मंगलवार, नवंबर 15, 2005

लेखक और आदमी

मुनीष के चिट्ठे कविता सागर पर सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की एक सुंदर कविता पढ़ी. मुनीष जी को धन्यवाद.

सर्वेश्वर जी दिल्ली में राजेन्द्र नगर में हमारे घर के पास ही रहते थे और पिता के मित्र भी थे इसलिए अक्सर देखता था. वे तब साप्ताहिक पत्रिका "दिनमान" में काम करते थे. तब मैं नहीं जानता था कि वे क्या लिखते थे या कैसा लिखते थे.

लेखक, कवि, चित्रकार, कलाकार और समाजवादी कार्यकर्ता और नेता, यह सब बचपन के जीवन का भाग थे और सभी बच्चों की तरह मैं उनका कोई महत्व नहीं समझता था. दिल्ली में क्नाट प्लेस में आज जहाँ पालिका बाजार है, वहाँ कभी एमपोरियम और एक काफी हाऊस हुआ करता था. वही काफी हाऊस अड्डा था सब लोगों के मिलने का. कभी कभी पिता के साथ वहाँ गया था, पर उनकी कलाकारों की बातों में कोई दिलचस्पी नहीं होती थी, हर समय खाने और खेलने की ही सूझती थी.

चौदह या पंद्रह साल का था जब तीन लेखकों से परिचय हुआ सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, रघुवीर यादव और मोहन राकेश. उनमें से उस समय, केवल मोहन राकेश जी को लेखक की तरह जानता था. नया राजेंद्र नगर में पम्पोश की तरफ जाती सड़क पर, बाग के सामने वे तीसरी मंजिल पर बरसाती में रहते थे. करीब ही मेरी बुआ रहती थीं और बुआ के यहाँ छुट्टी में जाता तो दीदी के साथ उनके घर भी कई बार गया. उनके बारे में सोचूँ तो उनका छोटा कद, मोटा काला चश्मा, सिगार पीना और ठहाकेदार हँसी याद आती है. उनकी बेटी पूर्वा का मुंडन हुआ था और उसके गंजे सिर पर हाथ फेरना मुझे बहुत अच्छा लगता. जब १९७२ में अचानक उनकी मृत्यु हुई तो बहुत धक्का लगा था.

सर्वेश्वर जी और रघुवीर जी को मैंने कभी लेखक नहीं बल्कि पिता के मित्रों के रुप में ही देखा. इन्होंने क्या लिखा, मुझे कुछ नहीं मालूम था और न ही मेरी यह जानने की कोई दिलचस्पी थी. रघुवीर जी बच्चों के साथ आते. मंजरी, उनकी बड़ी बेटी मुझसे कुछ छोटी थी, उसी से बात होती और खेलते. अभी कुछ साल पहले जब हिंदी की लेखिका अलका सरावगी ने बताया कि उन्होंने अपनी थीसिस रघुवीर सहाय के लेखन पर की थी तो मुझे अचरज सा हुआ. रघुवीर जी लिखते थे? तब मैंने रघुवीर सहाय जी की किताबें ढ़ूँढ़ीं.

कल सर्वेश्वर जी कविता पढ़ कर यह सब बातें सोच रहा था. उनकी कविता "विवशता" की यह पंक्तियां मुझे बहुत अच्छी लगती हैं:

कितनी चुप चुप गयी रोशनी
छिप छिप आयी रात
कितनी सहर सहर कर
अधरों से फूटी दो बात


चार नयन मुस्काए
खोये, भीगे फिर पथराये
कितनी बड़ी विवशता
जीवन की कितनी कह पाये

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय और मोहन राकेश के बारे में आप अंतरजाल पर अनुभूति तथा अभिव्यक्ति पत्रिकाओं में पढ़ सकते हैं.

आज की तस्वीरें हैं भारतीय लोक गायकों की, अरुण चढ़्ढ़ा के दूरदर्शन सीरियल "१८५७ के लोकगीत" से.


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