रविवार, दिसंबर 30, 2007

कट्टरपँथी और जनतंत्र

इन दिनों मेरी छुट्टियाँ चल रहीं हैं. छुट्टियों के पहले कुछ दिन ससुराल में बीते. अब वापस घर आये तो इंटरनेट पर मटरगश्ती करने का समय मिला है जो सारा साल काम की वजह से कम ही मिलता है. इसलिए देश विदेश में कौन क्या कह रहा है, क्या लिख रहा है उसे पढ़ने का मौका मिल रहा है. आज जो पढ़ा उस के बारे में लिखना चाहता हूँ. शायद यह बातें अलग अलग हैं और उन्हें इस तरह साथ जोड़ना कितना ठीक है, कितना गलत यह निर्णय आप पर छोड़ता हूँ.

मिस्री मूल के लेखक और पत्रकार श्री मगदी अल्लाम (Magdi Allam) इटली के लोकप्रिय अखबार "कोरियेरे देला सेरा" (Correire Della Sera) के वरिष्ठ सम्पादक दल का हिस्सा हैं. पिछले कुछ समय से वह इस्लामी जिहाद और आतंकवाद के विरुद्ध लिख रहे हैं जिसकी वजह से उन्हें जान से मारने की धमकियाँ मिलीं हैं और उन्हें इतालवी सरकार ने राजकीय सुरक्षा दी है. पाकिस्तानी नेता बेनज़ीर भुट्टो के खून के बारे में 29 दिसंबर की अखबार में "इस्लाम और जनतंत्र" के नाम से बहुत कठोर सम्पादकीय लिखा है. उनका कहना है किः

"इस्लाम और जनतंत्र में आपसी विरोधाभास है और यह दोनो बातें एक साथ नहीं हो सकतीं कि इस्लाम बहुमत के देश में जनतंत्र स्थापित हो. जो भी देश अपने आप को "इस्लामी जनतंत्र" का नाम देते हैं जैसे पाकिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान आदि, वहाँ जनतंत्र है ही नहीं. इस्लामी कान्फेरेंस संस्था के 56 देशों में से कोई भी देश जनतंत्र के नियमों का पूरी तरह से पालन नहीं करता, वहाँ जनतंत्र नाम के लिए है और वहाँ विभिन्न मानव अधिकारों की अवहेलना की जाती है... आधुनिक इतिहास यही दिखाता है कि इस्लामी बहुल्य के देश के जनतंत्र तभी सही होता जब शासन में धार्मिक वर्ग को अन्य जननीतियों से अलग रखा जाये. अगर यह भेद नहीं रखा जाता तो रूढ़िवादी और कट्टरपंथी लोग आम जीवन की हर बात में अपनी दखलदाँज़ी की जबरदस्ती करते हैं. चूँकि इस्लाम में कोई एक व्यक्ति या पद नहीं जिसे सबसे ऊपर माना जाये, हर धार्मिक नेता अपनेआप को धर्म का सच्चा रखवाला कहता है और चाहता है कि उसकी बात मानी जाये. इसी वजह से, इतिहास बताता है कि अन्य धर्मों से झगड़ा करने से पहले, इस्लाम अपने भीतर ही झगड़ों में उलझा रहा है..."
कल, 28 दिसंबर के एक अन्य इतालबी अखबार "लिबेरात्स्योने" (Liberazione) में, इतालवी पत्रकार फ्राँचेस्का मार्रेत्ता का लिया हुआ पाकिस्तानी मूल के ईण्लैंड में रहने वाले प्रसिद्ध लेखक हनीफ़ कुरैशी से एक साक्षात्कार भी छपा है. उसे भी आज ही पढ़ा. उन्होंने ने भी कुछ इसी तरह की बात कही हैः

"पाकिस्तान को मुसलमानों के लिए जनतंत्र की तरह सोच कर बनाया गया था, पर मुसलमान जनतंत्र में नहीं रह सकते, क्योंकि वे धर्म को बाकी सब बातों के सामने रखते हैं. मेरा अपना व्यक्तिगत विचार है कि पाकिस्तान को अलग देश नहीं बनाना चाहिये था, उसे भारत का हिस्सा ही रहना चाहिये था."
फ़िर पढ़ा भारतीय अँग्रेजी की अखबार इँडियन एक्सप्रेस (Indian Express) में श्री अरुण शोरी का नया लेख, "हिंदुत्व तथा उग्रवादी इस्लामः जहाँ यह दोनो मिलते हैं" (Hindutva and radical Islam: Where the twain do meet). इस लेख में शोरी जी का कहना है कि "हिंदुत्व उग्रपंथी इस्लाम से कम कट्टरपंथी नहीं है" वाली बात में अतिश्योक्ति है पर साथ ही कुछ सच्चाई भी है और हर धर्म के ग्रंथों में हिंसा को सही मानने वाली बात मिल सकती है. वह गाँधी जी के हिंदू विश्वास और बाल गंगाधर तिलक के हिंदू विश्वास की विभिन्नता की बात करते हैं और कहते हैं कि भगवद् गीता से हमें हिंसा का हिंसा से उत्तर देने की शिक्षा मिलती है.

उनके लेख पढ़ कर कुछ डर सा लगा, मानो वे चेतावनी दे रहे हों कि हिंदू हिँसा बढ़ने वाली है, बढ़ रही है. उससे भी अधिक डर लगा इस बात से कि शायद वह इस हिंसा को ही उचित मान रहे हैं.

शायद आज यह समझना आवश्यक है कि उग्रवाद, रूढ़िवाद, कट्टरपन, आदि जैसी बातें किसी एक धर्म की धरौहर नहीं, हर धर्म को अपनी चपेट में ले सकती हैं, हर धर्म को निर्भीक विचारक चाहियें जो किसी भी रुप में हिंसा को उचित न स्वीकारें, जो हमेशा उसका विरोध कर सकें. जो यह माने कि कोई भी धर्म मानव से हट कर या ऊँचा नहीं, और हर धर्म में मानव को उस पर खुल कर बहस करने, उसकी आलोचना करने का अधिकार हो.

5 टिप्‍पणियां:

  1. छुट्टियों का भरपूर आनंद लें।
    बात कतई अलग अलग नहीं हैं, हमें तो बिल्‍कुल प्रासंगिक व जुड़ी हुई बातें लगीं।

    और हॉं आपने टेंपलेट में बदलाव किए हैं, खूबसूरत है, पर शायद मैं ही ऐसिथेटिकली उजड्ड हूँ क्‍योंकि मुझे लग रहा है कि अब आपका चिट्ठा टेक्‍स्‍ट का अंडरमाइन कर रहा है, खासकर उद्धरण के पीछे के मोज़ाइक की वजह से।

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  2. आपका चिट्ठा बौधिक संवाद की तृष्णा को शांत करता रहा है, अब तो यह "चौकलेटी" भी हो गया है :)

    उग्रता किसी भी धर्म या देश के लिए उच्चीत नहीं. हिन्दु उग्रता ज्यादा चिंतीत करती है. समस्या की जड़ हिन्दु भावनाओं की तथा उसकी चिंताओ की अनदेखी करना है. वास्तव में भारत का लोकतंत्र हिन्दुओ के बल पर कायम है और इसकी किमत केवल हिन्दु ही चुकाये यह सही नहीं है.

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  3. अपने एक सम्मेलन में गांधीजी का स्वागत करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता ने उन्हें ‘हिन्दू धर्म द्वारा उत्पन्न किया हुआ एक महान पुरुष’ बताया . उत्तर में गांधीजी बोले - ‘ मुझे हिन्दू होने का गर्व अवश्य है.परंतु मेरा हिन्दू धर्म न तो असहिष्णु है और न बहिष्कारवादी है . हिन्दू धर्म की विशिष्टता , जैसा मैंने उसे समझा है, यह है कि उसने सब धर्मों की उत्तम बातों को आत्मसात कर लिया है . यदि हिन्दू यह मानते हों कि भारत में अ-हिन्दुओं के लिए समान और सम्मानपूर्ण स्थान नहीं है और मुसलमान भारत में रहना चाहें तो उन्हे घटिया दरजे से संतोष करना होगा… तो इसका परिणाम यह होगा कि हिन्दू धर्म श्रीहीन हो जाएगा . .. मैं आपको चेतावनी देता हूं कि अगर आपके खिलाफ लगाया जानेवाला यह आरोप सही हो कि मुसलमानों को मारने में आपके संगठन का हाथ है तो उसका परिणाम बुरा होगा.’

    इसके बाद जो प्रश्नोत्तर हुए उसमें गांधीजी से पूछा गया - ‘क्या हिन्दू धर्म आतताइयों को मारने की अनुमति नहीं देता ? यदि नहीं देता तो गीता के दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने कौरवों का नाश करने का जो उपदेश दिया है ,उसके लिए आपका क्या स्पष्टीकरण है ?’

    गांधीजी ने कहा -’पहले प्रश्न का उत्तर ‘हां’ और ‘नहीं’ दोनों है . मारने का प्रश्न खडा होने के पहले हम इस बात का अचूक निर्नय करने की शक्ति अपने में पैदा करें कि आततायी कौन है ? दूसरे शब्दों में , हमें ऐसा अधिकार मिल सकता जब हम पूरी तरह निर्दोष बन जांए . एक पापी दूसरे पापी का न्याय करने अथवा फ़ांसी लगाने के अधिकार का दावा कैसे कर सकता है ? रही बात दूसरे प्रश्न की.यह मान भी लिया जाए कि पापी को दंड देने का अधिकार गीता ने स्वीकार किया है , तो भी कानून द्वारा उचित रूप मेम स्थापित सरकार ही उसका उपयोग भली भांति कर सकती है .अगर आप न्यायाधीश और जल्लाद दोनों एक साथ बन जायें तो सरदार और पंडित नेहरू दोनों लाचार हो जांएगे.. उन्हें आपकी सेवा करने का अवसर दीजिए,कानून को अपने हाथों में ले कर उनके प्रयत्नों को विफल मत कीजिए .[ सम्पूर्ण गांधी वांग्मय , खण्ड : ८९]

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  4. अफ़लातून जी की टिप्पणी मे विश्व इतिहास के उस पारम्परिक और देसी दिखने वाले लेकिन शायद सबसे आधुनिक और लोकतान्त्रिक राजनीतिक चिन्तक और नेता का वह दिशा निर्देश है, जिसकी अनदेखी सिर्फ़ तात्कालिक भावनात्मक सत्तानीति के लिये नही की जानी चाहिये। अगर यूरोपीय उपनिवेशवादी साम्राज्य के अन्त का आरम्भ गान्धी जी के ही दिशानिर्देशो मे हुआ था, तो हिन्दू और इस्लामी धर्मो की कट्टरता और मध्यकालीनतावाद के अन्त का आरम्भ भी इन्ही विचारो की अगुआई मे होगा। वैसे धर्मो के आधार पर आधुनिकता और लोकतान्त्रिकता का वर्गीकरण बहुत तर्कसन्गत और उचित नही लगता। अरुण शौरी जी का लेख (२ किस्तो मे) मैने भी पढा था और मै भी सुनील जी की ही तरह चिन्तित था। इस द्रिष्टि से तो हिट्लर, मुसोलिनी, स्टालिन से लेकर ट्रुमेन और बुश तक सबसे अधिक बर्बर और दुर्दान्त लोग हुए! लेकिन क्या इनकए कर्मो का दोष हम ईसा की महान करुणा के सिर पर मढे? उसी ईसाइयत ने तोल्स्तोय जैसे साहित्यकार को जन्म दिया, जिनसे प्रेरणा गान्धी जी जैसे 'स्वाभाविक-सहज हिन्दू' ने ली और दक्छिन अफ़्रीका मे स्वाधीनता का नया औजार अहिन्सा, अवग्या और सत्याग्रह से विकसित किया क्या अब हम उसकी अनुपयोगिता स्वीकार कर ले? तो फिर जिस कट्टर धार्मिक हिन्सा से जवाबी हिन्सा के ज़रिये लड्ने मे अमेरिका तक पस्त है, क्या हम उसे परास्त कर सकेन्गे? मुझे लगता है इस प्रयास मे हम सिर्फ़ बर्बर, हिन्सक, असहिष्णु और कबीलाई समाज मे बदल जायेन्गे। लोकतन्त्र, उदारता, आधुनिकता से वन्चित 'श्री हीन' सम्प्रदाय!
    हमे अपने काल और इतिहास का 'न्यायाधीश'बनना चाहिये, 'जल्लाद' नही। इस मुद्दे को उठाने के लिये धन्यवाद!

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  5. मान्यवर, यह बिलकुल ग़लत है की इस्लाम लोकतंत्र को मान्यता नहीं देता लेकिन आज इस्लामिक मान्यताओं का सहिः किरयान्वयन नहीं हो रहा है दुसरे पाकिस्तान कोई इस्लामी मुल्क नहीं है. किरपिया इस्लामिक सिक्षाओं का अध्यन कर बात आगे करें
    आप का एक ब्लॉगर

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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