रविवार, अक्तूबर 30, 2005

रयू सिसमोंदि

जेनेवा में फ्राँसिसी भाषा बोलते हैं. कुछ वर्ष पहले, मुझे कई महीने जेनेवा में रहना पड़ा. होटल में इतने दिन ठहरना तो बहुत मँहगा पड़ता, इसलिए किराये पर घर ढ़ूँढ़ा. बेटा स्कूल में था, इसलिए वह और पत्नी इटली में ही रह रहे थे और मैं सप्ताह के अंत में दो दिनों के लिए हर हफ्ते वापस इटली में अपने परिवार के पास आता था. रहने के लिए कमरा मिला रयू सिसमोंदि में, यानि कि सिसमोंदि मार्ग पर. जेनेवा के रेलवे स्टेश्न के करीब का यह इलाका सेक्स संबंधी दुकानों, छोटे छोटे होटलों और रेस्टोरेंट से भरा है.

मेरी मकान मालकिन, जिजि, अमरीकी थी और मोरोक्को के एक युवक के साथ, मकान के सबसे ऊपर वाले हिस्से में सातवीं मज़िल पर रहती थी, जहाँ केवल लिफ्ट से जा सकते थे. ऊपर पहुँचने पर लिफ्ट के दाहिने ओर जिजि का घर था और बायीं ओर तीन कमरों में तीन किरायेदार पुरुष, जिनके लिए एक रसोई और गुसलखाना भी था.

मेरे साथ वाले कमरे में कौन रहता था, उन पाँच महीनों में उसे कभी नहीं देखा. हाँ हर सुबह उसे सुना अवश्य. क्या काम करता था, यह तो मालूम नहीं, पर रोज सुबह पौने पाँच बजे उसका अलार्म बजना शुरु हो जाता, और करीब पंद्रह मिनट तक बजता रहता. मैं तो तुरंत जाग जाता. सामने वाले कमरे में रहने वाला पुरुष भी उठ कर, बाथरुम वगैरा हो कर, अपने लिए चाय बनाता. जब अलार्म रुकता तो मैं फिर सो जाता.

एक ही घर में साथ साथ रहने पर भी हर किसी को अपनी प्राइवेसी बचानी है, इसलिए वहाँ कोई किसी से बात नहीं करता था. किसी की ओर देखता भी नहीं था. ऐसे कुछ सामाजिक नियम, मैंने बिना किसी के कहे ही आत्मसात कर लिये थे. सामने रहने वाले पुरुष से कभी कभी रसोई में मुलाकात होती. जब बाहर खाना खा कर तंग आ जाता तो कुछ आसान सा पकाने की कोशिश करता. "बों ज़ूर" या "बों स्वार", यानि शुभ दिन और शुभ संध्या, के अतिरिक्त आपस में हमने कुछ नहीं कहा.

इसलिऐ जेनेवा के रहने वाले दिन मेरे दिमाग में "बिना बातचीत वाले दिन" की तरह याद हैं. तब बात होती केवल दिन में विश्व स्वास्थ्य संघ के दफ्तर में. घर आ कर, अपने कमरे में बंद रहता और गलती से कोई और मिलता तो न उसकी तरफ अधिक देखता, न कुछ बात करने की कोशिश करता. इसके बावजूद कुछ पड़ोसियों से कुछ जान पहचान बनी.

निचली मंजिल वाली महिला वेश्या थीं. वहीं रयू सिसमोंदि में घर के दरवाजे के सामने ही सजधज कर ग्राहकों का इंतज़ार करतीं. शाम को काम से घर आता तो उनके काम का समय शुरु हो रहा होता. लाइन में हर घर के सामने, हर कोने पर, दो या तीन के झुंड में खड़ी वेश्याएँ जोर जोर से बातें करती और हँसते हुऐ सड़क पर से गुजरते पुरुषों को बुलाती. जब करीब से गुजरता तो सबको "बों स्वार मादाम" कह कर नमस्ते करता.

एक दिन काम से लौट कर, मैं सुपरमार्किट में सामान लेने के लिए रुका, बाहर निकला तो दो महिलाएँ वहीं बाहर खड़ी थीं. उनमें से एक ने मेरे सामने टाँग उठा कर मुझे रोक लिया. लाल रंग का गाऊन पहने थी जो एक तरफ से ऊपर तक खुला था. मैं घबरा गया और हकबका कर बोला, "ये स्वी मारिए", यानि कि "मैं शादीशुदा हूँ". वह ठहाका मार कर हँस पड़ी, बोली, "कोई बात नहीं, मुझे कोई एतराज़ नहीं." पर फ़िर टाँग हटा ली और मुझे जाने दिया. बस वह एक ही बार हुआ कि उनमें से किसी ने मेरे साथ छेड़खानी की.

उन महिलाओं में कई स्त्रियाँ अधेड़ उम्र की भी थीं और एक तो बहुत वृद्ध थी, शायद सत्तर साल की. सजधज कर, तंग, छोटे कपड़ों में उन्हें देख कर मुझे बहुत अजीब लगता. एक बार मैं सुबह सुबह घर से निकला, तो बर्फ गिर रही थी और बहुत सर्दी थी, तो उन्हें देखा. वे बर्फ से बचने के लिए एक घर के छज्जे के नीचे खड़ी थीं, सर्दी से ठिठुरती हुई. बहुत बुरा लगा, बहुत दया भी आयी.

***

आज की तस्वीरें भी जेनेवा सेः


1 टिप्पणी:

  1. बहुत आकर्षक चित्र और उतना ही सुन्दर संस्मरण।
    मेरी बहुत इच्छा थी कि फ़ैमिली को स्विटजरलैण्ड घुमाऊं। लेकिन बच्ची की छुट्टियां सिर्फ़ गरमियों मे होती हैं। और गर्मियों मे वहाँ, इतनी रेलमपेल हो जाती है कि हिम्मत नही पड़ती। इस बार शायद हिम्मत जुटा पाऊं। आपकी सलाह की जरुरत पड़ेगी।

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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