गुरुवार, अक्तूबर 06, 2005

अपने शहर में अजनबी

रविवार को भारत जाना है. कुछ दिनों का काम है और कुछ दिन घर वालों के साथ बीतेंगे. कल की पहचान वाली बात से ही सोच रहा था, कब अपना शहर अपने लिए अजनबी हो जाता है. पहली बार भारत से बाहर आया था तो 26 साल का था. शुरु शुरु में यह दूरी कुछ महीनों की ही होती थी, पर फिर धीरे धीरे लम्बी होती गयी. अब उस पहली यात्रा को 25 साल हो गये हैं और इन 25 सालों कब अपना शहर अपने लिए अजनबी हो गया, मालूम ही नहीं चला.

क्या बाहर रहने से चलने, बोलने में कुछ अंतर आ जाता है ? कनाट प्लेस में चलते हुए जब लोग "चेंज मनी, सर चेंज मनी" पूछते हुए पीछे चलते हैं या रुमाल बेच रहे लड़के अंग्रेजी में कहते हैं रुमाल खरीदने के लिए, तो अचरज सा होता है कि क्या बात दिखायी दी उन्हें मुझमें जिससे वे समझ गये कि मैं बाहर से आया हूँ? ऐसा पहले नहीं होता था, पिछले कुछ सालों से ही होने लगा है और शुरु के दो तीन दिनों में ही होता है. दो तीन के बाद कुछ बदल जाता है, जैसे बाहरपन का संदेश छपा हो शरीर पर, वह धुल जाता है? यह बात कपड़े या चेहरे की नहीं, और हिंदी में उत्तर दो तो बात करने वाला एक क्षण का अचरज दिखाता है, "धत्त साला, धोखा हो गया, यह तो यहीं का है!"

हर बार शहर नया लगता है. नये घर, नये फ्लाई ओवर, नयी दुकाने.

जिस गली में बड़ा हुआ था, उसमें नीचे नीचे घर थे. बच्चे सड़क पर क्रिकेट या गुल्ली डँडा खेलते थे. रात को कभी गरमी अधिक होती थी तो चारपाई गेट से निकाल कर सड़क पर बिछती थी क्योंकि "बाहर हवा अच्छी रहेगी". शोर में भी, रोशनी में भी, नींद जम कर आती. गली में बस एक ही कार थी, डाक्टर आँटी की पुरानी छोटी सी "बेबी हिंदुस्तान", जिसे चलाने के लिए वह उसकी आरती उतारती और मिन्नत मनवाती.

आज उस गली में जा कर भौचक रह जाता हूँ. सभी मकान तीन या चार मंजिले हैं, गली के दोनो ओर कारें लगी हैं. बीच में सड़क बिल्कुल छोटी सी लगती है. गली के बाहर लोहे का बड़ा गेट लगा है जो रात को दस बजे बंद हो जाता है और जिस पर लिखा है कि कुछ बेचने वालों को गली में घुसने की अनुमती नहीं है.

जिस गली में खेला, बड़ा हुआ, वहाँ बीच में खड़ा हो कर फोटो खींचे पर किसी ने नहीं पुकारा. किसी ने नहीं पूछा कुछ. अपने ही शहर में अजनबी हो गया था.

स्वामी ने लिखा है, "मैं खुद अपने आप में जितना भी मैं हो सका उतनी पूरी एक देसी इकाई रहा. अभी भी हूं. उत्सुकताओं के चलते नई चीजें देखने-सीखने, परिवेश मे ढलने की और उससे प्रभावित होने की प्रक्रियाओं मे भी इस इकाई में से कुछ चीजें कभी घटीं नहीं".

मैं भी यही सोचता था कि मेरी इकाई में कुछ चीज़े कभी घटी नहीं, पर यह सोचते हुए भी न जाने क्या बदल गया, बाहर की दुनिया में और अपने अंदर.

***
पिछले वर्ष की भारत यात्रा से

4 टिप्‍पणियां:

  1. यह अनुभव मुझे भी हुआ, पता नही अनजाने कैसे समझ जाते है कि हम बाहर से आये हैं, मजा तो तब आता है कि किसी ऐसे पड़ोसी ने हमें देखा हो जिसे हमारे आने का पता नही , बेचार यह समझता है कि हमारा भूत देख लिया हो।

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  2. "धत्त साला, धोखा हो गया, यह तो यहीं का है!" उस वक्त कैसा अनुभव हुआ, जब किसी ने ऐसा कहा हो और उसे कैसा लगा होगा जब उसने वहाँ का समझ लिया। वैसे थोड़े से लगते हैं आप चित्र में। स्वामी के लिंक पर पढ़ने में असमर्थ रहा। देखता हूँ वहाँ ठीक से।

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  3. स्वामी वाला लिंक है-http://hindini.com/eswami/archives/36

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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