बुधवार, फ़रवरी 28, 2007

मेरी प्रिय महिला चित्रकार (1) - फ्रीदा काहलो

चित्रकला के क्षेत्र में महिलाओं के नाम बहुत कम आते हैं. अगर आप जगतप्रसिद्ध महिला चित्रकारों के नाम खोजें तो फ्रीदा काहलो के अतिरिक्त कोई भी नाम नहीं मिलता, और फ्रीदा का नाम भी सबको नहीं मालूम होता. चौदहवीं पँद्रहवीं शताब्दियों में जब युरोप में कला के पुनर्जन्म का युग था, किसी भी महिला चित्रकार का नाम विशेष रुप से नहीं सुनने को मिलता और अधिकतर पश्चिमी कला समीक्षकों की सर्वश्रेष्ठ कलाकारों की सूची में भी कोई महिला चित्रकार नहीं होतीं.

मेरी प्रिय महिला चित्रकारों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक ही नाम है, फ्रीदा काहलो का.



फ्रीदा का जन्म 1907 में मेक्सिको में हुआ. उनके पिता हँगरी के प्रवासी थे. इस दृष्टि से फ्रीदा मेरी एक अन्य प्रिय महिला चित्रकार, अमृता शेरगिल, से मिलती है क्योंकि अमृता की माँ हँगरी की थीं.

छोटी सी फ्रीदा को पोलियो हुआ और दाँयीं टाँग पर उसका असर पड़ा, कुछ ठीक होने पर फ्रीदा ने बहुत से खेलों में भाग लेना शुरु किया ताकि दाँयीं टाँग मजबूत हो जाये पर यह टाँग कुछ छोटी ही रही जिसकी वजह से वह ऊँची एड़ी वाली जूता पहनती थीं और उनकी चाल में एक विशिष्टता थी.

18 साल की फ्रीदा को एक बस दुर्घटना में बहुत चोट लगी और कई हड्डियाँ भी टूट गयीं. इनकी वजह से उनका जीवन दर्द और चलने फिरने की तकलीफ़ में गुजरा. दियेगो रिवेरा से विवाह करके उनका वयस्क जीवन अमरीका कि डेट्रोयट शहर में गुज़रा.

फ्रीदा की कोई संतान नहीं हुई, कई गर्भपात हुए. संतान न होने के दुख को उन्होंने बहुत सी चित्रों में उतारा जैसे कि "उड़ता पँलग" नाम के चित्र में जिसे "हैनरी फोर्ड अस्पताल" के नाम से भी जाना जाता है, जिसमें खून में लथपथ पँलग पर लेटी फ्रीदा के शरीर से बहुत से तार निकल रहे हें जिनमें से एक तार एक भ्रूण से जुड़ा है.



संतान के न होने की पीड़ा को कला में व्यक्त करने की बात से मुझे उनमें भारतीय अभिनेत्री मीना कुमारी की याद आती है. 1960 के दशक में विभिन्न फ़िल्मों में जैसे "चंदन का पलना" मीना कुमारी ने इसी पीड़ा को दिखाया और कई बार असली जीवन और परदे के जीवन का भेद पता नहीं चलता था.

फ्रीदा ने अधिकतर चित्र छोटे आकार के बनाये और उनकी बहुत सी तस्वीरों में स्वयं ही चित्र का प्रमुख पात्र होती थीं. लाल रँग का उनके चित्रों नें विशेष स्थान दिखता है. 1954 में 47 वर्ष के आयु में उनका देहाँत हुआ. प्रस्तुत हैं फ्रीदा के कुछ चित्र.





आत्मप्रतिकृति और बंदर


कटे बालों वाली आत्मप्रतिकृति


आत्मप्रतिकृति और गले का हार


फ्रीदा के विचारों में दियेगो

4 टिप्‍पणियां:

  1. मेरे लिए हर जानकारी नई थी। धन्‍यवाद

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  2. संजय बेंगाणी28 फ़रवरी 2007 को 11:30 am

    उत्तम जानकारी.

    कला दर्द की अभिव्यक्ति का श्रेष्ट माध्यम रहा है. फिर वह गीत-संगीत हो या शेर-ओ-शायरी. चित्रकला भी एक माध्यम हो सकता है...आज अनुभव हुआ.

    महिला चित्रकारों की कमी सभी जगहो पर है, पता नहीं क्यों? जबकि ज्यादा दुखी वे ही है(मजाक नहीं कर रहा).

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  3. एक नई और रोचक जानकारी के लिये धन्यवाद.अभी जनवरी में मुझे दिल्ली स्थित ललित कला अकादमी में अमृता शेरगिल के चित्र देखने का मौका मिला.प्रभावित हूँ मैं.उसी श्रंखला में एक और महिला चित्रकार के बारे में जानना बहुत अच्छा लगा.

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  4. फ्रीदा कालो पर कुछ साल पहले 'फ्रीदा' फिल्म बनी है, जिसमें फ्रीदा के चरित्र का अभिनय सलमा हायेक ने किया है। फ्रीदा के आम तौर पर प्रदर्शित चित्रों में जो दिखता नहीं है, वह है उसकी राजनैतिक प्रतिबद्धता। दियेगो रिवेरा से उसकी घनिष्टता का कारण दियेगो का मार्क्सवादी चिंतन था। दियेगो के साथ फ्रीदा ने शादी की। फ्रीदा स्वभाव और चिंतन से अराजक थी, और उसकी घनिष्टता समाज/साम्य-वादी चिंतकों के साथ थी। रुस से भागे ट्राट्स्की के साथ उसके गहरे संबंध थे। यहाँ तक कि दियेगो पर यह इल्जाम भी लगा था कि उसने ट्राट्स्की की हत्या की साजिश की है।

    मैंने फ्रीदा की बनाई तस्वीरें यूनिवर्सिटी के दिनों में देखी थीं। तब से मैं फ्रीदा पर फिदा हूँ। हाल में २००३ में मैक्लियोडगंज के एक विडियो डेन में फ्रीदा पर बनी फिल्म बेटी के साथ देखी थी। मेरी बेटी इतनी प्रभावित हुई कि कुछ महीने पहले 'विश्व इतिहास' के अपने प्रोजेक्ट के लिए उसने फ्रीदा फिल्म को चुना। तब से फ्रीदा पर जितनी भी सामग्री मिलती है, हम इकट्ठी करते रहते हैं। अपनी टिप्पणी में शाना ने लिखा है कि हालाँकि अपने समय में दियेगो मेक्सिको के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सबसे प्रसिद्ध चित्रकार थे, किसी ने सोचा भी नहीं था कि भविष्य में कभी फ्रीदा की ख्याति इतनी बढ़ जायगी कि दियेगो की याद तक उसी के कारण रह जाएगी।

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