मंगलवार, सितंबर 26, 2006

सबके सामने

वृद्ध प्रोफेसर साहब मेरे गुरु रह चुके थे. बहुत साल हो गये उनको रिटाटर हुए पर कोई भी बड़ी सभा हो तो उनके बिना अधूरी सी लगे. बात हो रही थी सभा के कार्यक्रम की.

मैंने कहा, "अगर कोई व्यक्ति अपनी आत्मकथा कहे, बताये कि उसे कुष्ठ रोग होने से क्या क्या सहना पड़ा, किस भेद भाव से लड़ना पड़ता है इस बिमारी से प्रभावित लोगों को, तो उसका असर अधिक पड़ेगा. और अगर वह व्यक्ति जाना पहचाना और प्रसिद्ध भी है तो और भी अच्छा!"

असल में मैं चाहता था कि प्रोफेसर साहब अपनी कहानी सुनायें, क्योंकि मुझे मालूम था कि प्रोफेसर साहब को स्वयं भी यह रोग हो चुका था. पर वह कुछ नहीं बोले, चुपचाप बैठे रहे, और बात दूसरी दिशा में निकल गयी.

कुछ समय के बाद मैंने फ़िर से कोशिश की और वही बात दोबारा उठायी. बोला, "मुझे कुछ डर नहीं है, मैं ही सबके सामने कह सकता हूँ कि मुझे कुष्ठ रोग हुआ था पर मेरे पास इसके साथ सुनाने वाली कोई आत्मकथा नहीं है."

शायद प्रोफेसर साहब कुछ समझ गये, थोड़ी देर तक चुप रहे फ़िर धीरे से बोले, "बात केवल अपने आप के लिए डर की नहीं है, यह सोचना पड़ता है कि परिवार पर, बच्चों पर, इसका क्या असर पड़ता है. उनका क्या कसूर है जिसके लिए उन्हें बात सुननी पड़े या तकलीफ़ हो."

मुझे थोड़ी शर्म आयी. अपनी बात कर सकता हूँ पर किसी दूसरे की क्या मजबूरी हो सकती है, उसको न समझ कर उससे अपेक्षा करना गलत है.

आऊटलुक में प्रसिद्ध लेखक विक्रम सेठ का लम्बा साक्षात्कार पढ़ा तो इस बात की याद आ गयी. बहुत सी बातें हैं जिन्हें परम्परागत समाज में कहना और बताना कठिन है. कुष्ठ, यक्ष्मा (टीबी), एडस्, मिर्गी, मानसिक रोग, जैसी बहुत सी बीमारियाँ हैं जिनके होने पर आप को केवल बीमारी से नहीं बल्कि सामाजिक भेदभाव से भी लड़ना पड़ता है और अधिकतर लोग इन बातों को छुपा कर रखने की कोशिश करते हैं. वैसा ही भेदभाव और तिरस्कार बलात्कार की शिकार लड़कियों को, बिन ब्याही माओं को, समलैंगिक लोगों को मिलता है. ऐसे में विक्रम सेठ जैसे जाने माने लेखक का खुल कर स्वीकार करना कि वह द्वीलैंगिक हैं, स्त्रियों और पुरुषों, दोनो से उनके सम्बंध रहे हैं हिम्मत की बात है. सेठ ने यह साक्षात्कार भारतीय कानून की धारा 377 को हटाने के अभियान के सिलसिले में दिया है.

1875 में बना धारा 377 का कानून जो समलैंगिक सम्बंधों को गैरकानूनी कह कर उन्हें दण्डनीय अपराध करार देता है, पिछड़ी मानसिकता का प्रतीक है जब यह माना जाता था कि समलैंगिक सम्बंध विकृति हैं जिसका इलाज किया जाना चाहिये. आज की दुनिया में यह कानून मानव अधिकारों का उल्लघँन माना जायेगा.

बहुत साल पहले अभिनेत्री नीना गुप्ता ने अपने बिन ब्याही माँ होने की बात को खुले आम स्वीकार किया था. केवल किसी एक के कहने से, सब के सामने खुल कर आने से समाज नहीं बदलता, पर शायद उससे बहुत से लोग जो उस स्थिति में छुप कर रह रहे हैं, उन्हें थोड़ा सहारा मिल जाता है कि वह अकेले नहीं.

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