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बुधवार, फ़रवरी 26, 2025

इतिहास और मानव समाज के बदलते मूल्य

इअन मौरिस (Ian Morris) इंग्लैंड में जन्में लेखक, इतिहासकार तथा पुरातत्व विशेषज्ञ हैं जो आजकल अमरीका में स्टैनफोर्ड युनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं। मेरा यह आलेख उनकी २०१५ में लिखी एक पुस्तक (Forager, farmers and Fossil Fuels) से प्रेरित है जिसमें वह आदि मानव से ले कर आज के बदलते समाजों की सरंचना और उनके बदलते मूल्यों की बात करते हैं।

भीमबेटका, भोपाल, भारत क हाथी पर शिकार करने का पाषाणचित्र, तस्वीरकार सुनील दीपक

मैंने यह पुस्तक कुछ दिन पहले पढ़ी और मुझे इसके मूलभूत विचार दिलचस्प लगे। इसे पढ़ते हुए, मेरे मन में भारतीय पौराणिक कथाओं से जुड़ी कुछ बातें भी मन में उठीं, इसलिए इस आलेख को लिखने की सोची। ऊपर के चित्र में मध्यप्रदेश में भीमबेटका से हाथी पर चढ़ कर शिकार करने का पाषाणचित्र है (चित्र पर क्लिक करके बड़ा करके देख सकते हैं)।

इअन मौरिस की किताब का सार

मौरिस का मूलभूत विचार है कि जैसे-जैसे मानव समाज विकसित हुए, उनके ऊर्जा खोजने के साधन और उस ऊर्जा का उपयोग करने की शक्ति बदली, इस बदलाव से उनके समाजों की सरंचना और उनके मूल्य भी बदले।

इसमें ऊर्जा का अर्थ बहुमुखी है, यानि वह शारीरिक ऊर्जा (भोजन) से ले कर मानव के सब कामों में खर्च होने वाली ऊर्जा (यात्रा, तरह-तरह की मशीनें, संचार, रोशनी, इत्यादि) सबकी बात कर रहे हैं।

इस दृष्टि से वह आदि मानव से ले कर आज तक के समाजों को तीन प्रमुख हिस्सों में बाँटते हैं:

(१) आदिमानव के प्रारम्भिक हज़ारों सालों का समय जब मानव की ऊर्जा का स्रोत प्रकृति से भोजन इकट्ठा करना था, जैसे की जंगलों में होने वाले फ़ल, कंद, मूल, बीज, तथा पशु-पक्षियों के शिकार से मिला माँस-मछली आदि। इस समय में ऊर्जा का स्तर बहुत कम था, मानव छोटे गुटों में रहते थे और हर गुट को भोजन खोजने के लिए विस्तृत क्षेत्र की आवश्यकता होती थी, इसलिए दूसरों गुटों का आप के क्षेत्र में अतिक्रमण स्वीकार नहीं किया जा सकता था, जिसकी वजह से गुटों के बीच में हिँसा आम थी।

छिनहम्पेरे, मोज़ाम्बीक में शिकार करने का पाषाणचित्र, तस्वीरकार सुनील दीपक

चूँकि ज़मीन-जँगल किसी एक की निजि जयदाद नहीं होते थे, सामाजिक व आर्थिक स्तर पर गुटों के बीच समानता अधिक थी और विषमताएँ कम। चूँकि गुट एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते थे, इसलिए अधिक सामान को ले कर घूमना कठिन था, और निजि सम्पत्ति नहीं होती थी। छोटे बच्चों को खिलाना-पिलाना और उन्हें साथ ले कर घूमना भी कठिन होता था इसलिए बच्चे कम होते थे। अधिकांश लोग लम्बा नहीं जीते थे और चूँकि पुरुष अपने वारिस बच्चों के लिए कुछ विषेश नहीं छोड सकते थे, अपने बच्चे होना उतना महत्वपूर्ण नहीं था, इसलिए स्त्री-पुरुष दोनों में एक-दूसरे के प्रति निष्ठावान होना ज़रूरी नहीं था, दोनों अपने साथी बदल सकते थे। ऊपर के चित्र में मोज़ाम्बीक में छिनहम्पेरे से शिकारियों का आदिकाल का पाषाणचित्र है (चित्र पर क्लिक करके बड़ा करके देख सकते हैं)।

(२) दस से सात हज़ार पहले का समय जब कृषि का विकास हुआ, तो समाज में बदलाव आये। एक ओर मानव ने पौधों को उगाना और उनके बीज चुन कर विषेश तरह के पौधों को बढ़ावा देना सीखा और दूसरी ओर, पशुओं को पालतू बनाना और विभिन्न कामों के लिए विषेश तरह के पशुओं को चुन कर उन्हें बढ़ावा देना सीखा। इससे दो तरह के समाज निकले - एक कृषि-प्रधान और दूसरे पशु-पालन प्रधान। कृषि प्रधान को ज़मीन की सीमाएँ निर्धारित करनी थीं ताकि उसकी उपज को कोई नष्ट न करे, और पशु-पालन प्रधान लोगों को खुली जमीन चाहिये थी ताकि पशु जहाँ चाहें वहाँ चर सकें, इसलिए दोनों गुटों में संघर्ष भी हुए। बहुत जगहों पर, समय के साथ अक्सर यह दोनों गुट मिल कर एक ही हो गये, जो कृषि करते थे, वही सीमित मात्रा में पशु भी पालते थे।

इस बदलाव के साथ समाज में ऊर्जा का स्तर बढ़ा, लोग एक जगह पर रहने लगे और समाज बदले। मानव गुटों के लिए भोजन की मात्रा बढ़ी, जनसंख्या बढ़ी, नये कार्यक्षेत्र बने जैसे पशुओं को चराने वाले, खुरों में नाल लगाने वाले, अनाज बेचने वाले, आदि। समय के साथ, नये शहर बने, राज्य बने, उनके राजा, अधिकारी बने।

खेतों में काम करने के लिए अधिक लोग चाहिये थे, इसलिए औरतों से घर में रहने, बच्चे पैदा करने और घर के काम करने के लिए कहा गया। ज़मीन और सम्पत्ति हुई, तो वारिस छोड़ना और अपने खून वाले वारिस होने का महत्व बढ़ा तो स्त्री-पुरुष के विवाह होना, एक-दूसरे के प्रति निष्ठावान होने का महत्व बढ़ा। समाज में विषमताएँ बढ़ीं और हिंसा के नई मौके बने। सैना रखना, युद्ध करना, साम्राज्य बनाना जैसी बातें होने लगीं। 

(३) पिछले कुछ सौ सालों में ज़मीन में दबे ऊर्जा स्रोतों को निकालने और मशीनी युग के साथ मानवता का ऊर्जा स्तर बहुत अधिक बढ़ गया है और बढ़ता ही जा रहा है। आने वाले समय में कृत्रिम बुद्धि, अतिसूक्ष्म नैनो-तकनीकी, रोबोट-तकनीकी, स्वचलित वाहन, हाइड्रोजन शक्ति, परमाणू शक्ति, सूर्य-शक्ति, पवन शक्ति, आदि से ऊर्जा के स्तर जब इतने बढ़ जायेंगे तो उनका मानव समाजों पर क्या असर होगा?

इस वजह से अमरीका, यूरोप आदि के विकसित देशों में कई दशकों से सामाजिक बदलाव आये हैं, जैसे कि पुरुषों और औरतों दोनों का नौकरी करना, शादी देर से करना या नहीं करना, बच्चे नहीं पैदा करना, युद्ध और हिंसा में कमी, भुखमरी और बीमारियों में कमी, मानव-अधिकारों के साथ जीव-अधिकारों की बातें, आदि। वैसे ही बदलाव अब चीन, भारत, वियतनाम, कोरिया आदि में भी आ रहे हैं, विषेशकर बड़े और मध्यम स्तर के शहरों में। इन बदलावों की वजह से विषमताएँ कम हो रही हैं, स्त्री-पुरुष के बीच भी विषमताएँ कम हो रहीं हैं, युद्ध से जुड़ी हिँसा कम हो रही है। साथ ही आज व्यक्ति अधिक अकेले रह रहे हैं लेकिन साईबर जगत के माध्यम से उनकी वरच्यूअल बातचीत-सम्पर्क भी बढ़ रहे हैं।

यह बदलाव अभी चल रहा है, पूरा नहीं हुआ है। कृषि-प्रधान जीवन से आधुनिक जीवन का बदलाव भिन्न परिस्थितों में पारम्परिक तथा आधुनिक के बीच में टैन्शन बना रहा है।  यह बदलाव भविष्य में हमें किन नयी दिशाओं की ओर ले कर जायेंगे?

भारत की पौराणिक कहानियों में यह बदलाव

कुछ दिन पहले मनु पिल्लाई (Manu Pillai) की नयी किताब (Gods, Guns and Missionaries) के बारे में एक पॉडकास्ट सुन रहा था। उन्होंने कहा कि हमारे पौराणों में वेदों-उपनिषदों के विचारों का सारे भारत में फ़ैलने का दो हज़ार साल पहले  का इतिहास लिखा है। यानि, भारत के विभिन्न स्थानों पर वेदों-उपनिषदों के विचार, किस तरह से लोगों के स्थानीय विचारों से मिले और उनमें समन्वित हो कर वह धर्म बना जिसे आज लोग हिंदु धर्म कहते हैं।

यह सुन कर मेरे मन में प्रश्न उठा कि वेद-उपनिषद के ज्ञान को सबसे पहले सोचने वाले लोग कौन थे? क्या हमारे ऋषी-मुनि, वह जंगलों में फ़ल-कंद-मूल-बीज खोजने और शिकार करने वाले छोटे गुट में रहने वाले लोग थे? या वह पशु-पालक प्रधान लोगों का हिस्सा थे? या वे कृषि प्रधान लोगों से जुड़े थे? इन ग्रंथों को लिखा बाद में गया, क्योंकि लिखाई का आविष्कार बहुत बाद में हुआ लेकिन इनकी सोच बनाने के समय किस तरह का समाज था? आप की क्या राय है?

फ़िर मन में देवदत्त पटनायक का एक आलेख याद आया जिसमें उन्होंने परशुराम की कहानी लिखी थी। इस कथानुसार, परशुराम ने सभी क्षत्रियों को मार दिया, केवल माँओं के गर्भों में बचे क्षत्रिय बालक बच गये। बाद में इन बचे हुए क्षत्रियों की विभिन्न जातियों ने शस्त्र त्याग कर दूसरे काम अपनाये। खत्री वाणिज्य में चले गये, जाट गौ पालन और पशु पालन में, कायस्थ लेखन में, आदि।

इसे पढ़ कर मुझे लगा कि शायद कहानी प्राचीन जंगलों में रहने वाले लोगों से, जिनमें अधिकतर पुरुष शिकारी और कुछ पुरोहित होते थे जब पशु-पालन और कृषि विकास के बाद शहर बने, उन पहले शहरों के जीवन के बदलाव की बात कर रही है, जहाँ जीवन यापन के नये-नये व्यवसाय निकलने लगे थे, और पहले जो शिकारी थे, उन्हें नये काम सीखने पड़े।    

अंत में

अधिकतर इतिहासकार पिछले हज़ार-दो हज़ार सालों के साम्राज्यों, युद्धों के इतिहास लिखते हैं और पुरातत्व विशेषज्ञ इतिहास पूर्व के आदिमानव की बात करते हैं।

लेकिन कुछ इतिहासकार मानवता के प्रारम्भ से आज तक की विहंगम स्थिति को समझने की कोशिश करते हैं, उन्हें पढ़ना मुझे अच्छा लगता है। इअन मौरिस की तरह मुझे जारेड डायमण्ड (Jared Diamond) और युवाल नोह हरारी (Yuval Noah Harari) जैसे इतिहासकारों की किताबें भी अच्छी लगती हैं।

उनकी हर बात से सहमत होना आवश्यक नहीं, लेकिन उनसे सोचने की नयी दिशाएँ खुल जाती हैं। 

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बुधवार, अक्टूबर 23, 2024

व्यक्तिगत संरचनाएँ: वेनिस कला प्रदर्शनी

आजकल वेनिस द्वीवार्षिकी कला प्रदर्शनी (Biennale) चल रही है। लेकिन चाह कर भी उसे देखने नहीं गया, क्योंकि प्रदर्शनी बहुत फ़ैले हुए क्षेत्र में लगती है जिससे वहाँ चलना बहुत पड़ता है और मेरे घुटने दुखने लगते हैं। लेकिन प्रमुख प्रदर्शनी के साथ-साथ वेनिस शहर में बहुत सी अन्य छोटी-बड़ी कला प्रदर्शनियाँ भी लगती हैं, जिन्हें देखना मेरे लिए अधिक आसान है। ऐसी ही एक कला प्रदर्शनी वेनिस के यूरोपी सांस्कृतिक केन्द्र  में लगी तो कुछ दिन पहले मैं उसे देखने गया।

इस आलेख में मैंने आप के लिए अपनी पसंद की कुछ कलाकृतियाँ की लघु-प्रदर्शनी बनाई है। 

यूरोपी सांस्कृतिक केन्द्र का भवन तीन हिस्सों में बंटा है - पालात्ज़ो बैम्बो, पालात्ज़ो मोरो तथा मारिनारेस्सा के बाग। इसमें कुल मिला कर करीब चालिस कक्ष हैं जिनमें विभिन्न देशों के करीब दो सौ कलाकारों की यह प्रदर्शनी लगी है। यह भवन वेनिस रेलवे स्टेशन से रिआल्तो पुल जाने वाले प्रमुख रास्ते पर है।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures

इस प्रदर्शनी में चैक रिपब्लिक की एक कलाकृति ने मुझे बहुत प्रभावित किया, देख कर ऐसा लगा मानो किसी ने छाती पर मुक्का मारा हो और साँस नहीं ली जा रही हो। इसलिए मेरे लिए यह इस प्रदर्शनी की सबसे महत्वपूर्ण कलाकृति थी। यह कलाकृति आप को नीचे मेरे आलेख के अंत में मिलेगी।

इस प्रदर्शनी को "व्यक्तिगत संरचनाएँ: सीमाओं से परे" का नाम दिया गया है और यह २४ नवम्बर २०२४ तक चलेगी। इसे देखने के लिए कोई टिकट नहीं चाहिये। अगर आप इन दिनों में वेनिस आ रहे हैं और आप को कला में रुचि है, तो इस प्रदर्शनी को अवश्य देखें।

नीचे की सभी कलाकृतियों की तस्वीरों पर क्लिक करके आप उन्हें बड़ा करके देख सकते हैं। तो आईये चलते हैं मेरी यह लघु कला प्रदर्शनी देखने।

ग्रीस के कोसतिस ज्योर्जो (Kostis Georgiou) की कलाकृतियाँ

यह पहली दो कलाकृतियाँ भवन में घुसने से पहले, उसके सामने वाले बाग में दिखती है। एलुमिनियम की बनी मानव मूर्तयों को उन्होंने लाल रंग से रंगा है। एक में दो आकृतियाँ एक चक्र के ऊपर हवा में टिकी हैं, दूसरी में एक सीढ़ी के आसपास चार आकृतियाँ ऊपर नीचे हैं। कुछ रंग की वजह से, कुछ आकृतियों का हवा में तैरना और खेलना, मुझे अच्छा लगा। अगर आप कोसतिस के वेब-स्थल वाली लिंक पर देखेंगे तो वहाँ लाल रंग से  इस तरह की अन्य अनेक कलाकृतियाँ देख सकते हैं।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Kostis Georgiou

अमरीका की अलकनंदा मुखर्जी (Alakananda Mukerjin) की कला

अलकनंदा की जल-रंगों कि विभिन्न चित्रकला इस प्रदर्शनी में दिखी। मुझे यह विषेश नहीं भाईं, कुछ बेतरतीब सी लगीं, लेकिन साथ ही लगा कि उनकी आकृतियों में मकबूल फिदा हुसैन साहब की आकृतियों की प्रेरणा दिखती है। क्या आप को भी ऐसा लगता है?

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Alakananda Mukherjin

 आस्ट्रेलिया की एनेट्टे गोल्डन (Annette Golden) की चित्रकला

प्रदर्शनी में एनेट्ट की कलाकृतियों के लिए एक पूरा कमरा था जिसमें उनकी बीस-पच्चीस कलाकृतियाँ लगी थीं। वह एक्रेलिक, तेल-रंग और धातुओं की पत्तियाँ लगा कर केनवास पर कलाकृतियाँ बनाती हैं, जिनमें रंगबिरंगे विभिन्न नारी स्वरूप दिखते हैं। उन्हीं में से एक कलाकृति प्रस्तुत है जिसकी काली पृष्ठभूमि पर लाल और नीले रंगों से बनी युवती मुझे अच्छी लगी।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Annette Golden

न्यूज़ीलैंड तथा भारत के अरीज़ कटकी (Areez Katki) का इस्टालेशन

अरीज़ पारसी हैं और उनके इंस्टालेशन में रुमालों में ज़राथुस्त्रा गाथा के सतरह हा (टुकड़े या हिस्से) दिखते हैं। रुमालों पर उन्होंने चित्र बना कर, उन्हें धागों से छत से लटकाया था। पीछे खिड़की से आती वेनिस की रोशनी और और वहाँ से दिखते भवनों के साथ उनके प्राचीन धर्म ग्रंथ का चित्रण मुझे अच्छा लगा हालाँकि उन चित्रों में कौन सी कहानी थी, यह समझ नहीं आया।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Areez Katki

अमरीका के ब्रायन माक (Brian J. Mac) की वास्तुकला की कलाकृति

ब्रायन माक अमरीकी वास्तुकार हैं। अपने २७ सालों के वास्तुकार कार्य के हर साल उन्होंने एक डिब्बा बनाया जिसमें उनके रेखाचित्र, मॉडल, इत्यादि तोड़-मोड़ कर घुसा दिये। एक तरह से उनका पूरा कार्यजीवन इस तरह से उनकी कलाकृति में दिखता है। इसे देखते हुए मैं सोच रहा था कि हमारी हर चीज़ के साथ हमारी यादें जुड़ी होती हैं, कि  इसे वहाँ से खरीदा था, इसे वैसे बनाया था, आदि, लेकिन हमारे बाद हमारी यादों की कोई कीमत नहीं रहती, उस सब सामान को कूड़े की तरह फ़ैंक देते हैं। इस दृष्टि से यह कलाकृति मुझे यादों का व्यक्तिगत स्मारक लगी।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Brian J. Mac

रोमेनिया की कालिन टोपा (Calin Topa) और अदा गालेस (Ada Gales) की इन्स्टालेशन

कालिन स्वरों और ध्वनि की कलाकार है, उन्होंने इस प्रदर्शनी में एक लाल रोशनी वाला एक गलियारा बनाया, और जिसे स्वरों से भरा है। उस गलियारे की दीवारों पर अदा ने अपने शब्द लिखे हैं, और इस तरह से दोनों की कला-दृष्टि का संगम हुआ। मैं आप को कालिन की ध्वनि नहीं महसूस करा सकता लेकिन अदा के विभिन्न वाक्यों में से जो शब्द मैंने चुने हैं उनमें लिखा है, "मैं कभी कला बनाना चाहती हूँ और कभी थाई नूडल खाना चाहती हूँ"।  

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Calin Topa
 

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Ada Gales
 
ध्वनियों को मिला कर भी कला बनती है, के विषय पर कई इंस्टालेशन मैं पहले भी देख चुका हूँ लेकिन यह एक कला अनुभव है, यह बात मुझे अभी भी कुछ अजीब सी लगती है, हालाँकि इसे तार्किक स्तर पर समझता हूँ। मेरे लिए कला देखने की चीज़ है, छू कर देखने की चीज़ है। इसी तरह से मुझे कला प्रदर्शनियों में वीडियो इंस्टालेशन भी कुछ अजीब से लगते हैं।

स्विटज़रलैंड की केरोल कोहलर (Carole Kohler) की लुकन-छिपाई

केरोल कोहलर ने कपड़े उतराते हुए व्यक्तियों की मूर्तियाँ बनायी थीं और कोलाज बनाये थे जिन्हें ३-डी चश्में से देखो तो उनके भीतर छुपी हुई आकृतियाँ दिखती थीं। मैं आप को वे छिपी हुई आकृतियाँ नहीं दिखा सकता लेकिन आप उनकी कपड़े उतारने वालों  की मूर्तियों की एक झलक देख सकते हैं। सब मूर्तियों में बनियान या कमीज उतारने वालों के कपड़े से चेहरे छिप गये हैं, अवश्य इसका कोई प्रतीकात्मक अर्थ है, जैसे बच्चे अपना चेहरा ढक कर सोचते हैं कि उन्हें कोई नहीं देख सकता। या शायद, कलाकार कहना चाहता है कि हम कड़वी सच्चाई देखने से डरते हैं और उनसे अपना मुँह चुराते हैं।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Carole Kohler

स्विटज़रलैंड के क्रिस्टोफ स्टुकेलबर्गर (Christoph Stuckelberger) की जड़ें

स्टुकेलबर्गर हर वस्तु के नयी तरह से देखने के लिए कहते हैं। उनकी कलाकृतियों के लिए एक पूरा कक्ष था जिसमें वस्तुओ के भितर से बाहर, या नीचे से ऊपर, उल्टा दिखाया गया था। इस तस्वीर में आप उनकी "जड़ें" देख सकते हैं जो आपस में एक दूसरे के ऊपर-नीचे जा कर एक जाल बनाती हैं। जिस वस्तु को एक तरह से देखने की आदत हो, जब वह उससे भिन्न दिखे तो हमें रुकने और सोचने के लिए नया दृष्टिकोण देती है।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Christoph Stuckelberger

हंगरी के डेविड सज़ेंतग्रोती (David Szengroti) की अमूर्त चित्रकला

प्रदर्शनी में बहुत सी अमूर्त चित्रकला के नमूने थे जो मुझे अच्छे लगे। मैंने उनमें से इस लघु-प्रदर्शनी के लिए हंगरी के चित्रकार सज़ेंतग्रोती की तीन चित्रकलाओ को चुन कर उनकी एक मिली-जुली तस्वीर बनायी है। ऐसी कलाकृतियों के सामने मैं लम्बे समय तक खड़ा रह कर उन्हें देख सकता हूँ। इसमें रंगो का चुनाव, उनके आपस में सम्बंध, उनमें दिखती अमूर्त आकृतियाँ, सब का असर मिल जुल कर मुझे बहुत सुंदर लगा। 

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - David Szengroti (composit)

बेल्जियम की जाँन ओपगेन्होफ्फेन (Jeanne Opgenhoffen) की सिरामिक कला

ज़ाँन अपने सिरामिक के काम के लिए जानी जाती हैं। उनकी जिस कलाकृति को मैंने इस आलेख के लिए चुना है उसके लिए उन्होंने पहले महीन सेरामिक के चिप्स जैसे आकार के टुकड़े बनाये, फ़िर उन सबको जोड़ कर यह अमूर्त चित्र बनाये, जिनमें रंगों और अकृतियों का मेल मुझे बहुत अच्छा लगा। इसे देख कर सोचना कि इसे बनाने में उन्हें कितना समय और मेहनत लगी होगी, से इसकी सुंदरता और भी महत्वपूर्ण लगती है। इस तस्वीर पर क्लिक करके इसे बड़ा करके देखिये तब इसकी सुंदरता दिखेगी।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Jeanne Opgenhoffen

सीरिया-फिलिस्तीन के खैर अलाह सलीम (Khair Alah Salim) की चित्रकला

सलीम फिलिस्तीनी हैं और सीरिया में रहते हैं, उनकी केनवास पर एक्रेलिक से बनी इस तस्वीर की उदास मुस्कान वाली युवती मुझे बहुत अच्छी लगी। लगता है जैसे उसका चेहरा एक अंडे के छिलके के ऊपर बना है जिसमें दरारें पड़ रही हैं, जिनसे उसकी उदासी और भी गहरी हो जाती है।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Khair Alah Salim

फ्राँस के निकोलास लावारेन्न (Nicolas Lavarenne) और कोरीन फन्कन (Corin Funken) की कलाकृतियाँ

निकोलास ने रेज़िन से सोती हुई युवती की शिल्पकला बनाई है जिसकी बाजू नीचे, कोरीन की चित्रकला के सामने लडक रही है। निकोलास की मूर्ति छत पर लोहे के हैम्मोक पर झूल रही है, जबकि कोरीन की चित्रकला में वेनिस शहर के समुद्र से जुड़ी बातों-घटनाओं का चित्रण है जिसे उन्होंने "हमारा समुद्र" का नाम दिया है। मुझे कोरीन की चित्रकला कुछ विषेश नहीं लगी लेकिन निकोलास की मूर्ति के चेहरे का भाव और उनका कक्ष में छत पर तैरना बहुत अच्छे लगे।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Nicolas Lavarenne

 नाईजीरिया की ओर्री शेनजोबी (Orry Shenjobi) की आ-वाम-बे पार्टी

ओर्री की कलाकृतियों का एक पूरा कक्ष है जिसमें दीवारों पर उन्होंने वहाँ की पाराम्परिक पार्टी जिसे आ-वाम-बे कहते हैं, में भाग लेने वालों की तस्वीरों के ऊपर से विभिन्न चीज़ो को जॊड़ कर कोलाज जैसे बनाये हैं। उनकी कलाकृति ऊर्जा, रंगों और आनंद लेते हुए लोगों से भरी हुई है। इस कक्ष में बहुत देर तक रुका। नीचे वाली तस्वीर में आप को उस कक्ष की दो दीवारों के हिस्से दिखेंगे। इस तस्वीर पर भी क्लिक करके उसे बड़ा करके देखिये, तब दिखेगा कि किस तरह उन्होंने तस्वीरों पर अन्य वस्तुओं को जोड़ कर कैसे कोलाज बनाये हैं।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Orry Shenjobi (composit)

चिल्ली की पेटरिशिया टोरो रिब्बेक (Patricia Toro Ribbeck) की मिठाईयाँ

दक्षिण अमरीका की इस कलाकार ने रंग-बिरंगी चमकती हुई सिरामिक से तरह-तरह के केक, पेस्ट्रियाँ और मिठाईयाँ बनाई हैं, जिन्हें देख कर भूख लग जाती है। मेरे विचार में यह कलाकृति जिस घर में रहेगी वहाँ रहने वाले लोग डाईटिन्ग नहीं कर सकते। वह कहती हैं कि इसे उन्हें कोविड के समय में घर में बन्द रहने के समय बनाया था क्योंकि उस समय वह सुंदर सपने देखना चाहती थीं।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Patrizia Toro Ribbeck

फिलीपीनी कलाकारों का कक्ष

प्रदर्शनी में एक कक्ष में बहुत सारे फिलीपीनी कलाकारों की कलाकृतियाँ थीं। मुझे उनमें से कई कलाकृतियाँ अच्छी लगीं लेकिन उदाहरण के लिए मैंने उनमें से दो कलाकृतियाँ चुनी हैं। पहली चित्रकला डेमी पाडुवा की है और दूसरी चित्रकला सेड्रिक डेला पाज़ की है, दोनों कलाकृतियाँ केनवास पर एक्रेलिक रंगों से बनाई गई हैं।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Demi Padua
 
European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Cedric dela Paz

प्रिन्सटन विश्वविद्यालय के फ़िल्म-शोध स्टूडियो की तस्वीरें

यह वाला कक्ष अमरीकी श्याम वर्ण के लोगों के संघर्ष के बारे में बना है। इसमें एक और हज़ारों छोटी-छोटी तस्वीरों को मिला कर कम्प्यूटर से चित्र बनाये थे जिनमें दूर से देखो तो उनमें जाने-पहचाने व्यक्तियों के चेहरे दिखतॆ थे। जैसे कि नीचे वाली तस्वीर अमरीकी अभिनेता जोर्डन पील की है, जिसे ध्यान से देखेंगे तो यह बहुत सी छोटी तस्वीरों को जोड़ कर बनाई गई है। इस तस्वीर पर क्लिक करके उसे बड़ा करके देखिये कि पील का चेहरा कैसे बनाया गया है।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Princeton Uni Research film studio

सेशैल के रायन शैट्टी (Ryan Shetty) की तैरते हुए घर

रायन ने इस कक्ष में विभिन्न इस्टालेशन बनाई थीं। उनमें से मुझे यह तैरते घरों वाला हिस्सा अच्छा लगा। सफेद, चकोर, डिब्बे जैसे कमरों में खिड़कियाँ, सीढ़ियाँ और खम्बे बने हैं। नीचे से रोशनी से पीछे की दीवार पर प्रतिबिम्ब थे और साथ में एक वीडियो इंस्टालेशन भी था (यह सब इस तस्वीर में नहीं दिखते)।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Ryan Shetty

भारत की सोनल अम्बानी (Sonal Ambani) का घायल बैल

सोनल के धातुओं के टुकड़ों को जोड़ कर बना यह बैल देख कर मुझे दिल्ली के चर्खा संग्रहालय में बने शेर की शिल्पकला याद आई जिसे भारत सरकार ने "भारत में बनाईये" कम्पेन के लिए लगाया था। बैल देख कर फाईनेन्शियल और शेयर बाज़ार मार्किट का ध्यान आता है, शायद इसलिए लाल तीरों से घायल यह बैल नहीं है, प्रतीमात्मक गाय है। यह शिल्प स्टील, पीतल और लकड़ी से बना है और उनके अनुसार, यह पुरुष तथा नारी को काम के लिए मिलने वाली पगार की विषमताओं को दर्शाता है। सोनल जी ने इस कलाकृति का नाम दिया है, "बड़े सौभाग्य के तीर और गुलेलें"।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Sonal Ambani

दक्षिण कोरिया के याओ जुई छुंग (Yao Jui Chung) का झंडा

छुंग की इस कलाकृति के रंग यूक्रेन के झंडे के रंगों की याद दिलाते हैं और इस पर बनी दो आकृतियाँ ध्यान खींचती हैं। एक आकृती कुत्ते या सियार जैसी लगती है और दूसरी का चेहरा मानव सा है लेकिन उसके सींग हैं, यानि शैतान है। इसका अर्थ मुझे समझ नहीं आया लेकिन देख कर अच्छा लगा।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures- Yao Jui Chung

चीन के शांग मिंग शेंग (Chang Ming Sheng) की क्वान्टम भौतिकी कला

बाद में पता चला कि कलाकृति का नाम यी जिंग है और कलाकार का नाम शांग मिंग शेंग है। यह वैज्ञानिक तरीके से बालू के कणों को क्वांटम भौतिकी के माध्यम से घुमा कर अपनी कला बनाते हैं जो द्वीरूप और त्रीरूप के बीच में घूमती है। मुझे उनकी कोई बात समझ नहीं आई कि वह क्या करते हैं और क्यों करते हैं, इसलिए उनकी चित्रकला का एक नमूना यहाँ प्रस्तुत है ताकि आप में से बुद्धिमान व्यक्ति इसे समझ कर मुझे भी समझायें। 

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Chang Ming Sheng

चेक गणतंत्र के डानिएल पेस्टा (Daniel Pesta) की चोटियाँ

मेरी इस लघु-प्रदर्शनी के अंत में वह कलाकृति प्रस्तुत है जिसने मेरे दिल को गहराई से छुआ। इसे देख कर मुझे बहुत धक्का लगा, मैं वहाँ खड़ा रह गया।

कलाकृति में युवतियों की तीन कटी हुई, खून से सनी हुई चोटियाँ हैं, जिनके नीचे लिखा है, "मेरा खून जंगली था", "मेरा खून गर्म था", और "मेरा खून स्वतंत्र था"। जब लड़की जंगली हो, काबू में न आये, स्वतंत्र जीना चाहे तो अक्सर समाज उन्हें दीवारों और पर्दों के पीछे छुपा देते हैं और फ़िर भी न माने, तो परिवार और धर्म की इज़्ज़त के नाम पर जान से मार देते हैं।

दुनिया भर में लड़कियों और औरतों पर धर्म, संस्कृति और परम्पराओं के नाम पर होने वाले अत्याचारों और बंधनों को दिखाती यह कलाकृति मेरे मन को छू गई। नीचे वाली तस्वीर में मैंने तीनो कलाकृतियों को एक तस्वीर में जोड़ दिया है। इस तस्वीर को क्लिक करके इसे बड़ा करके अवश्य देखें।

इसे देख कर पंजाबी गीत, "काली तेरी गुत ते परांदा तेरा लाल नी" का नया ही अर्थ दिखता है।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Daniel Pesta

अंत में 

पिछले दशक से कॉनसैप्ट आर्ट यानि किसी विचार पर आधारित कला का महत्व बढ़ता जा रहा है, जिसमें कलाकार अपनी कला का कौशल नहीं दिखाता बल्कि कला के माध्यम से एक विचार को अभिव्यक्ति देता है। डानियल पेस्टा की कला में लड़कियों की चोटियाँ बनाने का कौशल प्रभावित नहीं करता बल्कि उसके पीछे उनका विचार है कि जो लड़कियाँ हमारे समाज की बात नहीं मानती उनकी चोटियाँ काट कर उनके सिरों को लहु-लुहान कर दो।

कुछ कलाकार वैचारिक-कला के नाम पर आलसपन दिखाते हैं जैसे कि कोई कुछ टूटी ईंटों को रख कर, उसे "टूटे सपने" नाम की कलाकृति बताईये। लेकिन चेक कलाकार डानियल की इस कलाकृति को देख कर मुझे लगा कि वैचारिक कला भी बहुत सशक्त हो सकती है।

कहिये आप का क्या विचार है और मेरी इस लघु कला प्रदर्शनी में आप को कौन सी कलाकृति सबसे अधिक अच्छी लगी।

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सोमवार, मार्च 18, 2024

हमारी भाषा कैसे बनी

कुछ दिन पहले मैंने भारत के जाने-माने डॉक्यूमैंट्री फ़िल्म निर्देशक अरुण चढ़्ढ़ा की १८५७ के लोक-गीतों पर बनी फ़िल्म के बारे में लिखा था। आज उन्हीं की एक अन्य फ़िल्म, "जिस तरह हम बोलते हैं" पर लिख रहा हूँ।

इस फ़िल्म को बनाने में उन्होंने हिंदी भाषा के विकास के प्रख्यात जानकार लोगों का सहयोग लिया, जिनमें प्रो. नामवर सिंह का नाम सबसे पहले आता है, वह इस फ़िल्म के सूत्रधार थे। अन्य विद्वान जिन्होंने फ़िल्म में सहयोग दिया उनमें प्रमुख नाम हैं वाराणसी के प्रो. जुगल किशोर मिश्र तथा प्रो. शुकदेव सिंह, उज्जैन के डॉ. कमलदत्त त्रिपाठी और दिल्ली विश्वविद्यलय के प्रो. अजय तिवारी

नीचे फ़िल्म के पहले वीडियो क्लिप में प्रो. नामवर सिंह

फ़िल्म में संस्कृत से पालि, प्राकृत तथा अपभ्रंश के रास्ते से हो कर आज की भाषाओं और बोलियों के विकास की गाथा चित्रित की गई थी। यह फ़िल्म २००४-०५ के आसपास दूरदर्शन इंटरनेशनल चैनल पर तथा अमरीका में विश्व हिंदी दिवस समारोह में दिखायी गई थी।

जब मैंने यह फ़िल्म पहली बार देखी थी तो मुझे लगा था कि इसमें हमारी भाषाओं और बोलियों के बारे में बहुत सी दिलचस्प जानकारी है, और इस फ़िल्म को जितना महत्व मिलना चाहिये था, वह नहीं मिला था। इसलिए नवम्बर २०२२ में मैंने इसे अरुण के साथ दोबारा देखा और उससे फ़िल्म में दिखायी बातों पर लम्बी बातचीत को रिकॉर्ड किया। कई महीनों से इसके बारे में लिखने की सोच रहा था, आखिरकार यह काम कर ही दिया।

फ़िल्म में दी गई कुछ जानकारी मुझे गूढ़ तथा कठिन लगी। चूँकि फ़िल्म में सबटाईटल नहीं हैं, हो सकता है कि कुछ बातें मुझे ठीक से समझ नहीं आयी हों, इसके लिए मैं पाठकों से क्षमा मांगता हूँ। मेरे विचार में दूरदर्शन को इस फ़िल्म को इंटरनेट पर भारतीय भाषाओं के विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध कराना चाहिये।

"जिस तरह हम बोलते हैं" - फ़िल्म के बारे में निर्देशक अरुण चढ़्ढ़ा से बातचीत

अरुण चढ़्ढ़ा: "हम लोग स्कूल में पढ़ते थे कि भारत की बहुत सी भाषाएँ हैं, हर प्रदेश की अपनी भाषा है, और हर भाषा की बहुत सी बोलियाँ हैं। कहते हैं कि यात्रा करो तो हर दो कोस पर बोली बदल जाती है। इसी बात से मैं सोच रहा था कि हिंदी कैसे विकसित हुई, और हिंदी से जुड़ी कौन सी प्रमुख बोलियाँ हैं, उनके आपस में क्या सम्बंध हैं, उनके संस्कृत से क्या सम्बंध हैं। एक बार इसके बारे में जानने की कोशिश की तो पता चला कि जिसे हम एक भाषा कहते हैं, उसमें कई तरह के भेद हैं। जैसे कि संस्कृत भी दो प्रमुख तरह की है, वैदिक संस्कृत तथा लौकिक संस्कृत। तो मेरे मन में आया कि हमारी भाषाओं के विकास में यह सब अंतर कैसे आये और क्यों आये? (नीचे तस्वीर में फ़िल्म-निर्देशक अरुण चढ़्ढ़ा)

हमारी हिंदी की जड़े कम से कम चार हज़ार वर्ष पुरानी हैं और आज की भाषा उस प्राचीन भाषा से बहुत भिन्न है, उनमें ज़मीन-आसमान का अंतर है। अगर कोई भाषा जीवित है तो वह समय के साथ बदलेगी। लोग कहते हैं कि हमारी भाषा में मिलावट हो रही है, भाषा की शुचिता को बचा कर रखना चाहिये, लेकिन अगर भाषा जीवित है तो उसका बदलते रहना ही उसका जीवन है। जयशंकर प्रसाद, मैथिलीचरण गुप्त और निराला जैसे साहित्यकारों ने, हर एक ने अपने साहित्य में अपने समय की भाषा का उपयोग किया है। 

यही सब सोच कर मुझे लगा कि इस विषय पर फ़िल्म बनानी चाहिये कि प्राचीन समय से ले कर हमारी भाषा कैसे विकसित हुई, कैसे कालांतर में उससे अन्य भाषाएँ और बोलियाँ बनी। सबसे पहले मैंने इसके बारे में नेहरु संग्रहालय के एक लायब्रेरियन से बात की, फ़िर उनके सुझाव पर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में बात की, वहाँ प्रोफेसर सब्यसांची ने सलाह दी, इस तरह से इस विषय पर सामग्री एकत्रित करनी शुरु की। तब प्रो. नामवर सिंह से बात हुई, जानकारी देने के साथ-साथ उन्होंने इस फ़िल्म का सूत्रधार बनना स्वीकार कर लिया। फ़िर, उज्जैन की संस्कृत एकादमी के निदेशक के. एम. त्रिपाठी साहब मिले, वाराणसी संस्कृत विद्यापीठ के प्रो. जुगल किशोर मिश्रा और अन्य बहुत से लोग इस काम में साथ चले, उन सबके सहयोग के बिना इस फ़िल्म को नहीं बना सकता था। (नीचे फ़िल्म के वीडियो-क्लिप में प्रो. युगलकिशोर मिश्रा लौकिक संस्कृत से प्राकृत के बारे में बताते हैं)

चूँकि भाषा लिखने, पढ़ने और बोलने का माध्यम है, यह दुविधा थी कि उस पर फ़िल्म कैसे बनाई जाये। मुझे लगा कि फ़िल्म के माध्यम से हम यह दिखा सकते हैं कि बोली हुई भाषा के उच्चारण कैसे होते हैं। जैसे कि उज्जैन में त्रिपाठी साहब को प्राकृत भाषा के उच्चारण की जो जानकारी थी वह अपने आप में अनूठी थी। वाराणसी में प्रो. मिश्र थे जिनके विद्यार्थयों का संस्कृत थियेटर का दल था, उन लोगों ने संस्कृत नाटकों के मंचन से फ़िल्म में सहयोग दिया था।

इस फ़िल्म की सारी रिकॉर्डिन्ग लोकेशन पर ही की गई, मैं इसकी डबिन्ग नहीं चाहता था। खुली जगहों में, भीड़ में, कैसे लाइव रिकॉर्डिन्ग की जाये, यह हमारी चुनौती थी। यह फ़िल्म बीस-बीस मिनट के पाँच भागों में प्रसारित की गई थी, बाद में उन्हें जोड़ कर मैंने एक घंटे की फ़िल्म भी बनाई थी। (टिप्पणी सुनील - इस आलेख के लिए मैंने वह एक घंटे वाली फ़िल्म देखी थी)

वैदिक तथा लौकिक संस्कृत और उसकी व्याकरण

फ़िल्म का प्रारम्भ जयशंकर प्रसाद की "कामायनी" की एक कविता से होता है। फ़िर नामवर सिंह बताते हैं कि "ऋग्वेद की पहली ऋचा वाक-सूक्त है, जिसमें वाक् यानि भाषा की महिमा गाई गई है। हडप्पा में मूर्तियाँ, चित्र, भवन, सब कुछ मिलते हैं लेकिन अभी तक उनकी लिपी नहीं पढ़ी जा सकी। इस तरह से हम उनकी सभ्यता के बारे में बहुत कुछ जानते हैं लेकिन उनके साहित्य के बारे में कुछ नहीं जानते। किसी भी समाज, संस्कृति, सभ्यता की, बिना उसकी भाषा जाने, उसकी पहचान पूरी नहीं होती।"

वैदिक संस्कृत दो हज़ार वर्ष पहले जैसी बोली जाती थी, आज भी वैसी ही बोली और लिखी जाती है, इसके शब्दों को आगे-पीछे नहीं कर सकते। फ़िल्म में वैदिक संस्कृत के मंत्रो के उच्चारण को छाऊ नृत्य के साथ दिखाया गया है।

लेकिन विभिन्न वेदों में मंत्रों के उच्चारण और ताल में अंतर आ जाता है। जैसे कि हिरण्यगर्भ समवर्ताग्रह ऋचा है जो तीन वेद ग्रंथों (ऋग्वेद, कृष्ण यजुर्वेद तथा शुक्ल यजुर्वेद) में मिलती है, इसके शब्द नहीं बदल सकते, लेकिन हर वेद के साथ उसका उच्चारण और ताल बदल जाते हैं। यह इस लिए होता है क्योंकि यह स्वाराघात-युक्त भाषा है, इसमें सात स्वरों का समावेश है, इसलिए उनका उच्चारण भी सप्त स्वर-नियमों के अनुसार होता है। यह सप्त सुर सामवेद में स्फटित रूप में मिलते हैं, जबकि ऋग्वेद, कृष्ण यजुर्वेद तथा शुक्ल यजुर्वेद में यह सात सुर तीन स्वरों (उदात्त, अनुदात्त और छड़िज) में समाहित हो जाते हैं। उदात्त में निशाद और गंधार मिल जाते हैं, अनुदात्त में ऋषभ और भैवत, और छड़िज में षड़ज, मध्यम और पंचम मिल जाते हैं। इस वजह से हर वेद की उच्चारण शैली में अंतर होता है।

वेद ग्रंथ वैदिक संस्कृत में लिखे गये हैं, जबकि रामायण और भगवद्गीता जैसे ग्रंथ लौकिक संस्कृत में लिखे गये हैं, जिनकी भाषा में समय के साथ बदलाव हो सकता है। पाणिनी व कात्यायन जैसे आचार्यों ने व्याकरण के नियमों की व्याख्या करके संस्कृत को व्यवस्था दी, उन्हीं नियमों का प्रयोग हिंदी जैसी भाषाएँ भी करती हैं।

फ़िल्म में बताया गया है कि, "पाणिनी की व्याकरण संस्कृत ही नहीं, किसी भी भाषा की पहली व्याकरण थी, जिसे उन्होंने १४०० सूत्रों में लिखा था। कहते हैं कि शिव जी ने चौदह बार डमरू बजाया, उस डमरू पर १४ स्वरों वाले "अइउड़ सूत्र" से संस्कृत की उत्पत्ति हुई, उन्हीं सूत्रों पर ही पाणिनी ने अष्टाध्यायी व्याकरण लिखी। उन्होंने संस्कृत की मुख्य धातुओं को निश्चित किया, जिनमें उत्सर्ग, प्रत्येय आदि जोड़ कर भाषा के शब्द बनाते हैं।"

फ़िल्म में लौकिक संस्कृत के उदाहरण कालीदास के नाटक के माध्यम से दिखाये गये हैं। उज्जैन के त्रिपाठी जी बताते हैं कि महाकवि कालीदास के समय में लौकिक संस्कृत संचार की भाषा थी और उसकी प्रवृति धीरे-धीरे प्राकृत भाषा में मुखरित हो रही थी, क्योंकि आम व्यक्ति जब उसे बोलते थे तो उनकी बोली में उच्चारण और व्याकरण का सरलीकरण हो जाता था। (नीचे फ़िल्म से वीडियो-क्लिप में डॉ. कमलेश दत्त त्रिवेदी)


 संस्कृत की परम्परा दक्षिण भारत में भी रही है। जैसे कि केरल के मन्दिरों में संरक्षित संगीत तथा नाट्य पद्धिति कुड़ीयट्टम का इतिहास दो हज़ार वर्ष पुराना है। करीब तीन सौ साल पहले इसका कथ्थकली स्वरूप विकसित हुआ है। इन पद्धतियों में वैदिक गान को तीन स्वरों (उदात्त, अनुदत्त और छड़िज) में ही गाते हैं, लेकिन कुड़ीयट्टम शैली में उनमें भावों को भी जोड़ देते हैं।

प्राकृत भाषा

ईसा से करीब छह सौ साल पहले, प्राकृत भाषाएँ लौकिक संस्कृत के सरलीकरण से बनने लगीं। समय के साथ प्राकृत के कई रुप बदले, इसलिए प्राकृत कई भाषाएँ थीं। सरलीकरण से संस्कृत के तीन वचन से दो वचन हो गये, कुछ स्वर जैसे ऋ, क्ष, आदि प्राकृत में नहीं मिलते थे। भगवान बुद्ध ने जिस प्राकृत भाषा में अपनी बात कही उसे "पालि" कहते हैं। जैन तीर्थांकर महावीर और सम्राट अशोक ने भी प्राकृत में ही अपने संदेश दिये। समय के साथ इनसे अपभ्रंश तथा आधुनिक आर्य भाषाओं का जन्म हुआ।

भारत के नाट्यशास्त्र में ४२ तरह की भाषाओं की बात की गई है, जबकि कोवल्य वाक्यमाला ग्रंथ में १८ तरह की प्राकृत की बात की गई है, जिनमें तीन प्रमुख मानी जाती थीं - मगधी, महाराष्ट्री और शौरसैनी। महाकवि कालीदास ने तीनों प्राकृत भाषाओं का अपने नाटकों में सुन्दर उपयोग किया था। जैसे कि उनके रचे एक नाटक में एक पात्र लौकिक संस्कृत बोलता है, गद्य में बोलने वाले पात्र शौरसैनी बोलते हैं और इसके गीत महाराष्ट्री में हैं। 

अपभ्रंश, औघड़ी, अवधी, ब्रज, हिन्दवी, खड़ी बोली ...

संस्कृत से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश, अपभ्रंश से औघड़, इस तरह से शताब्दियों के साथ भाषाएँ बदलती रहीं। महाकवि कालीदास ने विक्रमवेशी में अपभ्रंश का उपयोग भी किया और पतांजलि ने अपना महाभाष्य अपभ्रंश में लिखा।

अपभ्रंश से पश्चिम में गुजरात तथा राजस्थान में पुरानी हिंदी और ब्रज भाषाएँ निकलीं जिनका वीर रस की रचनाओं के सृजन में प्रयोग किया गया। दलपत राय ने खुमान रासो, चंदबरदाई ने पृथ्वीराज रासो, आदि ने अपनी रचनाओ के लिए इन्हीं भाषाओं का उपयोग किया। राजस्थान में इन रचनाओं को डिन्गल तथा पिन्गल भाषाओं में गाने की परम्पराएँ बनी। डिन्गल भाषा में शक्ति, ओज, और उत्साह अधिक होता है, जबकि पिन्गल में अधिक कोमलता है, वह ब्रज भाषा के अधिक करीब है। डिन्गल भाषा में युद्ध से पहले राजा और योद्धाओ को उत्साहित करने के लिए गाते थे। (नीचे वीडियो में श्री शक्तिदान कवि डिन्गल और पिन्गल के बेद के बारे में बताते हैं)

मैथिल कवि विद्यापति ने अवहट भाषा में लिखा, जैसे कि - "कुसमित कानन कुंज वसि, नयनक काजर घोरि मसि। नखसौ लिखल नलिनि दल पात, लिखि पठाओल आखर सात।" (नीचे के वीडियो-क्लिप में फ़िल्म से प्रो. शुकदेव सिंह विद्यापति की अवहट के बारे में)



बाहरवीं-तेहरवीं शताब्दी में हिंदी का स्वरूप सामने आने लगा। निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य अमीर खुसरो ने बहुत सी रचनाएँ इसी हिन्दवी भाषा में लिखीं, जैसे कि उनका यह गीत, "छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके, प्रेम भटी का मदवा पिलाइके, मतवारी कर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके। गोरी गोरी बईयाँ, हरी हरी चूड़ियाँ, बईयाँ पकड़ धर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके", बहुत प्रसिद्ध हुआ। खुसरो ने एक नया प्रयोग भी किया जिसे "दो सुखने" कहते हैं, कविताएँ जिनका एक हिस्सा फारसी में था और दूसरा हिंदी में।

मौलाना दाउद ने अवधी भाषा में "चांदायन" महाकाव्य की रचना की जिसमें उन्होंने चौपाई और दोहों को लिखा, यह ग्रंथ तुलसीदास के मानस से करीब दो-ढाई सौ साल पहले था। उन्होंने जिस तरह से चांदायन में रूप और प्रेम की पीड़ा का वर्णन किया, वह अनोखा था। इस तरह से हिंदी में सूफी काव्यधारा की परम्परा का प्रारम्भ हुआ।

अवधी लेखन की परम्परा में आगे चल कर मालिक मुहम्मद जायसी ने "पद्मावत" को रचा। अवधी भाषा का क्षेत्र बहुत बड़ा था और उसमें एक जगह से दूसरी जगह में कुछ अंतर थे। जायसी की अवधी, जौनपुर और सुल्तानपुर की अवधी थी, वह बहुत लोकप्रिय हुई लेकिन सबसे समझी नहीं गई।

तुलसीदास जी बहुत घूमे थे, उन्होंने अपनी अवधी को अखिल भारतीय रूप दिया, अपनी बात को सरल भाषा में कहा जिसे आम लोग, हलवाई, हज्जाम भी बोलते-समझते थे। उनके काव्य में इतनी उक्तियाँ हैं जिन्हें गाँव के अनपढ़ लोग भी याद रखते हैं और आम जीवन में बोलते हैं। (नीचे के वीडियो-क्लिप में फ़िल्म से प्रो. अजय तिवारी जायसी और तुलसीदास की अवधी के बारे में बताते हैं)




१४वीं - १७वीं शताब्दियों में "खड़ी बोली" सामने आई। कबीर जैसे संत-कवियों ने खड़ी बोली में अंधविश्वास, कर्मकाँड, छूआ-छूत के विरुद्ध कविताएँ गाईं, जो आज तक लोकप्रिय हैं।
 
हिंदी का सारा साहित्य ब्रज भाषा और अवधी में लिखा गया। जो मिठास ब्रज भाषा में मिलती है, वह अवधी में नहीं है। इस मिठास का सारा श्रेय महाकवि सूरदास को जाता है जिन्होंने ब्रज भाषा में लिखा, उसे विकसित किया और लोकप्रिय बनाया।
 
अठाहरवीं शताब्दी में हैदराबाद में ख्वाज़ा बंदानवाज़ ने मिली-जुली भाषा की बुनियाद रखी जिसमें हिंदी, उर्दू और फारसी मिली-जुली थीं। इसकी लिपी हिंदी थी और यह दखिनी हिंदी या दखिनी उर्दू कहलाती है।
 
१८७३ में भारतेन्दू हरीशचन्द्र ने ऐसी कविताएँ लिखीं जिनसे हिंदी नयी चाल में ढली। उनकी कविताएँ ब्रज भाषा में थीं, लेकिन उन्होंने अपना सारा गद्य-लेखन और नाटक खड़ी-बोली में लिखे। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में देवकीनन्दन खत्री, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, यशवंत, निराला, दिनकर, महादेवी वर्मा जैसे लेखकों ने भारत के विभिन्न वर्गों, स्तरों, क्षेत्रों, समाजों से, स्थानीय शब्दों को ले कर अपनी लेखनी से जोड़ा जिससे खड़ी-बोली समृद्ध हुई और हिंदी का विकास व विस्तार हुआ।

निराला ने एक ओर जटिल विचारों की अभिव्यक्ति, "नव गति, नव लय, ताल छंद नव, नवल कंठ नव जलद मंद्र रव। नव नभ के नव विहग वृंद को नव पर नव स्वर दे" जैसे शब्दों में की, जबकि "जीवन संग्राम" जैसी कविता में उसी निराला ने सामान्य बोलचाल की भाषा का उपयोग किया। 

पिछले पचास वर्षों में हिंदी तेज़ी से बदली है। सामाजिक गतिशीलता, आर्थिक बदलावों, बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय सम्पर्कों तथा प्रवासी संस्कृति का प्रभाव हमारी भाषा पर दिखता है। मीडिया ने इसे फैलाने में मदद की है। यह वह हिंदी है जिसमें अंग्रेज़ी, उर्दू आदि के साथ, गुजराती, मराठी आदि भाषाओं के शब्द भी मिल रहे हैं।

अंत में

इस आलेख में हिंदी और उत्तर भारत की भाषाओं के बारे में जो जानकारी है, वह भाषा और इतिहास पढ़ने वालों के लिए नयी नहीं होगी, लेकिन मेरे लिए नयी थी। आज एक ओर भाषा की शुद्धता को बचाने और उसे संस्कृत से जोड़ने की कोशिशें हैं, और दूसरी ओर, उसके सरलीकरण तथा उसमें अन्य भाषाओ से शब्दों को जोड़ने का क्रम भी है।
 
सौ साल बाद हिंदी होगी या नहीं, और होगी तो कैसी होगी? कत्रिम बुद्धि का जिस तरह से विकास हो रहा है उससे भाषाओं की विविधता बनी रहेगी या लुप्त हो जायेगी? इन प्रश्नों के उत्तर मेरे पास नहीं हैं, लेकिन पिछले दो-तीन हज़ार वर्षों का इतिहास यही सिखाता है कि समय के साथ बदले बिना भाषा जीवित नहीं रह पाती।

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गुरुवार, सितंबर 21, 2023

रहस्यमयी एत्रुस्की सभ्यता

ईसा से करीब आठ सौ वर्ष पहले, इटली के मध्य भाग में, रोम के उत्तर-पश्चिम में, बाहर कहीं से आ कर एक भिन्न सभ्यता के लोग वहाँ बस गये जिन्हें एत्रुस्की (Etruscans) के नाम से जाना जाता है। इनकी सभ्यता से जुड़ी बहुत सी बातें, जैसे कि इनकी भाषा, अभी तक पूरी नहीं समझीं गयी हैं। 

उस समय दक्षिण इटली में ग्रीस से आये यवनों का राज था। एत्रुस्की भी लिखने के लिए यवनी वर्णमाला का प्रयोग करते थे, लेकिन उनकी भाषा, धर्म, आदि बाकी यवनों तथा इटली वालों से भिन्न थे। ईसा से करीब सौ/डेढ़ सौ साल पहले जब रोमन सम्राज्य का उदय हुआ तो एत्रुस्की उनसे युद्ध हार गये और धीरे-धीरे उनकी सभ्यता रोमन सभ्यता में घुलमिल कर लुप्त हो गयी।

Etruscan archeological ruins, Marzabotto, Italy - Image by S. Deepak

एत्रुस्कियों के इटली में बारह राज्य थे, हर एक का अपना शासक था, लेकिन वह सारे एक ही धर्मगुरु के अधिपत्य को स्वीकारते थे। ईसा से चार-पाँच सौ वर्ष पूर्व उनका एक राज्य बोलोनिया शहर के पास भी था, जहाँ एक बार मुझे उनके शहर के पुरातत्व अवषेशों को देखने का मौका मिला। इस आलेख में उन्हीं प्राचीन भग्नावशेषों का परिचय है।

पुरातत्व में रुचि

मुझे इतिहास और पुरातत्व के विषयों में बहुत रुचि है। मेरे विचार में जन सामान्य में इतिहास तथा पुरातत्व के बारे में चेतना जगाने में संग्रहालयों का विषेश योगदान होता है। जितना मैंने देखा है, भारत में कुछ संग्रहालयों को छोड़ कर, अधिकांश में हमारी प्राचीन सांस्कृतिक धरौहर का न तो सही तरीके से संरक्षण व प्रदर्शन होता है और न ही उनके बारे में अच्छी जानकारी आसानी से मिलती है। अक्सर, धूल वाले शीशों के पीछे वस्तुएँ बिना विषेश जानकारी के रखी रहती हैं और वहाँ पर तस्वीर नहीं खींचने देते। शायद इसीलिए जन समान्य को इस विषय में कम रुचि लगती है।

सेवा-निवृत होने के बाद, पिछले कुछ वर्षों में, मैं इतिहास और पुरातत्व के बारे में पढ़ता रहता हूँ। मुझे लगता है कि भारतीय इतिहास और पुरातत्व के क्षेत्रों में अभी तक बहुत कम काम किया गया है और बहुत कुछ खोजना तथा समझना बाकी हैं।

खैर, अब चलते हैं उत्तरी-मध्य इटली के बोलोनिया (Bologna - इतालवी भाषा में g और n मिलने से 'इ' की ध्वनि बनती है) शहर के पास मार्ज़ाबोत्तो (Marzabotto) में मिले आज से करीब २६०० साल पुराने एत्रुस्की शहर के भग्नावषेशों की ओर। 

मार्ज़ाबोत्तो के एत्रुस्की भग्नावषेश

युरोप की बहुत सी प्राचीन सभ्यताओं में शहर तीन स्तरों पर बंटे होते हैं - (१) एक ऊँचा शहर, जो किसी पहाड़ी या ऊँचे स्थल पर बना होता है, इन्हें एक्रोपोली (ग्रीक भाषा में 'एक्रो' यानि ऊँचा और 'पोलिस' यानि शहर) जहाँ पर बड़े मन्दिर या राजभवन या किले या अमीर लोगों के घर होते हैं; (२) पोली यानि एक मध्य शहर, जो एक्रोपोली के पास में लेकिन थोड़ा सा नीचे होता है, जहाँ आम जनता रहती है; और (३) एक निचला शहर होता है जो सबसे नीचे होता है और जिसे नेक्रोपोली ('नेक्रो' यानि मृत) कहते हैं जहाँ पर कब्रें होती हैं।

मार्ज़ाबोत्तो के एत्रुस्की शहर के भग्नावषेशों में यह तीनों स्तर दिखते हैं। नीचे की तस्वीर में वहाँ के लोगों के घरों और भवनों की दीवारों और उनके बीच बनी गलियों या सड़कों के अवशेष देख सकते हैं जिनसे उनके जीवन के बारे में जानकारी मिलती है। यह सभी भवन छोटे पत्थरों से बने थे जिन्हें माल्टे से जोड़ते थे। उनकी सबसे चौड़ी सड़क पंद्रह मीटर चौड़ी थी, उसे देख कर मुझे लगा कि उस पर घोड़े या बैल के रथ और गाड़ियाँ आराम से चल सकती थीं।

Etruscan archeological ruins, Marzabotto, Italy - Image by S. Deepak

यहाँ के भग्नवशेषों में पुरात्तवविद्यों ने तिनिआ (Tinia) नाम के एक देवता के मन्दिर को खोजा है, यह प्राचीन ग्रीक के देवताओं की कहानियों के राजा ज़ेउस (Zeus) जैसे थे। "तिनिआ" शब्द का अर्थ 'दिन' या 'सूर्य' भी था, इसलिए शायद इसे सूर्य पूजा की तरह भी देखा जा सकता है। यहाँ एक मन्दिर वाले हिस्से की खुदाई अभी चल रही है, जहाँ पर बीच में एक तालाब या कूँआ जैसा दिखता है।

इस क्षेत्र के दक्षिणी-पूर्व के हिस्से में कुछ नीचे जा कर वहाँ पर एत्रुस्की नेक्रोपोलिस यानि कब्रिस्तान के कुछ हिस्से दिखते हैं। इन भग्नावशेषों में सोने के गहने, कमर में बाँधने वाली पेटियाँ, कानों की बालियाँ, आदि मिली हैं जो कि बोलोनिया शहर के पुरातत्व संग्रहालय में रखी हैं। यहाँ पर पत्थरों की बनी चकौराकार छोटी कब्रें मिलती हैं जिनमें से कुछ के ऊपर बूँद या अंडे जैसे आकार के तराशे हुए  पत्थर टिके हुए दिखते हैं। शायद यह तराशे पत्थर सभी कब्रों पर लगाये जाते थे और समय के साथ कुछ कब्रों से नष्ट हो गये या शायद, उन्हें किन्हीं विषेश व्यक्तियों की कब्रों के लिए बनाया जाता था, जैसा कि आप नीचे की तस्वीर में देख सकते हैं।

Etruscan archeological ruins, Marzabotto, Italy - Image by S. Deepak

एत्रुस्कों की भाषा

एत्रुस्कों की वर्णमाला यवनी/ग्रीक वर्णमाला जैसी थी लेकिन उनकी भाषा यवनी नहीं थी। इनकी भाषा को यवनी से पुराना माना जाता है, और उसे प्रोटो-इंडोयुरोपी भाषा भी कहा गया है। पुरातत्वविद्य कहते हैं कि यह लोग यवनभूमि के आसपास के किसी द्वीप के निवासी थे।

मुझे एत्रुस्कों के कुछ शब्दों में संस्कृत का प्रभाव लगा। जैसे कि 'ईश' को वह लोग 'एइसना' कहते थे, 'यहाँ' को 'इका', 'वहाँ' को 'इता', आदि। उनकी भाषा में 'सूर्य' का एक नाम 'उशिल' भी था, जिसमें मुझे 'उषा' की प्रतिध्वनि सुनाई दी। लेकिन उनके अधिकांश शब्दों में संस्कृत का प्रभाव नहीं है।

एत्रुस्की संग्रहालय

भग्नावशेषों के पास में ही मार्ज़ाबोत्तो में मिली एत्रिस्की वस्तुओं का संग्रहालय भी है। वहाँ उनके मिट्टी के बने तोलने वाले छोटे बट्टे दिखे (नीचे तस्वीर में).

Etruscan archeological ruins, Marzabotto, Italy - Image by S. Deepak

उनकी एक पूजा की थाली लिये हुए स्त्री की मूर्ति मुझे सुन्दर लगी।

Etruscan archeological ruins, Marzabotto, Italy - Image by S. Deepak

नीचेवाली, संग्रहालय की तीसरी तस्वीर में एत्रुस्की स्त्रियों के वस्त्रों को दिखाया गया है।

Etruscan archeological ruins, Marzabotto, Italy - Image by S. Deepak

अंत में

जब तक भाप के जहाज़, रेलगाड़ियाँ, मोटरगाड़ियाँ आदि नहीं थीं, एक जगह से दूसरी जगह जाना कठिन होता था। जिस रास्ते को आज हम साईकल से एक-दो घंटों में पूरा कर लेते हैं, कभी उसे पैदल चलने में पाँच-छह घंटे लग जाते थे। पहाड़ी घाटियों और द्वीपों में यह रास्ते पार करना और भी कठिन होता था। तब हर दस किलोमीटर पर, हर शहर, हर घाटी, हर द्वीप में, लोगों की भाषा, उनके खानपान का तरीका, आदि बदल जाते थे। एत्रुस्की सभ्यता ऐसे ही समय का नतीजा थी, यह एक द्वीप के लोगों की सभ्यता थी, जिसे ले कर वहाँ के निवासी दूर देश की यात्रा पर निकले और उन्हें उत्तरी-मध्य इटली में नया घर मिला।

घोड़े से मानव को इतिहास का पहला तेज़ वाहन मिला और दुनिया सिकुड़ने लगी। आज की दुनिया में तकनीकी विकास के सामने दूरियाँ और भी कम हो रहीं हैं और फिल्म-टीवी-इंटरनेट-मोबाइल आदि के असर से हमारी भाषाएँ, संस्कृतियों की भिन्नताएँ आदि धीरे-धीरे लुप्त हो रहीं हैं।

मानव समाजों का इतिहास क्या था, कैसे दुनिया के विभिन्न भागों में अलग-अलग सभ्यताएँ और संस्कृतियाँ विकसित हुईं, भविष्य के लिए इसकी याद को सम्भाल कर रखने के लिए, हम सभी को प्रयत्न करना चाहिये। आप चाहे जहाँ भी रहते हो, चाहे वह छोटा शहर हो या कोई गाँव, यह बदलाव का तूफान एक दिन आप की दुनिया को भी बदल देगा। आप कोशिश करो कि बदलाव से पहले वाली दुनिया की जानकारी को, उसकी सांस्कृतिक धरौहर की यादों को सम्भाल कर संजो रखो।

Etruscan archeological ruins, Marzabotto, Italy - Image by S. Deepak

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मंगलवार, अगस्त 29, 2023

"आदिपुरुष" की राम कथा

कुछ सप्ताह पहले आयी फ़िल्म "आदिपुरुष" का जन्म शायद किसी अशुभ महूर्त में हुआ था। जैसे ही उसका ट्रेलर निकला, उसके विरुद्ध हंगामे होने लगे। कुछ मित्रों ने देख कर फ़िल्म के बारे में कहा कि वह तीन घंटों की एक असहनीय यातना थी, जिसकी जितनी बुराईयाँ की जायें, वह कम होंगी। जब फ़िल्म के बारे में इतनी बुराईयाँ सुनी तो मन में उसे देखने की इच्छा का जागना स्वाभाविक था, कि मैं भी देखूँ और फ़िर उसकी बुराईयाँ करूँ। चूँकि फ़िल्म नेटफ्लिक्स पर है तो उसे देखने का मौका भी मिल गया।

जैसा कि अक्सर होता है, जब किसी फ़िल्म की बहुत बुराईयाँ सुनी हों और उसे देखने का मौका मिले तो लगता है कि वह इतनी भी बुरी नहीं थी। "आदिपुरुष" देख कर मुझे भी ऐसा ही लगा, बल्कि लगा कि उसके कुछ हिस्से और बातें अच्छी थीं।

फ़िल्म की जो बातें मुझे नहीं जंचीं

लेकिन इस आलेख की शुरुआत उन बातों से करनी चाहिये जो मुझे भी अच्छी नहीं लगी। उनमें सबसे पहली बात है कई जगहों पर कम्प्यूटर ग्राफिक्स का प्रयोग अच्छा नहीं है। जैसे कि मुझे कम्प्यूटर ग्राफिक्स से बने दोनों पक्षी, यानि रावण का वहशी वाहन और जटायू, यह दोनों और उनकी लड़ाई वाले हिस्से अच्छे नहीं लगे। इसी तरह से बनी वानर सैना भी मुझे अच्छी नहीं लगी। फ़िल्म के जिन हिस्सों में यह सब थे, मुझे लगा कि वह कमज़ोर थे, क्योंकि उनमें अत्याधिक नाटकीयता थी जिसकी वजह से उन दृष्यों से भावनात्मक जुड़ाव नहीं बनता था।

लेकिन इन हिस्सों के अतिरिक्त कुछ अन्य हिस्से थे, जहाँ के कम्प्यूटर ग्राफिक्स मुझे अच्छे लगे, हालाँकि मेरे विचार में फ़िल्म में कपिदेश तथा लंका वाले हिस्सों में श्याम और गहरे नीले रंगों को इतनी प्रधानता नहीं देनी चाहिये थी। शायद फ़िल्म के यह काले-गहरे नीले रंगों वाले हिस्से हॉलीवुड की चमगादड़-पुरुष यानि बैटमैन की फ़िल्मों से कुछ अधिक ही प्रभावित थे। इसी तरह से फ़िल्म के अंत में रावण के शिव मंदिर से बाहर निकलने वाले दृश्य में हज़ारों चमगादड़ जैसे जीवों का निकलना भी उसी प्रभाव का नतीज़ा था।

भारतीय कथा-कहानियों के कल्पना जगत, उनके भगवान और उनके लीलास्थल, रोशनी और रंगों से भरे हुए होते हैं, जैसा कि हमारे मंदिरों की मूर्तियों, रामलीलाओं, नाटकों और नृत्यों में होता है। बजाय "बैटमैन" से प्रेरणा लेने के, अगर फ़िल्म "अवतार" जैसे प्रज्जवलित रंगो वाले संसार की सृष्टि की जाती तो वह बेहतर होता (फ़िल्म में जंगल के ऐसे कुछ हिस्से हैं, लेकिन थोड़े से हैं).

फ़िल्म में "सोने की लंका" को काले पत्थर की लंका बना दिया गया है, जो मेरी कल्पना वाली लंका से बिल्कुल उलटी थी।

लंका की अशोक वाटिका, जहाँ जानकी कैद होती हैं, को इस फ़िल्म में जापानी हानामी फैस्टिवल जैसा बनाया गया है जिसमें काले पत्थरों के बीच में गुलाबी चैरी के फ़ूलों से भरे पेड़ लगे हैं जो देखने में बहुत सुन्दर लगते हैं। हालाँकि यह भी मेरी कल्पना की अशोक वाटिका से भिन्न थी, लेकिन यह मुझे अच्छी लगी, क्योंकि मुझे लगा कि इन दृश्यों में वे काले पत्थर जानकी की मानसिक दशा को अभिव्यक्त करते थे। फ़िल्म के अभिनेताओं में मुझे जानकी का भाग निभाने वाली अभिनेत्री सबसे अच्छी लगीं।

हनुमान, सुग्रीव तथा वानर सैना

जब फ़िल्म का ट्रेलर आया था तो लोग उसमें हनुमान जी के स्वरूप को देख कर बहुत क्रोधित हुए थे। फ़िल्म में हनुमान जी को देख कर मुझे भी शुरु में कुछ अजीब सा लगा लेकिन फ़िर मुझे वह अच्छे लगे। लोग उनके डायलोग सुन कर भी खुश नहीं थे, जबकि मुझे लगा कि इस तरह से फ़िल्म में हनुमान जी की वानर बुद्धि दिखाई गयी है। यानि इसके हनुमान जी सीधी-साधी सोच वाले, कुछ-कुछ गंवार से हैं, लेकिन राम-भक्ती से भरे हैं। वह ऐसे जीव हैं जिन्हें ऊँची जटिल बातों और कठिन पहेलियों के उत्तर नहीं आते, लेकिन वह हर बात को अपनी राम-भक्ति के चश्में से देख कर उनका सहज उत्तर खोज लेते हैं। मुझे उनका यह गैर-बुद्धिजीवि रूप अच्छा लगा।

फ़िल्म में वानरों और कपि-पुरुषों को भिन्न-भिन्न रूपों में दिखाया गया है। जैसे कि अगर हनुमान जी की त्वचा मानवीय लगती है तो बाली और सुग्रीव की गोरिल्ला जैसी। साथ में वानर भी विभिन्न प्रकार के हैं। मेरी समझ में फ़िल्म में इस तरह से वानर सैना और कपिराजों को आदिकालीन प्राचीन मानव की विभिन्न नसलों की तरह बनाया गया है।

मैंने बचपन से रामपाठ और रामलीलाएँ देखी हैं, उनमें सामान्य लोकजन के लिए हँसी-मज़ाक भी होता है और नर्तकियों के झटकेदार नृत्य भी होते हैं, जबकि कुछ लोग जो फ़िल्म की बुराई कर रहे थे,उन्हें इन सब बातों से आपत्ति थी। रामकथा को धर्म और श्रद्धा से सुनने का अर्थ यह बन गया है कि उसमें से लोकप्रिय हँसी-मजाक और ठुमके वाले गीत-नृत्यों आदि को निकाल दिया जाये। मेरी दृष्टि में यह गलती है। यह सच है कि अन्य धर्मों के पूजा स्थलों पर चुपचाप रहना और गम्भीर चेहरा बनाना होता है, वहाँ पर हँसी-मज़ाक की जगह नहीं होती, लेकिन मैंने मन्दिरों में, तीर्थ स्थलों आदि में आम जनता को कभी चुपचाप नहीं देखा, फ़िल्मी धुनों पर भजन और गीत गाना, हँसी-मज़ाक करना, अड़ोसियों-पड़ोसियों की आलोचना करना, मन्दिरों में और तीर्थस्थलों पर यह सब कुछ आनंद से होता है। अन्य धर्मों की देखा-देखी, हिन्दू धर्म की खिलंदड़ता और आनंद को दायरों में बाँधना, कहना कि ऐसा न करो, वैसा न करो, मुझे गलत लगता है।

रामकथा की नयी परिकल्पना

रामायण की कथा को अनेकों बार विभिन्न रूपों में परिकल्पित किया गया है। इन सब परिकल्पनाओं में तुलसीदास जी की रामचरित मानस का विशिष्ठ स्थान है। लेकिन यह कहना कि रामकथा को नये समय के साथ नये तरीकों से परिभाषित न किया जाये, तो बहुत बड़ी गलती होगी। हमारे उपनिषद कहते हैं कि हर जीव में ईश्वर हैं और जीवन के अंत में हर आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है, यानि "अहं शिवं अस्ति", हमारे भीतर शिव हैं, इसलिए हर आत्मा को अधिकार है कि वह अपनी समझ से अपने ईश्वर से बात करे। जब आप यह बात स्वीकार करते हैं तो क्या व्यक्ति से अपने अंदर के भगवान से बात करने के उसके अधिकार को छीन लेंगे? रामायण को और धर्म से जुड़ी हर बात को, हर कोई अपनी दृष्टि से परिभाषित कर सके, यह भी तो हमारा अधिकार है।

यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि हम लोग समय और विकास के साथ, अपने धर्म को बदल व सुधार सकें, उसे सही दिशा में ले कर जायें।

इस दृष्टि से "आदिपुरुष" में रामकथा के कुछ हिस्सों की नयी परिभाषा की गयी है जो मुझे अच्छी लगीं। जैसे कि बाली और सुग्रीव के युद्ध में राम का हस्ताक्षेप। रामलीला में जब यह हिस्सा आता था तो मुझे हमेशा लगता था कि राम ने छिप कर बाली पर पीठ से वार करके सही नहीं किया, क्योंकि इसमें मर्यादा नहीं थी। लेकिन "आदिपुरुष" में इस घटना को जिस तरह से दिखाया गया है, वह नयी परिभाषा मुझे अच्छी लगी।

ऐसे ही रामलीला में लक्ष्मण का सूर्पनखा की नाक को काटना भी मुझे हमेशा गलत लगता था लेकिन फ़िल्म में इस घटना को जिस तरह दिखाया गया है, जिसमें लक्ष्मण सीता जी की रक्षा के लिए दूर से सूर्पनखा पर वार करते हैं जो उसकी नाक पर लग जाता है, यह परिकल्पना भी मुझे अच्छी लगी।

लेकिन फ़िल्म का रावण मुझे विद्वान और ज्ञानी ब्राह्मण कम और सामान्य खलनायक अधिक लगा। फ़िल्म के प्रारम्भ में उसकी तपस्या से खुश हो कर जब ब्रह्मा जी उसे वरदान देते हैं तब भी उसे दम्भी, अहंकारी दिखाया गया है, तो मन में प्रश्न उठा कि ब्रह्मा जी कैसे भगवान थे कि वह उसके मन की इन भावनाओं को देख नहीं पाये? क्या तपस्या का अर्थ केवल शरीर को कष्ट देना या ध्यान करना है, उसमें मन का शुद्धीकरण नहीं चाहिये? बाद में रावण का सीताहरण भी केवल वासना तथा अहंकार का नतीजा दिखाया गया है। रावण के व्यक्तित्व से जुड़ी यह दोनों बातें मुझे इस फ़िल्म की कमज़ोरी लगीं।

लेकिन रामानंद सागर की रामायण या रामलीला में डरावना दिखाने के लिए जिस तरह से "हा-हा-हा" करके हँसने वाले रावण या कुंभकर्ण आदि दिखाये जाते थे, वे यहाँ नहीं दिखे, यह बात मुझे अच्छी लगी।

और अंत में

मुझे "आदिपुरुष" फ़िल्म बुरी नहीं लगी, बल्कि इसके कुछ हिस्से और फ़िल्म का संगीत बहुत अच्छे लगे। मैं उन लोगों से सहमत नहीं हूँ जो फ़िल्मों को बैन करने की बात करते हैं। मेरे विचार में हमें रामकथा या महाभारत या अन्य धार्मिक कथाओ को नये तरीकों से परिभाषित करते रहना चाहिए। अगर आप को उन नयी परिभाषाओ से आपत्ति है तो उसके विरुद्ध लिखिये, या आप अपनी नयी परिभाषा गढ़िये।  

पिछले कुछ समय से बात-बात पर कुछ लोग सोशल मीडिया पर उत्तेजित हो कर तोड़-फोड़ या बैन की बातें करने लगते हैं। कहते हैं कि उन्होंने हमारे भगवान का या धर्म का या भावनाओ का अपमान किया है, इसलिए हम इस नाटक, फ़िल्म, कला या किताब को बाहर नहीं आने देंगे, दंगा कर देंगे या आग लगा देंगे। मेरे विचार में इन लोगों को हिन्दू धर्म का ज्ञान नहीं है और यह देवनिंदा को अन्य धर्मों की दृष्टि से देखते हैं (मैंने "देवनिंदा" के विषय पर पहले भी लिखा है, आप चाहे तो उसे पढ़ सकते हैं।) मुझे लगता है कि यह उनके आत्मविश्वास की कमी तथा मन में हीनता की भावना का नतीजा है। 

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शनिवार, जून 17, 2023

प्राचीन भित्ती-चित्र और फ़िल्मी-गीत

कुछ सप्ताह पहले मैं एक प्राचीन भित्ती-चित्रों की प्रदर्शनी देखने गया था। दो हज़ार वर्ष पुराने यह भित्ती-चित्र पोमपेई नाम के शहर में मिले थे। उन चित्रों को देख कर मन में कुछ गीत याद आ गये। भारत में फ़िल्मी संगीत हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन जाता है, और हमारे जीवन में कोई भी परिस्थिति हो, उसके हिसाब से उपयुक्त गीत अपने आप ही मानस में उभर आते है। यह आलेख इसी विषय पर है।

पोमपेई के प्राचीन भित्ती-चित्र

इटली की राजधानी रोम के दक्षिण में नेपल शहर के पास एक पहाड़ है जिसका नाम वैसूवियो पर्वत है। आज से करीब दो हज़ार वर्ष पूर्व इस पहाड़ से एक ज्वालामुखी फटा था, जिसमें से निकलते लावे ने पहाड़ के नीचे बसे शहरों को पूरी तरह से ढक दिया था। उस लावे की पहली खुदाई सन् १६०० के आसपास शुरु हुई थी और आज तक चल रही है।



इस खुदाई में समुद्र तट के पास स्थित दो प्राचीन शहर, पोमपेई और एरकोलानो, मिले हैं जहाँ के हज़ारों भवनों, दुकानों, घरों, और उनमें रहने वाले लोगों को, उनके कुर्सी, मेज़, उनकी चित्रकला और शिल्पकला, आदि सबको उस ज्वालामुखी के लावे ने दबा दिया था और जो उस जमे हुए लावे के नीचे इतनी सदियों तक सुरक्षित रहे हैं।

मैं पोमपेई के भग्नवषेशों को देखने कई बार जा चुका हूँ और हर बार वहाँ जा कर दो हज़ार वर्ष पहले के रोमन जीवन के दृश्यों को देख कर चकित हो जाता हूँ। जैसे कि नीचे वाले चित्र में आप पोमपेई का एक प्राचीन रेस्टोरैंट देख सकते हैं - इसे देखते ही मैं पहचान गया क्योंकि इस तरह के बने हुए ढाबे और रेस्टोरैंट आज भी भारत में आसानी से मिलते हैं।
 

इन अवषेशों से पता चलता है कि उस ज़माने में वहाँ के अमीर लोगों को घरों की दीवारों को भित्तीचित्रों से सजवाने का फैशन था, जिनमें उनके देवी-देवताओं की कहानियाँ चित्रित होती थीं। इन्हीं चित्रों की एक प्रदर्शनी कुछ दिन पहले बोलोनिया शहर के पुरातत्व संग्रहालय में लगी थी।

पोम्पेई कैसा शहर था और ज्वालामुखी फटने से क्या हुआ इसे समझने के लिए आप एक छोटी सी (८ मिनट की) फिल्म को भी देख सकते हैं जो कि बहुत सुंदर बनायी गयी है।

अब बात करते हैं पोमपेई के कुछ भित्तीचित्रों की जिन्हें देख कर मेरे मन में हिंदी फिल्मों के गीत याद आ गये।

प्रार्थना करती नारी

नीचे वाला भित्तीचित्र पोमपेई के एक बंगले में मिला जिसे चित्रकार का घर या सर्जन (शल्यचिकित्सक) का घर कहते हैं। इसमें एक महिला स्टूल पर बैठी है, उनके सामने एक मूर्ति है और मूर्ति के नीचे किसी व्यक्ति का चित्र रखा है। चित्र के पास एक बच्चा बैठा है और नारी के पीछे दो महिलाएँ खड़ी हैं। चित्र को देख कर लगता है कि वह नारी भगवान से उस व्यक्ति के जीवन के लिए प्रार्थना कर रही है। सभी औरतों के वस्त्र भारतीय पौशाकों से मिलते-जुलते लगते हैं।
 

इस चित्र को देखते ही मुझे १९६६ की फ़िल्म "फ़ूल और पत्थर" का वह दृश्य याद आ गया जिसमें राका (धर्मेंद्र) बिस्तर पर बेहोश पड़ा है और विधवा शांति (मीना कुमारी) भगवान के सामने उनके ठीक होने की प्रार्थना कर रही है, "सुन ले पुकार आई, आज तेरे द्वार लेके आँसूओं की धार मेरे साँवरे"।

इसी सैटिन्ग में "लगान" का गीत "ओ पालनहारे" भी अच्छा फिट बैठ सकता है। वैसे यह सिचुएशन हिंदी फिल्मों में अक्सर दिखायी जाती है और इसके अन्य भी बहुत सारे गाने हैं।

संगीतकार और जलपरी की कहानी

पोमपेई के भित्ती-चित्रों में ग्रीक मिथकों की कहानियों से जुड़े बहुत से भित्ती-चित्र मिले हैं। जैसे कि प्राचीन ग्रीस के मिथकों की एक कहानी में भीमकाय शरीर वाले पोलीफेमों को जलपरी गलातेया से प्यार था, उन्होंने संगीत बजा कर उसे अपनी ओर आकर्षित करने की बहुत कोशिश की लेकिन जलपरी नहीं मानी क्यों कि वह किसी और से प्यार करती थी। नीचे दिखाये भित्ती-चित्र में पोलीफेमो महोदय निर्वस्त्र हो कर गलातेया को बुला रहे हैं जबकि गलातेया अपनी सेविका से कह रही है कि इस व्यक्ति को यहाँ से जाने के लिए कहो।


इस चित्र की जलपरी सामान्य महिला लगती है और उनके वस्त्र व वेशभूषा भारतीय लगते हैं। मेरे विचार में भारत में अप्सराओं को गहनों से सुसज्जित बनाते हैं जबकि यह जलपरी उनके मुकाबले में बहुत सीधी-सादी लगती है।

जैसा कि इस चित्र में दिखाया गया है, प्राचीन रोमन तथा यवनी भित्तीचित्रों में पुरुष शरीर की नग्नता बहुत अधिक दिखती है और उसकी अपेक्षा में नारी नग्नता कम लगती है। इस चित्र को देख कर मुझे लगा कि इसमें पोलीफेमो अनामिका फिल्म का गीत गा रहा है, "बाहों में चले आओ, हमसे सनम क्या परदा", जबकि जलपरी कन्यादान फिल्म का गीत गा रही है, "पराई हूँ पराई, मेरी आरजू न कर"।

यवनी सावित्री और सत्यवान

प्राचीन ग्रीस की भी एक सावित्री और सत्यवान की कहानी से मिलती हुई कथा है। उनके नाम थे अलसेस्ती और अदमेतो, लेकिन इनकी कथा भारतीय कथा से थोड़ी सी भिन्न थी।

जब अदमेतो को लेने मृत्यु के देवता आये तो अदमेतो ने उनसे विनती की कि उन्हें नहीं मारा जाये, तो मृत्यु देव ने कहा कि वह उनके बदले उनके परिवार के किसी भी व्यक्ति की आत्मा ले कर चले जायेंगे, जो  उनकी जगह मरने को तैयार हो।

अदमेतो ने अपने माता-पिता से अपनी जगह पर मरने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। तब उनकी पत्नी अलसेस्ती बोली कि वह उसकी जगह मरने को तैयार थी। मृत्यु देव अलसेस्ती की आत्मा को ले कर वहाँ से जा रहे थे जब भगवान अपोलो ने उसे जीवनदान दिया और वह पृथ्वी पर अपने पति के पास लौट आयी।

इस चित्र में नीचे वाले हिस्से में अदमेतो, अलसेस्ती और उनके दास को दिखाया गया है। ऊपरी हिस्से में, उनके पीछे बायीं ओर अदमेतो के बूढे माता-पिता हैं और दायीं ओर, अलसेस्ती और भगवान आपोलो हैं।
 

इस चित्र में अलसेस्ती की वेशभूषा और उसके चेहरे का भाव मुझे बहुत भारतीय लगे, जबकि अदमेतो को निर्वस्त्र दिखाया गया है।
 
सावित्री-सत्यवान की कहानी पर बहुत सी फ़िल्में बनी हैं, लेकिन इस सिचुएशन वाला उनका कोई गीत नहीं मालूम था, उसकी जगह पर मेरे मन में एक अन्य गीत याद आया, “मार दिया जाये कि छोड़ दिया जाये, बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाये"। कहिये, यह गीत इस सिचुएशन पर भी बढ़िया फिट बैठता है न?

विश्वामित्र और मेनक

कालीदास की कृति "अभिज्ञान शकुंतलम" में ऋषि विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए इन्द्र स्वर्गलोक से अप्सरा मेनका को भेजते हैं, और उनके मिलन से शकुंतला पैदा होती है। अगले चित्र में ऐसी ही स्वर्ग की एक देवी की प्राचीन यवनी कहानी है।

इस ग्रीक कथा में स्वर्ग की देवी सेलेने का दिल धरती के सुंदर राजा एन्देमेनों पर आ जाता है तो वह खुद को रोक नहीं पाती और कामातुर हो कर उनसे मिलन हेतू धरती पर आती है। यह कहानी भी उस समय बहुत लोकप्रिय थी क्योंकि इस विषय पर बने बहुत से भित्तीचित्र मिले हैं। नीचे वाले चित्र में सेलेने निर्वस्त्र हो कर एन्देमेनो कीओर आ रही हैं, उनकी पीछे एक एँजल बनी है।


इस कथा के अनुसार देवी सेलेने उससे प्रेम करते समय एन्देमेनों को सुला देती है, इस तरह से वह सोचता है कि वह सचमुच नहीं था बल्कि उसने सपने में किसी सुंदर अप्सरा से प्रेम किया था।

इस तस्वीर को देख कर मेरे मन में आराधना फ़िल्म का यह गीत आया - “रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना, भूल कोई हमसे न हो जाये"। इस सिचुएशन पर अनामिका फ़िल्म का गीत, "बाहों में चले आओ, हमसे सनम क्या परदा" भी अच्छा फिट होता।

हीरो जी

अंत में अपने हीरो जैसे शरीर पर इतराते एक युवक की शिल्पकला है, जिसे देख कर मुझे सलमान खान की याद आई। इस शिल्प कला से लगता है कि उस समय अमीर लोगों का अपने घरों में नग्न पुरुष शरीर को दिखाना स्वीकृत था।


जब मैंने इस कलाकृति को देखा तो मन में सलमान खान का गीत "मैं करूँ तो साला करेक्टर ढीला है" याद आ गया। अगर कोई आप से इस युवक के चित्र के लिए गीत चुनने को कहे तो आप कौन सा गीत चुनेंगे?

मैंने पढ़ा कि शिल्प और चित्रकला में पुरुष शरीर को दिखाने की ग्रीक परम्परा में पुरुष यौन अंग को छोटा दिखाना बेहतर समझा जाता था, क्यों कि वह लोग सोचते थे कि इससे पुरुष वीर्य जब बाहर निकलता है तो वह अधिक गर्म और शक्तिशाली होता है, जबकि अगर वह अंग बड़ा हो गा तो वीर्य बाहर निकलते समय ठंडा हो जायेगा और उसकी शक्ति कम होगी।

अंत में

मुझे पोमपेई की गलियों और घरों में घूमना और वहाँ के दो हज़ार साल पहले के जीवन बारे में सोचना बहुत अच्छा लगता है।

भारत में मध्यप्रदेश में भीमबेटका में आदि मानव के जीवन और महाराष्ट्र में अजंता जैसी गुफाओं में भगवान बुद्ध के समय के जीवन, या फ़िर उत्तर-पश्चिम में लोथाल, गनेरीवाला और राखीगढ़ी जैसी जगहों पर पुरातत्व अवशेषों से और भित्ती-चित्रों से सिंधु घाटी सभ्यता को समझने के मौके मिलते हैं, लेकिन पोमपेई तथा एरकोलानो में जिस तरह से उस समय का समस्त जीवन पिघले हुए लावे में कैद हो गया, वह दुनिया में अनूठा है।

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मंगलवार, फ़रवरी 21, 2017

झाँकियों का अनूठा गाँव

यह दुनियाँ तेज़ी से बदल रही है और इस बदलती दुनियाँ में तकनीकी तथा अन्य विकासों की वजह से जीवनयापन के नये तरीके निकालना आवश्यक हो गया है. आज मैं उतरी इटली के एक गाँव की बात लिख रहा हूँ, जहाँ पर्यटकों को आकर्षित करने तथा स्थानीय व्यवसाय को बढ़ावा देने का एक नया तरीका अपनाया गया है. इस गाँव का नाम है संत अंतोनियो (Sant'Antonio) और यह उत्तरी पूर्व इटली में एल्पस की पर्वतश्रृख्ला के पाज़ूबियो पहाड़ के साये में बना एक गाँव है.

कुछ वर्ष पहले संत अंतोनियो के निवासियों ने पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए मोम की मूर्तियाँ बनाने की सोची. नीचे की तस्वीर में आप इन मूर्तियों का एक नमूना देख सकते हैं जिससे आप उनकी जीवंत कला का अन्दाज़ लगा सकते हैं.


स्कियो का बदलता जीवन

संत अंतोनियों का गाँव स्कियो (Schio) शहर की नगरपालिका का हिस्सा है. इसी स्कियो शहर में हमारा घर है जहाँ मैं रहता हूँ.

पाज़ूबियो (Pasubio) की पर्वत की छाया में बसे छोटे से शहर स्कियो में उन्नीसवीं शताब्दी में बड़े पैमाने पर उद्योगीकरण हुआ. यहाँ का सबसे बड़ा उद्योग था ऊन बनाने की फैक्टरियाँ. आसपास के पहाड़ों पर भेड़े तथा पहाड़ी बकरियाँ पालीं जाती जिनका फर कट कर स्कियो की फैक्टरियों में पहुँचता जहां उसकी रंगबिरंगी ऊन बनती. ऊनी कपड़े बुनने की भी फैक्टरियाँ थीं. इस सब की वजह से यह क्षेत्र बहुत समृद्ध था.

उस समय इटली की राष्ट्रसीमा स्कियो में पाज़ूबियो पर्वत पर थी, पहाड़ के उत्तर की ओर आस्ट्रिया था, दक्षिण में इटली. 1914 में यह क्षेत्र प्रथम विश्वयुद्ध की लपेट में आ गया, जब इटली तथा आस्ट्रिया (Austria) के बीच में भी लड़ाई छिड़ी. अमरीकी फौज की छावनी स्कियो में थी. विश्वयुद्ध के दौरान कुछ समय तक अमरीकी सिपाही अरनेस्ट हेमिगवे, स्कियो की एक ऊन की फैक्टरी में बने अस्पताल में एम्बूलैंस चालक थे, और युद्ध के बाद में प्रसिद्ध लेखक बने.

युद्ध का शहर पर तथा आसपास के गाँवों पर बहुत असर पड़ा लेकिन फ़िर धीरे धीरे, ऊन की फैक्टरियों का काम दोबारा से निकल पड़ा. युद्ध में आस्ट्रिया की हार हुई थी, इसलिए पाजूबियो पर्वत के उत्तर का हिस्सा भी इटली में जुड़ गया.

लेकिन पिछले बीस-तीस वर्षों में वैश्वीकरण की वजह से नयी समस्याएँ खड़ी हो गयीं थीं. चीन से आने वाली सस्ती ऊन तथा स्वेटरों की वजह से यहाँ बनने वाली स्थानीय ऊन का बाज़ार नहीं रहा और एक एक करके सारी ऊन की फैक्टरियाँ बन्द हो गयीं. नये तकनीकी विकास से जुड़े कुछ उद्योग उभर कर आये पर पहाड़ी गाँवों में भेड़ों बकरियों से जुड़े जीवन यापन करने वाले लोगों के लिए कुछ नया खोजना आवश्यक था.

विभिन्न देशों में छोटे पहाड़ी गाँवों में पर्यटन से जुड़े विकास की कई कहानियाँ हैं. कहीं पर मेले आयोजित किये जाते हैं, कहीं पर नये खेल तो कहीं पर गाँवों को रंगबिरंगा बनाया जाता है. इस सब में आवश्यक है कि कुछ ऐसा किया जाये तो अन्य जगह न हो, जिससे गाँव की अपनी, अनूठी पहचान बने और पर्यटक वहाँ आने के लिए आकर्षित हों. संत अंतोनियो के गाँव ने भी ऐसा ही कुछ करने का सोचा.

संत अंतोनियो का खुली हवा में बना क्रिसमस की मूर्तियों का संग्रहालय

जैसे भारत में कृष्ण जन्माष्टमी पर अक्सर लोग घरों के बाहर झाँकियाँ बनाते हैं, इटली में क्रिसमस के अवसर में घर घर में छोटी छोटी झाँकियाँ बनायी जाती हैं.

संत अंतोनियों के लोगों ने सोचा कि इसी प्रथा को बड़े पैमाने पर तथा उसमें कुछ नया जोड़ कर बनाया जाये. चूँकि गाँव में कुछ मूर्तिकार रहते थे, उन्होंने कहा कि मानव आकार की ऐसी मूर्तियाँ बनायी जायें जो देखने में जीती जागती लगें.



उनका दूसरा निर्णय था कि सदियों से जिस तरह गाँव में परिवार रहते आये थे, वे जीवन शैलियाँ लुप्त होने लगी थीं, तो उनकी याद को जीवित रखा जाये जिससे आजकल के बच्चे यह जान सकें कि उनके दादा परदादा किस तरह रहते थे, किस तरह काम करते थे. यह भी निर्णय लिया गया कि उन मूर्तियों में वहां के रहने वालों की छवि दिखनी चाहिये, यानी उनके चेहरे तथा वस्त्र वहाँ के निवासियों पर आधारित होने चाहिये.

नीचे की छवियों में आप इस संग्रहालय की कुछ मूर्तियों को देख सकते हैं. मानव आकार की इन मूर्तियाँ को देख कर अक्सर धोखा हो जाता है कि यह सचमुच के व्यक्ति तो नहीं. पर असली आश्चर्य तो तब होता है जब अब मूर्ति के पास उस व्यक्ति को देखते हैं जिसकी प्रेरणा ले कर वह बनायी गयी थी, लगता है कि दो जुड़वा लोग कहीं से निकल आये हैं.



हर वर्ष यह संग्रहालय करीब 20 दिसम्बर से ले कर जनवरी के अन्त तक सजता है. यहाँ आने का, मूर्तियाँ देखने का, कार पार्किन्ग आदि का, फोटो या वीडियो खींचने का, किसी का कोई शुल्क नहीं है. शायद इसी लिए दूर दूर से बसों में तथा कारों में भर के लोग यहाँ आते हैं. इससे इस क्षेत्र के होटल, रेस्टोरेंट, हस्तकला तथा कला के दुकान वालों के काम तथा आय दोनो बढ़ जाते हैं और गाँव का नाम आसपास सब जगह प्रसिद्ध हो गया है.



यहाँ के रहने वाले इसका एक अन्य फायदा बताते हैं. इस मूर्तियाँ बनाने के कार्य में छोटे बड़े सभी लोग मिल कर काम करते हैं. एक पुरानी कला को जीवित करने का मौका मिला है जिसे वहाँ के नवयुवकों ने सीखा है. आपस में मित्रता तथा जानपहचान के भी नये मौके मिले हैं जिनसे उनका समुदाय सुदृढ़ हुआ है.

वैसे तो यहाँ की मूर्तियों में कई मुझे अच्छी लगती हैं, जैसे कि घर की बालकनी में कपड़े सुखाने डालने वाली युवती की या फ़िर एक नवयुवती की खिड़की के नीचे खड़े उपर निहारते उसके प्रेम में पागल युवक की मूर्ति.


आइये आलेख के अंत में यहाँ की वह दो मूर्तियाँ दिखाऊँ जो मुझे सबसे अच्छी लगती हैं.

इन मूर्तियों में मध्यकालीन जीवन की वह छवि बनी है जब घरों में टायलट नहीं होते थे. तब लोग रात को कमरे में पिशाब करने का बर्तन रखते थे और सुबह उठ कर वह मूत्र सड़क पर फ़ैंक देते थे.


इन दो मूर्तियों में एक वृद्ध व्यक्ति हैं जो घर की बालकनी से रात का मूत्र फ़ैंकने को तैयार हैं. दूसरा व्यक्ति एक छोटा शैतान सा लड़का है, जिसके हाथ में गुलेल है जो वहाँ बालकनी के नीचे से गुज़र रहा है. इस दृश्य को देख कर सहसा हँसी आ जाती है. लगता है कि अभी बच्चा कदम आगे बढ़ायेगा और उसके सिर पर मूत्र की बरखा होगी.



तो बताना नहीं भूलियेगा कि संत अन्तोनियो की मोम की मूर्तियों का खुली हवा का यह संग्रहालय आप को कैसा लगा.

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