बुधवार, मार्च 21, 2007

कबूतर और कौए

शाम को कुत्ते के साथ सैर से वापस आ रहा था कि बैंच पर चिपके कागज़ को देख कर रुक गया. बाग में पत्थर के कई बैंच बने हैं जहाँ गरमियों में लोग शाम को बाहर बैठ कर अड़ोसियों पड़ोसियों से गप्प बाजी करते हैं.

कागज़ पर लिखा था, "मैं रोज़ यह बैंच साफ करती हूँ ताकि हम लोग यहाँ बैठ कर बातचीत कर सकें, पर कबूतरों की बीट से यह इतना गन्दा हो जाता है कि सफाई करना कठिन हो गया है. मैंने पहले भी इस बारे में कहा था पर शाँति से कोई बात की जाये तो शायद समझ में नहीं आती. तो मुझे अन्य तरीके भी आते हैं. कबूतरों को खाना देना कानूनी जुर्म है. एक औरत को इसके लिए 500 यूरो का जुर्माना देना पड़ा था. मैं भी पुलिस में रिपोर्ट कर सकती हूँ."

पढ़ कर थोड़ी सी हँसी आई. कुछ कबूतरों की बीट के लिए इतना तमाशा! अगर आप कभी अपार्टमेंट में रहे हैं तो साथ रहते हुए पड़ोसियों के झगड़े छोटी छोटी बात पर भी कितने बढ़ सकते हें, इसका अंदाज़ा आप को हो सकता है. जहाँ हम रहते हैं वहाँ भी कुछ न कुछ झगड़े चलते ही रहते हैं. अभी तक रात को शोर मचाने का, ऊपर बालकनी से कालीन झाड़ने का और नीचे वालों के घर गंदा करने का, पार्किग में बाहर के लोगों की कार रखने का, बिल्लियों को खाना दे कर बढ़ावा देने का, आदि झगड़े तो सुने थे, पर यह कबूतरों की बात अनोखी लगी.

आगे बढ़ा तो एक पेड़ पर एक और कागज चिपका था. उस पर लिखा था, "सब लोग मुझे ही दोष देते हैं. पर मैं बेकसूर हूँ और मैंने कभी कबूतरों को खाना नहीं दिया. जो भी कबूतरों को खाना देता है उससे अनुरोध है कि वह यह न करे क्योंकि बाद में सब मुझसे ही झगड़ते हैं."

यह सच है कि इटली में बहुत से शहरों में सरकार कहती है कि कबूतरों को कुछ खाने को न दें क्योंकि उनकी संख्या बढ़ती जा रही है, वह गंदगी फ़ैलाते हैं और सफाई करने वालों को बहुत दिक्कत होती है. वेनिस में रहने वाले मेरे एक इतालवी पत्रकार मित्र को कबूतरों से बहुत चिढ़ है. दफ्तर में उसकी खिड़की के पास कोई कबूतर बैठने की हिमाकत करे तो चिल्लाने लगता है, "भद्दे गंदे जानवर!"

दूसरी और पर्यटकों को इटली के कबूतर बहुत अच्छे लगते हैं और वेनिस, मिलान जैसे शहरों में कई जगह पर कबूतरों को देने के लिए मक्की के दाने के पैकेट मिलते हैं, जैसे ही आप दानों को हाथों में लेते हैं, कबूतर आप के कँधों, हाथों पर बैठ कर चोंच से दाने छीन लेते हैं. वेनिस का सन मार्को गिरजाघर और मिलान का दूओमो इसके लिए हमेशा कबूतरों की फोटो खींचने वाले पर्यटकों से भरे रहते हैं.

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एक जर्मन पत्रिका में जापान में रहने वाले फ्लोरियन कूलमास का जापान की राजधानी टोकियो के बारे में एक लेख पढ़ा जिसमें लिखा है कि टोकियो में कौओं की बहुत मुसीबत है और टोकियोवासी बहुत परेशान हैं कि कैसे इन कौओं की संख्या कम करने का कोई उपाय खोजा जाये. वह लिखते हैं, "कोलतार की तरह काले, चाकू की तरह तेज धार वाली चोंच वाले कौए जब पँख फैलायें तो एक मीटर भी अधिक चौड़े होते हैं और देख कर ही डर लगता है. पंद्रह साल पहले टोकियो में करीब सात हजार कौए थे आज करीब पचास हजार. टोकियोवासियों में कोओं की समस्या की बहुत चिंता है. कूड़े के थैलों को चोंच मार कर खोल लेते हैं, जिसका उपाय यह निकाला गया है कि कूड़ा पीले थैलों में रखा जाये क्योंकि यह कहा जाता कि कौओं को पीला रंग नहीं दिखाई देता. फ़िर यहाँ भूचाल के डर से सभी तारें आदि ज़मीन में नहीं गाड़ी जाती बल्कि ऊपर खँबों पर लगायी जाती हैं, तो कौओं को मालूम चल गया कि तीव्रगति वाले इंटरनेट के संचार के लिए जो ओपटिकल केबल लगाये गये हैं उनमें बिजली का धक्का लगने का खतरा नहीं होता इसलिए वे चोंच मार-मार कर उस पर से प्लासटिक को उतार लेते हैं और उसे अपने घौंसलों में लगाते हें ताकि घौंसले पानी से गीले न हों, जिसकी वजह से अक्सर लोगों के इंटरनेट के क्नेक्शन खराब हो जाते हैं."

यानि कहीं कबूतरों का रोना है तो कहीं कौओं का!

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कुछ तस्वीरें वेनिस और मिलान के कबूतरों की.








8 टिप्‍पणियां:

  1. हर शहर अपने वि‍शिष्‍ट तेवर रखता है। हम अभी परिंदों को बख्‍श रहे हैं, दिल्‍ली तो सड़क की आवारा गायों और छुट्टे सांडों से निजात पा ले इतना काफी है।

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  2. वेनिस, मिलान जैसे शहरों में कई जगह पर कबूतरों को देने के लिए मक्की के दाने के पैकेट मिलते हैं, जैसे ही आप दानों को हाथों में लेते हैं, कबूतर आप के कँधों, हाथों पर बैठ कर चोंच से दाने छीन लेते हैं

    तो सुनील जी एक बात बताएँ, जब इन शहरों में कबूतरों को खाने का सामान देना गैरकानूनी है तो फिर नगर प्रशासन आदि उन मक्के के दाने आदि को बिकने क्यों देता है?

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  3. तोते , कबूतर बुद्धीमान होते है यह तो मेरा भी अनुभव था लेकिन कौवे भी इतने बुद्धीमान होते है यह पता नही था।

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  4. संजय बेंगाणी22 मार्च 2007 को 9:38 am

    थोड़ा अटपटा लगा की परिंदो से परेशानी हो रही है, यहाँ रो कुत्ते व गाये हेरान करते है.

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  5. हमारे घर पर भी ढेरों कबूतरों की मेहमाननवाज़ी होती है । गुस्सा भी आता है गंदगी पर । फिर लगता है अभी तक ये पंछी दिख तो रहे हैं । हमारे बच्चे कबूतरों की पहचान तो कर रहे हैं । क्या पता अगली पीढी इन्हें सिर्फ तस्वीरों में देखे ।

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  6. तस्वीरें बहुत ख़ूबसूरत रहीं, मगर अफसोस ये कि इन दोनों परिंदों को देखे अरसा बीत गया - याद नहीं आता कि कब यहां कबूरत देखा ;(

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  7. भारत के मन्दिरों के आसपास पाये जानेवाले बन्दरों की तरह.उनका खौफ़ भी है पर उनको मूँगफली आदि देने में भी हम आगे हैं.

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  8. अच्छा है कि ये पंछी दिख रहे हैं। मेरे शहर इन्दौर (मध्यप्रदेश) में मैंने अपनी कालोनी में आठ साल से गौरैया, कौवे और कबूतर नहीं देखे।

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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