गुरुवार, दिसंबर 13, 2007

किस नाम से तुम्हें मारूँ?

जब भी दिल्ली के एशिया मानव अधिकार केंद्र का बुलेटिन (ACHR Review) मिलता है तो अक्सर मन में इस केंद्र के ज़िम्मेदार श्री सुहास चकमा की सराहना करने की इच्छा होती है. मानव अधिकारों की बात हो तो भारत के आसपास के सभी देशों के बारे में निर्भीक हो कर लिखते हैं. अपने बुलेटिन के नये अंक में उन्होंने भारत में मानव अधिकारों पर होने वाले प्रहारों की बात की है.

जब किसी देश के कानून से बाहर निकल कर लोग अपने हाथों में कानून ले लेते हैं और अगर उस देश में कानून की रक्षा करने की समर्थता या इच्छा नहीं होती तो धीरे धीरे यह बात सारे समाज को डसती है. यह बात वह ग्वाटेमाला और कोलोम्बिया के उदाहरण के साथ बताते हैं जहाँ की सरकारों ने अपने शत्रुओं के लड़ने के लिए कानून छोड़ कर कानून के बाहर निजी सैंनाओं का सहारा लिया और यही सैनाएँ काबू से बाहर निकल कर अत्याचार, खून, बदमाशी का खुला खेल खेलने लगीं.

उनका कहना है कि कलकत्ता में नंदीग्राम में सीपीआई मार्कसवादी दल द्वारा अपने गुँडों के सहारे लोगों को कुचलना जो जबरदस्ती जमीन छौने जाने का विरोध कर रहे थे, उड़ीसा सरकार द्वारा पोस्को स्टील प्लाँट का विरोध करने वालों का दमन, केरल में सीपीआई मार्कसवादी दल के लोगों द्वारा मुन्नार के आदिवासियों पर हमला, भारत में इस दिशा में बढ़ती प्रवृति का संकेत देती है और कहते हैं कि अगर सरकार इसपर रोक नहीं लगायेगी तो इसके परिणाम घातक होंगे.

सच बात है कि आज भारत में जिसमें थोड़ा सा भी दम हो, चाहे वह शिवसैनिक हों जो किसी फ़िल्म या पुस्तक या चित्र का विरोध कर रहे हों, चाहे वह रूढ़िवादी मुस्लमान हों जो किसी लेखिका का विरोध कर रहे हों, या सिख हों जो अपने धर्म का मजाक उड़ाने वाले की बात कर रहे हों, कानून क्या होता है यह नहीं जानना चाहते, सीधा दंगाफसाद तोड़फोड़ शुरु कर देते हैं, मरने मारने की धमकी देते हैं, जिसका मन करता है वह अपनी धार्मिक भावना को ठेस लगने का झँडा पकड़ कर खड़ा हो जाता है, और सरकार उन गुण्डागर्दी करने वालों के विरुद्ध कुछ नहीं कर पाती, बल्कि उनका साथी बन कर लेखों, चित्रकारों, विचारकों पर मुकदमा कर ठोक देती है कि तुमने हमारे देश की शाँती को बिगाड़ा है, आग भड़कायी है. यह सभी जानते हैं कि किसी जिले के कमिशनर में अगर दम है तो अपने इलाके में दँगा फसाद होने नहीं देता, उसे सख्ती से रोक देता है पर अधिकाँश भारत में यह हिम्मत चुक गयी है.

तुरंत लाभ के लिए, चुनावों का सोच कर या गठबँधन का सोच कर या अन्य फायदे के लिए, सभी अपने मुँह आँखों पर पट्टी बाँध लेते हैं, चाहे वह काँग्रेस हो या बीजेपी या फ़िर कम्युनिस्ट पार्टी वाले. विकास, विदेशी अंदाज के बने माल, जगप्रसिद्ध ब्राँड की चाह, से अधिकतर लोगों की आँखें शायद चुँधिया गयीं हैं जो किसी को भी इस विकास में रुकावट बनता देखती हैं उसे मसल कर कुचल देती हैं या फ़िर उसे कुचलता देख कर भी अनदेखा कर देती हैं.
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आज एक फ़िल्मी समाचार देखा जो राम गोपाल वर्मा की नयी फिल्म "सरकार राज" की बात कर रहा था जिसमें अमिताभ बच्चन, अभिशेख और एश्वर्य राय तीनों काम रहे हैं. उसमें लिखा है कि शायद यह फ़िल्म नंदीग्राम में हुए हादसे पर बनी है और नंदीग्राम में क्या हादसा हुआ उस पर लिखा है कि नंदीग्राम में एक बड़ा बाँध बन रहा है जिसका वहाँ के लोग विरोध कर रहे हैं.

3 टिप्‍पणियां:

  1. KAFI BAATE THEEK HAI AAPKI. JO DEKHA WO LIKHA. JAHA TAK INDIA OR PAKISTAN KI BAAT HAI, WOH AB BAAT CHUKA HAI, EK HOGA NAHI HOGA, YEH ALAG OR BHAVISH KI BAAT HAI. VERTMAAN KIYA HAI USE KASIS BACHANA HAI, YEH DEKHANA HAI, IS LEKER UNDERCURRENT PURE DESH ME HAI, KARGIL WAR ME CLEAR HO GAYA THA. PER JAHA TAK DANGO KI BAAT HAI, SHIKHANDI RAJ HOGA TO YEHI HOGA, BAAT GEETA KI APNE . TO UMMEH KERTAH HU EK BAAR PHIR PDEGE, HINSA KA ISTEMAAL EKDUM ANT ME KERNE KO KAHA GAYA HAI, NA KI START ME. GEETA KI HINSA ARJUN KE LEIYA THI, SHIKHANDIO KE LIYE NAHI, JO DHARAM HI NAHI JANETE, JO MANUSH KO NAHI JANETE WOH KIYA GANDIV UTHAAGE. BAAT OR BHI HAI PHIR KABHI
    ROHIT

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