रविवार, फ़रवरी 24, 2008

मधु किश्वर

मधु किश्वर का आऊटलुक में छपा लेख पढ़ कर दिल दहल गया. मानुषी जैसी पत्रिका निकालने वाली मधु जी का नाम जाना पहचाना है. अपने लेख में उन्होंने दिल्ली में कुछ जगह पर सड़कों पर सामान बेचने वालों के जीवन में सुधार लाने के लिए किये एक नये प्रयोग के बारे में लिखा है जिसका विरोध करने वाले कुछ स्थानीय गुँडों ने स्थानीय पुलिस वालों के साथ मिल कर उन पर तथा मानुषी के अन्य कार्यकर्ताओं पर हमले किये हैं. लेख पढ़ कर विश्वास नहीं होता कि हाईकोर्ट, गर्वनर, और यहाँ तक कि प्रधानमंत्री भी उन लोगों की रक्षा करने में असमर्थ हैं और इस प्रयोग के सामने आयीं रुकावटों को नहीं हटा पा रहे.

देश में कानून का नहीं स्थानीय गुँडों का राज चलता है यह तो तस्लीमा नसरीन, जोधा अकबर, मुम्बई में राज ठाकरे काँड जैसे हादसों से पहले ही स्पष्ट था. थोड़े से लोग चाहें तो मनमानी कर सकते हैं, पर सोचता था कि यह सब इसी लिए हो सकता है क्योंकि राजनीति में गुँडागर्दी का सामना करने का साहस नहीं क्योंकि वह वोट की तिकड़म का गुलाम है पर जान कर, चाह कर भी प्रधानमंत्री और गवर्नर कुछ नहीं कर पाते, इससे अधिक निराशा की बात क्या हो सकती है!

भारत दुनिया का सबसे बड़ा गणतंत्र है, आने वाले समय का सुपरपावर है और मुट्ठी भर लोगों के हाथ में कबुतर की तरह फड़फड़ाता है, अन्याय के सामने सिर झुका लेता है?

3 टिप्‍पणियां:

  1. यह एक कड़वी सच्चाई है लेकिन इस पर "मेरा भारत महान " का लेबल लगा है।सिर्फ कुर्सीयों का खेल है।जो शायद अब कभी बंद नही होगा।

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  2. जनतंत्र सिर्फ नाम का है. गुन्डाराज एक पहलू है, रजनैतिक समीकरण् दूसरा. पर सबसे बडी बात जो मुझे दिखती है वो जन मे एक डेमोक्रटिक प्रक्रिया से सवालो के जबाब न तलाश् करने की खामी. हर समस्या का व्यक्तिगत समाधान सम्भव नही है. और कोई भी प्रक्रिया सिर्फ जोड-तोड और छोटे स्वार्थो मे दम तोड देती है.

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  3. लोकतंत्र वोट का गुलाम होता है. वोट अगर गुण्डो के बल पर आयेंगे तो राज भी वही करेंगे.

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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