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मंगलवार, सितंबर 22, 2026

लेखन यात्रा - अलका सरावगी

अलका जी मेरी जान-पहचान बीस-पच्चीस साल पहले अशोक जी (अशोक सेकसरिया) की वजह से हुई थी। अशोक जी, जैसा कि आप अलका जी के साक्षात्कार में पढ़ेंगे, ने उनके सृजनात्मक जीवन में महत्वपूर्ण भाग निभाया था। वैसे मैं अशोक जी को बचपन से जानता था जब वह दिल्ली में रहते थे और मेरे पिता ओम प्रकाश दीपक के साथ समाजवादी पत्रिका 'जन' में काम करते थे और अक्सर हमारे घर आते थे।

अलका सरावगी 2016 में इटली में वेनिस युनिवर्सिटी में - तस्वीर डॉ. सुनील दीपक

उसके बाद बीच-बीच में किसी न किसी वजह से अलका जी से पत्राचार होता रहता था। उनके तीन उपन्यास इतालवी भाषा में अनुवादित हो कर छपे हैं और उन्हें इतालवी सरकार का Order of the Star Cavelier सम्मान भी मिल चुका है।

कुछ साल पहले वह वेनिस युनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में अपने लेखन के बारे में बोलने आयीं थीं तो मैं उन्हें सुनने गया था, लेकिन घर लौटने वाली ट्रेन के छूटने की चिंता में, बाद में वहाँ रुक कर उनसे बात नहीं कर पाया था। पिछले साल कलकत्ता जा कर उनसे मिलने की बात थी, पर वह भी नहीं बन पाई थी।

बहुत समय से सोच रहा था कि अपने इस ब्लॉग के लिए उनसे बातचीत करूँ। यह आलेख एक प्रश्न-उत्तर के रूप में शुरु हुआ था। उसमें मैंने उनके कुछ वीडियो देख कर, कुछ अन्य बातें जोड़ीं। इस बातचीत को आप अलका जी की जुबानी ही पढ़ सकते हैं।  

अलका सरावगी की जुबानी

व्यक्तिगत

हमारा एक मध्यवर्गीय मारवाड़ी परिवार था, जहां लड़कियों को रोका-टोका जाता है कि ऐसे मत करो, वैसे मत बोलो। इसे मैंने बहुत रज़िस्ट किया। घर के काम देखने-सीखने में मेरा मन नहीं लगता था, इसलिए खाना बनाना भी नहीं सीखा जबकि मां बहुत अच्छा खाना बनाती थी। घर के काम में मन इसलिए भी शायद नहीं लगा क्योंकि बहुत प्यार करने वाली दादी ने बचपन में कान में फूंक दिया था कि भगवान ने तुम्हें चौका-चूल्हा घर-वर संभालने नहीं भेजा है।

जब सब सहेलियाँ मिल कर कोई फिल्म देखने जाती थीं तो हमें अनुमति नहीं मिलती थी। इन सब बातों को ले कर मन में गुस्सा और विद्रोह का भाव था, और पिता जी की बहुत सी बातें गलत लगती थीं। बारह-तेरह साल की थी जब पीरियड शुुरु हुए तो सब कहते कि यहां मत बैठो, वहां मत बैठो, यह मत छूओ, वगैरा, तो उससे बहुत घुटन होती थी। 

मेरे पिता जी अपनी लड़कियों को आगे बढ़ाना चाहते थे, उन्हें गाड़ी चलाना सिखवाया था। स्कूल में स्विमिंग पूल था तो मैंने तैरना भी सीखा था। एन.सी.सी में भर्ती हुई थी और उसके कैम्प में रोने-धोने के बाद जाने दिया गया था। कांचरापाड़ा कैम्प में पिता गाड़ी की डिक्की भरकर पच्चीस लड़कियों का खाना लेकर पहुंचे थे। वे छह फुट लंबे शानदार व्यक्तित्व वाले थे। स्कूल के वार्षिक समारोह में किसी नाटक के बाद मुख्य पात्र निभाने वाली लड़की को उन्होंने हॉल में खड़े हो कर अपनी तरफ़ से मेडल घोषित कर दिया था। उन पर गर्व करने के हमारे पास तमाम कारण थे। मेरे हमेशा फर्स्ट आने पर उन्हें भी बहुत गर्व था, पर मेरे साथ ही पढ़ने वाली बड़ी बहन के कारण वे इसे छुपा लेते थे। या शायद इसलिए कि मेरे पाँव धरती पर रहें।

दो बड़ी बहनों की कम उम्र में शादी हुई तो उनके जीवन को देख कर लगता था कि आगे मुझे भी वैसा ही जीवन मिलेगा। स्कूल के दिनों में "सारा आकाश" पढ़ रही थी और मन ही मन में विद्रोही बन रही थी, सोचती थी कि उस उपन्यास की प्रभा जैसा ही मुझे भी कोई ससुराल मिलेगा जहां लोग तरह-तरह के ताने कसेंगे। मां से कहती थी कि बंगाली घर में पैदा होती तो अच्छा होता, वह लोग मेरे पढ़ने लिखने पर खुश होते। मेरी बहनों का तो बीे.ए. भी नहीं हुआ था जब उनकी शादी हुई थी। ग़नीमत थी कि मेरी शादी बीस साल की उम्र में जाकर हुई, जब मैंने बी.ए. पास कर लिया था।

बाहरी तौर पर मेरे ससुराल का परिवार उस तरह से मॉर्डन नहीं था जैसा पीहर में था। पिता पैंट-शर्ट पहनते और शौक से रहते। अंग्रेज़ी में फर्राटे से बोलते और शेरो-शायरी उन्हें कंठस्थ थी। ससुर धोती-कुरते वाले थे और सास सीधे पल्ले से साड़ी पहनतीं, जबकि माँ उल्टे पल्लेवाले आधुनिक अंदाज़ में।

लेकिन, ससुराल में अपेक्षकृत पिता की तरह मजबूती से मुझे  हां या नहीं कहने वाले लोग नहीं थे। पिता की इच्छा के सामने अपनी चलाई नहीं जा सकती थी। उनके गुस्से से भी सबको डर लगता था। मेरी सास की तरफ से सहयोग था, वह पढ़ने-लिखने की बहुत क़दर करती थीं। वे बहुत धार्मिक थीं और शायद इसीलिए हर आत्मा को उसके प्रवाह से रोकने के पक्ष में नहीं थीं। उनका हमेशा सहयोग रहा।

मैंने शादी के बाद ही एम.ए. किया, फिर एम.फिल. किया। पति कहते थे कि बिना झगड़ा-झमेला किये जो कर सकती हो वह करो। वह समर्थन करते थे। लेकिन वैसी उन लोगों का सोच नहीं थी, यह बिना कहे ही ज़ाहिर था कि उस समय अगर कोई घर का काम होता तो वही ज्यादा ज़रूरी माना जाता था। 

जब मेरे एम.ए. के इम्तहान चल रहे थे तो मेरे ससुर ने मुझे बुलाया, पूछा कि क्या कर रही हो, तो मैंने कहा कि पढ़ रही हूँ। बोले कि इतना पढ़ना क्या जरूरी है? मुझे समझ में नहीं आया कि क्या कहूं। अगर बचपन से स्कूल में टॉपर रहे हों तो मन में हमेशा टॉपर रहने की भावना रहती है। वहां हमारी स्पेस मेरा बैडरूम ही था, वहां पर हर ओर किताबें ही किताबें बिछा रखी थीं। एम.ए. में फर्स्ट क्लास फर्स्ट आया तो सब खुश भी हुए।

उन दिनों में कुछ लिखने की याद तो बिल्कुल नहीं है। तब तक मैंने पी.एच.डी. और लेक्चरार बनने की परीक्षाएं दे डाली थीं। एक कॉलेज में पार्ट-टाइम नौकरी मिली, तो समझ में आया कि पढ़ाना मेरे बस की बात नहीं है। मैं अपनी ऊर्जा सिर्फ़ लिखने के लिए बचाना चाहती थी।

मेरी दादी

मेरे ख्याल से मैं तीन या चार साल की थी, मेरी दादी सुंदरकांड का पाठ करती थीं। तब मुझे पढ़ना नहीं आता था, पर दादी से सुन कर मुझे सुंदरकांड पूरा याद हो गया था। मैं उसे पूरा रिसाइट कर सकती थी, जो कि काफी बड़ा है। तब हमारे घर में यह चलन था कि अगर कोई भी बाहर का आदमी आता तो कहते कि सुंदरकांड वाली लड़की को बुलाओ। सबके सामने कहा जाता कि सुंदरकांड सुनाओ तो मैं सुना देती थी, पर लोग सुनते-सुनते बोर हो जाते थे, तो कहते थे, अच्छा, ठीक है।

मुझे अपनी दादी से बहुत प्रेम था। वह मुझे अपने जीवन की बहुत सी बातें बताती थीं, कि कैसे वह लोग राजस्थान से कलकत्ता आये, कलकत्ता में शादी होने के बाद वह वापस राजस्थान चली गयीं, वहां से आते-जाते रहे, परिवार में क्या-क्या घटनाएं - दुर्घटनाएं घटीं, वह क्या खाती-पीती थी, कैसे उनका जीवन बदल गया। उन्हें मुझ में एक श्रोता मिला हुआ था, और मुझे उनकी बातों में बहुत रस आता था। उनके चेहरे की एक-एक रेखा, एक-एक झुर्री तक, मुझे आज भी याद है।

वह मुझे कहती थीं कि ऊपरवाले ने तुम्हें यह सब सामान्य काम करने के लिए नहीं, कुछ और करने के लिए बनाया है। वह और काम क्या था या क्या हो सकता है, उसकी उन्हें कोई स्पष्ट कल्पना नहीं थी। लेकिन उनकी यह बात मेरे भीतर कहीं पर रह गयी और पनपती रही।

बचपन

हमारे बचपन के ज़माने में स्क्रीन तो था नहीं। किताबें और पत्रिकाएं घर में आती थीं और चाव से पढ़ी जाती थीं। माँ पापुलर उपन्यास पढ़ती थीं—शिवानी, रानू,ओम प्रकाश शर्मा, आचार्य चतुरसेन, ये कुछ नाम तो बिलकुल याद हैं। मुझे बचपन से पढ़ने का बेहद शौक़ था। जो कुछ मिल जाए उसे पढ़ डालती थी। धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान आदि पत्रिकाएँ, चंदामामा और चंपक के साथ पढ़ी जाती थीं। अक्सर मैं अपनी उम्र से ज़्यादा बड़ी किताब पढ़ लेती थी। बाद में चौदह साल की उम्र से अंग्रेजी में एनिड ब्लाइटन की किताब जन्मदिन पर किसी ने दी। उसके बाद उनका चस्का लगा और फिर आगे चलकर शेरलॉक होम्स, अगाथा क्रिस्टी, सिडनी शेल्डन पढ़ी गईं। जो कुछ मिल जाए वही पढ़ा जाता था। मेरी दादी दोस्तोवेस्की का हिंदी अनुवाद पढ़ती थीं। घर में साकेत, यशोधरा जैसी मैथिली शरण गुप्त की रचनाएँ थीं। पिता ग़ज़ल और गीतों के शौकीन थे और बाकायदा एक कॉपी रखते थे जिसमें उन्हें उतारते थे।

स्कूल में पढ़ने में अच्छी थी इसलिए शिक्षिकाओं की प्रिय थी। स्कूल की लायब्रेरियन भी मुझे अच्छी विद्यार्थी समझती थी, आठवीं में आते-आते मैंने प्रेमचंद के मानसरोवर के सारे खंड, और अन्य जो लेखक हमारे स्लेबस में होते और लायब्रेरी में उनकी किताबें मिल जातीं तो उनको पढ़ने लग जाती थी।

इस तरह से शब्दों से मेरा लगाव गहरा था और सब को मालूम था। बचपन में स्कूल की पत्रिका के लिए एकाध बार कुछ लिखा, पर विशेष कुछ नहीं लिखा। अलबत्ता परीक्षा में निबंध में हमेशा सबसे अधिक मार्क्स मिलते रहे। घर पर खाना खाते हुए पढ़ना मना था, पिता जी नाराज होते थे, इसलिए जब उनकी आवाज़ सुनती थी तो किताब को कुर्सी पर अपने नीचे रख कर उस पर बैठ जाती थी। पंडित रामचन्द्र शुक्ल का हिंदी साहित्य का इतिहास घर में पता नहीं कहां से आया था, वह भी पढ़ती रहती थी। हिंदी साहित्य से मेरा परिचय उसके माध्यम से हुआ, वह पुरानी प्रति अभी भी मेरे पास सुरक्षित है।

पढ़ना

कॉलेज के दिनों में अंग्रेज़ी की बहुत किताबें पढ़ी गईं । एक सहेली के घर में बहुत सारी किताबें थीं - आर्थर हेली, लियोन यूरी खासकर पढ़े गए। ऐन रेंड की ‘फ़ाउंटेनहेड’ ने मुझे बहुत प्रभावित किया। अंग्रेज़ी के बेस्टसेलर टाइप के तमाम उपन्यास पढ़े जो मिल जाते थे। सॉमरसेट मॉम के उपन्यास और कहानियाँ पढ़ना याद है।

मैंने हिंदी साहित्य जो मैंने दसवीं-ग्याहरवीं क्लास तक पढ़ा था, उसके बाद कॉलेज में पढ़ते समय वह छूट गया था, तब अंग्रेजी साहित्य पर अधिक जोर था। अशोक जी से मिलने के बाद मैं हिंदी साहित्य की ओर लौटी। अशोक जी कहते थे कि हमेशा एक डायरी रखिए और उसमें लिखिये। इसलिए डायरी रखी, जिसमें उनकी बातें सुनकर लिख लेती कि कौन सी किताबें पढ़नी है।

संयुक्त परिवार में रहते हुए और बच्चों के कारण, मेरे पास अपने लिए समय बहुत कम होता था। मैं अक्सर अपने उपन्यास की थीम से संबंधित नॉन-फिक्शन की किताबें पढ़ती रहती हूँ। समकालीन हिंदी साहित्य भी काफ़ी पढ़ती हूँ। प्रकाशक या लेखक मित्र कविता, कहानी, उपन्यास की किताबें भेज देते हैं, तो कोशिश करती हूँ कि उन्हें पढ़ कर फेसबुक पर ही सही, कुछ लिखूँ। मोबाइल पर ऑनलाइन वेब-साइट्स पर लेख और कहानियाँ पढ़ी जाती हैं। पत्रिकाओं में प्रकाशित किसी कहानी की चर्चा हो तो उसे खोज कर पढ़ती हूँ।

मेरा बेटा अंग्रेज़ी के बुकर और नोबेल पुरस्कृत लेखकों को बहुत पढ़ता है। पर वे किताबें आसपास रहते हुए भी नहीं पढ़ पाती हूँ, इसका अफ़सोस रहता है।

अशोक सेकसरिया और लेखन की शुरुआत

पच्चीस साल की उम्र में, जब मेरी शादी और दो बच्चे हो चुके थे, मुझे मेरे गुरु लेखक-पत्रकार अशोक सेक्सरिया मिले। बच्चों के लिए शब्दकोश बनाने के प्रोजेक्ट में उनसे परिचय मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट था। जिस दिन मैं पहली बार बालकोश के दफ्तर में गयी, तभी समझ गयी थी कि मेरे जीवन का यही अर्थ है। वहां चारों ओर किताबें थीं, बातें थीं, लोग थे। अशोक सेकसरिया मुझे वहाँ मिले, वही मेरे गुरु और मैंटोर बने। वह एक जाने माने लेखक और पत्रकार थे। उसके बाद मैंने सोचा नहीं कि इस माहोल के बाहर भी मेरा कोई जीवन है।

अशोक सेकसरिया व अलका सरावगी - तस्वीर अलका सरावगी के सौजन्य से

अशोक जी को अपने बारे में कुछ भी बताने से वह कहते थे, इसे लिख डालिए। मुझे लगता कि इतनी मामूली बातों को कौन पढ़ेगा? बहरहाल मैंने 'अंग्रेज़ी स्कूल में पहला दिन' शीर्षक से एक फीचर लिख डाला जो कलकत्ता की एक पत्रिका में छपा, जिसके राजकिशोर जी संपादक थे। जब मैंने उसे पढ़ा तो मैंने उसमें एक वाक्य था, "कितना कातर था वह बचपन", तो उसमें अशोक जी ने 'कातर' शब्द को काट करके कुछ और शब्द लिख दिया था, तो मुझे बहुत बुरा लगा। मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने उस पर काफी बहस की। तब अशोक जी ने अपनी गलती मान ली कि उन्हे उस शब्द को बदलना नहीं चाहिए था और खासकर कि मुझसे बिना पूछे। बाद में आगे चलकर अशोक जी ने मुझे बताया कि इस बात से उनको लगा था कि मैं अपने शब्दों के प्रति बहुत सजग हूं और अपने शब्द के लिए मैं उनसे लड़ पड़ी थी तो इस बात के लिए उनके मन में मेरे प्रति बहुत सम्मान हुआ था।

समाजवादी आंदोलन के लोगों की पत्रिका "सामयिक वार्ता" निकलती थी, अशोक जी उसके लिए बहुत काम करते थे, हर समय उसके लिए अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद करते रहते थे। सच्चिदानंद सिन्हा, किशन पटनायक जैसे लोग वहाँ आते रहते थे। मेरी पॉलीटिकल अवेयरनेस की शिक्षा-दीक्षा उनके कमरे में हुई, जो कि रेलवे प्लेटफार्म की तरह का कमरा था जिसमें सिर्फ किताबें और सिगरेट का धुआं और धूल रहती थी। अशोक जी की खटिया थी, हमेशा उस पर बैठे रहते थे। पास में कुछ टूटी-फूटी कुर्सियाँ रहती थी जिन पर हम लोग बैठे रहते थे।

उनके घर पर बहुत सारे लेखकों से मेरा परिचय और मिलना हुआ - कृष्णा सोबती, निर्मल वर्मा, गिरधर राठी, अशोक वाजपेयी, विभूति नारायण राय। यह सारे लोग जब कलकत्ता आते तो अशोक जी से मिलने आते और मेरे लिए यह एक ट्रेनिंग स्कूल था, जहाँ सुनने के लिए बहुत सारी बातें मिलती थी और सुनने में बड़ा आनंद आता था।

जब मुझे साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला तो अशोकजी इस बारे में बहुत चिंतित थे। उन्हें लगा मैं आगे लिख नहीं पाऊँगी।  खैर पुरस्कार मिला और उसके बाद भी मैं लिखती रही। अशोक जी को शायद इससे आश्वासन भी मिला होगा कि एक पुरस्कार मुझे नष्ट नहीं कर पाया, जैसा कि मैं उनको बार-बार कहती थी कि ऐसा नहीं होगा।

मेरे लेखन में और मेरे जीवन जीने के तरीके में, अशोक जी की एक बहुत बड़ी उपस्थिति हमेशा रही। वह ऐसे गुरु थे जो कुछ भी नहीं सिखाता है, कुछ भी नहीं पढ़ाता है,  फिर भी उसका होना ही एक तरह की एक मिसाल थी। 

कहानियाँ

तीस साल की उम्र में पहली कहानी छपने के बाद, मैं उत्साह में भर कर लगातार लिखती गई।

शायद 1989 में, हम सब परिवार सहित कलकत्ते के पास किसी के घर में दो दिन के लिए गए थे। वहां मुझे एक शक्स दिखाई दिया जो कुछ अजीब सा दिखता था, मुंह फाड़ कर मुस्कराता था, ऐसा ढीला पजामा पहने था कि वह लहंगे की तरह फट-फट करता चलता था। वह हंसता रहता था और हमारी सेवा-टहल ऐसे करता था जैसे घर का नौकर हो, लेकिन वह खाता हम सब के साथ में था और रहता भी उसी घर में सब के साथ था। घर में उसका स्थान क्या है, मुझे यह समझ में नहीं आता था। जब हम लौट रहे थे तब मैंने देखा कि वह रो रहा था। इसलिए जब गाड़ी चल पड़ी तो मैं बड़ी उदास हुई और मैंने उसके बारे में जानना चाहा। पहले तो उन लोगों को समझ में नहीं आया कि हम किसकी बात कर रहे हैं, क्योंकि अन्य लोगों के लिए जैसे वह था ही नहीं, अदृश्य सा था। बोले, कौन, वह पागल? तो मैंने कहा कि वह पागल नहीं है, तो सब हंस पड़े और खूब हंसे।

उस पर मैंने एक कहानी लिखी - "आपकी हँसी"। अशोक जी ने कहा कि रवींद्र कालिया है और यह उनका पता है यह भेज दीजिए। इस तरह से उस कहानी को "वर्तमान साहित्य" के महाविशेषांक में भेजा। निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती जैसे लेखकों के साथ, वह 'प्रथम रचना' करके छपी और चर्चित हुई। मेरे पास बहुत सारी चिट्ठियां आईं कि ऐसा आदमी, हाशिए पर फेंका हुआ मार्जिनलाइज्ड आदमी, जिसकी तरफ हम कभी ध्यान भी नहीं देते हैं और वह दिखता ही नहीं है, उन सबकी ज़िंदगी में कहीं न कहीं मौजूद था।

1996 में मेरा पहला कहानी संग्रह आया। वह कहानियाँ आसपास के जीवन और उससे जुड़े सोच पर आधारित थीं। कुछ स्त्री होने के अनुभव पर भी थीं, हालाँकि उनमें स्त्री-विमर्श या फेमिनिज्म नहीं था। शिल्प की दृष्टि से उनमें कुछ नयापन भी था।

उपन्यास

कलिकथा की शुरुआत भी एक कहानी की तरह हुई थी। उसका शीर्षक था, "बीच वाला कमरा कहाँ है"। यह हमारे किसी परिचित के हार्ट के बाइपास करवा कर लौटने पर कही गई बात पर आधारित थी। पर वह कहानी दो पैराग्राफ के बाद रुक गई थी। आज़ादी के पहले जब बीच वाला कमरा नहीं था, उस समय को खोजते हुए इस कहानी ने उपन्यास का विराट रूप धारण कर लिया।

अलका सरावगी व प्रो. थॉमस दाह्नहार्ट, 2016 में इटली में वेनिस युनिवर्सिटी में - तस्वीर डॉ. सुनील दीपक

 

मेरी कहानियाँ ‘आधार प्रकाशन’ ने हज़ारों प्रूफ की गलतियों के साथ छापी थीं। कलकत्ता के पुस्तक मेले में आए प्रकाशक को मैंने चाय पर घर बुलाया और कह दिया कि मेरे पास बन्दूक होती तो मैं उन्हें गोली मार देती। फिर अपने गुस्से का प्रायश्चित करने के लिए उन्हें ही उपन्यास दिया। उन्होंने भी उसे ऐसा बढ़िया छापा कि निर्मल वर्मा तक हाथ में लेकर देर तक कवर देखते रहे। कलिकथा पर अनेक पत्र आए— समीक्षाएँ भी झोली भर कर आयीं। यह सब मेरी आशा से परे था।

कलिकथा के बाद कुछ एक ऐसी दुर्घटना घटी जिससे मैं डिप्रेशन में चली गई। पांच-छह महीने तक किसी की कोई बात सुनने-कहने का, कुछ भी करने का, दिल नहीं होता था। तब एक मीटिंग के लिए फोन आया। घर वाले भी सब कह रहे थे कि तुम उठो, घर के बाहर निकलो, तो मैंने सोचा कि चलो ठीक है, वहां जा कर बैठ जाते हैं।

मैं वहां गई तो मुझे एक महिला मिलीं, उन्होंने बिल्कुल दादी की जैसी सफ़ेद साड़ी पहनी थी, दादी जैसा उनका स्नेहिल  चेहरा था। उन्होंने कहा कि अरे हमने तुम्हारी कलिकथा पढ़ी है। वह मुझे अपने जीवन की कहानियां सुनाने लगींं, तो मैंने उन्हें कहा कि आप की कहानियां इतनी सशक्त हैं, आप इन पर क्यों नहीं लिखती हैं। इस पर उन्होंने कहा कि नहीं, मैं लिख नहीं सकती, तुम्हें लिखना हो तो तुम लिखो। इस तरह से "शेष कादंबरी" की शुरुआत हुई और उसे लिखते हुए मेरा डिप्रेशन गायब हो गया और मैंने अपने आप को जैसे फिर से डिस्कवर किया, कि अल्टीमेटली मैं लेखक हूं और जीवन में चाहे कितना भी बड़ा कुछ भी हो जाए, मैं हार नहीं मान सकती। "शेष कादंबरी" ने इस तरह से मेरा उद्धार किया। मेरे शब्दों ने और लेखन ने मुझे फिर से जीवन जीने की हिम्मत दी है।

मेरे उपन्यास "गांधी और सरलादेवी चौधरानी" में गांधी जी एक मुख्य पात्र के रूप में है। गांधी जी को जानना भी मेरे लिए एक यात्रा थी, यह समझना कि किस तरह से उन्होंने अपने को बनाया, किस तरह से उन्होंने उस समाज को बनाया जिसने आजादी के लिए लड़ाई लड़ी। गांधी की क्या सोच थी, उनकी कितनी अंदरूनी ताकत थी जिसके भरोसे वह खड़े हो जाते थे, उन्हें भरोसा होता था कि वह ऐसा बदलाव ला सकेंगे। मैंने इस किताब में गांधी के जीवन का एक साल का पीरियड लिया है जो जलियांवाला बाग के 6 महीने बाद से शुरू होता है जब गांधी जी पहली बार लाहौर गए थे।

सरलादेवी चौधरानी, लाहौर के देशभक्त वकील-पत्रकार रामभज दत्त चौधरी की पत्नी थी और रवींद्रनाथ टैगोर की बहन की लड़की थीं। गांधी जी उन्हें एक सहयोगी नेता की तरह देख रहे थे क्योंकि वह इस देश की औरतों में जागृति लाना चाहते थे। सरलादेवी चौधरानी के साथ उनका यह एक साल का जीवन, उसे आप प्रेम प्रसंग भी कह सकते हैं या एक तरह का सपना जो वह देख रहे थे। सरला देवी एक ऐसा चरित्र है जो अपने समय के बहुत आगे देख सकता है, सोच सकता है।

गांधी और सरलादेवी में बहुत ही फोकस है, देश ही उनके लिए सब कुछ है और देश की आज़ादी के अलावा कुछ नहीं था। व्यक्तिगत कुछ भी महत्व नहीं रखता है। प्रेम के लिए वे दोनों तैयार नहीं थे। पर प्रेम हुआ और गांधी ने अपने पत्र में इसे साफ़ स्वीकार किया। इस तरह से यह एक ह्यूमन साइकोलॉजी का, एक स्त्री पुरुष के बीच के संबंधों का, दोनों ही का एक बहुत ही अनयूजुअल चरित्र हैं।  वह सम्बंध क्यों टूटता है और किस तरह टूटता है,यह उपन्यास उसकी बात कहता है।

मेरे पांचवें उपन्यास, "जानकीदास तेजपाल मेन्शन" को अपेक्षित सराहना नहीं मिली, ऐसा मुझे लगा। अपने बच्चे सबको श्रेष्ठ लगते हैं, इसलिए अपनी राय को ज़्यादा महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। कई साल बाद उसे इंदु शर्मा कथा यू.के. में सम्मान मिला, तो तसल्ली ज़रूर हुई। 

लिखना

मैं यह कह सकती हूँ कि पात्र का चुनाव और विषय बहुत कुछ संयोग पर आधारित होता है। अचानक कोई कहानी आप को पकड़ लेती है और आप उसमें धँसते चले जाते हैं। वह सोते-जागते नए रूप लेती रहती है और जीवन के जिस छोटे ग्राफ से वह शुरू हुई थी, वह फैलता जाता है। पात्र बिल्कुल वही नहीं रहते जहाँ से उन्हें शुरू में देखा था। वे जैसे ख़ुद को लिखवाते हैं जिसमें आप का पढ़ा- लिखा- देखा- सुना हुआ अनायास जुड़ता जाता है। कोई योजना से वे नहीं चलते।

लिखते हुए यदि यह भय रहे कि कोई आपको ग़लत समझ लेगा या कोई शख़्स उसे असली ज़िंदगी में पहचान कर आप से नाराज़ हो जाएगा, तो लिखा जा नहीं सकता। मेरे साथ ऐसा हुआ भी है। पर यह ख़तरा उठाये बिना जीवन रचा नहीं जा सकता।

हमको पहले का सब कुछ अनलर्न करके लिखना होता है और अगर आप अनलर्न नहीं कर पाते हैं तो फिर आप कहीं न कहीं अपने आप को दोहराने लग जाते हैं।

पात्र लेखक को अपनी अंगुली पकड़ा कर मनमाने तरीके से चलाते हैं। उसमें बहुत कुछ प्रीमेडीटेटेड नहीं होता, वह भी एक यात्रा होती है, डिस्कवरी की। पात्रों के साथ चलते हुए, आप लिखते भी हैं और साथ-साथ अपने आप को भी जानते चलते हैं, क्योंकि लिखा किरदार आपसे अलग भी होता है और वह आपका अपना ही होता है, खासकर जब तक किताब छप नहीं जाए।

अन्य लेखक

हिंदी के अन्य लेखकों से अधिकतर मेरे औपचारिक संबंध ही रहे हैं क्योंकि कलकत्ता में रहते हुए मिलना-जुलना कम होता है। अनामिका, गीतांजलि श्री, प्रत्यक्षा, प्रियदर्शन, रजनी गुप्त, उदयन वाजपेयी, यतीश कुमार, अम्बर पांडे कुछ नाम हैं जिनसे अपनापन महसूस हुआ है। अन्य भाषाओं के लेखकों में असम के नीलिम कुमार हैं। अभी उनकी आत्मकथा पढ़ रही हूँ। गुजराती में ग़ुलाम मोहम्मद शेख हैं। बांग्ला और अंग्रेज़ी के कई लेखक हैं। 


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शुक्रवार, सितंबर 18, 2026

क्या पढ़ा (2) - कहानी, कविता, आलेख

कुछ माह पहले मैंने निश्चय किया था कि मैं अपनी डायरी लिखूँगा कि हिंदी में क्या पढ़ा जो अच्छा लगा और इस डायरी का पहला भाग अगस्त के प्रारम्भ में लिखा था। आज इस डायरी का दूसरा भाग प्रस्तुत है।

मैं अधिकतर तीन भाषाओं में लिखता-पढ़ता हूँ - हिंदी, अंग्रेज़ी और इतालवी, पर कभी-कभी फ्राँसिसी और पुर्तगाली में भी पढ़ना पड़ता है। जैसे कि सुबह हिंदी, अंग्रेज़ी और इतालवी में अखबार पढ़ी, फिर कोई हिंदी पत्रिका पढ़ी, दोपहर में अंग्रेज़ी उपन्यास पढ़ा और रात को सोने से पहले कोई इतालवी पत्रिका पढ़ी। सपने भी इन तीनों भाषाओं में देखता हूँ। मेरे विचार में हर भाषा में हमारे सोचने का तरीका बदल जाता है, तो मेरे इस तरह से तीनों भाषाओं में लगातार बदलने से मेरे सोचने पर क्या असर पड़ता है, यह प्रश्न भी अक्सर मन में उठता है लेकिन समझ नहीं आता कि उसका उत्तर कैसे खोजा जाये?

इस बार मैंने जो हिंदी में पढ़ा उसे तीन भागों में बाँटा है - आलेख, कहानियाँ और कविताएँ। यह सब कुछ मैंने विभिन्न पत्रिकाओं में ॲानलाइन पोर्टल नॉटनुल पर पढ़ा।


 

खैर, अब उस पर आते हैं कि इस बार मुझे क्या पढ़ना अच्छा लगा, और शुरुआत करते हैं आलेखों से। अच्छा लगने के मूल्यांकन की मेरी पहली और सबसे बड़ी कसौटी है कि मैं किसी कहानी या आलेख को अंत तक पढ़ पाया या नहीं। पढ़ने को इतना कुछ है और दिन में केवल 24 घंटे होते हैं, जिसमें रुचि नहीं जागे, उसे तुरंत वहीं छोड देता हूँ।

हिंदी आलेख 

हँस पत्रिका के अगस्त 2026 अंक में अनुज लुगुन का अतिथि संपादकीय: हँस का यह अंक जनजातियों की संस्कृति, भाषाओं और जीवन पर केन्द्रित है, मुझे यह अंक पढ़ना बहुत अच्छा लगा। लुगुन जी अपने सम्पादकीय में 1970 के दशक में शुरु हुआ कोइलकारो बांध के विरुद्ध जन आंदोलन जो तीस सालों तक चला, से शुरु करके विभिन्न विषयों को छूते हैं जैसे कि - मूलनिवासियों के सांस्कृतिक-अध्यात्मिक पुनर्निवास की माँग, आदिवासी नागरिकों को दो संवैधानिक अनुच्छेदों में बाँटना (पाँचवीं और छठी अनुसूची), कानजी पटेल के "अनुत्तरित लोग" में आदिवासी कवियों का संकलन जिसमें 141 आदिवासी भाषाओं में 382 कवियों की कविताएँ मूलभाषा और हिंदी में संकलित की गयीं, आदिवासी यानि असुर-राक्षस के रूप में स्वयं अपनेआप को देखते हैं।

हँस के इसी अंक में सावित्री बड़ाईक का एक रोचक आलेख भी है, "असुरों की सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेज", जिसमें वह बताती हैं कि हिंदू ग्रंथों में जिन्हें असुर कहा गया है वह छोटानागपुर के पठार में रहते हैं, आदि। इस आलेख को पढ़ कर सोच रहा था की प्राचीन सीरिया के असुर राजाओं, जैसे कि असुर बनिपाल, जिनकी कहानियाँ और इतिहास मेसोपोटेमिया की पक्की मिट्टी की तख्तियों पर मिली हैं और भारत की असुर जनजातियों में क्या सम्बंध था या कोई सीधा सम्बंध नहीं था? 

हँस में ही अनामिका अनु द्वारा लिखी तीजन बाई की जीवनी का एक अंश, शीर्षक "अपनी नाक खुद सम्भाले यह समाज" जिसमें तेरह साल की लड़की के घर से निकाले जाने की बात है क्योंकि पाण्डवानी को ऊँचे स्वर और जोश में ही गा कर उसका अभ्यास करना पड़ता है और कोई उसे गाते हुए सुन लेता था, अच्छा लगा। इस आलेख की पहली पंक्ति, "धूँए से उठी, लोगों की आँखों में लगी", बहुत सुंदर लगी, उसमें तीजन बाई के जीवन का सार दिखता है।

पाखी के अगस्त अंक में "पाखी संवाद - जहाँ शब्द डरते नहीं" में शिवकुमार बटालवी और ताराशंकर वंद्योपाध्याय का स्मृति आलेख अच्छा लगा। वंद्योपाध्याय के लेखन की बात करते हुए कहते हैं, "इस उपन्यास में उन्होंने समाज के उस हिस्से को केन्द्र में रखा जिसे मुख्यधारा का साहित्य अक्सर अनदेखा कर देता था। वहाँ के लोगों की भाषा, उनके रीति-रिवाज, उनके भय, उनकी आस्थाएँ और उनके सपने - सब कुछ इतनी प्रमाणिकता से चित्रित है कि पाठक स्वयं उस संसार का हिस्सा बन जाते हैं।" मुझे भी हिंदी कहानियाँ-उपन्यास पढ़ते समय, लेखकों का यही कौशल आकर्षित करता है, कि अनदेखे-अनजाने लोगों के जीवन की झलक मिले। पाखी संवाद के इन आलेखों से मुझे उनकी पाखी संवाद यूट्यूब की चैनल का भी पता चला, और अब उनके विडियो देखने-सुनने का मौका भी मिलेगा।  

अकार पत्रिका के अगस्त अंक के प्रारम्भ और अंत में मुख्यपृष्ठों के पीछे मिर्ज़ा हादी रुसवा के उपन्यास उमराव जान अदा के हिंदी अनुवाद का एक छोटा सा अंश दिया है जो बहुत सुंदर लगा। इस अंश में पता चलता है कि उमराव जान के समय में तवायफों की तालीम में और उपन्यास लिखने वाले लेखक को, शास्त्रीय संगीत के विभिन्न रागों और उनके सुरों की गहरी पहचान होती थी। यह जान कर भी थोड़ा सा आश्चर्य हुआ कि उपन्यास का यह अनुवाद गुलशन नन्दा ने किया था। अपने समय में गुलशन नन्दा जी शायद हिंदी के सबसे प्रसिद्ध लेखक थे। बचपन की रेलयात्राओं में मुझे उनके विभिन्न उपन्यास पढ़ना याद है। उनके बहुत से उपन्यासों पर सफल फिल्में भी बनी थीं। लेकिन जैसा हिंदी लेखन जगत में अक्सर होता है, लोकप्रियता को अ-साहित्यिक माना जाता है, और जब हिंदी के बड़े लेखकों की बात होती है, शायद कोई गुलशन नन्दा को उनमें नहीं गिनता।

अकार पत्रिका के अगस्त अंक में प्रियंवद जी का संपादकीय, जहाँगीर के अंग्रेज सलाहकार हॉकिन्स द्वारा लिखे बादशाह जहाँगीर के एक दिन के ब्यौरे के बारे में है। उसे पढ़ते हुए सोच रहा कि उस जमाने में और आज में किंतना अंतर आया है, जो चीजे हमें इतनी आसानी से मिल जाती हैं कि हम उनके बारे में सोचते भी नहीं हैं, उस समय वह बादशाह को भी नहीं मिलती थीं। अगर जहाँगीर के पास ट्विटर, टिकटॉक, इंस्टाग्राम होते तो वह अपना सारा दिन कैसे बिताते? अगर उनके पास फ्रिज होता तो वह उसमें अपने लिए कौन सी आईसक्रीम रखवाते? अगर उनके पास टीवी होता तो क्या वह किस तरह के प्रोग्राम व फिल्में देखते या शायद वह भी अमिताभ बच्चन के फैन हो जाते? अगर उनके पास माईक्रोवेव होता तो क्या वह अपने लिए कॉफी बना कर पीते? या फिर, हवाई जहाज में घूमते हुए ट्रम्प या पुतिन से दोस्ती बनाते? या फिर, अनुराग कश्यप की फिल्म देख कर कहते, "कितनी गालियाँ लगाता है यह आदमी अपनी फिल्मों में, लाहोल विला कुव्वत! इसे फाँसी पर चढ़ा दिया जाये।"

कथाक्रम के सितम्बर अंक में ही लोकबाबू के उपन्यास "बस्तर-बस्तर" पर जयप्रकाश मानस का आलोचनात्मक आलेख, "जहाँ जंगल स्मृति है और आदमी धीरे-धीरे गायब होता हुआ वर्तमान" अच्छा लगा और इसे पढ़ कर "बस्तर-बस्तर" को पढ़ने की इच्छा भी हुई। मानस जी लिखते हैं, "बस्तर रूपक है उस देश का, जो अपने ही भीतर कुछ दूर छूट गया है - जहाँ विकास की सड़कें पहुँचते-पहुँचते थक जाती हैं, और पगडँडियाँ अब भी अपने होने पर अड़ी रहती हैं। बस्तर कविता है उस आदिम लय की जिसे किसी छंद में बांधना सम्भव नही; वह महुए की गंध की तरह फैलती है - धीरे, अनाम, लेकिन गहरे तक उतरती हुई।"

कथाक्रम के सितम्बर अंक में अर्चना पैन्यूली के उपन्यास "अलकनंदा सुन" पर संजीव जयसवाल 'संजय' का आलोचनात्मक आलेख, "माटी की गंध और स्मृतियों की सरिता" भी अच्छा लगा। इस उपन्यास के कथन-विन्यास के बारे में उन्होंने लिखा है, "यह उपन्यास शिवानंद के जीवन को किसी सर्वज्ञ कथावचाक के माध्यम से नहीं, बल्कि उसके बच्चों की दृष्टि से प्रस्तुत करता है - पहले बड़ा बेटा, फिर दूसरा बेटा और अंत में पुत्री। इस क्रमिक परिवर्तन से कथा केवल आगे ही नहीं बढ़ती, बल्कि भावनात्मक रूप से अधिक गहरी होती जाती है।" इस बात से भी इस उपन्यास पढ़ने का मन किया।

बनास जन पत्रिका के 88वें अंक में विद्यासागर नौटियाल के बारे में पढ़ रहा था। उनके लेखन के बारे में लिखा है: "उनके उपन्यासों और कहानियों का संसार उत्तराखंड के साधारण लोगों के जीवन संघर्षों का दस्तावेज बन गया है। वह सहज भाषा और सरल कथा-शिल्प में अपने लोगों की यातनाओं को दर्ज करते हैं। इतिहास और संस्कृति उनके लिए गौरव का स्मारक न हो कर साधारण लोगों की मुक्ति चेतना के वाहक बनते हैं।" ऐसे ही बातें कुछ अन्य आलेखों में भी थीं और मैंने अक्सर अन्य लेखकों के बारे में भी पढ़ी हैं। इसे पढ़ कर सोच रहा था कि क्यों हिंदी  में लेखकों के साधारण आदमियों की पीड़ा, शोषण, यातनाओं की बात करना ही अच्छा साहित्य समझा जाता है? जबकि मेरे मन में वही किताबें रहती हैं जिनमें मानव जीवन का और रिश्तों का सजीव चित्रण हो, उनमें केवल दुख, पीड़ा और कठिनाईयाँ देखना उसका अधूरापन नहीं बन जायेगा? मैंने नौटियाल जी की कोई किताब नहीं पढ़ी इसलिए मेरी यह टिप्पणी उनके लेखन के बारे में नहीं है, बल्कि अच्छा साहित्यकार किसे माना जाये का मूल्यांकन करने वाली दृष्टि के बारे में है। 

तद्भव पत्रिका के जनवरी-जून 2026 अंक में विश्वनाथ त्रिपाठी के संस्मरण "अस निबहुर देसू" का आठवाँ भाग बहुत रुचि से पढ़ा जिसमें उनके दिल्ली आने और यहाँ रहने के 1950-60 के वर्णन हैं। उनकी बातें पढ़ कर मुझे भी अपनी बचपन की वह घटनाएँ याद आयीं, जब मैं बच्चा था। उनका जामामस्जिद जा कर कबाब खाना, जमुनापार दिलशाद गार्डन में रहने के बारे में कहना "नानक दुखिया सब संसार, सबसे दुखिया जमुना पार", श्रीकाँत वर्मा और मन्मथनाथ गुप्त की चीन के बारे में बहस, सैम मानिकशा और जनरल करिअप्पा की बातें, ऐसी बहुत सी घटनाओं के बारे में पढ़ना अच्छा लगा।

तद्भव में ही राजाराम भादू का धर्मवीर भारती की जन्म शताब्दी के अवसर पर "एक पुनरावलोकन" आलेख भी अच्छा लगा। 1983-84 के आसपास मेरी एक कहानी धर्मयुग में छपी थी, तब भारती जी से कुछ पत्रचार हुआ था। वह मेरे पिता को जानते थे, दोनों इलाहाबाद के थे, करीब-करीब हमउम्र थे और दोनों के परिवार आर्यसमाजी थे। मैंने लड़कपन में भारती की "गुनाहों का देवता" पढ़ी थी और उनके लाखों प्रशंसकों में मैं भी आ गया था। मैं उनकी एक कविता को भी बहुत पसंद करता हूँ - "दिन यूँ ही बीत गया, अंजुरी में भरा हुआ जल जैसे रीत गया।"

तद्भव में आकांक्षा बरनवाल के लम्बे आलेख "परंपरा का मूल्यांकन और औपनिवेशिक आधुनिकता" में महाभारत के संदर्भ में, एक ओर है पश्चिमी तर्क, समझ और श्रेणीकरण, और दूसरी ओर हैं भारतीय समझ और परम्परा। वह इन दोनों के बीच के विरोधाभासों पर पश्चिमी सोच से प्रभावित महाभारत के "क्रिटिकल एडिशन" बना कर ग्रंथ के "मूल तथा प्रमाणिक" रूपों की खोज-दृष्टि, और दूसरी ओर, उसके विभिन्न संस्करणों-लेखकों की गतिशील, समय के साथ बदलने वाली भारतीय समझ की दृष्टि के अंतरों की बात करती हैं।

इस सिलसिले में वह लिखती हैं, "जो विद्वान वैज्ञानिक पाठालोचन की पद्धिति और मूल पाठ की अवधारणा के समर्थक हैं उन्हें शिकायत है कि सुकथांकर और उनके सहयोगियों ने बहुत से परवर्ती प्रक्षेप अपने क्रिटिकल एडिशन में शामिल कर लिए। जो विद्वान महाभारत को एक स्थिर रचना की बजाय एक गतिशील और जीवंत प्रवाह की तरह देखते हैं उन्हें यह शिकायत है कि क्रिटिकल एडिशन के संपादकों ने ऐसे प्रसंगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया जो भारतीय जनमानस में महाभारत की प्रसिद्धि और लोकप्रियता के आधारस्तंभ हैं।" इस संदर्भ में वह एस. एन. बालगंगाधर की बात रखती हैं, "इतिहास हमें 'तथ्य' देता है, अतीत हमें 'स्मृति' और 'मूल्य' देता है।" अपने निष्कर्ष में वह कहती हैं कि "आज हम जिस 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' का उदय देख रहे हैं, विडम्बना यह है कि वह भी उसी औपनिवेशिक जाल में फंसा हुआ है जिसका शिकार बंकिमचंद्र और सुकथांकर जैसे विद्वान हुए थे। एक तरफ आज का राजनीतिक विमर्श पश्चिम का विरोध करता है और भारतीयता की बात करता है, किन्तु दूसरी तरफ अपनी महानता सिद्ध करने के लिए वह पैमाना (standard) आज भी पश्चिम का ही उपयोग कर रहा है। जब आज का नैतृत्व या उसके बुद्धिजीवि यह दावा करते हैं कि 'महाभारत काल में इंटरनेट था' या 'वैदिक काम में हवाई जहाज थे' तो वह अनजाने में यह स्वीकार कर रहे होते हैं कि महान होने का एकमात्र अर्थ तकनीक और विज्ञान में आगे होना है, जो पूरी तरह से एक आधुनिक, पश्चिमी पैमाना है।" यह आलेख पढ़ कर बहुत सी बातें और प्रश्न मन में उठे और इसलिए यह बहुत अच्छा लगा। 

हिंदी कहानियाँ

विभिन्न पत्रिकाएँ पढ़ते हुए एक बात मेरे मन में आई कि अंग्रेजी, इतालवी, फ्रैंच आदि भाषाओं में विभिन्न श्रेणियों की कहानियाँ होती हैं - रोमांस, रहस्य, जासूसी, एडवैंचर, साईंस फिक्शन, फैतासी, डरावनी, आदि। भारत में भी अंग्रेजी के लेखन में अधिक विविधता है। लेकिन मुझे लगता है कि हिंदी कहानियों का संसार अधिकतर दुखों, संघर्ष, भेद-भाव, परिवार, जैसे दायरों आदि में ही घूमता रहता है, उसमें उतनी विविधता नहीं होती। यही बात मृणाल पाण्डे जी के एक साक्षात्कार में भी सुनी, जब उनसे पूछा गया कि उनकी कहानियाँ मध्यम वर्ग पर क्यों होती हैं, और गरीब, शोषित वर्ग के लोगों के बारे में क्यों नहीं होतीं? यानि लेखकों को गम्भीरता से तभी लिया जा सकता है अगर वह कुछ विशेष विषयों पर ही लिखें? पर ऐसा करना क्या हिंदी साहित्य को पिंजरों में बंद करना नहीं हो जायेगा?

हँस में ज्ञानचन्द बागड़ी की कहानी "धधकती ज़मीन" में मणिपुर की स्थिति की कहानी है जिसमें एक बाहर से आया प्रोफैसर आदित्य समझना चाहता है कि लड़ाईयाँ किसके बीच और क्यों हो रही है, लेकिन उनकी बातें स्थिति समझने में विशेष मदद नहीं करती। कहानी का भूगौलिक परिपेक्ष्य समझ में नहीं आता कि जिन गाँवों-जँगलों की बात हो रही है वे कहाँ हैं, न ही उसके पात्र किन जनजातियों के हैं, लड़ाई किसके बीच है, यह सब कुछ समझ नहीं आता। शायद यही वहाँ की सच्चाई है कि कुछ भी समझना कठिन है। एक जगह पर एक पात्र कहता है, कि शहर के लोग पहाड़ी लोगों की ज़मीन लेने के लिए यह कर रहे हैं। दूसरी जगह एक पात्र समझाता है कि विभिन्न जनजातियाँ हैं, राजनीति करने वाले हैं, उग्रवादी हैं, सेना वाले हैं, बाहरी ताकते हैं, सबका इस लड़ाई में हाथ है, सब अपने को सही समझते हैं और दूसरे को गलत। यह कहानी लड़ने वालों के धर्मों की बात नहीं करती। कहानी में घरों का जलना, लोगों का मरना, परिवारों का विस्थापित होना, आदि घटनाओं का दर्द महसूस होता है, लेकिन उसका क्या होगा या क्या करना चाहिये, इसकी झलक नहीं मिलती।

हँस में अनिशा मिंज की कहानी "फिर एक कोड़ा राजी" में एक चाय बागान में रहने वाली बुघनी नाम की बच्ची की कहानी है, जो स्कूल नहीं जाती क्योंकि उसकी शिक्षका कहती है कि वह हिंदी ठीक से नहीं जानती। बुघनी माँ के पीछे-पीछे चाय-बागान में जाती है, वहाँ काम में माँ की मदद करती है और लोगों से उनके अपने गाँव छोड कर चाय-बागानों में आने के इतिहास की बातें पूछती है। दिन समाप्त होता तो माँ को पगार अधिक मिलती है क्योंकि बुघनी की सहायता से उसने पत्तियाँ अधिक तोड़ी हैं। लेकिन रात को झोपड़ी में आग लगने से उसके माता-पिता मर जाते हैं, और कहानी का अंतिम भाग कलकत्ता में है जहाँ सोलह साल की बघनी एक घर में काम करती है, शोषित होती है और चायबगान के दिनों को याद करती है। कहानी की बनावट कमज़ोर है, लेकिन उसकी चायबागान की बोली और उनके गीत, यह दोनों बातें अच्छी लगीं।

हँस में विनोद कुमार की कहानी "वह राम नहीं था" में दो बेटियों की माँ आदिवासी परिवार की सुमारी है, जो एक "बाहरी" आदमी के साथ चली जाती है और कुछ महीनों बाद घर लौट आती है। मास्टर जी जो इस कहानी को सुना रहे हैं, इस बात को सुन कर उसकी तुलना रामायण के राम और गर्भवति सीता के वनवास से करते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि एक स्त्री-पुरुष के रिश्ते को केवल एक अच्छा या बुरा में बाँटना इतना आसान नहीं लगता, क्योंकि इसमें हम उनकी भावनाओं को अनदेखा कर रहे हैं। अपनी मर्जी से घर छोड़ कर नये साथी के साथ जाने के कुछ महीनों बाद पहले साथी के पास लौट आना, यह आदिवासी परिवार में हो या गैर-आदिवासी परिवार में हो, उसे केवल यौन-शुचिता की दृष्टि से तोलना, मुझे अधूरा सा लगता है। अगर दूसरे मर्द के साथ गयी स्त्री के घर वापस लौटने पर उसे स्वीकारना विकासशीलता का मापदंड है, तब दूसरी औरतों के साथ जाने वाले पुरुष के घर लौटने पर स्वीकारना क्या होगा? खैर इस कहानी ने इस विषय के बारे में सोचने का मौका दिया, इसलिए यह कहानी अच्छी लगी।

पाखी के अगस्त अंक में विद्याभूषण की कहानी "बनवारी बाबू का मकान" में उत्तर भारत के छोटे शहर के पारिवारिक रिश्तों की बातें हैं, जहाँ दो कमरों के घर में महीनों रहने वाले भाँजे-भतीजे ही नहीं, भाँजे के मित्र पेयिन्ग गैस्ट भी हैं, पैसा अधिक कमाने वाले बेटे का परिवार के निर्णयों पर अधिकार है, बेटी की शादी करने के लिए दान-दहेज क्या और कैसे तैयार किया जाये की बातें भी हैं, और सबसे बड़ी बात की मन-मुटाव हो या पुरानी यादों के साथ हँसना-हँसाना, जीवन नहीं रुकता, वह चलता रहता है। 

अकार में जीवेश प्रभाकर की कहानी "फ्री बर्डस" में धर्म और रिश्तों की नाजुकता की बात बहुत अच्छे तरीके से कही गयी है। रानी की माँ मुसलमान हैं और पिता हिंदू। समय के साथ उनके अपने परिवारों के साथ रिश्ते बदलते हैं लेकिन रानी के भाई की घर वालों द्वारा पक्की की हुई शादी में दिक्कत आती हैं क्योंकि लोग उनके परिवार के बारे में जान कर मना कर देते हैं। रानी के विवाह में भी मुश्किलें आयेंगी, इसलिए उसके मामा उसके लिए एक मुसलमान लड़के का रिश्ता लाते हैं लेकिन रानी का भी अपना एक रहस्य है जिसे उसने सबसे छुपाया है .. कहानी के अंत का सरप्राइज़ अच्छा है। कहानी में माँ और पिता के धर्मों की बात नहीं की है, कि क्या उनमें से किसी ने धर्म बदला था या नहीं, पर शायद उस बात को जोड़ने से कहानी की सरंचना थोड़ी जटिल बन जाती। 

सम्मुख में दो सौ शब्दों की कुछ लघु-कथाएँ पढ़ीं - कुछ कहानियाँ अच्छी लगीं जैसे कि बेजी जैसन की कहानी "भरम", अंजू शर्मा की "जीत", हरि मृदुल का "रोना", लकी राजीव की "अनायक", आदित्य शुक्ल की कहानी "पंख", और, आकांक्षा पारे काशिव की "न्यौता"। कुछ अन्य कहानियों में लगा कि उनका मूल विचार अच्छा था, लेकिन कथा-संरचना को थोड़ा और असरदार किया जा सकता था, जैसे कि , अनिर्बाण साधु का "रंग धनुष", देवेश पथ की "तुर्किश आइसक्रीम", उषा कुमारी की "वायरल विकास", और पल्लवी विनोद की "फोटोग्राफर"। खैर, अभी सभी लघु-कथाएँ नहीं पढ़ पाया हूँ।

कथाक्रम के सितम्बर 2026 अंक में गोविंद मिश्र की कहानी "काम ... मुझे भी" में वृद्ध सज्जन हैं जो अकेले रहते हैं पर बुढ़ापे के साथ तकलीफें बढ़ी हैं इसलिए किसी सहायक को खोज रहे हैं और एक एजैंसी से बात करते हैं। लेकिन शुरु में जितने युवक रखते हैं उनके साथ अनुभव अच्छा नहीं होता, जब एजैंसी वाला एक ऐसे युवक की बात करता है जिसका पारिवारिक इतिहास संदेहनीय है .. छोटी सी कहानी में कोई नाटकीय मोड़ नहीं हैं, बस विश्वास बनने की बात है। यह कहानी आज की दुनिया में अकेले वृद्धों की बढ़ती संख्या और नवयुवकों को नौकरी मिलने की दिक्कतें, इन दोनों समस्याओं को जोड़ती है।

संवेद पत्रिका के जनवरी 2026 अंक में दिव्या विजय की कहानी "कृष्ण पंखुरी" की कहानी सुरमा की है जिसकी बस्ती में सब लड़कियाँ घरों में बाथरूम साफ करने जाती हैं और सुरमा को एक मॉल के बाथरूम की सफाई की नौकरी मिलती है। आसपास सब काम करने वाली लड़कियों को ईर्श्या है कि सुरमा इतनी अच्छी जगह पर इज़्जतदार नौकरी करती है, लेकिन दिक्कत यह है कि जब मॉल में आने वाली लड़कियों की तरह, सफाईवाली के कपड़े-बाल छोड़ कर मॉल वाली लड़कियों के फैशन करने की कोशिश करती है तो उसके पास उनके क्रूर शब्दों से लड़ने के लिए साहस नहीं है, वह हार मान लेती है। पर, कुछ महीने बाद, उसे भी उनमें से एक युवती से बदला लेने का मौका मिलता है तो ... कहानी में अपने आत्मसम्मान के लिए लड़ने की कमज़ोरी का चित्रण अच्छा लगा।

तद्भव में मृत्युंजय कुमार सिंह की कहानी "जल्लाद उर्फ हैंगमैंन" में जेल के पुराने फांसी लगाने वाले बाबुल मसीह हैं, उनकी पत्नी बिल्किस है, उनका बेटा अब्दुल्ला है और जेल का कैदी तारक सकुल है। तारक ने लोगों की हत्या की है और जिस दिन तारक को फांसी लगने वाली है, उस दिन बाबुल मसीह उसे फांसी पर लटकाने वाली रस्सी को तैयार करते हुए उससे बातें करते हैं। छोटी सी कहानी में एक छोटी सी बात है, लेकिन मृत्युंजय जी की काबलियत है कि उस कहानी को ऐसे रचते हैं कि अंत तक बांधे रखती है।  

हिंदी कविता 

मुझे कविताएँ कम ही अच्छी लगती हैं, मैं अंग्रेज़ी और इतालवी में कविताएँ बिल्कुल नहीं पढ़ पाता, पढ़ूँ तो उनमें सौंदर्यबोध या भावबोध नहीं होता। हिंदी कविताओं में भी मुझे पुराने कवि ही अच्छे लगते हैं, नयी कविता मुझे प्रभावित नहीं करती। लेकिन आज के इस आलेख में दो आधुनिक कवि भी हैं - विनय सौरभ और दिनेश शुक्ल। 

अकार पत्रिका में  विनय सौरभ की कविताओं में छोटी-छोटी बातों में छिपी हुई लम्बी कहानियाँ हैं। "असंभावित के विरुद्ध" की कहानी में घर से भागी हुई एक लड़की है, और उसके सालों बाद अपने गाँव में लौटने की बात है। "माँ के शाल" में माँ और मौसी के सम्बंधों का रस है।

सौरभ जी की "अपने ही स्टेशन से गुज़रना" में छूटे हुए गाँव की यादों की बात है, उनकी कविताओं में मुझे यह कविता-कहानी सबसे अधिक अच्छी लगी - इसकी पहली पंक्तियाँ हैं, "एक रोज यात्री बन कर गुजरते हो/ अपने ही गाँव के स्टेशन से/ एक उदासी भीतर फैल जाती है अचानक/  खिड़की से बाहर तलाशते हो, कोई चेहरा दिख जाये परिचित/"।  उनकी एक अन्य कविता, "वे ही!" में अपने आप से प्रश्न हैं कि हम लोगों के सुख-दुख में, उनकी मृत्यु आदि पर क्यों नहीं हिस्सा ले पाते। इसकी कुछ पंक्तियाँ हैं - "यह ख्याल आता है अक्सर देर रात गये/ या आधी नीँद के बीच/ जैसे कोई पत्थर आज भी सीने में लुढ़कता रहता है/ आत्मग्लानी का भार लिए/"। 

ककसाड़ के अगस्त अंक में मुझे दिनेश शुक्ल की दो गज़लें पसंद आयीं। उनकी पहली गज़ल की यह पंक्तियाँ देखिये: "यह चादर वक्त की जर्जर हवा से थरथराती है/ गरीबी पर लगी तुरपाइयाँ रह-रह उधड़ती हैं/" और "दुखी सपनों के किस्से, रात की टूटी हुई नींदें/ सुबह परछाईयाँ इक सीढ़ियाँ चढ़ती उतरती हैं/"।

और उनकी दूसरी गज़ल की पहली पंक्तियाँ भी मुझे बहुत अच्छी लगीं: "किस्सा मत पूछिये, टूटी हुई थकानों का, इसके आगे है सफर, रेत के मकानों का।"

अंत में 

आज के इस आलेख के अंत में तद्भव से आकांक्षा बरनवाल के आलेख से कुछ अन्य पंक्तियां जो मुझे विचारनीय लगीं: "जिस प्रकार 19वीं सदी के सुधारकों ने 'पौरुषहीन (effeminate) कहलाने के डर से अपने धर्म को 'कठोर' और 'एकेश्वर वादी' बनाने का प्रयास किया था, वैसा ही आज की राजनीति इतिहास-2 (लोक परंपरा और मिथक) को जबरन इतिहास-1 (तथ्यात्मक इतिहास) बनाने पर तुली है। दीपेश चर्कवर्ती कहते हैं कि गाँधी ने इतिहास-2 (लोक परंपरा, मिथक और भावनाओं) की भाषा बोली। जब गांधी ने रामराज्य कहा तो उसका मतलब किसी ऐतिहासिक समय या राजा की वापसी नहीं बल्कि राज्य की ऐसी परिकल्पना देना था जिसे किसान भी समझता था। जब गांधी ने नमक उठाया या चरखा चलाया, तो वह कोई आर्थिक सिद्धांत देने से अधिक भारत की आत्मा को छूना चाहते थे। ... आज के नेता इतिहास-1 की भाषा बोलते हैं। यहां तक कि जब वे धर्म की बात भी करते हैं तो उसे 'वैज्ञानिक' सिद्ध करने में लगे रहते हैं ...लेकिन दोनों ही स्थितियों में वह पश्चिमी इतिहासबोध की ही नकल कर रहे हैं। यह सांस्कृतिक युद्ध तब तक शांत नहीं होगा जब तक हम गांधी की या जे. कृष्णमूर्ति की भांति उस हीन भावना से मुक्त नहीं हो जाते, जो हमें हर क्षण पश्चिम के समक्ष खुद को सही और ऐतिहासिक सिद्ध करने के लिए विवश करती है।" 

इस बार जो पढ़ा उसमें मुझे आकांक्षा बरनवाल के आलेख के अतिरिक्त हँस पत्रिका का आदिवासी जीवन और साहित्य पर केन्द्रित अंक सबसे अधिक रोचक लगा। 

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बुधवार, अगस्त 19, 2026

ब्लॉग या सबस्टैक

हिंदी के पहले ब्लॉग 2004-05 के आसपास बनने शुरु हुए थे। मैंने यह अपना ब्लॉग 2005 में गूगल के ब्लॉगर पर बनाया था। पिछले इक्कीस सालों में अपनी बात को लोगों तक पहुँचाने वाले माध्यमों में बहुत से परिवर्तन आये हैं। गूगल के अतिरिक्त, ब्लॉग बनाने के अन्य बहुत से प्लेटफॉर्म आये और गये, उनमें से कुछ जैसे कि वर्डप्रैस आज भी जीवित हैं। लेकिन स्थिति बदलती रहती है, जब भी फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम जैसे नये प्लेटफॉर्म निकलते हैं तो कुछ ब्लॉग लिखने वाले उन पर लिखने लगते हैं और अपने पुराने ब्लॉगों को बंद कर देते हैं, कुछ साथ-साथ ब्लाग को भी चालू रखते हैं।

कुछ वर्ष पहले सबस्टैक नाम का एक नया प्लेटफॉर्म निकला तो बहुत से ब्लॉग वहाँ चले गये हैं। कुछ दिन पहले किसी ने मेरी राय पूछी कि सामान्य ब्लॉग बनाना चाहिये या सबस्टैक वाला ब्लॉग, तो मैंने इस विषय पर सोचा। साथ में इस बात पर भी विचार किया कि इक्कीस साल के बाद भी मैं इस ब्लॉग पर क्यों लिखता रहता हूँ?

इस आलेख में ब्लॉग बनाम सबस्टैक, और आज की दुनिया में जब अपनी बात लोगों तक पहुँचाने के लिए इतने सारे माध्यम है, ब्लॉग लिखने का महत्व, जैसी बातों के बारे में अपनी सोच और अनुभव साझा करना चाहता हूँ।

यह सबस्टैक क्या है?

सबस्टैक के पाठकों के लिए दो चेहरे हैं - उसका प्रमुख चेहरा है इलैक्ट्रोनिक न्यूजलैटर का, यानि अगर आप किसी सबस्टैक के सदस्य बनेंगे तो उसके आलेख आप के ईमेल से आप तक पहुँचेंगे। उसका दूसरा चेहरा है कि आप उन्हीं आलेखों को ब्लॉग की तरह भी इंटरनैट पर या सबस्टैक एप्प पर पढ़ सकते हैं।

सबस्टैक के लेखक अपने पाठकों से अपने आलेखों को पढ़ने के लिए फीस माँग सकते हैं, आप से कह सकते हैं कि आप उनके सदस्य बनिये और अगर फीस दे कर आप सदस्य नहीं बनते तो उनके आलेखों को नहीं पढ़ सकते।

सबस्टैक 2017-18 के आसपास बनने शुरु हुए थे। गूगल से पूछा तो पता चला कि दुनिया में इस समय करीब एक लाख सबस्टैक लेखक हैं जो नियमित लिखते हैं और उन्हें पढ़ने के लिए पैसे दे कर सदस्य बनना आवश्यक है। उनके अतिरिक्त अन्य कई लाख फ्री सबस्टैक हैं, जिन्हें पढ़ने की कोई फीस नहीं लगती।

भारत से निकलने वाले लोकप्रिय सबस्टैक हैं रोहण वैंकट का इंडिया इनसाईड-आऊट, प्रणय कोटास्थाने का एन्टीसिपेटिन्ग द अनइनटैंडिड, महिमा वशिष्ठ का वूमैंनिन्ग इन इंडिया, द वायर का इंडिया केबल और श्रेयास शैंदे का इंडियालॉग।

जहाँ तक मुझे मालूम है अभी तक दुनिया मे हिंदी में कोई सबस्टैक नहीं चल रहा है। सदस्यता वाले सबस्टैक भारत में रह कर चलाना कठिन है क्योंकि उसके पैसे केवल स्ट्राईप पैयमैंट सिस्टम से मिलते हैं जिससे जुड़ने के लिए भारत में आप को रजिस्टर्ड बिज़नैस होना आवश्यक है, इसलिए आम व्यक्ति जो अपना व्यक्तिगत सबस्टैक बनाना चाहते हैं वह उसके माध्यम से कमा नहीं सकते। मैंने कुछ भारतीय सबस्टैक में देखा है कि वह आप से सदस्यता नहीं माँगते, लेकिन आलेखों के अंत में लिंक डाल देते हैं "हमारी सहायता कीजिये और हमे चाय या कॉफी पिलाईये" और वहाँ आप से पैसे देने के लिए कहते हैं। ऐसी ही एक लिंक पर क्लिक किया तो उन्होंने मुझसे कॉफी के लिए 5 यूरो यानि पाँच सौ रुपये देने के लिए कहा।

यूरोप के कुछ लोकप्रिय सबस्टैकों के कुछ उदाहरण हैं - तकनीकी के बारे में हॉलैंड से "द प्रेगमैटिक इंजीनियर" जिसके लाखों सदस्य हैं, साँस्कृतिक विषय पर इटली से "वाले तूत्तो" जिसके ढाई लाख सदस्य हैं, मैनेजमैंट के बारे में इटली से "रिफैक्टरिन्ग" जिसके डेढ़ लाख सदस्य हैं, और फाईनैन्स के विषय पर इंग्लैंड से "नेट इंडरस्ट"।

अमरीका के कुछ लोकप्रिय सबस्टैकों के उदाहरण हैं - अमरीकी राजनीति पर "लैटर्स फ्रोम एन अमेरिकन" और "द बुलवार्क", समाचारों पर "द फ्री प्रैस", नीतियों और आर्थिक विषयों पर "स्लो बोरिन्ग", और समाचारों पर व्यंग करने वाला, "द बोरोविट्ज़ रिपोर्ट"।

ब्लॉग या सबस्टैक पर लिखने के फायदे

मेरे विचार में इनका सबसे बड़ा फायदा है कि दुनिया के किसी भी कोने में लोग आप को पढ़ सकते हैं।

दूसरा फायदा है कि यह बने-बनाये प्लेटफॉर्म हैं, इसमें फॉन्ट, लेआऊट, तस्वीर लगाना आदि बहुत आसान है, इसे आप एक दिन में बिना किसी की सहायता के सीख सकते हैं।

इसका तीसरा फायदा है कि जब तक वह प्लेटफॉर्म रहेगा, आप का लिखा सुरक्षित है, जैसे कि मैं अपने बीस साल पहले लिखे आलेखों को आसानी से देख-खोज सकता हूँ, अगर उनमें कुछ नया जोड़ना चाहूँ या बदलना चाहूँ तो वह सब कर सकता हूँ। चूँकि कम्पनियाँ फेल हो जाती हैं, उनके प्लेटफॉर्म कभी भी बंद हो सकते हैं, इसलिए आप अपने ब्लॉग के आरकाइव को डाउनलोड करके उसकी एक कॉपी अपने पास सम्भाल कर भी रख सकते हैं।

इसका चौथा फायदा है कि आप अपने पाठकों की टिप्पणियाँ तुरंत देख सकते हैं और उनसे विचारों का आदान-प्रदान भी कर सकते हैं। एक ज़माने में लोग कम्प्यूटर से अधिक पढ़ते थे, तब टिप्पणियाँ अधिक मिलती थीं, आजकल लोग ट्रेन या बस में बैठे-बैठे मोबाइल पर ब्लॉग पढ़ते हैं इसलिए टिप्पणियाँ मिलना बहुत कम हो गया है।

ब्लॉगर पर बहुत सी एप्प हैं जिनकी सहायता से आप आसानी से जान सकते हैं कि कितने लोगों ने आप का आलेख पढ़ा है, वह कौन से देशों से हैं, महीने में कितने लोग आप के ब्लॉग को पढ़ते हैं। जैसे कि मेरे इस ब्लॉग को आजकल हर महीने बारह-पंद्रह हज़ार लोग पढ़ते हैं, इसके कुछ आलेख बहुत लोकप्रिय हैं, उन्हें बीस-पच्चीस हज़ार लोग पढ़ चुके हैं।

अगर आप चाहें तो ब्लॉग से कमा भी सकते हैं। ब्लॉगर आप को गूगल-एड डालने का मौका देता है, अन्य प्लेटफॉर्म वाले यह मौका नहीं देते लेकिन आप खुद अपने स्पॉन्सर या विज्ञापन खोज सकते हैं। जिन्होंने गूगल विज्ञापनों से कमाने की कोशिश की है, वह कहते हैं कि यह आसान नहीं है और कई बार गूगल अपने विज्ञापकों की वजह से आप से अपने लिखे को बदलने या हटाने के लिए कह सकता है। लेकिन गूगल-एड में कोई जबरदस्ती नहीं है, मैं ब्लॉग से कमाना नहीं चाहता, इसलिए मैं इसमें कोई व्यवसायिक आलेख या विज्ञापन नहीं स्वीकारता।

हो सकता है कि अपने ब्लॉग पर भी आप "मुझे चाय पिलाईये" जैसी लिंक डाल सकते हैं जिसके लिए आप यू.पी.आई. के किसी सिस्टम से पाठकों से कुछ पैसे देने के लिए कह सकते हैं। मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं है, न ही मैं जानता हूँ कि यह भारतीय कानून के हिसाब से कानूनी है या नहीं। इसे करने से पहले वकील आदि से सलाह लीजिये।

मेरा अनुभव है कि ब्लॉग या सबस्टैक से पैसा कमाना कठिन है। कुछ प्रसिद्ध सबस्टैक जिनके नाम ऊपर दिये हैं वह लाखों डालर कमाते हैं लेकिन वहाँ हम लाखों में से एक की बात कर रहे हैं, वह भी उसकी जो किसी क्षेत्र में बहुत ज्ञान रखता है और बहुत मेहनत करता है, हर हफ्ते नयी जानकारी ले कर आ रहा है।   

ब्लॉग और सबस्टैक में अंतर

कुछ अंतरों के बारे में ऊपर बात हुई है, जैसे कि ब्लॉग को उसकी वेबसाइट पर पढ़ते हैं जबकि सबस्टैक आप की ईमेल में न्यूजलैटर की तरह से आ सकता है। 

एक अन्य बड़ा अंतर है कि सबस्टैक का ले-आऊट (शब्द संयोजन) बदला नहीं जा सकता, जबकि ब्लॉग में आप रंग, तस्वीरें, ले-आऊट आदि सरलता से बदल सकते हैं।

ब्लॉगर बिल्कुल फ्री होता है, आप जितने चाहें, अलग-अलग भाषाओं में ब्लॉग बना सकते हैं। जबकि सबस्टैक में अगर आप सदस्यता की फीस नहीं लेते तो वह भी फ्री है, लेकिन अगर आप सदस्यता फीस लेते हैं तो आप को उसकी कमीशन देनी होती है। बाकी ब्लॉग प्लेटफॉर्म, जैसे कि स्कावयरस्पेस, को वार्षिक फीस देनी पड़ती है।

ब्लॉगर और सबस्टैक दोनों पर आप के आलेखों को, पाठक अपनी भाषा में अनुवादित देख और पढ़ सकते हैं। यानि आप के हिंदी ब्लॉग को फ्राँसिसी या स्पैनिश बोलने वाले भी पढ़ सकते हैं।

अगर आप ऐसे विषयों के बारे में लिखेंगे जिसके बारे में दुनिया जानना चाहती है तो लोग आप को किसी भी भाषा में पढ़ेंगे। पर अधिक पाठक खोजना जरूरी नहीं है, अगर ब्लॉग आप की आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम है, तो कौन-कितने वाली बातें भूल जाईये, जिसमें आप के मन को संतोष मिलता है, वह लिखिये। मेरी अपनी सोच यही रही है।

ब्लॉगर गूगल का है, अगर एक बार गूगल को विश्वास हो जाये कि आप बिना कहीं से नकल किये, अपनी जानकारी से और अच्छी भाषा में अच्छी तरह से लिखते हैं, तो वह पाठकों को आप के ब्लॉग में भेजता है, जबकि सबस्टैक को यह मदद नहीं मिलती। ब्लॉग और सबस्टैक, दोनों फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि की सहायता से भी अपने पाठक खोज सकते हैं।   

अंत में

हिंदी ब्लॉग जगत को जानने और पढ़ने के लिए आप पाँच लिंको का आनन्द, हिंदी ब्लाग जगत, ब्लाग4वार्ता, ब्लोगोदय, जैसे ब्लॉग प्लेटफार्म से तरह-तरह के हिंदी ब्लॉगों को देख सकते हैं। 

दस-पंद्रह साल पहले तक हिंदी के हज़ारों ब्लॉग होते थे, आज उनकी संख्या बहुत कम हो गयी है, बहुत से लोग अन्य सोशल मीडिया, विशेषकर फेसबुक के माध्यम से अपने लेखन को दूसरो तक पहुँचाते हैं। फेसबुक पर "हिंदी ब्लाग" खोजेंगे तो वहाँ ऐसे पन्ने मिलेंगे जहाँ पर आप अपने हिंदी लेखन के बारे में समाचार या विज्ञापन दे सकते हैं। 

मेरे लिए मेरा ब्लॉग मेरी डायरी है, मैं इसे सबसे पहले अपने संतोष के लिए लिखता हूँ। पहले के मुकाबले में आजकल पाठकों की टिप्पणियाँ मिलना बहुत कम हो गया है, लेकिन मैं देख सकता हूँ कि हर रोज़ पाँच सौ से ले कर एक हज़ार लोग इस ब्लॉग पर कुछ न कुछ पढ़ने आते हैं, मेरे लिए यही संतोष की बात है। कुछ महीने पहले मैंने अपने नये फैंतासी उपन्यास को भी अपने ब्लॉग से प्रकाशित किया है, इस तरह मुझे नये प्रयोग करना अच्छा लगता है।

अगर आप के मन में लिखने की और आत्म-अभिव्यक्ति की इच्छा है तो मेरी राय है कि अपना ब्लॉग बनाईये, इसके लिए आप को किसी अन्य पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा। आप के पास कम्प्यूटर या लेपटाप हो तो यह आसान होगा, मोबाइल से ब्लॉग लिखने में शायद कुछ मुश्किलें हों। एक बार लेखन का अभ्यास बढ़ेगा तो कल आप पत्रिकाओं और प्रकाशकों के लिए भी लिख सकते हैं।

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रविवार, अगस्त 09, 2026

क्या पढ़ा (1) - हिंदी कहानियाँ-आलेख

लगभग पिछले चालिस सालों से, जबसे दिल्ली छोड़ कर इटली में रहने लगा था, मेरा हिंदी पत्रिकाएँ पढ़ना बहुत कम हो गया था, जब भारत जाता था तो इक्का-दुक्का पढ़ लेता था। पिछले साल अगस्त में मैंने "नॉटनुल" की वार्षिक सदस्यता ली तो इतने सालों के बाद हिंदी की पत्रिकाएँ पढ़ने का मौका मिलने लगा। अब इस बात को करीब एक साल हो गया है, एक दिन मैं याद करने लगा कि पिछले बारह महीनों में हिंदी पत्रिकाओं में क्या अच्छा पढ़ा, तो कुछ भी याद नहीं कर पाया। तब सोचा कि आगे से मुझे जो पढ़ा हुआ अच्छा लगेगा, उसके बारे में इस ब्लॉग पर लिखने की कोशिश करनी चाहिये, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उसे याद किया जा सके।

 

मुझे आशावादी साहित्य पढ़ना अच्छा लगता है, मैं चाहता हूँ कि चाहे कितनी भी बड़ी मुश्किलें या दुख हों, लेकिन कहानी के क्षितिज पर एक आशा की छोटी सी किरण भी होनी चाहिये, सब कुछ बिल्कुल नकारात्मक नहीं होना चाहिये। दूसरी बात है कहानी का कथानक, उसके कहने का अन्दाज़, उसकी बातें। पिछले वर्ष में जब हिंदी पत्रिकाएँ पढ़ीं तो मुझे समझ में आया कि मुझे हिंदी कहानियाँ पढ़ना इतना अच्छा नहीं लगता, बल्कि आलेख पढ़ना अधिक अच्छा लगता है।

इसीलिए आज के मेरे इस आलेख में कहानियाँ कम पायेंगे और आलेख अधिक।

कथा-कहानियाँ 

चंद्रकिशोर जायसवाल की कहानी "फर्ज", नया ज्ञानोदय पत्रिका के जुलाई अंक में पढ़ी। इसमें दामोदर भगत का बेटा बैजनाथ अपनी पसंद की युवती से ब्याह करना चाहता है, पर भगत जी ने पाँच साल पहले किसी को ज़ुबान दी थी कि उनकी सुंदर, सुस्कृंत कन्या से पुत्र का ब्याह करेंगे। गुस्से में भगत जी निर्णय लेते हैं कि अगर बैजनाथ उनकी बात नहीं मानेगा तो वह उसे अपनी जयदाद से बेदखल कर देंगे। कह तो देते हैं लेकिन उनके मन में इस बारे में कुछ संशय है, इसलिए वह अपने फुलकाहा गाँव के वरिष्ठ ज्ञानी वेदानन्द गिरि से सलाह लेने जाते हैं ... जब यह कहानी शुरु हुई, तो मेरे मन में अपेक्षा थी कि वह किस दिशा में जायेगी, लेकिन कहानी ने वह घिसा-पिटा रास्ता नहीं लेती, बल्कि एक दूसरी ही दिशा में चल पड़ती है। कहानी में वेदानन्द बाबू की यादों के किस्से और उनकी भगत जी को समझाने की कोशिशें, मुझे अच्छी लगीं। कहानी का अंत थोड़ा सा कन्वीनियंट लगा, पर कहानी पढ़ने में मज़ा आया।

मुकेश नौटियाल की कहानी "सियारसिंगी", जुलाई 2026 की पाखी पत्रिका में पढ़ी। इस कहानी में दो कहानियाँ हैं, एक कहानी है एक पहाड़ी गाँव की औरत, उसके बेटे और उसके खोये हुए भाई की। और दूसरी कहानी है एक तिब्बती शरणार्थी युवती और उसके साथ रहने वाले गूँगे-बहरे लड़के की। इन दो कहानियों को स्कूल में पढ़ाने वाले एक मास्टर जी जोड़ते हैं जो गाँव वाली औरत की चिट्ठियाँ लिखते हैं और उसके भाई को खोजने देहरादून की तिब्बती बस्ती में जाते हैं। कहानी में दो लोकविश्वास की कहानियाँ भी जुड़ी हैं, एक सियारों के माथे में उगने वाली जादुई शक्ति वाली सियारसिंगी की और दूसरी, इन्सानों को आग पर पका कर उनके कपाल से निकाले जाने वाले रामतेल की। यह सारी कहानी संयोगों पर टिकी है, कहानी के हर मोड़ पर मास्टर जी हर जगह पर जो भी खोजते हैं, वह उन्हें आसानी से मिल जाता है। पर जादुई-यदार्थवाद की कहानी में तर्क की अपेक्षा करना शायद उचित भी नहीं है। इस कहानी में मुझे उसकी भाषा और पहाड़ी लोकजीवन की खुशबु अच्छी लगीं। 

नर्मदेश्वर की कहानी "सूई धागा", परिकथा पत्रिका के जुलाई अंक में पढ़ी, अच्छी लगी। छोटी सी, सीधी-साधी कहानी है, जद्दी चाचा नाम के दर्जी और संदीप नाम के लड़के की, कि कैसे समय के साथ संदीप की उनसे जान-पहचान बनती है और लड़के को समझ आती है कि ऊपर से सख्त दिखने वाले जद्दी चाचा मन के नर्मदिल हैं। कहानी में जद्दी चाचा का अपने बेटों के नाम पेट्रोल और डीज़ल देख कर कुछ अजीब सा लगा, सोचा कि लेखक को उन नामों की कहानी भी बतानी चाहिये थी। इस कहानी से मुझे बचपन के दिनों की याद आई जब दर्जी, सफाई वाले, कपड़े इस्तरी करने वाले, दुकानदार, आदि बेनाम नहीं सचमुच के लोग होते थे, हम उनके नामों और परिवारों के इतिहासों को जानते थे, और वे हमारे।

आलेख, संस्मरण, आदि 

बिपिन तिवारी, अभिषेख गुप्ता और रोहतास कुमार का सुधीर विद्यार्थी से लम्बा साक्षात्कार "विप्लव राग" शीर्षक से, बनास जन पत्रिका में पढ़ा जो मुझे अच्छा लगा। सुधीर विद्यार्थी जी 1953 में पैदा हुए थे, उन्होंने इतिहास में एमए की और बीसवीं सदी के क्राँतिकारियों के बारे में बहुत कुछ लिखा है। इस साक्षत्कार-आलेख में बहुत सी रोचक बातें जानने को मिली, जैसे कि बनारसीदास चतुर्वेदी, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ, सुंदरलाल, बाबा नागार्जुन, आदि के संस्मरण, क्राँतिकारियों के बारे में गाँधी जी और नेहरू जी के बीच मतभेद, लोगों द्वारा भगतसिंह के सिर पर पगड़ी रखने का अर्थ, पंडित परमानन्द की कहानी, सुनीति चौधरी और शांति घोष की बातें, आदि। आलेख में अपने लेखन के बारे में सुधीर जी कहते हैं, "मैं किसी लायब्रेरी में नहीं बैठा, न किसी आर्काइव में गया। उस इतिहास को मैंने देखा-सुना-जाना, क्राँतिकारियों की आँखों से, उनके शब्दों से। इतिहास को बताते हुए कई-कई बार उन्हें रोते हुए देखा ..."। 64 पन्नों का यह साक्षात्कार है, किसी छोटी किताब के बराबर लम्बा है, पर बहुत दिलचस्प है। 

प्रसिद्ध शायर बशीर बद्र का मई 2026 में 91 वर्ष की आयु में निधन हुआ। उनके बारे में दो आलेख पढ़े। एक आलेख "हँस पत्रिका" में पढ़ा जिसमें युवा शायर महेंद्र कुमार सानी ने अपने स्मृति-आलेख, "उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो", में उनके प्रिय और प्रसिद्ध शेरों को याद किया है। जबकि डॉ. जियाउर रहमान ज़ाफ़री ने "ककसाड़ पत्रिका" के जुलाई अंक में अपने आलेख, "शायर बशीर बद्र को याद करने वाले ...", में उनके जीवन की कुछ बातों बतायीं हैं जैसे कि कैसे 1987 में मेरठ के दंगे में अपना घर खो कर वह भोपाल चले आये थे, कैसे अंतिम वर्षों में उनकी यादाश्त नहीं रही थी और कैसे बड़े बाग कब्रिस्तान में उनके जनाज़े साथ केवल मोबाइल की रोशनी और थोड़े से लोग थे। यहाँ मैं बद्र साहब का वह शेर याद करना चाहूँगा जिसे मैंने अपना जीवन जीने का मंत्र बनाया है: "हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ़ भी चल देंगे, रास्ता हो जायेगा।" 

शिव कुमार पाण्डेय का आलेख, "बस्तर की बोली-भाषा", भी ककसाड़ पत्रिका में ही पढ़ा। मुझे जनजातियों के जीवन से जुड़े लेख पढ़ना अच्छा लगता है इसलिए "ककसाड़" मासिक पत्रिका हमेशा चाव से पढ़ता हूँ। इस आलेख में पाण्डेय जी ने बस्तर की भाषाओं और बोलियों का बहुत दिलचस्प विवरण दिया है। जैसे कि गोंडी भाषा बस्तर में कांकेर और भानुप्रतापपुर के साथ-साथ अन्य बहुत से क्षेत्रों में भी बोली जाती है जिनमें कोन्टा, भोपाल पटनम, दाँतेवाड़ा, गढ़चिरोली, बालाधार, आदि भी शामिल हैं। हर जगह की गोंडी थोड़ी सी भिन्न है, लोग एक-दूसरे की गोंडी को समझते हैं, लेकिन उत्तर अपनी गोंडी में देते हैं। गोंडी के अतिरिक्त इस आलेख में "हल्बी" भाषा का भी जिक्र है जिसे बस्तर की सम्पर्क की भाषा भी कह सकते हैं और जिसमें छत्तीगढ़िया, मराठी और उड़िया भाषाएँ मिली हुई हैं। लेकिन गोंडी, हल्बी और बस्तर की अन्य 36 बोलियों में आपस में क्या सम्बंध है, यह बात मुझे ठीक से समझ नहीं आई, इसलिए इस विषय पर और पढ़ना अच्छा लगेगा। 

अकार पत्रिका में प्रियंवद का सम्पादकीय पढ़ा जिसमें उन्होंने हिंदी के वरिष्ठ लेखक तथा पहल पत्रिका के सम्पादक ज्ञानरंजन जी के बारे में लिखा है वह अच्छा लगा। उसमें उन्होंने, अन्य लेखकों के ज्ञानरंजन जी को लिखे पत्रों के माध्यम से, उनकी मार्क्सवादी-कथाकार बनने की यात्रा और फ़िर उनका कथाकार से अधिक सम्पादक बन जाने की बात, अन्य लेखकों के साथ उनके सम्बंधों, आदि की बातें बतायी हैं। ज्ञानरंजन जी की यह बात कि "मैं अपनों के प्रति बहुत निर्मम हूँ", मुझे बहुत परिचित सी लगी, क्योंकि एक समय था जब मेरी सोच भी कुछ वैसी ही थी, मुझे भी यह लगता था कि अगर मैं आप की कड़वी आलोचना करता हूँ तो इसका मतलब है कि आप मेरे प्रिय हैं (अब मैं इस सोच से बचने की कोशिश करता हूँ)। ज्ञानरंजन जी का इस साल के प्रारम्भ में देहांत हो गया था।

अकार पत्रिका के 73 अंक में ही "मेरी रचनात्मकता: मेरे द्वंद" शीर्षक से विभिन्न लेखकों के वक्तव्य छपे हैं, इन्हें भी मैंने बहुत रुचि से पढ़ा और यह मुझे बहुत अच्छे लगे। इनमें से कुछ की बात करना चाहता हूँ, जिन्होंने मुझे गहरा छुआ:

मनोज रूपड़ा के वक्तव्य में, उनकी स्मृतियों में हिंसा की घटनाओं, कुत्तों का घायल बिल्ली को नोच कर खाने से ले कर जलती रेल की बोगी में झुलसती लाशों के विवरणों, ने दिल को हिला दिया।

जया जादवानी की जीवन गाथा पढ़ी तो लगा कि उनके जैसा जीवन जीते हुए पढ़ना और लिखना का मतलब कितनी कठिनाईयों से लड़ना है। वह लिखती हैं, "द्वंद कुछ नया सोचने का, कुछ नया रचने का अब ज़्यादा है। कुछ ऐसा जो वर्जित हो, जिसे अब तक कहा न जा सका हो। कहा भी गया हो तो उसके भीतर घुस कर नहीं। मैं चाहती हूँ मेरा सत्य मेरे होने से निकले ..."

जितेन्द्र भाटिया के वक्तव्य में उनका कहानी लिखने को वैताल के वृक्ष से "स्मृति के शव को नीचे उतारने जैसा" पढ़ कर बहुत देर तक सोचता रहा। मुझे लगा कि शायद स्मृतियाँ शव नहीं होतीं, जीवित होती हैं पर उनमें एक अलग किस्म का जीवन होता है। जैसे विक्रम के गलत उत्तर देने पर वह शव उड़ कर वापस पेड़ पर लौट जाता है, वैसे ही स्मृतियाँ भी हमारे मानसिक पटल पर उड़ती-घूमती रहती हैं। उनकी एक अन्य बात कि "कविता के मुकाबले में गद्य लेखन, प्रेरणा से अधिक एक धैर्यपूर्ण रियाज़ और अपने आगे-पीछे देखने-समझने की विवेकपूर्ण मशक्कत माँगता है", ने भी सोचने पर मजबूर किया।

दिव्या विजय की बात कि व्यक्ति अपने आप को लेखक कब महसूस करता है, मुझे दिलचस्प लगी। मैं अक्सर कला प्रदर्शनियों में कलाकारों से साक्षत्कार करता हूँ, वहाँ भी अक्सर उनके मन में यही संशय मिलता है, कि शायद मैं कलाकार नहीं हूँ, मैंने कला के लिए बलिदान वाला जीवन नहीं जिया। दिव्या जी लिखती हैं, "लिख देना, छप जाना, क्या इतने भर से लेखक बना जा सकता है? वह क्या है जो किसी व्यक्ति को लेखक में बदल देता है?"

राही डूमरचीर के वक्तव्य में संताल गाँव और मित्रों के बीच में एक प्रवासी परिवार का हिस्सा होने का द्वंद है, जो संतालों को नीचा और पिछड़ा हुआ मानता है, उनसे सम्बंध नहीं रखना चाहता, वहाँ की प्रकृति-पहाड़ की सुंदरता को नहीं देख पाता। वह लिखते हैं, "... दंभ भी आनुवांशिक होता है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्वत: हस्तांतरित होता रहता है ... आदिवासियों के प्रति हमदर्दी ही हिलोर मारती थी, प्यार नहीं कर पाता था ... जँगल में अराजकता का राज होता है, कोई कायदा, कानून नहीं होता, यह वही कह सकता है जिसे सिर्फ बगीचे वाली व्यवस्था नज़र आती है ...हमारा समय पुरखे, पेड़ों, जंगलों में निवास करता है। उनके बीच पलता-बढ़ता है। उन्हीं के साथ-साथ चलता है। उनके बीतने से हमारा समय भी बीत जाता है ... मनुष्य विरोधी हो कर तो फ़िर भी रहा जा सकता है, पर धरती विरोधी हो कर कितने दिनों तक बचे रह पायेंगे हम?" 

कथा क्रम पत्रिका के अप्रैल-जून अंक में मधुरेश जी का लम्बा आलेख "शरत चन्द्र और उनका 'शेष प्रश्न': प्रेम दृष्टि और स्त्री चिंता के सवाल" में शरत चन्द्र के उपन्यास "शेष प्रश्न" के विभिन्न पात्रों विशेषकर कमल के बारे में, विवेचना तो है ही, साथ ही इस उपन्यास के विभिन्न संस्करणों के अनुवादों की गुणवत्ता और साहित्यिक भिन्नताओं की बात भी है। इस सब के साथ, आलेख में हिंदी साहित्य के पुराने अनुवादकों और प्रकाशकों की बाते भी हैं जो मुझे बहुत दिलचस्प लगीं। उदाहरण के लिए इस उपन्यास के 1927 में निकले संस्करण जिसका अनुवाद धन्य कुमार जैन ने किया था और नाथूराम 'प्रेमी' ने प्रकाशित किया था, की बात करते हुए वह नाथूराम प्रेमी के बारे में वह पुरानी जानकारी देते हैं जिससे आज का साहित्य जगत अवश्य ही अपरिचित होगा। उन्होंने लिखा है: "नाथूराम प्रेमी किस कद-बुत के प्रकाशक थे, इसके लिए चंद उदाहरण ही काफी होंगे। वे प्रेमचन्द्र और जैनेन्द्र के ही प्रकाशक नहीं थे। हजारीप्रसाद द्विवेदी की 'बाणभट्ट की आत्मकथा', 'कबीर' और 'हिन्दी साहित्य की भूमिका' के प्रकाशक भी वही थे।"

अंत में

रिटायर होने के बाद से, हर रोज़ इतना कुछ पढ़ता हूँ, कि सब के बारे में लिखना सम्भव नहीं है, लेकिन जो पढ़ा उसमें क्या याद रखने लायक लगा, यह लिखना शायद थोड़ा सा आसान है। मेरे लिए ब्लॉग मेरी डायरी है, इस आलेख को लिखने की चेष्ठा का मेरा यही अर्थ है।

इस आलेख में जिन कहानियों और आलेखों के बारे में मैंने लिखा है, अगर आप कहें कि उसमें से चुन कर यह बताईये कि सबसे अधिक अच्छा क्या लगा, तो मेरा चुनाव होगा, अकार पत्रिका के 73 अंक में ही "मेरी रचनात्मकता: मेरे द्वंद" शीर्षक से विभिन्न लेखकों के वक्तव्य - इस बार सबसे अधिक दिलचस्प मुझे वही लगे।

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शनिवार, जून 27, 2026

अजेय की कविता में खड़ा आदमी

अजेय की एक प्रसिद्ध कविता है, जो मुझे बहुत अच्छी लगती है। लेकिन जब भी मैं उसे याद करता हूँ तो हर बार उसके एक शब्द पर अटक जाता हूँ। वह शब्द एक क्रिया है, जो मुझे अधूरी लगती है। और उसके अधूरेपन में कुछ ऐसा है जो मुझे बार-बार उस कविता की ओर खींचता है।


वह कविता है:

पहले एक गोरैया होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी इतना ऊँचा उड़ा
कि गोरैया खो गई।
 
पहले एक पहाड़ होता था
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे तन कर खड़ा
कि पहाड़ ढह गया।
 
पहले एक नदी होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे वेग से बहा
कि नदी सो गयी
 
पहले एक पेड़ होता था
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे जोर से झूमा
कि पेड़ सूख गया।
 
पहले एक पृथ्वी होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी इतनी जोर से घूमा
कि पृथ्वी रो पड़ी।
रो पड़ी ...
कि पहले एक आदमी होता था।

इसे पढ़ते हुए जिस क्रिया पर मैं अटक जाता हूँ, वह 'खड़ा' है, पहाड़ वाले अंतरे में। उड़ा, खड़ा, बहा, झूमा और घूमा में मुझे केवल 'खड़ा' वाली बात क्यों अधूरी लगती है? कवि को गिन कर शब्द लिखने होते हैं ताकि कविता की लय बनी रहे और 'खड़ा' को देख कर मैं अपने मन में उसे 'खड़ा हुआ' कर देता हूँ, लेकिन कहीं पर कुछ फँसा रह जाता है।

मैंने हिंदी आठवीं कक्षा तक ही पढ़ी थी, मुझे उसकी व्याकरण और साहित्य का विधिवत पढ़ने-समझने का मौका नहीं मिला था। खड़ा क्यों बाकी क्रियाओं से भिन्न है, शायद आप में से कोई हिन्दी व्याकरण के ज्ञानी मुझे समझा सकते हैं?

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टिप्पणी: पहले मैंने अजेय की जगह इसे अज्ञेय की कविता समझा था, एक सुधी पाठक, अनूप सेठी जी, जो स्वयं जाने माने हिंदी कवि हैं, ने इस गलती के बारे में मुझे बताया। उन्हें इसके लिए दिल से धन्यवाद। 

अजय कुमार "अजेय" की यह कविता (एक आदमी होता था) और अन्य कविताएँ आप कविता-कोष पर भी पढ़ सकते हैं।

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गुरुवार, मई 28, 2026

नया धारावाहिक उपन्यास

करीब एक-डेढ़ महीना पहले मैंने एक नया फैंतेसी उपन्यास लिखा, "देवी प्रतिमा के रक्षक"। यह एक छोटा सा हल्का-फुल्का उपन्यास है, जिसमें ताकानोरी नाम का एक जापानी याकूज़ा-गुँडा, एक गुप्त-शक्ति वाली मूर्ति की खोज में हिन्दुस्तान आता है और उसका मुकाबला एक अनाथालय में काम करने वाले युवक त्रिनेत्र और वहाँ रहने वाले अनाथ बच्चे करते हैं।

साथ की तस्वीर में उपन्यास के तीन प्रधान पात्र हैं - कोरिया के बौद्ध भिक्षुक जून मिन जिन्हें उनके भारतीय भक्त जामुन बाबा के नाम से जानते हैं, जापानी याकूज़ा ताकानोरी और अनाथाश्रम में काम करने वाला त्रिनेत्र। अगले सोमवार, 1 जून 2026 से आप इस उपन्यास को इसी ब्लाग पर पढ़ सकेंगे। 

अमेज़न या अन्य ओन-लाईन पर्टल या प्रकाशक के पास अपने उपन्यास को छपवाने की जगह पर मैंने अपने उपन्यास को ब्लॉग पर डालने का निर्णय क्यों लिया, इस आलेख में मैं इसकी बात करना चाहता हूँ।  

बचपन की यादें

जब मैं छोटा था तब बहुत सी हिंदी पत्रिकाएँ छपती थीं। पहले चँदामामा पत्रिका में रामायण की कथा छपती थी, वह पढ़ता था। कुछ बड़ा हुआ तो हमारे घर पर धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी सप्ताहिक पत्रिकाएँ आती थीं। उनमें अक्सर धारावाहिक उपन्यास छपते थे, यानि हर सप्ताह उपन्यास का एक नया अध्याय पढ़ने को मिलता था। तब पत्रिका आने और उपन्यास पढने की बहुत प्रतीक्षा रहती थी। शिवानी, शंकर, किशन चंदर, अन्नपूर्णा देवी और बिमल मित्र जैसे लेखकों से मेरा इसी तरह से परिचय हुआ था।

आजकल हिंदी की वैसी साप्ताहिक पत्रिकाएँ आनी बंद हो गयीं हैं। हिंदी की कुछ मासिक पत्रिकाएँ हैं लेकिन मुझे नहीं लगता कि उपन्यास के एक अध्याय को पढ़ने के लिए कोई एक महीने तक प्रतीक्षा करेगा। बल्कि, एक महीने पहले क्या पढ़ा था, उसे याद रखना कठिन होगा। मैं सोच रहा था कि पहले जैसा धारावाहिक उपन्यास पढ़ने का अनुभव आज के पाठकों को कैसे दिया जा सकता है? तब उसे ब्लाग में छापने की बात मन में आयी।

इस ब्लाग के आलेखों को दो सौ - तीन सौ पाठक आसानी से मिल जाते हैं, और कुछ लोकप्रिय आलेखों को पढ़ने वालों की संख्या कुछ हज़ार तक पहुँच जाती है। मैंने सोचा है कि अगर मेरे उपन्यास को ब्लाग से सौ - दो सौ पाठक मिल जायें तो मेरे लिए काफ़ी हैं और इसके लिए मुझे किसी अन्य पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा।

मुझे अच्छी पैंशन मिलती है, मुझे और पैसे की आवश्यकता नहीं है। वैसे भी जहाँ तक मुझे मालूम है, आम हिंदी लेखकों की किताबों से कमायी अधिक नहीं होती।   

हिंदी किताबों के प्रकाशक 

हिंदी प्रकाशनों के बारे में जितना पढ़ा-जाना है, उससे लगता है किताब छपवाना बहुत कठिन है, और वह मेरे बस की बात नहीं है। मेरे एक अन्य उपन्यास को छापने की मित्र अरविंद मोहन की सहायता से एक प्रतिष्ठित प्रकाशक से करीब तीन साल पहले बात हुई थी, वह अभी तक नहीं छपा और न ही उसके छपने के कुछ आसार दिखाई देते हैं।

कुछ दिन पहले जाने-माने पत्रकार और लेखक प्रिय दर्शन ने कुछ दिन पहले फेसबुक पर हिंदी लेखकों की स्थिति के बारे में लिखा था, कि "लेखक का पारिश्रमिक या तो बंद हो चुका है या घटता जा रहा है। जो वेब पोर्टल पहले लेखक को पैसे देते थे, उन्होंने पारिश्रमिक देना बंद कर दिया है, क्योंकि वे 'घाटे' में चल रहे हैं। किताबों की रॉयल्टी इतनी कम मिलती है कि बताने में कोई शर्मिंदा हो जाए। ... प्रकाशन की दुनिया में पैसे देकर- या अपनी अफ़सरी या नेतागीरी के बूते किताबें बिकवा कर- किताबें छपवाने का जो नया चलन शुरू हुआ है, उसने लेखकों के सामने एक नई मुश्किल पैदा कर दी है। उनकी किताबें प्रकशकों के यहां पड़ी रहती हैं- उनका प्रकाशन टलता जाता है। किताबों के प्रचार का ज़िम्मा भी लेखक का है प्रकाशक का नहीं।"।

वैसे अगर मैं चाहूँ तो मैं अपने उपन्यास को पैसे दे भी कर छपवा सकता हूँ, पर मुझे लगता है कि उससे मैं अपने उपन्यास को कुछ जान-पहचान के लोगों को भेज दूँगा, लेकिन उसे सामान्य पाठक नहीं मिलेंगे। वैसे भी यह हल्का-फुल्का जासूसी किस्म का उपन्यास है, शायद इसे ब्लाग पर अधिक लोग पढ़ेंगे।

वैसे तो दुनिया में एमाज़ॉन और नॉटनुल जैसी वेबसाईट हैं जहाँ किताबें छापी जा सकती हैं। मुझे एमाज़ॉन के किन्डल प्रकाशन का अनुभव नहीं है, लेकिन मैं नॉटनुल पर नियमित हिंदी पत्रिकाएँ पढ़ता हूँ। उनमें किताबें छपवा सकता हूँ, लेकिन मुझे लगा कि अगर मुझे लेखन की कमाई नहीं चाहिए, तो मैं अन्य झंझट क्यों करूँ?

कुछ अन्य ख्याली पुलाव

एक बार उपन्यास का धारावाहिक प्रकाशन पूरा हो जायेगा तो सोचा है कि जो पाठक चाहेंगे मैं उन्हें इस उपन्यास को उन्हें ईमेल से पीडीएफ, इपब और मोबी फॉरमैट में भी भेज सकता हूँ, ताकि जो लोग मेरे ब्लाग को नहीं पढ़ना चाहते, वह भी इसे पढ सकते हैं।

मैं यह भी चाहता हूँ कि युवा लोग हिंदी में पढ़ें और लिखें। उन्हें प्रोत्साहन देने के लिए मैं युवा पाठकों के लिए "आलोचना पुरस्कार" आयोजित करने की भी सोच रहा हूँ, यानि सोचा है कि मेरे उपन्यासों की सार्थक आलोचना लिखने वाले पाँच-दस युवाओं को मैं कुछ पुरस्कार दे सकता हूँ और उनकी आलोचना को ब्लाग पर जगह दे सकता हूँ - इसके बारे में भी सोच कर अगले दिनों में कुछ निर्णय लूँगा।

आशा है कि अगले सोमवार एक जून से आप मेरे उपन्यास "देवी प्रतिमा के रक्षक" को पढ़ेंगे और मुझे अपनी राय भेजेंगे। बाकी की सब बातें अभी दिमाग में घूम रही हैं, अगले कुछ दिनों में मैं इस विषय में निर्णय लूँगा। इस बारे में मेरे साथी ब्लॉग लेखक और पाठक मुझे कुछ सलाह देना चाहें तो उसके लिए आप को अग्रिम धन्यवाद।

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1 जून 2026: आप चाहें तो "देवी प्रतिमा के रक्षक" को इस ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं 

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शुक्रवार, मार्च 20, 2026

मेरा फैंतासी उपन्यास

बहुत सालों से मैं एक हल्का-फुल्का सा जासूसी उपन्यास, जेम्स बॉन्ड जैसा कुछ, लिखना चाहता था। बचपन में ऐसी किताबें पढ़ना मुझे बहुत अच्छा लगता था।

साठ के दशक में, घर पर पापा की अलमारी में बहुत सी गम्भीर साहित्य वाली किताबें थीं, जिन्हें मैंने बहुत छोटी उम्र में पढ़ना शुरु कर दिया था - नानक सिंह, रांगेय राघव, किशन चंदर, चतुरसेन, जैसे बहुत से लेखक मुझे अच्छे लगते थे। घर में सारिका, धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी पत्रिकाएँ भी आती थीं जिनमें मुझे शिवानी, शंकर, बिमल मित्र जैसे लेखकों को पढ़ना भी अच्छा लगता था।

लेकिन गम्भीर साहित्य के साथ हल्का-फुल्का साहित्य भी मुझे प्रिय था। मेरी मौसी की सहेली जो हमारी पड़ोसी थी, उनके यहाँ जासूसी उपन्यास पढ़ने को मिलते थे। मौसी के अपने सबसे प्रिय लेखक थे गुलशन नन्दा, जिनकी बहुत सी किताबें मैंने गर्मियों की छुट्टियों में पढ़ी थीं। छुट्टियों में हम कई बार बड़ी मौसी के यहाँ पश्चिमी बंगाल में अलीपुर द्वार जाते थे, जहाँ जाने की यात्रा में तीन दिन लगते थे, तब रास्ते भर मैं स्टेशन से खरीदी जासूसी और गुलशन नन्दा किस्म की किताबें पढ़ता था।

नया उपन्यास - देवी प्रतिमा के रक्षक 

आखिर में मैं अपना सपना पूरा करने में सफल हुआ। असल में इसे लघु उपन्यास कहना चाहिये, और इसे लिखने में मुझे बहुत मज़ा आया। मैं इसके प्रकाशन के बारे में सोच रहा हूँ, नये लेखकों के लिए हिंदी किताबों के प्रकाशक मिलना कठिन लगता है, और चूँकि मैं विदेश में रहता हूँ, प्रकाशित करवाने में और भी दिक्कते हैं। वैसे तो सुना है कि हिंदी किताबों के लेखन की कमाई से जीवन-यापन कठिन है, लेकिन मेरे पास मेरी पैंशन है, मुझे पैसे की आवश्यकता भी नहीं है, इसलिए मैंने सोचा है कि इसे अपने इस ब्लाग पर ही प्रकाशित कर चाहिये। आप की क्या राय है?

उपन्यास "देवी प्रतिमा के रक्षक" का कवर चित्र

यह उपन्यास लिखने की यात्रा

मेरे पहले दो उपन्यास साहित्यिक विषयों पर थे। एक उपन्यास लिखने में मुझे दो-तीन साल लगते थे, लेकिन मन कभी संतुष्ट नहीं होता था, इसलिए मैं उन्हें बार-बार लिखता, दस-पंद्रह बार भी। जबकि इस फैंतासी उपन्यास लिखने में सिर्फ दो महीने लगे।

शुरु में सोचा था कि उपन्यास एक रहमदिल खूनी पर होगा, जिसे अपने खून-खराबे पर पछतावा है और जो अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए अब केवल बुरे लोगों को मारता है, यानि कि वह एक तरह का रोबिनहुड-खूनी है। लेकिन जब उसे लिखने लगा तो वह कहानी उस खूनी के हृदय परिवर्तन की बात पर केन्द्रित हो गयी, यानि कि उस खूनी का दिल क्यों और कैसे बदलता है।

मेरे उपन्यास का खूनी, ताकानोरी ओकामो, एक जापानी याकूज़ा है, जिसे दक्षिण कोरिया के एक बुद्ध भिक्षुक की विशेष शक्ति वाली मूर्ति की खोज है। वह भिक्षुक जी उस मूर्ति के साथ कई सालों से भारत में एक वृद्धाश्रम में छिपे हुए रहते हैं।

उपन्यास लिखते हुए कथानक में एक और परिवर्तन हुआ, कि उस खूनी की कहानी के साथ, यह एक अनाथाश्रम में रहने वाले कुछ गुप्त-शक्तियों वाले बच्चों की कहानी भी बन गयी। उपन्यास पूरा करने के बाद मुझे लगा कि शायद मेरी कहानी के नायक त्रिनेत्र और उनके साथी बच्चे "मिस्टर इंडिया" फ़िल्म से कुछ हद तक प्रभावित हैं।

शायद यह उपन्यास बड़े बच्चों, किशोरों और नवजवानों के लिए अधिक उपयुक्त है, पर यह निर्णय तो पाठक ही कर सकते हैं। यह उपन्यास भारत के उत्तर-पूर्व की पृष्ठभूमि पर है, इसका एक बड़ा हिस्सा, असम के मजूली द्वीप पर केन्द्रित है, उसके अलावा इसमें विष्णुपुर, गंगटोक और मणिपुर भी हैं।  

उपन्यास का कवर

मेरे बेटे ने कृत्रिम बुद्धि (ए.आई.) यानि आर्टिफीशियल इन्टैलिजैंस से इसके लिए बहुत से कवर बना कर दिये, जिनके कुछ नमूने आप नीचे देख सकते हैं।

ए.आई. से बने मूल चित्र

अंत में मैंने जो कवर चुना, मुझे लगा कि उसके रंग अच्छे नहीं हैं, वह स्पष्ट रूप से दिखता है कि ए.आई. से बना है। मैंने उसके रंग हटा कर उन्हें कम्प्यूटर पर हाथ से रंगा और कुछ फिल्टर लगा कर देखे। जब उपन्यास निकलेगा, तब आप को इस पर राय देने का मौका मिलेगा। 

अंत में

पाठकों को यह उपन्यास कैसा लगेगा, पता नहीं, लेकिन मुझे इसे लिखने में बहुत आनन्द आया। यह लिखा भी फटाफट ही गया। जून में मेरा जन्मदिन होता है, सोचा है कि इस अवसर पर, "देवी प्रतिमा के रक्षक" को इसी ब्लॉग पर पाठकों के लिए किश्तों में प्रकाशित किया जाये।

मेरे मन में एक और ख्वाहिश भी है, साईन्स फिक्शन का उपन्यास लिखने की। फैंतासी लिखने में इतना मज़ा आया, मुझे आशा है कि साईन्स फिक्शन लिखने में भी उतना ही आनन्द आयेगा। अभी उसकी पलैनिन्ग शुरु की है।

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1 जून 2026: आप चाहें तो "देवी प्रतिमा के रक्षक" को इस ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं।   

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बुधवार, दिसंबर 31, 2025

मध्य-युगीन कृष्ण-भक्ति ब्रज-भाषा काव्य

यह आलेख डॉ. सावित्री सिन्हा की लिखी और 1962 में नेशनल पब्लिशिन्ग हाउज़ द्वारा छापी पुस्तक "ब्रज भाषा के कृष्ण भक्ति काव्य में अभिव्यंजना शिल्प" की भूमिका का एक अंश है। आप चाहें तो इस पूरे आलेख को कल्पना पर पढ़ सकते हैं या पीडीएफ में डाउनलोड कर सकते हैं।

डॉ. सावित्री सिन्हा ने यह पुस्तक अपने माता-पिता (और मेरे दादा-दादी द्वारकाप्रसाद और जयदेवी) को इन शब्दों के साथ समर्पित की थी: "स्वर्गीय पिता जी की आंसूभरी, धूमिल बाल-स्मृतियों को तथा मां के असीम साहस, धैर्य, त्याग और वात्सल्य को"

मध्य युगीन कृष्ण-भक्ति ब्रज-भाषा काव्य - डॉ. सावित्री सिन्हा

 

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सूरदास से पूर्व कृष्ण-भक्ति काव्य में अभिव्यंजना-शिल्प की स्थिति - एक विहंगावलोकन

डॉ. शिवप्रसाद सिंह के शोध के फलस्वरूप अभी हाल में ही सूरदास के समय से पहले का ब्रजभाषा काव्य प्रकाश में आया है। 'सूर-पूर्व ब्रजभाषा और उसका साहित्य' नामक उनके शोध-प्रबंध में उपलब्ध साहित्य के व्यख्यान के साथ ही कुछ अनुपलब्ध साहित्य भी प्रकाश में लाया गया है और सूरदास से पहले ब्रजभाषा कवियों के अस्तित्व को सिद्ध करने का प्रयास किया गया है। नामदेव, कबीर और रैदास की अनुभूतिपरक रचनाओं को लेखक ने कृष्ण-भक्ति काव्य के विकास का एक सोपान माना है। इस निर्णय को स्वीकार करने के पक्ष और विपक्ष दोनों ही ओर से अनेक तर्क दिये जा सकते हैं। परन्तु यह प्रश्न यहां पर अप्रासंगिक है।

संतमत के कवियों के अतिरिक्त उन्होंने कृष्ण-भक्ति काव्य के विकास में संगीतकार कवियों का महत्वपूर्ण योग स्वीकार किया है। उनके शब्दों में, “संगीतज्ञ कवियों ने न केवल अपनी स्वर-साधना से भाषा को परिष्कार और मधुर अभिव्यंजना प्रदान की, तथा अप्रतिम नाद-सौंदर्य से कविता को अधिक दीर्घयुगी बनाया परन्तु अपनी सम्पूर्ण संगीत-प्रतिभा को आराध्य कृष्ण के चरणों पर लुटा भी दिया। गोपाल नायक और बैजू बावरा के पदों में आत्मनिवेदन, गोपी-प्रेम और भक्ति के विविध पक्षों का बड़ा ही विशद और मार्मिक चित्रण हुआ है। गोपाल नायक के एक पद में रास का चित्रण इस प्रकार मिलता है -

कांधे कामरी गो आलाप के नाचे जमुना तीर, नाचे जमुना तीर

पीछे रे पांवरे लेती नाचि लोई मांगवा --

भुव आलि मृदंग बांसुरी बजावै गोपाल वैन वतरस ले आनन्द। (राग कल्पद्रुम)

बैजू बावरा का उल्लेख भी इस प्रसंग में किया गया है तथा राग कल्पद्रुम में संकलित उनके पदों के आधार पर उन्हें ब्रजभाषा का कवि सिद्ध किया गया है। राग कल्पद्रुम की यह रचनायें शुद्ध ब्रजभाषा में हैं -

आंगन भीर भई ब्रजपति के आज नन्द महोत्सव आनन्द भयो।

हरद दूब दधि अक्षत रोरी ले छिरकत परस्पर गावत मंगलचार नयो।

ब्रह्मा ईस नारद सुर नर मुनि हरषित विमानन पुष्प बरस रंग ठयो।

धन धन बैजू संतन हित प्रकट नन्द जसोदा ये सुख जो दयो। (राग कल्पद्रुम)

इन दोनों ही कवियों की रचनाओं में निहित संगीत तत्व परवर्ती कृष्ण-भक्त कवियों की संगीत-साधना की पृष्ठभूमि से जान पड़ते हैं, परन्तु जहां तक अभिव्यंजना शैली का प्रश्न है यह रचनायें परवर्ती रचनओं के सामने पासंग भर भी नहीं ठहरतीं।

इन रचनाओं के अतिरिक्त शोधकर्ता ने निम्नलिखित ७ अप्रकाशित पुस्तकों का परिचय-परीक्षण भी प्रस्तुत किया है - अग्रवाल कवि की प्रद्युमनचरित; विष्णुदास की महाभारत कथा, स्वर्गारोहड़, रुक्मिणी मंगल, स्वर्गारोहड़ पर्व और स्नेह लीला; थेघ नाथ की गीता भाषा।

कृष्णभक्ति सम्बंधी अप्रकाशित ग्रंथों को लेखक ने जिस रूप में हमारे सामने रखा है, उसे उसी रूप में स्वीकार कर लेने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं है। उनके मतों को उद्धृत करके विषय-विस्तार करने से कुछ लाभ नहीं होगा। जो कुछ भी सामग्री प्रकाश में आयी है उसके अध्ययन द्वारा ये निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं -

तत्कालीन ब्रजभाषा के दो रूप थे (१) अपभ्रंश मिश्रित ब्रजभाषा (२) तद्भव प्रधान ब्रजभाषा। संस्कृति के तत्सम शब्दों के प्रयोग द्वारा तत्कालीन ब्रजभाषा का रूप परिनिष्ठित नहीं हो पाया था। प्रथम कोटि की भाषा के उदाहरण के रूप में डूंगर कवि की एक रचना उद्धृत की जा रही है -

ऋतु बसंत उलहणी विविह वणराय फलह सहू।

कंटक विकट करीर पंत पिकखंत किंपि नहु।

धाराहर वर धवल बारि वरसंत घनघोर वन।

कुरलतंउ मूल मंत्री सर्प नहीम मानहिं दुर्जन।

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औषधि मूल मंत्री सर्प नहिं मानहिं दुर्जन।

सर्प डसी वेदना एही दिट्ठइ हुई, गुंजन।

लागइ दोष अनन्त कियइ संसर्ग एनि परि।

तवडी जल हरइ घड़ी पीटियइ सुफल्लरि।

द्वितीय कोटि के उदाहरण के रूप में विष्णुदास रचित 'सनेह लीला' की ये पंक्तियां ली जा सकती हैं -

महलन मोहन करत विलास।

कहां मोहन कहां रमन रानी और कोऊ नहिं पास।

रुकमन चरन सिरावत पिय के पूजी मन की आस।

जो चाहे थी सो अब पायो हरि पति देवकी सास।

तुम बिन और कौन थो मेरौ धरति पताल आकास।

पल सुमिरन करत तिहारौ ससि पूस परगास।

इन कवियों की रचनाओं में प्रबुद्ध कला-चेतना का पूर्ण अभाव है। अभिव्यंजना-शैली की दृष्टि से ये अत्यंत साधारण कोटि की रचनायें हैं। उनकी शैली अधिकतर वर्णनात्मक और विवरणात्मक है। अप्रस्तुत योजना, लक्षित चित्र-योजना, वाग्वैदग्घय आदि तत्व बहुत ही कम हैं।

विषय-वस्तु के क्षेत्र में कुछ ऎसे तत्व अवश्य मिलते हैं जिन्हें परवर्ती कृष्ण-भक्ति काव्य का पूर्वाभास कहा जा सकता है। यह प्रभाव मुख्य रूप से दो क्षेत्रों में दिखाई पड़ता है: (१) लोक संस्कृति के चित्रण में (२) शास्त्रीय संगीत के समावेश में।

गोस्वामी विष्णुदास रचित रुक्मणि मंगल की ये पंक्तियां प्रथम वर्ग के उदाहरण के रूप में ली जा सकती हैं:

मोतियन चौक पुराय के कियौ आरती माय।

अति आनन्द भयौ है नगर में घर घर मंगल साजै।

मनमोहन प्रभु ब्याह कर आये पुरी द्वारका राजै।

अंगन तन में भूषन पहिने सब मिलि करत समाज।

बाजै बाजन कानन सुनियत, नौबत घन ज्यूं बाज।

नर नारिन मिलि देत बधाई सुख उपजै दुखभाज।

नाचत गावत मृदंग बाजत रंग बसावत आज।।

दूसरे वर्ग की रचनाओं के अन्तर्गत गोपाल नायक और बैजू बावरा की रचनायें रखी जा सकती हैं। डॉ. सिंह ने इन रचनाओं को काव्य-कल्पद्रुम से संकलित किया है। संगीत कला के क्षेत्र में इस ग्रंथ का महत्वपूर्ण स्थान है परन्तु भाषा और साहित्य की दृष्टि से उसमें संकलित पदों को प्रमाणिक माना जा सकता है या नहीं यह प्रश्न विवादरहित नहीं है। यदि उन्हें प्रमाणिक मान लिया जाये तो गोपाल नायक और बैजू बावरा के पदों को परवर्ती कृष्ण-भक्त कवियों के ध्रुपद शैली में रचित पदों का पूर्वरूप माना जा सकता है। शास्त्रीय संगीत के तत्वों का उल्लेख तथा ध्रुपद शैली के अनुकूल पद-योजना इन रचनाओं में प्राप्त होती है -

सप्त स्वर तीन ग्राम इकइस मूर्छन बाइस सुर्त

उनचास कोट ताल लाग डाट

गोपाल नायक हो सब लायक आहत अनाहत शब्द,

सो ध्यायो नाद ईश्वर बसे मो घाट

तथा

मार्ग देसी कर मूर्छना गुन उपजे मति सिद्ध गुरु साध चावै।

सो पंचम मघ दर पावै।

बैजू बावरा के पदों की योजना भी ध्रपुद शैली की श्वास-साधना के निमित्त की हुई जान पड़ती है:

बोलियो न डोलियो ले आऊं हूं प्यारी को,

सुन हौ सुघर वर अब हीं पै जाऊं हूं।

मानिनि मनाय के तिहारे पाय ल्याय के,

मधुर बुलाय के तो चरण गहाऊं हूं।

सुन री सुंदर नारि काहे करत एति रार,

मदन डारत पार चलत पल तुझाऊं हूं।

मेरी सीख मान कर मान न करो तुम,

हे जु प्रभु प्यारे सो बहियां गहाऊं हूं।

बधाई के लोक-गीत भी उनके नाम से प्राप्त होते हैं:

आंगन भीर भई ब्रजपति के आज नन्द महोत्वस आनन्द भयौ।

हरद दूब दघि अक्षत रोरी ले छिरकत परस्पर गावत मंगलचार नयो।

ब्रह्मा ईस नारद सुर नर मुनि हरषित विमानन पुष्प बरस रंग ठयो।

धन धन बैजू संतन हित प्रकट नन्द जसोदा ये सुख जो दयो।

अधिकतर कवियों ने दोहा, चोपाई और छप्पय का प्रयोग किया है। कुछ पदों के ऊपर गौरी, धनाश्री और पूर्वी रागों का उल्लेख भी हुआ है।

इस सामग्री के अध्ययन के उपरान्त सूरदास से पूर्व ब्रज-भाषा काव्य के अस्तित्व की स्वीकृति में आचार्य शुक्ल का अनुमान आंशिक रूप में ही सत्य माना जा सकता है। सूरदास के काव्य-सौष्ठव पर विचार करते हुए आचार्य शुक्ल ने कहा था, ‘इन पदों के सम्बंध में सबसे पहली बात ध्यान देने की यह है कि चलती हुई ब्रजभाषा में सबसे पहली साहित्यिक रचना होने पर भी ये इतनी सुडोल और परिमार्जित है, यह रचना इतनी प्रगल्भ और काव्यांग-पूर्ण है कि आगे होने वाले कवियों की उक्तियां सूर की जूठी सी जान पड़ती हैं। अत: सूर-सागर किसी चली आती हुई गीति काव्य परम्परा का - चाहे वह मौखिक ही रही हो - पूर्ण विकास सा प्रतीत होता है।"

इन कृतियों के प्रकाश में आने पर भी कलाकार के रूप में सूर अपने पूर्व-स्थान पर ही शोभित हैं। इस काल के दर्जन कवियों में से एक भी ऎसा नहीं है जो अष्टछाप के अन्य कवियों के समकक्ष खड़ा रह सके, सूरदास तो दूर की बात है। जहां तक पूर्व-परम्परा की स्थापना का प्रश्न है यह तथ्य उसी रूप में स्वीकार किया जा सकता है जैसे हम यह कहें कि छायावादी कविता के बीज द्विवेदी-युग की रचनाओं में भी पाये जाते हैं।

सूर-पूर्व ब्रजभाषा काव्य में गीति-काव्य की मौखिक परम्परा भी स्थापित की जा सकती है, ब्रजभाषा का अस्तित्व भी माना जा सकता है पर उसमें कला-सौष्ठव का कोई ऎसा आधार नहीं मिलता जिसके कारण यह कहा जा सके कि सूरदास के पदों की प्रगल्भता और काव्यांगपूर्णता को कोई पूर्व आधार हिन्दी जगत् में विद्यमान था। कला के क्षेत्र में नये मार्गों का उद्घाटन सूरदास, नन्ददास और उनके समकालीन भक्तों ने ही किया। उनकी कला-चेतना का प्रादुर्भाव तत्कालीन परिस्थितियों के फलस्वरूप हुआ था। कला के पुनुर्त्थान युग में उनकी प्रतिभा प्रस्फुटित हो कर विकसित हुई। उत्तराधिकार रूप में उन्हें जो परम्परा प्राप्त हुई थी वह पूर्ण अविकसित थी, भाव, भाषा, शैली, किसी भी दृष्टि से मध्यकालीन कृष्ण-भक्त कवियों पर उनका ऋण नहीं स्वीकार किया जा सकता।

कृष्ण-काव्य परम्परा के विकास का संक्षिप्त परिचय

कृष्ण-काव्य परम्परा के विकास का प्रमुख श्रेय आचार्य वल्लभ और उनके पुत्र विट्ठलदास जी को है। आचार्य वल्लभ द्वारा प्रवर्तित 'पुष्टि मार्ग' को आधार बना कर श्री विट्ठलदास द्वारा स्थापित अष्टछाप के कवियों ने हिन्दी में अमर कृष्ण-भक्ति-काव्य की रचना की। पुष्टि मार्ग की अनुभूति मूलक साधना के कारण इन कवियों ने कृष्ण के व्यक्तित्व के लीला-प्रधान अंशों को ही ग्रहण किया है। राजनीतिज्ञ कृष्ण उनके आलम्बन नहीं हैं। कृष्ण के व्यक्तित्व में उन्होंने शक्ति के साथ माधुर्य और प्रेम का समन्वय कर दिया। अलौकिक आलम्बन में सहज और मधुर मानव का आरोपण उन्होंने जिस मनोवैज्ञानिक कौशल से किया है उसमें सार्वभौम उपादानों का समावेश हुआ है।

ऎतिहासिक क्रम से अष्टछाप के कवियों का उल्लेख इस प्रकार है - कुभंनदास, सूरदास, परमानन्ददास, कृष्णदास, नन्ददास, चतुर्भुजदास, छीतस्वामी और गोविन्दस्वामी। सूरदास प्रधान रूप से वात्सल्य और शृंगार रस के कवि हैं, परमानन्द जी के काव्य में वात्सल्य का अनुपात महत्वपूर्ण है। अन्य कवियों की रचनाओं में श्रंगार रस का ही प्राधान्य है, उसमें वात्सल्य तो है ही नहीं या अत्यंत गौणरूप में प्रयुक्त है। इन सभी के प्रतिपाद्य में साहित्यकता, पार्थिव अनुभूतियों और आध्यात्मिकता का सुंदर सामन्जस्य मिलता है। विभिन्न कवियों के व्यक्तित्व के अनुसार तीनों तत्वों का अनुपात उनकी रचनाओं में भिन्न-भिन्न है। साहित्यिक महत्व की दृष्टि से सूरदास के बाद नन्ददास का नाम आता है। उनकी अभिव्यंजना में सचेष्ट कलाकार का शिल्प है।

पूर्वमध्यकाल के इन पुष्टिमार्गी कवियों के बाद परिमाण और गुण दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण योग राधावल्लभ सम्प्रदाय के आचार्य हितहरिवंश तथा उनके शिष्यों और अनुयायियों ने दिया। राधावल्लभ सम्प्रदाय की उपासना पद्धति अन्य सम्प्रदायों से भिन्न थी। इस मत के सिद्धांतों के अनुसार राधा ही परम इष्ट हैं और कृष्ण की मान्यता इसीलिए है कि वह राधा के प्रियतम हैं। वे इष्ट नहीं हैं। भक्तजन राधा की सखी रूप में होते हैं। वे सखी रूप में उनके साथ परकीया गोपियों के समान स्वतंत्र रूप से सम्बंध स्थापित नहीं करते और न राधा के प्रति उनका सपत्नि भाव होता है। इस सम्प्रदाय में हितहरिवंश के अतिरिक्त ध्रुवदास की कला का महत्वपूर्ण स्थान है।

किसी विशिष्ठ सम्प्रदाय के बंधनों से मुक्त मतवाली मीरा और रसखान की रचनाओं का भी पूर्व-मध्यकालीन कृष्ण-भक्ति साहित्य में बड़ा महत्व है। मीराबाई द्वारा रचित कई ग्रंथों का उल्लेख प्राप्त होता है। नरसी का मायरा, गीत-गोविन्द की टीका, पद तथा गर्व गीत उनकी प्रमुख रचनायें मानी जाती हैं। उनका साहित्य और उसका स्वरूप दोनों ही संदिग्ध हैं। उनके काव्य में गिरधरगोपाल के प्रति उनकी आकुल भावनायें विर्बाध रूप से व्यक्त हुई हैं। जहां भावनायें उन्मुक्त हुईं, आकांक्षायें उच्छृंखल हो कर असंयत हो जाती हैं पर मीरा के काव्य की सबसे बड़ी सफलता यही है कि भावनाओं की निर्बाधता में असंयत और अनियंत्रित श्रृंगार की स्थूलताओं का समावेश नहीं होने पाया है। उनकी कला का एक अपूर्व ही सौंदर्य है जो कला सम्बंधी परिपक्वताओं से वंचित रहने पर भी पूर्ण है।

मुसलमान कृष्ण-भक्त कवि रसखान का नाम इस परम्परा में अमर है। उनके व्यक्तित्व में प्रधान प्रेम-तत्व ने लौकिक आलम्बन के अस्थायित्व के कारण अलौकिक कृष्ण का सहारा लिया और उनकी भावनायें भक्त हृदय के सुंदर उद्गारों के रूप में व्यक्त हो उठीं। भावानाओ की तीव्रता और उत्कटता के साथ ही साथ उनके काव्य का कलापक्ष भी प्रौढ़ और सबल है। 'प्रेम वाटिका' और 'सुजान रस सागर' उनके दो छोटे-छोटे ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं।

उत्तर-मध्य काल में भी कृष्ण-काव्य परम्परा विभिन्न सम्प्रदायों के संरक्षण में पल्लवित और पुष्पित होती रही। पूर्व-मध्य काल (भक्तिकाल) में कृष्ण-भक्ति-पद्धति में नैसर्गिक आलम्बन के प्रति मानवीय भावनाओं का जो उन्नयन हुआ उसमें राग और साधना का अपूर्व सामंजस्य था। इस परम्परा में रागतत्व के प्राधान्य के कारण ही १९वीं शती तक भक्ति-युग की परिष्कृत माधुर्य भावना लौकिकता में रंजित होने लगी। उत्तर-मध्य कालीन कृष्ण-काव्य परम्परा में आलम्बन और साधना दोनों पक्षों में अपार्थिव अंश केवल नाम-मात्र को ही शेष रह गया।

रीतिकालीन कृष्ण-भक्ति काव्य में श्रृंगारिक तत्वों का इतना प्राधान्य हो गया कि उसके फलस्वरूप ब्रह्मा की असीमता भी मानवीय क्रिया-कलापों में लिपट कर रह गई। साहित्य की रूढ़ परम्पराओं के अनुसार 'ब्रह्मा की प्रेमिकाओं' पर भी नायिका-भेद के विविध रूपों का आरोपण किया गया। हिन्दी काव्य जगत् में सतरहवीं शताब्दी के उपरान्त कृष्ण और गोपिकाओं के नाम पर श्रृंगारपरक ऎहिक भावनाओं की अभिव्यक्ति प्रधान हो उठी।

उत्तर-मध्य काल में वल्लभ सम्प्रदाय का कोई उल्लेखनीय कवि नहीं हुआ। केवल ब्रजवासीदास ने सूरसागर के आधार पर अपने ग्रंथ 'ब्रजविलास' की रचना की। राधावल्लभ सम्प्रदाय के हित वृंदावनदास ने 'लाड़ सागर' और 'ब्रज प्रेमानन्द सागर' ग्रंथों की रचना की। इसके अतिरिक्त निम्बार्क सम्प्रदाय के घनानन्द, नागरीदास, हठी जी, भगवत रसिक जी, रूप रसिक जी, सहचरिशरण ने कृष्ण-भक्ति सम्बन्धी रचनायें लिखीं, जिनमें उस युग की काव्य-चेतना की स्मस्त विशेषताओं का समावेश हो गया है।

प्रतिपाद्य के प्रति उनके दृष्टिकोण और उनकी अभिव्यंजना-कला का विवेचन आगामी अध्यायों में किया जायेगा।

आधुनिक काल नये संदेशों और नये जीवन-दर्शन से युक्त सामने आया। मध्यकालीन सामन्तीय व्यवस्था बीत चुकी थी। बौद्धिक जागरण और विज्ञान के इस युग में धार्मिकता और विशेषकर उपास्य के प्रति रागात्मक वृत्ति के उन्नयन को अंध-विश्वास और रूढ़िवादिता का नाम दिया गया। उत्तर-मध्य काल में कृष्ण-भक्ति में निहित श्रृंगार तत्व ने लौकिक श्रृंगार का रूप धारण कर लिया था, आधुनिक काल में केवल उसका अंधकार पक्ष ही अवशिष्ट रह गया। भक्ति के नाम पर भ्रष्टाचार, अंधविश्वास और पाखंड ने तत्कालीन सुधारवादी और बौद्धिक प्रवृत्तियों को अपने विरुद्ध आवाज़ उठाने की चुनौती दी। सूक्ष्म रागात्मक प्रवृत्तियों का आश्रित भक्ति बौद्धिक और ऎहिक जीवन-दर्शन के भार के नीचे दब गई। उसकी विकृति ही शेष रह गई।

मध्यकाल में भक्ति ने एक आंदोलन का रूप ग्रहण किया था। वह जनता के व्यक्तिगत और समष्टिगत संघर्षों और समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने आई थी। आधुनिक काल में उसका क्षेत्र 'व्यक्ति' की सीमा में ही संकीर्ण हो गया। परिवार के संसर्ग और वैयक्तिक संस्कार इत्यादि कारणों से 'धर्म' तत्व एक संकीर्ण दायरे में ही शेष रह गया। भारतेन्दु हरीशचन्द्र, जगन्नाथदास रत्नाकर, सत्यनारायण कविरत्न इत्यादि कवियों ने कृष्ण-भक्ति काव्य की रचना की जिसकी प्रेरणा स्थूल रूप में तीन प्रकार की मानी सकती है - (१) परम्परा-पालक (२) कृष्ण-चरित के गान द्वारा प्राचीन गौरव की स्थापना तथा (३) वैयक्तिक संस्कारजन्य आस्था। वल्लभाचार्य के शिष्यों द्वारा प्रवर्तित कृष्ण-काव्य परम्परा उत्थान और पतन के विविध सोपानों पर चढ़ती-गिरती आधुनिक काल तक चली आई। वल्लभ सम्प्रदाय के ही निष्ठावान भक्त भारतेन्दु हरीशचन्द्र ने उनमें पुन: माधुर्य-भक्ति की परिष्कृति और सूक्ष्मता के समावेश का प्रयत्न किया, परन्तु अब इस प्रकार की भक्ति का समय बीत चुका था, देश के सामने यथार्थ नग्न मुँह बाये खड़ा था, पाश्चात्य देशों का बुद्धिवाद भारत की आध्यात्मिकता को चुनौती दे रहा था, जिसके सूक्ष्म तन्तु बाह्य स्थूलताओं के सामने हार मान चुके थे। साहित्य में व्यवहारिक भाषा के अभाव के फलस्वरूप ब्रजभाषा का स्थान खड़ी-बोली ले रही थी, ऎसी स्थिति में ब्रजनायक से सम्बद्ध काव्य-परम्परा और ब्रजभाषा दोनों के विकास का मार्ग अवरुद्ध हो गया।

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