गुरुवार, दिसंबर 15, 2005

पिंटर की आग

सन २००५ का साहित्य के लिए नोबल पुरस्कार अंग्रेजी नाटककार, लेखक और राजनीतिक कार्यकर्ता हेरोल्ड पिंटर को मिला है. मुझे आम तौर पर नाटक पढ़ने में दिलचस्पी नहीं है, कभी विजय तेंदुलकर या मोहन राकेश का कुछ पढ़ा था, पर हेरोल्ड पिंटर का कोई नाटक न पढ़ा था न देखा था. उन्हें पहली बार देखा और सुना दिसम्बर २००४, करीब एक साल पहले जब उन्होंने बीबीसी के कार्यक्रम "हार्डटाक" में कहा कि श्री बुश और श्री ब्लेयर दोनो को युद्ध अत्याचार का अपराधी मान कर उन पर मुकदमा करना चाहिये. वे बहुत अच्छा बोलते हैं और केवल भावुकता की ही बातें या भाईचारे और न्याय की किताबी बातें करते हों, ऐसा नहीं, वह अपनी बात को साबित करने के लिए स्पष्ट विचार, तर्क और प्रमाण के साथ बात करते हैं. अगर आप चाहें तो उनका वह साक्षात्कार देख सकते हैं.

नोबल पुरस्कार लेते समय भी उनका भाषण कम दमदार नहीं था. इस भाषण में एक तरफ तो उन्होंने अपने लेखन के तरीके की झलक दिखाई, तो दूसरी तरफ अपने राजनीतिक कार्यकर्ता होना का सक्षम परिचय दिया है. अपने नाटकों के चरित्रों के बारे में वह कहते हैं कि चरित्र एक बार बनने के बाद अपना स्वतंत्र जीवन ले लेते हैं और लेखक के बस में नहीं रहते बल्कि अपनी नियती स्वयं ढ़ूँढ़ते हैं.

पर असली आग है उनके भाषण में - अमरीकी विदेश नीति और उसके द्वारा बड़े बहुदेशी कोरपोरेशनों के सम्राज्य को स्थापित करने के खिलाफ़. वह कहते हें कि कम्यूनिस्ट शासन और सोवियत रुस में हुए अत्याचारों के बारे में तो बहुत बहस हुई है पर दुनिया में क्रूरता से अपने मुनाफे के पीछे लाखों मासूम लोगों के जान लेने के लिए अमरीकी योगदान का न तो ठीक से ज्ञान है और न इस पर ठीक से शोध हुआ है. यह भाषण पढ़ कर देखिये, तब बताईये कि आप को उनके विचार कैसे लगे.
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मैं मानता हूँ कि पिंटर जी ने जरुर अच्छा ही लिखा होगा और ऊपर दिये गये विवरण से स्पष्ट है कि मैं उनका प्रशंसक हूँ लेकिन यह भी कहना पड़ेगा कि साहित्य का नोबल पुरस्कार यूरोपीय भाषाओं की तरफ पक्षपात करता है. भारत की भाषाओं की इसमें पूरी अवहेलना की जाती है. वरना दलित, पीड़ित जन पर लिखने वाली और उनके साथ कदम से कदम मिला कर काम करने वाली महाश्वेता देवी जैसे लेखक को क्यों भूल जाते लोग? क्यों उनका और उनके जैसे अनेक लेखकों के बारे में भारत से बाहर बहुत कम लोग जानते हैं ?
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किसी भी यात्रा के दौरान, शाम को, रात को, खाली समय में हिंदी लिखने का मौका मिल जाता है. इस बार लंदन यात्रा के दौरान मैंने पापा की दो अधूरी कहानियों को क्मप्यूटर पर लिखा. अधूरी कहानी पढ़ने में आनंद नहीं आता पर मुझे उन्हें लिखना जरुर अच्छा लगा.

आज की तस्वीरें लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम सेः


3 टिप्‍पणियां:

  1. आँसू और इन्द्रधनुष अच्छी लगी. लेखन शैली बहुत पसंद आई.
    प्रत्यक्षा

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  2. Maine pahlee dafaa Harold Pinter ka naam tab sunaa jab unhe Nobel milaa - ab aapke links dvaara unse parichit hone jaa rahaa hoon. Bahut bahut shukriya, links ke liyein.

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  3. Read your father's stories (two of them) found them to be very nice.
    Saw the interview with Mr. Pinter, and though I admire his conviction and his expression, I thought that he should have made his point in a more objective manner. Contrary to what you wrote in your post, I thought that his stand, though passionate, was not supported enough by facts.
    Nevertheless it was a pleasure to hear him speak - Thanks again for the links.

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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