सोमवार, अगस्त 21, 2006

सही या गलत

मैं लंदन में अपनी पुरानी मित्र पाम के यहाँ बैठा था और बात हो रही थी यूरोपीय जन स्वास्थ्य अभियान की एक मीटिंग के आयोजन की. बात आयी कि विषय पर विशिष्ट भाषण देने के लिए किस जानी माने व्यक्ति को बुलाया जाये. कुछ नाम लेने के बाद मैंने कहा कि सुप्रसिद्ध अमरीकी लेखक व जाने पहचाने सहयोगी को बुलाया जाये (जानबूझ कर उनका नाम यहाँ लेना ठीक नहीं समझता) तो पाम ने न कहते हुए सिर हिला दिया. क्यों, वह बहुत अच्छा बोलता है और उसके आने से हमारी सभा में लोग भी बहुत आयेंगे. "तुमने उसके पीडोफिलिया (किशोरावस्था से छोटे बच्चों के साथ यौन सम्बंध करना) की बात नहीं सुनी?" पाम ने पूछा. छीः, मुझे विश्वास नहीं हुआ कि कोई इतने अच्छे व्यक्ति के बारे में ऐसा भी सोच सकता है! सिर्फ बातें नहीं हैं, सच है, पाम ने बताया, "मैंने स्वयं उससे इस विषय में बात की है, सब सच है. वह स्वीकारता है पर वह कहता कि वह कुछ गलत नहीं कर रहा. वह किसी बच्चे से कभी जबरदस्ती नहीं करता. बच्चों में भी यौनता होती है और उन सभी बच्चों से उसे बहुत प्रेम है, कहता है."

बहुत धक्का लगा यह सुन कर.

अँग्रेजी में वैज्ञानिक साहित्य के सुप्रसिद्ध लेखक आर्थर सी क्लार्क जिन्होंने "2001 ए स्पेस ओडिसी" जैसी फिल्मों की कहानी लिखी, जो कि श्रीलंका में बहुत सालों से रहते हैं, उनके बारे में एक बार ऐसी ही बात सुनी थी और कहा गया था कि उन्होंने अपने बचाव में ऐसा ही कुछ कहा था कि वह तो उन गरीब बच्चों की मदद कर रहे हैं और उन्होंने कभी किसी बच्चे से जबरदस्ती नहीं की. बाद में श्री क्लार्क पर से यह इलज़ाम हटा लिया गया था और उन्हें ब्रिटिश सरकार से नाईट (Knight) का खिताब भी मिला था.

यह सोचना कि बच्चों के साथ जबरदस्ती नहीं होती, प्रेम का सम्बंध होता है, मेरे विचार में सच्चाई से भागना है. छोटा बच्चा जिसका व्यक्तित्व नहीं बना, अपने साथ रहने वाले व्यस्क व्यक्ति पर शारीरिक जरुरतों के साथ साथ भावात्मक जरुरतों पर भी निर्भर होता है और बच्चों से यौन सम्बंध उसी भावात्मक निर्भरता का गलत उपयोग करते हैं. यह तो हर हालत में बाल बलात्कार ही होगा, एक घृणित अपराध.
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मैं और मेरे इतालवी साथी रोबर्तो दक्षिण अमरीकी देश गुयाना में एक स्टीमर में नदी पार कर रहे थे. रोबर्तो और मेरी बहस करने की पुरानी आदत है, उसे मुझे भड़काना अच्छी तरह से आता है. जहाँ मुझे हर बात के विभिन्न पहलू देखना अच्छा लगता है, रोबर्तो की नजर में दुनिया की हर बात के दो ही पहलू होते हैं, एक सही और दूसरा गलत. उस दिन भी हम दोनो बहस में उलझे थे. तभी एक छोटा सा बच्चा हारमोनिका बजाता हुआ सामने आ खड़ा हुआ. बच्चे के संगीत के समाप्त होने पर मैंने उसे कुछ पैसे दिये और पास बुला कर उससे उसका नाम पूछा और पूछा कि वह स्कूल जाता है या नहीं? कुछ देर तक बाते करते रहे तो मैंने बच्चे से पूछा कि क्या मैं उसकी तस्वीर ले सकता हूँ? बच्चे के हाँ कहने पर उसकी तस्वीर ले रहा था कि रोबर्तो ने इतालवी में कहा, "ध्यान रखो, अधिक छूओ नहीं बच्चे को, दूर दूर से बात करो, अगर इस बच्चे का बाप यहाँ आसपास होगा तो समझेगा कि तुम भी पीडोफाईल (किशोरावस्था से छोटे बच्चों से यौन सम्बंध रखने वाला व्यक्ति) हो!"

हमारी भारतीय संस्कृति में बच्चों को लाड़ना पुचकारना सामान्य बात समझी जाती है और जाने अनजाने किसी को भी हम अंकल जी और आंटी जी बना लेते हैं, इस तरह की बात मेरे मन में आ ही नहीं सकती थी कि कोई मेरे कोतूहल को इस दृष्टि से भी देख सकता था. मैंने सुना है गोवा में कुछ पर्यटक इसी लिए पकड़े गये थे कि छोटे बच्चों को पैसे दे कर उनसे यौन सम्बंध बनाते थे. बैंकाक की बच्चियाँ या कलकत्ता के सोना गाची की बच्चियाँ जिन्हें छोटी सी ही उम्र में शरीर बेचने के काम में लगा दिया जाता है, उसके बारे में भी सुना है इसलिए मानता हूँ कि दुनिया में ऐसे लोग भी होते हैं जिनसे माँ पिता को सावधान रहना चाहिए.

पर यह सोच कर कि कोई हमें इस संदेह से न देखे, इसलिए हम अपनी प्राकृतिक जाने अनजाने बच्चों को प्यार करने की भावना को दबा दें, मुझे ठीक नहीं लगता. दूसरी तरफ़ किसी के मुख पर नहीं लिखा होता कि उसके मन में क्या होता है, तो फ़िर क्या करें? क्या सही है और क्या गलत?

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपने तो उलझन में डाल दिया, कभी इस ओर सोचा ही नहीं. बच्चे का प्यार से गाल थपथपा देने की आदत हैं, कोई गलत तो नहीं समझेगा?
    अरे बच्चे की मासुमियत पर दील वारी-वारी हो जाए यह तो स्वभाविक हैं.

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  2. आपने एक बार फिर मानव समाज के एक नग्न यथार्थ की परतें खोलने की कोशिश की है। भारतीय लोगों की मानसिकता में भी पीडोफीलिया बहुत हद तक फैल चुका है। अख़बारों में अक्सर इस तरह की ख़बरें दिखाई दे जाती हैं। छ: माह के अबोध बच्चे के साथ यौनाचार की ख़बर पिछले हफ्ते भी आई थी। पिछले वर्ष की चर्चित फिल्म 'पेज थ्री' में भारतीय कुलीन समाज के इस यथार्थ को बहुत बेबाकी ढंग से दिखाया गया था।

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  3. खास तौर पर पश्चिमी देशों मे आकर तो लगने लगा है कि वाकई अब बच्चों को प्यार से पुचकारने या लाड़ दिखाने का समय ही खतम हो गया.अकसर किसी बच्चे को देखकर प्यार से, भारत की तरह, थपथपाने का मन हो भी आता है, तो ईच्छा तुरंत सामाजिक मान्यताओं को देख कर दबा लेनी पड़ती है, कम से कम तब, जब आप बच्चे और उसके माता पिता से परिचित ना हो.
    बहुत सही विषय पर चर्चा की है आपने.

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  4. कई बार कुछ छोटे बच्चे बहुत प्यारे लगते हैं लेकिन बस ज्यादा हुआ तो बस हाथ हिला देता हूं, ऐसा ही मेरे बेटे के साथ लोग करते हैं। मन को समझाता हूं, हम भारत में नही हैं।

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  5. सुनीलजी,
    बहुत अछा लिखा है । आपसे एक बात जाननी थी की क्या जन्सत्ता पेपर नेट पर उप्लब्ध है! यदि नही तो आप को ओम थान्वी के लेख कैसे मिलते हैं । आप मुझे मेरे ब्लोग पर बता सकते हैं ।

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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