गुरुवार, दिसंबर 07, 2006

बम और जहाज़

जितनी बार टेलीविजन पर या अखबारों में लंदन में हुए रुसी जासूस के खून की बात पढ़ता हूँ, थोड़ी सी खीझ आती है. हमारे कैंची या क्रीम और शेम्पू ले जाने पर पिछले सालों से हवाई जहाज़ों पर सुरक्षा जाँच के बहाने इतने चक्कर होते हैं और दूसरी ओर ब्रिटिश एयरवेस के कुछ जहाज़ों में रेडियोएक्टिविटी (radioactivity) पायी गयी है, जिसका असर करीब 36 हजार यात्रियों पर पड़ सकता है, यह पढ़ कर सोचता हूँ कि क्या सुरक्षा जाँच करने करवाने का क्या फ़ायदा!

यह बात भी नहीं कि हर हवाई अड्डे के सुरक्षा जाँच नियम एक जैसे हों, और उसी हवाई अड्डे से अमरीका या इँग्लैंड जाने वाले जहाज़ के यात्रियों की जाँच एक तरीके से होती है और अन्य जगह जाने वाले यात्रयों की जाँच दूसरे तरीके से. तो क्या ले जा सकते हें या क्या नहीं, यह मालूम नहीं चलता.

अँग्रेजी पत्रिका इकोनोमिस्ट (Economist) में एक अन्य समाचार पढ़ा था. हवाई जहाज में मोबाईल टेलीफ़ोन के प्रयोग न कर पाने का. हमेशा कहते हैं कि अगर आप जहाज में टेलीफोन का प्रयोग करें तो जहाज के इलेक्ट्रोनिक उपकरणों में खराबी आ सकती है. यह सुन कर मन में डर सा आ जाता है और अगर कोई जहाज़ में मोबोईल का उपयोग करने की कोशिश करे तो उसके आस पास वाले यात्री गुस्से से उसके पीछे पड़ जाते हैं कि क्यों हमारी जान को खतरे में डाल रहे हो! इकोनोमिस्ट के अनुसार, मोबाईल से जहाज़ के उपकरणों को कुछ नहीं होता बल्कि जिस जगह के ऊपर से जहाज़ गुजर रहा है वहाँ के मोबाईल जाल में दखलअंदाज़ी होती है. उनके अनुसार जहाज़ कम्पनियाँ मोबाईल जालों से समझोता कर रही हैं और अगले साल तक यह फैसला हो जायेगा कि कौन इस तरह के मोबाईल प्रयोग से कितना कमायेगा, तब हवाईजहाज़ों यात्रा के दौरान मोबाईल का प्रयोग करना आसान हो जायेगा.

यानि कि सारी बात पैसे के बाँटने की थी?

इस लेख को पढ़ कर मुझे थोड़ा सा दुख भी हुआ. रेलगाड़ी में सफर करते समय मोबाईल पर बातचीत करने वालों से बचना मुश्किल है. कुछ लोग तो अपना कच्चा पक्का सारा चिट्ठा लोगों के सामने बघार देते हैं, और एक से बात करना बँद करते हें तो दूसरे से शुरु कर देते है. हवाईजहाज़ में अब तक इस झँझट से शाँती थी, अगर यह बात सच है तो वह शाँती भी जाती रहेगी.
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नोर्वे ने अपील की है कि गुच्छे वाले बमों (cluster bombs) का प्रयोग निषेध कर दिया जाये. फरवरी 2007 में नोर्वे ने एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया है जिसका विषय होगा कि गुच्छे वाले बमों का बनाना और प्रयोग करना अंतर्राष्ट्रीय कानून में गैरकानूनी घोषित किया जाये जैसे कि मानवघाती माईनस् (antihuman mines) के साथ कुछ वर्ष पहले किया गया था.

मेरा बस चले तो दुनिया के सारे हथियार बनाने बंद हो जायें. कितनी बार यात्राओं के दौरान युद्ध में और युद्ध के बाद बचे हुए बमों से मरने वाले और घायल हो कर हाथ पाँव खोने वाले लोगों को देखा है. जब मानवघाती माईनस् को निषेध करने की बात चली थी तो मैं उनसे पूरी तरह सहमत था.

पर अहिँसावादी निति, सभी हथियार न बनाने की नीति को अव्याव्हारिक माना जाता है. यह मान सकते हें कि युद्ध में भाग लेने वाला सिपाही जब तनख्वाह लेता है तो यह भी मानता है कि मैं अपनी तरफ़ वालों के लिए मरने, कैदी होने, घायल होने के लिए तैयार हूँ. इसलिए युद्ध में उसे मारने के लिए कुछ भी हथियारों का प्रयोग किया जाये, शायद जायज होगा.

पर जब मालूम हो कि हथियार किसी सिपाही को मारने के लिए नहीं हों बल्कि सारे क्षेत्र को असुरक्षित करने के लिए हों जिनसे युद्ध के बाद भी आम लोग, स्त्री, पुरुष, बच्चे, जिन्होंने युद्ध में भाग लेने की तनख्वाह नहीं ली, वे भी कई सालों तक मरते रहेंगे, तो उन हथियारों का प्रयोग करने वाला जानता है कि वह केवल सिपाहियों को नहीं मार रहा, बल्कि आम लोगों को मार रहा है और इस तरह का उपयोग किसी भी हालत में नैतिक नहीं कहा जा सकता.

मानवघाती माईनस् की यही बात थी. ज़मीन के नीचे दबा दो, जब ऊपर से कोई गुजरे तो बम फट जाये. अँगोला, मोजामबीक, लाओस जैसे देशों में युद्धों के समाप्त होने के दस साल बाद तक इनसे लोग मरते और घायल होते रहे.

वैसी ही बात गुच्छे वाले बमों की है. एक बम के भीतर छोटे छोटे कई बम होते हैं, गिरने पर उनमें से बहुत से नहीं फटते, और युद्ध समाप्त होने के बाद जान लेते रहते हैं. द्वितीय महायुद्ध में इनका आविष्कार किया गया था और अमरीका और रुस जैसे देशों ने इनका बहुत सी लड़ाईयों में प्रयोग किया है. अभी हाल में इज़राईल ने जब इनका उपयोग लेबनान में किया तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कुछ हल्ला मचा.

कोई भी बम या माईनस् हों, दुख होता कि स्वतंत्रता और मानव अधिकारों की बात करने वाले देश जो अंतर्राष्ट्रीय हथियारों के बाजार से करोड़ों कमाते हैं, इनके निषेध के लिए तैयार नहीं. मानईस् के निषेध की बात हुई तो अमरीका और रुस जैसे देश इसके लिए तैयार नहीं थे, आज गुच्छे वाले बमों की बात हो रही है तो भी यही देश नहीं मान रहे.

पर मैं नोर्वे के साथ हूँ. और आप?

बुधवार, दिसंबर 06, 2006

दिसम्बरी खिचड़ी

दिसम्बर आता है और क्रिसमस की तैयारी शुरु हो जाती है. घर में "क्रिसमस ट्री" बनाने की बातें होने लगती हैं, कहाँ रखा जायेगा, कितना बड़ा हो, सचमुच का पेड़ लेना चाहिये या नकली, कैसे सजाया जाये, इत्यादि. इस साल घर में पहली बार पुत्रवधु भी है तो सब कुछ अधिक धूमधाम से हो रहा है. सालों की नींद से पुत्र जागा है और इस बार अपनी नववधु को सिखाने और दिखाने के चक्कर में बढ़ बढ़ कर सब काम कर रहा है. वरना पत्नी मेरे पीछे पड़ी रहती, "लाल और नीले रंग की सजावट तो पिछले साल की थी, इस साल कौन से रंग की करें?" इस बार पुत्र और पुत्रवधु का निर्णय है कि क्रिसमस के लिए जो छोटा सा चीड़ का पेड़ खरीदा गया है उसे श्वेत, चाँदी और नीले रंग से सजाया जाये.

पेड़ सजाना तो फ़िर भी आसान है, असली सिरदर्द तो भेंट खरीदने की बहस से होती है.

"किसको क्या दिया जाये? अरे फ़िर से जुराबें, याद नहीं कि पिछले साल भी तो जुराबें ही दी थीं? नहीं दस्ताने नहीं, दो साल पहले दस्ताने ही दिये थे! टोपी नहीं, वह बहुत व्यक्तिगत चीज़ है और अपनी पसंद की ही लेनी चाहिए. तुम्हारा बस चले तो सबको किताबें ही दे दो, नहीं नहीं किताबें नहीं! तुमसे तो बात करना ही बेकार है, तुम क्मप्यूटर पर बैठ कर अपना काम करो, मैं भेंटें अपने आप ही खरीद लूँगी!"

"अच्छा बड़ी दीदी पूछ रही थीं कि तुम्हें क्या दिया जाये? पैसे दे दें, यह क्या बात हुई कि तुम अपने आप खरीद लोगे? सब लोगों की रंगीन पैकेट बने होंगे पेड़ के नीचे, तुम्हारे लिए पैसे रख देगें वहाँ, कैसा लगेगा? नहीं कैमरा तो बहुत मँहगा होगा, दीदी से इतनी मँहगी भेंट माँगना ठीक नहीं. क्यों जुराबों में क्या खराबी है? अच्छा नई टाई कैसी रहेगी? अच्छा कोई परफ्यूम लें तो कैसा रहेगा? हाँ यह ठीक रहेगा. अच्छा लाऊरा पूछे कि तुम्हारे लिए क्या खरीदे तो उसे क्या कहूँ?"
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सिरदर्दी में अचानक मन सपना देखने लगता है. साँभर वड़ा, इडली और मसालेदार चटनी, पेपर दोसा और रवा दोसा के सपने. "एक शाकाहारी उत्तरी भारत की थाली", "एक बटर चिकन", मन ही मन कहता हूँ. "यह वाला पतीसा, वह चमचम, यह बेसन का लड्डू"! अच्छा कौन सी फ़िल्में देखनी है? उमराव जान, धूम २, डोन, जानेमन, बाबुल, विवाह! क्या मालूम कि होटल के पास कोई सिनेमाहाल है कि नहीं जहाँ शाम को मीटिंग समाप्त होने के बाद कोई फ़िल्म देखी जाये?

हाँ शनिवार को भारत जाना है. बँगलोर में प्राकृतिक चिकित्सा पर दक्षिण एशियाई देशों की मीटिंग है जिसके संचालन की ज़िम्मेदारी है. पहले दस दिन बँगलोर में काम करते हुए, फ़िर कुछ दिन घर पर और 28 दिसम्बर को वापस बोलोनिया.

बँगलोर के मित्रों ने बताया कि बँगलोर भी अपना नाम बदलने की ठानी है और अबसे उसे बँगलूरु कहा जाना चाहिये. बधाई हो. मेरा विचार है कि हर भाषा के लोगों को यह अधिकार है कि अपने शहर को अपनी भाषा में पुकारें. पर मेरा विचार था कि यह तो हम हमेशा से करते ही हैं, इसके लिए इतना तमाशा क्यों?

असली झगड़ा अँग्रेजी से लगता है. जहाँ तक मैं समझता हूँ, बँगलोरवासी जब आपस में कन्नड़ में बात करते हैं तो हमेशा ही अपने शहर को बँगलूरु ही कहते आये हैं. उनका यह कहना कि अँग्रेजी में भी उनके शहर को बँगलूरु कहा जाये, समझ में नहीं आता. हर भाषा में शहरों के नामों का उच्चारण भिन्न होता है. जैसे कि इतालवी भाषा में बँगलोर को "बँगलोरे" कहा जाता है. स्वयं इटली में जिस शहर को इतालवी लोग वेनेत्सिया कहते हैं, उसे अँग्रेजी वाले वेनिस कहते हें और जर्मन वाले वेनेडिग कहते हैं.

इन नाम के पीछे होने वाले झगड़ों से लगता है कि असली बात आत्मसम्मान और आत्मविश्वास की है. अगर कन्नड़, मराठी बोलने वालों को लगता है कि उनके शहर बदल रहे हैं, बाहर से आये "विदेशियों" से भर रहे हैं और अपने ही शहर में वह अल्पसँख्यक हो रहे हें और उनकी पूछ कम रही है तो वह इस तरह का बदलाव चाहते हैं? पर क्या इस नाम के बाहरी बदलाव से सचमुच उनकी स्थिति बदलती है? भूमँडलीकरण से आने वाले बदलावों में जो पीछे रह जा रहे हैं वे कैसे प्रगति में अपना हिस्सा पायें, शायद असली प्रश्न यही है?

बर्मा से बना है मयनमार, कौंगो से बना ज़ाईर और कुछ समय बाद दोबारा कौंगो, इन बदलते नामों की बीमारी केवल भारत में नहीं है. शायद यह भूमँडलीकरण का नतीजा है, दुनिया इतनी तेजी से बदल रही है और उन बदलवों को रोक पाना हमारे बस में नहीं है तो अपनी इस शक्तिहीनता को सहारा देने के लिए शहरों के नाम बदलने की बैसाखी खोजने लग जाते हैं. और कुछ न भी हो, दिल को थोड़ा सहारा तो मिल ही जाता हे कि हम भी कुछ हैं, हम भी कुछ कर सकते हैं!
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क्रिसमस के साथ साथ आजकल बोलोनिया में साँस्कृतिक कार्यक्रमों का मौसम है. परसों रात को शहर के प्रमुख स्कावयर में सँगीत का कार्क्रम था जिसमें पारदर्शी टबों में स्विमसूट पहने लड़कियों ने जलपरियों की तरह नहाने का नृत्य किया. कँकपाने वाली सर्दी की रात में उनका इस तरह का नृत्य देख कर हिंदी फ़िल्मों की हीरोईनों की याद आ गयी जिन्हें इसी तरह कम कपड़े पहना कर बर्फ़ में गाने गवाये जाते हैं! कल रात को भारत से आये उस्ताद शाहिद परवेज़ खान का सितार वादन है.

आज की तस्वीरों में हमारा क्रिसमस का पेड़ और जलपरियों का साँस्कृतिक कार्यक्रम.








सोमवार, दिसंबर 04, 2006

दिल के घाव

हमारा घर, हमारी कार, हमारा टेलीविजन, हमारी पत्नी, हमारे बच्चे, जैसे कितनी चीज़ें होती हैं जिन्हें हम अपने जीवन का अभिन्न अंग मानते हैं, कभी जीवन उनके बिना भी हो सकता है, यह सोचा नहीं जाता. "सब माया है, मोह छोड़ दो" जैसी बातें सुन कर भी मन में आता है जब तक जीवन है तब तक मोह माया भी है, जब जीवन ही नहीं रहेगा तो अपने मोह माया छूट जायेंगे. लेकिन अगर जीवन तो रहे पर उसमें से वह सब कुछ खो जाये जिसके सहारे पर हमारे जीवन की नींव टिकी थी, तो?

शरणार्थी हो जाना ऐसी ही घटना है. नाना नानी जब तक जिंदा रहे, उनके लिए पाकिस्तान में भारत विभाजन के समय छूटे घर को खोने का घाव कभी भर नहीं पाया. संयुक्त राष्ट्र संघ के शरणार्थी उच्च कमिशन (यूएनएचसीआर - UNHCR) के साथ मुझे कीनिया, युगाँडा, नेपाल आदि देशों में शरणार्थी केम्प देखने का मौका मिला था. एक बार कश्मीर से आये शरणार्थियों से भी मिला था. जब तक टेलीविजन में दूर से देखो तो लगता है कि फ़िल्म देखी हो, वह सचमुच के लोग नहीं हों, पर करीब से देखने पर यह नहीं सोच सकते. हमारे जैसे ही लोग हैं जो सब कुछ खो चुके हैं, अगर उनके साथ हुआ है तो कल अपने साथ भी हो सकता है. भूचाल, बाढ़, युद्ध, कोई भी बहाना चाहिए नियती को, सब कुछ छीनने के लिए!

पिछले माह यूएनएचसीआर ने हँगरी से आये शरणार्थियों को याद करने की पचासवीं सालगिरह मनायी. 23 अक्टूबर 1956 को बुडापेस्ट में विद्यार्थियों का आँदोलन निकला था जिसके उत्तर में, 12 दिन के बाद, 4 नवम्बर को रूसी सेना ने हँगरी पर हमला किया था. उन दिनों में करीब एक लाख अस्सी हज़ार शरणार्थी हँगरी से आस्ट्रिया में आये थे और अन्य बीस हज़ार शरणार्थी दक्षिण में युगोस्लाविया में आये थे.

आस्ट्रिया में आये शरणार्थियों में थे 19 वर्ष के अँद्रास ग्रोफ़, यानि भविष्य की इंटेल कम्पनी के मालिक, एंड्रूय ग्रोव (Andrew Grove), जो अमरीका में जा कर बसे. उनमें मेरी प्रिय लेखिका अगोता क्रिसटोफ भी थीं जो उस समय 21 वर्ष की थीं और जो स्विटज़रलैंड में जा कर बसीं. अन्य भी जाने कितने लेखक, उद्योगपति, कलाकार, संगीतकार, आम काम करने वाले कितने लोग थे जिनके नाम आज किसी को याद नहीं. उनमें से जाने कितने अपने घरों के साथ अपने भाई बहन, माता पिता को छोड़ कर आये थे, कैसे बिखर गये उनके परिवार, कितने घाव बने उनके दिल पर, जो भरे नहीं पर जिन्हें बाहर औरों को नहीं दिखा सकते थे, अपने मन में छुपा कर जीना था.

रविवार, दिसंबर 03, 2006

आँसुओं में लिखा नाम

मिस्र के पिरामिडों को देख कर करीब दो हज़ार साल पहले के एक रोमन बादशाह, जिसका नाम था काइयो चेस्तियो (Caio Cestio), उसको रोम में पिरामिड बनवाने की सूझी. सदिया बीतीं और रोम से दक्षिण की ओर जाने वाली सड़क विया ओस्तिएन्से (Via Ostiense) पर बना यह पिरामिड समय के धुँधले में खो गया. जिस रास्ते पर राजसी रथ चलते थे, वहाँ घास उग आयी और ग्वाले वहाँ जानवर चराने लगे.

फ़िर करीब दो सौ साल पहले, इसी पिरामिड के साथ साथ एक नया प्रोटेस्टैंट ईसाईयों का कब्रिस्तान बनाया गया जहाँ गैरकेथोलिक ईसाईयों को दफ़न किया जाता था. इटली में रोम में वेटीकेन में केथोलिक धर्म का विश्व केन्द्र बन गया था. उस समय गैरकेथोलिक ईसाईयों के प्रति वेटीकेन का रुख बहुत कड़ा था, उन्हें धर्मभ्रष्ठ मानते थे. इसलिए उस कब्रिस्तान में शरीर केवल रात के अँधेरे में दफ़न किये जा सकते थे. कब्रिस्तान की कोई दीवार नहीं थी और लोग जब मन में आता वहाँ आ कर कब्रों पर तोड़फोड़ करते. किसी भी कब्र पर यह लिखना भी मना था कि "मृतक की आत्मा को भगवान शाँती दें", क्योंकि केथोलिक न होने की वजह से वेटीकेन में कहते थे कि उन्हें भगवान से कुछ भी नहीं मिल सकता था.

खैर इतिहास बदला और दुनिया बदली, विभिन्न धर्मों के साथ साथ रहने की नियम भी बदल गये. आज रोम का यह कब्रिस्तान जिसे उस रोमन बादशाह के पिरामिड के नाम पर काम्पो चेस्तियो (Campo Cestio) कहते हैं, अँग्रेजी पर्यटकों के लिए तीर्थ स्थल जैसा है क्योंकि यहाँ उनके दो प्रसिद्ध कवि, कीटस (Keats) और शैली (Shelley) की कब्रें हैं.

अँग्रेजी के कवि जोह्न कीटस (John Keats) का नाम रोमानी कविताओं के लिए प्रसिद्ध है. उनकी कविताओं में जीवन की क्षणभँगुरता और स्वपनों की अखँडता का मिला जुला दर्द भरा रोमानीपन मिलता है. वे 1820 में रोम आये जब यक्ष्मा से उनका शरीर कमजोर हो चुका था. उस समय यक्ष्मा का कोई इलाज नहीं था. तब लोग कहते कि बारिश वाले ईंग्लैंड में रहने से यक्ष्मा और बिगड़ जाता था जबकि अधिक धूप होने से रोम के मौसम को यक्ष्मा ठीक करने के लिए बेहतर माना जाता था.

उस समय कीटस् केवल 24 वर्ष के थे. उनके साथ थे उनके मित्र सेवेर्न. फरवरी 1821 में उनका रोम में देहाँत हुआ. कुछ ही सालों के लिए उन्होंने कविताएँ लिखीं थीं जिनकी वजह से आज भी उनकी कब्र पर फ़ूल चढ़ाने उनके प्रशँसक आते रहते हैं.

कीटस की कब्र पर लिखा है, "यह वह बदनसीब कवि है जिसका नाम पानी पर लिखा था". कहते हैं कि यह वाक्य स्वयं कीटस ने चाहा था कि उनकी कब्र पर लिखा जाये. उनकी कब्र के सामने ही उनके प्रशँसकों ने एक संगमरमर का पत्थर लगवाया है जिस पर लिखा है, "कीटस अगर तुम्हारा नाम पानी पर लिखा है, तो वह पानी तुम्हारे चाहनेवालों की आँखों से गिरा है."

नीचे तस्वीरों में (1) कीटस और उनके मित्र सेवेर्न की कब्रों के सामने अँग्रेजी पर्यटक, (2) कीटस के प्रशँसकों द्वारा लगवाया संगमरमर का पत्थर, (3) दूसरे कवि, यानि शैली की कब्र और (4) कब्रिस्तान के साथ काईयो चेस्तियो का पिरामिड




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कीटस की कब्र पर लिखे शब्द पढ़े तो मन में बचपन में सुने एक तुकबंदी वाले शेर की याद आ गयीः
हमने उनकी याद में रो रो कर आँसुओं से टब भर दिया
वे आये और उसमें नहा कर चले गये!
शायद यह तुकबंदी कीटस की रुमानी कविताओं का अपमान करने वाली बात हो गयी, पर यही तो खूबी है मानव कल्पना की, अच्छा बुरा नहीं देखती, जहाँ दिल चाहे उस तरफ़ घूम जाती है.

शनिवार, दिसंबर 02, 2006

एक नयी बीमारी

इस बार बात यौन विषय से सम्बंधित है इसलिए सोच समझ कर ही पढ़ियेगा.

जब भी किसी नयी बीमारी की बात सुनने को मिलती है तो मन में पहला विचार आता है कि दवा बनाने वाली कम्पनियों ने पैसे कमाने के लिए कुछ और नया सोचा होगा! नई दवाओं की खोज में बहुत से आदर्शवादी वैज्ञानिक सारा जीवन लगा देते हैं पर वह मुश्किल से करोड़पति बनते हैं, पैसे कमाती हैं दवा बनाने वाली अंतर्राष्ट्रीय कम्पनियाँ. अगर आप को शेयर बाज़ार की जानकारी हो तो अवश्य जानते होंगे कि हथियार बेचने वाली कम्पनियों की तरह, दवाईयाँ बेचने वाली कम्पनियों के शेयर खूब फायदा देते हैं.

जब यह मालूम पड़े कि नयी बीमारी यौन विषय से सम्बंधित है तो शक और भी बढ़ जाते हैं. जिस बीमारी का इलाज करने के लिए वियाग्रा की गोली बनाई गयी, वह बीमारी हमारे जमाने में चिकित्सा शात्र की पढ़ाई में होती ही नहीं थी. दवा बेचने वालों का पहला काम होता है कि पहले आप को यकीन कराया जाये कि आप को कुछ बीमारी है, उसके बाद उस बीमारी का उपचार भी बाज़ार में मिल जायेगा. वियाग्रा की बिक्री इतनी हुई कि बनाने वाली कम्पनियों ने करोड़ों बटोरे. पिछले वर्ष सुना था कि वे कम्पनियाँ परेशान हैं कि वियाग्रा की गोली केवल पुरुषों के काम आती है, और सोच रही हैं कि कैसे ऐसी बीमारी औरतों के लिए भी बनाई जाये, ताकि उसके लिए भी गोली बेची जा सके.

खैर आज जिस नयी बीमारी की बात कर रहा हूँ वह यौन विषय से ही सम्बंधित है और उसका समाचार अँग्रेजी की प्रतीष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका न्यू साईंटिस्ट (New Scientist) पर निकला है. यह बीमारी कुछ कुछ नींद में चलने की बीमारी से मिलती जुलती है. इसका नाम रखा गया है सेक्सोमनिया, यानि सोते सोते नींद में अपने साथ सोये साथी के साथ यौन सम्पर्क बनाना. जब व्यक्ति जागता है तो उसे मालूम नहीं चलता कि उसने नींद में क्या किया.

केनेडा में पश्चिमी टोरोंटो में एक शौधकर्ता निक त्राजनोविच ने पिछले वर्ष एक सर्वे किया और उनका कहना है कि यह बीमारी बहुत फैली हुई है पर लोग शर्म के मारे इसके बारे में बात नहीं करना चाहते. एक महिला को यह तब मालूम चला कि उसके पति को यह बीमारी है जब उसने देखा कि बीच रात में यौन सम्बंध करने वाला उसका पति, साथ साथ खुर्राटे लेता रहता था. इस बीमारी का शिकार पुरुष और स्त्रियाँ दोनो ही होती हैं.

न्यू हेम्पशायर के मनोवैज्ञानिक माईकल मनगन नें इस विषय पर शौध और बीमारी से ग्रस्त लोगों को सहारा देने के लिए एक अंतर्जाल पृष्ठ बनाया है स्लीपसेक्स डाट ओरग, दूसरी ओर कुछ लोग जिन पर बलात्कार और स्त्रियों से जबरदस्ती यौन सम्बंध बनाने की कोशिश करने का आरोप था, उन्होंने कहा कि दरअसल यह उन्होंने जानबूझ कर नहीं किया, यह तो उनकी सेक्ससोमनिया बीमारी का नतीजा है.

आप ही बताई कि कहाँ तक इसमे सच है? साथ साथ ही सोच रहा था कि हमारे आयुर्वेद के प्राचीन ग्रँथों में क्या इस बीमारी का वर्णन है?

बुधवार, नवंबर 29, 2006

आलोचना का अधिकार

फ़्योरेल्लो इटली के बहुत लोकप्रिय कलाकार हैं जिन्हें किसी एक श्रेणी में बाँधना कठिन है. गाना गाने, अभिनय करने, नृत्य करने, दूसरों की नकल उतारने, हँसने हँसाने, सबमें वह माहिर हैं. वह टेलीविजन पर कम ही आते हैं और पिछले दो सालों से प्रतिदिन रेडियो पर एक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं, पर जब भी वह टेलीविजन पर आते हैं, वह कार्यक्रम सफ़ल हो जाता है.



कुछ दिन पहले फ़्योरेल्लो ने टेलीविजन पर एक कार्यक्रम में पोप बेनेदेत्तो की नकल उतारी. अगले दिन वेटिकेन के समाचारपत्र ने और स्वयं पोप के प्रेस सम्पर्क अधिकारी ने इसकी आलोचना की, कि फ़योरेल्लो को पोप, जो कि कैथोलिक धर्म के सबसे उच्च पादरी हैं, उनके बारे में इस तरह की घटिया बातें नहीं करनी चाहिए थीं. एक सप्ताह बाद फ़्योरेल्लो दोबारा टेलीविजन पर आये और इस बार वेटीकेन द्वारा की गयी आलोचना की नकल करके उसका मजाक उड़ाया. वेटीकेन की तरफ़ से इस बार आलोचना और भी कड़ी हुई.

इस घटना पर यहाँ की पत्रिका "इंतरनात्सोनाले" ने सम्पादकीय लिखा है जो मुझे विचारनीय लगा. ज्योवान्नी दे माउरो, इस पत्रिका के सम्पादक लिखते हैं, "इस बात पर चिंता होती है कि यह प्रवृति बढ़ती जा रही है कि किसी भी बात पर मतभेद हो तो चर्च अपना दृष्टिकोण हर हाल में जबदस्ती मनवाना चाहता है, बिना यह सोचे की लोगों को सोचने की स्वतंत्रता है और विभिन्न विचार रख कर भी हम शाँति से साथ रह सकते हैं. अगर आप को वह नकल नहीं अच्छी लगी, तो चैनल बदल लीजिये, या फ़िर टीवी बंद करके कोई किताब पढ़िये. यह जिद करना कि उसे कोई भी न देखे, यह कहाँ तक ठीक है?"

कुछ ऐसा ही झगड़ा इन्ही दिनों में एक अन्य इतालवी टीवी फ़िल्म के बारे में हुआ है जिसमें एक इतालवी लेसबियन युवती अपनी स्पेनिश प्रेमिका से स्पेन में विवाह करती है, क्योंकि स्पेन में अब यह नया कानून है जो समलैंगिक युगलों को विवाह की अनुमति देता है. इस बात पर कुछ दिनों तक समाचार पत्रों पर बहुत बहस हुई कि इस तरह का कार्यक्रम शाम को ऐसे समय नहीं दिखाया जाना चाहिये था जब बच्चे भी टेलीविजन देखते हैं या फ़िर, ऐसी फ़िल्में क्या सरकारी चैनल पर दिखाई जानी चाहिये जो कि देश की संस्कृति के विरुद्ध हैं?

मुझे लगा कि यह बहस बेकार की थी. यहाँ टीवी पर शाम को "केवल व्यस्कों के लिए" वाली फ़िल्में आम दिखाई जाती हैं, बस कोने में लाल बिंदू लगा दिया जाता है ताकि माता पिता को मालूम रहे कि यह फ़िल्म उन्हें छोटे बच्चों को नहीं दिखानी चाहिए. अगर नग्नता, सेक्स और हिंसा के दृष्यों को दिखाया जा सकता है तो दो लेसबियन युवतियों के प्यार को दिखाने में क्या परेशानी है? बहस इस लिए भी बेकार लगी क्योंकि लेसबियन युवतियों के बारे में इस फ़िल्म में सेक्स या चुम्बन जैसी कोई बात नहीं थी, फ़िल्म की कथा थी कि कैसे उनमें से एक युवती अपने पिता को बताये कि वह शादी करने वाली है और किससे शादी करने वाली है, यानि परिवारिक कथा थी.

भारत में इस तरह के विषयों पर कुछ भी बात करना कितना कठिन है और किसी भी धर्म या जाति के लोगों को तोड़ फोड़ करके, डराना धमका कर किताब या कला या फ़िल्म पर रोक लगवाना कितना आम हो रहा है, और पुलिस या कानून कुछ नहीं करते, चुपचाप तमाशा देखते हैं! साथ साथ, बात साँस्कृतिक भेदों की भी है. भारतीय सभ्यता में अपने से बड़ों के बारे में, संत माने जाने वाले लोगों के बारे में, सत्ता में होने वाले राजनीतिक नेताओं के बारे में, धार्मिक नेताओं के बारे में, इत्यादि बहुत से ऐसे सामाजिक बँधन से बने हुए हैं जिनके बारे में आम व्यक्तियों की तरह से बात कर पाना बहुत कठिन है. मुझे इतालवी सभ्यता की यह बात कि कोई कितना ही बड़ा क्यों न हो, या कितना भी जाना पहचाना नेता या धर्मगुरु हो, उसके बारे में भी बात करना या किसी विषेश बात की आलोचना करना अपराध न माना जाये. हाँ, इस वैचारिक स्वाधीनता का यह अर्थ नहीं हो सकता कि किसी के व्यक्तिगत जीवन के प्रश्न उछाले जायें या फ़िर हिंसा और नफ़रत के लिए भड़काया जाये.

रविवार, नवंबर 26, 2006

सोचने वाले विज्ञापन?

इतालवी कम्पनी बेनेटोन ने ओलिवियेरो तोसकानी तथा डेविड सिम जैसे फोटोग्राफर और नये तरीके से विज्ञापनों को बनाने के लिए प्रसिद्धि पाई है, जिसकी वजह से उनके बहुत सारे विज्ञापन आज आप आधुनिक कला सँग्रहालयों में देख सकते हैं. जर्मनी में फ्रैंकफर्ट के आधुनिक कला सँग्रहालय ने तो एक पूरा हाल ही इन विज्ञापनों को दिया है.

इनमें से बहुत से विज्ञापनों का मुख्य ध्येय जनता को चौंका कर धक्का देना लगता है और इसके लिए इटली में उनकी बहुत आलोचना भी हुई है. यह भी सच है कि इनमें से बहुत से कुछ विज्ञापन इटली या यूरोप के बाहर कोई अन्य देश आम जनता के लिए प्रयोग नहीं करने देता, क्योंकि वहाँ लोग जल्दी भड़क उठते हैं.

जैसे कि कुछ वर्ष पहले के एक विज्ञापन में एक कैथोलिक पादरी एक नन (साध्वी) को चूम रहा है. चूँकि कैथोलिक धर्म के अनुसार पादरी और नन को ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है, इस विज्ञापन को धर्म विरोधी माना गया और बहुत आलोचना हुई और कुछ ही दिनों में इसे हटा दिया गया. पर कोई दँगे फसाद या मार काट नहीं हुई. अगर इस तरह का विज्ञापन कोई हिंदू या इस्लाम या किसी अन्य धर्म के लिए बनाता तो आप सोच सकते हैं कि उसका क्या असर होता?





पर बेनेटोन का कहना है कि सामाजिक समस्याओं को छुपाने से समाज में बदलाव नहीं आता और उनका ध्येय है कि विज्ञापनों के माध्यम से वे समाज का ध्यान बदलते युग की बदलती समस्याओं की ओर खींचें. अपने कपड़ों और फैशन का विज्ञापन करने के साथ साथ उनकी तस्वीरें माफिया का शिकार व्यक्ति, विकलाँग युवक का अकेलापन,एडस से मरणहीन युवक, समलैंगिक युगल, रँगभेद, जैसी समस्याओं पर भी सोचने को मजबूर करती हैं.

बेनेटोन की चालिसवीं वर्षगाँठ पर उनके विज्ञापनों की एक प्रदर्शनी आयोजित की गयी है, उन्हीं विज्ञापनों में से कुछ नमूने यहाँ प्रस्तुत हैं.




























अगर आप चाहें तो यह पूरी प्रदर्शनी अंतर्जाल पर बेनेटोन के पृष्ठ पर देख सकते हैं.

शुक्रवार, नवंबर 17, 2006

अचानक

गुयाना से वापस आ कर थकान हो गयी थी, पर वैसे सब कुछ ठीक था. उस दिन सुबह साईकल पर दूर तक पहाड़ी पर सैर करने गया. फ़िर दोपहर को सोया और शाम को परिवार के साथ बाहर खाना भी खाया और फ़िर पार्क में सैर भी की. अचानक रात को दर्द से नींद खुली, दाहिने कूल्हे में पीड़ा हो रही थी और करवट बदलने में तकलीफ़ होती थी. सुबह होते होते बुरा हाल था. बिस्तर से ठीक से उठा नहीं जाता, न ही कुर्सी पर बैठा जाता. थोड़ी सी हैरानी हुई कि रात तक तो सब ठीक था अचानक कैसे, क्या हो गया. खैर दवा खाई, सोचा अनजाने में कुछ चोट या धक्का लग गया हो जिस पर उस समय बातों में खोये होने से ध्यान न किया हो. दूसरी रात तो और भी कठिन बीती, दर्द घटने के बजाय बढ़ गया था.

मन में विचार आया फ्राँचेस्को का. हम दोनो इकट्ठे दक्षिण भारत में वैलूर के पास कारीगिरी में एक कोर्स में मिले थे और जल्दी ही दोस्ती हो गयी थी. कुछ वर्षों के बाद उससे अफ्रीका में गिनिया बिसाऊ में मुलाकात हुई जहाँ वह अस्पताल में काम करता था और मैं विश्व स्वास्थ्य संस्थान के लिए एक काम से वहाँ गया था. वह मुझे होटल से अपने घर ले गया, बोला मेरे साथ ही रहो. दक्षिण इटली का रहने वाला था और प्यार हुआ आल्बा से जो बोलोनिया की रहने वाली थी, अफ्रीका से लौटा तो कुछ दिन दोनो बोलोनिया रहे. तब बीच में कभी कभी मिलते रहते थे. फ़िर वे दोनो उत्तरी इटली में आउस्ट्रिया के पास एक अस्पताल में काम करने चले गये तो मिलना कम हो गया. दो साल पहले अचानक सुना कि फ्राँचेस्को की हालत बहुत खराब है, हड्डी का कैंसर हुआ है तो दिल धक्क से रह गया. मैं उससे मिलने गया तो उसका चेहरा देख कर समझ नहीं पाया कि क्या कहूँ. बड़ा बेटा नौ साल का छोटी बेटी दो साल की. छः महीने बाद मृत्यु हो गयी.

जब मन में फ्राँचेस्को का विचार आया तो बची खुची नींद भी गयी और दर्द भी बढ़ गया. कुछ कुछ याद था कि उसका कैंसर कुछ इसी तरह दर्द के साथ प्रकट हुआ था. सुबह सुबह अँधेरे में अस्पताल के एमरजैंसी विभाग में जा कर दिखाने का फैसला किया. जब तक एक्सरे वगैरा होते तीन घँटे बीते और उन तीन घँटों में बहुत सी बातें मन में आईं. जाने पोते या पोती का मुख देखने को मिलगा मरने से पहले? अगले सप्ताह एक जगह रोम में बोलने जाना है और दूसरी जगह फ्लोरैंस में, वहाँ कौन जायेगा? दिसंबर में जो भारत में प्राकृतिक चिकित्सा की अंतर्राष्ट्रीय सभा आयोजित कर रहा हूँ, उसे कौन सँभालेगा? जो उपन्यास लिखने का सपना था वह अधूरा रह जायेगा?

रोज की भागादौड़ी में यह तो कभी याद ही नहीं आता कि अचानक एक दिन सब कुछ समाप्त भी हो सकता है. लगता है कि अभी तो बहुत जीवन बाकी है, बहुत कुछ करना है.

जब एक्सरे की रिपोर्ट आई तो देखा कि हड्डी तो ठीक ही दिख रही थी, यानि कि फ्राँचेस्को को जो कैंसर हुआ था, वह तो नहीं दिख रहा था. फ़िर एमरजैंसी के डाक्टर से बात हुई. वह बोला कि कुछ माँसपेशियों की मोच सी लगती है. नहीं, न ही मुझे कोई मोच आई है और न ही कोई चोट लगी है, अवश्य इसमें कोई अन्य वजह है, मैंने कहा, आप अल्ट्रासाऊँड या कुछ और टेस्ट नहीं कर सकते? मुस्कुराने लगा डाक्टर, बोला पाँच दिन तक दवा ले कर देखिये, अगर न ठीक हो तो बाकी टेस्ट भी करवा लेंगे.

दो दिनों में दर्द बहुत कम हो गया है. अब दोबारा अस्पताल में लौट कर जाने और अन्य टेस्ट करवाने का विचार छोड़ दिया है. हाँ, मृत्यु के करीब होने के बारे में जो सोचा था, वह अभी भी मन को कटोचता है. समय बेकार की बातों में नहीं बिताना, जाने कब अचानक सब कुछ अधूरा छोड़ कर जाना पड़ेगा! पर फ़िर मालूम है कि थोड़े से ही दिनों में यह सब बातें भूल जाऊँगा, और वापस रोज रोज की भागदौड़ में यह याद रखने की फुरसत ही नहीं होगी कि एक दिन मरना भी है.

गुरुवार, नवंबर 16, 2006

नदियों का देश

मैं यहाँ विकलाँग व्यक्तियों के लिए हो रहे समुदाय पर आधारित पुनर्स्थापन कायर्क्रम (community based rehabilitation programme) के सिलसिले में आया हूँ. गुयाना में यह मेरी चौथी या पाँचवी यात्रा है. पहले तो हर बार किसी न किसी के साथ आया था और देश बहुत घूमा था पर यहाँ के भूगोल को ठीक से नहीं समझ पाया था, सारा समय हमारी आपस की बातचीत में निकल जाता था. इस बार अकेला होने के कारण, सोचने और समझने का समय अधिक मिला है, इसलिए सड़कों, रास्तों, शहरों के भूगोल को समझना भी अधिक आसान है.

गुयाना का इतिहास भी अनोखा है. दो सौ साल पहले तक यह देश घने जँगलों से भरा था जिसमें यहाँ के आदिम लोग रहते थे, जिन्हें आजकल अमेरंडियन (american Indians) कहते हैं, कोलोम्बस की याद में जो दक्षिण अमरीका की तरफ़ भारत को खोजते आये थे. फ़िर यूरोप की उपनिवेशी ताकतों ने यहाँ अपना सम्राज्य बनाने की लड़ाईयाँ शुरु कर दीं, कभी फ्राँस वाले जीतते, कभी होलैंड वाले तो कभी अंग्रेज़. होलैंड वालों का यहाँ बहुत दिन तक राज रहा जिसके निशान आज भी यहाँ के लकड़ी के मकानों में, नहरों के जाल में, समुद्री दीवारों और शहरों के नामों में मिलते हैं. होलैंड की तरह ही यहाँ की भूमि का स्तर समुद्र के स्तर से नीचा है इसलिए वे लोग अपने देश की सभी तकनीकों को यहाँ पर लागू कर सके. खैर लड़ाईयों से बचने का उपनिवेशी ताकतों ने फैसला किया और देश को तीन हिस्सों में बाँट दिया, एक बना फ्राँससी गुयाना जो आज भी फ्राँस का हिस्सा माना जाता है, दूसरा बना डच गुयाना जिसे आज सूरीनाम के नाम से जानते हैं तीसरा बना अँग्रेज़ी गुयाना जहाँ मैं इन दिनों में आया हूँ.

यहाँ काम करने के लिए उपनिवेशी ताकतें पहले तो अफ्रीका से गुलाम ले कर आयीं, पर धीरे धीरे अफ्रीका से आये लोगों ने विद्रोह करना शुरु कर दिया और आदेश मानने से इन्कार करने लगे. तब गन्ने के खेतों में काम करने के लिए यहाँ भारत से लोग लाये गये. वैसे तो यहाँ भारत के उत्तर और दक्षिण दोनों ही हिस्सों के विभिन्न प्राँतों से लोग लाये गये पर उनमें पश्चिमी उत्तरप्रदेश और दक्षिणी बिहार के भोजपुरी बोलने वाले लोग सबसे अधिक थे. उन्हें पाँच साल के लिए लाया जाता था और कहा जाता था कि पाँच साल बाद उन्हें वापस भारत ले जाया जायेगा, कुछ वैसा ही था जैसा आज कल गल्फ के देशों में लोगों को काम के लिए ले जाया जाता है. यहाँ आने वाले अधिकतर लोग पुरुष थे जबकि महिलाओं को अधिक नहीं लाया गया था क्योकि उनसे खेतों में उतना काम नहीं ले सकते थे. 1838 में यहाँ भारत से पहला जहाज़ आया, और उसके बाद तो जहाजों की कड़ी ही लग गयी जो बीसवीं शताब्दी के पहले भाग तक चलता रहा. करीब दो लाख चालिस हजार भारतीय यहाँ लाये गये.

कहते हैं कि गुयाना शब्द किसी अमेरिंडियन भाषा से है और इसका अर्थ है नदियों का देश. सच में देश नदियों के जाल से घिरा है, पर उत्तर में अटलाँटिक महासागर की ओर आते आते उन छोटी नदियों से तीन प्रमुख नदियाँ बनती हैं - बरबीस, डेमेरारा और एसेकीबो. नदियों के इलावा सारे उत्तरी भाग में नहरों के जाल बिछा है जिनसे गन्ने के खेतों की ओर पानी ले जाया जाता था. बहुत सुंदर और मनोरम लगती हैं यह नहरें पर अगर सोचिये कि किन हालातों में अफ्रीकी और भारतीय गुलामों ने अपने खून पसीने से, बिना किसी मशीनों के धरती का सीना चीर कर इन्हें बनाया होगा तो मन कड़वा हो जाता है.

(गुयाना यात्रा की डायरी से - चाहें तो पूरी डायरी कल्पना पर पढ़ सकते हैं.)






रविवार, अक्तूबर 22, 2006

टिप्पणी चर्चा

कभी कभी मन में आता है कि टिप्पणियों ने क्या बिगाड़ा किसी का जो उनकी कहीं कोई पूछ नहीं है? रो धो कर चिट्ठा चर्चा के बाद अगर जगह बचे तो कभी कभी लिख देते हैं, "आज की टिप्पणी". यानि चिट्ठे में कुछ भी लिखिये, गरिमामय माना जायेगा और टिप्पणी में भगवद् गीता भी दीजिये तो लोग पूछेंगे नहीं.

यानि कि टिप्पणियाँ चिट्ठा जगत का अफ्रीका हैं, किसी कमज़ोर देवता के बच्चे हैं, समाज के हाशिये से बाहर निकाले विकलाँग हैं या फ़िर अनचाही भारतीय बेटियाँ हैं या देवदास की चँद्रमुखी हैं, जो किसी को उनकी भावना की परवाह ही नहीं है?

आज मेरी तरफ़ से बेचारी टिप्पणियों के शोषण के विरुद्ध उठाये आँदोलन में छोटा सा सहयोग, अपने चिट्ठे पर आई कुछ टिप्पणियों की प्रस्तुती से.

मेरे सबसे प्रिय टिप्पणी लिखने वाले हैं श्री सँजय बेंगाणी जी. उनकी टिप्पणियों में सरलता होती है पर खाली चिट्ठे को देख कर जब मायूसी हो रही हो हो तो उनकी टिप्पणियाँ मन को सहारा देती है. प्रस्तुत है उनकी एक सरल टिप्पणी, "शीर्षक से लगा आप किसी जंगल से सचमुच की नील गाय की तस्वीर उतार लाए हैं. हरी घास पर नीली गाय बहुत भली लग रही हैं. कम से कम यातायात को बाधित तो नहीं करती."

धाँसू डायलाग खोजने के मेरे निमंत्रण पर बहुत सी सुंदर टिप्पणियाँ मिली जैसे अमित का मुगलेआज़म फिल्म का डायलाग, "काँटों को मुरझाने का ख़ौफ़ नहीं होता" और अनुराग श्रीवास्तव का लिखना, "यह पता नही किस फ़िल्म का संवाद है लेकिन सोचने पर मजबूर करता है "हम एक लमहे में सारी ज़िंदगी जी लेते हैं।" पक्का गुलज़ार साहब का लिखा हुआ होगा।"

पर पिछले दिनों में मेरी सबसे प्रिय टिप्पणी मिली प्रियँकर से, 'मेघे ढाका तारा' फिल्म की समीक्षा वाले मेरे चिट्ठे के साथ, "ऋत्विक घटक बहुत बेचैन करने वाले फ़िल्मकार हैं. उनकी फ़िल्मों की पृष्ठभूमि में बार-बार ध्वनित होने वाला विस्थापन, मात्र भौतिक विस्थापन नहीं है . वह ऐसा विस्थापन है जो मन के भीतर भी भावनात्मक स्तर पर घटित हो रहा है . बस इसी जगह मुझे वे बहुत बेचैन करते हैं . पीड़ा से एकमेक एक ऐसा कलात्मक आनंद सृजित करते है ऋत्विक घटक कि हम स्तब्ध रह जाते हैं . इसकी तुलना सिर्फ़ बच्चे के जन्म के समय मां को होने वाली प्रसव पीड़ा और बच्चे के जन्म से उपजी चरम आनन्द और आह्लाद की मिलीजुली अनुभूति से ही की जा सकती है"

छूती है न मन को प्रियँकर की बात? अंत में बात बड़ा लम्बा लिखने या छोटा लिखने की नहीं, कभी कभी टिप्पणी के दो वाक्यों में भी मोती छुपे मिलते हैं.
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कल सुबह करीब दो सप्ताह के लिए दक्षिण अमरीका जाना है, वापस आने पर ही फ़िर मुलाकात होगी.

बुधवार, अक्तूबर 18, 2006

धाँसू डायलाग

चीन की राजधानी बेजिंग में एक कुष्ठ रोग का अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन था जहाँ मैं विषेश अतिथि के लिए निमंत्रित था और भाषण देना था. सोच रहा था कि नयी क्या बात कहूँ. वैसे तो भाषण पहले से लिख कर भिजवाया था पर मैं उससे संतुष्ट नहीं था. खैर भाषण का समय आया और लिखा हुआ भाषण देने के अंत में कुछ नया जोड़ कहने का विचार अचानक ही आया. बोला, "कुष्ठ रोग से हुई विकलांगता वाले लोग आसमान के तारों की तरह हैं, हैं पर दिन की रोशनी में किसी को दिखते नहीं और हमें इंतज़ार है उस रात के अँधेरे का जब हम भी दिखाई देंगे और कोई हमारे बारे में भी सोचेगा."

भाषण समाप्त हुआ तो बहुत तालियाँ बजीं. उन दिनों मैं एक बहुत बड़ी अंतर्राष्ट्रीय संस्था का अध्यक्ष था और जैसा ऐसे पद पर होने से होता है, बहुत लोग भँवरों की तरह आस पास मँडरा रहे थे. उनमें से अनेक लोगों ने भाषण की तारीफ की, पर उस तरह की तारीफ को एक कान से सुन कर दूसरे से निकल करना ही बेहतर होता है. मैं वह वाक्य कैसा लगा, यह सुनना चाहता था. कुछ समय बाद ब्राजील के एक मित्र ने कहा कि हाँ उसे भाषण के अंत में कही वह बात बहुत पसंद आयी तो बहुत अच्छा लगा. सम्मेलन के कुछ दिन बाद इंदोनेशिया की एक जान पहचान की डाक्टर ने मुझे ईमेल भेजा कि मैं उसे वह अंत में कहा गया वाक्य ठीक से लिख कर भेजूँ क्योंकि वह उसे भी बहुत अच्छा लगा था. यानि कि डायलाग में दम था.

यह तो मैं ही जानता था कि वह वाक्य कहाँ से आया था. मेरा नहीं था, चुराया हुआ था. वह वाक्य था हिंदी की फ़िल्म "ज़िंदगी ज़िदंगी" से जिसमें वहीदा रहमान ने सुनील दत्त से कहा था, "हम वो तारे हें जो दिन की रोशनी में दिखाई नहीं देते पर हम हैं, हम हैं!"

यह अभिप्राय है मेरा एक डायलाग को धाँसू डायलाग कहने का, वह वाक्य जिसका गहरा अर्थ हो और जो सोचने पर मजबूर करे. वैसे तो बहुत से फ़िल्मों के डायलाग होते हैं जो जनता को बहुत भाते हैं जैसे "दीवार" में शशि कपूर का कहना, "मेरे पास माँ है", या शोले में संजीव कुमार, अमजद खान और धरमेंद्र के कई डायलाग, जैसे "अब तेरा क्या होगा कालिया?", पर मुझे वह सही मायनो में धाँसू डायलाग नहीं लगते क्योंकि फ़िल्म के संदर्भ से बाहर उनका कोई विषेश अर्थ नहीं बनता.

क्या आप बता सकते हैं अपना कोई ऐसा प्रिय डायलाग जिसे भूल नहीं पाये या जिसका आप के लिए कोई विषेश अर्थ हो?

रविवार, अक्तूबर 15, 2006

बादलों में छिपा तारा

ऋत्विक घटक को सत्यजित राय और मृणाल सेन के साथ बँगला सिनेमा के सबसे उत्तम फिल्मकारों में गिना जाता है. हृषिकेश मुखर्जी की "मुसाफ़िर" और बिमल राय की "मधुमति" जैसी फ़िल्मों की पटकथा लिखने वाले ऋत्विक घटक को अपनी बनाई फ़िल्मों के लिए अपने जीवन में आम जनता की सफलता नहीं मिली पर आज उनकी फ़िल्में सिनेमा परखने वालों में "कल्ट" मानी जाती हैं. ढाका में पैदा हुए ऋत्विक को बँगाल का विभाजन कलकत्ता ले आया पर अपना देस छोड़ने का दर्द उनकी फ़िल्मों में स्पष्ट झलकता है. उनकी मृत्यु 1976 में हुई जब वह केवल ५१ वर्ष के थे.

"मेघे ढाका तारा", यानि "बादलों से ढका तारा" उन्होंने 1960 में बनाई थी, तीन फ़िल्मों की पहली कड़ी के रूप में. इस ट्राईलोजी की अन्य फ़िल्में थीं 1961 की "कोमल गँधार" और 1965 की "सुबर्नरेखा".




कथासारः फ़िल्म प्रारम्भ होती है एक विशालकाय भव्य वृक्ष से, जिसके नीचे से गुज़र कर एक छोटी सी आकृति धीरे धीरे आगे आती है. यह आकृति है नीता (सुप्रिया चौधरी), कोलिज में एम.ए. पढ़ने वाली युवती जो बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर घर वापस आ रही है. झील के पास घास पर बैठे तान लगाते युवक (अनिल चैटर्जी) को देख कर उसके हँसी आ जाती है. वह युवक है शँकर, नीता का बड़ा भाई जो शास्त्रीय सँगीत सीख रहा है और गायक बनने के सपने देखता है. घर पहुँचते पहुँचते, नीता की चप्पल टूट जाती है, किराने वाले की दुकान के सामने से निकलती है तो दुकानदार उसे याद दिलाता है कि उनके उधार को दो महीने हो रहे हैं और उसे अपने पैसों का इंतज़ार है.

घर पर उसकी छोटी बहन गीता (गीता घटक) उसे एक चिट्ठी देती है. चिट्ठी है नीता को चाहने वाले युवक सनत (निरंजन राय) की. सनत चिट्ठी में कहता है, तुम मेरा बादलों में छिपा तारा हो, पर यह कठिनाईयों के बादल एक दिन अवश्य छँट जायेंगे और तब तुम अपनी रोशनी को ले कर चमक उठोगी.
नीता का परिवार बँगलादेश से शरणार्थी बन कर आया है. वर्डवर्थ और यीटस् की कविताँए पढ़ने वाले नीता के पिता बँगला भ्रद्रलोक के प्रतीक हैं जिसके लिए ज्ञान, कविता, सुंदरता जीवन के प्रमुख मुल्य हैं पर घर की गरीबी उस भ्रद्रता के सपनों को यथार्थ से टकराने के लिए मजबूर करती है.

शँकर को सब लोग भला बुरा कहते हें क्योंकि बड़ा बेटा हो कर भी वह कमा नहीं रहा, बल्कि बहन के बल पर जी रहा है, केवल नीता ही भाई को साँत्वना देती है कि एक दिन उसके सपने अवश्य सच होंगे. सनत भौतिकी में शोध कर रहा है और उसे जब पैसा चाहिये होता है तो वह भी नीता का ही दरवाज़ा खटखटाता है. ऐसे में जब नीता के पिता दुर्घटना में टाँग से बेबस हो जाते हैं तो नीता के पास अन्य कोई रास्ता नहीं बचता सिवाय पढ़ाई छोड़ कर नौकरी करने को.

सनत उससे शादी को कहता है पर नीता कहती है कि उसे इंतज़ार करना होगा, वह अपने छोटे भाई बहन को इस तरह नहीं छोड़ सकती. इस डर से कि नीता विवाह करके उनके घर को न छोड़ जाये, नीता की माँ छोटी बेटी गीता को प्रोत्साहन देती है कि वह बड़ी बहन के प्रेमी को रिझाए और सनत शोध कार्य छोड़ कर नौकरी कर लेता है और गीता से विवाह कर लेता है.

नीता चुपचाप आँसू पी कर रह जाती है, केवल शँकर उसका दुख समझता है. धीरे धीरे नीता का अपना कुछ नहीं रहता, घर के लोगों के लिए वह केवल पैसा कमाने वाली मशीन है. सबसे दुतकारा हुआ शँकर, नीता को पिसता देख कर घर छोड़ कर चला जाता है.

जब नीता को मालूम चलता है कि उसे यक्ष्मा (टीबी) है तो वह किससे कहे कि वह बीमार है, उसे समझ नहीं आता. सबसे छोटे भाई को काम पर दुर्घटना से चोट आई है, उसका इलाज करवाना है, उसके लिए खून का इंतजाम करना है. उधर नौकरी और पत्नी से असँतुष्ट, सनत नीता से सुहानुभूति चाहता है पर नीता पीछे हट जाती है. घर में किसी को उसका रोग की छूत न लगे, इसलिए अपना बिस्तर ले कर बाहर की प्रसव कोठरी में रहने चली जाती है. जब खाँसी में खून आने लगता है तो वह उसे भी छुपा लेती है.

बँबई में शँकर को गायक के रूप में सफलता मिली है, वह प्रसिद्ध हो कर घर लौटता है तो सभी उसे घेर लेते हैं. किसी को मोती का हार चाहिये और किसी को दो तल्ले का मकान. शँकर पूछता है कि खोकी यानि नीता कहाँ है और उसे खोजता कोठरी में पहुँचता है. तकिये के नीचे नीता को कुछ छिपाता देख कर शँकर कहता है कि तुम्हारी अभी भी अपने प्रेम पत्र छुपाने की आदत नहीं गयी और आगे बढ़ कर तकिये के नीचे से कपड़ा खींच लेता है और उस पर खून के धब्बे देख कर स्तब्ध रह जाता है.

शँकर नीता को शिलाँग में एक सेनोटोरियम में इलाज के लिए दाखिल करवा देता है. कुछ समय बीत जाता है. शँकर बहन से मिलने आता है. बहन बाहर बैठी पहाड़ों को देख रही है, उसके हाथ में वही पुरानी सनत की चिट्ठी है. भाई को देख कर नीता चिट्ठी फाड़ देती है, "मुझे बादलों के पीछे छुपा तारा नहीं बनना, मैं जीना चाहती हूँ" कह कर भाई से लिपट जाती है.

टिप्पणीः आजकल की अधिकतर फ़िल्में अक्सर मैं एक बार में नहीं देख पाता हूँ, मन ऊब जाता है पर "मेघे ढाका तारा" देखते हुए समय कैसे बीता मालूम ही नहीं चला. 46 साल पहले बनी फ़िल्म पुरानी हो कर भी, कहानी सुनाने के ढँग से पुरानी नहीं लगती. यह बात नहीं कि फ़िल्म में कमज़ोरियाँ नहीं, पर पूरी फ़िल्म एक कविता सी लगती है.

पहले बात करें मुझे लगने वाली कमियों की. फ़िल्म की पटकथा कई कई जगह बनावटी लगती है. सोचने पर लगता है कि फ़िल्म के तीन प्रमुख स्त्री पात्र, सच्ची और त्यागमयी ममता वाली नीता, अपना स्वार्थ, अपनी खुशी देखने वाली, साज सिँगार की शौकीन गीता और कर्कश माँ, स्त्री के तीन विभिन्न रूप दिखाने का बहाना हों, सचमुच के व्यक्ति नहीं. नीता के पिता का भाग निभाने वाला कलाकार करीब से लिए दृष्यों में कम उम्र का लगता है और नीता और शँकर जैसे बच्चों का पिता नहीं लगता. उसका चरित्र भी कुछ नाटकीय सा है.

नीता का इस तरह सब कुछ चुपचाप सहना, उतना बीमार होने पर किसी को कुछ न कहना और बढ़ते रोग के बावजूद काम करती रहती है, अविश्वासनीय सा लगता है. फ़िल्म के अंत में नीता की चीख भी कुछ बनावटी सी लगती है, हालाँकि उसका प्रतीकात्मक महत्व समझ में आता है.

पर यह कमियाँ फ़िल्म की सुंदरता को कम नहीं करतीं. नीता के भाग में सुप्रिया चौधरी बहुत अच्छी हैं. मुझे शँकर के भाग में अनिल चैटर्जी भी बहुत अच्छे लगे. (नीचे तस्वीर में अनिल चैटर्जी एवं सुप्रिया चौधरी) वास्तव में सभी कलाकार, चँदा माँगने वाले युवक से ले कर, सड़क पर चलती नीता जैसी युवती तक और किराने की दुकान के दुकानदार तक, सभी कलाकार असली लगते हैं, कलाकार नहीं.




फ़िल्म की फोटोग्राफी, दृष्यों की अँधेरे और रोशनी के प्रभाव, बहुत सुंदर हैं. अगर आप शास्त्रीय संगीत को पसंद करते हैं तो फ़िल्म के मंत्रमुग्ध करने वाले संगीत को भूल नहीं पायेंगे. जिस तरह बिना कहे ही शँकर नीता के जीवन में होने वाले भूचाल को समझता है वह बहुत अच्छी तरह से दिखाया गया है.
भावात्मक दृष्टी से फ़िल्म बहुत नियँत्रित है और बजाय डायलागबाजी या रोने धोने के, बिल्कुल सीधे साधे ढँग से अपनी बात कहती है और यही फ़िल्म की शक्ति है. मेरा सबसे प्रिय दृष्य वह है जब सकत और गीता की शादी होने वाली है और अँधेरे कमरे में शादी में गाने के लिए नीता अपने भाई से रबीँद्र सँगीत का कोई गीत सिखाने के लिए कहती है.

नीता का अंत में कहना कि वह प्राश्यचित कर रही है, जब गलत हो रहा था उस पर कुछ न कहने और सब कुछ चुपचाप सहने के पाप का प्राश्यचित, आत्मीय रिश्तों में छुपे स्वार्थ पर सोचने को मजबूर करता है. पर साथ ही समाज में नारी और पुरुष के विभिन्न रुपौं का प्रश्न भी उठाता है. अगर नीता बेटा होती तो कहानी क्या होती? कि उस पर परिवार को चलाने की जिम्मेदारी है पर इसका यह अर्थ नहीं कि वह विवाह नहीं कर सकता, तो सकत जैसे समझदार प्रेमी के होते नीता वह क्यों नहीं कर पाती?

शायद शोषण यह नहीं कि नीता नारी है, शोषण यह है कि नीता घर की कमाने वाली हो कर भी परिवार में सम्मान और निर्णय लेने वाला पुत्र का स्थान नहीं पाती बल्कि अपने लिए केवल बाहर की अँधेरी कोठरी पाती है?

फ़िल्म के अंत में शँकर का सड़क पर नीता जैसी एक अन्य लड़की को टूटी चप्पल पहन कर जाते देखता है जो फ़िल्म के कथानक की नीता को उस जैसी शरणार्थी और गरीब परिवारों में रहने वाली सभी युवतियों के शोषण की कहानी बना देती है.

मुझे मालूम है कि कुछ दिनों के बाद यह फ़िल्म अवश्य दुबारा देखूँगा, और जितनी बार देखूँगा कोई और नई बात दिखाई देगी जो पहली बार नहीं दिखी थी.

गुरुवार, अक्तूबर 12, 2006

हमारे बच्चों की धरती

शाम को टेलीविजन देख रहे थे जब एक नया विज्ञापन देखा, अमरीकी केलिफ्रोनिया के आलुबुखारों को बेचने का. विज्ञापन दिखाता है कि हर आलुबुखारा एक चमकीली पन्नी में बंद होगा जैसे बच्चों की टाफी या चाकलेट बेचते हैं. मुझे लगा कि यह विज्ञापन आज की "कूड़ा बढ़ाओ" संस्कृति का ही एक हिस्सा है.

कुछ भी खरीदिये, तो वह अपने साथ डिब्बे, पोलीफोम, कागज़, प्लास्टिक इत्यादि के साथ आता है, जो सीधा कूड़े में जाते हैं. अधिकाँश खरीदी हुई वस्तुएँ भी कुछ समय के बाद कूड़े में ही जाती हैं. भारत में बिगड़ा टेलीविज़न या रेडियो ठीक करवाना अभी भी हो सकता है, पर यहाँ यूरोप में ठीक करवाने की कीमत इतनी लगती है कि यह कठिन हो जाता है.

हमारा सत्तर यूरो का खरीदा सीडी प्लेयर जब खराब हुआ तो मैं उसे दुकान पर ठीक करवाने ले गया. ठीक करवाने के तीस यूरो का बिल जब भरा तो सोचा कि अगली बार कुछ खराबी होगी तो नया लेना ही बेहतर होगा. शाम को कुत्ते के साथ जब सैर को निकलता हूँ तो सड़क के किनारे बने कूड़ा इक्ट्ठा करने वाले डिब्बों के साथ साथ टीवी, फ्रिज, अलमारियाँ, रेडियो, गद्दे, सोफे, सब मिल सकते हैं.

यह कूड़ा कहाँ डालें नगरपालिकाएँ? कोई शहर या नगरपालिका अपने इलाके में कूड़ा जमा करने वाली खान नहीं रखना चाहती.
कहते हैं कि कूड़े से आसपास की सारी धरती का प्रदूषण होता है. हमारे शहर के बाहर की ओर जहाँ लोग नहीं रहते, कूड़े की पहाड़ियाँ बना रहे हैं. जब बहुत ऊँची हो जाती हैं तब उन्हें मिट्टी से ढ़क कर, ऊपर घास लगा कर, सुंदर बना दिया जाता है.

एक तरफ कूड़ा है और दूसरी ओर प्रदूषण. सड़कों पर कारों की भीड़ कम नहीं होती. सुबह सुबह काम पर जाते समय एक के पीछे दूसरी कार लगे देख कर, हर एक कार में देर होने के गुस्से से मुँह फुलाये लोगों के तनावपूर्ण चेहरे देखने को मिलते हैं, पर टेलीविजन और अखबारें यह बात करती हैं कि कारों की बिक्री कम हो गयी है, अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है और सरकार नयी स्कीम निकालती है कि नयी कार खरीदेंगे तो जाने कितनी छूट मिलेगी और फायदा यह कि आप की पुरानी कार सीधा कारों के शमशानघाट पर बिना खर्चे के ले जाई जायेगी.

वही सरकार चिंता व्यक्त करती है कि अरे गर्मी बहुत बढ़ रही है, समुद्र में जल का स्तर ऊपर उठ रहा है, जाने कितने द्वीप पानी में डूब जायेंगे, जाने कितने तूफान आयेंगे, जाने कितने रेगिस्तान बढ़ते जायेंगे और उर्वर धरती को खा जायेंगे. अपने बेचने, खरीदने और फैंकने को कम करने की भी कोई सलाह देता है. कोई मेरे जैसा नासमझ सोचता है कि साइकल पर काम पर जा कर और कार का उपयोग कम करके ही दुनिया को हम बचा सकते हैं.

चीन और भारत में जो विकास हो रहा है, उससे तो और भी खतरा महसूस हो रहा है सबको. अगर भारत और चीन भी विकसित देशों की तरह धरती के बलात्कार में जुट जायेंगे तो दुनिया कहाँ जायेगी, पूछते हैं और सलाह देते हैं कि इन्हें विकास के नये तरीके खोजने होंगे. अपने बच्चों के लिए कल के जीवन की रक्षा करनी है हमें, कहते हैं.

आप देते रहिये सलाह, सभाएँ करिये और नयी नयी योजनाएँ बनाईये. कुछ भी नयी तकनीक जिससे प्रदूषण कम हो सकता है उसे बाँटने के लिए हमें खूब मुनाफा चाहिये, यहाँ तक कि लाखों की जान बचाने वाली दवाईयों को भी हम बिना करोड़ों के लाभ के बिना नहीं बेचना चाहते. सारा जीवन का सबसे बड़ा मंत्र जब व्यापार है और अगर यहाँ का मानव सिर्फ अपना आज का, अभी का सुख देख पाता है, तो भारत और चीन के मानव भी उस जैसे ही हैं, और वहाँ भी बेचने वाले बिक्री बढ़ाने के नये नये तरीके खोज रहे हैं. अगर विकास का यही अर्थ दिया है कि अधिक से अधिक बेचो और फैंकों तो फ़िर चिंता कैसी, सभी को विकसित होने दीजिये. जब साथ साथ ही डूबना है तो हम भी क्यों न मजे ले कर डूबें?
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आज दो तस्वीरें मिस्र की राजधानी कैरो में अल अजहर बाग से जो कि एक पुराने कूड़े के ढेर पर ही बनाया गया है.





सोमवार, अक्तूबर 02, 2006

अंतहीन गणित राग


प्रभाकर पाण्डेय जी का नौ का महिमागान पढ़ा जिसमें उन्होंने राम और सीता जी के नामों के पीछे छुपे अंको का नौ से रिश्ता बताया है तो सोच रहा था कि किस भाषा की वर्णमाला के हिसाब से अंक देखे जाते हैं? अगर हिंदी वर्णमाला में "क" एक के बराबर है तो अंग्रेज़ी के हिसाब से हुआ बारह, यानि तीन. और इतालवी वर्णमाला तो अंग्रेज़ी से भिन्न है. तो यह न्यूमोरोलोजिस्ट यानि अंकज्ञान विषेशज्ञ किस तरह निर्णय लेते हैं कि किस भाषा में अंकों की गिनती करें?

मुझे स्वयं विश्वास नहीं होता कि एकता कपूर को एकककता ककपूर करने से या विवेक को विवैक लिखने से हमारी नियती बदल सकती है. पर शायद मुसीबत में पड़े लोगों को कोई सहारा चाहिए और जिसमें विश्वास हो उसके लिए नाम के अक्षर बदलने से ही शायद किस्मत बदल जाये!

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पर प्रभाकर जी जैसे लोग जिन्हें गणित के अंकों में कविता दिख सकती है, उनसे कुछ जलन होती है. अपने को तो गणित का सवाल पूछिये तो तारे दिखने लगते हैं.

रामानुज जी कहते थे कि समस्त दुनिया में ही गणित छुपा है. यह बात अंतर्जाल और कम्प्यूटरों को जानने से समझ आती है कि यह कम्प्यूटर पटल पर दिखने वाले शब्द, तस्वीरें, संगीत, फिल्म, सब "शून्य" और "एक" का खेल हैं.

शायद यह मानव जीवन भी भगवान का रचा अंतर्जाल ही है जिसमें हर जीवित अजीवित वस्तु कणुओं और अणुओं का खेल है जिसके पीछे छिपी साँख्यकी मायाजाल में खोई है. शायद एक दिन अंतर्जाल पर दिन रात चलने वाले अंतहीन खेलों को भी यही भ्रम होगा कि उनमें भी जीवन है और हम उनके जीवन के लिए भगवान होंगे?

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बारह साल पहले मेरे एक मित्र ने मुझे एक किताब भेंट दी, डगलास आर होफश्टाटेर (Douglas R. Hofstadter) की लिखी हुई जिसका नाम है "गूडल, एशर, बाखः एक अंतहीन तेजस्वी माला" (Gödel, Escher, Bach: an eternal golden braid). इसमें गूडल के गणित प्रमेय (Theorem), बाख के संगीत और एशर के चित्रों के अंतर्निहित समानताओं का विश्लेषण है और यह समझाया गया कि किस तरह संगीत, चित्रकला और गणित एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. स्वयं सारी पुस्तक का ढाँचा बाख की सिमफनी "मुसिकालिशेस ओपफेर" पर आधारित है. इस एक पुस्तक ने होफस्टाटेर को प्रसिद्ध कर दिया.

बहुत बार इस पुस्तक को पढ़ना शुरु किया पर कभी सौ कभी दो सौ पन्ने तक पढ़ कर थक कर उसे रख दिया. कुछ समझ में नहीं आता. एक एक वाक्य को कई बार पढ़ कर भी उसका अर्थ नहीं समझ पाता. तब से यह पुस्तक उन रातों के लिए रखी है जब नींद न आये. दो पन्ने पढ़ कर तुरंत नींद आ जाती है.

खैर आप देखिये एशर के इन चित्रों को और समझने की कोशिश करिये कि सीढ़ियाँ कहाँ जा रही हैं या फ़िर कौन से रंग की मछलियाँ किस तरफ जा रही हैं!





गुरुवार, सितंबर 28, 2006

रक्त की गंध

केनेडा की पत्रिका वालरस में फेरनांद मेसोनिये का साक्षात्कार निकला है जिन्हें अलजीरिया का अंतिम जल्लाद कहा जाता है और जिन्होंने करीब 200 लोगों को मौत की सजा दी थी. वह मृत्युदँड प्राप्त कैदियों को अपने पिता के साथ गिल्योटीन से मारने का काम करते थे. गिल्योटीन में एक भारी चाकू ऊँचाई से कैदी की गर्दन पर गिराया जाता है ताकि एक ही झटके में सिर धड़ से अलग हो जाये.

इस साक्षात्कार में फेरनंद कहते हैं, "खून निकलता है? अरे बहुत खून निकलता है, यह कोई बिजली का करंट देनी वाली कुर्सी नहीं है! पाँच से सात लिटर तक खून निकलता है जब गर्दन कटती है. खून के फुव्वहारे छूटते हैं, दो तीन मीटर दूर तक धार जाकर गिरती है. मानव खून की गंध विषेश होती है, जैसे घोड़े के खून की होती है. घोड़े काटने वाले कसाई के शरीर से जो गंध आती है वह अन्य कसाईयों से नहीं आती. मानव खून को भी तुरंत धोना पड़ता है, नहीं तो बदबू आने लगे. हम गिल्योटीन को भी धोते हैं पर उसपर साबुन नहीं लगाते."

जबकि उनके पिता का काम था ऊपर टँगे चाकू को छोड़ना, फेरनांद का काम था कैदी का सिर को कानों से खींच कर रखना, ताकि वह सिर पीछे न खींच सके. हालाँकि कैदियों के गर्दन पर लकड़ी का पट्टा रखा जाता है जिससे वह सिर पीछे न खींच सकें, फ़िर भी कैदी कितना ही ज़ोर लगा कर अंतिम क्षण में सिर को पीछे खींचने की कोशिश करते हैं. फेरनंद कहते हैं, "अगर ठीक जगह पर चाकू न गिरे तो सिर धड़ से अलग नहीं होता और उसे फ़िर हाथ से चाकू ले कर काटना पड़ता है."

सच कहिये, यह सब पढ़ते हुए आप का मन काँप जाता है या नहीं? मेरा अवश्य काँपा, झुरझुरी सी आई, जी कच्चा हुआ. शायद बीते समय में इन्सान को मार काट और खूण को करीब से देखना मिलता था पर यहाँ तो सुपरमार्किट में कटी मुर्गियाँ और माँस भी प्लास्टिक की पारदर्शी थैलियों में यूँ रखे होते हैं जिसमें एक बूँद खून नहीं दिखता मानो ऐसे ही पैदा होते हुए हों. एक बूँद खून देखने को मिल जाये तो सबकी तबियत खराब होने लगती है. खून दिखता है तो फिल्म में या वीडियोगेम पर, जहाँ वह सच्चा नहीं लगता.

मंगलवार, सितंबर 26, 2006

सबके सामने

वृद्ध प्रोफेसर साहब मेरे गुरु रह चुके थे. बहुत साल हो गये उनको रिटाटर हुए पर कोई भी बड़ी सभा हो तो उनके बिना अधूरी सी लगे. बात हो रही थी सभा के कार्यक्रम की.

मैंने कहा, "अगर कोई व्यक्ति अपनी आत्मकथा कहे, बताये कि उसे कुष्ठ रोग होने से क्या क्या सहना पड़ा, किस भेद भाव से लड़ना पड़ता है इस बिमारी से प्रभावित लोगों को, तो उसका असर अधिक पड़ेगा. और अगर वह व्यक्ति जाना पहचाना और प्रसिद्ध भी है तो और भी अच्छा!"

असल में मैं चाहता था कि प्रोफेसर साहब अपनी कहानी सुनायें, क्योंकि मुझे मालूम था कि प्रोफेसर साहब को स्वयं भी यह रोग हो चुका था. पर वह कुछ नहीं बोले, चुपचाप बैठे रहे, और बात दूसरी दिशा में निकल गयी.

कुछ समय के बाद मैंने फ़िर से कोशिश की और वही बात दोबारा उठायी. बोला, "मुझे कुछ डर नहीं है, मैं ही सबके सामने कह सकता हूँ कि मुझे कुष्ठ रोग हुआ था पर मेरे पास इसके साथ सुनाने वाली कोई आत्मकथा नहीं है."

शायद प्रोफेसर साहब कुछ समझ गये, थोड़ी देर तक चुप रहे फ़िर धीरे से बोले, "बात केवल अपने आप के लिए डर की नहीं है, यह सोचना पड़ता है कि परिवार पर, बच्चों पर, इसका क्या असर पड़ता है. उनका क्या कसूर है जिसके लिए उन्हें बात सुननी पड़े या तकलीफ़ हो."

मुझे थोड़ी शर्म आयी. अपनी बात कर सकता हूँ पर किसी दूसरे की क्या मजबूरी हो सकती है, उसको न समझ कर उससे अपेक्षा करना गलत है.

आऊटलुक में प्रसिद्ध लेखक विक्रम सेठ का लम्बा साक्षात्कार पढ़ा तो इस बात की याद आ गयी. बहुत सी बातें हैं जिन्हें परम्परागत समाज में कहना और बताना कठिन है. कुष्ठ, यक्ष्मा (टीबी), एडस्, मिर्गी, मानसिक रोग, जैसी बहुत सी बीमारियाँ हैं जिनके होने पर आप को केवल बीमारी से नहीं बल्कि सामाजिक भेदभाव से भी लड़ना पड़ता है और अधिकतर लोग इन बातों को छुपा कर रखने की कोशिश करते हैं. वैसा ही भेदभाव और तिरस्कार बलात्कार की शिकार लड़कियों को, बिन ब्याही माओं को, समलैंगिक लोगों को मिलता है. ऐसे में विक्रम सेठ जैसे जाने माने लेखक का खुल कर स्वीकार करना कि वह द्वीलैंगिक हैं, स्त्रियों और पुरुषों, दोनो से उनके सम्बंध रहे हैं हिम्मत की बात है. सेठ ने यह साक्षात्कार भारतीय कानून की धारा 377 को हटाने के अभियान के सिलसिले में दिया है.

1875 में बना धारा 377 का कानून जो समलैंगिक सम्बंधों को गैरकानूनी कह कर उन्हें दण्डनीय अपराध करार देता है, पिछड़ी मानसिकता का प्रतीक है जब यह माना जाता था कि समलैंगिक सम्बंध विकृति हैं जिसका इलाज किया जाना चाहिये. आज की दुनिया में यह कानून मानव अधिकारों का उल्लघँन माना जायेगा.

बहुत साल पहले अभिनेत्री नीना गुप्ता ने अपने बिन ब्याही माँ होने की बात को खुले आम स्वीकार किया था. केवल किसी एक के कहने से, सब के सामने खुल कर आने से समाज नहीं बदलता, पर शायद उससे बहुत से लोग जो उस स्थिति में छुप कर रह रहे हैं, उन्हें थोड़ा सहारा मिल जाता है कि वह अकेले नहीं.

रविवार, सितंबर 24, 2006

क्या बोलता तुम?


कुछ दिन पहले आमिर खान का नया कोका कोला का विज्ञापन देखा तो कुछ अजीब सा लगा. आमिर खान मुझे अच्छे लगते हैं और उनकी कई फिल्में मुझे बहुत पसंद हैं. उनके पहले भी बहुत से विज्ञापन देखे थे जिनमें वे विभिन्न भेष रुप बदल कर "कोक यानि ठँडा" कहते थे, जो मुझे अच्छे लगे थे, तो फ़िर इस बार क्या हुआ जो ठीक नहीं लगा?

कुछ सोचा पर ठीक से समझ नहीं पाया कि क्यों मुझे अच्छा नहीं लगा, और पिछले कुछ दिनों में जब भी वह विज्ञापन देखने का मौका मिला, बार बार लगता कि इस तरह का विज्ञापन दे कर आमिर खान ने कुछ ठीक नहीं किया.

मैं मानता हूँ कि कोका कोला एक व्यवसायिक कम्पनी है और उसका धर्म है अपना सामान बेचना. दूसरी ओर आमिर खान भी व्यवसायिक अभिनेता हैं और उनका काम है अपनी कला, अपना चेहरा बेचना. अगर किसी जगह पर दोनो के व्यवसायिक सम्बंध बनते हैं तो इसमें अच्छा या बुरा सोचने की बात नहीं, अगर आप को पसंद आये तो ठीक, नापसंद आये तो भी किसी को क्या फ़र्क पड़ता है!

पर कभी कभी अभिनेता भी अपने व्यवसायिक जीवन से बाहर अपने निजी जीवन में अपनी पसंद नापसंद और सही या गलत के विचार रख सकता है. आमिर खान ने कुछ महीने पहले नर्मदा बाँध के बारे जब बोला था तो वह अभिनेता नहीं उनके निजी विचारों की बात थी.

कहने का अर्थ है, अभिनेता पैसे ले कर, भेस बदल कर, किसी के लिखे डायलाग बोल दे तो वह उसका काम है पर अगर वह अभिनेता के पीछे छिपे व्यक्ति की तरफ से जनता के सामने आ कर कुछ कहता तो यह दूसरी बात है. शायद यही बात है जो मुझे अच्छी नहीं लगी, आमिर खान के नये विज्ञापन में, कि इस विज्ञापन में वह उत्तर प्रदेश का भैया या जापानी पर्यटक या खेतों में काम करने वाला पंजाबी युवक बन कर नहीं, स्वयं आमिर खान की तरफ से बात करते हैं.

हो सकता है कि आमिर ने विज्ञापन से पहले कोका कोला के बोतल चढ़ाने के सारे काम को स्वयं ठीक से जाँचा परखा हो, उन्हें पूरा भरोसा हो कि उसको बनाने के पानी में कोई प्रदूषण नहीं है, और उसके पीने में प्रदूषण के पदार्थों की वजह से कोई खतरा नहीं है पर मेरा विचार है कि इसके लिए वह अभिनेता बन कर कोई अन्य रुप धारण करके कहते, अपनी तरफ से नहीं.

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के पास बहुत तरीके होते हैं सच को छुपाने के, उसे घुमा फ़िरा कर दिखाने के, अपनी अपार ताकत के बस पर वह कुछ भी कर सकते हैं.

केरल में आदिवासी महिलाओं के कोका कोला के विरुद्ध आँदोलन के बारे में कुछ पढ़ा था. उनका कहना है कि वहाँ 260 कूँए सूख गये हैं, जो पानी है वह प्रदूषित हो गया है, जब कि कोका कोला वाले गहरे कूँए खोद कर पानी को निकाल सकते हैं. एक लिटर कोका कोला को बनाने के लिए 9 लिटर पानी चाहिए और कोका कोला वहाँ की प्राकृतिक सम्पदा को नष्ट कर रहे हैं. और भी ऐसी अनेक बातें पढ़ीं हैं. क्या वह सब बातें केवल बहूरा्ष्ट्रीय कम्पनियों के विरुद्ध राष्ट्रवादियों की फ़ैलाई अफवाहें हैं?

दुनिया के विभिन्न देशों में बहुराष्ट्रीय कम्पिनयों के इतिहास को पढ़ कर लगता है कि उनकी अपार ताकत से लड़ना आसान नहीं हैं और अपने जन सम्पर्क विभागों द्वारा, ऊँचे अधिकारियों को घूस दे कर और विज्ञापनों से वह किसी को भी झूठा साबित कर सकते हैं. ऐसे में आमिर खान का कोका कोला को अपने काम का नहीं, बल्कि अपने नाम का सहयोग देना मुझे कुछ ठीक नहीं लगा.

सोमवार, सितंबर 18, 2006

शीशे में चेहरा

एक इतालवी पत्रिका में छपा सुश्री इरशाद मनजी का नया लेख सोचने पर मजबूर करता है. इरशाद जैसे विचारकों की बात लोग आसानी से उड़ा सकते हैं. "वह तो लेस्बियन (समलैंगिक) है, कुछ भी उल्टा पल्टा कहती रहती है, विदेशियों की एजेंट है, केवल नाम की मुसलमान है", जैसी बातें कहीं जाती हैं उसके बारे में. जान से मारने की कई धमकियाँ मिल चुकी हैं उसे और केनेडा में उनके घर की खिड़कियाँ गोली से न टूटने वाली (बुलैटप्रूफ) बनी हैं.

इस नये लेख में मुस्लिम आतंकवाद के बारे में लिखा है उन्होंने. लिखती हैं:

इँग्लैंड की मुस्लिम संस्थाओं ने प्रधान मंत्री टोनी ब्लेयर को चिट्ठी लिखी है कि इराक तथा लेबनान में होने वाली बातों से आतंकवादियों को बढ़ावा मिल रहा है. आतंकवादियों को केवल बहाना चाहिये. पहले कहते थे कि आर्थिक भेदभाव होता है मुसलमानों के साथ जिसकी वजह से मुसलमान नवजवान आतंकवाद की ओर बढ़ते हैं और अब इसमें वे विदेश नीति के कारण खोज रहे हैं... अगर उन्हें मुसलमानों के मारे जाने का इतना ही गुस्सा है तो दुनिया के इतने देशों में जो मुसलमान शासन दूसरे मुसलमानों को मार रहे हैं उनके विरुद्ध क्यों नहीं आतंकवाद करते? सूडान में इस्लामी शासन के नीचे अरबी मुसलमान लड़ाकू काली चमड़ी वाले मुसलमानों को लूट रहे हैं, भूखा मार रहे हैं, उनकी औरतों का ब्लात्कार कर रहे हैं, उन पर बम बरसा रहे हैं तो क्यों नहीं बाकी के मुसलमान इसके विरुद्ध बोल रहे हैं? जो पाकिस्तान में सुन्नी मुसलमान, शिया मुसलमानों को मारते हैं तो क्यों नहीं बोलते? मुसलमान दुनिया में कितनी जगह गृहयुद्ध हो रहे हैं उसकी बात क्यों नहीं करते? यह कहना कि आतंकवाद अमरीका के इराक पर हमले की वजह से है या इज़राईल के पालिस्तीनी हमले से, सच को न देखना है. जब देखा कि आतंकवादी पढ़े लिखे, खाते पीते घरों से आ रहे हैं तो आर्थिक भेदभाव और पिछड़ेपन के बात छोड़ कर अमरीका और इज़राईल के बात करने लगे हैं. क्यों नहीं हमारे धार्मिक नेता आतंकवादियों के विरुद्ध फतवे देते?

कुछ भी हो, सब कहते हैं कि हमारा इस्लाम तो शाँती का धर्म है, वह युद्ध और मारना नहीं कहता. फ़िर कहने और करने में जो फर्क है उसे क्यों झुठला रहे हैं हम? जब तक हम यह मानेगें नहीं कि हमारे इस्लाम में ऐसा कुछ है जिससे हमारे नवजवान हिंसा की राह पर जा रहे हें, कैसे उपाय खोजेंगे इसका?

इरशाद जैसे लोगों की बातें सुन पाना और समझ पाना आसान नहीं होगा क्योंकि वह ऐसी बात कहती है जो कड़वी भी है और कठिन भी. कुछ महीने पहले जब डेनमार्क में छपे कार्टून का झमेला उठा था तब भी इरशाद ने कुछ ऐसा ही कहा था. कोई पर्दा नहीं करती इरशाद और खुले आम मानती हैं कि वह समलैंगिक हैं. बीबीसी जैसे प्रमुख टेलिविजन चैनलों पर अपने विचारों के बारे में बोल चुकी हैं. कहतीं हैं कि सभ्यता और परम्परा के नाम पर वह अपने मानव अधिकारों को बलि नहीं चढ़ायेंगी. उनके अंतरजाल पृष्ठ पर लिखा है कि मुस्लिम समाज के बहुत से लोग छिप कर उनके विचारों से सहमती करते हैं पर सामने आने से डरते हैं.

शनिवार, सितंबर 16, 2006

दिल्ली का दिल

बचपन में घर में दूसरे शहरों से मेहमान आते तो कहते, "बाप से बाप, यहाँ दिल्ली में रहना क्या आसान है!"

लखनऊ अधिक सभ्य है, हैदराबाद में लोग कितनी इज़्ज़त से बात करते हैं, बम्बई में यातायात किस तरह नियमों का पालन करते हुए चलता है जैसी बहुत सी बातें सुनने को मिलतीं, यह बतलाने के लिए कि उनके मुकाबले दिल्ली वाले सभ्यताविहीन थे, उनके बात करने में लड़ाकापन था, उनके यातायात में कोई नियम न पालन करने का ही नियम था.

"दिल्ली के लोग या तो पंजाब से आये शरणार्थी हैं जिनका सब कुछ पाकिस्तान में रह गया और सब कुछ खोने के बाद जिन्होंने जीने के लिए लड़ लड़ कर अपने जीने की जगह बनाई है, उनसे सभ्यता की आकाँक्षा रखना बेकार है. दूसरे दिल्ली के रहने वाले देश भर से आये बाबू लोग हैं जो सरकारी दफ्तरों में काम करते हैं, उन्हें दिल्ली अपना शहर ही नहीं लगता, उनके घर तो अन्य प्रदेशों में हैं जहाँ से वे आये हैं, उन्हें इसलिए दिल्ली की कुछ परवाह नहीं है."

तब कहते कि दिल्ली में सभ्यता तब आयेगी जब यहाँ पैदा होने वाली या यहाँ पलने वाली पीढ़ी बड़ी होगी. दिल्ली से उनका अपनापन होगा, दिल होगा उनका इस शहर में, दिल्ली उनका शहर होगा. वे लोग लायेंगे दिल्ली में सभ्यता.

उन बातों को गुज़रे चालीस साल हो गये हैं. कैसी है आज दिल्ली की सभ्यता? अगर कारों की गिनती से, फ्लाईओवरों और विदेशी सामान बेचने वाले मालस् से सभ्यता गिनी जाये तो दिल्ली बहुत सभ्य हो गयी है. व्यक्तिगत आमदनी के मापदँड पर भी दिल्ली ने बहुत तरक्की की है. पर दिल्ली का दिल, उसमें अपने शहर में रहने वालों का प्यार जागा है, इंसानियत जागी है?

दिल्ली के बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट निकली है जिसके अनुसार दिल्ली बच्चों के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक शहर है और औरतों के लिए भी असुरक्षित शहरों के लिस्ट में बहुत ऊपर के स्थान पर है. एक तरफ़ अच्छी बात है कि दिल्ली में पाँच साल से कम वर्ष वाले बच्चों की मृत्यु दर का अनुपात बाकी देश के मुकाबले में बहुत कम है दूसरी तरफ़ बुरी बात कि छोटे बच्चों से काम करवाने में दिल्ली भारत में सबसे उच्च स्थान पर है. देश की राजधानी में पल कर बड़े होने वाले अक्सर यह काम करने वाले बच्चे कोई शिक्षा नहीं पाते. रिपोर्ट के अनुसार, उनमे से एक लाख अस्सी हज़ार बच्चे दिल्ली की सड़कों पर रहते हैं.

ढाबे में बरतन धोते, सड़क किनारे नटी दिखाते, जूते पालिश करने के डब्बे उठाये घूमते, प्लास्टिक तथा कागज़ जमा करते, या फ़िर बाज़ार में आप के पीछे पीछे चल कर भीख माँगते, हर तरफ़ यह बच्चे दिखते हैं. हर बार प्रश्न "भीख दूँ या न दूँ" यहीं तक आ कर रुक जाता है, एक अकेला और क्या कर सकता है? कुछ लोग है जो बाग में बच्चों को जमा कर उन्हें खेल के साथ पढ़ाते भी हैं, पर इन सब बच्चों तक पहुँचने के लिए उनके जैसे कई हज़ार अन्य चाहिये. मुझे बुरा तब लगता है जब किसी को भीख माँगते बच्चे को क्रोध से दुदकारते हुए या गाली देते हुए सुनता हूँ. कुछ भी न देना हो तो न दो, दुदकारते क्यों हो?

जिस घर में बच्चे कोनवेंट में या पब्लिक स्कूल में पढ़ने जाते हैं, उसी घर में सफाई करने वाला, खाना बनाने वाला बच्चा बिना पढ़ लिख कर बड़ा होता है, जो बाकी बच्चों के साथ खेलता नहीं, उनकी तरह खाता नहीं. कब सोता है, कब छुट्टी मिलती है उसे यह मालिक की दया पर निर्भर है, उसके अधिकार कुछ नहीं. कहते हैं कि उसे काम दे कर उस पर अहसान किया गया है, गाँव में जहाँ गरीबी में पैदा हुआ था वहाँ उसे शायद दो वक्त की रोटी न मिल पाती, न ही कोई शिक्षा, न शहर के करिश्मे देखने का मौका, न टीवी पर फ़िल्में आदि. पर उसे काम के साथ थोड़ा सा बचपन जीने का मौका नहीं मिलता और न ही घरेलू नौकर के जीवन से बाहर निकलने के लिए कोई सहारा.

दिल्ली का ही दिल निष्ठुर है शायद ऐसा नहीं है, सारे भारत में यही हाल है पर दिल्ली जैसे महानगरों में और भी अधिक है. हम सब के बीच में भूतों से घूमते यह बच्चे और बड़े, जिन्हें उनकी गरीबी ने पारदर्शी बना दिया है, उन्हें देख कर भी नहीं देख पाते.

गुरुवार, सितंबर 14, 2006

रायमोन पनिक्कर का प्रेम संदेश

आज के युद्ध, बम और आतंकवाद के वातावरण में मेरे विचार में भारत के विचारक और दर्शनशास्त्री दुनिया को विभिन्न धर्मों के आपसी सम्मान और समन्वय से साथ रहने का संदेश दे सकते हैं. बहुत दुनिया देखी है पर भारत जैसा विभिन्न धर्मों के साथ रहने का तरीका किसी अन्य जगह मिलना कठिन है.

बचपन से ही देखा था कि अपना धर्म कुछ भी हो, अन्य धर्मों के पूजनीय स्थलों पर हाथ जोड़ने और प्रार्थना करने में कभी झिझक नहीं होती थी. गुरुद्वारा जाना हो या मस्जिद या बड़े दिन के अवसर पर गिरजाघर, कभी यह नहीं सोचा कि यह हमारा धर्म नहीं है तो कम पूजनीय है. ईद की सेंवियाँ हों या गुरुपर्व की कच्ची लस्सी या फ़िर क्रिसमस का प्लम केक, खाने में भी बिल्कुल नहीं रुके. इसका यह अर्थ नहीं था कि अपने धर्म में विश्वास कम हो जाता था पर दूसरे धर्मों का आदर करना भारत में अधिकतर लोगों के लिए स्वभाविक सी बात है जिसके लिए न सोचना पड़ता है, न किसी को समझाना पड़ता है कि क्यों सिख न होते हुए भी गुरुद्वारे में हाथ जोड़े या ईसाई न होते हुए गिरजाघर में हाथ जोड़े.

अन्य देशों में जहाँ एक ही धर्म के बहुत्व हो, इसको समझना आसान नहीं है. यहाँ जब अन्य धर्मों के सम्मान की बात होती है तो वह तार्किक दृष्टि की बात लगती है उसमें वह भारतीय आत्मीयता की समझ कि सब रास्ते एक ही ओर जाते हैं और सभी रास्ते पूजनीय हैं वाली बात नहीं दिखती.

इटली में जब केथोलिक तथा विभिन्न धर्मों के बीच में वार्तालाप या संचार की बात होती है तो कभी कभी लगता है कि अन्य धर्मों को कुछ श्रेणियों में बाँट दिया गया हो. बात अधिकतर एक ईश्वरवादी धर्मों यानि ज्यू और इस्लाम तक ही रुक जाती है शायद क्योकि ईसाई धर्म की जड़ें इन दोनो धर्मों से करीब से जुड़ी हैं. लगता है कि पूर्वी विश्व में जन्मे धर्म, हिदु, बुद्ध, जैन इत्यादि को इनसे नीचा देखा जा रहा हो, उनकी बात न की जाती है और उनसे क्या सीखा जा सकता है उस पर विमर्श नहीं होता.

इसीलिए जब सुना कि शाम को एक गिरजाघर में भारत से आये फादर रायमोन पनिक्कर बोलने वाले हैं तो उन्हे सुनने बहुत शौक से गया. वृद्ध पनिक्कर सादा कुर्ता और लुँगी पहने, कँधे पर झोला उठाये, गाँधीवादी हैं. बहुत सी भाषाएँ बोलते समझते हैं और हालाँकि भारत में उनका नाम कभी नहीं सुना, यहाँ इटली और स्पेन में उनका लिखी किताबें बहुत पढ़ी जाती हैं.

उनके भाषण का विषय था "श्रद्धा, धर्म और सभ्यता" और बहुत बढ़िया बोले. ईसाई धर्म की बात करते हुए उन्होने बाईबल के साथ साथ वेदों, गुरु ग्रँथसाहब, महात्मा बुद्ध और महावीर तथा महात्मा गाँधी के संदेशों की भी बात की. हाल लोगों से खचाखच्च भरा था और बार बार तालियों की गड़गड़ाहट गूँज जाती.

मुझे लगा कि यही योगदान है जो भारतीय विचारकों ने, चाहे वह विवेकानंद हो या कृष्णामूर्ती, अलग अलग स्वरों में दिया था और जिसे पनिक्कर जैसे महात्मा आज दे रहे हैं. भारत के कैथोलिक ईसाई समाज में इस तरह की बात करने वाले पनिक्कर अकेले नहीं है. रुढ़िवादी गिरजाघर इसे ईसाईयत से दूर जाना समझते हैं और पनिक्कर को भी पादरी से हटाने की बात की गयी थी पर उनको सुनने वालों की भीड़ को देख कर स्पष्ट था कि इस भारतीय सोच को समझने वाले लोग दुनिया में हैं.

आज की तस्वीरों में रायमोन पनिक्कर जी.






शनिवार, सितंबर 09, 2006

बेतरतीब डॉयरी के पन्ने

लगता था कि हिंदी का प्रेम अपनी पीढ़ी तक आ कर ही रुक जायेगा. पापा, बुआ के परिवार में हिंदी जीवन यापन का माध्यम भी थी और सृजनात्मकत्ता का प्रेम भी. यही सिलसिला हमारी पीढ़ी में बहुत लोगों ने जारी रखा था. पर पिछले कुछ महीनों में हमारे बाद की नयी पीढ़ी ने हिंदी ने लिखना प्रारम्भ किया है इससे बहुत खुशी होती है और गर्व भी. पहले भाँजे मुकुल ने निरंतर के लिए फ़िल्मों तथा एडस् पर लिखना स्वीकार किया और अब भतीजी पियुली ने अपने चिट्ठे में कविता लिखी है "आशा के पथ पे"-

निराशा का लिहाफ
आरामदायक है
अपने अन्धेरे आगोश मे
भर लेता है
असलियत की कडी धूप से
बचने का आसरा है
राह मे वही थम जाने का
बहाना है

आशा का सूरज
चुना है मैने
तपता तो है
मगर
राह नई दिखाता है
गर्म बाहो से सहला
हौसला दिलाता है

सूरज से अब तो
सारी उम्र का करार है
मन्ज़िल मिले ना मिले
सफर से मुझे प्यार है

*****

कुरबान अली ने बीबीसी के नये हिंदी पृष्ठ के बारे में बताया जो हिंदी पत्रिका के रुप में आया है. इस नये रुप के पहले अतिथि सम्पादक है अभिनेता देव आनंद और पत्रिका की सम्पादक हैं सलमा ज़ैदी. बीबीसी जैसी प्रशिष्ठावान संस्था हिंदी लेखन को प्रोत्साहन दे तो खुशी होना स्वाभाविक ही है. पत्रिका का पहला अंक पठनीय है.
*****

बहुत दिनों के बाद बँगला फिल्म देखने का मौका मिला. फिल्म थी ऋतुपूर्ण घोष की "अंतरमहल". बचपन में घर के पास दुर्गा पूजा पर उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन की रोने रुलाने वाली भावुक फिल्में मुझे बहुत पसंद थीं. कुछ बड़ा हो कर कभी फिल्म फेस्टिवल में और दूरदर्शन पर मृणाल सेन और सत्याजित राय के सिनेमा को जानने का मौका मिला था. हिंदी सिनेमा में भी बँगला साहित्य की सँवेदना लाने वाले निर्देशकों, बिमल राय, ऋषीकेष मूखर्जी, बासू चैटर्जी भी बहुत प्रिय थे.

ऋतुपूर्ण का सिनेमा जगत उसी समाज को देखता है पर उसकी दृष्टि ऊपर से केवल अच्छा अच्छा दिखने वाली, आसानी से रुलाने वाली भावनाओं जिन्हे भूलना आसान है, पर नहीं रुकती, वह अंदर घुस कर बाहर से सुंदर दिखने वाले उस समाज की परतें खोल कर अंदर सड़ते सच को अँधेरे से रोशनी में लाता है.



"अंतरमहल" को केवल "समय बिताने" को देख कर भुला पाना सँभव नहीं है. बार बार फिल्म में, गरीब घर से आई छोटी उम्र की सुंदर नयी बहु यशोमती (सोहा अली खान) को पुत्र की आशा में तड़पते, हाँफते हुए प्रोढ़ उम्र के राजा भुवनेश्वर चौधरी (जैकी श्रौफ़) के नीचे उनके बिस्तर में पिसता दिखाया जाता है, तब भी जब मँत्र पढ़ते, लार टपकाते पँडित जी बिस्तर के साथ बैठ कर उसके युवा शरीर को देख कर मजे ले रहे होते हैं. बड़ी बहु महामाया (रूपा गाँगुली) छोटी बहु को सलाह देती हैं कि रात को प्रोढ़ पति के सोने के बाद रात को उसे नीचे सो रहे युवा शिल्पकार (अभिशेख बच्चन) के बिस्तर में जाना चाहिए क्योंकि वह जानती है कि बच्चा न कर पाने का कमी पत्नियों में नहीं, स्वयं राजा साहब में हैं.

सोहा अली खान को देख कर लगता है मानो समय की सुई पीछे मुड़ गयी हो और उनकी माँ, "देवी" की शर्मीला टैगोर वापस लौट आईं हों. पर फिल्म समाप्त होने पर उस सड़न की गँध मन में रह जाती है.

बुधवार, सितंबर 06, 2006

दुर्गा माँ की वापसी

बिनिल का टेलीफ़ोन आया, बोला कि एक बहुत आवश्यक काम के लिए उसे मेरी सहायता की आवश्यकता है, कब मिल सकते हैं? बिनिल यहाँ की "सनातन साँस्कृतिक परिषद" का सभापति है. इस परिषद के सदस्य हैं भारत और बँगलादेश से आये बोलोनिया में रहनेवाले करीब ४० बँगाली हिंदु परिवार. दिक्कत यह है कि परिषद में किसी को भी ठीक से बँगला के अलावा कोई अन्य भाषा नहीं बोलनी आती. जबसे बिनिल को मालूम हुआ कि मुझे कुछ कुछ बँगला की समझ है तो तब से मुझे उनकी परिषद में माननीय सलाहकार की पदवी मिल गयी है जिसका अर्थ है कि जब भी बिनिल को किसी काम के लिए इतालवी या अँग्रेज़ी में कुछ तैयार करना होता है या फ़िर क्मप्यूटर पर कुछ करना होता है तो वह मुझे ही टेलीफ़ोन करते हैं.

शाम को बिनिल हमारे घर आया तो मालूम हुआ कि आवश्यक काम है आनेवाली दुर्गा पूजा के लिए विभिन्न भाषाओं में कुछ पोस्टर आदि बनाना.

बिनिल बात करते समय कुछ शब्द हिंदी के बोलता है और बाकि सर्राटेदार बँगला में. मैं बार बार कहता हूँ, "बिनिल बाबू, बेशी बाँगला आमारके बोलते पाड़बे ना, ओल्पो ओल्पो जानिश", यानि कि अगर आप इस तरह तेजी से बोलेंगे तो कुछ नहीं समझ सकता, धीरे धीरे बोलिये. हाँ कह कर सिर हिलाता है पर थोड़ी देर में फ़िर यह भूल जाता है.

पूजा प्रारम्भ होगी २८ सितम्बर को अधिवास से और उस दिन तो बस अधिवास पूजा ही होगी जब दुर्गा माँ की मूर्ती ला कर स्थापित की जायेगी. पूजा का महूर्त उनके पँडित ने बताया है शाम छहः बज कर तीस मिनट से ले कर रात आठ बज कर उन्नतीस मिनट.

"पर प्रोग्राम में लिखेंगे कि पूजा रात आठ बज कर उन्नतीस मिनट तक होगी तो कुछ अजीब सा नहीं लगेगा? मैंने पूछा. बिनिल मेरी तरफ़ बहुत दया से देखता है जब मैं ऐसे बेवकूफ़ी वाले प्रश्न पूछता हूँ. जब पँडित जी ने महूर्त का समय बताया है तो इसमे अज़ीब क्या? उसके कहने का तात्पर्य है कि हिंदू धर्म के प्रति मेरी श्रद्धा में कुछ कमी है.

"अच्छा साईं बाबा के बारे में आप का क्या विचार है?", इस बार प्रश्न पूछने की बारी बिनिल की थी. साई बाबा! मुझे पहले तो समझ नहीं आया क्या कहूँ. बहुत साल पहले दिल्ली में मेरी सीमा मौसी को साई बाबा की भक्ति का भूत चढ़ा था. उनके घर में एक बहुत बड़ी तस्वीर लगी थी जहाँ घर में आनेवाले सभी को जा कर दर्शन कराये जाते थे. "बाबा जी की विभूति", तस्वीर के सामने उन्होंने मुझे इशारा किया था. "विभूति माने क्या?, मैंने पूछा.

"बाबा का चमत्कार. उनकी तस्वीर से यह विभूति अपने आप ही आ जाती है!" कहते हुए उन्होंने हाथ जोड़ दिये थे. शायद मौसा की सिगरेट की राख होगी जो हवा से उड़ कर वहाँ गिर गयी, मैंने मन ही मन कहा था और सोचा था कि भारत में उनके इतने गरीब भक्त हैं उनका जीवन सुधारते तो चमत्कार होता. खैर अपने परिवार की यह सब पुरानी बातें बिनिल को क्या सुनाता, बोला, "साई बाबा का क्या? वह तो बहुत चमत्कार करते है, सुना है."

साई बाबा की एसोशियेशन वाले दुर्गा पूजा में "भोजन" करना चाहते हैं. पिछले साल भी किया था पर यह बात परिषद के सभी सदस्यों को अच्छी नहीं लगी थी, जिनका विचार था कि साईबाबा मुसलमान हैं. बँगलादेश से आये हिंदू इस पूजा में मुसलमानों से जुड़ा कुछ भी नहीं चाहते. कुछ देर लगी मुझे समझने में कि बात भोजन की नहीं भजन की थी. पर मुझे क्या मालूम था साई बाबा के बारे में जो इसका उत्तर देता? वह केवल हिंदुओं द्वारा पूजे जाते हैं या फ़िर उनके भक्तों में मुसलमान भी हैं, यह मुझे नहीं मालूम. सोचा कि चुपचाप सिर हिलाने में ही भलाई है. नहीं साईंबाबा मुसलमान नहीं हैं, अंत में बिनिल ने निर्णय लिया.

पाँच दिन का प्रोग्राम लिखने में दो घँटे निकल गये. बस बिनिल बाबू अब आप जाईये, मैंने कहा. पत्नी मुझे तीखी नजर से देख रही थी. ड्राईंगरुम में बैठे थे हम, इसलिए आज उसने टीवी नहीं देखा था. मैंने खाना भी नहीं खाया था और अभी कुत्ते को सैर कराना बाकी था. बेमन से उठे बिनिल बाबू जैसे कि मुझे छोड़ते समय बहुत दुख हो रहा हो, फ़िर जाते जाते, दरवाजे पर रुक गये, "आप इस प्रोग्राम को बँगला में भी लिख सकते हैं क्या क्मप्यूटर पर?"

शुक्रवार, सितंबर 01, 2006

सांस्कृतिक भिन्नता

मैं अपनी मित्र के साथ बाग में बने केफ़े में बैठा था. बहुत समय के बाद मुलाकात हुई थी. वह यहाँ से करीब सौ किलोमीटर दूर रिमिनी शहर में रहती है. बोली, "तुम्हें 16 सितम्बर को रिमिनी आ सकते हो क्या, हम लोग एक सभा कर रहे हैं, तुम भी होगे तो अच्छा लगेगा."

सोचना नहीं पड़ा, बोला, "16 को तो शायद नहीं आ पाऊँगा, उस दिन भारत से मेरे दादा भाभी यहाँ आ रहे हैं, दादा की पेरिस में मीटिंग है और वहाँ से वे दोनो तीन चार दिनों के लिए यहाँ आएँगे."

"पर तुम्हारा तो कोई भाई नहीं है!" उसने कहा तो मैंने बुआ के परिवार के बारे में बताया और कुछ भारतीय परिवारों के बारे में कि बुआ या मामा के बच्चे अपने सगे भाई बहनों से कम नहीं होते.

"एक शाम की ही तो बात है, उन्हें कुछ घँटों के लिए घर के बाकी लोगों के साथ रहने देना, तुम्हारे बिना सभा अच्छी नहीं होगी", उसने ज़िद की.

मुझे हँसी आ गयी, "वाह, इतने सालों के बाद भाभी के साथ रहने का मौका मिलेगा, उसमे से एक पल भी नहीं खोना चाहूँगा." मैंने उसे उन दिनों के बारे में बताया जब दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ता था, तब दादा और भाभी का प्रेम चल रहा था, विवाह नहीं हुआ था, मुझे लगता था कि भाभी से सुंदर लड़की दुनिया में हो ही नहीं सकती. शादी के बाद कहता था कि भाभी जैसी लड़की मिलनी चाहिए!

"लगता है कि भाभी से कुछ विषेश ही प्यार है, उनकी बात करते हो तो तुम्हारी आँखों में चमक आ जाती है", मित्र बोली और मैंने सिर हिलाया. "क्या केवल मन ही मन प्यार करते थे या बात कुछ आगे भी बढ़ी कभी?" वह प्रश्न पूछते समय मुस्करायी.

स्तब्ध रह गया मैं. छीः, यह कैसा बेहूदा प्रश्न हुआ? अचानक गुस्सा आ गया, कुछ बोला नहीं पाया. शायद उसने मेरे चेहरे से भाँप लिया था कि उसका प्रश्न कुछ ठीक नहीं था, बोली, "क्या हुआ? नाजुक सवाल था शायद, इस बारे में बात नहीं करना चाहते?"

मैंने स्वयं को समझाया कि गुस्सा करना बेकार था, यह हमारी सोच की सांस्कृतिक भिन्नता थी. उसे भारतीय परिवार में देवर भाभी के रिश्ते की क्या समझ हो सकती थी? उसे क्या मालूम था रामायण के बारे में और सीता और लक्षमण के आदर्श के बारे में? उसे इसके बारे में कुछ तो बताया पर अंदर से लगा कि ठीक से समझाना कठिन होगा.

गुस्सा ठँडा हुआ तो शाम को घूमते समय, मन में छुपे सामाजिक और नैतिक निषेधों के बारे में सोचने लगा, जो बचपन से ही रामायण और अन्य कथाओं से, या फ़िर आम व्यावहार से हमारे विचारों में इस तरह घुलमिल जाते हैं. उन्हे छेड़ना सोते शेर को जगाना है. उसका इशारा मात्र ही हिला कर रख देता है.

संयुक्त परिवार में जहाँ विभिन्न भाई साथ रहते हैं, उस समाज में जहाँ किशोरावस्था के बाद युवक और युवतियों को मिलने का, साथ रहने का मौका मिलना कम हो जाता है या नहीं रहता, उस स्थिति में देवर भाभी के रिश्ते को निषेधों में इस तरह बाँधना कि रिश्ते की सीमाओं को पार करना का विचार भी पाप लगे, परिवार की शाँती और समाज की स्थिरता के लिए आवश्यक होगा, पर जब स्थिति बदल जाती है तो क्या पुराने निषेध भी बदल जाते हैं? जैसे आज जब संयुक्त परिवार टूट रहे हैं या कम हो रहे हें तो क्या भारतीय समाज में भी देवर भाभी के नाते बदल जायेंगे?
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बहुत साल पहले डेविड लीन की फ़िल्म रायन की बेटी (Ryan's Daughter) देखी थी. आयरलैंड के समुद्री तट पर बसे एक गाँव के पब मालिक रायन की बेटी रोज़ी (Sarah Miles) की कहानी थी. जीवन से भरी, चंचल रोज़ी का विवाह होता है गाँव के शाँत प्रौढ़ स्कूल मास्टर (Roberto Mitchum) से. रोज़ी की दोस्ती हो जाती है गाँव में आये एक अँग्रेजी सिपाही (Christopher Jones) से. बाद में जब आयरिश क्राँतीकारियों की बँदूकें पकड़ी जाती हैं तो सबका शक रोज़ी पर ही पड़ता है, गद्दार हो कर दुश्मन के पुरुष को प्यार करने के अपराध की सजा मिलती है उसे जब गाँव के लोग उसका सिर मूढ़ कर, मुँह काला कर देते हैं.

द्वितीय महायुद्ध के दौरान इतालवी और फ्राँसिसी महिलाओं के जर्मन सिपाहियों से प्यार और सम्बंधों को भी युद्ध के बाद ऐसी ही सजा दी गयीं थीं.

कल रात को समाचारों में जब चेचेन्या की मल्लिका को पुलिस द्वारा नँगा करके, सिर मूढ़ा कर, माथे पर हरा निशान बना कर मार खाने का वीडियो देखा तो रायन की बेटी की याद आ गयी. मल्लिका का कसूर है कि उस पर चेचेन्या की मुसलमान हो कर रुसी दुश्मनों के इसाई सिपाही से प्यार करने का शक है. यह वीडियो न्यू योर्क टाईमस के वेबपृष्ठ पर देखा जा सकता है.

सच है कि इतिहास नहीं बदलता, बार बार हम अपना सभ्य होना भूल कर पुरानी बर्बरता में गिर जाते हैं. कमज़ोर पर ही इस बर्बरता की भड़ास निकाल जाती है, सबसे अधिक औरतों पर. नेपाल में जब घर में होने वाली हिंसा की बात हो रही थी तो गाँव की औरते कहती थीं कि पतियों को गर्भवती स्त्री के पेट पर लात मारने में विषेश आनंद आता है. गर्भवती मल्लिका को लात मारने वाले पुलिस वालों को भी इसी आनंद की खोज है. कितने भिन्न हैं हम आपस में और कितने मिलते हैं एक दूसरे से!

गुरुवार, अगस्त 31, 2006

बदलती रुचियाँ

एक समय था जब रविवार के आनंद का महत्वपूर्ण भाग होता था बिस्तर में लेटे लेटे गर्म चाय की चुस्कियाँ लेते हुए, अखबार पढ़ना. पढ़ने का इतना शौक था कि अखबार भी पहले से आखिरी पन्ने तक पढ़ी जाती थी. आदत के मारे सुबह आँख जल्दी ही खुल जाती थी, पर रविवार को अखबार देरी से आता था. जैसे ही अखबार वाला बाहर से अखबार को फ़ैंकता तो उसके गिरने की आवाज़ सुनते ही अखबार उठाने के लिए बाहर भागता, फ़िर उसके पन्ने घर में सब लोगों में बँट जाते ताकि किसी को भी उसे पढ़ने के लिए अधिक इंतज़ार न करना पड़े.

बचपन में तो घर में अखबार हिंदी का ही आता था, "नवभारत टाईमस". पर किशोरावस्था में आते आते, उसके साथ अँग्रेज़ी का "इँडियन एक्सप्रैस" भी जुड़ गया था. बुआ जो करीब ही रहतीं थीं, के यहाँ आता था अँग्रेज़ी का "हिंदुस्तान टाईमस", पर उसके तीन चार पन्नों के शादियों, घरों और नौकरियों के विज्ञापनों को देख कर मुझे खीज आती थी. सोचता था यह भी कैसा अखबार है, अखबार कम विज्ञापन की दुकान है.

वे दिन थे जब अरुण शौरी और चित्रा सुब्रामणियम "इँडियन एक्सप्रैस" में प्रति दिन राजीव गाँधी के विरुद्ध बोफोरस के घपले की नयी पोल खोलते थे. अखबार पढ़ना तब रोमाँचक उपन्यास पढ़ने से कम नहीं था. उन दिनों में अरुण शौरी का कुछ भी छपता तो उसे पढ़ने की बहुत उत्सुक्ता रहती थी. तब उनके लिखने का ढ़ँग भी अलग था. आजकल जैसे बाल की खाल निकाल कर उसे हज़ार टुकड़ों में बाँट कर, यहाँ वहाँ से रेफेरेंस दे कर वह कुछ उबा सा देते हैं, तब वैसा नहीं लिखते थे. वही दिन थे जब "इंडियन एक्सप्रैस" के प्रति मन में इतना विश्वास बन गया था कि जब तक भारत में रहे वही अखबार घर में आया.

"इँडियन एक्सप्रैस" के प्रति श्रद्धा का एक अन्य कारण भी था. पापा की अक्समात मृत्यु के बाद श्री जयप्रकाश नारायण के कहने पर अखबार के मालिक गोयनका जी ने छात्रविती दे कर मेरी और मेरी छोटी बहन की मेडिकल कालिज की पढ़ाई पूरी कराई, वरना कम से कम मुझे तो पढ़ाई छोड़ कर काम खोजना पड़ता.

यहाँ आ कर अपने चहेते अखबारों और पत्रिकाओं से धीरे धीरे नाता टूट गया. जब सारिका, धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान के प्रकाशन रुक गये तो भारत से पत्रिकाएँ मँगवाना बस "हँस" तक ही सीमित रह गया.

केवल पिछले कुछ वर्षों में अंतर्जाल की सुविधा के साथ भारतीय लेखन से नाता दोबारा जुड़ा है पर यह नाता पिछले नातों से भिन्न है. समय सीमित होता है इसलिए उपयोग सिर्फ़ उस जगह होता है जहाँ अधिक आनंद और संतोष मिले. आज कल अधिकतर समय, ८० प्रतिशत तक समय तो चिट्ठों के साथ गुजरता है, हिंदी और अँग्रेजी के भारतीय मूल के छिट्ठाकारों के जगत में.

अखबारों में कभी "हिंदुस्तान टाईमस" के पृष्ठों को देख लेता हूँ पर भारत के राजनीतिक समाचारों में रुचि कम हो जाने से वहाँ भी कम ही पढ़ता हूँ. अंतर्जाल के संस्करणों में बाकी के अखबार उतने अच्छे नहीं लगते. इसलिए मन में अभी भी कृतज्ञता की भावना के होते हुए भी, अंतर्जाल पर "इंडियन एक्सप्रैस" पढ़ना नहीं अच्छा लगता.

हिंदी फिल्म जगत में दिलचस्पी अवश्य बनी हुई है पर जिन पत्रिकाओं को भारत में पढ़ना अच्छा लगता था जैसे फिल्मफैयर इत्यादि, अंतर्जाल पर उनको पढ़ने में उतना आनंद नहीं आता बल्कि इंडिया एफएम या रिडिफ कोम जैसे अंतर्जाल पृष्ठ अधिक अच्छे लगते हैं क्योंकि वहाँ हर दिन नये समाचार मिलते हैं. जबकि फिल्मफैयर जैसी पत्रिकाओं के अंतर्जाल पृष्ठ छपे कागजं से सीधे अंतर्जाल पर उतार दिये गये लगते हैं.

अँग्रेजी की पत्रिकाएँ आऊटलुक और द वीक जिन्हें भारत में पढ़ना अच्छा लगता था, कोशिश करता हूँ कि उन्हें पढ़ने के लिए समय नियमित रुप से निकाला जाये, पर समय चिट्ठों मे निकलने की वजह से कभी कभी उन्हे पढ़े भी हफ्ते हो जाते हैं.

प्रवासी भारतीयों ने भारतीय फिल्मों पर अपना प्रभाव छोड़ा है, प्रवास में बाज़ार का मूल्य बढ़ने से, फिल्में अब प्रवासियों की रुचि को देख कर भी बनायी जाती हैं, पर क्या प्रवासियों का प्रभाव अखबारों और पत्रिकाओं पर भी पड़ेगा? आज की बढ़ती नयी तकनीकों का क्या प्रभाव पड़ेगा भारतीय मीडिया पर?

आप लोगों के इसके अनुभव कैसे हैं मालूम नहीं पर अगर सभी लोग मेरी तरह के होने लगे तो भविष्य में हमारी रुचियों के इन बदलावों का भारतीय पत्रकारिता पर क्या असर होगा? आज भारत में अधिकतर लोगों के लिए अंतर्जाल केवल एक शब्द है जिसका उन्हें व्यक्तिगत अनुभव न हो, न ही शायद अधिकतर भारतीयों के जीवन इतनी तेज़ी से भाग रहे हैं कि उन्हें मेरी तरह रुक कर सोचने की फुरसत ही न हो, इसलिए हो सकता है कि निकट भविष्य में इसका असर शायद कुछ न हो?

शुक्रवार, अगस्त 25, 2006

जीवन मृत्यु

रोम के भारतीय दूतावास पर प्रवासी भारतीय नागरिकता के कार्ड के लिए अपने और पुत्र के कागज़ जमा करवाने थे, सुबह सुबह बोलोनिया से गाड़ी में हम लोग निकले, मैं, पुत्र और पुत्रवधु. तीन महीने हो गये पुत्रवधु को इटली आये, सोचा कि काम समाप्त होने के बाद रोम की सैर भी जाये तो चार घँटे की जाने की और चार घँटे की वापस आने की यात्रा का कुछ लाभ होगा.

भारतीय दूतावास पहुँचते पहुँचते ग्यारह बजने लगे थे. छोटे से तँग गलियारे से घुसने का रास्ता, अँदर वीसा लेने वाले विदेशियों और पासपोर्ट नये बनवाने वाले भारतीयों की भीड़, उमस भरी गर्मी में छत पर टँगा धीरे धीरे घूमता पँखा, और ऊपर दफ्तर में फाईलों के पहाड़ों के पीछे छुपे बाबू लोग, यानि अगर भारत जाने के लिए पैसे न हों और मातृभूमि की बहुत याद आ रही हो तो दूतावास में घुसते ही लगता है कि दिल्ली के किसी सरकारी दफ़्तर में ही पहुँच गये हों. पर एक महत्वपूर्ण अंतर था, प्रवासी भारतीय नागरिकता के जिम्मेदार व्यक्ति का हमसे इज्जत से बात करना और सब कुछ ठीक से समझाना. हालाँकि भीड़ बहुत थी पर इंतज़ार भी बहुत अधिक नहीं करना पड़ा सब काम पूरा करने में.

काम पूरा करके सारी दोपहर और शाम रोम घूमने में निकल गयी. पहले कोलोसियम, फ़िर रोम के प्राचीन सम्राट के महलों के खँडहर, फ़िर मार्को आउरेलियो का भव्य भवन काम्पी दोलियो जहाँ आजकल नगरपालिका का दफ़्तर है और कला सँग्रहालय भी है, फ़िर युद्ध में मरे सैनिकों की याद में बने विटोरियानो, फ़िर नाव के आकार में बना नवोना चौबारा और त्रेवी का फुव्वारा, फ़िर वेटीकेन में सेंट पीटर. पाँच छहः घँटों में रोम के एक कोने से दूसरे कोने तक पर्यटकों के लिए सभी महत्व वाले स्थानों को बाहर बाहर से देख चुके थे. बस अब और कुछ नहीं होगा, वापस बोलोनिया की ओर चलना चाहिए सोच कर उस कार पार्क की तरफ़ लौटे जहाँ गाड़ी रखी थी.

चलते चलते तो मालूम नहीं हुआ था पर गाड़ी में बैठते ही दर्द की आह को नहीं रोक पाया. हल्का सा थैला था कँधे पर जिसमें दूतावास के कागज़ और कैमरा थे, वह दर्द से जकड़ गया था, दोनों घुटनों का बाजे अलग बज रहे थे. पुत्र और पुत्रवधु थके अवश्य थे पर मेरी तरह दर्द से नहीं कराह रहे थे. घर पहुँचते रात के ग्यारह बज रहे थे और शरीर का कोई अंग ऐसा नहीं था जहाँ दर्द न हो रहा हो, सी सी करते सीढ़ियाँ चढ़ीं. रात को पत्नी ने बाम लगा कर कँधे, कमर और टाँगों की मालिश की और बोली, "अब बचपना छोड़ो और अपनी उम्र को याद रखो. अब बच्चे नहीं हो कि कुछ भी भागा दौड़ी कर लो, हड्डियाँ माँस पेशियाँ अपनी उम्र दिखाने लगी हैं, उनका नहीं सोचेगो तो रहे सहे से भी जाते रहोगे."
*****
शायद यह जोड़ों में हो रहे दर्द का असर था, या फ़िर बिना वजह कभी कभी अचानक मन में आ जाने वाली उदासी का असर था. ओम थानवी जी का निर्मल वर्मा की मृत्यू पर लिखे आलेख को पढ़ कर मन बार बार मृत्यु और गुजरते समय के बारे में सोच रहा था. भारत में रहते हुए मृत्यु को भुलाना आसान नहीं है, जीवन और मृत्यु दोनो ही अपनी पूरी शक्ति के साथ जीवन के हर पहलू में घुले मिले हैं. किसी के दाह संस्कार पर जाईये तो अग्नि में भस्म होते शरीर को देख कर समझ आता है कि मृत्यू जीवन का ही दूसरा पहलू है, उसका अभिन्न अंग.

पर किसी के दाह संस्कार में गये बरसों बीत गये हैं. हर बार भारत जाओ तो मालूम है ये नहीं रहे या वे नहीं रहे. नाना नानी, बुआ फूफा, मौसी, मित्र. पर सबके समाचार मिले जब भारत से दूर था. और इटली में पत्नी के परिवार में या फ़िर जान पहचान के लोगों में जब भी किसी की मृत्यु हुई तो मैं कहीं विदेश यात्रा में था. हालाँकि इसाई कब्र में रखते शरीर की छवि में मुझे वह दाह संस्कार वाली "यही अंत है, धूल में मिल गया सब फ़िर से" जैसी बात कम लगती है पर यहाँ भी मुझे किसी प्रियजन की मृत्यु पर साथ रहने का मौका नहीं मिला.

ओम जी ने अपने आलेख में लिखा है, "हम चिता की बगल में एक पत्थर की बैंच पर बैठे हुए थे. चिता की राख और आँच रह रह कर इसी तरफ़ आती थी. हर झोंका आग की लपटों के साथ यादों के अनगिनत थपेड़े साथ लाता था. मेरी सूनी नज़र चिता पर टिकी थी, बल्कि उनके कपोल पर..." . पढ़ कर झुरझुरी सी आ गयी.

यहाँ जीवन में लगता है कि मौत जैसे है ही नहीं, जैसे हम सब शास्वत अंतहीन जीवन का वरदान पाये हुए हैं, यह करो, वह बनाओ, इसको कैसे काटो, उसको कैसे नीचा दिखाओ, जवान लगो, पतले लगो, स्वस्थ रहो, यह खाओ, यह न खाओ, अंतहीन चक्कर जिसमें मृत्यु कहीं भूलभुल्लियाँ में छुपी हुई है, उसकी कोई बात न करो, लगना चाहिए कि वह है ही नहीं और शायद वह सचमुच खो ही जायेगी!

यमराज का नचिकेता को उत्तर, "सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः" मानो हमारे ऊपर नहीं लागू होता, वह तो केवल अन्य लोगों के लिए बना है. पर जब शरीर आने वाली वृद्धावस्था के संकेत महसूस करने लगता है, तो शायद हमें उस आने वाले अंतिम पल के बारे में भी सोचना चाहिए, उसकी तैयारी करनी चाहिए?

जब तक कमर, कँधे और टाँगों का दर्द कम हुआ तो बिस्तर पर लेटे लेटे यही सब विचार मन में आ रहे थे.
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पुस्तकालय जा रहा था तो बस स्टाप वह दिखा. करीब आ कर उसने धीरे से पूछा, "आप पाकिस्तान से हैं क्या?"

"नहीं मैं भारत से हूँ, क्या आप पाकिस्तान से हैं?" मैंने पूछा. यहाँ बोलोनिया में भारतीय बहुत कम हैं और पाकिस्तानी बहुत अधिक इसलिए अपने जैसा चेहरा दिखे तो पहला विचार यही मन में आता है कि "पाकिस्तानी होगा". वह मुस्कुरा कर बोला, "नहीं मैं भी इंडिया से हूँ, होशियार पुर से".

साथ में बस में सफ़र करते करते उसने अपनी कहानी सुनाई. दसवीं पास है वह और मेटल का काम जानता है. 29 साल का है पर देखने में बहुत छोटा लगता है. सोलह महीने की यात्रा की है उसने यहाँ पहुँचने के लिए. पंजाब में बरोड़ नाम के किसी एँजेंट को पाँच लाख रुपये दिये और रूस में मोस्को पहुँचा, जहाँ पाँच महीने जेल में रहा. फ़िर एँजेंट के किसी आदमी ने जेल से निकलवाया. फ़िर यूक्रेन पहुँचा, वहाँ अन्य पाँच महीनो के लिए जेल. फ़िर किसी ने जेल से निकलवाया. यात्रा उसे अन्य कई देश ले गयी जिनके बारे में वह कुछ अधिक नहीं बता पाता. अंत में समुद्र में लहरों से लड़कर छोटी सी नाव में पहुँचा इटली की सीमा रक्षा करने वालों के हाथ यहाँ की एक जेल में. किसी मानव अधिकारों की बात करने वाले ने बाहर निकलने में सहायता की और शरणार्थी के फोर्म भरने की सहायता की. अब उसे कोई भारत वापस नहीं भेज सकता, क्योंकि वह किसी को नहीं बताता कि उसका पासपोर्ट और कागज़ कहाँ हैं और बिना कागजों के न तो भारत उसे स्वीकारेगा न पाकिस्तान. आजकल श्रीलँका के एक व्यक्ति के साथ रहता है और काम खोज रहा है. तब तक भूखा न मरने के लिए घर से पाँच सौ यूरो मँगवाये हैं.

उसकी आँखों में आशावान जीवन चमकता है, "एक बार काम मिल जायेगा तो घर की दरिद्री दूर हुई समझो, सब ठीक हो जायेगा. सब काम करने को तैयार हूँ, कुछ भी थोड़ा सा दे दो. कोई काम हो तो बताईयेगा."

साथ आने वाले कितने मरे और कितनों ने यह यात्रा पूरी की, पूछने का साहस नहीं हुआ. हर रोज़ टीवी पर समुद्र में गैरकानूनी आने वालों के मरने के समाचार बताते हैं, वह किसमत वाला है, मरा नहीं, जीवित पहुँच गया. जीवन जीवित रहने के लिए हिम्मत नहीं हारता, एक मुठ्ठी भर जगह चाहिए उसे, बस खड़ा होने भर की, जिंदा रहने के लिए पत्थर में भी जड़े खोद कर पानी खोज लेगा.
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रोम यात्रा से कुछ तस्वीरें प्रस्तुत हैं.








सोमवार, अगस्त 21, 2006

सही या गलत

मैं लंदन में अपनी पुरानी मित्र पाम के यहाँ बैठा था और बात हो रही थी यूरोपीय जन स्वास्थ्य अभियान की एक मीटिंग के आयोजन की. बात आयी कि विषय पर विशिष्ट भाषण देने के लिए किस जानी माने व्यक्ति को बुलाया जाये. कुछ नाम लेने के बाद मैंने कहा कि सुप्रसिद्ध अमरीकी लेखक व जाने पहचाने सहयोगी को बुलाया जाये (जानबूझ कर उनका नाम यहाँ लेना ठीक नहीं समझता) तो पाम ने न कहते हुए सिर हिला दिया. क्यों, वह बहुत अच्छा बोलता है और उसके आने से हमारी सभा में लोग भी बहुत आयेंगे. "तुमने उसके पीडोफिलिया (किशोरावस्था से छोटे बच्चों के साथ यौन सम्बंध करना) की बात नहीं सुनी?" पाम ने पूछा. छीः, मुझे विश्वास नहीं हुआ कि कोई इतने अच्छे व्यक्ति के बारे में ऐसा भी सोच सकता है! सिर्फ बातें नहीं हैं, सच है, पाम ने बताया, "मैंने स्वयं उससे इस विषय में बात की है, सब सच है. वह स्वीकारता है पर वह कहता कि वह कुछ गलत नहीं कर रहा. वह किसी बच्चे से कभी जबरदस्ती नहीं करता. बच्चों में भी यौनता होती है और उन सभी बच्चों से उसे बहुत प्रेम है, कहता है."

बहुत धक्का लगा यह सुन कर.

अँग्रेजी में वैज्ञानिक साहित्य के सुप्रसिद्ध लेखक आर्थर सी क्लार्क जिन्होंने "2001 ए स्पेस ओडिसी" जैसी फिल्मों की कहानी लिखी, जो कि श्रीलंका में बहुत सालों से रहते हैं, उनके बारे में एक बार ऐसी ही बात सुनी थी और कहा गया था कि उन्होंने अपने बचाव में ऐसा ही कुछ कहा था कि वह तो उन गरीब बच्चों की मदद कर रहे हैं और उन्होंने कभी किसी बच्चे से जबरदस्ती नहीं की. बाद में श्री क्लार्क पर से यह इलज़ाम हटा लिया गया था और उन्हें ब्रिटिश सरकार से नाईट (Knight) का खिताब भी मिला था.

यह सोचना कि बच्चों के साथ जबरदस्ती नहीं होती, प्रेम का सम्बंध होता है, मेरे विचार में सच्चाई से भागना है. छोटा बच्चा जिसका व्यक्तित्व नहीं बना, अपने साथ रहने वाले व्यस्क व्यक्ति पर शारीरिक जरुरतों के साथ साथ भावात्मक जरुरतों पर भी निर्भर होता है और बच्चों से यौन सम्बंध उसी भावात्मक निर्भरता का गलत उपयोग करते हैं. यह तो हर हालत में बाल बलात्कार ही होगा, एक घृणित अपराध.
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मैं और मेरे इतालवी साथी रोबर्तो दक्षिण अमरीकी देश गुयाना में एक स्टीमर में नदी पार कर रहे थे. रोबर्तो और मेरी बहस करने की पुरानी आदत है, उसे मुझे भड़काना अच्छी तरह से आता है. जहाँ मुझे हर बात के विभिन्न पहलू देखना अच्छा लगता है, रोबर्तो की नजर में दुनिया की हर बात के दो ही पहलू होते हैं, एक सही और दूसरा गलत. उस दिन भी हम दोनो बहस में उलझे थे. तभी एक छोटा सा बच्चा हारमोनिका बजाता हुआ सामने आ खड़ा हुआ. बच्चे के संगीत के समाप्त होने पर मैंने उसे कुछ पैसे दिये और पास बुला कर उससे उसका नाम पूछा और पूछा कि वह स्कूल जाता है या नहीं? कुछ देर तक बाते करते रहे तो मैंने बच्चे से पूछा कि क्या मैं उसकी तस्वीर ले सकता हूँ? बच्चे के हाँ कहने पर उसकी तस्वीर ले रहा था कि रोबर्तो ने इतालवी में कहा, "ध्यान रखो, अधिक छूओ नहीं बच्चे को, दूर दूर से बात करो, अगर इस बच्चे का बाप यहाँ आसपास होगा तो समझेगा कि तुम भी पीडोफाईल (किशोरावस्था से छोटे बच्चों से यौन सम्बंध रखने वाला व्यक्ति) हो!"

हमारी भारतीय संस्कृति में बच्चों को लाड़ना पुचकारना सामान्य बात समझी जाती है और जाने अनजाने किसी को भी हम अंकल जी और आंटी जी बना लेते हैं, इस तरह की बात मेरे मन में आ ही नहीं सकती थी कि कोई मेरे कोतूहल को इस दृष्टि से भी देख सकता था. मैंने सुना है गोवा में कुछ पर्यटक इसी लिए पकड़े गये थे कि छोटे बच्चों को पैसे दे कर उनसे यौन सम्बंध बनाते थे. बैंकाक की बच्चियाँ या कलकत्ता के सोना गाची की बच्चियाँ जिन्हें छोटी सी ही उम्र में शरीर बेचने के काम में लगा दिया जाता है, उसके बारे में भी सुना है इसलिए मानता हूँ कि दुनिया में ऐसे लोग भी होते हैं जिनसे माँ पिता को सावधान रहना चाहिए.

पर यह सोच कर कि कोई हमें इस संदेह से न देखे, इसलिए हम अपनी प्राकृतिक जाने अनजाने बच्चों को प्यार करने की भावना को दबा दें, मुझे ठीक नहीं लगता. दूसरी तरफ़ किसी के मुख पर नहीं लिखा होता कि उसके मन में क्या होता है, तो फ़िर क्या करें? क्या सही है और क्या गलत?

शनिवार, अगस्त 19, 2006

स्ट्रिंग आप्रेशन और स्त्री भ्रूण हत्या

भारत से एक मित्र ने समाचार दिया है कि सहारा टीवी पर एक स्ट्रिंग आप्रेशन दिखाया गया है जिसमे राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और उत्तर प्रदेश के डाक्टरों को भ्रूण की लिंग जाँच करते हुए तथा स्त्रीलिंग के भ्रूणों का गर्भपात करते हुए दिखाया गया है. करीब सौ डाक्टरों के बारे में दिखाया जा चुका है. कई जगह पर गर्भपात कानूनी सीमा के बाहर, यानि कि २० सप्ताह से बड़े भ्रूणों के गर्भपात भी किये जा रहे हैं. राजस्थान सरकार ने कुछ डाक्टरों को सस्पैंड किया है पर उनके विरुद्ध कोई कानूनी कार्यवाही नहीं प्रारम्भ की गयी है. राजस्थानी डाक्टरों के सहयोग में भारतीय मेडिकल काऊँसिल ने पत्रकार तथा टीवी चैनल के विरुद्ध बाते कहीं हैं और स्ट्रिंग आप्रेशनों पर रोक लगाने की माँग की है. मेरे मित्र का कहना है कि इन डाक्टरों को सजा देने के लिए अंतरजाल के द्वारा राजस्थान सरकार को पेटीशन भेजने के लिए सबको सहयोग देना चाहिए.

संदेश पढ़ कर मन बहुत से बातें उठीं, जिनमें कुछ विरोधाभास भी है. जाने क्यों, मुझे स्ट्रिंग आप्रेशनों का सुन कर अच्छा नहीं लगता. कुछ गलत होते हुए की छुप कर तस्वीरें तथा वीडियो लेना और उसे टीवी पर दिखाना मुझे मुकदमा सा लगता है जिसमें अपराधी के पास अपने बचाव के लिए कोई रास्ता नहीं होता है और जन समान्य के सामने, वह तुरंत दोषी साबित हो जाता है. यह बात मुझे ठीक नहीं लगती क्योंकि मेरे विचार में सभी के मानव अधिकार हैं, अपराधियों के भी जब तक वे अपराधी साबित न हो जायें और सभी को कानून में अपनी रक्षा करना का हक होना चाहिए. मैं मानता हूँ कि एक बार कानून का रास्ता छोड़ कर हम स्वयं लोगों को दोष देने और सजा सुनाने का अधिकार ले लेते हैं तो सही या गलत कहना सब हमारे हाथ में होता है और सभ्य समाज में यह अधिकार केवल कानून को होना चाहिए. वीडियो में क्या दिखाया जाये, किस बात को काट कर छुपा लिया जाये, यह सब दिखाने वाले पर निर्भर करता है.

दूसरी ओर यह भी मानना पड़ेगा कि कानून कुछ भी फैसला करने में इतनी देर लगाता है और ताकतवर संघों के हिस्से बने लोगों के विरुद्ध कानून भी कुछ नहीं कर पाता, जबकि टीवी पर दिखाने से तुरंत कुछ न कुछ न्याय तो हो जाता है. तीसरी बात यह है आज जब नये तकनीकी उपकरण हैं तो पत्रकार उनका सहारा क्यों न लें. इसी विषय पर अखबार में या किसी पत्रिका में अगर पत्रकार लिखते हैं और वह ठीक लगता है तो टीवी के पत्रकारों द्वारा वीडियो का इस्तमाल क्यों गलत माना जाये? यानि इस विषय पर मेरे विचारों में कुछ विरोधाभास है और मुझे अन्य लोगों की राय जानना अच्छा लगेगा.

रही बात स्त्री भ्रूण हत्या की, यह दुर्भाग्य है भारत का कि ऐसे घृणित अपराध को समाजिक समर्थन सा मिल गया है वरना इतने कानून होने के बाद भी यह समस्या यूँ न बढ़ती जाती. करीब पंद्रह वर्ष पहले अमर्त्या सेन ने जनसँख्या सम्बंधी आँकणे देख कर भारत की 10 करोड़ "गुमशुदा औरतों" का प्रश्न उठाया था. उनका कहना था कि हर देश में पुरुषों और स्त्रियों की संख्या करीब बराबर या स्त्रियों की संख्या कुछ अधिक ही होती है और इस हिसाब से भारत में करीब दस करोड़ स्त्रियाँ कम हैं. तब यह सोचा गया था कि स्त्रियों के साथ भेदभाव की वजह से है, क्योंकि उन्हें खाना कम दिया जाता है, उनकी पढ़ाई कम होती है, बीमार पड़ने पर उनका इलाज कम होता है. आज स्थिति और भी बिगड़ गयी है क्योंकि नयी तकनीकों से पैदा होने से पहले ही जाना जा सकता है कि पैदा होना बच्चा लड़का होगा या लड़की, और लड़की होने पर भ्रूण का गर्भपात कर दिया जाता है.

पिछले वर्ष की भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार हर 1000 पुरुषों के मुकाबले में स्त्रियों की संख्या विभिन्न प्रदेशों में कुछ इस प्रकार की है - आँध्र प्रदेश 978, बिहार 919, दिल्ली 821, गुजरात 920, गोवा 961, हरियाणा 861, केरल 1058, पंजाब 876, त्रिपुरा 948, आदि. यानि यह समस्या अधिकतर उत्तरी और विषेशकर उत्तर पश्चिमी भारत में अधिक है. दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, गुजरात जैसे समृद्ध प्रदेशों में.

मेरी एक गायनेकोलोजिस्ट मित्र जो दिल्ली के पास गाजियाबाद में अक्सर ऐसे गर्भपात के आप्रेशन करती है, उससे एक बार इसी विषय पर बात कर रहा था. वह बोली, "जब कोई औरत तुम्हारे सामने आ कर रोये, पैर पकड़ कर मदद माँगे, जिसके सास ससुर और पति उसे तंग करते हों, लड़की हुई तो उसे छोड़ कर दूसरी शादी करने की धमकी देते हों, तो न न करते करते भी दिल पसीज जाता है. आजकल अल्ट्रासाऊँड करना तो टेकनिशयन जानते हैं, उसके लिए डाक्टर की जरुरत नहीं. एक बार स्त्री को मालूम हो जाये कि पेट में लड़की पल रही है तो वह अपना सोचे या होने वाले बच्चे का? लड़की की कोई कीमत नहीं हमारे समाज में, सिर्फ बोझ है, यह सिर्फ उनके लिए नहीं जो गरीब हैं बल्कि उनमें अधिक है जिनके पास सब कुछ है."

सब डाक्टर केवल दया के लिए गर्भपात करते हैं यह मैं नहीं मानता. पैसे कमाने का लालच इसकी सबसे बड़ी वजह है. कानून बन कर भी कोई इसके विरुद्ध कुछ नहीं कर पा रहा तो समाज को कौन बदलेगा? जब तक समाज नहीं बदलेगा हर रोज़ हजारों बच्चों के खून की यह धारा कैसे रुकेगी? कौन बदलेगा हमारे धर्मग्रंथों को जो बेटे को सब कुछ मानते हैं और "पुत्रवती हो" का आशीर्वाद देते हैं?

गुरुवार, अगस्त 17, 2006

मेरे प्रिय कछुए

कछुआ भी कभी किसी का प्रिय पशु हो सकता है, मुझे विश्वास नहीं होता. मेरा सबसे प्रिय पशु तो कुत्ता है. बचपन से मुझे कुत्ते ही अच्छी लगते थे. नाना के यहाँ लूसी, मौसी के यहाँ राजा, जब भी किसी कुत्ते को देखता तो मन में सोचता कि काश मेरा भी कोई कुत्ता होता! एनिड ब्लाईटन की फेमस फाईव श्रृँखला की कोई किताब पढ़ने को मिलती तो जोर्ज और उसका कुत्ता टिम्मी मेरे सबसे प्रिय पात्र थे. किताब पढ़ता तो सपने देखता कि एक दिन मेरा भी कुत्ता होगा.

लेकिन माँ को कुत्ते बिल्कुल पसंद नहीं थे. "गंदा करते हैं, कौन साफ़ करेगा? नहीं, हमारे पास कुत्ते रखने की जगह नहीं", माँ कहती.

कभी सोचता, अगर पास में बिल्ली हो तो कैसा रहे? घर के आसपास कभी कोई बिल्ली के बच्चे मिल जाते तो कुछ दिन तक उनके पीछे दौड़ता. पर किसी बिल्ली से दिल का तार कभी ठीक से नहीं मिल पाया. कभी किसी बिल्ली के नाखूनों की खरौंचे खा कर मन दुखी हो जाता, कभी लगता कि बिल्ली को किसी की परवाह ही नहीं होती, वह अपनी ही दुनिया में रहती है, कभी मन किया तो करीब आ गयी, कभी मन न किया तो आप की ओर देखे भी नहीं.

कभी मन में सोचता कि पास में अगर बोलने वाला तोता हो तो कैसा रहे? यह इच्छा भी एनिड ब्लाईटन की ही पुस्तकों की वजह से ही मन मे आई थी. एडवेंचर श्रृँखला का तोता किकी भी मुझे टिम्मी कुत्ते जैसा ही पसंद था. उन सपनों के बहुत सालों के बाद दक्षिण अमरीका में एक यात्रा में एक बार रंग बिरंगे बड़े तोते देखे तो सोचा कि वैसा ही तोता होना चाहिए पर उन तोतों को अमेज़न के जँगल से बाहर ले जाना मना है इसलिए मन मसोस कर रह गया.

पर मन में कभी किसी कछुए के लिए ऐसा कुछ मससूस नहीं किया. मेरा स्कूल दिल्ली में बिरला मंदिर के साथ जुड़ा हुआ था और हर रोज़ दोपहर को खाने की छुट्टी का समय बिरला मंदिर के बागों में ही खेलते हुए गुज़रता था. वहाँ पानी में कछुए भी घूमते थे. हाई स्कूल के दिनों में एक दिन वहाँ एक मरा हुआ कछुआ मिला. मेरे साथी उसे देख कर नाक सिकोड़ रहे थे पर मैं उसे कागज़ में लपेट कर घर ले आया और माँ से छुप कर रसोई के चाकू से उसे काट कर उसके भीतर देखने की कोशिश करनी चाही. तब स्कूल में जीव विज्ञान की कक्षा में मेंढ़क जैसे जंतु काट चुके थे. पर रसोई का चाकू इस काम के लिए तेज़ नहीं था और कुछ नहीं काट पाया. अंत में तंग आ कर कछुए जी का बिना पोस्ट मार्टम किये ही दाह संस्कार कर दिया गया.

लेकिन आज हमारा घर कछुओं से भरा है. इस कथा का प्रारम्भ हुआ करीब पंद्रह सोलह साल पहले जब कोंगो से मेरा एक मित्र वहाँ से मेरे लिए हरे रंग के मेलाकीट पत्थर के बने दो कछुए ले कर आया. फ़िर पाकिस्तान से आने वाली एक मित्र मेरे लिए पेशावर से एक गुलाबी संगमरमर का कछुआ ले कर आई. बस वहाँ से शुरु हो गया हमारा कछुए जमा करने का शौक. ब्राज़ील, एक्वाडोर, केनिया, दक्षिण अफ्रीका, भारत के विभिन्न राज्यों से, अलग अलग देशों से कछुए हैं हमारे घर में. धातू की जाली के, पत्थर के, लकड़ी के, मिट्टी के, सब तरह के, सब रंगो के कछुए हैं. जब भी किसी नये देश में जाने का मौका मिलता है तो मैं कछुए खोजना नहीं भूलता.

पर शायद अब यह कछुए जमा करने का शौक शायद छौड़ना पड़े. "क्या, एक और कछुआ?", हमारी श्रीमति जी हर बार मेरे कछुओं को देख कर कहती है. पिछले दिनों में दो कछुए सफ़ाई करते हुए "गलती" से गिर कर टूट चुके हैं. मुझे लगता है कि और कछुए घर में आयेंगे तो यह गलतियाँ बढ़ सकती हैं. बहुत सोच कर भविष्य में मुखौटे जमा करने का फैसला किया है. दीवार के ऊपर लटके होंगे तो गलती से गिरेंगे भी नहीं.

आज की तस्वीरों में मेरे सकंलन से कुछ कछुए




शुक्रवार, अगस्त 11, 2006

उपदेश देना और कर के दिखाना

मेडस्केप पर आजकल एक नई बहस शुरु हुई है मोटे डाक्टरों के बारे में. बहस का विषय है "क्या मोटे डाक्टर अपना काम करने के लिए उपयुक्त हैं?"

मोटा होना स्वास्थ्य के लिए हानीकारक माना गया है क्योंकि इससे बहुत सी बीमारियों जैसे हृदय रोग, रक्तचाप का बढ़ना, डायबाटीज़, इत्यादि के होने की सम्भावना बढ़ जाती है. प्रश्न यह है कि डाक्टर का काम क्या केवल दूसरों का इलाज करना और सलाह देना है या उन्हें स्वयं प्रेरणादायद उदाहरण बन कर रहना चाहिए? अगर कोई मोटा डाक्टर किसी दूसरे व्यक्ति को सैर करने, कसरत करने, खाना कम खाने और पतला होने की सलाह दे, तो उसका असर होगा या नहीं?

जब कोई बात खुद पर लागू होती है तो उसे पढ़ने की रुचि भी बढ़ जाती है. क्योंकि पिछले दस सालों में मेरा वजन भी करीब दस किलो से अधिक बढ़ा है तो इस बहस का प्रश्न पढ़ कर दिल पर तीर की तरह लगा. और तुरंत पढ़ने लगा. मेडस्केप डाक्टरों के लिए शिक्षा और नयी जानकारी पाने का वेबपृष्ठ है, जो मुफ्त है बस केवल रजिस्ट्रेशन करना पड़ता है.

बहस के प्रश्न के उत्तर देने वाले दो पक्षों में बँट गये हैं. एक ओर है रोबर्ट सेंटोर जैसे लोग जो कहते है कि डाक्टर कोई फिल्मी सितारा या फुटबाल का खिलाड़ी नहीं, उनका कर्तव्य है कि जनता को अच्छा उदाहरण दें और दूसरों के लिए प्रेरणात्मक जीवन जीयें. वह सिगरेट पीने वाले डाक्टरों की भी बात करते हैं और कहते हैं कि आज ऐसे डाक्टर धीरे धीरे कम हो रहे हैं और अगर मोटापे पर भी वैसा ही प्रचार किया जाये तो भविष्य में मोटे डाक्टर भी कम हो जायेंगे. वह कहते हैं कि मोटे डाक्टर की दूसरों को पतले होने की सलाह मरीज़ों द्वारा गम्भीरता से नहीं ली जायेगी.

बहस के दूसरे पक्ष में हैं पेन्नी मारकेत्ती जैसे लोग जो मानते हैं कि दुनिया में वैसे ही मोटे लोगों के विरुद्ध सोचना, उन्हें सुस्त, गंदा और बेवकूफ समझना जैसे विचार फ़ैले हुऐ हैं, और इस तरह की बात उठाने वाले डाक्टर कट्टरपंथी हैं जो मानव की कमजोरियों को नहीं समझ पाते और अपनी बात सही होने की सोच में इतने लीन होते हैं कि दूसरों से सुहानूभूति से बात नहीं कर पाते, इसलिए उनकी सलाह का कम असर पड़ता है. दूसरी ओर मोटे डाक्टरों में मरीज़ों की स्थिति के बारे में अधिक समझ और सुहानुभूति होती है और उनका सम्बंध अपने मरीज़ों से अधिक अच्छा होता है.

बीच में कुछ और लोग भी हैं जो डाक्टरों के अधिक काम के बोझ तले मरने की बात करते हैं, कहते हैं कि वैसे ही बेचारों के पास साँस लेने की फुरसत नहीं. उनके घरवाले पहले ही नाराज रहते हैं कि उनके पास घर और परिवार के लिए कुछ समय नहीं होता. अगर अब उन्हें मरीज़ों को प्रेरणा देने के लिए पतले होने के लिए अगर हर रोज कसरत करने के लिए एक घँटे का समय और निकालना पड़े, तो यह समय वे कहाँ से निकालें?

मुझे भी लगता है कि ठीक से रहो, ऐसे करो, वैसे न करो, जब जरुरत से ज्यादा होने लगे तो जीवन की खुशी कुछ कम हो जाती है. काफी न पियो, वाईन न पियो, ऊँची ऐड़ी के जूते न पहने, तंग कपड़े न पहने, मिठाई न खाओ ... उपदेश सुनने लगो तो कभी खत्म ही नहीं होते. और ऐसे लम्बे जीवन का क्या फ़ायदा जिसमें कुछ भी ऐसा न हो जिससे आनंद मिले?

और यह भी है कि आधुनिक जीवन में मोटा होना जैसे घोर पाप बन गया है. सुंदरता का जमाना है. अगर आप जवान, सुंदर, पतले नहीं तो आप की कीमत कुछ कम है. कुछ समय पहले हाँगकाँग में एक कपड़े की दुकान में घुसा तो वहाँ काम करने वाली पतली सी नवयुवती मेरी ओर भागी भागी आई, "नहीं, आप के लिए यहाँ कुछ नहीं मिलेगा". उसके चेहरे का भाव देख कर, "यह मोटू बूढ़ा यहाँ कैसे घुस आया", मन को धक्का सा लगा और बिना कुछ कहे दुकान से बाहर निकल आया, यह नहीं कहा कि मैं अपने लिए नहीं, बेटे के लिए कुछ लेना चाहता था.

पर यह भी है कि वजन अधिक होने से सुस्ती सी रहती है, कपड़े ठीक से नहीं फिट होते है, और आजकल कुछ पतले होने के चक्कर में खूब वर्जिश हो रही है. वजन कम हुआ या नहीं, यह देखने की अभी हिम्मत नहीं आई. डरता हूँ कि अगर मशीन पर चढ़ूँ और सूई अपने स्थान से घटने की बजाय बढ़ गयी होगी तो कितना धक्का लगेगा. पर यह मेरी कोशिश किसी को प्रेरणा देने के लिए नहीं है, यह सिर्फ मेरे अपने लिए है.

और आप क्या कहते हैं? मोटे डाक्टरों की सलाह को क्या आप मानेंगे? और अगर मोटे और पतले डाक्टरों में से चुनना हो तो किसे चुनेंगे?
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