मंगलवार, नवंबर 01, 2011

हेमन्त की एक सुबह


लगता है कि इस वर्ष सर्दी कहीं सोयी रह गयी है. नवम्बर शुरु हो गया लेकिन अभी सचमुच की सर्दी शुरु नहीं हुई. यूरोप में हेमन्त का प्रारम्भ सितम्बर से माना जाता है. अक्टूबर आते आते ठँठक आ ही जाती है. मौसम की भविष्यवाणी करने वाले कहते हैं कि इस साल बहुत सर्दी पड़ेगी और बर्फ़ गिरेगी, पर अब तक शायद सर्दी को उनकी बात सुनने का मौका नहीं मिला. लेकिन अक्टूबर के जाने का समाचार पेड़ों को मिल गया है. मौसम के रंगरेज ने पत्तों में पीले, लाल, कत्थई रंगों से रंगोली बनाना शुरु किया है, उनकी विदाई की खुशी मनाने के लिए.

मौसम और जीवन कितना मिलते हैं! बँसत जैसे कि बचपन, अल्हड़, नटखट रँगों के फ़ूलों की खिलखिलाती हँसी से भरा. गर्मी यानि जवानी, जोश से मदहोश जिसमें अचानक बरखा की बूँदें प्रेम सँदेश ले कर आती हैं. हेमन्त यानि प्रौढ़ता, जीवन की धूप में बाल पकाने के साथ साथ जीने के सबक सीखे हैं, फ़ूल नहीं तो क्या हुआ, पत्तों में भी रँग भर सकते हैं.

और आने वाला शिशिर, जब पत्ते अचानक पेड़ का घर छोड़ कर, लम्बी यात्रा पर निकल पड़ते हैं, हवा के कन्धों पर. वर्षों के गुज़रने के साथ, वापस न आने वाली यात्रा पर निकले प्रियजनों की सूची लम्बी होती जाती है. इस साल चार प्रियजन जा चुके हैं अब तक. अगली बारी किसकी होगी?

आल सैंटस (All saints) का दिन है आज. यानि "हर संत" को याद करने का ईसाई त्यौहार जिसे यूरोप, अमरीका और आस्ट्रेलिया में अपने परिवार के मृत प्रियजनों को याद करने के लिए मनाया जाता है. अमरीका में इसके साथ हेलोवीयन (Halloween) का नाम भी जुड़ा है जिसमें बच्चे और युवा आलसैंटस से पहले की शाम को डरावने भेस बना कर खेलते हैं.

हर ईसाई नाम के साथ एक संत का नाम जुड़ा होता है जिसका वर्ष में एक संत दिवस होता है. 1 नवम्बर को सभी संतों को एक साथ याद किया जाता है, जिसमें कब्रिस्तान में जा कर अपने परिवार वालों तथा मित्रों की कब्रों पर जा कर लोग फ़ूल चढ़ाते हैं, कब्रों की सफ़ाई करते हैं और उन्हें याद करते हैं.

यही सोच कर मैंने अपनी पत्नी से कहा कि चलो आज हम लोग इटली में द्वितीय महायुद्ध में मरे भारतीय सिपाहियों के कब्रिस्तान में हो कर आते हैं. उन्हें तो कोई याद नहीं करता होगा. सुबह सुबह तैयार हो कर हम घर से निकल पड़े.

Indian cemetery of Forli, Italy - S. Deepak, 2011


भारतीय सिपाहियों का यह कब्रिस्तान हमारे घर के करीब एक सौ किलोमीटर दूर है, फोर्ली (Forli) नाम के शहर में. हाईवे से वहाँ पहुँचने में करीब 40 मिनट लगे. फोर्ली जिले का नाम फास्सिट नेता और द्वितीय महायुद्ध के दौरान, हिटलर के साथी, इटली के प्रधान मंत्री बेनितो मुसोलीनी के जन्मस्थान होने से प्रसिद्ध है.

द्वितीय महायुद्ध में अविभाजित भारत से करीब पचास हज़ार सैनिक आये थे इटली में, अंग्रेज़ी सैना का हिस्सा बन कर. उनमें से पाँच हज़ार सात सौ बयासी (5,782) भारतीय सैनिक इटली में युद्ध में मरे थे, जो अधिकतर नवयुवक थे और जिनकी औसत उम्र बाइस-तैईस साल की थी. इटली में मरने वाले इन सिपाहियों में से बारह सौ पैंसठ (1,265) लोगों का अंतिम संस्कार फोर्ली के कब्रिस्तान में हुआ था. उनमें से चार सौ छयानबे (496) लोग मुसलमान थे उन्हें यहाँ दफ़नाया गया, जबकि सात सौ उनहत्तर (769) लोग हिन्दू या सिख थे, जिनका यहाँ अग्नि संस्कार हुआ था. इटली में यह भारतीय सिपाहियों का सबसे बड़ा कब्रिस्तान-संस्कार स्थल है.

यहाँ मुसलमान सैनिकों की अपने नामों की अलग अलग कब्रें है जबकि हिन्दू तथा सिख सैनिकों के नाम का एक स्मारक बनाया गया है जिसपर उन सबके नाम लिखे हैं. इसके अतिरिक्त कुछ बहादुरी का मेडल पाने वाले हिन्दू तथा सिख सिपाहियों के नाम के बिना कब्र के पत्थर भी लगे हैं. सिपाहियों के नामों की सूची में, जो नामों के एबीसी (A B C) के हिसाब से बनी है, पहला नाम है स्वर्गीय आभे राम का जो दिल्ली के रहने वाले थे और 23 वर्ष के थे, अंतिम नाम है स्वर्गीय ज़ैल सिंह का जो लुधियाना जिले के थे और 25 साल के थे.

Indian cemetery of Forli, Italy - S. Deepak, 2011

Indian cemetery of Forli, Italy - S. Deepak, 2011

Indian cemetery of Forli, Italy - S. Deepak, 2011

Indian cemetery of Forli, Italy - S. Deepak, 2011


जब भारतीय सिपाहियों की चिताएँ जलाई गयी थी, उस समय वहाँ काम करने वाले फोर्ली के रहने वाले एक व्यक्ति श्री साल्वातोरे मरीनो पारी ने 2007 में एक साक्षात्कार में उन दिनों की याद को इन शब्दों में व्यक्त किया था (यह साक्षात्कार लिया था श्री एमानूएले केज़ी ने , जिसे उन्होंने दूचेलाँदियाँ नाम के इतालवी चिट्ठे पर लिखा था):
"तब मैं 18 साल का था. 1945 की बात है, लड़ाई समाप्त हुई थी. अंग्रेजी फौज ने वायुसैना रक्षा कोलेज में अपना कार्यालय बनाया था, वहीं मुझे काम मिला था. हमारा काम था जहाँ जहाँ लड़ाई हुई थी वहाँ जा कर अंग्रेज़ी फौज के सिपाहियों की लाशों को जमा करना और उन्हें अलग अलग जगहों पर अंतिम संस्कार के लिए भेजना. सुबह ट्रक में निकलते थे, और आसपास की हर जगहों को खोजते थे. लाशों को जमा करके उनको पहचानने का काम किया जाता था, जो कठिन था. हमें कहा गया कि किसी सैनिक की एक उँगली तक को ठीक से ले कर आना है. हमारा काम था जब भी कोई भारतीय सैनिक मिलता, हम उसे फोर्ली के कब्रिस्तान में ले कर आते. हमने मुसलमानों की लाशों को दफनाया और हिन्दू तथा सिख सिपाहियों की लाशों का लकड़ी की चिताएँ बना कर, घी डाल कर उनका संस्कार किया. एक चिता पर छः लोगों का इकट्ठा संस्कार किया जाता था.
इस तरह का दाह संस्कार हमने पहले कभी नहीं देखा था. शहर से बहुत लोग उसे देखने आये, लेकिन किसी को पास आने की अनुमति नहीं थी. अंग्रेज़ी फौज ने चारों ओर सिपाही तैनात किये थे जो लोगों को करीब नहीं आने देते थे. फ़िर हमने चिताओं से राख जमा की और उसको ले कर रवेन्ना शहर के पास पोर्तो कोर्सीनी में नदी में बहाने ले कर गये. बेचारे नवजवान सिपाही अपने घरों, अपने देश से इतनी दूर अनजानी जगह पर मरे थे, बहुत दुख होता था.
मुझे उनका इस तरह से पार्थिव शरीरों को चिता में जलाना बहुत अच्छा लगा. जब मेरा समय आयेगा, मैं चाहता हूँ कि मेरे शरीर को जलाया जाये और मेरी राख को मिट्टी में मिला दिया जाये ताकि मैं प्रकृति में घुलमिल जाऊँ."
हरी घास में तरीके से लगे पत्थर, कहीं फ़ूलों के पौधे, पुराने घने वृक्ष, बहुत शान्त और सुन्दर जगह है यह भारतीय सिपाहियों का स्मृति स्थल. जाने इसमें कितने सैनिकों के परिवार अब पाकिस्तान तथा बँगलादेश में होंगे, और कितने भारत में, इस लिए यह केवल भारत का ही नहीं बल्कि पाकिस्तान तथा बँगलादेश का भी स्मृति स्थल है.

यहीं उत्तरी इटली में रहने वाले सिख परिवारों ने मिल कर एक सिख स्मारक का निर्माण करवाया है जिसमें दो सिख सिपाही हैं जोकि एक इतालवी स्वतंत्रता सैनानी को सहारा दे रहे हैं. यह स्मारक बहुत सुन्दर है.

Indian cemetery of Forli, Italy - S. Deepak, 2011

Indian cemetery of Forli, Italy - S. Deepak, 2011

Indian cemetery of Forli, Italy - S. Deepak, 2011


सड़क की दूसरी ओर, फोर्ली का ईसाई कब्रिस्तान भी है. जहाँ एक ओर भारतीय सिपाही स्मृति स्थल में हमारे सिवाय कोई नहीं था इस तरफ़ के ईसाई कब्रिस्तान में सुबह सुबह ही लोगों का आना प्रारम्भ हो गया था.

हाथों में फ़ूल लिये, या प्रियजन की कब्र की सफ़ाई करते हुए या फ़िर नम आँखों से पास खड़े हुए प्रार्थना करते हुए लोग दिखते थे.

सुन्दर मूर्तियाँ, रंग बिरँगे फ़ूल, घने पेड़ों पर चहचहाती चिड़ियाँ, और पीले कत्थई होते हुए पेड़ों के पत्ते, हर तरफ़ शान्ती ही दिखती थी.

Cemetery of Forli, Italy - S. Deepak, 2011

Cemetery of Forli, Italy - S. Deepak, 2011

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21 टिप्‍पणियां:

  1. Sir, You are great. Is tarah se un Bhartiye Saniko to Sharandhanji mili jinhone doosere deso aur doosri nagrikta ke logo ke liye apna sab kuch nauchavar kar diya. Unke prati samman bavakt karne ke liye aapko Dhanyavad. Hum bhi sa parivar unhe naman karte hai. Post pad kar aake bhar aayi.
    On Santi Santi Santi

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  2. तस्वीरों ने बहुत कुछ कहा ... उन सिपाहियों को याद करना अच्छा लगा, जिन्हें सब भूल चुके होते हैं

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  3. आपने सब भारतीयों की ओर से कर्तव्य निभा दिया। भारतीय महत्व की जानकारी बताने का आभार।

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  4. बहुत ही भावमय करती यह प्रस्‍तुति ..आभार ।

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  5. bahut hi marmik post hai padhte padhte aankhe bhar aai.in sabhi veer javaano ko shraddhanjli deti hoon.bahut jaankari deti hui post.

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  6. बहुत सेंटीमेंटल कर दिया आपने.

    प्रणाम शाहिंदा नू.

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  7. ज्ञानवर्द्धक भावमयी सुन्दर प्रस्तुति...वाह!

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  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    छठपूजा की शुभकामनाएँ!

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  9. मेरे लिए एकदम अनजाना अध्‍याय.

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  10. लेखन में संवेदनापूर्ण तटस्‍थता जैसे ''मौसम के रंगरेज ने पत्तों में पीले, लाल, कत्थई रंगों से रंगोली''

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  11. आप सब को सराहना के लिए हृदय से धन्यवाद

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  12. आपने सब भारतीयों की ओर से कर्तव्य निभा दिया। बेहद संवेदनशील्।

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  13. बहुत कुछ जानने को मिला…देखने को भी…भारतीय सैनिकों के बारे मे इस तरह के लिखे को पढ़ना अच्छा लगा…

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  14. Oh!!! Its so lovely... and beautiful tribute to the forgotten hero's of war .... I appreciate your gesture so much..

    Thanks also for liking my post at Indiblogger... a poetry about Vikram Seth's recitation of his Verse 'FIRE' ...

    http://shadowdancingwithmind.blogspot.com/2011/11/whispers-fire-faayar-faayaar-dedicated.html

    Shashi
    ॐ नमः शिवाय
    Om Namah Shivaya

    At Twitter @VerseEveryDay

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  15. ये पोस्ट मुझसे छूट कैसे गयी आज आपके ब्लॉग को यूँ ही खंगाल रहा था तब पढ़ा काश इस स्थल के बारे में मुझे मेरे इटली प्रवास के वक्त पता होता तो जरूर जाता शहीदों को नमन और आपको आभार

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    1. धन्यवाद मुकुल. इटली में देखने वाली इतनी जगह हैं, उनमें इस स्थान का शायद उतना महत्व नहीं, हाँ शायद इतिहासिक स्तर पर है!

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  16. Great Tribute to Indian Soldiers who fought from the side of a different nation in a different place.

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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