बुधवार, नवंबर 16, 2005

धीरे जलना

क्या अर्थ है पहेली के इस गाने का, "धीरे जलना, धीरे जलना, जिंदगी की लौ पे जले हम"?

जीवन की आग में हमें धीरे धीरे जला कर पकाईये? पुराने तरीके से बिरयानी बनाने का ऐसे एक नुस्खे के बारे में कभी पढ़ा था कि हाँडी आग से बहुत ऊँची रख कर, चावल में थोड़ा सा पानी डालना चाहिये और उसे कड़छी से हिलाते रहिये, जब पानी सूखने लगे तो, थोड़ा सा और डाल दीजिये. कई घंटों में जाकर बिरयानी पकेगी.

अगर पत्नी को सलाह देनी होती है कि कोई चीज़ कैसे पकानी चाहिये, तो मेरी सलाह हमेशा धीरे धीरे पकाने वाले नुस्खों की होती है. इससे खाने में विषेश स्वाद आ जाता है, मैं कहता हूँ. पर उसे यह धीरे पकने वाले नुस्खों को तेजी से बनाने में मजा आता है. पहले पहले तो बहुत शौक से मुझे बतलाती थी कि कैसे उसने एक घंटे में बनने वाली चीज दस मिनट में बनायी.

"बैंगन का भुरता बनाया है, एक नये तरीके से", उसने प्रसन्न हो कर बताया था, "पहले कच्चे बैंगन को मिक्सी में डाल कर अच्छी तरह से महीन पीस लिया फिर तेज आग पर भून लिया, बन गया भुरता!"

"देखें भला कैसा बना है", हमने चखा और नाक सिकौड़ दी, "प्रिये, तुम्हें यह भारतीय खाना, भारतीय तरीके से ही बनाना चाहिये, तुम्हारी यह इटली की जल्दी, यहाँ के पास्ता बनाने में चल सकती है. अगर बैंगन को पहले आग पर भूनोगी नहीं, यूँ ही कच्चा मिक्सी में पीस दोगी तो उसमें वह विषेश भुना हुआ स्वाद नहीं आयेगा!"

"अच्छा, खाने के समय तो दस मिनट में जल्दी से खाना खा कर छुट्टी कर देते हो और मैं पहले एक घंटा पकाने में लगाऊँ और बाद में गैस के छेदों में से बैंगन के टुकड़े निकालते निकालते पागल हो जाऊँ?" वह बिगड़ कर बोली.

इसमे इतना बिगड़ने की क्या बात है, हमने समझाया, तुमने कहा था सच सच बताओ कैसे बने हैं और हमने सच बता दिया, बने तो अच्छे हैं पर यह तो "बैंगन पूरै" जैसी कुछ चीज बनी है इनमें भारतीय भुरते का स्वाद नहीं. भुनभुनाती रहीं वह उस शाम और खाने में हमें भुरता खाने को नहीं मिला.

कुछ सप्ताह बाद कुछ भारतीय मित्र घर पर खाने पर आये, उनमें एक दम्पति भी थे जिनका बोलोनिया में एक रेस्टोरेंट है. श्रीमति जी ने आलू के पराँठे और बैंगन का भुरता बनाया. तब तक हम भी भुरते वाली बात भूल चुके थे. हमने भी खूब खाया. सबने खूब तारीफ की खाने की. रेस्टोरेंट की मालकिन बोली, "मैं अपने कुक को भेज दूँगी उसे यह भुरता बनाना सिखा दो! भारत से बुलवाया है पर इतना बढ़िया भुरता कभी नहीं खाया."

श्रीमति जी ने हमारी ओर कटिल मुस्कान फैंकी और शुरु हो गयीं, "नया तरीका निकाला है भुरता बनाने का. जल्दी भी बन जाता है और गैस भी नहीं गंदी होती..."

आज की तस्वीरें बोलोनिया की भारतीय एसोसियेशन के समारोह की.


2 टिप्‍पणियां:

  1. यहां पर कविराज गुलज़ार, तांत्रिक विधी से क्रीडा करने की बात कर रहे हैं. धीरे जलना धीरे जलना, जल्दबाजी में मे खाक मत होना!

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  2. क्या याद दिला दी यार!
    बैंगन का भरता और साथ में दाल चटनी, मजा आ जाता है। वैसे तो मै सिन्धी हूँ, लेकिन शादी पंजाबियों मे की है, अब चूंकि किचन मे श्रीमतीजी की ज्यादा चलती है, इसलिये खाने मे पंजाबी टेस्ट ज्यादा रहता है। लेकिन मै बहुत चटोरा हूँ, दुनिया की हर डिश पर हाथ साफ़ करने के लिये एवरैडी रहता हूँ।पहले बाहर खाकर आता हूँ, वहाँ पर कुक से सवाल पूछ पूछकर पकाता हूँ, फ़िर घर पर भी बनाने की कोशिश करता हूँ।

    अरबी खाने में भी एक बैंगन की डिश होती है मुत्तबल, इसे ये लोग एपीटाइजर मे खाते है, बहुत सही होती है, बनाने की विधि ये रही:
    http://arabicslice.com/moutabal.html

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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