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बुधवार, अक्टूबर 23, 2024

व्यक्तिगत संरचनाएँ: वेनिस कला प्रदर्शनी

आजकल वेनिस द्वीवार्षिकी कला प्रदर्शनी (Biennale) चल रही है। लेकिन चाह कर भी उसे देखने नहीं गया, क्योंकि प्रदर्शनी बहुत फ़ैले हुए क्षेत्र में लगती है जिससे वहाँ चलना बहुत पड़ता है और मेरे घुटने दुखने लगते हैं। लेकिन प्रमुख प्रदर्शनी के साथ-साथ वेनिस शहर में बहुत सी अन्य छोटी-बड़ी कला प्रदर्शनियाँ भी लगती हैं, जिन्हें देखना मेरे लिए अधिक आसान है। ऐसी ही एक कला प्रदर्शनी वेनिस के यूरोपी सांस्कृतिक केन्द्र  में लगी तो कुछ दिन पहले मैं उसे देखने गया।

इस आलेख में मैंने आप के लिए अपनी पसंद की कुछ कलाकृतियाँ की लघु-प्रदर्शनी बनाई है। 

यूरोपी सांस्कृतिक केन्द्र का भवन तीन हिस्सों में बंटा है - पालात्ज़ो बैम्बो, पालात्ज़ो मोरो तथा मारिनारेस्सा के बाग। इसमें कुल मिला कर करीब चालिस कक्ष हैं जिनमें विभिन्न देशों के करीब दो सौ कलाकारों की यह प्रदर्शनी लगी है। यह भवन वेनिस रेलवे स्टेशन से रिआल्तो पुल जाने वाले प्रमुख रास्ते पर है।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures

इस प्रदर्शनी में चैक रिपब्लिक की एक कलाकृति ने मुझे बहुत प्रभावित किया, देख कर ऐसा लगा मानो किसी ने छाती पर मुक्का मारा हो और साँस नहीं ली जा रही हो। इसलिए मेरे लिए यह इस प्रदर्शनी की सबसे महत्वपूर्ण कलाकृति थी। यह कलाकृति आप को नीचे मेरे आलेख के अंत में मिलेगी।

इस प्रदर्शनी को "व्यक्तिगत संरचनाएँ: सीमाओं से परे" का नाम दिया गया है और यह २४ नवम्बर २०२४ तक चलेगी। इसे देखने के लिए कोई टिकट नहीं चाहिये। अगर आप इन दिनों में वेनिस आ रहे हैं और आप को कला में रुचि है, तो इस प्रदर्शनी को अवश्य देखें।

नीचे की सभी कलाकृतियों की तस्वीरों पर क्लिक करके आप उन्हें बड़ा करके देख सकते हैं। तो आईये चलते हैं मेरी यह लघु कला प्रदर्शनी देखने।

ग्रीस के कोसतिस ज्योर्जो (Kostis Georgiou) की कलाकृतियाँ

यह पहली दो कलाकृतियाँ भवन में घुसने से पहले, उसके सामने वाले बाग में दिखती है। एलुमिनियम की बनी मानव मूर्तयों को उन्होंने लाल रंग से रंगा है। एक में दो आकृतियाँ एक चक्र के ऊपर हवा में टिकी हैं, दूसरी में एक सीढ़ी के आसपास चार आकृतियाँ ऊपर नीचे हैं। कुछ रंग की वजह से, कुछ आकृतियों का हवा में तैरना और खेलना, मुझे अच्छा लगा। अगर आप कोसतिस के वेब-स्थल वाली लिंक पर देखेंगे तो वहाँ लाल रंग से  इस तरह की अन्य अनेक कलाकृतियाँ देख सकते हैं।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Kostis Georgiou

अमरीका की अलकनंदा मुखर्जी (Alakananda Mukerjin) की कला

अलकनंदा की जल-रंगों कि विभिन्न चित्रकला इस प्रदर्शनी में दिखी। मुझे यह विषेश नहीं भाईं, कुछ बेतरतीब सी लगीं, लेकिन साथ ही लगा कि उनकी आकृतियों में मकबूल फिदा हुसैन साहब की आकृतियों की प्रेरणा दिखती है। क्या आप को भी ऐसा लगता है?

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Alakananda Mukherjin

 आस्ट्रेलिया की एनेट्टे गोल्डन (Annette Golden) की चित्रकला

प्रदर्शनी में एनेट्ट की कलाकृतियों के लिए एक पूरा कमरा था जिसमें उनकी बीस-पच्चीस कलाकृतियाँ लगी थीं। वह एक्रेलिक, तेल-रंग और धातुओं की पत्तियाँ लगा कर केनवास पर कलाकृतियाँ बनाती हैं, जिनमें रंगबिरंगे विभिन्न नारी स्वरूप दिखते हैं। उन्हीं में से एक कलाकृति प्रस्तुत है जिसकी काली पृष्ठभूमि पर लाल और नीले रंगों से बनी युवती मुझे अच्छी लगी।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Annette Golden

न्यूज़ीलैंड तथा भारत के अरीज़ कटकी (Areez Katki) का इस्टालेशन

अरीज़ पारसी हैं और उनके इंस्टालेशन में रुमालों में ज़राथुस्त्रा गाथा के सतरह हा (टुकड़े या हिस्से) दिखते हैं। रुमालों पर उन्होंने चित्र बना कर, उन्हें धागों से छत से लटकाया था। पीछे खिड़की से आती वेनिस की रोशनी और और वहाँ से दिखते भवनों के साथ उनके प्राचीन धर्म ग्रंथ का चित्रण मुझे अच्छा लगा हालाँकि उन चित्रों में कौन सी कहानी थी, यह समझ नहीं आया।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Areez Katki

अमरीका के ब्रायन माक (Brian J. Mac) की वास्तुकला की कलाकृति

ब्रायन माक अमरीकी वास्तुकार हैं। अपने २७ सालों के वास्तुकार कार्य के हर साल उन्होंने एक डिब्बा बनाया जिसमें उनके रेखाचित्र, मॉडल, इत्यादि तोड़-मोड़ कर घुसा दिये। एक तरह से उनका पूरा कार्यजीवन इस तरह से उनकी कलाकृति में दिखता है। इसे देखते हुए मैं सोच रहा था कि हमारी हर चीज़ के साथ हमारी यादें जुड़ी होती हैं, कि  इसे वहाँ से खरीदा था, इसे वैसे बनाया था, आदि, लेकिन हमारे बाद हमारी यादों की कोई कीमत नहीं रहती, उस सब सामान को कूड़े की तरह फ़ैंक देते हैं। इस दृष्टि से यह कलाकृति मुझे यादों का व्यक्तिगत स्मारक लगी।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Brian J. Mac

रोमेनिया की कालिन टोपा (Calin Topa) और अदा गालेस (Ada Gales) की इन्स्टालेशन

कालिन स्वरों और ध्वनि की कलाकार है, उन्होंने इस प्रदर्शनी में एक लाल रोशनी वाला एक गलियारा बनाया, और जिसे स्वरों से भरा है। उस गलियारे की दीवारों पर अदा ने अपने शब्द लिखे हैं, और इस तरह से दोनों की कला-दृष्टि का संगम हुआ। मैं आप को कालिन की ध्वनि नहीं महसूस करा सकता लेकिन अदा के विभिन्न वाक्यों में से जो शब्द मैंने चुने हैं उनमें लिखा है, "मैं कभी कला बनाना चाहती हूँ और कभी थाई नूडल खाना चाहती हूँ"।  

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Calin Topa
 

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Ada Gales
 
ध्वनियों को मिला कर भी कला बनती है, के विषय पर कई इंस्टालेशन मैं पहले भी देख चुका हूँ लेकिन यह एक कला अनुभव है, यह बात मुझे अभी भी कुछ अजीब सी लगती है, हालाँकि इसे तार्किक स्तर पर समझता हूँ। मेरे लिए कला देखने की चीज़ है, छू कर देखने की चीज़ है। इसी तरह से मुझे कला प्रदर्शनियों में वीडियो इंस्टालेशन भी कुछ अजीब से लगते हैं।

स्विटज़रलैंड की केरोल कोहलर (Carole Kohler) की लुकन-छिपाई

केरोल कोहलर ने कपड़े उतराते हुए व्यक्तियों की मूर्तियाँ बनायी थीं और कोलाज बनाये थे जिन्हें ३-डी चश्में से देखो तो उनके भीतर छुपी हुई आकृतियाँ दिखती थीं। मैं आप को वे छिपी हुई आकृतियाँ नहीं दिखा सकता लेकिन आप उनकी कपड़े उतारने वालों  की मूर्तियों की एक झलक देख सकते हैं। सब मूर्तियों में बनियान या कमीज उतारने वालों के कपड़े से चेहरे छिप गये हैं, अवश्य इसका कोई प्रतीकात्मक अर्थ है, जैसे बच्चे अपना चेहरा ढक कर सोचते हैं कि उन्हें कोई नहीं देख सकता। या शायद, कलाकार कहना चाहता है कि हम कड़वी सच्चाई देखने से डरते हैं और उनसे अपना मुँह चुराते हैं।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Carole Kohler

स्विटज़रलैंड के क्रिस्टोफ स्टुकेलबर्गर (Christoph Stuckelberger) की जड़ें

स्टुकेलबर्गर हर वस्तु के नयी तरह से देखने के लिए कहते हैं। उनकी कलाकृतियों के लिए एक पूरा कक्ष था जिसमें वस्तुओ के भितर से बाहर, या नीचे से ऊपर, उल्टा दिखाया गया था। इस तस्वीर में आप उनकी "जड़ें" देख सकते हैं जो आपस में एक दूसरे के ऊपर-नीचे जा कर एक जाल बनाती हैं। जिस वस्तु को एक तरह से देखने की आदत हो, जब वह उससे भिन्न दिखे तो हमें रुकने और सोचने के लिए नया दृष्टिकोण देती है।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Christoph Stuckelberger

हंगरी के डेविड सज़ेंतग्रोती (David Szengroti) की अमूर्त चित्रकला

प्रदर्शनी में बहुत सी अमूर्त चित्रकला के नमूने थे जो मुझे अच्छे लगे। मैंने उनमें से इस लघु-प्रदर्शनी के लिए हंगरी के चित्रकार सज़ेंतग्रोती की तीन चित्रकलाओ को चुन कर उनकी एक मिली-जुली तस्वीर बनायी है। ऐसी कलाकृतियों के सामने मैं लम्बे समय तक खड़ा रह कर उन्हें देख सकता हूँ। इसमें रंगो का चुनाव, उनके आपस में सम्बंध, उनमें दिखती अमूर्त आकृतियाँ, सब का असर मिल जुल कर मुझे बहुत सुंदर लगा। 

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - David Szengroti (composit)

बेल्जियम की जाँन ओपगेन्होफ्फेन (Jeanne Opgenhoffen) की सिरामिक कला

ज़ाँन अपने सिरामिक के काम के लिए जानी जाती हैं। उनकी जिस कलाकृति को मैंने इस आलेख के लिए चुना है उसके लिए उन्होंने पहले महीन सेरामिक के चिप्स जैसे आकार के टुकड़े बनाये, फ़िर उन सबको जोड़ कर यह अमूर्त चित्र बनाये, जिनमें रंगों और अकृतियों का मेल मुझे बहुत अच्छा लगा। इसे देख कर सोचना कि इसे बनाने में उन्हें कितना समय और मेहनत लगी होगी, से इसकी सुंदरता और भी महत्वपूर्ण लगती है। इस तस्वीर पर क्लिक करके इसे बड़ा करके देखिये तब इसकी सुंदरता दिखेगी।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Jeanne Opgenhoffen

सीरिया-फिलिस्तीन के खैर अलाह सलीम (Khair Alah Salim) की चित्रकला

सलीम फिलिस्तीनी हैं और सीरिया में रहते हैं, उनकी केनवास पर एक्रेलिक से बनी इस तस्वीर की उदास मुस्कान वाली युवती मुझे बहुत अच्छी लगी। लगता है जैसे उसका चेहरा एक अंडे के छिलके के ऊपर बना है जिसमें दरारें पड़ रही हैं, जिनसे उसकी उदासी और भी गहरी हो जाती है।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Khair Alah Salim

फ्राँस के निकोलास लावारेन्न (Nicolas Lavarenne) और कोरीन फन्कन (Corin Funken) की कलाकृतियाँ

निकोलास ने रेज़िन से सोती हुई युवती की शिल्पकला बनाई है जिसकी बाजू नीचे, कोरीन की चित्रकला के सामने लडक रही है। निकोलास की मूर्ति छत पर लोहे के हैम्मोक पर झूल रही है, जबकि कोरीन की चित्रकला में वेनिस शहर के समुद्र से जुड़ी बातों-घटनाओं का चित्रण है जिसे उन्होंने "हमारा समुद्र" का नाम दिया है। मुझे कोरीन की चित्रकला कुछ विषेश नहीं लगी लेकिन निकोलास की मूर्ति के चेहरे का भाव और उनका कक्ष में छत पर तैरना बहुत अच्छे लगे।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Nicolas Lavarenne

 नाईजीरिया की ओर्री शेनजोबी (Orry Shenjobi) की आ-वाम-बे पार्टी

ओर्री की कलाकृतियों का एक पूरा कक्ष है जिसमें दीवारों पर उन्होंने वहाँ की पाराम्परिक पार्टी जिसे आ-वाम-बे कहते हैं, में भाग लेने वालों की तस्वीरों के ऊपर से विभिन्न चीज़ो को जॊड़ कर कोलाज जैसे बनाये हैं। उनकी कलाकृति ऊर्जा, रंगों और आनंद लेते हुए लोगों से भरी हुई है। इस कक्ष में बहुत देर तक रुका। नीचे वाली तस्वीर में आप को उस कक्ष की दो दीवारों के हिस्से दिखेंगे। इस तस्वीर पर भी क्लिक करके उसे बड़ा करके देखिये, तब दिखेगा कि किस तरह उन्होंने तस्वीरों पर अन्य वस्तुओं को जोड़ कर कैसे कोलाज बनाये हैं।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Orry Shenjobi (composit)

चिल्ली की पेटरिशिया टोरो रिब्बेक (Patricia Toro Ribbeck) की मिठाईयाँ

दक्षिण अमरीका की इस कलाकार ने रंग-बिरंगी चमकती हुई सिरामिक से तरह-तरह के केक, पेस्ट्रियाँ और मिठाईयाँ बनाई हैं, जिन्हें देख कर भूख लग जाती है। मेरे विचार में यह कलाकृति जिस घर में रहेगी वहाँ रहने वाले लोग डाईटिन्ग नहीं कर सकते। वह कहती हैं कि इसे उन्हें कोविड के समय में घर में बन्द रहने के समय बनाया था क्योंकि उस समय वह सुंदर सपने देखना चाहती थीं।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Patrizia Toro Ribbeck

फिलीपीनी कलाकारों का कक्ष

प्रदर्शनी में एक कक्ष में बहुत सारे फिलीपीनी कलाकारों की कलाकृतियाँ थीं। मुझे उनमें से कई कलाकृतियाँ अच्छी लगीं लेकिन उदाहरण के लिए मैंने उनमें से दो कलाकृतियाँ चुनी हैं। पहली चित्रकला डेमी पाडुवा की है और दूसरी चित्रकला सेड्रिक डेला पाज़ की है, दोनों कलाकृतियाँ केनवास पर एक्रेलिक रंगों से बनाई गई हैं।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Demi Padua
 
European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Cedric dela Paz

प्रिन्सटन विश्वविद्यालय के फ़िल्म-शोध स्टूडियो की तस्वीरें

यह वाला कक्ष अमरीकी श्याम वर्ण के लोगों के संघर्ष के बारे में बना है। इसमें एक और हज़ारों छोटी-छोटी तस्वीरों को मिला कर कम्प्यूटर से चित्र बनाये थे जिनमें दूर से देखो तो उनमें जाने-पहचाने व्यक्तियों के चेहरे दिखतॆ थे। जैसे कि नीचे वाली तस्वीर अमरीकी अभिनेता जोर्डन पील की है, जिसे ध्यान से देखेंगे तो यह बहुत सी छोटी तस्वीरों को जोड़ कर बनाई गई है। इस तस्वीर पर क्लिक करके उसे बड़ा करके देखिये कि पील का चेहरा कैसे बनाया गया है।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Princeton Uni Research film studio

सेशैल के रायन शैट्टी (Ryan Shetty) की तैरते हुए घर

रायन ने इस कक्ष में विभिन्न इस्टालेशन बनाई थीं। उनमें से मुझे यह तैरते घरों वाला हिस्सा अच्छा लगा। सफेद, चकोर, डिब्बे जैसे कमरों में खिड़कियाँ, सीढ़ियाँ और खम्बे बने हैं। नीचे से रोशनी से पीछे की दीवार पर प्रतिबिम्ब थे और साथ में एक वीडियो इंस्टालेशन भी था (यह सब इस तस्वीर में नहीं दिखते)।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Ryan Shetty

भारत की सोनल अम्बानी (Sonal Ambani) का घायल बैल

सोनल के धातुओं के टुकड़ों को जोड़ कर बना यह बैल देख कर मुझे दिल्ली के चर्खा संग्रहालय में बने शेर की शिल्पकला याद आई जिसे भारत सरकार ने "भारत में बनाईये" कम्पेन के लिए लगाया था। बैल देख कर फाईनेन्शियल और शेयर बाज़ार मार्किट का ध्यान आता है, शायद इसलिए लाल तीरों से घायल यह बैल नहीं है, प्रतीमात्मक गाय है। यह शिल्प स्टील, पीतल और लकड़ी से बना है और उनके अनुसार, यह पुरुष तथा नारी को काम के लिए मिलने वाली पगार की विषमताओं को दर्शाता है। सोनल जी ने इस कलाकृति का नाम दिया है, "बड़े सौभाग्य के तीर और गुलेलें"।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Sonal Ambani

दक्षिण कोरिया के याओ जुई छुंग (Yao Jui Chung) का झंडा

छुंग की इस कलाकृति के रंग यूक्रेन के झंडे के रंगों की याद दिलाते हैं और इस पर बनी दो आकृतियाँ ध्यान खींचती हैं। एक आकृती कुत्ते या सियार जैसी लगती है और दूसरी का चेहरा मानव सा है लेकिन उसके सींग हैं, यानि शैतान है। इसका अर्थ मुझे समझ नहीं आया लेकिन देख कर अच्छा लगा।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures- Yao Jui Chung

चीन के शांग मिंग शेंग (Chang Ming Sheng) की क्वान्टम भौतिकी कला

बाद में पता चला कि कलाकृति का नाम यी जिंग है और कलाकार का नाम शांग मिंग शेंग है। यह वैज्ञानिक तरीके से बालू के कणों को क्वांटम भौतिकी के माध्यम से घुमा कर अपनी कला बनाते हैं जो द्वीरूप और त्रीरूप के बीच में घूमती है। मुझे उनकी कोई बात समझ नहीं आई कि वह क्या करते हैं और क्यों करते हैं, इसलिए उनकी चित्रकला का एक नमूना यहाँ प्रस्तुत है ताकि आप में से बुद्धिमान व्यक्ति इसे समझ कर मुझे भी समझायें। 

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Chang Ming Sheng

चेक गणतंत्र के डानिएल पेस्टा (Daniel Pesta) की चोटियाँ

मेरी इस लघु-प्रदर्शनी के अंत में वह कलाकृति प्रस्तुत है जिसने मेरे दिल को गहराई से छुआ। इसे देख कर मुझे बहुत धक्का लगा, मैं वहाँ खड़ा रह गया।

कलाकृति में युवतियों की तीन कटी हुई, खून से सनी हुई चोटियाँ हैं, जिनके नीचे लिखा है, "मेरा खून जंगली था", "मेरा खून गर्म था", और "मेरा खून स्वतंत्र था"। जब लड़की जंगली हो, काबू में न आये, स्वतंत्र जीना चाहे तो अक्सर समाज उन्हें दीवारों और पर्दों के पीछे छुपा देते हैं और फ़िर भी न माने, तो परिवार और धर्म की इज़्ज़त के नाम पर जान से मार देते हैं।

दुनिया भर में लड़कियों और औरतों पर धर्म, संस्कृति और परम्पराओं के नाम पर होने वाले अत्याचारों और बंधनों को दिखाती यह कलाकृति मेरे मन को छू गई। नीचे वाली तस्वीर में मैंने तीनो कलाकृतियों को एक तस्वीर में जोड़ दिया है। इस तस्वीर को क्लिक करके इसे बड़ा करके अवश्य देखें।

इसे देख कर पंजाबी गीत, "काली तेरी गुत ते परांदा तेरा लाल नी" का नया ही अर्थ दिखता है।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Daniel Pesta

अंत में 

पिछले दशक से कॉनसैप्ट आर्ट यानि किसी विचार पर आधारित कला का महत्व बढ़ता जा रहा है, जिसमें कलाकार अपनी कला का कौशल नहीं दिखाता बल्कि कला के माध्यम से एक विचार को अभिव्यक्ति देता है। डानियल पेस्टा की कला में लड़कियों की चोटियाँ बनाने का कौशल प्रभावित नहीं करता बल्कि उसके पीछे उनका विचार है कि जो लड़कियाँ हमारे समाज की बात नहीं मानती उनकी चोटियाँ काट कर उनके सिरों को लहु-लुहान कर दो।

कुछ कलाकार वैचारिक-कला के नाम पर आलसपन दिखाते हैं जैसे कि कोई कुछ टूटी ईंटों को रख कर, उसे "टूटे सपने" नाम की कलाकृति बताईये। लेकिन चेक कलाकार डानियल की इस कलाकृति को देख कर मुझे लगा कि वैचारिक कला भी बहुत सशक्त हो सकती है।

कहिये आप का क्या विचार है और मेरी इस लघु कला प्रदर्शनी में आप को कौन सी कलाकृति सबसे अधिक अच्छी लगी।

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गुरुवार, सितंबर 21, 2023

रहस्यमयी एत्रुस्की सभ्यता

ईसा से करीब आठ सौ वर्ष पहले, इटली के मध्य भाग में, रोम के उत्तर-पश्चिम में, बाहर कहीं से आ कर एक भिन्न सभ्यता के लोग वहाँ बस गये जिन्हें एत्रुस्की (Etruscans) के नाम से जाना जाता है। इनकी सभ्यता से जुड़ी बहुत सी बातें, जैसे कि इनकी भाषा, अभी तक पूरी नहीं समझीं गयी हैं। 

उस समय दक्षिण इटली में ग्रीस से आये यवनों का राज था। एत्रुस्की भी लिखने के लिए यवनी वर्णमाला का प्रयोग करते थे, लेकिन उनकी भाषा, धर्म, आदि बाकी यवनों तथा इटली वालों से भिन्न थे। ईसा से करीब सौ/डेढ़ सौ साल पहले जब रोमन सम्राज्य का उदय हुआ तो एत्रुस्की उनसे युद्ध हार गये और धीरे-धीरे उनकी सभ्यता रोमन सभ्यता में घुलमिल कर लुप्त हो गयी।

Etruscan archeological ruins, Marzabotto, Italy - Image by S. Deepak

एत्रुस्कियों के इटली में बारह राज्य थे, हर एक का अपना शासक था, लेकिन वह सारे एक ही धर्मगुरु के अधिपत्य को स्वीकारते थे। ईसा से चार-पाँच सौ वर्ष पूर्व उनका एक राज्य बोलोनिया शहर के पास भी था, जहाँ एक बार मुझे उनके शहर के पुरातत्व अवषेशों को देखने का मौका मिला। इस आलेख में उन्हीं प्राचीन भग्नावशेषों का परिचय है।

पुरातत्व में रुचि

मुझे इतिहास और पुरातत्व के विषयों में बहुत रुचि है। मेरे विचार में जन सामान्य में इतिहास तथा पुरातत्व के बारे में चेतना जगाने में संग्रहालयों का विषेश योगदान होता है। जितना मैंने देखा है, भारत में कुछ संग्रहालयों को छोड़ कर, अधिकांश में हमारी प्राचीन सांस्कृतिक धरौहर का न तो सही तरीके से संरक्षण व प्रदर्शन होता है और न ही उनके बारे में अच्छी जानकारी आसानी से मिलती है। अक्सर, धूल वाले शीशों के पीछे वस्तुएँ बिना विषेश जानकारी के रखी रहती हैं और वहाँ पर तस्वीर नहीं खींचने देते। शायद इसीलिए जन समान्य को इस विषय में कम रुचि लगती है।

सेवा-निवृत होने के बाद, पिछले कुछ वर्षों में, मैं इतिहास और पुरातत्व के बारे में पढ़ता रहता हूँ। मुझे लगता है कि भारतीय इतिहास और पुरातत्व के क्षेत्रों में अभी तक बहुत कम काम किया गया है और बहुत कुछ खोजना तथा समझना बाकी हैं।

खैर, अब चलते हैं उत्तरी-मध्य इटली के बोलोनिया (Bologna - इतालवी भाषा में g और n मिलने से 'इ' की ध्वनि बनती है) शहर के पास मार्ज़ाबोत्तो (Marzabotto) में मिले आज से करीब २६०० साल पुराने एत्रुस्की शहर के भग्नावषेशों की ओर। 

मार्ज़ाबोत्तो के एत्रुस्की भग्नावषेश

युरोप की बहुत सी प्राचीन सभ्यताओं में शहर तीन स्तरों पर बंटे होते हैं - (१) एक ऊँचा शहर, जो किसी पहाड़ी या ऊँचे स्थल पर बना होता है, इन्हें एक्रोपोली (ग्रीक भाषा में 'एक्रो' यानि ऊँचा और 'पोलिस' यानि शहर) जहाँ पर बड़े मन्दिर या राजभवन या किले या अमीर लोगों के घर होते हैं; (२) पोली यानि एक मध्य शहर, जो एक्रोपोली के पास में लेकिन थोड़ा सा नीचे होता है, जहाँ आम जनता रहती है; और (३) एक निचला शहर होता है जो सबसे नीचे होता है और जिसे नेक्रोपोली ('नेक्रो' यानि मृत) कहते हैं जहाँ पर कब्रें होती हैं।

मार्ज़ाबोत्तो के एत्रुस्की शहर के भग्नावषेशों में यह तीनों स्तर दिखते हैं। नीचे की तस्वीर में वहाँ के लोगों के घरों और भवनों की दीवारों और उनके बीच बनी गलियों या सड़कों के अवशेष देख सकते हैं जिनसे उनके जीवन के बारे में जानकारी मिलती है। यह सभी भवन छोटे पत्थरों से बने थे जिन्हें माल्टे से जोड़ते थे। उनकी सबसे चौड़ी सड़क पंद्रह मीटर चौड़ी थी, उसे देख कर मुझे लगा कि उस पर घोड़े या बैल के रथ और गाड़ियाँ आराम से चल सकती थीं।

Etruscan archeological ruins, Marzabotto, Italy - Image by S. Deepak

यहाँ के भग्नवशेषों में पुरात्तवविद्यों ने तिनिआ (Tinia) नाम के एक देवता के मन्दिर को खोजा है, यह प्राचीन ग्रीक के देवताओं की कहानियों के राजा ज़ेउस (Zeus) जैसे थे। "तिनिआ" शब्द का अर्थ 'दिन' या 'सूर्य' भी था, इसलिए शायद इसे सूर्य पूजा की तरह भी देखा जा सकता है। यहाँ एक मन्दिर वाले हिस्से की खुदाई अभी चल रही है, जहाँ पर बीच में एक तालाब या कूँआ जैसा दिखता है।

इस क्षेत्र के दक्षिणी-पूर्व के हिस्से में कुछ नीचे जा कर वहाँ पर एत्रुस्की नेक्रोपोलिस यानि कब्रिस्तान के कुछ हिस्से दिखते हैं। इन भग्नावशेषों में सोने के गहने, कमर में बाँधने वाली पेटियाँ, कानों की बालियाँ, आदि मिली हैं जो कि बोलोनिया शहर के पुरातत्व संग्रहालय में रखी हैं। यहाँ पर पत्थरों की बनी चकौराकार छोटी कब्रें मिलती हैं जिनमें से कुछ के ऊपर बूँद या अंडे जैसे आकार के तराशे हुए  पत्थर टिके हुए दिखते हैं। शायद यह तराशे पत्थर सभी कब्रों पर लगाये जाते थे और समय के साथ कुछ कब्रों से नष्ट हो गये या शायद, उन्हें किन्हीं विषेश व्यक्तियों की कब्रों के लिए बनाया जाता था, जैसा कि आप नीचे की तस्वीर में देख सकते हैं।

Etruscan archeological ruins, Marzabotto, Italy - Image by S. Deepak

एत्रुस्कों की भाषा

एत्रुस्कों की वर्णमाला यवनी/ग्रीक वर्णमाला जैसी थी लेकिन उनकी भाषा यवनी नहीं थी। इनकी भाषा को यवनी से पुराना माना जाता है, और उसे प्रोटो-इंडोयुरोपी भाषा भी कहा गया है। पुरातत्वविद्य कहते हैं कि यह लोग यवनभूमि के आसपास के किसी द्वीप के निवासी थे।

मुझे एत्रुस्कों के कुछ शब्दों में संस्कृत का प्रभाव लगा। जैसे कि 'ईश' को वह लोग 'एइसना' कहते थे, 'यहाँ' को 'इका', 'वहाँ' को 'इता', आदि। उनकी भाषा में 'सूर्य' का एक नाम 'उशिल' भी था, जिसमें मुझे 'उषा' की प्रतिध्वनि सुनाई दी। लेकिन उनके अधिकांश शब्दों में संस्कृत का प्रभाव नहीं है।

एत्रुस्की संग्रहालय

भग्नावशेषों के पास में ही मार्ज़ाबोत्तो में मिली एत्रिस्की वस्तुओं का संग्रहालय भी है। वहाँ उनके मिट्टी के बने तोलने वाले छोटे बट्टे दिखे (नीचे तस्वीर में).

Etruscan archeological ruins, Marzabotto, Italy - Image by S. Deepak

उनकी एक पूजा की थाली लिये हुए स्त्री की मूर्ति मुझे सुन्दर लगी।

Etruscan archeological ruins, Marzabotto, Italy - Image by S. Deepak

नीचेवाली, संग्रहालय की तीसरी तस्वीर में एत्रुस्की स्त्रियों के वस्त्रों को दिखाया गया है।

Etruscan archeological ruins, Marzabotto, Italy - Image by S. Deepak

अंत में

जब तक भाप के जहाज़, रेलगाड़ियाँ, मोटरगाड़ियाँ आदि नहीं थीं, एक जगह से दूसरी जगह जाना कठिन होता था। जिस रास्ते को आज हम साईकल से एक-दो घंटों में पूरा कर लेते हैं, कभी उसे पैदल चलने में पाँच-छह घंटे लग जाते थे। पहाड़ी घाटियों और द्वीपों में यह रास्ते पार करना और भी कठिन होता था। तब हर दस किलोमीटर पर, हर शहर, हर घाटी, हर द्वीप में, लोगों की भाषा, उनके खानपान का तरीका, आदि बदल जाते थे। एत्रुस्की सभ्यता ऐसे ही समय का नतीजा थी, यह एक द्वीप के लोगों की सभ्यता थी, जिसे ले कर वहाँ के निवासी दूर देश की यात्रा पर निकले और उन्हें उत्तरी-मध्य इटली में नया घर मिला।

घोड़े से मानव को इतिहास का पहला तेज़ वाहन मिला और दुनिया सिकुड़ने लगी। आज की दुनिया में तकनीकी विकास के सामने दूरियाँ और भी कम हो रहीं हैं और फिल्म-टीवी-इंटरनेट-मोबाइल आदि के असर से हमारी भाषाएँ, संस्कृतियों की भिन्नताएँ आदि धीरे-धीरे लुप्त हो रहीं हैं।

मानव समाजों का इतिहास क्या था, कैसे दुनिया के विभिन्न भागों में अलग-अलग सभ्यताएँ और संस्कृतियाँ विकसित हुईं, भविष्य के लिए इसकी याद को सम्भाल कर रखने के लिए, हम सभी को प्रयत्न करना चाहिये। आप चाहे जहाँ भी रहते हो, चाहे वह छोटा शहर हो या कोई गाँव, यह बदलाव का तूफान एक दिन आप की दुनिया को भी बदल देगा। आप कोशिश करो कि बदलाव से पहले वाली दुनिया की जानकारी को, उसकी सांस्कृतिक धरौहर की यादों को सम्भाल कर संजो रखो।

Etruscan archeological ruins, Marzabotto, Italy - Image by S. Deepak

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शनिवार, जून 17, 2023

प्राचीन भित्ती-चित्र और फ़िल्मी-गीत

कुछ सप्ताह पहले मैं एक प्राचीन भित्ती-चित्रों की प्रदर्शनी देखने गया था। दो हज़ार वर्ष पुराने यह भित्ती-चित्र पोमपेई नाम के शहर में मिले थे। उन चित्रों को देख कर मन में कुछ गीत याद आ गये। भारत में फ़िल्मी संगीत हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन जाता है, और हमारे जीवन में कोई भी परिस्थिति हो, उसके हिसाब से उपयुक्त गीत अपने आप ही मानस में उभर आते है। यह आलेख इसी विषय पर है।

पोमपेई के प्राचीन भित्ती-चित्र

इटली की राजधानी रोम के दक्षिण में नेपल शहर के पास एक पहाड़ है जिसका नाम वैसूवियो पर्वत है। आज से करीब दो हज़ार वर्ष पूर्व इस पहाड़ से एक ज्वालामुखी फटा था, जिसमें से निकलते लावे ने पहाड़ के नीचे बसे शहरों को पूरी तरह से ढक दिया था। उस लावे की पहली खुदाई सन् १६०० के आसपास शुरु हुई थी और आज तक चल रही है।



इस खुदाई में समुद्र तट के पास स्थित दो प्राचीन शहर, पोमपेई और एरकोलानो, मिले हैं जहाँ के हज़ारों भवनों, दुकानों, घरों, और उनमें रहने वाले लोगों को, उनके कुर्सी, मेज़, उनकी चित्रकला और शिल्पकला, आदि सबको उस ज्वालामुखी के लावे ने दबा दिया था और जो उस जमे हुए लावे के नीचे इतनी सदियों तक सुरक्षित रहे हैं।

मैं पोमपेई के भग्नवषेशों को देखने कई बार जा चुका हूँ और हर बार वहाँ जा कर दो हज़ार वर्ष पहले के रोमन जीवन के दृश्यों को देख कर चकित हो जाता हूँ। जैसे कि नीचे वाले चित्र में आप पोमपेई का एक प्राचीन रेस्टोरैंट देख सकते हैं - इसे देखते ही मैं पहचान गया क्योंकि इस तरह के बने हुए ढाबे और रेस्टोरैंट आज भी भारत में आसानी से मिलते हैं।
 

इन अवषेशों से पता चलता है कि उस ज़माने में वहाँ के अमीर लोगों को घरों की दीवारों को भित्तीचित्रों से सजवाने का फैशन था, जिनमें उनके देवी-देवताओं की कहानियाँ चित्रित होती थीं। इन्हीं चित्रों की एक प्रदर्शनी कुछ दिन पहले बोलोनिया शहर के पुरातत्व संग्रहालय में लगी थी।

पोम्पेई कैसा शहर था और ज्वालामुखी फटने से क्या हुआ इसे समझने के लिए आप एक छोटी सी (८ मिनट की) फिल्म को भी देख सकते हैं जो कि बहुत सुंदर बनायी गयी है।

अब बात करते हैं पोमपेई के कुछ भित्तीचित्रों की जिन्हें देख कर मेरे मन में हिंदी फिल्मों के गीत याद आ गये।

प्रार्थना करती नारी

नीचे वाला भित्तीचित्र पोमपेई के एक बंगले में मिला जिसे चित्रकार का घर या सर्जन (शल्यचिकित्सक) का घर कहते हैं। इसमें एक महिला स्टूल पर बैठी है, उनके सामने एक मूर्ति है और मूर्ति के नीचे किसी व्यक्ति का चित्र रखा है। चित्र के पास एक बच्चा बैठा है और नारी के पीछे दो महिलाएँ खड़ी हैं। चित्र को देख कर लगता है कि वह नारी भगवान से उस व्यक्ति के जीवन के लिए प्रार्थना कर रही है। सभी औरतों के वस्त्र भारतीय पौशाकों से मिलते-जुलते लगते हैं।
 

इस चित्र को देखते ही मुझे १९६६ की फ़िल्म "फ़ूल और पत्थर" का वह दृश्य याद आ गया जिसमें राका (धर्मेंद्र) बिस्तर पर बेहोश पड़ा है और विधवा शांति (मीना कुमारी) भगवान के सामने उनके ठीक होने की प्रार्थना कर रही है, "सुन ले पुकार आई, आज तेरे द्वार लेके आँसूओं की धार मेरे साँवरे"।

इसी सैटिन्ग में "लगान" का गीत "ओ पालनहारे" भी अच्छा फिट बैठ सकता है। वैसे यह सिचुएशन हिंदी फिल्मों में अक्सर दिखायी जाती है और इसके अन्य भी बहुत सारे गाने हैं।

संगीतकार और जलपरी की कहानी

पोमपेई के भित्ती-चित्रों में ग्रीक मिथकों की कहानियों से जुड़े बहुत से भित्ती-चित्र मिले हैं। जैसे कि प्राचीन ग्रीस के मिथकों की एक कहानी में भीमकाय शरीर वाले पोलीफेमों को जलपरी गलातेया से प्यार था, उन्होंने संगीत बजा कर उसे अपनी ओर आकर्षित करने की बहुत कोशिश की लेकिन जलपरी नहीं मानी क्यों कि वह किसी और से प्यार करती थी। नीचे दिखाये भित्ती-चित्र में पोलीफेमो महोदय निर्वस्त्र हो कर गलातेया को बुला रहे हैं जबकि गलातेया अपनी सेविका से कह रही है कि इस व्यक्ति को यहाँ से जाने के लिए कहो।


इस चित्र की जलपरी सामान्य महिला लगती है और उनके वस्त्र व वेशभूषा भारतीय लगते हैं। मेरे विचार में भारत में अप्सराओं को गहनों से सुसज्जित बनाते हैं जबकि यह जलपरी उनके मुकाबले में बहुत सीधी-सादी लगती है।

जैसा कि इस चित्र में दिखाया गया है, प्राचीन रोमन तथा यवनी भित्तीचित्रों में पुरुष शरीर की नग्नता बहुत अधिक दिखती है और उसकी अपेक्षा में नारी नग्नता कम लगती है। इस चित्र को देख कर मुझे लगा कि इसमें पोलीफेमो अनामिका फिल्म का गीत गा रहा है, "बाहों में चले आओ, हमसे सनम क्या परदा", जबकि जलपरी कन्यादान फिल्म का गीत गा रही है, "पराई हूँ पराई, मेरी आरजू न कर"।

यवनी सावित्री और सत्यवान

प्राचीन ग्रीस की भी एक सावित्री और सत्यवान की कहानी से मिलती हुई कथा है। उनके नाम थे अलसेस्ती और अदमेतो, लेकिन इनकी कथा भारतीय कथा से थोड़ी सी भिन्न थी।

जब अदमेतो को लेने मृत्यु के देवता आये तो अदमेतो ने उनसे विनती की कि उन्हें नहीं मारा जाये, तो मृत्यु देव ने कहा कि वह उनके बदले उनके परिवार के किसी भी व्यक्ति की आत्मा ले कर चले जायेंगे, जो  उनकी जगह मरने को तैयार हो।

अदमेतो ने अपने माता-पिता से अपनी जगह पर मरने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। तब उनकी पत्नी अलसेस्ती बोली कि वह उसकी जगह मरने को तैयार थी। मृत्यु देव अलसेस्ती की आत्मा को ले कर वहाँ से जा रहे थे जब भगवान अपोलो ने उसे जीवनदान दिया और वह पृथ्वी पर अपने पति के पास लौट आयी।

इस चित्र में नीचे वाले हिस्से में अदमेतो, अलसेस्ती और उनके दास को दिखाया गया है। ऊपरी हिस्से में, उनके पीछे बायीं ओर अदमेतो के बूढे माता-पिता हैं और दायीं ओर, अलसेस्ती और भगवान आपोलो हैं।
 

इस चित्र में अलसेस्ती की वेशभूषा और उसके चेहरे का भाव मुझे बहुत भारतीय लगे, जबकि अदमेतो को निर्वस्त्र दिखाया गया है।
 
सावित्री-सत्यवान की कहानी पर बहुत सी फ़िल्में बनी हैं, लेकिन इस सिचुएशन वाला उनका कोई गीत नहीं मालूम था, उसकी जगह पर मेरे मन में एक अन्य गीत याद आया, “मार दिया जाये कि छोड़ दिया जाये, बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाये"। कहिये, यह गीत इस सिचुएशन पर भी बढ़िया फिट बैठता है न?

विश्वामित्र और मेनक

कालीदास की कृति "अभिज्ञान शकुंतलम" में ऋषि विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए इन्द्र स्वर्गलोक से अप्सरा मेनका को भेजते हैं, और उनके मिलन से शकुंतला पैदा होती है। अगले चित्र में ऐसी ही स्वर्ग की एक देवी की प्राचीन यवनी कहानी है।

इस ग्रीक कथा में स्वर्ग की देवी सेलेने का दिल धरती के सुंदर राजा एन्देमेनों पर आ जाता है तो वह खुद को रोक नहीं पाती और कामातुर हो कर उनसे मिलन हेतू धरती पर आती है। यह कहानी भी उस समय बहुत लोकप्रिय थी क्योंकि इस विषय पर बने बहुत से भित्तीचित्र मिले हैं। नीचे वाले चित्र में सेलेने निर्वस्त्र हो कर एन्देमेनो कीओर आ रही हैं, उनकी पीछे एक एँजल बनी है।


इस कथा के अनुसार देवी सेलेने उससे प्रेम करते समय एन्देमेनों को सुला देती है, इस तरह से वह सोचता है कि वह सचमुच नहीं था बल्कि उसने सपने में किसी सुंदर अप्सरा से प्रेम किया था।

इस तस्वीर को देख कर मेरे मन में आराधना फ़िल्म का यह गीत आया - “रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना, भूल कोई हमसे न हो जाये"। इस सिचुएशन पर अनामिका फ़िल्म का गीत, "बाहों में चले आओ, हमसे सनम क्या परदा" भी अच्छा फिट होता।

हीरो जी

अंत में अपने हीरो जैसे शरीर पर इतराते एक युवक की शिल्पकला है, जिसे देख कर मुझे सलमान खान की याद आई। इस शिल्प कला से लगता है कि उस समय अमीर लोगों का अपने घरों में नग्न पुरुष शरीर को दिखाना स्वीकृत था।


जब मैंने इस कलाकृति को देखा तो मन में सलमान खान का गीत "मैं करूँ तो साला करेक्टर ढीला है" याद आ गया। अगर कोई आप से इस युवक के चित्र के लिए गीत चुनने को कहे तो आप कौन सा गीत चुनेंगे?

मैंने पढ़ा कि शिल्प और चित्रकला में पुरुष शरीर को दिखाने की ग्रीक परम्परा में पुरुष यौन अंग को छोटा दिखाना बेहतर समझा जाता था, क्यों कि वह लोग सोचते थे कि इससे पुरुष वीर्य जब बाहर निकलता है तो वह अधिक गर्म और शक्तिशाली होता है, जबकि अगर वह अंग बड़ा हो गा तो वीर्य बाहर निकलते समय ठंडा हो जायेगा और उसकी शक्ति कम होगी।

अंत में

मुझे पोमपेई की गलियों और घरों में घूमना और वहाँ के दो हज़ार साल पहले के जीवन बारे में सोचना बहुत अच्छा लगता है।

भारत में मध्यप्रदेश में भीमबेटका में आदि मानव के जीवन और महाराष्ट्र में अजंता जैसी गुफाओं में भगवान बुद्ध के समय के जीवन, या फ़िर उत्तर-पश्चिम में लोथाल, गनेरीवाला और राखीगढ़ी जैसी जगहों पर पुरातत्व अवशेषों से और भित्ती-चित्रों से सिंधु घाटी सभ्यता को समझने के मौके मिलते हैं, लेकिन पोमपेई तथा एरकोलानो में जिस तरह से उस समय का समस्त जीवन पिघले हुए लावे में कैद हो गया, वह दुनिया में अनूठा है।

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शुक्रवार, सितंबर 30, 2022

रोमाँचक यात्राएँ

मेरा सारा जीवन यात्राओं में बीत गया लेकिन अब लगता है कि जैसे इन पिछले ढ़ाई-तीन सालों में यात्रा करना ही भूल गया हूँ। जब आखिरी बार दिल्ली से इटली वापस लौटा था,  उस समय कोविड के वायरस के बारे में बातें शुरु हो रहीं थीं। उसके बाद ढाई साल तक इटली ही नहीं, अपने छोटे से शहर से भी बाहर नहीं निकला। पिछले कुछ महीनों में यहाँ आसपास कुछ यात्राएँ की हैं और अब पहली अंतर्राष्ट्रीय यात्रा की तैयारी कर रहा हूँ - अक्टूबर के प्रारम्भ में कुछ सप्ताह के लिए भारत वापस लौटूँगा, तो लम्बी यात्रा की सोच कर मन में कुछ घबराहट सी हो रही है।

सोचा कि आज अपने जीवन की कुछ न भूल पाने वाली रोमाँचकारी यात्राओं को याद करना चाहिये, जब सचमुच में डर और घबराहट का सामना करना पड़ा था (नीचे की तस्वीर में रूमझटार-नेपाल में एक रोमाँचक यात्रा में मेरे साथ हमारे गाईड कृष्णा जी हैं।)।



रोमाँचकारी बोलिविया यात्रा

अगर रोमाँचकारी यात्राओं की बात हो तो मेरे मन में सबसे पहला नाम दक्षिण अमरीकी देश बोलिविया का उभरता है। बोलिविया की राजधानी ला'पाज़ ऊँचे पहाड़ों पर बसी है। 1991 में जब वहाँ हवाई जहाज़ से उतरे तो हवाई अड्डे पर जगह-जगह लिखा था कि अगर चक्कर आयें या साँस लेने में दिक्कत हो या बेहोशी सी लगे तो तुरंत बैठ जायें और सिर को घुटनों के बीच में कर लें। तभी हमारे साथ का एक यात्री "चक्कर आ रहे हैं" कह कर वहीं ज़मीन पर लेट गया तो जी और भी घबराया। खैर मुझे ला'पाज़ में कुछ परेशानी नहीं हुई।

कुछ दिन बाद हम लोग छोटे से तीन सीट वाले हवाई जहाज़ से त्रिनीदाद शहर गये। वहाँ का हवाई अड्डा एक घास वाला मैदान था जहाँ पर गायें चर रही थीं। पायलेट साहब ने मैदान पर जहाज़ के चक्कर लगाये जब तक नीचे से कर्मचारियों ने गायों को हटाया। दो दिन बाद हम लोग वहाँ से ला'क्रूस जाने के लिए उसी मैदान में लौटे तो मूसलाधार बारिश हो रही थी। इस जहाज़ में दो ही सीटें थीं, तो मैं स्टूल पर पायलेट के पीछे बैठा। पायलट ने जहाज़ का इंजन चालू किया और चलने लगे, लेकिन बारिश इतनी थी कि जहाज़ हवा में उठ नहीं पाया। तब पायलेट ने जहाज़ को रोकने के लिए ब्रेक लगायी, तो भी एक पेड़ से टक्कर होते होते बची। उस ब्रेक में मेरा स्टूल भी नीचे से खिसक गया तो मैं नीचे गिर गया। चोट तो कुछ नहीं लगी लेकिन मन में डर बैठ गया कि शायद यहाँ से बच कर नहीं लौटेंगे। खैर पायलेट ने जहाज़ को घुमाया और फ़िर से उसको चलाने की कोशिश की, इस बात जहाज़ उठ गया। एक क्षण के लिए लगा कि वह पेड़ों से ऊपर नहीं जा पायेगा, लेकिन उनको छूते हुए ऊपर आ गया, तब जान में जान आयी (नीचे की तस्वीर में त्रिनिदाद शहर की बारिश में हमारा हवाई जहाज़)।



ला'क्रूस में हम लोगों को रिओ मादेएरा नाम की नदी के बीच में एक द्वीप पर बने स्वास्थ्य केन्द्र में जाना था। जाते हुए तो कुछ कठिनाई नहीं हुई। जब वापस चलने का समय आया तो अँधेरा होने लगा था। नदी का पानी बहुत वेग में था और बीच-बीच में पानी में तैरते हुए बड़े वृक्ष आ रहे थे। तब मालूम चला कि नाव की बत्ती खराब थी, अँधेरे में ही यात्रा करनी होगी। फ़िर नाव वाले ने बताया कि वहाँ नदी में पिरानिया मछलियाँ थीं जो माँस खाती हैं, इसलिए वहाँ पानी में हाथ नहीं डालना था। अँधेरे में नाव की उस आधे घँटे की यात्रा में दिल इतना धकधक किया कि पूछिये मत। डर था कि नाव किसी तैरते वृक्ष से टकरायेगी तो पानी में गिर जाऊँगा और अगर उसके वेग में न भी बहा तो पिरानिया मछलियाँ मेरे हाथों-पैरों के माँस को खा जायेंगी। मन में हनुमान चलीसा याद करते हुए वह यात्रा पूरी हुई।

उसके बाद में मैं बोलिविया दोबारा नहीं लौटा! तीस सालों के बाद भी मेरी यादों में वही यात्रा मेरे जीवन का सबसे रोमाँचकारी अनुभव है।

रोमाँचकारी नेपाल यात्रा

मैं नेपाल कई बार जा चुका था लेकिन 2006 की एक यात्रा विषेश रोमाँचकारी थी। उस यात्रा में हम लोग ऊँचे पहाड़ों के बीच ओखलढ़ुंगा जिले में गये थे, जहाँ से एवरेस्ट पहाड़ की चढ़ाई की लिए बेस कैम्प की ओर जाते हैं। रुमझाटार के हवाई अड्डे से ओखलढ़ुंगा शहर तक पैदल गये, तो पहाड़ की चढ़ाई में मेरा बुरा हाल हो गया। लेकिन असली दिक्कत तो लौटते समय समय हुई जब रुमझाटार में इतनी तेज़ हवा चल रही थी कि हमारा हवाई जहाज़ वहाँ उतर ही नहीं पाया। हमसे कहा गया कि हम अगले दिन लौटें, इसलिए रात को वहीं रुमझाटार के एक होटल में ठहरे (नीचे की तस्वीर में रूमझटार का एक रास्ता)।



वह इलाका माओवादियों के कब्ज़े में था। हालाँकि हम लोग जिस प्रोजेक्ट के लिए वहाँ गये थे, उसके लिए माओवादियों से अनुमति ली गयी थी, फ़िर भी कुछ डर था कि रात में माओवादी नवयुवक होटल पर हमला कर सकते थे। वैसा ही हुआ। लड़कों ने रात को मेरे दरवाज़े पर खूब हल्ला किया, लेकिन मैंने दरवाज़ा नहीं खोला। डर के मारे बिस्तर में दुबक कर बैठा रहा, सोच रहा था कि वह लोग दरवाज़ा तोड़ देंगे, लेकिन उन्होंने वह नहीं किया। करीब एक घँटे तक उनका हल्ला चलता रहा, फ़िर वे चले गये।

दूसरे दिन भी वह तेज़ हवा कम नहीं हुई थी तो हमारी उड़ान को एक दिन की देरी और हो गयी। दूसरी रात को कुछ परेशानी नहीं हुई। तीसरे दिन भी जब हवा कम नहीं हो रही थी तो मैं घबरा गया, क्योंकि मेरी काठमाँडू से वापस जाने वाली फ्लाईट के छूटने का डर था।

तो हमने एक हेलीकोप्टर बुलवाया। उस तेज़ हवा में जब वह हेलीकोप्टर ऊपर उठने लगा तो मुझे बोलिविया वाली उड़ान याद आ गयी। वह मेरी पहली हेलीकोप्टर यात्रा थी। खैर हम लोग सही सलामत वापस काठमाँडू वापस पहुँच गये।

रोमाँचकारी लंडन यात्रा

नब्बे के दशक में मैं अक्सर लंडन जाता था। हमारा आफिस हैमरस्मिथ में था, हमेशा वहीं के एक होटल में ठहरता था। वहाँ मेरी कोशिश रहती थी कि सुबह जल्दी उठ कर नाश्ते से पहले थेम्स नदी के आसपास सैर करके आऊँ, शहर का वह हिस्सा मुझे बहुत मनोरम लगता था (नीचे की तस्वीर में)।



वैसे ही एक बार मैं वहाँ गया तो शाम को पहुँचा। अगले दिन सुबह मेरी मीटिंग थी, मैं खाना खा कर सो गया। अगले दिन सुबह जल्दी नींद खुल गयी। तो मैंने टेबल लैम्प जलाया, सोचा कि नदी किनारे सैर के लिए जाऊँगा, इसलिए उठ कर बिजली की केतली में कॉफ़ी बनाने के लिए पानी गर्म करने के लिए लगाया और खिड़की खोली।

खिड़की खोलते ही बाहर देखा तो सन्न रह गया। बाहर चारों तरफ़ होटल की ओर बँदूके ताने हुए पुलिस के सिपाही खड़े थे। झट से मैंने खिड़की बन्द की, बत्ती बन्द की और वापस बिस्तर में घुस गया। एक क्षण के लिए सोचा कि बिस्तर के नीचे घुस जाऊँ, फ़िर सोचा कि अगर किस्मत में मरना ही लिखा है तो बिस्तर में मरना बेहतर है। करीब आधे घँटे के बाद कमरे के बाहर से लोगों की आवाज़ें आने लगीं, लोग आपस में बातें कर रहे थे। मैंने कमरे का दरवाज़ा हल्का सा खोला और बाहर झाँका तो हॉल पुलिस के आदमियों से भरा था, लेकिन अब उनके हाथों में बँदूकें नहीं थीं।

नहा-धो कर नीचे रेस्टोरैंट में गया तो वहाँ पुलिस वाले भी बैठ कर चाय-नाश्ता कर रहे थे। तब मालूम चला कि हमारे होटल में एक आतंकवादी ठहरा था, उसे पकड़ने के लिए वह पुलिसवाले आये थे। खुशकिस्मती से उस आतंकवादी ने पुलिस को आत्मसमर्पण कर दिया और बँदूक चलाने का मौका नहीं आया।

लंडन में ही एक और अन्य तरह की सुखद रोमाँचकारी याद भी जुड़ी है। मेरा ख्याल है कि वह बात 1995 या 96 की थी, जब वहाँ एक समारोह में मुझे प्रिन्सेज़ डयाना से मिलने का और बात करने का मौका मिला (नीचे की तस्वीर में)।



उनके अतिरिक्त, कई देशों में प्रधान मंत्री या राजघराने के लोगों से पहले भी मिला था और उनके बाद भी ऐसे कुछ मौके मिले, लेकिन उनसे मिल कर जो रोमाँच महसूस किया था, वह किसी अन्य प्रसिद्ध व्यक्ति से मिल कर नहीं हुआ। उस मुलाकात के कुछ महीनों बाद जब सुना कि उनकी एक एक्सीडैंट में मृत्यु हो गयी है तो मुझे बहुत धक्का लगा था।

रोमाँचकारी चीन यात्रा

यह बात 1989 की है। तब चीन में विदेशियों का आना बहुत कम होता था। उस समय मेरे चीनी मित्र सरकारी दमन के विरुद्ध दबे स्वर में तभी बोलते थे जब हम खेतों के बीच किसी खुली जगह पर होते थे और आसपास कोई सुनने वाला नहीं होता था। वह कहते थे कि सरकारी जासूस हर जगह होते हैं। एक डॉक्टर मित्र, जिनके पिता माओ के समय में प्रोफेसर थे और जिन्हें खेतों में काम करने भेजा गया था, ने कैम्प में बीते अपने जीवन की ऐसी बातें बतायीं थीं जिनको सुन कर बहुत डर लगा था।

28 मई को हम लोग कुनमिंग से बेजिंग आ रहे थे तो रास्ते में हमारे हवाई जहाज़ का एक इँजिन खराब हो गया। उस समय जहाज़ पहाड़ों के ऊपर से जा रहा था, जब नीचे जाने लगा तो लोग डर के मारे चिल्लाये। खैर, पायलेट उस जहाज़ की करीब के हवाई अड्डे पर एमरजैंसी लैंडिग कराने में सफल हुए। तब चीन में अंग्रेज़ी बोलने वाले कम थे। जहाज़ की एयर होस्टेज़ और हवाई अड्डे के कर्मचारी किसी को इतनी अंग्रेज़ी नहीं आती थी कि हमें बता सके कि हम लोग किस जगह पर उतरे थे और हमारी आगे की बेजिंग यात्रा का क्या होगा।

जब हम लोगों को बस में बिठा कर होटल ले जाया जा रहा था तो सड़कों को बहुत से लोग प्रदर्शन करते हुए और नारे लगाते हुए दिखे, लेकिन वह भी हम लोग समझ नहीं पाये कि क्या हुआ था। वहाँ लोगों को खुलेआम सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन करते देखना बहुत अद्भुत लगा था। (नीचे की तस्वीर सियान शहर में बस की खिड़की से खींची थी जिसमें सड़क के किनारे बैठा एक परिवार है)



होटल पहुँच कर एक ताईवानी चीनी ने हमको सब कुछ बताया। उस शहर का नाम सियान था, वहाँ कुछ वर्ष पहले  दो हज़ार वर्ष पुराने चीनी सम्राट की कब्र मिली थीं जिसमें उनके साथ हज़ारों टेराकोटा मिट्टी के बने सैनिकों, पशुओं आदि को भी दफ़नाया गया था। हम लोग उस टेराकोटा की फौज के खुदाई स्थल को देखने गये तो रास्ते में और प्रदर्शन करने वाले दिखे। मालूम चला कि एक उदारवादी नेता हू याओबाँग की मृत्यु हो गयी थी और लोग, विषेशकर विद्यार्थी, जनताँत्रिक सुधारों के लिए प्रदर्शन कर रहे थे।

दूसरे दिन दोपहर को जब हमारे हवाई जहाज़ के इँजिन की मरम्मत हुई तो हम लोग शाम को बेजिंग पहुँचे। अगले दिन, एक जून को सुबह हमारी स्वास्थ्य मंत्रालय में मीटिंग थी, उस समय बारिश आ रही थी। मंत्रालय से हमें लेने कार आयी तो रास्ते में तिआन-आँ-मेन स्कावर्य के पास से गुज़रे। तब मंत्रालय के सज्जन ने हमे बताया कि वहाँ भी विद्यार्थी हड़ताल कर रहे थे। उस समय बारिश तेज़ थी, इसलिए हम लोग कार से नहीं उतरे, वहीं कार की खिड़की से ही मैंने कुछ विद्यार्थियों की एक-दो तस्वीरें खींची। बारिश में भीगते, ठँडी में ठिठुरते उन युवकों को देख कर वह प्रदर्शन कुछ विषेश महत्वपूर्ण नहीं लग रहा था।

उसी दिन रात को हम लोग बेजिंग से वापस इटली लौटे। मेरे पास केवल एक दिन का कपड़े और सूटकेस बदलने का समय था, तीन जून को मुझे अमरीका में फ्लोरिडा जाना था। चार तारीख को शाम को जब फ्लोरिडा के होटल में पहुँचा तो वहाँ टीवी पर बेजिंग के तिआन-आँ-मेन स्कावर्य में टैंकों की कतारों और मिलेट्री के प्रदर्शनकारी विद्यार्थियों पर हमले को देख कर सन्न रह गया। तब सोचा कि दुनिया ने बेजिंग में जो हो रहा था, केवल उसे देखा था, क्या जाने सियान जैसे शहरों में प्रदर्शन करने वाले नवजवानों पर क्या गुज़री होगी।

मैं उसके बाद भी चीन बहुत बार लौटा और उस देश को काया बदलते देखा है। मेरे बहुत से चीनी मित्र भी हैं, लेकिन उस पुराने चीन के डँडाराज को कभी नहीं भुला पाया।

अंत में

काम के लिए तीस-पैंतीस सालों तक मैंने इतनी यात्राएँ की हैं, कि अब यात्रा करने का मन नहीं करता। आजकल मेरी यात्राएँ अधिकतर भारत और इटली, इन दो देशों तक ही सीमित रहती हैं। बहुत से देशों की यात्राओं के बारे में मुझे कुछ भी याद नहीं, क्यों कि होटल और मीटिंग की जगह के अलावा वहाँ कुछ अन्य नहीं देख पाया था।

उन निरंतर यात्राओं से मैं पगला सा गया था। जैसे कि, नब्बे के दशक में एक बार मुझे भारत हो कर मँगोलिया जाना था। मैं दिल्ली पहुँचा तो हवाई अड्डे से सीधा आई.टी.ओ. के पास मीटिंग में गया और उसके समाप्त होने के बाद सीधा वहाँ से हवाई अड्डा लौटा और बेजिंग की उड़ान पकड़ी। दिल्ली में घर पर माँ को भी नहीं मालूम था कि मैं उस दिन दिल्ली में था और उनसे बिना मिले ही चला आया था। इसी तरह से एक बार मैं पश्चिमी अफ्रीका के देश ग्विनेआ बिसाऊ में था। रात को नींद खुली तो सोचने लगा कि मैं कौन से देश में था? बहुत सोचने के बाद भी मुझे जब याद नहीं आया कि वह कौन सा देश था तो होटल के कागज़ पर शहर का नाम खोजा। (नीचे की तस्वीर दक्षिण अमरीकी देश ग्याना की एक यात्रा से है।)

Sunil in Rupununi, near the Brazilian border, in Guyana


इसीलिए उन दिनों में जब कोई मुझे कहता कि कितने किस्मत वाले हो कि इतने सारे देश देख रहे हो, तो मन में थोड़ा सा गुस्सा आता था, लेकिन चुप रह जाता था। शायद यही वजह है कि कोविड की वजह से कहीं बाहर न निकल पाने, कोई लम्बी यात्रा न कर पाने का मुझे ज़रा भी दुख नहीं हुआ। अब ढाई साल के गृहवास के बाद भारत लौटने का सोच कर अच्छा लगता है क्योंकि परिवार व मित्रों से मिलने की इच्छा है।

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शनिवार, अगस्त 13, 2022

यादों की संध्या

संध्या की सैर को मैं यादों का समय कहता हूँ। सारा दिन कुछ न कुछ व्यस्तता चलती रहती है, अन्य कुछ काम नहीं हो तो लिखने-पढ़ने की व्यस्तता। सैर का समय अकेले रहने और सोचने का समय बन जाता है। शायद उम्र का असर है कि जिन बातों और लोगों के बारे में ज़िन्दगी की भाग-दौड़ में दशकों से नहीं सोचा था, अब बुढ़ापे में वह सब यादें अचानक ही उभर आती हैं।

यादों को जगाने के लिए "क्यू" यानि संकेत की आवश्यकता होती है, वह क्यू कोई गंध, खाना, दृश्य, कुछ भी हो सकता है, लेकिन मेरे लिए अक्सर वह क्यू कोई पुराना हिंदी फ़िल्म का गीत होता है। बचपन के खेल, स्कूल और कॉलेज के दिन, दोस्तों के साथ मस्ती, पारिवारिक घटनाएँ, जीवन के हर महत्वपूर्ण समय की यादों के साथ उस समय की फ़िल्मों के गाने भी दिमाग के बक्से में बंद हो जाते हैं। इस आलेख में एक शाम की सैर और कुछ छोटी-बड़ी यादों की बातें हैं।


आज सुबह से आसमान बादलों से ढका था, सुहावना मौसम हो रहा था, हवा में हल्की ठँडक थी। सारा दिन बादल रहे लेकिन जल की एक बूँद भी नहीं गिरी। शाम को जब मेरा सैर का समय आया तो हल्की बूँदाबाँदी शुरु हुई। पत्नी ने कहा कि जाना है तो छतरी ले कर जाओ, लेकिन मैंने सोचा कि थोड़ी देर प्रतीक्षा करके देखते हैं, अगर यह बूँदाबाँदी नहीं रुकेगी तो छतरी ले कर ही जाऊँगा। पंद्रह मिनट प्रतीक्षा के बाद बाहर झाँका तो बादलों के बीच में से नीला आसमान झाँकने लगा था। इस वर्ष अक्सर यही हो रहा है कि बादल कम आते हैं और अक्सर बिना बरसे ही लौट जाते हैं। हमारे शहर का इतिहास जानने वाले लोग कहते हैं कि ऐसा पहली बार हुआ कि हमारे घर के पीछे बहने वाली नदी में करीब आठ महीनों से पानी नहीं है। पूरे पश्चिमी यूरोप में यही हाल है।

खैर मैंने देखा कि बारिश नहीं हो रही तो तुरंत जूते पहने और हेडफ़ोन लगा लिया। शाम की सैर का समय कुछ न कुछ सुनने का समय है। कभी डाऊनलोड किये हुए हिंदी, अंग्रेज़ी या इतालवी गाने सुनता हूँ, कभी हिंदी के रेडियो स्टेशन तो कभी क्लब हाऊस पर कोई बातचीत या गाने के कार्यक्रम। आज मन किया विविध भारती सुनने का। यहाँ शाम के साढ़े सात बजे थे, तो मुम्बई से प्रसारित होने वाले विविध भारती के लिए रात के ग्यारह बजे थे और चूँकि आज गुरुवार है, मुझे मालूम था कि इस समय सप्ताहिक "विविधा" कार्यक्रम आ रहा होगा, जिसमें अक्सर हिंदी फ़िल्मों से जुड़ी हस्तियों के साक्षात्कारों की पुरानी रिकोर्डिंग सुनायी जाती हैं।

मोबाईल पर विविध भारती का एप्प खोला तो कार्यक्रम शुरु हो चुका हो चुका था और पुराने फ़िल्म निर्देशक, लेखक तथा अभिनेता किशोर साहू की बात हो रही थी। उनका नाम सुनते ही मन में "गाईड" फ़िल्म की बचपन एक याद उभर आयी। तब हम लोग पुरानी दिल्ली में फ़िल्मिस्तान सिनेमा के पास रहते थे। वह घर हमने १९६६ में छोड़ा था, इसका मतलब है कि वह याद इससे पहले की थी। मन में उभरी तस्वीर में एक दोपहर थी, नानी चारपाई पर चद्दर बिछा कर, उस पर दाल की वणियाँ बना कर सुखाने के लिए रख रही थी। बारामदे के पीछे खिड़की पर ट्राँज़िस्टर बज रहा था जिस पर उस दिन पहली बार किशोर कुमार और लता मँगेशकर का गाया गीत, "काँटों से खींच के यह आँचल, तोड़ के बँधन बाँधी पायल" सुना था। एक पल के लिए मैं उस आंगन में नानी को देखता हुआ सात-आठ साल का बच्चा बन गया था, यह याद इतनी जीवंत थी।

बचपन में पापा हैदराबाद में थे और माँ अध्यापिका-प्रशिक्षण का कोर्स कर रही थी और उसके बाद उन्हें नवादा गाँव के नगरपालिका के प्राथमिक स्कूल में नौकरी मिली थी, तो मैं और मेरी बहन, हम दोनों नानी के पास ही रहते थे। नानी और माँ में केवल अठारह या उन्निस साल का अंतर था, इसलिए मेरी सबसे छोटी मौसी उम्र में मेरी बड़ी बहन से छोटी थी।

नानी जब पैदा हुई थी तो उनकी माँ चल बसी थीं, इसलिए नानी अपनी मौसी के पास बड़ी हुईं थीं और उनके मौसेरे भाई, इन्द्रसेन जौहर, अपने समय के प्रसिद्ध फ़िल्म अभिनेता और निर्देशक बने थे। नानी की शादी करवाने के बाद उनके विधुर पिता ने नानी की उम्र की लड़की से शादी की थी, इस तरह से नानी की पहली संतानें भी उनके पिता की अन्य संतानों से उम्र में बड़ी थीं, और नानी के सबसे छोटे भाई मेरे हमउम्र थे।

नानी सुबह उठ कर अंगीठी जलाती थी। घर में एक कोठरी थी, जिसमें कच्चा और पक्का कोयला रखा होता था। अंगीठी की जाली पर नानी पहले थोड़ा सा कच्चा कोयला रखती, और उसके ऊपर पक्का कोयला। फ़िर नीचे राख वाली जगह पर कागज़ जलाती जिससे कच्चे कोयले आग पकड़ लेते। वह राख भी जमा की जाती थी, उससे बर्तन धोये जाते थे और उसे गाय या भैंस के गोबर में मिला कर उपले बनाये जाते थे।

उपलों को नानी अपनी पश्चिमी पंजाब के झेलम जिले की भाषा में "गोया" कहती थी। लेकिन उस घर में उपले कम ही बनते थे शायद क्योंकि शहर में गोबर आसानी से नहीं मिलता था। नानी का गाँव वाला घर जिस पर नाना ने "दीवान फार्म" का बोर्ड लगा रखा था, नवादा और नजफ़ गढ़ के बीच में ककरौला मोड़ नाम की जगह से थोड़ा पहले था। जहाँ नानी की रसोई थी, वहाँ अब "द्वारका मोड़" नाम के दिल्ली मेट्रो स्टेशन की दायीं सीढ़ियाँ हैं और जहाँ उनका बड़ा वाला कूँआ था वहाँ अब मेरे मामा के बनाया एक स्कूल चलता है। बचपन में वहाँ मैं अपनी छोटी मौसियों के साथ तसला ले कर गोबर उठाने जाता था। अगर आप ने कभी गोबर नहीं उठाया तो शायद आप को उसे हाथ से छूने या उठाने का सोच कर अज़ीब लगे, लेकिन बचपन में मुझे ताज़े गोबर की गर्मी को हाथ से छूना बहुत अच्छा लगता था। गाँव वाले उस घर में, दूध, दाल, सब्जी, हर चीज़ में उपलों की गंध आती थी।

आज उत्तरपूर्वी इटली में, दिल्ली से हज़ारों मील दूर, किशोर साहू के नाम और उनकी बातों से, साठ वर्ष पहले की यह सब यादें एक पल के लिए मन में कौंध गयीं, एक क्षण के लिए उपलों की गंध वाले उस खाने की वह सुगंध भी जीवित हो उठी।

किशोर साहू के बाद बात हुई पुरानी फ़िल्म अभिनेत्री मनोरमा की। उनका मुँह बना कर और आँखें मटका कर अभिनय करना मुझे अच्छा नहीं लगता था। उनकी बातें सुन रहा था तो मन में हमारे करोल बाग वाले घर की यादें उभर आयीं। तब दिल्ली में नियमित दूरदर्शन के कार्यक्रम आते थे, जिनमें मेरे सबसे प्रिय कार्यक्रम थे चित्रहार और फ़िल्में। छयासठ से अड़सठ तक हम उस घर में तीन साल रहे और उन तीन सालों में दूरदर्शन पर बहुत फ़िल्में देखीं। तब रंगीन टीवी नहीं होता था और टीवी कम ही घरों में थे। बिना जान पहचान के हम बच्चे मोहल्ले के आसपास के किसी भी टीवी वाले घर में घुस जाते थे, कभी किसी ने मना नहीं किया। हम लोग टीवी के सामने ज़मीन पर पालथी मार कर बैठ जाते।

तब रामजस रोड पर एक स्कूल में भी शाम को फ़िल्म आती तो वहाँ की एक अध्यापिका आ कर टीवी वाला कमरा खोल देती थीं, वहाँ खूब भीड़ जमती। उन सालों की दूरदर्शन पर देखी मेरी प्रिय फ़िल्मों में से वैजयंतीमाला की "मधुमति", मधुबाला की "महल", नूतन की "सीमा" और राजकपूर की "जागते रहो" थीं।

उन फ़िल्मों के बारे में सोचते हुए, उस समय सैर करते करते मैं हमारी सूखी हुई नदी के पुल पर पहुँच गया। वहाँ खड़े हो कर पहाड़ों के पीछे डूबते सूरज को देखना मुझे बहुत अच्छा लगता है, क्योंकि उस जगह पर पहाड़ों से घाटी में नीचे आती हुई बढ़िया हवा आती है। इस साल पानी न होने से पहले तो नदी के पत्थरों के बीच में लम्बी घास उग आयी थी, शायद उसे नदी के तल के नीचे की धरती में छुपी उमस मिल गयी थी। फ़िर भी जब पानी नहीं बरसा तो वह घास बहुत सी जगह पर सूख कर पीली सी हो गयी है, इस तरह से पुल से देखो तो संध्या के डूबते सूरज की रोशनी में नदी के तल पर बिछी घास के हरे और पीले रंग बहुत सुंदर लगते हैं। नदी के किनारे लगे पेड़ों के पत्ते जब सर्दी शुरु होती है तो सितम्बर के अंत में पीले और लाल रंग के हो कर गिर जाते हैं, लेकिन इस साल सूखे की वजह से अभी अगस्त के महीने में ही वह पत्ते पीले पड़ रहे हैं। बादलों से ढके आकश में प्रकृति के यह सारे रंग बहुत मनोरम लगते हैं।



पुल पर ही खड़ा था, जब विविध भारती पर आ रहे कार्यक्रम में शम्मी कपूर की बात होने लगी। उनकी एक पुराने साक्षात्कार की रिकार्डिंग सुनवायी जा रही थी। थोड़ा सा आश्चर्य हुआ यह जान कर कि वह अच्छा गाते थे। उस साक्षात्कार में उन्होंने "तीसरी मंजिल", "एन ईवनिंग इन पैरिस" जैसी फ़िल्मों के कुछ गाने गा कर सुनाये।

शम्मी कपूर के नाम से उनकी फ़िल्म "कश्मीर की कली" और फ़िर नानी के घर की याद आ गयी। घर के पास, ईदगाह को जाने वाली सड़क के पार एक फायर ब्रिगेड का स्टेशन होता था, जिसके सामने मैं सुबह स्कूल की बस की प्रतीक्षा करता था। वहीं पर फायरब्रिगेड में काम करने वाले एक सरदार जी से जानपहचान हो गयी थी। उनके पास एक छोटा सा पॉकेट साईज़ का ट्राँज़िस्टर था जिसमें इयरफ़ोन लगा कर सुनते थे। उन्होंने एक दिन मुझे वह इयरफ़ोन लगा कर रेडियो सुनवाया तो उस समय उसमें "कश्मीर की कली" फ़िल्म का गीत आ रहा था, "यह चाँद सा रोशन चेहरा, ज़ुल्फ़ों का रंग सुनहरा"। आज शम्मी कपूर जी की आवाज़ सुनी तो अचानक उस गीत को सुनने की वह याद आ गयी।

जब हम लोग करोल बाग में रहने आये, उन दिनों में मैं रेडियो पर नयी फ़िल्मों के गाने सुनने का दीवाना था, कोई भी गाना एक बार सुनता था तो उसकी धुन, शब्द, फ़िल्म का नाम, गाने वाले, लेखक, सब कुछ याद हो जाता था, इसलिए जब अंताक्षरी खेलते तो मैं उसमें चैम्पियन था। उन्हीं दिनों में दूरदर्शन पर पुरानी फ़िल्में देखने लगे थे तो सपने देखता कि जब बड़ा होऊँगा और पास में पैसा होगा तो सब फ़िल्मों को देखूँगा। आज तकनीकी ने इतनी तरक्की कर ली कि वह सारी फ़िल्में जो बचपन में देखना चाहता था और नहीं देख पाया था, अब जब चाहूँ तो यूट्यूब पर उनको देख सकता हूँ, तो क्यों नहीं देखता?

सैर से वापस घर लौटते समय सोच रहा था कि इन पचास-साठ सालों में दुनिया कितनी बदल गयी। बचपन का वह मैं, अगर उसे मालूम होता कि एक समय ऐसा भी आयेगा कि दुनिया में कहीं भी, किसी से बात करलो, जो मन आये वह संगीत सुन लो या फ़िल्म देख लो, तो उसे कितनी खुशी होती, और वह क्या क्या ख्याली पुलाव पकाता। 

अन्य दिनों में इस तरह की यादें, घर लौटने के दस मिनट में रात को देखे सपनों की तरह गुम हो जाती हैं, लेकिन आज सोचा है कि अपने ब्लाग के लिए इन्हें शब्दों में बाँध लूँगा।

शुक्रवार, जुलाई 29, 2022

इटली की वाईन संस्कृति

मेरे इस आलेख का शीर्षक पढ़ कर शायद आप सोच रहे होगे कि शराब का संस्कृति से क्या लेना देना, शराब तो संस्कृति के विनाश का प्रतीक है? आज के भारत में एक ओर से शहरों में रहने वालों में शराब पीने वालों में वृद्धि हुई है। दूसरी और से "शराब बुरी चीज़ है", शराबबँदी होनी चाहिये जैसी सोच वाले लोग भी हैं और बिहार तथा गुजरात में शराब पीना गैरकानूनी है।



खैर, इस आलेख में भारत की बात कम है, बल्कि इटली तथा दक्षिण यूरोप की वाईन पीने की संस्कृति की बात है।

कल रात की बात

कल रात को हम लोग कुछ मित्रों के साथ तरबूज खाने गये। हमारे घर से करीब तीन किलोमीटर दूर एक छोटा सा गाँव है जहाँ के लोग मिल कर हर साल गर्मियों में तरबूज-समारोह आयोजित करते हैं जिसे "अँगूरियारा" कहते हैं। इस समारोह में आप खेतों के बीच में बैठ कर संगीत सुन सकते हैं, नाच सकते हैं और तरबूज, सैंडविच, तले आलू जैसी चीज़ें खा सकते हैं।

इसका सारा काम गाँव वाले लोग स्वयंसेवक की तरह बिना पगार लिये करते हैं। यह दो महीने चलता है, हर सप्ताह में दो या तीन दिन, शाम को आठ बजे से रात के ग्यारह बजे तक। इससे जो भी कमाई होती है, वह सारा पैसा गाँव के स्कूल, स्वास्थ्य क्लिनिक आदि के लिए सामान खरीदने के काम आता है। इस फेस्टिवल को उस गाँव के चर्च के पादरी ने शुरु करवाया था और अभी भी वह स्वयं अन्य स्वंयसेवकों के साथ बीच में काम करते दिख जाते हैं।  

कल रात वहाँ करीब पाँच सौ आदमी जमा थे, उनमें बच्चे, जवान, प्रौढ़, बूढ़े, सभी तरह के लोग थे। बहुत से लोग साथ में वाईन या बियर भी पी रहे थे। हम लोग वहाँ रात को देर तक रुके लेकिन उनमें से एक भी व्यक्ति नहीं दिखा जो शराब के नशे में लड़खड़ा रहा हो या किसी ने किसी लड़की या युवती से बद्तमीज़ी की हो। अधिकतर लोगों ने एक गिलास वाईन या बियर ली थी।

तब सोचा कि ऐसा समारोह अगर भारत में हो तो वहाँ गाँव में खेत में बैठ कर खुलेआम वाईन या बियर पीने ही नहीं दिया जायेगा। भारत में जिन समारोहों में शराब चलती है, जैसे कि विवाह या कोई पार्टी, तो वहाँ विभिन्न उम्र के बच्चे, लड़कियाँ, युवतियाँ नहीं मिलेंगी। साथ ही, अक्सर ऐसे मौकों पर कुछ लोग इतनी पी लेते हैं कि उनके होश काबू में नहीं रहते। कुछ लोग नशे में लड़कियों-युवतियों से छेड़खानी करने लगते हैं और कुछ लोगों को आसानी से गुस्सा आ जाता है, वह आपस में लड़ने लगते हैं।

यह सब सोच कर इटली की वाईन और शराब से जुड़ी संस्कृति की बात मेरे दिमाग में आयी।

प्राचीन समाजों में नशे की परम्पराएँ

एन्थ्रोपोलोजिस्ट (मानव समूहों के विशेषज्ञ) कहते हैं कि लाखों साल पहले से आदिमानवों के पुरखों ने नशा देने वाले पदार्थों को पहचाना और अपनी संस्कृतियों में इनको विषेश महत्व दिये।

वैज्ञानिकों के शोध ने दिखाया है कि मानव ही नहीं, पशु, पक्षी और यहाँ तक कि कीड़े मकोड़ों को भी नशा देने वाले पदार्थ अच्छे लगते हैं। अधिक पके और गले हुए फ़लों में प्राकृतिक शराब बन जाती है, जिनको खा कर पशु और पक्षी ही नहीं, उन फ़लों पर बैठने वाली मक्खियाँ और कीड़े भी नशे में लड़खड़ाने लगते हैं।

मध्य व दक्षिण अमरीकी जनजातियों के पाराम्परिक पुजारी और चिकित्सक शराब के साथ साथ, आयाहुआस्का, कोका तथा अन्य नशीले पदार्थों वाले पौधों को पहचानते थे और उनका नियमित उपयोग करते थे। दक्षिण अफ्रीका में एक शोध ने तीन सौ से अधिक पौधों के बारे में जानकारी एकत्रित की जिन्हें उनके पाराम्परिक चिकित्सक बीमारियों के इलाज में उपयोग करते थे और पाया कि उनमें बहुत से पौधे नशीले पदार्थ वाले थे।

भारत के प्राचीन ग्रंथों वेदों में सोम रस के उपयोग की बातें थीं जबकि सदियों से हमारे ऋषियों और साधुओं ने भाँग तथा चरस जैसे पदार्थों का भगवान की खोज या समझ बढ़ाने के लिए उपयोग किया है। समकालीन भारत के छोटे शहरों और गाँवों में पान मसाला, सुर्ती, पान, ज़र्दा, भाँग, चरस, ताड़ी, देसी शराब जैसे नशीले पदार्थों का सेवन आम बात है।

पाराम्परिक तथा आदिवासी जन समूहों में इन नशीले पदार्थों में शराब का विषेश स्थान रहा है। लगभग हर देश व प्राँत में अपने विषेश तरीके से शराब बनाने की परम्पराएँ रहीं हैं।

यूरोप की वाईन परम्परा

दक्षिण-पश्चिमी यूरोप के देशों में अँगूरों से वाईन बनाने की परम्परा बहुत पुरानी है। यह परम्परा में इटली और फ्राँस में विशेष रूप से विकसित हुई। दुनिया के जिन कोनों में इटली और फ्राँस के प्रवासी गये, वह इस परम्परा को अपने साथ ले गये। इन में हर देश की अपनी वाईन संस्कृति है।

मध्य इटली में दो हज़ार साल पहले रोमन समय का जीवन पोम्पेई में एक ज्वालामुखी के फटने से राख में कैद हो गया था। वहाँ के घरों में और होटलों में वाईन पीने के दृश्य उनकी दीवारों पर बनी तस्वीरों में दिखते हैं और वाईन रखने के बड़े मर्तबानों से इसका महत्व समझ में आता है।

ईसाई धर्म का प्रारम्भ मध्य एशिया में जेरूसल्म में हुआ लेकिन उनके पैगम्बर ईसा मसीह की मृत्यु के बाद उनके सबसे महत्वपूर्ण अनुयायी, जैसे कि सैंट पीटर और सैंट पॉल, इटली में रोमन साम्राज्य में रहने आये और उनका धर्म रोम से पूरे यूरोप में फैला। उनके धार्मिक अनुष्ठानों में वाईन को विषेश स्थान दिया गया और आज भी कैथोलिक गिरजाघरों में पादरी पूजा के समय वाईन पीते हैं।

इटली की वाईन संस्कृति

इटली और फ्राँस, इन दोनों देशों में कोई ऐसा जिला, उपजिला और गाँव मिलना कठिन है जहाँ अपने स्थानीय अंगूरों से वाईन बनाने की परम्परा न हो।

उत्तरपूर्वी इटली में स्थित हमारे छोटे से शहर में, जिसमें आप किसी भी दिशा में निकल जाईये, तीन या चार किलोमीटर से कम दूरी में आप शहर की सीमा के बाहर निकल आयेंगे और वहाँ खेत शुरु हो जायेगे जिनमें हर तरफ़ अंगूरों की खेती होती है। यहाँ लोगों में "हमारे अंगूर, हमारी वाईन" के प्रति बहुत गर्व होता है और अक्सर लोग आपस में बहस करते कि इस साल किसकी वाईन बेहतर हुई है।

हमारे शहर के आसपास कम से सात या आठ किस्म की वाईन बनती हैं। बहुत सारे लोगों के घरों में अपनी वाईन को बनाया जाता है। सबके घरों में बेसमैंट में वाईन की बोतलों को सही तापमान और उमस के साथ संभाल कर रखा जाता है और अधिकाँश लोग एक या दो गिलास वाईन को खाने के साथ पीते हैं।

उत्तरपूर्वी इटली में दो तरह की अंगूर की शराब बनती है। पहली तो है वाईन जिसमें शराब यानि इथोनोल की मात्रा सात से ग्यारह प्रतिशत की होती है। फ्रागोलीनो यानि कच्ची वाईन में फ़लों का स्वाद अधिक महसूस होता है, उनमें इथोनोल की मात्रा कम (तीन या चार प्रतिशत) होती है, लेकिन फ्रागोलीनो वाईन केवल अक्टूबर या नवम्बर में मिलती है, जब अंगूर इकट्ठे किये जाते हैं और वाइन बनाना शुरु करते हैं।

यहाँ की दूसरी शराब को ग्रापा कहते हैं जिसमें इथोनोल की मात्रा अठारह से तीस प्रतिशत के आसपास होती है। ग्रापा को अक्सर बूढ़े लोग अधिक पीते हैं या लोग पार्टियों में पीते हैं। ग्रापा में चैरी, स्ट्राबेरी, शहतूत जैसे फ़लों को डाल कर या उनमें जड़ी-बूटियाँ भिगो कर रखते हैं, इस तरह के विषेश ग्रापा को "डाईजेस्टिव" (पचाने वाले) कहते हैं और अक्सर जब मेहमान हों तो उन्हें खाना समाप्त करने के बाद इसे छोटे गिलासों में पीया जाता है।

हमारा पहाड़ी इलाका है। आज से तीस-चालीस साल पहले तक पहाड़ी गाँवों में वाईन में डुबो कर रोटी को खाना या छोटे बच्चों को थोड़ी सी वाईन पिला कर शांत करवाना, सामान्य माना जाता था। आजकल ऐसा नहीं होता। पहले गाँव वाले लोग समझते थे कि लाल वाईन पीने से  खून बनता है और छोटे बच्चों को एक या दो घूँट लाल वाईन पिलाने को अच्छा माना जाता था। जबकि आजकल लोग जानते हैं कि वाईन के इथोनोल को जिगर में पचाया जाता है और पंद्रह-सोलह साल की आयु तक बच्चों के जिगर में यह पचायन शक्ति नहीं होती इसलिए उनको शराब देने से उनके जिगर खराब हो सकते हैं। इटली के कानून के अनुसार, अठारह साल से छोटे बच्चों को शराब नहीं बेची जा सकती, लेकिन घरों में अक्सर सोलह-सतरह साल के होते होते, बच्चों को थोड़ी बहुत बियर या वाईन को पीने से मना नहीं किया जाता। 

इटली तथा भारत की शराब संस्कृति में अंतर


यहाँ अमीर, मध्यमवर्गी, गरीब, सभी वाईन पीते हैं, वाईन को बिल्कुल न पीने वाले लोग कम ही देखे हैं। यहाँ के अधिकतर लोग खाने के साथ आधा या एक या बहुत हो गया तो दो गिलास वाईन पी लेते हैं, लेकिन नशे में धुत व्यक्ति कोई विरले ही होते हैं।

एक जमाने में यहाँ अंगूर का ग्रापा अधिक पीया जाता था, लेकिन आजकल ग्रापा पीने वाले बहुत कम हो गये हैं, अधिकतर लोग ग्रापा को विशेष अवसरों पर ही पीते हैं। पहले यहाँ बियर पीने वाले बहुत कम होते थे, जबकि पिछले दशकों में यहाँ बियर पीने वाले बढ़े हैं।

अगर आप मुझसे पूछें कि इटली तथा भारत की शराब संस्कृति में क्या अंतर है तो मेरी दृष्टि में सबसे बड़ा अंतर है शराब की मात्रा और उसको पीने का तरीका।

इटली में आप बच्चे होते हैं जब आप परिवार के लोगों को खाने के समय वाईन पीता देखते हैं। लोग अक्सर बच्चों को उँगली से या चम्मच से वाईन का टेस्ट करा देते हैं और कहते हैं कि जब तुम बड़े होगे तो तुम इसे पी सकते हो। थोड़ी सी वाईन पी कर लोग खुल जाते हैं, आसानी से बातें करते हैं, अधिक हँसते हैं या नृत्य करते हैं। इस तरह बच्चे बचपन से देखते हैं और सीखते हैं कि वाईन या बियर किस तरह से सीमित मात्रा में आनन्द के लिए पी जाती हैं, नशे में आने के लिए नहीं। बच्चों को वाईन या बियर चखने से रोका नहीं जाता, ताकि उनमें भीतर वह जिज्ञासा नहीं हो कि यह क्या चीज़ है जिसे घर वालों से छुपा कर करना है।

वाईन हर सुपरमार्किट में खुले आम मिलती है और सस्ती है, घर पर आम पीने वाली डिब्बे में बिकने वाली वाईन एक यूरो की भी मिलती है, जबकि दो या तीन यूरो में आप को अच्छी वाईन की बोतल मिल सकती है। इसे वह बच्चों को नहीं बेचते पर वाईन खरीदना, सब्जी या डबलरोटी खरीदने से भिन्न नहीं है। हर रेस्टोरैंट में, ढाबे में, सड़क के किनारे, लोग वाईन या बियर खरीद या पी सकते हैं, जहाँ लोग एक या दो गिलासों से ऊपर कम ही जाते हैं।

यहाँ पर ज्यादा पीने वालों में और नशे में धुत होने वालों में अधिकतर गरीब लोग, विषेशकर प्रवासी अधिक होते हैं। यह लोग अधिकतर अँधेरा होने के बाद बागों के कोनों में या बैंचों पर बैठे मिलते हैं।

जबकि भारत के मध्यम वर्ग या उच्च वर्ग के घरों में विह्स्की जैसी अधिक नशे वाली शराब अधिक पी जाती हैं। वहाँ लोग खाने से पहले पीते हैं और कई पैग पीते हैं जिनमें व्हिस्की में पानी या सोडा मिलाते हैं। और वहाँ पीने का मतलब है कि पक्का नशा चढ़ना चाहिये। आधा या एक गिलास केवल आनन्द के लिए पीना जिससे नशा नहीं हो, यह भारत में कम होता है। भारत में लोग बियर भी पीते हैं तो कई बोतलें पी जाते हैं क्योंकि लोग सोचते हैं कि शराब पी और पूरा नशा नहीं हो तो क्या फायदा।

अंत में


मेरे विचार में इटली व फ्राँस में दो या तीन हज़ार सालों से वाईन पीने की परम्परा की वजह से यहाँ के लोग उसे जीवन का हिस्सा समझते हैं, अधिकाँश लोग पीते हैं लेकिन सीमित मात्रा में पीने को सामाजिक मान्यता मिली है। यहाँ शराब पीना आम है, नशे में धुत होने वाले कम हैं।



जबकि भारत की व्हिस्की की परम्परा अंग्रेज़ों से आयी है, उनकी संस्कृति प्रोटेस्टैंट ईसाई धर्म से प्रभावित है जिसमें शराब या वाईन पीने को पाप या बुरा काम माना गया है और इसे सामाजिक व पारिवारिक मान्यता नहीं मिली है, बल्कि यह छुप कर करने वाली चीज़ है। वहाँ वाईन और शराब सामान्य जीवन के अंग की तरह नहीं है और वहाँ का समाज इन्हें गंदी बातों की तरह से देखता है। शायद इसी लिए शुक्रवार और शनिवार की रात को लँडन में पबों तथा नाईटकल्बों के बाहर नशे में धुत, जिस तरह के उल्टियाँ करते हुए नवयुवक व नवयुवतियाँ दिखते हैं, वैसे इटली में कभी नहीं देखे। हालाँकि इटली के नाईटक्लबों में अन्य तरह के नशे करने वाले लोग लँडन जितने ही होंगे।

मुझे मालूम है कि पिछले दशकों में महाराष्ट्र तथा कर्णाटक में लोगों ने अंगूरों की खेती तथा वाईन बनाना शुरु किया है। भारत की वाईन पीने की संस्कृति कैसी है? भारत के ग्रामीण समाजों में या आदिवासी समाजों में जो स्थानीय शराबें बनायी जाती हैं, उनके साथ जुड़ी संस्कृति कैसी है और वह इटली या फ्राँस की वाईन संस्कृति से किस तरह से भिन्न है?

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