शनिवार, जून 10, 2006

पुरुष या स्त्री ?

तुर्की (Turkey) की एक टेलीविज़न चैनल ने एक नया रियेल्टी शौ करना का फैसला किया था. आजकल इन्हीं रियेल्टी शो यानि वह कार्यक्रम जिनमें जीवन की सच्चाई दिखाई जायी, कहानी नहीं, का ज़माना है. इस कार्यक्रम में आठ तुर्की युवक जिनकी आयु १९ से ३९ वर्ष के बीच में थी, को तीन सप्ताह तक एक टेलीविजन कैमरे के सामने एक घर में स्त्री बनके रहना था. कुछ नयी बात नहीं थी, यह एक अमरीकी कार्यक्ररम "ही इज़ ए लेडी" (He is a lady) यानि "वह पुरुष स्त्री है" पर आधारित था. पर यह प्रोग्राम उन्हें रद्द करना पड़ा क्योंकि बहुत सारे लोगों ने कहना शुरु कर दिया कि यह कार्यक्रम पुरुषों का अपमान था.

इधर इटली में श्रीमति ल्कसूरिया जी इतालवी संसद में चुनी गयी हैं. उनकी खासयित है कि वह इतालवी संसद की पहली ट्राँस हैं, ट्राँस यानि वह लोग जिन्हें अपना जन्मजात लिंग ठीक नहीं लगता और वे स्त्री से पुरुष या पुरुष से स्त्री बन जाते हैं.

इसी विषय पर एक नयी अमरीकी फिल्म भी आयी है, "ट्राँसअमेरिका" (Transamerica) जिसमें शल्यक्रिया (surgery) से पुरुष यौन अंग निकलवा कर स्त्री बन जाने का सपना देखने वाला पुरुष मुश्किल में पड़ जाता है जब उसे अपने किशोर पुत्र के साथ कुछ दिन रहना पड़ता है.

इस बारे में बात करना और लिखना भाषा की दृष्टि से आसान नहीं क्योंकि बहुत बार समझ नहीं आता कि जिस व्यक्ति की बात कर रहे हैं उसे पुरुष बुलायें क्योंकि समाज उसे पुरुष मानता है और उनके बाह्य शरीर पुरुष सा है या फ़िर स्त्री बुलायें क्योंकि उनके विचार में उनकी आत्मा स्त्री की है जो गलत शरीर में कैद है ?

मुझे इस विषय में जानकारी तब हुई जब कुछ साल पहले "विगलाँगता और यौनता" के विषय पर शोध कर रहा था. शरीर के बाह्य और भीतरी लिंग में साम्यता न होना भी एक तरह की विकलाँगता है, ऐसा सोचने से इस परिस्थिति में फँसे लोगों के जीवन को घेरने वाली बहुत सी कठिनाईयों को समझने और उनके निधान ढ़ूँढ़ने का अवसर मिलता है.

शोध के सिलसिले में मेरी मुलाकात ईमेल के द्वारा आस्ट्रेलिया की एक युवती से हुई जो युवक बन कर पैदा हुई थी और जो विश्वविद्यालय में ट्राँस विषयों पर शोध कर रही थी. उसने बहुत सी जानकारी दी मुझे. पहले सोचता था कि यह सिर्फ कुछ पुरुषों की समस्या होती है, उसने बताया कि कुछ स्त्रियाँ भी होती हैं जो स्वयं को स्त्री शरीर में पुरुष महसूस करती हैं पर पुरुष के लिए बाह्य यौन अंग शल्यक्रिया से ठीक करवा कर स्त्री बन पाना अधिक आसान है, स्त्री के लिए पुरुष यौन अंग बनवाना बहुत अधिक कठिन.

यह भी सोचता था कि जो पुरुष इस तरह महसूस करते हैं वे सब समलैंगिक होते हैं यानि स्त्री बन कर अन्य पुरुषों के साथ रहना चाहते हैं. मेरी आस्ट्रेलियाई मित्र ने समझाया कि शरीर का लिंग और यौन रुझाव अलग चीज़े हैं. जैसे कि कुछ भीतर से स्वयं को स्त्री सोचने वाला पुरुष, किसी स्त्री की तरफ आकर्षित हो सकता हैं और दूसरी तरफ, अधिकतर समलैंगिक पुरुष अपने पुरुष शरीर से संतुष्ट हैं और स्त्री शरीर नहीं चाहते.

शरीर और भावनाओं का मेल न खाना और स्वयं को गलत शरीर में कैदी सोचना, हारमोन ले कर या शल्यक्रिया से अपने बाह्य शरीर को बदलना, इन सब का अर्थ है कि उस व्यक्ति का सारा जीवन संघर्ष और पीड़ा से गुज़रेगा. अक्सर अपने परिवार से ठुकराये जाते हैं वह. भारत में भी तो जाति से, समाज से बाहर कर उनकी अलग बंद दुनिया ही बन जाती है.


2 टिप्‍पणियां:

  1. संजय बेंगाणी11 जून 2006 को 12:05 pm

    "उस व्यक्ति का सारा जीवन संघर्ष और पीड़ा से गुज़रेगा"
    क्या मनोविज्ञान इनकी सहायता नहीं कर सकता?

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  2. हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास वाणभट्ट की आत्मकथा में किसी व्यक्ति में पुरुष और स्त्री के द्वंद्व के संबंध में भारतीय दर्शन के दृष्टिकोण से प्रकाश डाला गया है, जिससे इस विषय के मनोविज्ञान को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलती है।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं

"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...