शनिवार, अप्रैल 05, 2008

अपनी बात कहने का अधिकार

इतालवी राष्ट्रीय चुनाव होने वाले हैं और आजकल हर तरफ़ चुनाव रैलियाँ हो रहीं हैं. इसी तरह की एक रैली में दो दिन पहले हमारे शहर बोलोनिया में श्री जूलियानो फैरारा आये. फैरारा जी पत्रकार हैं, एक समाचार पत्र के सम्पादक हैं, टीवी पर कार्यक्रम भी करते हैं और पहले बहुत समय तक इतालवी उद्योगपति और पूर्व प्रधानमंत्री बेरलुस्कोनी के दल में थे. अब उन्होंने अपनी पार्टी बनायी है "जीवन का अधिकार पार्टी" जिसका प्रमु्ख ध्येय है कि देश में गर्भपात न करा सकने का कानून बनना चाहिये क्योंकि उनका कहना है कि जीवन का अधिकार सबसे बड़ा और ऊपर है, और किसी को दूसरे का जीवन लेने का हक नहीं, किसी न पैदा हुए बच्चे का भी नहीं. उनके दल को तुरंत पोप द्वारा समर्थन भी मिला है पर आम जनता उनके प्रति कुछ उत्साह नहीं दिखा रही.

बोलोनिया में उनकी रैली में करीब एक हज़ार औरतों और नवजवानों ने उनका बहुत उत्साह से स्वागत किया, उन पर सिक्के, टमाटर और अँडे फ़ैंके और स्टेज पर चढ़ कर उनको बोलने से रोकने की कोशिश की. मारामारी में लाठियाँ चलीं, कुछ लोग घायल हुए और फैरारा जी को पुलिस संरक्षण में वापस जाना पड़ा.

पिछले कुछ समय से इटली में पोप द्वारा कही जाने वाली इस तरह की बातों पर जैसे कि गर्भपात न होने दीजिये, समलैंगिक युगलों को सामान्य दम्पति के अधिकार नहीं दीजिये, मानव भ्रूँड़ पर जेनेटिक शौध नहीं होना चाहिये, कुछ राजनीतिक लोगों ने उनके पक्ष में बोलना शुरु कर दिया है कि हमें अपने कानून बदल लेने चाहिये, पोप ठीक कहते हैं, इत्यादि. विश्वविद्यालय के विद्यार्थी गुटों ने और मानव अधिकारों की बात करने वालों ने और कूछ आम जनता ने इस तरह की बातों को पिछड़ापन और पुराने समय में लौट जाने की कोशिश बताया है और इनका विरोध किया है. फैरारा जी पर हमला और उन्हें न बोलने देना इसी बहस का हिस्सा माना जा सकता है.

मैं इस बात से बिल्कुल सहमत नहीं कि कोई बोल रहा हो और उस पर हमला किया जाये और उसे अपनी बात न कहने का मौका मिले. मेरे विचार में इस तरह का विरोध बिल्कुल गलत है. मैं फैरारा जी का प्रशंसक नहीं हूँ, बल्कि मानता हूँ कि वह मुझे बिल्कुल पसंद नहीं. टीवी पर उनका कार्यक्रम हो तो मैं तुरंत चैनल बदल देता हूँ क्योंकि मुझे उनके बोलने का आक्रामक तरीका अच्छा नहीं लगता. मैं उनके गर्भपात रोकने का कानून बनाओ वाली बात से भी बिल्कुल सहमत नहीं, पर मैं मानता हूँ कि उनको भी बोलने का उतना ही हक है जितना अन्य किसी को है. मुझे नहीं पसंद तो न मैं उन्हें सुनने जाऊँगा, न उन्हें वोट दूँगा.

इस बात पर मेरी अपने कुछ युनियन वाले मित्रों से बहस हो गयी. मुझे लगता है कि मेरे कुछ वामपंथी मित्र किसी किसी बात पर उतने ही असहिष्णु और कट्टर हैं जितने रूढ़िवादी लोग, उनके लिए मानव अधिकार वही हैं जिन बातों में वह विश्वास करते हैं. उनका कहना है कि फैरारा जी बहुत ताकतवर हैं यानि उनको बहुत जगह मिल रही रही है अपनी बात कहने के लिए, टीवी में, अखबार में, और उन्हें रोकना आवश्यक है, किसी भी तरीके से. मुझे लगता है कि इस तरह से सोचने वाले गलत हैं.

मैं मानता हूँ कि हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का, लिखने का, कला में बनाने का, फ़िल्म में बनाने का, हर तरह से अभिव्यक्त करने का हक है, जाहे वह जिस विषय पर हो, चाहे वह किसी धर्म के बारे में हो, किसी देवता के बारे में, सेक्स के बारे में, राजनीति के बारे में. बस दो ही शर्तें हैं, एक किसी के मरने मारने को, किसी तरह की हिंसा के लिए न उकसाया जाये, और दूसरी, अन्य किसी व्यक्ति विषेश की निजी बातों के बारे में नहीं बोल सकते. साथ ही छोटे बच्चों के बचाव के लिए स्पष्ट जानकारी होनी चाहिये.

यह कहना कि इससे या उससे इस धर्म का अपमान होता है, या फ़िर नैतिक रूप से यह बात गलत है, इत्यादि और किसी की अभिव्यक्ति को रकने की कोशिश करना मुझे गलत लगता है. कुछ भी पढ़ कर आहत महसूस करना, अपमानित महसूस करना, इस लिए इसे बैन करो, उसे बंद करो, मुझे गलत लगते हैं क्योंकि आप कुछ भी करलो, कोई न कोई नाखुश हो ही जाता है. कोई जबरदस्ती नहीं कि आप यह फ़िल्म देखो, या वह किताब पढ़ो, या इसकी बात सुनो, आप कुछ और करो, जो आप को अच्छा लगता है, पर यह कहना कि दूसरे भी इसे न पढ़े, देखें, सुने, जबरदस्ती है.

3 टिप्‍पणियां:

  1. आप का ब्लाग अच्छा लगा।... परदेस में माटी की महक काफी सुहाती हैं उम्मीद है हम संपर्क में रहेंगे
    शुभकामनाओं सहित

    दीपक नरेश
    एसोसिएट प्रोड्यूसर
    टीवी टुडे नेटवर्क लिमिटेड
    दिल्ली, भारत
    MY BLOG.. rajabanaras.blogspot.com
    mail id: nareshdeepak@gmail.com

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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