शुक्रवार, सितंबर 01, 2006

सांस्कृतिक भिन्नता

मैं अपनी मित्र के साथ बाग में बने केफ़े में बैठा था. बहुत समय के बाद मुलाकात हुई थी. वह यहाँ से करीब सौ किलोमीटर दूर रिमिनी शहर में रहती है. बोली, "तुम्हें 16 सितम्बर को रिमिनी आ सकते हो क्या, हम लोग एक सभा कर रहे हैं, तुम भी होगे तो अच्छा लगेगा."

सोचना नहीं पड़ा, बोला, "16 को तो शायद नहीं आ पाऊँगा, उस दिन भारत से मेरे दादा भाभी यहाँ आ रहे हैं, दादा की पेरिस में मीटिंग है और वहाँ से वे दोनो तीन चार दिनों के लिए यहाँ आएँगे."

"पर तुम्हारा तो कोई भाई नहीं है!" उसने कहा तो मैंने बुआ के परिवार के बारे में बताया और कुछ भारतीय परिवारों के बारे में कि बुआ या मामा के बच्चे अपने सगे भाई बहनों से कम नहीं होते.

"एक शाम की ही तो बात है, उन्हें कुछ घँटों के लिए घर के बाकी लोगों के साथ रहने देना, तुम्हारे बिना सभा अच्छी नहीं होगी", उसने ज़िद की.

मुझे हँसी आ गयी, "वाह, इतने सालों के बाद भाभी के साथ रहने का मौका मिलेगा, उसमे से एक पल भी नहीं खोना चाहूँगा." मैंने उसे उन दिनों के बारे में बताया जब दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ता था, तब दादा और भाभी का प्रेम चल रहा था, विवाह नहीं हुआ था, मुझे लगता था कि भाभी से सुंदर लड़की दुनिया में हो ही नहीं सकती. शादी के बाद कहता था कि भाभी जैसी लड़की मिलनी चाहिए!

"लगता है कि भाभी से कुछ विषेश ही प्यार है, उनकी बात करते हो तो तुम्हारी आँखों में चमक आ जाती है", मित्र बोली और मैंने सिर हिलाया. "क्या केवल मन ही मन प्यार करते थे या बात कुछ आगे भी बढ़ी कभी?" वह प्रश्न पूछते समय मुस्करायी.

स्तब्ध रह गया मैं. छीः, यह कैसा बेहूदा प्रश्न हुआ? अचानक गुस्सा आ गया, कुछ बोला नहीं पाया. शायद उसने मेरे चेहरे से भाँप लिया था कि उसका प्रश्न कुछ ठीक नहीं था, बोली, "क्या हुआ? नाजुक सवाल था शायद, इस बारे में बात नहीं करना चाहते?"

मैंने स्वयं को समझाया कि गुस्सा करना बेकार था, यह हमारी सोच की सांस्कृतिक भिन्नता थी. उसे भारतीय परिवार में देवर भाभी के रिश्ते की क्या समझ हो सकती थी? उसे क्या मालूम था रामायण के बारे में और सीता और लक्षमण के आदर्श के बारे में? उसे इसके बारे में कुछ तो बताया पर अंदर से लगा कि ठीक से समझाना कठिन होगा.

गुस्सा ठँडा हुआ तो शाम को घूमते समय, मन में छुपे सामाजिक और नैतिक निषेधों के बारे में सोचने लगा, जो बचपन से ही रामायण और अन्य कथाओं से, या फ़िर आम व्यावहार से हमारे विचारों में इस तरह घुलमिल जाते हैं. उन्हे छेड़ना सोते शेर को जगाना है. उसका इशारा मात्र ही हिला कर रख देता है.

संयुक्त परिवार में जहाँ विभिन्न भाई साथ रहते हैं, उस समाज में जहाँ किशोरावस्था के बाद युवक और युवतियों को मिलने का, साथ रहने का मौका मिलना कम हो जाता है या नहीं रहता, उस स्थिति में देवर भाभी के रिश्ते को निषेधों में इस तरह बाँधना कि रिश्ते की सीमाओं को पार करना का विचार भी पाप लगे, परिवार की शाँती और समाज की स्थिरता के लिए आवश्यक होगा, पर जब स्थिति बदल जाती है तो क्या पुराने निषेध भी बदल जाते हैं? जैसे आज जब संयुक्त परिवार टूट रहे हैं या कम हो रहे हें तो क्या भारतीय समाज में भी देवर भाभी के नाते बदल जायेंगे?
*****

बहुत साल पहले डेविड लीन की फ़िल्म रायन की बेटी (Ryan's Daughter) देखी थी. आयरलैंड के समुद्री तट पर बसे एक गाँव के पब मालिक रायन की बेटी रोज़ी (Sarah Miles) की कहानी थी. जीवन से भरी, चंचल रोज़ी का विवाह होता है गाँव के शाँत प्रौढ़ स्कूल मास्टर (Roberto Mitchum) से. रोज़ी की दोस्ती हो जाती है गाँव में आये एक अँग्रेजी सिपाही (Christopher Jones) से. बाद में जब आयरिश क्राँतीकारियों की बँदूकें पकड़ी जाती हैं तो सबका शक रोज़ी पर ही पड़ता है, गद्दार हो कर दुश्मन के पुरुष को प्यार करने के अपराध की सजा मिलती है उसे जब गाँव के लोग उसका सिर मूढ़ कर, मुँह काला कर देते हैं.

द्वितीय महायुद्ध के दौरान इतालवी और फ्राँसिसी महिलाओं के जर्मन सिपाहियों से प्यार और सम्बंधों को भी युद्ध के बाद ऐसी ही सजा दी गयीं थीं.

कल रात को समाचारों में जब चेचेन्या की मल्लिका को पुलिस द्वारा नँगा करके, सिर मूढ़ा कर, माथे पर हरा निशान बना कर मार खाने का वीडियो देखा तो रायन की बेटी की याद आ गयी. मल्लिका का कसूर है कि उस पर चेचेन्या की मुसलमान हो कर रुसी दुश्मनों के इसाई सिपाही से प्यार करने का शक है. यह वीडियो न्यू योर्क टाईमस के वेबपृष्ठ पर देखा जा सकता है.

सच है कि इतिहास नहीं बदलता, बार बार हम अपना सभ्य होना भूल कर पुरानी बर्बरता में गिर जाते हैं. कमज़ोर पर ही इस बर्बरता की भड़ास निकाल जाती है, सबसे अधिक औरतों पर. नेपाल में जब घर में होने वाली हिंसा की बात हो रही थी तो गाँव की औरते कहती थीं कि पतियों को गर्भवती स्त्री के पेट पर लात मारने में विषेश आनंद आता है. गर्भवती मल्लिका को लात मारने वाले पुलिस वालों को भी इसी आनंद की खोज है. कितने भिन्न हैं हम आपस में और कितने मिलते हैं एक दूसरे से!

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपने बडी बारीकी से विभिन्न सँस्कृति और रिश्तोँ की बात की है. और हाँ हम भिन्न होते हुए भी एक दूसरे से मिलते हैँ ,क्योँ कि प्रेम और गुनाह दोनो ही आदमी के मौलिक गुण हैँ!

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  2. अपका ये लेख लम्बा है - साइबर केफे से कॉपी करलिया अब घर जकर पढूंगा :)

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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