उससे अधिक हो तो डायबिटीज़ की दवा लेनी चाहिये।

इसलिए मैंने तब चीनी और मीठी चीज़ें खाना कम कर दीं। छह महीने बाद यह टैस्ट दोबारा कराया तो घटने के बजाय शुगर बढ़ गयी थी, यह 6.3 आया। मेरी डॉक्टर बोली कि स्थिति तेज़ी से बिगड़ रही है, मुझे दवा लेना शुरु कर देना चाहिये, लेकिन मैंने उन्हें कहा कि छह महीने और प्रतीक्षा कर लेते हैं। इसके बाद मैंने तुरंत वज़न कम करने के नये प्रयास किये।

पिछले ढाई-तीन सालों में मैने बारह किलो वज़न कम किया है और चार महीने पहले जब मैंने टैस्ट कराये तो मेरा ब्लड शुगर 91 और एचबीएवन 5.7 आये। इसके अतिरिक्त जोड़ो के दर्द तथा अन्य तकलीफों में भी राहत मिली है।

आज की इस पोस्ट में मैं अपनी वज़न और ब्लड शुगर घटाने की यात्रा की बात करना चाहता हूँ।

 

डायबिटीज़ टाईप 1 एवं 2

डायबिटीज़ की बीमारी मुख्यत: दो तरह की होती है। एक कम उम्र में होने वाली डायबीटीज़ होती है जिसमें लोगों की पैनक्रियास ग्रंथी चीनी का पाचन करने वाले हॉरमोन इन्सुलिन (insulin) को बनाना बंद कर देती है। क्योंकि उनके शरीर में यह हॉरमोन होता ही नहीं, तो उनसे चीनी नहीं पचाई जाती और खून में उसकी मात्रा बढ़ जाती है। उन्हें नियमित इन्सुलिन के इन्जैक्शन लगवाने पड़ते हैं (अभी तक गोली की तरह लेने वाली इन्सुलिन नहीं बनी है, उसके इन्जैक्शन ही लगवाने पड़ते हैं)। इसे टाईप 1 की डायबीटीज़ कहते है।

दूसरी तरह की डायबीटीज़, अधिकतर अधेड़ उम्र के बाद होती है, विषेशकर उन लोगों में जिनका वज़न बढ़ा हुआ होता है। उनके शरीर में इन्सुलिन सामान्य या अधिक बनती है लेकिन उसका शरीर पर असर रुक जाता है या कम हो जाता है, जिससे वह हॉरमोन उनके शरीर में ठीक से काम नहीं कर पाता। यह टाईप 2 की डायबीटीज़ है। दुनिया में और विषेशकर भारत में पिछले कुछ दशकों में इस तरह की डायबीटीज़ बहुत अधिक बढ़ी है। इसमें शरीर में इन्सुलिन है लेकिन वह काम नहीं करती, इसलिए वह चीनी नहीं पचा पाते और उसकी खून में मात्रा बढ़ जाती है, जिसके लिए दवा की गोलियाँ मिलती हैं।

जब खून में शुगर बढ़ जाती है तो उससे खून की रगें बंद होने का खतरा होता है जिससे हृदय, गुर्दों, आँखों, पैरों आदि में रगें बंद होने से शरीर के अंग नष्ट हो सकते हैं। इस आलेख में मैं केवल दूसरी तरह की डायबीटीज़ की बात कर रहा हूँ।

ब्लड शुगर तथा एचबीएवन टैस्टों में अंतर

रक्त में चीनी की मात्रा मापने को ब्लड शुगर टैस्ट कहते हैं। यह कई तरीकों से करते हैं, सबसे आम तरीका है सारी रात भूखा रहने के बाद सुबह-सुबह भूखे पेट के समय रक्त की चीनी को मापा जाये। यह 85-95 के आसपास होनी चाहिये। अगर यह 120 से अधिक आये तो इसका मतलब है आप को डायबीटीज़ की बीमारी हो सकती है। जब खून में चीनी की मात्रा अधिक आती है तो अक्सर उन व्यक्तियों के पिशाब में भी शुगर मिलती है।

एचबीएवन (HbA1) टैस्ट रक्त के लाल कोषों में होने वाले हिमोग्लोबिन से जुड़ी हुई चीनी को मापता है। यह टैस्ट उस समय खून में कितनी शुगर है उसे नहीं देखता, बल्कि यह देखता है कि पिछले तीन हफ्तों में  खून में चीनी का औसत स्तर कितना रहा और वह मात्रा कितनी बार बढ़ी या घटी। यानि यह टैस्ट केवल एक समय में रक्त में चीनी है को नहीं देखता, बल्कि पिछले तीन हप्तों की रक्त की चीनी किस स्तर पर रही है, उस पर निर्भर करता है। यह डायबीटीज़ का बेहतर टैस्ट माना जाता है। नॉर्मल टैस्ट 5.5 या उससे कम होता है।

मेरे शुरु के प्रयास

जब मुझे पता चला कि मेरा एचबीएवन बढ़ा कर 6.1 हो गया है तो पहले मैंने नियमित वर्ज़िश करना शुरु किया और रात को खाना खा कर एक घंटे की सैर करने लगा। खाने पर भी बहुत कंट्रोल किया, खाने की मात्रा कम की, साथ में चीनी, घी-तेल वाली चीज़ें बिल्कुल कम कर दीं। यह छह महीने किया और वह समय बहुत मुश्किल से कटा। सारा समय मेरा ध्यान खाने पर होता था और मीठी चीज़ें, बिस्कुट, चिप्स वगैरा खाने का बहुत मन करता था। इतनी मेहनत के बाद जब ब्लड टैस्ट कराया तो एचबीएवन 6.3 आया, यानि मेरी शुगर घटने के बजाय बढ़ गई थी।

तब मैंने इसके बारे में कुछ किताबें पढ़ीं। कई विशेषज्ञ इंटरमिटैंट फास्टिन्ग की सलाह दे रहे थे, यानि जितना भी खाना हो उसे दिन में छह-आठ घंटे के समय के भीतर खाईये, उस समय के बाहर कुछ नहीं खाना। मैंने भी यही रास्ता ट्राई करने का फैसला किया।

इंटरमिटैंट फास्टिन्ग या प्रतिदिन कुछ घंटों का व्रत 

इंटरमिटैंट फास्टिन्ग के विशेषज्ञ कहते हैं कि हर रोज़ कुछ घंटे का व्रत रखिये। इसके लिए वह चार सुझाव देते हैं:

1. उनका पहला सुझाव है कि रात को जब हम सोते हैं, तो हमारा सात-आठ घंटों का व्रत अपनेआप हो जाता है। वह कहते हैं कि बजाय सुबह-सुबह नाश्ता करने के, हमें उसी व्रत को कुछ घंटे और बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिये। यानि आप सुबह नाश्ता करने की जगह पर दस-ग्यारह बजे नाश्ता कीजिये। उनके अनुसार, केवल इतने व्रत से शरीर की इन्सुलिन बेहतर काम करने लगती है और ब्लड शुगर कम होने लगती है। वह कहते हैं कि अगर आप को सुबह जल्दी चाय-कॉफी की आदत है और उसके बिना नहीं रह सकते तो आप उन्हें बिना चीनी और दूध के पीजिये।

व्रत में पानी, तथा बिना चीनी और दूध की चाय-कॉफ़ी पी सकते हैं, लेकिन और किसी चीज़ का एक छोटा सा दाना भी नहीं खाना चाहिये। कुछ ज़रा सा भी खाओ, चाहे वह नींबू की दो बँदें ही क्यों न हों, हमारा शरीर सोचता है खाना आने वाला है और इन्सुलिन बनाना शुरु कर देता है, जबकि व्रत रखने का उद्देश्य है कि 14-16 घंटो तक हमारे शरीर को इन्सुलिन बिल्कुल भी न बनानी पड़े।    

2. अगर हम शुगर के साथ वज़न भी घटाना चाहते हैं तो उनका दूसरा सुझाव है कि एक समय के खाने से अन्न को बिल्कुल निकाल दीजिये या जितना हो सके कम कर दीजिये, उस समय केवल सब्जियाँ और प्रोटीन-प्रधान भोजन (जैसे कि माँस, मछली, अंडे, दाल, राजमाँ, लोभिया, साग, दूध, दही, अखरोट, बादाम, मूँगफली आदि को प्रोटीन प्रधान भोजन मानते हैं) जैसी चीज़ें खाईये। फ़ल खा सकते हैं लेकिन कम और अधिक मीठे फ़ल जैसे कि केले, किवी, संतरे आदि कम या न खायें।

3. शरीर को स्वस्थ करने के लिए हर हफ्ते कम से कम तीस या अधिक तरह की विभिन्न दालें, सब्जियाँ, फल, ड्राई फ्रूट, मसाले आदि खाईये। यानि हर रोज़ खाना बदल-बदल कर खाईये।

4. नियमित व्यायाम कीजिये जैसे कि खाने के बाद सैर करना, वर्जिश करना आदि।

मेरी प्रारम्भ की इंटरमिटैंट फास्टिन्ग

मैंने सोचा कि मैं सुबह नाश्ता करना बिल्कुल बंद कर दूँगा। केवल दोपहर में बारह बजे से शाम के साढ़े सात बजे के बीच में खाऊँगा। लेकिन बिना चाय-कॉफ़ी के सुबह मुश्किल लगती थी, सोचा कि सुबह केवल बिना चीनी और दूध की कॉफ़ी पीयूँगा।

दोपहर के खाने के लिए मैंने केवल कच्ची सब्जियाँ और फ़ल चुने। बारह बजते ही मैं गाजर, मूली, खीरा, शिमला मिर्च, टमाटर, ओलिव, बंद गोभी, शलजम, अवोकादो, सेब, आदि मिला कर मैं पूरी प्लेट भर कर के खाता था, ताकि पेट भर जाये, मुझे यह नहीं लगे कि मैं भूखा हूँ। चूँकि मेरी एचबीएवन बढ़ी हुई थी, मैंने दोपहर को अवोकादो को छोड़ कर अन्य फ़ल कम या बिल्कुल नहीं खाये।

दोपहर में तीन बजे मैं एक मुट्ठी काजू, बादाम आदि के साथ दूध वाली चाय लेता था,और शाम को सात बजे नॉर्मल पूरा खाना खाता था। इटली में वाईन हर जगह मिलती है, मैं रात के खाने के साथ आधा गिलास लाल वाईन का भी लेता था। 

साथ ही मैंने केक, मिठाई, बिस्किट, आईसक्रीम आदि बंद कर दिये, उन्हें कभी-कभार, यानि हफ्ते-दस दिन में एक बार सीमित मात्रा में खाता था।

शाम को खाने के बाद सैर तो पहले से कर रहा था, अब स्टैप्पर, वर्जिश वाले इलास्टिक आदि खरीदे और हफ्ते में चार बार, सुबह भूखे पेट व्यायाम भी करने लगा। मेरे एक मित्र जो ओर्थोपीडिक्स के सर्जन हैं, वह अपने व्यक्तिगत अनुभव से कहते हैं कि हर सुबह दस बार सूर्यनमस्कार करना सबसे अच्छा व्यायाम है, लेकिन मुझसे सूर्यनमस्कार पूरा नहीं किया जाता।

इससे मेरा वज़न घटने लगा, हर महीने में एक-डेढ़ किलो कम होने लगा। करीब सात-आठ महीनों में बारह किलो घट गया और शुगर के टैस्ट भी ठीक हो गये।

यह सब करना शुरु में बहुत मुश्किल लगा। दोपहर बारह बजे तक खाने की प्रतीक्षा करना मेरे लिए सबसे कठिन था। कभी खाने में बारह की बजाय साढ़े बारह या एक बज जाते तो मैं चिड़चिड़ा और झगड़ालू हो जाता। रात को सोते समय मुझे खाने के सपने आते थे। पहला महीना सबसे कठिन था, उसके बाद धीरे-धीरे आदत हो गयी।

और आज

एक बार खाने की आदत बदली तो मैं दोबारा अपने पुराने ढर्रे पर नहीं लौटा हूँ। आज भी मैं हर रोज़ कुछ घंटों का व्रत रखता हूँ, आम तौर पर सुबह दस बजे से रात आठ बजे के बीच में खाता हूँ, यानि चौदह घंटे का व्रत होता है। कई बार व्यस्त होता हूँ तो बारह बजे तक भी कुछ नहीं खाता, अब उसमें कुछ कठिनाई नहीं लगती।

दोपहर का खाना अब भी सब्जियों का है, लेकिन अब उनके साथ अधिक फ़ल भी खाता हूँ और साथ में दो अंडे भी। रात को नॉर्मल खाना खाता हूँ।

लेकिन खाने के इस बदलाव ने मेरी इच्छाओं को भी बदल दिया है, अब मुझे बाज़ारी खाना अच्छा नहीं लगता। लेकिन जब पार्टी हो या रैस्टोरैंट जायें तॊ मैं सब कुछ खाता हूँ। बीच में भारत गया था, तब पूरी-भाजी, छोले-भटूरे, नान-चिकन आदि खाये लेकिन उन्हें खाने में पहले जैसा आनंद नहीं आया। सत्तू की बर्फी नियमित खायी, वह मुझे अच्छी भी लगी। 

वैसे तो अब मीठा कम ही खाता हूँ लेकिन रात को अक्सर दही में शक्कर, तिल, चिया, आदि मिला कर खाना मुझे अच्छा लगता है। मैंने व्यायाम और सैर भी नहीं छोड़े।

वज़न और शुगर कम होने के साथ मुझे लगता है मेरे जोड़ों के दर्द और सामान्य स्वास्थ्य को भी इस बदलाव से फायदा हुआ है। हालाँकि वज़न कम होने के बाद मैंने खाना बढ़ा दिया है, लेकिन एक बार जो बारह किलो वज़न कम हुआ वह अभी तक नहीं लौटा है।

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बुधवार, जुलाई 02, 2025

यौन दुराचरण और हमारी चुप्पियाँ

पिछले कुछ दिनों में फेसबुक पर साहित्यकारों से जुड़ी यौन दुराचरण की एक बहस चल रही है। मैं फेसबुक पर कम ही जाता हूँ और कोशिश करता हूँ कि नकारात्मक बातें न पढ़ू, फ़िर भी इस बहस के कुछ हिस्सों पर मेरी नज़र पड़ी। उस बहस में जिन व्यक्तियों की और जिस घटना की बात हो रही है, मैं दोनों से अपरिचित हूँ, इसलिए उसके बारे में कुछ नहीं लिखना चाहता।

लेकिन इस बात से मुझे अपने कार्य-जीवन से जुड़ीं यौन दुराचरण की बातें याद आ गईं। यह आलेख मेरी उन यादों, अनुभवों, तथा विचारों के बारे में है।


आप क्या करेंगे?  

अगर आप को पता चले कि आप का मित्र या ऐसा व्यक्ति जिसे आप बहुत मानते हैं वह यौन-दुराचरण कर रहा है तो आप क्या करेंगे? यह बातें फ़िल्मों में देख कर या दैनिक या पत्रिका में पढ़ कर आसान लगती है, और हम सोचते हैं कि इसके विरुद्ध आवाज़ उठानी चाहिए। 

जैसे कि मीरा नायर की फ़िल्म "मॉनसून वेडिन्ग" में यह प्रश्न उठता है, जब पता चलता है कि परिवार का एक सम्मानित आदमी जिसने परिवार की कई अवसरों पर मदद की है, घर की बच्ची के साथ जबरदस्ती यौन सम्बंध करता था। उस फ़िल्म में परिवार के वरिष्ठ लोग उस आदमी को वहाँ से चले जाने के लिए कहते हैं। लेकिन फ़िल्मों के बाहर की दुनिया में क्या होता है? वहाँ अक्सर इस विषय पर चुप्पियाँ मिलती हैं, और लोग इस बारे में बात करने में असहज हो जाते हैं।

मेरे व्यक्तिगत अनुभव भी यही बताते है कि सामान्य जीवन में इस तरह के निर्णय लेना कभी-कभी बहुत कठिन हो सकता है। अगर आप को यौन विषय पर पढ़ने-सुनने से परेशानी होती है, तो मेरी सलाह है कि आप इस आलेख को आगे नहीं पढ़िये।

दो जाने-माने नाम

एब्बे पिएर फ्राँस में १९१२ में पैदा हुए थे और उनकी मृत्यु सन् २००७ में हुई थी। उन्हें लोग संत मानते-बुलाते थे। सन् १९४९ में एब्बे पिएर ने यूरोप में एम्माउस नाम की संस्था बनाई थी जो गरीबों, विकलांगों, कुष्ठ रोगियों, शरणार्थियों आदि के साथ सक्रिय थीं। उनकी संस्था से प्रभावित हो कर बहुत सी अन्य एम्माउस एसोसियेशन भी बनीं। चूँकि मैं भी कुष्ठ रोग और विकलांगता के क्षेत्र में सक्रिय था, उनमें से कई संस्थाओं के साथ मेरे सम्पर्क बने और उनके साथ बहुत बार काम भी किया।

करीब तीस-पैंतीस साल पहले, नब्बे के दशक में मैं एब्बे पिएर से एक बार मिला था और उनकी बातों और सोच से बहुत प्रभावित हुआ था। इसलिए जब पिछले वर्ष (२०२४ में), एब्बे पिएर के बारे में खबरें आईं कि उन्होंने बहुत सी बच्चियों के साथ यौन दुराचार किया था, तो मुझे बहुत धक्का लगा था। इस विषय पर एक नई किताब आई है जिसकी लेखिकाओं ने इस विषय पर छानबीन की है जिससे स्पष्ट होता है कि उनके यौन दुराचार की बातें लोगों को बहुत पहले से मालूम थीं लेकिन इसके बारे में कोई खुल कर नहीं बोलता था। ३३ स्त्रियों ने बचपन में उनके इस तरह के व्यवहार के व्यक्तिगत अनुभवों के बारे में गवाही दी है।

जब इस तरह की बातें पता चलती हैं तो पहला प्रश्न जो मेरे मन में उठता है वह है - उस व्यक्ति के अच्छे कामों के बारे में क्या किया जाये? उन्हें भुला दिया जाना चाहिये? किसी व्यक्ति की बात करते हुए  उसके अच्छे और बुरे कर्मों को किस तराजू में कैसे तोला जाये?

दूसरी बात है समय की। एब्बे पिएर को गुज़रे हुए सतरह साल हो चुके हैं तो अब यह बातें कहने का क्या लाभ है? मेरे विचार में सच्ची बात को अभिव्यक्त करना भी आवश्यक है। इस समाचार के बाद कुछ एम्माउस संस्थाओं ने अपनी वेबसाईट आदि से एब्बे पिएर का नाम हटा दिया है। लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि इतने सालों के बाद की उन औरतों की स्मृति पर भरोसा नहीं किया जा सकता, या फ़िर किसी को मानसिक रोग हो तो वह गलत सम्बंध की बात की कल्पना भी कर सकता है, इसलिए इन बातों पर पूरा विश्वास करना कठिन है। लेकिन मुझे लगता है कि इतनी सारी औरतों की शिकायतों को मानसिक रोग कहना सच्चाई से मुँह छुपाना है।

दूसरी बात डेविड वर्नर की है। पिछड़े और विकासशील देशों के ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले बहुत सारे लोग डेविड वर्नर की दो किताबों को जानते हैं, "जहाँ कोई डॉक्टर नहीं है" और "गाँव के विकलांग बच्चे"। १९८०-९० के समय में यह दोनों किताबें बहुत प्रसिद्ध थीं और इनसे प्रेरणा पा कर इस तरह की अन्य कई किताबें भी लिखी गईं जैसे कि "जहाँ कोई डैंटिस्ट नहीं है", "जहाँ कोई मनोरोग विषेशज्ञ नहीं है", आदि।

मैंं डेविड से पहली बार १९८८ में मिला था और विकलांगता से सम्बंधित विषयों पर उसकी सोच-समझ को प्रेरणादायक पाया था।

२००३-४ के आसपास मैंने सुना कि उस पर आरोप लगा है कि मैक्सिको के जिस गाँव में रहता और काम करता था, वहाँ के कई बच्चों के साथ उसके यौन सम्बंध भी थे। मुझे विश्वास नहीं हुआ, लेकिन मेरी एक अंग्रेज़ी मित्र ने मुझे उसकी एक चिट्ठी दिखायी जिसमें वह इस तरह के "प्रेम सम्बंधों" को वह बच्चों के मानसिक विकास के लिए सही बता रहा था। हमारे मित्रों के गुट ने उस समय उससे सब सम्बंध तोड़ लिए थे। बाद में मैंने सुना कि वह अपनी बात से पलट गया है, वह इंकार करता है कि उसने ऐसा कुछ किया था।

डेविड मुझसे करीब बीस साल बड़ा था, अगर वह आज जीवित है तो नब्बे साल का होगा। बहुत सालों से मेरा उससे सम्पर्क नहीं है। लेकिन इसके बारे में मेरे मन में दुविधा है। उसकी जिन किताबों की वजह से लाखों लोगों को लाभ भी हुआ था और आज भी होता होगा, उनके लिए उसके योगदान को कैसे देखा जाये? मैं कई विकलांग लोगों को जानता हूँ जो कहते हैं कि उसकी किताबों में उन्होंने अपना जीवन जीने की राह पाई है।

मी टू - व्यस्कों में सम्बंधों की जटिलताएँ

कुछ वर्ष पहले "मी टू" (मुझे भी) के नाम से यौन दुराचार की बहुत सी बातें बाहर निकलीं, कई लोगों पर आरोप लगे जिसमें बड़ी उम्र के जाने-पहचाने या प्रसिद्ध या उच्चे पद के अफसरों-अधिकारियों ने अपने नीचे काम करने वाली युवतियों को सैक्स के लिए मजबूर किया था। कानूनी जाँच में बहुत से ऐसे आरोप सही निकले और कुछ में आरोपितों को सजा मिली या नौकरी से निकाला गया। कुछ ऐसे आरोप झूठे भी निकले। 

कुछ स्त्रियों का कहना है कि जिस समय यह हादसा हुआ था, यह इतना अप्रत्याशित था कि उस समय वह कुछ नहीं कह पायीं। अगर महिला ने रोका नहीं या स्पष्ट मना नहीं किया तो क्या इसे गलतफहमी का नतीजा भी माना जा सकता है?

यह भी सच है कि नीचे काम करने वाले को दबाव महसूस होता है कि अगर वह ऐसे सम्बंधों को नहीं स्वीकारेंगे तो उनके केरियर पर बुरा असर पड़ेगा। इसलिए कुछ लोग कहते हैं कि इस तरह के सम्बंध हमेशा गलत होते हैं। लेकिन ऐसे कई दम्पत्ति हैं जिनकी जानपहचान और प्रेम साथ में काम करने की वजह से हुए, जब उनमें से एक ऊँचे पदवे पर था और दूसरा नीचे। इसलिए यह सोचना कि ऊँचे और नीचे पद वालों के बीच किसी तरह के सम्बंध नहीं बने, को लागू करना कठिन होगा।

यह भी हो सकता है कि कैरियर में आगे बढ़ने के लिए या किसी लाभ की आशा से कुछ व्यक्ति इस तरह के सम्बंध सोच-समझ कर बनायें, लेकिन बाद में प्रमोशन या लाभ न मिलने पर गुस्सा हो जायें और बदला लेने के लिए कहें कि उनके साथ जबरदस्ती हुई है। यह बात सोच कर मुझे व्यस्क व्यक्तियों के बीच हुए सम्बंधों का मामला अधिक कठिन लगता है। 

समलैंगिक यौन दुराचरण की जटिलतायें

नब्बे के दशक में एक अधेड़ उम्र की नर्स हमारे एक प्रोजेक्ट में काम करने तीन महीने के लिए विदेश गईं। उन्होंने लौट कर मुझसे शिकायत की वहाँ काम करने वाली, उनसे दस वर्ष बड़ी हमारे प्रोजेक्ट की प्रमुख ने उनसे यौन सम्बंध बनाने की कोशिश की। वह चाहती थीं कि हम उस प्रोजेक्ट प्रमुख को नौकरी से निकाल दें। जहाँ तक मुझे समझ में आया शिकायत करने वाली महिला के साथ किसी तरह की कोई जबरदस्ती नहीं हुई थी, बल्कि वह सोचती थीं कि लेसबियन होना गलत है और ऐसी औरतों को प्रोजक्ट में ज़िम्मेदारी के पद पर नहीं रखना चाहिए। जबकि मुझे लगा कि लेसबियन होना और व्यस्क महिला से सम्बंध के लिए कहना या पूछना कोई जुर्म नहीं है। अंत में मैंने इस शिकायत के बारे में कुछ नहीं किया।

एक बार भारत में एक कुष्ठआश्रम के काम करने वाली यूरोपीय मूल की नर्स-नन के बारे में भी मुझे यही शिकायत मिली कि वह लेसबियन है। मैं उन्हें बहुत सालों से जानता था और मुझे लगा कि वह बहुत मेहनत तथा प्यार से रोगियों की सेवा करती थीं। मैंने सोचा कि लेसबियन होना अपराध नहीं है, और अगर वह किसी से जबरदस्ती नहीं कर रहीं तो यह उनका निजि मामला है। बाद में मुझे खबर मिली कि उनकी संस्था (कोनग्रेगशन) ने उन्हें संस्था से निकाल दिया है और वह यूरोप वापस लौट आईं।

कुछ साल पहले अमरीकी अभिनेता केविन स्पेसी पर भी कुछ पुरुषों ने आरोप लगाये थे कि कुछ दशक पहले जब वह नाबालिग थे तब स्पेसी ने उनके साथ जबरदस्ती सम्बंध बनाये थे। इन आरोपों की वजह से स्पेसी को कई फिल्मों और सीरियल से निकाल दिया गया, लेकिन बाद में न्यायालय ने उन आरोपों को सही नहीं माना। एक ओर से यह हो सकता है कि इतने पुराने ज़ुर्म को अदालत में साबित करना आसान नहीं है, लेकिन दूसरी ओर यह भी हो सकता है कि प्रसिद्ध और पैसे वाले व्यक्ति पर झूठा आरोप लगाने का कारण व्यक्तिगत लाभ की आशा हो। 

एक और अनुभव

मेरा तीसरा अनुभव एक यूरोपी पुरुष से जुड़ा है जो करीब बीस साल से अफ्रीका में काम करते थे। उन्होंने वहाँ की महिला से विवाह किया था और उनके बच्चे भी थे, जिनमें वहाँ के कुछ गोद लिए हुए बच्चे भी थे। उन्होंने बहुत से बच्चों को छात्रवृति दिलवा कर यूरोप पढ़ने भेजा था। एक दिन उनके विरुद्ध शिकायत आई कि वह वहाँ अनाथाश्रम के बच्चों से यौन सम्बंध बनाते हैं। इस बात की जाँच के लिए वहाँ एक व्यक्ति को भेजा गया। तीन सप्ताह तक उस व्यक्ति ने वहाँ के बच्चों से, वहाँ काम करने वालों से, आदि से साक्षात्कार किये, और इस बारे में प्रश्न पूछे। पता चला कि आरोप लगाने वालों में कुछ लोगों का उनसे झगड़ा हुआ था, लेकिन किसी बच्चे से इसके बारे में बातचीत से कोई संदेहजनक बात नहीं निकली। आखिर में कुछ सबूत नहीं मिलने से यह जाँच बंद कर दी गयी और उनके विरुद्ध कुछ कार्यवाही नहीं की गई।

इस बात के चार-पाँच साल के बाद उस देश की सरकार ने उन्हें अपने देशवासियों की सेवा के लिए विषेश पुरस्कार दिया। इस बात को बीस-पच्चीस साल हो गये हैं और वह सज्जन, जो अब वृद्ध हैं, आज भी उसी देश में रहते हैं और उसी अनाथाश्रम में स्वयंसेवक की तरह काम करते हैं।

सच कहूँ तो आज भी मेरे मन में इस घटना के बारे में दुविधाएँ हैं, हालाँकि उनके अपने गोद लिए हुए बच्चे, जो अब व्यस्क हैं, कहते हैं कि उनके पिता पर लगे आरोप झूठे थे। आप बताईये कि आप इस मामले में क्या करते?

अंत में

मेरे लिए, व्यक्तिगत स्तर पर, इस विषय पर सबसे बड़ी दुविधा का कारण है कि जहाँ बलात्कार जैसे सबूत नहीं हों, किसी पर लगे आरोपों को कैसे जाँचा जाये? बाद में मन में संदेह रह जाता है, उसे निकालना असम्भव होता है, तो यह लगता है कि आरोप लगाना बहुत आसान है, लोग कुछ भी कह सकते हैं। लेकिन इसका दूसरा पहलू है कि जब कोई औरत, अतीत में हुई किसी बात को बताती है, तो उसके लिए यह कहना आसान नहीं होता, उसे कैसे गम्भीरता से न लिया जाये?

अंत में बात घूम-फ़िर कर वहीं आ जाती है कि उपन्यासों, फ़िल्मों या अखबारों या फेसबुक में यह बातें आसान लग सकती हैं, कि यह हुआ, ऐसा या वैसा करना चाहिए था। फेसबुक जैसे सोशल मीडिया में कुछ भी लिखना आसान है। लेकिन जब आप को निर्णय लेना पड़े तो यह कभी-कभी बहुत कठिन हो सकता है। 

पटना की घटना से जुड़ी बहस पर साहित्यकारों और साहित्य की बात करते हुए, मित्र ओम थानवी ने लिखा है, "अच्छा या बड़ा लेखक जाति, विचार, चरित्र, आचरण के बावजूद अच्छा या बड़ा होता है। कम-से-कम इस तरह के आधारों पर उसे त्याज्य या उपेक्षणीय नहीं माना जा सकता।" कुछ यही बात अन्य क्षेत्रों में काम करने वालों के लिए भी कही जा सकती है।

आप बताईये आप इस विषय के बारे में क्या सोचते हैं? 

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बुधवार, जून 11, 2025

लेखक की दुविधाएँ

बारह ड्राफ्ट के बाद, मेरा दूसरा उपन्यास लगभग तैयार है। इसे आज से इक्कीस साल पहले अंग्रेज़ी में लिखना शुरु किया था और तब इसमें कहानी थी एक नवयुवक की जो दिल्ली में अपनी नानी के पास बड़ा हुआ है और जिसने बचपन से सुना है कि उसके माता-पिता की विदेश में मृत्यु हो गई थी। 

समय के साथ, बार-बार लिखने से इसके कथानक में कुछ बदलाव आये हैं। जैसे कि नवयुवक के बदले, यह बीसवीं सदी के प्रारम्भ की उसकी नानी की कहानी बन गई है, जिसकी पृष्ठभूमि में आसाम के चाय बागान में काम करने वाली एक गिरमिटिया युवती की कहानी भी है। इस उपन्यास की कहानी सुन कर नीचे वाला कवर मेरी मित्र विमला दीपक ने बना कर दिया है।

इस आलेख के माध्यम से मैं आप से सलाह माँगना चाहता हूँ कि अगर मुझे लेखन से पैसा कमाने की आवश्यकता न हो, तो क्या उपन्यास को किसी प्रकाशक से छपवाना महत्वपूर्ण है या उसे अमेज़न जैसे आनलाईन पोर्टल से छपवाना भी चल सकता है?

मेरे फेसबुक मित्रों में बहुत से अनुभवी लेखक हैं, मैंने पहले सोचा कि उन्हें सीधा लिख कर सलाह माँगनी चाहिये, फ़िर मुझे लगा कि ऐसा करना ठीक नहीं होगा, क्योंकि कोई जब मेरे साथ ऐसा करता है तो मुझे अच्छा नहीं लगता, जबरदस्ती सी लगती है।  इसलिए सोचा कि इसके बारे में ब्लाग पर लिखूँ।

उपन्यास लिखने की यात्रा

इक्कीस साल पहले लिखा उपन्यास अधूरा था। उसके बाद, कई बार इस उपन्यास को लिखने की कोशिशें कीं लेकिन हर बार यह अधूरा ही रह जाता था।

तब मैं अपने आप से कहता था कि जब रिटायर होऊँगा, तब इसे लिखूँगा। रिटायर हुए भी सात-आठ साल बीत गये, लेकिन मेरा काम और यात्राएँ समाप्त नहीं हुईं। दो-ढाई साल पहले दो ऐसी बातें हुईं जिनसे मुझे लगा कि अगर सचमुच मैं अपने उपन्यास को लिखना चाहता हूँ तो मुझे बाकी के सब काम छोड़ने पड़ेंगे।

पहली बात काम से जुड़ी थी। मुझे एक देश में विकलांगों के लिए नई स्वास्थ्य सेवाओं को लागू करने का बड़ा काँट्रेक्ट मिला था, जिसके लिए तीन साल तक मैंने बहुत मेहनत की। मेरा काम पूरा हुआ लेकिन उस देश में चुनावों के बाद नयी सरकार आयी, तो उन्होंने हमारे सारे काम को रोक दिया क्योंकि उनकी दृष्टि में वह काम महत्वपूर्ण नहीं था। मुझे लगा कि मैंने जीवन के तीन साल बेकार कर दिये, मैंने पैसा कमाया पर मेहनत का कुछ फायदा नहीं हुआ।

दूसरी बात मेरे अपने स्वास्थ्य से जुड़ी थी। मेरी आँखों में रेटिना में घाव हो गये जिनसे दिखना कम हो गया और डर था कि वह घाव बढ़ेंगे तो लिखना-पढ़ना पूरा बन्द हो जायेगा। सौभाग्य से अभी तक वह घाव जैसे थे वैसे ही हैं, बढ़े नहीं हैं, इसलिए दिखता कुछ कम है लेकिन मेरा लिखना-पढ़ना जारी है।

इसलिए मैंने फैसला किया कि अब उपन्यास पूरे करने पर ही ध्यान दूँगा और हिन्दी में लिखूँगा। इस तरह से मैंने २०२३ में अपना पहला उपन्यास पूरा किया था। मित्र अरविंद मोहन जी की सहायता से दिल्ली के एक प्रकाशक ने दो साल पहले उसे छापने के लिए स्वीकार भी किया था, लेकिन पता नहीं कब छपेगा। अब मेरा दूसरा उपन्यास भी लगभग तैयार है।

मन की दुविधाएँ

मैं चाहता हूँ कि अधिक से अधिक लोग मेरे लिखे को पढ़ें, लेकिन मैं इन किताबों से कुछ कमाना नहीं चाहता। तो क्या मुझे अपने उपन्यास को प्रकाशकों के पास भेजना चाहिए? मुझे चिंता है कि प्रकाशक निर्णय लेने में कई महीने लगायेंगे और फ़िर छापने में न जाने कितने साल निकाल देंगे।

क्या इसे सीधा अमेज़न या उसके जैसे किसे भारतीय पोर्टल पर मुफ्त देना बेहतर नहीं होगा, ताकि जो इसे ईबुक रूप में पढ़ना चाहते हैं वह इसे मुफ्त डाउनलोड करें और अगर कोई छपी हुई किताब पढ़ना चाहे तो वह इसकी छपाई की कीमत दे कर छपवा ले? जिन्हें अनुभव है वह बतायें कि किस पोर्टल पर डालना बेहतर होगा?

उपन्यास पढ़ना चाहने वाले

अगर आप मेरे उपन्यास को ई-बुक या पीडीएफ रूप में पढ़ना चाहते हैं तो मुझे ईमेल भेजिये, मेरा पता है sunil(at)kalpana.it (ईमेल भेजते समय '(at)' के बदले में '@' लगा दीजिये)। अगर आप उसे पढ़ कर उसके बारे में अपनी आलोचना या सुझाव देंगे तो मुझे और भी अच्छा लगेगा। 

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मंगलवार, मई 21, 2024

किताब, चाय और यादें

हमारे घर में एक छोटा सा बाग है, मैं उसे रुमाली बाग कहता हूँ, क्योंकि वो छोटे से रुमाल जैसा है। उसमें एक झूला है, बाहर की सड़क की ओर पीठ किये, पौधों की क्यारी से लगा हुआ,  जिस पर हरी और सफेद धारियों वाले कुशन हैं, और सामने एक गोल मेज़ और दो कुर्सियाँ हैं, और तीन ओर पौधे लगे हैं। वहीं, एक कुर्सी को करीब खींच कर, उस पर चाय का प्याला रख कर, आज सुबह मैं झूले पर बैठा अपनी किताब पढ़ रहा था।

उपन्यास पढ़ने के लिए यह झूला मेरी सबसे प्रिय जगह है, लेकिन जब नॉन-फिक्शन पढ़ता हूँ तो यहाँ नहीं बैठता। वैसे यहाँ बैठने का मौका कम ही मिलता है, क्योंकि हमारे यहाँ आधा साल सर्दी चलती है, और जब सर्दी नहीं होती तो शायद पहाड़ों की वजह से बारिश बहुत होती है।

जब गर्मी आती है तो बाग में फ़ूल खिल जाते हैं, आसपास के पेड़ों में पक्षी घोंसले बनाते हैं और सुबह से चहचहाने लगते हैं। हमारे सामने वालों के यहाँ चीड़ के दो ऊँचे पेड़ हैं, मुझे उनसे ज़रा सी खुन्दक है क्योंकि उनकी वजह से, मुझे उनके पीछे वाला पहाड़ नहीं दिखता, लेकिन उनमें पक्षियों की पूरी कोलोनी बसती है, जिनके गीत गर्मियों के दिनों का पार्श्वसंगीत बन जाते हैं।

जब गर्मी आती है तो मच्छर भी आ जाते हैं, लेकिन अभी तक सुबह-शाम का तापमान दस-बारह डिग्री के आसपास घूम रहा है इसलिए इस वर्ष अभी तक मच्छर नहीं आये।

खैर, बात बाहर बैठ कर किताब पढ़ते हुए चाय पीने की शुरु थी। पढ़ते-पढ़ते, अपनी किताब को नीचे रख कर मैं सोचने लगा कि अगर कुछ दिन इस तरह से धूप निकलती रहे तो मैं वेनिस में कला-बिएन्नाले प्रदर्शनी को देखने जा सकता हूँ।  

यहीं से शुरु हुई मेरी सोयीं यादों के जगने की शुरुआत, जो कब, कहाँ, और किस बात से जाग जाती हैं, यह कहना कठिन होता है। आज उन यादों को जगाया हुसैन साहब की कला प्रदर्शनी के विचार ने। वेनिस बिएन्नाले की प्रदर्शनियों में इस बार दिल्ली के केएनएम संग्रहालय वालों की मकबूल फिदा हुसैन साहब के चित्रों की प्रदर्शनी भी है, जिसे देखना चाहता हूँ। यही सोचते हुए बचपन की एक बात याद आ आई।

क्नॉट प्लेस का पुराना कॉफी हाऊज़ ...

मेरा ख्याल है कि यह बात १९६३ या ६४ की है। उस समय दिल्ली में क्नॉट प्लेस में, जहाँ आज पालिका बाज़ार है, वहाँ पर प्रसिद्ध कॉफी हाऊज़ होता था, जिसके आसपास अर्ध-चक्र में लकड़ी के खोखे बने थे जिनमें विभिन्न राज्यों के एम्पोरियम थे। मेरे ख्याल में उस समय बाबा खड़गसिंह मार्ग पर नये भवनों के निर्माण का काम चल रहा था। तब मैं नौ-दस साल का था। खैर, जिस शाम की मैं बात कर रहा हूँ, उस शाम मेरे मम्मी-पापा के साथ पिता के कुछ पत्रकार-लेखक मित्र थे और हुसैन साहब भी बैठे थे।

फ़िर सब लोग उठे कि चलो त्रिवेणी कला संगम चलो, वहाँ पर हुसैन साहब की कोई प्रदर्शनी लगी थी जिसका उद्घाटन होना था। हम साथ चल रहे थे तो मुझे हुसैन साहब का नंगे पाँव चलना बहुत अजीब लगा था। हम सब लोग बारहखम्बा रोड से होते हुए पैदल ही त्रिवेणी कला संगम आये। प्रदर्शनी के उद्घाटन के लिए वहाँ पर भारत के उपराष्ट्रपति डॉ. ज़ाकिर हुसैन आये थे। तब सिक्योरिटी की चिंता नहीं होती थी। मैं भी हुसैन साहब के चित्रों को देख रहा था जब डॉ. ज़ाकिर हुसैन जी ने मुझे रोका, मुझसे पूछा कि मुझे वह चित्र कैसे लग रहे थे? मैं झूठ नहीं बोल पाया, बोला कि पता नहीं यह क्या बनाया है, शायद कोई जेल बनायी है जिसके आसपास यह नुकीले काँटों वाली तारे लगी हैं। हुसैन साहब ने मेरी आलोचना सुनी तो मुस्कराये, डॉ. ज़ाकिर हुसैन साहब भी हँसे।

हालाँकि मुझे हुसैन साहब की उस प्रदर्शनी के चित्र अच्छे नहीं लगे थे लेकिन मैंने उनके कुछ अन्य चित्र देखे थे, जैसे कि हैदराबाद में बदरीविशाल पित्ती जी के घर में, जो मुझे अच्छे लगते थे। रामायण पर बनी उनकी चित्र-श्रिंखला मुझे बहुत अच्छी लगी थी।

रघुवीर जी, अशोक जी, जुगनू जी ...

हुसैन जी की चित्र-प्रदर्शनी से शुरु हुई यादें वहाँ से पापा के मित्रों तक पहुँच गयीं। मुझे पापा के साथ क्नॉट प्लेस के कॉफी हाउज़ जाने का मौका शायद दो-तीन बार ही मिला था, वे मित्र-बैठकें बच्चों के लिए नहीं होती थीं।  पापा के कुछ मित्र लेखकों से मुलाकात ७ रकाबगंज रोड पर हुई थी, जहाँ डॉ. राम मनोहर लोहिया का घर था और शायद उनके सर्वैंट क्वाटर में समाजवादी पार्टी की पत्रिका "जन" का दफ्तर था जिसमें पापा काम करते थे। उस घर में एक बार जब खान अब्दुल गफ्फार साहब आये थे तो उन्हें देखा था। 

अधिकतर लोगों से मुलाकात घर पर होती थी, जब वह पापा से मिलने आते थे। राजेन्द्र नगर में सरवेश्वर दयाल सक्सेना जी हमारे घर के पास रहते थे। कभी-कभी घर आते, एक-दो बार राशन की दुकान पर भी मिले। एक सुबह मुझे उनका मफलर लपेटे, मुख पर बंदर टोपी, सलेटी स्वैटर और धारीवाला पजामे में घर आना याद है। तब मैं उनकी ओर ध्यान नहीं देता था, अब जब उनकी कविताएँ पढ़ता हूँ तो सोचता हूँ कि वह मिलें तो उनसे कितनी बातें करना चाहूँगा।

ऐसी ही बात कुछ रघुवीर सहाय के साथ भी थी, वह भी अक्सर घर आते थे। तब मुझे कुछ नहीं मालूम था कि सर्वेश्वर जी या रघुवीर जी, क्या लिखते थे।

केवल मोहन राकेश जी, जो साठ के दशक में राजेन्द्र नगर में आर-ब्लॉक में रहते थे, केवल उनके लेखन से मेरा कुछ परिचय था, उनके घर जा कर लगता था कि हाँ यह प्रसिद्ध लेखक हैं। उन दिनों में उनकी बेटी पूर्वा का मुडंन हुआ था। जब उनकी अचानक मृत्यु हुई थी तो बहुत धक्का लगा था।

बंगला देश युद्ध के दौरान पापा "दिनमान" के लिए कई बार बंगलादेश गये थे। फ़िर बिहार छात्र आंदोलन के समय वह जेपी के साथ थे। इस वजह से छात्र आंदोलन से जुड़े बिहार के लोग घर आने लगे थे। उनमें से अधिकांश नाम भूल गया हूँ, केवल जुगनू शारदेय और अख्तर भाई के नाम याद हैं। फ़िर १९७५ में अचानक पापा भी चले गये तो बहुत से रिश्ते टूट गये। पहले वाले लोगों में से केवल अशोक सेकसरिया और जुगनू जी से कुछ सम्बंध बने रहे। एक बार मैं कलकत्ता में अशोक जी के १६ लार्ड सिन्हा वाले घर में कुछ दिन तक ठहरा था।

लेकिन वे सब भी क्या लिखते थे, क्या सोचते थे, उस समय मुझे कुछ मालूम नहीं था। उन दिनों में मैं मेडिकल कॉलेज में था, लेखन, साहित्य और राजनीति आदि के बारे में सोचने का शायद समय ही नहीं था?

गौहाटी में ...

जुगनू जी की बात से मुझे मेरा गौहाटी वाला घर याद आ गया। २०१५ में जब मैं गौहाटी में रहता था तो जुगनू जी मेरे पास रहने आये थे। उन दिनों में मैंने निर्णय किया था कि अपने घर के सब काम मैं खुद करूँगा। तीन कमरों का घर था। खाना बनाने के साथ, मैं खुद ही घर के सब काम जैसे कपड़े धोना, सफाई-झाड़ू-पौंछा, आदि भी करता था। सुबह सब काम करके संस्था के दफ्तर गया। शाम को घर लौटा तो सारे घर में सिगरेट की राख और टुकड़े बिखरे थे। मैंने जुगनू जी से कहा, कि सुबह मैंने इतनी मेहनत से झाड़ू लगाया, पौंछा लगाया, और आप से हाथ में अपनी एशट्रे भी नहीं ली जाती कि अपनी सिगरेट की राख को उसमें झाड़ें? बाद में मुझे शर्म भी आयी कि मुझे उनसे इस तरह से नहीं बोलना चाहिये था, तो उनसे क्षमा मांगी। खैर दो दिन के बाद वह किसी अन्य व्यक्ति के पास ठहरने चले गये।
 
जुगनू जी वह मेरी आखिरी मुलाकात थी। कुछ साल पहले फेसबुक से पता चला कि वह नहीं रहे।

लौट कर बुद्धू ...

कहाँ से शुरु हुई मेरी यादों की लड़ी, कहाँ पहुँच गयी। खैर, यादों का एक सुख है, कितनी भी दूर ले जायें, वहाँ से लौटने में समय नहीं लगता और मैं लौट कर वापस अपने रुमाली बाग में अपने उपन्यास पर आ गया।
 
असली बात तो वेनिस में हुसैन जी के चित्रों की प्रदर्शनी है, यह कमब्खत बारिश रुके तो वहाँ जाने का कार्यक्रम बनाना है। 

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मंगलवार, मार्च 26, 2024

एक बार फ़िर २५ मार्च की होली

२५ मार्च १९७५ को भी होली का दिन था। उस दिन सुबह पापा (ओमप्रकाश दीपक) को ढाका जाना था, लेकिन रात में उन्हें हार्ट अटैक हुआ था।

उन दिनों वह एंडियन एक्सप्रेस की अंग्रेज़ी की साप्ताहिक पत्रिका एवरीमैन के लिए काम कर रहे थे, और सुबह जब ड्राईवर उन्हें हवाई अड्डे ले जाने आया था तब तक वह अपनी लम्बी अंतिम यात्रा के लिए निकल चुके थे। उस समय वह ४७ साल के थे।

कल, एक बार फ़िर, २५ मार्च की होली थी। कल जब होली की बात हो रही थी तब मुझे वह रात याद आई थी, उनकी उखड़ती हुई साँस की आवाज़ और साथ में बैठी माँ, उन्हें पुकारती हुईं, उनकी छाती को मलती हुई।

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परिवार की तस्वीर - यह एक तस्वीर है जिसमें हम सब लोग हैं, दादी, पापा, मम्मी और हम तीनों। कुछ माह पहले मेरे बेटे ने किसी सोफ्टवैर से इसमें रंग भर दिये थे। यह उस साल की है जब नेहरू जी की मृत्यु हुई थी, और इसे मेरठ में छिपीटैंक के एक स्टूडियो में खींचा गया था।

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पापा अगर अब होते तो ९७ साल के होते। मन ही मन में उनसे मेरी बातचीत चलती रहती है। बहुत दुनिया घूमी और भिन्न विचारधाराएँ देशों को कहाँ ले जाती है, करीब से देखने का मौका मिला। जीवन में अलग-अलग सोच वाले लोगों के साथ काम करने का मौका भी मिला, उनके आदर्शों और सोच के बारे में मेरी अपनी व्यक्तिगत सोच भी बनी।

जब इसके बारे में सोचता हूँ तो उनकी कमी महसूस होती है - मैं मन में उनसे अपनी सोच की बात कहता हूँ लेकिन उनका उत्तर नहीं मिलता। मैं सत्तर साल का हो रहा हूँ लेकिन स्मृतियों वाले पापा अभी भी ४७ साल पर ही रुके हैं, तो मैं उन्हें कहता हूँ कि पापा मेरे जीवन का अनुभव आप से अधिक हो गया। 

अक्सर जब कोई अच्छी किताब पढ़ता हूँ तब भी मन में उनसे बात होती है, सोचता हूँ कि उन्हें वह किताब अच्छी लगती या नहीं? शायद सभी बच्चे ऐसा ही करते हैं, हमारी उम्र चाहे कितनी भी हो जाये, मन ही मन अपने माता-पिता से बातें करना जीवन भर चलता रहता है?

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पापा की २३वीं बरसी पर, १९९८ में माँ ने अपनी डायरी में लिखा था -

आज सचमुच जीवन का सफ़र जहाँ से शुरु किया था उसकी बहुत याद आ रही है। कश्यप भार्गव तुम्हारा प्रिय मित्र। हमारी शादी में उसकी माँ और बहने दोनो थीं। एक बार जानकीदेवी कॉलेज से निकल रही थी तो सविता मिली थी। तुम्हारे जाने के साल भर बाद ही, उसी तिथि और उसी समय में ही, कश्यप भी नहीं रहा था। वैसे ही दिल के दौरे में वही 25 मार्च को, वह भी नहीं रहा। क्या कहती उससे। अकेले ही बच्चों का पालन पोषण किया होगा उसने। कई बार मन में आया कि उसके स्कूल, बाल भारती में , जा कर पता लगाऊँ, लेकिन हिम्मत नहीं पड़ी उससे मिलने की।

ज़िन्दगी में दूसरे लोग ही नहीं खुद अपनी नज़रें, अपना दिल और अपने अहसास भी धोखा दे जाते हैं तो इसका कुछ हो भी तो नहीं सकता। ज़िन्दगी को बेहद गम्भीरता से लेने वाले और उस पर लम्बी बहसें करने वाला कश्पी जो मुझे लखनऊ छोड़ने गया था और लखनऊ में साथ भी रहा था। फ़ैज़ाबाद में भी हमारी शादी में भी उसने मेरे भाई की भूमिका निभाई थी। मुझे ढेर सारा प्यार और आशीर्वाद दिया था उसने। जीवन के कुछ महत्वपूर्ण निर्णय तुमने और कश्यपी ने कैसे लिये थे? आज भी मुझे इस पर हैरानी होती है।

तुम्हारी मृत्यु के बाद सविता को ले कर आया था और जाते हुए कहने लगा कि अब मेरी ही बारी है, सूरजप्रकाश और दीपक तो नहीं रहे, मैं अकेला क्या करूँगा। और ठीक एक वर्ष बाद तुम्हारे जैसा वही समय, वही दिन, वह भी चला गया। सचमुच उसकी बारी आ गयी थी. इस पर हैरान हूँ।

पापा के उस मित्र कश्पी (कश्यप भार्गव) और दिल्ली के बालभारती स्कूल में पढ़ाने वाली उनकी पत्नी सविता भार्गव से कभी कहीं मिलने की मुझे कोई याद नहीं, न ही कभी उनके बच्चों से कभी कोई परिचय हुआ। जब भी माँ कश्पी की बात करती थी तो मन में यही प्रश्न उठता था कि वह पापा के इतने अच्छे दोस्त थे तो हमारी कभी उनसे मुलाकात या जान पहचान कैसे नहीं हुई?

उनके बच्चे कहाँ होंगे? मन में आता है कि उनसे मिलना अच्छा लगेगा।

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जब पापा गुज़रे थे तब मैं मेडिकल कॉलेज के तीसरे वर्ष में पढ़ रहा था। उन दिनों में पापा जयप्रकाश नारायण जी के साथ बिहार में बहुत समय बिता रहे थे, वे बिहार छात्र आन्दोलन और सम्पूर्ण क्रांति वाले दिन थे। जे.पी. के कहने से ही इंडियन एक्सप्रेस के गुएनका जी ने मेरी मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई के लिए छात्रवृति स्वीकार कर ली थी, वरना शायद डॉक्टर बनने का सपना कठिनाई से पूरा होता।

शायद इसीलिए सारा जीवन मन में लगता रहा है कि इंडियन एक्सप्रेस "हमारा अपना" अखबार है। यादें कहाँ से शुरु होती हैं और कहाँ चली जाती हैं!


शनिवार, अगस्त 13, 2022

यादों की संध्या

संध्या की सैर को मैं यादों का समय कहता हूँ। सारा दिन कुछ न कुछ व्यस्तता चलती रहती है, अन्य कुछ काम नहीं हो तो लिखने-पढ़ने की व्यस्तता। सैर का समय अकेले रहने और सोचने का समय बन जाता है। शायद उम्र का असर है कि जिन बातों और लोगों के बारे में ज़िन्दगी की भाग-दौड़ में दशकों से नहीं सोचा था, अब बुढ़ापे में वह सब यादें अचानक ही उभर आती हैं।

यादों को जगाने के लिए "क्यू" यानि संकेत की आवश्यकता होती है, वह क्यू कोई गंध, खाना, दृश्य, कुछ भी हो सकता है, लेकिन मेरे लिए अक्सर वह क्यू कोई पुराना हिंदी फ़िल्म का गीत होता है। बचपन के खेल, स्कूल और कॉलेज के दिन, दोस्तों के साथ मस्ती, पारिवारिक घटनाएँ, जीवन के हर महत्वपूर्ण समय की यादों के साथ उस समय की फ़िल्मों के गाने भी दिमाग के बक्से में बंद हो जाते हैं। इस आलेख में एक शाम की सैर और कुछ छोटी-बड़ी यादों की बातें हैं।


आज सुबह से आसमान बादलों से ढका था, सुहावना मौसम हो रहा था, हवा में हल्की ठँडक थी। सारा दिन बादल रहे लेकिन जल की एक बूँद भी नहीं गिरी। शाम को जब मेरा सैर का समय आया तो हल्की बूँदाबाँदी शुरु हुई। पत्नी ने कहा कि जाना है तो छतरी ले कर जाओ, लेकिन मैंने सोचा कि थोड़ी देर प्रतीक्षा करके देखते हैं, अगर यह बूँदाबाँदी नहीं रुकेगी तो छतरी ले कर ही जाऊँगा। पंद्रह मिनट प्रतीक्षा के बाद बाहर झाँका तो बादलों के बीच में से नीला आसमान झाँकने लगा था। इस वर्ष अक्सर यही हो रहा है कि बादल कम आते हैं और अक्सर बिना बरसे ही लौट जाते हैं। हमारे शहर का इतिहास जानने वाले लोग कहते हैं कि ऐसा पहली बार हुआ कि हमारे घर के पीछे बहने वाली नदी में करीब आठ महीनों से पानी नहीं है। पूरे पश्चिमी यूरोप में यही हाल है।

खैर मैंने देखा कि बारिश नहीं हो रही तो तुरंत जूते पहने और हेडफ़ोन लगा लिया। शाम की सैर का समय कुछ न कुछ सुनने का समय है। कभी डाऊनलोड किये हुए हिंदी, अंग्रेज़ी या इतालवी गाने सुनता हूँ, कभी हिंदी के रेडियो स्टेशन तो कभी क्लब हाऊस पर कोई बातचीत या गाने के कार्यक्रम। आज मन किया विविध भारती सुनने का। यहाँ शाम के साढ़े सात बजे थे, तो मुम्बई से प्रसारित होने वाले विविध भारती के लिए रात के ग्यारह बजे थे और चूँकि आज गुरुवार है, मुझे मालूम था कि इस समय सप्ताहिक "विविधा" कार्यक्रम आ रहा होगा, जिसमें अक्सर हिंदी फ़िल्मों से जुड़ी हस्तियों के साक्षात्कारों की पुरानी रिकोर्डिंग सुनायी जाती हैं।

मोबाईल पर विविध भारती का एप्प खोला तो कार्यक्रम शुरु हो चुका हो चुका था और पुराने फ़िल्म निर्देशक, लेखक तथा अभिनेता किशोर साहू की बात हो रही थी। उनका नाम सुनते ही मन में "गाईड" फ़िल्म की बचपन एक याद उभर आयी। तब हम लोग पुरानी दिल्ली में फ़िल्मिस्तान सिनेमा के पास रहते थे। वह घर हमने १९६६ में छोड़ा था, इसका मतलब है कि वह याद इससे पहले की थी। मन में उभरी तस्वीर में एक दोपहर थी, नानी चारपाई पर चद्दर बिछा कर, उस पर दाल की वणियाँ बना कर सुखाने के लिए रख रही थी। बारामदे के पीछे खिड़की पर ट्राँज़िस्टर बज रहा था जिस पर उस दिन पहली बार किशोर कुमार और लता मँगेशकर का गाया गीत, "काँटों से खींच के यह आँचल, तोड़ के बँधन बाँधी पायल" सुना था। एक पल के लिए मैं उस आंगन में नानी को देखता हुआ सात-आठ साल का बच्चा बन गया था, यह याद इतनी जीवंत थी।

बचपन में पापा हैदराबाद में थे और माँ अध्यापिका-प्रशिक्षण का कोर्स कर रही थी और उसके बाद उन्हें नवादा गाँव के नगरपालिका के प्राथमिक स्कूल में नौकरी मिली थी, तो मैं और मेरी बहन, हम दोनों नानी के पास ही रहते थे। नानी और माँ में केवल अठारह या उन्निस साल का अंतर था, इसलिए मेरी सबसे छोटी मौसी उम्र में मेरी बड़ी बहन से छोटी थी।

नानी जब पैदा हुई थी तो उनकी माँ चल बसी थीं, इसलिए नानी अपनी मौसी के पास बड़ी हुईं थीं और उनके मौसेरे भाई, इन्द्रसेन जौहर, अपने समय के प्रसिद्ध फ़िल्म अभिनेता और निर्देशक बने थे। नानी की शादी करवाने के बाद उनके विधुर पिता ने नानी की उम्र की लड़की से शादी की थी, इस तरह से नानी की पहली संतानें भी उनके पिता की अन्य संतानों से उम्र में बड़ी थीं, और नानी के सबसे छोटे भाई मेरे हमउम्र थे।

नानी सुबह उठ कर अंगीठी जलाती थी। घर में एक कोठरी थी, जिसमें कच्चा और पक्का कोयला रखा होता था। अंगीठी की जाली पर नानी पहले थोड़ा सा कच्चा कोयला रखती, और उसके ऊपर पक्का कोयला। फ़िर नीचे राख वाली जगह पर कागज़ जलाती जिससे कच्चे कोयले आग पकड़ लेते। वह राख भी जमा की जाती थी, उससे बर्तन धोये जाते थे और उसे गाय या भैंस के गोबर में मिला कर उपले बनाये जाते थे।

उपलों को नानी अपनी पश्चिमी पंजाब के झेलम जिले की भाषा में "गोया" कहती थी। लेकिन उस घर में उपले कम ही बनते थे शायद क्योंकि शहर में गोबर आसानी से नहीं मिलता था। नानी का गाँव वाला घर जिस पर नाना ने "दीवान फार्म" का बोर्ड लगा रखा था, नवादा और नजफ़ गढ़ के बीच में ककरौला मोड़ नाम की जगह से थोड़ा पहले था। जहाँ नानी की रसोई थी, वहाँ अब "द्वारका मोड़" नाम के दिल्ली मेट्रो स्टेशन की दायीं सीढ़ियाँ हैं और जहाँ उनका बड़ा वाला कूँआ था वहाँ अब मेरे मामा के बनाया एक स्कूल चलता है। बचपन में वहाँ मैं अपनी छोटी मौसियों के साथ तसला ले कर गोबर उठाने जाता था। अगर आप ने कभी गोबर नहीं उठाया तो शायद आप को उसे हाथ से छूने या उठाने का सोच कर अज़ीब लगे, लेकिन बचपन में मुझे ताज़े गोबर की गर्मी को हाथ से छूना बहुत अच्छा लगता था। गाँव वाले उस घर में, दूध, दाल, सब्जी, हर चीज़ में उपलों की गंध आती थी।

आज उत्तरपूर्वी इटली में, दिल्ली से हज़ारों मील दूर, किशोर साहू के नाम और उनकी बातों से, साठ वर्ष पहले की यह सब यादें एक पल के लिए मन में कौंध गयीं, एक क्षण के लिए उपलों की गंध वाले उस खाने की वह सुगंध भी जीवित हो उठी।

किशोर साहू के बाद बात हुई पुरानी फ़िल्म अभिनेत्री मनोरमा की। उनका मुँह बना कर और आँखें मटका कर अभिनय करना मुझे अच्छा नहीं लगता था। उनकी बातें सुन रहा था तो मन में हमारे करोल बाग वाले घर की यादें उभर आयीं। तब दिल्ली में नियमित दूरदर्शन के कार्यक्रम आते थे, जिनमें मेरे सबसे प्रिय कार्यक्रम थे चित्रहार और फ़िल्में। छयासठ से अड़सठ तक हम उस घर में तीन साल रहे और उन तीन सालों में दूरदर्शन पर बहुत फ़िल्में देखीं। तब रंगीन टीवी नहीं होता था और टीवी कम ही घरों में थे। बिना जान पहचान के हम बच्चे मोहल्ले के आसपास के किसी भी टीवी वाले घर में घुस जाते थे, कभी किसी ने मना नहीं किया। हम लोग टीवी के सामने ज़मीन पर पालथी मार कर बैठ जाते।

तब रामजस रोड पर एक स्कूल में भी शाम को फ़िल्म आती तो वहाँ की एक अध्यापिका आ कर टीवी वाला कमरा खोल देती थीं, वहाँ खूब भीड़ जमती। उन सालों की दूरदर्शन पर देखी मेरी प्रिय फ़िल्मों में से वैजयंतीमाला की "मधुमति", मधुबाला की "महल", नूतन की "सीमा" और राजकपूर की "जागते रहो" थीं।

उन फ़िल्मों के बारे में सोचते हुए, उस समय सैर करते करते मैं हमारी सूखी हुई नदी के पुल पर पहुँच गया। वहाँ खड़े हो कर पहाड़ों के पीछे डूबते सूरज को देखना मुझे बहुत अच्छा लगता है, क्योंकि उस जगह पर पहाड़ों से घाटी में नीचे आती हुई बढ़िया हवा आती है। इस साल पानी न होने से पहले तो नदी के पत्थरों के बीच में लम्बी घास उग आयी थी, शायद उसे नदी के तल के नीचे की धरती में छुपी उमस मिल गयी थी। फ़िर भी जब पानी नहीं बरसा तो वह घास बहुत सी जगह पर सूख कर पीली सी हो गयी है, इस तरह से पुल से देखो तो संध्या के डूबते सूरज की रोशनी में नदी के तल पर बिछी घास के हरे और पीले रंग बहुत सुंदर लगते हैं। नदी के किनारे लगे पेड़ों के पत्ते जब सर्दी शुरु होती है तो सितम्बर के अंत में पीले और लाल रंग के हो कर गिर जाते हैं, लेकिन इस साल सूखे की वजह से अभी अगस्त के महीने में ही वह पत्ते पीले पड़ रहे हैं। बादलों से ढके आकश में प्रकृति के यह सारे रंग बहुत मनोरम लगते हैं।



पुल पर ही खड़ा था, जब विविध भारती पर आ रहे कार्यक्रम में शम्मी कपूर की बात होने लगी। उनकी एक पुराने साक्षात्कार की रिकार्डिंग सुनवायी जा रही थी। थोड़ा सा आश्चर्य हुआ यह जान कर कि वह अच्छा गाते थे। उस साक्षात्कार में उन्होंने "तीसरी मंजिल", "एन ईवनिंग इन पैरिस" जैसी फ़िल्मों के कुछ गाने गा कर सुनाये।

शम्मी कपूर के नाम से उनकी फ़िल्म "कश्मीर की कली" और फ़िर नानी के घर की याद आ गयी। घर के पास, ईदगाह को जाने वाली सड़क के पार एक फायर ब्रिगेड का स्टेशन होता था, जिसके सामने मैं सुबह स्कूल की बस की प्रतीक्षा करता था। वहीं पर फायरब्रिगेड में काम करने वाले एक सरदार जी से जानपहचान हो गयी थी। उनके पास एक छोटा सा पॉकेट साईज़ का ट्राँज़िस्टर था जिसमें इयरफ़ोन लगा कर सुनते थे। उन्होंने एक दिन मुझे वह इयरफ़ोन लगा कर रेडियो सुनवाया तो उस समय उसमें "कश्मीर की कली" फ़िल्म का गीत आ रहा था, "यह चाँद सा रोशन चेहरा, ज़ुल्फ़ों का रंग सुनहरा"। आज शम्मी कपूर जी की आवाज़ सुनी तो अचानक उस गीत को सुनने की वह याद आ गयी।

जब हम लोग करोल बाग में रहने आये, उन दिनों में मैं रेडियो पर नयी फ़िल्मों के गाने सुनने का दीवाना था, कोई भी गाना एक बार सुनता था तो उसकी धुन, शब्द, फ़िल्म का नाम, गाने वाले, लेखक, सब कुछ याद हो जाता था, इसलिए जब अंताक्षरी खेलते तो मैं उसमें चैम्पियन था। उन्हीं दिनों में दूरदर्शन पर पुरानी फ़िल्में देखने लगे थे तो सपने देखता कि जब बड़ा होऊँगा और पास में पैसा होगा तो सब फ़िल्मों को देखूँगा। आज तकनीकी ने इतनी तरक्की कर ली कि वह सारी फ़िल्में जो बचपन में देखना चाहता था और नहीं देख पाया था, अब जब चाहूँ तो यूट्यूब पर उनको देख सकता हूँ, तो क्यों नहीं देखता?

सैर से वापस घर लौटते समय सोच रहा था कि इन पचास-साठ सालों में दुनिया कितनी बदल गयी। बचपन का वह मैं, अगर उसे मालूम होता कि एक समय ऐसा भी आयेगा कि दुनिया में कहीं भी, किसी से बात करलो, जो मन आये वह संगीत सुन लो या फ़िल्म देख लो, तो उसे कितनी खुशी होती, और वह क्या क्या ख्याली पुलाव पकाता। 

अन्य दिनों में इस तरह की यादें, घर लौटने के दस मिनट में रात को देखे सपनों की तरह गुम हो जाती हैं, लेकिन आज सोचा है कि अपने ब्लाग के लिए इन्हें शब्दों में बाँध लूँगा।

शनिवार, जून 11, 2022

फ़िल्मी दुखड़े

एक समय था जब मुझे फिल्म देखना बहुत अच्छा लगता था, लेकिन फ़िर जाने क्या हुआ, मुझे फ़िल्में देखने से कुछ विरक्ति सी हो गयी है। कहते थे कि कोविड में सूंघने की शक्ति चली जाती है, वैसे ही मुझे शक है कि किसी रोग की वजह से मुझे अब फ़िल्म देखना अच्छा नहीं लगता। 


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बचपन में सिनेमाहाल में पहली फ़िल्म देखी थी, दिल्ली के झँडेवालान में स्थित नाज़ सिनेमा पर, वह थी भारत भूषण और मीना कुमारी की "बैजू बावरा"। उस फ़िल्म से कुछ भी याद नहीं है केवल अंतिम दृश्य याद है जिसमें मीना कुमारी नदी में बह जाती है। इस फ़िल्म के बारे में खोजा तो देखा कि यह फ़िल्म 1952 में आयी थी, जब मैं पैदा नहीं हुआ था, जबकि मेरे विचार में मैं अपनी मम्मी और उनकी सहेली के साथ इस फ़िल्म को 1959-60 में देखने गया था।

तब हम लोग झँडेवालान से फिल्मिस्तान जाने वाली सड़क पर बाँयी ओर जहाँ कब्रिस्तान है उसके साथ वाली सड़क पर रहते थे, तो बैजू बावारा के बाद नाज़ पर बहुत सी फ़िल्में देखीं। उन सब फ़िल्मों में सबसे यादगार फ़िल्म थी बासू भट्टाचार्य की "अनुभव", जिसे देखने मैं अपनी मँजू दीदी और उनके बेटे मुकुल के साथ गया था, जो तब दो या तीन साल का था। बड़े हो कर वही मुकुल जाना माना फोटोग्राफर तथा डाक्युमैंटरी फ़िल्मों का निर्देशक बना, लेकिन तब उसे वह फ़िल्म समझ नहीं आयी थी और वह उसके समाप्त होने की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा था। "फ़िल्म कब खत्म होगी" के उसके प्रश्न पर मँजू दीदी ने कहा "जब झँडा आयेगा"। तब फ़िल्मों के अंत में झँडा आता था और राष्ट्रगान होता था, तो मुकुल जी हर पाँच दस मिनट में पूछते, "अन्ना, झँडा कब आयेगा?" उस फ़िल्म का मुझे कुछ और याद नहीं, लेकिन झँडा कब आयेगा वाला प्रश्न नहीं भूलता।

खैर, बचपन की अधिकाँश फ़िल्में तो दिल्ली में दूरदर्शन में देखीं थीं। साठ के दशक में जब टीवी पर बुधवार को चित्राहार, शनिवार रात को हिंदी फ़िल्म और रविवार दोपहर को प्रादेशिक भाषा की फ़िल्में आती थीं तो हमारे घर में टीवी नहीं था, अड़ोस पड़ोस में लोगों के घर जा कर उनके ड्राईंगरूम में सब बच्चे सामने ज़मीन पर बैठ कर यह कार्यक्रम देखते थे। इस तरह से जाने कितने लोगों से, जिनसे अन्य कोई जान पहचान नहीं थी, तब भी हम बच्चे लोग उनके घरों में घुस जाते थे, और वह लोग भी खुशी से हमको घरों में घुसने देते थे। करोल बाग वाले घर में थे तो वहाँ एक नगरपालिका के स्कूल में टीवी था, अक्सर वहाँ भी जा कर फ़िल्में देखते थे। राजेन्द्र नगर वाले घर में रहते थे तब एक दो बार किसी ने अपने घर में टीवी देखने से मना किया था तो लगता था कि कितने वाहियात और स्वार्थी लोग हैं, अगर इनके टीवी को और लोगों ने भी देख लिया तो इनका क्या चला जायेगा?

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जब विदेश आया तो हिंदी फ़िल्मों की कमी, खाने में मिर्च मसालों की कमी से भी अधिक खलती थी। जब फ़िल्मों के वीडियो कैसेट बनने लगे तो लगा कि कोई खजाना मिल गया हो। हर वर्ष जब भारत से लौट कर आता तो सूटकेस फ़िल्मों के वीडियो कैसेटों से भरा होता था, उनसे से पुरानी फ़िल्मों के कैसेट तो अच्छे वाले मिलते थे, लेकिन नयी फ़िल्मों के कैसेट तो अधिकतर पायरेटिड होते थे, जिनमें छवि स्पष्ट नहीं होती थी। कुछ सालों के बाद उनमें जाँघियों-बनियानों की पब्लिसिटी भी आने लगी, तो टीवी स्क्रीन के ऊपर वाले हिस्से में माधुरी दीक्षित या श्रीदेवी अपने कमाल दिखातीं, और नीचे वाले हिस्से में जाँघिये बनियानें इधर से उधर फुदकतीं।

बाद में जब फ़िल्मों की वीसीडी और फ़िर उसके बाद डीवीडी आने लगीं तो फ़िल्में लाना आसान हो गया था, पर पायेरेटिड फ़िल्में देखने की समस्या का हल नहीं हुआ, हालाँकि वीडियों कैसेटों के मुकाबले में फ़िल्मों की छवि बेहतर दिखती थी।

तब यह प्रश्न उठा कि पुराने वीडियो कैसेटों का क्या किया जाये। कुछ तो मित्रों को बाँटीं लेकिन अधिकतर को कूड़े में फ़ैंका। केवल तीन वीडियो कैसेट नहीं फ़ैंके, क्योंकि वह मेरी सबसे प्रिय फ़िल्में थीं जिन्हें बीसियों बार देखा था - बँदिनी, साहिब बीबी और गुलाम और अपने पराये। बहुत सालों बाद जब घर में वीडियो कैसेट प्लैयर ही नहीं रहा तो मन मार कर उनको बेसमैंट के स्टोर रूम की अलमारी में रख दिया, कई सालों के बाद मेरी पत्नी ने उन्हें फ़ैंका, तब तक उन पर फँगस उग आयी थी।

उन दिनों में कुछ सालों के लिए लँडन में एक स्वयंसेवी संस्था का प्रैसिडैंट चुना गया था तो अक्सर वहाँ जाना होता था। तब साऊथहाल जा कर वहाँ से नयी फ़िल्मों की पायरेटेड सीडी ले कर आता था। कुछ सालों में घर में इतनी सीडी हो गयीं थीं तो उनको रखने की जगह नहीं बची थी। जब इंटरनेट से फ़िल्म डाऊनलोड करने का समय आया, तो धीरे धीरे नयी सीडी खरीदना बँद हो गया। घर में जो हज़ारों सीडी रखी थीं, फ़िर से उन्हें कुछ मित्रों में बाँटा, अधिकतर को कूड़े में फ़ैंका, लेकिन अभी भी करीब एक सौ सीडी हमारे घर के ऊपर वाले एटिक में एक बक्से में बँद रखी हैं। कभी कभी वहाँ कुछ सामान खोजते हुए जाता हूँ तो उनके कवर की तस्वीरों को देख कर पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं, बस इसी लिए उन्हें फ़ैंकने का मन नहीं करता।

आजकल फ़िल्में देखना तो और भी आसान हो गया है। अधिकतर पुरानी फ़िल्में, जिनमें तीन चार साल पहले वाली फ़िल्में भी आती हैं, वह सब यूट्यूब पर उपलब्ध हैं। नयी फ़िल्में नेटफ्लिक्स, प्राईम आदि पर मिल जाती हैं। जैसे जैसे नयी फ़िल्में देखना आसान हुआ है, मेरी फ़िल्म देखने की रुचि रास्ते में ही कहीं खो गयी है।

बहुत समय के बाद, कुछ दिन पहले क्रिकेट पर बनी एक फ़िल्म '83 एक बार में ही शुरु से अंत तक पूरी देखी। एक अन्य फ़िल्म देखी आर.आर.आर. (RRR) लेकिन एक बार में नहीं देखी, टुकड़ों में बाँट कर तीन-चार दिनों में देखी, और उसके थोड़े से हिस्सों को ही फास्टफोरवर्ड किया। दो सप्ताह पहले गँगूबाई देखनी शुरु की थी, अभी तक पूरी नहीं देखी।

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फ़िल्मों में कुछ भी टैंशन या हिंसा की बात हो तो मेरा दिल धकधक करने लगता है, मुझसे वह फ़िल्म देखी नहीं जाती। अनिल कपूर की "थार" देखनी शुरु की थी तो बीच में ही रोक दी, लगा कि उसे आगे देखना मेरे बस की बात नहीं है। केवल नयी फ़िल्मों से ही तकलीफ़ नहीं है, पुरानी फ़िल्में देखता हूँ तो जल्दी बोर हो जाता हूँ, उन्हें फास्ट फोरवार्ड करके बीस मिनट-आधे घँटे में पूरी कर देता हूँ। यही हाल रहा तो भविष्य में शायद केवल फैंटेसी यानि काल्पनिक दुनियाँओं में आधारित कुछ फ़िल्मों को ही देख सकूँगा, क्योंकि उनमें टैंशन और हिंसा के दृश्य नकली लगते हैं इसलिए उन्हें देखने में परेशानी कम होती है।

करीब दस-बारह साल पहले, तब बोलोनिया में रहता था, मैं वहाँ होने वाले मानव अधिकार तथा अंतरलैंगिक-समलैंगिक विषयों के फ़िल्मों के फैस्टिवलों से जुड़ा था। तब फ्लोरैंस में होने वाले भारतीय फ़िल्मों के फैस्टिवल, रिवर तू रिवर, में भी जाता था। दो बार मानव अधिकारों के फ़िल्म फैस्टिवल की जूरी का सदस्य भी रहा। लेकिन धीरे धीरे उन सब फ़िल्मों को देखना बँद कर दिया है। अब मुश्किल से शोर्ट फ़िल्म देख पाता हूँ, गम्भीर विषयों बनी लम्बी फ़िल्में जो अधिकतर फैस्टिवलों के लिए चुनी जाती हैं, उनको नहीं देख पाता। इटली में कभी कोई भारत से जुड़ा फ़िल्म फैस्टिवल हो रहा हो और आयोजक मेरे इटालवी ब्लाग पर हिंदी फ़िल्मों के बारे में पढ़ कर मुझसे सम्पर्क करते हैं कि मैं उनकी जूरी का हिस्सा बनूँ या फ़िल्में चुनने में सहायता करूँ तो मैं मना कर देता हूँ, मुझे मालूम है कि यह मुझसे नहीं होगा। 



क्या फ़िल्म न देख पाने वाली कोई बीमारी होती है? क्या किसी अन्य को भी ऐसी कोई बीमारी हुई है? क्या इलाज है इस बीमारी का? शयाद उसके बारे में लिखने से उसका कोई इलाज निकल आये!

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