मंगलवार, सितंबर 13, 2005

किटाणु रहित दुनिया

यहाँ टीवी पर प्रतिदिन नये विज्ञापन आते हैं जिनका सार यही होता है कि हमारे आसपास की दुनिया, फर्श पर, सोफे पर, रसोई में, हर जगह खतरनाक किटाणुओं से भरी है और जिनसे बचने के लिए केवल सफाई से काम नहीं चलेगा. अगर आप अच्छी गृहणीं हैं तो अवश्य यह नया पदार्थ खरीदये, जिसे पानी में मिला कर सफाई करने से या जिसे स्प्रे करने से, सारे किटाणु १२ घंटे या २४ घंटे के लिए नष्ट हो जायेंगे. विज्ञापन का असर बढ़ाने के लिए इनमें अक्सर बच्चे भी अवश्य दिखाये जाते हैं. यानि कि खतरनाक किटाणुओं के बारे में सुन कर अगर आपके मन पर कोई असर न हो तो, उस विज्ञापन में एक छोटा सा गोल मटोल बच्चा जोड़ दीजिये जो जमीन पर रेंग रहा हो या फिर उठा कर कोई चीज़ अपने मुँह में डाल रहा हो. अगर आप अच्छे माता पिता हैं तो अवश्य अपने बच्चे की सुरक्षा के लिए किटाणु रहित संसार बनाना चाहेंगे ?

यह सब बिकरी कराने के विषेशज्ञों का कमाल है, जो यह देखते हैं कि कैसे अपनी ब्रेंड बनायी जाये, कैसे अपने प्रोडक्ट को बाजार मे बिकने वाली उस जैसी अन्य सभी वस्तुओं से भिन्न बनाया जाया और कैसे मानव मन में छुपे डरों और विश्वासों का विज्ञापनमों में ऐसे प्रयोग किया जाये कि आप उनकी कम्पनी की वस्तु को ही खरीदें.

अगर आपने जीव विज्ञान पढ़ा है तो जानते ही होंगे कि यह दुनिया, आँखों से न दिखने वाले किटाणुओं से भरी है. ये मानव के लिए कोई हानी नहीं करते. मानव शरीर के अंदर भी ऐसे किटाणु भरे हैं, जो हमारे जीने के लिए जरुरी हैं और जब बिमार होने पर एंटीबायटिक लेने से यह किटाणु मर जाते हैं तो दस्त लगना और अन्य तकलीफें हो जाती हैं. एंटीबायटिक के गलत इस्तमाल की वजह से बहुत से किटाणु पर इन दवाईयों का असर होना बंद हो जाता है इसलिए नयी दवाईयों की खोज हमेशा जारी रहती है. ऐसे में, मेरे विचार में ऐसे विज्ञापन लोंगो को गलत विचार देते हैं और इन पर विश्वास नहीं करना चाहिये.

आज की तस्वीरें किटाणुओं से भरी हुई प्रकृति कीः

2 टिप्‍पणियां:

  1. ये विज्ञापनों की दुनिया है.कल को यह भी हो सकता है कि आदमी को आदमी से खतरा बताया जाये.बच्चों के माध्यम से भावनात्मक शोषण किया जाता है.

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  2. मैने एक कहानी पढी थी,कहानी तथा लेखक का नाम याद नही आ रहा है.
    दो बचपन के दोस्तो की कहानी थी जो बाद मे अलग अलग रास्तो मे चले जाते है.
    एक दोस्त शहर मे आकर टॊर्च बेचना शुरू कर देता है, टोर्च बेचने के लिये वह भरी दोपहरी मे लोगो को अंधेरे का डर, सांप बिच्छु का भय दिखा कर टॊर्च बेचा करता था.

    विज्ञापन कुछ ऐसे ही होते है, पहले लोगो को डराओ, फिर अपना उत्पाद बेचो.

    कहानी मे आगे वह राजनीती मे आ जाता है. यहां भी वह लोगो को डराना शुरू कर वोट बटोरना शुरू कर देता है. अंतर सिर्फ इतना होता है कि पहले वो अंधेरे का भय दिखाता था, अब धर्म जाति का डर दिखाता था.

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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