रविवार, नवंबर 13, 2011

फोटो डायरीः लंदन में एक दिन


पिछले पच्चीस सालों में हर वर्ष, किसी न किसी मीटिंग आदि के लिए दो तीन बार लंदन जाना हो ही जाता था. शहर में कई बार घूम चुका था लेकिन शहर कैसा बना है इसकी जानकारी बहुत कम थी, क्योंकि हर जगह मैट्रो से ही जाता. लंदन में मैट्रो की दस-पंद्रह लाईनों का जाल बिछा है, कहीं भी जाना हो, उसके करीब में कोई न कोई मैट्रो स्टेशन मिल ही जाता है इसलिए मुझे सुविधाजनक लगता था कि दिन भर का टिकट खरीदो और जहाँ मन हो वहाँ घूमो. लंदन मैट्रो मँहगा है, इसलिए भी दिन भर का टिकट खरीदना बेहतर लगता था.

पर दिक्कत यह थी कि मैट्रो के सारे रास्ते अधिकतर धरातल से निचले स्तर पर अँधेरी सुरंगों में गुज़रते हैं. इसकी वजह से बहुत से मैट्रो स्टेशनों के आसपास की जगहें मेरी पहचानी हुई थीं लेकिन लंदन शहर के रास्ते कैसे हैं, इसकी जानकारी कम थी. केवल पिछले दो तीन सालों में ही मैंने शहर की सड़कों को कुछ जानने की कोशिश शुरु की थी.

पिछले सप्ताह एक दिन के लिए लंदन जाना था, तो सोचा कि क्यों न इस बार रेलवे स्टेशन से मीटिंग स्थल का रास्ता पैदल ही चलने की कोशिश करूँ. गूगल मैप पर देख कर रास्ता बनाया (नीचे नक्शे में लाल रंग का निशान), तो लगा कि पैदल जाने में एक घँटे से कम समय लगना चाहिये. उसी नक्शे को छाप कर साथ रख लिया.

Central London - S. Deepak, 2011


सुबह 6.30 की उड़ान थी. लंदन के गेटविक हवाई अड्डा पहुँचा. वहाँ पहुँच कर तुरंत रेलगाड़ी से लंदन शहर के विक्टोरिया स्टेशन पहुँचा, तब समय था सुबह के आठ बज कर चालिस मिनट. बाहर विक्टोरिया स्ट्रीट खोजने में दिक्कत नहीं हुई. चलना शुरु किया ही था कि दृष्टि दायीं ओर के एक सुन्दर गिरजाघर पर पड़ी. पूर्वी बाइज़ेन्टाईन शैली से प्रभावित गुम्बजों वाले गिरजाघर का नाम है "अति पवित्र रक्त कैथेड्रल". उस समय हल्की हल्की बूँदा बाँदी हो रही थी लेकिन इतनी भी नहीं कि छतरी खोली जाये.

Central London - S. Deepak, 2011


सड़क की दूसरी ओर एक विशाल शीशे का भवन है जिसमें दुकाने और दफ़्तर हैं, उस समय वह बन्द ही दिख रहा था. आगे बढ़ा तो एक अन्य सुन्दर गिरजाघर दिखने लगा. पीछे से थेम्स नदी के किनारे बना "लंदन आई" यानि "लंदन की आँख" नाम का विशालकाय गोल झूला दिख रहा था. "अरे यह तो वेस्टमिनस्टर गिरजाघर है", मैंने आश्चर्य से सोचा. पहले वेस्टमिनस्टर कई बार देखा था पर तब यह समझ नहीं पाया था कि वह विक्टोरिया स्टेशन के इतने करीब है.

Central London - S. Deepak, 2011


पार्लियामैंट स्क्वायर पहुँचा तो आसपास बहुत सी मूर्तियाँ दिखीं लेकिन सड़क पर बसों, कारों का इतना यातायात था कि सबकी तस्वीरें लेना संभव नहीं था. सड़क के किनारे पर बनी अमरीकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की तस्वीर खींची और पार्लियामैंट स्ट्रीट पर मुड़ा.

Central London - S. Deepak, 2011


सड़क पर बहुत से लोग से मेरी तरह ही पैदल चलते हुए, या फ़िर शायद काम में देरी के डर से कुछ कुछ भागते हुए दिख रहे थे. वहीं सड़क के बीच में काले पत्थर का बना कुछ अलग सा स्मारक दिखा, जिसमें स्त्रियों के कोट और पर्स आदि टँगे बनाये गये थे. यह द्वितीय विश्वयुद्ध में स्त्रियों के योगदान का स्मारक है.

Central London - S. Deepak, 2011


कुछ और आगे बढ़ा तो सामने से धुँध के बीच में आसमान की पृष्ठभूमि पर एक जानी पहचानी मूर्ति दिखी, ट्रफाल्गर स्क्वायर पर नेलसन के खम्बे पर बनी जनरल नेलसन की मूर्ति जिनका नाव जैसा टोप दूर से ही पहचाना जाता है.

Central London - S. Deepak, 2011


घड़ी देखी, स्टेशन से चले करीब आधा घँटा हुआ था. सोचा कि अब आस पास देखने और फोटो खींचने का समय नहीं था. कम से कम आधे घँटे का रास्ता अभी बाकी था और मीटिंग में मेरा प्रेसेन्टेशन शुरु में ही था. इसलिए कैमरे को बैग में बन्द किया और तेज़ी से चैरिंग क्रास रोड की ओर कदम बढ़ाये. यूस्टन के पास लंदन स्कूल ओफ़ हाईजीन पहुँचना था, उसमें आधा घँटा लगा, और पूरे रास्ते में  बस एक बार ही किसी से दिशा पूछने की आवश्यकता पड़ी.

दोपहर को तीन बजे काम समाप्त करके मैंने मित्रों से विदा ली और वापस जाने के लिए निकला. मेरा विचार था कि पाँच बजे तक वापस विक्टोरिया स्टेशन पहुँचना चाहिये जिससे शाम के 6 बजे तक गैटविक हवाईअड्डा पहुँच जाऊँ क्योंकि वापस जाने की उड़ान 7.30 की थी. लगा कि बहुत समय है और आराम से इधर उधर देखता घूमता हुआ वापस पहुँच जाऊँगा.

टोटनहैम कोर्ट रोड से लेस्टर रोड के बीच बहुत से थियेटर हैं जहाँ नाटक, नृत्यकार्यक्रम, म्यूजि़कल आदि होते हैं. सबसे पहले दिखी एक थियेटर के बाहर "क्वीन" के प्रसिद्ध गायक फ्रेड्डी मर्करी की मूर्ति जहाँ "वी विल रोक इट" नाम का म्यूज़िकल दिखाया जा रहा था. फ्रैडी मर्करी यानि भारत में जन्मे फारुख बलसारा अपने संगीत के लिए सारी दुनिया में प्रसिद्ध हैं.

Central London - S. Deepak, 2011


फ़िर लगा कि समय है तो बजाय मुख्य सड़क पर चलने के क्यों न साथ की छोटी सड़कों और गलियों में चला जाये? यह सोच कर सैंट मार्टन स्ट्रीट पर मुड़ा तो वहाँ वह थियेटर दिखा जहाँ पिछले 59 सालों से, यानि मेरे पैदा होने से भी पहले से, अगाथा क्रिस्टी के उपन्यास माउस ट्रेप (चूहेदानी) पर आधारित नाटक को निरन्तर किया जाता है. तीस चालिस साल पहले भारत में सुना था इस बारे में, देख कर कुछ अचरज हुआ. सोचा कि यह भी एक तरह का स्मारक सा बन गया है जहाँ पर्यटक लोग बस सिर्फ़ इसीलिए आते होंगे कि चलो इसे भी देख लो, कहने को हो जायेगा कि लंदन गये तो इसे भी देखा.

Central London - S. Deepak, 2011


फ़िर मुझे आकर्षित किया दुकानो़ पर क्रिसमस की तैयारी में लगायी गई रंग बिरंगी रोशनियों ने. सोचा कि क्यों न उस और जा कर भी देखा जाये?

Central London - S. Deepak, 2011


रंगबिरंगी रोशनियों और दुकानों को देखते देखते मैं कोवेन्ट गार्डन पहुँच गया, जहाँ बाज़ार की छत पर लाल, चाँदी और सुनहरे रंग के बड़े बड़े गेंद से गोले लटक रहे थे. एक ओर रेस्टोरेंट थे, संगीतकार थे, तो दूसरी ओर दुकानें और भीड़ भाड़.

Central London - S. Deepak, 2011


कुछ देर तक वहीं दुकानों में घूमा, फ़िर बाहर निकला तो क्रिसमस के लिए बने हरे रंग के भीमकाय रैंनडियर ने ध्यान आकर्षित किया.

Central London - S. Deepak, 2011


फ़िर लगा कि अब देर हो रही है, वापस चलना चाहिये. तेज़ी से कदम बढ़ाये वापस चैरिंग क्रास जाने के लिए. आधा घँटा चल कर लगा कि कुछ गड़बड़ है. कोई जानी पहचानी सड़क नहीं दिख रही थी. वहाँ बैठी युवती की सुन्दर मूर्ति दिखी.

Central London - S. Deepak, 2011


रुक कर कुछ लड़कों से पूछा तो वह मेरी ओर हैरानी से देखने लगे, बोले कि यह तो अल्डविच है, चेरिंग क्रास तो बिल्कुल दूसरी ओर है और मुझे वापस जाना चाहिये. तब समझ में आया कि गलियों में घूमते हुए मेरी दिशा गलत हो गयी थी और मैं अपने रास्ते से बहुत दूर आ गया था. एक क्षण के लिए मन में आया कि इतनी झँझट करने से क्या फ़ायदा, वहीं से मैट्रो ले कर वापस विक्टोरिया जा सकता हूँ. लेकिन यह भी लगा कि वह मेरी हार होगी. हार न मानने की सोच कर, जिस रास्ते से आया थे, उसी पर वापस गया और जहाँ से सड़क छोड़ी थी, वहीं वापस पहुँचा.

चलना तो बहुत पड़ा लेकिन अंत में मुझे मेरी खोयी सड़क मिल गयी. अंत में जब ट्रैफ़ाल्गर स्क्वायर पहुँचा तो सोचा कि कुछ सुस्ता लिया जाये. चलते चलते टाँगे दुखने लगी थीं. उस समय दोपहर के 4.30 ही बजे थे लेकिन अँधेरा होने लगा था और बत्तियाँ जल चुकीं थीं. ट्रैफ़ाल्गर स्क्वायर में बड़ी घड़ी लगी दिखी जिस पर अगले वर्ष के ओलिम्पिक खेलों के प्रारम्भ होने में कितना समय बाकी है इसे दिखाया गया है.

Central London - S. Deepak, 2011


कुछ देर सुस्ता कर पार्लियामैंट स्ट्रीट की ओर बढ़ा तो एक सड़क के कोने पर नाम देख कर ठिठक गया, "डाउनिंग स्ट्रीट", यानि जहाँ ब्रिटिश प्रधान मंत्री का घर है. टेलीविज़न पर बहुत बार देखा था पर टीवी पर यह नहीं पता चलता कि उस सड़क पर सब लोग नहीं जा सकते क्योंकि सड़क के किनारे ग्रिल लगी है जिसके पीछे पुलिस वाले चेक करते हें कि कौन अन्दर जा सकता है, जैसा कि दिल्ली में रेसकोर्स रोड पर होता हैं जहाँ पहले इन्दिरा गाँधी रहती थी और अब सोनिया गाँधी रहती है.

Central London - S. Deepak, 2011


वेस्टमिन्सटर पहुँचा तो पुल की ओर जा कर नीली रोशनी में चमकते गोल झूले की तस्वीर लेने के लालच से खुद को नहीं रोक पाया.

Central London - S. Deepak, 2011


पुल के किनारे पर बनी बिग बैन की घड़ी और ब्रिटिश संसद का भवन रोशनी में चमक रहे थे.

Central London - S. Deepak, 2011


संसद भवन के साथ ही वैस्टमिन्स्टर के गिरजाघर में 11 नवम्बर के प्रथम विश्व युद्ध में मरने वाले सिपाहियों के स्मृति दिवस की तैयारी में पौपी यानि पोस्त के फ़ूलों से सजे क्रौस क्यारियों में लगाये गये थे, जैसा छोटा सा कब्रिस्तान बना हो.

Central London - S. Deepak, 2011


अंत में विक्टोरिया स्टेशन पहुँचा तो सामने शीशे का विशाल भवन रोशनी में जगमगा रहा था. उसके भीतर दफ़्तरों में काम करने वाले लोग किसी नाटक में काम करने वाले अभिनेता लग रहे जो सड़क पर जाने वाले लोगों को रियाल्टी शो दिखा रहे हों.

Central London - S. Deepak, 2011


आखिरकार ठीक समय पर विक्टोरिया स्टेशन पहुँच ही गया था. पैर दर्द कर रहे थे लेकिन मन में अपने पर गर्व हो रहा था कि लंदन की सारी यात्रा पैदल ही की और इस तरह से अपने जाने पहचाने शहर की बहुत सी नयी जगहों को देखने का मौका भी मिला.

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11 टिप्‍पणियां:

  1. बाहर का लंदन मेट्रो के लंदन से कहीं अधिक सुन्दर है।

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  2. बिल्कुल ठीक कहा तुमने प्रवीण. दुख यही है कि मुझे इस बात को समझने में बीस साल लग गये. खैर देर आये दुरस्त आये :)

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  3. aha ! such a beautiful post and such beautiful pics ! That pic of the Big Ben with cars whooshing by ! I loved your post and am now following you :)

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  4. Thanks Shadows Galore - I really admire your website and images so your praise is greatly appreciated :)

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  5. ये अंग्रेज लोग भी विचित्र हैं…घड़ी देखकर रहा हूँ, वह ओलम्पिल वाली…तस्वीरें तो सब पसन्द आईं…झूले वाली तस्वीर भी अच्छी लगी…अभी से क्रिसमस की तैयारी?…

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  6. धन्यवाद चन्दन. ओलिम्पक के लिए घड़ी लगाना, यह तो बेजिंग में किया गया था. यह दुनिया कैसे अधिक बिक्री हो इसकी बहुत चिन्ता करती है, इसलिए क्रिसमस की बत्तियाँ दो महीने पहले ही शुरु हो जाती हैं. :)

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  7. "पैदल सैर", अच्छा आइडिया है! अब मैं भी कोशिश करुंगा!

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  8. पैदल सैर का अलग आनन्द है लेकिन मेरे विचार में यह अकेले या फ़िर सही साथी के साथ ही हो सकता है!

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  9. आपकी पद यात्रा का फायदा हमें मिला और हमने वो लन्दन देखा जो अक्सर दिखाई नहीं देता...आइन्दा भी पैदल ही चलें इस से हमें भी फायदा और आपको भी...:-)

    नीरज

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  10. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।
    बालदिवस की शुभकामनाएँ!

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  11. लन्दन घूमने के लिए पैदल चलना जरुरी है.अच्छी सैर कर ली आपने.

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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