गुरुवार, अक्तूबर 12, 2006

हमारे बच्चों की धरती

शाम को टेलीविजन देख रहे थे जब एक नया विज्ञापन देखा, अमरीकी केलिफ्रोनिया के आलुबुखारों को बेचने का. विज्ञापन दिखाता है कि हर आलुबुखारा एक चमकीली पन्नी में बंद होगा जैसे बच्चों की टाफी या चाकलेट बेचते हैं. मुझे लगा कि यह विज्ञापन आज की "कूड़ा बढ़ाओ" संस्कृति का ही एक हिस्सा है.

कुछ भी खरीदिये, तो वह अपने साथ डिब्बे, पोलीफोम, कागज़, प्लास्टिक इत्यादि के साथ आता है, जो सीधा कूड़े में जाते हैं. अधिकाँश खरीदी हुई वस्तुएँ भी कुछ समय के बाद कूड़े में ही जाती हैं. भारत में बिगड़ा टेलीविज़न या रेडियो ठीक करवाना अभी भी हो सकता है, पर यहाँ यूरोप में ठीक करवाने की कीमत इतनी लगती है कि यह कठिन हो जाता है.

हमारा सत्तर यूरो का खरीदा सीडी प्लेयर जब खराब हुआ तो मैं उसे दुकान पर ठीक करवाने ले गया. ठीक करवाने के तीस यूरो का बिल जब भरा तो सोचा कि अगली बार कुछ खराबी होगी तो नया लेना ही बेहतर होगा. शाम को कुत्ते के साथ जब सैर को निकलता हूँ तो सड़क के किनारे बने कूड़ा इक्ट्ठा करने वाले डिब्बों के साथ साथ टीवी, फ्रिज, अलमारियाँ, रेडियो, गद्दे, सोफे, सब मिल सकते हैं.

यह कूड़ा कहाँ डालें नगरपालिकाएँ? कोई शहर या नगरपालिका अपने इलाके में कूड़ा जमा करने वाली खान नहीं रखना चाहती.
कहते हैं कि कूड़े से आसपास की सारी धरती का प्रदूषण होता है. हमारे शहर के बाहर की ओर जहाँ लोग नहीं रहते, कूड़े की पहाड़ियाँ बना रहे हैं. जब बहुत ऊँची हो जाती हैं तब उन्हें मिट्टी से ढ़क कर, ऊपर घास लगा कर, सुंदर बना दिया जाता है.

एक तरफ कूड़ा है और दूसरी ओर प्रदूषण. सड़कों पर कारों की भीड़ कम नहीं होती. सुबह सुबह काम पर जाते समय एक के पीछे दूसरी कार लगे देख कर, हर एक कार में देर होने के गुस्से से मुँह फुलाये लोगों के तनावपूर्ण चेहरे देखने को मिलते हैं, पर टेलीविजन और अखबारें यह बात करती हैं कि कारों की बिक्री कम हो गयी है, अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है और सरकार नयी स्कीम निकालती है कि नयी कार खरीदेंगे तो जाने कितनी छूट मिलेगी और फायदा यह कि आप की पुरानी कार सीधा कारों के शमशानघाट पर बिना खर्चे के ले जाई जायेगी.

वही सरकार चिंता व्यक्त करती है कि अरे गर्मी बहुत बढ़ रही है, समुद्र में जल का स्तर ऊपर उठ रहा है, जाने कितने द्वीप पानी में डूब जायेंगे, जाने कितने तूफान आयेंगे, जाने कितने रेगिस्तान बढ़ते जायेंगे और उर्वर धरती को खा जायेंगे. अपने बेचने, खरीदने और फैंकने को कम करने की भी कोई सलाह देता है. कोई मेरे जैसा नासमझ सोचता है कि साइकल पर काम पर जा कर और कार का उपयोग कम करके ही दुनिया को हम बचा सकते हैं.

चीन और भारत में जो विकास हो रहा है, उससे तो और भी खतरा महसूस हो रहा है सबको. अगर भारत और चीन भी विकसित देशों की तरह धरती के बलात्कार में जुट जायेंगे तो दुनिया कहाँ जायेगी, पूछते हैं और सलाह देते हैं कि इन्हें विकास के नये तरीके खोजने होंगे. अपने बच्चों के लिए कल के जीवन की रक्षा करनी है हमें, कहते हैं.

आप देते रहिये सलाह, सभाएँ करिये और नयी नयी योजनाएँ बनाईये. कुछ भी नयी तकनीक जिससे प्रदूषण कम हो सकता है उसे बाँटने के लिए हमें खूब मुनाफा चाहिये, यहाँ तक कि लाखों की जान बचाने वाली दवाईयों को भी हम बिना करोड़ों के लाभ के बिना नहीं बेचना चाहते. सारा जीवन का सबसे बड़ा मंत्र जब व्यापार है और अगर यहाँ का मानव सिर्फ अपना आज का, अभी का सुख देख पाता है, तो भारत और चीन के मानव भी उस जैसे ही हैं, और वहाँ भी बेचने वाले बिक्री बढ़ाने के नये नये तरीके खोज रहे हैं. अगर विकास का यही अर्थ दिया है कि अधिक से अधिक बेचो और फैंकों तो फ़िर चिंता कैसी, सभी को विकसित होने दीजिये. जब साथ साथ ही डूबना है तो हम भी क्यों न मजे ले कर डूबें?
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आज दो तस्वीरें मिस्र की राजधानी कैरो में अल अजहर बाग से जो कि एक पुराने कूड़े के ढेर पर ही बनाया गया है.





1 टिप्पणी:

  1. प्रेमलता पांडे12 अक्तूबर 2006 को 1:48 pm

    समसामयिक और आज की सर्वप्रमुख चिंताओं को कुरेदने वाला आलेख है जो सभी को सोचने को विवश कर सकता है।

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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