बुधवार, नवंबर 02, 2005

भीड़ में अकेले

प्रत्यक्षा जी की कविता और उससे जुड़ी हुई टिप्पड़ियों को पढ़ा तो अन्य लोगों के साथ रह कर भी कैसे अकेले रह जाते हैं, इसके बारे में सोच रहा था.

भीड़ में हमेशा अकेलापन लगे, यह बात नहीं. कभी कभी आस पास बैठे लोगों में किसी को न पहचानते हुए भी, महसूस होता है मानों हममें से हर एक किसी सागर की लहर है, जो एक दूसरे से अदृष्य धागे से बंधी हो, और साथ साथ उठ गिर रही हो. किसी अच्छे संगीत या नृत्य के कार्यक्रम में ऐसा लगा मुझे. ऐसे में कई बार जब कोई विषेश कला का प्रदर्शन हो तो स्वयं ही आँखे साथ में बैठे हुए लोगों से मिल कर, मुस्कान के साथ एक अपनापन बना देती हैं.

दूसरी ओर अपने जीवन साथी के साथ एक घर में, एक कमरे में रह कर, साथ खा, पी और सो कर भी दो लोग अकेले हो सकते हैं. इस अकेलेपन को फारमूला बातों से भर देते हैं वह, खुद को और औरों को यह दिखाने के लिए कि वे दोनो अकेले नहीं, साथ साथ हैं. आज खाने में क्या बनेगा ? मुन्नु पढ़ता नहीं है. बिजली का बिल भरना है. ऐसी बातें सूनापन भरने का धोखा दे सकतीं हैं. पर दोनों अपने मन में सचमुच क्या क्या सोच रहें हैं, न एक दूसरे से कह पाते हैं न सुन पाते हैं.

प्रेम के धरातल पर भी साथ जीवन शुरु करने वालों के बीच भी समय बीतने के साथ कभी कभी ऐसा हो सकता है. क्यों होता है, इसका कोई उत्तर नहीं है मेरे पास. आन्ना, मेरी पत्नी की सहेली, ने सात साल वित्तोरियो के साथ रह कर उससे विवाह किया, पर शादी के दो साल बाद दोनों ने अलग होने का फैसला किया. जब भी पत्नी कहती कि आन्ना के घर खाने पर जाना है या कि वह लोग हमारे यहाँ आ रहे हैं, तो जी करता कहीं और भाग जाऊँ. सारा समय दोनों एक दूसरे की इतनी कटुता से आलोचना करते थे, हर छोटी छोती बात पर, तुम ऐसी हो, तुमने वैसे किया, एक दूसरे को बातों की तलवारों की नोचते काटते थे, कि सोचता यह दोनों साथ किस लिए रहते हैं ? उन्हें देख कर लगता कि दोनो साथ रह कर अकेले तो थे ही, उस अकेलेपन को झगड़े से भरने की कोशिश कर रहे थे.

इसका यह अर्थ नहीं है कि जोड़ी के बीच आम जीवन की रोटी, खाने, बिजली, बच्चों आदि की बातें नहीं होनी चाहिये, वे तो होंगी ही, पर उनके अलावा भी कुछ हो तभी लगता है कि हम अकेले नहीं.

आज की तस्वीरें एक्वाडोर यात्रा सेः


1 टिप्पणी:

  1. किसी भी रिशते मे विश्वास का होना बहुत जरुरी होता है, जब बात जीवनसाथी की हो तो, इस रिश्ते की आधारशिला ही मजबूत विश्वास होती है। जहाँ विश्वास टूटा, वहाँ रिश्ता खत्म होकर बस एक बोझ बनकर रह जाता है।

    छोटी छोटी बातों पर तकरार होना एक अलग बात है, लेकिन उन तकरारों को बड़े झगड़े की शक्ल देना गलत है।सही तरीका है, जीवनसाथी के साथ उचित संवाद कायम करना, ताकि कठिन से कठिन मसलों पर भी बात करके उन्हे सुलझाया जा सके।

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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