मंगलवार, अक्तूबर 23, 2007

बदलता चीन

आज सुबह मुझे काम से दो सप्ताह के लिए चीन जाना है. अंतिम चीन यात्रा को बीते छह साल हो गये, जब मँगोलिया जाते समय एक दिन के लिए बेजिंग में रुका था. पर इस बार मुझे बेजिंग नहीं जाना, बेंकाक से सीधा चीन के दक्षिण पश्चिम में स्थित राज्य युनान की राजधानी कुनमिंग जाना है. पहली बार कुनमिंग 1989 में गया था और अंतिम बार 1995 में, इस बीच में वह शहर कितना बदला है यह जाने की उत्सुक्ता है.

पहली बार की बेजिंग यात्रा कुछ कुछ धुँधली सी याद है. 1988 में हवाई अड्डे से शहर जाने वाली पतली सी सड़क थी, दोनो ओर खेत और बीच में चलती साईकलें और बैलगाड़ियाँ. बेजिंग शहर के छोटे छोटे एक मंजिला पुराने तरीके के घर. सम्राट के राजमहल के अंदर घुसने के लिए चीन निवासियों के कम टिकट था और विदेशियों के लिए अधिक. विदेशियों के लिए चीनी रुपये भी अलग थे, रेनएमबी जबकि वहाँ के लोगों के रुपये थे युवान. रेनएमबी से केवल विषेश दुकानों से सामान खरीद सकते थे, जैसे कि बेजिंग का फ्रैंडशिप स्टोर जहाँ आयातित वस्तुएँ मिलती थीं और जहाँ चीनी नागरिक कुछ नहीं खरीद सकते थे. चीनी महिलाएँ और पुरुष एक जैसे काली, भूरे या नीले कोट पैंट पहनते थे, सबके एक जैसे कटे बाल, पता नहीं चलता था कि कौन नारी और कोन पुरुष? सड़क पर भीख माँगने वाला कोई नहीं था.

1989 में हाँगकाँग से मकाऊ होते हुए कानतोन यानि ग्वागज़ू गये थे, फ़िर वहाँ से कुनमिंग, कुनमिंग से सियान और अंत में बेंजिंग जहाँ तियानामेंन स्कावर्य में छात्रों का आंदोलन चल रहा था और एक बारिश भरे दिन में मैं भी छात्रों से बात करने गया था पर कोई अँग्रेजी बोलने वाला नहीं मिला था. जिस दिन बेंजिग से वापस यूरोप लौटे उसके तीन चार दिन के बाद ही छात्रों पर पुलिस ने टैंक ले कर हमला किया था.

1992 में वापस बेजिंग लौटा तो नया होटल देख कर हैरान रह गया. हवाई अड्डे से शहर जाने के लिए छह लेन वाला हाईवे बना था और हवाईअड्डे के पास ही तीस चालिस मँजिला होटल था, जिसकी खिड़की से नीचे आसपास के छोटे मोटे गरीब घर और भी गरीब लगते थे. शहर आँखों के सामने बदल रहा था. काले, भूरे कपड़ों वाले लोग कम हो रहे थे, सुंदर कपड़े पहने नवजवान बढ़ रहे थे.

1994और 1996 के बीच कई बार चीन लौटा, कभी ग्वागँडोंग, कभी ग्वाँगजी, कभी युनान, कभी बेजिंग. हर जगह मानो भूचाल आ रहा था. उन्हीं दिनो में पहली बार ग्वागज़ू के कुछ प्रोफेसरों से माओ के दिनों की कल्चरल रिवोल्यूशन के रोंगटे खड़े कर देने वाले अनुभव सुने. लोगों के मन में से सरकारी या पुलिस का डर कम हो रहा था, लोग अपने मन की बात कहने लगे थे.कुनमिंग भी बदल रहा था, छोटा सा अधसोया शहर जाग कर गगनचुँबी भवन बनाने में अन्य शहरों से पीछे कैसे रहता पर सड़कें फ़िर भी तंग थी, यातायात इस तरह का बैलगाड़ियों, कारों और साईकलों से मिला जुला.

मालूम है कि इन ग्यारह सालों में कुनमिंग का कायाकलप भी पूरा हो चुका होगा. वह छोटा सा पुराना शहर जो मेरी यादों में है, वह अब नहीं दिखेगा. पर मुझे अगले दो सप्ताहों में गाँवों मे घूमना है, यह देखना चाहूँगा कि इस बदलते चीन का गाँवों में कितना प्रभाव पड़ा है. यात्रा से आ कर उसका हाल सुनाऊँगा, तब तक पिछली चीन यात्राओं की कुछ तस्वीरें. 1989 में खींचीं यह तस्वीरें बहुत पुरानी लगतीं हैं, शायद इसलिए क्योंकि उस साल मुझे श्वेत श्याम तस्वीर खींचने का शौक चर्राया था. रंगीन तस्वीर में मैं खुद भी हूँ ग्वागँडोंग शहर के स्वास्थ्य मँत्रालय के अधिकारिओं के साथ.










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संजय नें मेधा पटकर के भाषण के बारे में पूछा है, उसकी भी रिकार्डिंग की थी पर अब तो चीन से वापस आ कर वह काम हो पायेगा.

9 टिप्‍पणियां:

  1. संजय बेंगाणी23 अक्तूबर 2007 को 10:11 am

    आपके यात्रा सस्मरण का इंतजार रहेगा.

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  2. चीन के बारे में और जिज्ञासा है.. इस बार ज़रा और विस्तार से लिखियेगा..और बीस साल पहले के चीन से तुलना करते हुए लिखियेगा.. इंतज़ार है..

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  3. बहुत सम्यक ढंग से बदलते चीन की तस्वीर खींची है आपने। इस वर्णन को पढ़कर फाह्यान और ह्वेनसांग की याद ताजा हो गयी।

    आपसे चीनी लोगों की 'कार्य संस्कृति' के बारे में भी कुछ सुनना चाहूँगा।

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  4. चीन एक बंद दराज़ की तरह रहा है । आप इस दराज़ में झांक रहे हैं । हमें प्रतीक्षा है । चीन की एक फिल्‍म देखी थी फेस्टिवल में कुछ साल पहले । पोस्‍टमैन । ग़ज़ब की फिल्‍म थी । चीन के पहाड़ी हिस्‍सों और वहां के जीवन की झलक दिखी थी फिल्‍म में । काफी कुछ
    कुमाऊं जैसा लगा था वो प्रदेश । अगले हिस्‍सों का इंतज़ार है ।

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  5. बहुत अच्छा लगा, चीन के तब और अब के बदलते रूप को आपकी निगाह से जानना।

    लौटकर कुछ और विस्तार से लिखिएगा, खासकर आर्थिक-सामाजिक नजरिए से।

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  6. आपकी यात्रा सुखद रहे और आपके लौट कर आने पर चीन व इस यात्रा के बारे में और पढ़ने को मिले ऐसी कामना करती हूँ ।
    घुघूती बासूती

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  7. यात्रा की शुभकामनाएं डाक्टर साहब।
    आपने मधुमक्खियां भी चीन के ही किसी प्रांत एं खाई थी ना?
    एक पुरानी पोस्ट हल्की सी याद आ रही है।
    :)

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  8. अरे आपने तो मुझे लखनऊ से चीन कल्पनाओं मे पहुँचा दिया :) आगे और भी यात्रा के बारे मे जानने की इच्छा रहेगी ।

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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