सोमवार, दिसंबर 17, 2007

आज की भारतीय नारी

भारत के बड़े शहरों में घूमिये तो हर क्षेत्र में नारी आगे बढ़ते दिखती है, चाहे वह विश्वविद्यालय की छात्राएँ हों या डाक्टर वकील जैसे पैशे में जुटी नारियाँ या फ़िर हर तरह के काम में लगी नौकरी करने वाली. जब विश्व लिंग भेद रिपोर्ट (World Gender Gap Report) देखी तो सोचा कि भारत का स्थान नारी विकास के क्षेत्र में अच्छा ही होना चाहिये.

रिपोर्ट ने कुल 128 देशों में नारी और पुरुष की स्थिति को जाँचा है और इसके हिसाब से स्वीडन विश्व में पहले नम्बर पर है और भारत 114वें स्थान पर. दक्षिण एशिया के अन्य देशों की स्थिति है नेपाल 125वें स्थान पर, पाकिस्तान 126वें स्थान पर, बँगलादेश 100वें स्थान पर और श्री लंका 15वें स्थान पर.

पहले तो यह हैरानी हुई की भारत इतना पीछे कैसे हुआ, पाकिस्तान और नेपाल के पास? दूसरी हैरानी हुई बँगलादेश का स्थान हमारे देश से आगे है. पर सबसे अधिक हैरानी की बात लगी कि श्री लंका इतना आगे है जबकि अमरीका 31वें स्थान पर है और इटली 84वें स्थान पर.

यह रिपोर्ट चार क्षेत्रों में समाज में नारी का स्थान परखती है - आर्थिक उन्नति और आय, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा राजनीतिक सशक्तिकरण. अब देखें भारत के कुछ आँकणे:

जहाँ तक आर्थिक उन्नति और आय का सवाल है कमजोरी के कारण हैं समान कार्य के लिए भारत में नारियों को पगार कम मिलती है, उन्हें काम करने के मौके कम मिलते हैं, ऊँचे पद पर उनकी तरक्की कम होती है (ऊँचे पद पर स्त्रियाँ 3 प्रतिशत, पुरुष 97 प्रतिशत) और तकनीकी क्षेत्रों में वे अपेक्षाकृत स्थान नहीं पातीं. इस दृष्टि से भारत का स्थान विश्व के 128 देशों में 114वाँ हैं.

शिक्षा क्षेत्र में लड़कों के मुकाबले कम लड़कियाँ लिखना पढ़ना जानती हैं (लड़कियाँ 48 प्रतिशत, लड़के 73 प्रतिशत), प्राईमरी स्कूल में उनका अनुपात कम है, ऊच्च शिक्षा में भी उनका अनुपात युवकों के मुकाबले में कम है (ऊच्च शिक्षा में लड़कियाँ 9 प्रतिशत, लड़के 14 प्रतिशत). इस दृष्टि से भारत का स्थान 128 देशों में से 122वें स्थान पर है.

स्वास्थ्य के क्षेत्र में जन्म के समय लड़कियों और लड़कों के अनुपात में अंतर होने की विषमता भारत में बहुत अधिक है, और स्वास्थ जीवन आकाँक्षा में उनका जीवन कुछ छोटा होता है, इसलिए इस दृष्टि से देखने पर भारत का स्थान 128 देशों में से 117वें स्थान पर है.

राजनीतिक संशक्तिकरण के क्षेत्र में भारतीय संसद में स्त्री साँसद पुरुषों के सामने बहुत कम हैं (स्त्रियाँ 8 प्रतिशत, पुरुष 92 प्रतिशत) और स्त्री मिनिस्टर भी कम हैं ( स्त्री मिनिस्टर 3 प्रतिशत, पुरुष 97 प्रतिशत).

कुछ दिन पहले अखबार में पढ़ा था कि एक सर्वे हुआ जिसमें पूछा गया कि आप अपने भविष्य के बारे में क्या सोचते हैं तो निकला की भारतीय सबसे अधिक आशावान हैं कि भविष्य आज से अच्छा होगा और 2020 तक भारत एक विकसित देश होगा. पर अगर देश की स्थिति आँकणों से देखी जाये तो विकासित होने का रास्ता अधिक लम्बा लगता है. शायद इसका सबसे बड़ा कारण शहरों और गाँवों के बीच की विषमता है. शहरों में जीवन तेजी से सुधर रहा है, उन्नति के मौके बढ़ रहे हैं पर गाँवों में अभी भी बैलगाड़ी ही चलती है, पानी और बिजली जैसी आवश्यकताएँ अधूरी रह जातीं हैं. भारतीय दर्शन नारी को देवी मानता है, देवी के रुप में मंदिर में जगह देता है पर जब तक आम जीवन में नारी के साथ विषमताएँ रहेंगी, मंदिर की देवी केवल कहने की बात हो कर ही रह जाती है.

5 टिप्‍पणियां:

  1. जमीनी हकीकत आंकड़ों से अधिक निराशाजनक है। भारत में विकास निस्संदेह हो रहा है, लेकिन वह एक विकलांग विकास है। यह भयंकर विषमता के पोलियो से ग्रस्त विकास है। सच्चाई यही है कि भारत की लगभग चालीस फीसदी आबादी विकास की दौड़ और कवायद में शामिल ही नहीं है। यह स्वस्थ और संतुलित विकास नहीं है। विकास के मौजूदा मॉडल पर चलते हुए हम बहुत आगे तक नहीं बढ़ सकेंगे।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुनील जी, अब इसे दुर्भाग्य कहें या कुछ और, पर आज भी कुछ बातें या तो राजनैतिक मंच पर या फ़िर यूनाईतेद नेशंश की रिपोर्ट में ही अच्छी लगती हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  3. सही कहा आपने, जब तक ग्रामीण स्तर पर महिलाऒं का विकास या उनकी भागीदारी नहीं बढती। तब तक निरी बातें हैं ,विकास या उससे जुडे मुद्दे।

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी ब्लग बहुत रोचक लगी । मैने भी रिपोर्ट पढा था और मै चकित रहि थि कि भारतसे नेपाल पिछे कैसे हुवाँ? मुझे लगता है या तो भारतकि अच्छि तरह से सर्भे नहु हुवा या तो नेपालकी! क्युँ कि भारत से ज्यादा महिलाओं पर अत्याचार कहिँ नहि होता । हाँ, हम ये नहि कहेगें कि नेपालमे सब बराबरी है, लेकिन कमसे कम भारत जैसा नहि हैं । भारतकी आवादी भि ज्यादा है और सिर्फ शहरके लोग धनी हो रहे हैं । वँहाके पुजिवाद ने महिलाओको नंगा करके छोडा है और पुँजीवादी महिलाएँ, नंगी होती जा रहि है । क्या इस नंगापनको सर्भे मे स्थान दिया है?
    कल्पना चावला से सुनिता तक कि प्रगतिको मै नजरअन्दाज नहि कर सकति लेकिन भारतमे इतना असमानता हैं कि मै दो महिने सोचति रह गइ कि कितना साल लगेगा भारतियोको ये सोचने मे कि औरते भि झापड मार सकति है, और लड्कोको सडकपर बेइज्जती कर सकति है ।

    उत्तर देंहटाएं

"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...