सोमवार, सितंबर 17, 2012

फ्राक पहनने वाले लड़के


आप का दो या तीन साल का बेटा फ्राक पहनने या नेल पालिश लगाने की ज़िद करे या खेलने के लिए गुड़िया चाहे, तो आप क्या करेंगे? और आप कुछ न भी कहें, आप के मन में क्या विचार आयेंगे? अगर पाँच-छहः साल का होने पर भी आप का बच्चा इसी तरह की ज़िद करता रहे तो आप क्या करेंगे?

अगर आप की उसी उम्र की बेटी इसी तरह से पैंट या निकर पहनने की ज़िद करे, लड़कों के साथ मार धाड़ के खेलों में मस्त रहे तो आप क्या सोचेंगे?

आज के समाज में लड़कियाँ का पैंट या जीन्स पहनना आसानी से स्वीकारा जाने लगा है. शायद ही ऐसा कोई काम बचा हो जिसे केवल लड़कों का काम कहा जाता हो. डाक्टर, वकील से ले कर पुलिस और मिलेट्री तक हर जगह अब लड़कियाँ मिलती हैं. कोई युवती पुलिस में हो या मिलेट्री में, यह भी स्वीकारा जाता है कि उस युवती का विवाह होगा, बच्चें होगें और परिवार होगा, यह आवश्यक नहीं कि उस युवती को लोग समलैंगिक ही माने.

लेकिन शायद लड़कों के लिए समाज के स्थापित लिंग मूल्यों की परिधि से बाहर निकलना, अभी भी आसान नहीं है. पति घर में झाड़ू या सफ़ाई करे, खाना बनाये या बच्चे का ध्यान रखे, तो अक्सर लोग सोचते हैं कि "बेचारे को कैसी पत्नी मिली!" या फ़िर सोचते हैं कि उसमें पुरुषार्थ की कमी है. लड़के फ्राक पहनना चाहें, मेकअप करना चाहें या गुड़िया से खेलना चाहें, तो तुरंत ही माता पिता दोनो बिगड़ जाते हैं. खेल के मैदान में साथ खेलने वाले साथी और विद्यालय में साथ पढ़ने वाले उसका जीवन दूभर कर देते हैं.

कुछ सप्ताह पहले ऐसे लड़कों और उनके माता पिता के बारे में अमरीकी प्रोफेसर रुथ पाडावर का लिखा, न्यू यार्क टाईमस मेगज़ीन पत्रिका में एक आलेख छपा था.

Cover New York Times Magazine

इस आलेख में उन्होंने बताया है कि कुछ दशक पहले तक लड़कों के इस तरह के व्यवहार को बीमारी के रूप में देखा जाता था. डाक्टरों का कहना था कि इस तरह के व्यवहार को तुरंत न रोका गया तो बच्चा बड़ा हो कर समलैंगिक बनेगा, नारी बन कर जीना चाहेगा. इसलिए तब इन लड़को को जबरदस्ती "लड़कों जैसे रहो और बनो" के लिए मजबूर किया जाता था. आज इस बारे में डाक्टरों और मनोवैज्ञानिकों की सोच बदल रही है.

आलेख पढ़ते हुए मुझे अंग्रेजी फ़िल्म "बिल्ली एलियट" (Billy Elliot) याद आ गयी जिसमें खान में काम करने वाले मजदूर पिता के बेटे की कहानी थी जो नृत्य सीखना चाहता है और उसके पिता को यह जान कर बहुत धक्का लगता है.

मेरी एक इतालवी मित्र जो पहले पुरुष थी और जिसने लिंग बदलवा कर नारी बनने का आपरेशन करवाया था, मैंने उसके विषय में एक बार इस ब्लाग पर लिखा था. एक बार उसने मुझे बताया था कि उसके छोटेपन में उसके लिए सबसे अधिक कठिन था अपने परिवार की शर्म को स्वीकार करना, "अगर तुम युवक हो और युवतियों के कपड़े पहनो, युवतियों जैसा व्यवहार करो, तो दुनिया तुम्हारा तिरस्कार करती है. तुम्हारे साथ के मित्र तुम्हारे साथ नहीं दिखना चाहते, सोचते हैं कि तुम्हारे साथ रहने से लोग उनके बारे में भी गलत सोचेंगे. कुछ तथाकथित मित्र इतनी क्रूर बातें करते हैं और कहते हैं कि तुम्हारा दिल टूट जाता है. तुम कोशिश करते हो कि इसको छुपा कर रखो. घर में माता पिता, इसे मान भी लें, वे कहते हैं कि घर के अन्दर जैसा चाहो वैसे रह लो, पर घर से बाहर लड़कों जैसे रहो, नहीं तो लोग हमारा मज़ाक उड़ायेंगे, हमारा जीना दूभर हो जायेगा."

करीब एक दशक पहले मैंने यौन पहचान, व्यक्तित्व और यौनिक इच्छा विषय पर शौध किया था. उस शौध के दौरान, एक युवक ने इससे कुछ कुछ विपरीत समस्या बतायी थी. वह विवाहित था और उसके तीन बच्चे थे. उसने बताया था कि "जब मैं छोटा था तो मुझे गुड़िया से खेलना अच्छा लगता था, लड़कियों के कपड़े पहनना चाहता था. कुछ बड़ा हुआ तो लड़कियों के कपड़े पहनने की इच्छा अपने आप लुप्त हो गयी, लेकिन मेरे शौक लड़कियों जैसे थे. मुझे प्रेम कहानियाँ पढ़ना, घर में खाना बनाना, कढ़ायी बुनायी करना अच्छा लगता था. आज भी मेरे वही शौक हैं. मेरे साथी मित्रों में कुछ अपेक्षा सी हो गयी कि मैं समलैंगिक हूँ. सब यही कहते थे कि मैं ऐसा हूँ तो अवश्य समलैंगिक होऊँगा. मैंने कुछ समलैंगिक सम्बन्ध भी किये, पर कुछ मज़ा नहीं आया, मुझे लड़कों से गहरी दोस्ती पसंद थी लेकिन मुझे लड़कों के साथ सेक्स में वह आनन्द नहीं मिला जो लड़कियों के साथ सेक्स में मिला. मेरे कुछ समलैंगिक मित्र कहते थे कि मैं भीतर से समलैंगिक हूँ लेकिन मैं उसे स्वीकारना नहीं चाहता. मेरे विचार में किसी पर यह ज़ोर नहीं होना चाहिये कि अगर किसी के शौक लड़कियों जैसे हैं तो उसे समलैंगिक ही होना चाहिये."

अपने शौध की वजह से मेरी सोच और समझ में बहुत अन्तर आया था लेकिन यह भी सच है कि मैं अपने भीतर इमानदारी से देखूँ तो जानता हूँ कि मन में गहरे मूल्य आसानी से नहीं बदलते. हाँ इतनी समझ आ गयी है कि मानव की यौन पहचान और यौनता को आसानी से श्रेणियों में बाँटा नहीं जा सकता.

रूथ ने अपने आलेख लिखने के बारे में एक ब्लाग में बताया है कि आज के बहुत से माता पिता जब यह जान जाते हैं कि उनका बेटा लड़कियों जैसे कपड़े पहनना चाहता है या गुड़िया से खेलना चाहता है तो वह उन बच्चों पर कोई ज़बरदस्ती नहीं करना चाहते, वह चाहते हैं कि बच्चा अपनी प्रकृति के अनुसार ही व्यवहार करे और बड़ा हो. पर ऐसा करना आसान नहीं क्योंकि समाज का, साथ के अन्य बच्चों का व्यवहार उनसे कहते है कि उनके बच्चे में कुछ खराबी है. इसलिए इस तरह के कई माता पिता ने इंटरनेट के माध्यम से एक दूसरे को सहारा देने के लिए फोरम बनाये हैं, ब्लाग बनाये हैं.

रुथ का शौध बताता है कि सात से दस प्रतिशत लड़कों में इस तरह की बात किसी हद तक हो सकती है, किसी में कुछ कम, किसी में अधिक.

आजकल डाक्टर तथा मनोवैज्ञानिक भी इसे बीमारी नहीं मानते और कहते हैं कि बच्चो को अपने व्यक्तित्व का विकास जिस दिशा में करना चाहे वैसा करने की छूट होनी चाहिये. इस शौध के अनुसार करीब दस वर्ष के होते होते, यह लड़के इस तरह के कपड़े पहनना या व्यवहार करना बन्द कर देते हैं.

बड़े होने पर, उनमें से करीब साठ प्रतिशत युवक समलैंगिक हो सकते  हैं और करीब चालिस प्रतिशत विषमलैंगिक. लेकिन यह शौध यह भी बताता है कि घर वालों तथा माता पिता का सहारा मिलने पर भी, समाज और स्कूल में इन बच्चों पर उनके हम उम्र बच्चों के दबाव रहता है जो कि मान्य लैंगिक मूल्यों के बाहर वाले बच्चों को नहीं स्वीकारते.

आप रुथ का आलेख न्यू योर्क टाईमस पत्रिका पर पढ़ सकते हैं और आलेख लिखने के बारे में रुथ का साक्षात्कार इस ब्लाग पर  पढ़ सकते हैं.

भारत में अगर इस तरह के बच्चे हों तो उनके माता पिता को सलाह और सहारा देने के कोई माध्यम हैं? अगर आप को इसके बारे में जानकारी हो, तो मुझे अवश्य बताईयेगा.

***

20 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत कठिन सवाल जवाब भी निश्चित रूप से कुछ हटकर मिलेगा मैं एक बात कहना चाहूँगा समय के साथ सभी मानदंड बनते बिगड़ते रहते हैं ज्यादा कह पाना सरल नहीं

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    1. रमाकाँत जी, आप ने सही कहा. न तो यह सवाल आसान हैं, न ही इनके उत्तर. पर शायद कठिन विषयों पर भी बात करना बहुत आवश्यक है. :)

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  2. उत्तर
    1. धन्यवाद शास्त्री जी. संसार परिवर्तनशील है, इसे स्वीकार करलें कि हमें भी समय के साथ बदलना होगा, तो बहुत सी कठिनाईयाँ अपने आप दूर हो जायें. :)

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  3. यहाँ तो माँ ही कभी कभी मनोरंजन के लिये बच्चों को फ्रॉक पहना देती हैं..

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    1. यह बात तो है प्रवीण की भारत परम्परागत संस्कृति में शायद कभी कभी लड़की के भेष बनाने और वस्त्र पहनने के लड़कों को मौके मिल जाते हैं जैसे त्यौहारों पर या विवाह से जुड़ी रितीयों में. :)

      लेकिन जहाँ तक मेरी जानकारी है, भारत में इस तरह के लड़कों को और उनके परिवारों को बहुत कठनाईयाँ सहन करनी पड़ती हैं.

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  4. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार १८/९/१२ को चर्चा मंच पर चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका चर्चा मच पर स्वागत है |

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  5. Suppose if a child is born in a jungle where no dolls, frock or other stereotypes like cooking, reading love stories doing crafts how he will express his feminine inclination. I think all homo discourse is just a result of another stereotype developing in society. Western society hyperexploited sex and becomes bored, need new excitement. Media starts telling stories, research papers are written, an environment is created. This breaks down social taboo and becomes norm. Tomorrow they will say rapist are not criminals but they have slightly different bent of mind. We appreciate beauty and they exploit it. All propaganda will support them and one day society will accept rapist as normal .

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    1. Anupam, I think that trying to think independently and not let us conditioned by dominent thought in western culture is a fine thing. Even in societies that live in jungles, there are male and female social roles. Men who think that they are women and women who think that they are men, are known even in indigenous groups living in jungles.
      While I agree that many of the concepts about homosexuality are due to western preoccupation with categorizing and simplifying, if you really think that homosexuality is a western invention by bored persons, you need to do a better reading of history. It was criminalized in British India in the eighteenth century, so it did not start yesterday.
      Finally I think that equating homosexuality with rape is wrong and shows lack of understanding. Homosexuality is about relationship between consenting adults. Rape is about violence.

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  6. क्या ऐसे लोग यदि एक उम्र के बाद भी यह व्यवहार नहीं छोड़ते हैं तो क्या उनके मानसिक स्वास्थ्य पर कोई विपरीत प्रभाव पड़ता है?या ये लोग हमारी तरह ही सामान्य रहते है।क्या हार्मोन असंतुलन इसका कारण है? एक बार सेक्सोलोजिस्ट प्रकाश कोठारी जी ने कहा था कि कुछ पुरुष पूरे दिन सामान्य रहते हैं लेकिन पत्नी से संबंध बनाते समय महिलाओं के कपड़े पहन लेते हैं,यहाँ तक कि वो पूरा महिलाओं वाला श्रंगार कर लेते हैं और अपनी पत्नी से पुरुष की तरह व्यवहार करने को कहते हैं।क्या यह भी कोई बीमारी नहीं है?या वो ऐसा सिर्फ फंतासी के लिए करते हैं?मैंने जब पहली बार ये पढ़ा तो मुझे विश्वास नहीं हुआ कि ऐसा भी होता हैं।

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    1. राजन जी यौन पहचान और यौनिकता से जुड़ी इतनी बातें हैं जिनके लिए यह कह पाना कि वे क्यों होती हैं, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की जानकारी से यह संभव नहीं.

      अपने बेडरूम के भीतर दो लोगों के बीच क्या होता है, अगर उन्हें स्वयं इससे परेशानी नहीं तो बाहर वालों को इससे क्या मतलब?

      बात तो तभी कठिन होती है जब दोनों में एक अपने को इस स्थिति में सहने स्वीकारने के लिए मजबूर पाता है.

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    2. ऐसे केस में मुझे नहीं लगता की ऐसे पुरुष की पार्टनर सहज रह पाती होगी बल्कि ये उसकी मजबूरी है और मुझे लगता है कि ऐसा पुरुष मनोरोगी ही होता है कोई सामान्य पुरुष ऐसी हरकत नहीं करेगा ।और आपने लेख में बताया है कि लड़कियों की तरह व्यवहार करने वाले लड़के कुछ वर्षों बाद सामान्य हो जाते हैं।लेकिन जो लड़के पहले सामान्य होते हैं उनके व्यवहार में भी किसी कारण से ऐसा परिवर्तन आ सकता हैं।एक मामला कुछ समय पहले सामने आया था। गंगानगर राजस्थान में एक व्यक्ति था जो डाँस क्लासेज चलाता था इसमें वह सभी लड़कों से लड़कियों वाले गानों पर नृत्य करवाता था धीरे धीरे इन सभी लड़कों के बात करने हँसने का ढंग यहाँ तक कि उनकी चाल भी बिल्कुल लड़कियों जैसी हो गई जबकि वह व्यक्ति खुद सामान्य था।कुछ लड़कों के अभिभावकों ने तो उस पर केस ही करवा दिया था।

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    3. राजन जी, मानव अधिकार की दृष्टि से और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से आजकल इसे मानव यौनता की विविधता का हिस्सा माना जाता है न कि मनोरोग का.

      ऊपर जिस मित्र का मैने ज़िक्र किया है, वह पुरुष से नारी बना, लेकिन उसका अपनी पत्नी से सम्बन्ध नहीं टूटा और दोनो आज भी साथ हैं.

      मानव विविधता को सहजता से स्वीकार किया जाये तो शायद उनकी कठिनाईयाँ कुछ कम हों, क्योंकि भारत में जिन्हें हिँजड़ा कह कर निकाल दिया जाता है, उनकी कहानियाँ सुनिये तो दर्दनाक होती हैं और विश्वास नहीं होता कि समाज इतना क्रूर हो सकता है. इसी समाज के दिन में गालियाँ देने वाले कुछ लोग रात के अँधेरे में उनकी खोज में उन्हें हमबिस्तर बनाने निकलते हैं.

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  7. सुनील जी, आपका लेख एक ऐसा प्रश्न उठाता है जिसका उत्तर हम तब सरलता से दे सकते हैं जब बच्चा हमारा अपना या अपने परिवार का नहीं होता. बिल्कुल, बच्चा स्वतंत्र होना चाहिए अपनी राह चुनने के लिए, अपने मन के खिलौने, कपडे चुनने के लिए. किन्तु यदि यह पुत्र मेरा हो तो? तब मै सोचूँगी की यह बाहर कैसे जी पाएगा? बहुत कठिन जीवन होगा इसका. इसे अपनी ये इच्छाएँ दबाना ही सिखाना होगा आदि.
    हमारी यह सोच कि जेंडर दो ही हैं या अधिक से अधिक तीन ही शायद गलत है. कौन पुरुष अपने भीतर गर्भाशय लिए घूम रहा है या कौन कितने नर और कितने मादा अंग लिए जी रहे हैं, हम कह नहीं सकते. हार्मोन्स क्या कह रहे हैं और क्रोमोजोम्स क्या कह रहे हैं. ये सब बहुत जटिल प्रश्न पैदा करते हैं. निर्णय लेना बहुत कठिन है.
    घुघूतीबासूती

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    1. घुघूनी बासूति जी, मेरे विचार भी आप से बहुत मिलते हैं. वैचारिक स्तर पर मुझे ठीक लगता है कि बच्चे को अपने व्यक्तित्व के अनुसार बढ़ने पनपने की छूट होनी चाहिये, लेकिन अगर सोचूँ कि मेरा बेटा ऐसा हो तो मन में डर होता है कि उसे दुनिया की बर्बता के कैसे सुरक्षित रख पाऊँगा.

      इस तरह के जिन लोगों से मैंने बात की वह कहते हें कि सब कष्टों के बाद भी हमें स्वयं पर्दे में रहना स्वीकार नहीं था, पर दुख है कि माता पिता और भाई बहनों ने साथ नहीं दिया. कुछ माता पिता से भी बात की तो उनमें बहुत ग्लानी भाव पाया कि मेरी ही कुछ गलती थी जिससे मेरा बेटा ऐसा हुआ.

      किसी भी दृष्टि से देखें, बात है तो बहुत कठिन. आलेख लिखते हुए मेरा विचार इस कठिनायी को छुपाना नहीं बल्कि कठिनायी के बावज़ूद इस स्थिति में खुद को पाने वाले परिवारों को सहारा देना है.

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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