गुरुवार, सितंबर 01, 2005

यादों के रंग

मुझे काम से उत्तरी इटली जाना था, पत्नी से साथ चलने को कहा, काम के बहाने सैर हो जायेगी. वह बोली कि अगर दो दिन की छुट्टी मिल जाये तो हम लोग स्कियो भी जा सकते हैं. स्कियो, यानि हमारी ससुराल. बहुत दिन हो गये थे ससुराल गये भी तो हमने भी तुरंत हाँ कर दी. वहाँ हमारी बड़ी साली साहिबा इन दिनों घर में अकेली हैं तो प्लेन यह बना कि काम समाप्त होने पर स्कियो से उनको ले कर, आसपास के छोटे छोटे शहरों में दो दिन घूमा जाये.

छोटा सा शहर है स्कियो, उत्तरी इटली में एल्पस के पहाड़ों से घिरा हुआ. इन दिनों में वहाँ मौसम भी अच्छा है, दिन में सुहावना और रात को थोड़ी सी सर्दी. पहाड़ों के अलावा, वहाँ बहुत सी झीलें भी हैं. दो दिन कैसे बीत गये पता ही नहीं चला. बहुत से छोटे शहर देखे जहाँ पहले कभी नहीं गया था या पंद्रह बीस साल पहले गया था.

सारे रास्ते में मेरी पत्नी अपनी बड़ी बहन से बातें करती रहीं. "वो याद है जब हम लोग उस पगडंदी पर साइकल ले कर घूमने गये थे ... वहाँ से केमिस्ट की दुकान से दवाई लेने गये थे ... वहाँ आइसक्रीम कितनी अच्छी थी ... वहाँ की जो मालकिन थी, जिसे बाद में केंसर हो गया था..." उन्ही शहरों में उन्होंने शादी से पहले बहुत बार छुट्टियाँ बितायीं थीं और उनसे जुड़ी हज़ार यादें थीं. हर जगह पहुँच कर सारी कहानी सुननी पड़ती, किसका कहाँ पर क्या हुआ था. शुरु शुरू में तो ध्यान से सुना पर फिर थोड़ी देर में थक गया. मन में सोच रहा था कि ऊपर से जाने हम कितने भिन्न हों, पर अंदर से सारी दुनिया में सभी लोग एक सी होते हैं. भाई-बहन जब बहुत दिनों बाद मिलते हैं और पुरानी जगहों को देखते हैं तो हर जगह एक जैसी ही बातें करते हैं. पुराने मित्रों की, पुराने गानों की, किसकी शादी हुई, कौन मरा, कौन चला गया.

आज की तस्वीरें इसी यात्रा से.

पिछले चिट्ठे के बारे में जिसमे पुराने आने-टकों की बात की थी, स्वामी जी और अतुल ने टिप्पड़ियों में मेरी गलतियों को सुधारा है और अन्य जानकारी भी दी है, दोनो को धन्यवाद.

विचेंज़ा का घंटाघर

लावारोने की झील

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