मंगलवार, नवंबर 20, 2007

अंगों की फसल की कटाई

एक मित्र ने जब डाफोह यानि डाक्टर अगेंस्ट फोर्सड हारवेस्टिंग (Doctors Against Forced Harvesting) के बारे में बताया तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ. जिस हारवेस्टिंग यानि फसल कटाई की बात वे कर रहे हैं वे मानव अंगो की है. इस एसोसियेशन में काम करने वाले वे डाक्टर हैं जो कहते हैं कि वे पैसे कमाने के लिए लोगों के अंग जबरदस्ती निकाले जाने के विरुद्ध हैं. उनका कहना है कि चीन में यह हो रहा है कि जेल में बंद कैदी या अस्पताल में दाखिल गरीब लोगों के जबरदस्ती गुर्दे या अन्य भाग निकाल कर जरुरतमंद मरीजों को ट्राँसप्लाँट के लिए बेचे जाते हैं.

कोई कोई डाक्टर जो शायद मानसिक रुप से बीमार हो, पैसा कमाने के लिए इस तरह का काम कर सकता हो पर यह बात इतनी अधिक फैली हो यह मुझे विश्वास नहीं होता. मुझे लगता है कि आजकल चीन के विरुद्ध वैसे ही बहुत प्रचार हो रहा है, उस देश की तरक्की से सारे विकसित जगत में डर सा फैल गया है और कुछ भी बात हो चीन के विरुद्ध ही बोला जाता है चाहे वह प्रदूषित रंग से बने खिलौने हों या अफ्रीका में बने चीने कारखाने. तो क्या डाफोह का यह कहना भी विकसित देशों में बसे चीन के विरुद्ध पूर्वाग्रहों का चिन्ह है और इसमें सचाई नहीं है?

अपने किसे प्रियजन की बीमारी पर उसे अपने शरीर का वह अंग देना जिसके बिना भी जी सकते हैं, चाहे वह गुर्दा हो या हड्डी की मज्जा यह तो अक्सर होता है. अपने प्रियजन की मृत्यु पर, विषेशकर जब मृत्यु जवानी में हुई हो, उसके शरीर के अंगो का दान करना यह मानवता की निशानी है. मेरे पर्स में भी एक कार्ड है जिसपर मेरे हस्ताक्षर हैं और जो मेरी अकस्मात मृत्यु पर अस्पताल को मेरे अंगदान करने की अनुमति देता है. अंगदान के विरुद्ध बहुत से लोगों के मन में धार्मिक कारणों से पूर्वाग्रह होते हैं कि शरीर का कोई अंग दे दिया तो जाने परलोक में व्यक्ति पर क्या असर हो या जब उसका पुर्नजन्म हो तो वह अपाहिज न पैदा हो, पर धीरे धीरे यह चेतना जाग रही है कि शरीर को तो जलाने या गाड़ने से नष्ट होना है, जबकि अंगदान करके आप अपने प्रियजन के शरीर को जीवित रहने का मौका दे रहे हैं. मेरा अपना विश्वास भगवत् गीता के पाठ में है कि शरीर आत्मा का वस्त्र है और जब शरीर पुराना हो जाता है आत्मा उसे त्याग देती है इसलिए मैं चाहता हूँ कि अगर मेरा पुराना वस्त्र किसी के काम आ सकता है तो अवश्य आये.

पर अगर अंग दान मानवता की निशानी है तो किसी गरीब के शरीर से उसकी गरीबी का फायदा उठा कर अंग खरीदना या जबरदस्ती उसके शरीर से अंग निकालना दानवता की निशानी है. डाक्टर जिसने मानवता की कसम खाई हो वह इस तरह के काम करे यह मुझे विश्वास नहीं होता. कोई इक्का दुक्का हो, जो मानसिक रुप से बीमार हो और इस तरह का काम करे यह मान सकता हूँ, पर डाफोह का कहना है कि चीन में यह बड़े पैमाने पर हुआ है और होता है.

भारत से भी कभी कभी कुछ छुटपुट समाचार मिलते हैं कि गरीब ने बेटी के विवाह के लिए पैसा जोड़ने के लिए अपना गुर्दा बेचना का अखबार में इश्तहार दिया. कुछ इसी तरह की बात एक फ़िल्म में भी देखी थी, पर क्या ऐसा हमारे देश में भी हो सकता है?

*****

इटली की पुलिस जिसे काराबिन्येरी (carabinieri) कहते हैं, उनके बारे में यहाँ बहुत चुटकले होते हैं, वैसा ही एक चुटकला हैः

एक अंगों के ट्राँसप्लाँट करने वाले की दुकान पर बोर्ड लगा था, "आईन्स्टाईन का दिमाग 1000 रुपये, चर्चिल का दिमाग 700 रुपये, मार्कस का दिमाग 400 रुपये, इटालवी काराबिन्येरे का दिमाग 1500 रुपये" तो उसे देख कर व्यक्ति दुकान में गया और पूछा, "भला काराबिन्येरे के दिमाग में ऐसी क्या बात है कि उसे इतना मँहगा बेचा जा रहा है?"

दुकानदार ने उत्तर दिया, "क्योंकि वह दिमाग बिल्कुल नया है, उसका कुछ प्रयोग नहीं किया गया तो कीमत तो ज्यादा होगी ही!"

2 टिप्‍पणियां:

  1. संजय बेंगाणी20 नवंबर 2007 को 1:11 pm

    मानव अंगो की तस्करी एक कड़वी सच्चाई है, नियम कड़े है फिर भी माफिया का पूरा तंत्र इस काम में लगा हुआ है. पाकिस्तान, भारत वगेरे के गरीब लोग छल से या लालच से अपने अंग गंवा देते है.

    इस क्षेत्र में जागृति फैल रही है. धार्मिक कहलाने वाले गुजरात में सबसे ज्यादा रक्तदान, चक्षुदान व देहदान होता है. यह एक अनुकरणीय उदाहरण है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. लेख अच्छा लगा । यह सच है कि ऐसी घटनाएँ होती ही रहती हैं। इसी कारण से सरकार को एक ऐसा कानून लाना पड़ा कि जीवित व्यक्ति का अंगदान केवल नाते रिश्तेदारों को ही किया जा सकता है ।
    घुघूती बासूती

    उत्तर देंहटाएं

"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...