गुरुवार, सितंबर 08, 2005

लेखक या साहित्यकार

कल अमरीकी लेखक जोह्न ग्रीशम (John Grisham) बोलोनिया विश्वविद्यालय में आने वाले हैं. उनकी नयी किताब, "द बरोकर" (The Broker), की कहानी हमारे शहर बोलोनिया में ही बनायी गयी है. लोग सोच रहे हैं कि शायद ग्रीशम की यह किताब पढ़ कर, हमारे शहर में कुछ अधिक पर्यटक आयेंगे. यहाँ रोम, वेनिस, फ्लोरेंस आदि शहरों के सामने, बेचारी बोलोनिया को कोई नहीं पूछता.

अगर मैं कोई सवाल पूछ सकूँ श्रीमान ग्रीशम से, तो वो यह होगा, "जब आलोचक आप को जनप्रिय लेखक कहते हैं पर आपको साहित्यकार नहीं मानते तो आप इस बारे में क्या सोचते हैं ?" उन्होंने इस तरह के आलोचनाओं के बाद, कुछ गम्भीर तरीके से भी लिखने की कोशिश की है, जैसे "यैलो हाऊस" (Yellow House), पर उनके ऐसे उपन्यासों को न तो सफलता मिली और न ही आलोचनों ने अपनी राय बदली. मैंने स्वयं भी, उनकी कई किताबें खूब मजे से पढ़ीं पर उनका गम्भीर "साहित्य" मुझसे नहीं पढ़ा गया.

इसी बारे में सोच रहा हूँ, क्या फर्क है आम लेखक में और साहित्यकार में ? मेरी दो प्रिय लेखिकाओं, शिवानी और आशापूर्णा देवी, को बहुत साल तक आलोचक आम लेखक, या "रसोई लेखिकाँए" कहते रहे. बचपन में मेरे स्कूल में हिंदी के एक बहुत बिकने वाले लेखक का पुत्र पढ़ता था, उन लेखक का नाम मुझे ठीक से याद नहीं, शायद दत्त भारती जी या ऐसा ही कुछ था. लेकिन अगर घर में कोई उनकी किताब पढ़ते हुए देख लेता तो कहता, "क्या कूड़ा पढ़ रहो हो". बचपन में पढ़ी गुलशन नंदा जैसे लेखकों की किताबें या फिर जासूसी उपन्यास इसी श्रेणीं में गिने जाते थे, कूड़ा. पर उन्हें पढ़ने में बहुत आनंद आता था.

तो सोच रहा था, किस बात से आम लेखन का साहित्य से भेद किया जा सकता है ? भाषा के उपयोग से ? याने साधारण लेखन सरल, आसानी से समझ आने वाली भाषा का प्रयोग करते हैं, पर साहित्यकार की भाषा अधिक कठिन होती है ? यह अंतर मुझे कुछ ठीक नहीं लगता, क्योंकि मेरे विचार में कई साहित्यकार हैं जो आसान भाषा का प्रयोग करते हैं. शायद लिखने की गहराई से साहित्यता को मापने का कोई नाता था ? या कथा के विषय से ? या लेखक किस तरह से कथा का विकास करता है ? या फिर आलोचक के अपने विचारों से ? बहुत सोच कर भी कोई सरल नियम जिससे यह आसानी से कहा जाये कि यह साहित्य है और यह साधारण लेखन है, मुझे समझ में नहीं आया. शायद मरने के बाद आम लेखक का साहित्यकार बनना अधिक आसान है.


आज हमारे शहर बोलोनिया की दो तस्वीरे

3 टिप्‍पणियां:

  1. my 2 cents its a linear equation of varying degrees of percieved cheapness which include but is not limited to : subject matter, presentation, vernacularity of the language, authors intellectual history.

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  2. हालही में मैंने भी The Broker पढ़ी, उपन्‍यास खत्‍म होने तक पाठकों का बांध कर रखता है। वैसे, मेरे ख्‍याल से तो भाषा से ज़्यादा भाव महत्‍वपूर्ण हैं। अगर लेखक के विचार और पुस्‍तक का सन्‍देश उत्‍कृष्‍ट हैं, तो वह पुस्‍तक 'साहित्‍य' के अन्‍तर्गत आती है।

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  3. शायद मरने के बाद आम लेखक का साहित्यकार बनना अधिक आसान है. :)

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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