बुधवार, अप्रैल 19, 2006

नेपाल जल रहा है

मोज़ाम्बीक में था तो भी नेपाल के समाचार मिल रहे थे. हर रोज़ पुलिस लोगों पर गोली चला रही, लाठियाँ बरसा रही है. आग लगी है नेपाल में और मन में बार बार वहाँ के स्थिति के बारे में चिंता होती है.

पंद्रह साल पहले जब बर्लिन की दीवार गिरी थी तब एक के बाद एक, पुलिस, मिलेट्री और बंदूकों से रक्षित तानाशाहों को अचानक समझ आया था कि जिन किलों में बंद करके खुद को सुरक्षित महसूस करते थे वे बालू के किले थे जो जनरोष के सामने आसानी से ठह गये थे. वैसा ही लगता है नेपाल के बारे में भी. जिस तरह से डाक्टर, वकील, छात्र, पर्यटन कार्य वाले, आम व्यक्ति, सब लोग मिल कर नेपाल के राजा से प्रजातंत्र लाने के लिए मांग कर रहे हैं, उसके सामने पुलिस का दमन अधिक नहीं चल सकता. मेरे विचार में पुलिस और मिलेट्री वाले भी जनता के साथ हो जायेंगे क्योंकि अगर सारा नेपाल मिल कर एक आवाज़ से बदलाव माँग रहा है तो वे इससे बाहर नहीं रह सकते.

यह ताश के पत्तों का किला गिरेगा तो सही, पर गिरने से पहले कितनों की जानें लेगा ?

1 टिप्पणी:

  1. राजा ज्ञानेन्द्र 'राजतंत्र' को समाप्त कर के ही मानेंगे। आम जनता मे राजतंत्र के लिये जो थोडा बहुत बचा हुआ सम्मान था वह भी अब खत्म हो चुका है।
    वैसे यह सही भी होगा लेकिन खून जरूर बहेगा।

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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